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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

चरन धोय पुनि राखेसि रानी । ले चरनाम्रित जन्म सुभ जानी ॥

इन्द्रमतीवचन ।

पुनि प्रसादको अज्ञा मांगी । हेप्रभु मोकहैं करहु सुभागी ॥

जूठन परै मो गृह माही । सीत प्रसाद लै हमहैं खाहीं ॥

कुरुणामय वचन ।

सुनुरानी मुहि छुधा न होई । पंच तत्त्व पावे जेहि सोई ॥

अमृत नाम अहार है मोरा । सुनु रानी यह भाष्यो थोरा ॥

देह हमारी तत्त्व गुन न्यारी । तत्त्वप्रकृतिहि काल रचिवारी ॥

असी पंच किहु काल समीरा । पंचतत्त्वकी देह खमीरा ॥

तामहैं आदि पवन इक आही । जीव सोहंगम बोलत ताही ॥

यह जिव अहै पुरुषको अंसा । रोकसि काल ताहि दे संसा ॥

नाना फंद रचि जीव गरासै । देह लोभ तब जीवहिं फांसै ॥

जिव तारन हम यहि जग आये । जो जिव चीन्ह ताहि मुकताये ॥

धर्मराय अस बाजी कीन्हा । धोक अनेक जीव कहैं दीन्हा ॥

नीर पवन कृत्रिम किय काला । विनसि जाय बहु करै बिहाला ॥

तन हमार यहि साजहिं न्यारा । मम तन नहिं सिरज्यो करतारा ॥

सब्द अमान देह है मोरा । परखि गहहु भाष्यो कछु थोरा ॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति ।

सुनत वचन अचरज भौ भारी । तब रानी अस वचन उचारी ॥

रानी इन्द्रमती वचन ।

हे प्रभु अचरज यह होई । अस सुभाव दूजा नहिं कोई ॥

छन्द— इन्द्रमति आधीन होय कहै, कृपा करहु दयानिधी ।

एक एक बिलोय बरनहु, सब मोहिते सकलहु विधी ॥

विस्तु सम दूजा नाहिं कोई, रुद्र चतुरानन मुनी ।

पंचतत्त्व है खमीर तन तिहि, तत्त्वनके वश गुन गुनी ॥

सोरठा—तुम प्रभु अगम अपार, बरनो माने किन भये ।

मेटहु त्रिषा हमार, अपने परिचय मोहि कहु ॥

हे प्रभु अस अचरज मोहि होई । अस सुभाव दूजा नहिं कोई ॥

कौन आहु कहवाँते आये । तन अर्चित प्रभु कहैवा पाये ॥

कौन नाम तुम्हरो गुरु देवा । यह सब वरनि कहो मोहि भेवा ॥

हम का जानहिं भेद तुम्हारा । ताते पूछा यह व्यवहारा ॥

करुणामय वचन ।

इन्द्रमती सुन कथा सुहावन । तोहि समुझाय कहों गुनपावन ॥
देस हमार न्यार तिहुँ पुरते । अहिपुर नरपुर अरु सुरपुरते ॥
तहाँ नहीं जम कर परवेसा । आदि पुरुषको जहवाँ देसा ॥
सत्य लोक तेहि देस सुहेला । सत्य नाम गहि कीजे मेला ॥
अद्भुत जोति पुरुष की काया । हंसन सोभा अधिक सुहाया ॥
आदि पुरुष सोभा अधिकारा । पटतर कहा देहुँ संसारा ॥
द्वीपकरी सोभा उजियारी । पटतर देहुँकाहि संसारी ॥
यहि तीनों पुर अस नहि कोई । जाकर पटतर दीजै सोई ॥
चन्द्र सूर यदि देश मंझारा । इन सम और नहीं उजियारा ॥
सत्य लोककी ऐसी बाता । कोटिक ससि इकरोम लजाता ॥
एक रोमकी सोभा ऐसी । और बदनकी बरणौ कँसी ॥
ऐसे पुरुष कान्ति उजियारा । हंसन सोभा कहों बिचारा ॥
एक हंस जस षोडस भाना । अगर वासना हंस अधाना ॥
तब कबहुँ जामिनि नहि होई । सदा अँजोर पुरुष तन सोई ॥
कहा कहों कछु कहत न आवे । धन्य भाग जे हंस सिधाये ॥
ताहि देसते हम चलि आये । करुणामय निज नाम धराये ॥
सतयुग त्रेता द्वापर आये । तोसन वचन कहों सुखदाये ॥
जुगन जुगनमें मैं चलि आवों । जो चेत तेहि लोक पठावों ॥

इन्द्रमती वचन ।

हे प्रभु औरो जुग तुम आये । कौन नाम उन जुगन धराये ॥

करुणामय वचन ।

सतजुगमें मैं सतनाम कहायो । त्रेता नाम मुनीन्द्र धरायो ॥
अब करुणामय नाम धरावों । जो चीन्हे तिहि लोक पठावों ॥

कबीरवचन धर्मवास प्रति ।

धरमदास तेहि कहयो बुझायी । सतयुग त्रेता कथा सुनायी ॥
सोसुनि अधिक चाह तिन कीन्हा । और बात सो पूछन लीन्हा ॥
उत्पति परलय और बहु भाऊ । जमचरित्र सब वरनि सुनाऊ ॥
जेहि विधि षोडश सुत प्रगटाने । सो सब भाष सुनाया ज्ञाने ॥
कूर्म विदार देवी उत्पानी । सो सब ताहि कहा सहिदानी ॥
ग्रास अष्टंगी और निकासा । जेहि विधि भये मही आकासा ॥

सिन्धु मथन त्रय सुत उत्पानी । सबही कहे पाछिल महिदानी ॥
जेहि विधिजीवन जमठगिराखी । सो सब ताहि सुनायउ भाखी ॥
मुक्त ज्ञान पाछिल भ्रम भागा । हरषि सो चरन गहे अनुरागा ॥

इन्द्रमती वचन ।

जोरि पानि बोली बिलखाई । हे प्रभु जमलेहु छुडाई ॥
राज पाट सब तुमपर वारों । धनसम्पति यह सब तजि डारों ॥
देहु सरन मुहि दीनदयाला । बंदिछोर मुहि करहैं निहाला ॥

करुणामय वचन ।

इन्द्रमती सुनु वचन हमारा । छोरों निश्चय बन्दि तुम्हारा ॥
चीन्हेंउ मोहि परतीत दिढाना । अबदे हूँ तोहि नाम परवाना ॥
कराइ आरति लेहु परवाना । भागे जम तब दूर षयाना ॥
चीन्हो मोहि करो परतीती । लहु पान चलु भौजल जीती ॥
आनहु जो कछु आरति साजा । राजपाट कर मोहि न काजा ॥
धन सम्पति कछु मोहि न भावा । जीव चितावनयहि जग आवा ॥
धन सम्पति परमारथ लायी । करहु सन्त सन्मान बतायी ॥
सकल जीवहैं साहिब केरा । मोह विवस जिवपरे अंधेरा ॥
सब घट पुरुषअंश कियो बासा । कहीं प्रगट कहि गुप्तनिवासा ॥

