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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

बहापुरी कौलास और अमरावती अदन आदिका वृत्तान्त

अद्यावचन ब्रह्मप्रति ।

कहे जननि सुनहु ब्रह्मा कोउ नहि जनक तुम्हार हो ॥

हमहि ते भई सबे उत्पति हमहि सब कीन सम्हार हो ॥ २१ ॥

ब्रह्मावचन अद्या प्रति ।

सोरठा-ब्रह्मा कहते पुकार, सुनु जननी तैं चित्त दे ॥

कहत वेद निरुवार, पुरुष एक सो गुप्त है ॥ २२ ॥

अद्यावचन ब्रह्मा प्रति ।

कहे अद्या सुन ब्रह्मकुमारा । मोसे नहीं स्रष्टा न्यारा ॥

स्वर्ग मृत्यु पाताल बनाई । सात समुन्दर हम निरमाई ॥

ब्रह्मावचन अद्या प्रति ।

माना वचन तुमहि सब कीन्हा । प्रथम गुप्त तुम कस रख लीन्हा ॥

जबै वेद मुहि कहे बुझाई । अलख निरञ्जन पुरुष बनाई ॥

अब तुम आप बनो करतारा । प्रथम काहे न किया विचारा ॥

जो तुम वेद आप कथि राखा । तो कस तुम अलख निरंजन भाखा ॥

आपे आप आप निरमाई । काहे न कथन कीन तुम भाई ॥

अब मोसन छल जनि करहू । सौंचे सौंच सब कहि उच्चरहू ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

जब ब्रह्मा यहि विधि हठ ठाना । तब अद्या मन कीन्ह तिवाना ॥

केहि विधि यहि कहूँ समझाई । विधि नहि मानत मोर बडाई ॥

जो यहि कहौं निरंजन बाता । कंहि विधि समझे यह विख्याता ॥

प्रथम कह्यो निरंजन राई । मोर दरश काहू नहि पाई ॥

अबै जो यही अलख लखावो । कौनी विधि ताको दिखलाओं ॥

अद्यावचन ब्रह्मा प्रति ।

अस विचारि पुनि ब्रह्मो समझावा । अलख निरंजन नहि दरस दिखावा ॥

ब्रह्मावचन अद्या प्रति ।

ब्रह्मा कहे मोहि ठोर बताओ । आगा पीछा जनि तुम लाओ ॥

मैं नहि मानो तुम्हरी बाता । ऐसी बात न मोहि सुहाता ॥

प्रथम तुम मुहि दीन भुलावा । अब तुम कहो न दरस दिखावा ॥

तासु दरस न पैहो पूता । ऐसी बात कहो अजगूता ॥

छंद-दरस दिखाय तत्काल दीजे मोहि न भरोस तुम्हार हो ॥

संशय निवार यहिकाल दीजे कीजे न विलम्ब लगार हो ॥

अदन क्या है निरंजनने सत्य लोककी नकलपर अपने लोक बनाये

अद्यावचन ब्रह्मा प्रति ।

कहे जननी सुनो ब्रह्मा कहों तोसों सत्तही ॥
सात स्वर्ग है माथ ताको चरन पताल सप्तही ॥ २२ ॥

ब्रह्माका पिताके खोजको जाना ।

सोरठा-लेहु पुष्प तुम हाथ, जो इच्छा तिहिं दरसकी ॥

जाय नवाओ माथ, ब्रह्मा चलै शिर नाइकै ॥ २३ ॥

जननी गुन्यो वचन चितमाहीं । मोरि कही यह मानति नाहीं ॥

या कहैं वेद दीन्ह उपदेशा । पै दरस ते नहिं पावे भेसा ॥

कह अष्टंगि सुनो रे वारा । अलख निरंजन पिता तुम्हारा ॥

तासु दरश नहिं पैहौ पूता । यह मैं वचन कहैं निज गूता ॥

ब्रह्मा सुनि व्याकुल ह्वै धावा । परसन सीस ध्यान हिय लावा ॥

ब्रह्मा चले जननि सिर नाई । सीस परसि आवों तोहि ठाई ॥

तुरतहि ब्रह्मा दीन्ह रिगायी । उत्तर दिशा बेगि चलि जायी ॥

आज्ञा माँगि विस्नु चले बाला । पिता दरशको चले पताला ॥

इत उत चितय महस न डोला । सेवा करत कछू नहिं बोला ॥

तेहि सिव मन अस चित अभावा । सेवा करन जननि चित लावा ॥

यहि विधि बहुत दिवस चलियऊ । माता सोच पुत्र कह कियऊ ॥

विष्णुका पिताके खोजसे लौटकर पिताके चरण तक न पहुंचनेका

बूतान्त अद्यासे कहना ।

प्रथम विस्नु जननी ढिग आये । अपनी कथा कहि समुझाये ॥

भेटचो नाहि मोहि पगु ताता । विष ज्वाला स्यामल भौ गाता ॥

व्याकुल भयउ तबै फिरि आवा । पिता पगु दरस मैं नहिं पावा ॥

सुनि हरषित भई आदिकुमारी । लीन्ह विस्नु कहैं निकट दुलारी ॥

चूमेउ बदन सीस दियो हाथा । सत्य सत्य बोलेउ सुत बाता ॥

धर्मदासवचन कबीर प्रति ।

कहे धरमनि यह संशय बीती । साहब कहहु ब्रह्माकी रीती ॥

पिता सीस तिन पर छन कीन्हा । कि होय निरास पीछे पगु दीन्हा ॥

छन्द-गयऊ ब्रह्मा सीस परसन, कथा ता दिनकी कहो ॥

भयो द्विस्टि मेराव कि नहिं, तासु दरसन तिन लहो ॥

यह बरनन सब कहो सतगुर, एक एक विलोयके ॥

निज दास जानि परगास कीजे, धरहु निज जनि गौयके ॥ २३ ॥

तीनों पुत्रोंकी कृतघ्नता आद्याकी पूजाका प्रचार

सोरठा-प्रभु हम हैं तुव दास, जनम किरतारथ मोर करि ॥
करहु वचन परगास, तेहि पीछे जो चरित भौ ॥ २४ ॥

पिताकी खोजमें गये हुए ब्रह्माकी कथा ।

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

धरमदास मुहि अति प्रिय अहूहू । कहो सँदेस परखि दूढ गहूहू ॥
चलत ब्रह्मा तब बार न लावा । पिता दरसकहूँ अति मन भावा ॥
तेहि स्थान पहुँचिगै जाई । नहिं तहूँ रबि ससि सून्य रहाई ॥
बहु विधि अस्तुति करे बनायी । ज्योति प्रभाव ध्यान तहूँ लाई ॥
ऐसे बहु दिन गये बितायी । नहिं पायो ब्रह्मा दरश पितायी ॥
सून्य ध्यान जुग चार गमावा । पिता दरस अजहूँ नहिं पावा ॥

