BharatKosha
Back to the archive

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

५७ कथासरित्सागर

Page 617Permalink

५७ कथासरित्सागर ते वयं हेमकमलान्येतान्यादाय साम्प्रतम्। वय पूजयितु याम श्वेतद्वीपे श्रिय पतिम् ॥१९॥ तद्भक्ता हि वयं सर्वे सत्प्रसादेन चारिपु। तेषु स्वेष्वाधिपत्य न सिद्धियुक्ताश्च सम्पद ॥२०॥ तदेहि दर्शयामस्ते श्वेतद्वीपे हरि प्रभुम्। नयामस्त्वन्तरिक्षेण यदि ते रोचते सखे ॥२१॥ इत्युक्तवद्भिस्तै साक देवपुत्रैस्तथेति स। नरवाहनदत्ताङ्ग स्वाभीनाम्बुफलादिके ॥२२॥ गोमुखादीनवस्थाप्य श्वेतद्वीप विहायसा। ययौ गृहीत स्वोत्सङ्गे तमध्यादेवसिद्धिनः ॥२३॥ नरवाहनदत्तस्य श्वेतद्वीपगमनं विष्णुसेवाप्राप्तिश्च तत्रावतीर्य गगनाद्ू रादेवोपसृत्य च। पार्श्वस्थिताङ्गितनय पादान्तस्थवसुन्धरम् ॥२४॥ शङ्खचक्रगदापद्मै सेव्यमान सविग्रहै। भक्त्योपगीयमानं च गन्धर्वैर्नारदादिभि ॥२५॥ प्रणम्यमानं देवेश्च सिद्धैर्विद्याधरैस्तथा। अग्रोपविष्टगरुड खपश्याभ्यागत हरिम् ॥२६॥ स ददर्श द्युतिर्मास्तं प्रापितो देवपुत्रकै । कस्य नाभ्युदये हेतुर्भवेत्साधुसमागम ॥२७॥ ततोऽजित देवपुत्रै कश्यपाद्यैश्च संस्तुतम्। नरवाहनदत्तस्तमस्तोषीत् प्राञ्जलि प्रभुम् ॥२८॥ नमोऽस्तु तुभ्य भगवन् भक्तकल्पमहीरुह। लक्ष्मीकरस्पर्शताश्लिष्टवपुषेऽभीष्टदायिने ॥२९॥ नमस्ते दिव्यहंसाय सन्मानसनिवासिने। सततोदितनादाय पराकाशविहारिणे ॥३०॥ तुभ्य नमोऽतिसर्वाय सर्वाभ्यन्तरवर्तिने। गुणातिवृन्तरूपाय पूर्णषाड्गुण्यमूर्तये ॥३१॥ ब्रह्मा ते नाभिकमले स्वाध्यायोद्यन्मृदुध्वनि। तद्भूतानेकचरणोऽप्येष पद्चरणायते ॥३२॥ भूमिपादो द्युमूर्धा त्वं दिक्श्रोत्रोऽर्केन्दुलोचन। ब्रह्माण्डजठर सोऽपि पुरुषो गीयसे बुधै ॥३३॥

नवम लम्बक ५७१

Page 618Permalink

नवम लम्बक ५७१ हम चारों इन सोने के कमलों को लेकर श्वेतद्वीप में भगवान् कमलापति (विष्णु) की पूजा के लिए जा रहे हैं॥१९॥ हमलोग उन्हीं के भक्त हैं और उन्हीं की कृपा से उन पर्वतों पर हमारा राज्य है और सिद्धियों के साथ सम्पत्तियाँ भी प्राप्त हैं॥२०॥ तो चलो श्वेतद्वीप में तुम्हें हरि का दर्शन करावें। मित्र यदि तुम्हें अच्छा लगे तो हमलोग तुम्हें आकाश-मार्ग से ले चलें ॥२१॥ इस प्रकार कहते हुए देवपुत्रों को स्वीकृति देकर, फल और जल से स्वाधीन उस स्थान पर गोमुख आदि सचिवों को ठहराकर वह उनके साथ जाने को तैयार होगया ॥२२॥ उन चारों में देवसिद्धि ने उसे अपनी गोद में बैठाकर आकाश-मार्ग से श्वेतद्वीप की यात्रा की ॥२३॥ नरवाहनदत्त का श्वेतद्वीप में जाना और विष्णु-सेवा की प्राप्ति श्वेतद्वीप में पास बैठी हुई लक्ष्मी और चरणों के पास बैठी हुई धरित्री से शोभित शरीरधारी शंख चक्र गदा और पद्म इन शस्त्रों से सेवित गन्धर्वों और नारद आदि से गाकर स्तुति किये जाते हुए, सामने बैठे हुए गरुड़ से सेवित और शेषनाग की शय्या पर सोये हुए हरि का उन चारों देवपुत्रों द्वारा पहुँचाये गये नरवाहनदत्त ने देखा। सच है सज्जनों का समागम किसके कल्याण के लिए नहीं होता॥२४-२७॥ तब उन देवपुत्रों और कश्यप आदि द्वारा स्तुति किये गये भगवान् की नरवाहनदत्त ने हाथ जोड़कर स्तुति की—॥२८॥ 'हे भक्तों के कल्पवृक्ष ! हे सरसी-रूपी कान्ता से लिपटे हुए शरीरवाले ! हे अभीष्ट फल देनेवाले तुम्हें प्रणाम है॥२९॥ सज्जनों के मानस-सरोवर में विहार करनेवाले निरन्तर नाद करते हुए और अनन्त आकाश में विहार करनेवाले तुम दिव्य हंस के लिए नमस्कार है ॥३०॥ सबसे अतिरिक्त रहनेवाले सबके अन्दर में विराजमान गुणों से परे रहनेवाले और पूरे षड् गुणों की मूर्तिमान् तुम्हारे लिए प्रणाम है ॥३१॥ वेदाध्ययन के कारण मन्द ध्वनि करते हुए और उससे उत्पन्न अनेक चरणोंवाले ब्रह्मा भी आपके समीप भ्रमर के समान लगते हैं॥३२॥ आकाश तुम्हारा सिर है दिशाएँ तुम्हारे कान हैं सूर्य और चन्द्रमा तुम्हारे नेत्र हैं और सारा ब्रह्माण्ड तुम्हारा उदर है। अतः तुम परमपुरुष कहे जाते हो ॥३३॥