छन्द— सब जीवहैं सतपुरुषके, बस मोह भरम विमानहो ।
जमराजको यह चरित सब भ्रम, जालजमपरधान हो ॥
जीवकाल बसहो लरत मोसे भ्रम वश मोहिन चीन्हही ।
तजि सुधा कीन्हो नेह विषसे, छोड़िघृत अँचवे मही ॥

सोरठा—कोई इकविरला जीव, परखि शब्द मोहिचीन्हई ॥
धाय मिले निज पीब, तजे जारको आसरो ॥

इन्द्रमती वचन ।

इन्द्रमती सुन वचन अमानी । बोली मधुर ज्ञान गुन खानी ॥
मोहि अधमको तुमसुख दीन्हा । तुव परसाद आगम ममचीन्हा ॥
हे प्रभु चिन्हतोहि अब पाहूँ । निश्चय सत्य पुरुष तुम आहूँ ॥
सत्य पुरुष जिन लोक सँवारा । करहु कृपा सो मोहि उदारा ॥
आपन हिरदय अस हम जाना । तुमते अधिक और नहिं आना ॥
अब भाषहु प्रभु आरति भाऊ । जो चहिय सो मोहि बताऊ ॥

अम्बुसागरका प्रमाण

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

हे धरमनि सो ताहि सुनावा । जस खेमसरी सो भाषेउ भावा ॥
चौका कर लेवहु परवाना । पाछ कहीं अपने सहिदाना ॥
आनेउ सकल साज तब रानी । चौका बैठि शब्द धुनि ठानी ॥
आरति कर दीन्हा परवाना । पुरुषध्यान सुमिरन सहिदाना ॥
उठि रानी तब माथ नवायी । ले आज्ञा परवाना पायी ॥
पुनि रानी राजहि समुझावा । हे प्रभु बहुरि न ऐसो दावा ॥
गहो सरन जो कारज चाहो । इतना वचन मोर निरबाहो ॥

राजा चन्द्रविजय वचन ।

तुम रानी अरधंगी सोई । हम तुम भगत होय नहिं दोई ॥
तेरि भगति कर देखों भाऊ । किहिविधि मोहि लेहु मुकताऊ ॥
देखों तोरि भगती परतापा । पहुँचो लोक मिटे संतापा ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

रानी बहुरि मोहिपहँ आयी । हम तिहिकालचरित्र लखायी ॥
रानी आई हमारे पास । तासो किया वचन परकासा ॥
सुनु रानी एक वचन हमारा । कालहु कला करे छल धारा ॥
काल ब्याल हँ तो पहुँ आयी । डसे तोहि सो देऊँ बतायी ॥
तो कहँ शिष्यकीन हमजानी । डसे काल तच्छक हँ आनी ॥
अब हमतो कहँ मन्त्र लखाओं । काल गाल सब दूर भागाओं ॥
लेहु शब्द विरहुली हम पाहीं । काल गरल जेहि व्यापे नाही ॥
पनि अरू दूसर छल तोहि ठानी । सो चरित्र में कहीं बखानी ॥
छल कर जम आवे तुव पास । सो तुहि भेद कहीं परगासा ॥
हंस वरण वह रूप बनायी । हम सब ज्ञान तोहि समझाई ॥
तुम सन कहे चीन्ह मुहि रानी । मरदन काल नाम ममज्ञानी ॥
यहि विधि काल ठगे तोहि आयी । काल भेख सब देऊँ बतायी ॥
मस्तक छोटा काल कर जानू । आखिन गुंजन रंग बखानू ॥
काल लच्छ में तोहि बतायी । और अंग लब सेत रहायी ॥

इन्द्रमती वचन ।

रानी चरण गहे तब धायी । हे प्रभु मोहि लोक लै जायी ॥
यह तो देश आहि जम केरा । लै चलुलोक मिटै झकझोरा ॥
यह तो देस कालकर थानी । हे प्रभु लै चलु देस अमानी ॥

आद्या लीला, रागोंके नाम

करुणामय वचन ।

तब रानीसों कहेउ बुझाई । वचन हमार सुनो चितलाई ॥
अब तुम्हार तिनका जम टूटा । परिचय भयो सकल भ्रमछूटा ॥
निसिदिन सुमरो नाम हमारा । कहा करे जम धरम लबारा ॥
जवलगि ठेका पूरे आई । तब लग रहो नाम लौलाई ॥
छंद-सुमरहु नाम हमारसु निसिदिन, काल तो कहैं जब छले ।
आयु ठीका पुरे नाहिं जौलौं, तौलों जीव नाहीं चले ॥
काल कला परचंड देखु, गज रूप धर जग आवई ।
देखि केहरि गजत्रास माने, धीर बहुरि न लावई ॥
सोरठा-गजरूपी है काल, केहरि पुरुष प्रताप है ।
रोक रहो तुम ढाल, काल खडग व्यापे नहीं ॥

इन्द्रमती वचन ।

हे साहिब मैं तुम कह जानी । वचन तुम्हार लीन्ह सिरमानी ॥
विनती एक करौं तुहि स्वामी । तुमतो साहिब अंतरयामी ॥
काल व्याल ह्वै मोहि सतायी । अरु पुनि हंस रूप भरमाई ॥
तब पुनि साहिब मो पहुँ आऊ । हंस हमार लोक लै जाऊ ॥

करुणामय वचन ।

कह ज्ञानी सुन रानी बाता । तुमसों एक कहों विख्याता ॥
काल कला धरि तो पहुँ आवे । नाना रंग चरित्र बनावे ॥
सब्द तोही हम दीन्ह लखाई । निसिदिन सुमरो चित लगायी ॥
तोरो ताहिकर मान गुमाना । कालके दावसो मिटै निदाना ॥
तेहि पीछे हम तुम लग अइहैं । मोहि देख तब काल परैहैं ॥
हंस तुम्हार लोक कहैं जाई । काल दगा रहन न पाई ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

इतना कह हम गुप्त छिपाया । तच्छक रूप काल होआया ॥
चित्रसार पर तच्छक आया । रानी केर तहैं पलँग रहाया ॥
जबहीं रात बीत गइ आधी । रानी उठि चलीं सेवा साधी ॥
रानी सब कहैं सीस नवायी । चली तबैं महलन कहैं आयी ॥
सेज आय रानी पौढायी । डसेउ व्याल मस्तकमहैं आयी ॥

इन्द्रमती वचन ।

इन्द्रमती अस वचन सुनाई । तच्छक डसेउ मोहिकहैं आयी ॥

इकसठ रागिनियोंके नाम

सुन राजा व्याकुल ह्वै धावा । गुनी गारुडी वेगि बुलावा ॥
राय कहे सम प्राण पियारी । लेहु चिताय जो अबकी बारी ॥
तच्छक गरल दूर होय जायी । देहुँ परगना तोहि दिवायी ॥

