कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
१३० कथासरित्सागर
१३० कथासरित्सागर सहसाणं गगनायान् पार्थय विद्याधरो जवान् । निक्षेपाग्निशिखारूपं सिंहं तमवगङ्गुविषा ॥२०४॥ समीपमेत्य चापृच्छद्राजानं तं स गत्वरः। राजन्रकनकवर्षेत्य प्राप्ताज्येतां वय भुषम् ॥२०५॥ समाश्वास्य समभ्येति हरषाम गजा प्रत्यवाच तम्। विन्ध्यान्तर्वासिजं वृत्तस्य वदिस मामिति ॥२०६॥ ततो विद्याधरोऽवादीन् प्राङ्कवन्धोऽभवम्। मानुषो बन्धुमियाम्यस्यखपुरे न्यवसं पुरा ॥२०७॥ मयया प्रार्थितनाथ स्वया गाहायके मृतः। विद्याधरत्वं प्राप्तोऽस्मि वीरवेतालसाधनात् ॥२०८॥ तेन त्वां प्रत्यभिज्ञाय यत स प्रत्युपक्रियाम्। त्वत्स्निपांसुरयं दृष्ट्वा सिंहो व्यापादितो मया ॥२०९॥ नाम्ना बन्धुप्रभञ्चाद्य सर्वतोऽस्मीति वादिनम् । राजा कनकवर्षस्त जातप्रीतिरभाषत ॥२१०॥ हन्त स्मरामि सा वह मैत्री निर्वाहिका त्वया। तत् ब्रूहि मे कदा भावी भार्यापुत्रसमागमः ॥२११॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा बुद्ध्वा विद्याप्रभावतः। विद्याधरोऽब्रवीद् बन्धुप्रभस्त स महीभृतम् ॥२१२॥ दृष्ट्वा विन्ध्यवासियां पत्नीपुत्रौ त्वमाप्स्यसि। तत्तत्र गच्छ सिद्धय त्वं स्वलोकं च व्रजाम्यहम् ॥२१३॥ इत्युक्त्वा स्व गते तस्मिन् राजा लब्धधृतिः शनैः। प्रायात् कनकवर्षोऽसौ द्रष्टुं तां विन्ध्यवासिनीम् ॥२१४॥ गच्छन्तमभ्यधावत नृपं धन्यो महान् पथि। आधूत मस्तको मत्त प्रसारिनकर करी ॥२१५॥ स दृष्ट्वा श्वभ्रमार्गेण स राजापाससारथाः। मथानुधावन् स गजो विषवे श्वभ्रपातः ॥२१६॥ तत सोऽभ्वभ्रमायासब्रान्तो राजा व्रजन् क्रमात्। उत्खण्डपुण्डरीकाढ्य प्रापदेकं महत्सरः ॥२१७॥ तत्र स्नात्वा च पीत्वा च जलं जग्धमृणालकम्। विश्रान्त पादपतले क्षण जह्ले स निद्रया ॥२१८॥
नवम लम्बक ६३१
नवम लम्बक ६३१
उसी क्षण आकाश से आते हुए किसी विद्याधर ने वेग से नीचे उतरकर तलवार के एक ही प्रहार से उस सिंह के दो टुकड़े कर दिये ॥२ ४॥
और पास में आकर उस आकाशचारी ने राजा से पूछा—'हे राजा कनकवर्ष तुम इस स्थिति में क्यों पहुँच गये हो ? ॥२ ५॥
यह सुनकर और अपनी स्थिति का स्मरण करके राजा ने उससे कहा—'विषाद की अग्नि से पायस बने हुए मुझे क्या तुम नहीं जानते? ॥२०६॥
तब विद्याधर ने कहा—'मैं पहले बन्धुमित्र नामक मनुष्य परिव्राजक होकर तुम्हारे नगर में रहता था। सेवा से प्रार्थना करने पर तुम्हारी सहायता से वीर बेताल की सिद्धि द्वारा विद्याधर पद को प्राप्त हुआ हूँ ॥२ ७-२ ८॥
इसी कारण तुम्हें पहचानकर तुम्हारा प्रत्युपकार करने के लिए, तुम्हें मारने के लिए उद्यत इस सिंह को मैंने मार डाला ॥२ ९॥
अब मैं आज नाम से बन्धुप्रभ हो गया। इस प्रकार कहकर उस पर प्रेम प्रकट करते हुए राजा कनकवर्ष ने कहा—'हाँ हाँ मुझे स्मरण है। आज तुमने मित्रता निभा दी। अब यह बताओ कि पत्नी और पुत्र से मेरा मिलन कब होगा ? ॥२१०-२११॥
राजा की यह बात सुनकर और अपनी विद्या के प्रभाव से सब बात जानकर बन्धुप्रभ नामक विद्याधर ने राजा से कहा—'विन्ध्यवासिनी का दर्शन प्राप्त करने पर पत्नी और पुत्र का मिलन तुम्हें हो जायगा। अतः तू अपनी कार्य-सिद्धि के लिए जा। मैं अपने विद्याधर-लोक को जाता हूँ ॥२१२-२१४॥
इस प्रकार कहकर उस विद्याधर के आकाश में उड़ जाने पर धीरे-धीरे धैर्य धारण किया हुआ वह राजा कनकवर्ष विन्ध्यवासिनी के दर्शन को गया ॥२१४॥
वन-मार्ग में जाते हुए राजा पर मस्तक और सूँड को हिलाता हुआ एक बड़े जंगली हाथी ने आक्रमण कर दिया ॥२१५॥
उसे देखकर राजा ने एक खड्ड के मार्ग से दौड़ना आरम्भ किया इस प्रकार राजा के पीछे दौड़ता हुआ वह हाथी उस खड्ड में गिरकर मर गया ॥२१६॥
तब मार्ग की थकावट से व्याकुल और प्यासे राजा को मार्ग में ऊँचे-ऊँचे और निविड़ कमलों- वाला एक तालाब मिला। उसमें स्नान करके जल पीकर और कमल-नालों को खाकर तृप्त राजा सरोवर के पास एक वृक्ष के नीचे विश्राम करते-करते सो गया ॥२१७-२१८॥
६३२ कथासरित्सागर