ब्रह्माके लिये अद्याकी चिन्ता ।

ब्रह्मा तात दरस नहिं पाई । सून्य ध्यानमहूँ जुग बहु जाई ॥
माता चित करत मन माहौं । जेठ पुत्र ब्रह्मा रहू काहौं ॥
किहि विधि रचना रचहुँ बनाई । ब्रह्मा आवे कौन उपाई ॥

गायत्री उत्पत्ति ।

उबटि सरीर मैल गहि काढी । पुत्री रूप कीन्ह रचि ठाढी ॥
शक्ति अंश निज ताहि मिलावा । नाम गायत्री ताहि धरावा ॥
गायत्री मातहिं सिर नाई । चरन चूमि निज सीस चढाई ॥

गायत्रीवचन अद्या प्रति ।

गावत्री विनवै कर जोरी । सुनु जननी 'इक विनती मोरी ॥
कौन काज मो कहूँ निरमाई । कहो वचन लेउँ सीस चढाई ॥

अद्यावचन गायत्री प्रति ।

कहे आद्या पुत्री सुनु बाता । ब्रह्मा आहि जेठहि तुव भ्राता ॥
पिता दरशकहूँ गयो अकासा । आनौ ताहि वचन परगासा ॥
दरश तातकर वह नहिं पावे । खोजत खोजत जन्म गमावे ॥
जौने विधिते इहवौं आई । करो जाय तुम तौन उपाई ॥

गायत्रीका ब्रह्माके खोजमें जाना । कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

चलि गायत्री मारग आई । जननीवचन प्रीति चित लाई ॥
चलत भई मारग सुकुमारी । जननी बचन ध्यान उर धारी ॥

पांचोंकी पूजाका निश्चित होना और निरंजनका सर्वाधिपत्य तपशिलाका वृत्तान्त

छन्द-जाय देख्यो चतुरमुख कहैं नाहि पलक उधारई ॥
कछुक दिन सो रहा तहवाँ बहुरि युक्ति विचारई ॥
कौन विधि यह जागिहै अब करें कौन उपाय हो ॥
मन गुनति सोच बहुत विधि ध्यान जननी लाय हो ॥ २४ ॥

ब्रह्माको जगानेके लिये अद्याका गायत्रीको युक्ति बताना ।

सोरठा-अद्या आयसु पाइ, गायत्री तब ध्यान महैं ॥

निज कर परसेहु जाइ, ब्रह्मा तबहीं जागिहैं ॥

गायत्री पुनि कीन्ही तैसी । माता जुगति बतायी जैसी ॥

गायत्री तब चित्त लगाई । चरण कमल कहैं परसेउ जायी ॥

ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना ।

ब्रह्मा जाग ध्यान मन डोला । व्याकुल भयो बचन तब बोला ॥

कवन अहै पापिन अपराधी । कहा छुडायहु मोरि समाधी ॥

साप देहैं तो कहैं मैं जानी । पिता ध्यान मोहि खंडयो आनी ॥

गायत्रीवचन ब्रह्मा प्रति ।

कहि गायत्री मोहि न पापा । बूझि लेहु तब देहहु सापा ॥

कहों तोहिसो सांची बाता । तोहि लेन पठयी तुव माता ॥

चलहु बेगि जनि लावहु बारे । तुम बिन रचना को बिस्तारे ॥

ब्रह्मावचन गायत्री प्रति ।

ब्रह्मा कहे कौन विधि जाऊँ । पिता दरस अजहूँ नहि पाऊँ ॥

गायत्रीवचन ।

गायत्री कह दरस न पैहो । बेगि चलहु नहि तो पछतैहो ॥

ब्रह्माका गायत्रीको झूठी साक्षी देनेको कहना और गायत्रीका

ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना ।

ब्रह्मा कहे देहु तुम साखी । परस्यो सीस देख मैं आंखी ॥

ऐसे कहो मातु समुझायी । तो तुम्हरे संग हम चलि जायी ॥

गायत्रीवचन ।

कह गायत्री सुन स्तुति धारी । हम नहिं मिथ्या बचन उचारी ॥

जो मम स्वार्थ पुरवहु भाई । तो हम मिथ्या कहब बनाई ॥

ब्रह्मावचन ।

कह ब्रह्मा नहिं लखी कहानी । कहैं बुझाय प्रगटकी बानी ॥

भवसागरका स्वरूप

गायत्रीवचन ।

कह गायत्री देहु रति मोही । तो कह झूठ जिताऊँ तोही ॥
गायत्री कहै है यह स्वार्थ । जानि कही मैं पुनि परमारथ ॥
सुनि ब्रह्मा चित करै विचारा । अबका जतन करउँ इहि बारा ॥
छन्द—जो विमुख या कह करें अब तो नहीं बनि आवई ॥
साखि तो वह देय नाही जननि मोहि लजावई ॥
यहाँ नाही पिता पायो भयो न एको काज हो ॥
पाप सोचत नहि वनै अब करें रति विधि साजहो ॥
सोरठा—कियो भोग रति रंग, विसरचोसो मन दरसका ॥
दोउ कहैं बढयो उमंग, छल मति बुद्धि प्रगास किये ॥ २६ ॥

सावित्रीउत्पत्तिकी कथा ।

कह ब्रह्मा चल जननी पास । तब गायत्री वचन प्रकासा ॥
औरौ करौ जुगति इक ठानी । दूसरि साखि लेउ उत्पानी ॥
ब्रह्मा कहे भली है वाता । करहु सोइ जेहि मानै माता ॥
तब गायत्री जतन विचारा । देह मैल गहि कीन्ह नियारा ॥
कन्या रचि निज अस मिलावा । नाम सावित्री तासु धरावा ॥
गायत्री तिहि कह समुझावा । कहियो दरस ब्रह्मा पितु पावा ॥
कह सावित्री हम नहि जानी । झूठी साख दै आपनि हानी ॥
यह सुनि दोउ कहैं चिंता व्यापा । यह तो भयो कठिन संतापा ॥
गायत्री बहु विधि समझायी । सावित्रीके मन नहि आयी ॥
पुनि गायत्री कहा बुझाई । तब सावित्री बचन सुनाई ॥
ब्रह्मा कर मोसों रति साजा । तो मैं झूट कहों यहि काजा ॥
गायत्री ब्रह्महि समुझावा । दै रति या कहैं काज बनावा ॥
ब्रह्मा रति सावित्रीहि दीन्हा । पाप मोट आपन शिर लीन्हा ॥
सावित्री कर दूसर नाऊँ । कहि पुहपावति वचन सुनाऊँ ॥
तीनों मिलिके चलि भे तहवों । कन्या आदि कुमारी जहवों ॥

ब्रह्माका गायत्री और सावित्रीके साथ

माताके पास पहुँचना और सबका शाप पाना ।

करि प्रनाम सम्मुख रहे जाई । माता सब पूछी कुसलाई ॥
कहु ब्रह्मा पितु दरसन पाये । दूसरि नारि कहाँसे लाये ॥

