कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
चाहिये । ज्ञानीजी बोले कि, हे राजा ! तुम सब कुछ छोड़दो । काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहङ्कार, सर्व संसार और माया, कालका पसारा है । इस हेतु संगांरको छोड़कर शब्दको ग्रहण करो । जिससे फिर जन्म मरण न होगा । स्वर्ग नरकको न भरमोगे, अजर अमर घर पाओगे, जो कोई शब्द न मानेगा उसको काल खा जावेगा । मोहकी नदी भारी है । इससे पार जाना कठिन है । पार उतारनेके निमित्त केवल सत्यगुरु भल्लाह है, उसीके साथ पार उतरना हैं । तब राजा बोला, हे सत्यगुरु ! आपके चरणकमलमें मन कैसे टिकाऊँ ? कैसे राज्यका मद उतरे ? कैसे पाखण्डको छोड़ूँ ? बड़प्पन और चतुराई कैसे दूर हो ? हँसी मसखरी नाना प्रकारके छूत, भोग विलास तथा मिथ्या भाषण, जाति, पांति कुल, परिवार, सुवर्ण-मन्दिर, सुख विहार किस प्रकार छोड़ दूँ ? सत्यगुरुने कहा कि, यह सब छोड़कर पुरुषके निकट चलो । राजा बोला कि, अपने शरणमें रखो मेरे माथे पर हाथ धरो, मुझे पापीको बचालो । मैंने सब छोड़ा, सर्व रोनियोंको पचास बेटोंको बीस सहस्र हाथी आदि सर्व सामग्रीको छोड़कर आपके साथ रहूँगा । मुझको तो भक्ति प्यारी लगी है । आपके अमृतवचन सुनकर मेरे सब दोष दूर हो गए । अब कृपा करके अमृतरूप नाम मुझको दीजिये, आपकी भक्ति बड़े भाग्यसे मिलती है, बारम्बार आपसे यह निवेदन है कि, आप मुझको पुरुषका दर्शन कराओ । ज्ञानीजी बोले, हे राजा ! हम तुमको सत्य नाम देंगे । तुमने मुझे पहचाना, इस कारण सत्यपुरुषके नामसे तुम एक यज्ञ करो । (जिस नामसे हंस बचते हैं) । जरीका चंदवा तानो, सुवर्णका सिंह्रासन बनवाओ, सुवर्णमय दीवारगीर तथा मोतियोंकी झालर बनाओ । गजमुक्तासे थाल भरकर धरो, सोनेका कलश धर उसपर पंचमुखी दीपक जलाओ । सरांश यह, सद्गुरुकी आज्ञानुसार राजाने दीक्षा लेनेका समस्त नियम किया । तब सत्यगुरुने राजा रानी इत्यादिको अपने शरणमें लिया, उन सबोंने सत्यगुरुको दण्डवत् करके उनकी स्तुति की । राजाने कहा कि, हे सत्यगुरु ! यहाँ का राजा कालपुरुष है, मैं अब यहाँ नहीं रहना चाहता, अब मेरा यहाँ कुछ काम नहीं है । मुझको अपने लोकमें ले लो, सत्यपुरुषका दर्शन कराओ । राजाकी नौ सौ रानियाँ तथा पचास बेटे सत्यगुरुके सामने हाथ बाँधकर खड़े विनती कर रहे थे । राजाकी एक पुत्री थी, वह भी सत्यगुरुके शरणमें आई सब सत्यगुरुके चरणोंपर गिरकर कहनेलगे कि, हम कदापि आपका शरण न छोड़ेंगे । सत्यगुरुने सब जीवोंको सत्य पुरुषका दर्शन कराया । जितने जीवोंने पान पाया सब सत्य पुरुषके दरबारको चल दिये ।
राहमें जब चले जाते थे, कालके दूतने एक ऐसा कौतुक दिखाया कि, सुकृतजीके साथ जितने हंस थे उतनेही रूप धरकर यमके दूत आये । वैसेही छापा तिलक आदि सब कुछ बनाकर कहने लगे कि, हे हंसगणो ! हमारे साथ चलो । तब हंसोंने उत्तर दिया कि, हम तुमको भली प्रकार पहचानते हैं कि, तुम ठग बटमार हो हम तुम्हारी बातें नहीं सुनते। हम तो जिनके हंस हैं उन्हीं साहबके पास जावेंगे । हम तुम्हारी दगाबाजी भली प्रकार जानते हैं । तुम्हारे धोखेमें कदापि न आवेंगे । सत्यगुरुने समस्त हंसोंको लेकर सुकृतसागर पर पहुँच कहा कि, सब हंस अब इसमें स्नान करो, तब सभीोंने वहां स्नान किया । जिससे उनको सब द्वीपोंका ज्ञान होगया । लोकमें पहुँचकर सुकृतजीके चरणोंमें गिरकर नमस्कार किया, पश्चात् हंसोंका दर्शन किया, सुकृतजीने कहा कि, हे राजा ! अब तुम अपने राज स्थान को पलट चलो । राजाने कहा कि, हे सत्यगुरु ! अब हम यहाँ ही रहेंगे, पृथ्वी पर न जावेंगे, यहाँ चार दिन बीत जानेपर चौपदार राजमहलमें गये तो वहां क्या देखते हैं कि, महल शून्य पड़े हैं न राजा है न कोई रानी है, न राजाके पचास पुत्र हैं न राजाकी पुत्री है, समस्त महल शून्य देखकर रोता हुवा बाहर आया, लोगोंको समाचार दिया । राजाके आत्मसंबंधी, मंत्री तथा अन्यान्य कर्मचारी गण आये । देखा तो राजमहल शून्य पड़ा है । कहीं कोई नहीं यह देख कर सब रोने लगे कि, राजाको उनके संबंधियों सहित किसने मार गया, कहाँ गए, कौनसी आपत्ति उन पर आई ? चौबदारने मंत्रीसे कहने लगा कि, एक जिन्दा फकीर आया था । उसने राजाको ऐसा कौतुक दिखलाया । हमने कहा था कि, यह जिन्दा सत्यानाश करनेको आया है । सो राजाने, उस जिन्दा फकीर पर विश्वास करके अपना सर्वस्व अपहरण करवाया, उसीका विष बोया हुआ है । धर्म-दासजीसे कबीर, साहब कहते हैं कि, हे धर्मदास ! जैसा यह राजा सत्यवादी हुआ तन मन धन सब सत्यगुरुको अर्पन किया, वैसेही को नाम बताओ दूसरोंसे उपेक्षा करो, क्योंकि सच्चेही जीव सत्यलोकको जावेंगे । झूठोंके लिये सत्यलोक नहीं है ।
राजा अमरसिंह ।
कबीर सागर नं. ४ में बोधसागर है । उसमें एक प्रकरण अमरसिंहबोध भी है । उसमें जो लिखा है उसीका सार लिखते हैं । ज्ञानीजीसे सत्य पुरुषने कहा कि, बहुत दिन बीते । कोई भी जीव सत्यलोकको नहीं आया । कालपुरुषने सब जीवोंको रोक रक्खा है, विहंगम मार्ग बतलाकर सब मनुष्योंकी मुक्ति कराओ । जब पुरुषने ज्ञानीजीको आज्ञा दी थी उस युगका नाम कसोद था । ज्ञानीजी सत्य-
