कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
दशम लम्बक १४७
दशम लम्बक १४७ तब मैंने स्नान करनेवाले अपने मित्र को हास्य-विनोद से डराने के लिए उस सर्प को मन्त्र के बल से किनारे पर बाँध दिया ॥८७॥ स्नान करके तुरन्त किनारे पर आया हुआ मित्र निश्चल बैठे हुए उस सर्प को सहसा देखकर मूर्च्छित हो गया ॥८८॥ मैंने ध्यान से यह जानकर चिरकाल के पश्चात् मित्र को चेतन किया। तब मेरे द्वारा डराये गये उसन मित्र ज्ञान पर भी क्रोध से मुझे शाप दिया ॥८९॥ 'जा तू भी ऐसा ही तीन फणोवाला साँप हो जा। मेर अनुनय-विनय पर उस मित्र ने मेरे शाप का अन्त इस प्रकार बतलाया ॥९०॥ साप बनकर कूँएँ में गिरे हुए तुझे जो उबारेगा समय पर उसी का उपकार करके तू शाप मुक्त होगा' ॥९१॥ इस प्रकार सर्प बने और कुएँ में गिरे हुए मुझे तुमने निकाला है। अब मैं जाता हूँ। तुम्हारे स्मरण करने पर प्रत्युपकार करके मैं शाप से छूट जाऊँगा' ऐसा कहकर सर्प के चले जाने पर उस स्त्री ने अपना वृत्तान्त सुनाया ॥९२-९३॥ दुष्टा स्त्री की आत्मकथा मैं राजा के सेवक एक क्षत्रिय-पुत्र की भार्या हूँ। मेरा पति शूरवीर और त्यागी है। युवा है, सुन्दर और आत्ममानी है ॥९४॥ तो भी पापिनी मैं ने दूसरे पुरुष का प्रणय कर लिया। यह जानकर मेरे पति ने मुझे मारने का विचार किया ॥९५॥ अपनी एक सहेली से यह जानकर उसी समय मैं घर से भागी और रात को इस बन में प्रवेश करके इस कुएँ में गिरी और तुमसे उबारी गई ॥९६॥ अब तुम्हारी ही कृपा से कहीं जाकर जीवन बिताती हूँ और वह दिन भी आय कि मैं आपका प्रत्युपकार कर सकूँ। —बोधिसत्त्व से ऐसा कहकर वह दुष्टा वहाँ से घोषकर्दम नामक राजा के नगर को गई और उसके परिवारवालों से मित्रता करके राजा की महारानी के पास सेविका बनकर रहने लगी ॥९७-९९॥ उस स्त्री के साथ भाषण करने से उस बोधिसत्त्व की सिद्धि नष्ट हो जाने के कारण उस बन में फल-मूलों की भी उत्पत्ति नष्ट हो गई ॥१००॥
ततः क्षुत्तृष्णया क्लान्तः प्राक्तं सिंहं समस्मरत्। स्मृतागतः स चैतस्य व्यधाद्वृत्तिं मृगामिषैः ॥१०१॥ कञ्चित्कालं स तन्मांसैः प्रकृतिस्थं विधाय तम्। केसरी सोऽब्रवीत् क्षीणः सशापो मे व्रजाम्यहम् ॥१०२॥ इत्युक्त्वा सिंहतां मुक्त्वा भूत्वा विद्याधरश्च सः। जगाम तदनुज्ञातस्तमामन्त्र्य निजं पदम् ॥१०३॥ ततः स बोधिसत्त्वांशो वृत्तिम्लानः पुनः खगम्। सस्मार स्वर्णचूडं तमुपागात् सोऽपि तत्स्मृतः ॥१०४॥ आवेदितार्तिस्तेनाऽसौ गत्वानीय खगः क्षणात्। रत्नाभरणसम्पूर्णां ददौ तस्मै करण्डिकाम् ॥१०५॥ उवाच चैतेनार्थेन वृत्तिः स्याच्छाश्वती तव। मम जातश्च शापान्तः स्वस्ति ते साधयाम्यहम् ॥१०६॥ इत्युक्त्वा सोऽपि भूत्वैव विद्याधरकुमारकः। स्वलोकं नभसा गत्वा प्राप राज्यं निजात् पितुः ॥१०७॥ सोऽपि रत्नानि विक्रेतुं बोधिसत्त्वः परिभ्रमन्। तत्प्राप नगरं यत्र सा स्त्री कूपोद्धृता स्थिता ॥१०८॥ तत्रैकस्याश्च वृद्धाया ब्राह्मण्या विजने गृहे। निधाय तान्याभरणान्यापणं यावदेति सः ॥१०९॥ तावद्ददर्श तामेव वने कूपात् समुद्धृताम्। स्त्रियं सम्मुखमायान्तीं सापि स्त्री पश्यति स्म तम् ॥११०॥ सम्भाषणे श्रुतान्योन्यमथ सा स्त्री कथाक्रमात्। स्वं राजमहिषीपार्श्वस्थितमस्मै न्यवेदयत् ॥१११॥ सोऽपि पृष्टस्ववृत्तान्तस्तया सत्यं शशंस ताम्। रत्नाभरणसम्प्राप्तिं स्वर्णचूडखगाद्बहु ॥११२॥ नीत्वा चाभरणं तस्मै वृद्धावदमन्यदर्शयत्। सापि गत्वा शठा राज्ञ्यै स्वस्वामिन्यै शशंस तत् ॥११३॥ तस्याश्च राज्ञ्या गृहान्तः स्वर्णचूलेन पक्षिणा। नीतं छलेन पश्यन्त्या एवाभरणभाण्डकम् ॥११४॥ तच्च सा स्वपुरप्राप्तं राज्ञी तस्या मुखात् स्त्रियाः। श्रुत्वा विदिततच्छाया राजानं तं न्यजिज्ञपत् ॥११५॥
षष्ठम लम्बक १४९
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तब (फल मूल आदि के अभाव में) भूख से मूच्छित बोधिसत्त्व ने सबसे पहले सिंह का स्मरण किया। स्मरण करते ही आये हुए सिंह ने मृगों का मांस लाकर बोधिसत्त्व का जीवन- निर्वाह किया ॥१११॥ कुछ समय तक मांस खिलाकर उस महात्मा को स्वस्थ बनाकर सिंह ने कहा—'अब मेरा शाप नष्ट हो गया मैं जाता हूँ' ॥११२॥ ऐसा कहकर वह सिंह शरीर का त्यागकर विद्याधर हो गया और महात्मा से आज्ञा लेकर उन्हें प्रणाम करके अपने स्थान को गया ॥११३॥ उसके चले जाने पर भोजन के अभाव से म्लान उस बोधिसत्त्व ने स्वर्णचूड़ का स्मरण किया और स्मरण करते ही वह उसके पास उपस्थित हो गया ॥११४॥ महात्मा द्वारा उसे अपनी पीड़ा बताने पर, उस पक्षी ने तुरन्त जाकर रत्नों से जड़े आभूषणों से भरी एक पिटारी लाकर उसे दी ॥११५॥ और बोला—'इतने धन से सदा के लिए तुम्हारा जीवन-निर्वाह चलेगा। अब मेरे शाप का अन्त हो गया तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं जाता हूँ' ॥११६॥ ऐसा कहकर और विद्याधरकुमार बनकर वह अपने लोक को चला गया और जाने पर उसने पिता का राज्य प्राप्त किया ॥११७॥ वह बोधिसत्त्व भी उन रत्नों को बेचने के लिए घूमता हुआ उसी नगर में जा पहुँचा जहाँ वह कुएँ से निकाली हुई स्त्री रानी की दासी के रूप में काम कर रही थी ॥११८॥ उस नगर में जाकर बोधिसत्त्व ने एकान्त में एक वृद्धा के घर में रत्न आभूषणों को रख दिया और उनमें से कुछ लेकर वह बाजार में बेचने के लिए गया ॥११९॥ उसने बाजार में जाते हुए सामने से आती हुई उस स्त्री को देखा जिसे उसने कूप से निकाला था। परस्पर बात होने पर उस स्त्री ने अपने को महारानी की दासी बतलाया ॥१२०-१२१॥ उसके द्वारा अपना हाल-समाचार पूछने पर उस सरल महात्मा ने स्वर्णचूड़ पक्षी से रत्नों से मण्डित आभूषणों का प्राप्त होना बताया और उस वृद्धा के घर में ले जाकर आभूषण भी दिखा दिये उस दुष्टा ने जाकर अपनी स्वामिनी से सब कह दिया। सुवर्णचूड़ पक्षी ने उस रानी के घर के भीतर से उसके हँसते-खेलते गहनों की पेटी छत से उठा ली थी। उस पिटारी को फिर उस स्त्री के द्वारा अपने नगर में आई हुई जानकर रानी ने राजा से कह दिया ॥१२२-१२५॥
१५ कथासरित्सागर
१५ कथासरित्सागर राजापि बोधिसत्त्वं स दर्शितं कुस्त्रिया तया। आनाययत् साभरणं भृत्यैर्बद्ध्वा गुहातस्तत् ॥११६॥ परिपृच्छ्य च वृत्तान्तं सत्यं मत्वापि तद्वचः। स्थापयामास बद्धं तं गृहीत्वाभरणान्यपि ॥११७॥ स बन्धस्थोऽत्र सस्मार बोधिसत्त्वो भुजङ्गमम्। ऋषिपुत्रावतारं समुपतस्थे च सोऽपि तम् ॥११८॥ दृष्ट्वा च तं स पृष्टाथ सर्पं साधुमभाषत। गत्वाऽङ्गे वेष्टयाम्येतमामूर्धान्तं महीपतिम् ॥११९॥ न च मुञ्चाम्यमुं यावदागत्योक्तोऽस्मि न त्वया। मोक्ष्याम्यहं नृपं सर्पादिति त्वं च वदेरिह ॥१२०॥ त्वय्यागते त्वद्वचसा मोक्ष्याम्यहमतो नृपम्। संमुक्तश्चैष राजा ते स्वराज्यर्धं प्रदास्यति ॥१२१॥ इत्युक्त्वा तं स गत्वैव परिवेष्टितवानहिः। राजानमास्त चैतस्य मूर्ध्नि कृत्वा फणत्रयम् ॥१२२॥ हा हा दष्टोऽहिना राजेत्याक्रन्दति जनश्च सः। बोधिसत्त्वोऽब्रवीद्रक्षाम्यहं नृपमहरिति ॥१२३॥ श्रुतवद्भिश्च तद्राज्ञे विज्ञप्तं सोऽनुजीविभिः। आनाय्य बोधिसत्त्वं तं सर्पाक्रान्तोऽब्रवीन्नृपः ॥१२४॥ यदि मां मोचयस्यस्मात् सर्पात् तस्मै वदाम्यहम्। राज्यार्धमन्तरस्थाश्च तत्रत मन्त्रिणोऽत्र मे ॥१२५॥ तं दृष्ट्वा बाढमित्युक्ते मन्त्रिभिः स जगाद तम्। भुजङ्ग याहिमत्स्यागा मुञ्च राजानमाद्यिति ॥१२६॥ ततस्तेनाहिना मुक्तो राज्यार्धं नृपतिर्ददौ। स तस्मै बोधिसत्त्वाय सोऽपि स्वस्थोऽभवत् क्षणात् ॥१२७॥ संपदश्च क्षणेनाप मन् भूत्वा मुनिकुमारकः। सन्मन्त्र्याख्यातवृत्तान्तो जगाम निजमाश्रमम् ॥१२८॥ एवं निश्चितमभ्येति शुभमेव शुभात्मनाम्। एष पाशिक्रमो नाम वक्तव्यो महतामपि ॥१२९॥ अविज्ञाताशयं चैव स्त्रीणां शृण्वन्ति नाशताम्। प्राप्तान्तान्तर्गताञ्छीघ्रं किं नामाभवदुच्यते ॥१३०॥
दशम लम्बक १५१
दशम लम्बक १५१ राजा ने भी उस दुष्टा स्त्री द्वारा दिखाये हुए आभूषणों के साथ उस बोधिसत्त्व को सेवकों से बँधवाकर बुलवाया ॥११६॥ उससे सारा वृत्तान्त पूछकर और उसे सच मानकर भी राजा ने सारे आभूषण ले लिये और उसे कारागार में डाल दिया ॥११७॥ कारागार में पड़े हुए उस बोधिसत्त्व ने ऋषिनन्दन के अवतार उस सर्प का स्मरण किया। स्मरण करते ही वह उसके पास आकर उपस्थित हुआ ॥११८॥ उसे देखकर और समाचार पूछकर सर्प ने साधु से कहा-'मैं जाता हूँ और पैर से सिर तक राजा को लपेट लेता हूँ ॥११९॥ जबतक तुम आकर नहीं कहोगे कि इसे छोड़ दो तबतक मैं उसे नहीं छोडूंगा। तुम भी यहाँ से कहना कि मैं राजा को सर्प से छुड़वा देता हूँ ॥१२०॥ तुम्हारे वहाँ आने पर और कहने पर मैं राजा को छोड़ दूँगा और मुझसे मुक्त किया गया राजा तुम्हें अपना आधा राज्य दे देगा' ॥१२१॥ ऐसा कहकर सर्प ने जाकर राजा को लपेट लिया और उसके सिर पर तीनों फन फैला दिये ॥१२२॥ तदनन्तर, चारों ओर कोलाहल मच गया कि राजा को सर्प ने काट लिया। तब बोधि- सत्त्व ने कहा- मैं राजा की सर्प से रक्षा कर सकता हूँ ॥१२३॥ उसकी बात को सुननेवाले सेवकों ने यह बात राजा से कही तब राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा-॥१२४॥ 'यदि तू मुझे इस सर्प से बचा लो मैं तुझे आधा राज्य दे दूँगा। ये मेरे मन्त्री मेरी और तेरी इस बात के साक्षी हैं ॥१२५॥ यह सुनकर मन्त्रियों के स्वीकार करने पर बोधिसत्त्व ने सर्प से कहा-'राजा को शीघ्र छोड़ दो' ॥१२६॥ तब उस सर्प से छोड़े गये राजा ने उस महात्मा को आधा राज्य दे दिया और स्वयं भी वह पूर्ण स्वस्थ हो गया ॥१२७॥ सर्प-रूपी वह मुनिकुमार भी शाप से मुक्त होकर, सभा में अपना वृत्तान्त सुनाकर अपने आश्रम को चला गया ॥१२८॥ इस प्रकार, शुभ विचारवाला को अवश्य ही कल्याण प्राप्त होता है और बुरे विचार वाले महान् व्यक्तियों को भी क्लेश प्राप्त होता है ॥१२९॥ अविश्वास की खान स्त्रियों के हृदय में प्राण देने पर भी उपकार स्थान प्राप्त नहीं कर सकता अधिक क्या कहा जाय ॥१३०॥
