वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र १ ] अध्याय ३ २६३
व्याख्या—श्रुतियोंमें यह विषय कई जगह आया है, उनमेंसे जिस स्थलका वर्णन स्पष्ट है, वह तो अपने-आप समझमें आ जाता है; परंतु जहाँका वर्णन कुछ अस्पष्ट है, उसे स्पष्ट करनेके लिये यहाँ छान्दोग्योपनिषद्के प्रकरणपर विचार किया जाता है। वहाँ यह वर्णन है कि श्वेतकेतु नामसे प्रसिद्ध एक ऋषिकुमार था, वह एक समय पांचालोंकी सभामें गया। वहाँ प्रवाहण नामक राजाने उससे पूछा—'क्या तुम अपने पितासे शिक्षा पा चुके हो?' उसने कहा—'हाँ।' तब प्रवाहणने पूछा—'यहाँसे मरकर यह जीवात्मा कहाँ जाता है? वहाँसे फिर कैसे लौटकर आता है? देवयान और पितृयानमार्गका क्या अन्तर है? यहाँसे गये हुए लोगोंसे वहाँका लोक भर क्यों नहीं जाता?—इन सब बातोंको और जिस प्रकार पाँचवीं आहुतिमें यह जल पुरुषरूप हो जाता है, इस बातको तू जानता है या नहीं?' तब प्रत्येक बातके उत्तरमें श्वेतकेतुने यही कहा—'मैं नहीं जानता।' यह सुनकर प्रवाहणने उसे फटकारा और कहा—'जब तुम इन सब बातोंको नहीं जानते, तब कैसे कहते हो कि मैं शिक्षा पा चुका?' श्वेतकेतु लज्जित होकर पिताके पास गया और बोला कि 'प्रवाहण नामवाले एक साधारण क्षत्रियने मुझसे पाँच बातें पूछीं; किंतु उनमेंसे एकका भी उत्तर मैं न दे सका। आपने मुझे कैसे कह दिया था कि मैं तुमको शिक्षा दे चुका हूँ।' पिताने कहा—'मैं स्वयं इन पाँचोंमेंसे किसीको नहीं जानता, तब तुमको कैसे बताता।' उसके बाद अपने पुत्रके सहित पिता उस राजाके पास गया और धनादिके दानको स्वीकार न करके कहा—'आपने मेरे पुत्रसे जो पाँच बातें पूछी थी, उन्हें ही मुझे बतलाइये।' तब उस राजाने बहुत दिनोंतक उन दोनोंको अपने पास ठहराया और कहा कि 'आजतक यह विद्या क्षत्रियोंके पास ही रही है, अब पहले-पहल आप ब्राह्मणोंको मिल रही है।' यह कहकर राजा प्रवाहणने पहले उस पाँचवें प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया, जिसमें यह जिज्ञासा की गयी थी कि 'यह जल पाँचवीं आहुतिमें पुरुषरूप कैसे हो जाता है?' वहाँ द्युलोकरूप अग्निमें
२६४ वेदान्त-दर्शन [पाद १ श्रद्धाकी पहली आहुति देनेसे राजा सोमकी उत्पत्ति बतायी है। दूसरी आहुति है मेघरूप अग्निमें राजा सोमको हवन करना; उससे वर्षाकी उत्पत्ति बतायी गयी है। तीसरी आहुति है पृथिवीरूप अग्निमें वर्षाको हवन करना; उससे अन्नकी उत्पत्ति बतायी गयी है। चौथी आहुति है पुरुषरूप अग्निमें अन्नका हवन करना; उससे वीर्यकी उत्पत्ति बतायी गयी है और पाँचवीं आहुति है स्त्रीरूप अग्निमें वीर्यका हवन करना; उससे गर्भकी उत्पत्ति बताकर कहा है कि इस तरह यह जल पाँचवीं आहुतिमें 'पुरुष' संज्ञक होता है। इस प्रकार जन्म ग्रहण करनेवाला मनुष्य जबतक आयु होती है, तबतक यहाँ जीवित रहता है—इत्यादि (छा० उ० ५।३।१ से ५।९।२ तक)। इस प्रकरणमें जलके नामसे बीजरूप समस्त तत्त्वोंके समुदाय सूक्ष्म शरीरसहित वीर्यमें स्थित जीवात्मा कहा गया है; अतः वहाँके प्रश्नोत्तरपूर्वक विवेचनसे यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा जब एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है, तब बीजरूपमें स्थित समस्त तत्त्वोंसे युक्त होकर ही प्रयाण करता है। सम्बन्ध—"इस प्रकरणमें तो केवल जलका ही पुरुष हो जाना कहा है, फिर इसमें सभी सूक्ष्म तत्त्वोंका भी होना कैसे समझा जायगा, यदि श्रुतिको यही बताना अभीष्ट था तो केवल जलका ही नाम क्यों लिया?'' इस जिज्ञासापर कहते हैं— त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ॥ ३।१।२॥ त्र्यात्मकत्वात्=(शरीर) तीनों तत्त्वोंका सम्मिश्रण है, इसलिये (जलके कहनेसे सबका ग्रहण हो जाता है); तु=तथा; भूयस्त्वात्=वीर्यमें सबसे अधिक जलका भाग रहता है, इसलिये (जलके नामसे उसका वर्णन किया गया है)। व्याख्या—जगत्की उत्पत्तिके वर्णनमें कहा जा चुका है कि तीनों तत्त्वोंका सम्मेलन करके उसके बाद परमेश्वरने नाम और रूपको प्रकट किया (छा० उ० ६।३।३)। वहाँ तीन तत्त्वोंका वर्णन भी उपलब्ध है, उसमें सभी तत्त्वोंका मिश्रण समझ लेना चाहिये। स्त्रीके गर्भमें जिस वीर्यका आधान किया जाता है, उसमें सभी भौतिक तत्त्व रहते हैं तथापि जलकी अधिकता होनेसे
