कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
अष्टम लम्बक २३१
अष्टम लम्बक २३१ चन्द्रप्रभ नाम का वह राजा विश्व को आह्लाद देनेवाला अतएव समुचित नामवाला होने पर भी शत्रुओं के लिए अग्नि के समान सन्तापदायक था ॥१८॥ उस राजा की कीर्तिमती नाम की महारानी से अत्यन्त शुभ लक्षणों से भूषित उत्कर्षवाला प्रभावशाली पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१९॥ ‘यह सूर्यप्रभ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ है, जिसे शंकर भगवान् ने पहले से ही विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती बनाया है' ॥२०॥ उसके उत्पन्न होने पर राजा चन्द्रप्रभ के कानों के लिए अमृत-वर्षा के समान इस प्रकार स्पष्ट आकाशवाणी हुई ॥२१॥ तदनन्तर, शिवजी की कृपा से अत्यन्त उत्सव-युक्त चन्द्रप्रभ के राजगृह में वह सूर्यप्रभ क्रमशः बड़ा होने लगा ॥२२॥ तीव्रबुद्धि वह सूर्यप्रभ बालकपन में ही क्रमशः गुरुओं की उपासना से सभी विद्याओं और कलाओं में पारंगत होगया ॥२३॥ अपने गुणों से प्रजा को आकृष्ट करनेवाले सोलह वर्ष के उस कुमार सूर्यप्रभ को पिता चन्द्रप्रभ ने युवराज-पद पर अभिषिक्त कर दिया ॥२४॥ और, अपने मन्त्रियों के पुत्र भास प्रभास सिद्धार्थ प्रहस्त आदिको कुमार के लिए मन्त्री नियुक्त कर दिया ॥२५॥ जब सूर्यप्रभ उन मन्त्रिपुत्रों के साथ युवराज का कार्य कर रहा था इसी बीच एक बार मय नामक असुर वहाँ आया ॥२६॥ आतिथ्य-सत्कार कर लेने के उपरान्त महासुर ने सूर्यप्रभ के साथ दरबार में बैठे हुए चन्द्रप्रभ से कहा—॥२७॥ ‘राजन्, शिवजी ने तुम्हारे इस पुत्र सूर्यप्रभ को विद्याधर-राजाओं का भावी चक्रवर्ती नियुक्त किया है ॥२८॥ तो यह सूर्यप्रभ उस विद्याधर-चक्रवर्ती के पद को प्राप्त करानेवाली विद्याओं को क्यों नहीं सिद्ध करता' इसीलिए शिवजी ने मुझे भेजा है॥२९॥ आप आज्ञा दीजिए कि मैं उसे ले जाकर विद्याधर चक्रवर्ती के पद की साधक विद्याओं को सिद्ध करने की क्रिया उसे सिखा देता हूँ ॥३०॥ इस सूर्यप्रभ का विरोधी विद्याधरों का सम्राट् श्रुतशर्मा है जिसे इन्द्र ने बनाया है ॥३१॥ १
२४४ कथासरित्सागर
२४४ कथासरित्सागर सिद्धविद्याप्रभावस्तु सहास्माभिर्विजित्य तम्। एष विद्याधराधीशचक्रवर्तित्वमाप्स्यति ॥३२॥ एवं मयेनाभिहिते राजा चन्द्रप्रभोऽब्रवीत्। धन्याः स्मः पुण्यवानेष यथेच्छं नीयतामिति ॥३३॥ ततस्तमामन्त्र्य नृपं तदनुज्ञानमादृ सम्। सूर्यप्रभं स सामात्यं पाताल नीतवान्मयः ॥३४॥ तत्रोपदिश्यैतस्तस्मै स तपांसि तथा यथा। राजपुत्रः स सामात्यो विद्या शीघ्रससाधयत् ॥३५॥ विमानसाधनं तस्मै तथैवोपदिवेश सः। तेन भूतासनं नाम स विमानमुपार्जयत् ॥३६॥ तद्विमानाधिरूढं तं सिद्धविद्यं समन्त्रिकम्। सूर्यप्रभं स पातान्तान्मयः स्वपुरमानयत् ॥३७॥ प्रापय्य पित्रो पार्श्वं च तं जगाद व्रजाम्यहम्। त्वं सिद्धिभोगा भुङ्क्ष्वेह यावदप्याभ्यहं पुन ॥३८॥ इत्युच्चिदानात्सपूज्यो जगाम स मयासुरः। ममन्द विद्यासिद्ध्या च सूनोश्चन्द्रप्रभो नृपः ॥३९॥ सोऽथ सूर्यप्रभो विद्याप्रभावात्सचिवैः सह। नानादेशान् विमानेन सदा बभ्राम लीलया ॥४०॥ यत्र यत्र च या या तमपश्यद्राजकन्यका। तत्र तत्र स्वयं वव्रे सा सा तं काममोहिता ॥४१॥ एका मदनसेनाख्या ताम्रलिप्त्यां महीपतेः। सुता वीरभटाख्यस्य कन्या लोकैकसुन्दरी ॥४२॥ द्वितीया सुभटाख्यस्य तनया चन्द्रिकावती। अपरान्ता१धिराजस्य सिद्धैर्नीत्वोन्मिषत्कान्त्यत् ॥४३॥ काञ्चीनगर्यां नृपतेः कुम्भीराख्यस्य चात्मजा। ख्याता वरुणसेनाख्या तृतीया रूपशालिनी ॥४४॥ १ साम्प्रतं 'तामलुक' इति बङ्गदेशे प्रसिद्धम्। २ 'गोवा' प्रान्तः साम्प्रतं पुर्तगाल साम्राज्येनाधिष्ठितः।
अष्टम लम्बक २१५
[Header] अष्टम लम्बक २१५
'यह सूर्यप्रभ विद्याओं की सिद्धि से प्रभावशाली होकर, हम लोगों के साथ उसे जीत कर, विद्याधर-चक्रवर्ती का पद प्राप्त करेगा' ॥३२॥ मय के ऐसा कहने पर राजा चन्द्रप्रभ ने कहा—'मैं धन्य हूँ और यह सूर्यप्रभ भी पुण्यवान् है आप अपनी इच्छानुसार इस से कार्य' ॥३३॥ तदनन्तर चन्द्रप्रभ से परामर्श कर और उससे आज्ञा प्राप्त सूर्यप्रभ को उसके मित्र मन्त्रियों के साथ मयासुर पाताल ले गया ॥३४॥ पाताल ले जाकर मयासुर ने सूर्यप्रभ को जैसे-जैसे उपदेश किया उसने भी मन्त्रियों के साथ वैसे ही वैसे तपस्याओं द्वारा विद्याओं की सिद्धि प्राप्त की ॥३५॥ अन्य विद्याओं के अतिरिक्त मय ने उसे विमान की साधना का भी उपदेश दिया जिससे उसने भूतासन नाम के विमान का निर्माण किया ॥३६॥ तदनन्तर मय उसी विमान पर आरूढ़ विद्याओं को सिद्ध किये हुए सूर्यप्रभ को उसके मित्र मन्त्रियों के साथ उसके पिता राजा चन्द्रप्रभ के समीप ले आया ॥