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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

द्वादश लम्बक १२५

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द्वादश लम्बक १२५ उस भोजन में पड़े हुए धतूरे के कारण उन पहरेदारों के बेहोश हो जाने पर, घट ने रात्रि के समय लकड़ियाँ इकट्ठी करके आग लगा दी और कर्पट का अग्नि-संस्कार पूरा कर दिया ॥७७॥ प्रातःकाल इस घटना को जानकर राजा ने उन पहरेदारों को हटाकर दूसरे पहरेदार नियुक्त किये। और उनसे कहा—'अब भी उसकी अस्थियों की रक्षा करनी है। जो भी उन्हें लेने आए उसे पकड़ लेना और किसी का दिया हुआ कुछ नहीं खाना ॥७८-७९॥ राजा की इस आज्ञा से वे नये प्रहरी दिन रात सावधानी से उसकी रक्षा करते थे। यह समाचार घट को मालूम हुआ ॥८०॥ तब उसने चण्डिका से प्राप्त मोहन-मन्त्र को जाननेवाले किसी साधु को अपना विश्वासी मित्र बनाया ॥८१॥ घट, उसी संन्यासी मित्र के साथ वहाँ गया और पहरेदारों को उस साधु से मोहित कराकर कर्पट की अस्थियाँ बीनकर वहाँ से ले आया ॥८२॥ तदनन्तर घट, उन अस्थियों को गंगा में प्रवाहित कर, राजकुमारी को अपना सारा वृत्तान्त सुनाकर और उस साधु के साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥८३॥ राजा ने भी पहरेदारों के मोहित होने और कन्या के अपहरण आदि के कार्य को किसी योगी के योग की माया समझा ॥८४॥ जिस योगी ने मेरी कन्या का हरण किया है, वह यदि प्रकट हो जाय तो मैं अपना आधा राज्य उसे दे दूँगा। राजा ने अपने नगर में ऐसी घोषणा करा दी। यह सुनकर जब घट अपने को प्रकट करने के लिए तैयार हुआ तब राजपुत्री ने यह कहकर उसे रोक दिया कि 'कपट से बात करनेवाले राजा पर विश्वास मत करो' ॥८५-८७॥ तब भेद खुलने के भय से घट उस साधु और राजपुत्री को लेकर दूसरे देश को चला गया ॥८८॥ मार्ग में उस राजपुत्री ने उस साधु से एकान्त में कहा—'एक कर्पट ने तो मेरा चरित्र नष्ट किया और दूसरे ने मुझे राजकुमारी-पद से गिरा दिया। वह कर्पट चोर तो मर गया किन्तु यह घट मरा नहीं। तुम मुझे अत्यन्त प्यारे लगते हो। ऐसा कहकर उससे सम्मति करके राजकन्या ने विष देकर घट को मार डाला ॥८९-९०॥ तब उस साधु के साथ जाती हुई वह पापिन राजकुमारी मार्ग में धनदेव नामक एक बनिए से मिल गई और बोली—'यह कंगाल पारण करनेवाला कहाँ ? तुम मेरे प्यारे हो। इस प्रकार सोए हुए साधु को छोड़कर वह बनिए के साथ चुपके-से भाग गई ॥९१-९२॥

१२२ कथासरित्सागर

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१२२ कथासरित्सागर तेन रक्षिषु धत्तूरमोहितेष्वेषु सोऽग्निसात् । निधिं चक्रे घटो गेहे कर्परस्याहृतेन्धनः ॥७७॥ गते तस्मिंस्ततः प्रातर्बुद्ध्वा राजा निवार्य तान् । विमूढांस्थापयामास रक्षिणोऽन्यानुवाच च ॥७८॥ रक्ष्यास्थ्यस्थी यपीदानीं यस्तान्यादातुमभ्येति । स युष्माभिर्ग्रहीतव्यो भक्ष्यं किञ्चिन्न चान्यतः ॥७९॥ इति राज्ञोदितास्ते च सावधाना दिवानिशम् । तत्रासन् रक्षिणस्तं च वृत्तान्तं बुबुधे घटः ॥८०॥ ततः स चण्डिकादत्तमन्त्रप्रभाववित् । मित्रं प्रव्राजकं किञ्चिच्चकाराश्वासकेतनम् ॥८१॥ तत्र गत्वा समं तेन प्रव्राजा मन्त्रजापिना । रक्षिणो मोहयित्वा तान् कर्परास्थीनि सोऽग्रहीत् ॥८२॥ क्षिप्त्वा च तानि गङ्गायामेत्याख्याय यथाकृतम् । राजपुत्र्या समं तस्थौ सुप्तं प्रव्राजकान्वितः ॥८३॥ राजाऽपि सोऽस्थिहरणं बुद्ध्वा तद्रक्षिमोधनम् । आ सुताहरणात् सर्वं मेने तद्योगिचेष्टितम् ॥८४॥ येनैव योगिनाकारि तनयाहरणादि मे । ददामि तस्मै राज्यार्धमभिव्यक्तिं स याति चेत् ॥८५॥ इति राजा स्वनगरे दापयामास घोषणाम् । तां श्रुत्वा चैच्छदात्मानं घटो दर्शयितुं तया ॥८६॥ मैवं कृथा न कार्योऽस्मिन् विश्वासश्छद्मघातिनि । राज्ञीत्यवार्यत तया राजपुत्र्या ततश्च सः ॥८७॥ अथोद्वेगभयात्तेन साकं प्रव्राजकेन च । घटो देशान्तरं यायाद्राजपुत्र्या तया युतः ॥८८॥ मार्गे च राजपुत्री सा प्रव्राजं तं रहोऽब्रवीत् । एकेन श्वसितान्येन अश्वास्यमुमा पदात् ॥८९॥ तच्चोरः स मृतो नाम घटो मे त्वं बहुप्रियः । इत्युक्त्वा तेन सङ्गम्य सा विषेणावधीद् घटम् ॥९०॥ ततस्तेन समं यान्ती पापा प्रव्राजकेन सा । धनदत्ताभिधानेन सञ्जग्मे वणिजा पथि ॥९१॥ कोऽप्य क्याक्षी त्वं प्रेयान् ममेत्युक्त्वा ययौ समम् । वणिजा तेन ससुप्तं सा प्रव्राजं विहाय तम् ॥९२॥