९५ कथासरित्सागर
९५ कथासरित्सागर
राजापि बोधिसत्त्वं तं दर्शितं कुस्त्रिया तया । आनावयत् साभरणं भृत्यैर्बन्धेवा गृहातस्त ॥११६॥ परिपृच्छंश्च च वृत्तान्तं सत्यं मत्वापि तद्वचः । स्थापयामास बद्धं तं गृहीत्वाभरणान्यपि ॥११७॥ स बन्धस्थोऽथ सस्मार बोधिसत्त्वो भुजङ्गमम् । ऋषिपुत्रावतारं तमृपतस्थे च सोऽपि तम् ॥११८॥ दृष्ट्वा च तं स पृष्टार्थः सर्पः साधुमभाषत । गत्वाऽहं वेष्टयाम्येतमामूर्धान्तं महीपतिम् ॥११९॥ न च मुञ्चाम्यमुं यावदागत्योक्तोऽस्मि न त्वया । मोक्ष्याम्यहं नृपं सर्पादिति स्वं च वदेरिह ॥१२०॥ त्वय्यागते त्वद्वचसा मोक्ष्याम्यहमतो नृपम् । मन्मुक्तश्चथ राजा ते स्वराज्यर्धं प्रदास्यति ॥१२१॥ इत्युक्त्वा तं स गत्वैव परिवेष्टितवानहिः । राजानमास्त चैतस्य मूर्ध्नि कृत्वा फणत्रयम् ॥१२२॥ हा हा दष्टोऽहिना राजेत्याक्रन्दति जनेऽथ सः । बोधिसत्त्वोऽब्रवीद्रक्षाम्यहं नृपमहैरिति ॥१२३॥ श्रुतवद्भिश्च तद्वाक्यं विज्ञप्तः सोऽनुजीविभिः । आनाय्य बोधिसत्त्वं तं सर्पाक्रान्तोऽब्रवीन्नृपः ॥१२४॥ यदि मां मोषयस्यस्मात् सर्पात् तत्ते ददाम्यहम् । राज्यार्धमन्तरस्थाश्च धवैते मन्त्रिणोऽत्र मे ॥१२५॥ तच्छ्रुत्वा बाढमित्युक्ते मन्त्रिभिः स जगाद तम् । भुजङ्ग बोधिसत्त्वांशो मुञ्च राजानमाश्र्विति ॥१२६॥ ततस्तेनाहिना मुक्तो राज्यार्धं नृपतिर्ददौ । स तस्मै बोधिसत्त्वाय सोऽपि स्वस्थोऽभवत् क्षणात् ॥१२७॥ सर्पेश्च क्षीणशापः सन् भूत्वा मुनिकुमारकः । सदस्याख्यातवृत्तान्तो जगाम निजमाश्रमम् ॥१२८॥ एष निश्चितमन्वेति शुभमेव शुभार्समम् । एव नातिक्रमो नाम क्लेशाय महतामपि ॥१२९॥ अविश्वासास्पदं चैव स्त्रीणां स्पृशति नाश्चर्यम् । प्राणदानोपकारोऽपि किं चासामन्यदुच्यते ॥१३०॥
दशम लम्बक १५१
दशम लम्बक १५१ राजा ने भी उस दुष्टा स्त्री द्वारा दिखाये हुए आभूषणों के साथ उस बोधिसत्त्व को सेवकों से बँधवाकर बुलवाया ॥११९६॥ उससे सारा वृत्तान्त पूछकर और उसे सच मानकर भी राजा ने सारे आभूषण ले लिये और उसे कारागार में डाल दिया ॥११९७॥ कारागार में पड़े हुए उस बोधिसत्त्व ने ऋषिकुमार के अवतार उस सर्प का स्मरण किया। स्मरण करते ही वह उसके पास आकर उपस्थित हुआ ॥११९८॥ उसे देखकर और समाचार पूछकर सर्प ने साधु से कहा- मैं जाता हूँ और पैर से सिर तक राजा को लपेट लेता हूँ ॥११९९॥ जबतक तुम जाकर नहीं कहोगे कि इसे छोड़ दो तबतक मैं उसे नहीं छोडूंगा। तुम भी यहाँ से कहना कि मैं राजा को सर्प से छुड़वा देता हूँ ॥१२००॥ तुम्हारे वहाँ आने पर और कहने पर मैं राजा को छोड़ दूँगा और मुझसे मुक्त किया गया राजा तुम्हें अपना आधा राज्य दे देगा' ॥१२०१॥ ऐसा कहकर सर्प ने जाकर राजा को लपेट लिया और उसके सिर पर तीनों फन फैला दिये॥१२०२॥ तदनन्तर, चारों ओर कोलाहल मच गया कि राजा को सर्प ने काट लिया। तब बोधि- सत्त्व ने कहा—मैं राजा की सर्प से रक्षा कर सकता हूँ ॥१२०३॥ उसकी बात को सुननेवाले सेवकों ने यह बात राजा से कही तब राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—॥१२०४॥ 'यदि तू मुझे इस सर्प से बचा ले तो मैं तुझे आधा राज्य दे दूँगा। ये मेरे मन्त्री मेरी और तेरी इस बात के साक्षी हैं' ॥१२०५॥ यह सुनकर मन्त्रियों के स्वीकार करने पर बोधिसत्त्व ने सर्प से कहा— राजा को शीघ्र छोड़ दो' ॥१२०६॥ तब उस सर्प से छोड़े गये राजा ने उस महात्मा को आधा राज्य दे दिया और स्वयं भी वह पूर्ण स्वस्थ हो गया ॥१२०७॥ सर्प-रूपी वह मुनिकुमार भी शाप से मुक्त होकर, सभा में अपना वृत्तान्त सुनाकर अपने आश्रम को चला गया ॥१२०८॥ इस प्रकार, शुभ विचारवाला को अवश्य ही कल्याण प्राप्त होता है और बुरे विचार वाले महान् व्यक्तित्व को भी क्लेश प्राप्त होता है ॥१२०९॥ अविश्वास की पात्र स्त्रियों के हृदय में ज्ञान होने पर भी उपकार स्थान प्राप्त नहीं कर सकता अधिक क्या कहा जाय ॥१२१०॥
१५२ कथासरित्सागर