इन्द्रमती वचन ।

छंद—सब्द विरहुली जपेउ रानी, सुरति साहिब राखिहो ।
वैद गारुडि सब दूर भागो, दूर नरपति नाहि हो ॥
मंत्र मोहि लखाय सतगुरु गरल मोहि न लागई ।
होत सूर परकास जेहि छन, अंध अघोर नसावई ॥
सोरठा—ऐसे गुरु हमार, बार बार विनती करौं ।
ठाढ भयी उठि नार, राजा लखि हरषित भयो ॥

यमदूत वचन ।

चला दूत तब उहँवा जायी । ब्रह्मा विस्नु महेश रहायी ॥
कहे दूत विष तेज न लागा । नाम परताप अन्ध हो भागा ॥

विष्णुवचन

कहे विस्नु सुनुं हो जम दूता । सेवहीं अंग करो तुम पूता ॥
छल करि जाइ लिवाइय रानी । वचन हमार लेहु तुम मानी ॥
कीन्हो दूत सेत सब अंगा । चलेउ नारि पहुँ बहुत उमंगा ॥
देखत रानी छल मतिचीन्हा । आदर भाव न तनिको कीन्हा ॥

यमदूत वचन ।

तबहीं अस दूत वचन परगासा । तुम कस रानी भई उदासा ॥
जानि बूझि कस भई अचीन्हा । दीच्छा मंत्र तोहि हम दीन्हा ॥
ज्ञानी नाम हमारो रानी । मरदों काल करौं पिसमानी ॥
तच्छक काल होय तोहि खाये । तब हम राखलीन्ह तोहि आये ॥
छोड़हु पलँग गहो तुम पाई । तजहु आपनी मान बडाई ॥
अब हम लैन तोहि कहँ आवा । प्रभुके दरसन तोहि करावा ॥

इन्द्रमती वचन ।

इन्द्रमती तब चीन्हेंउ रेषा । जस कछु साहिब कहेउ विसेषा ॥
तीनों रेख देख चख माहीं । जरद सेत अरु राता आहीं ॥
मस्तक ओछ देख पुनि ताको । भयो प्रतीत वचनको साको ॥
जाहु दूत तुम अपने देसा । अब हम चीन्हेंउ तुम्हरो भेसा ॥
काग रूप जो बहुत बनायी । हंस रूप सोभा किमि पायी ॥
तस हम तोरा रूप निहारा । है समरथ बड गुरु हमारा ॥

२ अध्याय । कबीर साहिबके प्राकट्य

यमदूत वचन ।

यह सुनि दूत रोष बड़ कीन्हा । इन्द्रमतीसों बोले लीन्हा ॥
बार बार तोकहैं समुझावा । नाहि न समुझतमती हिरावा ॥
बोलत वचन निकट चलिआवा । इन्द्रमती पर थाप चलावा ॥
थाप चलायी मुखपर मारा । रानी खसिपरि भूमि मँझारा ॥

इन्द्रमती वचन ।

इन्द्रमती तब सुमिरन लायी । हे गुरु ज्ञानी होहु सहायी ॥
हम कहैं काल बहुत विधि ग्रासा । तुम साहिब काटो जमफाँसा ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

सुनत पुकार मुहिं रहो न जायी । सुनहु धर्मनि यह मोर सुभायी ॥
रानी जबहीं कीन्ह पुकारा । तत छिन मैं तहाँहि पगुधारा ॥
देखत रानी भयी हुलासा । मनते भग्यो कालको त्रासा ॥
आवत हमरे काल पराया । भयी सुद्ध रानीकी काया ॥

इन्द्रमती वचन ।

तब कह इन्द्रमती कर जोरी । हे प्रभु सुनु विनती यक मोरी ॥
चीन्हि परी मोहि जमकी छाहीं । अब यहि देस रहब हम नाहीं ॥
हे साहब लै चलु निज देसा । इहवां है बहु काल कलेसा ॥
इहि विधि कही भयी उदासा । अबहीं लै चलु पुरुषके पास ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

तबहीं रानी लीनो संग। मेटयो काल कठिन परसंगा ॥
तबहीं ठीका पूर भराया । ले रानी सत लोक सिधाय। ॥
ले पहुँचायो मान सरोवर । जहवां कामिनि करहिं कलाहर ॥
अमी सरोवर अमी चखायी । सागर कबीर पांव परायी ॥
जब कबीर सागर कहैं परसेउ । सुरति सागर तबहीं सरसेउ ॥
तेहि आगे सुरतिको सागर । पहुँची रानी भई उजागर ॥
लोक द्वार ठाढ तब कीन्ही । देखत रानी अति सुख भीनी ॥
हंस धाय अंकम भर लीन्हा । गावहिं मंगल आरति कीन्हा ॥
सकल हंस कीन्हे सनमाना । धन्य हंस सतगुरु पहिचाना ॥
भल तुम छोड़े कालके फन्दा । तुम्हरे कष्ट मिटेउ दुखदुन्दा ॥
आवहु हंस हमारे साथ। चलहु पुरुष कहैं नावहु माथा ॥
इन्द्रमती आवहु संग मोरे । पुरुष दरश होवे अब तोरे ॥

कबीरसाहिबको आंझरी द्वीपमें आना

इन्द्रमती अरु सकल हंस मिलाहीं । करहिं कुतूहल मंगल गाहीं ॥
चलत हंस सब अस्तुति लावें । अब तो दरस पुरुषको पावें ॥
तब हम पुरुषाहिं बिनती लावा । देहु दरस अब हंस ढिग आवा ॥
देहु दरस तिहिं दीनदयाला । बंदीछोर सु होहु कृपाला ॥
बिकस्यो पुहुप उठा अस बानी । सुनहु जोगसँतायन ज्ञानी ॥
हंसन कहैं अब आव लिवाई । दरस कराइ लेउ तुम आई ॥
छंद-हमचलि आयेउ हंस लग तब, हंस सकलो ले गयो ॥

पुरुष दरसन पाय सब हंसा, रूप सोभा तब भयो ॥

करहिं सु दंडवत हंस सबहीं, पुरुष पहुँ चित लाइया ।

पुरुष अमि फल तब चार दीन्हों, हंस सब मिलि पाइया ॥

सोरठा-जस रविके परकास, दरस पाय पंकज खुलै ।

तैसे हंस विलास, जनम जनम दुख मिटि गयो ॥

इन्द्रमती का लोक में पहुँचकर पुरुष और करुणामय को एकही रूपमें देखकर चकित होना ।

पुरुष कान्ति सब देखउ रानी । अद्भुत अमी सुधाकी खानी ॥
गदगद होय चरन लपटानी । हंस सुबुद्धि सुजन गुनखानी ॥
दीनो सीस हाथ जीव मूला । रवि प्रकाश जिमि पंकज फूला ॥

