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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

७०८ कथासरित्सागर

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७०८ कथासरित्सागर तस्या रूपेण नृत्तेन गीतेन च हृतात्मनः । वणिजोऽथ स्थितस्याथ तस्य मासद्वयं ययौ ॥८८॥ तावच्च तस्य सुन्दर्ये कोट्यो द्वे स ददौ क्रमात् । अथोपैरार्यदत्ताख्यः सखा स्वरमुवाच तम् ॥८९॥ सख किं कुट्टनीशिक्षा सा यत्नोपार्जितापि ते । कातरस्यास्त्रविद्येव निष्फलावसरे गता ॥९०॥ वेश्याप्रमणि सद्भावो यदस्मिन् दृश्यते त्वया । सत्यं भवति किं जातु जलं मरुमरीचिषु ॥९१॥ तत्सर्वं क्षीयते यावदिहैव न धनं तव । तावद्ब्रजामो बुद्ध्वा हि क्षमेतैतत्पिता न ते ॥९२॥ इत्युक्तस्तेन मित्रेण वणिक्पुत्रो जगाद सः । सत्यं न वेश्यास्वाश्वासः सुन्दरी तु न तादृशी ॥९३॥ क्षणं हि मामपश्यन्ती मुञ्चेत् प्राणानसौ सखे । तद्गत्वा बोधयस्वैतां गन्तव्यं यदि सर्वथा ॥९४॥ एवमुक्तः स तेनार्यदत्तस्तस्यैव सन्निधौ । मातुर्मकरदंष्ट्रायाश्च सुन्दरीमवदत्ततः ॥९५॥ यन्न तावत्सामान्या प्रीतिरीश्वरकर्मणि । गन्तव्यं चाधुनावश्यं स्वर्णद्वीपं वणिज्यया ॥९६॥ ततः प्राप्स्यरयं लक्ष्मीं ययागत्य त्वदन्तिके । यावत्कालं सुखं स्थास्यत्यनुमन्यस्व तत्सखि ॥९७॥ तच्छ्रुत्वा साधुममना पश्यन्तीश्वरवन्ममः । मुखं कृतविषादा सा सुन्दरी च तमभ्यधात् ॥९८॥ यूयं जानीत किमयं वक्ष्यन्तमन्वेक्ष्य कः । कस्य प्रयति सद्यत्नं यदिभर्ता विधिर्मम ॥९९॥ तच्छ्रुत्वोवाच माता तां मा क्षुभं धृतिरस्तु ते । एप्यत्येव प्रियोऽय ते सिद्धार्थस्त्वां न हास्यति ॥१००॥ इति माता विभाव्यास्य कृतसंवित्त्या गृह। मार्गप्रि गुप्तमस्मन् कूपे जासमकारयत् ॥१ १॥


१ भीतोरित्यर्थः ।

दशम लम्बक ५०९

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[Header] दशम लम्बक ५०९

उसके सौन्दर्य नृत्य संगीत आदि पर मुग्ध ईश्वरवर्मा को वहाँ रहते-रहते दो महीने बीत गये ॥८८॥ तब तक वह सुन्दरी को दो करोड़ मुद्रा का धन दे चुका था। तब उसका मित्र अर्थदत्त एकान्त में आकर उससे कहने लगा—॥८९॥ 'मित्र इतने प्रयत्न से प्राप्त की गई उस कुट्टनी की शिक्षा क्या डरपोक की अस्त्र विद्या के समान समय पर ही निष्फल हो गई ॥९०॥ यदि तुम इस वेश्या के प्रेम में सच्ची भावना का अनुभव कर रहे हो तो यह समझना उचित है कि मरुस्थल की मृगतृष्णा में जल अवश्य है ॥९१॥ इसलिए, यह सारा धन जबतक समाप्त नहीं होता तबतक यहाँ से निकल चलें। तुम्हारे पिता इस सारे धन का अपव्यय जानकर कभी तुम्हें क्षमा नहीं करेंगे ॥९२॥ उस मित्र के इस प्रकार कहने पर ईश्वरवर्मा ने कहा—सच है वेश्या पर विश्वास न करना चाहिए, किन्तु यह सुन्दरी ऐसी अविश्वास्य नहीं है ॥९३॥ वह तो मुझे एक क्षण भी न देखकर प्राण छोड़ देगी। इसलिए, यदि चलना है तो उसे समझाकर समझाओ' ॥९४॥ ईश्वरवर्मा से इस प्रकार कहा गया अर्थवर्मा उस सुन्दरी के पास गया और उसकी माता मकरकटी के सामने ही उससे बोला—॥९५॥ यह सच है कि ईश्वरवर्मा पर तुम्हारा असाधारण प्रेम है। किन्तु, व्यापार के लिए स्वर्णद्वीप जाना भी अब आवश्यक हो गया है ॥९६॥ वहाँ से यह धन कमायेगा तो बहुत समय तक तुम्हारे पास रहेगा। इसलिए, उसे जाने दो' ॥९७॥ यह सुनकर आँखों में आँसू भरकर ईश्वरवर्मा के मुंह की ओर देखती हुई सुन्दरी अर्थदत्त से बोली—॥९८॥ आपलोग ही जानें मैं क्या कहूँ। अन्त देखे बिना कौन किसका विश्वास करता है? भाग्य जो न कराये ॥९९॥ यह सुनकर उसकी माता कहने लगी--यह तुम्हारा प्रेमी धन कमाकर फिर आयगा वह तुम्हें छोड़ेगा नहीं' ॥१००॥ उसकी माता ने इस प्रकार उसे आश्वासन देकर और उससे सम्मति करके रास्ते में पड़नेवाले एक गुप्त कुएँ में बाल बँधवा दिया ॥१०१॥

