कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
द्वादश लम्बक ८४३
द्वादश लम्बक ८४३ समुद्र की लहरों में निशान लगानेवाले की कथा अब एक चिल्लकर्त्ता की कथा सुनो। समुद्री नाव से यात्रा करते हुए किसी मूर्ख का एक सोने का बरतन समुद्र में गिर गया। उस मूर्ख ने वहाँ पर लहरों और जल के भँवरों पर मन ही-मन निशान (चिह्न) लगा लिया और यह सोचा कि 'लौटते समय यहाँ से बरतन निकाल लूँगा जब वह उधर से लौटा तब पानी में अपने चिह्न का स्मरण करके बरतन निकालने के लिए समुद्र में कूद पड़ा। लोगों के पूछने पर अपना अभिप्राय बताने पर उसकी हँसी हुई और लोगों ने उसे मूर्ख बनाकर धिक्कारा ॥२७८-२८१॥ मांस के बदले में मांस देनेवाले राजा की कथा अब अन्य में मांस देनेवाले एक राजा की कथा सुनो। एक राजा ने महल से दो व्यक्तियों को देखा उनमें एक ने रसोइघर से मांस चुरा लिया था। राजा ने आज्ञा देकर उसके शरीर से पाँच पल (२ तोला) मांस कटवा लिया। मांस काटने पर उसे रोने-बिलखने और भूमि पर लोटते देखकर राजा को दया आ गई और उसने द्वारपाल को आज्ञा दी कि पाँच पल मांस काट लेने से इसकी वेदना शान्त नहीं हो रही है इसलिए इस एक पाव से अधिक मांस दे दो॥२८२-२८६॥ 'महाराज गला काट लेने पर गो गले दने पर भी क्या पुरुष फिर जी सकता है—ऐसा कहकर बाहर जाकर और पेट पकड़कर द्वारपाल खूब हँसा ॥२८७॥ और आश्वासन देकर उस काटा हुआ मांस जोड़कर वैद्य को सौंप दिया। सच है मूर्ख राजा दंड देना और कृपा करना भी नहीं जानते ॥२८८॥ एक को मारकर दूसरा पुत्र चाहनेवाली स्त्री की कथा
८४४ कथासरित्सागर
८४४ कथासरित्सागर
यदि सोऽपि न जातस्ते तत्तत्सर्वं किं करिष्यसि । इत्यवार्यत सा पापादार्यया बुद्धया तया ॥२९३॥ एवं पतन्त्यकार्येपु डाकिनीसङ्गताः स्त्रियः । वृद्धोपदेशेन तु ता रक्ष्यन्ते कृतयन्त्रणा ॥२९४॥
मूर्ख सेवक कथा
अयमामलकानेता देवेदानीं निशम्यताम् । कस्याप्यभूद् गृहस्थस्य भृत्यः कश्चन मुग्धधीः ॥२९५॥ समादिशद् गृहस्थस्तं भृत्यमामलकप्रियः । गन्धारामात् सुमधुराण्यामयामंलकानि मे ॥२९६॥ एकैकं दशनच्छेदेनास्वाद्यानीतवाञ्जडः । आस्वाद मधुराण्येता यानीतानीक्षतां प्रभुः ॥२९७॥ सोऽब्रवीत्सोऽपि तान्यक्ष्णोच्छिष्टान्यालोक्य कुत्सया । अहो गृहपतिस्तन मूर्खेनाबुद्धिना समम् ॥२९८॥ निष्प्रज्ञो नाशयत्येव प्रभोरर्थमथात्मनः । अन्तरा चात्र शृणुत भ्रातृद्वयकथामिमाम् ॥२९९॥
बन्धुद्वयस्य कथा
ब्राह्मणौ भ्रातारावास्तां पुरे पाटलिपुत्रके । यशःसोम इति ज्येष्ठ कीर्त्तिसोमोऽस्य चानुजः ॥३००॥ पित्र्यं चाभूद्धनं भूरि तयोर्ब्राह्मणपुत्रयोः । कीर्त्तिसोमो निजं भागं व्यवहारादवर्धयत् ॥३०१॥ यशःसोमस्तु भुञ्जानो ददच्चाप्यनयत्क्षयम् । तत' स निर्धनीभूतो निजां भार्यामभाषत ॥३०२॥ प्रिये धनाढ्यो भूत्वाहमिदानीं निर्धनः कथम् । वसामि मध्ये बन्धूनां सद्धिरेदं तथाऽवहम् ॥३०३॥ पाथेयेन विना कुत्र याव इत्युदिते तया । निर्बन्धं स यदा चक्रे तदा भार्या तमाह सा ॥३०४॥ अवश्यं यदि गन्तव्यं तद् गत्वा कीर्त्तिसोमतः । मृगयस्व धनं किञ्चित् पाथेयमनुजादिति ॥३०५॥ ततो गत्वानुजं यावत् पाथेयं तं स मार्गति । तावत्तदनुजः सोऽत्र जगदे भार्यया स्वया ॥३०६॥ स्थापितस्वधनायास्म द्वयं दद्मः कुतः कियत् । य एव हि दरिद्रः स्यात् स एवास्मान्भजिष्यति ॥३०७॥
दशम लम्बक ८४५
दशम लम्बक ८४५ यदि यह दूसरा पुत्र भी न हुआ तो क्या करेगी (इस एकमात्र पुत्र से भी हाथ धो बैठेगी)। इस प्रकार पुत्र का वध करती हुई उस मूर्ख स्त्री को उस वृद्धा और भली स्त्री ने बचा दिया॥२९३॥ इसी प्रकार शाकिनी (डाकिनी) आदि के चक्कर में पड़कर स्त्रियाँ नष्ट हो जाती हैं। और, वृद्धा स्त्रियों के नियन्त्रण और उपदेश से वे रक्षित होती हैं ॥२९४॥ एक मूर्खसेवक की कथा स्वामिन् अब आँवले खानेवाले की कथा सुना। किसी धनी गृहस्थ का एक मूर्ख सेवक था। आँवलों के प्रेमी उस गृहस्थ ने सेवक से कहा—जाओ उद्यान से मीठे-मीठे आँवले ले आओ। वह मूर्ख एक-एक आँवले को दाँतों से काट-काटकर और चख-चख कर ले आया और बोला— स्वामी मैं एक-एक आँवले को चख चखकर और मीठे-मीठे बताकर लाया हूँ ॥२९५- २९७॥ स्वामी ने भी उन जूठे आँवलों को उस मूर्ख सेवक के साथ ही छोड़ दिया। (अर्थात् आँवले फेंक दिये और सेवक को निकाल दिया) ॥२९८॥ इस प्रकार मूर्ख व्यक्ति अपनी और अपने स्वामी की भी हानि करता है। इसी प्रसंग में दो भाइयों की कथा सुनो ॥२९९॥ दो बन्धुओं की कथा पाटलिपुत्र नगर में दो भाई रहते थे। बड़ा यज्ञसोम और छोटा कीर्तिसोम था। उन दोनों भाइयों के पास पिता का बहुत धन था। दोनों ने आपस में पिता के धन का बँटवारा कर लिया था और कीर्तिसोम अपने धन को ब्याज-बट्टे में लगाकर बढ़ाता था। यज्ञसोम ने खा-पीकर और ले-देकर अपने धन को समाप्त कर दिया। तब निर्धन होने पर यज्ञसोम अपनी पत्नी से बोला—॥३ ०—३ २॥ प्रिये मैं निर्धन होकर भी इस समय अपने इष्ट-सम्बन्धियों में कैसे रहूँ। इसलिए चलो कहीं दूसरे देश में चलें ॥३ ३॥ उसकी पत्नी ने कहा—'मार्ग में खान-पीने आदि के व्यय के बिना कैसे चलें। उसके इस प्रकार कहने पर भी जब वह हठ करने लगा तब उसकी पत्नी ने उससे कहा—'यदि जाना ही आवश्यक है तो जाकर अपने छोटे भाई कीर्तिसोम से कुछ आवश्यक व्यय के लिए धन माँगो ॥३ ४—३ ५॥ तब यज्ञसोम ने जाकर कीर्तिसोम से मार्ग-व्यय के लिए कुछ धन माँगा तो उसकी (कीर्तिसोम की) पत्नी ने उससे कहा—'अपना सब धन नष्ट कर देनेवाले इसे हम कहाँ से और कितना धन देंगे? जो भी निर्धन होजायगा वही हमारे इस प्रकार धन माँगने लगेगा ॥३ ६-३ ७॥
श्रुत्वैतत्कीर्त्तिसामोऽसौ भ्रातृस्नेहान्वितोऽपि सन्। नैच्छद्दातुं किमप्यस्मै कष्टा कुस्त्रीषु वश्यता ॥३०८॥ यज्ञसोमस्ततस्तूष्णीं गत्वा पत्न्यै न्यवेदयत्तत्। तया सह प्रस्थितवान् दैवैकशरणस्ततः ॥३०९॥ गच्छन् प्राप्तोऽटवीं धवाद्गिीर्णोऽजगरेण सः। तद्भार्या च तदालोक्य चक्रन्द पतिता भुवि ॥३१ ॥ किमाक्रन्दसि भद्रे त्वमिति मानुषभाषया। सा तेनाजगरणोक्ता ब्राह्मणी निजगाद तम् ॥३११॥ न क्रन्दामि कथं यस्मान्महासत्त्व मम त्वया। क्षुसिताया विदेशस्थ ह्य भिक्षाभाजन वृतम् ॥३१२॥ तच्छ्रुत्वाऽजगरो वक्त्रादुद्गीर्यास्यै ददौ महत्। स्वर्णपात्रं गृहाणेदं भिक्षाभाण्डमिति ब्रुवन् ॥३१३॥ भो महाभाग भिक्षां मे दास्यत्यस्मिन् स्त्रिया इति। उक्तस्तस्या तद्ब्राह्मण्या जगादाजगरश्च सः ॥३१४॥ न दास्यत्यर्थितो योऽत्र भिक्षां ते तस्य तत्क्षणम्। शतधा यास्यति शिरः सत्यमेतद्वचो मम ॥३१५॥ तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणी सा तमुवाचाजगरं सती। यद्येवं तत्त्वमवात्र भर्तृभिक्षां प्रयच्छ मे ॥३१६॥ इत्युक्तमात्रे ब्राह्मण्याः सत्या सोऽजगरो मुखात्। उज्जगाराक्षतं यज्ञसोमं जीवन्तमेव तम् ॥३१७॥ तमुद्गीर्यैव सपदि दिव्यः सोऽजगरः पुमान्। परितुष्टश्च तौ हृष्टौ दम्पती निजगाद सः ॥३१८॥ अहं काञ्चनवेगाख्यो विद्याधरमहीपतिः। सोऽहं गौतमशापेन प्राप्तोऽस्म्याजगरीं गतिम् ॥३१९॥ साध्वीसद्भावपर्यन्तः स च शापो ममाभवत्। इत्युक्त्वा हेमपात्रं च रत्नैरापूर्य तत्क्षणात् ॥३२०॥ विद्याधरेश्वरो हृष्टः खमुत्पत्य जगाम सः। तौ चाप्यमुतुरादाय रत्नौघं दम्पती गृहम् ॥३२१॥ तत्रास्तं यज्ञसोमोऽसावक्षयाप्तधनः सुखम्। सत्त्वानुरूपं सर्वस्य धाता सर्वं प्रयच्छति ॥३२२॥
द्वादश लम्बक ८४७
द्वादश लम्बक ८४७ यह सुनकर उस कीर्तिसोम ने भाई के स्नेह से देना चाहते हुए भी स्त्री के भय से उसे कुछ नहीं दिया। इस प्रकार दुष्ट स्त्रियों के वश में होना भी कष्टप्रद ही होता है॥३०८॥ तब यज्ञसोम ने यह सब समाचार पत्नी से कहा और ईश्वर की शरण होकर वह घर से निकल पड़ा॥३०९॥ वह जाते हुए मार्ग में एक जंगल में पहुँचा तो दैववश वहाँ उसे एक अजगर निगल गया। यह देखकर उसकी पत्नी भूमि में लोटकर रोने लगी॥३१०॥ उसका रोना-धोना सुनकर अजगर मनुष्य की वाणी में उससे बोला—'हे भली स्त्री तू इस प्रकार क्यों रो रही है ?' तब उस ब्राह्मणी ने कहा ॥३११॥ 'हे महाप्राणी मैं क्यों न रोऊँ, जब कि तूने विदेश में मुझ दुखिया का भिक्षापात्र ही हरण कर लिया ॥३१२॥ मुझ स्त्री को अब कौन भीख देगा'। उस सदाचारिणी ब्राह्मणी के इस प्रकार कहने पर अजगर ने अपने मुँह से उगलकर एक बड़ा-सा सोने का पात्र उसके आगे रख दिया और कहा—'यह ले भिक्षा-पात्र। माँगने पर जो भी व्यक्ति इस पात्र में दान नहीं देगा उसके सिर के सैकड़ों टुकड़े हो जायेंगे। यह मेरी सत्य वाणी है ॥३१३–३१५॥ तब वह सती ब्राह्मणी उस अजगर से बोली—'यदि ऐसा है, तो पहले तू ही इस पात्र में मुझे पति की भिक्षा दे' ॥३१६॥ उसके ऐसा कहते ही अजगर ने समूचे और जीवित यज्ञसोम को उगल दिया॥३१७॥ उसे उगलते ही तुरन्त वह अजगर दिव्य पुरुष बन गया और प्रसन्न होकर उन दोनों (पति पत्नी) से बोला—॥३१८॥ 'मैं काञ्चनवेग नाम का विद्याधरों का राजा हूँ। मेरे इस शाप की अवधि सती स्त्री के सम्भाषण तक थी। वह आज समाप्त हो गई। (अतः अब मैं पुनः अपने रूप में आ गया) ऐसा कहकर और उस सोने के पात्र को रत्नों से भरकर प्रत्यक्ष विद्याधरराज आकाश में उड़कर अपने लोक को चला गया। और, वे दम्पती रत्नों का पात्र लेकर अपने घर आ गए॥३१९ - ३२१॥ घर आकर अक्षय धन वाला हुआ यज्ञसोम सुख से रहने लगा। विधाता सभी को उसके मन और कर्म के अनुसार देता है ॥३२२॥