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प्रव्राजकश्च स प्रातं प्रबुद्धः समचिन्तयत्। न स्नेहोऽस्ति न दाक्षिण्यं स्त्रीष्वहो चापलावृत ॥९३॥ यद्विश्वास्यापि मां पापा हृतार्था च पलायिता। सेष लाभोऽद्य यन्न हतोऽस्मि घटवत्तया ॥९४॥ इत्यालोच्य निजं देशं ययौ प्रव्राजकोऽप्य सः। वणिजा सह तद्देशं प्राप्ता राजसुतापि सा ॥९५॥ प्रवेशयामि सहसा बन्धकीं किमिमां गृहम्। इति स्ववशप्राप्ताञ्च धनदेवो विचिन्तयन् ॥९६॥ वणिकस्तत्र किलिकस्या वृद्धाया वेश्म योषितः। प्रविवेश तया साकं राजपुत्र्या दिनात्यये ॥९७॥ तत्र नक्तं स वृद्धां तां पप्रच्छापरिजावतीम्। धनदव वणिग्गेहवार्तामम्वह वेत्सि किम् ॥९८॥ तच्छ्रुत्वा साऽब्रवीद् वृद्धा का वार्ता यत्र तत्र सा। पुंसा नवन्वेनैव तद्भार्या रमते सदा ॥९९॥ चर्मपटा गवाक्षेण रज्ज्वा तम हि सम्व्यसे। नक्तं घिशति यस्तस्यां स एवान्तः प्रवेश्यत ॥१००॥ निष्काश्यते सर्वैवात्र पश्चिमार्या पुनर्निशि। पानमत्ता च सा नैव निभारुयति किञ्चन ॥१०१॥ एषा च वृत्तस्थितिः ख्यातिं नगरेऽत्राखिले गता। बहुकालो गतोऽद्यापि न चायाति स तत्पतिः ॥१०२॥ एतद्वृद्धावचः श्रुत्वा धनदेवस्तदैव सः। युक्त्या निर्गत्य तत्रागात् सान्तःपुंश्चः ससंशयः ॥१०३॥ दृष्ट्वा स तत्र वासीभिः पेटो रज्जुववर्मिताम्। विवेश स ततस्ताभिरुत्क्षिप्यान्तरनीयत ॥१०४॥ प्रविष्टः स तयाऽनिलक्ष्य शय्यां निन्ये मदान्धया। अविज्ञातः स्वगहिन्या हठात् क्षीबत्वमूढया ॥१०५॥ रिरंसा तस्य यावच्च नास्ति तद्घापदर्शनात्। तावत्तां मददोषेण निद्रां तद्गृहिणी ययौ ॥१०६॥ निशान्ते च स दासीभिः सत्वरं रज्जुघटया। गवाक्षेण बहिः क्षिप्तः खिन्नो वणिगचिन्तयत् ॥१०७॥

दशम लम्बक १२५

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दशम लम्बक १२५ प्रातःकाल जप हुए साधु न देखा कि स्त्रिया म चंचलता (व्यभिचार) क सिवा न स्नेह है, न सज्जनता है। इसलिए, वह दुष्टा मुझे विश्वाम दिलाकर भी माछ छककर भाग गई। इतना ही लाभ हुआ कि उसन मुझ भी पट क समान मार नहीं डाला ॥१९३-१९४॥ ऐसा साचकर साधु अपन स्थान पर फर्मा गया राजपुत्री भी बनिय के साथ उसक देग जा पहुँची ॥१९५॥ अपन देश पहुँचकर धनदेव सोचन लगा कि मैं इस दुराचारिणी दुष्टा को एकाएक अपने पर में कैसे ल जाऊँ? ॥१९६॥ तब वह बनिया अपने नगर म सायंकाल के समय उस राजकुमारी के साथ एक वृद्धा स्त्री के घर में चला गया और वहीं ठहर गया ॥१९७॥ वहाँ पर उस राजकुमारी न उम जानकार वृद्धा स पूछा कि 'क्या तुम धनदेव के घर का हाल जानती हो ? ॥१९८॥ यह सुनकर बुद्धा बोली--'उमक घर की क्या बात है। उसकी पत्नी जहाँ-तहाँ सरा सब पुरुष क साथ रमण करती है ॥१९९॥ उसकी खिड़की म रस्सी स बँधी चमड़े की पिटारी लटकती रहती है। रात में जो भी उस पिटारी में घुसता है, उसे ही वह ऊपर बुला लती है ॥२ ००॥ रात के अन्त म उस उसी प्रकार बाहर निकाल देती है। मद्यपान स उन्मत्त वह कहीं कुछ देखती नहीं ॥२ ०१॥ उसकी यह स्थिति इस सारे नगर म प्रसिद्ध हो गई है। बहुत समय हो गया उसका पति अब भी नहीं आया ॥२ ०२॥ उस वृद्धा की बात सुनकर मन-ही-मन बुखी और सन्देह म पड़ा हुआ धनदेव किसी बहाने अपन घर गया। वहाँ पर उसने दासिमों द्वारा रस्सी में बाँधी हुई पिटारी देखी। वह उसमें बैठ गया और दासिया ने उसे ऊपर खींचकर भीतर कर लिया ॥१ ३ १ ४॥ उसके भीतर जाते ही नशे में चूर और काम में अन्धी स्त्री ने उसका आलिंगन करके उस खाट पर पटक दिया। नशे में मत्त रहने के कारण उसकी स्त्री ने उसे पहचाना भी नहीं ॥१ ५॥ अपनी पत्नी की यह दुरवस्था देख उस धनदेव की रमणेच्छा नहीं रह गई और तब तक नषे की तीव्रता के कारण उसकी पत्नी भी सो गई ॥१ ६॥ रात का अन्त होने पर उसकी दासियों ने उसे उसी प्रकार पिटारी में भरकर बाहर फेंक दिया। बाहर निकाला हुआ धनदेव बनिया सोचने लगा--॥१ ७॥

