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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

सप्तम लम्बक १०७

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सप्तम लम्बक १०७ यदि ऐसा न करोगे तो तुम्हारा राज्य नष्ट हो जायगा और रानी की मृत्यु हो जायगी। ऐसा कहकर वह प्राणी चला गया। इसीसे मुझे खेद हो गया है"॥४४॥ राजा के इस प्रकार कहने पर पतिव्रता रानी गुणवरा प्रेम और भय से व्याकुल होकर बोली—॥४५॥ 'महाराज ! यदि ऐसा है तो आप मुझे आज ही भू-गृह में क्यों नही बन्द कर देते। मैं धन्य हूँगी यदि मेरे प्राणों से भी तुम्हें सुख प्राप्त हो सके ॥४६॥ भले ही मेरी मृत्यु हो जाय किन्तु आपको दुःख प्राप्त न हो, क्योंकि स्त्रियों को इस लोक और परलोक में पति ही परम गति है ॥४७॥ उसके इस प्रकार के वचन सुनकर आँसू बहाता हुआ राजा सोचने लगा कि इस रानी में या उस मुनिपुत्र में मुझे पाप की शंका नहीं है ॥४८॥ उस मुनिसुत को मैंने शंका-रहित और प्रसन्नमुख देखा। दुःख है। तो भी इस निन्दा के सम्बन्ध में निश्चय करता हूँ॥४९॥ ऐसा सोचकर अत्यन्त दुःखी राजा ने रानी से कहा—'तब मैं यहीं रनिवास में भू-गृह बनवाता हूँ। रानी की स्वीकृति मिलने पर राजा ने वहीं एक सुगम (आने-जाने में सरल) भू-गृह बनवाया और रानी को उसमें रख दिया ॥५०-५१॥ दुःखी और कारण पूछते हुए पुत्र शुभभुज को रानी ने राजा से कही गई बात कहकर धीरज बँधाया ॥५२॥ रानी गुणवरा ने राजा का हित समझकर उस भू-गृह को स्वर्ग समान समझा क्योंकि पतिव्रता स्त्रियों को अपना सुख सुख नहीं है पति का सुख ही उनका सुख है ॥५३॥ यह सब होने पर दूसरी रानी अयशस्कान्ता ने अपने निर्दोषभुज नामक पुत्र को एकान्त में कहा—'राजा ने तुम्हारी सौत गुणवरा को तो गड्ढे में डाल दिया। अब इसका लड़का भी निष्कण्टक कर कहीं चला जाय तो बहुत आनन्द हो, हम राज्य देखें ! तुम अपने भाइयों से मिलकर उसी युक्ति सोचो ॥५४-५६॥ माता से इस प्रकार कहा गया निर्दोषभुज ईर्ष्यापूर्वक अपने भाइयों के साथ उपाय सोचने लगा ॥५७॥ इधर वे सभी राजकुमार अपने अन्य राज्य की प्राप्ति के लिए राजभवन में संलग्न व नैराश्य समझ हुए और गुप्त न कहा पर वे ... के लिए यत्न करने को तैयार ... ॥

१८ कथासरित्सागर

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१८ कथासरित्सागर विकृतं पक्षिणं तं च पश्यतस्तान् सविस्मयान्। ज्ञानी क्षपणकः कोऽपि पथा तत्रागतोऽब्रवीत्॥५९॥ राजपुत्रा बको नायं रूपमानेन राक्षसः। भ्रमत्यग्निशिखाख्योऽयं नगराणि विनाशयन्॥६०॥ सद्विध्येतैन काण्डेन यावद् गच्छतितो द्रुतः। एतत् क्षपणकाच्छ्रुत्वा भवतिस्म नवाधिकाः॥६१॥ काण्डानि चिक्षिपुर्ज्येष्ठा नकोऽप्याहतवान् बकम्। ततो नग्नक्षपणकः पुनस्तानब्रवीच्च सः॥६२॥ अयं कनीयान् युष्माकं भ्राता शृङ्गभुजो बकम्। शक्नोति हन्तुमतस्तद्गृह्णात्वेष क्षमं धनुः॥६३॥ तच्छ्रुत्वैव स्मरन् मातुस्तल्लब्धावसरं वचः। स निर्वासभुजो बालस्तत्क्षणं समचिन्तयत्॥६४॥ सोऽप्य शृङ्गभुजस्यास्य स्यादुपायः प्रवासन। तदर्पयामस्तातस्य सम्बन्धस्मै धनुःशरम्॥६५॥ सौवर्णं तच्छरं हृत्वा विद्धो यास्यति चेद् बकः। पश्चादेषोऽपि गन्तास्य मार्गैरुत्स्वस्मासु स शरम्॥६६॥ मवा च लप्स्यते नैतं घ्निन्वन् रक्षो बकः तदा। स्थास्यतीहस्ततो भ्राम्यँल्लप्स्यतीह शरं विना॥६७॥ इत्यालोच्य ददौ तस्मै पापः शृङ्गभुजाय सः। बकघाताय सशरं पितृसम्बन्धि कार्मुकम्॥६८॥ स गृहीत्वा तदाकृष्य तेन स्वर्णशरेण सम्। रत्नपुङ्खेन विव्याध बकं शृङ्गभुजो बली॥६९॥ स विद्धमात्रस्तं कायलग्नमादाय सायकम्। बकः सद्यदसृग्धारं पलाय्यैव ततो ययौ॥७०॥ ततः शृङ्गभुजं वीरं स निर्वासिभुजः शठः। तत्सङ्गात्प्रेरितास्ते च भ्रातरोऽन्ये समब्रुवन्॥७१॥ देहि हेममयं तं नस्तातसम्बन्धिनं शरम्। अन्यथाद्य शरीराणि त्यक्ष्यामः पुरतस्तव॥७२॥ तातस्तेन विना ह्यस्मानितो निर्वासयिष्यति। न च कर्तुं ग्रहीतुं वा शक्यं तत्प्रतिरूपकम्॥७३॥

सप्तम लम्बक १९

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यहाँ दिए गए पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण नीचे प्रस्तुत है:

सप्तम लम्बक १९ उस विकृत पक्षी को देखकर आश्चर्य करते हुए राजकुमारों को देखकर उस मार्ग से जाते हुए किसी ज्ञानी भिक्षु ने कहा—'हे राजकुमारो ! यह बगुला नहीं है। बगुले के रूप में नगरों का नाश करता हुआ यह अग्निमुख नामका राक्षस है ॥५९०॥ अतः इसे बाण से बींध दो जिससे कि यह यहाँ से भाग जाय। इसपर से ऐसा सुनकर उन निशान्तके राजकुमारों ने उसपर अपने-अपने तीर चलाये फिर भी बगुला नहीं मरा। तब वह दिगम्बर (नंगा) साधु बोला—'तुम लोगों का छोटा भाई शृङ्गभुज बगुले को मार सकता है इसलिए यह एक अच्छा धनुष ले ॥५९१-९२॥ उसी समय वह क्रूर (जालिम) निर्भासभुज माँ की बातों को यादकर और उस अवसर का उपयुक्त समझकर सोचने लगा—॥५९४॥ कि यह अवसर है शृङ्गभुज को यहाँ से निकालने का। अतः इसे पिता का धनुष-बाण देते हैं ॥५९५॥ उसके सुलक्ष्य बाण से बींधा हुआ बगुला यदि उड़ जायगा तो यह भी उस बाण को लाने के लिए पीछे-पीछे भागेगा ॥५९६॥ और जब इस राक्षस बगुले को खोजते-खोजते नहीं प्राप्त कर सकेगा तो लज्जा और दण्डाच्छन्न यहाँ न आकर इधर उधर घूमता रहेगा ॥५९७॥ ऐसा सोचकर उस पापी निर्भासभुज ने बगुले को मारने के लिए शृङ्गभुज को पिता के धनुष-बाण लाकर दे दिये ॥५९८॥ उसे लेकर बलवान् शृङ्गभुज ने रत्नाक्त पंखवाले उस सुवर्णजड़ बाण से बगुले को बींध दिया ॥५९९॥ बाण से बिंधा हुआ बगुला शरीर में चुभे हुए बाण को लिये और रक्त की धार बहाता हुआ वहाँ से उड़कर भागा ॥६००॥ तब वह दुष्ट निर्भासभुज और अन्य प्रदीप राजकुमार उस वीर शृङ्गभुज से बोले—॥६०१॥ 'हमारे उस किसीके भी न छूटने योग्य बाण को लाओ नहीं तो हम सब लोग सामने ही शरीर का हनन कर देंगे ॥६०२॥ क्योंकि उसके बिना पिता हम सबको देश से निर्वासित कर देंगे। उसी बाण के जैसा दूसरा नया बाण नहीं बनाया जा सकता ॥६०३॥

११० | कथासरित्सागर

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[Header] ११० | कथासरित्सागर

तच्छ्रुत्वैव स जिह्रांस्तान् वीर शृङ्गभुजोऽब्रवीत्। धीरा भवत मा भूद्वो भयं कार्पण्यमुज्झत ॥७४॥ आनेष्यामि शरं गत्वा हत्वा तं राक्षसाधमम्। इत्युक्त्वा सशरं चापं निजं शृङ्गभुजोऽग्रहीत् ॥७५॥ ययौ च तां समुद्दिश्य दिशं यां स बको गतः। पतितां रक्तसृग्धारां भूमावनुसरञ्जवात् ॥७६॥ दृष्टेषु तेषु चान्येषु मातृपार्श्वं गतेष्वथ। गच्छन् स क्रमशः प्राप दूरां शृङ्गभुजोऽटवीम् ॥७७॥ तस्यां ददर्श चिन्वानां वनस्यान्तर्महत्पुरम्। भोगायोपनतं काले फलं पुण्यतरोरिव ॥७८॥ तत्रोद्यानतरोर्मूले स विश्रान्त क्षणादिव। आश्चर्यरूपामार्यान्तीमत्र कन्यामवेक्षत ॥७९॥ विरहे जीवितहरां सङ्गमे प्राणदायिनीम्। विचित्रां निर्मितां धात्रा विषामृतमयीमिव ॥८०॥ शनैरुपागतां तां च चक्षुषा प्रेमवर्षिणा। पश्यन्तीं तद्गतमना स पप्रच्छ नृपात्मजः ॥८१॥ किं नामधेयं कस्येदं पुरं हरिणलोचने। त्वं च का किं तवेहागमनं कथ्यतामिति ॥८२॥ ततः साचीकृतमुखी न्यस्तदृष्टिर्महीतले। सा च जगाद मुदती मधुरस्निग्धया गिरा ॥८३॥ इदं धूमपुरं नाम सर्वसम्पद्गृहं पुरम्। अस्मिन् वसत्यग्निदिशो नाम राक्षसपुङ्गवः ॥८४॥ तस्य रूपशिखां नाम सबुधी विद्धि मां सुताम्। इहागतामसामान्यात्त्वद्रूपाद्धृतमानसाम् ॥८५॥ त्वं ब्रूहि मेऽधुना कोऽसि किमिहाभ्यागतोऽसि च। एवमुक्ते तया तस्मै सर्वं शृङ्गभुजः क्षणम् ॥८६॥ सोऽसौ यन्नामधेयश्च यस्य पुत्रो महीपतेः। यथा शरनिमित्तेन तद्धूमपुरमागतः ॥८७॥ ततो विदितवृत्तान्ता सा तं रूपशिखाभ्यधात्। न त्वया सुदृगन्योऽस्ति त्रैलोक्येऽपि धनुर्धरः ॥८८॥

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सप्तम लम्बर १११ यह सुनकर वीर शृंगभुज उन कपटियों से बोला—'धीरज रखो। घबराओ मत। डरो मत। मैं उस नीच राक्षस को मारकर उस बाण को लाऊँगा। ऐसा कहकर शृंगभुज अपने धनुष-बाण लेकर ज़मीन पर गिरती हुई रक्त-धारा का अनुकरण करता हुआ चला ॥७४-७६॥ इस प्रकार प्रसन्न होकर अन्य राजपुत्रों के अपनी माताओं के समीप चले जाने पर वह शृंगभुज जिस दिशा को बगुला भागा था उस दिशा की ओर बगुले के पीछे-पीछे जंगल में चला गया ॥७७॥ उसने उस घोर जंगल में बगुले को खोजते हुए उसके भीतर एक महान् नगर को ऐसे देखा जैसे मानों पुण्य-रूपी वृक्ष का भोग के लिए आया हुआ फल हो ॥७८॥ उस नगर के उद्यान में एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए उसने आश्चर्यमय रूपवाली आती हुई कन्या को देखा ॥७९॥ विरह में प्राण हरण करनेवाली और संगम म अमृतमयी वह कन्या विधाता ने विचित्र रूप से विष और अमृत के सम्मिश्रण से बनाई थी ॥८०॥ धीरे-धीरे समीप आई हुई और अमृत बरसानेवाली आँखों से देखती हुई उससे राजकुमार ने पूछा ॥८१॥ 'हे मृगनयनी ! इस नगर का क्या नाम है ? यह नगर किसका है और तू कौन है ? और यहाँ कैसे आई है। यह सब कहो ॥८२॥ तब मुख को कुछ टेढ़ी की हुई भूमि पर आँखें गड़ाई हुई वह सुन्दर दाँतोंवाली कन्या मीठी और स्नेह-भरी भाषा में बोली—॥८३॥ यह धूमपुर नामक नगर है। यह समस्त सम्पत्तियों का घर है। इस नगर में राक्षसों में श्रेष्ठ अग्निदिश नामक राक्षस रहता है ॥८४॥ मैं उसी के नाम के अनुसार रूपवाली रूपशिखा नाम की कन्या हूँ। तुम्हारे असाधारण रूप से आकृष्ट होकर यहाँ आई हूँ ॥८५॥ अब तुम बताओ कि तुम कौन हो ? और यहाँ कैसे आये हो ? उसके ऐसा कहने पर शृंगभुज ने अपना अपने पिता का और बगुले पर बाण चलाने आदि का सारा वृत्तान्त कह सुनाया और बताया कि वह पिता का सुनहरा बाण लाने के लिए धूमपुर आया है ॥८६-८७॥ तब उसके विचार को जानकर रूपशिखा उससे बोली कि तुम्हारे समान धनुर्धारी तीनों लोक में नहीं है ॥८८॥