३७॥ उसे माता-पिता के समीप पहुँचाकर मय ने कहा— मैं जाता हूँ तुम अपनी सिद्धि से सांसारिक भोगों को भोगो तबतक मैं फिर आऊँगा' ॥३८॥ ऐसा कहकर और सूर्यप्रभ से सत्कृत मयासुर चला गया और राजा चन्द्रप्रभ पुत्र की विद्या सिद्धि से बहुत प्रसन्न हुआ ॥३९॥ तदनन्तर सूर्यप्रभ विद्याओं की सिद्धि के प्रभाव से अपने मन्त्रियों के साथ विमान के द्वारा भिन्न-भिन्न देशों में स्वेच्छापूर्वक घूमने लगा ॥४०॥ जहाँ जहाँ जो-जो राजकुमारी उसे देखती थी वह-वह उस पर मोहित होकर उसका वरण कर लेती थी ॥४१॥ उनमें ताम्रलिप्ती के राजा वीरभट की अद्वितीय सुन्दरी पुत्री मदनसेना पहली राजकुमारी थी ॥४२॥ दूसरी अपरान्त (कोंकण) के राजा सुभट की चन्द्रिकावती कन्या थी जिस सिद्ध लोग कहीं से लाकर सुभट के पास छोड़ गये थे ॥४३॥ तीसरी अत्यन्त सुन्दरी कन्या कांची नगरी के राजा कुम्भीर की वल्लभसेना नाम की थी ॥४४॥
१ यह प्रदेश आजकल गोआ में सन्निग्ध है।—अनु० २ कांची मद्रास के पास प्रसिद्ध पुण्यपुरी है। यहाँ के पल्लव राजा प्रसिद्ध थे।—अनु०
२३६ कथासरित्सागर
२३६ कथासरित्सागर लावणकाधिराज्यस्य पौरवस्यस्य भूपतेः। सुता सुलोचना नाम चतुर्थी चारुलोचना ॥४५॥ चीनवङ्गपते राज्ञः सुरोहस्यात्मसम्भवा। हारिहेमावदाताङ्गी विद्युन्मालेति पञ्चमी ॥४६॥ कान्तिसेनस्य नृपतेः श्रीकण्ठविषयप्रभोः। सुता कान्तिमती नाम षष्ठी कान्तिजिताप्सराः ॥४७॥ जनमेजयभूपस्य कौशाम्बीनगरीपतेः। तनया परपुष्टाख्या सप्तमी मञ्जुभाषिणी ॥४८॥ अविज्ञातहृतानां च तासां बुद्ध्वापि बान्धवाः। विद्याबलोद्धते तस्मिन्नासंश्चेतसवृतयः १ ॥४९॥ ताभिश्चोपात्तविद्याभिः समं युगपदारमत्। विद्याधरर्षितानेकस्नेहः सूर्यप्रभोऽत्र सः ॥५०॥ नभोविहारसङ्गीतपानगोष्ठ्यादिभिस्तथा । चिक्रीड सहितस्ताभिः प्रहस्ताद्यैश्च मन्त्रिभिः ॥५१॥ दिव्यचित्रकलाभिश्च लिखंश्चिद्याधराङ्गनाः। कुर्वंश्च नर्मवक्रोक्तीः कोपयामास ताः प्रियाः ॥५२॥ रेमे च तासां वदनैः सभ्रभङ्गारुणेक्षणैः। वचनैश्च सकम्पौष्ठपुटविस्खलिताक्षरैः ॥५३॥ सर्वारस्ताम्रलिप्तीं च गत्वोद्यानेषु सेश्वरः। स राजसूनुर्व्यहरत् समं मदनसेनया ॥५४॥ स्थापयित्वा प्रियाश्चात्र भूतासनविमानगः। जगाम वज्रसाराख्यं प्रहस्तेनसखः पुरम् ॥५५॥ जग्राह तत्र समयां राज्ञो रम्भस्य पश्यतः। रक्तां तारावली नाम दह्यमानां स्मराग्निना ॥५६॥ आययौ ताम्रलिप्तीं च पुनस्तत्राप्युपाहरत्। अपरां राजतनयां कन्यां नाम्ना विलासिनीम् ॥५७॥ तदर्थं कुपितायातं तस्या भ्रातरमुद्यतम्। स गङ्गायुधं नाम विद्यया स्तम्भितं व्यधात् ॥५८॥ १ मुग्धाश्चेतसवृत्तयः। २ वज्रप्रभाख्ये चेत्यवप्रभा।
अष्टम लम्बक २३७
अष्टम लम्बक २३७ चौथी लावाणक के राजा पौरव की सुनयनी सुलोचना नाम की कन्या थी ॥४५॥ पाँचवीं चीन के राजा मुरोह की सोने के रंगवाली विद्युन्माला नाम की सुन्दरी कन्या थी ॥४६॥ छठी श्रीकंठ देश के राजा कान्तिसेन की कुमारी कान्तिमती थी जो अपने सौन्दर्य से अप्सराओं को जीतती थी ॥४७॥ कौशाम्बी नगरी के राजा जनमेजय की मधुरभाषिणी परपुष्टा नाम की कन्या सातवीं थी ॥४८॥ अनजान में अपहरण की गई उन कन्याओं के बन्धुगण सूर्यप्रभ को जान लेने पर भी उसकी विद्याओं के प्रभाव से बेंत के समान काँपते थे ॥४९॥ सूर्यप्रभ ने उन कन्याओं को भी विद्याओं का उपदेश कर दिया था और स्वय विद्या के प्रभाव से अनेक देह धारण करके एक साथ ही सबके साथ रमण करता था ॥५० ॥ राजा सूर्यप्रभ आकाश-विहार, संगीत पान-गोष्ठी आदि से उनके तथा प्रहस्त आदि मन्त्रियों के साथ आनन्द भाव में समय व्यतीत करता था ॥५१॥ और, दिव्य चित्रकला का जानकार वह सूर्यप्रभ दिव्य विद्याधरियों के चित्र बनाकर अपनी प्रियतमाओं को प्रणय-कुद्ध करता था ॥५२॥ टेढ़ी भौंहों और क्रोध से लाल नेत्रोंवाली तथा काम से काँपते हुए ओठों से फड़फड़ा कर मन्दमन्द बोलती हुई उन पत्नियों के साथ हास्य-विनोद करता हुआ वह आनन्द का अनुभव करता था ॥५३॥ वह राजपुत्र आकाश-मार्ग से ताम्रलिप्ती नगरी में आकर उसके उद्यानों में मदनसेना के साथ विहार करता था ॥५४॥ एक बार वह, अपनी सभी पत्नियों को भूतासन नामक विमान में बैठाकर, प्रहस्त नामक मन्त्री को साथ लेकर, वज्रसार नामक नगरी में गया ॥५५॥ यहाँ राजा रम्भ के देखते-देखते कामाग्नि से सन्तप्त उसकी तारावती नाम की कन्या को उठा लाया ॥५६॥ वह वहाँ से फिर ताम्रलिप्ती आया और वहाँ से विलासिनी नाम की दूसरी राजकन्या का भी अपहरण कर लिया ॥५७॥ इस बात से क्रुद्ध और युद्ध के लिए आये हुए रुह्व्रायुध नामक उसके भाई को सूर्यप्रभ ने अपनी विद्या के प्रभाव से बाँधकर स्तब्ध और विजय कर दिया ॥५८॥
२४८ कथासरित्सागर