७१ कथासरित्सागर

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७१ कथासरित्सागर तदा चेश्वरवर्माभूत्तद्दोलाऽऽरूढमानसः। शुचेवाल्पाल्पमाहारपानं चक्रे च सुन्दरी ॥१०२॥ गीतवादित्रनृत्तेषु न बबन्ध रतिं च सा। आश्वास्यते स्म प्रणयैस्तत्परीश्वरवर्मणा ॥१०३॥ ततो दिने वयस्योक्ते सुन्दरीमन्दिरात्ततः। चचालेश्वरवर्मा स कुट्टनीकृतमङ्गलः ॥१०४॥ अनुवव्राज यावच्च सुन्दरी तं समातृका। नगराद्बहिराकूपाद्बद्धान्तर्जलिकान्ततः । ॥१०५॥ ततो निवर्त्य यावच्च सुन्दरी तां प्रयाति सः। तावदम्बा तया कूपे जानुप्लुप्ते निक्षिपिप ॥१०६॥ हा हा स्वामिनि हा पुत्रीत्याक्रन्द्य सुमहांस्ततः। दासीनां भृत्यवर्गस्य तन्मातुश्चात्र शुश्रुवे ॥१०७॥ तेन प्रतिनिवृत्यैव समित्रः स वणिक्सुतः। कूपे क्षिप्ततनुं कान्तां बुद्ध्वा मोहमगात्क्षणम् ॥१०८॥ सप्रलापं च शोचन्तौ तस्मिन् मकरकट्धवः। स्वानबातारयद् भृत्यान्कूपे स्निग्धान् ससंबिदः¹॥१०९॥ रज्जुभिस्तेऽवतीर्यैवं दिष्ट्या जीवति जीवति। इत्युक्त्वा तां तत कूपादुत्क्षिपन्ति स्म सुन्दरीम् ॥११०॥ उत्क्षिप्ता मृतकल्पा सा क्रूरात्मानं निवेदितम्। प्रत्यागतं वणिक्पुत्रमालापं शनकैर्ददौ ॥१११॥ समाश्वस्तां समादाय हृष्टस्तां सानुगः प्रियाम्। अगादीश्वरवर्मासौ प्रत्यावृत्यैव तद्गृहम् ॥११२॥ निश्चित्य सुन्दरीप्रेमप्रत्ययं जन्मः फलम्। तत्प्राप्तिमेव मत्वा स यात्रामुद्धिं पुनर्ब्रही ॥११३॥ ततो ह्यद्यस्थितिं तत्र सोऽप्यंवस्त सखा पुनः। तमम्यधात् सखे मोहात्विमात्मा नाशितस्त्वया ॥११४॥ मा भूत्त सुन्दरीसमहप्रत्ययं कूपपाततः। अतश्चर्या कुट्टनीकूटरचना हि विधरपि ॥११५॥ १ प्रथममेव शिक्षितान्।

दशम लम्बक ७११

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दशम लम्बक ७११ तब ईश्वरवर्मा का चित्त संशय में पड़ गया। उधर उसके शोक से ही मानों सुन्दरी के भोजन आदि की मात्रा भी घट गई। अर्थात् उसने शोक प्रकट करने के लिए अपना खाना-पीना कम कर दिया ॥१९२॥ अब नाचने गाने और बजाने में वह उतना प्रेम प्रदर्शित नहीं करती थी। ईश्वरवर्मा उसे विविध प्रकार से धीरज और आश्वासन देता था ॥१९३॥ तदनन्तर, मित्र के बताये हुए दिन वह ईश्वरवर्मा सुन्दरी के घर से यात्रा के लिए निकला और कुट्टनी ने यात्रा के शकुन आदि करके मंगलाचार किया ॥१९४॥ रोती हुई सुन्दरी माता के साथ उस कुएं तक उसे पहुँचाने के लिए गई जिसके ऊपर जाल बँधा हुआ था ॥१९५॥ तदनन्तर जब ईश्वरवर्मा सुन्दरी को लौटाकर आगे चला तब सुन्दरी ने अपने को उस बँधे हुए जालवाले कूप में गिरा दिया ॥१९६॥ तब 'हाय मालकिन! हाय बेटी! - इस प्रकार की चिल्लाहट उसकी सेविकाएँ और माता करने लगीं। चिल्लाहट सुनकर मित्र के साथ वह वैश्यपुत्र लौट आया और अपनी प्रेयसी को कुएँ में गिरा जानकर मूच्छित हो गया ॥१९७-१९८॥ तदनन्तर, प्रलाप के साथ कन्या के लिए शोक प्रकट करती हुई मकरकटी ने पहले से ही साधे हुए अपने सेवकों को रस्सी के सहारे उस कूप में उतारा। उन्होंने 'भाग्य से जी रही है जी रही है, इस प्रकार कहकर सुन्दरी को कुएँ से बाहर निकाला। वह अपने को मूर्च्छ के समान बनाये हुए थी। लौटे हुए ईश्वरवर्मा से उसने टूटे-फूटे शब्दों में धीरे-धीरे कुछ अस्पष्ट-सी बात कहीं ॥१९९-१११॥ कुछ समय के पश्चात् स्वस्थ हुई उस प्रेयसी को लेकर ईश्वरवर्मा प्रसन्नचित होकर अपने अनुयायियों के साथ लौटकर फिर सुन्दरी के ही घर में आ गया ॥११२॥ और, सुन्दरी के प्रेम का विश्वास प्राप्त कर उसने अपने जन्म को सफल समझा तथा उसकी प्राप्ति को ही सर्वप्राप्ति समझकर यात्रा का विचार त्याग दिया ॥११३॥ तब वहीं जमकर रहते हुए ईश्वरवर्मा को उसके मित्र अर्थदत्त ने फिर उससे कहा- 'मित्र मोह में पड़कर तुमने फिर अपना नाश कर लिया ॥११४॥ कूप में गिरने से तुम्हें सुन्दरी के स्नेह का विश्वास नहीं कर लेना चाहिए। कुट्टनी की माया-रचना को ब्रह्मा भी नहीं समझ सकता ॥११५॥

७१२ कथासरित्सागर

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७१२ कथासरित्सागर पितुश्च क्षपितार्थं किं वक्ष्यस यास्यसि क्व वा। तदितोऽद्यापि निर्याहि कल्याणे चेन्मतिस्तव ॥११६॥ एतत्तस्य वचः सख्यूर्र्वधीर्यं वणिग्युवा। मासेनाप्यव्ययीचक्रे तत्र कोटित्रयं स तत् ॥११७॥ ततो हृतस्वो दत्तार्धचन्द्रः सुन्दरीगृहात्। तया मकरदंष्ट्राख्य कुट्टन्या निरकाश्यत ॥११८॥ अर्थदत्तादयस्तं च गत्वा स्वनगरं द्रुतम्। तत्पित्रे तत्समाचख्युर्यथावृत्तमशेषतः ॥११९॥ स तत्पिता रत्नवर्मा तद्बुद्ध्वा दुःखितो भृशम्। कुट्टनीं यमजिह्वां तां गत्वावोचद्वणिग्पतिः ॥१२०॥ गृहीत्वा मूल्यमीदृक् त्वया मे शिक्षितः सुतः। हृत मकरदंष्ट्रा यत्सर्वस्वं तस्य हर्म्यया ॥१२१॥ इत्युक्त्वा पुत्रवृत्तान्तं तस्यै स समवर्णयत्। ततः सा यमजिह्वां तं वृद्धकुट्टन्यभाषत ॥१२२॥ आनाययेह पुत्रं ते करिष्यामि तथा यथा। सम्या मकरदंष्ट्रास्तत्सर्वस्वं स हरिष्यति ॥१२३॥ एवं तया प्रतिज्ञाते कुट्टन्या यमजिह्वया। तदद्य शीघ्र मन्विष्य भूय्या गानपुरःसरम् ॥१२४॥ रत्नवर्मा ततस्तस्य पुत्रस्यानयनाय च। तन्मित्रमर्थदत्तं च प्रजिघाय हितैषिणम् ॥१२५॥ अर्थदत्त स गत्वा च तत्काञ्चनपुरं पुरम्। तस्मै शं शंस सन्देशं शसदेवरवर्मणः ॥१२६॥ पुनरत्र धात्रवीमित्र माकार्षीस्त्वं बथा हि मे। तदद्य वेदषामद्भावो दृष्ट प्रत्यक्षासत्प्रथया ॥१२७॥ अथधन्तस्खया प्राप्ता दृष्ट्वा ततोऽपिऽऽवदम्। कः प्राज्ञा बाञ्छतिरतन् वश्यासु गिरसासु च ॥१२८॥ विमुच्यते वा भवता वग्गुपमौन्यमीदृशः। तावद्विगन्धो धीरदप नरो भागी शुभस्य च ॥१२९॥ यावन्नमति नेत्राण रामाविभ्रमभूमिषु। तदागच्छ पितुः पार्श्वं मय्यूप्रतिश्रोति कुरु ॥१३०॥

