कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
दशम लम्बक १५१
दशम लम्बक १५१ राजा ने भी उस दुष्टा स्त्री द्वारा दिखाये हुए आभूषणों के साथ उस बोधिसत्त्व को सेवकों से बँधवाकर बुलवाया ॥११९६॥ उससे सारा वृत्तान्त पूछकर और उसे सच मानकर भी राजा ने सारे आभूषण ले लिये और उसे कारागार में डाल दिया ॥११९७॥ कारागार में पड़े हुए उस बोधिसत्त्व ने ऋषिकुमार के अवतार उस सर्प का स्मरण किया। स्मरण करते ही वह उसके पास आकर उपस्थित हुआ ॥११९८॥ उसे देखकर और समाचार पूछकर सर्प ने साधु से कहा- मैं जाता हूँ और पैर से सिर तक राजा को लपेट लेता हूँ ॥११९९॥ जबतक तुम जाकर नहीं कहोगे कि इसे छोड़ दो तबतक मैं उसे नहीं छोडूंगा। तुम भी यहाँ से कहना कि मैं राजा को सर्प से छुड़वा देता हूँ ॥१२००॥ तुम्हारे वहाँ आने पर और कहने पर मैं राजा को छोड़ दूँगा और मुझसे मुक्त किया गया राजा तुम्हें अपना आधा राज्य दे देगा' ॥१२०१॥ ऐसा कहकर सर्प ने जाकर राजा को लपेट लिया और उसके सिर पर तीनों फन फैला दिये॥१२०२॥ तदनन्तर, चारों ओर कोलाहल मच गया कि राजा को सर्प ने काट लिया। तब बोधि- सत्त्व ने कहा—मैं राजा की सर्प से रक्षा कर सकता हूँ ॥१२०३॥ उसकी बात को सुननेवाले सेवकों ने यह बात राजा से कही तब राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—॥१२०४॥ 'यदि तू मुझे इस सर्प से बचा ले तो मैं तुझे आधा राज्य दे दूँगा। ये मेरे मन्त्री मेरी और तेरी इस बात के साक्षी हैं' ॥१२०५॥ यह सुनकर मन्त्रियों के स्वीकार करने पर बोधिसत्त्व ने सर्प से कहा— राजा को शीघ्र छोड़ दो' ॥१२०६॥ तब उस सर्प से छोड़े गये राजा ने उस महात्मा को आधा राज्य दे दिया और स्वयं भी वह पूर्ण स्वस्थ हो गया ॥१२०७॥ सर्प-रूपी वह मुनिकुमार भी शाप से मुक्त होकर, सभा में अपना वृत्तान्त सुनाकर अपने आश्रम को चला गया ॥१२०८॥ इस प्रकार, शुभ विचारवाला को अवश्य ही कल्याण प्राप्त होता है और बुरे विचार वाले महान् व्यक्तित्व को भी क्लेश प्राप्त होता है ॥१२०९॥ अविश्वास की पात्र स्त्रियों के हृदय में ज्ञान होने पर भी उपकार स्थान प्राप्त नहीं कर सकता अधिक क्या कहा जाय ॥१२१०॥
१५२ कथासरित्सागर
१५२ कथासरित्सागर इत्याख्याय कथां वत्सराजपुत्रं स गोमुखः। उवाच कथयाम्येतां पुनर्मूग्धकथां शृणु॥१३१॥ बभूव श्रमणः कश्चिद्वहारे क्वापि मूढधीः। स रथ्यायां भ्रमन् जातु शुना जानुन्यदश्यत॥१३२॥ श्वदष्टः स विहारं स्वमुपागत्य व्यचिन्तयत्। किं वृत्तं जानुनि तवेत्येकैकः प्रक्ष्यतीह माम्॥१३३॥ प्रत्याययिष्याम्येष च कियतोऽहं कियच्चिरम्। तदुपायं करोम्यत्र सर्वान् बोधयितुं सकृत्॥१३४॥ इत्यालोच्य समारुह्य स विहारोपरि द्रुतम्। गृहीत्वा ग्रन्थिमुसलं मूढो भिक्षुरवादयत्॥१३५॥ अकारणमकाले किं ग्रन्थिं वादयसीति तम्। श्रुत्वाश्चर्येण मिलिताः पप्रच्छुरथ भिक्षवः॥१३६॥ शुना मे भक्षितं जानु तदेकैकस्य पृच्छतः। ब्रूवेऽहं कियवित्येव यूयं सङ्कट्टिता मया॥१३७॥ तद्बुध्यध्वं समं सर्वे जानु मे पश्यतेति सः। भिक्षून् प्रत्यब्रवीदेतान् स्वदष्टं जानु दर्शयन्॥१३८॥ ततः पार्श्वोपपीडं ते समग्रा भिक्षवोऽहसन्। कियन्मात्रे कृतोऽनेन संरम्भोऽयं कियानिति॥१३९॥ डक्कमूर्खकथा आख्यातः श्रमणो मूर्खष्टक्कमूर्खो निशम्यताम्। कदर्थः कोऽप्यभूत् क्वापि मूर्खष्टक्को महाधनः॥१४०॥ सभार्यः स सदा भुङ्क्ते सक्तूत्सवणवर्जितान्। अन्यस्यान्नस्य बुबुधे नैव स्वादं स जातुचित्॥१४१॥ एकदा प्रेरितो धात्रा स भार्यामब्रवीन्निजाम्। क्षीरिणीं प्रति जाता मे श्रद्धा तामद्य मे पच॥१४२॥ तथेति तस्य सा भार्या पपाच क्षीरिणीं तदा। तस्या भाम्यन्तरे गुप्तं स टक्कः स्वयमन्वित्॥१४३॥ दृष्ट्वा प्राघुणिकः कश्चिदत्र मे मा स्म भूदिति। तावत्तस्य सुहृद्धूर्तष्टक्कस्तत्रक आययौ॥१४४॥ १ टक्को बाह्लीकदेशोद्भवः पुंस्त्वं।
द्वादश लम्बक १५३
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गोमुख ने वत्सराज को इस प्रकार कथा सुनाकर कहा—'अब फिर और कुछ मूर्खों की कथाएँ सुनो ।।१३१।। कहीं पर किसी बौद्धमठ (विहार) में एक मूर्ख भिक्षु रहता था। गलियों में भिक्षार्थ घूमते हुए किसी समय एक कुत्ते ने घुटने में काट लिया था ।।१३२।। कुत्ते का काटा हुआ वह मूर्ख अपने मठ में आकर सोचने लगा कि मेरे घुटने में पट्टी बँधी देखकर प्रत्येक भिक्षु मुझसे पूछेगा कि 'तेरे घुटने में क्या हो गया ? ।।१३३।। इस प्रकार मैं कितनों को कितने समय तक बताता रहूँगा । इसलिए, सब को एक बार ही अपना हाल बताने का उपाय करता हूँ ।।१३४।। ऐसा सोचकर और मठ की छत पर चढ़कर घड़ियाल बजाने का मूसल लेकर उसने उसे बजा दिया। बिना कारण असमय में यह घड़ियाल क्यों बजाता है, यह सुनकर सभी भिक्षु आश्चर्य के साथ वहाँ एकत्र हो गये और उससे घंटा बजाने का कारण पूछने लगे ।।१३५-१३६।। 'मेरे घुटने में कुत्ते ने काट लिया है' इस बात को एक-एक करके मैं कबतक और कितनों को बताता रहूँगा । यही एक बार बताने के लिए मैंने आपलोगों को यहाँ एकत्र किया है' ।।१३७।। 'इस बात को आप सब लोग जान लें और मेरे घुटने को देख लें भिक्षुओं' का ऐसा कहकर उसने अपना घुटना सबको दिखा दिया । तब वे सब भिक्षु पेट पकड़कर हँसने लगे कि इतनी-सी बात के लिए इसने कितना प्रपंच रचा ।।१३८-१३९।।