सूत्र ३ ] अध्याय ३ २६५ वहाँ उसीके नामसे उसका वर्णन किया गया है। वास्तवमें वह कथन शरीरके बीजभूत सभी तत्त्वोंको लक्ष्य करानेवाला है। एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाते समय जीव प्राणमें स्थित होकर जाते हैं और प्राणको आपोमय (जलरूप) कहा गया है, अतः उस दृष्टिसे भी वहाँ जलको ही पुरुषरूप बताना सर्वथा सुसंगत है। इसलिये यही सिद्ध हुआ कि जीवात्मा सूक्ष्म तत्त्वोंसे युक्त हुआ ही एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातकी पुष्टि करते हैं— प्राणगतेश्च ॥ ३ । १ । ३ ॥ प्राणगतेः = जीवात्माके साथ प्राणोंके गमनका वर्णन होनेसे; च = भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—प्रश्नोपनिषद्में आश्वलायन मुनिने पिप्पलादसे प्राणके विषयमें कुछ प्रश्न किये हैं। उनमेंसे एक प्रश्न यह भी है कि ‘यह एक शरीरको छोड़कर जब दूसरे शरीरमें जाता है, तब पहले शरीरसे किस प्रकार निकलता है?’ (प्र० उ० ३। १) उसके उत्तरमें पिप्पलादने कहा है कि ‘जब इस शरीरसे उदानवायु निकलता है, तब यह शरीर ठण्डा हो जाता है, उस समय जीवात्मा मनमें विलीन हुई इन्द्रियोंको साथ लेकर उदानवायुके सहित दूसरे शरीरमें चला जाता है। उस समय जीवात्माका जैसा संकल्प होता है, उस संकल्प और मन-इन्द्रियोंके सहित यह प्राणमें स्थित हो जाता है। वह प्राण उदानके सहित जीवात्माको उसके संकल्पानुसार भिन्न-भिन्न लोकों (योनियों)-में ले जाता है।’ (प्र० उ० ३। १० तक) इस प्रकार जीवात्माके साथ प्राण और मन-इन्द्रिय आदिके गमनका वर्णन होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि बीजरूप सभी सूक्ष्म तत्त्वोंके सहित यह जीवात्मा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है। छान्दोग्योपनिषद्में जो पहले-पहल श्रद्धाका हवन बताया गया है, वहाँ श्रद्धाके नामसे संकल्पका ही हवन समझना चाहिये। भाव यह कि श्रद्धारूप
२६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ संकल्पकी आहुतिसे जो उसके सूक्ष्म शरीरका निर्माण हुआ, वही पहला परिणाम राजा सोम हुआ; फिर उसका दूसरा परिणाम वर्षारूपसे मेघमें स्थिति है, तीसरे परिणाममें पहुँचकर वह अन्नमें स्थित हुआ; चौथे परिणाममें वीर्यरूपसे उसकी पुरुषमें स्थिति हुई और पाँचवें परिणाममें वह गर्भ होकर स्त्रीके गर्भाशयमें स्थित हुआ। तदनन्तर वही मनुष्य होकर बाहर आया। इस प्रकार दोनों स्थलोंके वर्णनकी एकता है। प्राणका सहयोग सभी जगह है; क्योंकि गति प्राणके अधीन है, प्राणको जलमय बताया ही गया है। इस प्रकार श्रुतिके समस्त वर्णनकी संगति बैठ जाती है। सम्बन्ध— अब दूसरे प्रकारके विरोधका उल्लेख करके उसका निराकरण करते हैं— अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात्॥ ३।१।४॥ चेत्=यदि कहो कि; अग्न्यादिगतिश्रुतेः=अग्नि आदिमें प्रवेश करनेकी बात दूसरी श्रुतिमें कही है, इसलिये (यह सिद्ध नहीं होता); इति न=तो यह ठीक नहीं है; भाक्तत्वात्=क्योंकि वह श्रुति अन्यविषयक होनेसे गौण है। व्याख्या—यदि कहो, “बृहदारण्यकके आर्तभाग और याज्ञवल्क्यके संवादमें यह वर्णन आया है कि 'मरणकालमें वाणी अग्निमें विलीन हो जाती है, प्राण वायुमें विलीन हो जाते हैं'—इत्यादि (बृह० उ० ३।२।१३) इससे यह कहना सिद्ध नहीं होता कि जीवात्मा दूसरे तत्त्वोंके सहित जाता है, क्योंकि वे सब तो अपने-अपने कारणमें यहीं विलीन हो जाते हैं।” तो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह बात आर्तभागने प्रश्नमें तो कही है, पर याज्ञवल्क्यने उत्तरमें इसे स्वीकार नहीं किया, बल्कि सभासे अलग ले जाकर उसे गुप्तरूपसे वही पाँच आहुतियोंवाली बात समझायी—यह अनुमान होता है; क्योंकि उसके बाद श्रुति कहती है कि 'उन्होंने जो कुछ वर्णन किया, निस्संदेह वह कर्मका ही वर्णन था। मनुष्य पुण्यकर्मोंसे पुण्यशील होता है और पापकर्मसे पापी होता है।' छान्दोग्यके प्रकरणमें भी बादमें यही बात कही गयी है, इसलिये वर्णनमें कोई भेद नहीं। वह श्रुति प्रश्नविषयक होनेसे गौण है, उत्तरकी बात
सूत्र ५-६ ] अध्याय ३ २६७
सूत्र ५-६ ] अध्याय ३ २६७ ही ठीक है। उत्तर इसलिये गुप्त रखा गया कि सभाके बीचमें गर्भाधानका वर्णन करना कुछ संकोचकी बात है; सभामें तो स्त्री-बालक सभी सुनते हैं। सम्बन्ध - पुनः विरोध उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ॥ ३ । १ । ५ ॥ चेत्=यदि कहा जाय कि; प्रथमे=प्रथम आहुतिके वर्णनमें; अश्रवणात्= (जलका नाम) नहीं सुना गया है, इसलिये (अन्तमें यह कहना कि पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष नामवाला हो जाता है, विरुद्ध है); इति न=तो ऐसी बात नहीं है; हि=क्योंकि; उपपत्तेः=पूर्वापरकी संगतिसे (यही सिद्ध होता है कि); ताः एव=(वहाँ) श्रद्धाके नामसे उस जलका ही कथन है। व्याख्या-यदि कहो कि पहले-पहल श्रद्धाको हवनीय द्रव्यका रूप दिया गया है, अतः उसीके परिणाम सब हैं, इस स्थितिमें यह कहना कि पाँचवीं आहुतिमें जल ही पुरुष नामवाला हो जाता है, विरुद्ध प्रतीत होता है। तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वहाँ श्रद्धाके नामसे संकल्पमें स्थित जल आदि समस्त सूक्ष्मतत्त्वोंका ग्रहण है और अन्तमें भी उसीको जल नामसे कहा गया है, इसलिये कोई विरोध नहीं है। भाव यह कि जीवात्माकी गति उसके अन्तिम संकल्पानुसार होती है और वह प्राणके द्वारा ही होती है तथा श्रुतिमें प्राणको जलमय बताया है अतः संकल्पके अनुसार जो सूक्ष्म तत्त्वोंका समुदाय प्राणमें स्थित होता है, उसीको वहाँ श्रद्धाके नामसे कहा गया है। वह कथन गतिमें संकल्पकी प्रधानता दिखानेके लिये है। इस प्रकार पहले-पहल जो बात श्रद्धाके नामसे कही गयी है, उसीका अन्तिम वाक्यमें जलके नामसे वर्णन किया है; अतः पूर्वापरमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध - पहलेकी भाँति दूसरे विरोधकी उत्थापना करके उसका निराकरण करते हैं— अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां प्रतीतेः ॥ ३ । १ । ६ ॥ चेत्=यदि ऐसा कहा जाय कि; अश्रुतत्वात् = श्रुतिमें तत्त्वोंके साथ