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पिता का धन, नष्ट करने के बाद उनसे क्या कहोगे और कहाँ जाओगे ? इसलिए यदि अपना कल्याण चाहते हो तो अब भी यहाँ से निकल चलो' ॥११६॥ उस युवक ने मित्र का कहना न मानकर शेष तीन करोड़ मुद्रा भी व्यय कर डाली ॥११७॥ सारा धन समाप्त होने पर कुट्टनी मकरकटी ने ईश्वरवर्मा को सेवकों (नौकरों) द्वारा अर्धचन्द्र (गरदनिया) दिलवाकर निकलवा दिया ॥११८॥ तब अर्थदत्त आदि उसके साथियों ने अपने नगर में जाकर उसके पिता को सम्पूर्ण समाचार यथावत् सुना दिया ॥११९॥ यह समाचार सुनकर व्यापारियों का चौधरी रत्नवर्मा अत्यन्त दुःखी होकर यमजिह्वा कुट्टनी के पास आकर बोला- ॥१२० ॥ 'तूने इतना धन लेकर मेरे पुत्र को शिक्षा दी और मकरकटी ने सरलता के साथ उससे पाँच करोड़ मुद्रा ठग ली' ॥१२१॥ इस प्रकार कहकर उसने पुत्र का सम्पूर्ण समाचार उसे सुना दिया। तब उस वृद्धा कुट्टनी यमजिह्वा ने कहा- ॥१२२॥ 'अपने पुत्र को तुम यहाँ बुलवाओ। मैं उसे ऐसी शिक्षा दूँगी कि वह मकरकटी का सारा धन (सर्वस्व) हरण कर लेगा' ॥१२३॥ कुट्टनी यमजिह्वा के इस प्रकार प्रतिज्ञा करने पर रत्नवर्मा ने पुत्र के हितैषी मित्र अर्थदत्त को दान आदि का प्रलोभन देकर ईश्वरवर्मा को बुलाने के लिए भेजा ॥१२४ १२५॥ वह अर्थदत्त उस कांचनपुर में जाकर ईश्वरवर्मा से फिर बोला कि 'तूने मेरी बात नहीं मानी। आज वेश्या का सच्चा प्रेम तूने देख लिया। पाँच करोड़ मुद्रा देकर अर्धचन्द्र पाया। कौन बुद्धिमान् वेश्या में और बाल में स्नेह (प्रेम और तेल) चाहता है ॥१२६-१२८॥ तुम्हें क्या कहूँ? यह वस्तु का स्वाभाविक धर्म है। चतुर और वीर व्यक्ति तभी तक सम्मान के भागी होते हैं जबतक स्त्री की विलास-वासना में नहीं पड़ते। इसलिए अब चलो और अपने पिता के शोक को दूर करो ॥१२९-३१ ॥

४३४ कथासरित्सागर

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४३४ कथासरित्सागर इत्युक्त्वा सोऽर्धदन्तेन तेनानीयत सत्वरम्। आश्वास्येश्वरवर्मासौ पितुः पार्श्वमुपागतः ॥१३१॥ पित्रा चैकसुतस्नेहात् सान्त्वयित्वैव तन सः। नीतोऽभूच्चमचित्ताया कुट्टन्या निकटं पुनः ॥१३२॥ पृष्टश्चात्र तयाश्वस्यो सार्श्वदन्तमुखं तम्। स्वोदन्तं सुन्दरीकूपनिपातान्तं धनक्षयम् ॥१३३॥ यमजिह्वा ततोऽब्रवीदहमेवापराधिनी। यद्विस्मृत्य मया मायामत्तामेवं न शिक्षितः ॥१३४॥ कूपे मकरकट्या हि जाल्मन्तर्न्यधम्यतः। तत्पृष्ठे सुन्दरी देहमक्षिपन्न ममार यत् ॥१३५॥ तदत्रास्ति प्रतीकार इत्युक्त्वा सापि कुट्टनी। आनाययत्स्ववासीभिरालुं नाम स्वमर्कटम् ॥१३६॥ दत्त्वाग्रे स्वं च दीनारसहस्रं तमुवाच सा। निगिलेति शतं सोऽपि शिक्षितस्तन्निगीर्णवान् ॥१३७॥ पुत्रास्मै विंशतिं देहि देह्यस्मै पञ्चविंशतिम्। षष्टिमस्मै शतं चास्मा इति मानाख्यमेषु च ॥१३८॥ दाप्यमानो निगीर्णांस्तांस्तयाग्रे यमजिह्वया। उद्गीर्योद्गीर्य दीनारांस्तत्तथैव स कपिर्ददौ ॥१३९॥ आत्मयुक्तिं प्रदर्शैतां यमजिह्वाब्रवीत्सुतम्। गृहाणेश्वरवर्मंस्त्वमेतं मर्कटपोतकम् ॥१४०॥ पुनस्तत्सुन्दरीवेश्म प्राग्वद् गत्वा दिने दिने। एवं गुप्तनिगीर्णांस्ता मुञ्चयस्वामृता व्यये ॥१४१॥ दृष्ट्वा चिन्तामणिप्रख्यं सतमालं च सुन्दरी। दत्त्वा ते प्रार्थ्य सर्वस्वं कपिमेकं ग्रहीष्यति ॥१४२॥ गृहीतवस्नो दत्त्वा निगीर्णाहूंतयंमयम्। इमं तस्यै ततो दूरं यायास्त्वमविलम्बितम् ॥१४३॥ इत्युक्त्वा यमजिह्वा तत्समायीश्वरवर्मणे। मर्कटं तं ददौ भाण्डं पिता कोटिद्वयस्य च ॥१४४॥ तद्गृहीत्वैव स प्रायात्तत्काञ्चनपुरं पुनः। सृष्टाप्रदूतं सुन्दर्या तद्गृहं प्रविवेश च ॥१४५॥