२४८ कथासरित्सागर मातुलं च सहायातं तस्य ससम्भ्रमं सानुगम्। चक्रे मुण्डितमूर्धानं सत्कान्ताहरणैषिणम् ॥५९॥ भार्याबन्धू इति क्रुद्धोऽप्यवधीन्न स तावुभौ। दर्पभङ्गलक्षी तु विहस्य प्रतिमुक्तवान् ॥६० ॥ ततः स नवभिः सूर्यप्रभः कान्ताभिरन्वितः। पित्राहूतो विमानेन स्वपुरं शाकलं ययौ ॥६१॥ ततश्चास्य पितुश्चन्द्रप्रभभूमिभृतोऽन्तिकम्। प्राहिणोत्ताम्रलिप्तीतो दूतं वीरभटो नृपः ॥६२॥ सन्निवेशं च पुत्रेण तव मेऽभूदृते सुते । तदस्तु विलासिभ्यो हि श्लाघ्य एष पतिस्तयोः ॥६३॥ स्नेहश्च यदि वोऽस्मासु तदिहागच्छताधुना। विवाहाचारसंस्कारस्तस्य यावद्विदध्महे ॥६४॥ एतच्छ्रुत्वा स सत्कृत्य दूतं निश्चितवांस्तदा। श्व एव तत्र गमनं राजा चन्द्रप्रभो द्रुतम् ॥६५॥ सत्यत्वनिश्चयं ज्ञातुं राज्ञो वीरभटस्य तु। प्रहस्तं प्राहिणोमत्त्वा दूरं द्रुतगमागमी ॥६६॥ स प्रहस्तो जवाद् गत्वा दृष्ट्वा वीरभटं च तम्। नृपं दृष्ट्वा च तत्कार्यं तच्छ्रितैस्सुपूजितः ॥६७॥ तस्मै सविस्मयायोक्त्वा प्रभूणां प्रातरागमम्। मुहूर्तेनाययौ चन्द्रप्रभपार्श्वं विहायसा ॥६८॥ शशंस तस्मै राज्ञे च सज्जं वीरभटं स्थितम्। सोऽपि तं सचिवं सूनोस्तुष्टो राजाभ्यपूजयत् ॥६९॥ ततः कीर्तिमतीदेव्या सह चन्द्रप्रभः प्रभुः। सूर्यप्रभो विलासिन्या तथा मदनसेनया ॥७० ॥ भूतासनमानं तदारुह्य सपरिच्छदौ। सामात्यौ चापरेद्युस्तो प्रातः प्रययतुस्ततः ॥७१॥ अह्नः प्रहरमात्रेण ताम्रलिप्तीमवापतुः । दृश्यमानौ जनैर्व्योम्नि कौतुकोत्क्षिप्तलोचनैः ॥७२॥ नभस्तरावतीर्णौ च कृतप्रत्युद्गमेन तौ। राजा वीरभटेनैतां क्षमं विविशतुः पुरीम् ॥७३॥
मध्यम लम्बक २३९
मध्यम लम्बक २३९ सेना के साथ आये हुए उसके मामा को भी बाँधकर उसका सिर मुँड़वा दिया। दर्पभंग और विच्छिन्ननाम के साठों का उसने क्रुद्ध होकर भी वध नहीं किया प्रत्युत हँसकर उन्हें छोड़ दिया ॥५९१॥ तदनन्तर पिता के बुलाने पर वह सूर्यप्रभ अपनी उन सब पत्नियों के साथ अपने घर शाकलपुर (स्यालकोट) चला गया ॥५९२॥ तब उसके पिता चन्द्रप्रभ के समीप ताम्रलिप्ती से राजा वीरभट ने दूत भेजा और सन्देश दिया कि तुम्हारे पुत्र ने मेरी दो कन्याओं का अपहरण किया है, वह विद्याओं की सिद्धिवाला योग्य पति है इसलिए ठीक है॥५९३॥ यदि आपको हम पर स्नेह है, तो आप यहाँ आयें जिससे विवाह-संस्कार द्वारा हम मित्रता स्थापित कर सकें ॥५९४॥ दूत का यह वाक्य सुनकर राजा चन्द्रप्रभ ने उसका सत्कार करके दूसरे ही दिन ताम्रलिप्ती जाने का निश्चय किया ॥५९५॥ राजा चन्द्रप्रभ ने राजा वीरभट की सच्चाई परखने के लिए दूत का आना-जाना दूर होने से कठिन समझकर प्रहस्त को पहले वहाँ भेज दिया ॥५९६॥ प्रहस्त शीघ्र ही जाकर वीरभट से मिला और वीरभट द्वारा उसका श्रद्धापूर्वक स्वागत सत्कार किया गया ॥५९७॥ प्रहस्त ने आश्चर्य चकित वीरभट को प्रातःकाल ही स्वामी के आने की सूचना दी और घड़ी-भर में ही आकाश-मार्ग से वह चन्द्रप्रभ के समीप लौट आया ॥५९८॥ और कहा कि राजा वीरभट कन्यादान के लिए तैयार बैठे हैं। चन्द्रप्रभ ने भी प्रसन्न होकर मन्त्री प्रहस्त का समुचित स्वागत-सम्मान किया ॥५९९॥ तदनन्तर प्रातःकाल ही राजा चन्द्रप्रभ महारानी कीर्तिमती के साथ था तथा सूर्यप्रभ विलासिनी और मदनसेना के साथ अपने रोषम आदि को संग लेकर भूवामन नामक विमान में बैठकर मन्त्रियों-सहित बरात लेकर चल दिये ॥७०१॥ प्रातःकाल दिन के पहले प्रहर में ये लोग ताम्रलिप्ती नगरी जा पहुँचे जब कि नागरिक जन कौतुक के साथ आँख ऊपर करके उन्हें देख रहे थे ॥७०२॥ आकाश-मार्ग से उतरे हुए उन लोगों की वीरभट द्वारा अगवानी किये जाने पर उसी के साथ वे लोग नगरी म प्रविष्ट हुए ॥७०३॥
२४ कथासरित्सागर
२४ कथासरित्सागर चन्दनोदकसंसिक्तचारुरम्या पदे पदे। कटाक्षैः पौरनारीणां प्रकीर्णेन्दीवरामिव ॥७४॥ तत्र सम्बन्धिजामात्रोः कृत्वा वीरभटस्तयोः। पूजां यथावत्तनया-विवाहप्रक्रियां व्यधात् ॥७५॥ विशुद्धस्य हि भाराणां¹ सहस्रं काञ्चनस्य च। भृतं च शतमुष्ट्राणां रत्नाभरणभारकैः ॥७६॥ उष्ट्रपृच्छतशतीं नानावस्त्रभाराभिपूरिताम्। वाजिनां च सहस्राणि सप्त पञ्च च दन्तिनाम् ॥७७॥ रूपाभरणयुक्तानां सहस्रं वारयोषिताम्। वध्वां दुहित्रोः प्रददौ राजा वीरभटस्तयोः ॥७८॥ सूर्यप्रभस्य जामातुस्तत्पितुश्च तयोः पुनः। उपहारं ससद्रत्नैश्चकार विपुलैस्तथा ॥७९॥ समन्त्रिणो यथावच्च प्रहस्तादीनमानयत्। चकार सोत्सवं हृष्यत्स्वेषनगरीजनम् ॥८०॥ सूर्यप्रभश्च तत्रासीत्पितृयुक्तः प्रियासखः। तत्कालं विविधाहारपानगेयादिभोगभुक् ॥८१॥ तावच्च तत्र रम्भस्य सकाशाद्व्यधरात्रतः। आजगामद्रुतं स चास्थाने जगाद स्वप्रभोर्वचः ॥८२॥ विद्याबलाभिलिप्सेन युवराजेन न श्रुतः। सूर्यप्रभेण तनयाहरणोत्थः पराभवः ॥