इन्द्रमती बचन ।

कहरानी तुम धन करुणामय । जिव भ्रम मेटि आनि यहि ठामय ॥

पुरुष बचन ।

कहा पुरुष रानी समझायी । करुणामय कहैं आनु बुलायी ॥

कबीरबचन धर्मदास प्रति ।

नारि धाय आई मो पास । महिमा देखि चकित भौ दासा ॥

इन्द्रमती बचन ।

कह रानी यह अचरज आही । भिन्न भाव कछु देखों नाहीं ॥
जो कछु कला पुरुष कहैं देखा । करुणामय तन एक विसेखा ॥
धाय चरन गह हंस सुजाना । हे प्रभु तव चरित्र सब जाना ॥
तुम सतपुरुष दास कहलाये । यह सोभा कस उहां छिपाये ॥
मोरे चित यह निश्चय आई । तुमहिं पुरुष दूजा नहिं भाई ॥
सो मैं आय देख यह ठाई । धन समर्थ मुहिं लिया जगाई ॥

इन्द्रमती स्तुति करती है ।

तुम धन्य हो दयानिधान सुजान नाम अचिन्तयं ।
अकथ अविचल अमर अस्थिर अनघ अज सु अनादियं ॥
असंशय निः काम धाम अनाम अटल अखंडितं ।
आदि सबके तुमहि प्रभु हो सर्व भूत समीपतं ॥
सोरठा-मोपर भये दयाल, लियहु जगाई जानि निज ।
काटेहु जमको जाल, दीन्हो सुखसागर करी ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

संपुट कमल लगे तेहि बारा । चले हंस निज दीप मंझारा ॥

करुणामय (ज्ञानी) वचन इन्द्रमती प्रति ।

ज्ञानी बूझें रानी बाता । कहो हंस तुम्हरे विख्याता ॥
अब दुख द्रन्द तोर मिटि गयऊ । षोडश भानु रूप पुनि भयऊ ॥
ऐसे पुरुष दया तोहि कीन्हा । संसय सोग भेटि तुव दीन्हा ॥

इन्द्रमती का अपने पति राजा चन्द्रविजयको लोकमें लाने के

लिये विनती करना । इन्द्रमतीवचन ।

इन्द्रमती कह दोउ कर जोरी । हे साहिब इक विनती मोरी ॥
तुम्हरे चरण भागते पायी । पुरुष दर्श कीन्ह हम आयी ॥
अंग हमार रूप अति सोही । इक ससय व्यापे चित मोही ॥
मो कहैं भयो मोह अधिकारा । राजा तो पति आहि हमारा ॥
आने ताहि हंसपति राई । राजा मोर काल मुख जाई ॥

करुणामय वचन ।

कहे ज्ञानी सुन हंस सुजाना । राजा नहि पाये परवाना ॥
तुव तो हंस रूप अब पाया । कौन काज कहैं राव बुलाया ॥
राजा भाव भगति नहि पाया । सत्त्व हीन भव भटका खाया ॥

इन्द्रमती वचन ।

हे प्रभु हम जग महँ रहेऊ । भगति तुम्हार बहुत विधि करेऊ ॥
राजा भगति हमारी जाना । हम कहैं वरजेउ नाहि सुजाना ॥
कठिन भाव संसार सुभाऊ । पुरुष छोड़ि कहूँ नारि रहाऊ ॥
सब संसार देहि तिहि नारी । सुनतिहि पुरुष डार तेहि मारी ॥
राजा काज अति मान बडाई । पाखंड क्रोध और चतुराई ॥

ज्ञानीजी और धर्मरात्रिका वार्तालाप

साधु संतकी सेवा करऊँ । राजाकेर त्रास ना डरऊँ ॥
सेवा करों सन्तकी जबहीं । राजा सुनि हरषित हो तबहीं ॥
जो मोहि ताजन देतो राजा । तो प्रभु मोर होत किमि काजा ॥

छन्द-रायकी हम हती प्यारी, मोहि कबहु न बरजेऊ ।

साधु सेवा कीन्ह नित हम, सब्द मारग सिरजेऊ ॥

चरन मो कहैं मिलत कैसे, मोहि हटकत राज जो ।

नाम पान न मिलत मो कहैं, कैसे सुधरत काज जो ॥

सोरठा-धन्य राय सुजान, आनहु ताहि हंसनपति ।

तुम गुरु दयानिधान, भूपति बंद छुडाइये ॥

कबीर बचन धर्मदास प्रति ।

सुन ज्ञानी बहुतै विहैंसाये । चले तुरंत बार नहिं लाये ॥

गढ गिरनार बेगि चलि आया । नृपति केरि अवधि नियराया ॥

घेन्या ताहि लेन जमराई । राजहिं देत कष्ट बहुताई ॥

राजा परे गाढ महैं आई । सतगुरु कहे तहां गुहराई ॥

छोडे नृप नाहीं जमराई । ऐसी भगति चूक है भाई ॥

भगति चूक कर ऐसे ख्याला । अवधि पूर जम करै विहाला ॥

चन्द्रविजयका कर गहि लीन्हा । ततछन लोक पयाना दीन्हा ॥

रानी देखि नृपति ढिग आई । राजा केर गह्यो तब पाई ॥

इन्द्रमती बचन ।

इन्द्रमती कहे सुनहु भुवारा । मोहि चीन्हों मैं नारि तुम्हारा ॥

राजा चन्द्रविजय बचन ।

राय कहैं सुनु हंस सुजाना । बरन तोर षोडस ससि भाना ॥

अंग अंग तोरे चमकारी । कैसे कहों तोहि मैं नारी ॥

तुम तो भगति कीन्ह भल नारी । हमहू कहैं तुम लीन्ह उबारी ॥

धन्य गुरु अस भगति दिढाये । तोरि भगति हम निजघर पाये ॥

कोटिन जन्म कीन्ह हम धर्मा । तब पाई अस नारि सुकर्मा ॥

हम तो राज काज मन लाया । सतगुरु भगति चीन्ह नहि पाया ॥

जो तुम मोरि होत ना रानी । तो हम जात नरककी खानी ॥

तुव गुन मोहि वरनि ना जाई । धन्य गुरु धन्य नारि हम पाई ॥

जस हम तो कहैं पायउ नारी । तैंसे मिले सकल संसारी ॥

निरंजनके जालका वर्णन

कबीरबचन धर्मदास प्रति ।

सुनत बचन ज्ञानी विहँसायी । चंद्रविजय कहँ बचन सुनायी ॥

करुणामय बचन ।

सुनो राय तुम नृपति सुजाना । जो जिव सबद हमारा माना ॥

ते पुनि आय पुरुष दरबारा । बहुरि न देखे वह संसारा ॥

हंस रूप होवे नर नारी । जो निज माने बात हमारी ॥

पुरुष दर्श निरपति चितलायी । हंस रूप सोभा अति पायी ॥

षोडस भानु रूप नृप पावा । जानु मयंकम ढार बनावा ॥

धर्मदास बचन ।

छंद-धर्म दास विनती करे, जुग लेख जीव सुनायऊ ।

धन्य नाम तुम्हार साहिब, राय लोक समायऊ ॥

तत्व भाव ना गहेस राजा, भगति नारी ठानिया ।

नारि भगति प्रतापते, जमराजसे नृप आनिया ॥

सोरठा-धन्य नारिको ज्ञान लीन्ह बुलाय सु नृपति कहँ ।

आवागमन नसान, जगमें बहुरि न आइया ॥

इति द्रापर युगकी कथा (प्रमाण अनुराग सागर)