दशम लम्बक ७३५

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दशम लम्बक ७३५

वह ईश्वरवर्मा अर्थदत्त के इस प्रकार समझाने और आशा दिखाने पर, किसी प्रकार पिता के पास लाया गया ॥१३१॥ उसका पिता एकमात्र पुत्र के स्नेह के कारण उसे फिर यमजिह्वा कुट्टनी के पास ले गया ॥१३२॥ पूछने पर ईश्वरवर्मा ने सुन्दरी के कूप में गिरने और धनक्षय आदि का सारा वृत्तान्त अर्थदत्त के मुंह से पिता को सुना दिया ॥१३३॥ तब यमजिह्वा बोली कि मैं ही इसकी अपराधिनी हूँ जो मैंने वेश्याओं की माया इसे नहीं सिखाई ॥१३४॥ मकरकटी ने कूप के अन्दर जाल बँधवा दिया था उसी पर सुन्दरी गिरी और मरी नहीं ॥१३५॥ तो अब इसका भी उपाय है ऐसा कहकर कुट्टनी ने अपने 'आल' नामक बन्दर को वहाँ बुलवाया ॥१३६॥ उसके आगे अपना एक हजार दीनार रखकर बन्दर से वह बोली कि इसे निगल जा। वह शिक्षित बन्दर देखते ही उसे निगल गया ॥१३७॥ 'बेटा इसे बीस दीनार दो इसे पच्चीस दो इसे साठ दो और इसे सौ दो' इस प्रकार भिन्न भिन्न प्रकार के व्यय मार्गों में यमजिह्वा द्वारा दिलाये हुए दीनारों को उस बन्दर ने उगलकर दे दिया ॥१३८-१३९॥ आल नामक बन्दर की यह युक्ति दिखाकर कुट्टनी फिर बोली-'बेटा ईश्वरवर्मा तुम इस बन्दर के बच्चे को ले लो। और फिर उस सुन्दरी के घर में पहले की भाँति रहना प्रारम्भ कर दो। और, व्यय के लिए इसी प्रकार समय-समय पर बन्दर से धन माँगा करना ॥१४०-१४१॥ तब वह सुन्दरी चिन्तामणि के समान इस बन्दर को अपना सर्वस्व देकर भी तुमसे लेना चाहेगी ॥१४२॥ इस प्रकार, उसका धन लेकर और इससे दो दिनों का व्यय निकलवाकर तुम शीघ्र ही उससे दूर चले जाना' ॥१४३॥ ऐसा कहकर उस यमजिह्वा ने उस बन्दर को ईश्वरवर्मा के लिए दे दिया। और, उसके पिता ने भी दो करोड़ रुपय का धन उसे दिया ॥१४४॥ यह सब लेकर ईश्वरवर्मा फिर से कांचनपुर गया और दूत के द्वारा पहले उस (सुन्दरी वेश्या को) सूचित करके उसके घर पर गया ॥१४५॥

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सा तं साधनसर्वस्वं निर्ग्रन्थमिव सुन्दरी। अभ्यनन्दत् । ससूहूव कण्ठाश्लेपादिसम्भ्रमः ॥१४६॥ विश्वास्येश्वरवर्माणं तत्समक्षं क्षणान्तरे। आछमानय गत्वेति सोऽर्षदत्तमभाषत ॥१४७॥ तथेति तेन गत्वा च समानीयत मर्कटः। निर्मीर्णपूर्वदीनारसहस्रं स जगाद तम् ॥१४८॥ बाल पुत्र प्रयच्छाशु दीनाराणां शतत्रयम्। आहारपानस्य कृते ताम्बूलादिश्यये शतम् ॥१४९॥ शतं मकरकट्याय च वेश्याम्बाय द्विजातिषु। क्षत शेषं सहस्रात्तत्सुन्दर्यै तत्समर्पय ॥१५०॥ एवमीश्वरवर्मोक्तो मर्कट स तभव तान्। उद्गीर्योद्गीर्य दीनारान् प्राङ्निगीर्णान्यथेष्वदात् ॥१५१॥ इत्य युक्त्यानया नित्यं यावदीश्वरवमणा। आत्तो व्ययेषु दीनारान्वाप्यते पक्षमात्रकम् ॥१५२॥ तावन्मकरकट्यथ सुन्दरी च व्यचिन्तयत्। अहो चिन्तामणिरयं सिद्धोऽस्य कपिरूपधृत् ॥१५३॥ दिने दिने सहस्रं यो दीनाराणां प्रयच्छति। एषोऽमुना चेषस्माकं वत्त सिद्ध मनोरथैः ॥१५४॥ इत्यालोच्य समं मात्रा विजनऽर्भयते स्म सम्। सुन्दरीश्वरवर्माणं भुक्तोत्तरसुखस्थितम् ॥१५५॥ प्रसादो मयि सत्यं चेशारूभेतं प्रयच्छ मे। तच्छ्रुत्वेश्वरवर्मा तां निजगाद हसन्निव ॥१५६॥ असौ तातस्य सर्वस्वं तच्च दातुं न युज्यत। इत्यूचिवांस च पुन सुन्दरी तमुवाच सा ॥१५७॥ ददामि पञ्चकोटीस्त्वमेतदथ दीयतामिति। तत ईश्वरवर्मा च निश्चित्यव जगाद तम् ॥१५८॥ ददासि यदि सर्वस्वमिदं वा नगर मम। तथापि युज्यते नैष दातुं किमिति कोटिभिः ॥१५९॥ श्रुत्वैतत्सुन्दरी स्माह सर्वस्वं त ददाम्यहम्। देहोतं मकट मह्यमम्बा कुप्यतु नाम मे ॥१६०॥

द्वादश लम्बक ७१७

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द्वादश लम्बक ७१७ उस सुन्दरी ने ईश्वरवर्मा को फिर सब साधनों से युक्त देखकर मित्र के साथ उसका स्वागत-अभिनन्दन किया और उसे गले से लगाकर पूर्ववत् प्रेम प्रदर्शित किया ॥१४६॥ ईश्वरवर्मा ने भी उस समय की उचित बातों से उसे विश्वास दिलाकर अपने मित्र अर्थदत्त से कहा कि 'जाओ' बन्दर को ले आओ ॥१४७॥ 'अच्छा' कहकर अर्थदत्त बन्दर को ले आया। पहले से ही एक हजार दीनारों को निगले हुए बन्दर से ईश्वरवर्मा ने कहा- 'बेटा आज दो सौ भोजन-पानी के लिए और एक सौ पान-इत्र आदि के लिए, इस प्रकार तीन सौ दीनार दो ॥१४८-१४९॥ एक सौ माता मकरकटी को ब्राह्मणों को बाँटने के लिए और हजार में से शेष सौ सुन्दरी को दे दो ॥१५०॥ ईश्वरवर्मा से इस प्रकार कहे गये बन्दर ने उसी प्रकार उगल-उगलकर पहले निगले हुए दीनारों का उन-उन व्ययों के लिए दे दिया ॥१५१॥ इस प्रकार, ईश्वरवर्मा से कहा गया बन्दर एक पक्ष तक व्यय के लिए प्रतिदिन दीनार देता रहा ॥१५२॥ यह देखकर मकरकटी और सुन्दरी ने सोचा-ओह ! ईश्वरवर्मा का बन्दर के रूप में यह चिन्तामणि मित्र है ॥१५३॥ जो प्रतिदिन इसे एक हजार दीनार देता है यदि इसे ही यह हम दे दे तो हमारा मनोरथ ही सिद्ध हो जाय ॥१५४॥ माता से सुन्दरी ने इस प्रकार विचार करके एकान्त में भोजन के बाद गपशप में बैठे हुए ईश्वरवर्मा से उस बन्दर की माँग की ॥१५५॥ यदि मुझ पर तेरी कृपा या सच्चा प्रेम है तो इस बन्दर को मुझे दे दो। यह सुनकर ईश्वरवर्मा बनावटी हँसी हँसता हुआ बोला—॥१५६॥ यह मेरे पिता का सर्वस्व है इसलिए इसे मैं नहीं दे सकता। इस प्रकार कहते हुए ईश्वरवर्मा से सुन्दरी ने कहा- मैं तुम्हें पाँच करोड़ मुद्रा देती हूँ तुम मुझे दे दो। तब ईश्वरवर्मा गाढ़ा निश्चय करके बोला—'यदि तू मुझे अपना सर्वस्व दे दे या सारा नगर भी दे दे तो भी मैं इसे नहीं दे सकता। करोड़ों से क्या होता है ॥१५७-१५८॥ यह सुनकर सुन्दरी बोली—'मैं अपना सर्वस्व तुम्हें दे दूँगी। तुम यह बन्दर दे दो। भले ही माता उस पर कुपित हो ॥१५९॥