२६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
जीवात्माके गमनका वर्णन नहीं है, इसलिये (उनके सहित जीवात्मा जाता है, यह कहना युक्तिसंगत नहीं है); इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; इष्टादिकारिणाम्=(क्योंकि) उसी प्रसंगमें अच्छे-बुरे कर्म करनेवालोंका वर्णन है; प्रतीते:=अतः इस श्रुतिमें उन शुभाशुभकारी जीवात्माओंके वर्णनकी प्रतीति स्पष्ट है, इसलिये (उक्त विरोध यहाँ नहीं है)। व्याख्या—यदि कहो कि उस प्रकरणमें जीवात्मा उन तत्त्वोंको लेकर जाता है, ऐसी बात नहीं कही गयी है, केवल जलके नामसे तत्त्वोंका ही पुरुषरूपमें हो जाना बताया गया है, इसलिये यह कहना विरुद्ध है कि तत्त्वोंसे युक्त जीवात्मा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उसी प्रकरणमें आगे चलकर कहा है कि 'जो अच्छे आचरणोंवाले होते हैं वे उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं और जो नीच कर्म करनेवाले होते हैं, वे नीच योनिको प्राप्त होते हैं।'* (छा० उ० ५।१०।७) इस वर्णनसे अच्छे-बुरे कर्म करनेवाले जीवात्माका उन तत्त्वोंके साथ एक शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होना सिद्ध होता है, इसलिये कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—इसी प्रकरणमें जहाँ सकामभावसे शुभ कर्म करनेवालोंके लिये धूममार्गसे स्वर्गमें जानेकी बात कही गयी है, वहाँ ऐसा वर्णन आता है कि 'वह स्वर्गमें जानेवाला पुरुष देवताओंका अन्न है, देवतालोग उसका भक्षण करते हैं' (बृह० उ० ६।२।१६)। अतः यह कहना कैसे संगत होगा कि पुण्यात्मालोग अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये स्वर्गमें जाते हैं। जब वे स्वयं ही देवताओंके भोग बन जाते हैं तब उनके द्वारा स्वर्गका भोग भोगना कैसे सिद्ध होगा? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भाक्तं वानात्मवित्त्वात्तथा हि दर्शयति ॥ ३।१।७॥ अनात्मवित्त्वात्=वे लोग आत्मज्ञानी नहीं हैं, इस कारण (आत्मज्ञानीकी * तद् य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन्।
सूत्र ७ ] अध्याय ३ २६९
सूत्र ७ ] अध्याय ३ २६९ अपेक्षा उनकी हीनता दिखानेके लिये), वा=ही; भाक्तम्=उनको देवताओंका अन्न बतानेवाली श्रुति गौण है; हि=क्योंकि; तथा=उस प्रकारसे (उनका हीनत्व और स्वर्गलोकमें नाना प्रकारके भोगोंको भोगना) भी; दर्शयति=श्रुति दिखलाती है। व्याख्या—वे सकामभावसे शुभ कर्म करनेवाले लोग आत्मज्ञानी नहीं हैं, अतः आत्मज्ञानकी स्तुति करनेके लिये गौणरूपसे उनको देवताओंका अन्न और देवताओंद्वारा उनका भक्षण किया जाना कहा गया है, वास्तवमें तो श्रुति यह कहती है कि 'देवतालोग न खाते हैं और न पीते हैं, इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं।' (छा० उ० ३।६।१)१ अतः इस कथनका यह भाव है कि राजाके नौकरोंकी भाँति वह देवताओंके भोग्य यानी सेवक होते हैं। इस भावके वचन श्रुतिमें दूसरी जगह भी पाये जाते हैं—'जो उस परमेश्वरको न जानकर दूसरे देवताओंकी उपासना करता है, वह—जैसे यहाँ लोगोंके घरोंमें पशु होते हैं, वैसे ही—देवताओंका पशु होता है।' (बृह० उ० १। ४।१०)२ आत्मज्ञानकी स्तुतिके लिये इस प्रकार कहना उचित ही है। इसके सिवा, वे शुभ कर्मवाले लोग देवताओंके साथ आनन्दका उपभोग करते हैं, इसका श्रुतिमें इस तरह वर्णन किया गया है—'पितृलोकपर विजय पानेवालोंकी अपेक्षा सौगुना आनन्द कर्मोंसे देवभावको प्राप्त होनेवालोंको होता है ३।' तथा गीतामें भी इस प्रकार कहा गया है— ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥ 'वे वहाँ विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मृत्युलोकमें लौट आते हैं। इस प्रकार वेदोक्त धर्मका आचरण करनेवाले वे १-'न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥' २-'अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते······यथा पशुरेवँस देवानाम्।' ३-अथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः·········स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसम्पद्यन्ते। (बृह० उ० ४।३।३३)
