कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
५२ कथासरित्सागर
५२ कथासरित्सागर आश्वास्यमाने चैतस्मिन् न मृतोऽस्मि न केवलम्। यावज्ज्ञानं ममोत्पन्नमनिशं ध्यायतो हरम्॥१३४॥ तावत्कालश्च नैवासीत् क्षुत्तृष्णा च सखे मम। यावदद्योद्धृतः पुष्करपङ्ककूटादहं त्वया॥१३५॥ ज्ञाने प्राप्तेऽपि शक्तिर्मे तावती नैव विद्यते। मोचयेयं ययात्मानमितो मर्कटभावतः॥१३६॥ कण्ठसूत्रं यदा कापि तमन्त्रेष्वव मोक्ष्यति। योगिनी मे तदा भूयो भवितास्मीह मानुषः॥१३७॥ इत्येष मम वृत्तान्तस्त्वं स्वगम्यमिदं वनम्। किमागतः कथं चेति ब्रूहीदानीं वयस्य मे॥१३८॥ एव मर्कटरूपेण सोमस्वामिद्विजेन स । उक्तो निश्चयदत्तः स्वं तस्मै वृत्तान्तमब्रवीत्॥१३९॥ यथा विद्याधरीहेतोश्चोज्जयिन्याः समागतः। आनीतो धैर्यजितया यक्षिण्या च तथा निशि॥१४०॥ ततः श्रुततदाश्चर्यवृत्तान्तः कपिरूपधृत् । धीमान्निश्चयदत्तं तं सोमस्वामी जगाद सः॥१४१॥ अनुभूतं त्वया दुःखं मयेव स्त्रीकृतं महत्। न च श्रियः स्त्रियस्नेहः कदाचित्कस्यचित् स्थिराः॥१४२॥ सन्ध्याभ्रक्षणरागिण्यो नदीवत्कुटिलाशयाः। भुजङ्गीवदविश्वास्या विद्युदुज्ज्वलरूपाः स्त्रियः॥१४३॥ तस्सा विद्याधरी रक्ताप्यनुरागपरा क्षणात्। प्राप्य कञ्चित् स्वजातीयं विरज्येत् त्वयि मानुषे॥१४४॥ तदलं स्त्रीनिमित्तेन प्रयासेनामुनाधुना। किम्पाकफलतुल्येन विपाकविरसं ते॥१४५॥ मा मा विद्याधरपुरीं तां सखे पुष्करावतीम्। यक्षिणीस्कन्धमारुह्य तामेवोज्जयिनीं व्रज॥१४६॥ कुरु मद्वचनं मित्र पूर्वं मित्रवचो मया। न कृतं रागिणा तेन परितप्येऽधुनाव्यहम्॥१४७॥ बन्धूद्वसानुरक्तं हि सुस्निग्धा ब्राह्मणास्तदा। वारयन् भवशर्माख्यः सङ्गमामेवमब्रवीत्॥१४८।
सप्तम लम्बक ६३
सप्तम लम्बक ६३ हृदय को अनेक प्रकार से आश्वासन देने पर और भगवान् का ध्यान करने के कारण मैं मरा नहीं ॥१३४॥ जबतक तुमने मुझे उस मिट्टी के ढेर से नहीं निकाला तबतक मुझे भूख और प्यास नहीं लगी ॥१३५॥ ज्ञान प्राप्त कर लेने पर भी मुझ में अभी तक ऐसी शक्ति नहीं आई कि मैं उस बानर-योनि से छुटकारा पाऊँ ॥१३६॥ जब कोई योगिनी उसके मन्त्र द्वारा मेरे गले के डोरे को खोलेगी तभी मैं मनुष्य बन जाऊँगा ॥१३७॥ यही मेरी कहानी है। मित्र ! अब तू बता कि इस अगम्य वन में कैसे आया ? ॥१३८॥ इस प्रकार, बानर-रूपी सोमस्वामी नामक ब्राह्मण से कहा गया निश्चयदत्त उसने किए अपना वृत्तान्त कहने लगा—॥१३९॥ कि कैसे वह विद्याधरी अनुरागपरा के कारण उज्जैन से यहाँ तक चला आया। और द्यूत से जीती हुई—वश की हुई—यक्षिणी के द्वारा रात में कैसे यहाँ पहुँचाया गया— इत्यादि सब वृत्तान्त उसने बन्दर से कहा ॥१४०॥ उसके आश्चर्य-भरे समाचार को सुनकर बन्दर बना हुआ बुद्धिमान् सोमस्वामी उससे बोला—॥१४१॥ 'तुमने भी मेरे ही समान स्त्री के पीछे कष्ट भोगा है किन्तु याद रखो किसी की स्त्री और श्री (लक्ष्मी) कभी स्थिर नहीं रही। सन्ध्या के समान क्षणिक राग (प्रेम) वाली होती हैं। नदी के समान इनका हृदय कुटिल (ऊँचा-नीचा) रहता है और नागिन की तरह ये अविश्वसनीय तथा बिजली की तरह चंचल होती हैं ॥१४२-१४३॥ इसलिए, वह अनुरागपरा विद्याधरी तुम्हारे ऊपर आसक्त होकर भी किसी विद्याधर जाति के कामी को पाकर तुम मनुष्य से विरक्त हो जायगी ॥१४४॥ इसलिए, तुम स्त्री के लिए यह परिणाम-नीरस व्यर्थ प्रयत्न मत करो। हे मित्र ! तुम विद्याधरों की पुण्डरीकवती नगरी में न जाओ। यक्षिणी के कन्धे पर चढ़कर अपनी उज्जयिनी नगरी लौट जाओ ॥१४५-१४६॥ हे मित्र ! मेरी बात मानो। मैंने भी पहले अपने मित्र की बात नहीं मानी इसीलिए अब पश्चात्ताप कर रहा हूँ ॥१४७॥ जब मैं बन्धुदत्ता में अनुरक्त था तब मेरे एक परम स्नेही ब्राह्मण भवशर्मा ने मुझे इसी प्रकार रोका और कहा था—॥१४८॥
६४ कथासरित्सागर