पुरुषको नमस्कार करके पृथ्वी पर आ सिंहलक्ष्मीपमें उतरे । वहाँके राजाका नाम अमरसिंह था, अमरावतीमें रहता था । उसकी रानीका नाम स्वरकला था । वहाँ पर ज्ञानीजी गये उसको यह कौतुक दिखाया कि, राजाने ज्ञानीजीको सोलह सूर्यके समान ज्योतिमान तथा प्रकाशित देखा । ऐसी सुगंधि उठने लगी कि, मस्तिष्क भर गया । राजा अमरसिंहने उस स्वरूपका दर्शन किया, परन्तु दर्शन देकर ज्ञानीजी अन्तर्धान होगये । राजा उन्हें दूढ़ने लगा, खोज करता करता थक गया, कहीं पत्ता नहीं लगा । राजा ढाढ़े मार मार कर रोने लगा । जैसे जल बिना मीनकी गति होती है वही अवस्था राजाकी हुई । सात दिन रात इसी अवस्थामें बीते राजाने माया मोह तथा राज्यभिमान सभी छोड़ दिया, केवल सत्यगुरुके चरणोंके ध्यानमें लगा रहा । ज्ञानीजी दयालु हुए, पुनः राजाको दर्शन दिया, राजाके सिरपर हाथ रक्खा, जब राजाके मनमें सन्तोष आया तब राजाने कहा कि, आपका दर्शन पाकर मैं सुखी हुआ । जैसे चन्द्रको देखकर चकोर हर्षित होता है; जैसे कि, स्वातीके जलसे पपीहा हर्षित होता है । इतना कहकर सत्यगुरुके चरणोंपर शिर धर दिया । कहने लगा कि, अब मेरा दुःख दूर हुआ । फिर पूछा कि, आप कहाँसे आये हो ? कहाँ रहते हो ? आपका क्या नाम है ? किस लोकमें स्थान है ! मुझसे सत्य कहो, हंसका उबार करी ज्ञानीजीने कहा कि, हम मृत्यु लोकसे आए हैं, वह अमर ठिकाना है वहाँ सत्य पुरुष रहता है हंसभी रहते हैं, हम उस पुरुषकी आज्ञा लेकर आये हैं, जो कोई हमको पहचाने उसको लोकमें भेज देंगे । इतना सुनकर राजा हाथ जोड़कर बोला कि, हमारी मुक्ति करो, हमारे बड़े भाग्य हैं जो पुरुष रूप आपने मुझको दर्शन दिये, अब हमें आप अपने कालसे बचा लीजिए जिससे हम पुरुषका दर्शन कर सकें । ज्ञानीजी बोले कि, हे राजा ! शुद्ध बुद्धि करके परवाना लेकर सत्य पुरुषका निःतत्व ध्यान करो । सत्यगुरुकी दयासे फिर तुमको काल न छेड़ेगा । राजाने रानीसे कहा कि, अब तुम सत्यगुरुके चरण पकड़ो । क्योंकि चार वेद जिसको नित्य गाते हैं इस सत्यगुरुका भेद वे भी नहीं जानते हैं । सत्य सत्यगुरु अखण्ड पुरीमें रहते हैं । उनकी गम्य काल नहीं पाता । हे रानी ! चित्त लगायके दर्शन करो तो तुम्हारे अनेक जन्मोंके पाप कटें, ऐसे सन्त कभी नहीं आये । हमारे बड़े भाग्य हैं कि, सत्यगुरु हमारे घर पधारें । रानीने कहा कि, हे महाराज ! समझ बूझकर गुरु करो, जिसमें फिर पीछे पछ्ताना न पड़े । तब राजा ने कहा कि, हे रानी ! ऐसे सत्यगुरु कहाँ हैं ? हम तन मन धन सब सत्यगुरुको अर्पण करेंगे । हे रानी ! समस्त लज्जाओंको छोड़कर सत्यगुरुके चरण जल्दी पकड़ो. नहीं तो कुत्ते बिल्लीका जन्म होगा । तब रानी अपनी दासियोंसहित
बाहर आई, जिससे उसके आभूषण तथा वस्त्रोंकी बड़ी ज्योति फैली । अर्थात् ऐसे ऐसे मणि तथा जवाहरात रानीके मस्तक पर तथा शरीरमें आभूषण थे कि, जिनकी ज्योतिसे मानों सूर्योदय हो आया । तब समस्त दरबारी देखकर आश्चर्यान्वित होकर उठ खड़े हुये । तब रानीने अपनी समस्त दासियोंसहित आकर सत्यगुरुको दण्डवत् प्रणाम किया, हाथबाँधकर सत्यगुरुके सामने खड़ी होकर कहने लगी कि, हम आपके आधीन हैं । राजानेभी बारम्बार दण्डवत् करके सत्यगुरुके चरण पकड़ लिये । जैसे कि, चन्द्र चकोरको देखता है वैसेही राजा सत्यगुरुकी ओर देखने लगा, समस्त दरबारी जो खड़े थे सत्यगुरुकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे कि, आपने बड़ी दया की जो दर्शन दिया । हे दीनदयाल ! आपका चरणरज ऐसा पवित्र है कि, इससे मोहतिमिरका नाश हो जाता है, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य उत्पन्न होकर मोक्ष फल मिलता है । हे साहब ! हम सब आपके गुलाम हैं । हमारे ऊपर ऐसी दया करो कि आपके चरणोंमें प्रीति रहे समस्त आशाएँ छूट जावें । आप ब्रह्मस्वरूप अचिन्त, आदि, अदली, अविगत, अजर, अजीत, अमर अकह और अविचल हो । अक्षय, अखिल, आदि ब्रह्म उद्धारण, अखिलपति अविनाशी पापोंको दूर करनेवाले हो । हंसराज हंसपति और हंस उबारनहार हो आप सर्व सुखके धाम हो । इस प्रकार बहुतेरी प्रशंसा तथा स्तुति करके सत्यगुरु को महलमें लेजाकर सिंहासन पर बैठाया । रानीने चरण धोये (राजाकी आँख से प्रेम के आँसू बह रहे थे ।) रानीने अपने अञ्चलसे चरण पोंछा, सबोंने चरणा-मृत लिया । ज्ञानीजीने सबके शिरपर हाथ रक्खा । राजाको बड़ा ज्ञान प्रगट हुआ. राजा बोला कि, हे साहब ! आपने अपना लिया, अब परवाना दीजिये । जो कुछ आप कहेंगे सो हम करेंगे । ज्ञानीजी बोले कि, हे राजा ! अब तुम सर्व सामग्री मँगवाओ । आज्ञा पातेही यथानियम सब मँगाया, हर्ष और उत्साहके साथ राजा रानी तथा अन्यान्य लोगोंने सत्यगुरुकी दीक्षा ली, सबोंने सत्यगुरुका दण्डवत् प्रणाम किया । सत्यगुरुकी कृपासे सबके शोक सन्ताप छूट गये, कालका जाल दूर होगया तथा उसी समय राजाके बेटे नातियोंसहित अनेकों जीव सत्यगुरु के शरण आये । राजा और रानी सहित सब हाथ जोड़कर खड़े होगये । उस समय राजा कहने लगा कि, हे सत्यगुरु ! आपने मुझपर दया करके वह शब्द बतलाया है जो कि, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवादिको भी दुर्लभ है । मुझे भक्तिदान दिया, अब मुझको अपने लोक लेचलो । सत्यगुरुने कहा कि, हे राजा (अमरसिंह) अभी सवा सौ वर्षका वयस तुम्हारा शेष है, सो तुम सवासौ वर्ष अभी पृथ्वीपर रहो । इसके पीछे मेरे लोकको चलना । राजा बहुत बिनती करने लगा कि, बन्दीछोर ! अब
वेदमें कबीर
मुझसे यहाँ एक पलभी रहा नहीं जाता, मुझको अपने लोकमें लेचलो । हे सत्य गुरु ! अब आप मेरे पापों पर ध्यान मत दो. हंसोंका टबार करो । इक्कीस लाख जीव आपकी शरणमें हैं, तब ज्ञानीजी बोलें कि, एक नाम है जिसे मैं पुकारके कहता हूँ । हे राजा ! सब हंसोंको साथ लेआओ सुनो, राजा सब हंसोंको ले आया । कबीर साहबने उस नामको पुकार कर सुनाया । उस नामको सुनतेही सबकी देह छूटकर मुक्ति हो गई । उसी समय सब हंसोंने भवसागर छोड़ दिया इक्कीस लाख हंस राजाके साथ लगे, सबके सब सत्यपुरुषके दरबारमें पहुँच आनन्दसे रहने लगे । इस राजाने बड़ी सच्ची भक्ति की, इतने लाख जीव अपने साथ लेकर सत्यलोक को सिधारा, जहाँ जन्म मरणके सब संशय छूट गये, उस देशमें समस्त जीव एक समान हैं, सर्वदाके लिये परमानन्दको प्राप्त हैं वही सत्यपुरुषका देश है । उसके हंस यहाँ ही वसते हैं ।।
सत्ययुग त्रेता और द्वापरके हंस ।