दुःखितजीवोंकी पुकार व सत्यपुरुषकी गौहार

ब्रह्मावचन ।

कह ब्रह्मा दोऊ हैं साखी । परस्यो सीस देख इन आँखी ॥

अद्यावचन गायत्री प्रति ।

तब माता बूझे अनुसारि । कहु गायत्री वचन विचारी ॥

तुम देखा इन दरसन पावा । कहो सत्य दरसन परभावा ॥

गायत्रीवचन ।

तब गायत्री वचन सुनावा । ब्रह्मा दरस सीस पितु पावा ॥

मैं देखा इन परसेउ सीसा । ब्रह्महि मिले देव जगदीसा ॥

छन्द-लेइ पुहुप परसेउ सीस पितु इन द्विष्टि मैं देखत रही ।

जल ढार पुहुप चढाय दीन्ह हे जननि यह है सही ॥

पुहुपते पुहुपावती भयी प्रगट ताही ठामते ॥

इनहु दरसन लह्यो पितुको पूछहू इहि वामते ॥ २६ ॥

हो जननी यह है सही तुम पूछि लो पुहुपावती ।

सबही साँच मैं तोसो कहूँ नहि झूठ है एको रती ॥

अद्यावचन पुहुपावती प्रति ।

माता कह पुहुपावतीसो कहो सत्यहि मो सना ।

जो चढे सीसहि पिताके तुम वचन बोलहु ततखना ॥ २७ ॥

सोरठा-कहु पुहुपावति मोहि, दरश कथा निरवारके ॥

यह मैं पूछों तोहि, किमि ब्रह्मा दरसन किये ॥ १७ ॥

सावित्रीवचन ।

पुहुपावती बेचन तब बोली । माता सत्य वचन नहि डोली ॥

दरसन सीस लह्यो चतुरानन । चढेसीस यह धर निश्चय मन ॥

साख सुनत अद्या अकुलानी । भाअचरज यह मरम न जानी ॥

अद्याकी चिन्ता

अलख निरंजन अस प्रण भाखी । मोकहैं कोउ न देखै आँखी ॥

ये तीनहुँ कस कहहि लबारी । अलख निरंजन कहहु सम्हारी ॥

ध्यान कीन्ह अष्टंगी तेहि छन । ध्यान माहिँ अस कह्यो निरंजन ।

निरञ्जनवचन ।

ब्रह्मा मोर दरश नहि पाया । झूठि साखि इन आय दिवाया ॥

तीनो मिथ्या कहे बनाई । जनि मानहु यह है लबराई ॥

अद्याका ब्रह्माको शाप देना ।

यह सुनि माता कीन्हें दापा । ब्रह्मा कंहैं तब दीन्हो सापा ॥
पूजा तोरि करै कोइ नाहीं । जो मिथ्या बोलेउ मम पाहीं ॥
इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा । नरक मोट अपने शिर लीन्हा ॥
आगे होइ जो साख तुम्हारी । मिथ्या पाप करहि बहु भारी ॥
प्रगट करहि बहु नेम अचारा । अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥
विस्नु भक्तसों करहि हँकारा । ताते परिहैं नरक मँझारा ॥
कथा पुराण औरहि समुझैं हैं । चाल बिहून आपन दुखपैहैं ॥
उनसे और मुनै जो ज्ञाना । करि सो भगति कहां परमाना ॥
और देवको अंश लखैहैं । औरन निन्दि काल मुख जैहैं ॥
देवन पूजा बहु विधि लैहैं । दछिना कारण गला कटैहैं ॥
जा कह शिक्ख करै पुनि जायी । परमारथ तिहि नाहिं लखायी ॥
परमारथके निकट न जैहैं । स्वार अर्थ सबै समुझैहैं ॥
आप स्वार्थी ज्ञान मुनैहैं । आपनि पूजा जगत दिदैहैं ॥
आपन पूजा जगहि दिढायी । परमारथके निकट न जायी ॥
आप ऊँच औरहि कंहैं छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होइ खोटा ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

जब माता अस कीन्ह प्रहारा । ब्रह्मा मूरछि मही कर धारा ॥

अद्याका गायत्रीको शाप देना ।

गायत्री साप्यो तिहि वारा । हुइहै तोर पंच भरतारा ॥
गायत्री तोर होइ वृषभ भतारा । सात पाँच और बहुत पसारा ॥
धर औतार अखज तुम खायी । बहुत झूठ तुम वचन सुनायी ॥
निज स्वार्थ तुम मिथ्या भाखी । कहा जानि यह दीन्ही साखी ॥
मानि साप गायत्री लीन्ही । सावित्रिहि तब चितबन कीन्ही ॥

अद्याका सावित्रीको शाप देना ।

पुहुपावति निज नाम धरायेहु । मिथ्या कह निज जन्म नसायेहु ॥
सुनहु पुष्पावति तुम्हरो विस्वासा । नहिं पुजिहैं तुमसे कछु आसा ॥
होय कुगंध ठौर तब बासा । भुगतहु नरक काम गहि आसा ॥
जो तोहिं सींच लगावे जानी । ताकर होय वंशकी हानी ॥
अब तुम जाय धरो औतारा । क्योडा केतकी नाम तुम्हारा ॥

ज्ञानी अर्थात् कबीर साहिबका सत्य- लोकसे तपशिलाके समीप जाना और समस्त जीवोंके ठण्डा करनेका वृत्तान्त जीवोंका भक्ति करनेकी प्रतिज्ञा करना

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

छन्द-भये साप बस तीनों बिकल मतिहीन छीन कुकर्मते ।
यह काल कला प्रचंड कामिनि डस्यो सब कहैं चर्मते ॥
ब्रह्मादि सिव सनकादि नारद कोउं न बचि भागि हो ॥
सुनु धरमनि विरल बाचे सब्द सत सो लागि हो ॥ २८ ॥

सोरठा-सत्य सब्द परताप, कालकला व्यापे नहीं ।
निकट न आवै पाप, मन वच करम जो पर गहे ॥ २८ ॥

साप दे देनेपर अद्याका निरञ्जनके डरसे डरकर पछ्ताना ।
साप तीनौको दैलियो मन माहिं तब पछ्तावई ।
कस करहि मोहि निरंजना पल छमा मोहि न आवई ॥

निरञ्जनका अद्याको शाप देना ।

अकास बानी तब भयी यहु कहा कीन भवानिया ।
उत्पत्ति कारन तोहि पठायी कहा चरित यह ठानिया ॥
सोरठा-नीचहि ऊँच सिताय, बदल मोहि सो पावई ।

द्रापर युग जब आय, तुमहूँ पंच भतारि हो ॥ २९ ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति । अद्याका निडर होना ।

साप ओयल जब सुनेउ भवानी । मन सन गुने कहा नहिं बानी ॥
ओयल प्रभाव साप हम पाया । अब कहा करब निरंजनराया ॥
तोरे वस परी हम आई । जस चाहो तस करो उपाई ॥