६३२ कथासरित्सागर तावच्च तेन मृगयान्निवृत्ताः शबराः पथा। आगता ददृशुः सुप्तं तं राजानं सुलक्षणम् ॥२१९॥ तं च देव्युपहाराय बद्ध्वा निन्युस्तदैव तम्। स्वस्य मुक्ताफलाख्यस्य पार्श्वं शबरभूभृतः ॥२२० ॥ सोऽप्येनं शबराधीशः प्रशस्तं वीक्ष्य नीतवान्। स तं विन्ध्यवासिन्याः पशूकर्तुं नराधिपम् ॥२२१॥ दृष्ट्वैव च स देवीं तां प्रणमंस्तदनुग्रहात्। राजा स्तवप्रभावाच्च बभूव क्षतबंधनः ॥२२२॥ तदालोक्याद्भुतं मत्वा तस्य तं देव्यनुग्रहम्। मुमोच तं स राजानं शबराधिपतिर्वधात् ॥२२३॥ एवं कनकवर्षस्य तृतीयादपमृत्युतः। अतिक्रान्तस्य तस्याभूत्पूर्णं तच्छापवत्सरम् ॥२२४॥ तावच्च तस्य सा नागी राज्ञो मदनसुन्दरीम्। देवीं सपुत्रामादाय तत्रैवागात् पितृष्वसा ॥२२५॥ जगाद तं च भो राजन् ज्ञातकोपारुणा भयात्। एतौ ते रक्षितौ युक्त्या नीत्वा स्वभवनं मया ॥२२६॥ तस्मात्कनकवर्ष स्वौ गृहाणैतौ प्रियासुतौ। भुङ्क्ष्वेदं पृथिवीराज्यं क्षीणशापोऽधुना ह्यसि ॥२२७॥ इत्युक्त्वा प्रणतं सा तं नृपं नागी तिरोदधे। नृपोऽपि स्वप्नमिव तन्मेने भार्यासुतागमम् ॥२२८॥ ततोऽस्य राज्ञो गात्राच्च चिरादिष्टसमागमः। अगमद्विरहक्लेशो हृष्टबाष्पाम्बुभिः सह ॥२२९॥ ततः कनकवर्षं तं बुद्ध्वा पृथ्वीपतिं प्रभुम्। मुक्ताफलोऽप्यथ प्रणम्य शबरेन्द्रः स पादयोः ॥२३०॥ क्षमयित्वा च पल्लीं स्वां प्रपद्य च निजोचितैः। तस्तैः समुचितैस्तारैः तमुपचारैरपूजयत् ॥२३१॥ सोऽथ तत्र स्थितो राजा दूतैरानाययन्नृपम्। श्वशुरं देवशक्तिं तं स्वसुतं च निजात्सुतात् ॥२३२॥ अथान्वितनरेशः स मदनसुन्दरीं तां प्रियां सुतं च राज्येऽभिषिच्य हिरण्यगर्भाभिधम्। विधाय पुत्रस्तं श्वशुरं च समायादितः शशास स तदन्वितः कनकवर्षपृथ्वीपतिः ॥२३३॥
नवम लम्बक १३३
नवम लम्बक १३३
इतने में ही शिकार से लौटे हुए भील उस मार्ग से आ निकले और उन्होंने अच्छे लक्षणों से सम्पन्न राजा को वहाँ सोये हुए देखा ॥२१९॥ तब वे उसे बलिदान के योग्य समझकर देवी को भेंट करने के लिए बाँधकर अपने राजा मुक्ताफल के पास ले गये। वह भील सरदार भी उस अच्छे रूपवाला जानकर पशु बनाने के लिए विन्ध्यवासिनी के मन्दिर में ले गया ॥२२०-२२१॥ देवी का दर्शन करते ही राजा ने उसे प्रणाम किया और देवी की कृपा तथा स्वामी कार्त्तिकेय के वरदान के कारण उसी समय वह बन्धन से छूट गया। यह देखकर और उसे देवी की अद्भुत और आश्चर्यजनक कृपा समझकर भील-सरदार ने राजा का वध न करके उसे मुक्त कर दिया ॥२२२ २२३॥ इस प्रकार अपमृत्यु के तीसरे दौर से छूटे हुए राजा के शाप का एक वर्ष व्यतीत हो गया ॥२२४॥ तबतक राजा को ढूँढ़ती वह नागिन पुत्र-सहित रानी मदनसुन्दरी को लाकर उपस्थित हुई ॥२२५॥ और उससे बोली—'हे राजन्, कुमार के शाप को जानकर मैंने तुम्हारी पत्नी और पुत्र को युक्ति से अपने घर ले जाकर सुरक्षित रखा था। अब तुम इन दोनों को लो और शाप से मुक्त होकर अपनी भूमि के राज्य का उपभोग करो। इस प्रकार कहकर, और प्रणाम करते हुए राजा को आशीर्वाद देकर वह नागिन अन्तर्हित हो गई। राजा ने भी पत्नी और पुत्र के उस मिलने को एक सपना-सा समझा ॥२२६-२२८॥ तदनन्तर, चिरकाल के वियोग के उपरान्त मिलकर आलिंगन करते हुए राजा और रानी का वियोग-कष्ट प्रसन्नता के आँसुओं के साथ बह निकला ॥२२९॥ तब भीलों का सरदार मुक्ताफल ने उसे राजा कनकवर्ष समझकर पैर पर गिर पड़ा और उससे क्षमा माँगी। तदनन्तर पत्नी तथा पुत्र-सहित उसे अपने ग्राम में ले जाकर समुचित साधनों से उसकी सेवा करने लगा ॥२३०-२३१॥ वहाँ रहते हुए राजा ने दूत द्वारा अपने स्वपुर देशभक्ति को तथा अपनी सेना को वहीं बुलवा लिया ॥२३२॥ उन सब के आने पर राजा कनकवर्ष स्वामी कार्त्तिकेय के कहे हुए हिरण्यवर्म नाम के पुत्र के साथ रानी मदनसुन्दरी को हस्तिनी पर बैठाकर और आप रथपर मयूराक्ष जाने के लिए वहाँ से चला ॥२३३॥ ८
७४ कथासरित्सागर
७४ कथासरित्सागर अवाप च स वासरैः कतिपयैर्गृहं श्वशुरं बिदर्भविषयाश्रितं तदथ कुण्डिनाख्यं पुरम् । समुचितमिति तत्र च श्वशुरसत्कृतः कानिचित् दिनान्यभजत स्थितिं तनयदारसेनायुतः ॥२३४॥ प्रस्थाय सतश्च शनैः कनकपुरं प्राप्तवान्निजं नगरम् । पौरवधूजन नयन विचरोत्सुकैः पीयमान इव ॥२३५॥ अविशच्च राजधानीं सुतसहितो मदनसुन्दरीयुक्तः । उत्सव इव विग्रहवान् प्रमोषशोभान्वितो नृपतिः ॥२३६॥ अभिषिच्य बद्धपट्टां तत्र च तां मदनसुन्दरीमकरोत् । सर्वान्तःपुरमुख्यामभ्युदये मानितप्रकृतिः ॥२३७॥ वध्वा तया सह सुतेन च तेन बद्ध नित्योत्सवः पुनरदृष्टवियोगदुःखः । निष्कण्टकं कनकवर्धनरेश्वरोऽथ भूमण्डलं सञ्चतुरन्तमिव शशास ॥२३८॥ इति गोमुखतः स्वमन्त्रिमुख्यादुचिरां तत्र कथामिमां निशम्य । नरवाहनदत्तराजपुत्रः सवरूङ्कारवतीयुतस्तुतोष ॥२३९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरेऽलङ्कारवतीसम्बके - पञ्चमस्तरङ्गः । षष्ठस्तरङ्ग नरवाहनदत्त कथा (पूर्वानुवृत्ता) ततः स गोमुखाख्यात कथातुष्टः प्रियासखः । दृष्ट्वा सकोपविकृतिं मरुभूतिं सधीर्र्यया ॥१॥ नरवाहनदत्तस्तं निजगादानुरञ्जयन् । मरुभूते त्वमप्येकां किं नाख्यासि कथामिति ॥२॥ ततः स बाढमाख्यामीत्युक्त्वा तुष्टेन चेतसा । समाख्यातुं कथामेतां मरुभूतिः प्रचक्रमे ॥३॥
