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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

४०२ कथासरित्सागर

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४०२ कथासरित्सागर

यदि पल्लविका नात्र प्रावेक्ष्यत्तत्स निश्चितम्। अध्यवसिष्यत्पापो मामित्येवं वृत्तमद्य मे॥११९॥ इत्युक्त्वा सा नृपं राज्ञी विरराम ररोद च। आदावसत्स्ववचनं पश्चाज्जाता हि कुस्त्रियः॥१२०॥ राजा च स तदाकर्ण्य जज्वल झटिति क्रुधा। स्त्रीबन्धु प्रत्ययो हन्ति विचारं महतामपि॥१२१॥ अब्रवीच्च स कान्तां स्वां समाश्वसिहि सुन्दरि। तस्यावश्यं करिष्यामि द्रोहिणो वधनिग्रहम्॥१२२॥ किं तु युक्त्या स हन्तव्यो भवेदपयशोऽन्यथा। स्यात् हि यत्पञ्चकृत्वो दत्तं मे तेन जीवितम्॥१२३॥ त्वदास्कन्दनदोषश्च लोके वक्तुं न युज्यते। इत्युक्ता तेन राज्ञा सा राज्ञी तं प्रत्यभाषत॥१२४॥ अवाच्य एव वोढव्यस्तेदसाञ्चाप्योऽस्य सोऽपि किम्। यो गीतेश्वरसख्येन प्रभुद्रोहे समुद्यतः॥१२५॥ एवमुक्ते तया युक्तमुक्तमित्यभिधाय सः। ययौ राजा महासेनो निजमास्थानसंसदम्॥१२६॥ तत्र सर्वे समाजग्मुर्दर्शनायास्य भूपतेः। राजानो राजपुत्राश्च सामन्ता मन्त्रिणस्तथा॥१२७॥ तावच्च गुणशर्मापि गृहाद्राजकुलं प्रति। आगा मार्गे च सुबहून्यनिमित्तान्यवैक्षत॥१२८॥ वामस्तस्माभवत्काकः श्वा वामाद्दक्षिणं ययौ। दक्षिणोऽहिरभूद्वामः सस्कन्धश्चास्फुरद् भुजः॥१२९॥ अशुभं सूचयन्त्येतान्यनिमित्तानि मे ध्रुवम्। तन्ममैवास्तु यत्किञ्चिन्मा भूद्राज्ञस्तु मत्प्रभोः॥१३०॥ इत्यन्तश्चिन्तयंस्सोऽथ नृपस्यास्थानमाविशत्। मा स्याद्राजकुले किञ्चिद्विरुद्धमिति शङ्कितः॥१३१॥ प्रणम्यानोपविष्टं च न तं राजा स पूर्ववत्। अभ्यनन्ददपश्यत्तु तिर्यग्वक्रोपेक्षया दृशा॥१३२॥ विमतन्ति तस्मिंश्च गुणशर्मणि शङ्किते। स उत्थायाथनाद्राजा तस्य स्कन्धे उपाविशत्॥१३३॥

अष्टम लम्बक ४०५

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अष्टम लम्बक ४०५ यदि उस समय मेरी सेविका वहाँ न आती तो वह पापी अवश्य ही मेरा चरित्र भ्रष्ट कर देता। ॥११९॥* इस प्रकार की मिथ्या बातें बनाकर रानी चुप हो गई और रोने लगी सच है पहले झूठ की उत्पत्ति हुई और उसके उपरान्त दुष्ट स्त्रियों की। यह सुनते ही राजा क्रोध से जल उठा क्योंकि स्त्रियों की बातों पर विश्वास करने पर बड़े-बड़े विवेकयों का विवेक नष्ट हो जाता है॥१२०-१२१॥ और, राजा रानी से कहने लगा-'सुन्दरि, धैर्य रखो। मैं उस द्रोही का वध अवश्य करूँगा ॥१२२॥ किन्तु, उसे युक्ति से मारना होगा नहीं तो निन्दा होगी। यह बात प्रसिद्ध है कि उसने पाँच बार मुझे जीवन-दान दिया है ॥१२३॥ इसका यह अपराध जन-समाज में घोषित नहीं किया जा सकता। राजा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर रानी ने राजा से फिर कहा—'यदि यह दोष अगोपनीय¹ है तो क्या यह नहीं घोषित किया जा सकता कि वह 'वीरेश्वर से मित्रता करके राजद्रोह करता था' ॥१२४ १२५॥ रानी के इस सुझाव पर हाँ ठीक कहा'—इस प्रकार कहकर राजा सभा-भवन में चला आया ॥१२६॥ राजा के सभा में आने पर उसके दर्शन के लिए सामन्त राजा राजकुमार, मन्त्री तथा सचिव आदि सब वहाँ आये ॥१२७॥ उधर गुणशर्मा भी अपने घर से सभा में उपस्थित होने के लिए चला। उसने आते हुए मार्ग में अनेक तरह के अपशकुन देखे ॥१२८॥ उसकी बाईं ओर कौआ उड़ रहा था और कुत्ता बाईं ओर से दाहिनी ओर गया। साँप बाँये से बाईं ओर गया और कन्धे के साथ उसकी बाईं भुजा भी फड़कने लगी ॥१२९॥ 'सचमुच अपशकुन हो रहे हैं, इनका जो भी अशुभ फल होना है मुझे हो किन्तु मेरे स्वामी (राजा) का भला हो' ॥१३ ०॥ मन में ऐसा सोचता हुआ गुणशर्मा दरबार में आ पहुँचा। उसके हृदय में यह शंका थी कि राजगृह में कहीं अनिष्ट न हो ॥१३१॥ प्रणाम करके बैठे हुए गुणशर्मा की ओर राजा ने अच्छी दृष्टि से नहीं देखा और न उसका मौखिक स्वागत ही किया। प्रत्युत क्रोध के कारण तिरछी और पैनी दृष्टि से राजा उसे देखता रहा ॥१३२॥ आज यह क्या बात है' इस प्रकार अपने मन में गुणशर्मा जब सोच ही रहा था कि वह राजा अपने आसन से उठकर गुणशर्मा के कन्धे पर जा बैठा ॥१३३॥ १ प्रगट न करने के योग्य।