इस प्रकार रानीकी भक्तिसे राजा भी पार उत्तर गया—इस द्रापर युगमें सहस्रों बार करुणामय ऋषि प्रगट होते और सच्चे मनुष्योंको अपने लोकमें ले जाते हैं। जो करुणामय ऋषिके उपदेशको ग्रहण करता उसका लोक तथा परलोक दोनों सुधर जगता। जब जब ये तीनों युग आते हैं तब तब आप इन्हीं नामोंसे विख्यात होते हैं। सत्ययुगमें आप सत्यसुकृत कहलाते हैं, त्रेतामें मुनीन्द्र और द्रापर में करुणामय ऋषि अथवा करुणामय स्वामीके नामसे प्रख्यात होते हैं जब कोई जीव सच्चा होता है, तब सत्यगुरु इन नामों द्वारा उसको कृतार्थ करते हैं। यहाँ तक तो तीन युगोंका वृत्तान्त हुआ, अब आगे कलियुगका वृत्तान्त लिखा जाता है। +

  • इस कलियुगमें कबीर साहेबके प्रकट होनेकी कथा खूब सुधार और बढ़ाकर अनेक प्रकारसे स्वामी परमानन्दजीने "तालीम कबीर कलजुग" नामक ग्रन्थमें लिखा है। मेरा इरादा था कि, कबीर मन्शूरके इस अध्यायमें उसे पूरा पूरा देवना. किन्तु, कितने अनिवार्य कारणोंसे वैसा कर न सका। सद्गुरुकी मर्जी होगी तो अलगही वह प्रकट किया जायगा।

अनुवादक — श्रीयुगलानन्द विहारी.

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निरंजनका कबीरसाहिबसे वरदान

कबीर मन्शूर प्रथमभाग ।

तृतीय अध्याय ।

चौथे युग कलियुका वृत्तान्त ।

कलियुगमें ज्ञानीजीका पृथ्वीपर प्रगट होना और सत्य कबीर सैयद
अहमद कबीर व शेख कबीर जिन्दा पुरुष आदि नामोंसे होकर
मनुष्योंके उद्धार करने का वृत्तान्त ।

पहिला प्रकरण ।

उत्थानिका ।

द्वापरयुग जब समाप्त हो चुका और कलियुग आरंभ हुआ तब इस कलियुगमें ज्ञानीजी सत्य कबीर और कबीर साहबके नामसे प्रसिद्ध हुए मुसलमान लोग आपको सैयद अहमद कबीर और शेख कबीर कहते हैं । हिन्दू मुसलमान तथा संसार के सब कौमोंसे आप गुरु तथा पूजनीय हैं । चारों युगोंमें आपके चार नाम हैं—अर्थात् सत्यसुकृत सत्ययुगमें, मुनीन्द्र त्रेतामें, करुणामय स्वामी द्वापरमें और कबीर साहब कलियुगमें । इन चारों नामोंसे चारों युगोंमें आप सर्व मनुष्योंको शिक्षा दिया करते हैं । प्रत्येक समय प्रत्येक काल और प्रत्येक स्थानपर कबीर साहब सदैव पृथ्वीपर उपस्थित रहते हैं । इस कलियुगमें अनन्त बार आप पृथ्वीपर प्रगट होते हैं और फिर अन्तर्धान हो जाते हैं । परन्तु कुछ बेरकी सुध जो मुझको है उसका वृत्तान्त मैं थोडा लिखता हूँ ।

दूसरा प्रकरण ।

श्वपच सुदरशनको चेताना ।

जब कलियुगके आरंभ और द्वापरके अन्तमें पहले कबीर साहब पृथ्वीपर प्रकट हुए तब काशी नगरीमें दिखलाई दिये । वह समय कृष्ण तथा पाण्डवोंका था । उस समय मनुष्योंको उपदेश करने और अपने धर्मकी शिक्षा देने लगे । सुदर्शन नामक एक डोम था उसने आकर सत्यगुरुको दंडवत् करके निवेदन किया कि, हे महाराज ! मुझको अपनी शिक्षा दीजिये । तब सत्यगुरु उसपर दयालु हुए और उसको सत्यनामका उपदेश किया । वह सत्यगुरुकी शिक्षा पाकर बड़े प्रेमके साथ साधुसेवा और भक्ति करने लगा । इसी श्वपच सुदर्शनको वाल्मीकि भक्तभी कहते हैं । पाण्डवोंने जब महाभारतके उपरान्त यज्ञ किया और करोड़ों

छाया (विराट्) पुरुषका वृत्तान्त निरंजनका ज्ञानीजीकी अधीनता स्वीकार

साधुओंने भोजन किया, स्वयम् श्रीकृष्णजीने भी भोजन किया और अनेक प्रकारके दान पुण्य हुए किन्तु उससे यज्ञ पूरा नहीं हुआ और न आकाशमें घण्टाही बजा । परन्तु जब श्वपच सुदर्शनने भोजन किया, तब सात बार आकाशमें घण्टा बजा और पाण्डवोंका यज्ञ पूरा हुआ । इस श्वपच सुदर्शनका वृत्तान्त आगे लिखूंगा ।

अथ कलियुगका प्रमाण ।

द्रापरके अन्तमें श्वपच सुदर्शनको चेतानेकी कथा । (अनुराग सागर)

तीन जुगके सुना परभाऊ । अब कहिये कलजुगका दाऊ ॥
ता पीछे पुनि का प्रभु कीना । सोई कथा कहो परवीना ॥
कैसे पुनि आये भवसागर । सो कहिये हंसन पति नागर ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

धर्मनि पुनि आये जगमाही । रानी पति लै गये तहांहीं ॥
राख्यो ताहि लोक मंझारा । कछुक दिन रहे पुरुष दरबारा ॥
जबे पुनि कलिजुग नियराना । धरभराय तबहीं बरियाना ॥
पुरुष अवाज उठी तेहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥
तब चले हम मस्तक नायी । द्रापरगत कलि जुग नहिं आयी ॥
परथमहि पुरुष नाम गोहराई । कासीनगर महाँ दीना पाई ॥
पुरुष आयुस पाइ तेहि बारा । ततछिन पुनि आयउ संसारा ॥
कासी नगर तहां चलि आये । नाम मुदरसन सुपच जगाये ॥

श्वपच सुदर्शनकी कथा ।

नाम मुदरसन सुपच रहाई । ताकहैं हम सत सबद दिढाई ॥
सबद विवेकी संत सुहेला । चीन्हा मोहि सब्दके मेला ॥
निश्चय वचन मांन तिन्ह मोरा । लखी परतीत बंद तिहि छोरा ॥
नाम पान दियो मुगति संदेशा । मेटचो सकल काल कलेसा ॥
सबद ध्यान तेहि दीन्ह दिढाई । हरषित नाम सुमिरे चितलाई ॥
सतगुरु भगति करे चितलाई । छोडी सकल कपट चतुराई ॥
तात मात तेहि हरष अपारा । महाप्रेम अतिहित चितधारा ॥
धर्मनि यह संसार अँधेरा । बिनु परिचय जिव जमको चेरा ॥
मातु पितु देखे हरखाई । पान नाम हमरो नहिं पाई ॥
भगति देख हर्षित हो जायी । नाम पान हमरो नहिं पाई ॥