१२६ कथासरित्सागर

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१२६ कथासरित्सागर अलं मे गृहमोहेन गृहे नार्यो निबन्धनम्। तासामेवेदृशी वार्त्ता तस्माच्छ्रेयो वनं परम् ॥१०८॥ इति निश्चित्य सन्त्यज्य स तां राजसुतामपि। धनदत्तः प्रवृत्तः गन्तुं दूरं वनान्तरम् ॥१०९॥ गच्छतस्तस्य मार्गे च मिलितो मित्रतामगात्। ब्राह्मणो रुद्रसोमाख्यः प्रवासादागतश्चिरात् ॥११०॥ स तेनोक्तः स्ववृत्तान्तं स्वमार्गस्थितो द्विजः। तेनैव वणिजा साकं सायं स्वग्राममासदत् ॥१११॥ तत्र स्वभवनोपान्ते गोपं दृष्ट्वा नदीतटे। गायन्तमिव गायन्तं नम्रया पृच्छति स्म सः ॥११२॥ गोप तं तरुणी काचित् कस्मिंस्त्वय्यनुरागिणी। येनैवं गायसि मदान्मन्यमानस्तृणं जगत् ॥११३॥ तच्छ्रुत्वा सोऽहसद् गोपो गोप्यं वस्तु कियन्मया। चिरविप्रोषितस्याहं रुद्रसोमद्विजन्मनः ॥११४॥ ग्रामाधिपस्य तरुणीमहं भार्यां सदा भजे। प्रवेशयति सद्दासी समीपं तद्गृहेऽत्र माम् ॥११५॥ एतद्गोपालतः श्रुत्वा मन्युमन्तर्निगृह्य च। तत्त्वं जिज्ञासमानस्तं रुद्रसोमो जगाद सः ॥११६॥ यद्येवमतिथिस्तेऽहं स्ववेषं देह्यमुं मम। यावत् त्वमिव तत्राद्य याम्यहं कौतुकं हि मे ॥११७॥ एवं कुरु गृहाण त्वं मदीयं कास्रकम्बलम्। लगुडं पास्व धवह तद्दासी यावदेष्यति ॥११८॥ मद्बुद्ध्या च तयात्र त्वं वन्दारूनाम्यट। नक्तं तत्र व्रजाहं च विधास्यामि निशामिमाम् ॥११९॥ एवमुक्तवतस्तस्माद् गोपात्तल्लगुडकम्बलौ। गृहीत्वा रुद्रसोमोऽत्र तद्रूपेण स तस्थिवान् ॥१२०॥ गोपश्च वणिजा साकं धनदत्तेन तेन सः। दूरे तत्र मनाक् तस्थौ शशौ सा जाययो ततः ॥१२१॥ सा तं तमसि तूष्णीमाहूय स्त्रीवदवगुण्ठितम्। एहीत्युक्त्वा तदा रुद्रसोमं गोपाधियानयत् ॥१२२॥

दशम लम्बक १२७

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दशम लम्बक १२७ 'घर का मोह व्यर्थ है। क्योंकि घर में स्त्री ही एक बन्धन है। उन स्त्रियों की भी जब यह दशा है, तब घर से अच्छा एकान्त जंगल ही है' ॥१८॥ ऐसा निश्चय करके और उस राजकन्या को भी उसी वृद्धा के घर पर ही छोड़कर धनदेव बनिया कहीं दूर वन के लिए चल पड़ा ॥१९॥ मार्ग में जाते हुए उसे रुद्रसोम नाम का एक ब्राह्मण मिला जो उसका मित्र बन गया। वह भी बहुत दिनों बाद लम्बे प्रवास से घर आ रहा था ॥११०॥ बनिये से उसकी स्त्री के वृत्तान्त को सुनकर वह ब्राह्मण भी अपनी स्त्री पर शंका करता हुआ उसी बनिये के साथ सायंकाल अपने गाँव पहुँचा ॥१११॥ अपने घर के पास नदी में एक ग्वाले को आते हुए देखकर उसने हँसी-हँसी में उससे पूछा—॥११२॥ 'ग्वाले क्या कोई युवती स्त्री तुमसे प्रेम करती है जिस कारण संसार को तृण के समान समझकर इस प्रकार की मस्ती में तुम गा रहे हो ? ॥११३॥ यह सुनकर वह ग्वाला हँसा और बोला— मैं कहाँतक छिपाऊँ। लम्बे समय से विदेश गये हुए गाँव के चौधरी रुद्रसोम नामक ब्राह्मण की युवती भार्या है, मैं उसी का सेवन करता हूँ उसकी दासी स्त्री का वेष पहनाकर मुझे उसके घर ले जाती है। ग्वाल से यह सुनकर और क्रोध को भीतर-ही-भीतर पीकर सच्चाई को जानने की इच्छा से रुद्रसोम ने ग्वाले से कहा— ॥११४-११६॥ 'यदि ऐसी बात है, तो आज मैं तेरा मेहमान हूँ। अतः अपना वेष मुझे दे दो तो तुम्हारी तरह आज मैं वहाँ जाऊँ। मुझे बहुत कौतुक हो रहा है' ॥११७॥ 'ऐसा करो यह मेरा काला कम्बल ले लो। लाठी भी ले लो और तबतक यहाँ बैठो जबतक दासी यहाँ आती है। ग्वाले ने उससे इस प्रकार कहा ॥११८॥ और कहा कि—'मेरे भ्रम में दासी तुम्हें स्त्री के कपड़े पहनने को देगी। स्त्री वेष धारण कर रात में तू वहाँ जाना और मैं आज की रात विश्राम करूंगा ॥११९॥ इस प्रकार कहते हुए ग्वाले से लाठी और कम्बल लेकर वह रुद्रसोम उसी वेष में बैठा रहा ॥१२०॥ वह ग्वाला धनदेव बनिया के साथ कुछ दूर पर जा बैठा और इतने में ही वहाँ दासी आ पहुँची ॥१२१॥ उसने चुपचाप आकर अँधेरे में धुर बैठे रुद्रसोम को याराना (ग्वाला) समझकर उस स्त्री का वेष धारण कराकर कहा—जाओ ॥१२२॥

१९८ कथासरित्सागर

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१९८ कथासरित्सागर स च नीतं स्वभार्यां तां दृष्ट्वा गोपालचुम्बितः। उत्थायैव कृताश्लेषां रुद्रसोमो व्यचिन्तयत् ॥१२३॥ सन्निकृष्टे निकृष्टेऽपि कष्टं रज्यन्ति कुस्त्रियः। पापानुactionरक्ता यदियं गोपेऽप्यासनवर्त्तिनि ॥१२४॥ इति ध्यायन् मिषं कृत्वा तत्रवास्फुटया गिरा। निर्गत्यैव विरक्तात्मा धनदेवान्तिकं ययौ ॥१२५॥ उक्तस्वगृहवृत्तान्तो वणिजं समुवाच सः। त्वया सहाहमप्यमि वनं यातु गृहं क्षयम् ॥१२६॥ इत्य्रूचिवान् रुद्रसोमो धनदेववणिक् च सः। वनं प्रति प्रतस्थाते सर्वैष सह तौ यतः ॥१२७॥ मिलितश्च तयो मार्गे धनदेवसुहृच्छशी। कथाप्रसङ्गात् तौ तस्मै स्ववृत्तान्तं शशंसतुः ॥१२८॥ स तच्छ्रुत्वा शशीप्यर्त्तुश्चिराद्धान्तरागतः। साशङ्कोऽभूत्स्वगेहिन्यां न्यस्तायामपि भूगृहे ॥१२९॥ प्रक्रमंश्च समं ताभ्यां सायं स स्वगृहान्तिकम्। शशी प्राप गृहातिथ्यं तयोः कर्तुमियेष च ॥१३०॥ तावच्च दुर्गन्धवहं कुष्ठीर्णकराङ्घ्रिकम्। तत्रापश्यत् सशृङ्गारं गायन्तं पुरुषं स्थितम् ॥१३१॥ विस्मयाच्च तमप्राक्षीदीदृशः को भवानिति। कामदेवोऽहमस्मीति कुष्ठी सोऽपि जगाद तम् ॥१३२॥ का भ्रान्तिः कामदेवस्त्वं रूपशोभैव वक्ति ते। इत्युक्तः शशिना भूयः सोऽवादीच्छृणु वच्मि ते ॥१३३॥ इह धूर्त्तः शशी नाम वसत्कपरिवारिकाम्। भार्यां निक्षिप्य भूगेहे सोऽप्यों देशान्तरं गतः ॥१३४॥ तद्भार्यया विविक्ताविह दृष्टस्य मे तया। अर्पितः सद्य एवात्मा मदनाकृष्टचित्तया ॥१३५॥ तया समं च सततं रात्रौ रात्रावहं रमे। पृष्ठे गृहीत्वा तद्दासी प्रवेशयति तत्र माम् ॥१३६॥ तद् ब्रूहि किन्न कामोऽहं प्राप्य कल्यान्ययोषिताम्। यच्चित्राकारधारिण्या भार्यया शशिनः प्रियः ॥१३७॥