४०४ कथासरित्सागर

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४०४ कथासरित्सागर

विस्मितांश्चाब्रवीत्सभ्यान्यायं मे गुणशर्मणः। शृणुतेति ततस्तं स गुणशर्मा व्यजिज्ञपत् ॥१३४॥ भृत्योऽहं त्वं प्रभुस्तद्वौ व्यवहारः कथं समः। अधितिष्ठासनं पश्चाद्यदिच्छसि तथाविधम् ॥१३५॥ इति धीरेण तेनोक्तो मन्त्रिभिश्च प्रबोधितः। अभ्यास्ते स्मासने राजा पुनः सभ्यानुवाच च ॥१३६॥ विदितं वावदेतद्वो मन्त्रिणो यत्क्रमागतम्। विहाय गुणशर्मायं तावदात्मसमः कृतः ॥१३७॥ श्रूयतां मम चैतेन कीदृग्दूतगतागतैः। गौडेश्वरेण कृतैक्यं द्रोहं कर्तुमचिन्तयत् ॥१३८॥ इत्युक्त्वा वर्णयामास तत्तेभ्यः स महीपतिः। यदशोकवती तस्मै जगाद रचितं मृषा ॥१३९॥ योऽप्यारम्भवसनाक्षेपस्तया तस्य मृषोदितः। निष्कास्य लोकान्ताप्तेभ्यः सोऽप्युक्तस्तेन भूभुजा ॥१४०॥ ततः स गुणशर्मा तमुवाचासत्यमीदृशम्। देव केनासि विज्ञप्तं तन्मित्रं केन निर्मितम् ॥१४१॥ तच्छ्रुत्वैव नृपोऽवादीत्पाप सत्यं न चेदिदम्। चरुभाण्डान्तरस्थं तत्कथं ज्ञातं विषं त्वया ॥१४२॥ प्रज्ञया ज्ञायते सर्वमित्युक्ते गुणशर्मणा। अशक्यमेतदित्यूचुस्तद्वेषेणान्यमन्त्रिणः ॥१४३॥ देव तत्त्वमनन्विष्य वक्तुमेव न ते क्षमम्। प्रभुश्च निर्विचारश्च नीतिज्ञैर्न प्रशस्यते ॥१४४॥ इत्यस्य वदतो भूयः स राजा गुणशर्मणः। धावित्वा छुरिकाघातं ददौ धृष्ट इति ब्रुवन् ॥१४५॥ तस्मिन्प्रहारे चरणप्रयोगात्तेन वञ्चिते। अन्ये तु प्रहरन्ति स्म वीरे तस्मिन्नृपानुगाः ॥१४६॥ स चापि युद्धकरणैर्वञ्चयित्वा कृपाणिकाः। गुणशर्मा समं तेषां सर्वेषामप्यपाहरत् ॥१४७॥ बबन्ध चैतानन्योऽन्यं केशपाशेन वेष्टितान्। कृत्वा चरणयुक्त्यैव चित्रद्युतिशितलाघवः ॥१४८॥

अष्टम लम्बक ४५

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अष्टम लम्बक ४५ राजा ने सभासदों से कहा—'गुणशर्मा के लिए मेरा न्याय सुनो। यह सुनकर गुणशर्मा ने कहा—'मैं सेवक हूँ आप मेरे स्वामी हैं, अतः मेरा और आपका व्यवहार समान नहीं हो सकता। पहले आप अपने आसन पर बैठें फिर जो इच्छा हो आज्ञा करें' ॥१३४-१३५॥ धैर्यशाली गुणशर्मा द्वारा इस प्रकार कहा गया और सभ्यों द्वारा समझाया गया राजा अपने आसन पर बैठ गया और सभ्या से बोला—॥१३६॥ 'आपलोगों को विदित है कि कुलक्रम से आये हुए मन्त्रियों को छोड़कर मैंने इस गुणशर्मा को अपने समान बना डाला। अब आप लोग सुनिए कि इसने दूतों के यातायात द्वारा गौडदेश के राजा से मिलकर राजद्रोह करने की सोची। ऐसा कहकर राजा ने रानी अशोकमती की बनावटी बातें सभा में सुना दीं। इसके अतिरिक्त उसने अन्य लोगों को हटाकर अत्यन्त आत्मीय व्यक्तियों से रानी अशोकमती के सतीत्व-नाश करने की उसकी चेष्टा भी स्पष्ट कर दी ॥१३७—१४०॥ तब गुणशर्मा ने कहा—'राजन् आपको यह झूठी बात किसने कह दी। और, यह आकाश-चित्र किसने बनाया ॥१४१॥ यह सुनते ही राजा ने कहा—'हे पापी यदि यह सच नहीं है, तो भोजन-पात्र के अन्दर पड़े हुए विष का पता तुम्हें कैसे चला ? ॥१४२॥ बुद्धि से सब कुछ जाना जा सकता है' गुणशर्मा के इस प्रकार कहने पर उसके शत्रु अन्य मन्त्री बोले—'यह असम्भव है महाराज ! 'तत्व की खोज किये बिना आपको ऐसा न कहना चाहिए। राजा और वह भी विवेक-हीन हो तो प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता' ॥१४३-१४४॥ गुणशर्मा जब यह कह ही रहा था कि राजा ने उठकर उस पर छुरे का प्रहार करते हुए कहा कि 'तू बड़ा ढीठ है' ॥१४५॥ गुणशर्मा ने करभ प्रयोग १ (कलावाजी) से उस प्रहार को बचा लिया यह देखकर अन्य दरबारियों ने भी उस पर छुरे से प्रहार कर दिया ॥१४६॥ आश्चर्यजनक कलावाज गुणशर्मा ने अपनी विचित्र कला से उन सबकी छुरियां छीन लीं और उन्हें ही सिर के बालों से आपस में बाँध दिया ॥१४७-१४८॥ १ करभ-प्रयोग, एक प्रकार की पैंतरेबाजी।

कथासरित्सागर

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कथासरित्सागर निर्ययौ च ततस्तस्याः प्रसभं नृपसंसदः। अश्वान क्षतमात्रं च योधानामनुधावताम् ॥१४९॥ ततो दत्त्वाञ्चलस्य तदन्तर्धानाञ्जनं दृशोः। अदृश्यः प्रययौ तस्माद्देशात्तत्क्षणमेव सः ॥१५०॥ दक्षिणापथमुद्दिश्य गच्छंश्चाचिन्तयत्पथि। नूनं तयाशोकवत्या मूढोऽसौ प्रेरितो नृपः ॥१५१॥ अहो विषादप्यधिकाः स्त्रियो रक्तविमानिताः। अहो असेव्याः साधूनां राजानोऽतत्त्वदर्शिनः ॥१५२॥ इत्यादि चिन्तयन्प्राप गुणशर्मा कथञ्चन। ग्रामं तत्र वटस्याधो ददर्शैकं द्विजोत्तमम् ॥१५३॥ शिष्यानध्यापयन्तं समुपसृत्याभ्यवादयत्। सोऽपि तं विहितातिथ्यः पप्रच्छ ब्राह्मणः क्षणात् ॥१५४॥ हे ब्रह्मन्कतमां शाखामधीषे कथ्यतामिति। ततः स गुणशर्मा तं ब्राह्मणं प्रत्यवोचत ॥१५५॥ पठामि द्वादश ब्रह्मन् शाखा द्वे सामवेदतः। ऋग्वेदाद्द्वे यजुर्वेदात्सप्त चैकामथर्वतः ॥१५६॥ तच्छ्रुत्वा तर्हि वेत्थस्त्वमित्युक्त्वा ब्राह्मणोऽथ सः। आकृत्या कथितोत्कर्षं प्रहृष्टः पप्रच्छ तं पुनः ॥१५७॥ को देशः कोऽन्वयो ब्रूहि जन्मनामश्रुतंस्तव। किं ते नाम कथं वेत्थस्त्वमधीतं क्व वा वद ॥१५८॥ गुणशर्मणो जन्मवृत्तान्तम् तच्छ्रुत्वा गुणशर्मा तमुवाचोज्जयिनीपुरि। आदित्यशर्मनामासीत्कोऽपि ब्राह्मणपुत्रकः ॥१५९॥ पिता तस्य च बालस्य सतः पञ्चत्वमाययौ। माता तेन समं पत्या विवेश च हुताशनम् ॥१६०॥ ततः स ववृधे तस्यां पुरि मातुसवेश्मनि। सादित्यशर्माधीयानो वेदान्विद्याः कलास्तथा ॥१६१॥ प्राप्तविद्यस्य तस्याथ जपव्रतनिषेविणः। प्रव्राजकेन केनापि सख्यं समुदपद्यत ॥१६२॥ स परिव्राट् समं तेन मित्रेणादित्यशर्मणा। गत्वा पितृवने होमं यक्षिणीसिद्धये व्यधात् ॥१६३॥