अब हम सत्ययुग और त्रेता द्वापरके हंसोंके विषयमें कुछ कहते हैं । कबीर सागरके दूसरे भाग अनुरागसागरमें यह प्रकरण विस्तारके साथ लिखा है । सत्य-युगमें राजा धोकल और खेमसरी ग्वालिन हुई है, इसमें कबीर साहिब सत्सुकृत कहलाये । त्रेतामें विचित्र भार मन्दोदरी बिचित्र बधू और मधुकर हुए हैं, इसमें कबीर साहिब मुनीन्द्र कहलाते हैं । द्वापरमें रानी इन्द्रमती और सुपच सुदर्शन हुए हैं इसमें कबीर साहिब करुणामय कहाते हैं ।
चारों युगोंमें कबीर साहब एकही प्रकारका उपदेश करते हैं । सहस्रों लोग उपदेश सुनते हुए उसका मान भी कर लेते हैं पर वे सब कबीर साहबके शिष्य इस कारण नहीं कहलाते कि, उनमें अब तक दोष है । अबतक उनको सत्यगुरुका पूरा चिह्न नहीं मिला । हंस कबीरका पूरा पद नहीं प्राप्त हुआ । इस कारण उन लोगोंको आवागमनका । संबंध नहीं छूटा. क्योंकि, जब तक जिन लोगोंके सत्यगुरु का पूरा रंग नहीं चढ़ा तबतक वे सत्यगुरुके हंस नहीं बन सकते । उनकी बुद्धिपर आवरण पड़ा हुआ है । जो लोग सत्यगुरुकी पूर्णरूपसे अनधीनता स्वीकार करते हैं, वही उसके हंस हैं ।
श्वपच सुदर्शन ।
जब द्वापरमें कबीर साहब पृथ्वीपर आये काशी नगरीमें प्रगट हुये, उस नगरके वासियोंको सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश कर रहे थे । उस समय सुदर्शन नाम एक मनुष्य जातिका भङ्गी आकर सत्यगुरुके चरणोंपर गिरकर निवेदन
सुकृत, अग्रनाम उग्रनाम, कबीर शब्दके अर्थ
करने लगा कि, हे सत्यगुरु ! मुझे अपनी भक्तिमें लगाओ । सत्यगुरु उसपर दयालु हुये उसको नाम दिया । जबसे उसने सत्यगुरुका उपदेश पाया तबसे तन मन धनसे भक्ति, साधुसेवा और भजन करने लगा । उसका समस्त विवरण कबीर साहबके ग्रन्थ यज्ञसमाजमें लिखा है । दूसरे स्थानोंमें भी कहीं कहीं लिखा है । जिस समय कबीर साहबने श्वपत्त सुदर्शनका उपदेश दिया, उस समय कौरव तथा पाण्डवोंके बीच बड़ा वैर उपस्थित था । दोनों समरके निमित्त रणभूमिमें एकत्रित हुये थे । दोनों ओरसे सैन्यकी चढ़ाई हुई । बड़ा महाभारत हुआ । इसमें कौरव ससैन्य मारे गये । पाण्डव कृष्णकी सहायतासे विजयी हुये । विजय प्राप्त करनेके पीछे राजा युधिष्ठिर राज्यासन पर बैठे, राजाने एक दिवस एक बड़ाही भयानक स्वप्न देखा । जैसा कि, कबीर साहबके ग्रन्थ उग्रगीतामें लिखा है, इस भयानक स्वप्न को राजाने इस प्रकार देखा कि, समस्त कौरव जो मेरे भाई थे उनका बिना शिरका धड़ रणभूमिमें दौड़ रहा है, वे सब मुझसे अपना बदलालेनेके निमित्त तैयार हैं । राजा युधिष्ठिरने ऐसा भयानक स्वप्न देखा कि उनको बड़ा भय उत्पन्न हुआ, बड़ेही शोकित हुये कि, अब हमको भाई मारनेके महापापसे नरकमें जाना पड़ेगा । इस भयसे कातर होकर युधिष्ठिर श्रीकृष्णके पास जाकर कहने लगे कि, हे महा-राज ! मैंने ऐसा भयानक स्वप्न देखा है जिससे कि, मेरा हृदय स्थिर नहीं है । बड़ा भय उत्पन्न हो रहा है । कृष्ण बोले, हे युधिष्ठिर ! भीमादिको ! सुनो, तुमने अपने भाइयोंकी हत्या की है, जिसका महापाप तुम लोगोंको हुआ है । इतना सुन कर युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन बोले कि, हे महाराज ! हम तो महाभारत करनेपर उद्यत नहीं थे । आपनेही गीताका ज्ञान सुनाकर हमें युद्धके निमित्त प्रस्तुत कराके हमारे भाइयोंको हमसे मरवाडाला, इसमें हमारा क्या दोष है ? हम तो आपके आज्ञाकारी थे । श्रीकृष्णने कहा कि वह समय वैसाही था । युधिष्ठिरने कहा कि, हे महाराज ! अब हम क्या करें ? जिससे हमारे पाप छूटे । तब श्रीकृष्ण ने कहा कि, पहले सर्व तीर्थोंका जल मँगवाओ उससे स्नान करो । तब राजाने समस्त तीर्थोंका जल मँगवाकर उससे स्नान किया । श्रीकृष्णने कहा कि, अब तुम हाथी-दान, घोड़ादान, गऊदान, कन्यादान, सुवर्णदान, चाँदीदान, पृथ्वीदान, अन्नदान इत्यादि धर्म करो । तब राजा युधिष्ठिरने समस्त कार्य दान पुण्य इत्यादि वेदकी आज्ञानुसार तथा श्रीकृष्णजीके आदेशानुसार किया । श्रीकृष्णजीने कहा कि, यज्ञ करो, देश देशान्तरोंमें पत्र भेजकर साधुओंको बुलवाकर भोजन कराओ । राजा युधिष्ठिरने ऐसाही किया । सर्वदेशोंसे साधुओंको बुलवाया । समस्त देशों के साधु एकत्रित हुये । श्रीकृष्णजीने एक घण्टा बौधकर लटका दिया कहा कि,
यह घण्ट जब सात बार आपसे आप बजे तब तुम जानो कि, यज्ञ पूर्ण होगई । राजाने श्रीकृष्णकी आज्ञानुसार सब प्रकारके दान पुण्य करके यज्ञ आरम्भ किया । इस यज्ञमें पच्चीस करोड़ ब्राह्मण आचारी एकत्रित हुये, सात करोड़ अस्सी सहस्र ऋषि, मुनि, सिद्ध साधु (षट् दर्शनके) उपस्थित हुये । पाण्डवोंने बड़े प्रेम तथा भक्ति सहित भोजन करवाया । सब प्रकारके दान पुण्य किये पर एक बारभी घण्ट न बजा । इससे पाण्डवोंके चित्तमें बड़ा सन्देह उत्पन्न हुआ । राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित कृष्णजीके पास जाकर पूछने लगे कि, हे महाराज ! हम लोगोंने तो आपकी आज्ञानुसार सब प्रकारके दान पुण्य किये, बत्तीस करोड़ अस्सी सहस्र साधु ब्राह्मण भोजन कर चुके, सबके ऊपर महाराजा आपने स्वयम् भोजन किया, अब इससे बढ़कर क्या रहा ? पर फिरभी आकाशी घण्ट एक बार भी नहीं बजा । इतनी बात सुनकर भगवान् बोले कि, हमारा सर्व परिश्रम व्यर्थ हुआ, धनका सर्व व्यय निष्फल हुआ, क्या उपाय करे कि, घण्ट बजे ? भगवानने, कहा कि, हे युधिष्ठिर ! तुम ध्यानसे सुनो । जब साधुओंको भोजन करा रहे थे, तब मैं अपनी ज्ञानचक्षुद्वारा उन सबोंको भली भाँति देख रहा था उनमें कोई साधु नहीं दिखाई दिया । उनमें साधु तो जहाँ कोई भी मनुष्य नहीं रहा था, सबके सब ढोंगर ढोर, कीड़े, मकोड़े, पशु, पक्षी इत्यादि बैठे भोजन कर रहे थे । हे युधिष्ठिर ! तुम्हारे यज्ञमें कोई भी साधु नहीं था । कोई सत्यगुरुका अंश तुम्हारे यज्ञमें भोजन करनेके निमित्त नहीं आया था । जबतक सत्यगुरुका अंश न आवे तुम्हारे यज्ञमें भोजन न करे तबतक आकाशी घण्ट नहीं बजेगा, तुम्हारी यज्ञ पूरी नहीं होगी । युधिष्ठिरने कहा कि, हे महाराज ! मैंने