Page 619Permalink

त्वत्तो धामनिघृष्टासी भूतग्रामो विजृम्भते। नाष स्फुलिङ्गसङ्घात इव प्रज्वलतोऽनलात् ॥३४॥ पुनश्च प्रविशत्येष त्वामेव प्रलयागमे। दिनान्ते विहगव्रात इव वासमहाद्रुमम् ॥३५॥ सृजस्युल्लसित स्वांशांस्त्वमतान् भुवनेश्वरान्। अनन्तवेलाक्षुभितस्तरङ्गानिब वारिधिः ॥३६॥ विश्वरूपोऽप्यरूपस्त्वं विश्वकर्मापि चाक्रियः। विश्वाधारोऽप्यनाधारः कः स सत्त्वमवैति ते ॥३७॥ तां सामुद्रि सुराः प्राप्तास्त्वत्प्रसङ्गेक्षवेक्षिताः। तत्प्रसीद प्रपन्नं मां पश्य पश्यार्द्रया दृशा ॥३८॥ एव कृतस्तुतिं दृष्ट्वा सप्रसादेन चक्षुषा। नरवाहनदत्तं च हरिनारदमभ्यधात् ॥३९॥ गच्छ क्षीरोदसम्भूता या वराप्सरसः पुरा। न्यासीकृत्य मया हस्ते शक्रस्य स्थापिताः स्वकाः ॥४०॥ तास्तस्मान्मम वाक्येन मृगयित्वा महामुने। आरोप्य तद्रथे सर्वाः सत्वरं स्वमिहानय ॥४१॥ इत्युक्तो हरिणा गत्वा नारदः स उपेत्य ताः। आनिन्येऽप्सरसः शक्रात्तद्रथेन समातरि ॥४२॥ तेन तासूर्पनीतासु प्रणतेनाप्सरःस्वथ। वत्सराजतनुजं च भगवानादिदेश सः ॥४३॥ नरवाहनदत्तैतास्तुभ्यमप्सरसो मया। दत्ता विद्याधरेन्द्राणां भविष्यच्चक्रवर्त्तिने ॥४४॥ त्वमासामुचितो भर्त्ता मार्यादिद्यैतास्तवापिताः। : कामदेवावतारो हि निमित्तस्य पुरारिणा ॥४५॥ तच्छ्रुत्वा पादपतिते तस्मिन् वत्सेश्वरात्मजे। लब्धप्रसात्समुदिते हरिर्मातलिमादिशत् ॥४६॥ नरवाहनदत्तोऽसावप्सरःसहितस्त्वया । प्राप्यतां स्वगृहं यावत्पद्या येनायमिच्छति ॥४७॥ एवं भगवतादिष्टः साप््सरस्कं प्रणम्य तम्। नरवाहनदत्तं स रथे मातलिगारथिम् ॥४८॥

Page 620Permalink

मत्स्य सम्भव ५७१ हे प्रभो यह समस्त प्राणियों का समूह और तेज का पुञ्ज तुममें वैसे ही उत्पन्न होता है जैसे जलती हुई अग्नि से चिनगारियां ॥३४॥ यह सारा भूत-संघात (प्राणि समूह) प्रलयकाल में तुम्हारे ही अन्दर उसी प्रकार समा जाता है जैसे सायंकाल के समय पक्षियों का समूह महावृक्ष में समा जाता है ॥३५॥ अखण्ड बेला से क्षुब्ध होकर समुद्र जैसे तरंग उत्पन्न करता है वैसे तुम भी अपने अंग से इन्द्र आदि लोकपालों को उत्पन्न करते हो ॥३६॥ तुम विरञ्चर होकर भी अ-रजा (रजहीन) हो। विश्वकर्मा होकर भी अ-क्रिय (कर्म रहित) हो। विश्व के आधार होकर भी स्वयं निराधार (आधार रहित) हो। वह कौन है जो तुम्हारी अलक्षितता का ज्ञान रखता है ॥३७॥ तुम्हारी कृपा दृष्टि से ही देव गण देवता उस महान् ऐश्वर्यों को प्राप्त करते हैं। अतः मुझ पर कृपा करो। शरण में आये हुए मुझे सदय दृष्टि से देखो ॥३८॥ इस प्रकार, स्तुति किये गये मत्स्यावतार को प्रसन्न दृष्टि से देखकर हरि ने नारद से कहा-जाओ क्षीरसमुद्र में उत्पन्न हुई अप्सराओं को मैंने इन्द्र के पास अपनी धरोहर के रूप में रखा था उन सबको रथ में बैठाकर शुभ शीघ्र मेरे कहने से यहाँ ले आओ ॥३९-४१॥ विष्णु के इस प्रकार कहने पर नारद मुनि ने 'जो आज्ञा' कहकर तुरन्त ही मातलि के साथ रथ में बैठी अप्सराओं को लाकर उपस्थित किया ॥४२॥ नारद द्वारा अप्सराओं के लाने पर उन अप्सराओं के रूप को भगवान् ने आदेश दिया-हे मत्स्यावतार ! दिव्यवर राजाओं व हरदेव व चक्रवर्ती ! त्वा मैंने ये अप्सराएँ दे दीं। तू इनका योग्य पति है और ये तेरी योग्य पत्नियां। क्योंकि शिव ने पहले ही इस वरदान का अवतार बताया है ॥४३-४५॥ यह सुनकर मत्स्यरूपधारी प्रसन्न होकर व रूप-लावण्य गुण से युक्त वे भगवान् के चरणों में गिरने पर हरि ने मातलि को आज्ञा दी कि इन सब रत्नरूप व अप्सराओं सहित जिस कार्य में यह आये थे, वहाँ को चले जाओ ॥४६-४७॥ भगवान् के ऐसा आदेश देने पर मत्स्यरूपधारी अप्सराओं के साथ हँसते-हँसते जलचरों द्वारा रक्षक हुए ॥४८॥

५७४ कथासरित्सागर

Page 621Permalink

५७४ कथासरित्सागर नरवाहनदत्तस्य नारिकेलद्वीपे गमनम् आरुह्य देवपुत्रैस्तैः साकं कृतनिमन्त्रणः । नारिकेलमगाद्दीपं देवेष्विव कृतस्पृहः ॥४९॥ तत्र तैरर्चितो रूपसिद्धिप्रभृतिभिः कृती । चतुर्भिर्दिव्यवपुषैः शक्रसारथिना युतः ॥५०॥ मनाग्वपुषमाधाय वन्दिवासांसिषु क्रमात् । अप्सरोभिः समं ताभिः स्वर्गस्याधिप्वरस्त सः ॥५१॥ मधुमासागमोत्फुल्लनानातस्रुवनासु च । विजहार तदुद्यानवनभूमिषु कौतुकी ॥५२॥ पश्यैतास्तरुमञ्जयः पृधुपुष्पविलोचने । कान्तं वसन्तमायान्तं पश्यन्तीव विकस्वरैः ॥५३॥ अस्मत्क्षेत्रेऽत्र मा भून्नः सन्तापोऽर्ककरोद्भवः । इतीवाच्छाद्यितुं पश्य फुल्लं सरसिजैः सरः ॥५४॥ पद्मोञ्ज्वलः कर्णिकारमुपेक्ष्यापि बिसौरभम् । विमुञ्चन्त्यन्यतो नीचं श्रीमन्तमिव साधवः ॥५५॥ पश्येह किन्नरीगीतैः कोकिलानां च कूजितैः । रुतैर्लीनां सङ्गीतमृतुराजस्य तन्यते ॥५६॥ इत्यादि देवपुत्रास्ते सुवाणास्तामदर्शयन् । नरवाहनदत्ताय तस्मै स्वापवनावलीम् ॥५७॥ तत्पुरेष्वपि चित्रीडं पश्यन् वत्सदेवरात्मजः । स वसन्तोत्सवोद्दामप्रनृत्यत्पौरचर्चरी ॥५८॥ बुभुजे सागरस्थस्य भागानपामराचितान् । सुकृती यत्र गच्छन्ति सत्रपामृतद्याऽमृतः ॥५९॥ एव स्थित्वा त्रिजतुगन्धिमान् देवपुत्रवान् । नरवाहनदत्तस्तान् सुहृदो निजगाद सः ॥६०॥ गच्छाम्यहं स्वनगरीं तातसन्दर्शनात्सुकः ॥ तद्यथ तां पुरीमेत्य श्रूवापयत पश्यतः ॥६१॥ तच्छ्रुत्वा तेऽब्रुवन् दृष्ट्वा मारुतस्या पुरो भवान् । विमर्त्यतुं प्राञ्जविद्यन स्मतस्यास्तु वय त्वया ॥६२॥