[Header: षष्ठम लम्बक, ४०७]

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[Header: षष्ठम लम्बक, ४०७]

तदनन्तर गुणधर्मा बलपूर्वक सबको विवश करके राजसभा से निकल गया और उसका पीछा करते हुए एक सौ ग्यारह सिपाहियों को भी उसने मार डाला॥१४९॥ तब आँख में बचे हुए अंजन को लगाकर वह अन्तर्धान होकर उसी क्षण उस देश से बाहर चला गया ॥१५०॥ दक्षिण-पथ की ओर जाते हुए उसने मार्ग में सोचा कि 'रानी अधोकवती ने अवश्य उस मूर्ख को उकसाया है' ॥१५१॥ प्रेमी द्वारा अपमानित स्त्रियां विष से भी अधिक भीषण होती हैं और असत्प्रवर्ती (अविवेकी) राजा भी सज्जनों के लिए सेवनीय नहीं होते ॥१५२॥ ऐसा सोचता हुआ गुणधर्मा एक गाँव में पहुँचा और वहाँ उसने वटवृक्ष के नीचे बैठे हुए एक ब्राह्मण को देखा जो शिष्यों को पढ़ा रहा था। उसके पास जाकर गुणधर्मा ने प्रणाम किया। उस ब्राह्मण ने भी उसका स्वागत-सत्कार करके पूछा—'हे ब्राह्मण देवता! कौन-सी शाखा का अध्ययन करते हो बताओ। तब गुणधर्मा उस ब्राह्मण से कहने लगा—'हे विद्वान्! मैं बारह शाखाओं का अध्ययन करता हूँ। दो सामवेद से दो ऋग्वेद से सात यजुर्वेद से और एक अथर्व से ॥१५३—१५६॥ यह सुनकर वह ब्राह्मण बोला-'तब तो तुम देवता-स्वरूप हो। प्रभावशाली आकृति से उत्कृष्ट प्रतीत होते हुए गुणधर्मा से ब्राह्मण ने पुनः नम्रतापूर्वक कहा—'यह तो बताओ कि तुम अपने जन्म से कौन-सा देश और कौन-सा कुल अलंकृत करते हो? और तुम्हारा नाम क्या है। तुमने कहाँ पढ़ा? ॥१५७–१५८॥

गुणधर्मा का जन्म-वृत्तान्त

यह सुनकर गुणधर्मा कहने लगा—"उज्जयिनी नगरी म आदित्यधर्मा नाम का एक ब्राह्मण-कुमार रहता था ॥१५९॥ बाल्यकाल में ही उसके पिता की मृत्यु हो गई और उसकी माता उसी के साथ सती हो गई ॥१६०॥ तब वह आदित्यधर्मा वेदों और कलाओं का अध्ययन करता हुआ उसी नगरी में अपने मामा के घर पर रहने लगा ॥१६१॥ विद्याध्ययन के अनन्तर मन्त्र की बात करनेवाले आदित्यधर्मा की मित्रता एक संन्यासी के साथ हो गई ॥१६२॥ वह संन्यासी उस मित्र आदित्यधर्मा के साथ यक्षिणी की सिद्धि के लिए श्मशान में जाकर हवन करता था ॥१६३॥

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तत्र तस्याविरासीच्च कार्तस्वरविमानगा। वरकन्यापरिवृता दिव्यकन्या स्वलङ्कृता॥१६४॥ सा तं मधुरया वाचा बभाषे मस्करिग्रहम्। विद्युन्मालेत्यभिधा यक्षी यक्ष्यश्चापरा इमाः॥१६५॥ तदितो मत्परिवाराद् गृहाणैकां यथारुचि। एतावदेव सिद्धं ते मन्त्रसाधनयानया॥१६६॥ त्वया हि नैव विज्ञातं पूर्णं मन्मन्त्रसाधनम्। अतोऽहं ते न सिद्धैव मान्थ क्लेशं वृथा कृथाः॥१६७॥ एवमुक्तस्तया यक्ष्या परिव्राडनुमान्य सः। यक्षिणीमग्रहीदेकां तस्मात्तत्परिवारात· ॥१६८॥ ततश्च विद्युन्माला सा तिरोभूतां च यक्षिणीम्। आदित्यशर्मा पप्रच्छ सिद्धां प्रव्राजकस्य या॥१६९॥ अप्यस्ति विद्युन्मालातो यक्षिणी काचिदुत्तमा। तन्मुखा यक्षिणी सा तं प्रत्युवाचास्ति सुन्दर॥१७०॥ विद्युन्माला चन्द्रलेखा तृतीया च सुलोचना। उत्तमा यक्षिणीष्वेता एतास्वपि सुलोचना॥१७१॥ इत्युक्त्वा सा यथाकालमागन्तुं यक्षिणी ययौ। आदित्यशर्मणा साकमगात्प्रव्राट् च तद्गृहम्॥१७२॥ तत्र प्रतिदिनं तस्मै प्रीता प्रव्राजकाय सा। प्रायच्छद्यक्षिणी भोगानिष्टान्कालोपगामिनी॥१७३॥ एकदादित्यशर्मा च प्रव्राजकमुखेन ताम्। सुलोचनामन्त्रविधिं को जानातीति पृष्टवान्॥१७४॥ सापि तन्मुख एवास्मन्मक्षिप्येव किलाब्रवीत्। अस्ति तुम्बवनं नाम स्थानं दक्षिणदिङ्मुखे॥१७५॥ तत्रास्ति विष्णुगुप्ताख्यो वणातीरकृतास्पदः। प्रव्राजको भदन्तान्यः स सङ्केत्ति सविस्तरम्॥१७६॥ श्रुत्वैतद्यक्षिणीवाक्यात्तं देशं सोत्सुको ययौ। आदित्यशर्मानुगतः प्रीत्या प्रव्राजकेन सः॥१७७॥ तत्रान्विष्य यथावृत्तं भदन्तमभिगम्य च। परिचर्यापरो भक्त्या त्रीणि वर्षाण्यसेवत॥१७८॥

