कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
७३२ कथासरित्सागर
७३२ कथासरित्सागर एकदा तस्य भार्यायास्तस्या पुत्रान्वितः पिता। निमन्त्रणाय माळव्य सोत्कण्ठोऽभ्याययौ स्वयम् ॥८१॥ वज्रसारोऽथ सत्कृत्य तं स राज्ञे निवेद्य च। निमन्त्रितस्तन समं सभार्यो मालवं ययौ ॥८२॥ मासमात्रं च विश्रम्य सोऽत्र श्वशुरवेश्मनि। इहागाद्राजसंवार्थं सद्भार्या त्वास्त तत्र सा ॥८३॥ ततो दिनेषु यातेषु वज्रसारमुपेत्य तम्। अकस्मात् क्रोधनो नाम सुहृदेवमभाषत ॥८४॥ भार्यां पितृगृहे त्यक्त्वा किं गृहं नाशितं त्वया। तत्रान्यपुरुषासङ्गा पापया हि कृतस्तया ॥८५॥ आगतेन ततोऽद्यैतदाप्तेन कथितं मम। मा मस्था विस्रभं तस्माद्भिगृहीतां जहापराम् ॥८६॥ इत्युक्त्वा क्रोधने याते स्थित्वा मूढ इव क्षणम्। अचिन्तयद्वज्रसारः शङ्के सत्यं भवदिदम् ॥८७॥ आह्वयायके विसृष्टेऽपि सान्यथा नागता कथम्। तदेतां स्वयमानेतुं यामि पश्यामि किं भवेत् ॥८८॥ इति सङ्कल्प्य गत्वैव मालवं श्वशुरौ स तौ। अनुज्ञाप्य गृहीत्वैतां भार्यां प्रस्थितवांस्ततः ॥८९॥ गत्वा च दूरमध्वानं स युक्त्या वञ्चितानुगः। उत्पथेनाविशद्वृभार्यामादाय गहनं वनम् ॥९०॥ तत्रोपवेश्य मध्ये तां विजने वदति स्म सः। त्वमन्यपुरुषासक्तेत्याप्तान्मित्रात्प्रिया श्रुतम् ॥९१॥ मया चात्र स्थितेनैव यदाहूतासि नागता। तत्सत्यं ब्रूहि नो चेद्वा करिष्ये निग्रहं तव ॥९२॥ तच्छ्रुत्वा तमवादीत् सा तच्चेद् यदि निश्चयः। र्तार्हक पृच्छसि मां यत्ते रोचते तत्कुरुष्व मे ॥९३॥ इति सावज्ञमाकर्ण्य वचस्तस्याः स कोपतः। वज्रसारस्तरी बद्ध्वा लताभिस्तामताडयत् ॥९४॥ वस्त्रं हरति यावच्च तस्यास्तावद्विलोक्य ताम्। मग्ना रिरंसा मूढस्य तस्याजायत रागिणः ॥९५॥
दशम लम्बक ७३३
यहाँ पृष्ठ पर दिए गए पाठ का लिप्यंतरण है:
दशम लम्बक ७३३ एक बार उसकी पत्नी का पिता (श्वशुर) अपने पुत्र (उसके साले) के साथ मालव देश से उसे निमन्त्रण देने के लिए बड़ी ही उत्सुकता के साथ आया ॥८१॥ तब वयस्यार ने उसका सत्कार करके और उसके द्वारा निमन्त्रित होकर राजा से प्रार्थना करके (अवकाश लेकर) उसके साथ मालव देश को प्रस्थान किया ॥८२॥ और, वह एक माह तक श्वशुरालय में विश्राम करके राजसेवा के लिए कौशाम्बी लौट आया किन्तु उसकी स्त्री वहीं रह गई ॥८३॥ कुछ दिन बीतने पर वयस्यार का मित्र क्रोथन अकस्मात् आकर उससे बोला—'तूने अपनी स्त्री को उसके बाप के घर पर छोड़कर अपने घर का नाश क्यों कर दिया ! वहीं उस पापिन ने दूसरे पुरुष का साथ कर लिया है ॥८४-८५॥ आज ही उधर से आये हुए एक विश्वस्त व्यक्ति ने मुझसे कहा है। इसे झूठ न समझना। इसलिए उसे दंड देकर दूसरी स्त्री से विवाह कर लो' ॥८६॥ इस प्रकार कहकर क्रोथन के चले जाने पर कुछ समय तक कर्त्तव्यविमूढ़ होकर वयस्यार सोचता रहा—'मैं समझता हूँ यह बात सत्य है ॥८७॥ नहीं तो बुलाने के लिए आदमी भेजने पर भी वह क्यों नहीं आई ? इसलिए, उसे लाने के लिए स्वयं जाता हूँ। देखता हूँ क्या होता है ॥८८॥ इस प्रकार निश्चय करके मालव देश को जाकर और सास-ससुर से आज्ञा लेकर अपनी स्त्री के साथ वह वहाँ से घर की ओर चला ॥८९॥ दूर मार्ग निकल जाने पर अपने साथी सेवक से बहाना करके विपरीत पथ से स्त्री को लेकर वह एक घने जंगल में पहुँचा ॥९० ॥ उस बियाबान (भीषण) सूने जंगल में स्त्री को बैठाकर उसने पूछा—'तू पर-पुरुष पर आसक्त है ऐसा मैंने किसी विश्वासी मित्र से सुना है ॥९१॥ मैंने कौशाम्बी में रहते हुए तुझे लाने के लिए वहाँ से एक दूत भेजा तो भी तू न आई। इसलिए सब सत्य बता। अन्यथा तेरा नाश कर दूँगा' ॥९२॥ यह सुनकर वह बोली—यदि तुम्हें मेरे चरित्र नष्ट होने का विश्वास ही है तो फिर मुझसे क्या पूछते हो जो तुम्हें उचित प्रतीत हो वह करो ॥९३॥ इस प्रकार उसके उपेक्षायुक्त वचन सुनकर वयस्यार ने उसे एक वृक्ष से बाँधकर लताओं से मारना आरम्भ किया ॥ ९४॥ क्रोध में आकर जब उसने उसकी साड़ी खींच ली तब उसे नंगी देखकर वयस्यार का मन विचलित हो उठा और उस मूर्ख कामी का उससे समागम करने की इच्छा जग उठी ॥ ९५ ॥
७३४ कथासरित्सागर