६४ कथासरित्सागर स्त्रियाः सखे वशं मा गाः स्त्रीचित्तं ह्यतिदुर्गमम्। तथा च मम यद्वृत्तं तदिदं वच्मि ते शृणु ॥१४९॥ वाराणस्यामिहैवासीत्तरुणी रूपशालिनी। ब्राह्मणी सोमदा नाम चपला गुप्तयोगिनी ॥१५०॥ तया च सह मे दैवात् समभूत्सङ्गमो रहः। तत्सङ्गमक्रमात्तस्यां मम प्रीतिरवर्धत ॥१५१॥ एकदा तामहं स्वैरमीर्ष्याकोपादताडयम् । तन्नासहिष्ट सा क्रूरा कोपं प्रच्छाद्य तत्क्षणम् ॥१५२॥ अन्येद्युः प्रणयक्रीडाव्याजाच्च मम सूत्रकम्। गले बद्धावहं ध्वान्तस्तत्क्षणं बलवोऽभवम् ॥१५३॥ ततोऽहं बलदीभूतस्तया दान्तोष्ट्रजीविनः। एकस्य पुंसो विक्रीतो गृहीताभीष्टमूल्यया ॥१५४॥ समारोपितभारं मां क्लिश्यमानमवेक्षत। बन्धमोचनिका नाम योगिन्यथ कृपान्विता ॥१५५॥ सा ज्ञानतः सोमदया विदित्वा मां पशूकृतम्। मुमोच कण्ठात् सूत्रं मे मद्गोस्वामिन्यपश्यति ॥१५६॥ ततोऽहं मानुषीभूतः स च क्षिप्राद्विलोक्यमाम्। पलायितं मां मन्वानो मत्स्वामी प्राभ्रमद्दिशः ॥१५७॥ अहं च बन्धमोचिन्या तया सह ततो व्रजन्। दैवादागतया दूराद्दृष्टः सोमदया तया ॥१५८॥ सा क्रोधेन ज्वलन्ती तां ज्ञानिनीं बन्धमोचिनीम्। अवादीत्किमय पापस्तिर्यक्त्वान्मोचितस्त्वया ॥१५९॥ धिग्प्राप्स्यसि दुराचारे फलमस्य कुकर्मणः। प्रातस्त्वां निहनिष्यामि सहितां पाप्मनामुना ॥१६०॥ इत्युक्त्वैव गतायां च तस्यां सा सिद्धयोगिनी। तत्प्रतीघातहेतोर्मामवाचद्वन्धमोचिनी ॥१६१॥ हन्तुं मां कृष्णतुरगीरूपेणाभ्युपेष्यति। मया च घोषबडवारूपमत्राभियिष्यते ॥१६२॥ ततो युद्धे प्रवृत्ते नौ पृष्ठतः खड्गपाणिना। सोमदायां प्रहर्त्तव्यं त्वयास्यामप्रमादिना ॥१६३॥
सप्तम लम्बक ९५
सप्तम लम्बक ९५ 'मित्र ! स्त्री के वश मत हो। स्त्रियोंका हृदय अत्यन्त दुर्गम होता है। मेरे साथ जो बीती है उसे कहता हूँ सुनो' ॥१४९॥ इसी वाराणसी नगरीमें युवती सुन्दरी चंचल और गुप्तयोगिनी सोमदा नामकी ब्राह्मणी रहती थी॥१५०॥ दैव-योग से मेरे साथ उसका एकान्त समागम हो गया। उसी क्रम से मेरा उसका प्रेम बढ़ा ॥१५१॥ एक बार ईर्ष्या से क्रोध करके मैंने उसे मारा। उस दुष्टा ने क्रोध को छिपाकर उस समय उसे सहन कर लिया ॥१५२॥ दूसरे दिन उसने प्रेम-क्रीडा के बहाने मेरे गले में सूत बाँध दिया और उसी समय मैं बधिया बैल बन गया ॥१५३॥ बैल बने हुए उसने मुझे बधिया ऊँटों का व्यापार करनेवाले एक व्यापारी के हाथ इच्छित मूल्य लेकर बेच दिया ॥१५४॥ बोझ लदे हुए और तंग होते हुए मुझे देखकर बन्धमोचनिका नाम की योगिनी को दया आ गई ॥१५५॥ उसने अपनी विद्या के प्रभाव से मुझे सोमदा द्वारा पशु बनवाया हुआ समझकर मेरे मालिक की अनुपस्थिति में मेरे गले का डोरा खोल दिया ॥१५६॥ तब मैं मनुष्य हो गया। मेरा मालिक मुझे (बैल को) भागा हुआ जानकर चारों ओर ढूँढ़ता हुआ घूमने लगा ॥१५७॥ मुझे बन्धमोचनिका के साथ घूमते हुए दैवयोग से उस सोमदा ने दूर से देख लिया ॥१५८॥ क्रोध से जलती हुई सोमदा ने मोचनिका योगिनी से कहा कि तूने इस पापी को पशु-योनि से क्यों मुक्त कर दिया ? तुझे धिक्कार है! इस कुकर्म का फल तुझे कल प्रातःकाल मारकर चखाऊँगी ॥१५९ १६०॥ ऐसा कहकर सोमदा के चले जाने पर वह सिद्ध योगिनी बन्धमोचनिका मुझसे बोली— यह सोमदा काली घोड़ी का रूप धारण करके मुझे मारने के लिए आयेगी और मैं उस समय श्वेत घोड़ी के रूप में रहूँगी ॥१६१ १६२॥ हम दोनों का युद्ध प्रारम्भ होने पर तुम तलवार लिये हुए पीछे रहकर सावधानी से सोमदा पर प्रहार करना ॥१६३॥ ९
एवमेतां हनिष्यावस्तत्प्रातस्तस्य गृहे मम। आगच्छेरित्युदित्वा सा गृहं मे स्वमदर्शयत् ॥१६४॥ तत्र तस्यां प्रविष्टायामहं निजगृहानगाम्। अनुभूताद्भुतानेकश्च मामुत्रैव जननि ॥१६५॥ प्रात कृपाणपाणिश्च गतवानस्मि तद्गृहम्। अथामात् सोमदा सात्र कृष्णाश्वापषधारिणी ॥१६६॥ सापि शोनहयारूपमकराद् बन्धमोचिनी। खुरदन्तप्रहारैश्च ततो युद्धमभूत्तयो ॥१६७॥ मया प्रवृत्तनिस्त्रिंशप्रहारा क्षुद्रशाकिनी। निहता बन्धमोचिन्या सया, मा सोमदा तत ॥१६८॥ मञ्चाहं निर्भयीभूतस्तीर्णतिर्मन्त्वधुर्गतिः। न कुस्त्रीसङ्गमं भूयो मनसा समचिन्तयम् ॥१६९॥ चापलं साहसिकता शाकिनीछम्बरादय । दोषाः स्त्रीणां भय प्रायो लोकत्रयमयावहाः ॥१७०॥ तच्छाकिनीसमीं बन्धदत्तां किमनुधावसि । स्नेहो यस्या म पत्यौ स्वे तस्यास्तु खम्पसो कुत ॥१७१॥ एवमुक्तोऽप्यहं तेन मित्रेण भवशर्मणा। नाकार्षं वचनं तस्य प्राप्तोऽस्मीमां गति तत ॥१७२॥ अतस्त्वां वच्मि मा कार्षीरनुरागपरां प्रति। क्लेशं सा हि स्वजातीये प्राप्ते त्वां त्यक्ष्यति ध्रुवम् ॥१७३॥ मुञ्चीष पुष्पं पुष्यं स्त्री वाञ्छति नव नवम्। अतोऽनुतापो भविता ममेव भवत सखे ॥१७४॥ इत्येतत्कपिरूपस्यसोमस्वामिवचो हृदि। तस्य निश्चयदत्तस्य नाविशद्रागनिर्मरे ॥१७५॥ उवाच स कपिं स हि न सा व्यभिचरेन्मयि। विद्याधराधिपकुले शुद्धे जाता ह्यसाविति ॥१७६॥ एव तयोराल्पतो सम्ध्यारक्तोऽस्तमूधरम्। ययौ निश्चयवत्तस्य प्रियेप्सुरिव भास्करः ॥१७७॥ अथागतायां रजनाबप्रवृत्यामियाययो । सा शृङ्गोत्पादिनी तस्य निकट तत्र यक्षिणी ॥१७८॥