अष्टम लम्बक ४०९

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अष्टम लम्बक ४०९ श्मशान-भूमि में सोने के विमान में बैठी हुई और सुन्दरी कन्याओं से घिरी हुई एक दिव्य कन्या प्रकट हुई ॥१६४॥ वह कन्या मधुर वाणी द्वारा उस संन्यासी से बोली—'हे संन्यासी ! मैं विद्युन्माला नाम की यक्षिणी हूँ और ये भी दूसरी यक्षिणियाँ हैं ॥१६५॥ सो तुम मेरे परिवार में इच्छानुसार एक यक्षिणी को ले लो। तुम्हारी मन्त्र-साधना से इतनी ही सिद्धि हुई है ॥१६६॥ तुमने मेरे मन्त्र की विधि पूर्ण रूप से नहीं जानी। इसलिए, मैं तुम्हें सिद्ध नहीं हो सकी। अब तुम दूसरा कष्ट व्यर्थ न उठाओ' ॥१६७॥ उस यक्षिणी विद्युन्माला द्वारा इस प्रकार कहे गये संन्यासी ने उसकी बात मान ली और उसके परिवार से एक यक्षिणी ले ली ॥१६८॥ तदनन्तर, विद्युन्माला अदृश्य हो गई। तब आदित्यशर्मा ने उस यक्षिणी से जो उस संन्यासी को सिद्ध हुई थी पूछा—॥१६९॥ 'क्या विद्युन्माला से भी बढ़कर और कोई उत्तम यक्षिणी है ? तब वह बोली—'सुन्दर ! उत्तम यक्षिणियों में विद्युन्माला चन्द्रलेखा और सुलोचना तीन हैं। इन तीनों में भी सुलोचना अत्युत्तम है ॥१७०-१७१॥ इस प्रकार कहकर वह यक्षिणी यथासमय आने के लिए चली गई और वह संन्यासी आदित्यशर्मा के साथ उसके घर गया ॥१७२॥ तदनन्तर, प्रतिदिन नियत समय पर आनेवाली वह यक्षिणी प्रसन्न होकर उस परिव्राजक को अभीष्ट भोगों का प्रदान करती थी ॥१७३॥ एक बार आदित्यशर्मा ने परिव्राजक के द्वारा उस यक्षिणी से पूछा कि 'सुलोचना को सिद्ध करने की मन्त्रविधि को कौन जानता है' ॥१७४॥ उस यक्षिणी ने आदित्यशर्मा के सामने ही कहा—'दक्षिण दिशा की भूमि में गुल्मवन नाम का स्थान है। वहाँ पर वेणा नदी के किनारे स्थान बनाकर विद्युन्मुख नाम का मटन्थ (बौद्ध संन्यासी) रहता है। वह उसकी विधि को विस्तारपूर्वक जानता है' ॥१७५-१७६॥ यक्षिणी के मुँह से यह सुनकर उत्सुक आदित्यशर्मा प्रव्राजक के साथ वहाँ गया। वहाँ जाकर, और मटन्थ को ढूँढ़कर वह उसके समीप ही रहने लगा। तत्पश्चात् उसने तीन वर्षों तक भक्ति- पूर्वक उसकी सेवा की ॥१७७-१७८॥ ५२

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उपाचरच्च यक्षिण्या परिव्राट्सिद्धया तया। यथोपयोगोपहृतैरुपचारैरमानुषैः ॥१७९॥ ततस्तुष्टो भदन्तोऽसौ तस्माआदित्यशर्मणे। ददौ सुलोचनामन्त्रमभित सविधानकम् ॥१८०॥ ततश्चादित्यशर्मा स मन्त्रं प्राप्य समाप्य च। होमं चकार सम्पूर्णं गत्वैकान्ते यथाविधि ॥१८१॥ ततस्तस्य विमानस्था यक्षिणी सा सुलोचना। प्रादुर्वभूव रूपेण जगदाश्चर्यदायिना ॥१८२॥ जगाद चैतमेहोहि सिद्धाऽहं तव किं पुनः। षण्मासं कन्यकाभावो नापनेयो मम त्वया ॥१८३॥ यदि मत्तो महावीर्यमृद्धिपात्रं सुलक्षणम्। सर्वज्ञकल्पमजितं पुत्रं सम्प्राप्तुमिच्छसि ॥१८४॥ इत्युक्त्वा सा तथेत्येनमुक्तवन्तं च यक्षिणी। आदायादित्यशर्माणं विमानेनालकां ययौ ॥१८५॥ स च तत्र समीपस्थां तांन्नपश्यन्नास्त सर्वदा। आदित्यशर्मा षण्मासानसिधाराव्रतं चरन् ॥१८६॥ ततस्तुष्टो धनाध्यक्षो दिव्येन विधिना स्वयम्। आदित्यशर्मणे तस्मै व्यतरत्तां सुलोचनाम् ॥१८७॥ तस्यां तस्य द्विजस्यात्र जातोऽयमहमात्मजः। पित्रा च मे कृतं नाम गुणशर्मेति सद्गुणात् ॥१८८॥ ततस्तत्रैव यक्षाधिपतेर्मणिधराभिधात्। क्रमाद्वेदाश्च विद्याश्च कलाश्चाधिगता मया ॥१८९॥ अथैकदा किमप्यागाच्छक्रोऽत्र धनवान्तिकम्। उत्तस्थुश्च तं दृष्ट्वा ये तत्रासत केचन ॥१९०॥ मत्पितादित्यशर्मा तु तत्कालं विधियोगतः। अन्यत्र गतचित्तत्वान्नोदतिष्ठत्ससम्भ्रमः ॥१९१॥ ततस्तमशपत्क्रुद्धः स शक्रो द्विजड प्रज। स्वमेव मर्त्यलोकं त गेहुं योग्यो भवानिति ॥१९२॥ प्रणिपत्यानुनीतोऽथ स सुलोचनया तया। शक्रोऽब्रवीत्तर्हि मा गान्मर्त्यलोकमयं स्वयम् ॥१९३॥

सप्तम लम्बक ४११

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सप्तम लम्बक ४११ उस समय पहले संन्यासी की सिद्ध की गई यक्षिणी ही दिव्य उपचारों से उसकी सेवा करती रही ॥१७९॥ तब सेवा से सन्तुष्ट महन्त ने आदित्यशर्मा को सुलोचना की सिद्धि का मन्त्र और उसका विधान बता दिया ॥१८०॥ आदित्यशर्मा ने भी मंत्र प्राप्त करके और उसका नियमित जप समाप्त करके एकान्त में जाकर विधिपूर्वक हवन किया ॥१८१॥ तदनन्तर, जगत् के लिए आश्चर्यजनक रूपवाली सुलोचना यक्षिणी विमान पर बैठकर उसके सामने प्रकट हुई ॥१८२॥ और उससे बोली-'आओ आओ। मैं तुम्हें सिद्ध हो गई हूँ किन्तु छह महीनों तक तू मेरा कन्याभाव नष्ट न करना ॥१८३॥ यदि तुम मुझसे महावीर, सम्पत्तिशाली सुन्दर कंचनमाला सर्वज्ञ और अजेय पुत्र प्राप्त करना चाहते हो' ॥१८४॥ 'ऐसा ही करूँगा'—कहते हुए उस आदित्यशर्मा को वह यक्षिणी विमान द्वारा अलका नगरी को ले गई ॥१८५॥ तदनन्तर, वह आदित्यशर्मा छह महीनों तक पास में बैठी हुई उसको देखते हुए नियमा- नुसार असिधारा-व्रत करता रहा ॥१८६॥ उसके ब्रह्मचर्य-व्रत से सन्तुष्ट होकर कुबेर ने विधिपूर्वक वह सुलोचना यक्षिणी आदित्यशर्मा को दान कर दी ॥१८७॥ तब उसी सुलोचना यक्षिणी के गर्भ में उस ब्राह्मण द्वारा मैं उत्पन्न हुआ और मेरे पिता ने मेरे सद्गुणों के कारण मेरा नाम गुणशर्मा रख दिया ॥१८८॥ तब बड़ा होकर मैंने अलका नगरी में ही यक्षों के सरदार मनिभद्र से समग्र वेदों, अन्यान्य विद्याओं और कलाओं का अध्ययन किया ॥१८९॥ एकबार किसी कार्य के लिए इन्द्र कुबेर के पास आया। उसे देखकर जो भी बैठे थे उठ खड़े हुए ॥१९०॥ किन्तु वहाँ बैठे हुए मेरे पिता आदित्यशर्मा अन्यमनस्कता के कारण कुछ सोचते रह गये वे सम्मान के समय उठे नहीं ॥१९१॥ इस कारण क्रोध करके इन्द्र ने कहा—'रे जड़ तू अपने मर्त्यलोक में ही जा। तू यहाँ रहने योग्य नहीं है' ॥१९२॥ तब माता सुलोचना की करुण प्रार्थना करने पर इन्द्र ने कहा-यदि ऐसा है, तो यह न जाये इसका पुत्र ही जाय—॥१९३॥