७३४ कथासरित्सागर ततो निवेश्य बद्धां तां रन्तुमाश्लिष्यति स्म सः। मज्जति स्म च सा तेन प्रार्थ्यमाना जगाद च ॥१९६॥ लताभिस्ताडिता बद्ध्वा यथाहं भवता तथा। यद्यहं ताडयेयं त्वां तत इच्छामि नान्यथा ॥१९७॥ तथेति प्रतिपेदे तच्च न व्यसनमोहितः। तृणसारीकृतश्चित्रं वध्यसारो मनोभुवा ॥१९८॥ तत संहस्तपादं तं सा बबन्ध दृढं तरौ। सच्छस्त्रेणैव बद्धस्य कर्णनासं चकर्त सा ॥१९९॥ गृहीत्वा तस्य शस्त्रं च वासांसि च विधाय च। पापा पुरुषवेषं सा यथाकाममगात्ततः ॥२००॥ वध्यसारस्तु तत्रासीच्छिन्नश्रवणनासिकः। गलत्क्षाणिताङ्गेन मानेन च नताननः ॥२०१॥ अथ तत्रागतः कश्चिदौषध्यर्थं वने भिषक्। दृष्ट्वा तं रूपमोन्मुच्य साधुः स्व नीतवान्गृहम् ॥२०२॥ तत्र पाश्वासितस्तेन शनैः स्वगृहमागमत्। स वध्यसारो न च तां विन्दप्राप कुगेहिनीम् ॥२०३॥ अवर्णयच्च स तस्मै वृत्तान्तं श्रेष्ठनाय सः। तेनापि वत्सराजाग्रे कथितं सर्वमेव तत् ॥२०४॥ अय निष्पौरुषामर्षः स्त्रीमूढ इति भार्यया। पुंवेषोऽस्य कृतो नूनं निग्रहश्चोचितः कृतः ॥१०५॥ इति राजकुले सर्वजनोपहसितोऽपि सः। वध्यसार इहास्ते वध्यसारेण चेतसा ॥१ ६॥ तदेवं कस्य विश्वासः स्त्रीषु दवेति गोमुखः। उक्तवानथ भूयोऽपि जगाद मरुभूतिकः ॥१ ७॥ राज्ञः सिंहबलस्य राज्ञ्याः कल्याणवत्याश्च कथा अप्रतिष्ठं मनः स्त्रीणामत्रापि श्रूयतां कथा। पूर्वं सिंहबलो नाम राजाभूद्दक्षिणापथे ॥१ ८॥ तस्य कल्याणवत्याख्या सर्वान्तःपुरयापिताम्। प्रिया माण्डलिकमन्तसुता भार्या बभूव च ॥१ ९॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ उल्टी (180 अंश घूमी हुई) दिशा में है तथा इसका अधिकांश भाग अत्यधिक धुंधला एवं क्षत-विक्षत है। सीधे विन्यास में पठनीय अंश का देवनागरी लिप्यंतरण नीचे दिया गया है:
... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... जब वह वंशी रव सुने तब अति व्याकुल होकर भागे उस दशा में उसके सब अंग शिथिल होगये हैं इस से वह गिर-गिर पडती है और फिर उठ कर वेग से दौडती लज्जा से संकोच बन जाती है और भय भी उस को रोक रहा है तब तेरी दशा पूरी सकेगी अथवा नहीं ॥ १- ॥
४३६ कथासरित्सागर
४३६ कथासरित्सागर
तया सह स राज्यं स्वं शासन्नृपतिरेकदा। निष्कासितोऽभूद्बलिविद्देशात् सम्भूय गोत्रजैः॥११०॥ देवीद्वितीयः प्रच्छन्नं सायुधोऽल्पपरिच्छदः। स प्रतस्थे ततो राजा मालवं श्वशुरास्पदम्॥१११॥ गच्छन् पथि च सोऽटव्यां सिंहमाधावितं पुरः। शरैः खड्गप्रहारेण द्विधा चक्रेऽवहेलया॥११२॥ वनद्विपं च गर्जन्तमायान्तं मण्डलाग्रभाक्। खड्गच्छिन्नकराङ्गुलिकं मुक्ताटटिमपातयत्॥११३॥ एकाकी तस्करचमूर्विदलयन्नवपङ्कजाः। गमाधारव्यविक्रान्तः करी कमलिनीमिव॥११४॥ एवं मार्गमतिव्रज्य दृष्टारब्धभूतविक्रमाम्। मालवं प्राप्य देवीं स्वां सोऽब्रवीत् सत्त्वसागरः॥११५॥ न मार्गवृत्तमेतन्मे वाच्यं पितृगृहे त्वया। लज्जया देवि का श्लाघा क्षत्रियस्य हि विक्रमे॥११६॥ इत्युक्त्वा च तया सार्धं प्राविशत्पितृगेहम् । सम्भ्रमात्तेन पृष्टश्च निजं वृत्तान्तमुक्तवान्॥११७॥ सम्भाव्य दत्तहस्त्यश्वस्तत्त्वेन श्वशुरेण सः। शतानीकाभिधस्यागाद्राज्ञोऽतियशिनोऽन्तिकम् ॥११८॥ देवीं तु कल्याणवतीं भार्यां तां पितृवेश्मनि। तत्रैव स्थापयामास विपक्षविजयोद्यतः॥११९॥ तस्मिन्प्रयाते मातुस्तु दिवसप्रकटात्र सा। देवी वातायनाधस्था कञ्चित्पुरुषमददात्॥१२०॥ स दृष्ट एव रूपेण तस्याश्चित्तमपाहरत्। स्मरणाङ्कुप्यमाणा च तत्क्षणं सा व्यचिन्तयत्॥१२१॥ जानेऽहं नार्यपुत्राद्यत्सुलक्ष्णाङ्गो न शोयपाम्। धावत्येव तथाप्यस्मिन् पुरुषे यत मे मनः॥१२२॥ तद्यथ भजाम्येनमिति सञ्चिन्त्य सा ततः। गय्र्यं रहस्यधारिण्यै स्वाभिप्रायं शशंस तम्॥१२३॥ शयनानाय्य भक्तं च बानायनरथेन सा। अन्त पुरं तं पुरुषं रञ्जलिखं न्यवेशयत्॥१२४॥
रानी के साथ राज्य के ग्राहक उस राजा को एकबार उसके प्रबल कुटुम्बी बन्धुओं ने मिलकर राज्य से निकाल दिया ॥११॥ तब वह राजा रानी और कुछ सेवकों के साथ गुप्त रूप से वहाँ से चला और अपनी ससुराल आ गया ॥१११॥ मार्ग में जाते हुए जंगल में उसने अपने ऊपर आक्रमण करते हुए एक सिंह को अनायास तलवार के प्रहार से दो टुकड़े करके मार डाला ॥११२॥ और, उन्नत पैंतर के साथ घूमते हुए तथा आक्रमण करते एवं चिल्लाड़ते हुए हाथी के पैर और सूँड़ काटकर उसे गिरा दिया ॥११३॥ आगे चलकर मिले हुए चोरों के दल को उसने इस प्रकार काटकर गिरा दिया जैसे जंगली हाथी कमल के जंगल को रौंद डालता है॥११४॥ इस प्रकार, रानी के द्वारा देखा गया पराक्रमवाला वह राजा मार्ग तय करके मालव देश पहुँचा। तब बल का समुद्र वह राजा रानी से कहने लगा—॥११५॥ मार्ग का यह समाचार तुम अपने पिता के घर मत कहना। यह तो एक लज्जा की बात है। पराक्रम करने में क्षत्रिय की क्या प्रशंसा ? ॥११६॥ ऐसा रानी से कहकर वह राजा उसके साथ उसके पिता के भवन में गया। और, घबराकर समाचार पूछने पर उसने अपना समाचार (बन्धुओं द्वारा राज्य छीने जाने का) सुना दिया ॥११७॥ तब श्वशुर द्वारा सत्कृत होकर और हाथी घोड़े आदि सेना की सहायता प्राप्त कर वह अत्यन्त बलवान् राजा यज्ञावलोक के समीप गया ॥११८॥ और, शत्रुओं को जीतने में प्रयत्नशील राजा ने रानी कल्याणवती को वही पिता के ही घर पर रख दिया ॥११९॥ उस राजा के चले जाने पर और कुछ दिन बीतने पर एक बार, भवन की खिड़की में बैठी हुई रानी ने किसी पुरुष को देखा ॥१२० ॥ उस पुरुष ने देखते ही रानी के मन को मोह लिया और काम-वासना से प्रेरित रानी उस समय सोचने लगी—॥१२१॥ मैं भली भाँति यह जानती हूँ कि मेरे पतिदेव के समान सुन्दर और पराक्रमी दूसरा पुरुष नहीं है। फिर भी इस पुरुष की ओर मेरा मन खिंच रहा है। यह खेद है ॥१२२॥ अब जो भी हो, मैं इसे भोगूंगी ही। इस प्रकार सोचकर उसने अपना गुप्त भेद जाननेवाली सहेली से अपने मन का भाव प्रकट किया ॥१२३॥ और उसी के द्वारा उस रात्रि के समय खिड़की के मार्ग से रस्से के सहारे ऊपर चढ़ा कर अपने घर में बुला लिया ॥१२४॥ १
१८ कथासरित्सागर
१८ कथासरित्सागर स प्रविष्टोऽत्र पुरुषो नैवाभ्यासितुमोजसा । शशाक तस्याः पर्यङ्के न्यषीदत् पुष्पासने ॥१२५॥ तद्दृष्ट्वा बत नीचोऽयमिति यावद्विषीदति । राज्ञी सा तावदत्रागादुपरिष्टाद् भ्रमन्नहिः ॥१२६॥ तं विलोक्य भयोत्थाय सहसा पुरुषोऽत्र सः । धनुरादाय भुजगं जघान विशिखेन तम् ॥१२७॥ विपन्नपतितं तं च गवाक्षात्क्षिप्तवान्बहिः । हर्षेण तन्मयोत्तीर्णो मनर्त स च कातरः ॥१२८॥ नृत्यन्तं वीक्ष्य तं खिन्ना सा कल्याणवती भृशम् । दध्यौ धिग्विधिमेतेन निःसत्त्वेनाधमेन मे ॥१२९॥ दृष्ट्वैव तद्विरक्तां तां चित्तज्ञा सा च तत्सखी । निर्गत्याशु प्रविश्यात्र जगाद कृतसम्भ्रमा ॥१३०॥ आगतस्ते पिता देवि तदयं यातु सम्प्रति । यथागतेनैव पथा स्वगृहं त्वरितं युवा ॥१३१॥ एव तयोक्ते निर्याते रज्ज्वा वातायनाद्बहिः । भयाकुलः स पतितो न दैवात् पञ्चतां गतः ॥१३२॥ गते तस्मिन्नुवाचैतां सा कल्याणवती सखीम् । सखि सुष्ठु कृतं नीचो यत्त्वयैष बहिष्कृतः ॥१३३॥ शान्तं त्वया मे हृदयं चेतो हि मम दूयते । भर्त्ता मे व्याघ्रसिंहादीन्विपाट्यापहृतो ह्रिया ॥१३४॥ अयं तु भुजगं हत्वा हीनसत्त्वः प्रनृत्यति । तत्तादृशं तं हित्वा किमस्मिन्मे प्राकृते रतिः ॥१३५॥ तदप्रतिष्ठितमतिं धिङ् मां धिगथवा स्त्रियः । या धावन्त्यगुणे हित्वा कर्पूरं मक्षिका इव ॥१३६॥ इति जातानुतापा सा राज्ञी नीत्वा निशां ततः । प्रतीक्षमाणा भर्त्तारमासीत्तत्र पितुर्गृहे ॥१३७॥ तावत्स दत्तान्यबलो गजानीकेन भूभुजा । गत्वा तान्प्राग्जयान्यस्य पापात्सिंहवतोऽब्रवीत् ॥१३८॥ ततः स सम्प्राप्य पुनः स्वराज्यमानीय भार्यां च पितुर्गृहात्ताम् । प्रपूज्य तं च श्वशुरं धनोपेतोऽनिष्कण्टकां क्ष्मां सुचिरं शशास ॥१३९॥
वह पुरुष उसके शयनागार में जाकर भी उसके तेज से प्रभावित होकर उसके पर्यंक पर न बैठकर भूमि पर बिछे हुए अलग आसन पर ही बैठ गया ॥१२५॥ यह देखकर, जब रानी यह सोच रही थी कि अरे, यह तो कायर है, तो मन में दुख करने लगी। इतने में ही छत के ऊपर से घूमता हुआ एक सर्प वहाँ आ निकला ॥१२६॥ उसे देखकर, भय से उठकर और धनुष लेकर उस पुरुष ने बाण से सर्प को मार डाला ॥१२७॥ मरने के बाद गिरे हुए उस सर्प को उसने झरोखे से बाहर फेंक दिया। फलतः उस भय से छूट जाने पर वह कायर प्रसन्न होकर नाचने लगा ॥१२८॥ उसे नाचते हुए देखकर व्याकुल वह कन्यावती गम्भीर चिन्ता करने लगी कि 'मुझे धिक्कार है! ऐसे बलहीन और नीच पुरुष से मैं क्या समागम करूँ? ॥१२९॥ उस पुरुष को देखते ही रानी को विरक्त जानकर, उसके मनोभाव को जाननेवाली सहेली ने उस कमरे में तुरन्त आकर घबराहट के साथ कहा—'हे देवि तुम्हारे पिता आये हैं इसलिए यह युवापुरुष जिस मार्ग से आया था उसी मार्ग से अपने घर चला जाय' ॥१३०-१३१॥ उस सहेली के ऐसा कहने पर खिड़की से बाहर लटकती हुई रस्सी के सहारे वह निकला किन्तु भय के कारण गिर पड़ा भाग्यवश मरा नहीं ॥१३२॥ उसके चले जाने पर कन्यावती अपनी सहेली से कहने लगी—'सखि अच्छा किया तुमने जो इस अधम और कायर को बाहर निकाला ॥१३३॥ तुमने मेरे हृदय को जान लिया। मेरा चित्त दुःखी हो रहा है। मेरा पति तो सिंह, जंगली हाथी और डाकुओं के दल का नाश करके भी लज्जा से उसे छिपाता है। और, यह कायर तो साँप को मारकर नाचता है। इसलिए, ऐसे शूर-वीर पति को छोड़कर ऐसे पामर व्यक्ति से मैं क्या प्रेम करूँ? ॥१३४-१३५॥ इस प्रकार चंचल बुद्धिवाली मुझे धिक्कार है। या उन सभी स्त्रियों को धिक्कार है, जो मक्खियों की भाँति सुगन्धित कपूर को छोड़कर गन्दगी की ओर दौड़ती हैं ॥१३६॥ इस प्रकार पश्चात्ताप करती हुई रानी उस रात्रि को व्यतीत करके पति की प्रतीक्षा करती हुई पिता के घर में रहने लगी ॥१३७॥ उधर, राजा विह्वल ने राजा गजानीक से और भी सेना की सहायता लेकर, चढ़ाई करके अपने महाबली पाँचों कुटुम्बियों को पराजित किया ॥१३८॥ तदनन्तर, राजा विह्वल ने पुनः अपने राज्य को पाकर अपनी रानी कन्यावती को पिता के घर से लाकर और श्वशुर को पर्याप्त धन देकर अपने निष्कंटक राज्य का चिरकाल तक शासन किया ॥१३९॥