देश देशान्तरोंमें पत्र भेजकर, दुँदुवाकर बड़े बड़े सिद्ध साधु बुलवाये । बड़े बड़े तपस्वी आचारीगण आये, इनमें सत्यगुरुका अंश कोई नहीं था क्या ? हे महाराज ! ये सब तपस्वी लोग किसके अंश हैं ? वे सत्यगुरुके अंश किस देशमें रहते हैं ? कौन शास्त्र पढ़ते हैं ? किसकी भक्ति करते हैं ? यहाँ पर कबीर साहब कहते हैं कि, यह सब जो भेष बाना बनाकर रहते हैं, उनमें सहस्रों प्रकारके लोग हैं, उनमें जो मांस मछली इत्यादि खाते, मदिरा पीते, परस्त्रीगमन करते हैं, वे सब चाण्डाल हैं । वे नरकको जावेंगे । भगवा वस्त्र पहनकर स्त्रीगमन करते हैं उनकी ऐसी दशा होवेगी कि—“भगवा बसता बिन्द प्रकासा । सत्तर जन्म श्वान घर वासा ॥” जितने भी षट्दर्शन भेषके लोग एवं सर्व ब्राह्मण आदि हैं उनमें मनुष्यका लेश भी नहीं है । जो सत्यगुरुका अंश है वही मनुष्य है । श्री-कृष्णजी युधिष्ठिरसे कहते हैं कि, हे युधिष्ठिर ! तुम सत्यगुरुका अंश जो श्वपच
सुदर्शन है, काशी नगरीमें रहता है उसको ले आओ, जब वह आकर तुम्हारे गृहमें भोजन करेगा, उस समय तुम्हारी यज्ञ पूरी होगी सात बार आकाशी घण्ट बजेगा । बिना सुदर्शनके भोजन किये आसमानी घण्ट कदापि न बजेगा न यज्ञही पूरी होगी । तब युधिष्ठिरने कहा कि, हे महाराज ! भङ्गीको ऐसी बड़ाई कैसे मिली ? ऐसे बड़े बड़े महात्मा एकत्रित हुये, इनमें कोई इस योग्य नहीं ? यह क्या बात है ? श्रीकृष्णने कहा कि, हे युधिष्ठिर ! मेरा कहना मान ले श्वपच सुदर्शनको यहाँ लेआओ । पीछे भीमसेनको श्वपच सुदर्शनके बुलानेके लिये भेज दिया ।
भीमसेन सुदर्शनजीको बुलाने चले । काशी नगरीमें जा पहुँचे । दृढ़ते दृढ़ते श्वपच सुदर्शनका मकान पाया । जाकर सुदर्शन जीसे ! कृष्ण तथा युधिष्ठिरका समाचार पहुँचाया । भीमने कहा कि, हे सुदर्शनजी ! आपको कृष्ण तथा युधिष्ठिरने बुलाया है । आप मेरे साथ चलिये । हमारे यज्ञमें भोजन कीजिये, आपके भोजन करनेसे यदि घण्ट बज जायगा तो हमारी यज्ञ पूर्ण हो जायगी । राजा युधिष्ठिर आपपर बड़े प्रसन्न होंगे, एवं बड़ा अनुग्रह करेंगे । ऐसा सुनकर सुदर्शनजीने उत्तर दिया कि, हे भीमसेन ! तुम राजाके पासजाकर कहो कि, हम राजाके घरका भोजन न करेंगे ।
चौ०—भीम कहो राजासे जाई । राजा घर भोजन नहीं पाई ।
राजा वेश्या^१^ जात शिका^२^री । महा अक^३^र्मी विषय विक^४^ारी ॥
सतसठ दूत^५^ कर्म इन सङ्ग^६^। भोजन करत सत्य हो भङ्गा^७^ ।
राजा वेश्या छु^८^चे न कोई । इनके छुए^९^ पाप बड़ होई ॥
राजाद्वार^१०^ भोजन जो पावे । अरु वेश्या^११^ही छुये नरक महाँ जावे ॥
राजा धीमर वेश्यापा^१२^सी । इनके छुये यमपुर जासी^१३^ ॥
साखी—चार^१४^ जातिके दर्शन, दूरते कीजे जान^१५^ ।
इनके घर भोजन किये, पडे नरककी खान^१६^ ॥
इतनी बातके सुनतेही भीमसेन तो जल गये । मनमें सोचने लगे कि, यह नीच मुझको ऐसी बात कहता है । यदि मैं इसको एक गदा मारूँ तो यह पातालको चला जावे । जब भीमसेनने अपने मनमें यह विचार किया, तब श्वपच सुदर्शनजी महाराजने भीमसेनके अन्तःकरणकी बातोंको जानकर
१ करेंगे । २ रंठी । ३ जीर्वाहसक । ४ बुरे कर्म करनेवाले । ५ विषयी । ६ चुगलखोर । ७ सात । ८ नष्ट । ९ स्पर्श । १० स्पर्श किये । ११ राजेके घर । १२ वेश्याके । १३ एक, प्रकारके जीवहत्यारे । १४ जायेगा । १५ राजा, १४ धीमर, वेश्या और पाशी । १६ मत । १७ कुण्ड ।
कहा कि, हे राजाजी ! मैं अपने मकानके भीतरसे हो आता हूँ, तब आपके साथ चलूंगा, तबतक आप मेरी सुमिरिनी लेकर चले। शीघ्रही मैं आकर आपके साथ हो लूंगा। यह कहकर सुदर्शनजी तो भीतर चले गये। भीमसेन उनकी सुमिरिनी उठाने लगे तो न उठी। बड़ा बल लगाया पर उस जगह न छोड़ी; लज्जित होकर भीमसेन उसी जगह खड़े रहे। इतनेमें सुदर्शनजी भीतरसे बाहर आये। देखा कि, भीमजी लज्जित खड़े हैं। तब कहा कि, हे राजाजी ! मैंने आपसे कहा था कि, मेरी सुमिरिनी लेकर आप चलो पर आप खड़े रह गये, क्या कारण है। भीमसेनने उत्तर दिया कि, मुझसे सुमिरिनी नहीं उठी,। सुदर्शनजीने कहा कि, जब मेरी सुमिरिनी आपसे न उठी तो मैं आपके गदा मारनेसे पातालको क्यों कर चला जाता ? आप अब यहाँसे चले जाओ, मैं आपके घर भोजन करने न जाऊँगा। क्योंकि, तुमने भाइयों तथा संबंधियोंको मारकर गिरा दिया, यह महापाप किया है। यह बात सुनकर भीमसेन नितान्तही क्रुद्ध हुए। झुंझलाकर राजा युधिष्ठिरके पास लौट आये। श्वपच सुदर्शनका सर्व हाल कहकर भीमने कहा कि, वह तो बड़ा घमण्डी है। कड़ीबातें कहता हुआ कहता है कि, मैं राजा तथा कञ्जरीके मकानपर भोजन नहीं करता, उसकी सूरत देखनेको मेरा मन नहीं चाहता। हे महाराज ! मैंने आपका तथा श्रीकृष्ण भगवान्का भय किया नहीं तो बिना मारे न रहता। जो कड़ी बातें उसने कही वे मेरे सहन करने योग्य नहीं थीं। इतना सुन महाराज युधिष्ठिर भीम आदिको साथ ले श्रीकृष्णके समीप गये। जाकर कहा कि, हे महाराज ! आपने व्यर्थही ऐसे शूद्रके समीप भेजा। भला इतने सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि, एकत्रित हुए, उनमें सुदर्शन भङ्गीहीको आपने श्रेष्ठ क्यों ठहराया ? उसमें कौनसी बड़ाई है ? वह कैसे सबसे अच्छा है ? श्रीकृष्णचन्द्र बोले कि, हे युधिष्ठिर ! तुम श्वपच सुदर्शनकी श्रेष्ठता तथा बड़ाईसे अनभिज्ञ हो; पर मैं भली भाँति जानता हूँ; बिना श्वपच सुदर्शनके भोजन करवाये तुम्हारी यज्ञ पूरी न होगी, न घंटाही बजेगा। भीमसेन बोले कि, हे कृष्णजी ! मैं इस बातका विश्वास न करूँगा, जबतक कि, आँखोंसे न देख लूँ। सात करोड़ अस्सी सहस्र ऋषि मुनियोंमें श्वपच सुदर्शन कैसे श्रेष्ठ ठहरा ? यह बात सुनकर कृष्णजी कहने लगे, हे भीम ! मैं तुम लोगोंको अवश्यही श्वपच सुदर्शनकी श्रेष्ठता दिखाऊँगा। जब तुम स्वच्छस्नुसे देखलेना तब विश्वास करना। हे युधिष्ठिर ! तुम स्वयम् सुदर्शनजीके बुलानेके निमित्त जाओ। अत्यन्त नम्रता पूर्वक मिलना। बड़ी मर्यादा तथा बड़े सम्मानपूर्वक श्रीमान् महाराज सुदर्शनजीको बुलालाना। सुदर्शनजी महा-
