कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
८६ कथासरित्सागर
८६ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा स ददौ तुष्टस्तेभ्योऽर्थं स च ते पुनः। विवाहस्तव सम्पन्न इत्यूचुर्दिवसगते ॥२०॥ ततः स सुतरां तुष्टस्तेभ्यो भूरि धनं ददौ। दिनेष्वथ च वदन्ति स्म पुत्रो जातस्तवेति ते ॥२१॥ ननन्द तेन सर्वं च मूढस्तेभ्यः समर्प्य सः। पुत्रं प्रत्युत्सुकोऽस्मीति प्रारोदीच्चापरेऽहनि ॥२२॥ श्वश्रूशावन्न शोकस्य हासं धूर्तेः स वञ्चितः। पशुभ्य इव सङ्क्रान्तजडिमा पशुपालकः ॥२३॥ मत्तकूरत्नस्तम्बककथा पशुपालः श्रुतो देव शृण्वस्तूरत्नस्तम्बकम्। ग्राम्यः कश्चित्तमं मूर्ध्नि प्रापास्तूरजं महत् ॥२४॥ रात्रौ राजकुलाभ्यन्तरैर्नीत्वा तत्र निवेशितम्। यद्गृहीत्वा स तत्रैव भार्यां तेन व्यभूषयत् ॥२५॥ बबन्ध मेखलां मूर्ध्नि हारं च जघनस्थले। नूपुरौ करयोस्तस्याः कर्णयोरपि कङ्कणौ ॥२६॥ हसद्भिः स्थापितं लोकैर्बुद्ध्वा राजा जहार तत्। तस्मात् स्वाभरणं तं तु पशुप्रायं मुमोच सः ॥२७॥ तूलविक्रयिणः कथा उक्तोऽस्तूरणो देव शृणु वक्ष्यमथ तूलिकम्। मूर्खः कश्चित् पुमांस्तूलविक्रमायापणं ययौ ॥२८॥ अशुद्धमिति तत्तस्य न जग्राहात्र कश्चन। तावद्ददर्श तत्राग्नौ हेम निष्टप्तशोधितम् ॥२९॥ स्वर्णकारेण विक्रीतं गृहीतं ग्राहकेण च। तद्दृष्ट्वाऽपि स तत्तूलमिच्छञ्छोधयितुं जडः ॥३०॥ अग्नौ क्षिप्त्व दग्धे च तस्मिँल्लोको जहास्तम्। खर्जूरीच्छेदककथा श्रुतोऽप्य तूलिको देव खर्जूरीच्छेदकं शृणु ॥३१॥
The provided image is blank and does not contain any text to transcribe.
८८ कथासरित्सागर
८८ कथासरित्सागर केचिन्मूर्खाः समाहूय न्ययोज्यन्ताधिकारिभिः । ग्राम्या राजकुलाविष्ट खर्जूरानयनं प्रति ॥३२॥ ते दृष्ट्वर्का सुखग्राह्यां खर्जूरपतितां स्वतः । खर्जूरीं तत्र खर्जूरीः सर्वा ग्रामे स्वकेऽच्छिदन् ॥३३॥ पतितास्ताश्च कलितास्तेषखर्जूरसञ्चयाः । उत्पाप्यारोपयामासुर्न चैषां सिद्ध्यति स्म तत् ॥३४॥ ततश्चानीतखर्जूरा बादृतारोपणेन ते । खर्जूरीच्छेदनं बुद्ध्वा राज्ञा प्रत्युत दण्डिताः ॥३५॥ मूर्खमन्त्रि कथा उक्तं खर्जूरघासोऽथ निष्फालोकनमुच्यते । निधानदर्शी केनापि कोष्याज्ञाहे महीभुजा ॥३६॥ मा गात्क्वापि पलाय्यापि राजकुर्मत्रिणा । नेत्रे तस्योदपाट्येतां निधानस्थानदर्शिनः ॥३७॥ भूरूक्ष्णाम्धपदस्मस्त गतावप्यगतौ समम् । अन्ध दृष्ट्वा च तं मन्त्री स जडो जहसे जनैः ॥३८॥ लवणभक्षकस्य मूर्खस्य कथा निधानालोकनं श्रुत्वा श्रूयतां लवणाशनम् । बभूव गह्वरो ग्रामवासी कोऽपि जडः पुमान् ॥३९॥ स मित्रेण गृहं जातु नीतो नगरवासिना । भोजिता लवणस्वादूत्यन्नानि व्यञ्जनानि च ॥४०॥ केनेय स्वादुतान्नानेरित्यपृच्छत्स गह्वरः । प्राधान्याल्लवणेनेति तेनोचे सुहृदा तदा ॥४१॥ तदेव सहि भोक्तव्यमित्युक्त्वा लवणस्य सः । पिष्टस्य मुष्टिमादाय प्रक्षिप्यामक्षयन्मुखे ॥४२॥ तच्छूनं तस्य दुर्बुद्धेरोष्ठौ द्मश्रूणि घालिपत् । हसतस्तु जनस्यात्र मुखं धवरतां ययौ ॥४३॥ मूर्खगोदोहककथा लवणाशी ध्रुतो येव त्वया मोदोहकः शृणु । ग्राम्यः कश्चिदभून्मुग्धो गोरेका तस्य चाभवत् ॥४४॥
पञ्चम सम्वाद ८०९ राजा के आज्ञानुसार उसके कुछ अधिकारियों ने कुछ गँवारों को बुलाकर खजूर तोड़ लाने के लिए नियुक्त किया ॥१२॥ उन लोगों ने खजूर के एक पेड़ को गिरा देखकर और उससे खजूरों को बिना कष्ट के पाने के योग्य समझकर, अपने गाँव के सभी खजूर के पेड़ काटकर गिरा दिये ॥१३॥ उन गिरे हुए वृक्षों के सारे खजूर एकत्र कर लेने पर वे उन वृक्षों को उठाकर फिर से रोपने लगे किन्तु ऐसा न कर सके । तब राजा के पास खजूर लाने पर उनकी मूर्खता को सुनकर राजा ने सभी को दंड दिया ॥१४-१५॥ मूर्ख मन्त्री की कथा खजूर खानेवालों का हास्य सुना । अब भूमि में गड़े धन को देखनेवाले की कथा सुनो। किसी राजा ने गड़ा हुआ धन बताने के लिए किसी ज्ञानी को कहीं से बुलवाया। किन्तु, राजा के मूर्ख मन्त्री ने सोचा कि यह कहीं भाग न जाय इसलिए उसकी दोनों आँखें निकलवा लीं ॥१६-१७॥ तब वह ज्ञानी भूमि के लक्षण देखने और चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गया। उसे अन्धा देखकर सभी लोग हँसी करने लगे ॥१८॥ नमक खानेवाले की कथा अब एक नमक खानेवाले की कथा सुनो। किसी गाँव का रहनेवाला मङ्गर नाम का एक वज्रमूर्ख पुरुष था। उसको किसी नागरिक मित्र ने अपने घर लेजाकर खूब स्वादिष्ट भोजन कराया ॥