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर इति प्रवीरे सुभग च सल्पतौ विवेकिनीनामपि दैव योषिताम् । चलं मनो धावति यत्र कुत्रचिद्विदुश्चसत्त्वा विरला पुनः स्त्रियः ॥१४०॥ इति मरुभूतिनिगदितामाकर्ण्य कथां स वत्सराजसुतः । नरवाहनदत्तस्तां सुखसुप्तो नीतवान् रजनीम् ॥१४१॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे शक्तियशोलम्बके द्वितीयस्तरङ्गः । तृतीयस्तरङ्गः नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता) ततः प्रातः कृतावश्यकरायं स सचिवैः सह । नरवाहनदत्त स्वमुद्यानं विहरन्ययौ ॥१॥ तत्रस्थश्च प्रभापुञ्जमादौ व्योम्नोऽप्यनन्तरम् । ततो विद्याधरीवल्लीरवत्तीर्णा ददर्श सः ॥२॥ तासां मध्य च दीप्तानां ददर्शेकां स कन्यकाम् । ताराणामिव शीतांशुलेखां लोचनहारिणीम् ॥३॥ विकसत्पद्मवदनां लोललोचनषट्पदाम् । सलीरुहसगमनां बह्दुत्पलसौरभाम् ॥४॥ तरङ्गहारित्रिवलीस्त्रासन्नतमध्यमाम् । साक्षादिव स्मरोद्यानवापीशोभाभिदेवताम् ॥५॥ स्मरसञ्जीवनीं तां च दृष्ट्वा सोत्कलिकामतः । चान्द्रीं मूर्तिमिवाम्भोधिश्शुशुभे स नृपात्मजः ॥६॥ अहो सुन्दरनिर्माणवैचित्री वाप्यसौ विधेः । इति शंसन् स सचिवः सहितस्तामुपाययौ ॥७॥ तिर्यक्प्रमार्द्या दृष्ट्या पश्यन्ती सा च स क्रमात् । पप्रच्छ का त्वं कल्याणि किमिहागमनं च ते ॥८॥ तच्छ्रुत्वा साऽब्रवीत्कन्या शृणुतेतद्वदामि यः । अशितघनाख्यः कौशाम्ब्याभागमनम् अस्ति काञ्चनशृङ्गाख्यं पुरं हैमं हिमाचले ॥९॥ तत्रास्ति नाम्ना स्फटिकयशा विद्याधरेश्वरः । धार्मिक कृपनानाधशरण्यामृतबरसम् ॥१०॥
षष्ठम लम्बक ७५१
षष्ठम लम्बक ७५१ हे स्वामी इस प्रकार वीर, सदाचारी और सुन्दर पति के रहने पर भी विचारशील युवतियों का भी मन चंचल होकर यहाँ-वहाँ दौड़ता है। विशुद्ध मनवाली स्त्रियाँ विरल ही होती हैं ॥१४॥ मरुभूति द्वारा इस प्रकार कही गई कथा को सुनकर वत्सराज-पुत्र नरवाहनदत्त ने सुखपूर्वक सोकर रात बिताई ॥१४१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त
तृतीय तरंग नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत)
सुबह में सोकर उठने के बाद आवश्यक कर्मों से निवृत्त होकर नरवाहनदत्त अपने मन्त्रियों के साथ उद्यान में विहार करने के लिए गया ॥१॥ उद्यान में भ्रमण करते हुए उसने आकाश में पहले तेज का पुंज और उसके पश्चात् ही आकाश से उतरती हुई बहुत-सी विद्याधरियों को देखा ॥२॥ उन चमकती हुई विद्याधरियों के मध्य उसने एक कन्या को इस प्रकार देखा मानों तारिका-मंडल के मध्य चमकती हुई नयनहारिणी चन्द्रमा की रेखा हो ॥३॥ उसका मुख-कमल खिला हुआ था और उसके चंचल नयन भ्रमरों के समान घूम रहे थे। हंस के समान लीलायुक्त गमन करती हुई उसके शरीर से कमल के समान सुगन्धि निकल रही थी ॥४॥ तरंग युक्त त्रिवली-लता से उसकी कमर अलंकृत थी मानों काम-रूपी बावली की छाया की वह मूर्तिमती अधिदेवता थी ॥५॥ कामदेव की संजीवनी-विद्या के समान और उत्कंठित चन्द्रमा की मूर्ति के समान उसे देखकर समुद्र के समान वत्सराज का पुत्र वह नरवाहनदत्त क्षुब्ध हो उठा ॥६॥ 'अहो ! यह तो ब्रह्मा के सौन्दर्य-सृष्टि की विचित्र रचना है' इस प्रकार कहता हुआ वह युवराज मन्त्रियों के साथ उसके पास आ गया ॥७॥ वह भी स्नेह से स्निग्ध और तिरछी आँखों से उसे देखती थी। क्रमशः समीप जाकर उसने उस सुन्दरी से पूछा कि तू कौन है और यहाँ कैसे आई ? ॥८॥
शक्तियशा का कौशाम्बी में आगमन
यह सुनकर वह कन्या बोली 'सुनो मैं तुम्हें बताती हूँ। हिमाचल पर्वत पर कांचन शृंग नाम का सुवर्ण-निर्मित नगर है ॥९॥ वहाँ स्फटिकयश नाम का विद्याधरों का राजा है। वह बहुत धर्मात्मा है और दीन अनाथों एवं शरणागतों का पालन रक्षण करनेवाला है ॥१०॥
४४२ कथासरित्सागर