इस प्रकार, हम दोनों इसे प्रातःकाल मार डालेंगे। तुम सबेरे ही मेरे घर पर आ जाना। ऐसा कहकर उसने उसे अपना घर दिखा दिया। उसके घर चले जाने पर मैं अपने घर लौट आया। मैं इसी क्रम में अनेक अद्भुत जन्मों का अनुभव कर चुका था ॥१६४-१६५॥ सबेरे ही तलवार हाथ में लेकर बन्धमोचनिका के घर गया और सोमदा काली घोड़ी के रूप में वहाँ आई ॥१६६॥ उस बन्धमोचनिका ने भी लाल घोड़ी का रूप धारण किया और खुरों एवं दांतों के प्रहार से उन दोनों का युद्ध प्रारम्भ हुआ। अवसर पाकर मेरे द्वारा प्रहार करने पर वह नीच डाग्न (सोमदा) बन्धमोचनिका से मार दी गई ॥१६७-१६८॥ तदनन्तर पशुता की दुर्व्यथा से छूटे हुए मैंने यह निश्चय किया कि अब मन से भी परस्त्री का संसर्ग न करूँगा ॥१६९॥ चंचलता, साहस और डायनपन—स्त्रियों के ये तीन दोष तीनों लोकों को भय देनेवाले हैं। इसलिए, डायन की सहेली बन्धुदत्ता का पीछा क्यों कर रहे हो, जिसका अपने पति के प्रति प्रेम नहीं है, वह तुमसे क्या स्नेह करेगी ? ॥१७०-१७१॥ मित्र भवशर्मा से इस प्रकार कहे जाने पर भी मैंने उसकी बात नहीं मानी, उसीसे इस गति को पहुँचा हूँ ॥१७२॥ इसीलिए, तुमसे भी कहता हूँ कि तुम भी अनुरागपरा से प्रेम न करो। वह किसी सजातीय विद्याधर के मिलने पर तुम्हें छोड़ देगी ॥१७३॥ जैसे मधुकरी नये-नये फूलों को चाहती है, उसी प्रकार स्त्री नये-नये यार को चाहती है। अतः हे मित्र ! तुम्हें भी मेरे ही समान पश्चात्ताप करना पड़ेगा ॥१७४॥ सोमस्वामी के प्रेम से भरे ये वचन निश्चयदत्त के हृदय में स्थान न पा सके ॥१७५॥ वह बोला—अनुरागपरा मेरे साथ कभी धोखा न करेगी, वह विशुद्ध विद्याधरी-वंश में जन्मी है ॥१७६॥ इस प्रकार, उन दोनों के वार्तालाप करते-करते सूर्य मानों निश्चयदत्त का प्रिय कार्य करने के लिए अस्ताचल को चल पड़ा। तदनन्तर रात आने पर अवदूती के समान वह शृंगोत्पादिनी यक्षिणी उसके समीप आई ॥१७७-१७८॥
२८ कथासरित्सागर
[Header] २८ कथासरित्सागर
ययौ निश्चयदस्तत्स्कन्धारूढ प्रियां प्रति। प्रयातुमापृच्छ्य कपिं स्मर्तव्योऽस्मीति वादिनम् ॥ १७९ ॥ निशीथे च हिमाद्रौ तामनुरागपरा पितुः। पुरीं विद्याधरपतेः प्राप्तवान् पुष्करावतीम् ॥ १८० ॥ तावत्प्रभावतो बुद्ध्वा तदस्यागमनं सा। ततो नगर्या निरगादनुरागपरा बहिः ॥ १८१ ॥ इयमायाति ते कान्ता निशि नेत्रोत्सवप्रदा। इन्दुमूर्तिर्द्वितीयेव तदिदानीं व्रजाम्यहम् ॥ १८२ ॥ इत्युक्त्वा दर्शयित्वा तामसावादवतारितम्। नत्वा निश्चयदत्तं तमथ सा यक्षिणी ययौ ॥ १८३ ॥ ततः सापि चिरोत्सुक्यसंरम्भाश्लिङ्गनादिभिः। उपगम्याभ्यनन्दत्तमनुरागपरा प्रियम् ॥ १८४ ॥ सोऽप्याश्लिष्य बहुक्लेशलब्धतत्संगमोत्सवः। अवर्तमानः स्वे देहे तनुं तस्या इवाविशत् ॥ १८५ ॥ तेन गान्धर्वविधिना भार्या भूत्वाथ तस्य सा। अनुरागपरा सद्यो विद्यया निर्ममे पुरम् ॥ १८६ ॥ तस्मिन्निश्चयदत्तोऽसौ बाह्ये तस्थौ तया सह। तद्विद्याच्छन्नदृष्टिभ्यां तत्पितृभ्यामतरिकतः ॥ १८७ ॥ पृष्टस्तांस्तावृथांस्तस्यै मार्गक्लेशाञ्छशंस यत्। तेन सा बहु मेने तं भोगैश्चेष्टैरुपाचरत् ॥ १८८ ॥ अथ तन्मर्कटीभूतसोमस्वामिकथाऽमृतम्। सोऽत्र निश्चयदत्तोऽस्यै विद्याधर्यै न्यवेदयत् ॥ १८९ ॥ जगाद चैतन्मित्रं मे त्वत्प्रयत्नेन केनचित्। तिर्यक्त्वान्नहि मुच्येत तत्प्रिये सुकृतं भवेत् ॥ १९० ॥ इत्युक्ता तेन सावोचदनुरागपरापि तम्। योगिन्या मन्त्रमार्गोऽयं नास्माकं विषयः पुनः ॥ १९१ ॥ तथापि साधयिष्यामि प्रियमेतदहं तव। अभ्यर्च्य मद्ररूपाख्यां वयस्यां सिद्धयोगिनीम् ॥ १९२ ॥ तच्छ्रुत्वा स वणिक्पुत्रो हृष्टस्तामवदत् प्रियाम्। तर्हि तं पश्य मन्मित्रमेहि यावत्त्वदन्तिकम् ॥ १९३ ॥
सप्तम लम्बक ६९