१५२ कथासरित्सागर इत्याख्याय कथां वत्सराजपुत्रं स गोमुखः। उवाच कथयाम्येतां पुनर्मूग्धकथां शृणु॥१३१॥ बभूव श्रमणः कश्चिद्वहारे क्वापि मूढधीः। स रथ्यायां भ्रमन् जातु शुना जानुन्यदश्यत॥१३२॥ श्वदष्टः स विहारं स्वमुपागत्य व्यचिन्तयत्। किं वृत्तं जानुनि तवेत्येकैकः प्रक्ष्यतीह माम्॥१३३॥ प्रत्याययिष्याम्येष च कियतोऽहं कियच्चिरम्। तदुपायं करोम्यत्र सर्वान् बोधयितुं सकृत्॥१३४॥ इत्यालोच्य समारुह्य स विहारोपरि द्रुतम्। गृहीत्वा ग्रन्थिमुसलं मूढो भिक्षुरवादयत्॥१३५॥ अकारणमकाले किं ग्रन्थिं वादयसीति तम्। श्रुत्वाश्चर्येण मिलिताः पप्रच्छुरथ भिक्षवः॥१३६॥ शुना मे भक्षितं जानु तदेकैकस्य पृच्छतः। ब्रूवेऽहं कियवित्येव यूयं सङ्कट्टिता मया॥१३७॥ तद्बुध्यध्वं समं सर्वे जानु मे पश्यतेति सः। भिक्षून् प्रत्यब्रवीदेतान् स्वदष्टं जानु दर्शयन्॥१३८॥ ततः पार्श्वोपपीडं ते समग्रा भिक्षवोऽहसन्। कियन्मात्रे कृतोऽनेन संरम्भोऽयं कियानिति॥१३९॥ डक्कमूर्खकथा आख्यातः श्रमणो मूर्खष्टक्कमूर्खो निशम्यताम्। कदर्थः कोऽप्यभूत् क्वापि मूर्खष्टक्को महाधनः॥१४०॥ सभार्यः स सदा भुङ्क्ते सक्तूत्सवणवर्जितान्। अन्यस्यान्नस्य बुबुधे नैव स्वादं स जातुचित्॥१४१॥ एकदा प्रेरितो धात्रा स भार्यामब्रवीन्निजाम्। क्षीरिणीं प्रति जाता मे श्रद्धा तामद्य मे पच॥१४२॥ तथेति तस्य सा भार्या पपाच क्षीरिणीं तदा। तस्या भाम्यन्तरे गुप्तं स टक्कः स्वयमन्वित्॥१४३॥ दृष्ट्वा प्राघुणिकः कश्चिदत्र मे मा स्म भूदिति। तावत्तस्य सुहृद्धूर्तष्टक्कस्तत्रक आययौ॥१४४॥ १ टक्को बाह्लीकदेशोद्भवः पुंस्त्वं।
द्वादश लम्बक १५३
[Page Header] द्वादश लम्बक १५३
गोमुख ने वत्सराज को इस प्रकार कथा सुनाकर कहा—'अब फिर और कुछ मूर्खों की कथाएँ सुनो ।।१३१।। कहीं पर किसी बौद्धमठ (विहार) में एक मूर्ख भिक्षु रहता था। गलियों में भिक्षार्थ घूमते हुए किसी समय एक कुत्ते ने घुटने में काट लिया था ।।१३२।। कुत्ते का काटा हुआ वह मूर्ख अपने मठ में आकर सोचने लगा कि मेरे घुटने में पट्टी बँधी देखकर प्रत्येक भिक्षु मुझसे पूछेगा कि 'तेरे घुटने में क्या हो गया ? ।।१३३।। इस प्रकार मैं कितनों को कितने समय तक बताता रहूँगा । इसलिए, सब को एक बार ही अपना हाल बताने का उपाय करता हूँ ।।१३४।। ऐसा सोचकर और मठ की छत पर चढ़कर घड़ियाल बजाने का मूसल लेकर उसने उसे बजा दिया। बिना कारण असमय में यह घड़ियाल क्यों बजाता है, यह सुनकर सभी भिक्षु आश्चर्य के साथ वहाँ एकत्र हो गये और उससे घंटा बजाने का कारण पूछने लगे ।।१३५-१३६।। 'मेरे घुटने में कुत्ते ने काट लिया है' इस बात को एक-एक करके मैं कबतक और कितनों को बताता रहूँगा । यही एक बार बताने के लिए मैंने आपलोगों को यहाँ एकत्र किया है' ।।१३७।। 'इस बात को आप सब लोग जान लें और मेरे घुटने को देख लें भिक्षुओं' का ऐसा कहकर उसने अपना घुटना सबको दिखा दिया । तब वे सब भिक्षु पेट पकड़कर हँसने लगे कि इतनी-सी बात के लिए इसने कितना प्रपंच रचा ।।१३८-१३९।।
मूर्ख टक्क की कथा मूर्ख श्रमण की कथा सुनी अब एक मूर्ख टक्क की कथा सुनो। किसी स्थान पर एक अत्यन्त कंजूस टक्क रहता था जो बहुत धनी था ।।१४० ।। वह अपनी पत्नी के साथ सदा बिना नमक का सत्तू खाता था उसने सत्तू के सिवाय दूसरे अन्न का कभी स्वाद भी नहीं जाना ।।१४१।। एक बार ईश्वर की प्रेरणा से उसने अपनी पत्नी से कहा— 'आज मेरा मन खीर खाने को है । इसलिए आज तुम खीर पकाओ' ।।१४२।। 'ठीक है' कहकर उसकी पत्नी खीर पकाने लगी और वह मूर्ख घर के भीतर खाट पर जाकर पड़ गया कि मुझे बाहर बैठा देखकर कोई मेहमान न आ जाय । इतने में ही उसका एक मित्र धूर्त टक्क आ गया ।।१४३॥-१४४।।
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१५४ कथासरित्सागर
१५४ कथासरित्सागर
क्व च भर्त्तेति पप्रच्छ स च तां तस्य गेहिनीम्। साप्यदत्तोत्तरा तस्य प्राविशद्भर्तुरन्तिकम् ॥१४५॥ आख्यातमित्रागमना सोऽपि भार्यां जगाद ताम्। उपविश्येह रुदती पादावाशय तिष्ठ मे ॥१४६॥ भर्त्ता मे मृत इत्येव वदस्व सुहृदं मम। ततो गतेऽस्मिन्प्रावाभ्यां भोक्तव्या क्षीरिणी सुखम् ॥१४७॥ इत्युक्ता तेन यावत्सा प्रवृत्ता रवितुं तदा। तावत् प्रविश्य सोऽपृच्छत्किमेतदिति तां सुहृत् ॥१४८॥ भर्त्ता मृतो मे पश्येति तयोक्तः स व्यचिन्तयत्। क्व पचन्ती मया दृष्टा सुखिता क्षीरिणीमियम् ॥१४९॥ क्वाधुनेष विपन्नोऽप्रमत्तवन्मर्त्ता विना रुजम् नूनं मां प्राघुणं दृष्ट्वा कृतमाभ्यामिदं मृषा ॥१५०॥ तन्मया नैव गन्तव्यमित्यासोऽप्युपविश्य सः। धूर्त्तो हा मित्र हा मित्रेत्याक्रन्दस्तत्र तस्थिवान् ॥१५१॥ श्रुताक्रन्दा प्रविश्याथ बान्धवा मृतवत्स्थितम्। श्मशानं भीतटक्कं च नेतुमासन् समुद्यताः ॥१५२॥ उत्तिष्ठ बान्धवैर्यावन्नीत्वा न दह्यसे। इत्युपादवदत् कर्णमूले भार्या तदा च तम् ॥१५३॥ मव शठोऽस्य टक्को मे क्षीरिणीं भोक्तुमिच्छति ॥ मोत्तिष्ठामि तवेवस्मिन्गतेऽहृ मृतो यदि ॥१५४॥ प्राणेभ्योऽप्यन्नमुष्टिर्हि मादृशानां गरीयसी। इति प्रत्यब्रवीद् भार्यामुपांश्वेव स तां जडः ॥१५५॥ ततस्तेन कुमित्रेण नीत्वा तैः स्वजनैश्च सः। दह्यमानोऽपि निश्चेष्टो ददौ नामेरणाद्रवम् ॥१५६॥ एव स मूढो विजहौ प्राणान् क्षीरिणीं पुनः। रुषाजितं च बुभुज तस्यान्यैहंस्या धनम् ॥१५७॥
मार्जारमूर्खस्य कथा
धृत कदर्ये श्रूयन्ताममी मार्जारभौतकाः। उज्जयिन्यामुपाध्यायो मुग्धः कोऽप्यभवन् मठे ॥१५८॥ सत्र निद्रा न तस्याभून्मूपकोपत्रवाग्निधि। तत्खिन्नस्तच्च सुहृदे स कस्मैचिद्वयवर्ययत् ॥१५९॥