४४२ कथासरित्सागर तस्य हेमप्रभादेव्यां जातां गौरीवरोद्भवाम्। मां शक्तियशसं नाम जानीहि तनयामिमाम् ॥११॥ पितुः प्राणप्रिया साहं पञ्चभ्रातृकनीयसी। अतोषयं तवादेशाद् व्रतं स्तोत्रैश्च पार्वतीम् ॥१२॥ तुष्टा सा सकला विद्या दत्त्वा मामेवमादिशत्। पितुर्वंशगुणैः पुत्रि भावि विद्याबलं तव ॥१३॥ नरवाहनदत्तश्च भर्त्ता तव भविष्यति। वत्सराजसुतो भाविचक्रवर्ती द्युचारिणाम् ॥१४॥ इत्युक्त्वा शर्वपत्नी मे तिरोऽभूत्तत्प्रसादतः। सद्योविद्याबला साहं सम्प्राप्ता यौवनं क्रमात् ॥१५॥ अद्यादिशच्च सा रात्रौ देवी मां दत्तदर्शना। प्रातः पुत्रि त्वया गत्वा द्रष्टव्यः स निजः पतिः ॥१६॥ आगन्तव्यमिहैवाद्य मासेन हि पिता तव। चित्तस्थितैस्तत्सङ्कल्पो विवाहं संविधास्यति ॥१७॥ इत्यादिश्य तिरोऽभूत् सा देवी याता च यामिनी। ततोऽहमार्यपुत्रैषा त्वमिह द्रष्टुमागता ॥१८॥ तत्सम्प्रति व्रजामीति गदित्वा ससखीजना। उत्पत्य च शक्तियशाः सा जगाम पुरं पितुः ॥१९॥ नरवाहनदत्तश्च तद्विवाहोत्सुकस्ततः। दिवसाभ्यन्तरं खिन्नः पश्यन् मासं युगॊपमम् ॥२०॥ तत्र दृष्ट्वा विमनसं सोऽथ तं गोमुखोऽब्रवीत्। शृणु देव कथामेकां तवाख्यामि विनोदिनीम् ॥२१॥ विद्याधर्याः कथा बभूव काञ्चनपुरीत्याख्यया नगरी पुरा। तस्यां च सुमना नाम महानासीन्महीपतिः ॥२२॥ आक्रान्तदुर्गकान्तारभूमिना येन चक्रिरे। चित्रं विराजमानेन तादृशा अपि शत्रवः ॥२३॥ तमेकदास्थानगतं प्रतीहारो व्यजिज्ञपत्। देव मुक्ताक्षिता नाम निषादाधिपकन्यका ॥२४॥ पञ्जरस्थितमादाय शुकं द्वारि बहिः स्थिता। वीरसेनेनानुगता भ्रात्रा तव दिदृक्षते ॥२५॥ १ इयमेव कथा कादम्बरीमूलभूता।
षष्ठ लम्बक ७४३
षष्ठ लम्बक ७४३ उस राजा की हेमप्रभा नाम की रानी में पार्वती की कृपा से उत्पन्न हुई शक्तियशा नाम की कन्या मुझे जानो ॥११॥ पाँच भाइयों में सबसे छोटी और अपने पिता की प्राणों से भी प्यारी कन्या मैने अपने पिता की आज्ञा से व्रतों और स्तोत्रों से पार्वती को सन्तुष्ट किया ॥१२॥ उस प्रसन्न पार्वती ने मुझे सभी विद्याएँ देकर आज्ञा दी कि 'बेटी तुझे पिता से दसगुना विद्याओं का बल प्राप्त होगा और वत्सराज का पुत्र तथा विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती नरवाहनदत्त तेरा पति होगा' ॥१३-१४॥ इस प्रकार कहकर पार्वती अन्तर्धान हो गई और विद्याबल को प्राप्त कर मैं समस्त गुणवती हो गई ॥१५॥ आज रात मुझे स्वप्न में दर्शन देकर पार्वती देवी ने आज्ञा दी कि 'बेटी प्रातःकाल ही तुम अपने पति को देखना ॥१६॥ और, एक मास के पश्चात् आज के ही दिन यहाँ फिर आना। तब चित्त में इस निश्चय को ठाने हुए तुम्हारा पिता तुम्हारा विवाह-संस्कार सम्पन्न करेगा' ॥१७॥ इस प्रकार की आज्ञा देकर देवी चली गईं और रात भी बीत गई। इसलिए, 'हे आर्यपुत्र मैं तुम्हें देखने के लिए यहाँ आई हूँ ॥१८॥ तुम्हारा दर्शन हुआ अतः अब मैं जाती हूँ।" यह कहकर शक्तियशा अपनी सहेलियों के साथ आकाश में उड़कर पिता के नगर को चली गई ॥१९॥ तब उसके विवाह के लिए व्याकुल नरवाहनदत्त एक मास को एक युग के समान समझता हुआ अपने भवन को गया ॥२०॥ घर आकर उसे उदास देखकर गोमुख ने कहा-हे स्वामी तुम्हारे मन को बहलाने के लिए मैं एक कथा कहता हूँ सुनो- ॥२१॥ दो विद्याधरियों की कथा प्राचीन समय में कांचनपुरी नाम की एक नगरी थी। उसमें सुशर्मा नाम का महान् राजा था ॥२२॥ दुर्गम भूमियों को आक्रान्त करके उस राजा ने शत्रुओं को भी ऐसा ही कर दिया (अर्थात्, उसके शत्रु भी दुर्गम भूमि की शरण में चले गए) ॥२३॥ एक बार सभा (आम दरबार) में बैठे हुए राजा से द्वारपाल ने आकर निवेदन किया- 'महाराज निषादों की राजकन्या मुक्ताफला पिंजरे में रखे हुए शुक (तोते) को लेकर बाहर द्वार पर खड़ी है। उसीके साथ उसका बड़ा भाई वीरध्वज है। वह आपको देखना चाहती है' ॥२४-२५॥
७४४ कथासरित्सागर
७४४ कथासरित्सागर प्रविशत्विति राज्ञोक्ते प्रतीहारनिवेशन । भिल्लकन्या नृपास्थानप्राङ्गणं प्रविवेश सा ॥२६॥ न मानुषीयं दिव्यस्त्री कापि नूनमसाविति । सर्वैरप्यचिन्त्यस्तत्र दृष्ट्वा तद्रूपमद्भुतम् ॥२७॥ सा च प्रणम्य राजानमेवं व्यज्ञापयत्तदा । देवाय सर्व्वशास्त्रज्ञोऽस्येनतुर्वेदघरः शुकः ॥२८॥ कविः कृत्स्नासु विद्यासु कलासु च विचक्षणः । भयैश्वरोपयोगित्वादहानीतोऽय गृह्यताम् ॥२९॥ इत्यर्पितस्तमादाय प्रतीहारेण कौतुकात् । नीतोऽग्रे नृपतेरेनं शुकः श्लोकं पपाठ सः ॥३०॥ राजन्युक्तमिदं सदैव यदयं दवस्य समुद्द्यते । धूमश्याममुखो द्विषद्विरहिणीनिःश्वासवातोद्गमैः । एतत्त्वद्भुतमेव यत्परिमषाद्वाष्पाम्बुपूरप्लवै- र्गाढं प्रज्वलतीह दिक्षु वणसु प्राप्य प्रतापानलः ॥३१॥ एवं पठित्वा व्याख्याय शुकोऽवादीत् पुनश्च सः । किं प्रमेयं कुत शास्त्राद्ब्रवीम्याविश्यतामिति ॥३२॥ ततोऽतिविस्मितं राज्ञि मन्त्री तस्याब्रवीन्निदम् । शङ्के शापाच्छुकीभूतः पूर्व्वर्षि कोऽप्ययं प्रभो ॥३३॥ जातिस्मरो धर्मवशात् पुरासीत स्मरत्यतः । इत्युक्ते मन्त्रिणा राजा स शुकं पृच्छति स्म तम् ॥३४॥ कौतुक भद्र मे ब्रूहि स्ववृत्तान्त क्व जन्म ते । शुकत्वे शास्त्रविज्ञानं कुत को वा भवानिति ॥३५॥ शुकस्यात्मकथा तत स बाष्पमुत्सृज्य ववति स्म शुकः शनै । अवाच्यमपि वैवंत्तच्छृणु वच्मि त्वाज्ञया ॥३६॥ हिमवन्निकटे राजंस्तस्येको रोहिणीतरुः । आम्नाय इव दिव्यापिभूरिशाखाश्रितद्विजः ॥३७॥ १ आम्नायपक्षे—भूरिशाखाश्रिता द्विजाः यस्य तरुपक्षे—भूरिशाखासु आश्रिता, द्विजाः=पक्षिणो यस्य ।