नवम लम्बक १३५
नवम लम्बक १३५ कुछ समय बाद वह राजा विदर्भदेश-स्थित कुण्डिनपुर नामक समृद्ध नगर में श्वशुर गृह को पहुँचा। वहाँ श्वशुर द्वारा सत्कार प्राप्त कर स्त्री और पुत्र के साथ कुछ दिनों तक वह वहीं ठहर गया ॥२३४॥ तदनन्तर, वहाँ से धीरे-धीरे चलकर स्त्री मदनसुन्दरी और पुत्र हिरण्यवर्म के साथ प्रजाओं के लिए मूर्तिमान् उत्सव के समान और प्रसन्नचित्त वह राजा अपनी राजधानी कनकपुर में पहुँचा ॥२३५-२३६॥ वहाँ पहुँचकर प्रसन्न प्रजाओं का अभिनन्दन स्वीकार कर राजा कनकवर्म ने रानी मदन- सुन्दरी का पट्टबन्धन करके उसे सभी रानियों में प्रमुख अर्थात् महारानी बना दिया ॥२३७॥ तदनन्तर राजा कनकवर्म महारानी और पुत्र के साथ प्रतिदिन उत्सव मनाता हुआ सदा के लिए विद्यारस भुक्त होकर, अपने निष्कण्टक सर्वभोग्य राज्य का पालन करने लगा ॥२३८॥ अलंकारवती के साथ नरवाहनदत्त अपने मुख्य मंत्री गोमुख से इस प्रकार की मनोरंजक कथा को सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ ॥२३९॥ महाकवि श्री सोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती लम्बक का पञ्चम तरंग समाप्त षष्ठ तरंग तदनन्तर गोमुख द्वारा कही गई कथा के सुनने से सन्तुष्ट राजा नरवाहनदत्त ने मरुभूतिक आदि मन्त्रियों को कुछ कुण्ठित-सा देखकर उसे प्रसन्न करते हुए कहा-हे मरुभूति तुम भी एक कथा जरा सही कहो ॥१-२॥ तब मरुभूति ने 'बहुत अच्छा कहता हूँ'—इस प्रकार उत्तर देकर कथा आरम्भ की ॥३॥
११६ कथासरित्सागर
११६ कथासरित्सागर चन्द्रस्वामिनस्तत्सूनोर्महीपालस्य च कथा चन्द्रस्वामीत्यभूत् पूर्वं राज्ञः कमलवर्मणः। नगरे ऽथ कमलपुराख्यं ब्राह्मणोत्तमः ॥४॥ तस्य लक्ष्मीसरस्वत्यास्तृतीया विनयोग्ज्वला। भार्या देवमतिर्नाम समाना सुमतिरभूत् ॥५॥ तस्यां तस्य च विप्रस्य पत्न्यां जज्ञे सुलक्षणः। पुत्रः स यस्य जातस्य वागेवमुदगाद्दिवः ॥६॥ चन्द्रस्वामिन् महीपालो नाम्ना कार्यः सुतस्त्वया। राजा भूत्वा चिरं यस्मात् पालयिष्यत्ययं महीम् ॥७॥ एतद्दिव्यं वचः श्रुत्वा स महीपालमेव तम्। चन्द्रस्वामिसुतं नाम्ना चकार रचितोत्सवः ॥८॥ क्रमाच्च स महीपाले विवृद्धौ ग्राहितोऽभवत्। शस्त्रास्त्रवेदविद्यासु समं सर्वासु शिक्षितः ॥९॥ तावच्च सुषुवे तस्य सा चन्द्रस्वामिनः पुनः। भार्या देवमतिः कन्यां सर्वावयवसुन्दरीम् ॥१०॥ सा च चन्द्रवती नाम महीपालः स च क्रमात्। भ्रातरौ ववृधाते तौ स्वपितुस्तस्य वेश्मनि ॥११॥ अथार्वृष्टिकृतस्तत्र देशे दुर्भिक्षविप्लवः। उदपद्यत दग्धेषु सस्येषु रविरश्मिभिः ॥१२॥ क्षुधोपन्नं च राजान्नं प्रारेभे तस्करायितुम्। अधर्मेण प्रजाभ्योऽर्थमाकृष्य मुक्तसत्पथः ॥१३॥ ततोऽवसीदत्यत्यर्थं देशे तस्मिन्नुवाच सा। भार्या देवमतिर्विप्रं चन्द्रस्वामिनमत्र तम् ॥१४॥ आगच्छ मत्पितृगृहं व्रजामो नगरादितः। एते ह्यपत्ये नश्येतामावयोरिह जातुचित् ॥१५॥ तच्छ्रुत्वा तां गदति स्म चन्द्रस्वामी स्वगेहिनीम्। भय पापं महद्गङ्गासद्दुर्भिक्षे हि पलायनम् ॥१६॥ तदहं बालचावतीं नीत्वा स्वपितुर्वेश्मनि। स्थापयामि त्वमास्वेह शीघ्रं यास्याम्यहं पुनः ॥१७॥
नवम लम्बक ६३७
नवम लम्बक ६३७ चन्द्रस्वामी और उसके पुत्र महीपाल की कथा राजन् प्राचीन काल में राजा कमलवर्मा के कमलपुर नामक नगर में चन्द्रस्वामी नाम का एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था ॥४॥ उस सद्गुणोंवाले ब्राह्मण की साध्वी और सरस्वती के समान तीसरी नम्रता की मूर्ति देवमति नाम की पत्नी थी ॥५॥ उस ब्राह्मण का उस पत्नी में शुभ लक्षणोंवाला एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसके उत्पन्न होते ही आकाशवाणी हुई कि हे चन्द्रस्वामी तू इस बालक का नाम महीपाल रखना। क्योंकि यह राजा होकर चिरकाल तक पृथ्वी का पालन करेगा ॥६-७॥ इस प्रकार दिव्य वाणी को सुनकर चन्द्रस्वामी ने पुत्र जन्मोत्सव करके उस शिशु का नाम महीपाल ही रख दिया ॥८॥ क्रमशः बड़े होते हुए महीपाल को पिता ने शस्त्र अस्त्र वेद तथा अन्यान्य विद्याओं में समान रूप से शिक्षित कर दिया ॥९॥ इस बीच चन्द्रस्वामी की पत्नी देवमति ने एक सर्वांगसुन्दरी कन्या को जन्म दिया ॥१०॥ उसका नाम चन्द्रवती रखा गया और वे दोनों भाई-बहन माता-पिता के घर में क्रमशः बढ़ने लगे ॥११॥ कुछ दिनों के अनन्तर उस देश में वर्षा न होने के कारण दुर्भिक्ष पड़ गया। खेतों में पड़ा अन्न सूर्य की किरणों से (गर्मी से) जल गया ॥१२॥ दुर्भिक्ष के कारण उस देश का राजा सन्मार्ग को छोड़कर अधर्म-पथ से प्रजा का धन लूटने लगा ॥१३॥ इस अत्याचार और दुर्भिक्ष के कारण उस देश के अत्यन्त दुःखित हो जाने पर देवमति ने चन्द्रस्वामी से कहा-आओ इस नगर से मेरे पिता के घर चलें। अन्यथा इस कष्ट में किसी समय भी इन दोनों बच्चों को हानि पहुँच सकती है ॥१४-१५॥ यह सुनकर चन्द्रस्वामी ने अपनी पत्नी से कहा—ऐसा न करो। दुर्भिक्ष के समय घर से भागना महापाप है ॥१६॥ इसलिए, मैं इन दोनों बच्चों को ले जाकर तुम्हारे पिता के घर रखकर शीघ्र ही लौट आता हूँ ॥१७॥