३९-४०॥ उस मङ्गर ने अपने मित्र से पूछा कि 'भोजन में इतना स्वाद किस कारण हुआ ? तब उसने कहा—'इसमें प्रधानता नमक की है' ॥४१॥ तब उस गँवार ने सोचा कि जब अल्प से ही इतना स्वाद है, तो क्यों न केवल नमक ही खाया जाय। ऐसा सोचकर उसने मुट्ठी-भर नमक का चूर्ण मुँह में डाक लिया और खाने लगा ॥४२॥ उस नमक के चूर्ण से उस मूर्ख के ओठ दाढ़ी और मूंछ सब मर गये और उसका श्वेत मुँह का देखकर लोगों के मुँह भी हँसी से श्वेत हो गये ॥४३॥ गाय दुहनेवाले की कथा हे प्रभो सस्याघाती की कथा तुमने सुनी। अब गौ दुहनेवाले की कथा सुनो। एक गँवार ग्वाला था। उसके पास एक गाय थी ॥४४॥ १ २
४१२ कथासरित्सागर
४१२ कथासरित्सागर काककूर्ममृगाखूनां कथा¹ अभूत्क्वापि वनोद्देशे महाञ्छाल्मलिपादपः । उवास लघुपतीति काकस्तत्र कृतालयः ॥५८॥ स कदाचित् स्वनीडस्थो ददर्शाङ्घ्रि तरोरधः । जालगृहस्तं सलगुडं रौद्रं पुरुषमागतम् ॥५९॥ ततः स धीसखे यावत्काकस्तावद् वितत्य सः । जालं भुवि विकीर्यात्र व्रीहीञ्छन्नोऽभवत्पुमान् ॥६० ॥ तावच्च चित्रग्रीवाख्यः पारावतपतिर्भ्रमन् । तत्राजगाम नभसा पारावतशतैर्वृतः ॥६१॥ स व्रीहिप्रकरं दृष्ट्वा जालेऽत्राहारलिप्सया । पतितः पाशनिकरैर्बद्धोऽभूत्सपरिच्छदः ॥६२॥ तद्दृष्ट्वा सानुगान् सर्वांश्चित्रग्रीवो जगाद सः । गृहीत्वा चञ्चुभिर्जालं समुत्पतत वेगतः ॥६३॥ ततस्तथेति ते जालमादायोत्पत्य वेगतः । कपोता नभसा गन्तुं भीताः प्रारेभिरेऽखिलाः ॥६४॥ सोऽप्युत्थायाध्वंनुखिन्नो लुब्धकः सन्यवर्त्तत । निर्भयोऽथ जगादैतांश्चित्रग्रीवोऽनुयायिनः ॥६५॥ मममित्रस्य हिरण्यस्य मूषकस्यान्तिकं द्रुतम् । व्रजामः स इमान्पाशांश्छित्त्वाऽस्मान् मोचयिष्यति ॥६६॥ इत्युक्त्वा सोऽनुगैः साकं गत्वा तैर्जालकर्षिभिः । मूषकस्य बिलद्वारं प्राप्याकाशादवातरत् ॥६७॥ भो भो हिरण्य निर्याहि चित्रग्रीवोऽहमागतः । इत्याजुहाव तं तत्र मूषकं स कपोतराट् ॥६८॥ स श्रुत्वा द्वारमार्गेण दृष्ट्वा तं सागतं तथा । सुहृदं निर्ययावाशुस्तस्माच्छतमुखाद् बिलात् ॥६९॥
१ पञ्चतन्त्रस्य मित्रसम्प्राप्तिप्रकरणस्य मूलकथा। यथा— असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्तः सुहृत्तमाः। साधयन्त्याशु कार्याणि काककूर्ममृगाखुवत् ॥ इत्येषा कथात्र वर्णिता॥
दशम लम्बक ८१५
दशम लम्बक ८१५ कौआ कछुआ मृग और चूहे की कथा¹ किसी वन में एक ओर विशाल सेमल का वृक्ष था। उसमें लघुपाती नाम का एक कौआ घोंसला बनाकर रहता था ॥५८॥ किसी समय अपने घोंसले में बैठ हुए उसने वृक्ष के नीचे हाथ में जाल और लाठी लिये हुए एक भयानक पुरुष (बहेलिये) को आते देखा ॥५९॥ जबतक वह देख ही रहा था कि इतने में वह बहेलिया जाल बिछाकर और वहाँ दाने छीट कर वहीं छिप गया ॥६०॥ इतने में ही चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का सरदार, सैंकड़ों कबूतरों के साथ आकाश में भ्रमण करता हुआ उधर आ निकला ॥६१॥ जाल में फैले हुए पर्याप्त अन्न-बीजों को देखकर वह अपने साथियों के सहित उस जाल पर उतर आया और अपने साथियों के साथ ही उसमें फँस गया ॥६२॥ सब कबूतरों को फँसा हुआ देखकर उनका राजा चित्रग्रीव उनसे बोला—'तुम लोग अपनी-अपनी चोंचों से जाल को पकड़कर वेग से आकाश में उड़ चलो' ॥६३॥ उसकी आज्ञा को स्वीकार करके सभी कबूतर जाल को लेकर कुछ डरते हुए आकाश में उड़ने लगे ॥६४॥ यह देखकर घबराया हुआ वह बहेलिया ऊपर की ओर आँखें किया हुआ उठा और वहाँ से निराश लौट गया ॥६५॥ तब निर्भय होकर चित्रग्रीव ने अपने साथी कबूतरों से कहा—'चलो अपने मित्र हिरण्यक चूहे के पास चलें। वह हमारे इन जालों को काटकर हमें मुक्त कर देगा ॥६६॥ ऐसा कहकर और जाल को लेकर उड़ते हुए वे चित्रग्रीव के मित्र चूहे के बिल के पास पहुँचकर आकाश से उतरे ॥६७॥ 'ऐ हिरण्यक निकल आओ। मैं चित्रग्रीव आया हूँ। ऐसा कहकर कपोतराज ने उस चूहे को आवाज दी ॥६८॥ चूहा यह सुनकर और द्वार के मार्ग से अपने मित्र को आया हुआ देखकर, सौ मुँहवाले अपने उस बिल से बाहर निकल आया ॥६९॥
१ यहाँ से पंचतन्त्र का मित्रलाभ-प्रकरण प्रारम्भ होता है जिसका प्रारम्भ श्लोक इस प्रकार है— असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्त सुहृत्तमाः। साधयन्त्याशु कार्याणि काककूर्ममृगाखुवत् ॥ २ पंचतन्त्र और हितोपदेश में इसका नाम लघुपतनक है।