अधिकता, अहिंसक सुखी हैं

परगट देख चीन्हे नहि मूढा । परे कालके फन्द अगूढा ॥
जैसे स्वान अपावन रंवेउ । तिमिजगअमीछोडिविषखांचेउ ॥
नृपति युधिष्ठिर द्वापर राजा । तिनपुनिकीन्हजग्यको साजा ॥
बन्धु मार अपकीरति कीन्हा । ताते जग्य रचन चित दीन्हा ॥
क्रिस्त केर जब आज़ा पाई । तब पांडव सब साज मंगाई ॥
जग्यकी सामग्री गहि सारी । जहाँ तहाँते सब साधु हंकारी ॥
पांडव प्रति बोले जदुपाला । पूरण जग्य जान तिहि काला ॥
घंट अकास बजत सुनि आवे । जग्यको फल तब पूरन पावे ॥
संन्यासी बैरागी झारी । आये ब्राह्मण औ ब्रह्मचारी ॥
भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सर्बहि जेवाई ॥
इच्छा भोजन सब मिलि पावा । घंट नहि बाजा राय लजावा ॥
जबही घट न बाज अकासा । चकित भयो राय बुद्धि नासा ॥
भोजन कीन सकल रिषिराया । बजा न घंटा भूप भ्रम आया ॥
पांडव तबहि क्रिस्त पहुँ गयऊ । मन संसय करि पूछत भयऊ ॥

युधिष्ठिर वचन ।

करिके किरपा कहो जदुराजा । कारन कौन घंट नहि बाजा ॥

कृष्ण उत्तर ।

क्रिस्त अस कारन तासु बताया । साधू कोई न भोजन पाया ॥

यधिष्ठिर वचन ।

चकित हो तब पांडव कहेऊ । कोटिन साधु भोजन लहेऊ ॥
अब कहैं साधु पाइय नाथा । तिनते तब बोले जदुनाथा ॥

कृष्ण वचन ।

सुपच सुदरसनको लै आवो । आदर मान समेत जिमावो ॥
सोई साधु और नहि कोई । पूरन जग्य जाहिते होई ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

क्रिस्त आज़ा जब अस पयऊ । पांडव तब ताके ढिग गयऊ ॥
सुपच सुदरसन को लै आये । विनय प्रीतिसे ताहि जेवाँये ॥
भूप भवन भोजन कर जबहीं । बजा अकासमें घंटा तबहीं ॥
सुपच भगत जब आस उठावा । बाजो घंट नाम परभावा ॥
तबहुँ न चीन्हे सतगुरु बानी । बुद्धि नास जम हाट बिकानी ॥
भगत जीव कहैं काल सताये । भगत अभक्त सबन कहैं खाये ॥

हैयताका कारण, भ्रष्ट करनेवाला, रक्त- पातका काल, हत्याका प्रायश्चित्त

क्रिस्न बुद्धि पांडव कहैं दीन्हा । बन्धु घात पांडव तब कीन्हा ॥
पुनि पांडव कहैं दोष लगावा । दोष लगा तेहि जग्य करावा ॥
ताहूपर पुनि अधिक दुखावा । भेजी हिमालय तिन्हें गलावा ॥
चार बन्धु सह द्रोपदि गलेऊ । उबरे सत्य जुधिष्ठिर रहेऊ ॥
अर्जुन सम प्रिय और न आना । ताकर अस् कीन्हा अपमाना ॥
बलि हरिचन्द्र करन बड दानी । काल कीन्ह पुनि तिन्हकी हानी ॥
जिव अचेत आसा तेहि लावे । खसम बिसार जारको धावे ॥
कला अनेक दिखावे काला । पीछे जीवन करे बिहाला ॥
मुक्ति जानि जिव आसा लावें । आसा बांधि काल मुख जावें ॥
सब कहैं काल नचावे नाचा । भक्त अभक्त कोइ नहिं वाचा ॥
जो रच्छक तेहि खोजे नाहीं । अन चीन्हें जमके मुख जाहीं ॥
बार बार जीवन समझावा । परमारथ कहैं जीव चितावा ॥
अस जम बुद्धि हरी सबकेरी । फंद लगाय जीव सब घेरी ॥
सत्य सबद कोई परखे नाहीं । जमदिसि होय लरै हम पाहीं ॥
जब लगि पुरुष नाम नहिं भेटे । तब लगि जनम भरन नहिं भेटे ॥
पुरुष प्रभाव पुरुष पहुँ जायी । क्रित्रिम नामते जम धरि खायी ॥
पुरुष नाम परवाना पावे । कालहिं जीत अमर घर जावे ॥

छंद—सत नाम परताप धर्मनि, हंसलोक सिधावई ।

जन्म मरनको कष्ट मेटै, बहुरि न भव जल आवई ॥

पुरुषकी छवि हंस निरखहिं, लहे अति आनंद घना ।

अंशहंस मिल करे कुतूहल, चंद्रकुमुदिनि सँग बना ॥

सोरठा—जैसे कुमुदिनि भाव, चन्द्र देखि निशि हरषई ।

तैसइ हंस सुख पाव, पुरुष दरसके पावत ॥

नहीं मलीन मुख भाव, एकप्रभाव सदा उदित ।

हंस सदा सुख पाव, सोक मोह दुख छनक नहिं ॥

जबै सुदरसन ठेका पूरा । ले सत लोक पठाया सूरा ॥

मिले रूप सोभा अधिकारा । अरु हंसन संग कुतूहल सारा ॥

षोडस भानुरूप तब पावा । पुरुष दरस सो हंस जुडावा ॥

उस कालमें एक तो श्वपचसुद'शॉन और दूसरे शिष्य गरुडजी हुए । ये

हिंसकोंके मारनेका कारण, सबसे हिंसक और अहिंसक, पापी और कृत-कृत्य, डखलाकी असूल, नूकितके अधिकारी

दोनों शिष्य बड़े प्रसिद्ध हुए और तीसरे दुर्वासा ऋषि । इन तीनोंकी खबर मुझको है और इनके अतिरिक्त जो और चले कबीर साहबके उस समयमें हुए उनका वृत्तान्त मुझको मालूम नहीं हैं । उस समय कबीर साहब कृष्णजीको और सहस्रों ऋषयों मुनियोंको उपदेश देते फिरे, जिसने आपका उपदेश सुना और कहना माना, वह परमधामको पहुँचा और जिसको विश्वास नहीं हुआ वह कालका भोजन बना ।

दूसरीबार कलियुगमें कबीर साहबके पृथ्वीपर प्रगट होनेका वृत्तान्त ।

धर्मदास बचन ।

हे साहिब इक विनती मोरी । खसम कबीर कहु बंदीछोरी ॥
भगत सुदरसन लोक पठाया । पाछे साहिब कहां सिधाया ॥
सो सतगुरु मुहि कहो संदेशा । सुधा वचन सुनि मिटै अँदेशा ॥