राज पधारनेसे तुम्हारी यज्ञ पूरी होगी । तुम अपनी दृष्टिसे सुदर्शनजीकी श्रेष्ठता देखोगे तो जानोगे कि, करोड़ों साधुओंमें तथा उनमें क्या विभिन्नता है ? क्या गुण तथा महत्त्व है ? श्रीकृष्णजीकी आज्ञानुसार राजा युधिष्ठिर स्वयम् सुदर्शनजीको बुलाने चले, बनारसमें पहुँच उससे भेंट करके निवेदन किया कि, हे भक्तजी ! आप दया करके मेरे साथ चलो, बिना आपके मेरी यज्ञ पूरी नहीं होती । आप कृष्णचन्द्रके बड़े भक्त हो । महाराज कृष्णचन्द्र आपके हृदयमें विराजमान हैं । भगवान्का मन आपहीसे प्रसन्न है । युधिष्ठिरकी ऐसी नम्रता तथा गिड़गिड़ाहटको देखकर श्वपच सुदर्शनजी दयालु होकर कहने लगे कि, हे युधिष्ठिर ! तुम्हारी नम्रतासे मैं नितान्तही आह्लादित हूँ, तुम्हारे साथ मैं चलूंगा । कारण यह कि, तुम प्रेमी भक्त हो । हे युधिष्ठिर ! तुम निश्चय जानो कि हम कृष्णके भक्त हैं हमारा सत्यगुरु सत्यलोकवासी है । हम उसके अंश हैं — कृष्ण उसीके अवतार हैं । हे युधिष्ठिर ! तुम कृष्णका विश्वास सदा करना क्योंकि, वो भक्तवत्सल है । स्वयम् कृष्ण ने तो तुम्हारे यज्ञमें भोजन किया फिर घंटा क्यों न बजा ? यदि मैं कृष्णका न भक्त होता तो वो मुझको बुलानेकी क्या आवश्यकता समझते, जब स्वयम् श्रीकृष्णके भोजनसे घण्टा नहीं बजा पर कृष्णके भक्तोंके भोजनसे घण्टा बज सकता है । हे युधिष्ठिर ! तुम्हारा प्रेम तथा तुम्हारी भक्ति देखकर मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ, परमार्थके निमित्त मुझको जाना आवश्यक है । यह कहकर सुदर्शनजी युधिष्ठिरके आगे हुये और युधिष्ठिर महाराज उनके पीछे होलिए । इसी प्रकार सुदर्शनको लिये महाराज युधिष्ठिर अपने मकान पर पहुँचे ।
जब श्वपच सुदर्शनजी राजा युधिष्ठिरके मकानमें प्रविष्ट हुये, राजाने रानी द्रौपदीको आज्ञा दी कि, स्वादिष्ट भोजन बनाओ, सन्मान तथा प्रतिष्ठा-पूर्वक सन्तको भोजन कराओ । उसी समय द्रौपदीने भोजन बनानेका प्रबंध किया । भौति भौतिके स्वादिष्ट भोजन बनाकर प्रस्तुत किये । अत्यंत मर्यादाके साथ सुदर्शनजीको आसनासीन कर मेवें तथा पकवानके थाल सामने धर दिये । सुदर्शनजीने जो सम्यक् प्रकारके स्वादोंसे विरक्त थे, सब खट्टा, मीठा आदि भोजन एक साथ मिला दिया । क्योंकि, आपको तो किसी प्रकारके स्वादकी कामनाही नहीं थी । सबको मिलाकर खाने लगे । तीन ग्रास खा चुके थे कि, रानी द्रौपदीके मनमें ऐसा ध्यान हुआ कि, फिर तो सुदर्शन नीच अज्ञानी है, भोजनके स्वादको वह क्या जाने ? मैंने कितनेही प्रकारके भोजन बनाये थे सो सब एकसाथ मिलाकर खाते हैं । नमक मिष्ठान आदिका स्वाद तनिक
ऋषीश्वरोंका वचन
विचार नहीं करते। सुदर्शनजीने द्रौपदीके हृदयकी बातोंको जानकर अपने हाथको भोजनसे खींच लिया। केवल तीन ग्रास खाये अधिक भोजन नहीं किया हाथ धोकर चले, सुदर्शनजीने जो तीन ग्रास खाये थे इस कारण वह आकाश घण्ट तीनही बार बजकर रह गया, अधिक नहीं बजा। उस समय राजा युधिष्ठिरको फिर संदेह हुआ, कृष्णचन्द्रके पास जाकर कहने लगे कि, महाराज ! अब क्या करें ? सुदर्शनजीने भोजन किया तो भी घण्ट तीनही बेर बजा। किस अपराधसे पूरे सात बार नहीं बजा ? महाराज ! कृपा कर इसका कारण बतलाइये। कृष्णचन्द्रने कहा हे युधिष्ठिर ! रानी द्रौपदीने अपने मनके भीतर सुदर्शनजीकी खानेके समय निन्दा की कि, सुदर्शन अज्ञानीहै। भोजनके स्वादको नहीं जानता। इस कारण सुदर्शनजीने उसके अन्तःकरणकी बात जानकर खानेसे हाथ खींच लिया। तुम्हारी यज्ञ पूरी नहीं हुई इसलिये घण्ट नहीं बजा। अब तुम दौड़कर जाओ सुदर्शनजीके चरणोंपर गिरकर अपना अपराध क्षमा कराओ। प्रार्थना तथा निवेदन करके उनको फेर लेआओ। बड़ी मान भक्ति तथा नम्रतापूर्वक भोजन कराओगे, तब सात बार घण्ट बजेगा। सावधान, किसी प्रकारकी विभिन्नता न करना। इतनी बात सुनकर राजा युधिष्ठिर दौड़े गये और सुदर्शनजीके चरणोंपर गिरकर अत्यंत नम्रतासे कहने लगे कि, महाराज ! हमारा अपराध क्षमा करो, हम अज्ञानसे अंधे हैं, आपके भेदको नहीं जानते, अब चलकर हमारे घरमें फिर भोजन करो। जब राजाने बड़ी नम्रता की तब सुदर्शनजी पुनः दयालु हुए राजाके घर आकर पुनः भोजन किया। तब घण्ट सात बार आकाशमें आपसे आप बजा। चारों ओरसे जय जयकार ध्वनि होने लगी।
यह सब कबीर साहब धर्मदासजीसे कहते हैं कि:—
साखी-श्वपचभक्त^१^ भोजन कियो, घण्ट बजेउ अकाश^२^ ।
गण गंधर्व मुनि देवमें, जैजै होत^३^ प्रकाश^४^ ॥
चौ०-भोजन श्वपच कीन्ह जिउनारा^५^ । सात बार घण्टा झनकारा^६^ ॥
राय युधिष्ठिर चरनन परचो । पातक^७^ सकल^८^ भक्त^९^ मम^१०^ हरचो^११^ ॥
हम तो महा अधम अपराधी । कुटिल^१२^ कठोर^१३^ भक्ति नहीं राधी^१४^ ॥
अहो भगत हम बडे अभागी । कृपा कीन्ह मोहि कीन्ह सुभागी ॥
पांचों पाण्डव विनवैं^१५^ शूरा । भक्त प्रताप यज्ञ भा पूरा^१६^ ॥
१ सुदर्शन, २ अपने आप, ३ होती थी, ४ प्रत्यक्षमें ५ परोसी हुई वस्तुका, ६ बज गया, ७ पाप ८ सब, ९ हे सुदर्शन, १० मेरे, ११ दूरकर दिये, १२ कपटी, १३ कड़े स्वभावके, १४ सिद्ध की, १५ प्रणाम करे, १६ हो गया।
गण गंधर्व देव सब आये । श्वपच भक्तको मस्तक' नाये' ॥
सब शट दर्शन और अचारी' । अस्तुति करै चरण शिर धारी' ॥
सा०—कल' वन्त बहुतेक जुरे', पण्डित कोटि पचीस ।
श्वपच भक्तकी पनही', तुलै' न काहुको' शीस ॥
चौ०—नाम सुमिरले अमृत बानी । क्या चतुराई ठानि रे प्रानी ॥
पढ़े रे भरथरी' चारों वेदा । बिन सद्गुरु नहिं पायो भेदा" ॥
गोरखको भी जन्म सरानी" । कायाकी गति" उनहुँ न जानी॥
जबहुँ जुरे कोटिन ऋषि राजा । तबहुँ न घण्ट अघर" बिच बाजा॥
जबही श्वपच" मन्दिरपगुधारा । बाजेउ घण्ट भये झनकारा ॥
कह कबीर चारों बरण हैनीचा । सबते श्वपचहु भगत है ऊंचा ॥