८१० कथासरित्सागर
८१० कथासरित्सागर सा च तस्यान्वहं धेनुं पयःपलशतं ददौ। कदाचिच्छ्वाश्रवस्तस्य प्रत्यासन्नं विलोक्यकः ॥४५॥ एकवारं ग्रहीष्यामि पयोऽस्याः प्राज्यमुत्सवे। इति मूढः स नैवैतां मासमात्रं दुदोह गाम् ॥४६॥ प्राप्तोत्सवश्च यावत्तां दोग्धि तावत्पयोऽनिशम्। स्तत्तस्याच्छिन्नमच्छिन्नं लोकस्य हसितं त्वभूत् ॥४७॥
मूर्खखल्वाटकथा
श्रुतो गोदोहको मूर्खः श्रूयतामपरापिभो। खलतिस्ताम्रकुम्भाभशिराः कश्चित्पुमानभूत् ॥४८॥ वृक्षमूलोपविष्टं तं सतृणं कश्चिदक्षत्। आगताञ्च कपित्थानि गृहीत्वा क्षुधितः पथा ॥४९॥ स कपित्थेन तत्तस्य क्रीडयाताडयच्छिरः। खलतिः सोऽपि तत्सेहे न तस्योवाच किञ्चन ॥५०॥ ततोऽन्यैः क्रमशः सर्वैः स कपित्थैरताडयत्। शिरस्तस्य स चातिष्ठत्तूष्णीं रक्ते स्रवत्यपि ॥५१॥ स च निष्पन्नतारुण्यकृतक्रीडाविचूर्णितैः। विना कपित्थैः क्षुत्क्लान्तो ययौ मूर्खयुवा ततः ॥५२॥ कपित्थैः स्वादुभिः किं न सहे घातानिति ब्रुवन्। स खल्वाटो गलद्रक्तधिरो मूर्खो ययौ गृहम् ॥५३॥ मूर्खसाम्राज्यबण्डेन पट्टेनेव भृतं शिरः। रक्तेन तस्य तद्दृष्ट्वा हसति स्म न तत्र कः ॥५४॥ एवं देवोपहास्यत्वं लोके गच्छन्त्यबुद्धयः। लभन्ते कार्यसिद्धिं च पूज्यन्ते तु सुबुद्धयः ॥५५॥ इति गोमुखतः श्रुत्वा मूर्खहासकथा इमाः। नरवाहनदत्तः समुत्थाय व्यधितार्थिकम् ॥५६॥ निशागमे पुनस्तेन नियुक्तस्त्वथोत्सुकं सः। गोमुखः कथयामास प्रज्ञानिष्ठामिमां कथाम् ॥५७॥
दशम लम्बक ८१३
दशम लम्बक ८१३ कौआ कछुआ मृग और चूहे की कथा¹ किसी वन में एक ओर विशाल सेमर का वृक्ष था। उसमें 'लघुपती'² नाम का एक कौआ घोंसला बनाकर रहता था ॥५८॥ किसी समय अपने घोंसले में बैठ हुए उसने वृक्ष के नीचे हाथ में बास और कानी लिये हुए एक भयानक पुरुष (बहेलिये) को आते देखा ॥५९॥ जबतक वह बच ही रहा था कि इतने में वह बहेलिया जाल बिछाकर और वहाँ दाने छीट कर वहीं छिप गया ॥६०॥ इतने में ही चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का सरदार, सैकड़ों कबूतरों के साथ आकाश में भ्रमण करता हुआ उधर आ निकला ॥६१॥ जाल में फैले हुए पर्याप्त अन्न-बीजों को देखकर वह अपने साथियों के सहित उस जाल पर उतर आया और अपने साथियों के साथ ही उसमें फँस गया ॥६२॥ जब कबूतरों को फँसा हुआ देखकर उनका राजा चित्रग्रीव उनसे बोला—'तुम लोग अपनी-अपनी चोंचों से जाल को पकड़कर वेग से आकाश में उड़ चलो' ॥६३॥ उसकी आज्ञा को स्वीकार करके सभी कबूतर जाल को लेकर कुछ डरते हुए आकाश में उड़ने लगे ॥६४॥ यह देखकर घबराया हुआ वह बहेलिया ऊपर की ओर आँखें किया हुआ उठा और वहाँ से निराश लौट गया ॥६५॥ तब निर्भय होकर चित्रग्रीव ने अपने साथी कबूतरों से कहा—'चलो अपने मित्र हिरण्यक चूहे के पास चलें। वह हमारे इन जालों को काटकर हमें मुक्त कर देगा ॥६६॥ ऐसा कहकर और जाल को लेकर उड़ते हुए वे चित्रग्रीव के मित्र चूहे के बिल के पास पहुँचकर आकाश से उतरे ॥६७॥ 'ऐ हिरण्यक निकल आओ। मैं चित्रग्रीव आया हूँ। ऐसा कहकर कपोतराज ने उस चूहे को आवाज दी ॥६८॥ चूहा यह सुनकर और द्वार के मार्ग से अपने मित्र को आया हुआ देखकर, सौ मुँहवाले अपने उस बिल से बाहर निकल आया ॥६९॥ १ यहाँ से पंचतन्त्र का मित्रलाभ प्रकरण प्रारम्भ होता है जिसका प्रारम्भ श्लोक इस प्रकार है— असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्तः सुहृत्तमाः । साधयन्त्याशु कार्याणि काककूर्ममृगाखुवत् ॥ २ पंचतन्त्र और हितोपदेश में इसका नाम लघुपतनक है।
८१२ कथासरित्सागर
८१२ कथासरित्सागर काककूर्ममृगाखूनां कथा¹ अभूत्क्वापि वनोद्देशे महाञ्छाल्मलिपादपः । उवास लघुपातीति काकस्तत्र कृतालयः ॥५८॥ स कदाचित् स्वनीडस्थो ददर्शान्ते तरोरधः । जालहस्तं समागच्छन् रौद्रं लुब्धकमागतम् ॥५९॥ ततः स वीक्षते यावत्काकस्तावद्वितत्य सः । जालं भुवि विकीर्यात्र व्रीहींश्छन्नोऽभवत्पुमान् ॥६०॥ तावच्च चित्रग्रीवास्यः पारावतपतिर्भ्रमन् । तत्राजगाम नभसा पारावतशतैर्वृतः ॥६१॥ स व्रीहिप्रकरं दृष्ट्वा जालेऽप्याहारलिप्सया । पतितः पाशनिकरैर्बद्धोऽभूत्सपरिच्छदः ॥६२॥ तद्दृष्ट्वा चानुगान् सर्वांश्चित्रग्रीवो जगाद सः । गृहीत्वा चञ्चुभिर्जालं समुत्पतत वेगतः ॥६३॥ ततस्तथेति ते जालमादायोत्पत्य वेगतः । कपोता नभसा गन्तुं भीताः प्रारेभिरेऽखिलाः ॥६४॥ सोऽप्युत्थायोर्ध्वदृग्विघ्नो लुब्धकः समवर्तत । निर्भयोऽथ जगादैतांश्चित्रग्रीवोऽनुयायिनः ॥६५॥ मममित्रस्य हिरण्यस्य मूषकस्यान्तिकं द्रुतम् । व्रजामः स इमांश्पाशांश्छित्त्वाऽस्मान् मोचयिष्यति ॥६६॥ इत्युक्त्वा सोऽनुगैः सार्धं गत्वा तैर्जालकर्षिभिः । मूषकस्य बिलद्वारं प्राप्याकाशादवातरत् ॥६७॥ भो भो हिरण्य निर्याहि चित्रग्रीवोऽहमागतः । इत्याजुहाव तं तत्र मूषकं स कपोतराट् ॥६८॥ स श्रुत्वा द्वारमार्गेण दृष्ट्वा तं चागतं सखा । सुहृत् निर्ययावाशुस्तस्माच्छतमुखाद् बिलात् ॥६९॥ १ पञ्चतन्त्रस्य मित्रसंप्राप्तिप्रकरणस्य मूलकथा । यथा— असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्तः सुहृत्तमाः । साधयन्त्याशु कार्याणि काककूर्ममृगाखुवत् ॥ इत्येषा कथात्र वर्णिता ॥
दशम लम्बक ८१५
दशम लम्बक ८१५ उनके पास आकर सब वृत्तान्त पूछकर उस सहृदय चूहे ने चित्रग्रीव और उसके साथियों के जाल काट दिये ॥७० ॥ जाल कट जाने पर, अपने स्नेहपूर्ण मीठे शब्दों से चित्रग्रीव ने उस चूहे को धन्यवाद दिया और अपने अनुचरों के साथ आकाश में उड़ गया ॥७१॥ जाल में फंसे कबूतरों के पीछे आया हुआ लघुपती नाम का कौआ यह सब देख रहा था। वह बिल में गये हुए चूहे के पास आकर कहने लगा—'मैं लघुपती नाम का कौआ हूँ। तुम्हें मित्रस्नेही देखकर, विपत्ति से मित्रों का उद्धार करनेवाले तुमसे मित्रता करना चाहता हूँ ॥७२-७३॥ यह सुनकर बिल के अन्दर से ही कौए को देखकर चूहा बोला—'जा। तू मेरा भक्षक है और मैं तेरा भक्ष्य हूँ। मेरी-तेरी मित्रता कैसी? ॥७४॥ तब वह कौआ बोला—'ऐसा न कहो। तुम्हें खा लेने पर तो क्षण भर की तृप्ति होगी और तुम्हारी मित्रता में सदा के लिए रक्षा होगी ॥७५॥ इस प्रकार की बातें कहकर और शपथपूर्वक विश्वास दिलाकर कहा गया वह चूहा बिल से बाहर निकला और उस कौए ने उसके साथ मित्रता कर ली ॥७६॥ तब वह चूहा उसके लिए मांस के टुकड़े लाया और चावल के दाने भी। तब दोनों ने मिलकर वही भोजन किया और सुखपूर्वक बैठकर वार्तालाप किया ॥७७॥ एक बार वह कौआ मित्र चूहे से बोला—'मित्र, यहाँ समीप ही वन के मध्य में एक नदी है। उस नदी में मेरा मित्र मन्थर नाम का कछुआ है। उसके लिए मैं वहाँ जा रहा हूँ। वहाँ मेरे लिए आमिष-भोजन सुलभ है ॥७८-७९॥ यहाँ रहने से मांस का आहार पाकर भी मुझे बहेलियों का भय सदा ही बना रहता है। ऐसा कहते हुए कौए से चूहा बोला ॥८० ॥ 'यदि ऐसा है, तो हम लोग साथ ही रहेंगे। मुझे भी यहाँ से कुछ वैराग्य हो गया है। इसका कारण वहीं चलकर कहूँगा ॥८१॥ वह लघुपती कौआ इस प्रकार कहते हुए हिरण्यक को अपनी चोंच में लेकर आकाश में उड़ गया और उसे उस वन-नदी के तीर पर ले गया ॥८२॥ वहाँ अपने मित्र मन्थर से मिलकर, और उसका आतिथ्य स्वीकार करके चूहे के साथ वह वहीं रहने लगा ॥८३॥ बातचीत के प्रसंग में कौए ने अपने आने का कारण उसे बताया और हिरण्यक चूहे की मित्रता के कारण भी उस कछुए से कहा ॥८४॥
उपेत्य पृष्ट्वा वृत्तान्तं सम्भ्रमात् सोऽपि मूषकः। पारावतपतेः पाशान् सानुगस्याच्छिनत् सुहृद् ॥७०॥ छिन्नपाशस्तमामन्त्र्य मूषकं वचनेः प्रियैः। चित्रग्रीवः समुत्पत्य ययौ सोऽनुचरैः सह ॥७१॥ अन्वागतः स काकोऽत्र लघुपाती विलोक्य तत्। बिलप्रविष्टं तद्द्वारमागत्योवाच मूषकम् ॥७२॥ लघुपातीति काकोऽहं दृष्ट्वा त्वां मित्रवत्सलम्। मित्रत्वाय वृणोमीदृग्विषदुद्धरणक्षमम् ॥७३॥ तच्छ्रुत्वाऽभ्यन्तराद्दृष्ट्वा मूषकस्तं स वायसम्। जगाद गच्छ का मैत्री भक्ष्यभक्षकयोरिति ॥७४॥ तत स वायसोऽप्यावीच्छान्तं भुक्ते मम त्वयि। तृप्तिः क्षण स्यान्मित्रं तु शश्वज्जीवितरक्षणम् ॥७५॥ इत्याद्युक्त्वा सशपथं कृत्वादश्वासं च तेन सः। निर्गतेनाकरोत्सख्यमाशुना सह वायसः ॥७६॥ स मांसपक्षीरान्नेपीदास क्षालिकजानपि। एकत्र सह भुञ्जातौ तस्थातुस्तावूभी सुखम् ॥७७॥ एकदा स च काकस्तं मित्रं मूषकमब्रवीत्। इतोऽविदूरे मित्रास्ति वनमध्यगता नदी ॥७८॥ तस्यां मन्थरको नाम कूर्माऽस्ति सुहृन्मम। तदहं यामि तत्स्थानं सुप्रापामिषभाजनम् ॥७९॥ कृच्छ्रात्प्राप्य इहाहारो नित्यं व्याधभयं च मे। इत्युक्तवन्तं तं काकं मूषकोऽपि जगाद सः ॥८०॥ : सहव तर्हि वह्स्यामो नय तत्रैव मामपि। ममाप्यस्तीह निर्वेदो यस्य सत्रव तं च ते ॥८१॥ इति वादिनमादाय चञ्च्वा तं स हिरण्यकम्। सप्रभा लघुपाती तद्ययौ वननदीतटम् ॥८२॥ मिलित्वा सह कूर्मेण तेन मन्थरेण च। कृतातिथ्येन मित्रण स तस्थौ मूषकन्वितः ॥८३॥ शशंस च कूर्माय तस्मै स्वागमकारणम्। हिरण्यकप्रवृत्तान्तप्रयुक्तं वायः शशंस च ॥८४॥