दशम लम्बक ७४५
दशम लम्बक ७४५ 'ले आयें राजा के इस प्रकार कहने पर, द्वारपाल के बताये मार्ग से वह म्लेच्छकन्या राजसभा भवन के आँगन में आई। उसके आश्चर्यजनक रूप को देखकर सभी सभासद सोचने लगे कि क्या यह मानुषी है अथवा कोई दिव्य स्त्री ॥२६-२७॥ वह कन्या राजा को प्रणाम करके बोली-'महाराज शास्त्रगज नाम का चारों वेदों का ज्ञाता यह शुक है। यह कवि है। सम्पूर्ण विद्याओं और कलाओं में यह कुशल है। मैं इसे महाराज के उपयुक्त समझकर यहाँ ले आई हूँ। आप इसे स्वीकार करें' ॥२८ २९॥ इस प्रकार, म्लेच्छकन्या द्वारा समर्पित शुक को द्वारपाल ने कौतूहलवश राजा के सामने प्रस्तुत कर दिया। तब उस शुक ने एक श्लोक पढ़ा जिसका अर्थ है—॥३०॥ 'राजन् यह तो उचित ही है कि आपके शत्रुओं की विरहिणी स्त्रियों के लम्बे श्वासों के साथ निकलते हुए वायु से धुएँ से श्याम मुखवाली प्रताप-अग्नि सदा चमकती रहती है किन्तु यह आश्चर्य की बात है कि शत्रु-स्त्रियों के दुःख के कारण निकले हुए आँसुओं की बाढ़ से वह प्रताप अग्नि दसों दिशाओं में और भी प्रचंड रूप से जलती रहती है ॥३१॥ यह श्लोक पढ़कर और उसकी व्याख्या करके वह सुग्गा बोला-महाराज किस शास्त्र से किस विषय का वर्णन करूँ आज्ञा दीजिए' ॥३२॥ तब राजा के आश्चर्य में निमग्न हो जाने पर उसका मन्त्री बोला-'प्रभो यह पूर्वजन्म का कोई ऋषि शापवश सुग्गा बन गया है। इसे पूर्वजन्म की स्मृति है और उस जन्म के पढ़े हुए विषयों का भी यह स्मरण करता है ॥३३-३४॥ 'हे भद्र मुझे यही कौतूहल है कि तुम अपना ही वृत्तान्त बताओ तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ और शुक होने पर भी तुम्हारा शास्त्रों का ज्ञान कैसा ? साथ ही तुम कौन हो? ॥३५॥ शुक की आत्मकथा तब वह शुक¹ आँसू गिराकर धीरे से बोला-'यह बात यद्यपि कहने योग्य नहीं है, फिर भी आपकी आज्ञा से कहता हूँ सुनिए' ॥३६॥ हे राजन् ! हिमालय के समीप रोहिणी का एक वृक्ष है। वेदों के समान जिसकी अनेक शाखाओं² में द्विज³ गण (पक्षी और ब्राह्मण) आश्रय लेते हैं ॥३७॥ १ यही कादम्बरी का वैशम्पायन शुक है। २ वृक्ष के पक्ष में शाखा = डालें। वेद के पक्ष में शाखा = भाग। ३ द्विज के पक्ष में = पक्षी। वेद के पक्ष में = त्रिवर्ण (ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य)। ९४
७४६ कथासरित्सागर
७४६ कथासरित्सागर तन्मिन्नहं समं शुक्या शुकस्तस्यां कृतालयः । तस्मादपोढमुत्पन्नस्तस्यां दुष्कर्मयोगतः ॥४३८॥ जातस्य च मे माता शुकी सा पञ्चतां गता । तातस्तु वृद्धः पक्षांस्तः क्षिप्त्वा वर्धयति स्म माम् ॥४३९॥ निग्म्यशुकानीतमुक्तशेषफलानि च । मन्नन् मह्यं च वितरन्नथ तत्रास्त मन्पिता ॥४४०॥ एकदा तत्र सूयाग्निष्मातपोग्रार्जुननादिनी । आग्नेत्वाय समगाद् भिल्लसेना भयङ्करी ॥४४१॥ विद्रस्तकृष्णमागक्षी धूलिव्यालोसितांशुका । सम्भ्रमोद्वल्लचमरीविभ्रमत्कवरीभग ॥४४२॥ विद्रुतव्याघ्नुतवाभूत्सहसा सा महाटवी । पुल्लिन्वले विविधप्राणिपाताय धावति ॥४४३॥ वृत्तान्वटीदित शूरया दिनमागत्वभूमिपु । आगाच्छद्वरमम्यं सत्रास्त पिशितभारवं ॥४४४॥ एवस्तु वृद्धगयरन्तद्रामामान्त्यामिप । अद्वाशीत् स त गाधं सुधिवस्तमुपागतम् ॥४४५॥ आगत्य च स तत्राणू शुक्तानन्यांश्च पक्षिणः । आरूढ्यारूह्य नीडेभ्यो हत्वा हत्या भुवि क्ष्यपात् ॥४४६॥ मपायान्तं च निकटं यमविस्फुरदन्निभम् । मं दृष्ट्वा भयाल्लीनो हन पक्षांन्तरं पितुः ॥४४७॥ तावत्नाम्मरतुमाय स प्राप्यारूह्यथ पातरौ । तान्तं म पीडितग्रीवं हत्या तन्मन्वधिक्षिपत् ॥४४८॥ अयं च तातेन समं पतित्वा तस्य कण्ठने । निगल्प शष्पन्तंग भयं प्राविन शनैः ॥४४९॥ अपार्याथ भित्नात्रावमो भग्नतमाश्रयन् । श्वानन्पाग्गमानाय पातं पत्तौ निशामगात् ॥४५०॥ तत्र तातमया दृष्ट्वाऽथ नीत्वा निशामयम् । शाभूदिन्यमुनि रन्त्येष्वति भागणः ॥४५१॥ अनन्तं फालगण्डूषप प्रवृन्तमन्तम् । तृप्तं पदगम्भीरंरमग्प्रदर्शना ॥४५२॥
