कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
७६६ कथासरित्सागर
७६६ कथासरित्सागर दृष्ट्वा नियम्य स क्रोधं चिन्तयामास धैर्यतः । किं मित्रद्रोहिणैतेन पङ्गुना निहतेन मे ॥५॥ दुश्चारित्र्यानया वापि पापया निगृहीतया । किं करोम्यहमप्येनान्मात्मानं पापभागिनम् ॥६॥ इत्यालोच्य परित्यज्य तावुभावप्युवाच सः । हन्यामहं न युवयोः पश्येयं पुनरेव च ॥७॥ नागन्तव्यमितो भूयो मम लोचनगोचरम् । इत्युक्त्या तौ च मुक्तौ तौ ययतुः क्वापि दूरतः ॥८॥ स स्वस्यां परिणीतायामभूच्छूरवर्मा सुनिर्वृतः । एवं नूनं जितक्रोधो न दुःखस्यास्पदीभवेत् ॥९॥ कृतप्रज्ञश्च विपदा न जातु न बाध्यते । निगदाम्यपि हि प्रज्ञा श्रेयसे न परायणम् ॥१०॥ तथा च शृण्विमां सिंहवृषभादिगतां कथाम् । सञ्जीवकवृषभस्य पिङ्गलकसिंहस्य च कथा आसीत् कोऽपि वणिक्पुत्रो धनवान् नगरे क्वचित् ॥११॥ तस्यैकदा वणिज्यार्थं गच्छतो मथुरां पुरीम् । भारवोढा युगं भग्नं भरेण न्यपतद्भुवि ॥१२॥ गिरिप्रस्रवणोद्भूतपङ्के मग्नः स एव पथि । सञ्जीवाख्यो वृषभः पपाताद्भूवनिर्गतः ॥१३॥ दृष्ट्वाभिपालितमिदमश्मगिरिदारणायतनम् । निरागसं चिरात् त्यक्त्वा वणिक्पुत्रो जगाम सः ॥१४॥ स च सञ्जीवको दैवाद् गतान्वक्षा युगं शनैः । उत्थाय शान्तदम्भोजदुर्वलस्तद्भविभाण्डवान् ॥१५॥ चरंश्च यमुनातारे हरितानि तृणानि च । पीत्वा स्वच्छतरं वारि शनैर्हृष्टतनुर्बभूव ॥१६॥ उत्प्लवन् पीनसर्वाङ्गः माद्यन् द्युतिमयस्तथा । शृङ्गोल्लिखितपद्माक्षः स च सन्नादनन् वने ॥१७॥ तत्राथ चाभवत्तत्र महासिंहो वनान्तरम् । यियुः पिङ्गलको नाम रिपुमारणकोविदः ॥१८॥ दमनकः करटकश्च द्वौ शृगालावरचैतयोः । एषां मन्त्री स हि नाम तथा करटकस्तयोः ॥१९॥
दशम लम्बक ७२७
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यह देखकर और क्रोध को रोककर वह धैर्यपूर्वक सोचने लगा कि इस मित्रद्रोही पशु को मारने से क्या लाभ ? और, इस दुष्टा स्त्री को मारकर भी क्या होगा ? मैं भी इन्हें मारकर पाप का भागी क्यों बनूँ ॥५६॥ इस प्रकार सोचकर और उन दोनों को छोड़कर वह बोला—'मैं तुम दोनों में से उसे मार डालूँगा जिसे बार-बार देखूँगा। अब यहाँ मेरी आँखों के आगे कभी न जाना'। इस प्रकार, कहकर उसके द्वारा छोड़े गये वे दोनों कहीं दूर चले गये ॥५७-८॥ तदनन्तर, दूसरी स्त्री से विवाह करके वह शूरवर्मा निश्चिन्त हो गया हे महाराज समुचित बुद्धिवाला व्यक्ति विपत्तियों से कभी बाधित नहीं होता। पदुओं की भी बुद्धि ही कल्याणकारिणी होती है पराक्रम नहीं ॥५ ९ १ ॥
संजीवक बैल और पिंगलक सिंह की कथा १
सिंह बैल आदि की कथा इस सम्बन्ध में सुनो। किसी नगर में एक धनी वैश्यपुत्र था ॥१२१॥ एक बार व्यापार के लिए मथुरा को जाते हुए उसके रथ का भार ढोनेवाला संजीवक नाम का एक बैल पहाड़ के टपकते जल से कीचड़वाले मार्ग में जाने हुए, गाड़ी का जुआ टूट जाने से दलदल म गिरकर फँस गया और उसके अंग शत-विक्षत हो गये ॥१२२ १३॥ उसे गिरकर बेहोश हुए देखकर और उसके उठाने के सभी प्रयत्नों को विफल जानकर निराश वैश्य ने बहुत समय के पश्चात् उसे वहीं छोड़ दिया और आगे की यात्रा की ॥१२४॥ दैवयोग से वह अनाथ और असहाय संजीवक बैल धीरे-धीरे कुछ स्वस्थ होकर नई कोमल घासों को खाता हुआ दलदल से निकलकर पहले के समान स्वस्थ हो गया और यमुना के तट पर जाकर, वहाँ भी हरी-हरी घासों को खाता हुआ स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण करने लगा और महा बलवान् होगया ॥१२५ २६॥ उठी हुई और मोटी डीलवाला शिव के वाहन नन्दी के समान मस्त संजीवक सींगों से मिट्टी के डूहों को उखाड़ता हुआ बार-बार रँभाया करता था ॥१२७॥ उस स्थान के समीप ही अपने पराक्रम से सारे जंगल पर छाया हुआ पिंगलक नाम का एक सिंह रहता था। दो शृगाल उस मृगराज के मन्त्री थे जिनमे एक का नाम करटक और दूसरे का नाम दमनक था ॥१२८ १ ॥
१ पंचतन्त्र के मित्रभेद नामक प्रथम तन्त्र की कथा जिसका प्रारम्भ इस श्लोक से होता है— वर्धमानो महान् स्नेहः सिंहगोवृषयोर्वने। पिशुनेनातिक्रुद्धेन जम्बुकेन विनाशितः॥ यही कथा बगदाद के शाह हारूँ रशीद के समय कलीला दिमना के नाम से अरबी में अनूदित हुई है।—अनु