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९२ कथासरित्सागर

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९२ कथासरित्सागर एतत्कुष्ठिवचः श्रुत्वा शशी निर्भातिदारुणम्। दुःखं निगृह्य जिज्ञासुर्निश्चयं समुवाच सः॥१३८॥ सत्यं भवसि कामस्त्वं तदद्य त्वाहमार्चये। स्वतः श्रुतायामुत्पन्नं तस्यां कौतूहलं मम॥१३९॥ तदद्यैव निशां तत्र त्वद्वेषेण विशाम्यहम्। प्रसीदान्वहरन्म्येऽर्थे सद्यात्र कियती क्षतिः॥१४०॥ इत्युक्तः शशिना तेन स कुष्ठी तमभाषत। एवमस्तु गृहाणेमं मद्वेषं देहि मे निजम्॥१४१॥ तिष्ठाहमिह संवेष्ट्य पाणिपादं च वाससा। यावदायाति सा तस्या दासी तमसि जृम्भिते॥१४२॥ मबुद्ध्या च तया पृष्ठे गृहीतोऽङ्गमिव व्रज। अहं हि पादवैकल्याद् गच्छाम्यत्र तथा सदा॥१४३॥ इत्युक्तः कुष्ठिना सोऽथ शशी तद्वेषमाश्रितः। तत्रासीत् तत्सहायौ तौ कुष्ठी चासन् विदूरतः॥१४४॥ अथागत्य तया कुष्ठिवेषो दृष्टः स तद्विदा। एहीत्युक्त्वा शशीमार्यादास्र्या पृष्ठेऽप्यरोप्यत॥१४५॥ निन्ये च नक्तं स तया स्वभार्यायास्ततोऽन्तिकम्। कुष्ठिजारप्रतीक्षिण्यास्तस्यास्तद्भूगृहान्तरम् ॥१४६॥ तम्रान्धकारे शोचन्तीमङ्गस्पर्शन सा ध्रुवम्। स्वभार्यामेव निश्चित्य स वैराग्यमगाच्छशी॥१४७॥ क्षतस्तस्यां प्रसुप्तायां निर्गत्यादृष्ट एव सः। जगाम धनदेवस्य खसोमस्य चान्तिकम्॥१४८॥ आख्याय च स्ववृत्तान्तं तयोः खिन्नो जगाद सः। हा धिङ्निम्नाभिपातिभ्यो लाला दूराम्मनोरमाः॥१४९॥ सुक्षोभ्या न स्त्रियः कस्याः पातुः स्वभ्रापगा इव। यद्येषा भूगृहस्थापि भार्या मे कुष्ठिनं गता॥१५०॥ तन्ममाऽपि वनं श्रेयो धिग्गृहानिति स ब्रुवन्। समदुःखसखिब्रप्रमुखस्तामनयन्निशाम् ॥१५१॥ प्रातस्त्रयोऽपि सहिताः प्रस्थितास्ते वनं प्रति। सवापीकतलं प्रापुर्दिनान्ते पथि पादपम्॥१५२॥

[Header] दशम लम्बक १५१

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[Header] दशम लम्बक १५१

वज्र के समान कठोर कोढ़ी के बचन सुनकर अपनी व्याकुलता को छिपाकर वास्तविक तत्त्व जानने की इच्छा से वह कोढ़ी से बोला-॥१३८॥

'तू सचमुच कामदेव है। इसलिए, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि तुमसे सुनकर मुझे उस स्त्री के प्रति अत्यन्त कौतूहल उत्पन्न हो गया है जो आज की रात में तुम्हारे वेष में उसके घर जाऊँ। इसलिए कृपा करो। प्रतिदिन मिलने वाली वस्तु यदि एक बार न भी मिले तो तुम्हारी क्या हानि है ? शशी के इस प्रकार कहने पर कोढ़ी ने उससे कहा—'ऐसा ही करो। मेरा वेष ले लो और अपना वेष मुझे दे दो ॥१३९—१४१॥

और, हाथ-पैरों को कपड़े से ढँककर यहाँ तबतक बैठो जबतक अँधेरा बढ़ने पर दासी आती है ॥१४२॥

मेरे भ्रम से उसके पीठ पर उठ लेने पर (अर्थात् सहारा देने पर) तू मेरे ही समान चलना। मैं पैर से रोगी होने से सदा जैसे जाता हूँ उसी तरह तुम भी जाना ॥१४३॥

कोढ़ी से इस प्रकार कहा गया शशी उसी के समान रूप में हो गया। वहाँ पर उसके दोनों साथी और कोढ़ी कुछ दूर पर जा बैठे ॥१४४॥

तदनन्तर, दासी ने आकर कोढ़ी के वेष में शशी को देखा और उसी कोढ़ी के भ्रम से बाबा —ऐसा कहकर उसने उसे अपनी पीठ का सहारा दिया ॥१४५॥

तब वह शशी रात अँधेरे में उस उसी की पत्नी के पास ले गई जो अपने कोढ़ी जार की प्रतीक्षा अँधेरे तहखाने में कर रही थी ॥१४६॥

वहाँ अन्धकार में सोवती हुई उसके शरीर के स्पर्श से उसे पहचान कर और वही उसकी स्त्री है -इस प्रकार निश्चय करके शशी विरक्त हो गया ॥१४७॥

तब उसके सो जाने पर, शशी चुपचाप बाहर निकलकर वज्रदेव और रुद्रसोम के पास आ गया और उन दोनों को अपना वृत्तान्त सुनाकर खेद के साथ बोला—'नीचा की ओर जाने- वाली चंचल स्त्रियों को धिक्कार है जो दूर से ही मनोरम प्रतीत होती हैं ॥१४८ १४९॥

गड्ढे में गिरनेवाली नदियों के समान स्त्रियां की रक्षा करना सम्भव नहीं है। देखो तहखाने में रखी हुई भी मेरी पत्नी कोढ़ी के साथ रमण करने लगी ॥१५०॥