नवम लम्बक ५७५

Page 622Permalink

नवम लम्बक ५७५ नरवाहनदत्त का नारिकेल-द्वीप में जाना देवताओं से ईर्ष्या किया जाता हुआ नरवाहनदत्त उन देवपुत्रों से निमन्त्रित होकर उस रथ से नारिकेलद्वीप को गया ॥४९॥ नारिकेल-द्वीप में रूपसिद्धि आदि चारों देवपुत्रों से सत्कृत नरवाहनदत्त मैनाक ऋषभ आदि स्वर्ग से होड़ लेनेवाले उन चारों पर्वतों पर अप्सराओं के साथ रमण करने लगा ॥५०-५१॥ कौतुकी वह नरवाहनदत्त वसन्त के आगमन से विकसित नाना प्रकार के पुष्पों से शोभित वनों और वृक्षोंवाले उन पर्वतों की उद्यान भूमि में विहार करता था ॥५२॥ देखो ये वृक्षों की मंजरियाँ शून्य-रूपी बड़ी-बड़ी विकसित आँखों से आते हुए अपने कान्त वसन्त को देख रही हैं ॥५३॥ देखो हमारा जन्म-क्षेत्र इस सरोवर में सूर्य-किरणों का प्रचंड सन्ताप न पहुँच सके मानों इसीलिए कमलों ने खिलकर तालाब को ढक लिया है ॥५४॥ देखो खिले हुए कनिकार के गन्धहीन पुष्पों को भौंरे उसी प्रकार छोड़ रहे हैं जैसे श्रीमान् के नीच होने पर सज्जन उसे छोड़ देते हैं ॥५५॥ यहाँ देखो किन्नरियों के गान कोकिलों की कूक और भौंरों की गुनगुनाहट मानों ऋतुराज के आगमन के संगीत हैं । ॥५६॥ इस प्रकार, कहते हुए देवपुत्रों ने नरवाहनदत्त को अपने उद्यानों की पंक्तियाँ दिखाई ॥५७॥ नरवाहनदत्त वसन्तोत्सव का अभिनन्द-नृत्य करती हुई नागरिक स्त्रियों के गान का आनन्द लेता हुआ उस नगर में सानन्द क्रीड़ा करता रहा। वह यहाँ अप्सराओं के साथ देवताओं के योग्य आनन्द प्राप्त करता रहा। भाग्यवान् व्यक्ति जहाँ भी जाता है, भोग उसके पास पहले ही वहाँ उपस्थित हो जाते हैं ॥५८-५९॥ इस प्रकार वह तीन-चार दिनों तक वहाँ रहकर अपने उन मित्र देवपुत्रों से कहने लगा- 'पिताजी को देखने की उत्कंठा है। अतः अब मैं अपनी नगरी को जाता हूँ। देखिए, आपलोग मेरी नगरी में आकर मुझे कृतार्थ कीजिए' ॥६०-६१॥ यह सुनकर वे बोले-'उस नगरी के सारभूत आपको हमने देख लिया और क्या कहूँ ? जब आपकी सभी विद्याएँ प्राप्त हो जायें तब हम लोगों को आप स्मरण करें' ॥६२॥

५७६ कथासरित्सागर

Page 623Permalink

५७६ कथासरित्सागर इत्युक्त्वा प्रतिमुक्तस्तद्रुपनीतन्द्रसद्रथम् । नरवाहनदत्तोऽसौ मातलिं तमभाषत ॥६३॥ मत्र दिव्यसरस्तीरे स्थिता मे गोमुखादयः । तन् मार्गेण कौशाम्बीं पुरीं प्रापय मामिति ॥६४॥ ततस्तथति तनोक्तः साप्सरस्कः स तद्रथे । आरुह्य तत्सरः प्राप गोमुखादीन् ददर्श च ॥६५॥ आयातं स्वपथा शीघ्रं सर्वं वक्ष्यामि वो गृहे । इत्युक्त्वा तांश्च कौशाम्बीं ययौ शक्ररथेन सः ॥६६॥ तत्रावतीर्य नभसः पूजितं प्रेष्य मातलिम् । अप्सरोभिर्युतस्ताभिः स विवेश स्वमन्दिरम् ॥६७॥ स्थापयित्वा च तास्तत्र गत्वा वत्सेश्वरस्य सः । तदागमनहृष्टस्य ववन्दे चरणौ पितुः ॥६८॥ मातुर्वासवदत्तायाः पद्मावत्यास्तथैव च । अभ्यनन्दच्च तैश्चार्यं दर्शनातृप्तचक्षुषा ॥६९॥ तावच्च स रथासङ्गो गोमुखोऽत्र ससारथिः । प्रलम्बबाहुना सार्द्धं विप्रेण सममाययौ ॥७०॥ अथ स्थित मन्त्रिवर्गे पित्रा पृष्टः सादरं सः । नरवाहनदत्तस्तं स्ववृत्तान्तं महाद्भुतम् ॥७१॥ वदासि तस्य कस्याणमित्रप्रयोगमीश्वरः । इच्छत्यनुग्रहं यस्य कर्तुं सुकृतकर्मणः ॥७२॥ इति शंसत्सु सर्वेषु राजा वत्सेश्वरोऽथ सः । चकार तुष्टस्तनयस्यान्युतामुपहोत्सवम् ॥७३॥ ददर्श पादपतनायानीता गोमुखेन च । हरप्रसादरम्भास्ताः सदारोऽप्सरसः स्नुषाः ॥७४॥ देवरूपां देवरतिं देवमालां तथैव च । देवप्रियां चतुर्थी च चेटीभिः पृष्टनामकः ॥७५॥ क्वाहं क्व मय्यप्सरसो दिष्ट्याह राजसूनुना । नरवाहनदत्तेन भुवि स्वर्नागरी कृता ॥७६॥ इतीवावकिरन्ती सा सिन्दूरं विततोत्सवा । चञ्चद्रक्तपताकाभिः कौशाम्बी वदृशे तदा ॥७७॥