दशम लम्बक १५५
दशम लम्बक १५५ उसने उसकी स्त्री से पूछा कि तुम्हारा पति कहाँ है। वह भी उसे उत्तर न देकर पति के पास चली गई ॥१४५॥ पति को मित्र के आने की सूचना देती हुई स्त्री से उसने कहा—'मेरे पास पैरों को पकड़ कर रोती हुई बैठी रहो' और मेरे मित्र से कहना कि मेरा पति मर गया है। उसके चले जाने पर हम दोनों सुख से खीर खायेंगे' ॥१४६-१४७॥ पति की यह आज्ञा पाकर वह बैठकर रोने लगी। तब उस मित्र मेहमान ने स्त्री से पूछा कि 'यह क्या हुआ ? ॥१४८॥ 'देखो मेरा पति मर गया उसने इस प्रकार कहा। उसके ऐसा कहने पर उस धूर्त मित्र ने सोचा—'कहाँ तो मैंने इसे आनन्द से खीर पकाती हुई देखा था और कहाँ अभी-अभी इसका पति बिना किसी रोग के मर गया। अवश्य ही इन दोनों ने मुझे देखकर यह ढोंग रचा है ॥१४९-१५०॥ इसलिए, मुझे अब यहाँ से न जाना चाहिए,—ऐसा सोचकर वह भी वहीं जमकर बैठ गया। और 'हाय मित्र हाय मित्र'—इस प्रकार रोने-चिल्लाने लगा ॥१५१॥ उसका चिल्लाना सुनकर उसके पड़ोस के सभी बन्धु और मित्र वहाँ आ गये और उसे मरा हुआ देखकर उस मूर्ख टक्क को श्मशान ले जाने की तैयारी करने लगे ॥१५२॥ तब उसकी स्त्री ने एकान्त में उसके कान में कहा—'उठो। नहीं तो ये सारे भाई बन्धु तुझे श्मशान में ले जाकर फूंक डालेंगे' ॥१५३॥ उसने कहा—'ऐसा न होगा। यह धूर्त टक्क मेरी खीर खाना चाहता है। अतः मैं जब मर गया हूँ तब इसके यहाँ से गये बिना न उठूँगा ॥१५४॥ मेरे जैसे लोभों के लिए एक मुट्ठी अन्न भी प्राण से अधिक है। उस मूढ ने एकान्त में ही इस प्रकार अपनी पत्नी से कहा ॥१५५॥ तब उस दुष्ट मित्र ने बन्धु बान्धवों के साथ उसे ले जाकर चिता में फूंक दिया किन्तु वह मरते समय भी तनिक भी हिला-डुला नहीं और न मुंह से ही कुछ बोला ॥१५६॥ इस प्रकार उस मूर्ख ने खीर के पीछे अपने प्राण दे दिये और इतने कष्टों से कमाया हुआ उसका धन दूसरा न भोगा ॥१५७॥ मार्जार-मूर्ख की कथा कञ्जूस की कथा सुनी अब मार्जार-मूर्ख की कथा सुनो—'उज्जयिनी के किसी मठ में एक मूर्ख अध्यापक रहता था ॥१५८॥ चूहों के उपद्रव के कारण रात को उसे नींद नहीं आती थी इस कारण दुःखी होकर उसने अपने किसी मित्र से अपना यह कष्ट सुनाया ॥१५९॥
१५४ कथासरित्सागर
१५४ कथासरित्सागर क्व ते भर्तेति पप्रच्छ स च तां तस्य गेहिनीम्। साप्यदत्तोत्तरा तस्य प्राविशद्भर्तुरन्तिकम् ॥१४५॥ आख्यातमित्रागमना सोऽपि भार्या जगाद ताम्। उपविश्येह रुदती पादावादाय तिष्ठ मे ॥१४६॥ भर्त्ता म मृत इत्येव वदेरेष सुहृद् मम। शठो गतेऽस्मिन्नावाभ्यां भोक्तव्या क्षीरिणी सुखम् ॥१४७॥ इत्युक्ता तन यावत्सा प्रवृत्ता रोदितुं तथा। तावत् प्रविश्य सोऽपृच्छत्किमवेविति तां सुहृत् ॥१४८॥ भर्त्ता मृतो म पश्येति तयोक्तः स व्यचिन्तयत्। क्व पचन्ती मया दृष्टा सुसिता क्षीरिणीमियम् ॥१४९॥ क्वाधुनैव विपन्नोऽयमवङ्भर्त्ता बिना रुजम् नूनं मां प्राघुणं दृष्ट्वा कृतमाभ्यामिदं मृषा ॥१५०॥ तन्मया नैव गन्तव्यमित्यालोच्योपविश्य सः। धूर्त्तो हा मित्र हा मित्रेत्याक्रन्दस्तत्र तस्थिवान् ॥१५१॥ [L16: श्रुताक्रन्दाः प्रविश्यात्र बान्धवा मृतवत्स्थितम्। श्मशानं भोटटक्कं स नेतुमासन् समुद्यताः ॥१५२॥ उत्तिष्ठ बान्धवैर्यावदेतैर्नीत्वा न बध्यसे। इत्युपांश्ववदत् कर्णमूले भार्या तदा च तम् ॥१५३॥ मैवं शठोऽस्य टक्को मे क्षीरिणीं भोक्तुमिच्छसि ॥ नोत्तिष्ठामि तदेतस्मिन्नगतेऽङ्ग मृतो यदि ॥१५४॥ प्राणेभ्योऽप्यन्नमुष्टिर्हि मादृशानां गरीयसी। इति प्रत्यब्रवीद् भार्यामुपांश्व स तां जडः ॥१५५॥ ततस्तेन कुमित्रेण नीत्वा तं स्वजनश्च सः। दह्यमानोऽपि निर्दग्धो ददौ नामरणाद्वचः ॥१५६॥ एवं स मूढो विजहौ प्राणान्न क्षीरिणीं पुनः। कलहार्जितं च बुभुजे तस्यान्यहँस्तया पुनम् ॥१५७॥
मार्जारमूषकस्य कथा श्रुतं रूपं शृण्वताममी मार्जारभीतकाः। उज्जयिन्यामुपाध्यायो मुग्धः कोऽप्यभवन् मठे ॥१५८॥ तत्र निद्रा न तस्याभून्मूषकोपद्रवान्निशि। तस्मिंस्तस्य सुहृदे स कस्मैचिदवर्णयत् ॥१५९॥
दशम लम्बक १५५
दशम लम्बक १५५ उसने उसकी स्त्री से पूछा कि तुम्हारा पति कहाँ है। वह भी उसे उत्तर न देकर पति के पास चली गई ॥१४५॥ पति को मित्र के आने की सूचना देती हुई स्त्री से उसने कहा—'मेरे पास पैरों को पकड़ कर रोती हुई बैठी रहो' और मेरे मित्र से कहना कि मेरा पति मर गया है। उसके चले जाने पर हम दोनों सुख से खीर खायेंगे' ॥१४६-१४७॥ पति की यह आज्ञा पाकर वह बैठकर रोने लगी। तब उस मित्र मेहमान ने स्त्री से पूछा कि 'यह क्या हुआ ?' ॥१४८॥ 'देखो मेरा पति मर गया' उसने इस प्रकार कहा। उसके ऐसा कहने पर उस धूर्त मित्र ने सोचा—'कहाँ तो मैंने इसे आनन्द से खीर पकाती हुई देखा था और कहाँ अभी-अभी इसका पति बिना किसी रोग के मर गया। अवश्य ही इन दोनों ने मुझे देखकर यह ढोंग रचा है ॥