३३८ कथासरित्सागर
३३८ कथासरित्सागर इत्युक्त्वा स्वापयित्वा तां तथेत्युक्तवती गृहे। भार्यां स चन्द्रस्वामी तौ गृहीत्वा दारको निजौ ॥१८॥ महीपालं च तं सां च कन्यां चन्द्रवतीमुभौ। ततः प्रतस्थे नगरात् पत्नीं पितृगृहं प्रति ॥१९॥ गच्छन् क्रमात्त्रिचतुर्दिनं प्राप महानटवीम्। अर्कांशुतप्तसिकतां विशुष्कविरलद्रुमाम् ॥२०॥ सत्यां तृषाभिभूतौ तौ स्वापयित्वा स दारको। चन्द्रस्वामी ययौ दूरमन्वेष्टुं वारि सत्कृते ॥२१॥ तत्र तस्याययावग्र मानुगः शबराधिपः। अकस्मात् सिंहदंष्ट्राख्यः कार्याय प्रस्थितः क्वचित् ॥२२॥ स तं दृष्ट्वात्र पृष्ट्वा च बुद्ध्वा भिल्लो जलाथिनम्। संज्ञां कृत्वाब्रवीद् भृत्याञ्छ्रीत्वाम्भः प्राप्यतामयम् ॥२३॥ तच्छ्रुत्वा तस्य भृत्यास्तं द्वित्रा लब्धाशया ऋजुम्। ते चन्द्रस्वामिनं पत्नीं नीत्वा बद्धमकुर्वत ॥२४॥ नरोपहारायात्मानं तेभ्यो बुद्ध्वा स सत्वरम्। चन्द्रस्वामी शुशोच स्वौ- वारकावटवीगतौ ॥२५॥ हा महीपाल हा वत्से चन्द्रवत्यपदे कथम्। मयारण्ये युवां त्यक्त्वा सिंहव्याघ्रामिषीकृतौ ॥२६॥ आत्मा च भातिसत्त्वीरैनै घास्ति शरणं मम। इत्याक्रन्दत्स विप्रोज्ञं व्योम्न्यपश्यत्संववात् ॥२७॥ हन्त मोहं विहायेतं स्वं प्रभुं शरणं यये। इत्यालोच्य द्विजः सूर्य स स्तोतुमुपचक्रमे ॥२८॥ तुभ्यं परापगकाशाधामिने ज्योतिषे विभो। आभ्यन्तरं च बाह्यं च तमः प्रणुदते नमः ॥२९॥ त्वं विष्णुस्त्रिजगद्व्यापी त्वं शिवः श्रेयसां निधिः। सृष्टं विष्टप्यम्बिदध परमस्र प्रजापतिः ॥३०॥ अग्रवाणी प्रवाद्येतामेताविरयग्निचन्द्रयोः। न्यक्तारमत्तजा दययवास्तधि यामि यामिनीम् ॥३१॥ यिम्बस्यपि रक्षांसि प्रभवन्ति न दस्यवः। प्रमोद्न्ते च गुणिनो भास्वद्यम्यदिन रवयि ॥३२॥
नवम लम्बक ६११
नवम लम्बक ६११ ऐसा कहकर और पत्नी को घर छोड़कर चन्द्रस्वामी अपने दोनों बच्चों—पुत्र महीपाल और पुत्री चन्द्रवती को लेकर ससुराल की ओर गया ॥१८-१९॥ जाते हुए उसे तीन चार दिनों के अनन्तर अगम्य मार्ग में एक बड़ा जंगल मिला। उस जंगल की रेत सूर्य की किरणों से तप रही थी और उसमें कहीं-कहीं धूप और काठ-कुट ही बस दीख रहे थे ॥२०॥ चन्द्रस्वामी प्यास से व्याकुल उन दोनों बच्चों को एक छायावान् स्थान पर बैठाकर उनके लिए जल की खोज में दूरतक चला गया ॥२१॥ जाते हुए उसे सामने भीलों का राजा सिंहदंष्ट्र अपने सेवकों के साथ कहीं जाता हुआ अकस्मात् मिल गया ॥२२॥ उस भीलराज ने उस ब्राह्मण को देखकर और पूछकर और उसे स्वाभिमानी समझकर अपने सेवकों से इशारा करके कहा—'इसे ले जाकर शान्ति दिलाओ' ॥२३॥ यह सुनकर उसके दर्प-हीन सरदार ने उसके भाव को समझकर उस सीधे-सादे विद्वान् ब्राह्मण को अपने गाँव में ले जाकर और बाँधकर रख दिया ॥२४॥ उस सेवक द्वारा बन्धन के लिए जाल का बिछा हुआ जानकर चन्द्रस्वामी उस जंगल में भर छोड़ हुए अपने दोनों बच्चों की चिन्ता करने लगा ॥ २५॥ 'हाय महीपाल! हाय चन्द्रवती! मैंने तुम्हें सूखा जंगल में छोड़कर रख और बाघों का भोजन बना डाला और चोरों से काटना भी चाहा होगा। अब यह दिल नहीं समझ रहा है। इस प्रकार शोच-चिन्तित उस ब्राह्मण ने आकाश में चारी नेत्र को देखा ॥ २६-२७॥ हाय! अब मैं मोह-छोड़ कर इसी आज उस देव को शरण में जाता हूँ'—यह सोचकर वह ब्राह्मण सूर्य की स्तुति करने लगा—॥ २८॥ हे उदय आकाश में उड़ने चन्द्रहासे पद्म शशाङ्क-नयन उषा आत्मीय और छाया अपरंपार का नष्ट करनेवाले तुम्हें नमस्कार है ॥ २९ ॥ सुदृढितों का प्रहार से बचाना विष्णु हैं तू ही कल्याणों का दान लिए हुए है। मात्र सब विश्व का कार्य प्रवृत्त कर संसार-राज्य प्रकाशित करने में प्रणाम है ॥३०॥ इसप्रकार स्तोत्र और बारम्बार प्रणाम करने से दुर्दान्त-रूप उस राजा ने अपने तेज समेटकर वहाँ प्रकट हुआ [२९/३१/३८ २२१॥] हे चक्रवाकबन्धु चन्द्रमा! ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ...