नवम लम्बक ५७७

Page 624Permalink

नवम लम्बक ५७७ इस प्रकार कहकर उनसे बिदा किया हुआ नरवाहनदत्त इन्द्र के रथ को लेकर आये हुए सारथी मातलि से बोला-'उस दिव्य सरोवर के समीप जहाँ गोमुख आदि ठहरे हैं चलकर उसी मार्ग से मुझे कौशाम्बी पहुँचाओ' ॥६३-६४॥ 'वैसा ही करूँगा'-मातलि से ऐसा कहा गया वह नरवाहनदत्त अप्सराओं के साथ रथपर चढ़कर उस सरोवर पर पहुँचा और वहाँ गोमुख प्रलम्बबाहु आदि को उसने देखा ॥६५॥ और उनसे बोला-'आप लोग अपने ही मार्ग से जाओ। घर पर सब कुछ कहूँगा - ऐसा कहकर वह इन्द्र के रथ से कौशाम्बी चला गया ॥६६॥ वहाँ पर आकाश से उतरकर और मातलि को सत्कार के साथ विदा करके अप्सराओं के साथ वह अपने महल में गया ॥६७॥ उन अप्सराओं को वहीं ठहराकर वह उसके आगमन से प्रसन्न अपने पिता वत्सराज के पास गया और उसके चरणों की वन्दना की ॥६८॥ इसी प्रकार उसने माता वासवदत्ता और पद्मावती के चरणों में प्रणाम किया। दर्शन से अतृप्त आँखों से उसे देखकर माताओं ने उसे आशीर्वाद दिया ॥६९॥ इतने में ही गोमुख भी रथ पर चढ़ा हुआ सारथी और प्रलम्बबाहु नामक उस ब्राह्मण के साथ वहाँ आ पहुँचा ॥७०॥ तदनन्तर सभी मन्त्रियों के आ जाने पर पिता द्वारा पूछे गये नरवाहनदत्त ने अपना अत्यन्त आश्चर्यमय यात्रा-वृत्तान्त उन्हें सुनाया ॥७१॥ ईश्वर, जिस पुण्यकर्मा पर कृपा करता है, उसे अच्छे और कल्याणकारी मित्रों का संयोग कराता है ॥७२॥ सब लोगों के ऐसा कहने पर वत्सराज ने अपने पुत्र पर भगवान् विष्णु की कृपा का महोत्सव मनाया ॥७३॥ तब राजा (वत्सराज) ने विष्णु की कृपा से प्राप्त उन नई वधुओं (अप्सराओं) को देखा जिन्हें राजा और रानी के चरणों की वन्दना करने के लिए गोमुख वहाँ लाया था ॥७४॥ सासियों द्वारा नाम पूछने पर उन चारों ने अपने नाम देवरूपा देवरति देवमाला और देवप्रिया बतलाया ॥७५॥ उस समय वायु से हिलती हुई लाल पताकाओं से उत्सव मनाती हुई कौशाम्बी- 'मैं कहाँ और अप्सराएँ कहाँ ? नरवाहनदत्त ने तो पृथ्वी पर मुझे स्वर्ग की नगरी के समान बना दिया-इस प्रसन्नता से मानों सिन्दूर उड़ाती थी ॥७६-७७॥ ७३

५७८ कथासरित्सागर

Page 625Permalink

५७८ कथासरित्सागर नरवाहनदत्तश्च पित्रोर्दत्तोत्सवो दृशोः। अथा सम्भावयामास भार्या मार्गोन्मुखीर्निजाः॥७८॥ ताश्चोन्मिषिदवर्षेरिव तं च कृशीकृताः। अनन्यत्रन्वर्णयन्त्यस्तां तां विरहवेदनाम्॥७९॥ गोमुखो वनवासे च रक्षतो रणवाजिनः। प्रलम्बबाहोः सिंहादिवधशौर्यमवर्णयत्॥८०॥ एष श्रुतिसुखाञ्छृण्वन् कथाशपानयन्त्रणान्। निर्वर्णयैष कान्तानां रूपं स नयनामृतम्॥८१॥ कुर्वंश्चाटूनि च पिबन् मधूनि सचिवैर्युतः। नरवाहनवतोऽत्र तं कालमवसत्सुखी॥८२॥ एकदाऽसिरलङ्कारवतीवासगृहे स्थितः। सवयस्यः स शुश्राव तूर्यकोलाहलं बहिः॥८३॥ ततो हरिशिखं सेनापतिं निजमुवाच सः। अकस्मात्कुत एतस्यात्तूर्यनादो महानिह॥८४॥ समुद्रशूरस्य कथा एतच्छ्रुत्वैव निर्गत्य प्रविश्य च स तं क्षणात्। व्यजिज्ञपद्धरिशिखो वत्सराजसुतं प्रभुम्॥८५॥ शूरो नाम वणिग्देव नगर्यामिह विद्यते। इतः सुवर्णद्वीपं च स जगाम वणिज्यया॥८६॥ आगच्छंस्ते निजस्तास्य सम्प्राप्तोऽप्यर्थसञ्चयः। अम्भौ वहनमङ्गेन निमग्नो नाक्षमगात्॥८७॥ उत्तीर्णश्चारमर्नेवैको देव जीवन्स वारिधेः। प्राप्तश्चाद्य दिने षष्ठमिहापन्नो निजं गृहम्॥८८॥ दिनानि कतिचिद्यावदिह तिष्ठति दुःखितः। तावत् स्वारामतो दैवात् प्राप्तस्तेन निधिर्महान्॥८९॥ तद् गोत्रजानां च मुदाऽज्ञातं यत्सोदरेण तत्। ततोऽस्यागत्य तेनासी विज्ञप्तो वणिजा प्रभुः॥९०॥ सरत्नोघा मया लब्धाऽद्यतन्त्रा हेमकोटयः। तदाविशति देवस्तदपयिष्यामि सा इति॥९१॥ जन्माशयेन मुषितं दीनं दृष्ट्वैव वेधसा। कृपया सविभक्तं स्वां वो मय्यारयञ्जडाशयः॥९२॥

नवम लम्बक ५७९

Page 626Permalink

नवम लम्बक ५७९ माता-पिता को आँखों का आनन्द देनेवाला नरवाहनदत्त ने प्रतीक्षा करती हुई अपनी अन्यान्य पत्नियों को जाकर प्रसन्न किया ॥७८॥ वे सब चार वर्षों के समान चार बिना न सूखकर लकड़ी-सी हो गई थीं ? उन्होंने अपनी-अपनी विरह-वेदनाओं का वर्णन करते हुए नरवाहनदत्त को आनन्दित किया ॥७९॥ तब गोमुख ने वनवास के समय उनके रथ के घोड़ों की रक्षा करते हुए हाथों से ही सिंह आदि हिंसक जन्तुओं को मार डालने की प्रचण्डबाहु की वीरता का वर्णन किया ॥८०॥ इस प्रकार, आनन्द देनेवाली इधर-उधर की बातों को सुनते हुए और पत्नियों का मुखामृत पान करके उन्हें रिझाते हुए तथा और मन्त्रियों के साथ मद्यपान करते हुए नरवाहनदत्त के दिन सुखपूर्वक बीतने लगे ॥८१-८२॥ एक बार अलंकारवती के भवन में मित्रों के साथ बैठे हुए नरवाहनदत्त ने बाहर की ओर से ढोल-नगाड़ों का शब्द सुना ॥८३॥ तब उसने अपने सेनापति हरिशिख से कहा—'यहाँ अकस्मात् यह ढोल-नगाड़ों का शब्द कहाँ से और कैसे हो रहा है'? ॥८४॥ समुद्रवैश्य की कथा यह सुनकर बाहर निकलकर और तुरन्त लौटकर हरिशिख ने स्वामी नरवाहनदत्त से निवेदन किया—'स्वामी इस नगरी में समुद्र नाम का एक बनिया है। वह व्यापार के लिए यहाँ से सुवर्ण-द्वीप को गया ॥८५-५८६॥ वहाँ से लौटते हुए उसका अपना और कमाया हुआ भी धन समुद्र में जहाज के डूब जाने से नष्ट हो गया ॥८७॥ इस रूप में से वह बनिया दैवयोग से जीवित समुद्र के बाहर निकल आया और अपने घर पहुँच गया। आज उसे घर पहुँचे हुए छठा दिन है। इसी बीच जब वह अत्यन्त दुःखी होकर अपने घर रहता था तब उसने अपने बगीचे में एक गड़ा हुआ बहुत बड़ा खजाना पाया ॥८८-८९॥ यह बात उसने मन में विचारपूर्वक 'यह महाराज उदयन का प्राप्य है'। इसलिए आज उस क्षत्रिय ने स्वयं जाकर महाराज से निवेदन किया—॥९०॥ 'हे स्वामिन्! मैंने सुना है कि जो आप प्राप्त न हो वह भूमिस्थ खजाने से प्राप्त है यदि महाराज की आज्ञा हो तो मैं इसे लाकर महाराज की भेंट में अर्पित करूँ' ॥९१॥ समुद्र द्वारा यत्न से किये जाने पर उस नीच मनुष्य आश्चर्य में पड़ गया कि इस दीन समय द्वारा ऐसा कारण' ? ।