स सिंहो जातु तोयार्थमागच्छन् यमुनातटम् । तस्याराक्षादमशृणोत् सञ्जीवनकहुङ्कृतम् ॥२०॥ श्रुत्वा चाश्रुतपूर्वं स तन्नादं दिक्षु मूर्च्छितम् । स सिंहोऽचिन्तयत् कस्य बत नादोऽयमईदृशः ॥२१॥ नूनमत्र महत्सत्त्वं किञ्चित्तिष्ठत्यवेमि सत् । तन्मे दृष्ट्वैव मां हन्यादनाद्वापि प्रवासयेत् ॥२२॥ इति सोऽपीतपानीय एव गत्वा वनं द्रुतम् । भीतः सिंहो निगूढासीदाकारमनुयायिषु ॥२३॥ अथ प्राज्ञो दमनकः स मन्त्री तस्य जम्बुकः । तमवोचत् करटकं द्वितीयं मन्त्रिणं रहः ॥२४॥ अस्मत्स्वामी पयः पातुं गतो पीत्वैव सत्त्वरम् । आगतस्त्वरितं भद्र प्रच्छन्नोऽधैव कारणम् ॥२५॥ ततः करटकोऽवादीद् व्यापारोऽस्माकमेष कः । श्रुतस्त्वया न वृत्तान्तः किं कीलोत्पाटिनः कपेः ॥२६॥
कीलोत्पादिनो वानरस्य कथा
नगरे क्वापि केनापि वणिजा देवतागृहम् । कर्तुमारब्धमभवन् भूरिसम्भूृतदायकम् ॥२७॥ तत्र कर्मकराः काष्ठं क्रकचोर्ध्वार्धपाटितम् । दत्त्वान्तःकीलकमत्रं ते स्थापयित्वा गृहं ययुः ॥२८॥ तावदागत्य तत्रैको वानरश्चापलोत्प्लुतैः । कीलकन्यस्तविभागेऽपि काष्ठे तस्मिन्नुपाविशत् ॥२९॥ नाड्यन्तरे मुखे भूत्योरिव तत्रोपविश्य च । कीलमुत्पाटयामास हस्ताभ्यां निष्प्रयोजनम् ॥३०॥ मिथोश्लिष्टात्कीलेन सह काष्ठेन तेन च । सषूमागढमसङ्घट्टपीडिताङ्गो ममार सः ॥३१॥ एवं न यस्य यत्कर्म स तत्कुर्वन् विनश्यति । तस्मात् किं मृगराजस्य विज्ञातेनाद्यचेन नः ॥३२॥ एतत्करटकाच्छ्रुत्वा धीरो दमनकोऽब्रवीत् । अन्तर्भूमं प्रभोः प्राप्यो विशेषः सर्वदा बुधैः ॥३३॥
प्रथम तन्त्र ७६१ उस सिंह ने एकबार पानी पीने के लिए यमुना के किनारे की ओर आते हुए उस बड़ी डील- वाले बैल की गर्जना सुनी ॥२ ॥ चारों दिशाओं में फैलनेवाले और इस प्रकार कभी इस न सुनाई पड़नेवाले शब्द को सुनकर वह सिंह सोचने लगा कि 'यह किसका शब्द है ! मालूम होता है कि यहाँ कोई बलवान् प्राणी रहता है । वह मुझे देखते ही मार डालेगा या इस वन से निकाल देगा' ॥२१ २२॥ ऐसा सोचकर सिंह बिना पानी पिये ही वन को लौट और अपने अनुचरों में अपने को छिपाकर बैठ गया ॥२३॥ उसकी यह दशा देखकर उमरा बुद्धिमान् शृगाल रूपी दमनक दूसरे मन्त्री करटक से एकान्त में बोला-॥२४॥ 'हमारा स्वामी सिंह पानी पीने के लिए गया था किन्तु वह बिना पानी पिय ही क्यों लौट आया इसका कारण पूछना चाहिए ॥२५॥ तब करटक ने कहा- 'यह हमारा व्यापार (काम) नहीं है क्या तू ने खूँटा उखाड़नेवाले बन्दर की कहानी नहीं सुनी ? ॥२६॥ कील उखाड़नेवाले बन्दर की कथा कहीं किसी नगर में एक बनिया
७७ कथासरित्सागर
७७ कथासरित्सागर दमनककरटकयोः संवादः को हि नाम न कुर्यात् केवलोदरपूरणम्। एवं दमनकेनोक्ते साधु करटकोऽब्रवीत् ॥३४॥ स्वेच्छयातिप्रवृत्तो यो न धर्मः सेवकस्य सः। इति चोक्तः करटकेनेदं दमनकोऽभ्यधात् ॥३५॥ मैवमात्मानुरूपं हि फलं सर्वोऽपि वाञ्छति। श्वा तुष्यत्यस्थिमात्रेण केसरी धावति द्विपे ॥३६॥ एतच्छ्रुत्वा करटकोऽवादीदेवं कृते यदि। कुप्यति प्रत्युत स्वामी तद्विशेषफलं कुतः ॥३७॥ अतीव कर्कशा स्तब्धा हिंस्रजन्तुभिरावृता। दुरासदाश्च विषमा ईश्वराः पर्वता इव ॥३८॥ ततो दमनकोऽवादीत् सत्यमेतद्बुधस्तु यः। स्वभावानुप्रवृत्त्या स्वीकरोति शनैः प्रभुम् ॥३९॥ एवं कुरुत चेत्युक्तस्ततः करटकेन सः। ययौ दमनकस्तस्य सिंहस्य स्वामिनोऽन्तिकम् ॥४०॥ प्रणिपत्योपविष्टश्च सिंहं पिङ्गलकं स तम्। स्वामिनं कृतसत्कारं क्षणादेव व्यजिज्ञपत् ॥४१॥ अहं क्रमागतस्तावद् भृत्यो हितस्तव। हितः परोऽपि स्वीकार्यो हेयः स्वोऽप्यहितः पुनः ॥४२॥ क्रीत्वा यतोऽपि मूल्येन मार्जारः पोष्यते हितः। अहितो हन्यते यत्नाद् गृहजातोऽपि मूषकः ॥४३॥ श्रोतव्यं च हितैषिभ्यो भृत्यैभ्यो भूतिमिच्छता। अपृष्टैरपि वक्तव्यं तैश्च काले हितं प्रभो ॥४४॥ तद्विश्वसिषि चेद्देव न कुप्यसि न निह्नुषे। पृच्छामि तदहं किञ्चिन्न सोद्वेगं करोषि चेत् ॥४५॥ एवं दमनकेनोक्तः सिंहः पिङ्गलकोऽब्रवीत्। विश्वासाह्रोऽसि भक्तोऽसि तन्निःशङ्कं त्वयोच्यताम् ॥४६॥ इति पिङ्गलकेनोक्तेऽथोचेद्दमनकोऽथ सः। देव पानीयपानार्थं तृषितो गतवानसि ॥४७॥ तदपीतजलः किं त्वमागतो विमना इव। एतत्तद्वचनं श्रुत्वा स मृगेन्द्रो व्यचिन्तयत् ॥४८॥
दशम लम्बक ४७१
दशम लम्बक ४७१ दमनक और करटक का संवाद केवल पेट भरना कौन नहीं जानता ? दमनक के ऐसा कहने पर सरलहृदय करटक बोला- ॥३४॥ 'अपनी इच्छा से राजा की अंतरंग बातों में अधिक घुसना सेवक का धर्म नहीं है। करटक के इस प्रकार कहने पर दमनक बोला-'ऐसा नहीं ! सभी अपने योग्य फल पाना चाहते हैं। कुत्ता हड्डी का एक टुकड़ा पाकर सन्तुष्ट हो जाता है किन्तु सिंह हाथी पर दौड़ता है ॥३५ ३६॥ यह सुनकर करटक बोला- ऐसा जानकर स्वामी उल्टे ही कोप करने लगे तो उसका विशेष फल कैसे मिल सकता है ॥३७॥ क्योंकि स्वामी जन पर्वतों के समान अत्यन्त कठिन हिंसक प्राणियों से घिरे होने के कारण कठिनाई से वश में आते हैं ॥