सप्तम लम्बक ६९ 'मुझे याद रखना' ऐसा कहते हुए बन्दर से पूछकर निश्चयदत्त यक्षिणी के कन्धे पर चढ़कर अपनी प्रेयसी के पास चला ॥१७९॥ और, आधी रात के समय हिमाचल पर स्थित अनुरागपरा के पिता की नगरी पुष्करावती में पहुँचा ॥१८०॥ इधर विद्याधरी अनुरागपरा ने भी अपनी विद्या के प्रभाव से निश्चयदत्त का आना जान लिया और उसे लाने के लिए वह अपने पिता की नगरी से बाहर निकल आई ॥१८१॥ दूसरे चन्द्रमा के समान यह तुम्हारे नेत्रों को आनन्द देनेवाली तुम्हारी सुन्दरी प्यारी आ रही है। तो अब मैं जाती हूँ इस प्रकार कहती हुई यक्षिणी निश्चयदत्त को कन्धे से उतारकर और उसे नमस्कार करके चली गई ॥१८२-१८३॥ तब उस विद्याधरी ने भी चिरकालीन उत्कण्ठा से भरकर आलिंगन चुम्बन आदि से निश्चयदत्त का भलीभाँति अभिनन्दन किया ॥१८४॥ अत्यन्त क्लेश के अनन्तर प्राप्त होनेवाले समागम से आनन्दित निश्चयदत्त अनुरागपरा का आलिंगन करते हुए उसके शरीर में प्रवेश करके मानो अपने शरीर में की सुध-बुध खो दी ॥१८५॥ अनुरागपरा उसके साथ गान्धर्व-विधिसे विवाह करके अपने विद्या-बल से नया नगर बनाकर उसी में उसके साथ रहने लगी ॥१८६॥ उसी की विद्या के प्रभाव से उसके माता-पिता की दृष्टि से छिपाया हुआ निश्चयदत्त उसके साथ बाहरी नगर में रहने लगा ॥१८७॥ उसके पूछने पर उसने मार्ग में प्राप्त होनेवाले कष्टों का भी वर्णन उससे किया इस कारण वह उससे अधिक प्यार करने लगी और विविध भोगों से उसे प्रसन्न करने लगी ॥१८८॥ तदनन्तर निश्चयदत्त ने बन्दर बने हुए सोमस्वामी की आश्चर्य-जनक कथा उसे सुनाई और कहा कि यदि तुम्हारे प्रयत्न से वह पशु-योनि से छूट जाय तो तुम्हें बहुत पुण्य होगा ॥१८९-१९०॥ ऐसा कहने पर अनुरागपरा उससे बोली—'यह योगिनियों की मन्त्र-सिद्धियों का काम है। हमारा विषय नहीं है ॥१९१॥ तो भी मैं तुम्हारे इस प्रिय कार्य को अपनी सखी मद्ररूपा नाम की सिद्ध योगिनी से प्रार्थना करके, सिद्ध करूँगी' ॥१९२॥ यह सुनकर प्रसन्न वैश्य-पुत्र बोला—'तुम मेरे उस मित्र को देखो। आओ उसके पास चलें' ॥१९३॥
७० | कथासरित्सागर
७० | कथासरित्सागर
तथेत्युक्ते तयान्येद्युस्तदुत्सङ्गस्थितश्च सः। व्योम्ना निश्चयदत्तोऽगात्सख्युरस्तस्याथ वनम्॥१९४॥ सत्र तं सुहृदं दृष्ट्वा कपिरूपमुपेत्य सः। प्रणमत्प्रियया साकमपृच्छत्कुशलं तदा॥१९५॥ अद्य मे कुशलं यत्त्वमनुरागपरायुतः। दृष्टो मयेति सोऽप्युक्त्वा सोमस्वामिकपिः किल॥१९६॥ तमभ्यनन्दत्प्रवदौ तत्प्रियायै सभाधिपम्। तत सर्वेऽप्युपाविशंस्तत्र रम्ये शिलातले॥१९७॥ धत्तूश्च सत्कथालाप ततस्तस्य कपेः कृते। [L10: आदौ निश्चयदत्तेन चिन्तितं कान्तया सह॥१९८॥ ततस्तं कपिमापृच्छ्य प्रेयसीसदनं च तत्। ययौ निश्चयदत्तो द्वामुत्पत्याङ्के धृतस्तया॥१९९॥ अन्येद्युस्तामवादीच्च सोऽनुरागपरो पुनः। एहि तस्यान्तिकं सख्युः क्षणं यावत् कपेरिति॥२००॥ सत सापि तमाह स्म त्वमेवाद्य व्रज स्वयम्। गृहाणोत्पतनीं विद्यां मत्तोऽवतरणीं तथा॥२०१॥ इत्युक्त्व स तदादाय तद्विद्याद्वितयं ततः। व्योम्ना निश्चयवत्तोऽगात्सख्युरस्तस्यान्तिकं कपेः॥२०२॥ तत्र यावत्स कुरुत तेन साकं चिरं कथाः। सानुरागपरा तावदुद्यानं निर्ययौ गृहात्॥२०३॥ तत्र तस्यां निष्पन्नायां विद्याधरकुमारकः। कोऽप्यांजगाम नभसा परिभ्राम्य यदृच्छया॥२०४॥ स दृष्ट्वैव स्मरावेशविवशस्तामुपाययौ। विद्याधरी स तां बुद्ध्वा विद्यया मर्त्यभर्तृकाम्॥२०५॥ साप्युपतं समालोक्य सुभगं विनतानना। कस्त्वं किमागतोऽसीति शनैः पप्रच्छ कौतुकात्॥२०६॥ ततः स प्रत्यबोचत्तां स्वविद्याभानशासिनम्। विद्धि विद्याधरं मुग्धे माम्ना मां राजभञ्जनम्॥२०७॥ सोऽहं सन्दर्शनादेव सहसा हरिणेक्षणे। मनोभुवा वशीकृत्य तुभ्यमेव समर्पितः॥२०८॥
सप्तम लम्बक ७१
सप्तम लम्बक ७१ उसके स्वीकार करने पर दूसरे दिन निश्चयदत्त विद्याधरी की गोद में बैठकर उस बन्दर वाले वन में गया ॥१९४॥ वन में बन्दर-रूप उस मित्र को प्रिया के साथ प्रणाम करके निश्चयदत्त ने उसका कुशल- क्षेमंक पूछा ॥१९५॥ बन्दर ने कहा—'आज मेरा कुशल ही है कि तू अनुरागपरा के साथ मुझसे मिला' ऐसा कहकर बन्दर रूप सोमस्वामी ने निश्चयदत्त को बधाई दी और उसकी पत्नी को आशीर्वाद दिया। तदनन्तर वे सब एक पत्थर की सुन्दर चट्टान पर बैठ गये ॥१९६-१९७॥ वहीं बैठकर वे उस बन्दर के लिए चर्चा करने लगे जैसा कि निश्चयदत्त ने पहले ही अपनी पत्नी से कहा था ॥१९८॥ तदनन्तर अपनी प्रेयसी की गोद में बैठा हुआ निश्चयदत्त बन्दर से आज्ञा लेकर अपनी पत्नी के नवनिर्मित भवन में लौट गया ॥१९९॥ दूसरे दिन निश्चयदत्त ने फिर कहा— आओ उस बन्दर-मित्र के पास आज फिर चलें। तब अनुरागपरा बोली—'आज तुम स्वयं जाओ। मुझ से उड़ने और उतरने की विद्या ले लो ॥२००-२०१॥ उसके ऐसा कहने पर वह निश्चयदत्त विद्याधरी से दोनों विद्याएँ प्राप्त करके आकाश में उड़कर उस मित्र बन्दर के पास आया ॥२०२॥ इधर जब वह अपने मित्र के साथ बैठकर गप-शप कर रहा था उधर अनुरागपरा घर से निकल बाग में आई। जब वह बाग में बैठी थी तब उसपर आकाश से उड़ता हुआ एक विद्याधर कुमार घूमता हुआ उधर आ निकला। वहाँ पर अनुरागपरा को देखकर काम के आवेश में आ गया और उसे मनुष्य-पतिवाली विद्याधरी जानकर उसके समीप आया ॥२०३-२०५॥ उस विद्याधरी ने भी उस सुन्दर विद्याधर-युवक को पास आये देखकर नीचे मुँह किये हुए कौतुक से पूछा—'तू कौन है और क्यों आया है' ॥२०६॥ तब वह बोला— हे सुन्दरी ! मुझे अपनी विद्याओं के ज्ञानवाला राजभंजन नामक विद्याधर समझो ॥२०७॥ मृगनयनी ! यह मैं तुझे देखकर कामदेव द्वारा वश में करके तुझको समर्पित कर दिया गया हूँ ॥२०८॥
७२ कथासरित्सागर
७२ कथासरित्सागर तदलं देवि सेवित्वा मर्त्यं धरणिगोचरम्। पिता वेत्ति न यावत्ते तावदुत्पत्य भजस्व माम्॥२०९॥ इति तस्मिन्ब्रुवाणे सा कटाक्षार्धविलोकिती। अचिन्तयदयं युक्तो ममेति चपलाशया॥२१०॥ ततो लब्धाशयं चक्रे भार्या तेनैव तम सा। अपेक्षत द्वयोरेकचित्त्ये किं रहसि स्मरः॥२११॥ अथ विद्याधरे तस्मिन् सम्प्रत्यपसुते ततः। आगात्निश्चयवत्तोऽत्र सोमस्वामिसमीपतः॥२१२॥ आगतस्य च सा चक्रे विरक्तालिङ्गनादिकम्। अनुरागपरा तस्य व्यपदिश्य शिरोरुजम्॥२१३॥ स तु तद्व्याजमविदन्नृजुः स्नेहविमोहितः। अस्वास्थ्यमेव मन्वास्या युक्तस्तदनमद्दिनम्॥२१४॥ प्रातश्च दुर्मना भूयस्तं कपिं सुहृदं प्रति। स सोमस्वामिन प्रायान्नभसा विद्ययोर्बलात्॥२१५॥ यात तस्मिन्नुपागात्तां सानुरागपरा पुनः। कामी विद्याधरो रात्रिक्लान्तोऽनिद्रस्तया विना॥२१६॥ निशाविरहसोत्कण्ठः कण्ठे तामवलम्ब्य च। सुरतान्तपरिश्रान्तो निद्राक्रान्तो बभूव सः॥२१७॥ साप्यङ्कसुप्तं प्रच्छाद्य प्रियं विद्याबलेन तम्। रात्रिजागरणाद्निद्रामनुरागपरा ययौ॥२१८॥ तावन्निश्चयवत्तोऽपि प्राप तस्यान्तिकं नृप। सोऽपि पप्रच्छ च कृत्वा स्वागतं वानरः सुहृत्॥२१९॥ दुर्मनस्कमिवाद्य त्वां किं पश्याम्युच्यतामिति। ततो निश्चयवत्तोऽपि स तं वानरमब्रवीत्॥२२०॥ अनुरागपराद्यैषामस्वस्था मित्र वर्तते। तेनास्मि दुःखितः सा हि प्राणेभ्योऽपि प्रिया मम॥२२१॥
सप्तम लम्बक ७३
सप्तम लम्बक ७३ इसलिए, हे देवि ! जब तुम पृथिवी पर रहनेवाले मानव का तबतक परित्याग कर दो जबतक तुम्हारे पिता को मालूम नहीं होता और अपने समानजातीय मेरा वरण कर लो' ॥२१०॥ उसके ऐसा कहने पर कटाक्ष से देखती हुई वह चंचलहृदया विद्याधरी सोचने लगी कि 'यह मेरे लिए उपयुक्त पति है। ॥२११॥ तब राजमञ्जन ने उसके हृदय के अभिप्राय को जानकर उसे भार्या बना लिया । एकान्त में दोनों (प्रेमी और प्रेमिका) के एकत्रित होने पर कामदेव किसकी परवाह करता है ? ॥२१२॥ तदनन्तर, विद्याधर के चले जाने पर निश्चयदत्त सोमस्वामी से मिलकर आ गया ॥२१३॥ उसके लौट आनेपर उस विरक्ता अनुरागपरा ने सिरदर्द का बहाना करके उससे आलिंगन आदि द्वारा प्रेम-प्रदर्शन नहीं किया ॥२१४॥ उस सरलहृदय प्रेमी निश्चयदत्त ने उसका बहाना न समझकर वैसे ही वह दिन व्यतीत किया और प्रातःकाल दुःखितचित्त होकर विद्या के बल से पुनः उस बन्दर के समीप गया ॥२१४-२१५॥ उसके चले जानेपर, अनुरागपरा के बिना रात-भर का जगा हुआ वह कामी विद्याधर फिर उसके पास आया। रात के जागरण से उत्कण्ठित उसे गल से लगाकर वह विद्याधर काम क्रीडा से थककर वहीं सो गया ॥२१६-२१७॥ वह अनुरागपरा भी रात-भर जगने के कारण गाढ म सोये उस प्यारे का विद्याबल से छिड़ाकर आ गई॥ २१८॥ इधर निश्चयदत्त भी बन्दर के पास पहुँचा । बन्दर ने भी उसका स्वागत करके समाचार पूछा—॥२१९॥ 'आज तुम खिन्नमन मालूम हो रहे हो ? क्या कारण है बताओ। तब निश्चयदत्त उस बन्दर से बोला—'मित्र ! अनुरागपरा अस्वस्थ हो गई है। उसी से दुःखी हूँ। वह मेरे प्राणों से भी प्यारी है ॥२२०-२२१॥ १०
७४ कथासरित्सागर