५८ कथासरित्सागर

Page 627Permalink

५८ कथासरित्सागर गच्छ भुङ्क्ष्व यथाकामं धनं प्राप्तं स्वभूमितः । इति वत्सेश्वरेणापि व्यादिष्टोऽसौ वणिक्ततः ॥९३॥ स एष पादयो राज्ञः पतित्वा हर्षनिर्भरः । तूर्याणि वादयन् याति स्वगृहं सानुगो वणिक् ॥९४॥ एवं हरिशिखेनोक्तां श्रुत्वा धार्मिकतां पितुः । नरवाहनदत्त स्तान्सचिवान्विस्मितोऽब्रवीत् ॥९५॥ यदि तावदरत्यांस्त्वन्यत्र ददाति किम् । चित्रमुच्छ्रायपाताभ्यां क्रीडतीव विधिर्नृणाम् ॥९६॥ तच्छ्रुत्वा गोमुखोऽथावीदीदृश्येव गतिर्विषः । समुद्रशूरस्य कथा सथा चात्र निशम्यताम् ॥९७॥ समुद्रशूरस्य कथा बभूव नगरं पूर्वं नृपतेर्हर्षवर्मणः । स्फीतं हर्षपुरं नाम सौराज्यसुखितप्रजम् ॥९८॥ तस्मिन्समुद्रशूराख्यो नगरेऽभून्महावणिक् । कुलजो धार्मिको धीरसत्त्वो बहुधनेश्वरः ॥९९॥ स वणिज्यावशाद् गच्छन् सुवर्णद्वीपमेकदा । आरुरोह प्रवहणं तत् प्राप्य महाम्बुधौ ॥१००॥ गच्छतस्तस्य तत्राथौ किञ्चिच्छेषे तदध्वनि । घोरः समुद्बभूवेषो वायुश्च क्षोभितार्णवः ॥१०१॥ तेनोर्मिभगविक्षिप्ते वहने मकराहतं । भग्ने परिकरं बद्ध्वा सोऽम्बुधावपतद्वणिक् ॥१०२॥ यावच्च बाहुविक्षेपैर्वीरोऽत्र तरति क्षणम् । तावच्छिरोमृतं प्राप पुरुषं पवनरितम् ॥१०३॥ तदारूढश्च बाहुभ्यां क्षिप्तोऽम्बुविधिनेव सः । नीतः सुवर्णद्वीप तदनुकूलेन वायुना ॥१०४॥ तत्रावतीर्णे पुळिने स तस्मा मृतमानुषात् । कटीनिबद्ध मप्रन्थि तस्यार्षक्षत शाटकम् ॥१०५॥ उन्मुच्य वीक्षते यावच्छाटकं त्रुटितोऽन्य तत् । तावत्तदन्तरद्विध्य रत्नार्ग्य प्राप कण्ठकम् ॥१०६॥ तं दृष्ट्वाऽनर्घमादाय कृतस्नानस्तुतोष सः । मन्वानाऽसौ विनष्टं तदनं तस्याग्रतस्सुखम् ॥१०७॥

अष्टम लम्बक ५८१

Page 628Permalink

अष्टम लम्बक ५८१ इसलिए तुम जाओ। अपनी भूमि से प्राप्त धन का अपने इच्छानुसार उपभोग करो, वत्सराज द्वारा इस प्रकार कहा गया वह वैश्य हर्ष से भरकर महाराज वत्सराज के चरणों में गिर पड़ा और सब ढोल-नगाड़े बजाता हुआ अपने परिजनों के साथ अपने घर जा रहा ॥१९३-९४॥ हरिशिख के ऐसा कहने पर और पिता की धार्मिकता सुनकर चकित नरवाहनदत्त अपने मन्त्रियों से बोला—॥९५॥ दैव मनुष्यों का धन छीनकर, पुनः तुरन्त ही क्यों दे देता है? इस प्रकार दैव मनुष्यों के उत्थान और पतन से खेल करता है, यह आश्चर्य है! ॥९६॥ यह सुनकर गोमुख ने कहा—'दैव की गति ऐसी ही है। इस सम्बन्ध में समुद्र शूर की कथा सुनो ॥९७॥ समुद्रशूर वैश्य की कथा पूर्व समय में राजा हर्षवर्मा का हर्षपुर नाम का विशाल नगर था, जिसमें सुराज्य के कारण प्रजा अत्यन्त प्रसन्न थी ॥९८॥ उस नगर में समुद्रशूर नाम का एक बनिया था। वह कुलीन, धार्मिक, धैवशाली और बहुत धनवाला था॥९९॥ एक बार समुद्रशूर व्यापार के लिए स्वर्णद्वीप को जाते हुए माल-सामान लेकर और समुद्र के तट पर पहुँचकर नाव पर चढ़ा ॥१००॥ उस नाव से समुद्र में जाते हुए कुछ ही मार्ग शेष रहने पर भीषण वात्य चक्र आकाश में उठा और समुद्र को क्षुब्ध कर देनेवाला भारी तूफान भी आ गया ॥१०१॥ ऊँची-ऊँची लहरों द्वारा नाव के फेंक दिये जाने और अन्ततः उसके डूब जाने के कारण वह बनिया कमर कसकर समुद्र में कूद पड़ा ॥१०२॥ तैरने पर कुछ समय तक वह हाथों को चलाकर समुद्र में तैरता रहा। तब उस समुद्र में गिरते हुए एक मुर्दे का शव उसके हाथ लग गया। वह वैश्य उस पर चढ़कर हाथों से पानी को चलाता हुआ वायु के अनुकूल होने के कारण सुवर्णद्वीप के तट पर पहुँच गया ॥१०३-१०४॥ वहाँ पहुँचकर वह उस शव से उतर पड़ा और उसकी कमर में बँधी हुई धोती को वह टटोलने लगा जिसमें एक गाँठ बँधी थी। उसने जब उसकी कमर से धोती निकालकर उसे खोलकर सम्भालकर देखा तो उस गाँठ में एक दिव्य और रत्नमय कण्ठाभरण उसे दिखाई पड़ा ॥१०५-१०६॥ उस अमूल्य कण्ठाभरण को देखकर वह प्रसन्न हुआ और भली भाँति स्नान करके उस शव द्वारा बचाये उसने समुद्र में डूबी हुई अपनी सम्पत्ति का दुःख भूल गया ॥१०७॥