विष्णुका गौरसे श्याम होनेका कारण ।

अद्यावचन विष्णु प्रति ।

पुनि माता विष्णु दुलारा । सुनहु पुत्र इक वचन हमारा ॥
सत्य सत्य तुम कहो बुझाई । पितु पद परसन जब गै भाई ॥
प्रथमहु तो तुव गौर सरीरा । कारण कौन स्याम भए धीरा ॥

विष्णुवचन अद्या प्रति ।

आज्ञा पाय हम तत्काला । पितु, पद परसन चले पताला ॥
अक्षत पुहुप लीन्ह करमाहों । चले पताल पंथ मग जाहों ॥
पहुँचि संसनाग पहुँ गयऊ । विषक तेज हम अलसयऊ ॥
भयो स्याम विष तेज समावा । भइ अवाज अस वचन सुनावा ॥
अहो विस्तु माता पहुँ जाई । बचन सत्य कहियो समझाई ॥
सतजुग त्रेता जैहै जबहीं । द्रापर ह्वै चौथा पद तबहीं ॥

पूर्व देशमें काल पुरुषका जीवोंको फसानेके— —लिये नानामत मतान्तरका प्रचार करना

तब तुम होहु कृस्न अवतारा । लैहो ओयलसों कहों विचारा ॥
नाथहु नाग कलिंद्री जाई । अब तुम जाहु विलम्ब न लाई ॥
ऊँच होइके नीच सतावे । ताकर ओयल मोहि सो पावे ॥
जो जिव देह पीर पुनि काहू । हम पुनि ओयल दिबावै ताहू ॥
पहुँचे हम तब तुव पास । कीन्हेट सत्य वचन परगासा ॥
भेटेउ नाहि मोहि पद ताता । विष ज्वाला साँवल भोगाता ॥
व्याकुल भयो तवै फिर आयो । पितु पद दरसन मैं नहि पायो ॥

अद्याका विष्णुको ज्योतिका दर्शन कराना ।

इतना सुनि हरषित भई माई । लीन्ह विस्नु कहैं गोद उठाई ॥
पुनि अस कहेउ आदि भवानी । अब सुनहु पुत्र प्रिय मम बानी ॥
देख पुत्र तोहि पिता भिटावों । तोरे मन कर धोख मिटावों ॥
प्रथमहि ज्ञान द्रिष्टिसो देखो । मोर वचन निज हिये परेखो ॥
मन सरूप करता कहैं जानों । मनते दूजा और न मानो ॥
सरग पताल दौर मन केरा । मन इस्थिर मन अहै अनेरा ॥
छनमहैं कला अनंत दिखावे । मन कहैं देख कोइ नहि पावे ॥
निराकार मनहीको कहिये । मनकी आस दिवस निसि रहिये ॥
देखहु पलटि सून्यमहैं जोती । जहूँ झिलमिल झालर होती ॥
फेरहु स्वास गगन कहैं धाओ । मार्ग अकासहि ध्यान लगाओ ॥
जैसे माता कहि समुझावा । तैसे विस्नु ध्यान मन लावा ॥

छंद-पैठि गुफा ध्यान कीन्हो स्वास संयम लायके ॥

पवन धूँका दियो जबते गगन गरज्यो आयके ॥

बाजा सुनत तब मगन भा पुनि कीन्ह मन कस ख्याल हो ॥

सून्य स्वेत पीत सज्ज लाल दिखाय रंग जंगल हो ॥ ३० ॥

सोरठा-तेहि पीछे धर्मदास, मन पुनि आपे दिखायऊ ॥

कीन्ह ज्योति परकास, देखि विस्नु हरषित भये ॥ ३० ॥

मातहि नायो सीस, बहु अधीन पुनि विस्नु भा ॥

मैं देखा जगदीस, हे जननी परसाद तुव ॥ ३१ ॥

धर्मदास वचन ।

धरमदास गहि टेके पाया । हे साहिब इक संशय आया ॥

कन्या मनको ध्यान बतावा । सो यह सकल जीव भरमावा ॥

पश्चिमके चार किताबोंका वर्णन तौरीतमें उत्पत्तिका वृत्तान्त आदमकी पैदाइश

सद्गुरु वचन ।

धरमदास यह काल स्वभाऊ । पुरुष भेद विस्नु नहिं पाऊ ॥
कामिनिकी यह देखहु बाजी । अम्रित गोय दियो विष साजी ॥
जोत काल दूजा जनि जानहू । निरखि धर्म सत्यहिं उर आनहू ॥
परगट तोहि कहीं समुझाई । धरमदास परखहु चित लायी ॥
जस परगट तस गुपुत सुभाऊ । जो रह हियासो बाहर आऊ ॥
जब दीपक बारै नर लोई । देखहु जोति सुभाव विलोई ॥
देखत जोति पतंग हुलासा । जानि प्रीति आवै तिहि पास ॥
परसत होवे भसम पतंगा । अन जाने जरि मरहि मतंगा ॥
जोति सरूप काल अस आही । कठिन काल वह छाँडत नाही ॥
कोटि विस्नु औतारहि खाया । ब्रह्मा रुद्रहि खाय नचाया ॥
कौन विपति जीवनकी कहऊँ । परखि वचन जिन सहजहिं रहऊँ ॥
लाख जीव वह नित्यहि खाई । अस विकराल सो काल कसाई ॥

धर्मदास वचन ।

धर्मदास कह सुनहु गुसाई । मोरे चित संसय अस आई ॥
अष्टंगिहि पुरुष उत्पानी । जिहि विधि उपजी सो मैं जानी ॥
पुनि वहि त्रास लीन्ह धर्म राई । पुरुष प्रताप सु बाहर आई ॥
सो अष्टंगी अस छल कीन्हा । गोइसि पुरुष प्रगट जम कीन्हा ॥
पुरुष भेद नहिं सुनत बतावा । काल निरंजन ध्यान करावा ॥
यह कस चरित कीन्ह अष्टंगी । तजी पुरुष भई कालकि संगी ॥

सद्गुरु कबीर वचन ।

धर्म सुनहु जन नारि सुभाऊ । अब तुहि प्रगट वरणि समझाऊ ॥
होय पुत्री जेहि घर माहीं । अनेक जतन परितोषत ताही ॥
वस्त्र भच्छ सुख सेज निवासा । घर बाहर सब तिहिं विस्वासा ॥
यज्ञ कराय देय पितु माता । बिदा कीन्ह हित प्रीतिसों ताता ॥
गयी सुता जब स्वामी गेहा । राती तासु संग गुन नेहा ॥
माता पिता सबै बिसरावा । धरमदास अस नारि स्वभावा ॥
ताते अध्या भई विगानी । काल अंग ह्वै रही भवानी ॥
ताते पुरुष प्रगट ना लायी । काल रूप विस्नुहि दिखलायी ॥

धर्मदासवचन कबीर प्रति ।

हे साहब यह जान्यो भेदा । अब आगेका करहु उछेदा ॥

आदम और हव्वाकी सन्तान

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

पुनि माता कहि विस्नु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निज वारा ॥
अहो विस्नु तुम लेहु असीसा । सब देवनमें तुमहीं ईसा ॥
जो इच्छा तुम चितमें धरिहौ । सो सब तोर काज मैं करिहौ ॥