अतः मेरे लिए भी वन ही ठीक है, घर को धिक्कार है। ऐसा कहते हुए शशी ने समान दुःख से दुःखी बनिया और ब्राह्मण के साथ वह रात बिताई ॥१५१॥

प्रातः ही वे तीनों मिलकर वन की ओर चले। सायंकाल उन्हें मार्ग में एक बावली के साथ छायादार पेड़ मिला ॥१५२॥

१३२ कथासरित्सागर

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१३२ कथासरित्सागर भुक्तपीताश्च ते रात्रौ तदारुह्य तरी स्थिताः। अपश्यन् पान्थमागत्य सुप्तमेकं तरोरधः ॥१५३॥ क्षणाच्च ददृशुर्वापीमध्यादपरमुद्गतम्। पुरुषं वदनोद्गीर्णसस्त्रीकशयनीयकम् ॥१५४॥ उपभुज्य स्त्रियं तां स सुष्वाप शयनीयके। स्त्री च दृष्ट्वैव सञ्जग्मे पान्थेनोत्थाय तत्र सा ॥१५५॥ कौ युवामिति पृष्टा च रतान्ते तेन साब्रवीत्। नाग एषोऽहमेतस्य भार्यैषा नागकन्यका ॥१५६॥ मामुद्वम्य च ते यस्मात् पान्थानां नवतिर्मया। नयाधिकोपभुक्तैव पूरितं तु शतं त्वया ॥ १५७॥ एवं वदन्ती सा तं च पान्थं दैवात् प्रबुध्य सः। नागो दृष्ट्वा मुखाज्ज्वालां मुक्त्वा भस्मीचकार तौ ॥१५८॥ न शक्या रक्षितुं यत्र देहान्तर्निहिता अपि। स्त्रियस्तन्न गृहे तासां का वार्त्ता धिग्धिगेव ताः ॥१५९॥ इति नागे गते वापीं प्लवन्तस्ते त्रयो निशाम्। शशिप्रभृतयो नीत्वा निभृताः प्रययुर्वनम् ॥१६०॥ तस्मिन् मैत्र्याद्यविकलचतुर्भावनाम्यासशान्ते क्षिप्रं सम्यङ्नियतमतयः सर्वभूतेषु सौम्याः। प्राप्ताः सिद्धिं निरुपमपरानन्दभूमौ समाधौ जग्मुर्मोक्षं क्षपिततमसस्ते त्रयोऽपि क्रमेण ॥१६१॥ ता योषितस्तु तेषां निजपापविपाकजनितकष्टदशाः। अचिरादेव विनष्टा दुष्टा लोकद्वयभ्रष्टाः ॥१६२॥ एवं मोहप्रभवो रागो न स्त्रीषु कस्य दुःखाय। तास्वेव विवरुभूता भवति विरागस्तु मोक्षाय ॥१६३॥ इति गोमुखतः कथाविनोदं सविधाच्छक्तियशःसमागमोत्कः। पुनरेष स वत्सराजसूनुश्चिरमाकर्ण्य शनैर्जगाम निद्राम् ॥१६४॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे शक्तियशोलम्बके अष्टमस्तरङ्गः।

दशम लम्बक १३३

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दशम लम्बक १३३ वहाँ वे खा-पीकर रात में वृक्ष पर चढ़ गये। इतने में ही उन्होंने आकर सोये हुए एक पथिक को वृक्ष के नीचे देखा ॥१५३॥ क्षण-भर में ही उन्होंने बामली के बीच से ऊपर की ओर निकले हुए एक पुरुष को देखा जिसने अपने मुख से स्त्री के साथ एक शय्या को उगल दिया था ॥१५४॥ तब वह स्त्री के साथ समागम करके उसी शय्या पर सो गया। और, वह स्त्री सोये हुए उस पथिक के पास जाकर सो गई ॥१५५॥ रति-कार्य के अनन्तर उस पथिक से 'तुम होना कौन हो' इस प्रकार पूछी गई वह स्त्री बोली- 'मैं नागकन्या हूँ और इसकी भार्या हूँ ॥१५६॥ तुम्हें डरना न चाहिए क्योंकि मैं निन्यानब्बे पथिकों के साथ समागम कर चुकी हूँ। अब तून सौ पूरा कर दिया' ॥१५७॥ ऐसा कहती हुई उस स्त्री को और उसके नये जार को सोये हुए नाग ने उठकर डँस लिया। डँसने के उपरान्त मुँह से अग्नि की ज्वाला फेंककर उन दोनों को भस्म कर दिया ॥१५८॥ 'जहाँ शरीर के भीतर रखी हुई भी स्त्री रक्षित नहीं हो सकती वहाँ घर में तो उनकी बात ही क्या है ? ऐसी स्त्रियों को बार-बार धिक्कार है !' उस नाग के चले जाने पर इस प्रकार कहते हुए सखी आदि वे तीनों रात बिताकर वन को चले गये ॥१५९-१६०॥ वन में जाकर मैत्री आदि की चार भावनाओं को सिद्ध करके और उनके द्वारा अन्तःकरण की प्रवृत्तियों को स्थिर करके सब प्राणियों पर समान भावना रखनेवाले वे तीनों साधक अनुपम और परमानन्ददायक समाधि में मग्न होकर पूर्णसिद्धि को प्राप्त हुए और पापों का क्षय हो जाने पर मोक्ष-सिद्धि भी क्रमशः उन्होंने प्राप्त की ॥१६१॥ अपने पापों के फलस्वरूप उत्पन्न विविध कष्टों को भोगती हुई उनकी वे दुष्टा स्त्रियाँ भी द ना लोकों से भ्रष्ट होकर शीघ्र ही नष्ट हो गईं ॥१६२॥ इस प्रकार स्त्रियों में मोह (अज्ञान) के कारण होनेवाले राग (प्रेम) किसके लिए दुःख दायक नहीं होता । और, सारासार का विवेक रखनेवाले महापुरुषों का स्त्रियों के प्रति विराग मोक्ष के लिए ही होता है ॥१६३॥ पद्यवरा के समागम के लिए उत्सुक वत्सराज का पुत्र नरवाहनदत्त मन्त्रिप्रवर गोमुख द्वारा इस प्रकार चिरकाल तक मनोरञ्जन करनेवाली कथा को सुनकर धीरे-धीरे सो गया ॥१६४॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का अष्टम तरंग समाप्त