२७० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ भोगकामी मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते रहते हैं।' (गीता ९।२१) इसलिये यह सिद्ध हुआ कि उनको देवताओंका अन्न कहना वहाँ गौणरूपसे है, वास्तवमें वहाँ जाकर वे अपने कर्मोंका ही फल भोगते हैं और फिर वहाँसे वापस लौट आते हैं। अतः जीवात्माका एक शरीरसे दूसरे शरीरमें सूक्ष्म तत्त्वोंके सहित जाना सर्वथा सुसंगत है, इसमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है। सम्बन्ध—"उक्त प्रकरणमें कहा गया है कि 'जबतक उसके कर्मोंका क्षय नहीं हो जाता, तबतक वह वहीं रहता है, फिर वहाँसे इस लोकमें लौट आता है' अतः प्रश्न होता है कि उसके सभी पुण्यकर्म पूर्णतया समाप्त हो जाते हैं या कुछ कर्म शेष रहता है, जिसे साथ लेकर वह लौटता है।" इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं— कृतात्ययेऽनुशयवान्दृष्टस्मृतिभ्यां यथेतमनेवं च ॥ ३ । १ । ८ ॥ कृतात्यये=किये हुए पुण्य कर्मोंका क्षय होनेपर, अनुशयवान्=शेष कर्मसंस्कारोंसे युक्त (जीवात्मा); यथेतम्=जैसे गया था उसी मार्गसे; च= अथवा; अनेवम्=इससे भिन्न किसी दूसरे प्रकारसे लौट आता है; दृष्टस्मृतिभ्याम्=श्रुति और स्मृतियोंसे (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—उस जीवके द्वारा किये हुए कर्मोंमेंसे जिनका फल भोगनेके लिये उसे स्वर्गलोकमें भेजा गया है, उन पुण्यकर्मोंका पूर्णतया क्षय हो जानेपर वह स्वर्गस्थ जीवात्मा अनुशयसे अर्थात् शेष कर्मसंस्कारोंसे युक्त होकर जिस मार्गसे गया था, उसीसे अथवा किसी दूसरे प्रकारसे लौट आता है। इस प्रकरणमें जो यह बात कही गयी है—'तद् य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्......अथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन्।' अर्थात् 'अच्छे आचरणोंवाले अच्छी योनिको प्राप्त होते हैं और बुरे आचरणोंवाले बुरी योनियोंको प्राप्त होते हैं।' (छा० उ० ५।१०।७) इस वर्णनसे यही सिद्ध होता है तथा स्मृतिमें जो यह कहा गया है कि 'जो वर्णाश्रमी मनुष्य अपने कर्मोंमें स्थित रहनेवाले
सूत्र ९-१० ] अध्याय ३ २७१ हैं, वे यहाँसे स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ कर्मोंका फल भोगकर बचे हुए कर्मोंके अनुसार अच्छे जन्म, कुल, रूप आदिको प्राप्त होते हैं।' (गौतमस्मृति ११।१) इस स्मृतिवाक्यसे भी यही बात सिद्ध होती है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे विरोधकी उत्थापना करके उसका निराकरण करते हैं— चरणादिति चेन्नोपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ॥ ३ । १ । ९ ॥ चेत् = यदि ऐसा कहो कि; चरणात् = चरण शब्दका प्रयोग है, इसलिये (यह कहना उचित नहीं है कि वह शेष कर्मसंस्कारोंको साथ लेकर आता है); इति न = तो ऐसी बात नहीं है; उपलक्षणार्था = क्योंकि वह कथन अनुशय (शेष कर्म-संस्कारों)-का उपलक्षण करनेके लिये है; इति = यह बात; कार्ष्णाजिनिः = 'कार्ष्णाजिनि' नामक आचार्य कहते हैं (इसलिये कोई विरोध नहीं है)। व्याख्या—उपर्युक्त शंकाका उत्तर अपनी ओरसे न देकर आचार्य कार्ष्णाजिनिका मत उपस्थित करते हुए सूत्रकार कहते हैं—यदि पूर्वपक्षीद्वारा यह कहा जाय कि “यहाँ 'रमणीयचरणाः' इत्यादि श्रुतिमें तो चरण शब्दका प्रयोग है, जो कर्मसंस्कारका वाचक नहीं है; इसलिये यह सिद्ध नहीं होता कि जीवात्मा स्वर्गलोकसे लौटते समय बचे हुए कर्मसंस्कारोंको साथ लिये हुए लौटता है'' तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि वहाँ जो 'चरण' शब्द है, वह अनुशयका उपलक्षण करानेके लिये है अर्थात् यह सूचित करनेके लिये ही है कि जीवात्मा भुक्तशेष कर्मसंस्कारोंको साथ लेकर लौटता है, अतः कोई दोष नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनमें पुनः शंका उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ॥ ३ । १ । १० ॥ चेत् = यदि कहो; आनर्थक्यम् = (बिना किसी कारणके उपलक्षणके रूपमें 'चरण' शब्दका प्रयोग करना) निरर्थक है; इति न = तो यह ठीक नहीं; तदपेक्षत्वात् = क्योंकि कर्माशयमें आचरण आवश्यक है।
२७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
२७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—यदि यह कहा जाय कि यहाँ 'चरण' शब्दको बिना किसी कारणके कर्मसंस्कारका उपलक्षण मानना निरर्थक है, इसलिये उपर्युक्त उत्तर ठीक नहीं है, तो ऐसी बात नहीं है, उपर्युक्त उत्तर सर्वथा उचित है, क्योंकि कर्मसंस्काररूप अनुशय पूर्वकृत शुभाशुभ आचरणोंसे ही बनता है, अतः कर्माशयके लिये आचरण अपेक्षित है, इसलिये, 'चरण' शब्दका प्रयोग निरर्थक नहीं है। सम्बन्ध—अब पूर्वोक्त शंकाके उत्तरमें महर्षि बादरिका मत प्रस्तुत करते हैं— सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ॥ ३ । १ । ११ ॥ बादरिः तु=बादरि आचार्य तो, इति=ऐसा (मानते हैं कि); सुकृत- दुष्कृते=इस प्रकरणमें 'चरण' नामसे शुभाशुभ कर्म; एव=ही कहे गये हैं। व्याख्या—आचार्य श्रीबादरिका कहना है कि यहाँ उपलक्षण माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है; यहाँ 'रमणीयचरण' शब्द पुण्यकर्मोंका और 'कपूयचरण' शब्द पापकर्मका ही वाचक है। अतः यह समझना चाहिये कि जो रमणीयचरण हैं, वे शुभ कर्माशयवाले हैं और जो कपूयचरण हैं वे पाप कर्माशयवाले हैं। इसलिये यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा बचे हुए कर्मसंस्कारोंको साथ लिये हुए ही लौटता है। सम्बन्ध—अब पूर्वपक्षी पुनः शंका उपस्थित करता है— अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ॥ ३ । १ । १२ ॥ च=किंतु; अनिष्टादिकारिणाम्=अशुभ आदि कर्म करनेवालोंका; अपि=भी (चन्द्रलोकमें जाना); श्रुतम्=वेदमें सुना गया है। व्याख्या—कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद्में कहा है कि 'ये वैके चास्माल्लोकात् प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति।' ( १।२) अर्थात् 'जो कोई भी इस लोकसे जाते हैं, वे सब चन्द्रमाको ही प्राप्त होते हैं।' इस प्रकार यहाँ कोई विशेषण न देकर सभीका चन्द्रलोकमें जाना कहा
सूत्र १३ ] अध्याय ३ २७३
सूत्र १३ ] अध्याय ३ २७३ गया है। इससे तो बुरे कर्म करनेवालोंका भी स्वर्गलोकमें जाना सिद्ध होता है, अतः श्रुतिमें जो यह कहा गया है कि इष्टापूर्त और दानादि शुभ कर्म करनेवाले धूममार्गसे चन्द्रलोकको जाते हैं, उसके साथ उपर्युक्त श्रुतिका विरोध प्रतीत होता है; उसका निराकरण कैसे होगा ? सम्बन्ध — पूर्वसूत्रमें उपस्थित की हुई शंकाका उत्तर देते हैं— संयमने त्वनुभूयेतरेषामारोहावरोहौ तद्गति- दर्शनात् ॥ ३ । १ । १३ ॥ तु=किंतु; इतरेषाम्=दूसरोंका अर्थात् पापकर्म करनेवालोंका; संयमने= यमलोकमें; अनुभूय=पापकर्मोंका फल भोगनेके बाद; आरोहावरोहौ=चढ़ना- उतरना होता है; तद्गतिदर्शनात्=क्योंकि उनकी गति श्रुतिमें इसी प्रकार देखी जाती है। व्याख्या — वहाँ पापीलोगोंका चन्द्रलोकमें जाना नहीं कहा गया है; क्योंकि पुण्यकर्मोंका फल भोगनेके लिये ही स्वर्गलोकमें जाना होता है; चन्द्रलोकमें बुरे कर्मोंका फल भोगनेकी व्यवस्था नहीं है; इसलिये यही समझना चाहिये कि अच्छे कर्म करनेवाले ही चन्द्रलोकमें जाते हैं। उनसे भिन्न जो पापीलोग हैं, वे अपने पापकर्मोंका फल भोगनेके लिये यमलोकमें जाते हैं; वहाँ पापकर्मोंका फल भोग लेनेके बाद उनका पुनः कर्मानुसार गमनागमन यानी नरकसे मृत्युलोकमें आना और पुनः नये कर्मानुसार स्वर्गमें जाना या नरक आदि अधोगतिको पाना होता रहता है। उन लोगोंकी गतिका ऐसा ही वर्णन श्रुतिमें देखा जाता है। कठोपनिषद्में यमराजने स्वयं कहा है कि— न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्। अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे॥ 'सम्पत्तिके अभिमानसे मोहित हुए, निरन्तर प्रमाद करनेवाले अज्ञानीको परलोक नहीं दीखता। वह समझता है कि यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला लोक ही सत्य है, दूसरा कोई लोक नहीं, इस प्रकार माननेवाला मनुष्य बार-बार मेरे वशमें पड़ता है।' (कठ० १।२।६) इससे यही सिद्ध होता है कि शुभ कर्म
२७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ करनेवाला ही पितृयानमार्गसे या अन्य मार्गसे स्वर्गलोकमें जाता है, पापीलोग यमलोकमें जाते हैं। कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद्में जिनके चन्द्रलोकमें जानेकी बात कही गयी है, वे सब पुण्यकर्म करनेवाले ही हैं; क्योंकि उसी श्रुतिमें चन्द्रलोकसे लौटनेवालोंकी कर्मानुसार गति बतायी गयी है। इसलिये दोनों श्रुतियोंमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—इसी बातको दृढ़ करनेके लिये स्मृतिका प्रमाण देते हैं— स्मरन्ति च॥ ३ । १ । १४॥ च=तथा; स्मरन्ति=स्मृतिमें भी इसी बातका समर्थन किया गया है। व्याख्या—गीतामें सोलहवें अध्यायके ७ वें श्लोकसे १५ वें श्लोकतक आसुरी प्रकृतिवाले पापी पुरुषोंके लक्षणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन करके अन्तमें कहा है कि ‘वे अनेक प्रकारके विचारोंसे भ्रान्त हुए, मोहजालमें फँसे हुए और भोगोंके उपभोगमें रचे-पचे हुए मूढ़लोग कुम्भीपाक आदि अपवित्र नरकोंमें गिरते हैं (गीता १६। १६)। इस प्रकार स्मृतिके वर्णनसे भी उसी बातका समर्थन होता है। अतः पापकर्मियोंका नरकमें गमन होता है; यही मानना ठीक है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको कहते हैं— अपि च सप्त ॥ ३ । १ । १५ ॥ अपि च=इसके सिवा; सप्त=पापकर्मका फल भोगनेके लिये प्रधानतः सात नरकोंका भी वर्णन आया है। व्याख्या—इसके सिवा, पापकर्मोंका फल भोगनेके लिये पुराणोंमें प्रधानतासे रौरव आदि सात नरकोंका भी वर्णन किया गया है, इससे उन पापकर्मियोंके स्वर्गगमनकी तो सम्भावना ही नहीं की जा सकती। सम्बन्ध—नरकोंमें तो चित्रगुप्त आदि दूसरे अधिकारी बताये गये हैं, फिर यह कैसे कहा कि पापीलोग यमराजके अधिकारमें दण्ड भोगते हैं? इसपर कहते हैं—