मायाका विष्णुको सर्वप्रधान बनाना ।

प्रथम पुत्र ब्रह्मा दुरि गयऊ । अकरम झूठ ताहि प्रिय भयऊ ॥
देवन सेष्ठ तुमहिं कहैं मानहिं । तुम्हरी पूजा सब कोई ठानहिं ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

किरपा वचन अस मातैं भाखा । सबसे सेष्ठ विस्नु कहैं राखा ॥
माता गयी रुद्रके पास । देख रुद्र अति भये हुलासा ॥

अद्याका महेशको बरदान देना ।

पुनि लहुरा कहैं पूछे माता । तुम सिव कहो हृदयकी बाता ॥
माँगहु जो तुम्हरे चित भावे । सो तोहिं देउँ माता फुरमावे ॥
दोइ पुत्रन कहैं मता दृढावा । माँग महेश जोई मन भावा ॥

महेशवचन ।

जोरि पानि सिव कहबे लीन्हा । देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥
कबहिं न विनसे मेरी देही । हे माता माँगों बर एही ॥
हे जननी यह कीजे दाय। कबहुँ न विनशै मेरी काया ॥

अद्यावचन ।

कह अष्टंगी अस नहिं होई । दूसर अमर भयो नहिं कोई ॥
करहु योग तप पवन सनेहा । रहे चार जुग तुम्हरी देहा ॥
जौलौ पृथ्वी अकास सनेही । कबहुँ न विनसे तुम्हरी देही ॥

धर्मदासवचन ।

धर्मदास विनती चित लाई । ज्ञानी मोहि कहो समुझाई ॥
यह तो सकल भेद हम पायी । अब ब्रह्माको कहो उपायी ॥
अद्या साप ताहि कहैं दीन्हा । तेहि पीछे ब्रह्मा कस कीन्हा ॥

कबीरवचन ।

विस्नु महेश जबै वर पाये । भये आनन्द अतिहि हरषाये ॥
दोनों जने हरण मन कीना । ब्रह्मा भयो मान मद हीना ॥
धरमदास मैं सब कुछ जानों । भिन्न २ कर प्रगट बखानों ॥

जलप्रलय और नूहकी किस्तीका वर्णन

शाप पानेके कारण दुःखित हो ब्रह्माका विष्णुके पास जाकर
अपना दुःख कहना और विष्णुका उसे आश्वासन देना ।
ब्रह्मा मनमें भयो उदासा । तब चलि गयो विस्तुके पास ॥

ब्रह्मावचन विष्णु प्रति ।

जाय विस्तुसे विनती ठाना । तुम हो बंधु देव परधाना ॥
तुम पर माता भई दयाला । साप विवश तुम भये बिहाला ॥
निज करनी फल पावउ भाई । किहि बिधि दोष लगाऊँ माई ॥
अब अस जतन करो हो भ्राता । चल परिवार वचन रह माता ॥

विष्णुवचन ।

कहे विस्तु छोडो मन भंगा । मैं करिहँ सेवकाई संगा ॥
तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संसय सब देहु बहाई ॥
जो कोइ होवे भगत हमारा । सो सेवै तुम्हरो परिवारा ॥
छंद—जग माहि ऐसे दिढाइहँ फल पुन्य आसा जोय हो ॥
जज्ञ धर्म अरु करे पूजा द्विज बिना नहि होय हो ॥
जो करे सेवा द्विजनकी तेहि महापुन्य प्रभाव हो ॥
सो जीव मोकह अधिक प्यारे राखिहों निज ठाँव हो ॥ ३१ ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

सोरठा—ब्रह्मा भये आनंद, जबहि विस्तु अस भासेऊ ॥
मेटेउ चितकर दुंद, सखा मोर सब सुखीभौ ॥ ३२ ॥

काल प्रपंच ।

देखहु धर्मान काल पसारा । इन ठग ठग्यो सकल संसारा ॥
आसा दै जीवन बिल मावै । जनम जनम पुनि ताहि सतावै ॥
बलि हरिचंद बेनु बइरोचन । कुंती सुत औरो महिसोचन ॥
ये सब त्यागी दानि नरेसा । न कहूँ लै राखै केहि देसा ॥
जस गंजन इन सबकी कीन्हा । सो जग जाने काल अधीना ॥
जानत है जग होय न सुद्धी । काल अमरबल सबकी हर बुद्धी ॥
मन तरंगम जीव भुलाना । निज घर उलटिन चीन्ह अजाना ॥

धर्मदासवचन ।

धर्मदास कह सुनो गुसाई । तबकी कथा मोहि समझाई ॥
तुम प्रसाद जमको छल चीन्हा । निस्वय तुम्हरे पद चित दीन्हा ॥

इब्राहीम पैगंबरका वर्णन यूसुफ पैगंबरका वृत्तान्त

भव बूडत तुमही गहि राखा । सब्द सुधारस मोसन भाखा ॥
अब वह कथा कहो समुझाई । स्नाप अन्त किय कौन उपाई ॥
कबीर बचन धर्मदास प्रति गायत्री के अद्या को शाप देनेका वृत्तान्त
धर्मनि तुम सन कहों बखानी । भाषा ज्ञान अगमकी बानी ॥
मातु स्नाप गायत्री लीन्हा । उलटि साप पुनि मातहि दीन्हा ॥
हम जो पाँच पुरुषकी जोई । पाँचोकी तुम माता होई ॥
बिना पुरुष तू जनि है वारा । सो तो जनि है सकल सनसारा ॥
दुहुन साप फल पायो भाई । उगरह मयो देह धरि आई ॥

इति सृष्टि उत्पत्ति विषयक प्रमाण-अनुराग सागर ।

अथ आदिमंगल

बोहा—

प्रथमै समरथ आप रहे, दूजा रहा न कोइ ।
दूजा केहि बिधि ऊपजा, पूछत हों गुरु सोइ ॥ १ ॥
तब सतगुरु मुख बोलिया, सुकृत सुनो सुजान ।
आदि अन्तकी पारचै, तोसों कहैं बखान ॥ २ ॥
प्रथम सुरति समरथ कियो, घटमें सहज उचार ।
ताते जामन दीनिया, सात करी बिस्तार ॥ ३ ॥
दूजे घट इच्छा भई, चित मनसा तो कीन्ह ।
सातरूप निरमाइया, अविगत काहु न चीन्ह ॥ ४ ॥
तब समरथके स्त्रवणते, मूल सुरति भै सार ।
सब्द कला ताते भई, पाँच ब्रह्म अनुहार ॥ ५ ॥
पाँचौ पाँचे अंड धरि, एक एकमा कीन्ह ।
दुइ इच्छा तहैं गुप्त है, सो सुकृत चित चीन्ह ॥ ६ ॥
योगमया यकु कारने, ऊजे अक्षर कीन्ह ।
या अविगति समरथ करि, ताहि गुप्त करि दीन ॥ ७ ॥
स्वासा सोहं ऊपजे, कीन्ह अमी बंधान ।
आठ अंश निरमाइया, चीन्हौ संत सुजान ॥ ८ ॥
तेज अंड अचिंत्यका, दीन्हो सकल पसार ।
अंड शिक्षापर बैठकै, अधर दीप निरधार ॥ ९ ॥