१४ कथासरित्सागर
१४ कथासरित्सागर तद्रक्ष शरणापन्नं त्रैलोक्यैकप्रदीप माम्। हृदं दुःखाधकारं मे विदारय दयां कुरु॥३३॥ इत्यान्दिभिस्तदा वाक्यैर्भक्त्या स्तुवततो रविम्। चन्द्रस्वामिद्विजस्यास्य गगनादुच्चचार वाक्॥३४॥ तुष्टोऽस्मि चन्द्रस्वामिंस्तं न त्वं वधमवाप्स्यसि। मत्प्रसादाच्च पुत्रादिसङ्गमस्ते भविष्यति॥३५॥ इत्युक्तो दिव्यया वाचा जाताश्वस्तस्तत्र तस्थिवान्। चन्द्रस्वामी स शबरापहृतस्नानभोजनः॥३६॥ तावच्च स महीपालं स्वस्रा युक्तमरण्यगम्। पित्र्यैनायरयाक्रन्दविधुरं शङ्किताशुभम्॥३७॥ ददर्श तेन मार्गेण सार्थवाहः समागतः। महान् सार्थधरो नाम वृत्तान्तं पृच्छति स्म च॥३८॥ स तमाश्वास्य कृपया शिशुं दृष्ट्वा सुलक्षणम्। सार्थवाहो निनाय स्वं देशं स्वसुतसन्नितम्॥३९॥ तत्रासीत् स महीपालो बाल्येऽप्यग्निक्रियारतः। सन्ते तस्य वणिजः पुत्रस्नेहेन पश्यतः॥४०॥ एकदा नृपतेर्मन्त्री तारापुरनिवासिनः। ताराधर्माभिधानस्य कायातेनागतः पथा॥४१॥ विवेश सार्थवाहस्य तस्य मित्रं द्विजोत्तमः। गृहाननन्तस्वामीति सहस्त्रहयपदातिकः॥४२॥ स विश्रान्तोऽत्र तं दृष्ट्वा महीपालं शुभाकृतिम्। अपाग्निकार्याविरतं वृत्तान्तं परिपृच्छ्य च॥४३॥ अनपत्यो विदित्वा च सवर्णं सार्थवाहतः। तस्मादयाचत्परयार्थी मन्त्री सद् भगिनीं च ताम्॥४४॥ ततस्तौ तेन वैश्येन दत्वावानाय दारकौ। सार्थवाहेन सानन्तस्वामी तारापुरं ययौ॥४५॥ तत्र पुत्रीकृतस्तेन महीपालः स मन्त्रिणा। तस्थ्यौ सद् भवनेऽप्यस्य विद्याविपुलसम्पदि॥४६॥ अत्रान्तरं च यद्यु तं चन्द्रस्वामिनमेत्य सः। भिल्लाधिपः सिंहदंष्ट्रः पप्रच्छात्तस्याममापतत्॥४७॥
[Header: नवम लम्बक १४१]
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'हे तीनों लोकों के एकमात्र प्रदीप शरण में आए हुए मेरी रक्षा करो। मेरे इस दुःख-रूपी अंधेरे को नष्ट करो। दया करो' ।।३४।। इत्यादि स्तुति वाक्यों द्वारा भक्ति-भाव से सूर्य की प्रार्थना करते हुए चन्द्रस्वामी ब्राह्मण को आकाशवाणी सुन पड़ी—।।३५।। 'हे चन्द्रस्वामिन् मैं तुझसे प्रसन्न हूँ। तू मारा नही जायगा और मेरी कृपा से पुत्र आदि के साथ तेरा मिलन भी होगा' ।।३५।। दिव्य वाणी द्वारा इस प्रकार कहा गया चन्द्रस्वामी विश्वासपूर्वक वहाँ भीलों द्वारा लाये गये भोजन फल आदि ग्रहण कर वहीं ठहरा रहा ।।३६।। उधर वह महीपाल छोटी बहन के साथ जंगल में बैठा-बैठा पिता के न आने पर किसी सार्थवाह¹ से अशुभ आशंका से रोने लगा ।।३७।। इतने में ही उस मार्ग से व्यापारियों का एक दल आ निकला। उस दल के प्रधान सार्थवाह¹ ने उस बालक से सारा समाचार पूछा ।।३८।। वह व्यापारी उस बालक को शुभ लक्षणोंवाला जानकर धीरज बँधाया और उसे बहन के साथ अपने घर ले गया ।।३९।। वहीं पर बनिये के घर में पुत्र के समान स्नेह को प्राप्त करता हुआ वह महीपाल बाल्यावस्था में ही स्नान सन्ध्या अग्निहोत्र आदि क्रिया में निपुण होने के कारण वैश्य के घर में नित्य-क्रिया करता हुआ रहने लगा ।।४०।। एक बार तारापुर के तारावर्म नामक राजा का मंत्री किसी कार्यवश उसी मार्ग से वहाँ आया ।।४१।। वह श्रेष्ठ ब्राह्मण मंत्री अनन्तस्वामी हाथी घोड़े नौकर चाकर आदि के साथ उसी अपने मित्र व्यापारी के घर विश्राम के लिए ठहर गया ।।४२।। उस घर में ठहरे हुए उसने सुन्दर आकृतिवाले जप अग्निहोत्र आदि में लगे हुए महीपाल को देखा और उसका परिचय पूछा ।।४३।। उस सन्तानहीन मन्त्री ने व्यापारी से उसका परिचय पाकर और उसे ब्राह्मण जानकर, उसे अपना पोष्य-पुत्र बनाने के लिए उसकी बहन के साथ उसे माँग लिया ।।४४।। तब वह मन्त्री अनन्तस्वामी व्यापारी से उन बालकों को लेकर, तारापुर चला आया ।।४५।। वहाँ विधिवत् पुत्र बनाया हुआ महीपाल विद्या और धन से भरे हुए उसके घर में सुखपूर्वक रहने लगा ।।४६।। इसी बीच भीलों का राजा सिंहदंष्ट्र उस ग्राम में आकर और चन्द्रस्वामी के पास जाकर बोला—।।४७।।
१ सौदागरों का मुखिया सरदार। ८१
६४२ कथासरित्सागर
६४२ कथासरित्सागर ब्रह्मन् स्वप्नेऽहमाविष्टस्तथा देवेन भानुना। यथा सम्पूज्य भोक्तव्यो न हन्तव्यो मया भवान् ॥४८॥ तदुत्तिष्ठ व्रज स्वच्छमित्युक्त्वा स मुमोष तम्। प्रत्तमुक्तामृगमद क्लृप्तारण्यानुयायिकम् ॥४९॥ सोऽप्य मुक्तस्ततश्चन्द्रस्वामी तमनुजामृतम्। अप्राप्यारभ्यत पुत्रं महीपाल गवेषयन् ॥५०॥ भ्रमन्नब्धेस्तटे प्राप्य नाम्ना जलपुरं पुरम्। प्रविबेशातिथीभूत्वा गृहं विप्रस्य कस्यचित् ॥५१॥ तत्र मुक्तोत्तराख्यातस्ववृत्तान्तं समासतः। तं स विप्रो गृहपतिश्चन्द्रस्वामिनमभ्यधात् ॥५२॥ वणिक्कनकवर्माख्योऽतीतेष्वगाद्दिनेष्विह । तेनाटव्यां स्वसूनुस्त प्राप्तो ब्राह्मणदारकः ॥५३॥ तौ चादायातिभव्यौ द्वौ दारको स इतो गतः। नारिकेलमहाद्वीपे नोक्तं तन्नाम तेन तु ॥५४॥ तच्छ्रुत्वा मामकावेव नूनं ताविति चिन्तयन्। चन्द्रस्वामी मतिं चक्रे गन्तुं द्वीपवरं सवम् ॥५५॥ नीत्वा च रात्रिमन्विष्य वणिजा विष्णुवर्मणा। स व्यधात् सङ्गतिं द्वीप नारिकेलं प्रमास्यता ॥५६॥ तेनैव च सहारुह्य यानपात्रं जगाम सः। चन्द्रस्वामी सुतस्नेहाद् द्वीपमब्धिपथेन तम् ॥५७॥ तत्र पृच्छन्तमूचुस्तं वणिजस्सनिवासिनः। वणिक्कनकवर्माख्यः काममासीदिहागतः ॥५८॥ सुरूपारटवीप्राप्तावादाय द्विजदारकौ। गतः कटाहद्वीप तु तद्युक्तः स इतोऽधुना ॥५९॥ तच्छ्रुत्वा स ततो विप्रो वणिजा दानवर्मणा। पोतेन गच्छता साकं कटाहद्वीपमभ्यगात् ॥६०॥ तत्रापि स द्विजोऽशृण्वीद् गतं तं वणिजं ततः। द्वीपात् कनकवर्म्माणं द्वीप कर्पूरमंगलम् ॥६१॥ एवं क्रमेण कर्पूरसुवर्णद्वीपसिंहलान्। वणिग्भिः सह गत्वापि न प्राप वणिजं स तः ॥६२॥
नवम लम्बक ६४५
नवम लम्बक ६४५ हे ब्रह्मदेव मुझे स्वप्न में भगवान् भास्कर ने आदेश दिया है कि मैं तुम्हें सत्कृत करके छोड़ दूँ। तुम्हारा वध न करूँ ॥४८॥ इसलिए, उठो और जहाँ चाहो जाओ। ऐसा कहकर भील ने चन्द्रस्वामी को मोती और कस्तूरी देकर जंगल में मार्ग बतलानेवाले सेवकों के साथ आदरपूर्वक विदा कर दिया ॥४९॥ तब वह चन्द्रस्वामी छोटी बहन के साथ अपने पुत्र महीपाल को ढूँढ़ता हुआ उन्हें जंगल में न पाकर घूमते-घामते समुद्र के किनारे जलपुर नामक नगर में जा पहुँचा। वहाँ जाकर वह किसी ब्राह्मण के घर में अतिथि के रूप में ठहर गया ॥५०-५१॥ वहाँ पर भोजन के उपरान्त अपना वृत्तान्त सुनाते हुए चन्द्रस्वामी से गृह के स्वामी ब्राह्मण ने कहा—॥५२॥ 'पिछले दिनों में कनकवर्मा नाम का एक व्यापारी बनिया यहाँ आया था। उसने जंगल में छोटी बहन के साथ एक ब्राह्मण बालक को प्राप्त किया। वह उन दोनों अति सुन्दर बच्चों को लेकर यहाँ से नारिकेल-द्वीप में गया है किन्तु उसने उस बालक का नाम नहीं बताया' ॥५३-५४॥ यह सुनकर और वे अवश्य ही मेरे बालक हैं ऐसा सोचकर चन्द्रस्वामी ने नारिकेल- द्वीप जाने का विचार किया ॥५५॥ किसी प्रकार रात्रि व्यतीत कर उसने प्रातःकाल ही नारिकेल-द्वीप जाते हुए वणिक विष्णुवर्मा से अपना साथ-मेल बैठाया ॥५६॥ और, उसी के साथ नाव में बैठकर चन्द्रस्वामी बच्चों के प्रेम से समुद्र-मार्ग द्वारा नारिकेल-द्वीप को गया ॥५७॥ वहाँ पर कनकवर्मा को पूछते हुए उसे वहाँ के व्यापारी बनियों ने बताया कि कनकवर्मा नाम का व्यापारी जंगल से मिले हुए दो सुन्दर ब्राह्मण-बालकों को लेकर यहाँ आया अवश्य था किन्तु इस समय वह उन बच्चों के साथ यहाँ से कटाह-द्वीप को चला गया ॥५८-५९॥ व्यापारियों से इस प्रकार सुनकर चन्द्रस्वामी जलयान द्वारा कटाह-द्वीप जाते हुए व्यापारी दानवर्मा के साथ कटाह-द्वीप को गया ॥६०॥ वहाँ भी उसे ब्राह्मण से ज्ञात कि कनकवर्मा यहाँ से कर्पूर-द्वीप को चला गया। उसी क्रम से कर्पूर सुवर्ण और सिंहल-द्वीपों में वैश्यों के साथ जाने पर भी वह कनकवर्मा को न पा सका ॥६१-६२॥
६४४ कथासरित्सागर
६४४ कथासरित्सागर सिंहलेभ्यस्तु शुश्राव गतः स वणिजं निजम्। देशं कनकवर्माणं चित्रकूटामिधं पुरम् ॥६३॥ ततः कोटीश्वराख्येन वणिजा स समं ययौ। चन्द्रस्वामी चित्रकूटं तत्पोतोत्तीर्णवारिधिः ॥६४॥ तस्मिन् कनकवर्माणं वणिजं तमवाप सः। शशंस चाखिलं तस्मै स्वोदन्तं दारकोत्सुकः ॥६५॥ चैतं कनकवर्मा तौ भ्रातराविति सोऽस्य दारको। दर्शयामास यौ तेन लब्ध्वा नीतावटव्यतः ॥६६॥ चन्द्रस्वामी च तौ यावदीक्षते दारकावुभौ। तावन्नैव तदीयौ तौ तावन्यावेव कौचन ॥६७॥ ततः सबाष्पं शोकार्तों निराशो विललाप सः। इयद् भ्रान्त्वापि हा नाप्तो न पुत्रो न सुता मया ॥६८॥ धात्रा कुप्रभुणेवाशा दर्शिता मे न पूरिता। भ्रामितोऽस्मि च मिथ्यैव दूराद्दूरं दुरात्मना ॥६९॥ इत्यादि शोचन् वणिजा क्रमात् कनकवर्मणा। आश्वासितः स सेनाद्य चन्द्रस्वामी शुचाऽब्रवीत् ॥७०॥ वत्सरेणारमजो तौ चेन्न प्राप्स्यामि भुवं भ्रमन्। ततस्त्यक्ष्यामि तपसा गङ्गातीरे शरीरकम् ॥७१॥ इत्युक्तवन्तं तमथो ज्ञानी कोऽपि तमभ्यधात्। नारायण्या प्रभावात्तौ प्राप्स्यस्येवात्मजौ व्रज ॥७२॥ तच्छ्रुत्वा स प्रहृष्टात्मा भास्करानुग्रहं स्मरन्। वणिग्भिः पूजितः प्रायाच्चन्द्रस्वामी पुरात्ततः ॥७३॥ ततोऽग्रहारान् ग्रामांश्च चिन्वन् स नगराणि च। भ्रमन् प्रापैकदा सायं वनं प्रांशुबहुद्रुमम् ॥७४॥ तत्र क्षपयितुं रात्रिं कृत्वा वृत्तिं फलाम्बुभिः। स तस्थौ तरुमारुह्य सिंहव्याघ्रादिनाङ्किताम् ॥७५॥ अथाद्रवन् निशीथेऽत्र दृप्तं रा तरोरधः। महन्नारायणीमुख्यं मानुषञ्च रामागतम् ॥७६॥ उपहारान् समाहृत्य नानारूपान्द्विजातिताम्। प्रतीक्षमाणं देवस्य भैरवस्य बिलागमम् ॥७७॥
नवम लम्बक ४४५