७१८ कथासरित्सागर

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७१८ कथासरित्सागर इत्युक्त्वा सुन्दरी पादौ जग्राहेष्वरवर्मणः। ऊचुस्ततोऽर्थदत्ताद्या दीयतां यद्वमत्विति॥१६१॥ ततश्चेश्वरवर्मा तं तथा दातुममन्यत। अनयत्सह सुन्दर्या दिनं तच्च प्रहृष्टया॥१६२॥ प्रातश्चाभ्यर्थमानायै सुन्दर्यै मर्कटं स तम्। निगीर्णगुप्तदीनारसहस्रत्रितयं ददौ॥१६३॥ तन्मूल्यं गृहसर्वस्वं तस्याश्चादाय तत्क्षणम्। ततः प्रायाद्द्रुतं पोतात् स्वर्णद्वीपं वणिग्जया॥१६४॥ सुन्दर्यै च प्रहृष्टायै ददावासौ दिनद्वयम्। स सहस्रं सहस्रं तान् दीनारान्व्यधित कपिः॥१६५॥ तृतीयेऽह्न्वथ सत्प्रीत्या याच्यमानोऽप्यसौ यदा। नादात्किञ्चित्तदा मुष्ट्या सुन्दरी तमताडयत्॥१६६॥ स ताडितः क्रुधोत्पत्य मर्कटो दशनैर्नखैः। सुन्दर्यास्तज्जनन्यश्च घ्नन्त्याः पाटितवान् मुखम्॥१६७॥ ततस्तज्जननी सा तु स्रवद्रक्तमुखी क्रुधा। लगुडैस्ताडयामास तं तावद्यावन्ममार सः॥१६८॥ तं मृतं वीक्ष्य सर्वस्वं नष्टमालोक्य दुःखिता। प्रायत्यागोद्यता साभूज्जनन्य सह सुन्दरी॥१६९॥ जालं मकरकन्द्या यत्कृत्वा यस्य हृतं धनम्। आप्त कृत्यैव तस्यान्याः सर्वस्वं सुधिया हृतम्॥१७०॥ त्याग्यस्य कृतं जालमालं ज्ञातं तु नात्मनः। इत्युक्ताचात्र विज्ञातवृत्तान्तो विहसञ्जनः॥१७१॥ ततः सा सुन्दरी कुब्जा देहत्यागान्न्यवर्त्तत। स्वजनैर्जननीयुक्ता नष्टार्था पाटितानना॥१७२॥ स चार्जिताधिकधीः स्वर्णदीपात्ततोऽचिरात्। आगादीश्वरवर्मा तच्चित्रकूटं पितुर्गृहम्॥१७३॥ समुपागतमर्जितामितार्थं सुतमालोक्य पिता च रत्नवर्मा। अभिपूज्य स कुट्टनीं धनेन यमजिह्वां सुमहोत्सवं चकार॥१७४॥ स च विदितातुलमायो विरक्तचेता विलासिनीसङ्गे। आसीदीश्वरवर्मा ततोऽत्र कृतदारसङ्ग्रहः स्वगृहे॥१७५॥

द्वादश लम्बक ७११

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द्वादश लम्बक ७११ इस प्रकार कहकर सुन्दरी ने ईश्वरवर्मा के पैर पकड़ लिये। तब जयदत्त आदि ने ईश्वरवर्मा से कहा—दे दो जाने दो ॥१६१॥ ईश्वरवर्मा ने इस प्रकार (सुन्दरी का सर्वस्व लेकर) उसे लेना स्वीकार कर लिया और उस दिन को प्रसन्न सुन्दरी के साथ आनन्द में बिता दिया ॥१६२॥ प्रातःकाल ही मांगती हुई सुन्दरी को दो हजार दीनार नियमे हुए बन्दर ने दे दिये ॥१६३॥ और उसके मूल्य में सुन्दरी के घर का सर्वस्व लेकर वह व्यापार के लिए स्वर्णद्वीप को चला गया ॥१६४॥ बन्दर को पाकर प्रसन्न सुन्दरी को वह मात्र दो दिना तक मांगने पर दीनार देता रहा ॥१६५॥ तीसरे दिन प्रेमपूर्वक बार-बार मांगने पर भी जब उसने कुछ नहीं दिया तब सुन्दरी ने उसे मुक्कों से मारा ॥१६६॥ मुक्कों से मारे गए बन्दर ने क्रोध से उछलकर मारती हुई सुन्दरी और उसकी माता का मुख दाँतों और नखों से नोंच डाला ॥१६७॥ तब मुँह से बहते हुए रक्तवाली मकरन्दीका ने डंडा से उस बन्दर को ऐसा मारा कि वह मर गया ॥१६८॥ आप को क्षत और अपने मङ्कर को आहत देखकर वह सुन्दरी माता के साथ मरने के लिए तैयार हो गई ॥१६९॥ "मकरन्दिका ने धूर्त से जाल लगाकर जिसका धन हरण कर लिया था उस बुद्धिमान् ने बांन के द्वारा उसका सर्वस्व हरण कर लिया ॥१७०॥ बन्दरी ने दूसरे के लिए जाल बिछाया किन्तु अपने लिए आज का शूल लगाया उसका समाचार जाननेवाले सभी लोग ऐसा कहकर हँसने लगे ॥१७१॥ तब शहर के सामन्तवर गुणधारी सुन्दरी को भी कषाय ग्रहण के लिए उद्योग देखकर उसके कुलस्त्रियों से वार्ता सर्वप्रार्थ किया गया ॥१७२॥ वह ईश्वरवर्मा स्वर्णद्वीप से अधिक धन कमाकर शीघ्र ही लौटकर अपने पिता के पास चित्रकूट नगर में पहुँचा ॥१७३॥ अनन्त धन कमाकर लौट हुए पुत्र ईश्वरवर्मा को देखकर उसके पिता रत्नवर्मा ने सर्वविद्या बहुरी का पुरस्कार अर्थ देकर बड़ा उत्सव मनाया ॥१७४॥ वह ईश्वरवर्मा भी उस वेश्या के उस स्त्री के कपट को देखकर उससे विरक्त होकर और विवाह करके अपने घर में आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥१७५॥