१४९-१५०॥ इसलिए मुझे अब यहाँ से न जाना चाहिए—ऐसा सोचकर वह भी वहीं जमकर बैठ गया। और 'हाय मित्र हाय मित्र'—इस प्रकार रोने-चिल्लाने लगा ॥१५१॥ उसका चिल्लाना सुनकर उसके पड़ोस के सभी बन्धु और मित्र वहाँ आ गये और उसे मरा हुआ देखकर उस मूर्ख ठस्क को श्मशान ले जाने की तैयारी करने लगे ॥१५२॥ तब उसकी स्त्री ने एकान्त में उसके कान में कहा—'उठो। नहीं तो ये सारे भाई- बन्धु तुम्हें श्मशान में ले जाकर फूंक डालेंगे' ॥१५३॥ उसने कहा—'ऐसा न होगा। यह धूर्त ठस्क मेरी खीर खाना चाहता है। अतः, मैं जब मर गया हूँ तब इसके यहाँ से गये बिना न उठूँगा ॥१५४॥ मेरे जैसे लोगों के लिए एक मुट्ठी अन्न भी प्राणों से अधिक है। उस मूर्ख ने एकान्त में ही इस प्रकार अपनी पत्नी से कहा ॥१५५॥ तब उस दुष्ट मित्र ने बन्धु बान्धवों के साथ उसे ले जाकर चिता में फूंक दिया किन्तु वह जलते समय भी तनिक भी हिला-डुला नहीं और न मुख से ही कुछ बोला ॥१५६॥ इस प्रकार उस मूर्ख ने खीर के पीछे अपने प्राण दे दिये और इतने कष्टों से कमाया हुआ उसका धन दूसरों ने भोगा ॥१५७॥ मार्जार-मूर्ख की कथा कंजूस की कथा सुनी अब मार्जार-मूर्ख की कथा सुनो—'उज्जयिनी के किसी मठ में एक वृद्ध अध्यापक रहता था ॥१५८॥ चूहों के उपद्रव के कारण रात को उसे नींद नहीं आती थी इस कारण दुःखी होकर उसने अपने किसी मित्र से अपना यह कष्ट सुनाया ॥१५९ ॥
१५६ कथासरित्सागर
१५६ कथासरित्सागर मार्जारं स्थापयानीय सोऽत्र खादति मूषकान्। इति सोऽपि सुहृद्विप्रस्तमुपाध्यायमब्रवीत् ॥१६०॥ मार्जारः कीदृशः क्वास्ते न स दृष्टचरो मया। इत्युक्तवत्युपाध्याये तं सुहृत्सोऽब्रवीत् पुनः ॥१६१॥ काचरं लोचने तस्य वर्णः कपिशधूसरः। पृष्ठे च लोमशं चर्म रथ्यास्वटति यह सः ॥१६२॥ तदेभिस्त्वमभिज्ञानैरन्विष्यानानयाशु तम्। मित्र मार्जारमित्युक्त्वा तत्सुहृत्स ययौ गृहम् ॥१६३॥ ततः शिष्यानुपाध्यायः स जगाद जडो निजान्। अभिज्ञानानि युष्माभिः श्रुतान्येव स्थितेरिह ॥१६४॥ तदन्विष्यत मार्जारं रथ्यासु तमिह क्वचित्। तथेति ते गताः शिष्यास्तत्र भ्रमुरितस्ततः ॥१६५॥ तथापि न तु तैर्दृष्टो मार्जारः स कदाचन। अथैकं ते वटुं रथ्यामुखाविक्षन्त निर्गतम् ॥१६६॥ काचरं नेत्रयुगलं वर्णं धूसरपिङ्गलम्। पृष्ठोपरि दधानं च लोमशं हरिणाजिनम् ॥१६७॥ दृष्ट्वा तं सैष मार्जारः प्राप्तोऽस्माभिर्यथाश्रुतः। इत्यवष्टभ्य तं निन्युस्पाध्यायान्तिकं च ते ॥१६८॥ उपाध्यायोऽपि मित्रोक्तैर्युक्तं मार्जारलक्षणैः। दृष्ट्वा तं स्थापयामास रात्रौ तत्र मठान्तरे ॥१६९॥ मार्जारो नूनमस्तीति मेने सोऽपि वटुर्जडः। मार्जाराख्यां कृतां शृण्वन्नात्मनस्तैर्मुखिभिः ॥१७०॥ स च भीतो वटुः शिष्यस्तस्य विप्रस्य येन तत्। उपाध्यायस्य तस्योक्तं मख्या मार्जारलक्षणम् ॥१७१॥ प्रातः सोऽत्रागतो विप्रो वटुमन्तर्विलोक्य तम्। इह कनायमानीत इति मौठानवाच तान् ॥१७२॥ धृतोपलक्षणस्त्वत्तो मार्जारोऽस्माभिरप्य सः। आनीत इत्युपाध्यायो भीतः शिष्याश्च तेऽवदन् ॥१७३॥
दशम लम्बक ९५७
दशम लम्बक ९५७ 'यहाँ एक बिल्ली लाकर रखो वह चूहा को खा जाती है'—ऐसा उत्तर अध्यापक के मित्र ने दिया ॥१६०॥ 'बिल्ली कैसी होती है और कहाँ रहती है, उसे मैंने पहले कभी नहीं देखा' अध्यापक के इस प्रकार कहने पर उसके मित्र ने फिर कहा—॥१६१॥ 'उसकी आँखें चमकीली होती हैं उसका रंग काला और भूरा होता है और पीठ पर रोएँदार चमड़ी होती है। वह यहाँ गलियों में घूमती-फिरती रहती है ॥१६२॥ मित्र इन चिह्नों से उसे ढूँढ़कर शीघ्र ही मँगवाओ। ऐसा अध्यापक के मित्र ने उससे कहा और कहकर वह अपने घर चला गया ॥१६३॥ तब उस मूर्ख अध्यापक ने अपने शिष्यों से कहा—यहाँ बैठे हुए 'तुमलोगों ने बिल्ली के चिह्न तो सुन ही लिये हैं, अतः गलियों में जाकर इन चिह्नों के अनुसार बिल्ली को ढूँढ़ लाओ' गुरु की आज्ञा से बिल्ली की खोज में गये हुए वे शिष्य गलियों में इधर-उधर घूमने लगे। फिर भी उन्होंने उन लक्षणोंवाली बिल्ली कहीं नहीं देखी। कुछ समय के पश्चात् उन्होंने गली के मुहाने से निकलते हुए एक ब्रह्मचारी बटु को देखा। उसके दोनों नेत्र चमकीले थे रंग काला और भूरा था और उसने अपनी पीठ पर रोएँदार मृगचर्म ओढ़ रखा था ॥१६४—१६७॥ उसे देखकर उन लोगों ने कहा—'यही वह बिल्ली है, जिसे हमने सुना था। अतः उसे रोककर वे अपने गुरु के समीप ले गये ॥१६८॥ गुरु ने भी मित्र से बताये हुए उन लक्षणों से युक्त उस बटु को देखकर और उसे बिल्ली समझकर अपने मठ में रख लिया ॥१६९॥ उन्हें 'बिल्ली बिल्ली' कहते सुनकर उस मूर्ख बटु ने भी अपने को बिल्ली ही समझ लिया। क्योंकि वह मूर्खो से अपना यही नाम सुनता था ॥१७०॥ वह बटु (बालक) भी उस अध्यापक के उसी मित्र का पुत्र था जिसने उसे बिल्ली की पहचान बताई थी ॥१७१॥ प्रातःकाल ही उस मठ में आये उस ब्राह्मण ने वहाँ पर उस बटु (ब्रह्मचारी बालक) को देखा और 'इसे यहाँ कौन लाया ? इस प्रकार उसने उन मूर्खो से पूछा ॥१७२॥ तब गुरु के शिष्य बोले—'हमलोगों ने तुमसे ही बिल्ली का लक्षण सुनकर इसे पकड़ कर यहाँ ला रखा है' ॥१७३॥