८४८ कथासरित्सागर
८४८ कथासरित्सागर मूर्खयोद्धुः कथा श्रूयतां नापितस्यार्थी मुग्धोऽत्र च पुमानयम्। कर्णाट-क्षोत्रेपि भूपं स्वं रणे शौर्यात्सतोषयत् ॥३२३॥ स प्रसन्नो नृपस्तस्याभीष्टं दत्तवान् वरम्। शस्यस्य नापितं वस्त्रं नपुंसकनिभो भटः ॥३२४॥ सर्वथैतत्प्रमाणेन सदसन्नाभिवाञ्छति। न किञ्चिन्मार्गणं चान्यन्मुग्धं शृणुताधुना ॥३२५॥ किञ्चिन्न याचकस्य मूर्खस्य कथा कश्चित्पथि व्रजन् मूर्खं शकटस्थेन केनचित्। ऊचे समं कुरुष्वैतच्छकटं मे मनागिति ॥३२६॥ समं करोमि चेत्तन्मे किं ददासीति वादिनम्। न किञ्चित्ते ददामीति शकटी निजगाद तम् ॥३२७॥ ततः स मूर्खः शकटं समं कृत्वैव तस्य तत्। तन्मे न किञ्चिद्देहीति तं ययाचे स चाहसत् ॥३२८॥ इति देव सदैव हास्यभावं परिभावं च जनस्य निन्द्यतां च। विपदास्पदतां च यान्ति मूढा इह सन्तस्तु भवन्ति पूजनीयाः ॥३२९॥ एवं स गोमुखमुखोक्तकथाविनोदैतन्निक्षम्य रजनौ सचिवैः समेतः। विश्रान्तिहेतुमनिरास्य जगत्श्रमस्य निद्रामियाय नरवाहनदत्तदेवः ॥३३०॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे शक्तियशोलम्बके पञ्चमस्तरङ्गः। षष्ठस्तरङ्गः नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता) ततः प्रातः समुत्थाय पितुर्वत्सेश्वरस्य सः। नरवाहनदत्तोऽत्र दर्शनायान्तिकं ययौ ॥१॥ तत्र पद्मावतीं देवीं भ्रातरि स्वगृहात्ततः। मागतं मगधेशस्य तनये सिंहवर्मणि ॥२॥ हृष्टस्वागतकथाप्रश्नप्रबार्बीदिवस गते। नरवाहनदत्तः स्वं मुक्त्वा मन्दिरमाययौ ॥३॥
दशम लम्बक ८४९
दशम लम्बक ८४९ एक मूर्ख योद्धा की कथा अब नापित के शावक की कथा सुनो। कर्णाट देश के एक वीर ने युद्ध में शूरता दिखाकर अपने स्वामी राजा को प्रसन्न किया। उस राजा ने भी प्रसन्न होकर उससे इच्छित वर माँगने को कहा। उस षण्ढक योद्धा ने राजा से उसके भाई को वर में माँगा ॥१२३-१२४॥ प्रत्येक व्यक्ति अपने चित्त के प्रमाण से अपना भला या बुरा चाहता है। अब कुछ न माँगनेवाले मूर्ख की कथा सुनो ॥१२५॥ 'कुछ न' माँगनेवाले मूर्ख की कथा राह चलते हुए एक मूर्ख से गाड़ी पर बैठे हुए एक व्यक्ति ने कहा- 'मेरी गाड़ी को कुछ बराबर कर दो' ॥१२६॥ उस मूर्ख ने कहा-'यदि मैं बराबर कर दूँगा तो क्या देगा ? तब गाड़ीवाले ने कहा- 'कुछ नहीं दूँगा। तब उस मूर्ख ने 'मुझे कुछ न दो' इस प्रकार कहकर गाड़ी को ठीक कर दिया और कुछ न दो माँगा। तब गाड़ीवान हँसने लगा ॥१२७-१२८॥ 'स्वामिन्, मूर्खजन इस प्रकार सदा हँसी के पात्र तिरस्कृत निन्दनीय और विपत्तियों के शिकार होते रहते हैं और बुद्धिमान् समाज में सम्मान पाते हैं ॥१२९॥ इस प्रकार, गोमुख के मुँह से कही गई कथाओं के विनोद को मन्त्रियों के साथ सुनकर युवराज नरवाहनदत्त रात में समस्त संसार को विश्राम देनेवाली नींद में सो गया ॥१३०॥ महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का पञ्चम तरंग समाप्त षष्ठ तरङ्ग नरवाहनदत्त की कथा (कथागत) रात बीतने पर प्रातःकाल नरवाहनदत्त उठकर पिता वत्सराज (उदयन) के दर्शन के लिए उनके पास गया ॥१॥ वहाँ महारानी पद्मावती के भाई और मगधराज (प्रद्योत) के पुत्र सिंहवर्मा के आने पर उनके स्वागत कुशल प्रश्न तथा अन्यान्य वार्तालाप में दिन व्यतीत होने पर नरवाहनदत्त भोजन करके अपने भवन में आया ॥२-३॥ १०
८५ कथासरित्सागर
८५ कथासरित्सागर तत्र शक्तियशः सोत्कं तं विनोदयितुं निशि । ततः स गोमुखो धीमानिमामकथयत् कथाम् ॥४॥ काकोलूकीयकथा बभूव क्वापि सञ्छायो महान्न्यग्रोधपादपः । शकुन्तशब्द्यैः पथिकान् विश्रमायाह्वयन्निव ॥५॥ तत्रासीन् मेघवर्णाख्यः काकराजः कृतालयः । तस्यावमर्द्दनामाभूदुलूकाधिपती रिपुः ॥६॥ स तस्य काकराजस्य तत्र रात्रावुलूकराट् । एत्य काकान् बहून् हत्वा कृत्वा परिभवं ययौ ॥७॥ प्रातः स काकराजोऽथ समाज्योवाच मन्त्रिणः । उड्डीम्पाडीविसण्डीविप्रडीविचिरजीविनः ॥८॥ स शत्रुः परिभूयास्मान् रूढशत्रुर्यो बली पुनः । आपतत्येव तत्तत्र प्रतीकारो निरूप्यताम् ॥९॥ तच्छ्रुत्वाभाषतोड्डीवी शत्रौ बलवति प्रभो । अन्यवेद्याद्य कार्यस्तस्यानुनयोऽथवा ॥१०॥ धूखैतदाडीब्याह स्म सह्यो न भयमप्यवः । पराश्रयं स्वशक्तिं च वीक्ष्य कुर्मो यथाक्षमम् ॥११॥ ततो जगाद सण्डीवी मरणं देव शोभनम् । न तु प्रणमनं शत्रोर्विषेणे वापि जीवनम् ॥१२॥ योद्धव्यं तेन साकं नः कृतावज्ञेन शत्रुना । राजा सहायवाञ्शूरः सोत्साहो जयति द्विषः ॥१३॥ अथ प्रडीवी वक्ति स्म न वध्यः स बली रणे । सन्धिं कृत्वा तु हन्तव्यः सम्प्राप्तावसरे पुनः ॥१४॥ चिरजीवी ततोऽवादीत् कः सन्धिर्धूत एव कः । आसृष्टि वैरं काकानामुल्लूकस्तत्र को ब्रजेत् ॥१५॥ मन्त्रसाध्यमिदं मन्त्रो मूलं राज्यस्य चोच्यते । श्रुत्वैतत्काकराजस्तं सोऽब्रवीच्चिरजीविनम् ॥१६॥ वृद्धस्त्वं वेत्सि चेत्तन्मे ब्रूहि त्वं केन हेतुना । काकोलूकस्य वैरिञ्च मन्त्रं वदयस्यतः परम् ॥१७॥