४१२ कथासरित्सागर

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४१२ कथासरित्सागर एतत्पुत्रस्तु यात्वेष पुत्रो भार्यैव बध्यते। मा भूद्भवचनं मोघमित्युक्त्वेन्द्रः शमं ययौ॥१९४॥ अतः पित्राहमानीय निजमातुलवेश्मनि। उज्जयिन्यां विनिक्षिप्तो भवितव्यं हि यस्य यत् ॥१९५॥ तत्राजायत सख्यं मे राजाश्रत्येन दैवतः। ततोऽत्र मम यद्वृत्तं तत्सर्वं शृणु वच्मि ते ॥१९६॥ इत्युक्त्वामूर्त्ववृत्तान्तं यदशोकवतीप्रसम् । यच्च राज्ञा कृतं तस्य मुदान्तं तदवर्णयत् ॥१९७॥ पुनश्चोवाच स ब्रह्मन्नित्थमस्मि पलायितः। देशान्तरं व्रजन्मार्गे भवन्तमिह दृष्टवान् ॥१९८॥ श्रुत्वैतद्ब्राह्मणस्तं स गुणशर्माणमभ्यधात्। तर्हि धन्योऽस्मि संवृत्तस्त्वदभ्यागमनात्प्रभो ॥१९९॥ तदेहि मे गृहं तावदग्निदत्तं च विद्धि माम्। नाम्ना मवप्रहारश्च ग्रामोऽयं निर्वृतो भव ॥२००॥ इत्युक्त्वा सोऽग्निदसस्तं गृहं प्रावेशयद्द्विजम्। ऋद्धिमद्गुणशर्माणं बहुगोमहिषीहयम् ॥२०१॥ तत्र स्नानाङ्गरागाभ्यां वस्त्रैराभरणैश्च तम्। अतिथिं मानयामास भोजनैर्विविधैश्च सः ॥२०२॥ अदर्शयच्च तस्मै स्वां काम्यरूपां सुरैरपि। लक्षणावेक्षणमिपात्सुन्दरीं नाम कन्यकाम् ॥२०३॥ गुणशर्मापि सोऽन्यत्समरूपां विलोक्य ताम्। सपत्न्योऽस्या भविष्यन्तीत्यन्निदत्तमुवाष तम् ॥२०४॥ नासायां तिलकोऽस्त्यस्यास्तत्सम्बन्धो भविष्यहम्। उरस्यस्ति द्वितीयोऽपि तयोश्चैतत्फलं विदुः ॥२०५॥ एवं तेनोक्ति सम्प्रा भ्रात्रा पितुरनुज्ञया। उद्घाटयत्युरो यावत्तावत्तिलकमदक्षत ॥२०६॥ ततोऽग्निदत्तः साश्चर्यो गुणशर्माणमभ्यधात्। सर्वज्ञस्त्वमिमो स्वस्यास्तिसको नानुमप्रभो ॥२०७॥ गपरम्यो हि भवन्तीह प्रायः धीमति भर्तरि। दरिद्रो विमुयादेशमपि कष्टं शुना यह ॥२०८॥

अष्टम लम्बक ४१५

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अष्टम लम्बक ४१५ क्योंकि, पुत्र आत्मा ही होता है। मेरा वचन व्यर्थ न जाय। इतना कहकर इन्द्र शान्त होगया ॥१९४॥ तब पिता ने मुझे उज्जयिनी में लाकर मामा के घर रख दिया जिसका जैसा भवितव्य है वैसा होता ही है॥१९५॥ उज्जयिनी में रहते हुए दैवयोग से वहाँ के राजा के साथ मेरी मित्रता हो गई। गुणशर्मा ने इस प्रकार अपना मूल समाचार कहकर रानी अशोकावती और राजा द्वारा किये गये युद्ध पर्यन्त की कथा उस ब्राह्मण से कह दी ॥१९६-१९७॥ और फिर बोला—'हे ब्राह्मण देवता इस प्रकार मैंने उज्जयिनी से भागते हुए मार्ग में आपके दर्शन किये' ॥१९८॥ यह सुनकर वह ब्राह्मण गुणशर्मा से बोला—'हे प्रभो यदि ऐसा है, तो तुम्हारे आगमन से मैं धन्य हो गया ! ॥१९९॥ आप मेरे घर पधारें। मेरा नाम अग्निदत्त है। यह गाँव भी मेरे ही नाम से है। अब आप निश्चिन्त हो जायें' ॥२००॥ इतना कहकर अग्निदत्त धन-धान्य गौ-भैंस और घोड़ों आदि से भरे हुए अपने घर में गुणशर्मा को ले गया ॥२०१॥ वहाँ ले जाकर उसने उबटन मालिश स्नान तथा सुन्दर वस्त्राभरणों एवं इत्र से गुणशर्मा का स्नेह-पूर्ण सम्मान किया और विविध प्रकार के भोजन कराये ॥२०२॥ तदनन्तर, लगन दिखाने के बहाने उसने देवताओं से भी चाही जानेवाली अपनी सुन्दरी कन्या उसको दिखा दी ॥२०३॥ अनुपम सुन्दरी उस कन्या के लक्षणों को देखकर गुणशर्मा ने कहा—'इसकी बहुत-सी सपत्नियां (सौतें) होंगी ॥२०४॥ इसकी नाक पर तिल है, इस कारण मैं ऐसा कह रहा हूँ और इसकी छाती में भी तिल है। यह फल उसी का है' ॥२०५॥ गुणशर्मा के ऐसा कहने पर उसके भाई ने पिता की आज्ञा से उसकी छाती खोलकर देखी, तो वहाँ तिल दिखाई दिया ॥२०६॥ तब पण्डित अग्निदत्त ने गुणशर्मा से कहा—'तुम सचमुच सर्वज्ञ हो किन्तु इसके ये दोनो तिल अशुभ फल देनेवाले नहीं हैं ॥२०७॥ पति के धनवान् होने पर ही सौतें होती हैं। दरिद्र तो एक स्त्री का भरण-पोषण भी कष्ट से करता है। बहुत-सी स्त्रियों की तो बात ही क्या' ॥२०८॥