फिरऊनका वृत्तान्त मूसाकी उत्पत्तिका वृत्तान्त

ते अचिन्तके प्रेमते, उपजे अक्षर सार ।
चारि अंश निरमाइया, चारि वेद विस्तार ॥ १० ॥
तब अक्षरका दीनिया, नींद मोह अलसान ।
वे समरथ अवि गति करी, मर्म कोई नहि जान ॥ ११ ॥
जब अक्षरके नींदगे, देवी सुरति निरवान ।
स्यामवरन यक अंड है, सो जलमें उतरान ॥ १२ ॥
अच्छर घटमें ऊपजे, व्याकुल संसय सूल ।
किन अंडा निरमाइया, कहा अंडका मूल ॥ १३ ॥
तेहि अंडके मुखपर, लगी सब्दकी छाप ।
अक्षर दृष्टिसे फूटिया, दसद्वारे कठि बाप ॥ १४ ॥
तेहिंते जोति निरञ्जनौ, प्रकटे रूप निधान ।
काल अपरवल बीरभा, तीनिलोक परधान ॥ १५ ॥
ताते तीन देव भे, ब्रह्मा विष्णु महेस ।
चारि खानि तिन सिरजिया, मायाके उपदेश ॥ १६ ॥
चारि वेद षट सास्त्रऊ, औं दशअष्ट पुरान ।
आसा दै जग बाँधिया, तीनों लोक भुलान ॥ १७ ॥
लख चौरासी धारमा, तहाँ जीवदिय बास ।
चौदह यम रखवारिया, चारिवेद विश्वास ॥ १८ ॥
आपु आपु सुख सबरमै, एक अंडके माहिं ।
उत्पत्ति परलय दुःख सुख, फिरि आवहिं फिरि जाहिं ॥ १९ ॥
तेहि पाछे हम आइया, सत्य सब्दके हेत ।
आदि अन्तकी उत्पत्ती, सो तुमसों कहि देत ॥ २० ॥
सात सुरति सबमूल है, प्रलयहु, इनहीं माहिं ।
इनहींमासे ऊपजे, इनहीं माहैं समाहिं ॥ २१ ॥
सोई ख्याल समरथकर, रहे सो अच्छप छपाई ॥
सोई संधिलै आइया, सोवत जगहिं जगाइ ॥ २२ ॥
सात मुरतिके बाहिरे, सोरह संखके पार ॥
तहैं समरथको बैठका, हंसन केर आधार ॥ २३ ॥
घर घर हम सबसों कही, शब्द न सुनें हमार ॥
ते भसागर डूबहीं, लख चौरासी धार ॥ २४ ॥
मंगल उत्पत्ति आदिका, सुनियो संत सुजान ॥
कह कबीर गुरु जाग्रत, समरथका फुरमान ॥ २५ ॥

दूसरी किताब जबूरका वृत्तान्त

प्रमाण श्वास गुञ्जारका ।

देखो प्रकरण दशवाँ, पृष्ठ २७ ।

कबीर बचन—चौपाई ।

कहे कबीर सत्य प्रकाश । श्रोता सुरति धनी धर्मदासा ॥
सत्य सार सुकृत गुन गावों । अविचल बाँह अच्छे पद पावों ॥
संशय रहित सदा सो गाऊँ । शीलरूप सब हितकर नाऊँ ॥
करै कुलाहल हंस उजागर । मोह रहित सब सुखके सागर ॥
तेहि पुर जरा मरन भ्रम नाही । मन विकार इंद्री नहिं ताहीं ॥
सत्यलोक हंसन सुख होई । सो सुख इहाँ न जाने कोई ॥
जाने सो जो उहाँ रहाई । इहूवाँ आय कहै समुझाई ॥
आवत जात बार नहिं लावे । उहाँकी चाल सो इहाँ चलावे ॥
जो समझे सोइ उतरे पारा । बिन समझे जब जमके चारा ॥

समय—अमरलोककी महिमा, सत्य शब्द उपदेश ।

हंस हेतु सों बरनों, छूटे जमकर देस ॥

अमरलोककी अविगति बानी । धरमदास मैं कहूँ बखानी ॥
जो समझे सो उतरे पारा । बिन समझे सब जमके चारा ॥

धर्मदास बचन ।

प्रथम शरन सतगुरु गुन गाऊँ । अच्छरभेद सकल सुधि पाऊँ ॥
सत्यलोक कर भाव अपारा । सो भवसागर करै पसारा ॥
भाषो अग्र अग्रकी बानी । भाषो द्वीप जहां लगि खानी ॥
भाषो पुरुष पुरुषकी काया । भाषो अमी अमान अमाया ॥
भाषो पुरुष लोककी बानी । भाषो सबै सहज सहिदानी ॥
जो काया प्रभु आप सँवारा । सो समुझाइ कहौ व्यवहारा ॥
अमर तार अखंडित बानी । स्वासा पार सार सहिदानी ॥
जब का प्रभु कीन बन्धाना । कहौ विचारि तासु सहिदाना ॥
जोतिक स्वासा पुरुषकी देहा । तार तार कर कहो सनेहा ॥

कबीर बचन ।

अमर तार अखंडित बानी । स्वाँसा सार पार सहिदानी ॥
जेता बचन पुरुष उच्चार । तेता बचन नाम अधिकारा ॥
स्वासा पारम आदि निरबाना । सोरह सुतकी नाल बखाना ॥
समय—पंच अमीकी देह धरि, प्रकटी जोति अपार ।
सुरतिवंत निहतत्त पुर, होत स्वाँस गुंजार ॥

तीसरी किताब इजीलका वृत्तान्त

धर्मदास वचन— चौपाई ।

हाथ जोरिके टेकेउ पाऊ । साहब कहौ तहवौ कर भाऊ ॥
कहौ लोककी बात बिचारी । जहैलौ दीप करी विसतारी ॥
बरनौ दीप गुप्त अनुसार । बरनौ जहैललिग सकल पसारा ॥
बरनौ सोरह सुतकर भाऊ । तिनको फिर कैसे निरमाऊ ॥
पुरुष स्वास जेता अनुसार । ताकर कहो सकल विसतारा ॥
केहि विधि सोरह सुत परगासा । कहो केही कहाँ रहिवासा ॥
कहो बिस्तार सकल अस्थाना । सत्यलोक और जमके थाना ॥
कैसे निरगुन परभुहि कीन्हा । कैसे पांच तत्वको चीन्हा ॥
कैसे आदि अन्त प्रभु कीन्ही । कैसे रची देहकर चीन्ही ॥
कैसे भय निरंजन राया । कैसे तीन लोक निरमाया ॥
कैसे उपजन विनशन कीन्हा । काह जान बाजी जम दीन्हा ॥
कैसे चित्त अचित्त तन दीना । कैसे जीव सीव कर लीना ॥
कैसे इन्द्दी देह बनाई । कैसे जीव परा बसि आई ॥
कैसे जीव अपन पौ दरसे । कैसे जीव पुरुष पग परसे ॥