दशम लम्बक ८५१
दशम लम्बक ८५१ तब शक्तियशा के लिए उत्सुक नरवाहनदत्त का मनोरंजन करने के लिए बुद्धिमान् मन्त्री गोमुख ने यह कथा कही ॥४॥ कौओं और उल्लुओं की कथा१ किसी जंगल में बहुत बड़ा वटवृक्ष था। जो पक्षियों के कलरव से मानों पक्षियों के विश्राम के लिए सदा उन्हें बुलाता रहता था ॥५॥ उस बरगद पर मेघवर्ण नाम का कौओं का राजा घोंसला बनाकर रहता था। अवमर्द्द नाम का उल्लुओं का राजा उसका शत्रु था ॥६॥ वह उलूकराज एकबार रात में आकर, बहुत-से कौओं को मारकर काकराज का अपमान करके चला गया ॥७॥ प्रातःकाल ही काकराज ने मन्त्रियों को बुलाकर उन्हें सत्कार करके कहा। उसके मन्त्री थे—उड्डीवी आदीवी संडीवी प्रदीवी और चिरजीवी ॥८॥ काकराज ने कहा—'वह हमारा शत्रु उलूकराज हमारा स्थान जानता है और बलवान् भी है। वह इस प्रकार आक्रमण करता ही रहेगा। उसका प्रतीकार सोचो ॥९॥ यह सुनकर उड्डीवी मन्त्री बोला—'स्वामिन् शत्रु यदि बलवान् है तो दूसरे देश में आश्रय लेना चाहिए या उससे ही अनुनय-विनय करनी चाहिए कि वह आक्रमण न करे' ॥१०॥ यह सुनकर आदीवी बोला—'अभी तत्काल उसका इतना भय नहीं है। शत्रु का आशय (अभिप्राय) और अपनी शक्ति को समझकर यथासम्भव यत्न करना चाहिए' ॥११॥ यह सुनकर संडीवी बोला—'स्वामिन् मरना अच्छा है या विदेश में जाकर जीवन बिताना अच्छा है। किन्तु, शत्रु के सामने झुकना अच्छा नहीं ॥१२॥ हमें हानि पहुँचानेवाले शत्रु के साथ युद्ध करना चाहिए। सहायकाकांक्षा शूर और उत्साही राजा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है' ॥१३॥ उसके पश्चात् प्रदीवी ने कहा—वह शत्रु बलवान् है युद्ध में उसे जीता नहीं जा सकता। इस समय उससे सन्धि करके फिर अवसर मिलने पर उसे मारना चाहिए' ॥१४॥ तब चिरजीवी ने कहा—'सन्धि का दूत कौन होगा और सन्धि ही क्या होगी। कौओं और उल्लुओं की शत्रुता सृष्टि के प्रारम्भ से ही चली आ रही है। हमारे बीच कौन पड़ेगा' ॥१५॥ यह काम मन्त्र से सिद्ध होनेवाला है क्योंकि राज्य का मूल मन्त्र ही है। यह सुनकर काकराज चिरजीवी से बोला- ॥१६॥ 'तुम वृद्ध हो सब जानते हो यह बताओ कि कौए और उल्लुओं में वैर किस कारण हुआ। उसके पश्चात् मन्त्र (सम्मति) बताना' ॥१७॥ १ पंचतन्त्र के तीसरे काकोलूकीय तन्त्र की कथा मूल यही कथा है।—अनु
८५२ कथासरित्सागर
८५२ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा काकराजं तं चिरजीवी जगाद सः। वाग्दोषोज्झ्य श्रुता किं न गर्दभाख्यायिका त्वया ॥११८॥ केनापि रजकनस्य गर्दभः पुष्टये कृशः। परसस्येषु मुक्तोऽभूदाच्छाद्य द्वीपिचर्मणा ॥११९॥ स तानि खादन् द्वीपीति जनैस्त्रासान्न वारितः। एकेन ददृशे जातु कार्षिकेण धनुष्मता ॥१२०॥ स तं द्वीपीति मन्वानः कुब्जीभूय भयान्नतः। कम्बलावेटिततनुर्गन्तुं प्रवृभूते सत्वरम् ॥१२१॥ तं च दृष्ट्वा पलायान्तं खरोऽयमिति चिन्तयन्। खरस्तं स्वरस्तनोच्चैर्व्याहरत् सस्यपोषितः ॥१२२॥ तच्छ्रुत्वा गर्दभं मत्वा तमुपेत्य स कार्षिकः। अवधीच्छरघातेन कृतवैरं स्वया गिरा ॥१२३॥ एवं वाग्दोषतोऽस्माकमुल्लूकैः सह वैरिना। पूर्वं ह्यराजका आसन् कदाचिदपि पक्षिणः ॥१२४॥ ते सम्भूयारभन्ते स्म पक्षिराजाभिषेचनम्। सर्वे कर्तुमूलूकस्य ढौकितच्छत्रचामरम् ॥१२५॥ तावच्च गगनायातस्तद्दृष्ट्वा वायसोऽब्रवीत्। रे मूढाः सन्ति नो हंसकोकिलाद्या न किं खगाः ॥१२६॥ येन क्रूरबुधं पापमिममप्रियदर्शनम्। अभिपिञ्चिथ राज्येऽस्मिन् धिगुलूकमङ्गलम् ॥१२७॥ राजा प्रभाववान् कार्यो यस्य नामैव सिद्धिकृत्। तथा च शृणुतातैकां कथां वो वर्णयाम्यहम् ॥१२८॥ चतुर्दन्तगजस्य शशकानां च कथा अस्ति चन्द्रसरो नाम महद् भूरिजलं सरः। शिलीमुखाख्यस्तत्तीरेऽप्युवास शशकेश्वरः ॥१२९॥ तत्रावग्रहशुष्केऽन्यनिपाने गजयूथपः। चतुर्दन्ताभिधानोऽम्भः पातुमागात् कदाचन ॥१३०॥ १ पञ्चतन्त्रे कथेयम्—'महतां व्यपदेशेन सिद्धिः सम्भाव्यते परा। शशिनो व्यपदेशेन वसन्ति शशकाः सुखम्॥'—इत्येवं प्रारब्धा।
दशम लम्बक ८५१