८३॥ अद्य च ज्ञातमस्माभिर्यद्वीरभटभूभृतः। प्रतिपन्ना स्नुषा स्थाने समानव्यसनस्य नः ॥८४॥ तच्चैव चानुमन्यध्वं यद्यस्मत्सन्धिमाशु तत्। इहाप्यागम्यतां नो चेन्मृत्युनो भोऽत्र निष्कृतिः ॥८५॥ तच्छ्रुत्वा तं च सम्मान्य दूतं वीरभटार्चितः। प्रहस्य सोऽब्रवीद्राजा तत्र चन्द्रप्रभः पुनः ॥८६॥ त्वमेव गच्छ तं रम्भमस्मद्वाक्यादिदं वद। किं तप्यसे वृथा भावी चक्रवर्ती हि निर्मितः ॥८७॥ विद्याधराणां विष्ण्वेनैष सूर्यप्रभाधुना। यस्यभाग्यगुणाद्यादन् भार्या सिद्धैरपाहृता ॥८८॥ १ भारः प्राचीनकालप्रचलितो मानः । 'भारः स्याद् विशतितुला' इत्यमरः। तान्त्रिक मानानुसारं सार्द्धद्विमन (२॥ मन) मितं प्रदेशेषु भारवाहकेन वोढुं शक्यते ।
अष्टम लम्बक २४१
[Header] अष्टम लम्बक २४१
[Body] इस अवसर पर, सारी नगरी की गलियाँ और सड़कें चन्दन के जल से सींची गई थीं और नागरिक रमणियों के सकटाक्ष नयन मार्गों उनपर फैले हुए थे ॥७४॥
राजभवन में जाकर वीरभट ने अपने समधी और जामाता का विधिवत् स्वागत-सत्कार करके शास्त्रानुसार कन्यादान की विधि सम्पन्न की। दहेज में विशुद्ध स्वर्ण के दस भार१ रत्न और आभूषणों से लदे हुए एक सौ ऊँट और विविध प्रकार के वस्त्रादि से लदे हुए पाँच सौ ऊँट, साठ हजार घोड़े, पाँच हजार हाथी तथा सुन्दर आभूषणों से सजी हुई एक हजार रूपवती स्त्रियाँ (दासियाँ) उन दोनों कन्याओं के विवाहोत्सव पर दीं ॥७५-७८॥
इसके अतिरिक्त समधी और जामाता का अच्छे-अच्छे रत्नों और वस्त्राभरणों से तथा भूमिदान से विशेष सत्कार किया ॥७९॥
उसी प्रकार अति प्रसन्न नागरिक जनों के साथ राजा के प्रहस्त आदि मन्त्रियों का भी विधिपूर्वक सत्कार किया ॥८०॥
इस अवसर पर माता-पिता के साथ सूर्यप्रभ भी विविध प्रकार के भोजन पान गान वाद्य आदि का आनन्द लेने लगा ॥८१॥
इसी बीच रम्भ के राजा वज्रप्रभ की ओर से दूत आया और दरबार में बैठे हुए सूर्यप्रभ से अपने स्वामी का सन्देश कहा- 'हे महाराज ! विद्याओं के बल से मदोन्मत्त सूर्यप्रभ ने मेरा कन्या हरण-रूपी (अपमान) किया है ॥८२-८३॥
ज्ञात हुआ है कि मेरे ही समान विपत्ति (कन्या-हरण) वाले राजा वीरभट से आज आपने मित्रता स्वीकार की है। इसी प्रकार, आप मेरे साथ सन्धि करें और यहाँ पधारें, अन्यथा अपने प्राण त्याग द्वारा ही मैं अपने अपमान का प्रायश्चित्त करूँगा' ॥८४-८५॥
यह सन्देश सुनकर तथा दूत का सत्कार करके राजा चन्द्रप्रभ ने प्रहस्त से कहा- 'तुम जाओ और हमारी ओर से राजा रम्भ को कहो कि वह व्यर्थ सन्ताप न करें। सूर्यप्रभ को शिवजी ने विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती नियुक्त किया है। तुम्हारी तथा अन्य राजाओं की कन्याएँ इसी की पत्नियाँ हैं, इस प्रकार शिवजी ने आदेश दिया है ॥८६-८७॥
[Footer] १. भार, प्राचीन समय का एक परिमाण जो दो मन से कुछ अधिक था।—अनु. ३१
२४२ कथासरित्सागर
२४२ कथासरित्सागर तत्प्राप्ता से सुता स्यानं कर्मणस्त्व तु प्रार्थितः । तत्प्रीयस्व सखा नस्त्वमेष्यामोऽत्राप्यमी वयम् ॥८९॥ इति राज्ञोक्तसन्देशः प्रहस्तो गगनेन सः । गत्वा प्रहरमात्रेण वज्ररात्रमवाप सत् ॥९०॥ तत्र रम्भाय सन्देशमुक्त्वा तेनानुमोदितः । तथवागत्य सोऽवादीद्राज्ञे चन्द्रप्रभाय तत् ॥९१॥ चन्द्रप्रभोऽथ सचिवं प्रभासं प्रप्य शाकलात् । आनाययत्तां रम्भस्य पार्श्वे तारावलीं सुताम् ॥९२॥ ततो ययौ विमानेन सह सूर्यप्रभेण सः । राज्ञा वीरभटेनापि सर्वैश्चान्यै सुपूजितः ॥९३॥ वज्ररात्रं च सम्प्राप मार्गोन्मुखजनाकुलम् । रम्भेणाभ्युद्गतस्तस्य राजधानीं विवेश सः ॥९४॥ तत्र रम्भोऽप्यसौ क्लृप्तविवाहप्रक्रियोत्सवः । असङ्ख्यहस्त्यश्वरत्नादि दुहितुर्ददौ ॥९५॥ जामातरं च स तथा सूर्यप्रभमुपाचरत् । यथा यस्य निजा भोगा सर्वे विस्मृतिमाययुः ॥९६॥ यावच्च तत्र ते तिष्ठन्त्युत्सवानन्दिताः सुखम् । तावद्रम्भान्तिकं काञ्चीनगर्या दूत आययौ ॥९७॥ स तस्माच्छ्रुतसन्देशो रम्भश्चन्द्रप्रभं नृपम् । प्राह काञ्चीश्वरो राजा कुम्भीराख्योऽस्ति मेऽग्रजः ॥९८॥ तेनाप्त प्रेषितो मेऽद्य दूतो वक्तुमिदं वचः । मम सूर्यप्रभेणाद्य सुता नीता ततस्त्व ॥९९॥ कृतं चाद्य त्वया सख्यं तै सहति मया श्रुतम् । तन्ममापि तथैव त्वं सख्यं तैः सह साधय ॥१००॥ आयान्तु ते मम गृहं यावत्सूर्यप्रभाय ताम् । स्वहस्तेनार्पयामीह सुतां वरणसेनिकाम् ॥१०१॥ इत्येपाम्यर्थना तस्य क्रियतामिति वादिनः । रम्भस्य शुश्रुवे चन्द्रप्रभो राजा तदा वचः ॥१०२॥ प्रहस्तं प्रेष्य च क्षिप्रं शाकलात्तामनाययत् । पुराद्व्रजसेनां स कुम्भीरस्यान्तिकं पितुः ॥१०३॥
अष्टम लम्बकं २४५