सयय—काया मध्ये स्वास है, स्वासा मध्ये सार ।

सार शब्द बिचारिके, साहब कहो सुधार ॥

सतगुरु वचन— चौपाई ।

कहै कबीर सुनो धर्म दासा । अहंकार जस कीन तमासा ॥
अहंकार कीन यकं थाती । तासे होय दिवस अरु राती ॥
बाजीगर यह जाल पसारा । धंधे लाय दियो संसारा ॥
काम क्रोध लालच अरु मोषा । जाल पसार सगरो ये धोखा ॥
एती जाल पास संसारा । विरला गुरु मुख उतरे पारा ॥
धरमदास जो पूछेहु आई । आदि अंत सब कहों बुझाई ॥
कहों लोक लोककी बानी । कहों पुरुष सुतकी उत्पानी ॥
कहों संदेश दया करि तोही । भुक्ति जानि जो पूछहु मोही ॥
सुनहुँ संदेश आदि निरबाना । जाके सुनत काल छै माना ॥
सुमिरहु आदि पुरुष दरबारा । सुमिरत आप हंस होय पारा ॥
समय—तीन लोकके भीतरे, रोकि रहो जम द्वार ।
वेद शास्त्र अगुवा कियो, मोह्यो सकल संसार ॥

चौथी किताब कुरानका वृत्तान्त आठ वेदोंका वर्णन, निरञ्जनका पंथ

चौपाई ।

धरमदास चित्त चेतहु जानी । कहों बुझाय अगरकी खानी ॥
पुरुष अजावन रहे विदेहा । तत्त्व बिहीन सुरति सनेहा ॥
चारि करी सिंहासन जोरा । पांचऐँ आप मध्य अंजोरा ॥
चारि करी चारिउ परवाना । स्वाती युक्त भीतर अकुलाना ॥
समय-करी करी महा परिमल, वास सुवासकी खानि ।
तेज करीन परगट भई, चिता आनि समानि ॥

चौपाई ।

पुरुष आंचित चिता जब कीन्हा । उपज्योशब्द सुरतिको चीन्हा ॥
रहे गुप्त परगट भई काया । स्वासा सार शब्द निरमाया ॥
शब्दहिते है पुरुष अस्थूला । शब्दहिते है सबको मूला ॥
शब्दहिते बहु शब्द उचारा । शब्दै शब्द भया उजियारा ॥
शब्दहिं पारस शब्द अधारा । शब्दहिते भौ सकल पसारा ॥
शब्दहिं रूप गुरु कर धारा । सोई शब्द जिवके रखवारा ॥
प्रथम शब्द भया अनुसार । निहतत्त्वी यक कमल सुधारा ॥
नीहतत्त्वीपर आसन कीन्हौ । रचना रची सकल तब लीन्हौ ॥
रच्यौ पुहुप रचना मनि भारी । सहस्र अठासी दीप सुधारी ॥
अच्छै वृक्ष एक रचा बनाई । अग्रवास तहैं रही समाई ॥
समय-पेड पात रस फूलमें, प्रगटी वास अनूप ।

पारस गिहतत्त्वहि पुरुष, सुरति हंसको रूप ॥

पेड पात फल फूलमें, प्रगटी वास अनूप ।

प्रसन्न होत निहतत्त्व पुरुष, सुरति हंसको रूप ॥

चौपाई

जब पारस सुरति भये स्थाना । अगर प्रताप निमिष उरआना ॥
पुहुप प्रसन्न होत उजियारा । स्वासा पारस बचन सुधारा ॥
पुरुष प्रसन्न नाम उच्चार । श्वासापर सब रचनि सुधारा ॥
स्वासा पार शब्द गुँजारा । पांच अमीको भयो बिस्तारा ॥
पांच अमीको जो विसतारा । ताहि अमी सब लोक सुधारा ॥
स्वासा पुहुप अगरकी खानी । सोलह सुतकी भई उत्पानी ॥
पांच अमी साहबके अंगा । पांचों तत्त्व ताहि परसंगा ॥
स्वासा नेह सबै उपजाया । बानी बानी बरन बनाया ॥

सत्य सार सबहिनको मूला । भयऊ सत्य सो सब अस्थूला ॥
स्वासासार सत्य कर भाऊ । अमी आदि उपजी तेहि नाऊ ॥
सत्यसार स्वासा संभारी । अमी आदि पारस तहैं धारी ॥
स्वासा आदि सुरङ्ग बखाना । रंग अमीकर भा बंधाना ॥
स्वासा अजर नाम अनुमाना । परगट अमी सो कहों सुजाना ॥
अदल नाम स्वासा परकाशा । उपजी अमी अमान सुबासा ॥
स्वासा निरञ्जन भया अनुसार । अधर अमीका भा विस्तारा ॥
स्वासा पांच परगट विस्तारा । पांच अमीको भयो पसारा ॥
पांच अमी पांचों अधिकारा । पांचों तत्व तेहि संग सुधारा ॥
पांच अमी सब लोक पसारा । पांचों तत्व गुप्त अनुसार ॥
समय-पांच अमीते पांच भये, पांच नाम अधिकार ।
सनै सनैही सब भया, अमी तत्व विस्तार ॥

चौपाई

सोरह स्वासा सार सुहाया । सोरह सुतकी प्रगटी काया ॥
सोरह सुतकी सोरह नाला । एकते एक अमान रिसाला ॥
पुहुप नाम स्वासा अनुसारि । उपजी सुरति हंसपति भारी ॥
सुरति समानी प्रभुकी देहा । बाहर भीतर एक सनेहा ॥
पांच अमीकी प्रकटी देहा । सुरति कीन्ह तेहि मांहि सनेहा ॥
जेतिक पुरुष खान निरमाया । पांच अमीते सबकी काया ॥
पांचों अमी सुरतिके अंगा । नाल सात उपजी तेहि संग ॥
सात नाल संग एकै भाऊ । सातो सुरत पुरुष परगटाऊ ॥
सात नालकर एके भाऊ । सातौं रहै पुरुषके ठाऊ ॥
पुरुष सुरति कहैं अगुवा कीन्हा । सातौं नाल सौंप तेहो दीना ॥
सातौं नाल सुरति जब पाई । ताहि नालमों रही समाई ॥
छिन बाहर छिन भीतर आवै । देह विदेह दोऊ दरसावै ॥
अमरतार निःअच्छर कियेऊ । सोऊ पुरुष सुरति कह दियेऊ ॥
सत्तपुरुष निज सुरति सनेही । पारस आदि रची सबदेही ॥
समय-अधर निहछर संग लिये, सेत ध्वजा फहराय ।
पलटि समानि सुरति पुरुष, रहि सो अछप छिपाय ॥