दशम लम्बक ८५१ यह सुनकर चिरंजीवी काकराज से बोला— इस सारी शत्रुता का मूल कारण वाणी का दोष है। क्या तुमने गध की कथा नहीं सुनी ? ॥१८॥ किसी धोबी ने अपने दुर्बल गधे को पुष्ट करने के लिए बाघ के चमड़े से ढककर दूसरे के खेत में छोड़ दिया ॥१९॥ वह खेतों में फसलों को खाता था किन्तु 'यह बाघ है, इस भय से खेत के रखवाले उसे रोक नहीं सकते थे। कुछ समय बाद एक धनुर्धारी किसान ने उसे देखा ॥२०॥ वह भय से नम्र और कुबड़ा होकर शरीर को कम्बल से लपेटकर उधर से जाने लगा ॥२१॥ काला कम्बल ओढ़कर और कुबड़ा होकर जाते हुए उसे देखकर गधे ने उसे दूसरा गधा समझा और फसल खाये हुए गधे ने मस्ती में अपनी ढिंचूँ-पों आवाज लगाकर उसे बुलाना शुरू किया ॥२२॥ उसकी आवाज सुनने से उस किसान ने अपनी ही आवाज से अपना नाश करनेवाला गधा समझकर उसे बाण से मार डाला ॥२३॥ इसी प्रकार, वाणी-दोष के कारण ही हमारी उल्लुओं से शत्रुता है। पहले किसी समय पक्षी राजा से हीन थे ॥२४॥ उन्होंने एकत्र होकर पक्षिराज का अभिषेक प्रारम्भ किया और सभी ने छत्र चामर लगे उल्लू को राजा बनाने की तैयारी की। इतने में ही आकाश से आये हुए कौए ने यह देखकर कहा— 'अरे मूर्खो ! क्या हंस कोयल आदि और पक्षी नहीं हैं कि इस क्रूर, पक्षी अमंगल और देखने में भद्दे उल्लू को राजा बना रहे हो ? धिक्कार है ॥२५-२७॥ किसी प्रभावशाली व्यक्ति को राजा बनाना चाहिए, जिसका नाम ही सिद्धिदायक हो। इस विषय में एक कथा सुनो। मैं तुम लोगों से कहता हूँ ॥२८॥ चतुर्दन्त नाम के हाथी और खरगोशों की कथा¹ कहीं पर अथाह पानी से भरा चन्द्रसर नाम का एक तालाब था। उसके किनारे शिलीमुख नाम का खरहा का राजा रहता था ॥२९॥ उस वन में अनावृष्टि के कारण अन्य सभी जलाशयों के सूखने पर हाथियों के झुंड का एक चतुर्दन्त नामक सरदार किसी समय पानी पीने के लिए वहाँ आया ॥३०॥ १ पंचतन्त्र में इस कथा का प्रारम्भ इस प्रकार है— व्यपदेशेन महतां सिद्धि संञ्जायते परा। शशिनो व्यपदेशेन वसन्ति शशकाः सुखम्॥
८५४ कथासरित्सागर
८५४ कथासरित्सागर तस्य यूथेन शशका गाहमानेन तत्र ते । शिलीमुखस्य बहवः शशराजस्य चूर्णिताः ॥३१॥ ततो गजपतौ तस्मिन् गते सोऽत्र शिलीमुखः । दुःखितो विजयं नाम शशं प्राह्याससन्निधौ ॥३२॥ लब्धास्वादो गजेन्द्रोऽयं पुनः पुनरिहैष्यति । निःशेषयिष्यत्यस्मांश्च तदुपायोऽत्र चिन्त्यताम् ॥३३॥ गच्छ तस्यान्तिकं पश्य युक्तिः काप्यस्ति चेन्न वा । त्वं हि कार्यमुपायं च वेत्सि वक्तुं च युक्तिमान् ॥३४॥ यत्र यत्र गतस्त्वं हि तत्र तत्राभवच्छुभम् । इति स प्रेषितस्तेन प्रीतस्तत्र ययौ शनैः ॥३५॥ मार्गानुसारात् प्राप्तं च वारेन्द्रं ददर्श तम् । यथा तथा च युक्तं स्यात् सङ्गो बलिनेति सः ॥३६॥ शशोऽद्रिशिखरासङ्गो धीमांस्तमवदद् गजम् । अहं देवस्य चन्द्रस्य दूतस्त्वां चवमाह सः ॥३७॥ शीतं चन्द्रसरो नाम निवासोऽस्ति सरो मम । तत्रासते शशास्तेषां राजाऽहं ते च मे प्रियाः ॥३८॥ अत एवास्मि शीतांशू शशी चेति गतः प्रभाम् । तत्सरो नाशितं ते च शशका मे हतास्त्वया ॥३९॥ भूयः कर्तासि चेदेवं मत् प्राप्स्यसि तत्फलम् । एतद्दूताच्छशाच्छ्रुत्वा गजेन्द्रः सोऽब्रवीद् भयात् ॥४०॥ नैवं करिष्ये भूयोऽहं मान्यो मे भगवान्छशी । तदेहि दर्शयामस्ते यावत् प्रार्थये सखे ॥४१॥ इत्यूचिबान् स नागेन्द्रमानीय सरसोऽन्तरे । तत्र तस्मै धणश्चन्द्रप्रतिबिम्बमदर्शयत् ॥४२॥ तद्दृष्ट्वा दूरतो मत्वा भयात् कम्पसमाकुलः । नतं द्विपैन्द्रं स ययौ भूयस्तत्र न चाययौ ॥४३॥ प्रत्यक्षं तच्च दृष्ट्वा स शशराजः शिलीमुखः । सम्मान्य तं शशं दूतमवसत्तत्र निर्भयः ॥४४॥ इत्युक्त्वा वायसो भूयः पक्षिणस्तानभाषत । एवं प्रभुः स्वनाम्नैव मस्य कश्चिन्न बाधते ॥४५॥
द्वादश लम्बक ८५५
द्वादश लम्बक ८५५ उसके झुंड के वहाँ आने पर शिलीमुख के बहुत-से अनुचर खरहे, उसके पैरों से रौंदे जाकर चूर्ण बिचूर्ण-हो गए ॥३६१॥ हाथी-सरदार के चले जाने पर, दुःखित शिलीमुख ने सभी खरहों की सभा में विजय नामक खरहे से कहा-॥३६२॥ 'यह गजराज यहाँ जल का आनन्द पाकर बार-बार आयगा और हमलोगों को निक्षेप कर डालेगा । इसलिए, इस विषय में कोई उपाय सोचो ॥३६३॥ उसके पास जाओ । देखो कोई युक्ति लगती है या नहीं। तुम कार्य और उपाय सब जानते हो और बोलने में भी कुशल हो ॥३६४॥ तुम जहाँ-जहाँ गये वहाँ-वहाँ शुभ ही हुआ। 'इस प्रकार कहकर शिलीमुख से भेजा हुआ विजय प्रसन्न होकर वहाँ गया ॥३६५॥ मार्ग के अनुसार जाते हुए उसने गजराज को देखा और सोचने लगा कि जैसे-तैसे इस बलवान् का समागम हो। तब वह विजय नामक खरहा पहाड़ की चोटी पर चढ़कर उस हाथी से बोला- मैं राजा चन्द्रमा का दूत हूँ। उसने मुझे यह सन्देश दिया है ॥