मूर्ख टक्क की कथा मूर्ख श्रमण की कथा सुनी अब एक मूर्ख टक्क की कथा सुनो। किसी स्थान पर एक अत्यन्त कंजूस टक्क रहता था जो बहुत धनी था ।।१४० ।। वह अपनी पत्नी के साथ सदा बिना नमक का सत्तू खाता था उसने सत्तू के सिवाय दूसरे अन्न का कभी स्वाद भी नहीं जाना ।।१४१।। एक बार ईश्वर की प्रेरणा से उसने अपनी पत्नी से कहा— 'आज मेरा मन खीर खाने को है । इसलिए आज तुम खीर पकाओ' ।।१४२।। 'ठीक है' कहकर उसकी पत्नी खीर पकाने लगी और वह मूर्ख घर के भीतर खाट पर जाकर पड़ गया कि मुझे बाहर बैठा देखकर कोई मेहमान न आ जाय । इतने में ही उसका एक मित्र धूर्त टक्क आ गया ।।१४३॥-१४४।।
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१५४ कथासरित्सागर
१५४ कथासरित्सागर
क्व च भर्त्तेति पप्रच्छ स च तां तस्य गेहिनीम्। साप्यदत्तोत्तरा तस्य प्राविशद्भर्तुरन्तिकम् ॥१४५॥ आख्यातमित्रागमना सोऽपि भार्यां जगाद ताम्। उपविश्येह रुदती पादावाशय तिष्ठ मे ॥१४६॥ भर्त्ता मे मृत इत्येव वदस्व सुहृदं मम। ततो गतेऽस्मिन्प्रावाभ्यां भोक्तव्या क्षीरिणी सुखम् ॥१४७॥ इत्युक्ता तेन यावत्सा प्रवृत्ता रवितुं तदा। तावत् प्रविश्य सोऽपृच्छत्किमेतदिति तां सुहृत् ॥१४८॥ भर्त्ता मृतो मे पश्येति तयोक्तः स व्यचिन्तयत्। क्व पचन्ती मया दृष्टा सुखिता क्षीरिणीमियम् ॥१४९॥ क्वाधुनेष विपन्नोऽप्रमत्तवन्मर्त्ता विना रुजम् नूनं मां प्राघुणं दृष्ट्वा कृतमाभ्यामिदं मृषा ॥१५०॥ तन्मया नैव गन्तव्यमित्यासोऽप्युपविश्य सः। धूर्त्तो हा मित्र हा मित्रेत्याक्रन्दस्तत्र तस्थिवान् ॥१५१॥ श्रुताक्रन्दा प्रविश्याथ बान्धवा मृतवत्स्थितम्। श्मशानं भीतटक्कं च नेतुमासन् समुद्यताः ॥१५२॥ उत्तिष्ठ बान्धवैर्यावन्नीत्वा न दह्यसे। इत्युपादवदत् कर्णमूले भार्या तदा च तम् ॥१५३॥ मव शठोऽस्य टक्को मे क्षीरिणीं भोक्तुमिच्छति ॥ मोत्तिष्ठामि तवेवस्मिन्गतेऽहृ मृतो यदि ॥१५४॥ प्राणेभ्योऽप्यन्नमुष्टिर्हि मादृशानां गरीयसी। इति प्रत्यब्रवीद् भार्यामुपांश्वेव स तां जडः ॥१५५॥ ततस्तेन कुमित्रेण नीत्वा तैः स्वजनैश्च सः। दह्यमानोऽपि निश्चेष्टो ददौ नामेरणाद्रवम् ॥१५६॥ एव स मूढो विजहौ प्राणान् क्षीरिणीं पुनः। रुषाजितं च बुभुज तस्यान्यैहंस्या धनम् ॥१५७॥
मार्जारमूर्खस्य कथा
धृत कदर्ये श्रूयन्ताममी मार्जारभौतकाः। उज्जयिन्यामुपाध्यायो मुग्धः कोऽप्यभवन् मठे ॥१५८॥ सत्र निद्रा न तस्याभून्मूपकोपत्रवाग्निधि। तत्खिन्नस्तच्च सुहृदे स कस्मैचिद्वयवर्ययत् ॥१५९॥
दशम लम्बक १५५
दशम लम्बक १५५ उसने उसकी स्त्री से पूछा कि तुम्हारा पति कहाँ है। वह भी उसे उत्तर न देकर पति के पास चली गई ॥१४५॥ पति को मित्र के आने की सूचना देती हुई स्त्री से उसने कहा—'मेरे पास पैरों को पकड़ कर रोती हुई बैठी रहो' और मेरे मित्र से कहना कि मेरा पति मर गया है। उसके चले जाने पर हम दोनों सुख से खीर खायेंगे' ॥१४६-१४७॥ पति की यह आज्ञा पाकर वह बैठकर रोने लगी। तब उस मित्र मेहमान ने स्त्री से पूछा कि 'यह क्या हुआ ? ॥१४८॥ 'देखो मेरा पति मर गया उसने इस प्रकार कहा। उसके ऐसा कहने पर उस धूर्त मित्र ने सोचा—'कहाँ तो मैंने इसे आनन्द से खीर पकाती हुई देखा था और कहाँ अभी-अभी इसका पति बिना किसी रोग के मर गया। अवश्य ही इन दोनों ने मुझे देखकर यह ढोंग रचा है ॥१४९-१५०॥ इसलिए, मुझे अब यहाँ से न जाना चाहिए,—ऐसा सोचकर वह भी वहीं जमकर बैठ गया। और 'हाय मित्र हाय मित्र'—इस प्रकार रोने-चिल्लाने लगा ॥१५१॥ उसका चिल्लाना सुनकर उसके पड़ोस के सभी बन्धु और मित्र वहाँ आ गये और उसे मरा हुआ देखकर उस मूर्ख टक्क को श्मशान ले जाने की तैयारी करने लगे ॥१५२॥ तब उसकी स्त्री ने एकान्त में उसके कान में कहा—'उठो। नहीं तो ये सारे भाई बन्धु तुझे श्मशान में ले जाकर फूंक डालेंगे' ॥१५३॥ उसने कहा—'ऐसा न होगा। यह धूर्त टक्क मेरी खीर खाना चाहता है। अतः मैं जब मर गया हूँ तब इसके यहाँ से गये बिना न उठूँगा ॥१५४॥ मेरे जैसे लोभों के लिए एक मुट्ठी अन्न भी प्राण से अधिक है। उस मूढ ने एकान्त में ही इस प्रकार अपनी पत्नी से कहा ॥१५५॥ तब उस दुष्ट मित्र ने बन्धु बान्धवों के साथ उसे ले जाकर चिता में फूंक दिया किन्तु वह मरते समय भी तनिक भी हिला-डुला नहीं और न मुंह से ही कुछ बोला ॥१५६॥ इस प्रकार उस मूर्ख ने खीर के पीछे अपने प्राण दे दिये और इतने कष्टों से कमाया हुआ उसका धन दूसरा न भोगा ॥१५७॥ मार्जार-मूर्ख की कथा कञ्जूस की कथा सुनी अब मार्जार-मूर्ख की कथा सुनो—'उज्जयिनी के किसी मठ में एक मूर्ख अध्यापक रहता था ॥१५८॥ चूहों के उपद्रव के कारण रात को उसे नींद नहीं आती थी इस कारण दुःखी होकर उसने अपने किसी मित्र से अपना यह कष्ट सुनाया ॥१५९॥