दशम लम्बक ८१७
दशम लम्बक ८१७ तब मन्थर ने भी कौए से प्रशंसित चूहे से मित्रता करके उससे अपने स्थान से वैराग्य होने का कारण पूछा ॥८५॥ तब उन दोनों के सुनते रहने पर हिरण्यक चूहे ने अपना वृत्तान्त इस प्रकार उनसे कहा ॥८६॥ हिरण्यक चूहा और संन्यासी की कथा एक बार मैं नगर के समीप बड़े बिल में रहता था। वहाँ रहता हुआ मैं राजा के भवन से एक हार ले आया और उसे अपने बिल में रख दिया ॥८७॥ उस हार को देख-देखकर बड़े हुए बलवाले मुझे अन्न लाने में समर्थ जानकर दूसरे चूहों ने घेर लिया ॥८८॥ इसी बीच मेरे बिल के पास एक संन्यासी मठ बनाकर रहने लगा। वह विभिन्न प्रकार के भोजन भिक्षा करके लाता था ॥८९॥ वह भिक्षु, भोजन से बचे हुए अन्न को प्रात:काल खाने के लिए एक झोली में डालकर एक खूँटी में लटका देता था ॥९०॥ उसके सोये रहने पर मैं बिल के मार्ग से उसके अन्दर घुसकर और ऊँचे उछल-उछल कर प्रत्येक रात में उसका भोजन समाप्त कर देता था ॥९१॥ एक दिन उसके यहाँ उसका एक मित्र संन्यासी आ गया। वह संन्यासी अपने मित्र से बातचीत करने लगा ॥९२॥ तब तक अन्न खाने के लिए मेरे वहाँ पहुँचने पर वह संन्यासी फटे हुए बाँस का एक टुकड़ा लेकर और कान लगाकर उस भिक्षा के पात्र को वह बार-बार बजाने लगा ॥९३॥ बीच में बात को काटकर 'यह तुम क्या करते हो' इस प्रकार आये हुए मित्र द्वारा पूछे जाने पर वह संन्यासी उससे बोला—॥९४॥ 'यहाँ एक चूहा मेरा शत्रु हो गया है जो दूर ऊपर लटकाये हुए अन्न को भी उछल उछलकर यहाँ से ले जाता है ॥९५॥ इस फटे बाँस से अन्न के बरतन को बार-बार बजाकर मैं उसे डराता हूँ। इस प्रकार, कहते हुए उस साधु से दूसरा साधु बोला—'लोभ प्राणियों के लिए महान् हानिकारक है। इस विषय में कथा सुनो। मैं एक बार तीर्थों का भ्रमण करता हुआ एक नगर में गया ॥९६-९७॥ १ ३
८१६ कथासरित्सागर
८१६ कथासरित्सागर ततः स कूर्मस्तं कृत्वा मित्रं वायससंस्तुतम्। दत्तनिर्वासनैर्वेदहेतुं पप्रच्छ मूषकम्॥८५॥ ततो हिरण्यः स तयोरुभयोः काककूर्मयोः। शृण्वतोर्निजवृत्तान्तकथामृतामवर्णयत् ॥८६॥ मस्करीमूषकयोः कथा अहम् महाबिले तत्र नगरासन्नवर्तिनि। वस राजकुलाद्भारमानीयास्थापयं निधिम्॥८७॥ दृश्यमानेन हारेण तेन जातोर्जस च माम्। समर्थमन्नाहरणे मूषकाः पर्यवारयन्॥८८॥ अत्रान्तरे च तत्रासीत्कश्चिद्वस्मठिकान्तिके। परिव्राण्मठिकां कृत्वा नानाभिक्षान्नवृत्तिकः॥८९॥ स भुक्तशेषं भिक्षान्नं नक्तं स्थापयति स्म तत्। भिक्षाभाण्डस्थमुल्लम्ब्य शङ्कौ² प्रातर्जिघत्सया ॥९०॥ सुप्तस्यात्र च तस्याहं बिलेनान्तः प्रविश्य तत्। दत्तोर्ध्वंक्रम्यो¹ निशीथमनद्य प्रतियामिनि॥९१॥ कदाचित्सम तस्यागारमुहूर्त् प्रव्राजकोऽपरः। मुक्तोत्तरं समं तेन कथां रात्रौ स चाकरोत्॥९२॥ तावन्नेतुं प्रवृत्तश्च मयि जर्जरकण सः। प्रप्राड्व्वादयहस्तकंस्तद्भाण्डं मुहू॥९३॥ कथाभान्तिश्च किमिदं करोषीति स तेन च। आगन्तुना परिव्राजा पृष्टः प्रवाद तमब्रवीत्॥९४॥ इह मे मूषकः शत्रुरुपद्रोऽद्य सदब यः। अपि दूरस्थमुत्प्लुत्य नयत्यन्नमितो मम॥९५॥ तं त्रासयामि यस्त्यञ्जर्जरेणाश्मभाजनम्। इत्युक्तवन्तं प्रव्राजं परिव्राट सोऽभ्रगोऽब्रवीत्॥९६॥ लोभो नामैष जन्तूनां दोषायात्र कथां शृणु। तीर्थान्यहं भ्रमन् प्रापमेकं नगरमेकदा॥९७॥ १ लोहरीमके सम्बन्धित्वा । २ प्रातःखादितुमिच्छया । ३ कर्दभं कृत्वा ।
षष्ठम लम्बक ८१९