१३४ कथासरित्सागर

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१३४ कथासरित्सागर नवमस्तरङ्गः नरवाहनदत्ताय गोमुखकथिता विविधाः कथाः अथान्येषु पुनरिमां निशि प्राग्वद्विनोदयन्। नरवाहनदत्ताय गोमुखोऽकथयत् कथाम् ॥१॥ बोधिसत्त्वांशस्य वणिजः कथा बभूव नगरे क्वापि बोधिसत्त्वांशसम्भवः। कस्याप्याढ्यस्य वणिजस्तनयो मृतमातृकः ॥२॥ अन्यजायाप्रसक्तेन पित्रा तत्प्रेरितेन सः। निरस्तो वनवासाय सभार्यो निरगाद् गृहात् ॥३॥ स्वानुजं तु सहायातं तद्विप्रा निराकृतम्। अक्षान्तचित्तमुत्सृज्य सोऽन्येनेव पथा ययौ ॥४॥ प्रव्रजंश्च क्रमात् प्राप निस्तोयतृणपादपम्। पाथेयहीनश्चण्डांशुतप्तां मरुमहाटवीम् ॥५॥ तस्यां व्रजन् स सप्ताहं भार्यां क्लान्तां क्षुधातृषा। अजीवयत् स्वमांसास्रैः पापा साम्याहरच्च सा ॥६॥ अष्टमेऽह्नि सरिद्वीचिवाचालं गिरिकाननम्। प्राप सत्फलसञ्छायपादपं स्निग्धशाद्वलम् ॥७॥ तत्र सम्भाव्य भार्या तां क्लान्तां भूरुहफलाम्बुभिः। अवातरद् गिरिनदीं स्नातुं कल्लोलमालिनीम् ॥८॥ तस्यां ददर्श च छिन्नहस्तपादचतुष्टयम्। ह्रियमाणं जलौघेन पुरुषं त्राणकाङ्क्षिणम् ॥९॥ बहूपवासक्लान्तोऽपि तां विगाह्य नदीं ततः। उज्जहार कृपालुस्तं महासत्त्वः स पूरुषम् ॥१०॥ केनेदं ते कृतं भ्रातरिति कारुणिकेन च। तेनारोप्य स्थलं पृष्टः स रुवन् पुरुषोऽभ्यधात् ॥११॥ निकृत्तहस्तचरणो नद्यां क्षिप्तोऽस्मि शत्रुभिः। विट्सुभिः क्लेशमरणं त्वयाहं सुखतस्ततः ॥१२॥ एवमुक्तवतस्तस्य स बबन्ध व्रणपट्टिकाम्। दत्त्वाहारं महासत्त्वः स्नानादि व्यधितात्मनः ॥१३॥

दशम लम्बक १३५

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दशम लम्बक १३५ नवम तरंग गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त को सुनाई गई विविध कथाएँ दूसरे दिन रात में फिर पहले के ही समान मनोविनोद करते हुए गोमुख मन्त्री ने नरवाहनदत्त के लिए कथा सुनाई ॥१॥ बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न बनिये की कथा किसी नगर में बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न किसी धनी बनिये (सेठ) का लड़का था जिसकी मां मर गई थी ॥२॥ दूसरी स्त्री (सौतेली मां) के वशीभूत और उसी के द्वारा प्रेरित पिता से बनवास के लिए निर्वासित वह पुत्र अपनी पत्नी के साथ घर से निकल गया ॥३॥ अपने साथ आते हुए अपने भ्रान्ताचित छोटे भाई को लौटाकर वह दूसरे ही मार्ग से गया ॥४॥ चलते चलते मार्ग में भोजन-रहित वह क्रमशः प्रचंड सूर्य की किरणों से संतप्त महान् मरुस्थल में जा पहुँचा ॥५॥ उस मरुस्थल में सात दिनों तक थकी-मांदी और भूखी-प्यासी स्त्री को वह अपने मांस और रक्त से जिलाता रहा। वह पापिनी भी उसे खाती-पीती रही। ॥६॥ आठवें दिन वह एक पहाड़ी जंगल में पहुँचा जो पहाड़ी नदी की तरंगों से मुखरित फल- वाले सघन वृक्षों की छायावाला और हरी घासों के मैदानों से रमणीय था ॥७॥ वहां पर थकी-मांदी अपनी पत्नी को कन्द, मूल फल जल आदि से स्वस्थ करके वह स्वयं तरंगों से सुशोभित पहाड़ी नदी में स्नान करने के लिए उतरा ॥८॥ उसने नदी की धार में बहते हुए अपना बचाव चाहते हुए कटे हुए हाथपैर वाले एक पुरुष को देखकर, अनेक उपवासों से थके और दुर्बल होते हुए भी उस दयालु महापुरुष ने नदी की धार में जाकर उसे निकाला ॥९ १ ॥ और, उस दयालु राजकुमार ने उस वृद्ध पुरुष को अपनी पीठ पर उठाकर सूखे स्थान पर रखा और पूछा कि 'भाई, तुम्हारी यह दुर्दशा किसने की' ॥१०॥ तब उस पुरुष ने कहा—'मेरे शत्रुओं ने मुझे कष्टपूर्वक मरने के लिए मेरे हाथ-पैर काट कर मुझे नदी में फेंक दिया' ॥११॥ ऐसा कहते हुए उस पुरुष के घावों पर पट्टियां बांधकर और उसे भोजन आदि से सन्तुष्ट करके उस महापुरुष ने स्नान आदि क्रिया समाप्त की ॥१२॥

२१६ कथासरित्सागर

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२१६ कथासरित्सागर ततो मूलफलाहारो भार्यायुक्तोऽत्र कानने। स तस्थौ बोधिसत्त्वांशो वणिक्पुत्रस्तपश्चरन् ॥१४॥ एकदा फलमूलार्थं गत तस्मिन् स्मरातुरा। तद्भार्या तेन रुण्डेन रमे स्वव्रणन सा ॥१५॥ तत्सक्ता तेन सम्मन्त्र्य भर्तुस्तस्य वधैषिणी। युक्त्या चकार सान्यद्युर्मान्द्यं दुष्टचारिणी मृषा ॥१६॥ स्वप्ने दुरवतारेऽद्य स्थिता दुस्तरनिम्नगे। दर्शयित्वौषधिं पापा पतिं सा त्वमभाषत ॥१७॥ जीवाम्यहं त्वयैषा चेन्मयानीता महौषधिः। जाने ह्येतामिहस्थां मे स्वप्ने वक्ति स्म देवता ॥१८॥ तच्छ्रुत्वा स तथैवेथ द्वबध्रे तत्रौषधं कृते। तुषवेष्टितया रज्ज्वावातरत्स्तब्धया ॥१९॥ अवतीर्णस्य रज्जुं तां चिक्षेपोन्मुच्य तस्य सा। ततः स पतितो नद्या तया जह्रे महौघया ॥२०॥ दूराद्वीची नीत्वा च तया सुकृतलक्षितः। नद्या कस्यापि नगरस्यासन्ने सोऽर्पितस्तटे ॥२१॥ तत स स्थलमारुह्य चिन्तयन् स्त्रीविचेष्टितम्। जलावगाहनक्लान्तो विशश्राम तरोस्तले ॥२२॥ तस्मिन् काले च नगरे राजा तत्र मृतोऽभवत्। मृते राजनि चानादिदेशे छत्रेष्वसौ स्थितिः ॥२३॥ यन्मङ्गलगजःपौरैर्भ्राम्यमाणः करेण यम्। आरोपयति पृष्ठे स्वे सोऽत्र राज्येऽभिषिच्यते ॥२४॥ स धैर्यतुष्टो धातेव भ्रमन् प्राप्तोऽन्तिकं गजः। उत्क्षिप्यारोपयामास स्वपृष्ठे तं वणिक्सुतम् ॥२५॥ ततः स नगरं नीत्वा रम्ये प्रकृतिभिः क्षणात्। वणिक्सुतोऽभिषिक्तोऽभूद् बोधिसत्त्वांशसम्भवः ॥२६॥ स राज्यं प्राप्य करुणामुदिताक्षान्तिभिः सह। अरस्त न तु पापाभिः स्त्रीभिश्चपलवृत्तिभिः ॥२७॥ तद्भार्या सापि निःशङ्का मत्वा तं च नदीहृतम्। वभ्रामतस्ततो जारं रुण्डं पृष्ठेऽधिरोप्य तम् ॥२८॥