३६६-३७॥ चन्द्रसर नाम का शीतल सरोवर मेरा निवास-स्थान है। वहाँ शश (खरगोश या खरहा) रहते हैं वे मेरे प्यारे हैं। इसीलिए, मेरा नाम शीतांशु और शशी है। तूने उस सर को गंदला कर दिया और मेरे प्यारे शशों को मार डाला है ॥३६८-६९॥ यदि तुम फिर ऐसा करोगे तो उसका फल (दंड) पाओगे। दूत के मुँह से यह सन्देश सुनकर वह गजराज भय से बोला -॥४० ॥ 'अब फिर मैं ऐसा न करूँगा । भगवान् चन्द्रमा मेरे पूज्य हैं। आओ मुझे चन्द्रमा का दर्शन कराओ । मैं उनसे प्रार्थना करूँ' ॥४१॥ ऐसा कहते हुए उसे विजय ने ले जाकर रात्रि के जल में चन्द्रमा की परछाईं दिखा दी । ॥४२॥ इसे देखकर और भय से काँपते हुए गजराज ने प्रणाम किया। फिर वह जंगल को लौट गया और उसके बाद वह कभी उधर न आया ॥४३॥ इस घटना को आँखों से देखकर शशों के राजा शिलीमुख ने विजय नामक दूत का बहुत सम्मान किया और वहाँ निडर होकर रहने लगा ॥४४॥ ऐसा कहकर वह चीला उन पक्षियों से फिर बोला-'राजा ऐसा होना चाहिए जिसके नाम से ही कोई कष्ट न दे ॥४५॥
[८५६] कथासरित्सागर
[८५६] कथासरित्सागर
तदुलूको दिवाभोज्यः क्षुद्रो राज्यं कुतोऽर्हति । क्षुद्रश्च स्यादविश्वास्यस्तत्र चैतां कथां शृणु ॥४६॥ शशकपिञ्जलकथा¹ कदाचित् क्वापि वृक्षऽद्रुमवस तत्र चाप्यथ । पक्षी कपिञ्जलो नाम वसति स्म कृतालयः ॥४७॥ स कदाचिद् गत क्वापि यावन्न दिवसान् बहून् । आयाति तावत्तन्नीडं ततस्त्यः शशकोऽवसत् ॥४८॥ दिने कपिञ्जलोऽत्रागात् ततोऽस्य शशकस्य च । नीडो मे तव नेत्येव विवाद उदभूद्द्वयोः ॥४९॥ निर्णेतारं ततः सम्यगन्वेष्टुं प्रस्थितावुभौ । तावहं कौतुकाद् द्रष्टुमन्वगच्छमलक्षितः ॥५०॥ गत्वा स्तोकं सरस्तीरेऽहिंसाधृतमृषाव्रतम् । ध्यानाधोमीलितदृशं मार्जारं तावपश्यताम् ॥५१॥ एतमेव च पृच्छाव किं न्यायमिह धार्मिकम् । इत्युक्त्वा तौ बिडालं तमुपेत्यैवमवोचताम् ॥५२॥ शृणु नौ भगवन्न्यायं तपस्वी त्वं हि धार्मिकः । श्रुत्वैतदल्पया वाचा बिडालस्तौ जगाद सः ॥५३॥ न शृणोमि तपः क्षामो दूरादायात मेऽन्तिकम् । धर्मो ह्यसम्यङ् निर्णीतो निहन्त्युभयलोकयोः ॥५४॥ इत्युक्त्वाश्वास्य तावप्रमानीय स बिडालकः । उभावप्यवधीत्क्षुद्रः साकं शशकपिञ्जलौ ॥५५॥ तदेवं नास्ति विश्वासः क्षुद्रकर्मणि दुर्जने । [L23: तस्मादुलूको राज्याय न कर्त्तव्योऽतिदुर्जनः ॥५६॥ इत्युक्ताः पक्षिणस्तेन वायसेन तथेति ते । अभिषेकमुलूकस्य निवार्यैतस्ततो ययुः ॥५७॥ अद्यप्रभृति यूयं च वयं चाप्योन्यशत्रवः । स्मर यामीत्युलूकस्तं काकमुक्त्वा क्रुधा ययौ ॥५८॥
१ क्षुद्रमर्थपतिं प्राप्य व्यापारवधतत्परौ । उभावपि क्षयं प्राप्तौ पुरा शशकपिञ्जलौ ॥ पञ्चतन्त्रे—
द्वादश लम्बक ८५७
द्वादश लम्बक ८५७ तब दिन का अन्धा और क्षुद्र उल्लू कैसे राजा बन सकता है। सभी क्षुद्र व्यक्ति अविश्वासी होते हैं। इस विषय में एक कथा सुनो' ॥४६॥ शश और कपिञ्जल की कथा किसी समय किसी वृक्ष पर मैं (कौआ) रहता था और उसी वृक्ष के नीचे अपना घर बनाकर कपिञ्जल नाम का पक्षी भी रहता था ॥४७॥ वह कपिञ्जल किसी समय दूर देश को जाकर, जब बहुत दिनों तक नहीं लौटा तब उसके घोंसले में एक शश आकर रहने लगा ॥४८॥ कुछ दिनों बाद कपिञ्जल लौट आया तब उसे घोंसले के विषय में 'यह मेरा है, तेरा नहीं' दोनों में इस प्रकार का झगड़ा हो गया। तब वे दोनों इसका निर्णय करने के लिए किसी निर्णायक को ढूंढने निकले। कौतुकवश मैं भी छिपे-छिपे उन दोनों के पीछे-पीछे गया ॥४९-५०॥ कुछ दूर जाकर, उन्होंने किसी तालाब के किनारे झूठा अहिंसा-व्रत धारण किये हुए और ध्यान में आधी आँखें बन्द किये हुए एक बिलाव को देखा ॥५१॥ इसी धार्मिक व्यक्ति से न्याय क्यों न पूछें ऐसा कहकर वे दोनों उसके पास जाकर बोले—॥५२॥ 'भगवन् तुम धार्मिक और तपस्वी हो हमारे न्याय को सुनो। यह सुनकर वह बिलाव बहुत थोड़े शब्दों में उन दोनों से बोला—॥५३॥ 'मैं तपस्या से दुर्बल होने के कारण ऊँचा सुनता हूँ। इसलिए, तुम दोनों दूर से मेरे समीप आ जाओ। भली भाँति न दिया गया न्याय दोनों लोकों का नाश करता है' ॥५४॥ ऐसा कहकर और उन दोनों को पास बैठाकर, उस क्षुद्र बिलाव ने शश तथा कपिञ्जल दोनों को साथ ही मार डाला ॥५५॥ इसलिए, नीच कर्म करनेवाले दुर्जन का विश्वास न करना चाहिए। और इसीलिए, अत्यन्त दुर्जन (कुष्ट) उल्लू को राजा नहीं बनाना चाहिए ॥५६। कौए से इस प्रकार कहे गये पक्षी उसकी बात मानकर उल्लू का राज्याभिषेक रोककर इधर-उधर उड़ गये ॥५७॥ वह उल्लू 'आज से हम और तुम दोनों परस्पर शत्रु हुए। याद रखना अब मैं जाता हूँ' क्रोध पूर्वक इस प्रकार मुझसे कहकर चला गया ॥५८॥ १८