[Header] १५८ कथासरित्सागर
[Header] १५८ कथासरित्सागर ततो विहस्य सोऽवादीद्विप्रो मूढाः क्व मानुषः। क्व च तिर्यक्स मार्जारश्चतुष्पात् पुच्छवानपि ॥१७४॥ तच्छ्रुत्वा तं वटुं मुक्त्वा तेऽब्रुवन्मन्दबुद्धयः। तद्गान्विष्यानयामस्तं मार्जारं तादृशं पुनः ॥१७५॥ एवमुक्तवतो मूढाञ्जनस्तत्र जहास तान्। अज्ञता नाम कस्येह नोपहासाय जायते ॥१७६॥ मार्जारमोतः कथितः श्रूयतामपरेऽप्यमी। आसीद् बहूनां मुग्धानां मुख्यो मुग्धो मठे क्वचित् ॥१७७॥ स केनचिद्वाच्यमानाद्धर्मशास्त्रात् कदाचन। तडागकर्त्तुरक्षोपीदमत्र सुमहत् फलम् ॥१७८॥ ततः स धनसम्पूर्णो विपुलं वारिपूरितम्। तडागं कारयामास नातिदूरे निजान्मठात् ॥१७९॥ एकदा स तडागं तं द्रष्टुं मुग्धाग्रणीर्गतः। केनाप्युत्पाटितान्यस्य पुलिनानि व्यलोकयत् ॥१८०॥ तथैवागत्य सोऽन्येद्युरुत्खातं तटमन्यतः। दृष्ट्वा तस्य तडागस्य सोद्वेगं समचिन्तयत् ॥१८१॥ प्रातः प्रभातादारभ्य स्थास्यामीहैव वासरम्। द्रक्ष्यामि कः करोत्येतदित्यालोच्य ययौ प्रगे ॥१८२॥ अन्येद्युर्यावदेत्यास्ते तावत्तत्र ददर्श सः। दिवोऽवतीर्य शृङ्गाभ्यां खनन्तं वृषभं तटम् ॥१८३॥ दिव्यो वृषोऽयं तत्किं न दिवं यामि सहामुना। इत्युपेत्य वृषस्यास्य हस्ताभ्यां पुच्छमग्रहीत् ॥१८४॥ सतं पुच्छाप्रलम्बं च भीतमुत्क्षिप्य वेगतः। क्षणाभिनाय नभसः स्वं धाम भगवान् वृषः ॥१८५॥ तत्र दिव्यानि भक्ष्याणि मोदकादीन्यवाप्य सः। मुञ्जानो न्यवसद् भीतो दिनानि कतिचित् सुखम् ॥१८६॥ गतागतानि कुर्व्वाणं स दृष्ट्वा तं महावृषम्। अचिन्तयत भीतानां मुख्यो दैवेन मोहितः ॥१८७॥ गच्छामि वृषपुच्छाग्रलम्बं पश्यामि बान्धवान्। कथयित्वाऽमृतमिदं तथैवेष्याम्यहं पुनः ॥१८८॥ इति सञ्चिन्त्य वृषमस्यैकदोपेत्य तस्य सः। आलम्ब्य गच्छतः पुच्छमागाद् भीतो भुवंस्तलम् ॥१८९॥
दशम लम्बक ९५९
दशम लम्बक ९५९ यह सुनकर वह ब्राह्मण हँसकर बोला—अरे मूर्खो कहाँ यह मनुष्य और कहाँ वह पशु ? बिल्ली के चार पैर होते हैं और उसकी पूँछ भी होती है। यह सुनकर वे मूर्ख शिष्य उस बालक को छोड़कर बोले—'तब वैसे ही ढूँढ़कर लाते हैं' ॥१७५॥ ऐसा कहते हुए उन्होंने सभी को हँसा दिया। सच है, मूर्खता किसके हास्य का कारण नहीं होती ॥१७६॥ मार्जार-मूर्ख की कथा सुनी अब कुछ और मूर्खों की कथाएँ सुनो। किसी एक मठ में मूर्खो का मुखिया एक महामूर्ख था ॥१७७॥ उसने किसी कथावाचक से सुन लिया कि 'तालाब बनवानेवाले को इस लोक में बहुत पुण्य मिलता है। वह मठाधीश धनी था। उसने अपने मठ के पास ही पानी से भरा एक विशाल तालाब बनवाया ॥१७८ १७९॥ एक बार वह मूर्खराज उस तालाब को देखने के लिए गया । उसने तालाब के किनारों को किसी के द्वारा उखाड़े हुए देखा ॥१८०॥ इसी प्रकार दूसरे दिन उसने दूसरी ओर देखा और वह सोचने लगा कि 'यह कौन इसके किनारों को तोड़ता है। कल प्रातःकाल ही आकर यहाँ सारा दिन रहकर देखूँगा कि कौन ऐसा करता है—ऐसा सोचकर वह दूसरे दिन प्रातःकाल ही ज्यों ही वहाँ आया उसने आकाश से उतरकर सींग से किनारों को तोड़ते हुए एक बैल को देखा। 'ओह ! यह तो दिव्य बैल है इसलिए मैं भी इसके साथ ही सीधे स्वर्ग क्यों न चला जाऊँ ? —ऐसा सोचकर और उसके पास जाकर उसने हाथों से उस बैल की पूँछ पकड़ ली ॥१८१—१८४॥ पूँछ पकड़े हुए उसे लेकर नन्दी भगवान् क्षण-भर में अपने कैलासधाम जा पहुँचे ॥१८५॥ वह मूर्ख मठाधीश दिव्य भोजन लड्डू आदि खाकर, कुछ दिनों तक वहीं सुखपूर्वक रहा । नन्दी को प्रतिदिन पृथ्वी पर यातायात करते हुए देखकर वह मूर्खराज सोचने लगा कि बैल की पूँछ पकड़कर नीचे जाऊँ और अपने बन्धु-मित्रों से मिलूँ। उन्हें यह आश्चर्यजनक घटना सुनाकर फिर आ जाऊँगा । ऐसा सोचकर एकबार वह मूर्खराज उस नन्दी के पास जाकर उसकी पूँछ पकड़कर भूमि पर आ गया ॥१८६—१८९॥
९६ कथासरित्सागर
९६ कथासरित्सागर ततः प्राप्तो मठे भौटैरन्यैराश्लिष्य तत्स्थितैः । क्व गतोऽसीति पृष्टस्तं स्ववृत्तान्तं शशंस सः ॥१९०॥ ततः सर्वे श्रुताश्चर्या भीतास्ते प्रार्थयन्त सम्। प्रसीद नय तत्रास्मानपि भोजय मोदकान् ॥१९१॥ तच्छ्रुत्वा स तथेत्येतान् युक्तिमुक्त्वापरे दिने । तडागोपान्तमनयत् स च तत्राययौ वृषः ॥१९२॥ जग्राह तस्य लाङ्गूलं मुख्यः पाणिद्वयेन सः । तस्याप्यगृह्णाच्चरणौ न्यस्तस्तस्यापि चेतरः ॥१९३॥ इत्यन्योन्याङ्घ्रिलग्नैस्तैर्मौटैर्यावच्च शृङ्खला । रचिता स वृषस्तावदुत्पपात नभःस्थलम् ॥१९४॥ याति तस्मिंश्च वृषभे लाङ्गलालम्बिभौटके१ । मुख्यमेश्रं तमप्राक्षीदेको मौटोऽथ दवत२॥१९५॥ अद्धामाख्याहि नस्तावदथेष्टसुरभा दिवि । कियत्प्रमाणा भवता मोदका भक्षिता इति ॥