३८॥ तब दमनक ने कहा- 'यह सच है किन्तु जो समझदार है, वह मालिक के स्वभाव के अनुसार चलकर उसे धीरे-धीरे वश में कर लेते हैं ॥३९॥ 'तब ऐसा ही करो' इस प्रकार करटक ने उससे कहा। तदनन्तर दमनक अपने राजा सिंह के पास गया ॥४०॥ प्रणाम करके पास में बैठे हुए दमनक ने अपने स्वामी पिंगलक सिंह द्वारा 'आओ बैठो' कहकर स्वागत किये जाने पर, इस प्रकार निवेदन किया-॥४१॥ 'स्वामी मैं आपका कुल-परम्परागत सेवक हूँ। दूसरा व्यक्ति भी यदि आपका हितैषी हो तो उसे स्वीकार करना चाहिए। और, आपका आत्मीय व्यक्ति भी यदि अ-हितचिन्तक हो तो उसे छोड़ देना चाहिए ॥४२॥ अपना हित चाहनेवाले बिलाव को भी मूल्य देकर घर में लाकर रखा जाता है और हानि पहुँचानेवाले चूहे को अपने घर में ही उत्पन्न होने पर भी मार दिया जाता है ॥४३॥ अपना कल्याण चाहनेवाले राजा को अपने हितैषी सेवकों की बात सुननी चाहिए। और सेवकों को भी चाहिए कि वे बिना पूछे भी अपने स्वामी का हित चिन्तन करें और उसे हित बात कहे ॥४४॥ इसलिए स्वामिन् यदि आप विश्वास करते हैं साथ ही कोप न करें और छिपावें नहीं तो मैं कुछ पूछना चाहता हूँ ॥४५॥ दमनक के इस प्रकार पूछने पर पिंगलक सिंह उससे बोला- 'तुम विश्वास करने योग्य और हमारे भक्त सेवक हो इसलिए जो भी कहना हो निश्शंक होकर कहो' ॥४६॥ पिंगलक के इस प्रकार कहने के पश्चात् दमनक बोला- 'देव तुम प्यासे होकर पानी पीने के लिए गये थे ॥४७॥ किन्तु, आप बिना पानी पिये ही कुछ उदास-से होकर क्यों लौट आये ? दमनक की यह बात सुनकर पिंगलक सिंह सोचने लगा ॥४८॥
लक्षितोऽस्म्यमुना तत्किं मत्तस्त्यास्य निगूह्यत। इत्यालोच्याब्रवीत् स शृणु गोप्यं न तदस्ति मे ॥४९॥ जलपार्श्वगतेनात्र नादोऽपूर्वः श्रुतो मया। स चास्मदधिकस्योग्रो जाने सत्त्वस्य कस्यचित् ॥५०॥ भार्यं शब्दानुरूपेण प्रायेण प्राणिनां महत्। प्रजापतिर्विचित्रो हि प्राणिसर्गोऽधिकाधिकः ॥५१॥ येन बहु प्रविष्टेन न शरीरं म मे वनम्। तस्मादितो मयान्यत्र गन्तव्यं कानने क्वचित् ॥५२॥ इति वादिनमाह स्म सिंहं दमनकोऽथ तम्। शूरः समित्यतां देव किं वनं त्यक्तुमिच्छसि ॥५३॥ जलेन भज्यते सेतुः स्नेहः कर्णेजपेन तु। अरक्षणेन मन्त्रश्च शब्दमात्रेण कातरः ॥५४॥ यन्त्रादिहृच्छब्दास्ते ते हि भवन्त्येव भयङ्कराः। परमार्थमविज्ञाय न भेतव्यमत प्रभो ॥५५॥
भेरीगोमायुकथा
तथा च भेरीगोमायुकथेयं श्रूयतां त्वया। कोऽपि क्वापि वनोद्देशे गोमायुरनशत्पुरा ॥५६॥ स भक्ष्यार्थी भ्रमन्नुत्तुङ्गां प्राप्य भुवं ध्वनिम्। गम्भीरमेकतः श्रुत्वा भीतो दृष्टिं ततो ददौ ॥५७॥ तत्रादृष्टचरां भेरीमपश्यत् पतितस्थिताम्। किमीदृशोऽयं प्राणी स्यात् कोऽप्येवंरूपशब्दकृत् ॥५८॥ इति सञ्चिन्तयन् दृष्ट्वा निस्पन्दां तामुपाययौ। यावत्पश्यति तावत्स नायं प्राणीत्यबुध्यत ॥५९॥ वातप्रेल्लच्छरस्तम्बहतचर्मपुटोद्भवम् । शब्दं निरूप्य तस्यां च स गोमायुर्जहौ भयम् ॥६०॥ स्यात्किञ्चिद्भक्ष्यमत्रान्तरित्युत्पाट्य स पुष्करम्। प्रविश्य वीक्षते यावत् केवले दारुचर्मणी ॥६१॥ तन्मेव शब्दमात्रेण किं विभ्यति भवादृशाः। मन्यसे यदि तत्तत्र तद्विज्ञातुं व्रजाम्यहम् ॥६२॥
दशम लम्बक ७७१
दशम लम्बक ७७१ इसने मुझे ताड़ लिया है अब तो इस अपने भक्त से क्या छिपाया जाय ? ऐसा सोचकर वह बोला—'सखे तेरे लिए कुछ छिपाने की बात नहीं है॥४९॥ जल के पास गये हुए मैंने एक अपूर्व शब्द सुना जो पहले कभी नहीं सुना था। वह शब्द मुझसे भी अधिक बल किसी प्राणी का था ॥५० ॥ क्योंकि वह प्राणी भी शब्द के ही अनुरूप होगा। ब्रह्मा की सृष्टि विचित्र है। उसमें एक-से-एक बढ़कर प्राणी हैं ॥५१॥ ऐसे प्राणी के मेरे इस वन में घुस आने पर यह शरीर और वन अब मेरे नहीं रहे। इसलिए, अब मुझे यहाँ से किसी दूसरे वन में चला जाना चाहिए' ॥५२॥ ऐसा कहते हुए सिंह से दमनक ने कहा—'स्वामिन् ! आप शूर हैं और अच्छे नेता (राजा) हैं, तो वन को क्यों छोड़ना चाहते हैं ? ॥५३॥ पानी के प्रवाह से पुल टूटता है और कानाफूसी से प्रेम टूटता है ! बिना रक्षा किये मन्त्र (नीति) फूट पड़ता है और कायर व्यक्ति केवल शब्द से ही टूट जाता है ॥५४॥ भेरी, शंख आदि के शब्द भी भयंकर होते हैं। इसलिए, वास्तविक बात को बिना जाने डरना नहीं चाहिए॥५५॥ नगाड़ा और सियार की कथा इस प्रसंग में आप 'नगाड़ा और एक सियार की कथा सुनें' । प्राचीन समय में किसी जंगल में एक सियार रहता था ॥५६॥ उसने भोजन की खोज में घूमते हुए पहले की पुरानी युद्ध-भूमि में पहुँचकर और उसके एक ओर से गम्भीर शब्द सुनकर डरते हुए उधर देखा। वहाँ उसने पहले कभी न देखे हुए और गिर कर भूमि में पड़े हुए एक नगाड़े को देखा। तब उसे देखकर उसने सोचा क्या यह इस प्रकार का शब्द करनेवाला कोई प्राणी है ? ॥५७-५८॥ ऐसा सोचता हुआ वह एकदम स्थिर पड़े हुए उस नगाड़े के पास गया और जब उसे भली भाँति देखा तब उसे मालूम हुआ कि यह कोई प्राणवाली वस्तु नहीं है॥५९॥ वायु से हिलते हुए सरकंडों के आघात से बोलते हुए नगाड़े के चमड़े के उस शब्द को सुनकर उस सियार ने भय छोड़ दिया ॥६० ॥ उसके भीतर कुछ खाने योग्य वस्तु मिलेगी इस प्रकार सोचकर, उसके चमड़े को उधेड़ कर जब उसने देखा तब तो उसे केवल लकड़ी और चमड़ा ही उसे दीखा ॥६१॥ अतः हे स्वामी आप-जैसे व्यक्ति भी क्या केवल शब्द से डरते हैं? यदि आप यहाँ भय का कारण समझते हैं तो मैं उसे जानने के लिए जाता हूँ ॥६२॥
३७४ कथासरित्सागर
३७४ कथासरित्सागर इत्युक्त्वाऽथ दमनको गच्छ क्षमतोऽसि चेदिति। गदितस्तेन सिंहेन स ययौ यमुनातटम्॥६३॥ तत्र शब्दानुसारेण यावत्त्वरं स गच्छति। तावत्तृणानि खादन्तं वृषभं तं ददर्श सः ॥६४॥ उपेत्य चान्तिकं तस्य कृत्वा तेन च संविदम्। गत्वा तस्मै स सिंहाय यथावस्तु शशंस तत्॥६५॥ महोक्षः स त्वया दृष्टः संस्तवश्च कृतो यदि। तदिहानय तं भुक्त्वा तावत्पश्यामि कीदृशः ॥६६॥ इत्युक्त्वा स प्रहृष्टस्तं सिंहः पिङ्गलकस्ततः। वृषस्य प्राहिणोत्तस्य पार्श्वं दमनकं पुनः॥६७॥ एह्याह्वयति तुष्टस्त्वामस्मत्स्वामी मृगाधिपः। इति गत्वा दमनकेनोक्तः स वृषभो भयात् ॥६८॥ यदा न प्रतिपेदे तत्सदा गत्वा पुनर्वनम्। तं निजस्वामिनं सिंहं तस्याभयमदापयत्॥६९॥ एत्याभयेन चाश्वास्य ततः सञ्जीवकं स तम्। वृषभं तं दमनकोऽनयीत् केसरिणोऽन्तिकम् ॥७०॥ स चागतं तं प्रणतं दृष्ट्वा सिंहः कृतादरः। उवाच हैव तिष्ठ त्वं मत्पार्श्वे निर्भयोऽधुना॥७१॥ तथेति तेन तत्रस्थेनाहृतः स तथा क्रमात्। उक्त्या यथान्यविमुखस्तद्गतोऽभूत्स केसरी ॥७२॥ ततो दमनकोऽवादीत्खिन्नः करटकं रहः। पश्य सञ्जीवकवृतः स्वामी नावामवेक्षते ॥७३॥ एक एवामिषं भुङ्क्ते न भागं नौ प्रयच्छति। मूढबुद्धिः प्रभुश्चायमुख्यानेनाथ शिक्ष्यते ॥७४॥ कृतो मयैव दोषोऽस्य यदेवं वृषमानयम्। तत्पाहं करिष्यामि यथोक्षाय विस्रक्ष्यति॥७५॥ मस्यान्मव्यसनाच्चायं निवर्त्स्यति यथा प्रभुः। एतद्दमनकाच्छ्रुत्वा वचः करटकोऽथ सः॥७६॥ सखे न कर्तुमधुना शक्यमेतद्भवताऽपि। ततो दमनकोऽवादीच्छक्ष्यामि प्रज्ञया ध्रुवम् ॥७७॥
दशम लम्बक ७७५
दशम लम्बक ७७५ दमनक के इस प्रकार कहने पर सिंह ने कहा कि 'तुम समर्थ हो तो जाओ। स्वामी से यह सुनकर वह यमुना-तट पर गया ॥६३॥ वहाँ पर जब वह शब्द के अनुसार चुपचाप जा रहा था तब उसने घास चरते हुए एक बैल को देखा ॥६४॥ तब वह उस बैल के पास आकर और उससे बातचीत करके सिंह के पास लौट आया और उसे उसने वास्तविक समाचार दिया ॥६५॥ 'यदि तूने बड़े साँड़ को देखा है और उससे बातचीत की है तो उसे युक्तिपूर्वक समझा बुझाकर यहाँ ले आ। मैं भी देखूँ वह कैसा है ?' ॥६६॥ इस प्रकार कहकर उस प्रसन्न पिंगलक ने दमनक को फिर उस बैल के पास भेजा ॥६७॥ 'आओ आओ हमारा प्रसन्न स्वामी मृगराज तुम्हें बुलाता है। दमनक ने जाकर बैल से इस प्रकार कहा किन्तु उसने भय के कारण विश्वास नहीं किया। तब दमनक ने फिर से वन में जाकर अपने स्वामी सिंह द्वारा उस बैल को अभयदान दिलाया ॥६८-६९॥ और फिर, बैल के पास जाकर उसे अभयदान द्वारा विश्वास दिलाकर और उसे धीरज बँधाकर दमनक बैल को सिंह के पास ले आया ॥७०॥ सिंह ने आये हुए और प्रणाम करते हुए बैल से आदर के साथ कहा—'तुम अब यहाँ मेरे पास निडर होकर रहो' ॥७१॥ 'ठीक है' ऐसा कहकर उसके पास आदर से रहते हुए बैल ने धीरे-धीरे सिंह को इस प्रकार वश में कर लिया कि वह दूसरों से उदासीन हो गया ॥७२॥ तब उपेक्षा के कारण दुःखी दमनक ने एकान्त में करटक से कहा—'देखो संजीवक की ओर खिंचा हुआ स्वामी अब हम दोनों की उपेक्षा करता है ॥७३॥ शिकार मारकर सब मांस अकेले ही खा जाता है, हम लोगों को नहीं देता। आज यह मूर्ख सिंह इस बैल से सिखाया जा रहा है ॥७४॥ यह दोष मेरा ही है कि मैं इस बैल को यहाँ लाया। अब मैं ऐसा करूँगा कि यह बैल नष्ट हो जायगा ॥७५॥ और हमारा स्वामी भी इस अनुचित व्यसन से दूर हो जायगा। दमनक के ये वचन सुनकर करटक बोला—'मित्र अब यह कार्य तुम भी नहीं कर सकते। उसके ऐसा कहने पर दमनक ने कहा—'बुद्धि द्वारा अवश्य कर सकता हूँ' ॥७६-७७॥
७७६ कथासरित्सागर
[Page Header] ७७६ कथासरित्सागर
न स शक्नोति किं यस्य प्रज्ञा नापदि हीयते । तथा च मकरस्तैतां बकहन्तुः कथां शृणु ॥७८॥