११२ कथासरित्सागर

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११२ कथासरित्सागर येन तातोऽप्यसौ विद्धो बकरूपो महेषुणा। स च हेममयो बाण स्वीकृतः क्रीडया मया॥८९॥ क्षतस्तु निर्व्रणः सद्यो महादंष्ट्रेण मन्त्रिणा। विशल्यकरणीमुख्यमहौषधिविदा कृतः॥९०॥ तथापि तातं सम्बोध्य नयाम्यभ्यन्तरं द्रुतम्। त्वामार्यपुत्र न्यस्तो हि त्वय्यात्मायं मयाधुना॥९१॥ इत्युक्त्वा समवस्थाप्य तत्र शृङ्गभुजं क्षणम्। ययौ रूपशिखा पार्श्वं पितुरग्निशिखस्य सा॥९२॥ तात शृङ्गभुजो नाम राजसूनुरिहागतः। कोऽप्यनन्यसमो रूपकुलशीलबयोगुणैः॥९३॥ जाने कोऽप्यवतीर्णोऽत्र देवांशो न स मानुषः। स चेद्भर्त्ता न मे स्यात् तत्यजेयं जीवितं ध्रुवम्॥९४॥ इत्युक्तः स तया तत्र पिता सां राक्षसोऽब्रवीत्। मानुषाः पुत्रि भक्ष्या मस्तथापि यदि ते ग्रहः॥९५॥ तदस्तु राजपुत्रं तमिहैवानाय्य दर्शय। तच्छ्रुत्वा सा ययौ रूपशिखा शृङ्गभुजान्तिकम्॥९६॥ तत्सर्वं यथावृत्तं सञ्च तं निनायान्तिकं पितुः। सोऽपि तं नम्रमादृत्य तत्पिताग्निशिखोऽब्रवीत्॥९७॥ ददामि राजपुत्रैतां तुभ्यं रूपशिखामहम्। यदि मद्वचनं किञ्चिन्नातिक्रामसि जातुचित्॥९८॥ इत्युक्तवन्तं तं सोऽपि प्रह्वः शृङ्गभुजोऽब्रवीत्। बाढमुल्लङ्घयिष्यामि नैवाज्ञावचनं तव॥९९॥ इति शृङ्गभुजोक्त्यास्तुष्टः सोऽग्निशिखोऽभ्यधात्। उत्तिष्ठ तर्हि स्नात्वा त्वमागच्छ स्नानवेश्मनः॥१००॥ तमेवमुक्त्वावादीत्सा सुतां रूपशिखां च सः। त्वं गच्छ सर्वा भगिनीरादायागच्छ सत्वरम्॥१०१॥ एवमग्निशिखेनोक्तौ तेन निर्जग्मतुस्ततः। तयैव साकमुत्तस्थौ शृङ्गभुजो रूपशिखा च सा॥१०२॥ ततश्च सा सुधीः शृङ्गभुजं रूपशिखाभ्यधात्। आर्यपुत्र कुमारीणां स्वसॄणामस्ति मे शतम्॥१०३॥

सप्तम लम्बक ११३

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सप्तम लम्बक ११३ क्योंकि तुमने बगुला बने मेरे पिता को भीषण बाण से बींध दिया। उस सोने के बाण को मैंने देखने के लिए पिता से ले लिया है ॥८९॥ मेरे पिता को उसके मन्त्री महादंष्ट्र ने विशल्यकरणी आदि ओषधियों से तुरन्त अच्छा कर दिया है ॥९०॥ तो मैं पिता को सूचित करके तुम्हें शीघ्र अन्दर लिवा ले जाती हूँ। हे आर्यपुत्र ! मैंने अपने को तुम्हें दे डाला है ॥९१॥ ऐसा कहकर और शृंगभुज को बैठाकर वह रूपशिखा पिता अग्निशिख के पास गई ॥९२॥ 'हे पिता ! शृंगभुज नाम का एक राजकुमार यहाँ आया है। वह रूप, शील (चरित्र) अवस्था और गुणों से असाधारण व्यक्ति है। मालूम होता है कि वह कोई पृथ्वी पर अवतीर्ण देवता का अंश है, मानव नहीं है। यदि वह मेरा पति न होगा तो मैं निश्चय ही प्राण त्याग कर दूँगी' ॥९३-९४॥ रूपशिखा से इस प्रकार कहे गये उसके पिता ने कहा—'बेटी ! मनुष्य तो हमारे भक्ष्य हैं। तो भी यदि तुम्हारा आग्रह है, तो वही ठीक है। तुम उस राजकुमार को यहीं लाकर दिखाओ। ऐसा सुनकर रूपशिखा शृंगभुज के समीप गई और जो कुछ किया था, उसे कहकर पिता के समीप ले गई। अग्निशिख ने भी उसे विजयी देखकर सत्कार किया और बोला—॥९५-९७॥ 'हे राजकुमार ! मैं तुम्हें इस रूपशिखा को देता हूँ, यदि तुम कभी मेरी बात को इधर-उधर न करोगे' ॥९८॥ ऐसा कहते हुए अग्निशिख से विजयी शृंगभुज बोला—'ठीक है, तुम्हारी आज्ञा के वचनों का उल्लङ्घन कभी न करूँगा' ॥९९॥ शृंगभुज से इस प्रकार कहा गया प्रसन्न अग्निशिख बोला—'अब उठो और स्नानगृह से स्नान करके आओ' ॥१००॥ उसे ऐसा कहकर रूपशिखा से बोला—'तू भी जा और सब बहनों को लेकर शीघ्र जा' इस प्रकार अग्निशिख से कहे गये शृंगभुज और रूपशिखा—दोनों 'जो आज्ञा' कहकर बाहर निकले ॥१०१-१०२॥ बाहर आकर रूपशिखा ने शृंगभुज से कहा—'आर्यपुत्र ! मेरी एक सौ कुँवारी बहनें हैं। ॥१०३॥ १५