१५४ कथासरित्सागर
१५४ कथासरित्सागर क्व ते भर्तेति पप्रच्छ स च तां तस्य गेहिनीम्। साप्यदत्तोत्तरा तस्य प्राविशद्भर्तुरन्तिकम् ॥१४५॥ आख्यातमित्रागमना सोऽपि भार्या जगाद ताम्। उपविश्येह रुदती पादावादाय तिष्ठ मे ॥१४६॥ भर्त्ता म मृत इत्येव वदेरेष सुहृद् मम। शठो गतेऽस्मिन्नावाभ्यां भोक्तव्या क्षीरिणी सुखम् ॥१४७॥ इत्युक्ता तन यावत्सा प्रवृत्ता रोदितुं तथा। तावत् प्रविश्य सोऽपृच्छत्किमवेविति तां सुहृत् ॥१४८॥ भर्त्ता मृतो म पश्येति तयोक्तः स व्यचिन्तयत्। क्व पचन्ती मया दृष्टा सुसिता क्षीरिणीमियम् ॥१४९॥ क्वाधुनैव विपन्नोऽयमवङ्भर्त्ता बिना रुजम् नूनं मां प्राघुणं दृष्ट्वा कृतमाभ्यामिदं मृषा ॥१५०॥ तन्मया नैव गन्तव्यमित्यालोच्योपविश्य सः। धूर्त्तो हा मित्र हा मित्रेत्याक्रन्दस्तत्र तस्थिवान् ॥१५१॥ [L16: श्रुताक्रन्दाः प्रविश्यात्र बान्धवा मृतवत्स्थितम्। श्मशानं भोटटक्कं स नेतुमासन् समुद्यताः ॥१५२॥ उत्तिष्ठ बान्धवैर्यावदेतैर्नीत्वा न बध्यसे। इत्युपांश्ववदत् कर्णमूले भार्या तदा च तम् ॥१५३॥ मैवं शठोऽस्य टक्को मे क्षीरिणीं भोक्तुमिच्छसि ॥ नोत्तिष्ठामि तदेतस्मिन्नगतेऽङ्ग मृतो यदि ॥१५४॥ प्राणेभ्योऽप्यन्नमुष्टिर्हि मादृशानां गरीयसी। इति प्रत्यब्रवीद् भार्यामुपांश्व स तां जडः ॥१५५॥ ततस्तेन कुमित्रेण नीत्वा तं स्वजनश्च सः। दह्यमानोऽपि निर्दग्धो ददौ नामरणाद्वचः ॥१५६॥ एवं स मूढो विजहौ प्राणान्न क्षीरिणीं पुनः। कलहार्जितं च बुभुजे तस्यान्यहँस्तया पुनम् ॥१५७॥
मार्जारमूषकस्य कथा श्रुतं रूपं शृण्वताममी मार्जारभीतकाः। उज्जयिन्यामुपाध्यायो मुग्धः कोऽप्यभवन् मठे ॥१५८॥ तत्र निद्रा न तस्याभून्मूषकोपद्रवान्निशि। तस्मिंस्तस्य सुहृदे स कस्मैचिदवर्णयत् ॥१५९॥
दशम लम्बक १५५
दशम लम्बक १५५ उसने उसकी स्त्री से पूछा कि तुम्हारा पति कहाँ है। वह भी उसे उत्तर न देकर पति के पास चली गई ॥१४५॥ पति को मित्र के आने की सूचना देती हुई स्त्री से उसने कहा—'मेरे पास पैरों को पकड़ कर रोती हुई बैठी रहो' और मेरे मित्र से कहना कि मेरा पति मर गया है। उसके चले जाने पर हम दोनों सुख से खीर खायेंगे' ॥१४६-१४७॥ पति की यह आज्ञा पाकर वह बैठकर रोने लगी। तब उस मित्र मेहमान ने स्त्री से पूछा कि 'यह क्या हुआ ?' ॥१४८॥ 'देखो मेरा पति मर गया' उसने इस प्रकार कहा। उसके ऐसा कहने पर उस धूर्त मित्र ने सोचा—'कहाँ तो मैंने इसे आनन्द से खीर पकाती हुई देखा था और कहाँ अभी-अभी इसका पति बिना किसी रोग के मर गया। अवश्य ही इन दोनों ने मुझे देखकर यह ढोंग रचा है ॥१४९-१५०॥ इसलिए मुझे अब यहाँ से न जाना चाहिए—ऐसा सोचकर वह भी वहीं जमकर बैठ गया। और 'हाय मित्र हाय मित्र'—इस प्रकार रोने-चिल्लाने लगा ॥१५१॥ उसका चिल्लाना सुनकर उसके पड़ोस के सभी बन्धु और मित्र वहाँ आ गये और उसे मरा हुआ देखकर उस मूर्ख ठस्क को श्मशान ले जाने की तैयारी करने लगे ॥१५२॥ तब उसकी स्त्री ने एकान्त में उसके कान में कहा—'उठो। नहीं तो ये सारे भाई- बन्धु तुम्हें श्मशान में ले जाकर फूंक डालेंगे' ॥१५३॥ उसने कहा—'ऐसा न होगा। यह धूर्त ठस्क मेरी खीर खाना चाहता है। अतः, मैं जब मर गया हूँ तब इसके यहाँ से गये बिना न उठूँगा ॥१५४॥ मेरे जैसे लोगों के लिए एक मुट्ठी अन्न भी प्राणों से अधिक है। उस मूर्ख ने एकान्त में ही इस प्रकार अपनी पत्नी से कहा ॥१५५॥ तब उस दुष्ट मित्र ने बन्धु बान्धवों के साथ उसे ले जाकर चिता में फूंक दिया किन्तु वह जलते समय भी तनिक भी हिला-डुला नहीं और न मुख से ही कुछ बोला ॥१५६॥ इस प्रकार उस मूर्ख ने खीर के पीछे अपने प्राण दे दिये और इतने कष्टों से कमाया हुआ उसका धन दूसरों ने भोगा ॥१५७॥ मार्जार-मूर्ख की कथा कंजूस की कथा सुनी अब मार्जार-मूर्ख की कथा सुनो—'उज्जयिनी के किसी मठ में एक वृद्ध अध्यापक रहता था ॥१५८॥ चूहों के उपद्रव के कारण रात को उसे नींद नहीं आती थी इस कारण दुःखी होकर उसने अपने किसी मित्र से अपना यह कष्ट सुनाया ॥१५९ ॥
१५६ कथासरित्सागर