बककर्कटयोः कथा
आसीत् कोऽपि बकः पूर्वं मत्स्याढ्ये सरसि क्वचित् । मत्स्यास्तत्र पलायन्त तस्य दृष्टिपथाद्रुमात् ॥७९॥ अप्राप्नुवंश्च मिथ्या तान्स मत्स्यान्ब्रवीद्वकः । इहागतो मत्स्यघाती पुरुषः कोऽपि जालबान् ॥८०॥ स जालेनाचिराद्युष्मान् गृहीत्वा विहनिष्यति । तत्कुरुध्वं मम वचो विश्वासो वोऽस्ति यन्मयि ॥८१॥ अस्त्येकान्ते सरः स्वच्छमज्ञातमिह धीवरैः । एते तत्र निवासाथ नीत्वैकैकं क्षिपामि वः ॥८२॥ तच्छ्रुत्वा समयेरुक्त मत्स्यैस्तैर्जडबुद्धिभिः । एव कुरुष्व विवस्ता वय त्वन्मयसिला इति ॥८३॥ ततो बकस्तानेकैक मत्स्यान् नीत्वा शिलातले। विन्यस्य भक्षयामास स बहून् विप्रलम्भकः ॥८४॥ दृष्ट्वा मीनानमन्तं तं 'मकरस्तत्सरो गतः । एको बक स पप्रच्छ नयसि क्व तिमीमिति ॥८५॥ ततस्त स तदेवाह बको मत्स्यानुवाच यत् । तेन भीतो भयोऽत्रोचत् स मामपि नयति त्वम् ॥८६॥ सोऽपि तन्मांसगर्धान्धबुद्धिरादाय त बकः । उत्पत्य प्रापयति तथावद्यम्यशिलातलम् ॥८७॥ तावत्तज्जग्धमीनास्थिशकला न्यत्र वीक्ष्य सः । त बुध्यते स्म मकरो बक विश्वास्य भक्षकम् ॥८८॥ तत शिलातल न्यस्तमात्रस्तस्य स तत्क्षणम् । बकस्य मकरो धीमांश्चकर्ताविव्हल शिरः ॥८९॥ गत्वा च शेषमत्स्यानां यथावत् स शशंस तत् । तेऽप्याप्यभिननन्दुस्तं तुष्टा प्राणप्रदायिनम् ॥९०॥
[Footnote] १ हितोपदेशे पञ्चतन्त्रादिषु मकरस्थाने कर्कटस्योल्लेखो दृश्यते। स एव च सङ्गत प्रतीपते। मकरस्य बकेन मैत्री तयोश्चाहवं च दुर्घटमेव प्रतीपते।
दशम लम्बक ७७७
दशम लम्बक ७७७ आपत्ति के समय जिसकी बुद्धि नष्ट नहीं होती वह क्या नहीं कर सकता। इस सम्बन्ध में बगुले को मारनेवाले मकर¹ की कथा सुनो ॥७८॥ बगुला और केकड़े की कथा किसी समय मछलियों से भरे हुए तालाब में एक बगुला रहता था। उसके अंगूठ में ग फैले इसलिए मछलियाँ उसकी आँखों से ओझल रहती थीं ॥७९॥ इस प्रकार, उन मछलियों को न पाकर बगुले ने मछलियों से झूठ कहा कि 'यहाँ पर जाल फेंककर कोई मछली मारनेवाला पुरुष आया है। वह शीघ्र ही तुमलोगों को जाल से पकड़कर मार डालेगा। इसलिए, यदि तुम लोगों को मुझपर विश्वास है तो मेरी बात मानो ॥८०-८१॥ यहाँ पर एकान्त में एक तालाब है जिसे धीवर नहीं जानते। तुमलोग रहने के लिए वहाँ चलो। मैं तुमलोगों को एक-एक करके वहाँ पहुँचा दूँगा ॥८२॥ यह सुनकर उन मूर्ख मछलियों ने डरते हुए उससे कहा—'ऐसा ही करो। हम सब तुम्हारे प्रति विश्वास करते हैं' ॥८३॥ तब वह ठग बगुला उन मछलियों को एक-एक करके ले जाकर एक चट्टान पर पटककर खाने लगा। इस प्रकार, धीरे-धीरे वह बहुत-सी मछलियों को खा गया ॥८४॥ मछलियों को इस प्रकार ले जाते हुए बगुले को देखकर उस तालाब में रहनेवाले एक मकर (केकड़े) ने उस बगुले से पूछा कि 'तुम इन मछलियों को कहाँ ले जाते हो ? ॥८५॥ यह सुनकर बगुले ने उसे भी वही उत्तर दिया जो मछलियों को दिया था। तब उस डरे हुए मगरमच्छ (केकड़े) ने भी कहा कि 'मुझे भी ले चलो' ॥८६॥ उसके मांस के लालच से अन्धी बुद्धिवाला बगुला उसे भी लेकर जब मछलियों का वध करनेवाली चट्टान पर पहुँचा तो उन लाई हुई मछलियों के बची और बिखरी हुई हड्डियों के टुकड़ों को देखकर वह मगरमच्छ (केकड़ा) बगुले को विश्वासघाती मयंक समझ गया ॥८७-८८॥ तब उस बुद्धिमान मकर (केकड़े) ने उस बगुले द्वारा चट्टान पर रखते ही बगुले का गला काट लिया ॥८९॥ और, जाकर बची हुई मछलियों को सब समाचार सुनाया। उन सब ने भी प्राणदान देने वाले उसका अभिवादन करके कृतज्ञता स्वीकार की ॥९० ॥ १ पंचतन्त्र में यहाँ केकड़ा लिखा है जो उचित मालूम पड़ता है। अतः, आगे मकर के स्थान पर केकड़ा ही कोष्ठक में लिखा गया है।—अनु ९८
४७८ कथासरित्सागर
४७८ कथासरित्सागर प्रज्ञा नाम बल यस्मात् निष्प्रज्ञस्य बलम् किम् । एतां च सिंहशशयोः कथामत्रापरां शृणु ॥९१॥ सिंहशशकयोः कथा अभूत् क्वापि वने सिंह एकवीरोऽपराजितः । स ध य य ददर्शत्रि सत्त्व त त न्यपातयत् ॥९२॥ ततः सार्डम्यर्थित सर्वै सम्भूयात्र मृगादिभिः । आहाराम तवैकैंक प्रेषयामो दिने दिने ॥९३॥ सर्वांक्षो युगपद्गत्वा स्वार्थहानि करोषि किम् । इति तद्वचन सिंह स सधेत्यन्वमन्यत ॥९४॥ तत प्राणिनमेकैक तस्मिन्नन्वहमश्नति । एकदा शशकस्यागाद्वार एकस्य तत्कृते ॥९५॥ स सर्वै प्रेषितो गच्छञ्छश धीमानचिन्तयत् । स धीरो यो न सम्मोहमापत्कालेऽपि गच्छति ॥९६॥ उपस्थितावपि मृत्यौ समुक्ति तावत्करोम्यहम् । इत्यालोच्य स त सिंह विलम्ब्य शशकोऽभ्यगात् ॥९७॥ आगत तु विलम्बेन केसरी निजगाद सः । अरे वेळा व्यतिक्रान्ता ममाहारे कथ त्वया ॥