सोलह सुतकी उत्पत्ति-चौपाई ।

सुरत सनेह प्रभु इच्छा कीन्हीं । सोरह सुत उपजावे लीन्हीं ॥

आदि भवानी आद्याका पन्थ ब्रह्माका पंथ, विष्णु और शिवकापंथ

सत्यसार स्वासा अनुमाना । सुकृत अंस भये अगुआना ॥
दुसरी स्वासा बाहर आई । उपजे सहज सून्य तिनह पाई ॥
तिसरी स्वासा पुहुप सनेही । तेहिंते भई हमारी देही ॥
चौथी स्वासा तेज सनेहा । तेहिंते भई धरमकी देहा ॥
पांचें स्वासा नाम खुमारी । उपजी कन्या आदि कुमारी ॥
शील नाम स्वासा निरमयऊ । छठयें अंसं सुजन जन भयऊ ॥
सतमें स्वासा नाम अनंगा । उपजे अंश भृंगीमुनि संगा ॥
अठवें स्वासा नाम सुहेली । उपजे कूर्म सीस उर मेली ॥
नवमें स्वासा नाम सोहंगी । जाते उपजे सुत सरवंगी ॥
दसएँ स्वासा नाम रसीला । जाते उपजे सरवन लीला ॥
ग्यारहें स्वासा नाम सुरंगा । सुत स्वभाव उपजे तेहि संगा ॥
बारहें स्वासा नाम सुमाहा । भाव नाम सुत उपजे ताहां ॥
तेरहें स्वासा अछय सुभाऊ । उपजे सुत विवेक तेहि नाऊँ ॥
चौदह स्वासा अमर बंधाना । उपजे सुत संतोष सुजाना ॥
पंद्रहे स्वासा प्रेम सनेहा । उपजी कदल ब्रह्मकी देहा ॥
षोडशे स्वासा नाम जलरङ्गी । उपजे दयापालना सङ्गी ॥
षोडश स्वासा षोडश बानी । उपजे जोगसंतायन ज्ञानी ॥
सोलह स्वासा नाम बखाना । उपजे सोलह सुत निरवाना ॥
सोरह सुत कर एकै मूला । भिन्न भिन्न प्रगटी अस्थूला ॥
एके प्रीति एकै व्यवहारा । सबही रहैं पुरुष दरबारा ॥
एक पाँवते सेवा करहीं । पुरुष वचन शीशपर धरहीं ॥
सेवा करें रहैं लौलीना । पुरुषलोकते होहि न भीना ॥
सेवा करें समाधि लगावैं । पुरुष लोक तजि अनतन जावैं ॥
कहैं कबीर सुनो धर्म दासा । यहि विधि सोलह सुत परगासा ॥
समय-सोरह सुतकी एक मति, एकत एक अधीन ।
कर जोरें सेवा करें, प्रेम प्रगति लौलीन ॥


१ पाठभेद=तेरहें स्वासा अछय सुधारा । ताते सुत विवेक औतारा ॥

२ भाव यह है कि-सोलहों मिलकर जोग संतायन हुए । कहीं कहीं “सतरहें स्वासा अदल सुवानी । उपजे योग संतायन ज्ञानी ॥” लिखा है-किन्तु जब पूर्वापर सब जगह “सोलह सुत” बराबर लिखते जाते हैं तब सत्रवाँ लिखना असंगत है । इसके अतिरिक्त जब स्पष्ट लिखा है “षोडस स्वासा षोडश बानी । उपजे जोगसंतायन ज्ञानी” तब तो सत्रहवें सुतकी कल्पनाकी जड़ मिटकर स्पष्ट सिद्ध होता है कि, सोलहोंके समूहका नाम है “योगसंतायन” और है भी ऐसाही-योगसंतायनमें सबकेही लक्षण पाये जाते हैं । स्पष्टीकरण कबीर धर्मदर्शनमें होगा ।

३ किसी किसी प्रतिमें “वचन” के बदले “चरन” लिखा है, यद्यपि उससेभी आज्ञाकारिता का भाव निकलता है किन्तु “वचन” से विशेष गूढार्थ प्रकट होता है ॥ - श्री युगलानन्द विहारी ॥

विष्णुका पंथ प्रथम श्री सम्प्रदायके धाम क्षेत्रका वृत्तान्त ब्रह्म संप्रदायके धामक्षेत्रका वृत्तान्त

चौपाई ।

सेवा करत बहुत दिन गयऊ । पुरुष अवाज अधर धुनि भयऊ ॥
अधर अवाज भई जब बानी । निकसी अगर बासकी खानी ॥
सबतर लोक दीप रहि छाई । बिमल बास भरपूर समाई ॥
अगर बास सब हंसन पाई । निर्मल बास सदा सुखदाई ॥
पीय अमृत सबै अधाने । अपने अपने लोक सिधाने ॥
और पुत्र सब अच्छप छिपाये । धरम धीर सबते बरियाये ॥
धरमराय सेवा अधिकाने । सो सब तोहि कहौं सहिदाने ॥
छलके बचन पुरुष सो लीन्हा । पाछे दुदैं लोक महैं कीन्हा ॥

समय—और सबै सुत बैठे, अपने अपने थान ।

धरम रोष सबते कियो, ठाँम ठाँम विगरान ॥

धर्मदास बचन—चौपाई ।

धर्मदास बिनवै कर जोरी । साहब संसय मेटहु मोरी ॥
और सब सुत अच्छप छिपाने । धरमराय कस भये बिगाने ॥
कैसे और सबे सुत भारी । धरमराय कस भये विकारी ॥

सतगुरु बचन ।

धर्मदास सुनहुँ चितलाई । कहौं सँदेश आदि समझाई ॥
जब प्रगटे प्रभु अम्मर तारा । निकसी अधर निअच्छर धारा ॥
भई अवाज अधरसे बानी । निकसी अगर वासकी खानी ॥
पारस परिमल महक बसाई । सोई परिमल सुरति दुराई ॥
अगर छिपाय आप महैं राषा । सुरति सनेह मुख प्रगटी भाषा ॥
प्रथम पुरुष मुख भाषा आई । भाषा अग्र पारस निरमाई ॥
भाषा बचन भया अधिकांश । भाषहिंते सकलो विस्तारा ॥
भाषा बचन पुरुष उच्चार । भाषा ते सकलो व्यवहारा ॥
भाषा बोल पुरुष उच्चार । सेवहु सत्यलोक के द्वारा ॥
स्वैसा सार तार जुरियाना । अधर अमान ध्वजा फहराना ॥
भाषा स्वर बानी अनुमाना । बचन समान शब्द बन्धाना ॥
निमिष माहिं अनेक संचारा । बचन समान सबै जग सारा ॥
नाम सनेह शब्द मँझारा । बचन समान स्वास गुञ्जारा ॥
स्वासा नेह देह भइ जबही । भाषा सहज बचन भा तबही ॥