१५६ कथासरित्सागर मार्जारं स्थापयानीय सोऽत्र खादति मूषकान्। इति सोऽपि सुहृद्विप्रस्तमुपाध्यायमब्रवीत् ॥१६०॥ मार्जारः कीदृशः क्वास्ते न स दृष्टचरो मया। इत्युक्तवत्युपाध्याये तं सुहृत्सोऽब्रवीत् पुनः ॥१६१॥ काचरं लोचने तस्य वर्णः कपिशधूसरः। पृष्ठे च लोमशं चर्म रथ्यास्वटति यह सः ॥१६२॥ तदेभिस्त्वमभिज्ञानैरन्विष्यानानयाशु तम्। मित्र मार्जारमित्युक्त्वा तत्सुहृत्स ययौ गृहम् ॥१६३॥ ततः शिष्यानुपाध्यायः स जगाद जडो निजान्। अभिज्ञानानि युष्माभिः श्रुतान्येव स्थितेरिह ॥१६४॥ तदन्विष्यत मार्जारं रथ्यासु तमिह क्वचित्। तथेति ते गताः शिष्यास्तत्र भ्रमुरितस्ततः ॥१६५॥ तथापि न तु तैर्दृष्टो मार्जारः स कदाचन। अथैकं ते वटुं रथ्यामुखाविक्षन्त निर्गतम् ॥१६६॥ काचरं नेत्रयुगलं वर्णं धूसरपिङ्गलम्। पृष्ठोपरि दधानं च लोमशं हरिणाजिनम् ॥१६७॥ दृष्ट्वा तं सैष मार्जारः प्राप्तोऽस्माभिर्यथाश्रुतः। इत्यवष्टभ्य तं निन्युस्पाध्यायान्तिकं च ते ॥१६८॥ उपाध्यायोऽपि मित्रोक्तैर्युक्तं मार्जारलक्षणैः। दृष्ट्वा तं स्थापयामास रात्रौ तत्र मठान्तरे ॥१६९॥ मार्जारो नूनमस्तीति मेने सोऽपि वटुर्जडः। मार्जाराख्यां कृतां शृण्वन्नात्मनस्तैर्मुखिभिः ॥१७०॥ स च भीतो वटुः शिष्यस्तस्य विप्रस्य येन तत्। उपाध्यायस्य तस्योक्तं मख्या मार्जारलक्षणम् ॥१७१॥ प्रातः सोऽत्रागतो विप्रो वटुमन्तर्विलोक्य तम्। इह कनायमानीत इति मौठानवाच तान् ॥१७२॥ धृतोपलक्षणस्त्वत्तो मार्जारोऽस्माभिरप्य सः। आनीत इत्युपाध्यायो भीतः शिष्याश्च तेऽवदन् ॥१७३॥
दशम लम्बक ९५७
दशम लम्बक ९५७ 'यहाँ एक बिल्ली लाकर रखो वह चूहा को खा जाती है'—ऐसा उत्तर अध्यापक के मित्र ने दिया ॥१६०॥ 'बिल्ली कैसी होती है और कहाँ रहती है, उसे मैंने पहले कभी नहीं देखा' अध्यापक के इस प्रकार कहने पर उसके मित्र ने फिर कहा—॥१६१॥ 'उसकी आँखें चमकीली होती हैं उसका रंग काला और भूरा होता है और पीठ पर रोएँदार चमड़ी होती है। वह यहाँ गलियों में घूमती-फिरती रहती है ॥१६२॥ मित्र इन चिह्नों से उसे ढूँढ़कर शीघ्र ही मँगवाओ। ऐसा अध्यापक के मित्र ने उससे कहा और कहकर वह अपने घर चला गया ॥१६३॥ तब उस मूर्ख अध्यापक ने अपने शिष्यों से कहा—यहाँ बैठे हुए 'तुमलोगों ने बिल्ली के चिह्न तो सुन ही लिये हैं, अतः गलियों में जाकर इन चिह्नों के अनुसार बिल्ली को ढूँढ़ लाओ' गुरु की आज्ञा से बिल्ली की खोज में गये हुए वे शिष्य गलियों में इधर-उधर घूमने लगे। फिर भी उन्होंने उन लक्षणोंवाली बिल्ली कहीं नहीं देखी। कुछ समय के पश्चात् उन्होंने गली के मुहाने से निकलते हुए एक ब्रह्मचारी बटु को देखा। उसके दोनों नेत्र चमकीले थे रंग काला और भूरा था और उसने अपनी पीठ पर रोएँदार मृगचर्म ओढ़ रखा था ॥१६४—१६७॥ उसे देखकर उन लोगों ने कहा—'यही वह बिल्ली है, जिसे हमने सुना था। अतः उसे रोककर वे अपने गुरु के समीप ले गये ॥१६८॥ गुरु ने भी मित्र से बताये हुए उन लक्षणों से युक्त उस बटु को देखकर और उसे बिल्ली समझकर अपने मठ में रख लिया ॥१६९॥ उन्हें 'बिल्ली बिल्ली' कहते सुनकर उस मूर्ख बटु ने भी अपने को बिल्ली ही समझ लिया। क्योंकि वह मूर्खो से अपना यही नाम सुनता था ॥१७०॥ वह बटु (बालक) भी उस अध्यापक के उसी मित्र का पुत्र था जिसने उसे बिल्ली की पहचान बताई थी ॥१७१॥ प्रातःकाल ही उस मठ में आये उस ब्राह्मण ने वहाँ पर उस बटु (ब्रह्मचारी बालक) को देखा और 'इसे यहाँ कौन लाया ? इस प्रकार उसने उन मूर्खो से पूछा ॥१७२॥ तब गुरु के शिष्य बोले—'हमलोगों ने तुमसे ही बिल्ली का लक्षण सुनकर इसे पकड़ कर यहाँ ला रखा है' ॥१७३॥
[Header] १५८ कथासरित्सागर
[Header] १५८ कथासरित्सागर ततो विहस्य सोऽवादीद्विप्रो मूढाः क्व मानुषः। क्व च तिर्यक्स मार्जारश्चतुष्पात् पुच्छवानपि ॥१७४॥ तच्छ्रुत्वा तं वटुं मुक्त्वा तेऽब्रुवन्मन्दबुद्धयः। तद्गान्विष्यानयामस्तं मार्जारं तादृशं पुनः ॥१७५॥ एवमुक्तवतो मूढाञ्जनस्तत्र जहास तान्। अज्ञता नाम कस्येह नोपहासाय जायते ॥१७६॥ मार्जारमोतः कथितः श्रूयतामपरेऽप्यमी। आसीद् बहूनां मुग्धानां मुख्यो मुग्धो मठे क्वचित् ॥१७७॥ स केनचिद्वाच्यमानाद्धर्मशास्त्रात् कदाचन। तडागकर्त्तुरक्षोपीदमत्र सुमहत् फलम् ॥१७८॥ ततः स धनसम्पूर्णो विपुलं वारिपूरितम्। तडागं कारयामास नातिदूरे निजान्मठात् ॥१७९॥ एकदा स तडागं तं द्रष्टुं मुग्धाग्रणीर्गतः। केनाप्युत्पाटितान्यस्य पुलिनानि व्यलोकयत् ॥१८०॥ तथैवागत्य सोऽन्येद्युरुत्खातं तटमन्यतः। दृष्ट्वा तस्य तडागस्य सोद्वेगं समचिन्तयत् ॥१८१॥ प्रातः प्रभातादारभ्य स्थास्यामीहैव वासरम्। द्रक्ष्यामि कः करोत्येतदित्यालोच्य ययौ प्रगे ॥१८२॥ अन्येद्युर्यावदेत्यास्ते तावत्तत्र ददर्श सः। दिवोऽवतीर्य शृङ्गाभ्यां खनन्तं वृषभं तटम् ॥१८३॥ दिव्यो वृषोऽयं तत्किं न दिवं यामि सहामुना। इत्युपेत्य वृषस्यास्य हस्ताभ्यां पुच्छमग्रहीत् ॥१८४॥ सतं पुच्छाप्रलम्बं च भीतमुत्क्षिप्य वेगतः। क्षणाभिनाय नभसः स्वं धाम भगवान् वृषः ॥१८५॥ तत्र दिव्यानि भक्ष्याणि मोदकादीन्यवाप्य सः। मुञ्जानो न्यवसद् भीतो दिनानि कतिचित् सुखम् ॥१८६॥ गतागतानि कुर्व्वाणं स दृष्ट्वा तं महावृषम्। अचिन्तयत भीतानां मुख्यो दैवेन मोहितः ॥१८७॥ गच्छामि वृषपुच्छाग्रलम्बं पश्यामि बान्धवान्। कथयित्वाऽमृतमिदं तथैवेष्याम्यहं पुनः ॥१८८॥ इति सञ्चिन्त्य वृषमस्यैकदोपेत्य तस्य सः। आलम्ब्य गच्छतः पुच्छमागाद् भीतो भुवंस्तलम् ॥१८९॥