९८॥ वधादप्यधिकं कि वा कर्त्तव्यं ते मया शठ । इत्युक्तवन्त त सिंह प्रह्व स शशकोऽब्रवीत् ॥९९॥ न मे देवापराधोऽयं स्ववशो नाहमद्य यत् । मार्गे विधार्य सिंहेन द्वितीयेनोज्झितश्चिरात् ॥१ ०॥ तच्छ्रुत्वास्यास्य लाङ्गूलं सिंह क्रोधारुणेक्षणः । सोऽब्रवीत्को द्वितीयोऽसौ सिंहो मे दर्शयतां त्वया ॥१०१॥ आगत्य दृश्यतां देवत्युक्त्वा सोऽपि निनाय तम् । सद्येत्यन्वागत सिहं दूरं कूपान्तिक पथि ॥१०२॥ इहान्त स्थं स्थित पश्येत्युक्तस्तत्र च तेन सः । शशकेन कुभा गर्जत्सिहोऽन्त कूपमैक्षत ॥१०३॥ दृष्ट्वा स्तब्धे च तोये स्व प्रतिबिम्ब निशम्य च । स्वगर्जितप्रतिरव मत्वा तत्रातिगर्जितम् ॥१ ४॥
क्या लाभ ? इस सम्बन्ध में भी सिंह और शश (खरगोश) की एक कथा सुनो ॥९१॥
इसलिए बुद्धि ही वास्तविक बल है। बुद्धिहीन व्यक्ति के पास बल होने पर भी उससे क्या लाभ ? इस सम्बन्ध में भी सिंह और शश (खरगोश) की एक कथा सुनो ॥९१॥
सिंह और शश की कथा
किसी जङ्गल में एकमात्र वीर और अपराजित सिंह रहता था। वह जंगल में जिस-जिस जीव को देखता था उसे मार डालता था ॥९२॥ तब एक बार जंगल के सभी मृग आदि पशुओं ने एकत्र होकर, उससे प्रार्थना की कि हमलोग तुम्हारे भोजन के लिए प्रतिदिन एक-एक जीव को भेजेंगे। एक साथ ही हम सब को मारकर तुम अपने ही स्वार्थ की हानि क्यों करते हो ? उन लोगों के इस प्रस्ताव को सिंह ने 'ठीक है' कहकर मान लिया ॥९३-९४॥ इस निश्चय के पश्चात् एक-एक जीव को प्रतिदिन जब वह खा रहा था तब एक दिन उसके लिए एक शश (खरगोश) की बारी आई ॥९५॥ सब जानवरों से भेजे गये उस शश ने जाते हुए सोचा कि धीर व्यक्ति वही है जो आपत्ति काल में भी नहीं घबराता ॥९६॥ इसलिए, अब मृत्यु के सिर पर मँडराते हुए भी एक युक्ति करता हूँ। ऐसा सोचकर वह शश देर करके सिंह के पास पहुँचा ॥९७॥ विलम्ब से आए हुये उसे देखकर सिंह बोला-'क्यों रे, तूने आज मेरे भोजन का समय क्यों बिता दिया ? अरे दुष्ट क्षुध करने न मिला और मैं तेरा भक्ष कर ही क्या सकता हूँ। इस प्रकार कहते हुए उस सिंह से वह विनम्र शश (खरगोश—बोला) ॥९८-९९॥ 'हे स्वामी मेरा दोष नहीं है। आज मैं अपने वश में नहीं रह गया था। आते हुए मार्ग में मुझे दूसरे सिंह ने देर तक रोकने के बाद छोड़ा ॥१००॥ यह सुनकर पूँछ को उठाकर हिलाता हुआ और कोप से आँखें लाल करके गुर्रारता हुआ वह सिंह बोला—'वह कौन दूसरा सिंह है ? तू उसे मुझे दिखा' ॥१०१॥ 'स्वामी आकर देखिए। यह कहकर पीछे आते हुए सिंह को वह शश उसे एक कुएँ के पास ले गया ॥१०२॥ और बोला—'इस कुएँ के अन्दर बैठे हुए उसे देखो। शश के ऐसा कहने पर सिंह ने कुएँ के भीतर देखा और स्वच्छ जल में अपनी परछाई को देखकर, अपनी गर्जना की प्रति ध्वनि को ही दूसरे सिंह की अपने से भी तेज गर्जना समझ ली ॥१०३-१०४॥
१ पञ्चतन्त्र में इस कथा का प्रारम्भ इस प्रकार होता है— बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्। पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः॥
४८० कथासरित्सागर
४८० कथासरित्सागर
प्रतिसिंहं स कोपेन तद्वधाय मृगाधिपः । आत्मानमक्षिपत्कूपे मूढोऽत्र व्यपादि च ॥१०५॥ शशः स प्रज्ञयोत्तीर्य मृत्योरुत्तार्य चाखिलान् । मृगान् गत्वा तदाख्याय स्ववृत्तं ताननन्दयत् ॥१०६॥ एवं प्रज्ञैव परमं बलं न तु पराक्रमः । यत्प्रभावेन निहतः शशकेनापि केसरी¹ ॥१०७॥ तदहं साधयाम्येव प्रज्ञया स्वमभीप्सितम् । एवं दमनकेनोक्ते तूष्णीं करटकोऽभवत् ॥१०८॥ ततो दमनकश्चापि तस्य पिङ्गलकस्य सः । सिंहस्य स्वप्रभोरासीदन्तिके दुर्मना इव ॥१०९॥ पृष्टश्च कारणं तेन तमुवाच जनान्तिकम् । बुद्ध्वा न युज्यते तूष्णीं स्थातुं चेन्न वदाम्यतः ॥११०॥ अनियुक्तोऽपि च ब्रूयाद्यदीच्छेत् स्वामिनो हितम् । तद्विहायायमागुण्ठिं मद्विज्ञप्तिमिमां शृणु ॥१११॥ भूप सञ्जीवकोऽयं त्वां हत्वा राज्यं चिकीर्षति । मन्त्रिणा हि सतानेन त्वं भीरुरिति निश्चितः ॥११२॥ धुनोति त्वां जिघांसुश्च शृङ्गाग्रमुग्रं निजायुधम् । निर्मर्यादो जयेष्वस्य मयि राज्ञि तृणाशने ॥११३॥ तदेतं हन्मो युष्मासु मृगेन्द्र मांसभोजनम् । आश्वास्योपजपन्त्येवं प्राणिनश्च वने वने ॥११४॥ तदेतं चिन्तय नृप नास्त्यस्मिन्सति शर्म ते । एवं दमनकेनोक्ते स तं पिङ्गलकोऽभ्यधात् ॥११५॥ बलीवर्दो वराकोऽयं किं कुर्यात्तृणभुङ्मम । दत्ताभयं कथं हन्यामहं च शरणागतम् ॥११६॥
[FN1] १ पञ्चतन्त्रहितोपदेशयोरियं कथा— [FN2] बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् । [FN3] पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥ [FN4] —इति शीर्षकयोल्लिखिताऽप्यन्या ।