४१४ कथासरित्सागर

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४१४ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा गुणशर्मा तं प्रत्युवाच यथातथ भो । सुलक्षणाय ईदृश्या ह्याकुबेरशुभं कुतः ॥२०९॥ इत्यूचिवानप्रसङ्गेन पृष्टस्तस्मै शशंस सः । प्रत्यङ्गं तिलकादीनां फलं स्त्रीपुंसयोः पृथक् ॥२१०॥ यदा च गुणशर्माणं तं सा दृष्ट्वैव सुन्दरी । इत्येष पातु दृष्ट्यैव चकोरीवेन्दुमुत्सुका ॥२११॥ ततोऽग्निदत्तो विजने गुणशर्माणमाह तम् । महाभाग वदाम्येतां कल्यां ते सुन्दरीमहम् ॥२१२॥ मा गा विदेशं तिष्ठेह गृहे मम यथासुखम् । एतत्तद्वचनं श्रुत्वा गुणशर्माप्युवाच तम् ॥२१३॥ सत्यमेवं कृते किं किं न सौख्यं मम किं तु माम् । मिथ्याराजावमानाग्नितप्तं प्रीणाति नैव तत् ॥२१४॥ कान्ता चन्द्रोदयो वीणा पञ्चमध्वनिरित्यमी । ये मन्दयन्ति सुखितांस्तुषितान्यधयन्ति ते ॥२१५॥ जाया च स्वरसा रक्ता भवेदव्यभिचारिणी । अवशा पितृवत्ता तु स्यादशोकवती यथा ॥२१६॥ इतः प्रवेशानिकटा सा किं चोज्जयिनी पुरी । तद्वृद्धया स नृपो जातु मम कुर्यादुपद्रवम् ॥२१७॥ तत्परिभ्रम्य तीर्थानि प्रक्षाल्याजमकल्बिषम् ॥ शारीरमेतन्त्यक्ष्यामि भविष्याम्यथ निर्वृतः ॥२१८॥ इत्युक्तवन्तं प्रत्याह सोऽग्निदत्तो विहस्य तम् । तवापि मोहो यत्रेवृत्तत्रान्यस्य किमुच्यताम् ॥२१९॥ अज्ञावमानाद्दानिः का वद शुद्धाशयस्य ते । पङ्को हि नभसि क्षिप्तः क्षप्तुः पतति मूर्धनि ॥२२०॥ राजैव सोऽचिरात्प्राप्स्यत्यविशेषज्ञताफलम् । मोहान्धमविवेकं हि धीदिपराय न छेदते ॥२२१॥ किं चाशोकवतीं दृष्ट्वा वैरस्यं स्त्रीषु यत्तव । सतीं दृष्ट्वा न किं तासु श्रद्धां बध्नासि च रुदाणम् ॥२२२॥ निकटोञ्जयिनी वा चेत्तन्न दास्याम्यहं तथा । यथा त्वामिह तिष्ठन्तं नैव ज्ञास्यति कश्चन ॥२२३॥

अष्टम लम्बक ४१५

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अष्टम लम्बक ४१५ यह सुनकर गुणशर्मा ने कहा—'ठीक है, ऐसी सुन्दर लक्षणोंवाली कन्या का वधुत्व ही क्यों होगा ? ॥२१०॥ इसी प्रसंग में अग्निदत्त के पूछने पर गुणशर्मा ने स्त्रियों और पुरुषों के भिन्न-भिन्न अंगों पर होनेवाले तिल आदि चिह्नों का पृथक्-पृथक् फल उसे बताया ॥२११॥ इधर वह सुन्दरी कन्या गुणशर्मा को देखकर चन्द्रमा को चकोरी जैसी आँखों से पी जाना चाहती थी ॥२१२॥ तब अग्निदत्त ने एकान्त में गुणशर्मा से कहा—'हे भाग्यशालिन्, मैं इस सुन्दरी नाम की कन्या को तुझे देता हूँ ॥२१३॥ विदेश न जाओ और यहीं मेरे घर में अपनी स्वतन्त्रता से रहो। उसकी यह बात सुनकर गुणशर्मा बोला—'सच है, ऐसा करने पर मुझे कौन-सा सुख प्राप्त नहीं हो सकता किन्तु राजा द्वारा किये गये झूठे अपमान की आग से जले हुए मुझे यह सब अच्छा नहीं लग रहा है॥२१४-२१५॥ सुन्दरी स्त्री चन्द्रमा का उदय (चाँदनी) और वीणा की पंचम ध्वनि ये सब सुखी जनों को आनन्द देते हैं॥२१५॥ स्वयं (अपने से) आसक्त और अनुरागिणी स्त्री व्यभिचारिणी नहीं होती जैसे अशोक- वती ॥२१६॥ और भी बात है कि उज्जयिनी नगरी यहाँ से समीप है। इसलिए, मुझे यहाँ जानकर वह (राजा) किसी समय भी उपद्रव कर सकता है ॥२१७॥ अतः तीर्थों का भ्रमण करके और अपने पापों का प्रक्षालन कर इस शरीर को छोड़ूँगा तब सुखी हूँगा ॥२१८॥ यह सुनकर अग्निदत्त हँसकर बोला—'शुद्ध हृदयवाले तुम्हारे, एक मूर्ख के द्वारा अपमानित होने में क्या हानि है ? आकाश में फेंका हुआ कीचड़ फेंकनेवाले के सिर पर ही गिरता है। वह राजा शीघ्र ही अपनी मूर्खता का फल पायेगा। मोह से अन्धे और विवेक से विहीन व्यक्ति के पास लक्ष्मी अधिक दिन नहीं रहती ॥२१९-२२१॥ यदि तुम दुष्टा अशोकवती को देखकर स्त्रियों से विरक्त हो गये हो तो सती स्त्री को देखकर श्रद्धा भी उन पर क्यों नहीं करते ? तुम तो सती और असती के लक्षणों को जानते हो ॥२२२॥ उज्जयिनी यदि समीप है, तो तुम्हारा ऐसा प्रबन्ध करूँगा कि तुम्हें यहाँ रहते कोई जान न सकेगा ॥२२३॥

४१९ कथासरित्सागर

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४१९ कथासरित्सागर तीर्थयात्रा सवष्टावा सञ्छस्ता तस्य सा बुधैः। सम्पत्तिविधिभङ्गः स्याद्वैदिके यस्य कर्मणि॥२२४॥ अन्यथा देवपित्रग्निप्रियाव्रतजपादिभिः। गृहे या पुण्यनिष्पत्तिः साध्वनि भ्रमतः कुतः॥२२५॥ भुजोपधाना भूशायी भिक्षाशी केवलोऽशनः। मुनेः समत्वं प्राप्यापि न क्लेशैर्मुच्यतेऽध्वगः॥२२६॥ देहत्यागात्सुखं यद्वा वाञ्छस्येष तव भ्रमः। इतः कष्टतरं दुःखममुत्र ह्यात्मघातिनाम्॥२२७॥ तदेषोऽनुचितो मोहो यूनश्च विदुषश्च ते। स्वयं विचारयावश्यं कर्तव्यं मद्वचस्तव॥२२८॥ कारयामीह गुप्तं ते भूगृहं पृथु सुन्दरम्। विवाह्य सुन्दरीं तत्र तिष्ठाज्ञातो यथेच्छसि॥२२९॥ इति तेनाग्निवत्तेन बोधितः स प्रयत्नतः। गुणशर्मा सभ्येत्येतत्प्रतिपद्य जगाद तम्॥२३०॥ कृतं मया ते वचनं को भार्या सुन्दरीं त्यजेत्। किं त्वेतामकृती नाहं परिणेष्यामि ते सुताम्॥२३१॥ आराधयाम्यहं तावद्देवं कञ्चित्सुसंयतः। येन तस्य कृतघ्नस्य राज्ञः कुर्यां प्रतिक्रियाम्॥२३२॥ इति तद्वचनं हृष्टः सोऽग्निवत्तोऽन्वमन्यत। सोऽपि तां गुणशर्माणि विशश्राम सुखं निशाम्॥२३३॥ अन्येद्युश्चाग्निवत्तोऽस्य सौख्यार्थं तत्र गुप्तिमत्। पातालवसतिप्रख्यं कारयामास भूगृहम्॥२३४॥ तत्रस्थश्चाग्निवत्तं स गुणशर्माब्रवीद्ग्रहः। इहान्तर्ब्रूहि कं देवं केन मन्त्रेण भक्तितः॥२३५॥ आराधयाम्यहं तावद्वरदं व्रतचर्यया। इत्युक्तवन्तं तं धीरमग्निवत्तोऽभ्यभाषत॥२३६॥ अस्ति स्वामिकुमारस्य मन्त्रो मे गुरुचोदितः। तेनाराधय तं देवं सेनान्यं तारकान्तकम्॥२३७॥ यस्य जन्माग्निभिर्देवैः प्रथितं शत्रुपीड़ितैः। दग्धोऽपि कामः सङ्कल्पजन्मा स्वर्गेण निर्मितः॥२३८॥