१९६॥ ततो हृष्टामुनन्द्यानो वृषपुच्छं विमुच्य तम् । पद्माकारौ करौ कृत्वा संस्प्रिष्टौ मौठनायकः ॥१९७॥ इयत्प्रमाणा इत्याशु यावत्तान प्रतिवक्ति सः । तावत्सोऽन्ये च ते सर्वे क्षितिपेत्य विपदिरे ॥१९८॥ वृषः प्रायाच्च कैलास जनो दृष्ट्वा जहास च । दोषाय निर्विमर्षैव भौतप्रश्नोत्तरक्रिया ॥१९९॥ श्रुता दुगामिनो मौटाः श्रूयतामपरोऽप्ययम्। कश्चिद् भौतो विसस्मार मार्ग मार्गान्तरं व्रजन् ॥२००॥ तरोर्नदीतटस्थस्य गच्छास्योपरिवर्त्मना । इत्युच्यते स्म पन्थानं परिपृच्छञ्जनेन सः ॥२०१॥ ततस्तस्य तरोः पृष्ठं गत्वास्त्वः स मूर्खधीः । एतत्पृष्ठेन मे पन्था उपदिष्टो जनैरिति ॥२०२॥ सत्पृष्ठे सर्पवक्षास्य भरात्पर्यन्तवर्तिनी । शाखा ननाम यत्नेन पपातालम्ब्य नैप याम् ॥२०३॥ १ लाङ्गूले=पुच्छे, मालम्बिनः=सम्बद्धानां भौटाः=मूर्खास्तस्यतस्मिन् वृषभविशेषण २ दैववशादित्यर्थः ।
दशम लम्बक [right-aligned: १९१]
दशम लम्बक [right-aligned: १९१]
तब उसके मठ में पहुँचते ही अन्य मूर्ख उसे घेरकर बैठ गए और कहाँ गए थे ? उनके ऐसा पूछने पर मूर्ख ने कैलास-यात्रा का सारा वृत्तान्त उन्हें सुना दिया ॥१९॥
सुनकर आश्चर्य चकित वे सभी मूर्ख उससे प्रार्थना करने लगे कि 'हम लोगों पर भी कृपा करो हमें भी वहाँ ले चलो। हम लोगों को भी दिव्य लड्डू खिलाओ' ॥१९१॥
उनकी बातें सुनकर और वहाँ जाने की युक्ति बताकर दूसरे दिन तालाब के पास वह उन्हें ले गया और बैल भी वहाँ आया ॥१९२॥
तब उन मूर्खो के मुखिया महन्त ने दोनों हाथों से उसकी पूँछ पकड़ ली। उसके पैर दूसरे ने पकड़े और उसके तीसरे ने। इस प्रकार सभी मूर्खों ने एक-दूसरे के पैर पकड़-पकड़कर एक लम्बी पंक्ति-सी बना ली। तब वह बैल वेग से आकाश में उड़ा। पूँछ से लटके हुए अनेक मूर्खो वाले बैल के आकाश में जाते समय दैवयोग से उनमें से एक ने मुखिया से पूछा—'मन के अनुकूल फल देनेवाले स्वर्गलोक के प्रति हमारी उत्सुकता बढ़ाइए और यह बताइए कि तुमने कितने बड़े बड़े लड्डू वहाँ खाये थे ? ॥१९३—१९५॥
तब अपने मिससिल को भूलकर उस मूर्ख महन्त ने बैल की पूँछ छोड़ दी और दोनों हाथों को कमल की तरह मिलाकर कहा—'इतने-इतने बड़े' ॥१९६॥
जब वह उन्हें हाथ के इंगित से बता ही रहा था कि तबतक वे सब के-सब मूर्ख खड़-मुड़ होकर आकाश से नीचे गिर गये और बैल अपनी तीव्र गति से कैलास को चला गया। यह देखकर जनता पेट पकड़कर हँसने सभी मूर्खों की प्रश्नोत्तर-क्रिया भी विवेक-रहित होती है ॥१९७-१९९॥
महाराज तुमने आकाश में जानेवाले मूर्ख सुने। अब दूसरे को सुनिए एक मूर्ख मार्ग में चलते हुए सही मार्ग भूलकर विपरीत मार्ग पर जा रहा था। लोगों से पूछने पर उन्होंने कहा कि 'नदी के किनारे जो पेड़ है उसके ऊपर के मार्ग से जाओ। वह मूर्ख पेड़ के पीछे जाकर उस पर चढ़ गया। डाल पर चलते हुए उस पेड़ की लचीली पतली डालियाँ नीचे झुक गईं। किन्तु उसने अगली डाल को हाथ से पकड़ लिया और नदी के ऊपर झूलने लगा। क्योंकि लोगों ने उसे पेड़ के पीछे से जाने को बताया था ॥२००-२०१॥ १२१
१५२ कथासरित्सागर
१५२ कथासरित्सागर शाखामारुम्ब्य स्थितो यावत्तावत्तेनाययौ पथा। आरोहेष्वोपरिस्थेन नद्यां पीतजलः करी ॥२०४॥ स दृष्ट्वा तरुशाखाग्रलम्बी भीतः स दीनवाक्। महात्मन् मां गृहाणेति हस्त्यारोहमुवाच तम् ॥२ ५॥ हस्त्यारोहश्च भीतः समवतारयितुं तरोः। पादयोरग्रहीद्द्वाभ्यां पाणिभ्यामुज्झिताङ्कुशः ॥२०६॥ तावच्च निर्गत्य गते गजे भीतस्य तस्य सः। ललम्बे पादयोर्हस्तिपको वृक्षाग्रलम्बिनः ॥२०७॥ ततः स स्वरमभीतो हस्त्यारोहं तमभ्यधात्। यदि जानासि तच्छीघ्रं यत्किञ्चिद् गीयतां त्वया ॥२०८॥ इतोऽवसारयञ्जातु यच्छ्रुत्वागत्य नौ जनः। पतिताव यथाधस्ताद्रेखाबामिय नदी ॥२०९॥ इत्युक्तः स गजारोहस्तेन मञ्जु तथा जगौ। यथा स एव भीतोऽद्य परितोषमगात् परम् ॥२१०॥ साधुवादं च स ददद्विस्मृतोज्झितपादपः। दातुं प्रावर्तत द्वाभ्यां हस्ताभ्यां छोटिकां जडः ॥२११॥ तत्क्षणं विनिपत्यैव सहस्त्यारोह एव सः। नद्यां विपप्रे मूर्धहि सङ्गः कस्यास्ति शर्मणे ॥२१२॥ इत्याख्याय कथां भूयो वत्सेश्वरसुतां सः। गोमुखः कथयामास हिरण्याक्षकथामिमाम् ॥२१३॥ हिरण्याक्ष कथा अस्तीह हिमवत्कुक्षौ देशः पृथ्वीशिरोमणिः। कद्मीर इति विद्वानां धर्मस्य च निकेतनम् ॥२१४॥ तत्राधिष्ठानमभवद्धिरण्यपुरनामकम् । कनकप्रभ इति ख्यातस्तस्मिन् राजा बभूव च ॥२१५॥ तस्य रत्नप्रभादेव्यां शङ्कराराधनोद्भवः। पुत्रो हिरण्याक्ष इति क्ष्मापतेरुपपद्यत ॥२१६॥ स जातु गुलिकाक्रीडां कुर्वन् गुलिकया छलात्। तापसीं राजतन्तव्यां मार्गायातामताडयत् ॥२१७॥ सा तापसी जितक्रोधा राजपुत्रं विहस्य तम्। वागीश्वरी हिरण्याक्षमुवाच विवृतानना ॥२१८॥ स्वयौवनादिकरीदृग्मदधस्त्वं तां यदि। मृगाङ्कमगामाप्नोषि भार्यां तत्कीदृशो भवेत् ॥२१९॥