सूत्र १६-१७ ] अध्याय ३ २७५
सूत्र १६-१७ ] अध्याय ३ २७५ तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ॥ ३।१।१६॥ च=तथा; तत्र=उन यातनाके स्थानोंमें; अपि=भी; तद्व्यापारात्=उस यमराजके ही आज्ञानुसार कार्य होनेसे; अविरोधः=किसी प्रकारका विरोध नहीं है। व्याख्या—यातना भोगनेके लिये जो रौरव आदि सात नरक बताये गये हैं और वहाँ जो चित्रगुप्त आदि दूसरे अधिकारी हैं, वे ही यमराजके आज्ञानुसार कार्य करते हैं, इसलिये उनका किया हुआ कार्य भी यमराजका ही कार्य है। अतः यमराजके अधिकारमें पापियोंके दण्ड भोगनेकी जो बात कही गयी है, उसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—ऐसा मान लेनेपर भी पूर्वोक्त श्रुतिमें जो सबके चन्द्रलोकमें जानेकी बात कही गयी, उसकी संगति (कौ० १।२) कैसे होगी? इसपर कहते हैं— विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ॥ ३।१।१७॥ विद्याकर्मणोः=ज्ञान और शुभ कर्म—इन दोनोंका; तु=ही; प्रकृतत्वात्= प्रकरण होनेके कारण; इति=ऐसा कथन उचित ही है। व्याख्या—जिस प्रकार छान्दोग्योपनिषद् (५।१०।१)-में विद्या और शुभ कर्मोंका फल बतानेका प्रसंग आरम्भ करके देवयान और पितृयान-मार्गकी बात कही गयी है, उसी प्रकार वहाँ कौषीतकि- ब्राह्मणोपनिषद्में भी ज्ञान और शुभ कर्मोंका फल बतानेके प्रकरणमें ही उक्त कथन है। इसलिये यह समझना चाहिये कि जो शुभ कर्म करनेवाले अधिकारी मनुष्य इस लोकसे जाते हैं, वे ही सब-के-सब चन्द्रलोकको जाते हैं, अनिष्ट कर्म करनेवाले नहीं; क्योंकि उनका प्रकरण नहीं है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'कठोपनिषद्में जो पापियोंके लिये यमलोकमें जानेकी बात कही गयी है, वह छान्दोग्य-श्रुतिमें बतायी हुई तीसरी गतिके अन्तर्गत है या उससे भिन्न?' इसके उत्तरमें कहते हैं—
२७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
२७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ न तृतीये तथोपलब्धेः ॥ ३।१।१८॥ तृतीये=वहाँ कही हुई तीसरी गतिमें; न=(यमलोकगमनरूप गतिका) अन्तर्भाव नहीं होता; तथा उपलब्धेः=क्योंकि उस वर्णनमें ऐसी ही बात मिलती है। व्याख्या—वहाँ छान्दोग्योपनिषद् (५।१०।८)-में यह बात कही गयी है कि ‘अथैतयोः पथोर्न कतरेण च नतानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयँ स्थानम्।’ अर्थात् देवयान और पितृयान—इन दोनों मार्गोंमेंसे किसी भी मार्गसे जो ऊपरके लोकोंमें नहीं जाते, वे क्षुद्र तथा बार-बार जन्मने-मरनेवाले प्राणी होते हैं; ‘उत्पन्न होओ और मरो’—यह मृत्युलोक ही उनका तीसरा स्थान है। इत्यादि। इस वर्णनमें यह पाया जाता है कि उनका किसी भी परलोकमें गमन नहीं होता, वे इस मृत्युलोकमें ही जन्मते-मरते रहते हैं। इसलिये इस तीसरी गतिमें यमयातनारूप नरकलोकवाली गतिका अन्तर्भाव नहीं है। सम्बन्ध—इन तीन गतियोंके सिवा चौथी गति जिसमें नरकयातना आदिका भोग है तथा जो ऊपर कही हुई तीसरी गतिसे भी अधम गति है, उसका वर्णन कहाँ आता है, इसपर कहते हैं— स्मर्यतेऽपि च लोके ॥ ३।१।१९॥ स्मर्यते=स्मृतियोंमें इसका समर्थन किया गया है; च=तथा; लोके= लोकमें; अपि=भी (यह बात प्रसिद्ध है)। व्याख्या—श्रीमद्भगवद्गीता (१४।१८)-में कहा है कि— ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥ ‘सत्त्वगुणमें स्थित रहकर मरनेवाले लोग ऊपरके लोकोंमें जाते हैं (देवयान और पितृयान—दोनों मार्ग इसके अन्तर्गत हैं), राजसी लोग बीचमें अर्थात् इस मनुष्यलोकमें ही जन्मते-मरते रहते हैं (यह छान्दोग्यमें बतायी हुई तीसरी गतिके अन्तर्गत है)। निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित तामसी जीव
सूत्र २० ] अध्याय ३ २७७
सूत्र २० ] अध्याय ३ २७७ नीचेके लोकोंमें जाते हैं' (इसीके अन्तर्गत उक्त तीसरी गतिसे अधम यह यमयातनास्वरूप गति भी है) इसका स्पष्टीकरण गीता अध्याय १६ श्लोक २०में किया गया है। इस प्रकार इस यमयातनास्वरूप अधोगतिका वर्णन स्मृतियोंमें पाया जाता है तथा लोकमें भी यह प्रसिद्ध है। पुराणोंमें तो इसका वर्णन बड़े विस्तारसे आता है। इसको अधोगति कहते हैं, इसलिये वहाँसे जो नारकी जीवोंका पुन: मृत्युलोकमें आना है, वह उनका पूर्व कथनके अनुसार ऊपर उठना है और पुन: नरकमें जाना ही नीचे गिरना है। सम्बन्ध— अब दूसरा प्रमाण देकर उसी बातको सिद्ध करते हैं— दर्शनाच्च ॥ ३ । १ । २० ॥ दर्शनात्=श्रुतिमें भी ऐसा वर्णन देखा जाता है, इसलिये; च=भी (यह मानना ठीक है कि इस प्रकरणमें बतायी हुई तीसरी गतिमें यमयातनाका अन्तर्भाव नहीं है)। व्याख्या—ईशावास्योपनिषद्में कहा है— असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः। ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥ (ईशा० ३) 'जो असुरोंके प्रसिद्ध लोक हैं, वे सब-के-सब अज्ञान तथा दुःख- क्लेशरूप महान् अन्धकारसे आच्छादित हैं, जो कोई भी आत्माकी हत्या करनेवाले मनुष्य हैं, वे मरनेके बाद उन्हीं भयंकर लोकोंको बार-बार प्राप्त होते हैं।' इस प्रकार उपनिषदोंमें भी उस नरकादि लोकोंकी प्राप्तिरूप गतिका वर्णन देखा जाता है। इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि इस प्रसंगमें कही हुई तीसरी गतिमें यमयातनावाली गतिका अन्तर्भाव नहीं है। सम्बन्ध— यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद्में जीवोंकी तीन श्रेणियाँ बतायी गयी हैं—अण्डज—अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले, जीवज— जेरसे उत्पन्न होनेवाले और उद्भिज्ज—पृथ्वी फोड़कर उत्पन्न होनेवाले (छा० उ० ६ । ३ । १); किंतु दूसरी जगह जीवोंके चार भेद सुने जाते हैं।
२७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
२७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ यहाँ चौथी स्वेदज अर्थात् पसीनेसे उत्पन्न होनेवाली श्रेणीको क्यों छोड़ा गया ? इसपर कहते हैं— तृतीयशब्दावरोधः संशोकजस्य ॥ ३ । १ । २१ ॥ संशोकजस्य = पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले जीवसमुदायका; तृतीयशब्दा- वरोधः = तीसरे नामवाली उद्भिज्ज-जातिमें संग्रह (समझना चाहिये)। व्याख्या—इस प्रकरणमें जो पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले स्वेदज जीवोंका वर्णन नहीं हुआ, उसका श्रुतिमें तीसरे नामसे कही हुई उद्भिज्ज-जातिमें अन्तर्भाव समझना चाहिये; क्योंकि दोनों ही पृथिवी और जलके संयोगसे उत्पन्न होते हैं। सम्बन्ध—अब स्वर्गलोकसे लौटनेकी गतिपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। छान्दोग्योपनिषद् (५ । १० । ५, ६)- में कहा गया है कि स्वर्गसे लौटनेवाले जीव पहले आकाशको प्राप्त होते हैं, आकाशसे वायु, धूम, मेघ आदिके क्रमसे उत्पन्न होते हैं। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीव उन-उन आकाश आदिके रूपमें स्वयं परिणत होते हैं या उनके समान हो जाते हैं? इसपर कहते हैं— तत्साभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ॥ ३ । १ । २२ ॥ तत्साभाव्यापत्तिः = उनके सदृश भावकी प्राप्ति होती है; उपपत्तेः = क्योंकि यही बात युक्तिसे सिद्ध होती है। व्याख्या—यहाँ जो आकाश, वायु आदि बनकर लौटनेकी बात कही गयी है, इस कथनसे जीवात्माका उन-उन तत्त्वोंके रूपमें परिणत होना युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि आकाश आदि पहलेसे विद्यमान हैं और जीवात्मा जब एकके बाद दूसरे भावको प्राप्त हो जाते हैं उसके बाद भी वे आकाशादि पदार्थ रहते ही हैं। इसलिये यही मानना युक्तिसंगत है कि वे उन आकाश आदिके सदृश आकारवाले बनकर लौटते हैं। उनका आकाशके सदृश सूक्ष्म हो जाना ही आकाशको प्राप्त होना है। इसी प्रकार वायु आदिके विषयमें भी समझ लेना चाहिये।
सूत्र २३-२४] अध्याय ३ २७९
सूत्र २३-२४] अध्याय ३ २७९ सम्बन्ध- अब यह जिज्ञासा होती है कि वे जीव उन-उन तत्त्वोंके आकारमें बहुत दिनोंतक टिके रहते हैं या तत्काल ही क्रमसे नीचे उतरते जाते हैं, इसपर कहते हैं— नातिचिरेण विशेषात् ॥ ३ । १ । २३ ॥ विशेषात् = ऊपर गमनकी अपेक्षा नीचे उतरनेकी परिस्थितिमें भेद होनेके कारण; नातिचिरेण = जीव उन आकाश, वायु आदिके रूपमें अधिक कालतक न रहकर क्रमश: नीचे उतर आते हैं। व्याख्या—ऊपरके लोकमें जानेका जो वर्णन है, वह कर्मोंके फलभोगसे सम्बन्ध रखता है, इसलिये बीचमें आये हुए पितृलोक आदिमें विलम्ब होना भी सम्भव है, परंतु लौटते समय कर्मभोग तो समाप्त हो जाते हैं, इसलिये बीचमें कहीं विलम्ब होनेका कोई कारण नहीं रहता। इस प्रकार ऊपरके लोकोंमें जाने और वहाँसे लौटनेकी गतिमें विशेषता होनेके कारण यही सिद्ध होता है कि लौटते समय रास्तेमें विलम्ब नहीं होता। सम्बन्ध— अब यह जिज्ञासा होती है कि परलोकसे लौटनेवाले उस जीवात्माका जो धान, जौ, तिल और उड़द आदिके रूपमें होना कहा गया है, उसका क्या भाव है। क्या वह स्वयं वैसा बन जाता है या उस योनिको भोगनेवाला जीवात्मा कोई दूसरा होता है, जिसके साथमें यह भी रहता है? इसपर कहते हैं— अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिलापात् ॥ ३ । १ । २४ ॥ पूर्ववत् = पहलेकी भाँति ही; अभिलापात् = यह कथन है इसलिये; अन्याधिष्ठितेषु = दूसरे जीवात्मा अपने कर्मफलभोगके लिये जिनमें स्थित हो रहे हैं, ऐसे धान, जौ आदिमें केवल सन्निधिमात्रसे इसका निवास है। व्याख्या-जिस प्रकार पूर्वसूत्रमें यह बात कही गयी है कि वह लौटनेवाला जीवात्मा आकाश आदि नहीं बनता, उनके सदृश होकर ही उनसे संयुक्त होता है, उसी प्रकार यहाँ धान आदिके विषयमें भी समझना