षष्ठम लम्बक ४१७

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षष्ठम लम्बक ४१७ तीर्थ-यात्रा तुम्हें अभीष्ट है, किन्तु विद्वानों के कथनानुसार तीर्थ-यात्रा उसके लिए उचित है, जिसके पास वैदिक कर्म करने के लिए प्रचुर सम्पत्ति नहीं है ॥२२४॥ अन्यथा देवता, पितर, अग्नि की सेवा, व्रत एवं जप आदि से घर बैठे जो पुण्य की प्राप्ति हो सकती है, वह मार्ग में भटकनेवाले तीर्थयात्रियों को नहीं ॥२२५॥ भुजाओं की तकिया लगाये भूमि पर सोनेवाला, भिक्षाओं से भोजन प्राप्त करनेवाला, अकेला और दीन यात्री मुनियों की समता पाकर भी कष्टों से छुटकारा नहीं पाता ॥२२६॥ देह-त्याग से तुम जो सुख चाहते हो, वह तुम्हारी भूल है। आत्मघाती को परलोक में भी अत्यधिक कष्ट उठाने पड़ते हैं ॥२२७॥ अतः युवा और विद्वान् तुम्हारा यह निरा मोह है। स्वयं सोचो और मेरी बात मानो ॥२२८॥ मैं तुम्हारे लिए विशाल विस्तृत भू-गृह बनवा देता हूँ। तुम सुन्दरी से विवाह करके वहाँ अज्ञात रूप से रहो, जैसा तुम चाहते हो ॥२२९॥ अग्निदत्त द्वारा इस प्रकार समझाये गये गुणशर्मा ने उसकी बात मान ली और उससे कहा कि मैंने तुम्हारी बात मान ली। सुन्दरी जैसी पत्नी को कौन छोड़ सकता है। किन्तु असफल अवस्था में मैं तुम्हारी कन्या से विवाह न करूँगा। तबतक संयत स्थिति में रहकर किसी देवता की आराधना करता हूँ। जिससे उस कृतघ्न राजा से बदला ले सकूँ ॥२३०-२३२॥ प्रसन्न चित्त अग्निदत्त ने उसकी बात मान ली और गुणशर्मा ने भी उसके घर में रात्रि को सुखपूर्वक विश्राम किया ॥२३३॥ दूसरे ही दिन अग्निदत्त ने गुणशर्मा की सुविधा के लिए रक्षायुक्त और आवश्यकताओं से परिपूर्ण 'पाताल-वसति' नामक भू-गृह बनवाया ॥२३४॥ उस गृह में रहते हुए एक बार गुणशर्मा ने अग्निदत्त से एकान्त में कहा- यह बताइए कि मैं यहाँ रहकर किस देवता की भक्ति और व्रत विधानानुसार आराधना करूँ? ऐसा कहते हुए धैर्यशाली गुणशर्मा से अग्निदत्त ने कहा-'मैं गुरु द्वारा दीक्षा में प्राप्त स्वामी कार्तिक का मन्त्र जानता हूँ। उस मन्त्र से तुम तारक (तारकासुर)-निहन्ता देवसेनापति (कार्तिकेय) की आराधना करो ॥२३५-२३७॥ जिन कार्तिकेय के जन्म को चाहनेवाले असुरों से पीड़ित देवताओं द्वारा भेजे गये कामदेव को शिव ने दग्ध करके भी सफलप्रयत्न बना दिया ॥२३८॥ ५३

१८ कथासरित्सागरं

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१८ कथासरित्सागरं महेश्वरादग्निकुण्डाद्वने शरवणादपि। कृत्तिकाभ्यश्च शंसन्ति विचित्रं यस्य सम्भवम्॥२३९॥ जातेनैव जगत्कृत्स्नं क्षुब्धधैर्येण तेजसा। आनम्य येन निहतो दुर्जयस्तारकासुरः॥२४०॥ तन्मन्त्रमिममावृत्स्व मत्त इत्यभिधाय सः। अग्निवस्तो ददौ तस्मै मन्त्रं तं गुणशर्मणे॥२४१॥ सेनाराधितवांस्कन्दं गुणशर्मा स भूगृहे। तयोपचर्यमाणः सन्सुन्दर्या नियतव्रतः॥२४२॥ ततः प्रत्यक्षतामेत्य साक्षादेव स षण्मुखः। तुष्टोऽस्मि ते वरं पुत्र वृणीष्वेति तमादिशत्॥२४३॥ २४४॥ अक्षीणकोशो भूत्वा च महासेनं विजित्य च। गत्वाप्रतिहतः पुत्र पृथ्वीराज्यं करिष्यसि॥२४५॥ इति दत्त्वाधिकं तस्मै वरं स्कन्दस्तिरोदधे। सम्प्राप्ताक्षयकोषश्च गुणशर्मापि सोऽभवत्॥२४६॥ पृष्ट्वा सद्यः स्वमहिमोचितयाग्निवत्त— विप्रात्मजामनुविनाधिकबद्धभावाम् ॥ मान्मथसिद्धिमिव रूपवतीमुपेतां। तां सुन्दरीं स सुकृती विधिनोपयेमे॥२४७॥ अक्षीणकोशनिचयप्रभवप्रभावात् । सम्भूतभूरिगजबजिपदातिसैन्यः । दानप्रसादमिलिताखिलपार्थिवानां । रुन्धन्बलेरवनिमुज्जयिनीं जगाम॥२४८॥ प्रख्याप्य तस्यां तदशोकवत्याः प्रजास्वशीलं समरे च भूपम्। जित्वा महासेनमपास्य राज्यात्पृथ्वीपतित्वं स समाससाद॥२४९॥ अन्याश्च कन्याः परिणीय राज्ञामन्यैस्तटेष्वप्याप्तगजाश्वमुख्यैः। इष्टान्स भोगान्गुणशर्मसम्राट् चिराय मुद्वस्त स्म ससुन्दरीकः॥२५०॥