दशम लम्बक १६७

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दशम लम्बक १६७ तब कन्द और फल आदि का आहार करते हुए उस वैश्यपुत्र ने पत्नी के साथ तपस्या करते हुए उसी वन में निवास किया ॥१४॥ एक बार उस वाणिग्दत्त के अंध वैश्यपुत्र के कन्द फल आदि लेने के लिए दूर निकल जाने पर, काम-वासना से पीड़ित उसकी स्त्री उस रंड पर आसक्त हो गई और उसके साथ रमण करने लगी ॥१५॥ उसके सम्पर्क में आकर और उससे सम्मति करके अपने पति का वध करने की इच्छा से वह पापिन दुराचारिणी बीमारी का बहाना बनाकर पड़ गई ॥१६॥ दुस्तर नदी के करारे में नीचे की ओर उगी हुई किसी ओषधि को दिखाकर, वह, अपने पति से बोली कि यदि तुम उस ओषधि को ला दो तो मैं जी सकती हूँ, ऐसा मुझे स्वप्न में देवता ने कहा है ॥१७-१८॥ यह सुनकर साधु स्वभाव उसका पति उस औषधि को लेने के लिए बास की रस्सी बनाकर, उसे वृक्ष से बाँधकर और उसमें लटककर नदी की ओर लटका। रस्सी के सहारे उसके लटकने पर उस कामिनी ने रस्सी को खोलकर फेंक दिया। इस कारण उसका पति नदी में गिरकर तेज धारा में बह गया ॥१९-२०॥ पूर्व पुण्यों से रक्षित उस वैश्यपुत्र को नदी ने दूर तक बहाकर एक किनारे पर ले जाकर पटक दिया ॥२१॥ उस तट से ऊपर को चढ़ता हुआ अपनी स्त्री के कुकर्म को सोचता हुआ और पानी के बहाव से थका-हारा वह वैश्यपुत्र एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा ॥२२॥ उसी समय उस नगर का राजा मर गया। उस देश में प्राचीन समय से यह प्रथा चली आ रही थी कि राजा के मरने पर, पुरवासी माङ्गलिक मत्तगज को घुमाते थे। वह घूमते हुए सूँड़ से उठाकर जिसे अपनी पीठ पर बैठा लेता था वही राजगद्दी पर बैठाया जाता था ॥२३-२४॥ उसी नियमानुसार धैर्य से सम्पुष्ट विधाता के समान वह हाथी वृक्ष के तले बैठे हुए वैश्यपुत्र के पास आया और उसने उसे उठाकर अपनी पीठ पर बैठा लिया ॥२५॥ तब राजा के मन्त्रियों तथा अधिकारियों ने उस वैश्यपुत्र का नगर में ले जाकर उसका राज्याभिषेक कर दिया ॥२६॥ बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न वह वैश्यपुत्र राज्य पाकर मैत्री करुणा मुदिता क्षमा आदि गुणों के साथ राज्यशासन करने लगा। चंचल वृत्तिवाली पापिनी स्त्रियों को उसने दूर ही रखा ॥२७॥ उधर, उसकी पत्नी निःशंक होकर पति का नदी में डूबकर मरा हुआ जानकर, अपने उस जार को पीठ पर चढ़ाकर इधर उधर घूमने लगी ॥२८॥ ११८

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परिकृत्ताङ्घ्रिहस्तोऽयं भर्त्ता मेऽहं पतिव्रता। भिक्षित्वा जीवयाम्येतं तद्भिक्षां मे प्रयच्छत॥२९॥ इति सा भिक्षमाणा च ग्रामं ग्रामं पुरे पुरे। राज्यस्थस्यात्मनो भर्तुर्नगरं प्राप तस्य तत्॥३०॥ तथैव भिक्षमाणात्र राज्ञस्तस्य क्रमेण सा। पतिव्रतेत्यर्च्यमाना पौरैः श्रुतिपथं ययौ॥३१॥ आनाययत्तस राजा च तां पृष्ठारूढरुण्डिकाम्। का सा पतिव्रतेत्यारात् परिव्राजं च पृष्टवान्॥३२॥ साहं पतिव्रता देवेत्यप्रतिज्ञाय सापि तम्। भर्तारमब्रवीत् पापा राजधीतेजसा वृतम्॥३३॥ ततः स बोधिसत्त्वांशो हसन् राजा जगाद ताम्। दृष्टं पतिव्रतात्वं ते फलेनैव मयात्र च॥३४॥ स्वरक्तमांसं दत्त्वापि स्वीकृतुं शकिता न या। स्वेनाबिलुप्तहस्तेन भर्त्रा मानुषराक्षसी॥३५॥ सा सदा रक्तमांसानि हरन्ती बत मे कषम्। रुण्डेन विकलेनापि स्वीकृत्य वहनीकृता॥३६॥ किंस्विद्रूढः स भर्त्ता यो नद्यां क्षिप्तस्त्वयानघः। कर्मणा तेन बहसे रुण्डमेतं बिभर्षि च॥३७॥ इत्युद्घाटितवृत्तं तं प्रतिज्ञाय पतिं ततः। भयात् सा मूर्च्छितेवाभूल्लिखितेव मृतेव च॥३८॥ किमेतद्ब्रूहि देवेति सोऽथ राजा सकौतुकैः। पृष्टोऽमात्यैर्यथावृत्तं तेभ्यः सर्वमवर्णयत्॥३९॥ ततो मत्तद्रुहं बुद्ध्वा छित्त्वा तां कर्णनासिकम्। कृत्वाङ्क मन्त्रिणो देशात् सरुण्डां निरवासयन्॥४०॥ छिन्ननासिकया रुण्डं बोधिसत्त्व नृपधिया। युक्तं सवृक्षत्तयोगं तथा बिभिरवर्णयत्॥४१॥ एवं दुरवधार्यैव गतिश्चित्तस्य योषिताम्। देवस्येवाविचारस्य नीचैकाभिमुखस्य च॥४२॥ एवं चात्यन्तधीराणां सत्त्वानां जिततृष्णाम्। तुष्ट्वेवाचिन्तिता एव स्वयमायान्ति सम्पदः॥४३॥