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सर्वा वयं सदृश्यश्च तुल्याभरणवाससः। सर्वासां सन्ति कण्ठेषु तुल्या हारलताश्च नः॥१०४॥ तत्तातो मेलयित्वास्मांस्त्वां विमोहयितुं प्रिय। आसां मध्यादभीष्टां त्वं वृणीष्वेति वदिष्यति॥१०५॥ जानाम्येतमहं तस्य व्याजाभिप्रायमीदृशम्। सर्वा सङ्कटयत्यस्मान्किमर्थमयमन्यथा ॥१०६॥ तवा मूर्ध्नि करिष्ये च कण्ठाद्धारलतामहम्। तदभिज्ञानलक्ष्म्या यां वनमालां मयि क्षिपे ॥१०७॥ भीतप्रायश्च तातोऽस्य बुद्धिर्नास्य विवेकिनी। तथा मय्यपि मार्गोऽस्य जातिसिद्धः क्व गच्छति॥१०८॥ तदस्य वञ्चनार्थं ते यद्यत्किञ्चिद्वदिष्यति। अङ्गीकृत्य त्वया तत्तद्वाच्यं मे वेद्म्यहं परम्॥१०९॥ इत्युक्त्वा भगिनीनां सा पार्श्वं रूपशिखा ययौ। तथेत्युक्त्वा च गतवांस्नातुं शृङ्गभुजोऽपि सः॥११०॥ अथागात्स्वसृभिः साकं पार्श्वं रूपशिखा पितुः। सोऽपि शृङ्गभुजश्चैतैः स्नापितोऽत्रागमत्पुनः॥१११॥ आसां मध्यान्निजेष्टायै प्रयच्छैतामिति ब्रुवन्। वनमालां ददौ शृङ्गमूनायाग्निशिखोऽथ सः॥११२॥ सोऽप्यादायैव तां रूपशिखायाः क्षिप्तवान्गले। प्राङ्मूर्धन्यस्तसङ्केतहारभ्रष्टेनुं पारमञ्ज ॥११३॥ ततः सोऽग्निशिखो रूपशिखां शृङ्गभुजान्विताम्। निजगाद विभास्ते यां प्रातस्ताहमङ्गलम्॥११४॥ इत्युक्त्वा तौ च ताश्चान्या विससर्ज सुता गृहम्। क्षणाच्च तं शृङ्गभुजं समाहूयैवमब्रवीत्॥११५॥ गच्छैवं दान्तयुगलं समादाय पुरावहिः। राधिस्यं भुवि तन्नाद्य तिलसारीशतं वप॥११६॥ तच्छ्रुत्वा स तथेत्युक्त्वा गत्वा शृङ्गभुजोऽब्रवीत्। खिन्नो रूपशिखायास्तत्साप्येवं निजगाद तम्॥११७॥ आर्यपुत्र न कार्यस्ते विषादोऽत्र मनागपि। गच्छ त्वं साधयाम्येतदहं क्षिप्रं स्वमायया॥११८॥

सप्तम लम्बक ११५

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सप्तम लम्बक ११५ हम सब एक समान रूप और वेश भूषावाली हैं। हम सब के गले में एक समान हार पड़े हुए हैं॥१०४॥ इसलिए, मेरा पिता तुमको ठगने के लिए सभी लड़कियों को एकत्र करके ऐसा कहेगा कि इनमें से तुम जिसे चाहते हो उसे वर लो ॥१०५॥ मैं उसके इस कपट-व्यवहार को जानती हूँ। नहीं तो यह हम सब को एकत्र क्यों कर रहा है ॥१०६॥ वरमाला के वरण के समय मैं अपने कण्ठहार को सिरपर रख लूँगी। तब तुम मुझे पहचान कर मेरे गले में वरमाला डाल देना ॥१०७॥ मेरा पिता मूर्ख है उसकी बुद्धि विवेकशालिनी नहीं है। इसीलिए, मुझ पुत्री के साथ भी ऐसा व्यवहार करता है। जातिगत स्वभाव कहाँ जायगा ॥१०८॥ अतः तुम्हें ठगने के लिए यह जो-जो भी कहेगा उसे स्वीकार कर तुम मुझसे कहना— [L13: आगे जो कर्त्तव्य है मैं करूँगी' ॥१०९॥ ऐसा कहकर रूपसिखा अपनी बहनों के पास गई। 'ऐसा ही करूँगा'—यह कहकर श्रृंगभुज नहाने चला गया ॥११०॥ तदनन्तर रूपसिखा अपनी बहनों के साथ पिता के पास आई। उधर सेविकाओं द्वारा स्नान कराया गया श्रृंगभुज भी आ गया ॥१११॥ तब अग्निधिश ने 'इन कन्याओं में जिसे तुम चाहते हो उसे यह माला दे दो' ऐसा कहकर श्रृंगभुज को एक वरमाला दी ॥११२॥ उस राजकुमार ने भी माला को लेकर, पहले ही सिर पर हार की लड़ियों को रखी हुई रूपसिखा के गले में डाल दिया ॥११३॥ तब अग्निधिश श्रृंगभुज और रूपसिखा से बोला—'कल प्रातःकाल तुम दोनों का विवाह सम्पन्न कर दूँगा' ॥११४॥ ऐसा कहकर उन दोनों को तथा अन्य कन्याओं को उसने अपने-अपने घर जाने की आज्ञा दी और पल-भर में ही श्रृंगभुज को बुलाकर यों बोला—॥११५॥ जाओ इन दो बैलों की गाड़ी सजाकर नगर के बाहर डर के रूप में रंगे हुए तिलों की एक सौ गाड़ी को रोल में बो आओ—॥११६॥ यह सुनकर और 'ठीक है ऐसा कहकर घबड़ाया हुआ श्रृंगभुज रूपसिखा के पास आकर सब वृत्तान्त बोला। तब वह भी उससे बोली ॥११७॥ 'आर्यपुत्र ! तुम इस सम्बन्ध में जरा भी खेद न करो। तुम खेत की ओर जाओ। मैं अपनी माया से सब सिद्ध कर देती हूँ' ॥११८॥

११६ कथासरित्सागर

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११६ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा तत्र गत्वा स दृष्ट्वा राजसुतस्तिलान् । राक्षसान्विह्वलो यावद्वप्तुं प्रक्रमते कृपन् ॥११९॥ तावद्ददर्श भूमिं तां कृष्टमुप्तांश्च तांस्तिलान् । प्रियामायाबलात्सर्वान्क्रमेणैव सुविस्मितः ॥१२०॥ गत्वा चाग्निशिखायैतत्कृतं कार्यं न्यवेदयत् । ततः स वञ्चको भूयस्तमभाषत राक्षसः ॥१२१॥ न ममोप्तैस्तिलैः कार्यं गच्छ राशीकुरुष्व तान् । तच्छ्रुत्वोपेत्य तद्रूपशिखायै सोऽब्रवीत्पुनः ॥१२२॥ सा तं विसृज्य भूमिं तां सृष्ट्वासंख्याः पिपीलिकाः । ताभिः सङ्घटयामास तिलांस्तान्निजमायया ॥१२३॥ सवृष्ट्वैव पुनर्गत्वा तस्मै सोऽग्निशिखाय तान् । न्यवेदयच्छृङ्गभुजस्तिलां राशीकृतानपि ॥१२४॥ ततः सोऽग्निशिखो मूर्खं शठो भूयोऽप्युवाच तम् । इतो दक्षिणतो गत्वा योजनद्वयमात्रकम् ॥१२५॥ अस्ति देवकुलं शून्यमरण्ये भद्र शाम्भवम् । तस्मिन्धूमशिखो नाम भ्राता वसति मे प्रियः ॥१२६॥ तत्रेदानीं व्रजेच्चैव वदेद्देवकुलाग्रतः । भो धूमशिख दूतस्ते सानुगस्य निमन्त्रणम् ॥१२७॥ प्रहितोऽग्निशिखेनाहं शीघ्रमागम्यतां त्वया । भावी रूपशिखाया हि प्रातः परिणयोत्सवः ॥१२८॥ एतावदुक्त्वा चैवात्र त्वमिहायाहि सत्वरम् । प्रातः परिणयस्वैतां सुतां रूपशिखां मम ॥१२९॥ इत्युक्तस्तेन पापेन तथेत्युक्त्वा तथैव सः । गत्वा रूपशिखायास्तत्सद्यः शृङ्गभुजोऽब्रवीत् ॥१३०॥ सा चास्मै मृत्तिकां तोयं कण्टकानग्निमेव च । दत्त्वा तस्य वधार्थं च निजमेवं जगाद तम् ॥१३१॥ एतदादाय तुरगं गत्वा देवकुलं च तत् । द्रुतं धूमशिखायोक्त्वा तत्तादृशं निमन्त्रणम् ॥१३२॥ आगन्तव्यं त्वया शीघ्रमन्येनानेन पाप्मना । पृष्ट्वा शोणितपं च मृत्युर्लब्धिस्त्वया परम् ॥१३३॥