नवम लम्बक ४४५ सिंहल-द्वीपवासियों से उसने सुना कि कनकवर्मा अपने देश चित्रकूट को चला गया। तब चन्द्रस्वामी कोटीश्वर नामक वैश्य के साथ सिंहल से समुद्र पार करके चित्रकूट को आया ॥६३-६४॥ और, यहाँ आकर उसने कनकवर्मा वैश्य को ढूँढ़ लिया। उसके पास जाकर बच्चों के लिए उत्सुक उसने अपना सारा वृत्तान्त सुना दिया ॥६५॥ उसकी बेचैनी का अनुभव करके कनकवर्मा ने उन दोनों बालकों को उसे दिखा दिया जिन्हें वह जंगल से लाया था ॥६६॥ चन्द्रस्वामी ने उन दोनों बच्चों को देखा तो वे उसके बच्चे नहीं थे बल्कि दूसरे ही कोई थे ॥६७॥ तब शोक-सन्तप्त और निराश चन्द्रस्वामी रो पड़ा और विलाप करने लगा—हाय! मैं इतना घूमने पर भी न लड़का पाया न लड़की ॥६८॥ दुष्ट स्वामी के समान भाग्य ने आशा दी किन्तु पूरी न की। इस दुराशा ने व्यर्थ ही दूर से दूर भटकाया ॥६९॥ इस प्रकार सोचते हुए चन्द्रस्वामी को कनकवर्मा ने धीरे-धीरे धीरज बँधाया। तब चन्द्रस्वामी शोक से बोला—॥७०॥ सारी पृथ्वी पर घूमते-भटकते हुए मैंने यदि एक वर्ष के भीतर उन दोनों बच्चों को नहीं पाया तो मैं गंगा-तीर पर तपस्या करके शरीर त्याग दूँगा' ॥७१॥ इस प्रकार कहते हुए चन्द्रस्वामी से वहाँ बैठे हुए किसी ज्ञानी ने कहा—'नारायणी की कृपा से तू बच्चों को प्राप्त करेगा जा' ॥७२॥ यह सुनकर प्रसन्नचित्त चन्द्रस्वामी सूर्य भगवान् की कृपा का स्मरण करता हुआ कनकवर्मा द्वारा सत्कार किये जाने पर चित्रकूट नगर से चला ॥७३॥ वह चन्द्रस्वामी अग्रहारों ग्रामों और नगरों में भटकता-मचलता सायंकाल बहुत ऊँचे ऊँचे और घने वृक्षोंवाले एक जंगल में पहुँचा ॥७४॥ वहाँ रात बिताने के लिए, फल और जल से तृप्ति पाकर सिंह बाघ आदि पशुओं के भय से वह एक वृक्ष पर चढ़कर बैठ गया ॥७५॥ उसे नींद नहीं आई और जागते ही जागते उसने आधी रात के समय उस वृक्ष के नीचे देखा कि नारायणी की प्रसन्नता से एक मातृचक्र वहाँ आया ॥७६॥ वह मातृचक्र नाना प्रकार के अपने योग्य आहार लाकर भैरव देव की प्रतीक्षा करने लगा ॥७७॥
६४४ कथासरित्सागर
६४४ कथासरित्सागर चिरयस्यथ किं देव इति तत्र च मातरः । नारायणीमथापृच्छन् सा जहासा शु नाब्रवीत् ॥७८॥ अतिनिर्बन्धपृष्टा च ताभिस्सा प्रत्युवाच सा । लज्जावहं यदप्येतत् सख्यस्तदपि वच्म्यहम् ॥७९॥ अस्ताह सुरसेनाख्यो राजा सुरपुरे पुरे । तस्य विद्याधरी नाम ख्यातरूपास्ति चात्मजा ॥८०॥ प्रदमायाश्च तेनास्या राज्ञा रूपसमं श्रुतं । विमलाख्यस्य तनयो राज्ञो नाम्ना प्रभाकरः ॥८१॥ तस्मै दित्सति तां तस्मिन् राज्ञि तेनापि सा श्रुता । विमलेन सुता तस्य निजपुत्रानुरूपिका ॥८२॥ ततः स विमलस्तस्मात् सुरसेनादयाचत । विद्याधरीं दूतमुखात् पुत्रार्थे तां तदात्मजाम् ॥८३॥ सोऽप्यपेक्षितसम्पत्त्या तत्सुताय सुतामदात् । प्रभाकराय तस्मै तां सुरसेनो यथाविधि ॥८४॥ तत सा प्राप्य विमलपुराख्यं श्वशुरं पुरम् । विद्याधरी समं भर्त्रा शयनीयमगात्निशि ॥८५॥ तत्रासम्भोगसुप्तं सा पतिं सोल्का प्रभाकरम् । यावन्निरीक्षते तावत्तमपश्यन्नपुंसकम् ॥८६॥ हा हताऽस्मि कथं षण्डः पतिः प्राप्तो मयेति सा । शोचन्ती छतसा रात्रिं राजपुत्री निनाय ताम् ॥८७॥ नपुंसकाय दत्ताहमन्विष्य कथं त्वया । इति लेखं लिखित्वा च पित्रे सा प्रहिणोत् ततः ॥८८॥ स दूत वाचायित्वैव विमलेनास्मि वञ्चितः । छद्मनाप्यगमत् क्रोधं तत्पिता विमलं प्रति ॥८९॥ सुतां नपुंसकायाहं यद्ब्याजाद्ग्राहितस्त्वया । पुत्राय तत्फलं मूढश्वः पश्य त्वामद्य हन्म्यहम् ॥९०॥ इति तस्मै स्वलङ्घनं सन्दिश्य स भूपतिः । शूरमना बलोद्रिक्तो विमलाय महीक्षित् ॥९१॥ विमलस्तदधिक्षिप्यत तस्येत्यार्यं गताश्रवः । विमृशन् दुजयं तन्निग्रहाय कञ्चिदन्बछत ॥९२॥
नवम लम्बक ६४७
नवम लम्बक ६४७ आज भैरव देव क्यों विलम्ब कर रहे हैं इस प्रकार माताओं ने नारायणी देवी से पूछा। किन्तु वह हंसती थी कुछ बोलती न थी ॥७८॥ उन माताओं द्वारा अत्यन्त आग्रह के साथ पूछे जाने पर नारायणी ने कहा- 'यद्यपि यह लज्जाजनक बात है फिर भी सहेलियों मैं तुमसे कहती हूँ' ॥७९॥ शूरपुर नगर में शूरसेन नाम का राजा है। सौन्दर्य में प्रसिद्ध उसकी विद्याधरी नाम की कन्या है ॥८०॥ उसे देने की इच्छा करनेवाले राजा शूरसेन ने सुना कि उसके रूप के समान सुन्दर राजा विमल का पुत्र प्रभाकर है ॥८१॥ राजा शूरसेन प्रभाकर को कन्या देना चाहता है यह राजा विमल ने भी सुना। और, उस कन्या को अपने पुत्र के समान ही सुन्दर जानकर राजा विमल ने राजा सेनपुर में दूत भेजकर, उसकी पुत्री विद्याधरी की अपने पुत्र प्रभाकर के लिए माँग की ॥८२-८३॥ शूरसेन ने भी आवश्यक सम्मति के साथ विमल के पुत्र प्रभाकर को विधिवूर्वक अपनी कन्या प्रदान कर दी ॥८४॥ तब बहूरूपा विद्याधरी अपने श्वशुर के नगर विमलपुर में आकर अपने पति प्रभाकर के साथ रात्रि में मिली ॥८५॥ वहाँ उत्कण्ठिता विद्याधरी ने जब पति प्रभाकर को बिना किसी चेष्टा के सोया देखा तब उसने आश्चर्य से उसकी परीक्षा की और उसे नपुंसक पाया ॥