जब सुदर्शनजीने दूसरी बार भोजन किया तब सात बार स्वयम् आकाशी घण्ट बजा, चारों ओरसे धन्य धन्य और जयजयकार शब्द होने लगा, सम्भस्त राजा प्रजा आकर श्वपच सुदर्शनके चरणोंपर गिरे षट् दर्शनके ऋषि मुनिगण आकर दण्डवत प्रणाम करने लगे पाँचों पाण्डव अत्यंत नम्रतापूर्वक उनके चरणोंपर गिर, स्तुति करने लगे । सुदर्शन महाराजकी महिमा सब संसारमें प्रकट हो गई ।
पाण्डवोंको सुदर्शनकी श्रेष्ठता दिखाना ।
भीमसेनसे कहा था, कि, जबतक हम श्वपच सुदर्शनकी श्रेष्ठता अपनी आँखोंसे न देखलें तबतक कभी भी विश्वास न करेंगे क्योंकि, कृष्णजीने प्रतिज्ञाकी थी कि, मैं तुमको सुदर्शनकी श्रेष्ठता तुम्हारी आँखोंसे दिखला दूंगा, तुम देख लेना, तब विश्वास करना । इस कारण कृष्णजीने आज्ञा दी कि, अब यह सब समाज जो इस समय उपस्थित हैं पुष्करजी चलें । आज्ञानुसार सब पुष्करजी को चल दिये ।
भगवान् कृष्णने भी जो कुछ कहा था उसको पद्यबद्ध ग्रन्थोंमें दिखाये देते हैं—
ततक्षण' कृष्ण वचन अस" भाखी" । सुनहु न राय युधिष्ठिर साखी" ॥
सबही लैचलु" पुष्कर तीरा" । देखहु दृष्टि" सकल" मतिधीरा" ॥
पुष्कर क्षेत्र आहि" अघहारी" । बेगिहि" चलहु" तहाँ पग धारी ॥
१ शिर, २ झुकाया ३ जोगे जंगम, सेवडा, संन्यासी, दर्बेश, ब्राह्मण, ४ रखकर, ५ सिद्धिवाले, ६ हुए, ७ जूती, ८ बराबर, ९ किसीको, १० भर्तृहरि, ११ हाल, १२ बीता, १३ हाल, १४ आसमानी, १५ श्वपच भी, १६ उसी समय, १७ ऐसे १८ कहे, १९ किसीके कहे हुए, २० लेचलो, २१ किनारे, २२ आँखोंसे, २३ सब २४ बुद्धिमान्, २५ है, २६ पापनाशक, २७ जलदी २८ चल दिये ।
तब सब जिलि मिलि दीन रेगाई^१^। पुष्कर छेत्र पहुँचे^२^ जाई^३^ ॥
सवालाख दीपक उँजियारा^४^। सब परछाही^५^ आप^६^ निहारा^७^ ॥
बैठे देख सकल सरदारा। सुर नर भूपति ठाढ़े पारा^८^ ॥
सकल मेष^९^को देखहु देवा। जलमट्ट^१०^ रूप^११^ कहहु कस^१२^ भेवा^१३^ ॥
साखी-सब परछाई निरखह^१४^, सुनहु युधिष्ठिर राय।
कहहु^१५^ सुपच कस^१६^ आगरे^१७^, जलमह^१८^ निरखहु जाय^१९^ ॥
युधिष्ठिर बचन।
चौ०- निरखे^२०^ राय युधिष्ठिर छाहि^२१^। पशुकी छाया सबकी आहि^२२^ ॥
खर^२३^ शूकर^२४^ लीन्हें औतारा^२५^। श्वानजन्म^२६^ भरमें^२७^ मनियारा^२८^ ॥
सा०- मीन^२९^ माँस जो खात^३०^ है, ते तो जाति चँडाल।
गीध^३१^ कागकी^३२^ देह धरि^३३^, भरमें जग^३४^ जञ्जाल^३५^ ॥
जब समस्त समाजको समेटि कर राजा युधिष्ठिर तथा कृष्णजी पुष्कर तीर्थ गये। कृष्णजीने सवालाख प्रदीप जलवाये, युधिष्ठिरजीसे कहा कि, अब तुम लोग आदिमियोंको परछाई इस जलमें देखो, उन्होंने देखा तो सर्व मनुष्योंका प्राकृतिक स्वरूप उस जलमें दिखाई दिया अर्थात् गदहा, सूबर कुत्ता, बैल, हाथी घोड़े पशु, पक्षी हंसक जीव कीड़े मकोड़े आदि देख पड़े, एक भी उनमें मनुष्य नहीं था केवल श्वपच सुदर्शनजी महाराजही इनमें मनुष्य थे, श्रीकृष्ण का सत्य पुरुषका रूप था। जब पाण्डवोंने स्वचक्षुसे देख लिया कि सुदर्शनजीके अतिरिक्त दूसरा कोई मनुष्य नहीं है तो उनको सुदर्शनजीकी श्रेष्ठताका परिचय भली प्रकार मिल गया। पुष्करजीमें सबका प्राकृतिक स्वरूप दिखाई दिया। क्योंकि, पुष्करजी सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ हैं, पृथ्वीकी आँख हैं। इस कारण कृष्णचन्द्रने यह समस्त कौतुक धरतीकी आँखद्वारा दिखलाया। सब लोगोंने हंस कबीरकी श्रेष्ठताको भली प्रकार जान लिया। इसी प्रकार हंस कबीरकी सबकालोंमें प्रकट हो जाती है, किसीसे छिपी नहीं रह सकती। उन्हींकी श्रेष्ठतापर यह गजल है इसमें उनकी श्रेष्ठताका कुछ नमूना दिखा देते हैं —
गजल-संद^३६^ मह खुर छिप जायेंगे इस नूरके^३७^ आगे।
तुझ बंदः सुदर्शन कदम^३८^ धूरके आगे ॥
१ चल दिये, २ पहुँच गये, ३ प्रकाशमें, ४ अपनी परछाई को, ५ स्वयम, ६ देखा।
७ किनारेपर ८ दशनोंके, ९ जलमें, १० आकार, ११ कँसा, १२ रहस्य है, १३ देखो, १४ बताओ,
१५ कँसे, १६ आकार, १७ पानीमें, १८ देखो, १९ देखे, २० परछाई, २१ है, २२ गदहा,
२३ सूअर, २४ जन्म लिए हुए हैं, २५ कुत्तेकी योनि, २६ डोलें, २७ चूड़ीवेचा, २८ मछली
२९ खाते हैं, ३० गूढ़, ३१ कऊआ, ३२ शरीर, ३३ संसार, ३४ बखेडेमें, ३५ सूर्य चाँद आदि
३६ आत्मीय प्रकाश, ३७ चरण, ३८ रज।
है, हेच' नमक' हुस्नोदमक' हूँ' रो गिलमा' ।
पापोश' चमक' इन्द्रमती हूरके आगे ॥
जेते हैं सलातीन जमी' और 'फलकके !
खिदमंतममें' हैं सारे मेरे फगफूरके आगे ॥
दिलदार है बाजारमें कोपर्दः नशीं' है ।
हाजिर 'बदिले बेदिल 'रञ्जुरके आगे ॥
मूसा 'सदहा गुजरे न देखा कभी सो औज' ॥
गाफिल हुए सब हिसोहवा' ढङ्ग लगाये ॥
कुछ जोर नहीं जालिम' जंवूरके आगे ॥
फिरता बतवाफे तो यह गरदूँ जो कमरकोज ।
सिजदे' झुका है तेरे मनशूरके आगे ॥
कह भेद उसीसे जो कि हो महूरमें' इसरार
कर फाश' न तू हरगिज 'गयूरके आगे ॥
नथुनेमें 'बनी जजान है जबतक तेरे आजिज ॥
कर उसकी बुजर्गी खडे जम्हूरके आगे ।
यथा ।
भारतो 'स्वसमवेदकी तहरीर' में देखो ।
उलमाय' फकीरनकी' तकरीर' में देखो ॥
जिनके सदहा लख हैं सुदर्शनसे गुलामों ।
सो साहब के कलमए 'तासीर में देखो ॥
मखलूक' जहाँ मजमअ' हुआ केते करोडों ।
इस सत्यगुरु की 'खादिम तौकरिमें' देखो ॥
बन्दे हैं पडे कैद हसीनान' हजारो ।
बबदल' बुते जुल्फकी' जञ्जीर में देखो ॥
जिस नामसे वाकिफ' न जमी' और न जमाँ' है ।
सो नाम है उस खादिमे जागीर में देखो ॥
१ तुच्छ, २ खार, ३ सौन्दर्य, लावण्य, ४ परी, ५ सुंदर सुंदर लडके, ६ जूती, ७ लावण्य,
८ भू, ९ आसमान, १० सेवा, ११ पदमें छिप हुआ, १२ हृदयके व्याकुल, १३ अत्यन्त रंजीदा,
१४ रातदिन, १५ तपिश, १६ जिस पर्वतपर मूसाको परमात्माके दर्शन हुए थे, १७ अत्यन्त-
जुल्मी, १८ वन्दना, १९ ढकना, २० जाहिर, २१ गमार, २२ कविकी कविताका नाम है ।
२३ आत्म बोधक शास्त्र या कबीर साहबका बीजक, २४ लिखावट, २५ उलमा, २६ फकीरों
२७ वचन, २८ स्वभाव, २९ पैदा, किया, ३० समूह, ३१ खिदमत करनेवाला, ३२ सत्कार ।