सप्तम लम्बक ११७

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सप्तम लम्बक ११७ यह सुनकर राजकुमार गया और जबतक तिलों के बोने की तैयारी करता है तबतक देखता है कि उसकी प्रेयसी की माया के बल से सारी भूमि जुत गई और सारे तिल बो दिये गये हैं ॥११९ १२० ॥ राजपुत्र ने जाकर अग्निशिख से खेत जोतने और तिल बोये जाने का समाचार सुना दिया तब वह धूर्त और ठग राक्षस फिर बोला—॥१२१॥ 'मुझे तिलों के बोने से कोई प्रयोजन नहीं है। तुम जाकर उन्हें एकत्र करके फिर से ढेर लगा दो। यह सुनकर राजकुमार ने फिर सारा हाल रूपशिखा से कहा—'रूपशिखा ने उस भूमि में अगणित चीटियाँ उत्पन्न करके उनसे उन तिलों को बिनवाकर अपनी माया से ढेर करा दिया ॥१२२ १२३॥ यह देखकर राजपुत्र ने अग्निशिख से जाकर कहा कि वे तिल फिर ढेर कर दिये गये ॥१२४॥ तब वह मूर्ख ठग फिर बोला—'यहाँ से दक्षिण की ओर आठ कोस पर शिव का एक मन्दिर है। उसमे मेरा प्यारा भाई धूमशिख रहता है ॥१२५ १२६॥ तुम अभी वहाँ जाओ और देव-मन्दिर के सामने खड़े होकर मेरी ओर से कहना कि 'हे धूमशिख ! अपने अनुचरों के साथ तुम्हे निमन्त्रण देने के लिए मुझे अग्निशिख ने भेजा है। तुम शीघ्र आना। कल प्रातःकाल मेरी कन्या रूपशिखा का विवाहोत्सव है। इतना कहकर तुम आज ही लौटकर यहाँ आओ और प्रातःकाल मेरी कन्या रूपशिखा से ब्याह करो ॥१२७—१२९॥ उस पापी अग्निशिख से इसप्रकार कहा गया राजकुमार 'ऐसा ही होगा' कहकर रूपशिखा के पास आया और ये सारी बातें उससे कहीं ॥१३० ॥ उस पतिव्रता ने उसे मिट्टी पानी काँटे और आग एवं अपना अच्छा घोड़ा देकर कहा—॥१३१॥ 'इस अच्छे घोड़े पर चढ़कर, उस देव-मन्दिर का प्रणाम कर तथा धूमशिख को मेरे पिता की ओर से निमंत्रण करके तुम दौड़ते हुए इस घोड़े से शीघ्र आ जाओ। आते हुए गर्दन घुमाकर बार-बार पीछे की ओर देखना ॥१३२ १३३॥

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पश्चात्तमागतं धूमशिखं द्रक्ष्यसि यत्ततः। सन्मार्गे मृत्तिकां ते प्रक्षेप्स्यात्मपृष्ठतः ॥१३४॥ ततोऽपि पश्चादागच्छेत् स ते धूमशिखो यदि। तथैव पृष्ठतस्त्याज्यं तोयमेव त्वयान्तरा ॥१३५॥ तदप्यत्येति चेत्क्रम्यास्तद्वदेतेऽप्य कण्टकाः। तथापि चेत्सोऽनुपतेन् मध्येऽग्निमिमं क्षिप ॥१३६॥ एवं कृते हि निर्वेन्यस्त्वमिष्टंवाप्स्यसि मा च ते। विकल्पोऽभूद्ध्रुवं प्रत्यस्य च विद्याबलं मम ॥१३७॥ इत्युक्तः स तया शृङ्गभुजो धृतमुदादिकः। तथेति तद्यातश्चोदरण्ये देवकुलं ययौ ॥१३८॥ तत्र वामस्थगौरीकं दक्षिणस्थविनायकम्। दृष्ट्वा नत्वा च विश्वेशमुक्तचैवाग्निशिखोदितम् ॥१३९॥ निमन्त्रणवचस्तस्य तूर्ण धूमशिखस्य तत्। ततश्चारुह्य चतुरं प्रधाविततुरङ्गमम् ॥१४०॥ क्षणाच्च पृष्ठतो यावदीक्षते वलिताननः। तावद्धूमशिखं पश्चादागतं तं ददर्श सः ॥१४१॥ चिक्षेप चाशु मार्गेऽस्य मृत्तिकां तां स्वपृष्ठतः। क्षिप्तमात्रं तया मध्ये सद्योऽभूत्पर्वतो महान् ॥१४२॥ तमुल्लङ्घ्य कथञ्चित्तमागतं वीक्ष्य राक्षसम्। तथैव पृष्ठतस्तोयं तत्स राजसुतोऽप्रक्षिपत् ॥१४३॥ तेन तत्रान्तरा जज्ञे वेल्लद्वीचिर्महानदी। तामप्युत्तीर्य कथमप्यागतेऽस्मिन्निशाचरे ॥१४४॥ शीघ्रं शृङ्गभुजः पश्चात्कण्टकांस्तामवाकिरत्। तैर्बभूव गहनं वनं मध्ये सकण्टकम् ॥१४५॥ ततोऽपि निर्गते तस्मिन् राक्षस्यग्निं स्वपृष्ठतः। अहो तेन स जज्वाल मार्गं सत्तृणकाननम् ॥१४६॥ तं वीक्ष्य साण्डबमिव ज्वलितं दुरतिक्रमम्। ययौ धूमशिखः खिन्नो भीतश्च स यथागतम् ॥१४७॥ सदा रूपसिखामायामोहितः स हि राक्षसः। पद्भ्यामागावगाञ्चैव न सस्मार मनोजवित्वम् ॥१४८॥