दशम लम्बक ९५९
दशम लम्बक ९५९ यह सुनकर वह ब्राह्मण हँसकर बोला—अरे मूर्खो कहाँ यह मनुष्य और कहाँ वह पशु ? बिल्ली के चार पैर होते हैं और उसकी पूँछ भी होती है। यह सुनकर वे मूर्ख शिष्य उस बालक को छोड़कर बोले—'तब वैसे ही ढूँढ़कर लाते हैं' ॥१७५॥ ऐसा कहते हुए उन्होंने सभी को हँसा दिया। सच है, मूर्खता किसके हास्य का कारण नहीं होती ॥१७६॥ मार्जार-मूर्ख की कथा सुनी अब कुछ और मूर्खों की कथाएँ सुनो। किसी एक मठ में मूर्खो का मुखिया एक महामूर्ख था ॥१७७॥ उसने किसी कथावाचक से सुन लिया कि 'तालाब बनवानेवाले को इस लोक में बहुत पुण्य मिलता है। वह मठाधीश धनी था। उसने अपने मठ के पास ही पानी से भरा एक विशाल तालाब बनवाया ॥१७८ १७९॥ एक बार वह मूर्खराज उस तालाब को देखने के लिए गया । उसने तालाब के किनारों को किसी के द्वारा उखाड़े हुए देखा ॥१८०॥ इसी प्रकार दूसरे दिन उसने दूसरी ओर देखा और वह सोचने लगा कि 'यह कौन इसके किनारों को तोड़ता है। कल प्रातःकाल ही आकर यहाँ सारा दिन रहकर देखूँगा कि कौन ऐसा करता है—ऐसा सोचकर वह दूसरे दिन प्रातःकाल ही ज्यों ही वहाँ आया उसने आकाश से उतरकर सींग से किनारों को तोड़ते हुए एक बैल को देखा। 'ओह ! यह तो दिव्य बैल है इसलिए मैं भी इसके साथ ही सीधे स्वर्ग क्यों न चला जाऊँ ? —ऐसा सोचकर और उसके पास जाकर उसने हाथों से उस बैल की पूँछ पकड़ ली ॥१८१—१८४॥ पूँछ पकड़े हुए उसे लेकर नन्दी भगवान् क्षण-भर में अपने कैलासधाम जा पहुँचे ॥१८५॥ वह मूर्ख मठाधीश दिव्य भोजन लड्डू आदि खाकर, कुछ दिनों तक वहीं सुखपूर्वक रहा । नन्दी को प्रतिदिन पृथ्वी पर यातायात करते हुए देखकर वह मूर्खराज सोचने लगा कि बैल की पूँछ पकड़कर नीचे जाऊँ और अपने बन्धु-मित्रों से मिलूँ। उन्हें यह आश्चर्यजनक घटना सुनाकर फिर आ जाऊँगा । ऐसा सोचकर एकबार वह मूर्खराज उस नन्दी के पास जाकर उसकी पूँछ पकड़कर भूमि पर आ गया ॥१८६—१८९॥
९६ कथासरित्सागर
९६ कथासरित्सागर ततः प्राप्तो मठे भौटैरन्यैराश्लिष्य तत्स्थितैः । क्व गतोऽसीति पृष्टस्तं स्ववृत्तान्तं शशंस सः ॥१९०॥ ततः सर्वे श्रुताश्चर्या भीतास्ते प्रार्थयन्त सम्। प्रसीद नय तत्रास्मानपि भोजय मोदकान् ॥१९१॥ तच्छ्रुत्वा स तथेत्येतान् युक्तिमुक्त्वापरे दिने । तडागोपान्तमनयत् स च तत्राययौ वृषः ॥१९२॥ जग्राह तस्य लाङ्गूलं मुख्यः पाणिद्वयेन सः । तस्याप्यगृह्णाच्चरणौ न्यस्तस्तस्यापि चेतरः ॥१९३॥ इत्यन्योन्याङ्घ्रिलग्नैस्तैर्मौटैर्यावच्च शृङ्खला । रचिता स वृषस्तावदुत्पपात नभःस्थलम् ॥१९४॥ याति तस्मिंश्च वृषभे लाङ्गलालम्बिभौटके१ । मुख्यमेश्रं तमप्राक्षीदेको मौटोऽथ दवत२॥१९५॥ अद्धामाख्याहि नस्तावदथेष्टसुरभा दिवि । कियत्प्रमाणा भवता मोदका भक्षिता इति ॥१९६॥ ततो हृष्टामुनन्द्यानो वृषपुच्छं विमुच्य तम् । पद्माकारौ करौ कृत्वा संस्प्रिष्टौ मौठनायकः ॥१९७॥ इयत्प्रमाणा इत्याशु यावत्तान प्रतिवक्ति सः । तावत्सोऽन्ये च ते सर्वे क्षितिपेत्य विपदिरे ॥१९८॥ वृषः प्रायाच्च कैलास जनो दृष्ट्वा जहास च । दोषाय निर्विमर्षैव भौतप्रश्नोत्तरक्रिया ॥१९९॥ श्रुता दुगामिनो मौटाः श्रूयतामपरोऽप्ययम्। कश्चिद् भौतो विसस्मार मार्ग मार्गान्तरं व्रजन् ॥२००॥ तरोर्नदीतटस्थस्य गच्छास्योपरिवर्त्मना । इत्युच्यते स्म पन्थानं परिपृच्छञ्जनेन सः ॥२०१॥ ततस्तस्य तरोः पृष्ठं गत्वास्त्वः स मूर्खधीः । एतत्पृष्ठेन मे पन्था उपदिष्टो जनैरिति ॥२०२॥ सत्पृष्ठे सर्पवक्षास्य भरात्पर्यन्तवर्तिनी । शाखा ननाम यत्नेन पपातालम्ब्य नैप याम् ॥२०३॥ १ लाङ्गूले=पुच्छे, मालम्बिनः=सम्बद्धानां भौटाः=मूर्खास्तस्यतस्मिन् वृषभविशेषण २ दैववशादित्यर्थः ।
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तब उसके मठ में पहुँचते ही अन्य मूर्ख उसे घेरकर बैठ गए और कहाँ गए थे ? उनके ऐसा पूछने पर मूर्ख ने कैलास-यात्रा का सारा वृत्तान्त उन्हें सुना दिया ॥१९॥
सुनकर आश्चर्य चकित वे सभी मूर्ख उससे प्रार्थना करने लगे कि 'हम लोगों पर भी कृपा करो हमें भी वहाँ ले चलो। हम लोगों को भी दिव्य लड्डू खिलाओ' ॥१९१॥
उनकी बातें सुनकर और वहाँ जाने की युक्ति बताकर दूसरे दिन तालाब के पास वह उन्हें ले गया और बैल भी वहाँ आया ॥१९२॥