५८२ कथासरित्सागर

Page 629Permalink

५८२ कथासरित्सागर ततो गत्वाथ कलशपुराख्यं नगरं क्रमात्। हस्तस्थकण्ठको देवकुलमेकं विवेश सः॥१०८॥ तत्र छायोपविष्टं स वारिव्यायामतों भृशम्। परिश्रान्तं शनैर्निद्रा ययौ विधिविमोहितं ॥१०९॥ सुप्तस्य तत्र चाकस्मादागताः पुररक्षिणः। ददृशुस्तस्य हस्तस्थं कण्ठकं तमनावृतम्॥११०॥ अयं स कण्ठको राजसुताया इह कण्ठतः। हारितश्चन्द्रसेनाया ध्रुवं चोरोऽयमेव सः॥१११॥ इत्युक्त्वा तं प्रबोध्यासौ निन्ये राजकुलं वणिक्। तत्र पृष्टं स्वयं राज्ञा स यथावृत्तमभ्यधात्॥११२॥ मिथ्या वक्ष्येष चोरोऽयमिमं पश्यत कण्ठकम्। इति प्रसार्य तं राजा यावत् सभ्यान् ब्रवीति सः॥११३॥ तावत् प्रभास्वरं दृष्ट्वा निपत्य नभसो जवात्। गृध्रस्तं कण्ठकं हृत्वा जगाम क्वाप्यदर्शनम्॥११४॥ अथार्यात्तस्य वणिजः क्रन्दतः शरणं शिवम्। वधे राज्ञा कृतादिष्टे शुश्रुवे भारती दिवः॥११५॥ मा स्म राजन्वधीरेनमसौ हर्षपुराद्वणिक्। साधुः समुद्रशूराख्यो विषयंऽभ्यागतस्तव॥११६॥ कण्ठको येन नीतोऽभूत् स चौरः पुररक्षिणाम्। भयेन विह्वलो नश्यन्निपत्याम्भौ मृतो निशि॥११७॥ अयन्तु तस्य चौरस्य भार्यं प्राप्याधिशेष च। मज्जन्मग्नप्रवहणस्तत्तीर्त्वाम्भोधिमिहागतः ॥११८॥ तदा च तत्स्त्रीबद्धशाटकग्रन्वितोऽमुना। वणिजा कण्ठकः प्राप्तो न नीतोऽनेन वो गृहात्॥११९॥ तदचोरमिमं राजन्वणिजं मुञ्च धार्मिकम्। सम्भाव्य प्रहिणुष्वैनमित्युक्त्वा विरराम वाक्॥१२०॥ एतच्छ्रुत्वा स सन्तुष्य मुक्त्वा तं वणिजं नृपात्। समुद्रशूरं सम्भाव्य धनै राजा विसृष्टवान्॥१२१॥ स च प्राप्यधनः प्रीतभाञ्ज भूयो भयङ्कुरम्। स्वदेशमप्यन्ववहत्तादृशातान्यम्बुधि वणिक् ॥१२२॥

नवम लम्बक ५८३

Page 630Permalink

नवम लम्बक ५८३ हाथ में उस कंठहार को लिये हुए वह क्रमशः कलशपुर नामक नगर में पहुँचा और वहाँ एक यक्ष-मन्दिर में गया ॥१०८॥ पानी में तैरते-तैरते थका हुआ वह बनिया भाग्यवश वहाँ अच्छी छाया पाकर धीरे-धीरे सो गया ॥१०९॥ उसके सोते हुए में ही नगर के पहरेदार अकस्मात् उधर जा निकले और उन्होंने उसके हाथ में खुले हुए उस हार को चमकते देखा ॥११० ॥ 'यह हार हमारी राजकुमारी चन्द्रसेना का है। इसने ही उसके गले से झपट लिया है इसलिए यह अवश्य चोर है' ॥१११॥ ऐसा कहकर वे पहरेदार उसे जगाकर राजा के पास ले गये। वहाँ राजा के उससे पूछने पर उसने सब सत्य समाचार राजा से कह दिया ॥११२॥ 'यह चोर है झूठ बोलता है।' ऐसा कहकर और हार को फैलाकर राजा ने सभासदों को दिखलाया ॥११३॥ कान्ति से चमकते हुए उस हार को आकाश में उड़ते हुए एक गीध ने देखा और राजा के हाथ से उसे झपटकर वह आकाश में उड़ गया तथा अदृश्य हो गया ॥११४॥ तदनन्तर अत्यन्त भीत उस वैश्य के शिव के नाम लेकर चिल्लाहट मचाने पर, राजा ने क्रुद्ध होकर उसके वध का आदेश दे दिया किन्तु इतने में ही आकाशवाणी हुई—॥११५॥ 'हे राजन् इसे मत मारो। यह सज्जन बनिया समुद्रशूर तुम्हारे देश में व्यापार करने आया है॥११६॥ हार को जिस चोर ने चुराया था वह सिपाहियों के डर से घबराया हुआ रात को समुद्र में डूब गया। वह बनिया नाव के टूट जाने पर उसी चोर के शव पर बैठकर हाथों से समुद्र पार करके यहाँ आया है। उस शव की कमर में बँधी हुई धोती की गाँठ से बनिया ने यह हार पाया है। अतः इसने यह हार तुम्हारे घर से नहीं लिया है ॥११७–११९॥ इसलिए, यह चोर नहीं है। हे राजन् इस धार्मिक वैश्य को छोड़ दो और सम्मानित करके इसे विदा करो। इतना कहकर आकाशवाणी बन्द हो गई ॥१२० ॥ यह सुनकर सन्तुष्ट हुए राजा ने उसे छोड़ दिया और धन से सम्मानित करके उसे विदा किया। उस वैश्य समुद्रशूर ने भी उस धन से व्यापार का सामान लेकर स्ववश आते हुए उस भयंकर महासमुद्र को पार किया॥१२१ १२२॥