७४ कथासरित्सागर इत्युक्तस्तेन स ज्ञानी मर्कटस्समभाषत । गच्छ सुप्तामिदानीं तां स्थितां कृत्वाऽङ्गरुहसिनीम् ॥२२२॥ तद्धस्तविद्यया व्योम्ना तामानय मदन्तिकम् । यावन्महद्विहाटथ्यं दर्शयाम्यधुनैव च ॥२२३॥ तच्छ्रुत्वा खेन गत्वैव सोऽनुरागपरो ततः। दृष्ट्वा निश्चयदत्तस्तां सुप्तामङ्केऽग्रहील्लघु ॥२२४॥ न तु विद्याधरं तस्या नाङ्गे लग्नं ददर्श सः । सुप्तं विद्याधसेनाथाववृश्यं विहितं तया ॥२२५॥ उत्पत्य चान्तरिक्षं तामनुरागपरां क्षणात् । आनिनाय कपेस्तस्य स सोऽगत्स्वामिनोऽन्तिकम् ॥२२६॥ स कपिर्विद्ययुक्तेस्मै तथा योगमुपादिदत्। येन विद्याधरं तस्याः कण्ठे लग्नं ददर्श सः ॥२२७॥ दृष्ट्वा च हा भिगोतस्स्मीति तं वादिनं कपिः। स एव तत्त्वदर्शी तच्चेष्टावृत्तमबोधयत् ॥२२८॥ क्रुद्धे निश्चयदत्तेऽथ तस्मिन् विद्याधरोऽत्र सः । प्रबुद्धस्तत्प्रियाकामी समुत्पत्य तिरोबभे ॥२२९॥ सापि प्रबुद्धा तत्कालमनुरागपरात्मनः । रहस्यमेदं तं दृष्ट्वा ह्रिया तस्याप्यधोमुखी ॥२३०॥ ततो निश्चयदत्तस्तामुवाचोदश्रुलोचनः । विश्वस्तोऽहं कथं पापे त्वयैव बत वञ्चितः ॥२३१॥ अत्यन्तसञ्छन्नस्येह पारवश्य निबन्धने । कामं विज्ञायते युक्तिर्न स्त्रीचित्तस्य काचन ॥२३२॥ इति ब्रुवति तस्मिन्सामुत्तरा रुदती शनैः । अनुरागपरोत्पत्य विप्रं धाम निजं ययौ ॥२३३॥ ततो निश्चयदत्तस्तं सुहृन्मर्कटमब्रवीत् । एतां यन्म्यभावस्त्वं वारितोऽपि ममा प्रियाम् ॥२३४॥ त्यक्त्व तीव्ररागान्धैः पश्चाद्यदनुतप्यते । कः हि सम्पत्सु चपलास्वाश्वासो वनितासु च ॥२३५॥
सप्तम लम्बक ७५
सप्तम लम्बक ७५ उससे इसप्रकार कहा गया वह ज्ञानी बन्दर बोला—'जाओ उसकी दी हुई विद्या के प्रभाव से सोई हुई उसे गोद में उठाकर ले आओ। तब मैं तुम एक महान् आश्चर्य दिखाऊँगा ॥२२२ २२३॥ यह सुनकर निश्चयदत्त आकाश-मार्गस वहाँ गया और सोती हुई अनुरागपरा को धीरे से गोद में उठाकर सोमस्वामी बन्दर के समीप ले आया। पहले शाप और फिर विद्याधरी के द्वारा विद्या के बल से अदृश्य कर दिये गये उस विद्याधर का विद्याधरी के शरीर से लग रहने पर भी निश्चयदत्त ने नही देखा ॥२२४-२२६॥ उसके बाद उस दिव्य दृष्टिवाले बन्दर ने निश्चयदत्त को ऐसा योग बताया जिससे निश्चयदत्त ने विद्याधरी के गाल से चिपक हुए विद्याधर को देख लिया। देखते ही ओह ! यह क्या ? —ऐसा कहते हुए उस तत्त्वदर्शी बानर ने सब यथार्थ बात बता दी ॥२२७ २२८॥ यह दृश्य देखकर निश्चयदत्त के क्रुद्ध होने पर वह विद्याधर आकाश में उड़ गया। और, वह अनुरागपरा भी निद्रा से जागकर अपने रहस्य का भण्डाफोड़ देखकर लज्जा से नीचा मुंह किये बैठ गई ॥२२९ २३०॥ तब रोते हुए निश्चयदत्त ने कहा—हे पापिन ! मेरे ऊपर विश्वास करनेवाले मुझे तुमने क्यों ठग लिया? ॥२३१॥ अत्यन्त चंचल पार का बाँधने की युक्ति है। परन्तु चंचल स्त्री-चित्त को जानने या बाँधने की कोई शक्ति नही ॥२३२॥ उसके ऐसा कहने पर वह अनुरागपरा उत्तर दिये बिना ही धीरे-धीरे रोती हुई आकाश में उड़कर अपने घर चली गई ॥२३३॥ तब वह बानर सोमस्वामी निश्चयदत्त से बोला—मेरे कहने पर भी जो तुम इस स्त्री के पीछे दौड़ रहे थे, उसी तीव्र प्रमात्ति का यह फल है कि आज दुःख पा रहे हो। चंचल धन और स्त्री का क्या विश्वास ? ॥२३४ २३५॥
७६ कथासरित्सागर
७६ कथासरित्सागर तदलं परितापेन तवदानीं शमं कुरु । भवितव्यं हि धात्रापि न शक्यमतिवर्तितुम् ॥२३६॥ इति तस्मात्कपेः श्रुत्वा शाकमोहं विहाय तम् । ययौ निश्चयवसोऽत्र विरक्तः शरणं शिवम् ॥२३७॥ अथ तत्र वने सुहृवा कपिना सह तिष्ठतस्ततो निकटम् । तस्याजगाम दैवात्तपस्विनी मोक्षदा नाम ॥२३८॥ सा तं क्रमेण दृष्ट्वा प्रणतं पप्रच्छ मानुषस्य सतः । चित्रं कथमिह जातो मित्रं ते मर्कटोऽयमिति ॥२३९॥ यतः स्वं वृत्तान्तं तदनु च स मित्रस्य चरितं समाचख्यो तस्यै कृपणमथ तामेवमवदत् । प्रयागं मग्नं वा यदि भगवती वेत्ति तदिमं परिभ्रंशात् सन्मित्रं सुहृदमधुना मोचयतु मे ॥२४०॥ श्रुत्वा सा तस्य वाचं कपेस्तत् सूत्रं कण्ठामन्त्रयुक्त्या मुमोच । सोऽथ त्यक्त्वा मर्कटीमाकृतिं तां सामस्वामी पूर्ववन्मानुषोऽभूत् ॥२४१॥ तस्यां ततश्च तद्विद्यां तिरोहितायां दिव्यप्रभावभूमिं भूरि तपो विधाय । प्राप्य तत्र शिवं निश्चयसमोम- स्यामसिद्धा प्रययतुः परमां गतिं तौ ॥२४२॥ एवं निजगुणगण्या रमना विचर- पद्यते विषयदोषपरिग्रहवशा । साध्वी तु रागिणी तासु कुरु विरक्तिं यासां फलं न तनुतापमवाप्नुवन्ति ॥२४३॥ इत्येतां नरवाहनदत्तो रुचिरास्य गोमुखस्य मुखात् । चिन्तामपश्य कथां श्रुत्वैव गताधमार्गेण ॥ २४४ ॥ इति कथासरित्सागरे मदनमञ्चुकालम्बके षष्ठस्तरङ्गः समाप्तः । शुभं भूयात् ।
सप्तम लम्बक ४७