तब उन मूर्खो के मुखिया महन्त ने दोनों हाथों से उसकी पूँछ पकड़ ली। उसके पैर दूसरे ने पकड़े और उसके तीसरे ने। इस प्रकार सभी मूर्खों ने एक-दूसरे के पैर पकड़-पकड़कर एक लम्बी पंक्ति-सी बना ली। तब वह बैल वेग से आकाश में उड़ा। पूँछ से लटके हुए अनेक मूर्खो वाले बैल के आकाश में जाते समय दैवयोग से उनमें से एक ने मुखिया से पूछा—'मन के अनुकूल फल देनेवाले स्वर्गलोक के प्रति हमारी उत्सुकता बढ़ाइए और यह बताइए कि तुमने कितने बड़े बड़े लड्डू वहाँ खाये थे ? ॥१९३—१९५॥
तब अपने मिससिल को भूलकर उस मूर्ख महन्त ने बैल की पूँछ छोड़ दी और दोनों हाथों को कमल की तरह मिलाकर कहा—'इतने-इतने बड़े' ॥१९६॥
जब वह उन्हें हाथ के इंगित से बता ही रहा था कि तबतक वे सब के-सब मूर्ख खड़-मुड़ होकर आकाश से नीचे गिर गये और बैल अपनी तीव्र गति से कैलास को चला गया। यह देखकर जनता पेट पकड़कर हँसने सभी मूर्खों की प्रश्नोत्तर-क्रिया भी विवेक-रहित होती है ॥१९७-१९९॥
महाराज तुमने आकाश में जानेवाले मूर्ख सुने। अब दूसरे को सुनिए एक मूर्ख मार्ग में चलते हुए सही मार्ग भूलकर विपरीत मार्ग पर जा रहा था। लोगों से पूछने पर उन्होंने कहा कि 'नदी के किनारे जो पेड़ है उसके ऊपर के मार्ग से जाओ। वह मूर्ख पेड़ के पीछे जाकर उस पर चढ़ गया। डाल पर चलते हुए उस पेड़ की लचीली पतली डालियाँ नीचे झुक गईं। किन्तु उसने अगली डाल को हाथ से पकड़ लिया और नदी के ऊपर झूलने लगा। क्योंकि लोगों ने उसे पेड़ के पीछे से जाने को बताया था ॥२००-२०१॥ १२१
१५२ कथासरित्सागर
१५२ कथासरित्सागर शाखामारुम्ब्य स्थितो यावत्तावत्तेनाययौ पथा। आरोहेष्वोपरिस्थेन नद्यां पीतजलः करी ॥२०४॥ स दृष्ट्वा तरुशाखाग्रलम्बी भीतः स दीनवाक्। महात्मन् मां गृहाणेति हस्त्यारोहमुवाच तम् ॥२ ५॥ हस्त्यारोहश्च भीतः समवतारयितुं तरोः। पादयोरग्रहीद्द्वाभ्यां पाणिभ्यामुज्झिताङ्कुशः ॥२०६॥ तावच्च निर्गत्य गते गजे भीतस्य तस्य सः। ललम्बे पादयोर्हस्तिपको वृक्षाग्रलम्बिनः ॥२०७॥ ततः स स्वरमभीतो हस्त्यारोहं तमभ्यधात्। यदि जानासि तच्छीघ्रं यत्किञ्चिद् गीयतां त्वया ॥२०८॥ इतोऽवसारयञ्जातु यच्छ्रुत्वागत्य नौ जनः। पतिताव यथाधस्ताद्रेखाबामिय नदी ॥२०९॥ इत्युक्तः स गजारोहस्तेन मञ्जु तथा जगौ। यथा स एव भीतोऽद्य परितोषमगात् परम् ॥२१०॥ साधुवादं च स ददद्विस्मृतोज्झितपादपः। दातुं प्रावर्तत द्वाभ्यां हस्ताभ्यां छोटिकां जडः ॥२११॥ तत्क्षणं विनिपत्यैव सहस्त्यारोह एव सः। नद्यां विपप्रे मूर्धहि सङ्गः कस्यास्ति शर्मणे ॥२१२॥ इत्याख्याय कथां भूयो वत्सेश्वरसुतां सः। गोमुखः कथयामास हिरण्याक्षकथामिमाम् ॥२१३॥ हिरण्याक्ष कथा अस्तीह हिमवत्कुक्षौ देशः पृथ्वीशिरोमणिः। कद्मीर इति विद्वानां धर्मस्य च निकेतनम् ॥२१४॥ तत्राधिष्ठानमभवद्धिरण्यपुरनामकम् । कनकप्रभ इति ख्यातस्तस्मिन् राजा बभूव च ॥२१५॥ तस्य रत्नप्रभादेव्यां शङ्कराराधनोद्भवः। पुत्रो हिरण्याक्ष इति क्ष्मापतेरुपपद्यत ॥२१६॥ स जातु गुलिकाक्रीडां कुर्वन् गुलिकया छलात्। तापसीं राजतन्तव्यां मार्गायातामताडयत् ॥२१७॥ सा तापसी जितक्रोधा राजपुत्रं विहस्य तम्। वागीश्वरी हिरण्याक्षमुवाच विवृतानना ॥२१८॥ स्वयौवनादिकरीदृग्मदधस्त्वं तां यदि। मृगाङ्कमगामाप्नोषि भार्यां तत्कीदृशो भवेत् ॥२१९॥
द्वादश लम्बक ९६३
द्वादश लम्बक ९६३ जब वह मूर्ख डाल पकड़कर झूल ही रहा था कि इतने में उस मार्ग से नदी में पानी पीकर एक हाथी लौट रहा था। उस पर महावत भी बैठा था। उसे देखकर पेड़ की डाल में लटकता हुआ मूर्ख शीघ्रतापूर्वक हाथीवान से बोला 'महात्मा मुझे पकड़ लो' ॥२४-२५॥ महावत ने भी उसे वृक्ष से उतारने के लिए, अंकुश को रखकर, दोनों हाथो से उसके दोनो पैर पकड़ लिये ॥२६॥ इतने में ही हाथी के आगे निकल जाने पर महावत भी पेड़ की डाल में झूलते हुए उस मूर्ख के पैरों में लटक गया ॥२७॥ तब डाल में लटका हुआ वह मूर्ख शीघ्रतापूर्वक महावत से बोला कि 'यदि तू गाना जानता है, तो गा' ॥२८॥ इसलिए यह सम्भव है कि कोई गाना सुनकर यहाँ आवे और हम दोनों को उतार ले ॥२९॥ इस प्रकार, उसके कहने पर महावत ने इतना अच्छा गीत गाया कि वह लटका हुआ मूर्ख अत्यन्त सन्तुष्ट हो गया ॥३०॥ और उसे वाहवाही देता हुआ यह भूल गया कि मैं लटका हूँ, इसलिए उस मूर्ख ने अपने दोनों हाथों से चुटकी बजाना प्रारम्भ किया ॥३१॥ इस प्रकार चुटकी बजाने के चक्कर में डाल छूट जाने के कारण वह मूर्ख महावत के साथ ही गिरकर नदी में डूब गया। सच है कि मूर्खों का साथ किसके लिए हानिकारक नहीं होता ॥३२॥ नरवाहनदत्त को यह कथा सुनाकर गोमुख ने उसे हिरण्याक्ष की कथा सुनाई ॥३३॥ हिरण्याक्ष की कथा हिमालय के मध्य में पृथ्वी का शिरोमणि कश्मीर नाम का देश है, जो विद्या एवं धर्म का घर है। उस देश में हिरण्यपुर नाम का एक राज्य था जिसका राजा कनकप्रभ नाम से प्रसिद्ध था। रत्नप्रभा नाम की उसकी रानी से शिवजी की आराधना के फलस्वरूप एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका नाम हिरण्याक्ष रखा गया। ॥३४-३६॥ वह बालक कभी गोलियाँ खेल रहा था। उसने किसी बहाने से मार्ग में जाती हुई एक तपस्विनी को गोली से मारा। क्रोध न करनेवाली क्षमाशील तपस्विनी यशोधेश्वरी ने मुँह बिगाड़ बिचकाकर राजकुमार से कहा— 'यदि तुझे अपने यौवन आदि पर इतना घमंड है तो मृगांक- लेखा को अपनी पत्नी बना लेने पर तुम्हारा घमंड कितना न बढ़ जाय' ॥३७-३९॥