अष्टम लम्बक ४१९

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अष्टम लम्बक ४१९ महेश्वर से अग्निकुंड से अग्नि से शर के वन से और कृत्तिकाओं से जिस स्वामी कार्तिकेय का विचित्र जन्म हुआ है, जिसने उत्पन्न होते ही अपने प्रचंड तेज से समस्त संसार को आनन्दित करके दुर्जय तारकासुर को मारा उस कार्तिकेय का मन्त्र मुझसे लो। इस प्रकार कहकर अग्निदत्त ने पुण्यशर्मा को मन्त्र-दीक्षा दी ॥२३९–२४१॥ उस पुण्यशर्मा ने सुन्दरी से सेवित होकर नियमित रूप से उस भू-गृह में उस मन्त्र द्वारा स्वामी कार्तिकेय की आराधना की ॥२४२॥ कुछ दिनों के उपरान्त भगवान् षडानन ने प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष होते हुए आज्ञा दी—'बेटा तुम पर मैं प्रसन्न हूँ वर माँगो' ॥२४३॥ २४४वां श्लोक त्रुटित है। पुण्यशर्मा द्वारा अभीष्ट वर माँगने पर षडानन ने कहा—'पुत्र ! तू अनन्त धन का स्वामी होकर और महासेन को जीतकर निष्कंटक पृथ्वी का राज्य करेगा' ॥२४५॥ इस प्रकार, माँग से भी अधिक वर प्रदान कर स्वामी कार्तिकेय अन्तर्हित हो गये और तदनन्तर पुण्यशर्मा को भी अक्षय धन की प्राप्ति हुई ॥२४६। अनुष्ठान की सिद्धि होने पर पुण्यशर्मा ने अपने महत्त्व और प्रभाव के अनुकूल समझकर चिरकालीन सेवा-सहवास से आसक्त अग्निदत्त की रूपवती कन्या सुन्दरी का मानो साक्षात् भावी कार्यसिद्धि के समान विधिपूर्वक पाणिग्रहण कर लिया ॥२४७॥ अक्षय धन-कोष की प्राप्ति के प्रभाव से प्रचुर हाथी घोड़े और पदातियों की सेना से युक्त पुण्यशर्मा ने शस्त्र के प्रभाव से मिलाए हुए दूसरे राजाओं की सेनाओं से भी उज्जयिनी नगरी को घेरते हुए उस पर आक्रमण कर दिया ॥२४८॥ उसने उज्जयिनी में जाकर रानी अशोकवती के दुराचार की घोषणा करके और युद्ध में राजा महासेन को जीतकर राज्य का अधिकार प्राप्त किया ॥२४९॥ राज्य प्राप्त कर और अन्य राजाओं की कन्याओं से विवाह करके समुद्र के तट तक राज्य का विस्तार करके सम्राट् पुण्यशर्मा उस सुन्दरी के साथ चिरकाल तक सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने लगा ॥२५ ॥

४२० कथासरित्सागर

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४२० कथासरित्सागर इति पुष्यनिधोपाख्यानतो मूढबुद्धिः। सपदि विपदमाप प्राङ्महासेनभूपः। इति च स गुणशर्मा धैर्यमेकं सहायं। कृतमतिरवगम्य प्राप्तवानृद्धिमग्र्याम् ॥२५१॥ एव कथां स्वसचिवस्य मुखादुदारां। सूर्यप्रभो निशि निशम्य स वीतभीतेः। वीरो महासमरसागरमुत्तितीर्षु- रुत्साहमभ्यधिकमाप शनैश्च निद्रये ॥२५२॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके षष्ठस्तरङ्गः।

सप्तमस्तरङ्गः सूर्यप्रभचरितम्: अन्तिमं युद्धम् ततः सूर्यप्रभः प्रातरुत्थाय सचिवैः सह। दानवादिवलैः सर्वैर्युतो युद्धभुवं ययौ ॥१॥ आययो श्रुतशर्मा च विद्याधरबलैर्वृतः। आजग्मुश्च पुनर्द्रष्टुं सर्वे देवासुरादयः ॥२॥ सैन्ये द्वे अपि ते व्यूहावर्धचन्द्रौ च चक्रतुः। प्रावर्त्तत ततो युद्धं बलयोरुभयोस्तयोः ॥३॥ ससाध्वसमभिधावन्तो निकृन्तन्तः परस्परम्। पत्रास्ता प्रजविनो युध्यन्ते स्म शरा अपि ॥४॥ कोशानानप्रनिर्यताः सुदीर्घाः पीतशोणिताः। लोलाः खड्गलसा रेजुः कृतान्तरसना इव ॥५॥ शूरोत्कृष्टक्रमाम्भोजसम्पतच्चञ्चत्खड्‌गहतिः । राजहंसक्षयायासीत्तदाहवमहासुरः ॥६॥ उत्प्लद्भिः पतद्भिश्च निर्लूनैः शूरमूर्धभिः। कृतान्तकन्दुकक्रीडासभिमा समिवाबभौ ॥७॥ क्षतजासेकनिर्धूतधूलिध्मान्ते रणाजिरे। महारथानामभवद्वन्द्वायुद्धान्यमर्षिणाम् ॥८॥

अष्टम लम्बक ४२१

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अष्टम लम्बक ४२१ इस प्रकार पुण्डरीकाक्ष के अज्ञान से मूर्खबुद्धि महासेन ने विरक्ति प्राप्त की और गुणशर्मा ने धैर्य धारण कर पूर्ण शक्रता और सर्वोत्कृष्ट राज्यलक्ष्मी प्राप्त की ॥२५१॥ अपने मन्त्री शास्त्रान्वित इस प्रकार की उदार कथा को सुनकर समर-रूपी महासागर को पार करने की इच्छा से सूर्यप्रभ ने अधिक उत्साह प्राप्त किया और धीरे धीरे सो गया ॥२५२॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का षष्ठ तरङ्ग समाप्त सप्तम तरङ्ग सूर्यप्रभ का वृतान्त अन्तिम युद्ध रात बीतने पर प्रातःकाल मदिरा के साथ शय्या से उठकर सूर्यप्रभ अपनी दानव और मानव-सेना को लेकर रणभूमि में गया ॥१॥ उधर विद्याधरों की सेनासहित श्रुतशर्मा भी युद्ध के मैदान में आकर डट गया और देवता असुर आदि भी प्रतिज्ञा के समान आकाश में युद्ध का दृश्य देखने के लिए आ गये ॥२॥ उस दिन दोनों ओर की सेनाओं में अर्धचन्द्र व्यूह बनाये गये और उसके पश्चात् दोनों सेनाओं में सङ्ग्राम आरम्भ हुआ ॥३॥ अस्त्रशस्त्रों के साथ दोनों ओर से दौड़ते हुए वीर आपस में एक दूसरे को काटते हुए और रक्ताक्त हुए हाथी भी दोनों आपस में टकरा-टकराकर युद्ध करने लगे ॥४॥ बाणों की धूलि में छिपी लक्ष्मी और खून की प्याली भरकर चलती हुई तलवारें मानो यम की प्रीक्षा के समान रणभूमि में लहलहा रही थीं ॥५॥ शस्त्रसञ्चालन से गिरे हुए हाथ-कङ्कालों पर गिरते हुए यक्ष-राक्षसों ... के सिरों को काट रहे थे ॥६॥ युद्ध के अन्ध और विकराल वातावरण के समय वीरों के पैर कटकर गिरते ... ... रही थी ॥७॥ उस समय दोनों ओर के ... ... ॥८-९-१०-११-१२-१३...॥ १. एक प्रकार का सैन्यव्यूह। २. युद्ध का फैसला।