७२० कथासरित्सागर

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७२० कथासरित्सागर एष नरेन्द्र वनिताहृदये न जातु धूतादृते वसति सत्यकथाल्पोऽपि। उत्सार्यसाध्यगमनासु सवत्सासु धूयाटबीष्विव रमेत न मूतिकायाम्॥१७६॥ इति मरुभूतयेदमाख्याय स ययावदारुजामकथाम्। नरवाहनदत्तस्तच्छ्रौषाय जहास गोमुखादियुतः ॥१७७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे शक्तियशोशम्भके प्रथमस्तरङ्गः ।

द्वितीयस्तरङ्गः राज्ञो विक्रमसिंहस्य कुमुदिकावेश्यायाश्च कथा एवं वेश्यास्वसद्भावे कथिते मरुभूतिना। आचख्यौ गोमुखो धीमांस्तद्वत्कुमुदिकाकथाम् ॥१॥ आसीद्विक्रमसिंहाख्यः प्रतिष्ठाने महीपतिः । व्यधायि विधिनान्वर्थो यः सिंह इव विक्रमे ॥२॥ यस्येश्वरस्य सुभगा नवीनप्रमदा प्रिया । अनुङ्गारतनुर्देवी शशिप्रभेति नामतः ॥३॥ तमेकदा स्वनगरे स्थितं सम्भूय गोत्रजाः । पञ्चापा गृहमागत्य राजानं पर्यवेष्टयन् ॥४॥ महाभटो वीरबाहुः सुबाहुः सुभटस्तथा। नृप प्रतापादित्यश्च सर्वेऽप्येते महाबलाः ॥५॥ तेषु सामादि युञ्जानं निराकृत्य स्वमन्त्रिणम्। राजा विक्रमसिंहोऽसौ युद्धायैषां विनिर्ययौ ॥६॥ प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते स नृपः सैन्ययोर्द्वयोः । शौर्यदर्पावृगजारूढः प्रविवेशाहवं स्वयम् ॥७॥ धनुद्वितीयं दृष्ट्वा तं वक्ष्यस्तं द्विषच्चमूम्। महाभटाद्याः पञ्चापि राजानोऽभ्यपतन्समाम् ॥८॥ तद्बले च शमं भूयस्यस्मिन्नेप्यभिधावति। बलं विक्रमसिंहस्य तदतुल्यममन्यत ॥९॥ ततोऽनन्तगुणास्त्वस्ते मन्त्री पार्श्वस्थितोऽब्रवीत्। भग्नमस्मद्बलं तावज्जयो नास्तीह साम्प्रतम् ॥१०॥

द्वादश लम्बकः ७२१

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द्वादश लम्बकः ७२१ हे राजन्! इस प्रकार की स्त्री के हृदय में छल-कपट के बिना सरल बात का लेश भी नहीं रहता इसलिए ऐश्वर्य चाहनेवाले व्यक्ति को अर्थग्राध्य मूनि जंघक के समान भीषण विलासिनी स्त्रियों से प्रेम नहीं करना चाहिए ॥१७६॥ मरुभूति के मुंह से इस प्रकार आत्म-श्रास की कथा सुनकर और उस पर विश्वास करके नरवाहनदत्त गोमुख आदि मन्त्रियों के साथ हँसने लगा ॥१७७॥ महाकवि श्रीमत्सोमदेवभट्ट-विरचित कथामरित्सागर के शशित्वप्रभ लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त द्वितीय तरंग विक्रमसिंह और कुमुदिका वेश्या की कथा इस प्रकार मरुभूति द्वारा वेश्याओं के कृत्रिम प्रेम की कथा सुनाये जाने पर बुद्धिमान् गोमुख ने राजा विक्रमसिंह और कुमुदिका वेश्या की कथा इस प्रकार कही—॥१॥ प्रतिष्ठान नगर में विक्रमसिंह नाम का राजा था जिस विशाखान नाम के अनुसार पराक्रम में भी सिंह के समान बनाया था ॥२॥ उस राजा की शशिकला नाम की रानी थी जो उच्च वंश में उत्पन्न और सर्वांग सुन्दरी थी ॥३॥ एक बार अपने नगर से निष्कासित उसके पाँच दुष्ट भाई-बन्धुओ ने मिलकर उस पर किया। उन पांचों के नाम इस प्रकार थे-महाट, वीरबाहु, सुबाहु, सुभट और राजा प्रतापसिंह। (छठा स्वयं विक्रमसिंह था।) ये सभी महा बलवान् थे ॥४-५॥ जब राजा के मन्त्री उनके साथ सन्धि आदि करके उन्हें शान्त करने का यत्न कर रहे थे तभी राजा विक्रमसिंह मन्त्री के परामर्श का अनादर कर युद्ध के लिए बाहर निकल पड़ा ॥६॥ दोनों सेनाओं के बीच पत्थर की वर्षा शुरू होने पर वीरता के घमण्ड के साथ राजा स्वयं हाथी पर चढ़कर सेना में आ लगा। केवल धनुष लेकर शत्रु की सेना को कुचलते देख विक्रमसिंह के ऊपर पाँचों भ्रातृगण आदि राजा एक साथ ही टूट पड़े ॥७-८॥ शत्रुओं की भारी सेना के व्यूह में घुस जाने पर उस समय राजा विक्रमसिंह की सेना वशी में भाग निकली ॥९॥ जब उसके रथ घोड़े टूट ... नामक मन्त्री ने उससे कहा-'हमारी सेना के अन्दर बच रहें। इस समय विजय नहीं होगी ॥१०॥ ९१

७१२ कथासरित्सागर

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७१२ कथासरित्सागर विधूयास्मान् कृतघ्नाय दलवद्विग्रहस्त्वया। तच्छ्रिवायाधुनापीह मदीयं वचनं कुरु॥११॥ अवहृत्य द्विपावस्मादादाय च सुरङ्गमम्। एतान्यविषयं यामो जीवन् जेतास्यरीन् पुनः॥१२॥ इति मन्त्रिगिरा स्वैरमवतीर्य स वारणात्। हयारूढः समं तेन स्ववलाभिर्मयौ पुनः॥१३॥ ययौ च वेषच्छन्नः सन् सहितस्तेन मन्त्रिणा। राजा विक्रमसिंहोऽसौ क्रमादुज्जयिनीं पुरीम्॥१४॥ तस्यां कुमुदिकाख्यायाः प्रख्यातवसुसम्पदः। मन्त्रिवितीया वसतिं विलासिन्या विवेश सः॥१५॥ अकस्मात्तं गृहायातं दृष्ट्वा सापि व्यचिन्तयत्। पुण्यातिशयः कोऽपि ममायं गृहमागतः॥१६॥ तेजसा लक्ष्मणेनेष महान् राजेति शङ्क्यते। तन्मे यथेप्सितं सिद्ध्यद्यद्येषस्वीकृतो भवेत्॥१७॥ इत्यालोच्य समुत्थाय स्वगतेनाभिनन्द्य च। चकार महदातिथ्यं राज्ञः कुमुदिकास्य सा॥१८॥ विश्रान्तं च जगादैनं राजानं सा क्षणान्तरे। धन्याहमद्य सुकृतं प्राक्तनं फलितं मम॥१९॥ देवेन स्वयमागत्य यद्गृहं मे पवित्रितम्। तदनेन प्रसादेन क्रीता दासीयमस्मि ते॥२०॥ यदस्ति मे हस्तिशतं हयानां द्वे तथाथुते। मन्दिरं पूर्णरत्नं च तदायत्तमिदं तव॥२१॥ इत्युक्त्वा सा कुमुदिका राजानं समुपाचरत्। स्नानादिनोपचारेण महार्हेण समन्त्रिकम्॥२२॥ ततस्तन्मन्दिरे साकं तया तत्रार्पितस्वया। राजा विक्रमसिंहोऽसौ निशस्तिस्रो मवायसत्॥२३॥ बुभुजे द्रविणं तस्या याचकेभ्यो ददौ च सः। न च सादर्शयत्तस्य विकारं तुष्यति स्म तु॥२४॥ अहो मय्यनुरक्तेयमिति तुष्टं ततो नृपम्। तं सोऽनन्तगुणो मन्त्री रहोऽवादीत् सहस्थितः॥२५॥