१६४ कथासरित्सागर
१६४ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा क्षमयित्वा तां राजपुत्रः स पृष्टवान्। कपा मृगाङ्कलेखास्या भगवत्युच्यतामिति ॥२२ ॥ अतस्त सान्द्रवीचिस्ति शशितेजा इति श्रुतः। विद्याधरेन्द्रो हिमवत्यचलन्द्र महायशाः ॥२२१॥ मृगाङ्कलेखा तस्यास्ति तनया वरकन्यका। रूपेण सुरेन्द्राणां निशासूनिश्चकप्रदा ॥२२२॥ सा चानुरूपा भार्या ते तस्यास्त्वमुचितः पतिः। इत्युक्तः सिद्धतापस्या हिरण्याक्षो जगाद ताम् ॥२२३॥ कथं भगवति प्राप्या मया सा तर्हि कथ्यताम्। तच्छ्रुत्वा सा हिरण्याक्षं तं योगेश्वर्यभाषत ॥२२४॥ गत्वाहं त्वत्कथाख्यानादुपलप्स्ये तदाशयम्। आगत्य चाहमेव त्वां तत्र नेष्याम्यतः परम् ॥२२५॥ इहास्ति योऽमरेषाख्यो देवस्तत्केतने त्वया। प्रातः प्राप्यास्मि नित्यं हि तमर्चितुमुपैम्यहम् ॥२२६॥ इत्युक्त्वा नभसा प्रायात्तापसी सा स्वसिद्धितः। तस्या मृगाङ्कलेखाया निकटं तुहिनाचलम् ॥२२७॥ तत्र तस्यै हिरण्याक्षगुणान्युक्त्वा शशंस सा। यथा यथा दिव्यकन्या साह्युत्कैवमुवाच ताम् ॥२२८॥ तादृशं चन्न भर्तारं प्राप्नुयां भगवत्यहम्। तन्निष्फलेन किं कार्यममुना जीवितेन मे ॥२२९॥ इत्यास्तऽस्मरावेशा नीत्वा तत्कथया दिनम्। मृगाङ्कलेखा तापस्या सहोवास तया निशाम् ॥२३०॥ तावत्सोऽपि हिरण्याक्षस्तच्चिन्तामीतवासरः। सुप्तः कषष्टिध्वज्जगदे गौर्या स्वप्ने निशाक्षये ॥२३१॥ विद्याधरः सन् प्राप्तस्त्वं मुनिशापेन मर्त्यताम्। तापस्याः करसंस्पर्शादेतस्या मोक्ष्यसे ततः ॥२३२॥ मृगाङ्कलेखां च ततस्तामाशु परिणेष्यसि। तच्चिन्ता नात्र कार्या ते पूर्वभार्या हि सा तव ॥२३३॥
१ काश्मीरेषु 'अमरनाथ' इति प्रसिद्धः।
दशम लम्बक ९६५
दशम लम्बक ९६५ यह सुनकर उस राजकुमार न तपस्विनी से क्षमा-प्रार्थनापूर्वक पूछा कि भगवति वह कौन-सी मृगाङ्कलेखा है? कृपया बताइए' ॥२२० ॥ तब वह तपस्विनी उससे कहने लगी—पर्वतराज हिमालय पर शशिशेखर नाम का विद्याधरों का राजा है। मृगाङ्कलेखा उसी राजा की सुन्दरी कन्या है जो अपने सौन्दर्य से रात में विद्याधरों को सोने नहीं देती (अर्थात्, सभी उसकी चिन्ता में सो नहीं पाते) ॥२२१ २२२॥ 'वह तेरे योग्य पत्नी है और तू उसके योग्य पति है'। सिद्ध तापसी के इस प्रकार कहने पर हिरण्याक्ष उससे बोला—'भगवति तब मुझे यह भी बताइए कि वह मुझे कैसे मिल सकती है ? यह सुनकर योगेश्वरी हिरण्याक्ष से बोली—'मैं उसके पास जाकर तेरी चर्चा करके उसका आशय (अभिप्राय) समझूँगी। और फिर, मैं ही यहाँ आकर तुझे वहाँ ले जाऊँगी ॥२२३—२२५॥ यहाँ अमरनाथ नाम का जो शिव-मन्दिर है वहीं मैं प्रातःकाल तुझे मिलूँगी। मैं वहाँ नित्य पूजन के लिए उपस्थित होती हूँ' ॥२२६॥ ऐसा कहकर वह तपस्विनी अपनी सिद्धि के योग से उस मृगाङ्कलेखा के पास हिमालय पर गई ॥२२७॥ वहाँ जाकर उसने हिरण्याक्ष के गुणों का ऐसा वर्णन किया कि वह मृगाङ्कलेखा अत्यन्त उत्कण्ठित होकर उससे बोली—॥२२८॥ 'भगवति यदि वैसे पति को मैंने न पाया तो इस निष्फल जीवन से मुझे क्या काम है? इस प्रकार के भावावेश से आक्रान्त मृगाङ्कलेखा ने हिरण्याक्ष की चर्चा में दिन व्यतीत कर उसी तपस्विनी के साथ रात भी बिताई ॥२२९-२३० ॥ इधर हिरण्याक्ष भी मृगांकलेखा की चिन्ता में दिन व्यतीत करके रात्रि में किसी प्रकार सोया और पार्वती ने उसे स्वप्न में कहा—तू पहले जन्म में विद्याधर था। मुनि के शाप से मनुष्य हो गया। इसी तापसी के हाथ का सम्पर्क होने से तू शापमुक्त हो जायगा ॥२३१ २३२॥ तब तू उस मृगाङ्कलेखा से विवाह करेगा। उसकी चिन्ता तुझे न करनी चाहिए। वह तेरी पूर्वजन्म की पत्नी है' ॥२३३॥