५८४ कथासरित्सागर

Page 631Permalink

५८४ कथासरित्सागर तीर्णाब्धिश्च ततो गत्वा सार्थेन सह स क्रमात्। अटवीं प्रापदेकस्मिन्वासरे दिवसात्यये ॥१२३॥ तस्यामावसिते सार्थे रात्रौ तस्मिंश्च जाग्रति। समुद्रशूरे ऽयपतञ्चौरसेनाऽथ द्रुतया ॥१२४॥ हन्यमाने तथा सार्थे भाण्डांस्त्यक्त्वा पलाय्य सः। समुद्रशूरो ऽथप्रोषमास्कन्दोऽभूदमक्षितः ॥१२५॥ हृताशेषधने याते चौरसैन्ये भयाकुलः। तत्रैव तां तरौ रात्रिं दुःखात्तंश्च निनाय सः ॥१२६॥ प्रातस्तस्य तरोः पृष्ठे गतदृष्टिः स ददर्श । दीपप्रभामिवापश्यत्स्फुरन्तीं पत्रमध्यगाम् ॥१२७॥ विस्मयात्तत्र चारूढो गृध्रनीडमवैक्षत। अन्तस्थभास्वरानर्घ्यरत्नलाभरणसञ्चयम् ॥१२८॥ जग्राह तस्मात्सर्वं तत्तन्मध्ये प्राप कण्ठकम्। तं च यं प्राप्तवान् स्वर्णद्वीपे गृध्रोद्धरञ्च यम् ॥१२९॥ ततः प्राप्तामितधनो ऽथप्रोषादवरुह्य सः। हृष्टो गच्छन् क्रमात् प्राप निजं हर्षपुरं पुरम् ॥१३०॥ तत्र तस्थौ वणिक्सोऽथ वीताम्यद्रविणस्पृहः। समुद्रशूरः स्वजनैः सह नन्दन्यथेच्छया ॥१३१॥ अवधौ तत्पतनं सोऽर्थेनाशस्तत्तरेण ततः। सा कण्ठकस्य च प्राप्तिस्तस्यैवापगमः स च ॥१३२॥ सा निष्कारणनिग्राहदृढावाप्तिः स सत्सखम्। तुष्टात्कटाहेस्वराल्लाभस्तदम्भोस्तरणं पुनः ॥१३३॥ सोऽथ सर्वोपहारश्च पथि चौरैः समागमात्। पश्यन्त तस्य वणिजस्तत्पुष्टाद्धनागमः ॥१३४॥ तदव्यमीदृग् एव विचित्रं चेष्टितं विधेः। सुकृती जानुभूयैव दुःखमप्यश्नुते सुखम् ॥१३५॥ इति गोमुखतः श्रुत्वा श्रद्धाभोत्थाय च व्यधात्। नरवाहनदत्तोऽत्र स्नानादिविधिसत्क्रियाम् ॥१३६॥ १ दैवयोगादित्यर्थः ।

नवम लम्बक ५८५

Page 632Permalink

नवम लम्बक ५८५ उस किनारे पहुँचकर और नाव से उतरकर वैश्य व्यापारियों के झुंड के साथ क्रमशः स्वदेश जाते हुए एक दिन सायंकाल के समय एक भीषण जंगल में जा पहुँचा ॥१२३॥ उस जंगल में झुंड के डेरा डालने पर और समुद्रशूर के जागते रहने पर वहाँ डाकुओं की बलवती सेना ने आक्रमण कर दिया॥१२४॥ उस सेना द्वारा व्यापारियों के मारे जाने पर, वह समुद्रशूर अपना सामान छोड़कर चुपचाप एक बड़े बरगद के वृक्ष पर चढ़कर छिप गया ॥१२५॥ समस्त व्यापारियों का माल लूटकर चले जाने के कारण भय से व्याकुल और दुःख से पीड़ित समुद्रशूर ने वह सारी रात उसी वृक्ष पर बिताई ॥१२६॥ प्रातःकाल वैश्रवण वृक्ष के ऊपरी भाग में दृष्टि डालते हुए समुद्रशूर ने पत्तों के झुरमुट में चमकती हुई दीपक की लौ-सी देखी ॥१२७॥ आश्चर्य चकित वैश्य उसे देखकर, जब ऊपर चढ़ा तब उसने वहाँ चील का घोंसला देखा जिसके भीतर से अमूल्य रत्नों का प्रकाश बाहर छिटक रहा था ॥१२८॥ उस वैश्य ने घोंसले में हाथ डालकर उसे उठा लिया और वही कंठहार उसे वहाँ दीख पड़ा जिसे उसने सुवर्ण-द्वीप में पाया था और जिसे राजसभा से चील झपट ले गया था ॥१२९॥ तब उस अनन्त धन को प्राप्त करके बनिया उस वटवृक्ष से नीचे उतरा और प्रसन्न होकर जाता हुआ क्रमशः अपने हर्षपुर नगर में पहुँच गया। वहाँ जाकर धन कमाने की चाह छोड़कर वैश्य समुद्रशूर, अपने परिवार के पास सानन्दपूर्वक रहने लगा। समुद्र में गिरना, धन का डूबकर नाश हो जाना, गले का हार पाना, मुर्दे पर बैठकर समुद्र पार करना, फिर उसका छिप जाना, निष्कारण मृत्युदंड मिलना, उसी क्षण प्रसन्न द्वीप के राजा से धन की प्राप्ति होना, मार्ग में फिर डाकुओं द्वारा उसका भी अपहरण हो जाना और अन्त में उस वृक्ष में फिर धन (हार) की प्राप्ति होना—आदि देखकर मानता रहता है महाराज कि दैव की गति विचित्र है। किन्तु पुण्यवान् व्यक्ति पहले दुःख का अनुभव करके अन्त में सुख पाता है ॥१३०—१३५॥ गोमुख से यह कथा सुनकर और उस पर विश्वास करके नरवाहनदत्त स्नान आदि नित्यकर्म के लिए सभा से उठ गया ॥१३६॥ ७४

५८६ कथासरित्सागर

Page 633Permalink

[Header] ५८६ कथासरित्सागर

अन्यद्युरेत्य चास्थानगतं तं वात्सवकः। शूरः समरतुङ्गाख्यो राजपुत्रो व्यजिज्ञपत् ॥१३७॥ देव सङ्ग्रामवर्षेण नाशितो गोत्रजेन मे। दशदक्षतुभिर्युक्तेन पुत्रैर्वीरजितादिभिः ॥१३८॥ तदद्य गत्वा पञ्चापि यद्ध्वा तानानयाम्यहम्। प्रभोर्विदितमस्त्वेतदित्युक्त्वा सन्न सोऽगमत् ॥१३९॥ तमल्पसैन्यं तानन्यान् भूरिसैन्यानवेत्य सः। वत्सेश्वरसुतस्तस्य विदेशानुबलं निजम् ॥१४०॥ सोऽगृहीत्वैव तन्मानी गत्वा पञ्चापि तान् रिपून्। स्वबाहुभ्यां रणे जित्वा संयम्यानीतवान्समम् ॥१४१॥ तथा जयिनमायान्तं वीरं सम्भाव्य स प्रभुः। नरवाहनदत्तस्तं प्रशशंस स्वसेवकम् ॥१४२॥ चित्तमाक्रान्तविषयान्सबलानिन्द्रियोपमान् । जित्वानन रिपून् पञ्च पुरुषार्थः प्रसाधितः ॥१४३॥ तच्छ्रुत्वा गोमुखाद्वादीच्छृणुता चम्र तद्विधौ। राज्ञश्चमरबालस्य कथां तच्छृणु वच्मि ताम् ॥१४४॥

राज्ञः चमरबालस्य कथा

हस्तिनापुरमिरथस्ति नगरं तत्र चाभवत्। राजा चामरबालाख्यः कोषदुर्गाब्धिसान्वितः ॥१४५॥ बभूवुस्तस्य समरबलाद्या भूम्यनन्तराः। राजानो गोत्रजास्ते च सम्भूयवमचिन्तयन् ॥१४६॥ अयं चमरबालोऽस्मानेकैकं बाधते सदा। तदेते मिलिताः सर्वे विदध्मोऽस्य पराभवम् ॥१४७॥ इति सम्मन्त्र्य पञ्चत तज्जयाय यियासवः। प्रस्थानलग्नं क्षितिपाः पप्रच्छुर्गणकं रहः ॥१४८॥ अपश्यन् स शुभं लग्नं पश्यंश्चशकुनानि च। जगाद गणको नास्ति लग्नं संवत्सरेऽत्र वः ॥१४९॥ यथा तथा च यातानां न युष्माकं भवेज्जयः। किं चात्र वोऽनुबन्धेन समृद्धिं तस्य पश्यताम् ॥१५०॥