चाहिये; क्योंकि यह कथन भी पहलेके सदृश ही है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि उन धान, जौ आदिमें अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये जो दूसरे जीव पहलेसे ही स्थित हैं उनके रहते हुए ही यह चन्द्रलोकसे लौटनेवाला जीवात्मा उनके साथ-साथ पुरुषके उदरमें चला जाता है; धान, जौ आदि स्थावरयोनियोंको प्राप्त नहीं होता। सम्बन्ध- इसपर शंका उपस्थित करके ग्रन्थकार उसका निराकरण करते हैं- अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ॥ ३ । १ । २५ ॥ चेत् = यदि कहा जाय कि; अशुद्धम् = यह तो अशुद्ध (पाप) कर्म होगा; इति न = तो ऐसी बात नहीं है; शब्दात् = श्रुतिके वचनसे इसकी निर्दोषता सिद्ध होती है। व्याख्या-यदि यह शंका की जाय कि 'अनाजके प्रत्येक दानेमें जीव रहता है, इस मान्यताके अनुसार अन्नको पीसना, पकाना और खाना तो बड़ा अशुद्ध (पाप) कर्म होगा, क्योंकि उसमें तो अनेक जीवोंकी हिंसा करनेपर एक जीवकी उदरपूर्ति होगी' तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि इस प्रकरणमें पुरुषको 'अग्नि' बताकर उसमें अन्नको हवन करना बताया है तथा श्रुतिमें जगह-जगह अन्नके खाये जानेका वर्णन है। (छा० उ० ६।६।२) अतः श्रुतिका विधान होनेके कारण उसमें हिंसा नहीं होती तथा उन जीवोंकी उस कालमें सुषुप्ति-अवस्था रहती है, जब वे पृथिवी और जलके सम्बन्धसे अंकुरित होते हैं, तब उनमें चेतना आती है और सुख-दुःखका ज्ञान होता है, पहले नहीं। अतः अन्नभक्षणमें हिंसा नहीं है। सम्बन्ध-अन्नसे संयुक्त होनेके बाद वह किस प्रकार कर्मफलभोगके लिये शरीर धारण करता है, उसका क्रम बतलाते हैं- रेतःसिग्योगोऽथ ॥ ३ । १ । २६ ॥ अथ = उसके बाद; रेतःसिग्योगः = वीर्यका सेचन करनेवाले पुरुषके साथ उसका सम्बन्ध होता है।
सूत्र २७ ] अध्याय ३ २८१ व्याख्या—उसके अनन्तर वह जीवात्मा अन्नके साथ पुरुषके पेटमें जाकर उसके वीर्यमें प्रविष्ट हो उस पुरुषसे संयुक्त होता है, इस कथनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि आकाश आदिसे लेकर अन्नतक सभी जगह केवल संयोगसे ही उसका तदाकार होना कहा है; स्वरूपसे नहीं। सम्बन्ध—उसके बाद— योनेः शरीरम् ॥ ३ । १ । २७ ॥ योनेः=स्त्रीकी योनिमें प्रविष्ट होनेके अनन्तर; शरीरम्=वह जीवात्मा कर्मफलभोगके अनुरूप शरीरको प्राप्त होता है। व्याख्या—इस प्रकार वह स्वर्गसे आनेवाला जीवात्मा पहले पुरुषके वीर्यके आश्रित होता है। फिर उस पुरुषद्वारा गर्भाधानके समय स्त्रीकी योनिमें वीर्यके साथ प्रविष्ट करा दिया जाता है। वहाँ गर्भाशयसे सम्बन्ध होकर उक्त जीव अपने कर्मफलोंके अनुरूप शरीरको प्राप्त होता है। यहींसे उसके कर्मोंके फलका भोग आरम्भ होता है। इसके पहले स्वर्गसे उतरकर वीर्यमें प्रविष्ट होनेतक उसका कोई जन्म या शरीर धारण करना नहीं है, केवल उन-उन आकाश आदिके आश्रित रहना मात्र कहा गया है; उन धान आदि शरीरोंके अधिष्ठाता जीव दूसरे ही हैं। पहला पाद सम्पूर्ण
दूसरा पाद
दूसरा पाद पहले पादमें देहान्तरप्राप्तिके प्रसंगमें पञ्चाग्निविद्याके प्रकरणपर विचार करते हुए जीवको बारंबार प्राप्त होनेवाले जन्म-मृत्युरूप दुःखका वर्णन किया गया। इस वर्णनका गूढ़ अभिप्राय यही है कि जीवके मनमें सांसारिक पदार्थों तथा अपने नश्वर शरीरके प्रति आसक्ति कम हो और निरन्तर वैराग्यकी भावना बढ़े। अब दूसरे पादमें वर्तमान शरीरकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओंपर विचार करके इस जन्म-मरणरूप संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये परमेश्वरका ध्यानरूप उपाय बताना है; अतएव पहले स्वप्नावस्थापर विचार आरम्भ करते हुए दो सूत्रोंमें पूर्वपक्षकी उत्थापना की जाती है— संध्ये सृष्टिराह हि ॥ ३।२।१ ॥ संध्ये=स्वप्नमें भी जाग्रत्की भाँति; सृष्टिः=सांसारिक पदार्थोंकी रचना होती है; हि=क्योंकि; आह=श्रुति ऐसा वर्णन करती है। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्में यह वर्णन आया है कि ‘स्वप्नावस्थामें यह जीवात्मा इस लोक और परलोक दोनोंको देखता है, वहाँ दुःख और आनन्द दोनोंका उपभोग करता है, इस स्थूल शरीरको स्वयं अचेत करके वासनामय नये शरीरकी रचना करके (बृह० उ० ४।३।९) जगत्को देखता है। ‘उस अवस्थामें सचमुच न होते हुए भी रथ, रथको ले जानेवाले वाहन और उसके मार्गकी तथा आनन्द, मोद, प्रमोदकी एवं कुण्ड, सरोवर और नदियोंकी रचना कर लेता है।’ (बृह० उ० ४।३।१०)* इत्यादि। इसी प्रकार दूसरी श्रुतियोंमें भी स्वप्नमें सृष्टिका होना कहा है (प्र० उ० ४।५; बृह० उ० २।१।१८)। इसलिये यह सिद्ध होता है कि स्वप्नमें भी सांसारिक पदार्थोंकी रचना होती है और वह अत्यन्त विचित्र तथा जीवकृत हैं।
- ‘न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते न तत्रानन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते······वेशान्तान् पुष्करिणीः स्रवन्तीः सृजते।’