तच्छ्रुत्वा क्षमयित्वा तां राजपुत्र च पृष्टवान्। कषा मृगाङ्कलेखास्या भगवत्युच्यतामिति ॥२२०॥ ततस्त साद्रवीदस्ति क्षितितेजा इति श्रुतः। विद्याधरेन्द्रो हिमवत्यचलेन्द्रे महायशाः ॥२२१॥ मृगाङ्कलेखा तस्यास्ति तनया वरकन्यका। रूपेण द्युचरेन्द्राणां निशासूनिद्रकप्रभा ॥२२२॥ सा चानुरूपा भार्या ते तस्यास्त्वमुचितः पतिः। इत्युक्तः सिद्धतापस्या हिरण्याक्षा जगाद ताम् ॥२२३॥ कथं भगवति प्राप्या मया सा तर्हि कथ्यताम्। तच्छ्रुत्वा सा हिरण्याक्षं च योगेश्वर्यभाषत ॥२२४॥ गत्वाहं त्वत्कथाख्यानावुपलप्स्ये तदाशयम्। आगत्य चाहमत्र त्वां तत्र नेष्याम्यतः परम् ॥२२५॥ इहास्ति योऽमरेखाख्यो देवस्तत्केतने त्वया। प्रात प्राप्तास्मि नित्यं हि तमर्चितुमुपम्यहम् ॥२२६॥ इत्युक्त्वा नमसा प्रायात्तापसी सा स्वसिद्धितः। तस्या मृगाङ्कलेखाया निकटं तुहिनाचलम् ॥२२७॥ तत्र तस्यै हिरण्याक्षगुणान्युक्त्वा क्षणेन सा। तथा यथा दिव्यकन्या सात्युत्कण्ठमुवाच ताम् ॥२२८॥ तादृशं अद्य भर्तारं प्राप्नुयां भगवत्यहम्। तन्निष्फलेन किं कार्यममुना जीवितेन मे ॥२२९॥ इत्यारूढस्मरावेशा नीत्वा तत्कथया दिनम्। मृगाङ्कलेखा तापस्या सहोवास तया निशाम् ॥२३०॥ तावत्सोऽपि हिरण्याक्षस्तच्चिन्तानीतवासरः। सुप्तः कपञ्चिज्जगदे गौर्या स्वप्ने निशाक्षये ॥२३१॥ विद्याधरः सन् प्राप्तस्त्वं मुनिशापेन मर्त्यताम्। तापस्याः करसंस्पर्शात्तस्या मोक्षमथ ततः ॥२३२॥ मृगाङ्कलेखां च तवस्तामाशु परिणेष्यसि। तच्चिन्ता नात्र कार्या ते पूर्वभार्या हि सा तव ॥२३३॥
१ काश्मीरेषु 'अमरनाथ' इति प्रसिद्धः।
द्वादश लम्बक १९५
द्वादश लम्बक १९५ यह सुनकर उस राजकुमार ने तपस्विनी से क्षमा प्रार्थनापूर्वक पूछा कि भगवति वह कौन-सी मृगांकलेखा है? कृपया बताइए' ॥२२०॥ तब वह तपस्विनी उससे कहने लगी—पर्वतराज हिमालय पर शशिखण्ड नाम का विद्याधरों का राजा है। मृगांकलेखा उसी राजा की सुन्दरी कन्या है, जो अपने सौन्दर्य से रात में विद्याधरों को सोने नहीं देती (अर्थात् सभी उसकी चिन्ता में सो नहीं पाते) ॥२२१-२२२॥ वह तेरे योग्य पत्नी है और तू उसके योग्य पति है'। सिद्ध तापसी के इस प्रकार कहने पर हिरण्याक्ष उससे बोला— भगवति तब मुझे यह भी बताइए कि वह मुझे कैसे मिल सकती है ? यह सुनकर योगेश्वरी हिरण्याक्ष से बोली— 'मैं उसके पास जाकर तेरी चर्चा करके उसका आशय (अभिप्राय) समझूँगी। और फिर, मैं ही यहाँ आकर तुझे वहाँ ले जाऊँगी ॥२२३—२२५॥ यहाँ अमरनाथ नाम का जो शिव-मन्दिर है, वहीं मैं प्रातःकाल तुझे मिलूँगी। मैं वहाँ नित्य पूजन के लिए उपस्थित होती हूँ ॥२२६॥ ऐसा कहकर वह तपस्विनी अपनी सिद्धि के योग से उस मृगांकलेखा के पास हिमालय पर गई ॥२२७॥ वहाँ जाकर उसने हिरण्याक्ष के गुणों का ऐसा वर्णन किया कि वह मृगांकलेखा अत्यन्त उत्कण्ठित होकर उससे बोली—॥२२८॥ 'भगवति यदि वैसे पति को मैंने न पाया तो इस विरूद्ध जीवन से मुझे क्या लाभ है? इस प्रकार के भावावेग से आक्रान्त मृगांकलेखा ने हिरण्याक्ष की चर्चा में दिन व्यतीत कर उसी तपस्विनी के साथ रात भी बिताई ॥२२९-२३० ॥ इधर हिरण्याक्ष भी मृगांकलेखा की चिन्ता में दिन व्यतीत करके रात्रि में किसी प्रकार सोया और पार्वती ने उसे स्वप्न में कहा— तू पहले जन्म में विद्याधर था। मुनि के शाप से मनुष्य हो गया। इसी तापसी के हाथ का सम्पर्क होने से तू शापमुक्त हो जायगा ॥२३१-२३२॥ तब तू उस मृगांकलेखा से विवाह करेगा। उसकी चिन्ता तुझे न करनी चाहिए। वह तेरी पूर्वजन्म की पत्नी है' ॥२३३॥
१६६ कथासरित्सागर
१६६ कथासरित्सागर इत्यादिश्य सा देवी तिरोऽभूत्तस्य सोऽपि च। प्रबुध्य प्रातरुत्थाय चक्रे स्नानादिमङ्गलम्॥२३४॥ ततोऽमरेश्वरस्याग्रे गत्वा तस्मै प्रणम्य तम्। यत्र सङ्केतक तस्य तापस्या विहित तया॥२३५॥ अत्रान्तरे च कथमप्याप्तनिद्रा स्वमन्दिरे। मृगाङ्कलेखामपि तां गौरी स्वप्ने समादिशत्॥२३६॥ क्षीणशाप हिरण्याक्ष जात विद्याधर पुन। करस्पर्शेन तापस्याः पतिं प्राप्स्यस्यल शुचा॥२३७॥ इत्युक्त्वान्तर्हितायां च देव्यां प्रातः प्रबुध्य सा। मृगाङ्कलेखा तापस्यै तस्मै स्वप्न शशंस तम्॥२३८॥ सा तच्छ्रुतैव नागत्य भूलोक सिद्धतापसी। स्मित क्षेत्रेऽमरेशस्य हिरण्याक्ष तमभ्यधात्॥२३९॥ एहि विद्याधर लोक पुत्रेत्युक्त्वा करेण सा। प्रणत त समादाय बाहावुपतस्थुषम्॥२४०॥ तावत्स च हिरण्याक्षो भूत्वा विद्याधरेश्वरः। स्मृत्वा शापक्षयाज्जाति तापसीं तामभाषत॥२४१॥ हिमाद्रौ वद्ध्यकूटाख्ये पुरे जानीहि मामियम्। विद्याधराणा राजान नाम्नाप्यमृततेजसम्॥२४२॥ सोऽहमुल्लङ्घनक्रोधाच्छाप प्राप्य पुरा मुनेः। मर्त्ययोनिमुपागच्छ त्वत्करस्पर्शनावधिम्॥२४३॥ शाप्तस्य मे सदा भार्या या दुःखादजहत्तनूम्। सैषा मृगाङ्कलेखाद्य जाता पूर्वप्रिया मम॥२४४॥ इदानीं च त्वया सार्धं गत्वा प्राप्स्यामि तामहम्। त्वत्करस्पर्शपूतस्य शान्तः शापो हि सोऽद्य मे॥२४५॥ इति ब्रुवस्तया साक तापस्या गगनेन सः। जगामामृततेजास्त हिमाद्रि द्युचराधिपः॥२४६॥ मृगाङ्कलेखामुद्यानस्थितां तत्र ददर्श सः। साप्यापश्यत्तमायान्तं तापस्याधिष्ठितं तया॥२४७॥ चित्र श्रुतिपथेनादौ प्रविश्याग्योन्यमानसम्। अनिर्गत्याप्यधिष्ठितां दृष्टिमार्गेण तौ पुनः॥२४८॥