द्वादश लम्बक १५१

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द्वादश लम्बक १५१

वह कहती थी—'यह मेरा पति है और शत्रुओने इसके हाथ-पैर काट दिये हैं। मैं पतिव्रता हूँ इसलिए भीख मांगकर भी पति को जिलाती हूँ। इसलिए, मुझे भिक्षा दो' ॥२९॥ इस प्रकार, गांव-गांव और नगर-नगर में भीख मांगती हुई वह दुष्टा स्त्री उस नगर म पहुँची जहाँ उसका पहला पति राज्य करता था ॥३०॥ इसी प्रकार वहाँ भीख मांगती हुई वह पतिव्रता होने के कारण जनता में खूब मानी जाने लगी। धीरे-धीरे राजा के कानों में भी उसकी प्रशंसा पहुँची ॥३१॥ राजा ने भी पीठ पर रूंड को चढ़ाई हुई उसे बुलवाया और भली भांति उसे पहचान कर पूछा कि 'क्या तू ही वह पतिव्रता है ?' ॥३२॥ उस पापिनी ने भी राजलक्ष्मी के तेज से परिवर्तित स्वरूपवाले अपने उस पति को न पहचान कर कहा—'हाँ महाराज मैं वही पतिव्रता हूँ' ॥३३॥ तब बोधिसत्त्व का अंश वह राजा हँसकर बोला—'इस परिणाम से मैं ने भी तेरा पातिव्रत्य देख लिया। तू वह मनुष्य-रूपी राक्षसी है जिसे तेरा पति अपना रक्त और मांस देकर भी वश में न कर सका और शरीरहीन रूंड ने तुझे अपना बाहुन बनाया। क्या यह वही तेरा निष्पाप पति है जिस तूने नदी में फेंक दिया था। उसी कर्म से तू इस रूंड को ढो रही है और पाल रही है ?' ॥३४-३५॥ इस प्रकार, गुप्त रहस्य को खोलनेवाले उस अपने पति को पहचानकर वह स्त्री भय से मूर्च्छित-सी चित्र-लिखित और मूक-सी हो गई ॥३८॥ तदनन्तर, कौतुक-भरे मन्त्रियों से 'महाराज यह क्या बात है ?' इस प्रकार पूछे गये राजा ने सब सत्य समाचार उन्हें सुना दिया ॥३९॥ तब मन्त्रियों ने उसे पति-विरोधिनी जानकर उसके नाक-कान कटवा दिये और उस रूंड के साथ उसे उस नगर से बाहर निकलवा दिया ॥४०॥ नकटी को रूंड के साथ और राजलक्ष्मी को बोधिसत्त्व के साथ मिलाते हुए दैव ने समान संयोग का उदाहरण प्रदर्शित किया ॥४१॥ इस प्रकार विवेकहीन और निम्न चित्तवृत्तिवाली स्त्रियों की चित्तवृत्ति दैव-गति के समान नहीं जानी जा सकती ॥४२॥ इसी प्रकार, अपने स्वभाव और चरित्र के रक्षक विशाल हृदयवाले और क्रोध पर विजय करनेवाले व्यक्तियों को सम्पत्तियां मान प्रसन्न होकर बिना साध ही प्राप्त हो जाती हैं ॥४३॥

इत्याख्याय कथां मन्त्री गोमुखः पुनरेव सः।

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इत्याख्याय कथां मन्त्री गोमुखः पुनरेव सः। नरवाहनदत्ताय कथामेतामवर्णयत् ॥४४॥ कोऽप्यासीद्बोधिसत्त्वांशो वने क्वापि कृतोटजः। कारुणैकाग्रहृदयो महासत्त्वस्तपश्चरन् ॥४५॥ स तत्र जन्तूनापन्नान् पिशाचांश्च समुद्धरन्। अपरांश्च जलेऽग्नौ स्वभावादतर्पयत् ॥४६॥ एकदान्योपकारार्थं भ्रमन् सोऽटावीभुवि। महान्तं कूपमद्राक्षीत्तदन्तश्च ददौ दृशम् ॥४७॥ तावच्च स्त्री तदन्तस्था स दृष्ट्वैवोच्चैरभाषत। भो महारम्भह नारी सिंहः स्वर्णशिखः खगः ॥४८॥ भुजङ्गश्चेति चत्वारः कूपेऽत्र रजनी वयम्। पतितास्तदतः क्लेशादुद्धरास्मान् कृपो कुरु ॥४९॥ एतच्छ्रुत्वा जगादैतां स्त्रियं यूयं त्रयो यदि। तमसान्धा निपतिताः खगोऽत्र पतितः कथम् ॥५०॥ तमवैषोऽपि पतितो व्याधजालेन सङ्गतः। इति सापि महासत्त्वं तं नारी प्रत्यभाषत ॥५१॥ ततस्तान् स तपःशक्त्या यावदुद्धर्तुमिच्छति। तावत्तच्छक्त्या नोद्धर्तुं सिद्धिस्तस्य त्वहीयत ॥५२॥ पापेयं स्त्री ध्रुवं सिद्धिरितत्सम्भाषणाद्धि मे। नष्टा यतस्त्वत्र तावद्युक्तिं यां करोम्यहम् ॥५३॥ इति सञ्चिन्त्य रज्ज्वा तांस्तृणावेष्टितयाखिलान्। उज्जहार महासत्त्वः स कूपात् कुर्वतः स्तुतिम् ॥५४॥ सविस्मयश्च पप्रच्छ सिंहपक्षिमृजङ्गमान्। व्यक्ता वाग् वः कथं कीदृग्वृत्तान्ताद्वोच्यतामिति ॥५५॥ तत मिथोऽब्रवीद् व्यक्तवाचो जातिस्मरा वयम्। अन्योन्यबाधकाश्चास्मद् वृत्तान्तं च क्रमाच्छृणु ॥५६॥ सिंहस्य कथा इत्युक्त्वा स स्ववृत्तान्तं सिंहो वक्तुं प्रचक्रमे। अस्ति बभ्रुमृगेन्द्रस्य तुषाराद्रौ पुरोत्तमम् ॥५७॥ पद्मगभिधानोऽस्ति तत्र विद्याधरेश्वरः। पद्मगभिधानश्च पुत्रस्तस्याप्यदत्त ॥५८॥