प्रथम सम्बंध ७८१ वह मूर्ख सिंह उस दूसरे सिंह पर आक्रमण करने की दृष्टि से उस कुएँ में कूद पड़ा और मर गया ॥१९५॥ इस प्रकार, उस शश ने अपनी मृत्यु को पार कर और अन्यान्य पशुओं को भी मृत्यु से बचाकर और उस जंगल के सभी पशुओं को यह शुभ समाचार सुनाकर उन्हें आनन्दित किया ॥१९६॥ 'इस प्रकार, बुद्धि ही वास्तविक बल है। शारीरिक बल उसके आगे कुछ नहीं है। जिस बुद्धि के प्रभाव से शश ने सिंह को भी मार डाला ॥१९७॥ इसलिए, मैं अपने इस कार्य को बुद्धि के बल से सिद्ध करता हूँ। दमनक के इस प्रकार कहने पर करटक चुप हो गया ॥१९८॥ तदनन्तर, दमनक अपने स्वामी सिंह के पास आकर उदास होकर बैठ गया। जब सिंह ने उसकी उदासीनता का कारण उससे पूछा तब उसने एकान्त में उससे कहा- 'स्वामी किसी बात को जानकर चुप नहीं बैठा जा सकता। इसलिए कहता हूँ कि सेवक का धर्म है स्वामी के हित को बिना अधिकार के भी कहे। इसलिए, आप इसे अन्यथा न समझकर मेरे निवेदन को सुनें ॥१९९-१११॥ यह संजीवक बैल तुम्हें मारकर इस वन का राज्य चाहता है। इसके मन्त्री हो जाने पर इसने निश्चय कर लिया है कि 'तुम डरपोक हो' ॥११२॥ वह तुम्हें मारने की इच्छा से अपने शस्त्र-रूपी सींगों को पैना करता रहता है और जंगल के जीवों को घूम-घूमकर धीरज दिलाकर यह समझाता रहता है कि 'घास खानेवाले मेरे जीते रहते तुम निर्भय रहो और मेरे साथ आओ और इस मांसभोजी सिंह को किसी प्रकार मार डालो। दमनक से इस प्रकार कहा गया पिंगलक बोला-'घास खानेवाला बेचारा यह बैल मेरा क्या कर सकता है? किन्तु यही एक बात है कि अभय दिये हुए और शरण में आये हुए इसे कैसे मारूँ? ॥११३-११५॥
४८२ कथासरित्सागर
४८२ कथासरित्सागर
एतच्छ्रुत्वा दमनकः प्राह मा स्मैवमादिथः। यस्तुष्ट्यै क्रियते राज्ञा न तदुच्छ्रीः प्रसर्पति ॥११७॥ द्वयोर्दत्तपदा सा च तयोरुच्छ्रितयोश्चला¹। न शक्नोति स्थिरं स्थातुं ध्रुवमेकं विमुञ्चति ॥११८॥ प्रभुश्च यो हितं दृष्ट्वा सेवेत चाहितं सदा। स वर्जनीयो विद्वद्भिर्भवेद्वैद्यैर्दुष्टातुरो यथा ॥११९॥ अप्रियस्य प्रथमतः परिणामे हितस्य च। वक्ता श्रोता च यत्र स्यात्तत्र श्रीः कुरुते पदम्² ॥१२०॥ न शृणोति सतां मन्त्रमसतां च शृणोति यः। अचिरेण स सम्प्राप्य विपदं परितप्यते ॥१२१॥ तदस्मिन्सुदृशि कः स्नेहस्तव देव किमस्य वा। दुष्टतोऽभयदानं तच्छरणागतता च का ॥१२२॥ किं चैतस्य भवत्पार्श्वे नित्यसन्निहितस्य गोः। एव कीटाः प्रजायन्ते ये तन्मूत्रपुरीषयोः ॥१२३॥ ते दंशिष्यन्ति मत्तेमदन्ताघातव्रणावृते। शरीरे भवतः किं न मृतः स्याद्युक्तितो वधः ॥१२४॥ दुर्मन्त्रकृत् स्वयं पापं विपश्चिन्ना करोति यत्। उत्पद्यते स तत्सङ्गादत्र च श्रूयतां यथा ॥१२५॥
मन्दविसर्पिण्या यूकाया मत्कुणस्य च कथा
राज्ञः कस्यापि शयने चिरमासीदलक्षिता। यूका कुतश्चिदागत्य नाम्ना मन्दविसर्पिणी ॥१२६॥ अकस्माच्चात्र चोपेक्ष्य कृतोऽपि पवनैरितः। विवेश शयनीयं तट्टिट्टिभो नाम मत्कुणः ॥१२७॥ मन्निवासमिमं कस्मादागतस्त्वं प्रजान्यतः। इति मन्दविसर्पिण्या स दृष्ट्वा जगदे तया ॥१२८॥
१ अत्युच्छ्रिते मन्त्रिणि पार्थिवे च विष्टभ्य पादावुपतिष्ठते श्रीः। सा स्त्री स्वभावादसहाभरस्य तयोर्द्वयोरेकतरं जहाति॥ —मुद्राराक्षसे। २ अप्रियस्य च पथ्यस्य श्रोता वक्ता च दुर्लभः। —इति मारिचिरमुत्सस्नेवेः।
दशम लम्बक ४८१
दशम लम्बक ४८१ यह सुनकर दमनक बोला- ऐसा न करना चाहिए। जिसे राजा अपने समान बनाता है, उसे राजा के समान ही राजलक्ष्मी नहीं प्राप्त होती। जब वे दोनों ही राजमद से उच्छृङ्खल हो जाते हैं तब चंचल लक्ष्मी दोनों ओर पैर रखकर अधिक समय तक नहीं ठहरती। और, उनमें से एक को अवश्य ही छोड़ देती है ॥११७-११८॥ जो स्वामी हितैषियों से भी द्वेष करता है और अहितचिन्तकों को ही सदा चाहता है, वह बुद्धि- मानों के लिए उसी प्रकार छोड़ देने के योग्य हो जाता है, जिस प्रकार वैद्य के लिए कुष्ट-रोगी ॥११९॥ प्रारम्भ में कड़वी और अन्त (परिणाम) में मधुर बातों का कहने और सुननेवाला जहाँ होता है, वहाँ लक्ष्मी निवास करती है ॥१२०॥ जो राजा सज्जनों की बात नहीं सुनता और दुर्जनों की बातों पर ध्यान देता है, वह शीघ्र ही विपत्ति में पड़कर पश्चात्ताप और सन्ताप करता है ॥१२१॥ हे स्वामी, उस बैल पर आपका स्नेह व्यर्थ है। इस द्रोही के लिए अभय-दान क्या और इस शरणागत की रक्षा कैसी ! ॥१२२॥ और भी बात है। सदा आपके पास रहनेवाले इस बैल के गोबर और गोमूत्र में कीड़े उत्पन्न होते हैं। वे कीड़े हाथियों के दांतों से हुए आपके घावों में प्रविष्ट होकर आपके शरीर को हानि पहुँचाते हैं। अतः उपाय द्वारा ऐसे व्यक्ति का वध करना ही उचित है ॥१२३-१२४॥ विद्वान् व्यक्ति यदि स्वयं कोई अपराध नहीं करता तो भी दुष्ट के संसर्ग से उसमें भी दोष उत्पन्न हो ही जाते हैं। इस प्रसंग में एक कथा सुनो¹ ॥१२५॥ मन्दविसर्पिणी जूँ और खटमल की कथा किसी राजा के पलंग में मन्दविसर्पिणी नाम की एक यूका (जूं) कहीं से जाकर छिपी रहती थी। एक बार सहसा वायु के वेग से उड़ाया गया टिट्टिभ नाम का एक खटमल उस पलंग में आकर घुस गया ॥१२६-१२७ ॥ उसे देखकर मन्दविसर्पिणी ने कहा-'तू मेरे रहने के स्थान में क्यों घुस आया ? कहीं दूसरे स्थान पर जा ॥१२८॥ १. इसी भाव का मुद्राराक्षस नाटक में आया हुआ श्लोक संस्कृत-टिप्पणी में द्रष्टव्य है।
७८४ कथासरित्सागर
७८४ कथासरित्सागर अपीतपूर्व पास्यामि राजासृक्¹ तत्प्रसीद मे। एहीह वस्तुमिति तामवादीत्सोऽपि टीटिभः ॥१२९॥ ततोऽनुरोधादाह स्म सा त यद्येवमास्स्व तत्। किं त्वस्य राज्ञो नाकाले दंशो देयस्त्वया सखि ॥१३०॥ दयोऽस्य दंशः सुप्तस्य त्रासक्तस्य वा लघु। तच्छ्रुत्वा टीटिभः सोऽत्र तथेत्युक्त्वा व्यतिष्ठत ॥ १३१॥ नक्तं शय्याश्रितं तं च नृपमाशु ददंश सः। उत्तस्थौ च ततो राजा 'हा दष्टो स्मीति' स ब्रुवन् ॥१३२॥ ततः पलायिते तस्मिंस्त्वरितं मत्कुणे शठे। विचित्य राजभृत्यैः सा लब्ध्वा यूका व्यपाद्यत ॥१३३॥ एवं टीटिभसम्पर्कद्विष्टा मन्दविसर्पिणी। तत्सञ्जीवकसङ्गस्ते न शिवाय भविष्यति ॥१३४॥ न मे प्रत्येषि चेत्तत्त्वं स्वयं द्रक्ष्यस्युपागतम्। शिरो धुनन् दर्पेण शृङ्गयोः क्षुण्णशातयोः ॥१३५॥ इत्युक्त्वा विकृतिं तन नीतो दमनकेन सः। सिंहः पिङ्गलकश्चक्रे वध्यं सञ्जीवकं हृदि ॥१३६॥ लब्ध्वा तस्याशयं स्वैरं क्षणाद्दमनकस्ततः। तस्य सञ्जीवकस्यागात् स विषण्ण इवान्तिकम् ॥१३७॥ किमीदृगसि किं मित्र शरीरं कुशलं सखे। इति पृष्टश्च तेनात्र कृपणं स जगाद तम् ॥१३८॥ किं सेवकस्य कुशलं कश्च राज्ञां सदा प्रियः। कोऽर्थी न लाघवं यात कः कालस्य न गोचरः ॥१३९॥ इत्युक्तवन्तं पप्रच्छ तं म सञ्जीवकः पुनः। विमुद्विग्न इव त्वं कथ्यतामोग्यतामिति ॥१४०॥ ततो दमनकोऽवादीच्छृणु प्रीत्या वदामि ते। मृगराजो विरुद्धोऽसौ जात पिङ्गलकोऽद्य ते ॥१४१॥ निरपगोऽस्थिरस्नेहो हत्वा त्वां भोक्तुमिच्छति। हृद्यं परिच्छिदं चास्य पश्यामि प्रतनं सदा ॥१४२॥ १ रक्तम्।
दशम लम्बक ७८५
दशम लम्बक ७८५ मैं पहले कभी नहीं पिया हुआ राजा का रक्त-पान करूँगा इसलिए कृपा कर, और मुझे यहाँ रहने दे। इस प्रकार, उस खटमल ने जूँ से कहा ॥१२९॥ तब खटमल के अनुरोध से वह जूँ कहने लगी—'यदि ऐसा है तो रहो। लेकिन मित्र राजा को अनवसर (बे-मौके) न काटना। जब वह सोया हो या आनन्द-विलास में तन्मय हो तो धीरे से काटना। यह सुनकर वह टिट्टिभ खटमल ऐसा ही करूँगा कहकर वहीं रहने लगा ॥१३०-१३१॥ एक बार टिट्टिभ ने रात में सोये हुए राजा को शीघ्रता में जोर से काट लिया। तब राजा 'हाय ! काट लिया ! इस प्रकार कहकर उठ गया। इतने में उस दुष्ट खटमल के भागने पर और राजा के सेवकों के ढूँढ़ने पर उसे तो नहीं पाया किन्तु उस जूँ को पा लिया और उसे मसल डाला ॥१३२-१३३॥ इस प्रकार, टिट्टिभ नामक खटमल के सम्पर्क से बेचारी मन्दविसर्पिणी नामक जूँ मारी गई। अतः इस संजीवक का साथ तुम्हारे लिए कल्याणकारी नहीं होगा ॥१३४॥ यदि आप मेरा विश्वास नहीं करते हैं तो उसे स्वयं आये हुए देखेंगे कि वह क्रुद्ध के समान तीखे सींगों को घुमाता हुआ तुम्हारे सामने आयेगा ॥१३५॥ इस प्रकार, दमनक द्वारा डराये गये सिंह ने मन ही-मन संजीवक को मारने की सोच ली ॥१३६॥ सिंह के मन के भाव को समझकर दमनक वहाँ से चुपचाप खिन्न-सा होकर संजीवक के पास गया ॥१३७॥ 'कहो मित्र कैसे हो ? तुम्हारा शरीर तो ठीक है? बैल संजीवक के इस प्रकार पूछने पर दमनक उससे बोला-॥१३८॥ 'सेवक का क्या कुशल ? राजा का सदा प्यारा कौन रहा ? कौन याचक (माँगनेवाला) लघुता को प्राप्त नहीं होता और कौन मौत का शिकार नहीं होता ? ॥१३९॥ इस प्रकार कहते हुए दमनक से संजीवक ने फिर पूछा-आज तुम इस प्रकार की विरक्ति की बातें क्यों कर रहे हो ? ॥१४०॥ तब दमनक ने कहा-'सुनो। प्रेम के कारण तुमसे कहता हूँ। आज वह मृगराज (सिंह) निपट तुम्हारे विरुद्ध हो गया है। वह निरपेक्ष चंचल प्रेमवाला तुम्हें मारकर खाना चाहता है और मैं उसके हिंसक वृत्तिवाले सेवक साथियों को सदा तुम्हारे विरुद्ध प्रेरणा देते हुए देखता हूँ ॥१४१-१४२॥ ९९