कबीर बचन ।

अब सुनु धर्मनि परम पियारा । तुमसो कहों आगल व्यवहारा ॥
द्रापर गत कलिजुग परवेशा । पुनि हम चल जीवन उपदेशा ॥
धरमराय कहैं देखो आई । मोहिं देखि जम गयो मुरझाई ॥

धर्मराय बचन ।

कहे धरम कस मोहिं दुखावहु । बच्छ हमार लोक पहुँचावहु ॥
तीनों जुग गवने संसारा । भवसागर तुम मोर उजारा ॥
हार वचन पुरुष मोहि दीन्हा । तुम कस जीव छुडावन लीन्हा ॥
और बन्धु जो आवत कोई । छिनमहैं ता कहैं खात बिलाई ॥
तुमते कछू न मोर बसाई । तुम्हरे बल हंसा घर जाई ॥
अब तुम फिर जाहु जगमाहीं । शब्द तुम्हारा सुनै कोउ नाही ॥
करम भरम हम उसकें ठाटा । जात कोइ न पावै बाटा ॥
घर घर भरम भूत उपजावा । धोका दै दै जीव नचावा ॥
भरम भूत हो सब कह लागे । तोहि चिन्है ताकहैं भ्रम भागे ॥
मद्य मांस खावैं नर लोई । मद्य मांस प्रिय नरको होई ॥
आपन पंथ मैं कीन परगासा । मांस मद्य सब मानुस ग्रासा ॥
चंडी जोगिन भूत पुजाओ । यही भरम महैं जग जहैं डाओ ॥
बांधि बहु फंदहि फंद फंदाओ । अंत काल कर सुधि बिसराओ ॥
तुम्हरी भगति कठिन है भाई । कोई न मनिहैं कहैं बुझाई ॥

यूरोपके विद्वानोंकी संमर्तियाँ, मिस्टर लार्ड- वक और मिस्टर गॉजिज़्ज़ाल्ट

ज्ञानी वचन ।

धरमराय तें बहु छल कीन्हा । छल तोहार सकलो हम चीन्हा ॥
पुरुष वचन दूसर नहिं होई । ताते तुम जीवन कहैं खोई ॥
पुरुष मोहिं जो आज्ञा देहीं । तो सब जिव होय नाम सनेही ॥
ताते सहजहिं जीव चैताऊँ । अंकुरी जीत सकल मुकताऊँ ॥
कोटी फंद जो तुम रचि राखा । वेद शास्त्र निज महिमा भाखा ॥
प्रगट कला जो धरी जग जाऊँ । तो सब जीवनको मुकताऊँ ॥
जो अस करौं वचन तब डोलै । वचन अखंड अडोल अमोलै ॥
जो जियरा सुभ अंकुरी होई । सब्द हमार मानी है सोई ॥
अंकुरी जीव सकल मकताओं । फंदा काटि लोक ले जाओं ॥
काटि भरम जा दैहों ताही । भरम तुम्हारा मानि हैं नाहीं ॥

छन्द-सत्य शब्द दिडाम सबहीं, भ्रम तोरि सब डारिहैं ।

छल तोर सब चिन्हाइ तबहीं, नाम बल जिय तारिहैं ॥

मन वचन सत्य जो मोहि चीन्हि, एक तत्त्व लौ लाइहैं ।

तब सीस तुम्हरे पांव देइहैं, अमल लोक सिधाइहैं ॥

सोरठा-मर्दहिं तोरा मान, सूरा हंस सुजान कोइ ।

सत्य शब्द सहिदान, चीन्हहि हंस हरष अती ॥

धर्मराय वचन ।

कहै धर्म जीवन सुखदाई । वात एक मुहिं कहो बुझाई ॥
जो जिव रहै तुम्हरो लौ लाई । ताके निकट काल नहिं जाई ॥
दूत हमार ताहि नहिं पावे । मुरछित दूत मोहिं पहैं आवे ॥
यह नहिं बूझ परी मोहिं भाई । तौन भेद मोहिं कहो बुझाई ॥

ज्ञानी वचन ।

सुनहु धरम जो पूछहुँ मोही । सो सब हाल कहौं मैं तोही ॥
सुनहु धरम तुम सत सहिदानी । सो तो सत्य शब्द आहि निरबानी ॥
पुरुष नाम है गुप्त परमाना । प्रगट नाम सत हंस बखाना ॥
नाम हमार हंस जो गहई । भवसागरसे सो निरबहई ॥
दूत तुम्हार होय बल थोरा । जब मम हंस नाम ले मोरा ॥

धर्मराय वचन ।

कहै धरम सुनु अन्तरजामी । कृपा करहु अब मोपर स्वामी ॥
यहि युग कौन नाम तुव होई । सो जनि मोपर राखहु गोई ॥

समीक्षा, प्रकृति वैपरीत्य, बेजिटेरियन

बीरा अंक गुप्त मन भाऊ । ध्यान अंग सब मोहि बताऊ ॥
केहि कारन तुम जाहु संसारा । सोई कहहु मोहि भेद गुन न्यारा ॥
हमहूँ जीवन सब्द चितायब । पुरुष लोककहँ जीव पठायब ॥
मोहि दास आपन कर लीजै । सब्द सार प्रभु मोकहँ दीजै ॥

ज्ञानी बचन ।

सुनहू धर्म तुम कस छल करहू । परगट दास गुप्त छल धरहू ॥
गुप्त भेद नहि देहौं तोहीँ । पुरुष अवाज कही नहि मोहीँ ॥
नाम कबीर मोर कलिमाहीँ । कबीर कहत जम निकट न जाहीँ ॥

धर्मराय बचन ।

कहै धरम तुम मोहिं दुरैहो । खेल एक पल हमहूँ खेलैहो ॥
ऐसी छल बुधि करब बनाई । हंस अनेक लेब संग लाई ॥
तुम्हार नाम ले पंथ चलायब । यहि विधि जीवन धोख दिखायब ॥

ज्ञानी बचन ।

अरे काल तू पुरुष द्रोही । छलमति कहा सुनावसि मोही ॥
जो जिव होइ है सब्द सनेही । छल तुम्हार नहि लागै तोही ॥
जौहरी हंस लहिं पहिचानी । परखिहँ ज्ञान ग्रन्थ मम बानी ॥
जेहि जीव मैं थापब जाई । छल तुम्हार तेहि देव चिन्हाई ॥

कबीरबचन धर्मदास प्रति ।

यहि सुनि धरमराय गहु मौना । ह्वै अन्तरधान गयो निज भौना ॥
धर्मनि कठिन काल गति फन्दा । छलबुध कै जीवन कहँ फन्दा ॥