सप्तम लम्बक १११

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सप्तम लम्बक १११ यदि तुम्हें पीछा करता हुआ धूमशिख दीख पड़े तो तुम अपने पीछे उसके मार्ग में मिट्टी फेंक देना ॥१३४॥ उसके अनन्तर भी यदि वह पीछा करता हुआ दीख तो तुम अपने पीछे के मार्ग में पानी छोड़ देना। फिर भी आवे तो उन काँटों को पीछे फेंक देना और फिर भी पीछा करे तो आग को पीछे की ओर फेंकना ॥१३५-१३६॥ ऐसा करने से तुम बिना कष्टके वहाँ आ जाओगे । मुझसे न डरो, जाओ। तुम आज मेरी विद्या का बल देखोगे ॥१३७॥ शशिशास्त्र लेता हुआ गुणशुभ्र मिट्टी पानी आग आदि लेकर घोड़े पर सवार होकर जंगल में स्थित मन्दिर में पहुँचा ॥१३८॥ उस मन्दिर में उसने काँटों और चोटी एवं दाढ़ी वाले गणेश को फल दिखलाकर सिर को ढूँगा और प्रणाम करके अभिवादन का उल्लेख बताया ॥१३९॥ और, धूमशिख को नियम की बात कहकर राजकुमार शान्त होकर चुप हो गया॥१४०॥ क्षण भर में ही जब उसने शब्द सुनाई दी दया कि धूमशिख पीछे-पीछे आ रहा है॥१४१॥ तब उसने अपने पीछे उस दानव के मार्ग में मिट्टी फेंक दी। क्या हुआ मिट्टी से रास्ते में बड़ा-सा पहाड़ बन गया॥१४२॥ उस पहाड़ को लाँघकर जब वह दानव का लड़का राजकुमार के पीछे दौड़ने लगा तब ॥१४३॥ उस पानी के पड़ते ही मार्ग में बड़ी भारी तरंगों वाली अथाह बड़ी नदी बन गयी॥१४४॥ उसने उस बड़ी नदी को भी पार कर लिया। यह देखकर गुणशुभ्र ने शीघ्र ही काँटों को फेंक दिया। उन काँटों से मार्ग में काँटों से भरा हुआ जंगल बन गया॥१४५॥ दानव-बालक जब उस काँटोंवाले जंगल को पार कर राजकुमार के पास पहुँचा तब उसने उसके ऊपर आग फेंक दिया ॥१४६॥ उस आग की ज्वाला से सब दिशाओं को घेर लिया। आग के लपटों से जलते हुए उस दानव-बालक को अपने पिता का स्मरण हुआ ॥१४७॥ उसने अपने पिता का नाम लेकर कहा कि हे पिताजी! मुझे इस आग से बचाइये। तब उसके पिता ने उससे कहा॥१४८॥

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अथ प्रशमन्नन्तस्तत्त्रिपामायाविजृम्भितम् । गतमीरायणौ धूमपुरं शृङ्गभुजः स तत् ॥१४९॥ ततो रूपशिखायै तं समर्प्याश्वं निवेद्य च। यथा कृतं स दृष्टायै जगामाग्निशिखान्तिकम् ॥१५०॥ निमन्त्रितो मया गत्वा भ्राता धूमशिखस्तव। इत्युक्तवन्तं तं सोऽत्र सभ्रान्तोऽग्निशिखोऽब्रवीत् ॥१५१॥ यदि तत्र गतोऽभूस्त्वमभिज्ञानं तदुच्यताम्। इति तेनोदितः शृङ्गभुजो जिह्यं जगाद तम् ॥१५२॥ शृण्विह वक्ष्यमभिज्ञानं तत्र देवकुले विभो। वामेऽस्ति पार्वती पार्श्वे दक्षिणे च विनायकः ॥१५३॥ तच्छ्रुत्वा विस्मितः सोऽग्निशिखः क्षणमचिन्तयत्। क्व गतोऽपि मद्‌भ्रात्रा शक्तितो नैष साधितुम् ॥१५४॥ तञ्जाने मानुषो नायं देवोऽप्य कोऽपि निश्चितम्। अनुरूपस्तवेषोऽस्तु मत्सुताया दुहितुर्मम ॥१५५॥ इति सञ्चिन्त्य तं शृङ्गभुजं रूपशिखान्तिकम्। कृतार्थं व्यसृजत्स्वं तु नाङ्गभेदं विवेद सः ॥१५६॥ स च शृङ्गभुजस्तत्र गत्वा परिरभ्योत्सुकः। भुक्तपीतस्तया साकं कञ्चिच्चानयन्त्रिथाम् ॥१५७॥ प्रातश्चाग्निशिखस्तस्मै तां स रूपशिखां ददौ। ऋद्ध्या स्वसिद्धमुचितया विधिवद्वह्रिसाक्षिकम् ॥१५८॥ क्व राक्षससुता कुत्र राजपुत्रः क्व चैतयोः। विवाहो बत चित्रेयं गतिः प्राक्तनकर्मणाम् ॥१५९॥ स रेजे राजसूनुस्तां प्राप्य रक्षःसुतां प्रियाम्। पेशलां पङ्कजम्भूतां राजहंसोऽब्जिनीमिव ॥१६०॥ तस्थौ च स तया तत्र सर्वैकभमसा सह। भुञ्जानो विविधान् भोगाम् रक्षःसिद्धयुपकल्पिताम् ॥१६१॥ गतेष्वथ दिनेष्वत्र तां स रूपशिखां रहः। मवादीद्देहि गच्छावो वर्धमानपुरं प्रिये ॥१६२॥ सा हि स्वा राजधानी मस्तस्याश्चैवं प्रवासनम्। परैः सोढुं न शक्नोमि मामप्राणा हि मादृशाः ॥१६३॥