षष्ठम लम्बक ८१९ वहाँ निवास के लिए एक ब्राह्मण के घर पहुँचा। मेरे बैठने पर वह ब्राह्मण अपनी पत्नी से बोला-॥१९८॥ 'आज पर्व का दिन है इसलिए ब्राह्मण के लिए खिचड़ी पकाओ। तब उसकी पत्नी ने कहा 'तुम दरिद्र के यहाँ यह कहाँ ? यह सुनने पर उस ब्राह्मण ने पत्नी से फिर कहा- 'प्रिये संग्रह करने पर भी अत्यन्त संग्रह करने की बुद्धि नहीं करनी चाहिए। इस विषय में कथा सुनो' ॥१९-१ ॥ कहीं जंगल में एक बहेलिया शिकार करके मांस लिये हुए धनुष-बाण चढ़ाकर एक सूअर की ओर झपट पड़ा ॥१ १॥ और, बाण से आहत सूअर के डाढ़ के आघात से वह स्वयं भी मर गया। दूर से एक सियार यह सब देख रहा था ॥१ २॥ वह वहाँ आया और भूखा होने पर भी भोजन का संग्रह करने की दृष्टि से उसने सूअर, बहेलिया आदि के प्रचुर परिमाणवाले मांसों को उसने नहीं चखा। उसने पहले धनुष में लगी चमड़े की डोरी को ही खाना प्रारम्भ किया। उसी समय धनुष के हिलने से उससे छूटे हुए बाण से वह स्वयं बिंधकर मर गया। इसलिए, अति संग्रह न करना चाहिए। ब्राह्मण ने इस प्रकार कहने पर, उसकी पत्नी ने तिलों को सूखने के लिए धूप में रख दिया। तब उसके घर के भीतर चले जाने पर कुत्ते ने उसमें मुँह डालकर उन तिलों को भ्रष्ट कर दिया। तब उन तिलों को मूल्य देकर भी किसी ने नहीं खरीदा ॥१ ३-१ ६॥ 'इसलिए, लोभ से मोह नहीं किया जा सकता। वह तो केवल कष्ट देने के लिए ही होता है। ऐसा कहकर आये हुए साधु ने उस साधु से कहा- 'तुम्हारे पास कुदाल हो तो मुझे दो। मैं आज ही तुम्हारे चूहे के इस उपद्रव को दूर करता हूँ'। यह सुनकर मठ-निवासी साधु ने उसे कुदाल लाकर दी और छिपा हुआ मैं अपने बिल में घुस गया ॥१ ७ -१ ९॥ तब उस कुदाल को लेकर उस दुष्ट आगन्तुक साधु ने मेरे आने-जाने के बिल को खोदना प्रारम्भ किया। मेरे भाग जाने पर उस दुष्ट ने क्रमशः जहाँतक खोद डाला जहाँतक वह हार और अन्य धन-संग्रह उसे मिला। 'देखो मित्र इसी धन के तेज से इस चूहे को इतना बल था कि उछलकर वह तुम्हारा भोजन खाता था। ऐसा उसने मठवासी साधु से कहा और मैं सुन रहा था ॥११०-११२॥
८१८ कथासरित्सागर
८१८ कथासरित्सागर तत्र चैकस्य विप्रस्य निवासायाविशं गृहम्। स्थितं मयि स विप्रश्च वदति स्म स्वगेहिनीम् ॥९८॥ श्वसर ब्राह्मणकृते पर्वण्यद्य पचेरिति । कुडन्तं निर्धनस्यैतदित्यवोचच्च सापि तम् ॥९९॥ ततः स विप्रोऽवादीत्तां प्रिये कार्योऽपि सञ्चये। नातिसञ्चयधीः कार्या शृणु चात्र कथामिमाम् ॥१००॥ वने क्वापि कृताखेटो व्याधो यन्त्रितसायकः । प्रादाय मांसं धनुषि प्राधावत्सूकरं प्रति ॥१०१॥ तेनैव काण्डविद्धेन निहतः पोत्रिणाक्षत' । स न्यपतत् तच्चात्र दूरादंशत जम्बुकः ॥१०२॥ स सागरस्य क्षुधार्त्तोऽपि चिकीर्षुः सञ्चयाय सतः। श्रोऽभ्यापामियात् विच्छिन्नं श्वादादतिभूयसः ॥१०३॥ स्नाक्तुं प्रवृत्तं सत्तु गत्वा धनुषि यन्त्रितम्। तत्क्षणं बाष्पलग्नत्रगविद्धा ममार सः ॥१०४॥ तन्नातिसञ्चयः कार्य इति तत्र द्विजन्मना। भार्योक्ता प्रतिपर्यततिलान् प्राक्षिपदातपे ॥१०५॥ प्रविष्टायां गृहं तस्यां प्राद्य श्वा तान्दूषयत्। तथा न धूषगनान्वद्भिर्मूल्यान्निग्राह्यहीत् ॥१०६॥ तस्यै नागाभागाय लाभ वरणाय वयसम्। व्युक्त्वा पुनर्गृहं स्म प्रदाहामन्तुरोथ सः ॥१०७॥ गनित्रमग्निं शशं क्षीयतां याञ्च यः । युक्त्या निवारयाम्येनं मूषाद्यमुपदंशम् ॥१०८॥ मन्त्रणा मन्त्रिरागो स प्रहारम् गनित्राम्। ददर्श न च्छत्रग्यम्बर् दृष्ट्वा प्रादित विन्दूम् ॥१०९॥ ततस्तन गनित्रण प्रहारान्नुरोथ सः। मण्डलार्विर् योग श्रारभ गनित्र शरम् ॥११०॥ रमारूय गालभन्तर् पतायनार मति। पादल द्वार गग्य तार स पादयत्मयम् ॥१११॥ गज्जा शत शलाधनागानन्दान् परम्। ज्ज्ञा गनित्रं न च प्रहार यदि भूत्वा ॥११२॥ १ ततस्तेनैव ।
प्रथम तन्त्रम् ८२१ इस प्रकार, वह साधु मेरा सर्वस्व लेकर और हार का सिर पर रख लिया। तदनन्तर दोनों साधु निश्चिन्त होकर सो गये ।।११३।। उन दोनों के प्रसन्न होकर सो जाने पर भोजन चुराने के लिए पुनः आये हुए मुझे स्थायी साधु ने जगकर छड़ी से मेरे सिर पर मारा ।।११४।। उस प्रहार से आहत मैं बिल में भाग गया किन्तु भाग्यवश मरा नहीं। उसके पश्चात्, मुझमे उछलकर उससे भोजन लेने की शक्ति नहीं रह गई ।।११५।। धन ही पुरुषों का यौवन है और धन का अभाव ही बुढ़ापा है। धन के अभाव से मनुष्य का ओज तेज बल और रूप नष्ट हो जाता है।।११६।। तदनन्तर, केवल अपने पेट भरने का यत्न करने में ही किसी प्रकार समर्थ देखकर मेरे सभी साथी मुझे छोड़कर चले गये ।।११७।। जीवन-निर्वाह न कर सकनेवाले स्वामी को सेवक पुष्पहीन वृक्ष को भ्रमर, जल-रहित सरोवर को हंस चिरकाल तक उसका आश्रय पाकर भी छोड़ देते हैं।।११८।। इस प्रकार, वहाँ बहुत समय से रूठा हुआ मैं इस लघुपती कौए की मित्रता पाकर हे कण्ठश्रेष्ठ यहाँ तुम्हारे पास आ पहुँचा ।।११९।। हिरण्यक के ऐसा कहने पर मन्थरक कछुआ बोला--मित्र यह तुम्हारा अपना ही स्थान है। अतः तुम अधीर न होना ।।