दशम स्तबक ४२७ उस वृक्ष में एक सुग्गा सुग्गी के साथ घोंसला बनाकर रहता था। उसी सुग्गी के गर्भ से, अपने दुष्कर्मों के कारण मैं उत्पन्न हुआ ॥३८॥ मेरे उत्पन्न होते ही वह माता सुग्गी मर गई। पिता वृद्ध थे वे अपने पक्षों के भीतर मुझे रखकर मेरा पालन-पोषण करते थे ॥३९॥ आसपास सुग्गों के खाकर बचे (फेंके हुए) फलों को खाते हुए और मुझे देते हुए मेरे पिता मेरा पालन करने लगे ॥४०॥ एक बार शिकार करने के लिए तूणी गोमुख आदि वाद्यों से भीषण शब्द करती हुई भीलों की भयंकर सेना शिकार करने के लिए उस वन में आई ॥४१॥ उस सेना के भील जब जंगली प्राणियों के विनाश के लिए चारों ओर दौड़-धूप कर रहे थे तब नाचते हुए कृष्णसार मृग-रूपी आँखोंवाली धूल से भरे हुए पत्तोंवाली भाग्य से घबराकर इधर-उधर भागते हुए चमरी मृगों के पूँछ-रूपी केशोंवाली वह वनभूमि सहसा व्याकुल हो उठी ॥४२-४३॥ सारे दिन उस शिकार की भूमि में विनाश-लीला करके मारे हुए पशुओं के मांस को लादे हुए वह भील-सेना सायंकाल के समय उस वृक्ष के नीचे आ गई ॥४४॥ उसमें एक वृद्ध भील था जिसे मांस नहीं मिला था। उस भूखे भील ने सायंकाल के समय उस वृक्ष पर दृष्टि डाली और वृक्ष के समीप आ गया ॥४५॥ आकर, तुरन्त ही वृक्ष पर चढ़कर उसने सुग्गा तथा अन्यान्य पक्षियों को घोंसलों से निकाल-निकालकर और मार-मारकर वृक्ष के नीचे फेंकना प्रारम्भ किया ॥४६॥ उसे यम के किंकर की तरह निकट आया देख मैं भय से अपने पिता के पंखों के बीच चुपके-से छुपक गया ॥४७॥ जब उस पापी ने क्रमशः मेरे घोंसले को देखकर मेरे पिता को घोंसले से बाहर खींचकर, गला दबाकर मार डाला और फेंक दिया ॥४८॥ मैं भी अपने पिता के साथ भूमि पर गिरकर और उनके पंख से निकलकर घास और पत्तों के भीतर धीरे-धीरे घुस गया ॥४९॥ तब वह भील नीचे उतरकर और मारे हुए पक्षियों को आग में भून-भूनकर खाने लगा। शेष कुछ सुग्गों को लेकर वह पापी अपने गांव को चला गया ॥५०॥
४४८ कथासरित्सागर
४४८ कथासरित्सागर तत्रापश्यं कृतस्नानमहं सरत्सैकतस्थितम् । मुनिं मरीचिनामानं पूर्वपुण्यमिवात्मनः ॥५३॥ स मां दृष्ट्वा समाश्वास्य मुखक्षिप्तोदबिन्दुभिः । कृत्वा पत्रपुटेऽनैषीदाश्रमं कृपया मुनिः ॥५४॥ तत्र दृष्ट्वा कुलपतिर्मां पुलस्त्यः किलाहसत् । तेनान्यमुनिभिः पृष्टो दिव्यदृष्टिरुवाच सः ॥५५॥ इमं शापशुकं दृष्ट्वा दुःखेने हसितं मया । वक्ष्यामि चैतत्सम्बद्धां कथां वो विहिताह्निकः ॥५६॥ जातिं यच्छ्रवणादेष प्राग्वृत्तं च स्मरिष्यति । इत्युक्त्वा स पुलस्त्यश्चिराह्निकाद्योत्थितोऽभवत् ॥५७॥ कृताह्निकश्च मुनिभिः पुनरभ्यर्थितोऽत्र सः । मत्सम्वद्धां कथामेतां महामुनिरवर्णयत् ॥५८॥ सोमप्रभमकरन्दिकाभर्त्तूरत्नप्रभायाः कथा आसीज्ज्योतिष्प्रभो नाम राजा रत्नाकर पुरे । आरत्नाकरमुर्वी यः शशासोजितशासनः ॥५९॥ तस्य तीव्रतपस्तुष्टगौरीपतिवरोद्भवः । हर्षवत्यभिधानायां पुत्रो दम्यामजायत ॥६०॥ स्वप्ने मुखप्रविष्टं यत्सोमं वक्री ददर्श सा । तेन सोमप्रभं नाम्ना तं चक्रे स्वसुतं नृपः ॥६१॥ ववृधे च स तन्वानः प्रजानां नयनोत्सवम् । राजपुत्रोऽमृतमयैर्गुणैः सोमप्रभः क्रमात् ॥६२॥ दृष्ट्वा भरक्षमं शूरं युवानं प्रकृतिप्रियम् । यौवराज्येऽभ्यषिञ्चत्तं प्रीतो ज्योतिष्प्रभः पिता ॥६३॥ प्रभाकराभिधानस्य तनयं निजमन्त्रिणः । ददौ प्रियङ्करं नाम मन्त्रित्वे चास्य सद्गुणम् ॥६४॥ तत्कालमम्बरादद्य दिव्यमादाय मातलिः । अवतीर्णस्तमभ्येत्य सोमप्रभमभाषत ॥६५॥ विद्याधरः सखा शक्रस्यावतीर्णो भवानिह । तेन बान्धवा मानं शकेणाञ्चैषवत्सुत ॥६६॥ पूर्वस्नेहेन तं राजन् प्रहितस्तुरगोत्तमः । अमानुषश्च शत्रूणामजय्यत्वं भविष्यसि ॥६७॥
दशम लम्बक ७४९
दशम लम्बक ७४९ उस सरोवर में स्नान करके तट की बालू पर बैठे हुए मैंने अपने पूर्वजन्मों के पुण्यों के समान मरीचि नाम के मुनि को देखा ॥५३॥ वह मुनि मुझे देखकर और जल की बूंदों को मेरे मुंह पर डालकर, मुझे धीरज बँधाकर और पत्तों के दोनों में मुझे रखकर कृपापूर्वक अपने आश्रम में ले गये ॥५४॥ वहाँ मुझे देखकर आश्रम के कुलपति पुलस्त्य ऋषि ने हंस दिया। तब अन्य ऋषियों द्वारा उनके हँसने का कारण पूछने पर पुलस्त्य ने कहा-'मैं अपना दैनिक कृत्य समाप्त करके इसकी कथा आप लोगों से कहूँगा। इस कथा को सुनने से यह सुग्गा अपने पूर्वजन्म का स्मरण करेगा और अपना पिछला वृत्तान्त भी स्मरण करेगा'। ऐसा कहकर पुलस्त्य मुनि नित्य-कर्म में लग गए ॥५५-५७॥ नित्यकर्म करने के उपरान्त अन्य मुनियों द्वारा पुनः पूछे गये पुलस्त्य महामुनि ने मेरे सम्बन्ध की कथा का वर्णन किया ॥५८॥