दशम लम्बक

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दशम लम्बक ७२५ हमारी बात न मान कर तुमने बलवानों से युद्ध ठान लिया इसलिए अब भी अवसर है कि बात मान जाओ। आओ इस हाथी से उतरकर और घोड़े पर बैठकर हम दोनों दूसरे देश को निकल चलें। जीते रहेय तो शत्रुओं को फिर जीत लेंगे ॥११-१२॥ मन्त्री के इस प्रकार कहने पर राजा धीरे ग हाथी से उतरकर और घोड़े पर चढ़कर मन्त्री के साथ अपनी सेना में निकल गया और अपना वेश बदलकर उस मन्त्री के साथ वह उज्जयिनी नगरी को गया ॥१३-१४॥ उस नगरी में धन-सम्पत्तिवाली प्रसिद्ध वेश्या कुमुदिका के घर पर वह मन्त्री के साथ जाकर ठहर गया ॥१५॥ अकस्मात् ही राजा को अपने घर आया जानकर वेश्या ने भी समझा कि यह कोई असाधारण पुरुष है ॥१६॥ प्रताप से और लक्षणों से तो यह महाराजा-सा प्रतीत होता है। तब तो मेरा मनोरथ अवश्य ही सिद्ध होगा यदि इसने मेरा कार्य स्वीकार कर लिया ॥१७॥ इस प्रकार सोचकर, उठकर और स्वागत के साथ अगवानी करके कुमुदिका ने उस राजा

७२४ कथासरित्सागर

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७२४ कथासरित्सागर वेश्यानां क्व सद्भावो नास्त्यत्र कुरुते पुनः। मते कुमुदिका भक्तिं न जानेऽस्य कारणम्॥२६॥ एतत्तस्य वचः श्रुत्वा स राजा निजगाद तम्। मम कुमुदिका प्राणानपि मञ्चति मत्कृते॥२७॥ न चेत्प्रत्ययसि तदहं प्रत्ययं दर्शयामि ते। इत्युक्त्वा तं स्वसचिवं राजा व्याजमिमं व्यधात्॥२८॥ शनैः कृशाङ्करयं तनुं मितपानोऽल्पभोजनः। चकार मृतभारमानं निश्चेष्टं मूर्च्छिताङ्गकम्॥२९॥ ततोऽधिरोप्य शिबिकां निन्ये परिजनैश्च सः। श्मशानं शोचतानन्तगुण ... ... सित्॥३०॥ सा च शोकार्ताकुमुदिका वार्यमाणापि बान्धवैः। आगत्य तेनैव समं समारोहुञ्चितोपरि॥३१॥ यावच्च दीप्यते वह्निस्तावदन्वागतां स ताम्। दृष्ट्वा कुमुदिकां राजा समुत्तस्थौ सजृम्भिकम्॥३२॥ प्रत्युज्जीवित एषोऽत्र दिष्ट्या विष्ट्येति वादिनः। सर्वे कुमुदिकायुक्तं निन्युस्तं स्वगृहं मुदा॥३३॥ अथोत्सवे कृते प्राप्तः स राजा प्रकृतिं रहः। कश्चिद्दृष्टोऽनुरागोऽस्या इति स स्माह मत्रिणम्॥३४॥ ततस्तं सोऽब्रवीन्मन्त्री न प्रत्यम्येवमप्यहम्। अस्यप्र कारणं नूनं तत्पेक्ष्यामात्र निश्चयम्॥३५॥ प्रकाशयामस्त्वात्मानमस्म यनेतदर्पितम्। श्वस मित्रबलं चाभ्यत्राप्य हन्मो रिपून् रणे॥३६॥ एव तस्मिन् वदत्येव मन्त्रिण्यभ्याययौ पुनः। स गुप्तप्रहितश्चारः स च पृष्टोऽब्रवीदिदम्॥३७॥ वैरिभिर्विषयो व्याप्तः शशिलेखा तु शोकजात्। देवी राज्ञो मृषा श्रुत्वा विपत्तिं वह्निमाविशत्॥३८॥ एतच्चारवचः श्रुत्वा शोकार्त्तनिरतस्तदा। हा देवि हा सतीत्यादि विललाप स भूपतिः॥३९॥ तत क्रमेण विश्रान्ततस्तथा कुमुदिकाञ्च सा। एत्य विक्रमसिंहं तमाश्वास्योवाच भूपतिम्॥४०॥