सप्तम लम्बक ४७ अब व्यर्थ चिन्ता और शोक मत करो। जो होना है, उसे ब्रह्मा भी नहीं बदल सकते' ॥२३६॥ वानर ने यह सुनकर और शोक एवं मोह को छोड़कर निश्चयदत्त विरक्त भाव से शिव की शरण में चला गया ॥२३७॥ तदनन्तर वन में उस बन्दर के साथ रहते हुए निश्चयदत्त के पास एक बार दैव योग से मायंदा नाम की तपस्विनी आई। उसने प्रणाम करते हुए निश्चयदत्त से पूछा कि तुम्हारे मनुष्य होते हुए भी यह तुम्हारा मित्र बानर कैसे हुआ यह आश्चर्य है! ॥२३८-२३९॥ तब निश्चयदत्त ने पहले अपना और बाद बानर का समाचार सुनाकर उस तपस्विनी से दीनतापूर्वक कहा— यदि आप कोई प्रयोग या मन्त्र जानती हैं तो मेरे मित्र को पशुता से बचाइए ॥२४०॥ निश्चयदत्त की प्रार्थना सुनकर मायंदा योगिनी ने उसे स्वीकार कर, मन्त्र की युक्ति से बन्दर के गले का डोरा खोल दिया। उसके खोलते ही सोमस्वामी बन्दर-रूप छोड़कर उसी क्षण अपने यथार्थ मनुष्य-रूप में आ गया ॥२४१॥ तदनन्तर, वह दिव्य प्रभाववाली मायंदा के बिजली के समान अन्तर्धान हो जाने पर निश्चयदत्त और सोमस्वामी दोनों उग्र तपस्या करते हुए योग-धाम को प्राप्त हुए ॥ २४२॥ इस प्रकार, संसार में चञ्चला स्त्रियाँ विपत् और वैराग्य देनेवाले अपने दुष्पापों को त्याग नहीं करतीं। पतिव्रता स्त्री भाग्यवान् विरले ही होती है जो अपने कुल को उसी प्रकार आनन्दित करती है जैसे नई चन्द्रकला आकाश को शोभित करती है॥२४३॥ इस प्रकार गोमुख के मुख से इस विचित्र कथा को सुनकर नरवाहनदत्त के साथ मन्दारवती बहुत सन्तुष्ट हुआ ॥२४४॥ महाकवि श्रीमत्सोमदेव भट्ट-विरचित कथासरित्सागर के मन्दारवती-लम्बक का तृतीय तरङ्ग समाप्त
४८ कथासरित्सागर
४८ कथासरित्सागर षट्षष्टस्तरङ्गः राज्ञो विक्रमादित्यस्य मदनमालावेश्यायाश्च कथा गोमुखीयकथातुष्टं दृष्ट्वा तत्स्पर्धया किल। नरवाहनदत्तं तं मरुभूतिरथाब्रवीत् ॥१॥ प्रायेण चपला कामं स्त्रियो नैकान्ततः पुनः। वेश्या अपि च दृश्यन्ते सत्त्वाढ्या किमुतापराः ॥२॥ तथा च देव विख्यातामिमामत्र कथां शृणु। विक्रमादित्य इत्यासीद्राजा पाटलिपुत्रकः ॥३॥ तस्याभूतामभिप्रेते मित्रे हयपतिर्नृपः। राजा गजपतिश्चोभौ बह्वश्वगजसाधनौ ॥४॥ शत्रुर्नृपतिर्भूयिषादातस्तस्य चाभवत्। मानिनो नरसिंहस्य प्रतिष्ठानेश्वरो बली ॥५॥ तं रिपुं प्रति सामर्थ्यं स मित्रबलर्गवितः। चकार विक्रमादित्यः प्रतिज्ञां रभसादिमाम् ॥६॥ तया मया विजेतव्यो राजा नरपतिर्यथा। स बन्दिमागधैर्द्वारि सेवको मे निवेद्यते ॥७॥ एवं कृतप्रतिज्ञस्ते मित्रे हयगजाधिपौ। समानीय समं ताभ्यां हस्त्यश्वक्षोभितक्षितिः ॥८॥ अभियास्तुं नरपतिं नरसिंहं प्रसह्य तम्। स ययौ विक्रमादित्यो राजास्तिरुबलान्वितः ॥९॥ प्राप्ते तस्मिन्प्रतिष्ठाननिकटं सोऽप्यवेत्य तत्। नरसिंहो नरपतिः संनद्धाग्रेस्र्यो निर्ययौ ॥१०॥ ततस्तयोरभूद्युद्धं राज्ञोर्जनितविस्मयम्। गजाश्वनं समं यत्र युध्यन्त स्म पदातयः ॥११॥ क्रमाच्च नरसिंहस्य कोटिसंख्यपदातितिभिः। भग्नं तद्विक्रमादित्यबलं नरपतेर्बलैः ॥१२॥ मग्नश्च विक्रमादित्यः पुरं पाटलिपुत्रकम्। ययौ पलाय्य तन्मित्रे स्वं स्वं देशं च जग्मतुः ॥१३॥ नरसिंहो नरपतिर्जितशत्रुनिजं पुरम्। प्रविवेश प्रतिष्ठानं बन्दिभिः स्तुतविक्रमः ॥१४॥
सप्तम लम्बक ७९
सप्तम लम्बक ७९ चतुर्थ तरङ्ग राजा विक्रमादित्य और मदनमाला वेश्या की कथा गोमुख से कही गई कथा को सुनकर प्रसन्न हुए नरवाहनदत्त को देखकर उससे मरुभूति बोला— 'स्त्रियाँ अविशङ्कत अवश्य ही चंचल (दुराचारिणी) होती हैं—यह कोई निश्चित बात नहीं है। ऐसी वेश्याएँ भी देखी जाती हैं जो सत्त्वगुणशाली (सदाचारिणी) होती हैं। दूसरी स्त्रियों की तो बात ही क्या ? ॥१-२॥ महाराज ! मैं इस विषय में एक प्रसिद्ध कथा सुनाता हूँ सुनिए—। पाटलिपुत्र नगर में विक्रमादित्य नामक राजा था। उसके दो परम प्रिय मित्र राजा थे। एक का नाम हयपति और दूसरे का गजपति था। इन दोनों राजाओं की सेना में हाथी और घोड़े प्रचुर मात्रा में थे ॥३-४॥ उस राजा विक्रम का एकमात्र शत्रु प्रतिष्ठानपुर का बलवान्-राजा नरसिंह था जो उसके वश में नहीं आया था ॥५॥ राजा विक्रम उस शत्रु के प्रति क्रोध करके और मित्र राजाओं के घोड़ों और हाथियों की शक्ति पर विश्वास करके आवेश में यह प्रतिज्ञा कर बैठा कि मुझे प्रतिष्ठान-नरेश पर ऐसी विजय प्राप्त करनी है कि वह मेरे द्वार पर आने और भृत्यों द्वारा सेवकों के समान सूचना दिये जाने पर प्रवेश पा सके ॥