ब्राह्मणस्य धूर्तानां च कथा
काकोऽपि युक्तमुक्तं तु मत्वा खिन्नस्ततोऽभवत्। वाङ्मात्रोत्पादितासङ्ख्येरात्को नानुवप्यते ॥५९॥ एव वाञ्चोपसम्भूत वर न कौशििकै सह। इत्युक्त्वा काकराज त चिरजीव्यब्रवत् पुन ॥६०॥ बह्ववो यस्मिन्स्ते श्व जेतु शक्या न कौशिका। बह्ववो हि जयन्तीह शृणु चात्र निदर्शनम् ॥६१॥ ब्राह्मणस्य धूर्तानां च कथा छाग क्रीत गृहीत्वांसे ग्रामात्कोऽपि व्रजन् द्विज। बहुभिर्ददृशे मार्गे धूर्तैश्छाग जिहीर्षुभि ॥६२॥ एकश्च तेम्य आगत्य तमुवाच ससम्भ्रमम्। ब्रह्मन्कथमय स्कन्धे गृहीत श्वा त्वया त्यज ॥६३॥ सच्छ्रुत्वा तमनादृत्य स द्विज प्राक्रमत्तदा। ततोऽन्यो द्वावुपेत्यान्रे तद्वदेव तमूचतु ॥६४॥ तत ससशमो यावद्याति च्छाग निरुपयन्। तावन्त्ये त्रयोऽभ्येत्य समेवमवदञ्छठाः ॥६५॥ क्वच यज्ञोपवीत त्व श्वानं च वहसे समम्। नून व्याधो न विप्रस्त्वं हन्त्यनेन शुना मृगान् ॥६६॥ तच्छ्रुत्वा स द्विजो दध्यौ नून भूतन् केनचित्। भ्रान्गितोऽह दुद्य ह्रुत्वा सर्वे पश्यन्ति वि मृषा ॥६७॥ इति विप्र स त त्यक्त्वा छागं स्नात्वा गृह ययौ। धूर्ताश्च नीत्वा तमजं यथेच्छं समभक्षयन् ॥६८॥ काकोलकीयकथाया शेषोऽशः इत्युक्त्वा चिरजीवी त वायसश्वरमब्रवीत्। तदेवं देव बह्वो यसवन्तदप दुर्जया ॥६९॥ तम्माद्यत्नविरोपण्डेस्मिन् यन्न्ं वष्मि तत्शृ। विक्षिप्यन्तश्छिप्रमन्डाश मां रक्तक्वाग्पंश्च सङ्गोप्य ॥७०॥ यूय गिर्गिमम यात श्लाथों यावदेम्यहम्। लब्ध्वत्वा स मयोपत्र त्रय्यात्ष्टिणगच्छ्म्॥७१॥ श्चत्वाधत्त गिरि प्रायात् वायसराज स मानुग। चिरञ्जीवी तु तत्राशीत् पतित्वा न्वन्तरोन्ममे ॥७२॥
दशम लम्बक ८५९
दशम लम्बक ८५९ इस कारण कौआ भी 'कहा तो ठीक' ऐसा सोचकर व्याकुल हुआ। केवल वाणी से उत्पन्न हुए असह्य वैर से किसे पश्चात्ताप नहीं होता ॥५९॥ इस प्रकार वाणी के अपराध से हमारे और उल्लुओं के बीच वैर हो गया। काकराज से इस प्रकार कहकर चिरजीवी फिर बोला—॥६० ॥ 'महाराज वे उल्लू संख्या में बहुत हैं और हमसे बलवान् भी हैं। इसलिए, युद्ध के द्वारा जीते नहीं जा सकते। अधिक संख्यावाले ही विजय प्राप्त करते हैं। इस सम्बन्ध में एक उदाहरण सुनो' ॥६१॥ ब्राह्मण और धूर्तों की कथा एक कोई ब्राह्मण एक बकरा खरीदकर और उसे कन्धे पर रखकर जा रहा था। उसे मार्ग में बकरा ठग लेने की इच्छा रखनेवाले कई धूर्तों ने देखा ॥६२॥ उनमें से एक ने उसके पास आकर घबराहट के साथ कहा—'ब्राह्मण देवता तुमम इस कुत्ते को कन्धे पर क्यों रख लिया ? इसे छोड़ो' ॥६३॥ यह सुनकर उसकी परवाह न करके ब्राह्मण आगे चला। तब उसे दूसरे दो धूर्त आगे मिले और बोले-'अरे, तुम जनेऊ और कुत्ता दोनों को एक साथ कन्धे पर रखे हुए हो कैसा ब्राह्मण हो? तब वह बकरे को भली भांति देखता हुआ कुछ आगे गया तो तीन और धूर्त उसे मिले और बोले— तुम अवश्य बहेलिये हो ब्राह्मण नहीं। इस कुत्ते के द्वारा मृगों को मारते हो' ॥६४—६६॥ यह सुनकर ब्राह्मण ने सोचा कि अवश्य ही किसी भूत ने मेरी आंखों का हरण कर मुझे धोखा दिया है, अन्यथा क्या ये सभी व्यक्ति इसे झूठ देख रहे हैं? ॥६७॥ यह सोचकर बकरे को वहीं छोड़कर और स्नान करके वह घर गया और उधर वे धूर्त उस बकरे को लेकर आनन्दपूर्वक खा गए ॥६८॥ कौए और उल्लुओं की कथा का संबंध ऐसा कहकर चिरजीवी काकराज से बोला—'अतः महाराज बहुत और बलवान् दुर्जय होते हैं। इसलिए, मैं इन बलवान् के साथ विरोध में जो कहता हूँ वह करो। तुम लोग मेरे पंखों को कुछ नोचकर इसी पेड़ के नीचे फेंककर उस पहाड़ पर चले जाओ। तबतक मैं कार्य करके (सफल होकर) आता हूँ ॥६९—७१ ॥ यह सुनकर काकराज सोच में कुछ पंखों को नोचकर और चिरजीवी को नीचे फेंककर मंन्त्री अपने अनुयायियों के साथ पहाड़ की ओर चला गया और चिरजीवी स्वयं उल्लुओं के
८६ कथासरित्सागर