१२ ।। गुणी के लिए कोई विदेश नहीं है। सन्तोषी के लिए कोई दुःख नहीं। धैर्यशाली के लिए कोई विपत्ति नहीं और उद्योगी के लिए कोई कार्य असाध्य नहीं ।।१२१।। कछुआ जब इस प्रकार कह ही रहा था कि बहेलिये से डरा हुआ चित्रांगद नाम का एक हिरण दूर से उस वन में आ पहुँचा ।।१२२।। उसे देखकर और उसके पीछे बहेलिये को न आते देखकर उसे धीरज बँधाकर कौए कछुए आदि मित्रों ने उसके साथ भी मित्रता कर ली ।।१२३।। परस्पर एक दूसरे की सहायता करते हुए वे चारों सु-हृदय मित्र सुखपूर्वक उस वन में साथ ही रहने लगे ।।१२४।। एक बार बहुत देर तक चित्रांगद को न आते हुए देखकर, उसे देखने के लिए वह लघुपती कौआ ऊँचे वृक्ष पर चढ़कर चारों ओर उस वन को देखने लगा ।।१२५।। और उसने नदी के एक किनारे पर बील और जाल में बँध हुए चित्रांगद को देखा। आकर यह समाचार उसने चूहे तथा कछुए से कहा ।।१२६।। तब आपस में विचार कर कौआ उस हिरण्यक चूहे को साथ ले जाकर बँधे हुए चित्रांगद के पास ले गया ।।१२७।।
नीत्वा च तन्मे सर्वस्वं हारं मूर्ध्नि निधाय च। आगन्तुस्थायिनौ हृष्टौ प्रव्राजौ स्वपतः स्म तौ ॥११३॥ प्रसुप्तयोस्तयोस्त्वं च हर्तुं मां पुनरागतम्। प्रबुद्ध्याताडयद्यष्ट्या प्रद्राट् स्थायी स मूर्ध्नि मे ॥११४॥ तेनाहं व्रणितो दैवान्न मृतो बिलमाविशम्। भूयश्च शक्तिर्नाभून्मे तदन्नाहरणप्लवे ॥११५॥ अर्थो हि यौवनं पुंसां तदभावश्च वार्द्धकम्। तन्नाश्योजो बलं रूपमुत्साहश्चापि हीयते ॥११६॥ अथात्ममात्रभरणे यत्नवन्तमवेक्ष्य माम्। परित्यज्य गतं सर्वं स मूषकपरिच्छदः ॥११७॥ अवृत्तिकं प्रभुं भृत्या अपुष्पं भ्रमरास्तरुम्। अजलं च सरो हंसा मुञ्चन्त्यपि चिरोषितम् ॥११८॥ इत्थं तत्र चिरोद्विग्नः सुहृदं लघुपतिनम्। प्राप्यैतं कच्छपश्रेष्ठं त्वत्पार्श्वमहमागतः ॥११९॥ एवं हिरण्यकेनोक्ते कूर्मो मन्थरकोऽभ्यधात्। स्वमत्र स्थानमत्से तन्मा मित्राधृतिं कृथाः ॥१२०॥ गुणिनो न विदेशोऽस्ति न सन्तुष्टस्य चासुखम्। धीरस्य च विपन्नास्ति नासाध्यं व्यवसायिनः ॥१२१॥ इति तस्मिन् वदत्येव कूर्मे चित्राङ्गसंज्ञकः। दूरतो व्याधवित्रस्तो मृगस्तद्भवनमाययौ ॥१२२॥ तं दृष्ट्वा तस्य दृष्ट्या च पश्चाद् व्याधमनागतम्। आश्वासितेन तेनापि सख्यं कूर्मादयो व्यधुः ॥१२३॥ न्यवसस्ते ततस्तत्र काककूर्ममृगाखवः। परस्परोपकारेण सुखिनः सुहृदः समम् ॥१२४॥ एकदा क्वापि चित्राङ्गं चिरायातं तमीक्षितुम्। आरुह्य तरुमशिष्टं लघुपती स तद्वनम् ॥१२५॥ ददर्श च नदीतीरे कीलपाशेन संयतम्। चित्राङ्गमवदच्चैतत्तत्त्वदत्त्वाऽलुकूर्मयोः ॥१२६॥ तत सम्मन्त्र्य चञ्च्वा तं गृहीत्वाऽमुं हिरण्यकम्। चित्राङ्गस्यान्तिकं तस्य लघुपती निनाय सः ॥१२७॥
षष्ठम लम्बक ४२३
षष्ठम लम्बक ४२३ तब हिरण्यक ने जाल को दाँतों से काटकर क्षण-भर में जाल से बँधे हुए चित्रांगद को मुक्त कर दिया ॥१२८॥ तबतक नदी के मध्य से आकर मन्थरक कछुआ भी उनके पास किनारे पर आकर मिल गया ॥१२९॥ उसी समय जाल बाँधनेवाले बहलिये ने आकर मृग चूहे और कौए के भाग जाने पर उस कछुए को ही पकड़ लिया ॥१३०॥ हिरन के भागने से व्याकुल बहलिये ने कछुए को घास में रखकर, उसी से सन्तोष किया और घर की ओर चल पड़ा। उसके चलने पर दूरदर्शी हिरण्यक के परामर्शानुसार वह मृग कुछ दूर जाकर और गिरकर मुर्दे के समान पड़ गया और कौआ उसके सिर पर बैठकर मानों उसकी आँखें निकालने लगा ॥१३१ १३२॥ बहलिये ने दूर से हिरन को मरा समझकर और कछुए को घास-सहित नदी के किनारे रखकर मृग को लेने का प्रयत्न किया ॥१३३॥ उसे दूसरी ओर जाते हुए देखकर चूहे ने जाल काटकर कछुए को मुक्त कर दिया और वह नदी में कूद पड़ा ॥१३४॥ हिरन भी कछुए को रखकर आते हुए बहेलिये को देखकर छलांग मारकर भागा और कौआ उड़कर वृक्ष पर बैठ गया ॥१३५॥ उधर से निराश लौटकर आए हुए बहेलिये ने जाल काटकर भाग हुए कछुए को भी न पाकर, दोनों ओर से हताश होकर अपने भाग्य को कोसा और अन्त में वह अपने घर चला गया ॥१३६॥ तब वे चारों मित्र फिर आपस में मिले और प्रेमी मृग उनसे बोला- ॥१३७॥ मैं भाग्यवान् हूँ कि आपलोग जैसे सच्चे और सहृदय मित्र मुझे मिले जिन्होंने अपने प्राणों की भी परवाह न करके मुझे मौत के पंजे से उबार लिया ॥१३८॥ इस प्रकार उस हिरण से प्रशंसित वे चारों मित्र कौआ कछुआ चूहा और हिरण उस वन में परस्पर प्रेम के साथ सुखी होकर रहने लगे ॥१३९॥ इस प्रकार पशु भी बुद्धि से अपना कार्य सिद्ध कर लेते हैं। वे भी अपने प्राणों की चिन्ता न करके आपत्तिके समय मित्र को नहीं छोड़ते ॥१४०॥ मित्रों में परस्पर ऐसी आसक्ति कल्याणकारी होती है, किन्तु यह ईर्ष्या के कारण स्त्रियों में प्रशंसनीय नहीं होती। इस सम्बन्ध में कथा सुनो ॥१४१॥ ईर्ष्यालु पुरुष और उसकी दुष्ट स्त्री की कथा किसी नगर में कोई ईर्ष्यालु पुरुष था। उसकी स्त्री बहुत रूपवती थी और उसे बहुत प्यारी थी ॥१४२॥