६-७॥ ऐसी प्रतिज्ञा करके हयपति और गजपति नामक दोनों मित्रों से सम्मति करके उनके साथ ही हाथी-घोड़ों से पृथ्वी को रौंदता हुआ अपनी समस्त सेना के साथ प्रतिष्ठान-नरेश पर अवज्ञा के साथ चढ़ गया ॥ ८-९॥ विक्रम की चढ़ाई का समाचार सुनकर राजा नरसिंह भी अपने पैदल सैनिकों के साथ युद्ध के लिए समरभूमि में निकल आया ॥१० ॥ वहाँ उन दोनों का आश्चर्यजनक घमासान युद्ध हुआ जिसमें पैदल सैनिक घोड़ों और हाथियों के साथ लड़े ॥११॥ क्रमशः नरसिंह के एक करोड़ पैदल सैनिकों से विक्रम की सेना हार गई और भाग गई विक्रमादित्य भी भागकर पाटलिपुत्र में चला आया और उसके मित्र अश्वपति (हयपति) तथा गजपति भी सब अपनी-अपनी राजधानियों को चले गये ॥१२-१३॥ शत्रु पर विजय प्राप्त किया हुआ राजा नरसिंह भी विजयलक्ष्मी के साथ बन्दी-चारणों से स्तुति किया जाता हुआ अपने प्रतिष्ठान नगर में गया ॥१४॥
८ कथासरित्सागर
८ कथासरित्सागर ततः स विक्रमादित्योऽसिद्धकार्यो व्यचिन्तयत् । शस्त्रेरजय शत्रुं स जयामि प्रज्ञया वरम् ॥१५॥ कामं कश्चिद्विगर्हन्तां मा प्रतिज्ञाम्यथा तु भूत्। इति सञ्चिन्त्य निक्षिप्य राज्यं याम्येषु मन्त्रिषु ॥१६॥ निर्गत्य नगराद् गुप्त मुख्येनेकेन मन्त्रिणा । सह वज्रवराख्येन राजपुत्रवरैस्तथा ॥१७॥ पञ्चभिः कुलजैः शूरैः स कार्पटिकवेषभृत् । भूत्वा पुरं निजरिपोः प्रतिष्ठानं जगाम तत् ॥१८॥ तत्र वारविलासिन्या नरेन्द्रसदनोपमम् । ययौ मदनमालेति ख्याताया वरमन्दिरम् ॥१९॥ कृताह्वानमिव प्रांशुप्रकारशिखरोच्छ्रितैः । ध्वजांशुकैर्मृदुमयैर्विक्षिप्ताक्षिप्तपल्लवैः ॥२०॥ प्रधाने पूर्वदिग्द्वारे विविधाग्रुधशालिनाम् । गुप्तं सहस्रद्वितया पदातीनां दिवानिशम् ॥२१॥ अन्यासु दिक्षु तिसृषु द्वारि द्वारि मदोद्धतैः । दशभिर्दशभिः शूरसहस्रैरभिरक्षितम् ॥२२॥ आव्रजितं प्रतीहारस्तथामूत प्रविश्य च । क्वचित्प्रथितवेतानेकवराश्वश्रेणिशोभितम् ॥२३॥ क्वचिद्धावन्मातङ्गभटासङ्घटसञ्चरम् । क्वचिद्यायुधसन्दर्मगम्भीराकारगुम्भितम् ॥२४॥ क्वचिद् रत्नप्रभाभास्वद्बहुकोशगृहाज्वलम् । क्वचित्सेवकसङ्घातसन्ततायतमण्डलम् ॥२५॥ क्वचित्युच्चैः पठद्वन्दिबुन्दकोलाहलाकुलम् । क्वचिन्निबद्धसङ्गीतमुवङ्गध्वनिनादितम् ॥२६॥ सप्तकक्ष्याविभक्तं तत्स पश्यन् सपरिच्छदः । प्रापन्मदनमालाया वासप्रासादमुन्नतम् ॥२७॥ सा तं कक्ष्यासु साकूतनिर्वर्णिंतहृयादिकम् । श्रुत्वा परिजनान् मत्वा प्रच्छन्नं कञ्चिदद्भुतम् ॥२८॥ प्रत्युद्गम्य प्रणम्यासौ साभिलाषं सकौतुकम् । राजोचिते प्रवेश्यान्तस्तमुपावेशयदासने ॥२९॥
सप्तम लम्बक' ८१
सप्तम लम्बक' ८१ तब पराजित राजा विक्रमादित्य ने सोचा कि शत्रु शस्त्रों से अजेय है। अतः अच्छा हो कि इसपर बुद्धि से विजय प्राप्त करें ॥१५॥
भले ही कुछ लोग निन्दा करें किन्तु मेरी प्रतिज्ञा झूठी न होनी चाहिए—ऐसा सोचकर और राज्यकार्य का भार, मन्त्रियों पर डालकर एक सौ राजपूतों तथा पाँच विशेष अंगरक्षकों के साथ गुप्त रूप से साधु का वेश बनाकर राजा विक्रमादित्य प्रतिष्ठानपुर पहुँचा ॥१६-१८॥
वहाँ जाकर वह राजा राजभवन के समान महान् और सुन्दर मदनमाला नाम की वेश्या के भवन में जा पहुँचा ॥१९॥
वह विशाल भवन (वायु से कम्पित करहा की झंडियों के) हिलते हुए वस्त्रों से मानो अतिथियों को हाथ से आमन्त्रित करता था। उस भवन के पूर्वी द्वार पर बीस हजार सैनिक सिपाही दिन-रात रक्षा करते थे और अन्य तीनों दिशाओं के द्वारों पर दस दस हजार शूर-वीर सैनिक पहरा देते थे ॥२०-२२॥
वह भवन कहीं घोड़ों की फैंकी हुई पंक्तियों से शोभित हो रहा था। कहीं हाथियों की चल-बन्द से भरा हुआ था। कहीं विविध अस्त्र-शस्त्रों की सुन्दर सजावट थी। कहीं चमचमाते रत्नों और खजानों से उज्ज्वल था। कहीं संगीत और मृदंग की मधुर स्वर-लहरी लहरा रही थी। सात प्राकारों (परों) से बँधे हुए उस भवन को देखता हुआ राजा मदनमाला के ऊँचे भवन पर पहुँचा ॥२३-२७॥
मदनमाला ने उन प्राकारों में अभिप्राय के साथ हाथी घांट आदि को देखते हुए उस राजा के गुप्तचरों द्वारा समाचार जानकर उस गुप्त बने हुए उच्च कोटि का व्यक्ति समझ लिया और उसके आने पर उसकी अगवानी करती हुई उसे समझदार समझ बड़ी अभिलाषा और आदर के साथ लाकर राजाओं के योग्य आसन पर बिठाया ॥२८-२ ९॥