८६ कथासरित्सागर ततस्तत्राययौ रात्रौ सानुगः स उलूकराट्। अवमर्दो न चापश्यत्तत्रैकमपि वायसम्॥७३॥ तावत् स चिरजीव्यत्र मन्द मन्दं विरौत्यधः। श्रुत्वा चोलूकराजस्तमवतीर्य ददर्श सः॥७४॥ कस्त्वं किमवस्थोऽसीत्यपृच्छत्तं सविस्मयः। ततः स चिरजीवी तं रुजेवाल्पस्वरोऽवदत्॥७५॥ चिरजीवीत्यहं तस्य सचिवो वायसप्रभोः। स च दातुमवस्कन्दमच्छते मन्त्रिसम्मतम्॥७६॥ ततस्तन्मन्त्रिणोऽन्यांस्तान्निर्भर्त्स्याहं समब्रवम्। यदि पृच्छसि मां मन्त्रं यदि चाहं मतस्तव॥७७॥ तन्न कार्यो बलवता कौशिकेन्द्रेण विग्रहः। कार्यस्त्वनुनयस्तस्य नीतिं चेदनुमन्यसे॥७८॥ श्रुत्वैतच्छत्रुपक्षोऽयमिति क्रोधात्प्रहृत्य मे। स काकः स्वैः समं मित्रैर्मूर्खोऽवस्थामिमां व्यधात्॥७९॥ क्षिप्त्वा च मां तरुतले क्वापि सानुचरो गतः। इत्युक्त्वा चिरजीवी स श्वसन्नासीदधोमुखः॥८०॥ उलूकराजश्च ततः स पप्रच्छ स्वमन्त्रिणः। किमेतस्य विधातव्यमस्माभिश्चिरजीविनः॥८१॥ तच्छ्रुत्वा दीप्तनयनो नाम मन्त्री जगाद तम्। अवध्यो रक्ष्यते चोरोऽप्युपकारीति सज्जनैः॥८२॥ वृद्धवणिक्चौरस्य च कथा तथाहि पूर्वं क्वाप्यासीद् वणिक्कोऽपि स कामपि। वृद्धोऽप्यर्थप्रभावेण परिणिन्ये वणिज्सुताम्॥८३॥ सा तस्य शयने नित्यं जरात्तोऽभूत् पराङ्मुखी। व्यतीतपुष्पकालेऽत्र भ्रमरीव तरोर्वने॥८४॥ एकदा चाविशच्चोरो निधिं सम्भ्यासयोस्तयोः। तं दृष्ट्वा सा परावृत्य तमाश्लिष्यत् पतिं भयात्॥८५॥
दशम लम्बक ८६१
दशम लम्बक ८६१ तब रात में उल्लूकराज असमर्थ अपने सहयोगियों के साथ वहाँ आया और उसने वहाँ एक भी कौए को न देखा ॥७३॥ तब चिरंजीवी नीचे पड़ा हुआ धीरे-धीरे कराहने लगा । उसका कराहना सुनकर उल्लूकराज ने नीचे आकर उसे देखा ॥७४॥ और आश्चर्य के साथ उससे पूछा—'तू कौन है और तेरी ऐसी दशा क्यों है ? तब वह चिरंजीवी वेदना से लड़खड़ाती हुई वाणी में धीरे से बोला ॥७५॥ “मैं चिरंजीवी नाम का काकराज का सचिव हूँ । वह अन्य मन्त्रियों की सम्मति से तुम पर आक्रमण करना चाहता था ॥७६॥ तब मैंने उसे और उसके अन्य मन्त्रियों को डाँटते-फटकारते हुए कहा—'यदि तुम मुझसे सम्मति पूछते हो और मुझे मानते हो और यदि नीति को मानते हो तो उसके अनुसार उस बलवान् उल्लूकराज से विरोध न करना चाहिए प्रत्युत उससे अनुनय-विनय करनी चाहिए ॥७७-७८॥ यह सुनकर यह शत्रु का पक्षपाती है'—ऐसा कहकर और क्रोध से मुझपर प्रहार करके उस मूर्ख कौए ने अपने साथियों के साथ मेरी यह दुर्दशा कर डाली ॥७९॥ तदनन्तर मुझे वृक्ष के नीचे फेंककर अपने अनुयायियों के साथ वह कहीं भाग गया। कहकर चिरंजीवी ने लम्बी साँस लेकर अपना मुंह लटका दिया ॥८० ॥ यह सुनकर उल्लूकराज ने अपने मन्त्रियों से पूछा कि अब हमें इस चिरंजीवी का क्या करना चाहिए' ॥८१॥ उल्लूकराज का यह प्रश्न सुनकर उसका दीप्तनयन नाम का मन्त्री उससे बोला—'अरक्षणीय चोर भी उपकारी समझकर सज्जनों द्वारा रक्षा करने योग्य है ॥८२॥ वृद्ध बनिया और चोर की कथा प्राचीन समय में कहीं एक बनिया था। वृद्ध होने पर भी उसने धन के प्रभाव से किसी बनिये की कन्या से विवाह कर लिया ॥८३॥ वह वैश्य-कन्या रात में बिस्तर पर उस बनिये से इस प्रकार मुंह फेरकर सोती थी जैसे वन में वसन्त-काल के बीतने पर भ्रमरी वृत्त से विमुख हो जाती है ॥८४॥ एक बार, रात में जब वे दोनों शय्या पर सो रहे थे तब घर में चोर घुस आया। यह देखकर उस कन्या ने भय से (पति की ओर) करवट बदलकर उस वृद्ध पति का आलिंगन किया ॥८५॥
४६२ कथासरित्सागर
४६२ कथासरित्सागर सममभ्युदयमाश्चर्यं मत्वा यावन्निरीक्षते । विवस्तत्र वणिक्तावत्कोणे चौरं ददर्श तम् ॥८६॥ उपकार्यसि मे तत्त्वां न मृत्यवेऽतिसृजाम्यहम् । इत्युक्त्वा सोऽथ चौरं तं रक्षित्वा प्राहिणोद् वणिक् ॥८७॥ एवं रक्ष्योज्प्यमस्माकं चिरजीव्युपकारकः । इत्युक्त्वा दीप्तनयनो मन्त्री तूष्णीं बभूव सः ॥८८॥ ततोऽन्यं वक्रनासाख्यं मन्त्रिणं कौशिकेश्वरः । स पृच्छति स्म किं कार्यं सम्यग्वक्तुं भवानिति ॥८९॥ वक्रनासस्ततोऽवादीद्वध्योऽप्य परमम्बित् । अस्माकमेतयोर्वैरं श्रेयसे स्वामिमन्त्रिणोः ॥९०॥ राक्षसचौर्योः कथा निदर्शनायैषा दैव श्रूयतामत्र वच्मि ते । कश्चित्प्रतिग्रहेण द्वे गावो प्राप द्विजोत्तमः ॥९१॥ तस्य दृष्ट्वाथ चौरस्ते गावो नेतुमचिन्तयत् । तत्कालं राक्षसः कोऽपि समैच्छत् खादितुं द्विजम् ॥९२॥ तदद्य निशि गच्छन्तौ दैवात्तौ चौरराक्षसौ । मिलित्वाऽन्योन्यमुक्तार्थौ यत्र प्रययतुः समम् ॥९३॥ अहं धेनू हराम्यादौ त्वद्गृहीतो ह्ययं द्विजः । सुप्तो यदि प्रबुध्येतद्वेरयं गोयुगं कथम् ॥९४॥ मव हराम्ह पूर्वं विप्रं मोचेद्वृथा मम । भवद्गोपुरशब्देन प्रबुद्धेऽस्मिन् परिश्रमः ॥९५॥ इति प्रविश्य तद्विप्रसदनं चौरराक्षसौ । यावतौ कलहायेतं तावत्प्राबोधि स द्विजः ॥९६॥ उत्थायात्तकृपाणं च तस्मिन् रक्षोघ्नजापिनि । त्रासाणे जग्मतुश्चौरराक्षसौ द्वौ पलाय्य तौ ॥९७॥ एवं तयोर्मिथो भङ्गो हितायाभूद्द्विजन्मनः । तथा भेदो हितोऽस्माकं शत्रोश्चिरजीविनोः ॥९८॥ इत्युक्तो वक्रनासेन कौशिकेन्द्रः स्वमन्त्रिणम् । तं च प्राकारकर्णाख्यमपृच्छत्सोऽप्यवाच तम् ॥९९॥