८६॥ 'हाय! हाय! मैं मारी गई, मुझे नपुंसक पति मिला' इस प्रकार सोचती हुई राजकुमारी ने किसी प्रकार रात्रि व्यतीत की ॥८७॥ प्रातः काल ही उसने पत्र लिखकर अपने पिता के पास भेजा कि तुमने बिना जाँच किये ही मुझे नपुंसक को कैसे दे दिया ॥८८॥ उस पत्र को पढ़कर राजा शूरसेन ने सोचा कि राजा विमल ने मुझे ठग लिया है। इसलिए उसे क्रोध आ गया और उसने विमल के प्रति क्रोध प्रकट करते हुए उसे यह लिखित सन्देश भेजा कि तूने छल से अपने नपुंसक लड़के के लिए जो मेरी पुत्री को बियाह दिया है अब उसका फल भोगो। मैं सेना लेकर आता हूँ और तुझे मार डालता हूँ ॥८९॥ बल के मद से उन्मत्त शूरसेन ने राजा विमल के लिए इस प्रकार सन्देश भेज दिया। राजा विमल भी इस सन्देश को पाकर मन्त्रियों के साथ उसके लेख का तत्त्व विचारने लगा क्योंकि शूरसेन बल में विमल से अधिक होने के कारण उसके लिए अजेय था ॥९१-९२॥
१४८ कथासरित्सागर
१४८ कथासरित्सागर
ततस्तं पिङ्गलदासाख्यो मन्त्री विमलमभ्यधात्। एक एवास्त्युपायोऽत्र तं देव शृणु साम्प्रतम्॥९३॥ अस्ति स्थूलशिरा नाम यक्षस्तस्य च वद्म्यहम्। मन्त्रमाराधनं येन वरमिष्टं ददाति सः॥९४॥ तेनोपास्तेन मन्त्रेण यक्षमाराध्य सम्प्रति। लिङ्गं याचस्व पुत्रार्थं सद्यः शाम्यतु विग्रहः॥९५॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा तस्मान्मन्त्रमादाय तं नृपः। सुतार्थं यक्षमाराध्य स तं लिङ्गमयाचत॥९६॥ तेन सम्प्रति दत्तं च लिङ्गं यक्षेण तत्सुतः। पुमांस्प्रभाकरः सोऽभूद्यक्षस्त्वासीन्नपुंसकः॥९७॥ सा तु विद्याधरी दृष्ट्वा पुमांसं तं प्रभाकरम्। तेन परया सहावाप्तरससौख्या व्यचिन्तयत्॥९८॥ भ्रान्ताहं मददोषेण न मे भर्त्ता नपुंसकः। पुमानेवैष सुभगो नात्र कार्यान्यथा मतिः॥९९॥ इत्यालोच्यैनमेवार्थं लिखित्वा लज्जिता पुनः। पित्रे सा प्राहिणोल्लेखं शमं भेजे च तेन सः॥१००॥ एतत् ज्ञात्वा च वृत्तान्तं भैरवेणाथ कुप्यता। मानाम्य स स्थूलशिराः शप्तो देवेन गुह्यकः॥१०१॥ लिङ्गत्यागेन यच्छश्वद्भावितं मत्प्रिया ततः। षण्ढ एव भवाजीवं पुमान् सोऽस्तु प्रभाकरः॥१०२॥ एवं नपुंसकीभूतो गुह्यकः सोऽथ दुःसहाम्। प्रभाकरश्च पुरुषीभूतो भोगसुखाय सः॥१०३॥ तदेतेनाथ कार्येण देवस्यागमने मनाक्। जातो विलम्बः क्षिप्राच्च जानीतायन्तमेव तम्॥१०४॥ इति नारायणी देवी मातृभिरिदमब्रवीत् सा। देवश्चण्डेश्वरस्तावदाययौ सोऽत्र भैरवः॥१०५॥ सम्पूजितश्च सर्वाभिरुपहारैः स मातृभिः। ताण्डवेन क्षणं नृत्यंश्चक्रीडेयोगिनीसखः॥१०६॥ तञ्च सर्वं तरोः पृष्ठाच्चन्द्रस्वामी विलोकयन्। मारायच्या वदर्शाका शासी सापि तमक्षत॥१०७॥
नवम लम्बक ६४९
नवम लम्बक ६४९ जब उसे कोई उपाय नहीं सूझा तब पिंगदत्त नामक मन्त्री ने राजा विमल से कहा- 'स्वामिन् एक ही उपाय कल्याण के लिए है। उसे करो ॥१९३॥ स्थूलशिरा नाम का एक यक्ष है। उसका मन्त्र और आराधना-विधि मैं जानता हूँ जिससे वह अभीष्ट वर देता है ॥१९४॥ उसके मन्त्र को ग्रहण करके उससे पुत्र के लिए जननेन्द्रिय की याचना करो। इससे विरोध दूर होजायगा' ॥१९५॥ मन्त्री के इस प्रकार कहने पर राजा ने उससे मन्त्र ग्रहण किया और उससे यक्ष की आराधना करके पुत्र के लिए जननेन्द्रिय की याचना की ॥१९६॥ उस यक्ष द्वारा जननेन्द्रिय प्राप्त हो जाने पर वह नपुंसक पुत्र प्रभाकर पूर्ण पुरुष हो गया किन्तु वह यक्ष नपुंसक हो गया ॥१९७॥ अब वह विद्याधरी प्रभाकर को पुरुषत्व से युक्त देखकर और उसके साथ यौन सुख का आनन्द लेकर सोचने लगी- ॥१९८॥ मैं अपने यौवन-मद में भूल कर गई। मेरा पति नपुंसक नहीं है। यह तो पूर्ण पुरुष है। अतः इसके सम्बन्ध में विपरीत मति नहीं करनी चाहिए ॥१९९॥ इस प्रकार विचार कर और इसी बात को पुनः पिता को लिखकर, साथ ही लज्जित होकर भी उसने यह सन्देश भेजा जिससे उसका पिता शान्त हो गया ॥२००॥ यह समाचार सुनकर आज क्रुद्ध हुए भैरव ने स्थूलशिरा यक्ष को बुलाकर शाप दिया-॥२०१॥ कि जननेन्द्रिय का त्याग करने से तूने नपुंसकता धारण की है अतः अब तू आजीवन नपुंसक ही बना रहेगा और वह प्रभाकर सदा के लिए पुरुष हो जायगा ॥२०२॥ इसलिए नपुंसक बना हुआ यह यक्ष आज बहुत दुःखी है और प्रभाकर भार्या-सुख के लिए पुरुष बनकर सुखी है॥२०३॥ इसी काम में आज भैरव का आने में कुछ विलम्ब होगया है। फिर फिर भी उन्हें आया ही समझो ॥२०४॥ कात्यायनी देवी जबतक उन योगिनी महात्मा से कह ही रही थीं कि इतने में ही भयङ्कर भैरवदेव आ ही गये और उन योगिनियों ने नाना प्रकारके उपहारों से उनका पूजन किया। भैरव ने भी कुछ समय तक उन योगिनियों के साथ मोद-प्रमोद किया ॥२०५॥ चन्द्रस्वामी ने वन पर बैठ बैठकर यह सब कुछ दृश्य देखा। वह कात्यायनी की एक दासी को देखा। उसने भी चन्द्रस्वामी को देखा॥२०६॥ ८२