सोमप्रभ मकरन्दिका और मनोरथप्रभा की कथा रत्नाकर नगर में ज्योतिष्प्रभ नाम का राजा था। वह प्रचण्डशासन राजा समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का शासन करता था ॥५९॥ उस राजा की तीव्र तपस्या से प्रसन्न शिवजी के वर से उसकी रानी हर्षवती के पुत्र उत्पन्न हुआ ॥६०॥ रानी ने स्वप्न में चन्द्रमा को अपने मुंह में प्रवेश करते देखा था इसलिए राजा ने उस पुत्र का नाम सोमप्रभ रखा ॥६१॥ प्रजाजन के नेत्रों के आनन्द को बढ़ाता हुआ वह बालक सोमप्रभ अपने अमृतमय गुणों के साथ क्रमशः बढ़ने लगा ॥६२॥ कुछ दिनों के पश्चात् पुत्र सोमप्रभ को गुण, युवा और प्रजा का प्रिय देखकर पिता ज्योतिष्प्रभ ने उसे युवराज के पद पर बैठा दिया ॥६३॥ और प्रभाकर नाम के अपने मन्त्री के सदगुण पुत्र प्रियंकर को उसका मन्त्री बना दिया ॥६४॥ उसी समय मातलि दिव्य घोड़े को लेकर आकाश से उतरा और सोमप्रभ के समीप आकर बोला- ॥६५॥ 'तुम इन्द्र के मित्र विद्याधर भूमि पर अवतरे हो इसलिए इन्द्र ने तुम्हें धषा नामक अपने घोड़े के पुत्र आशुश्रवा को तुम्हारे लिए भेजा है॥६६॥ यह घोड़ा तुम्हें प्राचीन स्नेह के कारण भेजा गया है। इस पर चढ़कर तुम शत्रुओं के लिए अजेय हो जाओगे ॥६७॥
१. यही कादम्बरी का कथाबीज है। २. कादम्बरी का शूद्रकराज। ३. यही कादम्बरी का इन्द्रायुध है।
७२० कथासरित्सागर
७२० कथासरित्सागर
इत्युक्त्वा वाजिरत्नं तद्दत्त्वा सोमप्रभाय स। आप्तपूजः समुत्पत्य ययौ वासवसारथिः ॥६८॥ ततो नीत्वैव दिवस तमुत्सवमनोरमम्। सोमप्रभस्तमन्येद्युरुवाच पितरं नृपम् ॥६९॥ तात न क्षत्रियस्यैष धर्मो यदजिगीषुता। तदाज्ञां देहि मे यावद्दिग्जयाय व्रजाम्यहम् ॥७०॥ तच्छ्रुत्वा स पिता तुष्टस्तथेति प्रत्यभाषत। चक्रे ज्योतिष्प्रभस्तस्य यात्रासविदमथ च ॥७१॥ ततःप्रणम्य पितरं दिग्जयाय बलैः सह। प्रायाच्छत्रुन्व्यपास्तङ्कः शुभे सोमप्रभोऽहनि ॥७२॥ जिगाय सोऽश्वरत्नेन तेन दिक्षु महीपतीन्। आजहार च रत्नानि तेभ्यो दुर्वारविक्रमः ॥७३॥ नामितं स्वधनुस्तेन विद्धिषां च शिरः समम्। उन्नतिं तद्धनुः प्राप न तु तद्विषतां शिरः ॥७४॥ आगच्छन् कृतकार्योऽथ हिमाद्रिनिकटे पथि। सन्निविष्टबलश्चक्रे मृगयां स वनान्तरे ॥७५॥ दैवात् सद्रत्नखचितं तत्रापश्यत्स किन्नरम्। अभ्यधावच्च स प्राप्तुं तेन शाक्रेण वाजिना ॥७६॥ स किन्नरो गिरिगुहां प्रविश्यादर्शनं ययौ। सोमप्रभस्तु तेनाश्वेनातिदूरममीमत् ॥७७॥ तावत्प्रकीर्णं काष्ठासु प्रकाशं तिग्मतेजसि। प्राप्ते प्रतीचीं ककुभं सन्ध्यासङ्गमकारिणीम् ॥७८॥ श्रान्तं कथञ्चिदावृत्य स ददर्श महत्सरः। तत्तीरे तां निशां नेतुकामश्चाश्वादवातरत् ॥७९॥ दत्त्वा तृणोदकं तस्मायाहृताम्बुफलोदकः। विश्रान्तश्चैकतोऽकस्मादशृणोत् गीतनिःस्वनम् ॥८०॥ गत्वा तदनुसारेण कौतुकात्रातिदूरतः। सोऽपश्यच्छिवलिङ्गाग्रे गायन्तीं दिव्यकन्यकाम् ॥८१॥ केयमद्भूतरूपा स्यादिति तं च सविस्मयम्। साप्युदाराकृतिं दृष्ट्वा कृतातिथ्यमवोचत ॥८२॥
दशम लम्बक ७५१
दशम लम्बक ७५१ इस प्रकार कहकर और उस अश्वरत्न को सोमप्रभ के लिए देकर तथा सोमप्रभ से सत्कृत होकर इन्द्र का सारथी वह मातलि आकाश में उड़कर चला गया ॥६८॥ तब युवराज सोमप्रभ ने उत्सव से मनाकर उस दिन को व्यतीत कर दूसरे दिन अपने पिता से कहा—॥६९॥ 'पिता क्षत्रिय का यह धर्म नहीं है कि वह विजय की इच्छा न करे। इसलिए मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं दिग्विजय करने जाऊँ' ॥७०॥ यह सुनकर प्रसन्न उसके पिता ने 'अच्छा' कहकर उसके दिग्विजय की तैयारी की ॥७१॥ तब युवराज सोमप्रभ माता-पिता को प्रणाम कर, सेनाओं के साथ इन्द्र के उस घोड़े पर चढ़कर शुभ दिन में दिग्विजय के लिए निकल पड़ा ॥७२॥ उस अश्वरत्न से सभी दिशाओं के राजाओं को जीतकर, उस अनन्त शक्तिवाले सोमप्रभ ने उनसे अनेक रत्न प्राप्त किये ॥७३॥ उसने अपने धनुष के साथ शत्रुओं के सिर भी झुका दिये। वह धनुष तो फिर तन गया किन्तु शत्रुओं के सिर फिर न उठ सके ॥७४॥ दिग्विजय करके लौटते हुए युवराज ने मार्ग में हिमालय के समीप सेना का शिविर लगाया और वन में आखेट करना प्रारम्भ किया ॥७५॥ दैवयोग से उसने सुन्दर गन्ध से आकृष्ट एक किन्नर को देखा और उसे पकड़ने के लिए इन्द्र के घोड़े से उसका पीछा किया किन्तु वह किन्नर पर्वत की हिमगुहा में घुसकर अदृश्य हो गया। सोमप्रभ को यह पीछा बहुत दूर ले गया ॥७६-७७॥ सभी दिशाओं को प्रकाशित करके जब प्रचण्डरश्मि भगवान् भास्कर सन्ध्या से संगम करानेवाली पश्चिमा दिशा में पहुँचे तब थके हुए सोमप्रभ ने एक सरोवर को देखा और उसी के किनारे रात बिताने की इच्छा से वह घोड़े से उतर पड़ा ॥७८-७९॥ घोड़े को घास-पानी देकर और स्वयं फल तथा जल ग्रहण कर एक ओर विश्राम करने पर उसने गान का रव सुना ॥८०॥ कौतुकवश गान-ध्वनि के अनुसार कुछ ही दूर जाकर उसने शिवलिंग के आगे गाती हुई एक दिव्य कन्या को देखा ॥८१॥ 'यह आश्चर्यजनक रूपवाली कन्या कौन है? विस्मय के साथ वह यह सोच ही रहा था कि उस कन्या ने भी सोमप्रभ का असाधारण सौन्दर्य देखकर और उसका यथायोग्य सत्कार करके उससे कहा—॥८२॥