नवम लम्बक ५८७

Page 634Permalink

नवम लम्बक ५८७ दूसरे दिन सभा में बैठे हुए उसके पास उसका बाल-मित्र और शूर राजपूत समरतुंग आकर बोला- महाराज मेरे कुटुम्बी दायाद संग्रामदर्प ने वीरजित आदि चार पुत्रों की सहायता से मेरे देश जीत लिये हैं ॥१३७-१३८॥ तो मैं जाकर उन पाँचों को बाँधकर लाता हूँ आपका यह विदित हो-ऐसा कहकर वह चला गया ॥१३९॥ नरवाहनदत्त ने समरतुंग की सेना को न्यून (कम) और संग्रामदर्प की सेना को अधिक जानकर समरतुंग की सहायता के लिए अपनी सेना भेज दी ॥१४० ॥ वह मानी समरतुंग उस सेना की सहायता लिये बिना ही वहाँ जाकर उन पाँचों शत्रुओं को अपने बाहुबल से जीतकर और एक साथ ही बाँधकर ले आया ॥१४१॥ इस प्रकार आये हुए उस विजयी वीर का सम्मान करके नरवाहनदत्त ने अपने उस सेवक की प्रशंसा की ॥१४२॥ आश्चर्य है कि विषय (देश) का आक्रमण किए हुए पाँच इन्द्रियों के समान इन पाँच शत्रुओं को जीतकर इसने पुरुषार्थ की साधना की है ॥१४३॥ यह सुनकर गोमुख ने कहा-'स्वामिन् यदि तुमने इसी प्रकार की राजा अमरदत्त की कथा न सुनी हो तो कहता हूँ सुनो - ॥१४४॥ राजा अमरदत्त की कथा हस्तिनापुर नाम का एक नगर है। वहाँ कोष (खजाना) दुर्ग (किला) और बल (सेना) से युक्त अमरदत्त नाम का राजा था। उसके साथ ही समरबल आदि उसके पास में उत्पन्न दायादों के राज्य थे। उन लोगों ने एकत्र होकर सोचा- ॥१४५-१४६॥ यह अमरदत्त हम लोगों में से एक-एक को सदा डराता रहता है अतः हम सब मिलकर इसका अपमान करें ॥१४७॥ ऐसी सहमति करके उस पर चढ़ाई करने के लिए उद्यत उन पाँचों राजाओं ने एकान्त में ज्योतिषी से चढ़ाई का मुहूर्त पूछा ॥१४८॥ वे लोग अगूढ़ संशय को दूर करके चढ़ाई करने के शुभ लग्न पूछना चाहते थे। तब ज्योतिषी ने कहा- इस वर्ष भर चढ़ाई का लग्न नहीं है ॥१४९ ॥ यदि किसी प्रकार तुमने चढ़ाई की भी तो उसमें तुम लोगों की विजय न होगी और उस अमरदत्त की मर्यादा न रखकर तुम लोगों का इससे अपहरण क्या है ? ॥१५० ॥

५८८ कथासरित्सागर

Page 635Permalink

५८८ कथासरित्सागर भोगो नाम फलं लक्ष्म्याः स तस्मादधिकोऽस्ति वः। न चेच्छ्रुता श्रूयतां तत्कथात्र वणिजोर्द्वयोः ॥१५१॥ राज्ञो बहुसुवर्णस्य कथा बभूव कौतुकपुरं नामह नगरं पुरा। तस्मिन्नन्वर्थनामाभूद्राजा बहुसुवर्णकः ॥१५२॥ यशोवर्मेति तस्यासीत्सेवकः क्षत्रियो युवा। सस्म दातापि स नृपो नादात्किञ्चित्कदाचन ॥१५३॥ यदा यदा च नृपतिस्तेनार्थ्या याच्यते स्म सः। भावित्य दर्शयन्नव समुवाच तदा तदा ॥१५४॥ अहमिच्छामि तं दातुं किं पुनर्भगवानयम्। तुभ्यं नेच्छति मे दातुं किं करोम्युच्यतामिति ॥१५५॥ तत सोऽवसरं चिन्वन् यावत्तिष्ठति दुःखितः। सूर्योपरागसमयस्तावदत्रागतोऽभवत् ॥१५६॥ तत्कालं स यशोवर्मा गत्वा सततसेवकः। नृपं भूरिमहादानप्रवृत्तं तं व्यजिज्ञपत् ॥१५७॥ यो ददाति न तं तुभ्यं धातुं सैष रविः प्रभो। ग्रस्तोऽद्य वैरिणा यावत्सावत्किञ्चित्प्रयच्छ मे ॥१५८॥ तच्छ्रुत्वा स हसित्वा च दत्तवानो महीपतिः। गवीं वस्त्रं हिरण्यादि तस्मै बहुसुवर्णकम् ॥१५९॥ क्रमात्तस्मिन्धने मुक्ते क्षिप्रं साऽर्द्धवति प्रभो। मृतजानि यशोवर्मा प्रययौ विन्ध्यवासिनीम् ॥१६ ०॥ किं निरर्थेन देहेन जीवतापि मृतेन मे। त्यक्ष्याम्यत पुरा देव्या वरं प्राप्स्यामि चेप्सितम् ॥१६१॥ इत्यग्रे विन्ध्यवासिन्या प्रविश्या दर्भसस्तरे। तन्मनाः स निराहारस्तपा महत्तपायत ॥१६२॥ प्राविशत् च सा स्वप्ने देवी तुष्टास्मि पुत्र ते। वदाम्यर्थंधियं किं ते किं वा भोगश्रियं वद ॥१६३॥ १ मृता जाया यस्यासौ मृतजानिः मृतभार्य इत्यर्थः।

राजा शत्रुसुवर्ण की कथा

Page 636Permalink

नवम स्तबक ५८९ ... काम का ... श्मशान की भूमि ... इस प्रकार यह सब चरित्र सुनकर कहा ॥१५५॥ राजा शत्रुसुवर्ण की कथा श्यामावद नाम नगरका राजा शत्रुसुवर्ण नामका राजा था। उस नगर में दयाल नाम का ब्राह्मणधर्मी नाम का राजा था ॥१५६॥ उस स्त्री नाम का बड़ा सौख्य उसका गन्धर्व था। गजानन के ध्यान पर भी उस राजा का कभी पुत्र नहीं दिया ॥१५७॥ के निदान यह नगर इस प्रकार राज्य करते न रहा था जब एक बार राजा युगल का दिन आया तब उस पर चिन्ता करता कि इस कायायुक्त के कारण पुत्र नहीं प्राप्त हुआ ॥१५८॥ तब दोनों परस्पर कहने लगे कि जब बलि पुत्रादिकों का सुख संसार का सुख नहीं पाता तब दयार्थी कपटपूर्वक सन्तानहीन घर में रहता कि इस कारण दोनों का दैव भली देवे जब इस प्रकार दृढ़ चित्त से चिन्ता दे महर्षि व्यास मुनि दयालु ॥१५९॥ तब राजा एक बार नगरबहार जा कर मुनिराज का दर्शन करने गया और देखा कि मुनि ... ... ... ... ... ... ... ... ...