द्वादश लम्बक ७२५

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[Header] द्वादश लम्बक ७२५

'महाराज वेश्याओं में तो सच्चा प्रेम होता ही नहीं है फिर भी यह कुमुदिका तुम्हारे प्रति जो सद्भाव प्रकट कर रही है, पता नहीं इसमें क्या रहस्य है ? ॥२९॥ मन्त्री की बातें सुनकर राजा ने उससे कहा-'ऐसी बात नहीं है। कुमुदिका मेरे लिए प्राण भी दे सकती है। यदि तुम विश्वास नहीं करते तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ। मन्त्री को इस प्रकार कहकर राजा ने कपट-माया रची। राजा ने अपना भोजन-पान नियमित करके अपने को दुर्बल बना दिया और धीरे-धीरे अपने हाथ पैर ढीले करके अपने को मुर्दा बना लिया। तब दिखावटी दुःख प्रकट करते हुए मन्त्री अनन्तगुण की आज्ञा से सेवक राजा के शव को पालकी में डालकर, श्मशान ले गये ॥२७-१ ॥ और, राजा के शोक से बह कुमुदिका बन्धुओं से रोके जाने पर भी श्मशान में आकर राजा के साथ चिता पर चढ़ गई ॥३१॥ चिता फूंकने की तैयारी हो ही रही थी कि राजा कुमुदिका को सती होते जानकर जँभाई लेकर उठ गया ॥३२॥ तब ओह ! हमलोगों के भाग्य से यह (राजा) जी उठा इस प्रकार कहते हुए श्मशान में उपस्थित व्यक्ति कुमुदिका के साथ राजा को घर ले गये ॥३३॥ तदनन्तर, प्रसन्नता से उत्सव मनाये जाने पर राजा धीरे-धीरे स्वस्थ हो गया और उसने एकान्त में मन्त्री अनन्तगुण से कहा-'देखा तुमने कुमुदिका का प्रेम ! ॥३४॥ तब मन्त्री ने राजा से कहा-'राजन् मैं तो अब भी नहीं विश्वास करता। इसमें कुछ कारण अवश्य है। अब आगे और निश्चय करते हैं ॥३५॥ और जिसने इतना दिया उसके सामने अपने को प्रकट कर देना चाहिए, जिससे कि इसकी सेना और नगर मित्र की सेना लेकर युद्ध में शत्रुओं पर विजय की जाय ॥३६॥ मन्त्री अनन्तगुण ऐसा कह ही रहा था कि इतने में गुप्त रूप से भेजा हुआ एक गुप्तचर वहाँ आया। उससे पूछने पर उसने कहा-शत्रुओं ने देश को आक्रान्त कर लिया और रानी शशिप्रभा ने झूठे ही राजा के मरने का समाचार सुनकर अग्नि प्रवेश कर लिया। गुप्तचर के वे वचन सुनकर बाण से आहत के समान वह राजा विह्वल होकर 'हाय रानी! हाय रानी !'-इस प्रकार कहकर विलाप करने लगा ॥३७-१ ॥ तब वेश्या सब बात जानकर कुमुदिका राजा के पास आकर और उसे धीरज देकर बोली-॥४ ॥

७२६ कथासरित्सागर

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७२६ कथासरित्सागर प्रागेव मम नादिष्टं किं दवेनाधुनापि यत्। धनेनेदीये सबलैः क्रियतामरि निग्रहः ॥४१॥ इत्युक्तः स तया कृत्वा तद्धनैरधिकं बलम्। ययौ राजा स्वमित्रस्य राज्ञो बन्धुतोऽन्तिकम् ॥४२॥ तद्वलैः स्वबलैस्तैश्च सह गत्वा निहत्य तान्। पञ्चाप्यरिनृपान् युद्धे तद्राज्यान्यप्यवाप सः ॥४३॥ ततस्तुष्टः कुमुदिकां सोऽब्रवीत्तां सह स्थिताम्। प्रीतोऽस्मि ते तवाभीष्टं किं करोम्युच्यतामिति ॥४४॥ अथावाचत्कुमुदिका सत्यं तुष्टोऽसि चेत्प्रभो। तदुद्धरेव हृच्छल्यमेकं मम चिरस्थितम् ॥४५॥ उज्जयिन्यां द्विजसुतं श्रीधरं नाम मे प्रियम्। राज्ञाल्पेनापराधेन बद्धं तस्माद्विमोचय ॥४६॥ दृष्ट्वा त्वां भाविकल्याणमुत्तमे राजलक्षणे। एतत्कार्यक्षमं वेद्य मक्त्या सेवितवत्यहम् ॥४७॥ अभीष्टसिद्धिनैराश्यादारोहे स्वचितामपि। विफलं जीवितं मत्वा विना तं विप्रपुत्रकम् ॥४८॥ एवमुक्तवतीं तां स राजावाचद्विलासिनीम्। साधयिष्याम्यहं तत्ते धीरा सुवदने भव ॥४९॥ इत्युक्त्वा मन्त्रिवचनं सस्मूर्याचिन्तयच्च सः। सत्यं वेश्यास्वसद्भावः प्रोक्तोऽनन्तगुणेन मे ॥५०॥ अतस्तु पूरणीयेषा वराक्या कामना मया। इति सङ्कल्प्य सबलः स तामुज्जयिनीमगात् ॥५१॥ श्रीधरं मोचयित्वा तं दत्त्वा च द्रविणं बहु। व्यधात् कुमुदिकां तत्र प्रियसङ्गमसुस्थिताम् ॥५२॥ आगत्य च स्वनगरं मन्त्रिमन्त्रसमृद्धयम्। प्रभादिश्रमसिंहोऽसौ बुभुजे सकलां महीम् ॥५३॥ एवं हृदयमज्ञेयमगाधं वशयोषिताम्। ॥५४॥¹ १ मूलपुस्तके पदार्धं मुद्रितमस्ति।

दशम लम्बक ७२७

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दशम लम्बक ७२७ 'महाराज ! मुझे पहले ही आज्ञा क्यों नहीं दी। अब भी आप मेरी सेना और मेरे धन की सहायता से शत्रुओं का नाश करें' ॥४१॥ कुमुद्विका से इस प्रकार कहे गये राजा ने कुमुद्विका के धन से उसकी सेना को बढ़ाया और अपने एक बलवान् मित्र के पास वह गया। उससे भी सेना की सहायता ली ॥४२॥ इस प्रकार, उसकी सेना और अपनी सेना को साथ लेकर राजा ने उन पाँचों शत्रु-राजाओं को युद्ध में जीतकर अपना राज्य प्राप्त किया ॥४३॥ तब राजा ने साथ में बैठी हुई कुमुद्विका से कहा- यह सच है कि मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। बताओ कौन सा तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध करूँ ? ॥४४॥ यह सुनकर कुमुद्विक ने कहा- 'हे देव यदि सचमुच आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो चिरकाल से मेरे हृदय में बैठा हुआ एक काँटा निकाल दें ॥४५॥ उज्जैन में धीवर नाम का वणिक्-पुत्र मेरा प्रेमी है। उस राजा न एक छोटे-से अपराध के कारण कारागार का दंड दिया है। उसे छुड़ा दीजिए। मैंने आपके शुभ लक्षणों से पहले ही आपको असाधारण और इस काम के योग्य व्यक्ति समझकर ही अपने भविष्य की कल्याण-कामना की थी और इसीलिए आपकी सेवा भी की थी ॥४६-४७॥ अपनी इष्टसिद्धि के प्रति निराश होकर और उस युवक के बिना अपने जीवन को निष्फल समझकर ही मैं आपकी चिता पर चढ़ी थी ॥४८॥ इस प्रकार कहती हुई उस वेश्या से राजा ने कहा-'हे सुमुखि धैर्य रख। मैं तेरा कार्य सिद्ध करूँगा। इतना उससे कहकर और मन्त्री की बात का स्मरण करके राजा ने सोचा- कमलगुप्त ने वेश्याओं में सद्भावना न होने की जो बात कही थी वह सत्य थी ॥४९-५०। अब तो इस बेचारी की इच्छा पूरी करनी ही होगी। ऐसा सोचकर वह सेना के साथ उज्जयिनी पर चढ़ गया और वहाँ से धीवर को छुड़ाकर कुमुद्विका को बहुत-सा धन देकर उस प्रिय-समागम से सुखी बना दिया ॥५१ - ५२॥ तदनन्तर, अपने नगर में आकर मन्त्रियों की मन्त्रणा का उल्लङ्घन किए बिना पृथ्वी का उपभोग करने लगा ॥५३॥ इस प्रकार वेश्याओं का हृदय अगम और अथाह होता है ॥५४॥