३३ प्रसन्न चेता, ३४ न फिरनेवाले, ३५ शरीर, ३६ जानकर, ३७ भू, ३८ जमाना,
जो कर न सके फतह' कोई मर्द सिपाई ।
सो आशकके नालए' शबगीर में देखो ॥
जिस इल्मसे महरूम' रहे खादिमोख्वाजः ।
सोई कदमें बरकत्' गुरु पीर में देखा ॥
बुल बुल है फुगा में जिसे कुमरी करे कूकू ।
हर' गुलशनो हर गुलवने तसवीर में देखा ॥
जिसके लिए जाबाज' है परवानए' बे खौफ' ।
सो महरुख' हर शमः व मुलगीर में देखो ॥
सदरञ्ज' उठा न गञ्ज' सो हाथमें आवे ।
आसान है सो उसकी तदवीरमें देखो ।
यह हरदो' जहाँ और जहाँदार तमासा ॥
सब खेल खुला' कैल की तजबीर में देखो ।
सोहाजिरो' नाजिर' है बहों जाहिरो वातिन' ॥
वेदारी और खाबकी ताबीर में देखो ।
जिसके लिये महाह' समीह्मद' सरायों ॥
यह सारा जहाँ उसकी तस्वीर में देखो ।
जो मजहब जारी न हुआ तीन जमाना ॥
घर घर है सो दौर इनकी अखीर में देखो ।
यों और वहाँ परदः दुई, इठगया' आजिज ।
सत् पुरुषको साहबे कबीर' वें देखो ॥
*यथा- ताजीम तेरे बन्देको गुलजार झुका ।
तकरीमको शम्शो महे अनवार झुका ॥
जब आपही से आप बजा घण्ट समावी ॥
पाबोसको गेती शहे दरबार झुका ॥
रक्कास झुका तबलः झुका तार व तम्बूर ।
बं बादए पैमानः व सरशार झुका ॥
१ जीव २ प्रेमी, ३ आहंकीलैन, ४ अलग, ५ हल्का, ६ प्रत्येक, ७ जीव, ८ पतंग, ९ निडर,
१० चन्द्रमुखी, ११ सदाके दुख, १२ ताला, १३ इसलोक और परलोक, १४ एक अनागत वक्ता,
१५ उपस्थित, १६ द्रष्टा, १७ हृदय, १८ सराहक, १९ स्तुति, २० द्वैत, २१ कबीर साहब ।
- यज्ञमें घंटाके अपने आप बज जानेसे सभीने सुदर्शन श्वपचको भगवान्का अनन्य भक्त जानकर शिर झुकाया था इसी शिर झुकानेकी बातको नाम निर्देशके साथ इस गजलमें भी कहा गया है ।
सूफ़ी भि झुंका रिन्द झुका जाजिबे मजबूत ।
मयः पीर मुर्गा खानए खुम्मार झुका ॥
मखलूक हुआ आगाह उस अकबर इसरार ।
आली अमलो इल्म अमलदार झुका ॥
जब पहिन अजर जामा चले हंस तुम्हारे ।
तसलीमको तब आगे हो ओंकार झुका ॥
हाज़िर थे इल्म और फ़नून फ़ाखिरे कसूबी ।
वा तजरबए तसबीहो जुन्नार झुका ॥
सदहा जमा जङ्गलको जलावे तजो पलकमें ।
ता विन्दए नाविक शररबार झुका ॥
है कौन बद अन्देशः जो आ पेश तुम्हारे ।
हैबत से तेरी चर्ख यह दौवार झुका ॥
सब वेष भगे देख तेरा तीर ज़िगर सोज़ ।
रुस्तम भी झुका शेवः सितमगार झुका ॥
ताज़ीस्त सनाख्वाँ हो तु इस कातिल अपने ।
सिजदेको पहले निरङ्कार झुका ॥
बोले न हँसे यार तलबगार फिर आजिज़ ।
जब तुझ हदफ़े सीनः पै सोफ़ार झुका ॥
गरुड़जी महाराज ।
कबीरसागरान्तर्गत बोधसागरमें एक 'गरुड़ बोध' भी है । उसमें सबसे पहिले धर्मदासजी कबीर साहिबसे गरुड़बोधका भेद पूछते हैं, एवं कबीर साहिब कहते हैं कि, पुरुषने कहा कि, ए सुकृत ! आप संसारमें जाओ जीवोंका उद्धार करो । ज्ञानीजीने पृथ्वीपर आकर, जिसने उनके वचन माना उसीका उद्धार कर दिया । सबसे पहले गरुड़जी मिले, मैंने उन्हें सत्यनामका उपदेश दिया, कैसे दिया । सो मैं तुझे सुनाये देता हूँ । गरुड़को जब मैं मिला तो गरुड़ने मुझे पूछा कि, आप कौन एवं कहाँसे आये हैं मैंने कहा कि, ज्ञानी मेरा नाम है संसामें दीक्षा देनेके लिये सत्य लोकसे आया हूँ । गरुड़ने यह सुनकर बड़ा आश्चर्य माना कि, कृष्णसे भिन्न दूसरा सत्य पुरुष कौन है । वे ही दसों अवतार धारण करते हैं । कुछ बातोंके पीछे कबीर साहिबने गरुड़जीको कृष्ण महाराज की आज्ञा लेने को भेजा था ।
कृष्ण वचन ।
चौ०— सुनके कृष्ण उत्तर तब दीन्हा । भले गरुड़ तुम उनको चीन्हा ॥
सरगुण कई बार अवतारा । निज साहब है अगम अपारा ॥
सो साहब हमको निरमाया । आज्ञा कीन्हीं हमहिं उपाया ॥
जो कबीर भाषे अरथाई । सोई वचन सत्य है भाई ॥
गरुड़ वचन ।
गरुड़ कहे तुम काहे न भाखी । कैसे मोहिं छिपायके राखी ॥
सरगुण प्रभु दीन्हा फैलाई । निरगुन कैसे नहिं प्रगटाई ॥
कृष्ण वचन ।
सुनहु गरुड़ एक वचन प्रमाना । निरगुन कोई बिरलै जाना ॥
हम देही धरि क्रीडा कीन्हा । यही मान सब काहू लीन्हा ॥
हम गीतामहैं सन्धि जनाई । ताको कोई न चीन्है भाई ॥
निरगुन भेद कहूँ परमाना । मनकर भेद न कोई जाना ॥
पढ़ गीता पण्डित बौराई । अर्थ भेद को गम नहिं पाई ॥
पढ़ गीता औरन समझावें । आप भरममें जन्म गवावें ॥
कथ गीता हम सकल बताई । पण्डित अर्थ न समझा जाई ॥
ब्रह्मा विष्णू शिव कह भाई । इन तीनों मिल बाजी लाई ॥
ता बाजी अटका सब कोई । निरगुणकी गम कैसे होई ॥
बाजी लायके जग भरमाई । निर्गुणकी गति कोइ नहिं पाई ॥
मैं सब जानूँ भेद अवगाहा । और देव नहिं पावैं थाहा ॥
गीताको हम कथ समझाई । सा अर्जुन नहिं मानी भाई ॥
रहन गहन उनहैं नहिं पाई । अरथ सुनै सब जन अरुझाई ॥
पण्डित पढ़ गीता अरथावै । गीता केर अर्थ नहिं पावै ॥
फिर फिर हमहींको ठहरावै । निर्गुणकी गम नाहीं पावै ॥
हम कबीरको नीके जाना । उनहीं कीन्ह सकल मण्डाना ॥
सकल जीव उन अण्ड मुँदाई । इनहीं सबहीं अर्थ दूढ़ाई ॥
जहैं लगि तीरथ देखहु जाई । इनहीं सब थापना थपाई ॥
और सकलको रचना कीन्हा । यहि विधि थाप सबनको दीन्हा ॥
हम तीनों पुरुष बिसराई । आप आपको कीन्ह बड़ाई ॥
साखी—कह कृष्णजी गरुड़से, तुम गुरु करो कबीर ॥
हंस लोक पहुँचावई, खेड़ लगावै तीर ॥
इस प्रकार श्रीकृष्णने जब गरुड़को आज्ञा दी कि, तुम कबीर सहाबको गुरु करो, तब गरुड़जी तुरन्त सत्यगुरुके पास गये । कबीर साहबकी आज्ञानुसार दीक्षा लेनेका सब प्रबंध किया । जैसा कि, अब वर्तमान कालमें कबीर पंथियोंमें दीक्षा लेनेकी प्रथा है । इसी नियमके अनुसार गरुड़जीने चारों ओर पत्र भेजकर बहुत साधुओंको एकत्रित कर भण्डारेका बड़ा प्रबंध किया । समस्त साधुमंडलिका प्रेम पूर्वक सेवा सत्कार किया ।
चौपाई—जितने साधु द्वारिका चीन्हू । तिनिहिं गरुड़ सबको दल दीन्हू ॥
जहैं लगि मुनिवर सहस अठासी । आए ऋषि मुनि सिद्ध चौरासी ॥
आए ऋषि जो सहस अठासी । नागलोकके भोग विलासी ॥