अष्टम लम्बकं २४५ अतः, तुम्हारी कन्या उचित स्थान पर पहुँच गई है। तुम कठोर प्रकृति के व्यक्ति हो अतः तुमसे कन्या की याचना नहीं की गई। अब तुम प्रसन्न हो जाओ तुम हमारे मित्र हो हम लोग भी आ रहे हैं ॥८८-८९॥ चन्द्रप्रभ का यह सन्देश लेकर प्रहस्त आकाश-मार्ग से एक ही प्रहर में मयराष्ट्र जा पहुँचा। वहाँ राजा रम्भ को सन्देश देकर और उसकी स्वीकृति के साथ लौटकर उसका सन्देश राजा चन्द्रप्रभ को सुनाया ॥९०-९१॥ चन्द्रप्रभ ने दूसरे मन्त्री प्रभास को भेजकर शशाङ्क नगर से रम्भ की पुत्री तारावली को रम्भ के पास पहुँचा दिया ॥९२॥ तदनन्तर, राजा चन्द्रप्रभ सभी बरातियों ताम्रलिप्ती के राजा वीरभट तथा साथ आये हुए अन्य सभी व्यक्तियों के साथ चला और सबके साथ मयराष्ट्र डेरा में जा पहुँचा। तदनन्तर, वहाँ राजा रम्भ द्वारा उनकी अगवानी किये जाने के पश्चात् उसकी राजधानी में गया ॥९३-९४॥ वहाँ विवाह की तैयारी किये हुए राजा रम्भ ने उत्सव किया और सोना रत्न वस्त्र आभूषण आदि कन्या के साथ दिये और जामाता सूर्यप्रभ का भी विशेष रूप से सेवा-सत्कार किया जिससे वह अपने भोगे हुए उत्तमोत्तम सुखों को भी भूल गया ॥९५-९६॥ विवाहोत्सव का आनन्द लेते हुए जब वे वहाँ निवास कर रहे थे उसी समय कांची नगरी के राजा कुम्भीर का दूत राजा रम्भ के समीप आया ॥९७॥ उस दूत का सन्देश सुनकर राजा रम्भ ने महाराज चन्द्रप्रभ से कहा कि कांची के राजा मेरे बड़े भाई कुम्भीर हैं। उन्होंने मेरे पास अपने विश्वस्त दूत को भेजकर यह सन्देश दिया है कि सूर्यप्रभ ने पहले मेरी कन्या का अपहरण किया तब तुम्हारी कन्या का। मैंने अभी सुना है कि तुमने उसके साथ मित्रता कर ली है। अतः अपने ही समान उसके साथ मेरी भी मित्रता करा दो ॥९८-१००॥ वे लोग मेरे घर पर आवें तो मैं भी अपनी कन्या वरप्रभा को अपने हाथ से उनके लिये अर्पण करूँ उनकी यह प्रार्थना स्वीकार करें। ऐसा कहते हुए राजा रम्भ की बात को चन्द्रप्रभ ने स्वीकार किया और प्रहस्त को शशाङ्क नगर भेजकर वरप्रभा को उनके पिता कुम्भीर के पास कांची पहुँचा दिया ॥१०१-१०३॥
२४४ कथासरित्सागर
२४४ कथासरित्सागर अन्येद्युश्च विमानेन स च सूर्यप्रभश्च सः। रम्भो वीरभटः सर्वे काञ्चीं ते सानुगा ययुः ॥१०४॥ कुम्भीराभ्युद्गतास्तां च नानारत्नचितां पुरीम्। काञ्चीं काञ्चीमिव भुवः प्राविशन्गुणगुम्फिताम् ॥१०५॥ तत्र तां विधिना दत्त्वा सुतां सूर्यप्रभाय सः। वरबन्धोरदान्भूरि कुम्भीरो द्रविणं तदा ॥१०६॥ निर्वृत्ते च विवाहेऽत्र भुक्तोत्तरसुखस्थितम्। चन्द्रप्रभमुवाचेदं प्रहस्तः सर्वसन्निधौ ॥१०७॥ देव श्रीकण्ठविषये प्रद्युम्नं गतवानहम्। तत्र प्रसङ्गपृष्टो मां कान्तिसेननृपोऽब्रवीत् ॥१०८॥ सूर्यप्रभो ममादाय सुतां कान्तिमतीं हृताम्। गृहेमेतु करिष्यामि विधिवत्तस्य सत्क्रियाम् ॥१०९॥ नो चेत्त्यक्ष्याम्यहं देहं दुहितृस्नेहमोहितः। इत्युक्तस्तेन तत्राहं प्रस्तावे च मयोदितम् ॥११०॥ एवमुक्ते प्रहस्तेन राजा चन्द्रप्रभोऽभ्यधात्। गच्छ कान्तिमतीं तर्हि तां प्रापय तदन्तिकम् ॥१११॥ ततस्तत्र वयं याम इत्युक्तस्तेन भूभृता। तदैव मनसा गत्वा प्रहस्तस्तत्तथाकरोत् ॥११२॥ प्रातश्च ते सकुम्भीराः सर्वे चन्द्रप्रभादयः। श्रीकण्ठविषयं जग्मुर्विमानेन खगामिना ॥११३॥ तत्राप्याप्रगतो राजा कान्तिसेनः स्वमन्दिरम्। तावत्प्रबोद्य दुहितुर्व्यधादुद्वाहमङ्गलम् ॥११४॥ ददौ तस्यै तदा कान्तिमत्त्यै सूर्यप्रभाय च। माद्यद्यजननं राजानमितं रत्नसञ्चयम् ॥११५॥ तत्र स्थितेषु तच्चात्र नानाभोगोपसेविषु। सर्वेषु दूतः कौशाम्ब्या आगत्यैवमभाषत ॥११६॥ जनमेजयभूपालो ब्रवीति भवतामिदम्। हृता केनापि मन्दिरे परपुष्टेति मे सुता ॥११७॥
अष्टम लम्बक २४५
अष्टम लम्बक २४५
दूसरे दिन वह राजा चन्द्रप्रभ सूर्यप्रभ रम्भ वीरभट आदि अपने अनुचरों के साथ विमान द्वारा राजा कुम्भीर की सुन्दर बुर्जों से युक्त तथा अनेक रत्नों से भरी हुई कांची नगरी पहुँच गया ॥१०४-१०५॥ वहाँ पर राजा कुम्भीर ने सूर्यप्रभ को अपनी कन्या तथा उसके साथ बहुत-सा धन दिया ॥१०६॥ विवाहोत्सव सम्पन्न होने पर भोजन आदि से निवृत्त होकर, विश्राम करते हुए चन्द्रप्रभ को प्रहस्त ने सभी के सामने कहा—'महाराज मैं भ्रमण करता हुआ श्रीकंठ देश की ओर गया था वहाँ प्रसंगवश मिले हुए राजा कान्तिसेन ने कहा कि सूर्यप्रभ मेरी कन्या कान्तिमती को लेकर मेरे घर पर आवें मैं उनका विधिपूर्वक सत्कार करूँगा ॥१०७-१०९॥ अन्यथा कन्या के स्नेह से विह्वल होकर मैं शरीर-त्याग कर दूँगा। इस प्रकार, उसके कहने पर प्रस्ताव-रूप से आपसे मैंने निवेदन कर दिया ॥११०॥ प्रहस्त के ऐसा कहने पर चन्द्रप्रभ ने कहा—'तो जाओ और उसकी कन्या कान्तिमती को उसके पास पहुँचाओ ॥१११॥ इसके पश्चात् हमलोग वहाँ आ रहे हैं। राजा के ऐसी आज्ञा देने पर प्रहस्त ने कान्तिमती को पिता कान्तिसेन के समीप पहुँचा दिया ॥११२॥ प्रातःकाल ही वे चन्द्रप्रभ आदि सभी राजा कुम्भीर के सहित आकाशचारी विमान द्वारा श्रीकंठ देश को गये ॥११३॥ वहाँ भी राजा कान्तिसेन ने सबकी अगवानी करके अपनी कन्या का विवाह महास- समारोह के साथ सम्पन्न किया ॥११४॥ तदनन्तर, पुत्री कान्तिमती और जामाता सूर्यप्रभ को रत्नों का अमूल्य संग्रह प्रदान किया जिसे देखकर सभी राजा आश्चर्य-चकित हो गये ॥११५॥ जब वे सब राजा कान्तिसेन के यहाँ विविध प्रकार के स्वागत-सत्कार का आनन्द ले रहे थे तभी सबके सामने कौशाम्बी नगरी से आये हुए दूत ने इस प्रकार कहा—॥११६॥ राजा जनमेजय आपसे यह कहते हैं कि 'कुछ दिन हुए मेरी कन्या वरपुष्टा का किसीने अपहरण कर लिया था ॥११७॥
२४६ कथासरित्सागर
२४६ कथासरित्सागर ज्ञातं चेहाद्य मत्प्राप्ता हस्तं सूर्यप्रभस्य सा । तया सह सोऽस्माकं गृहमायात्वशङ्कितः ॥११८॥ सत्कृत्य प्रेषयिष्यामि सभार्यं च यथाविधि । अन्यथा शत्रवो यूयं मम युष्माकमप्यहम् ॥११९॥ इत्युक्त्वा स्वामिवचनं दूतस्तूष्णीं बभूव सः । अथ चन्द्रप्रभः सर्वानैकान्ते क्षितिपोऽब्रवीत् ॥१२०॥ कथमद्य सदर्पोक्तैर्गम्यते तस्य वेश्मनि । तच्छ्रुत्वा तस्य सिद्धार्थनामा मन्त्र्येवमभ्यधात् ॥१२१॥ नान्यथा देव मन्तव्यं वक्तुमद्य हि सोऽर्हति । स हि राजा महादाता पण्डितः सत्कुलोद्गतः ॥१२२॥ शूरोऽश्वमेधयाजी च सदैवान्यपराजितः । विरुद्धं किं नु तेनोक्तं यथावस्तुमभिधायिना ॥१२३॥ शत्रुतोद्वाह्यता मा वा सा प्राप्तप्रकृतेऽधुना । तद् गन्तव्यं गृहे तस्य सत्यसन्धो नृपो हि सः ॥१२४॥ तदपि प्रेष्यतां कश्चित्तस्य चित्तोपसम्भये । इति सिद्धार्थवचनं सर्वे ददृशुरत्र ते ॥१२५॥ ततो जिज्ञासितुं चन्द्रप्रभस्तं जनमेजयम् । प्रहस्तं व्यसृजत्तं च दूतं तस्याप्यानयत् ॥१२६॥ प्रहस्तश्च स गत्वा तं कौशाम्बीशं ससंविदम् । विधायानीय तल्लेखं चन्द्रप्रभमतोषयत् ॥१२७॥ सोऽपि राजा तमेवाशु प्रहस्तं प्रेष्य धान्ध्रकात् । जनमेजयपार्श्वं तां परपुष्टामनाययत् ॥१२८॥ ततश्चन्द्रप्रभाद्यास्ते सूर्यप्रभपुरोगमाः । सकान्तिसेना कौशाम्बीं विमानेनागमन् नृपाः ॥१२९॥ तत्र सम्बन्धिजामातृमुख्यान् प्रत्युद्गमादिना । प्रहृस्तान्युपभामास स राजा जनमेजयः ॥१३०॥ ददौ च कृत्वा दुहितुर्विवाहविधिसत्क्रियाम् । पञ्च हस्तिसहस्राणि लक्षं च वरवाजिनाम् ॥१३१॥ रत्नकाञ्चनवस्त्रेषुपूगगगपूरित । मारेर्भतानामुष्ट्राणां सहस्राण्यपि पञ्च सः ॥१३२॥
अष्टम लम्बक २४७
अष्टम लम्बक २४७ जब ज्ञात हुआ है कि वह सूर्यप्रभ के हाथ लगी है। अतः वह सूर्यप्रभ उस कन्या (परपुष्टा) के साथ निःशंक होकर हमारे घर आवें। मैं उन्हें विधिपूर्वक सत्कृत करके पत्नी के साथ उन्हें भेज दूंगा। यदि आपने ऐसा न किया तो आप मेरे शत्रु हैं और मैं आप लोगों का शत्रु हूँ—॥११९८-११९९॥ अपने स्वामी के इस सन्देश को कहकर दूत चुप हो गया तब चन्द्रप्रभ ने अपने सभी सम्बन्धी राजाओं से कहा—॥१२० ॥ 'इस प्रकार घमण्ड की बातें करनेवाले उसके घर में कैसे जाया जाय।' यह सुनकर राजा का सिद्धार्थ नामक मन्त्री बोला—'महाराज आपको उसके कहने का बुरा न मानना चाहिए। वह ऐसा कहने के योग्य है। वह राजा जनमेजय महान् दानी बड़ा विद्वान् और अच्छे ऊँचे पांडव कुल में उत्पन्न हुआ है। शूर-वीर है और अश्वमेध यज्ञ कर चुका है। वह कभी किसी से पराजित नहीं हुआ। इस प्रकार, यथार्थता को देखते हुए उसने जो भी सन्देश दिया है वह कुछ भी अनुचित नहीं है॥१२१-१२३॥ उसने जो शत्रुता की बात कही वह दम्भ के लिए है। अतः उसके घर पर चलना चाहिए। वह राजा सुप्रतिष्ठ है॥१२४॥ फिर भी उसका अभिप्राय जाँचने के लिए आप किसी दूत को भेजिए'। मन्त्री सिद्धार्थ के इस प्रकार के वचनों पर सभी ने श्रद्धा प्रकट की ॥१२५॥ तब जिज्ञासा का समाधान करने के लिए चन्द्रप्रभ ने जनमेजय के समीप सिद्धार्थ नामक दूत को भेजा और जनमेजय के दूत का भी सम्मान किया ॥१२६॥ तदनन्तर प्रहस्त कौशाम्बी के राजा के पास गया और उससे विचार-विमर्श करके तथा उनका पत्र लाकर राजा चन्द्रप्रभ को प्रसन्न किया ॥१२७॥ राजा चन्द्रप्रभ ने प्रहस्त को शीघ्र अपनी नगरी शाकल में भेजकर परपुष्टा को उसके साथ जनमेजय के पास भेज दिया ॥१२८॥ तदनन्तर दूसरे दिन सूर्यप्रभ को लेकर चन्द्रप्रभ आदि सम्बन्धी राजा कान्तिसेन के साथ विमान द्वारा जनमेजय के यहाँ गये ॥१२९॥ वहाँ विप्रभ राजा जनमेजय जामाता के साथ उन सभी सम्बन्धी राजाओं की अगवानी करके समुचित स्वागत किया और अपनी नगरी में ले गया ॥१३०॥ तथा कन्या का विवाह-संस्कार करके राजा जनमेजय ने पाँच हजार हाथी एक लाख श्रेष्ठ घोड़े एवं अच्छे-अच्छे रत्न सुवर्ण वस्त्र कपूर आदि से लदे हुए पाँच हजार ऊँट दहेज में कन्या के साथ दिये ॥१३१-१३२॥