८२२ कथासरित्सागर
८२२ कथासरित्सागर हिरण्यकश्च तं बन्धविधुरं मूषको मृगम्। क्षणादमुञ्चदाश्वास्य दशनच्छिन्नपाशकम्॥१२८॥ तावन्मन्थरकोऽभ्येत्य नदीमध्यान् कच्छपः। आरुरोह तटं तेषां निकटं स सुहृत्प्रियः॥१२९॥ तत्क्षणं स कुतोऽप्येत्य लुब्धकः पाशदायकः। विद्रुतेषु मृगाद्येषु लब्ध्वा तं कूर्ममग्रहीत्॥१३०॥ क्षिप्त्वा च जालकान्तस्तं यावन्नष्टमृगाकुलः। स याति तावद्दृष्ट्वैतद् दीर्घदृश्वासुवाक्यत॥१३१॥ भृगो गत्वा ततो दूरं पतित्वासीन्मृतो यथा। काकस्तु मूर्ध्नि तस्यासीच्चक्षुषी पाटयन्निव॥१३२॥ तद्दृष्ट्वा स गृहीत तं व्याधो मत्वा मृगं मृतम्। गन्तुं प्रवृते नद्यास्तटं कूर्म्म निधाय तम्॥१३३॥ यात दृष्ट्वा तमभ्येत्य मूषकस्तस्य जालकम्। कूर्मस्य सोऽच्छिनत्तेन मुक्तो नद्यां पपात स ॥१३४॥ मृगोऽपि निकटीभूतं व्याधं वीक्ष्य विकच्छपम्। उत्थाय स पलाय्यागात् काकोऽप्यारुडवांस्तरुम्॥१३५॥ एत्य व्याधोऽत्र कूर्मं तं वत्सबच्छेदपलायितम्। अप्राप्तोभयविभ्रष्टो दैव शोचन्नगाद् गृहम्॥१३६॥ ततो मिलन्ति स्मैकत्र हृष्टाः कूर्मादयोऽत्र ते। मृगस्तु प्रीतिमानेवं कूर्मादींस्तानभाषत स॥१३७॥ पुण्यवानस्मि यत्प्राप्ता भवन्तः सुहृदो मया। प्राणानुपस्कृत्य यैरेष मृत्योरहमुद्धृतः॥१३८॥ एवं प्रशंसता तेन मृगेण सह तत्र ते। अन्योन्यप्रीतिसुखिताः काककूर्मसखोऽवसन्॥१३९॥ प्रज्ञया साधयन्त्येव विर्य्यल्पोऽपि समीहितम्। प्राणैरपि न मुञ्चन्ति तेऽन्येव मित्रमापदि॥१४०॥ एवं च श्रेयसी मित्रष्वासक्तिर्नाङ्गनासु ताम्। इर्ष्याय मत्त्याच्छंसन्ति तथा च श्रूयतां कथा॥१४१॥ ईर्ष्याकुपुरुषस्य तस्य च दुष्टस्त्रियःकथा नगर क्वापि कोऽप्यासीदीर्ष्यावान्नृप प्रभो। बभूव तस्य भार्या च वल्लभा रूपशालिनी॥१४२॥
दशम लम्बक ८२५
दशम लम्बक ८२५ वह अविश्वासी पति उसे कभी अकेला नहीं छोड़ता था। वह चित्रस्थ पुरुषों से भी उसके चरित्र के पतन की आशंका करता था ॥१४३॥ एकबार किसी आवश्यक कार्य से वह पुरुष पत्नी को साथ ही लेकर दूसरे देश को गया॥१४४॥ आगे के जंगली मार्ग में वह भीलों को देखकर भय से अपनी पत्नी को एक गांव के बूढ़े ब्राह्मण के घर में रखकर उस जंगल में गया ॥१४५॥ उस ब्राह्मण के घर रहती हुई उस स्त्री ने उस मार्ग से भीलों को जाते हुए देखा और एक युवा भील के साथ वह निर्लज्ज स्त्री ईर्ष्यालु पति को छोड़कर इस प्रकार निकल भागी जैसे वेगवती नदी बाँध तोड़कर निकल जाती है ॥१४६ १४७॥ जब उसका पति अपना कार्य समाप्त करके वहाँ आया तब उसने उस ग्रामीण वृद्ध से अपनी स्त्री की मांग की ॥१४८॥ 'मैं नहीं जानता कि वह कहाँ गई, इतना अवश्य है कि यहाँ कुछ भील आये थे सम्भवतः वे ही उसे ले गये हों। भीलों का वह गाँव भी यहीं पास में है। शीघ्र जाओ। तुम्हें स्त्री मिलेगी। मेरे प्रति कुछ विपरीत बुद्धि न करो' ॥१४९ १५०॥ ब्राह्मण से इस प्रकार कहा गया वह रोता-कलपता और अपनी बुद्धि की निन्दा करता हुआ भीलों के गाँव में गया और वहाँ जाकर उसने अपनी पत्नी को भी देखा ॥१५१॥ वह पापिन स्त्री भी उसे देखकर डरी हुई-सी उसके पास आकर बोली- मेरा अपराध नहीं है। मुझे भील बलपूर्वक ले आया' ॥१५२॥ 'चलो जबतक कोई देखता नहीं यहाँ गाँव में चलें। इस प्रकार कहते हुए उस प्रेमान्ध पति से वह बोली —॥१५३॥ 'शिकार पर गये हुए उस भील के आने का समय हो गया है। आने पर वह पीछे दौड़कर मुझे और तुझे दोनों को मार डालेगा ॥१५४॥ इसलिए, इस गुफ़ा में घुस कर बैठो। रात में सोये हुए उसे मारकर निडर होकर चलेंगे ॥१५५॥ उस दुष्टा स्त्री से इस प्रकार कहा गया वह मूर्ख उसी गुफा में घुसकर बैठ गया क्योंकि काम से अन्ध व्यक्ति के हृदय में विवेक के लिए स्थान नहीं होता ॥१५६॥ उस दुष्टा स्त्री ने सायंकाल घर पर आये हुए उस भील को दुर्बलमन के कारण आया हुआ अपना पति दिखा दिया ॥१५७॥ १ ४