सप्तम लम्बक १२१

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सप्तम लम्बक १२१ तदनन्तर अपनी पत्नी रूपशिखा के विद्या-वैभव की प्रशंसा करता हुआ राजकुमार निर्भय होकर धूमपुर पहुँच गया ॥१४९॥ उसके बाद रूप शिखा का घोड़ा वापस करते हुए प्रसन्न हृदया उससे जैसी घटना हुई, कह सुनाई। तदनन्तर वह अग्नि शिख के पास गया ॥१५०॥ जब उसने अग्निशिख से कहा कि मैंने तुम्हारे भाई धूमशिख का निमन्त्रित कर दिया। ऐसा कहते हुए शृंगभुज को घबराया हुआ अग्निशिख बोला कि यदि तुम यहाँ गये थे तो वहाँ का कुछ चिह्न (निशानी) बताओ ऐसा कहते हुए उस कुटिल राक्षस से शृंगभुज बोला ॥१५१ १५२॥ 'सुनो ! मैं उस मन्दिर का चिह्न बतलाता हूँ। उसमें शिवजी के बायें पार्वती और दाहिने गणपति बिराजते हैं ॥१५३॥ यह सुनकर विस्मित अग्निशिख सोचने लगा कि आश्चर्य है कि मेरा भाई इस मनुष्य को क्यों खा न सका ! अतः मैं समझता हूँ कि यह मनुष्य नहीं निश्चय ही कोई देवता है। इसलिए, यह मेरी कन्या के लिए उपयुक्त वर है ॥१५४ १५५॥ ऐसा सोचकर उसने उस सफल राजकुमार को रूपशिखा के पास भेज दिया किन्तु उसे बाण मारकर अपना अंग-भंग करनेवाला नहीं समझ सका ॥१५६॥ विवाह के लिए उत्सुक शृंगभुज ने खा-पीकर रूपशिखा के साथ किसी तरह रात बिताई ॥१५७॥ प्रातःकाल ही अग्निशिख ने अपने वैभव के अनुसार दान-दहेज आदि देकर अग्नि के साक्ष्य में रूपशिखा का विवाह कर दिया ॥१५८॥ कहाँ राजकुमार और कहाँ राक्षस की पुत्री—उन दोनों का विवाह एक विचित्र दैवी घटना ही है ॥१५९॥ वह राजपुत्र उस प्यारी राक्षस-कन्या को प्राप्त कर इस प्रकार शोभित हुआ जैसे हंस ग्रीष्म में उत्पन्न कमलिनी को पाकर शोभित होता है ॥१६०॥ इस प्रकार राक्षस की सिद्धि द्वारा प्राप्त भोगों को भोगता हुआ शत्रुंजय शृंगभुज रूपशिखा के साथ श्वशुर-गृह में रहने लगा ॥१६१॥ कुछ दिनों के व्यतीत होने पर उसने एकबार एकान्त में रूपशिखा से कहा—'प्रिये ! चलो वर्धमान नगर को चलो। वह हमारी राजधानी है। उससे इस प्रकार दूर रहना मेरे लिए सहन नहीं किया जा सकता क्योंकि मेरे जैसे व्यक्ति का वह धर्म ही है ॥१६२—१६३॥ १६

१२२ कथासरित्सागर

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१२२ कथासरित्सागर तमूचे जन्मभूमिं स्वमटव्यामपि मत्कृते । आवेद्य पितुस्तं च हस्ते ह्यम्बर कुरु ॥१६४॥ इति शृङ्गभुजेनोक्ता सा स रूपशिखाब्रवीत् । यदादिशसि तत्कार्यमार्यपुत्र मयाधुना ॥१६५॥ क्व जन्मभूः क्व स्वजनः सर्वमेतद् भवान् मम । न पतिव्यतिरेकेण सुस्त्रीणामपरा गतिः ॥१६६॥ तातस्यावेदनीयं तु नैतत्सोऽस्मान्हि न त्यजेत् । तस्मादविदितं तस्य गन्तव्यं क्रोधनस्य सः ॥१६७॥ आगमिष्यति यत् पश्चाद् बुद्ध्वा परिजनात्ततः । मोहयिष्याम्यबुद्धिं तं भीततुल्यं स्वविद्यया ॥१६८॥ इति तस्या वचः श्रुत्वा प्रहृष्टः सोऽमरद्युतिः । दत्तरत्न्यार्धमानर्घरत्नपूर्णसमुद्गया ॥१६९॥ तयैवानीततन्पादसुवर्णक्षरया सह । आरुह्य खरवेगाख्यं तदीयं तुरगोत्तमम् ॥१७०॥ वञ्चयित्वा परिजनं स्वैरोद्यानभ्रमच्छलात् । ततः शृङ्गभुजः प्रायादर्धमानपुरं प्रति ॥१७१॥ गतयोर्दूरमध्वानं बुद्ध्वा सोऽग्निश्शिखस्तयोः । दम्पत्योराययौ पश्चाद्भ्रमसा राक्षसः क्रुधा ॥१७२॥ तस्यागमनवगोत्थं शब्दं श्रुत्वा च दूरतः । मार्गे रूपशिखा साध्व तं शृङ्गभुजमब्रवीत् ॥१७३॥ आर्यपुत्रागतस्तातो निवर्तयितुमेष नः । तत्त्वमास्वेह निःशङ्कः पश्यैतं वञ्चये कथम् ॥१७४॥ नैष द्रक्ष्यति साश्वं त्वां विद्ययाच्छादितं मया । इत्युक्त्वाश्वादवतीर्णा सा पुरुषं माययाऽकरोत् ॥१७५॥ इहायाति महद्रक्षस्तत्त्वं तूष्णीं क्षणं भव । इत्युक्त्वा काष्ठिकं चात्र वार्धं वनमागतम् ॥१७६॥ तत्कुठारेण काष्ठानि पाटयन्ती किलास्त सा । तदा रूपशिखा शृङ्गभुजे पश्यति सस्मिते ॥१७७॥ तावत् सोऽग्निशिखस्तत्र प्राप्यैव काष्ठिकाकृतिम् । दृष्ट्वावतीर्य भगनाम्मुङ पप्रच्छ राक्षसः ॥१७८॥

सप्तम लम्बक १२३

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सप्तम लम्बक १२३ इसलिए, न त्यागने के योग्य भी इस अपनी जन्मभूमि को मेरे लिए छोड़ दे। अपने पिता से कह दे और उस सुगुहस्त ज्ञान को अपने हाथ में कर ले' ॥१६४॥ शृंगभुज के यह कहने पर रूपशिखा बोली—'हे प्राणप्रिय ! तुम जो आज्ञा देते हो उसे मैं अभी करती हूँ ॥१६५॥ जन्मभूमि क्या है ? और बन्धु-बान्धव क्या हैं ? मेरे तो तुम्हीं सब कुछ हो। सदाचारिणी स्त्रियों के लिए अपने पति के सिवा और क्या गति है ॥१६६॥ यहाँ से प्रस्थान की बात पिता से न कहनी चाहिए। वह हम लोगों को नहीं छोड़ेगा। इसलिए, उस पापी के बिना जाने ही चल देना चाहिए ॥१६७॥ यदि सबकों से समाचार जानकर पीछे आयेगा भी तो मैं उस मूर्ख राक्षस को अपनी माया से ठग लूँगी ॥१६८॥ रूपशिखा की बातें सुनकर दूसरे दिन शृंगभुज पिता का आधा राज्य पाई हुई और रत्नों से भरी हुई पिटारी साथ ली हुई एवं राजकुमार के मान के बाण का अभिभूत की हुई उस रूपशिखा के साथ उसीके शरवेग¹ नामक घोड़े पर चढ़कर बाग़ों में घूमने-टहलने के बहाने अपने सेवकों को ठगकर, वर्धमानपुरी की ओर चल पड़ा ॥१६९-१७१॥ उन दोनों के कुछ दूर निकल जाने पर उनके जाने का समाचार जानकर राक्षस अग्निशिख क्रोध में उनके पीछे आकाश-मार्ग से दौड़ा ॥१७२॥ उसके आने के वेग का शब्द दूर से सुनकर रूपशिखा शृंगभुज से बोली—'प्रिय ! मेरा पिता हम लोगों को लौटाने के लिए आया है। तुम तो यहाँ निश्शंक होकर बैठो। देखो मैं कैसे इसे ठगती हूँ॥१७३-१७४॥ मैं अपनी विद्या से तुझे ऐसा छिपा दूँगी कि वह घोड़े के साथ तुझे नहीं देख सकेगा । ऐसा कहकर रूपशिखा ने घोड़े से उतरकर पुरुष का रूप बना लिया ॥१७५॥ 'यहाँ एक बड़ा राक्षस आ रहा है तू कुछ दूर चल बैठ'—ऐसा कहकर लकड़ी काटने के लिए वन में आये हुए एक लकड़हारे से कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी काटने लगी। उसे देखकर मूर्ख राक्षस आकाश से उतरा और पूछने लगा—॥१७६-१७८॥ १. तीर के समान तेज चलनेवाला।