२४८ कथासरित्सागर
२४८ कथासरित्सागर चक्रे च वाद्यनृत्तैकमयं लोकमहोत्सवम्। पूजितब्राह्मणवरं मानिताखिलराजकम् ॥१३३॥ तावच्चाशङ्कितं तत्र नभः पिञ्जरतां ययौ। रक्ताश्मत्वमसम्पूर्णभावि शसदिवात्मनः ॥१३४॥ तुमुलाकुलशब्दाश्च बभूवुः सहसा दिशः। भीता इवागतं दृष्ट्वा परसैन्यं विहायसा ॥१३५॥ तावच्च तत्क्षणं वातुं प्रवृत्तोऽभून्महानिलः। सपरैः सह युद्धाय भूचरानुत्क्षिपन्निव ॥१३६॥ क्षणाच्च ददृशे व्योम्नि विद्याधरबलं महत्। दीप्तिद्योतितविश्वचक्रमुद्यद्भाद महाजवम् ॥१३७॥ तन्मध्ये भातिशुभगं विद्याधरकुमारकम्। एकं सूर्यप्रभाद्यास्ते पश्यन्ति स्म सुविस्मिताः ॥१३८॥ 'आषाढेश्वरतनयो दामोदर एष जयति युवराजः। रे मर्त्य धरणिगोचर सूर्यप्रभ निपत पादयोरस्य ॥१३९॥ प्रणम च रे जनमेजय भवता दत्ता सुता किमस्मैव। आराधय तमिमं तद्देव नैषोऽन्यथा क्षमते' ॥१४०॥ इति तस्मिन्क्षणे विद्याधरबन्दी ततोऽम्बरात्। तस्य दामोदरस्याज्ञाव्यावजहारोच्चया गिरा ॥१४१॥ तच्छ्रुत्वा दृष्टतत्सैन्यो गृहीत्वा खड्गचर्मणी। सूर्यप्रभो नभः क्रोधादुत्पपात स्वविद्यया ॥१४२॥ अनूत्पेतुश्च सचिवास्तस्य सर्वे धृतायुधाः। प्रहस्तश्च प्रभासश्च भासः सिद्धार्थ एव च ॥१४३॥ प्रज्ञाढ्यः सर्वदमनो वीतभीतिः शुभङ्करः। विद्याधराणां तैः साकं प्रावर्तत महाहवः ॥१४४॥ सूर्यप्रभश्चाभ्यधावत्ततो दामोदरस्ततः। खड्गेनाच्छन् रिपून् गुह्यैस्तच्छस्त्राणि स्वचर्मणा ॥१४५॥ तं जनाः कति सख्ये च शतसहस्रा नभश्चराः। समत्वमेव विविद्युद्युध्यमानाः परस्परम् ॥१४६॥ बभु राङ्गलसत्पाशाः साङ्कुशा रुधिराग्णाः। पतन्त्यः शूरचापेभ्यः कृतान्तस्येव दृष्टयः ॥१४७॥
सप्तम लम्बक २४९
सप्तम लम्बक २४९ संगीत नृत्य और वाद्य के साथ भारी महोत्सव मनाया और ब्राह्मणों तथा समागत राजाओं का समुचित सम्मान किया ॥१३३॥ इतने में ही सारा आकाश देखते-देखते पीला हो गया मानों भविष्य में रक्त से लाल होने की सूचना दे रहा हो ॥१३४॥ चारों दिशाओं में भीषण हाहाकार मच गया मानो शत्रुओं की सन्तानों से डरी हुई दिशाएँ दौड़ी जा रही थीं ॥१३५॥ उसी क्षण मानो भू चरों को गे पैरों के साथ उड़ाने के लिए ऊपर की ओर फेंकती हुई महावायु (आँधी) चलने लगी ॥१३६॥ इतने में ही आकाश में अपनी चमक से दिशाओं को प्रकाशित करती हुई और वेगवती विद्याधरों की सेना दिखाई पड़ी ॥१३७॥ उस सेना के मध्य में चकित सूर्यप्रभ आदि ने अत्यन्त सुन्दर और तेजस्वी एक विद्याधर कुमार को देखा ॥१३८॥ आषाडम्बर के पुत्र युवराज दामोदर की जय हो! अरे, पृथ्वी के रहनेवाले मनुष्य सूर्यप्रभ इसके चरणों में नत होओ ॥१३९॥ अरे जनमेजय तू भी इसके चरणों में पड़कर क्षमा प्रार्थना कर, तूने अपनी कन्या को अवाच्य स्थान में क्यों दिया। इसलिए इस दामोदर देव को प्रसन्न कर। अन्यथा यह तुम्हें कदापि क्षमा न करेगा ॥१४०॥ इस प्रकार आकाश से विद्याधर के बन्दी (चारण भाट) ने उस दामोदर के आगे चलते हुए ऊँचे स्वर से कहा ॥१४१॥ यह सुनकर, विद्याधरों की सेना को देखकर और हाथ-तलवार लेकर सूर्यप्रभ अपनी विद्या के प्रभाव से आकाश में उड़ा॥१४२॥ उसके पीछे उसके सभी मन्त्री प्रहस्त प्रभास सिद्धार्थ प्रह्लादन सर्वदमन वीतभीत और शुभकर भी शस्त्रों को लिए हुए आकाश में उड़े और उनके साथ विद्याधरों का महान् युद्ध छिड़ गया ॥१४३-१४४॥ सूर्यप्रभ ऊपर ही छूटा जिधर दामोदर था वह अपने बाणों से शत्रुओं का संहार कर रहा था और उसके बाणों को अपनी ढाल पर रोक रहा था ॥१४५॥ इधर युद्ध ही इने-गिने कवच और उधर लाखों की संख्या में सशस्त्र सादी विद्याधर। किन्तु, ये आपस में लड़ते हुए भी अपने को सशस्त्र सैकड़ों के समान थे ॥१४६॥ रक्त से सनी और लाल रंग की चमकती हुई मंत्री तलवार विद्याधर सेना की के रुधिर से सराबोर शस्त्रों से रणभूमि का कर रही थी ॥१४७॥ ३२
२५ कथासरित्सागर
२५ कथासरित्सागर विद्याधराश्च धरणी भियेव शरणाथिनः । शिरोभिश्च शरीरैश्च पतुश्चन्द्रप्रभाग्रतः ॥१४८॥ सूर्यप्रभो बभौ शोकदृष्ट्या रुधरधिया। सिन्दूरेणेव कीर्णेन नभोऽभूवसृजारुणम् ॥१४९॥ सूर्यप्रभश्च सम्प्राप्य युयुधे तेन सम्मुखम् । खड्गचर्मधरणेव सह दामोदरेण सः ॥१५०॥ युध्यमानश्च करजप्रयोगेण प्रविश्य सम् । खड्गखण्डितधर्माणं रिपुं भूमावपातयत् ॥१५१॥ छेत्तुमिच्छति यावच्च शिरस्तस्य विहस्ततः । तावदागत्य नभसा हुङ्कारो विष्णुना कृतः ॥१५२॥ तच्छ्रुत्वा वीक्ष्य च हरिं नम्रस्तद्गौरवेण सः । दामोदरममुञ्चत बन्धात् सूर्यप्रभस्ततः ॥१५३॥ बद्धमुक्तं तमादाय भक्तं क्वापि ययौ हरिः । भगवान्स हि सद्भक्तमिहामुत्र च रक्षति ॥१५४॥ दामोदरानुगास्तं च ययुः सर्वे यतस्ततः । सूर्यप्रभोऽपि गगनात् पितुः पार्श्वमबातरत् ॥