तीसरा प्रकरण ।

जगन्नाथकी स्थापनाकी उत्थानिका ।

जब कृष्णजी महाराजका शरीर छूटा तब आपकी स्थापना जगन्नाथजीमें हुई ! उस समय उड़ीसा देशका राजा इन्द्रदमन था । उस राजा इन्द्रदमन को जगन्नाथजीने स्वप्न दिखलाया कि, तू मेरा मन्दिर उठा । जगन्नाथजीकी आज्ञानुसार राजा मन्दिर बनाने लगा, जब मन्दिर बनकर तय्यार हो गया तब समुद्र महा वेगसे लहरें मारता हुआ आया और मन्दिरको ढहाकर समेट ले गया और भूमि बराबर हो गयी । इसके उपरान्त फिर राजाने मन्दिर बनवाना आरंभ किया, फिरभी उसकी वही दशा हुई । फिर बनवाया फिर वही दशा हो गयी । इस प्रकार कई बेर राजाने मन्दिर बनवानेकी इच्छा की पर समुद्रने उसको पूर्ण होने नहीं दिया । तब राजाने दुःखित होकर उसका बनवानाही छोड़ दिया ।

रालिन्ससाहब, प्रोफ़ेसर फ़ाक्स साहब, डाक्टर नैम्ब, कतिपय चिह्न

चौथा प्रकरण ।

कबीर साहबके जगन्नाथ स्थापनाकी कथा ।

इस समय कबीर साहबने अपने वचनका स्मरण किया । जैसा कि, मैं इतः पूर्व निरञ्जन और कबीर साहबकी गोष्ठीमें लिख गया हूँ कि, निरञ्जनने कबीर साहबसे निवेदन किया था कि, जब मेरा जगन्नाथका अवतार होगा, तब समुद्र मेरे मन्दिरको तोड़ेगा, उस समय आप कृपा करके समुद्रको हटाकर और मेरे मन्दिर को स्थापित कर देवें । तब आप वचनबद्ध हुए थे कि मैं तुम्हारा मन्दिर स्थापित कर दूंगा और समुद्रको हटा दूंगा उसी वचनके अनुसार कबीर साहब उड़ीसा देशमें आ उत्तरे और राजा इन्द्रदमनके पास जाकर बोले कि, हे राजा ! आप जगन्नाथके मन्दिरको बनाओ । तब राजाने निवेदन किया कि, महाराज ! समुद्र मंदिरको बनने नहीं देता, मेरा कुछ वश नहीं चलता, जब मैं बनाकर तय्यार प्रस्तुत करता हूँ तब वह आकर ढा जाता है, मैं क्या करूँ ? तब कबीर साहबने कहा कि, हे महाराज ! मैं इसी प्रयोजनसे आपके निकट आया हूँ । अब आप प्रसन्नतापूर्वक ठाकुरद्वार बनवाओ मैं समुद्रको हटा-दूंगा, अब उसका कुछ वश नहीं चलेगा । तब राजाने पुनः मन्दिरके बनवानेका प्रबन्ध किया और मन्दिर तय्यार होने लगा । कबीर साहब समुद्र तटपर गये और एक चबूतरा बनाकर आसा'को अपने सामने लगा और समुद्रकी ओर मुंह करके बैठ गये । उधर ठाकुरका मन्दिर बनकर तय्यार होनेके समीप आ गया । समुद्रने देखा कि, अब तो ठाकुरका मन्दिर पूर्ण होने पर आया है, तब बड़े वेगसे दौड़ा । उसकी लहरें आकाशको उड़ीं । जब वह लहरें मारता कबीर चबूतरेके समीप पहुँचा, तब सामने कबीर साहबको बैठे देखकर ठहर गया, आगेको बढ़ नहीं सका । फिर ब्राह्मणका स्वरूप धरकर कबीर साहबके पास आया और दंडवत् प्रणाम करके निवेदन किया कि, ऐ महाराज ! मैं तो ध्रोखेसे आया और जगन्नाथका मंदिर ढाहना चाहता । किन्तु सामने तो आप बैठे हैं मुझमें यह सामर्थ्य नहीं है कि, आगे बढ़ सकूँ । आप न्यायकर्ता हैं मेरा न्याय कीजिये । तब कबीर साहबने कहा कि, हे जलधे ! मैं तुम्हारा हाल जानता हूँ—परन्तु अब इस कलिकालमें जगन्नाथजीका माहात्म्य होगा तथा उनकी पूजा होवेगी इस कारण अब तुम ठाकुरका मंदिर उठने दो और किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित मत करो । मैं तुमको इस मन्दिरके बदले द्वारकापुरी देता हूँ,

१ आसाका दूसरा नाम योगदण्ड हठयोगी लोग सुमेरको सीधा रखने अथवा श्वास बदलनेके लिये रक्खा करते हैं ।

मस्तिष्कके बलकी अपेक्षा, स्वभावका परिवर्तन, प्रकृतिका नियम

तुम जाकर उसको ले लो । तब समुद्र प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे पीछे पलटा और द्वारकापुरीको डुबा लिया । तबतक उधर जगन्नाथजीका मन्दिर बनकर पूरा हो चुका ।

जगन्नाथ मन्दिरकी स्थापनाका वृत्तान्त । (अनु०)

धर्मदास बचन ।

कह धर्मनि प्रभु मोहि सुनाओ । आगलचरित्र कहि समझाओ ॥

कबीर बचन धर्मदास प्रनि ।

राजा इन्द्रदमन तेहि काला । देश उड़ैसे को महिपाला ॥

सतगुरु बचन ।

राजा इन्द्रदमन तहैं रहई । मंडपकाज युगति सो कहई ॥

क्रिस्त देह छांडी पुनि जबही । इन्द्रदमन सपना भा तबही ॥

कृष्णका इन्द्रदमन राजाको सपना देना ।

स्वप्नेमें हरि अस ताहि बताई । मेरो मन्दिर देहु उठाई ॥

मोकहैं स्थापन कर राजा । तोपहैं मैं आयउ यहि काजा ॥

राजा यहि विधि सपना पाई । ततछन मण्डप काम लगाई ॥

मण्डप उठा पूरन भा कामा । उदधि आय बोरा तेहि ठामा ॥

जब जब मन्दिर लाग उठावे । क्रोधवन्त सागर तब धावे ॥

छनमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथ को मन्दिर तोरे ॥

मंडप सो षट बार बनायी । उदधि दौर तिहि लेत डुवाई ॥

हारा नृप करि बहुत उपायी । हरिमन्दिर तहैं उठै न भाई ॥

मन्दिरकी यह दशा विचारी । वर पूरब मनमांहि सम्हारी ॥

हम सन काल मांग अन्याई । बाचा बन्ध तहां हम जायी ॥

आसन उदधि तीर हम कीन्हा । काहू जीवन मोही चीन्हा ॥

पीछे उदधि तीर हम आई । चौरा तहां बनायउ जाई ॥

इन्द्रदमन तब सपना पावा । अहो राय तुम काम लगावा ॥

मंडप शंक न राखो राजा । इहैंवा हम आये यहि काजा ॥

जाहु वेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानहु बचन हमारा ॥

राजा मंडप काम लगायो । मंडप देखि उदधि चलि आयो ॥

सागर लहर उठी तिहि बारा । आवत लहर क्रोध चित धारा ॥

उदधि उमंग क्रोध अति आवे । पुरुषोत्तम पुर रहन न पावे ॥