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सप्तम लम्बक १२५

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सप्तम लम्बक १२५

'क्यों भाई ! तुमने इस रास्ते से जाते हुए स्त्री और पुरुष को देखा है' ? तब पुरुष वेशधारिणी वह रूपशिखा कुछ खिन्न-सी हो कर बोली—'परिश्रम के पसीने से आँखें बन्द रहने के कारण हम दोनों ने किसी को नहीं देखा। 'हम आज राक्षसराज अग्निशिख को जलाने के लिए अधिक लकड़ियाँ काटने में व्यस्त हैं। यह सुनकर वह परममूर्ख राक्षस सोचने लगा—ओह ! मैं कैसे मर गया यदि ऐसा है तो उस कन्या से क्या करूँगा। जाता हूँ अपने घर पर अपने आदमियों से पूछता हूँ ॥१८ –१८२॥

ऐसा सोचकर वह अग्निशिख तुरन्त घर को लौटा और उसकी लड़की हँसती हुई पहले के समान स्त्री-वेश में आ गई और पति के साथ आगे चली ॥१८३॥

कुछ ही क्षणों में मुस्कराते हुए अपने कुटुम्बियों से मृत्यु का निश्चय करके राक्षस फिर लौटा वह अपन को जीवित समझकर और सुनकर प्रसन्न था ॥१८४॥

भयंकर शब्द के कारण राक्षस-पिता को फिर आते हुए जानकर घोड़े से उतरी रूपशिखा पति को अपनी माया से छिपा दिया और रास्ते में आते हुए किसी पत्रवाहक के हाथ से पत्र लेकर फिर पुरुष बन गई ॥१८५ १८६॥

इतने में ही राक्षस ने आकर उससे पूछा कि क्या तुमने स्त्री के साथ जाते हुए किसी पुरुष को देखा है ? ॥१८७॥

तब पुरुषरूपा रूपशिखा लम्बी साँस भरती हुई बोली— शीघ्रता के कारण मैंने किसी को नहीं देखा। आज युद्ध में शत्रु से मारे गये और अन्तिम श्वास लेते हुए राक्षसराज अग्निशिख से जम्बुखण्ड से रहनेवाले अपने भाई धूम्रशिख के पास राज्य-ग्रहण करने के लिए पत्र देकर भेजा गया मैं दूत हूँ ॥१८८–१९ ॥

यह सुनकर अग्निशिख घबराया और सोचने लगा कि 'क्या मुझे शत्रुओं ने मार डाला ? यह जानने के लिए वह फिर अपने घर को लौटा ॥१९१॥

'कहाँ मारा गया ? मैं तो स्वस्थ हूँ'—ऐसा उसने नहीं सोचा। ब्रह्मा की मूर्ख सृष्टि भी एक महान् आश्चर्य है ॥१९२॥

घर पहुँचकर, लोगों को हँसानेवाले समाचार को सुनकर मोह से बचा हुआ राक्षस फिर कन्या की खोज में नहीं लौटा ॥१९३॥

१२६ कथासरित्सागर

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१२६ कथासरित्सागर सापि संमोह्य पितरं प्राग्वद्रूपधिया पतिम्। तमभ्यगात् पतिहितादन्यत् साध्व्यो न जानते ॥१९४॥ ततस्तया समं शृङ्गभुजः पत्न्या स सत्वरम्। आश्चर्यतुरगारूढो वर्धमानपुरं ययौ ॥१९५॥ तत्र बुद्ध्वा तमायान्तं युक्तं शृङ्गभुजं तया। पिता वीरभुजस्तस्य हृष्टोऽग्रे निर्ययौ नृपः ॥१९६॥ स दृष्ट्वा शोभितं बध्वा तं शौरिमिव भामया। प्राप्तां तदा नवां मेने नरेन्द्रो राज्यसम्पदम् ॥१९७॥ अश्वावतीर्णमेनं च पादलग्नं सवल्लभम्। उत्थाप्यालिङ्ग्य तनयं हर्षबाष्पाम्बु बिभ्रता ॥१९८॥ वधूप्रवेशकृतोदार निर्विच्छन्नममङ्गलः¹। प्रावेशयद्राजधानीं स ततो विहितोत्सवः ॥१९९॥ क्व गतोऽभूस्त्वमित्यत्र तेन पृष्टः सुतोऽथ सः। निजमाद्यन्तं शृङ्गभुजो वृत्तान्तमब्रवीत् ॥२००॥ आहूय तत्समक्षं च भ्रातृभ्यस्तत्समर्पयत्। स निर्वासभुजादिभ्यस्तेभ्यो हेममयं शरम् ॥२०१॥ तच्छ्रुत्वा च दृष्ट्वा च तेषु वीरभुजो नृपः। व्यरज्यत्सर्व्वेषु सुतेष्वेकं मेने च तं सुतम् ॥२०२॥ अथ स राजा मतिमान् सम्यगेवमचिन्तयत्। ज्ञातं यथैष विद्वेष्यादमूद्भिः प्रवासितः ॥२०३॥ पापैर्निरपराधोऽपि शत्रुभिर्भ्रातृनामभिः। तथैव नूनमेतेषां जननीभिर्मम प्रिया ॥२०४॥ मातास्य सा गुणवरा निर्दोषा दूषिता मृषा। तत्किं चिरेण पश्यामि यावदद्यैव निश्चयम् ॥२०५॥ इत्यालोच्य यथासद्दिनं नीत्वाभ्यगाद्भिशि। जिज्ञासुरयशोलेखां राज्ञीं तां स नृपोजशराम् ॥२०६॥ तदभ्यागमहृष्टा सा मद्यं तेनातिपायिता। रतान्तसुप्ता व्यस्पन्दामि तस्मिन् सजागरे ॥२०७॥ मिथ्या गुणवरायाश्चेत्साऽवदिष्याम दूषणम्। तत्किमेवमुपायास्यदयं राजा मामिह ॥२०८॥ १ निर्विन् निर्द्वन्द्व तस्यान्न राजननेव मङ्गलम्।