वासुदेव जहैं आप रहाये । और नाग बहुतेक चलि आये ॥
ब्रह्मा विष्णु जहैं आये भाई । शिव आये बहुतेक चलि लुगाई ॥
महादेव वचन ।
कह शिव कोपके वचन अपारा । तीन छोड़ कस और विचारा ॥
सब पर तेज महादेव कीन्हू । सब मिलिआय गरुड़को चीन्हू ॥
तब शिव ऐसे वचन सुनाई । हमें तीनों पर और न भाई ॥
गरुड़ वचन ।
सुनु ब्रह्मा सुनु विष्णु महेशा । मो को कीन्ही कृष्ण उपदेशा ॥
जो कछु कृष्ण बताई भेखा । सो तुम्हरो मत आखिन देखा ॥
महादेव वचन ।
यह सुनि महादेव रिसियाना । हमरी गति तुम कैसे जाना ॥
हम तीनों हैं त्रिभुवन राई । हमें छोड़ कस और दूढ़ाई ॥
शिवजी बहुत कुछ कह अत्यंत क्रुद्ध हुए बड़ा भय दिखलाया ।
पर गरुड़जीने कुछ भी परवाह नहीं की, ब्रह्मा विष्णु आदि सब देवता उपस्थित थे । जब गरुड़जीने कबीर साहबसे दीक्षा ली, सत्यगुरुका ज्ञान पाकर भली प्रकार सन्तुष्ट हुए, गरुड़जीके सामने बहुतसे लोग ब्रह्मा विष्णु तथा शिव सहित एकत्रित हुए, पर किसकी ताकत थी कि, ज्ञानमें गरुड़जीका सामना कर सके ।
जिस समय गरुड़जी दीक्षालेने लगे उस समयका वृत्तान्त सुनो कि, उनपर कैसी आकाशी दया हुई थी ।
चौ०—ऐसी भाँति भगति उन साजा । बाजे सकल अनाहद बाजा ॥
बाजे शंख बीन शहनाई । गैवको बाजा बाजै भाई ॥
ताल मृदङ्ग गैवसे वाजी । ऐसी भांति भक्त भल साजी ॥
सत्य लोकसे उतरे दासा । करें भक्ति वो भोग विलासा ॥
सखा समेत साज जो आई । जगमगज्योतिवरणि नहिं जाई ॥
निर्गुण भक्त कीन्ह सञ्जोई । केते भूल रहे सब कोई ॥
नागलोककी कन्या आई । मोहि रहे सब देखी भुलाई ॥
मोहे ब्रह्मा विष्णु महेशा । नारद शारद औ सुख देशा ॥
गण गंधर्व मोहे आचारी । निर्गुन भेद न परे विचारी ॥
मोहे कृष्ण द्वारिका वासी । मोहे सकल सिद्ध चौरासी ॥
यहि विधि भक्ति कीन्ह चितलाई । देहको सुधि सर्वाहि विसराई ॥
धन्य धन्य सब करें पुकारी । धन्य कबीर है भक्ति तुम्हारी ॥
धन्य गरुण है ज्ञानि जो पाया । ऐसे सब कमाल बचन सुनायी ॥
जब गरुड़जीने दीक्षा ली उस समय बड़ा सभाज हुआ । सत्यलोकसे हंस, उत्तर पड़े, सब सिद्ध साधु तथा देवता इकट्ठे थे, अंतरिक्षसे, अनगिनती बाजे बजने लगे, नागलोकसे एक स्त्री आई, उसको देख सब देवता तथा सिद्ध आदि मोहितसे हो गये, गरुड़जी ऐसे भाग्यवान् थे कि, उनके निमित्त कबीर साहबने सर्व सामग्री सत्यलोकसे मँगवाई थी, दीक्षा देनेके समय अनहद बाजा बजने लगा, ऐसा आनन्द हुआ । जो कभी देखा सुना नहीं गया था । गरुड़ने अत्यंत नम्रता पूर्वक सब ऋषि, मुनि तथा सब मनुष्योंका सत्कार किया जिससे बड़ा आनन्द हुआ । गरुड़जी सत्यगुरुका ज्ञान पाकर योग्य हो गए । पीछे सत्यगुरुकी आज्ञा लेकर तीनों देवताओंके निकट गये, पहले ब्रह्मासे मिले । ब्रह्माने देखा कि, गरुड़जी आते हैं तब प्रतिष्ठा सहित उठ खड़े हुए । यह बात उस समयकी हैं जब सभा विसर्जन हो चुकी थी, सब लोग अपने अपने घरको चले गये थे । जब ब्रह्माने देखा कि, गरुड़जी आते हैं, तब ब्रह्मा स्वागतके निमित्त उठे और बड़ी प्रतिष्ठा तथा मर्यादा की । जब गरुड़जी आसनपर बैठ गये तब वार्तालाप होने लगी । गरुड़जीने कहा कि, हे ब्रह्मा ! सत्यगुरुकी भक्ति मिले बिना कदापि मुक्ति न मिलेगी । करोड़ों बार सब उत्पन्न होते और मरते हैं उनकी मुक्ति कदापि नहीं होती । हे ब्रह्मा ! सत्यगुरुकी दया बिना आवा-गमनके दुःखसे कदापि कोई नहीं छूट सकता ।
चौ०—अस्थिर योग न काहू पाई । कोटि ऋषीश रहे भरमाई ॥
कोटि रुद्र औतार जो लीन्हा । अविगत पुरुष न काहू चीन्हा ॥
गण गंधर्वकी कौन चलावे । सनकादिक शुक्रदेव भुलावे ॥
कबीर शब्दका अरबीमें अर्थ
शेषनागजी बहुत भुलाई । देवी भूल दया नहिं आई ॥
जीव अनेक घात जो लाई । अविगतिकी गति काहु नपाई ॥
आप आप सब करें बड़ाई । तुमहूं ब्रह्मा देह जो पाई ॥
कीन्हा खोज अन्त नहिं पाये । तब तुम आप आप ठहराये ॥
तुम्हारे भूले जगत भुलाना । आदि पुरुषका मर्म न जाना ॥
तैतिस कोटि देवता आहीं । सब भूले कोई पार न पाहीं ॥
तुम बाजीगर बाजी लाये । तुमहीं सकल दीन भरमाये ॥
जब गरुड़जीके कथनको ब्रह्माजी सुनकर अत्यंत क्रुद्ध हुए जान लिया कि, गरुड़ने हमको तुच्छ ठहरा लिया है, ब्रह्माने सबको बुलाया राजा इन्द्र अपने दरबारियों सहित और नाग नागिन इत्यादि सब देवते ब्रह्मा तथा गरुड़का वाद विवाद सुननेके लिये आविराजे, ब्रह्माजी बड़े ही क्रुद्ध थे कि, गरुड़ तो हमको तुच्छ और नीच जानता हुआ बटमार बताता है ।
चौपाई—दिव्य दृष्टि में देखा बानी । है कोई पुरुष अगम निर्वानी ॥
इस प्रकार सुन देवता और राजा इन्द्र इत्यादि गरुड़जीके सामने कोई बात नहीं कर सके, सबके सब पराजित हुए, सब मिलकर आदिभवानीके निकट गये, दण्डवत प्रणाम किया । ब्रह्माने कहा कि, हे माता मेरा रचा हुआ तो समस्त संसार है गरुड़ दूसरेको किस प्रकार ठहराता है ! आदि भवानीने उत्तर दिया कि, हे ब्रह्मा ! तू मिथ्यावादी है पहले तूने मिथ्या भाषण किया था, इसके कारण तुझको शाप मिला अब फिर तू क्यों घमण्ड करता है ? यदि तूही समस्त संसारका रचयिता था तो फिर तू किसका ध्यान धरने गया था ? अपनी अज्ञानता तथा मूर्खताको छोड़, सत्यपुरुषका ध्यान कर । महामायाके इस प्रकार कहनेपर ब्रह्मा लज्जित तथा निस्तब्ध हुए । आद्याके सामने किसीको कुछ उत्तर देते न बन पड़ा । तब फिर गरुड़जी बोले—
चौपाई—सुन ब्रह्मा मति है अज्ञाना । तुम माताको कहा न माना ॥
साखी—तुम ब्रह्मा जानो नहीं, भये करमके खोट ।
हम हम करके भूलिया, ताते लगी न चोट ॥
कहैं गरुड़ समझायकै, जनि भूलो अज्ञान ।
साहब एक अगम्य है, ताका करलो ध्यान ॥
सबने निरञ्जन देवताको जगत् रचयिता ठहराया कि, वह सबके ऊपर है । फिर शिवजी अत्यंत क्रुद्ध होकर बोले कि, मेरा बनाया हुआ तो सब कुछ है, मैं चाहूँ तो गरुड़ तुझको अभी समाप्त कर डालूँ । फिर तू बोलने योग्य न रहेगा कि, सत्य पुरुष कौन हैं । यह सुन गरुड़ बोले कि—