१५५॥ सामारयमक्षतप्राप्तं पिता चन्द्रप्रभस्य तम् । अभ्यनन्दद्युपाद्धान्त्ये सुदृढुर्द्दष्टविक्रमम् ॥१५६॥ ततोऽत्र यावत्सर्वे ते दृष्टास्तत्कथया स्थिताः । आगात् सुभटसम्बन्धी तावद्दूतोऽपरस्ततः ॥१५७॥ स च चन्द्रप्रभस्यैव लेखमग्रे समर्पयत् । तमुद्घाट्य च सिद्धार्थः सदस्येवमवाचयत् ॥१५८॥ श्रीमान्प्रतववंशमौक्तिकमणिश्चन्द्रप्रभो भूपती राजा धीसुभटेन सादरमिदं धीकोङ्कणाद् बोध्यते । नीता मे सनयापहृत्य रजनी सन्त्वेन भ्नापि या । सा प्राप्ता तय सूनुनेत्यवगतं यत्तेन तुष्टा वयम् ॥१५९॥ तद्युक्तेन सुतेन तेन सह तत्सूर्यप्रभगोद्यमो । युष्माभिः क्रियताममङ्गलमिहाप्यस्मद्गृहाभ्यागमं यावतां परराक्त पुनरिव प्रत्यागतामारजां पश्यामश्च विपाङ्गकर्मण्युना श्वर्भेश्च तस्या वयम् ॥१६१॥
अष्टम लम्बक २६१
अष्टम लम्बक २६१ भूमि पर पड़े हुए राजा चण्डसेन के बाणों के साथ गिरने हुए (मृत) विद्याधर, मानो शिर और शरीर में शरण की प्रार्थना कर रहे थे ॥१४८॥ जनता की दृष्टियों में देखा जाता हुआ सूर्यप्रभ आकाश में युद्ध करता हुआ अत्यन्त शोभित हो रहा था। रक्त से रंजित आकाश मानो छिड़के हुए सिन्दूर की शोभा धारण कर रहा था॥१४९॥ सूर्यप्रभ द्वारा ललकार किये हुए दामोदर के सामने आकर युद्ध करने लगा और युद्ध करते हुए उसने खड्ग प्रयोग (पैंतरेबाजी) से अन्तर घुसकर दामोदर की ढाल-तलवार को काटकर उस पर प्रहार कर दिया ॥१५०-१५१॥ तदनन्तर सूर्यप्रभ जैसे ही उसका सिर काटने के लिए तैयार हुआ वैसे ही विष्णु भगवान् ने आकाश में आकर उसे मना करते हुए हुंकार दिया॥१५२॥ हुंकार को सुनकर और विष्णु भगवान् को देखकर उदार गौरव से मग्न सूर्यप्रभ ने दामोदर को मारने से अपना हाथ रोक लिया॥१५३॥ फिर भगवान् प्रसन्न व प्रसन्न हुए उस अपने भक्त दामोदर को लेकर अन्तर्हित हो गए क्योंकि भगवान् अपने भक्तों की इस लोक और परलोक में भी रक्षा करते हैं॥१५४॥ दामोदर के लुप्त होते ही उसके साथी सभी विद्याधर इधर-उधर भाग गये और सूर्यप्रभ भी आकाश से उतरकर अपने पिता के पास आ गया॥१५५॥ उसके पिता चन्द्रप्रभ ने अपने सभी अनुचरों के साथ जय-जयकार करते हुए सूर्यप्रभ का यथायोग्य अभिनन्दन किया। और अन्य राजाओं ने भी उसकी वीरता की प्रशंसा की॥१५६॥ इसप्रकार सभी लोग प्रसन्न होकर सूर्यप्रभ की प्रशंसा और उसकी वीरता की चर्चा कर रहे थे कि दूर से ही राजा सुषेण का दूतगण दूत वहाँ आ पहुँचा। उसने आते ही राजा चन्द्रप्रभ को प्रणाम किया। जिन्होंने उस पत्र को खोलकर सभा में इस प्रकार पढ़ा—॥१५७-१५८॥ हे मित्र राजा चन्द्रप्रभ आपके यहाँ के आने के समय राजा चन्द्रप्रभ से इसके पहले जो शिष्टाचार के सम्बन्धी बातों का निर्णय हुआ था वह सब कुछ आपको स्मरण ही होगा। हम सब लोग यहाँ ठीक हैं। यह जानकर इस प्रकार उत्तर दें॥१५९॥ 'प्रहस्त का युद्ध समाप्त होने के पश्चात् राजा चन्द्रप्रभ के साथ उपस्थित होकर हम सबने जो बात तय की थी उसपर विचारकर, जिस तरह युद्ध समाप्त हो उसी का उपाय करने के लिए यह पत्र भेजा गया है।' इस पत्र का उत्तर दें ॥१६०॥
१५२ कथासरित्सागर
१५२ कथासरित्सागर इत्यत्र वाचिते लेखे सिद्धार्थेन तथेति सः। राजा चन्द्रप्रभो दूतं सञ्चकार जहर्ष च॥१६१॥ आनाययच्च सुभटस्यान्तिकं चन्द्रिकावतीम्। तत्सुतामपरान्तं तं प्रहस्तं प्रेष्य सत्वरम्॥१६२॥ प्रातश्च जग्मुः सर्वे तं कृत्वा सूर्यप्रभं पुरः। अपरान्तं विमानेन जनमेजयसंयुताः॥१६३॥ तत्र वान्त्सुभटो राजा दुहितृप्राप्तिनन्दितः। भृशमानर्च चक्रे च सुतापरिणयोत्सवम्॥१६४॥ ददौ च चन्द्रिकावत्यै सोऽस्यै रत्नादिकं तथा। यथा वीरभटाद्यास्ते स्वदत्तेन कलञ्जिरे॥१६५॥ ततः सूर्यप्रभे तत्र स्थिते श्वशुरवेश्मनि। आगात् पौरवसम्बन्धी दूतो श्रावणकादपि॥१६६॥ सोऽपि चन्द्रप्रभमिदं निजस्वामिवचोऽभ्यधात्। युता सुलोचना नीता धीमत्सूर्यप्रभेण मे॥१६७॥ ततो मे नैव सन्तापस्तद्युक्तं किं तु मद्गृहम्। आनीयतां स युष्माभिराधारो यद्विदन्महः॥१६८॥ तच्छ्रुत्वैव मुदाम्यर्च्य दूतं चन्द्रप्रभो नृपः। आनाययत्प्रहस्तेन पितुः पार्श्वं सुलोचनाम्॥१६९॥ रातः स सुभटाः सर्वे सह सूर्यप्रभेण ते॥ श्रावाणकं विमानेन ययुर्व्यामोपगामिना॥१७०॥ तत्रोद्वाहोत्सवं कृत्वा सूर्यप्रभसुलोचने। रत्नैरापूरयत्सोऽपि पौरवोऽभ्यर्चितराजकः¹॥१७१॥ तेषूपचर्यमाणेषु सुतस्नुषासु तेषु च। प्रजिघाय सुरोहोऽपि दूतं श्रीमन्नरेश्वरः॥१७२॥ सोऽभ्यन्यदवदूतमुत्सनार्चयामास पार्थिवः। हृतकन्यस्तया साकं तषामागमनं गृहे॥१७३॥ ततश्चन्द्रप्रभो राजा हृष्टस्तस्यापि तां सुताम्। विदामासां प्रहस्तेनानाययामास चेतसम्॥१७४॥ १ विवाहविधिनादित्यर्थः। २ सम्बन्धिराजसमूहः।