भारतकोश
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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

बागवानी करता है । उन्होंने उत्तर दिया कि एक वर्ष हुये । तब अमीर आश्चर्यित हुआ कि यह कौन मनुष्य है कि, जो बरस भरसे बागवानी करता है, परन्तु बागका कोई फल नहीं खाया ऐसा ईमानदार यह कौन है । जब भली-प्रकार जाँच किया लोगोंने पहचाना तो कहा कि यह तो सुलतान इबराहीम अद्वम है । वह अमीर नितान्तही लज्जित हुआ हाथ बाँधकर अपना अपराध क्षमा कराने लगा, पर वे तो हँसकर कहोंके कहों चल दिये ।

एकबार इबराहीम अद्वमका बेटा जो सिंहासनरुद्ध था, रातके समय नदीके किनारे आनन्द विलास कर रहा था, नावें नदीमें चलाई जाती थीं खूब प्रकाश होरहा था, नाच तमाशा तथा ठट्ठा मसखरीमें लोग लगे हुये थे उस समय फकीरीकी अवस्थामें बादशाह इबराहीम अद्वम चले जाते थे । लोगोंने पागल समझकर उनको पकड़ लिया । रातभर ठट्ठा मसखरी करते रहे । जैसे होलीके भड़डवे होते हैं वैसाही ठट्ठा उनके साथ होता रहा, उन्होंने किसी प्रकारका अवरोध नहीं किया । जब प्रातःकाल हुआ सब लोगोंने पहचाना कि, यह तो हजरत हैं । तब बादशाहका जो पुत्र था वह देखकर बड़ा दुःखी होकर कहने लगा कि, पिताजी ! आपने अपनी कैसी बुरी दशा बनाली है, आप पागलोंके समान फिरते हैं । मैं इतना बड़ा बादशाह हूँ कि, जो चाहूँ सो करूँ, समस्त देश मेरे वशमें हैं, आप जो कहें सो मैं करूँ मेरे वशमें सब हैं । इबराहीम अद्वमने अपनी गुदडी सीनेवाली जो सूरई थी नदीमें फँकदी और अपने पुत्रसे कहा कि तू कहता है कि, मैं बड़ा बादशाह हूँ तो मेरी सूरई मँगवादे । शाहजादेने कहा कि, मैं सहस्रों सूरईयाँ मँगवाये देता हूँ । बादशाहने कहा कि, मैं तो अपनीही सूरई लूंगा तब शाहजादेने जाल डलवाए और बहुत ढुँढवाया पर वह सूरई नहीं मिली । तब इबराहीम अद्वमने कहा कि, हे नदी ! तू मेरी सूरई दे । उस समय नदीसे एक मछली वह सूरई मुंहमें लिये उनके पास आई, उनने अपनी सूरई लेली । शाहजादेसे कहा कि, देख, तेरी आज्ञा बढ़कर है, अथवा मेरी, तेरी आज्ञा तेरे देशमात्रमें है । मेरी आज्ञा नदी, पर्वत आदि जड़ चेतन स्थावर जंगम सभी मानते हैं ।

शेख मन्शूर और शिवली ।

जहाँ प्रेम और उसकी दृढ़तापर मर मिटनेवाले इस्लामी सम्भ्यताके सुयोग्य पुरुषोंका प्रसंग आता है तो उनमें शेख मन्शूरका सादर स्मरण हो आता है । अनल हक—‘अहं ब्रह्मास्मि’ का यह दृढ़ विश्वासी था, यद्यपि उस समयके इस्लामी कानूनोंके पंडितोंने ‘मैं खुदा हूँ’ यह कहनेके कारण उन्हें मारने योग्य

कहकर अपना फँसला देदिया था, पर कोई भी न तो इनके सामनेही ठहर सका था एवं न इनकी धारणाही बदल सका था। ये आज कलके रंगेश्वरोंकी तरह अनलहकके भक्त नहीं थे किंतु इनकी यह वानि सच्चे भावोंको लिये हुए थी। कँद हो जाने पर जो२ करामातें इन्होंने दिखाई थीं वह बड़ेसे बड़े सिद्ध पुरुषोंसे किसी प्रकार भी कम नहीं थी। मन्शूरके मुखसे ही नहीं किन्तु प्रत्येक रोमसे अनलहककी ध्वनि निकलती थी। शूली पर चढे पीछे खूनकी बूँदें भी अपने आन 'अनलहक' लिखती चली गईं। जलानेपर धूआँ भी वही बनकर उड़ा, तथा खाक भी नदीमें 'अनलहक' होकर ही बही। ये सिद्ध थे जैसे इन्होंने अपनी सिद्धिके प्रभावसे जैलकी दीवारोंको गिराकर सभी कैदियोंकी एक साथ बेडी काटकर उन्हें भगा दिया था उसी तरह आप भी अलक्ष्य हो जाते किन्तु अलक्ष्य होने पर इन्होंने इसीमें प्रेम और भगवानके नामका बड़ाई देखी इस कारण अपने नश्वर शरीर को शूलीके घाटपर उतार दिया।

जब कभी किसीको कोई प्रेमकी आखिरी मंजिल दिखाता है तो कहता है कि—

“खड़ा मन्शूर शूलीपर पुकारे इश्क बाजोंको है।

इश्के बामका जीना वों जीले जिसका जी चाहें॥

मन्शूर शूलीपर खड़ा हुआ पुकार २ कर कह रहा है कि, यह इश्कके ऊपरका जीना है। जिसमें सामर्थ्य हो वो जीले। किसीने परमात्माको उपालब्ध देते हुए उसीके लिये लिखा है कि—

तोडा है कोहेकनका शर पत्थरोंसे किसने।

मन्शूरको 'अनलहक' किसने कहाके मारा ॥

हे परमात्मन् ! यह तो बता कि, कोहकनका शिर किसने पत्थरोंसे तोडा था तथा यह भी बता कि, किसने मन्शूरके मुखसे 'अनलहक' कहलवाकर मौतके लिये भेजा था।

निर्भयदासजीने भी सच्चे वेदान्ती मन्शूरको बड़े सम्मानके साथ याद किया है कि—

जबतक जिन्दा रहा अनलहक कहता रहा शूलीपर भी कहे बिना नहीं माना क्योंकि, सनमका सच्चा प्यार पाना आसान नहीं है। किसी किसी बीरने तो इनकी फाँसीको किसी और ही रूपमें वर्णन किया है कि—

किया अच्छा जिन्होंने दारपर मन्शूरको खींचा।

कि था मन्शूरका जीना भी मुशकिल राहेदाँ होकर ॥

इनकी एक संप्रदाय इस्लामी समाजमें मौजूद है। इनकी अनेकों वाणी हैं। इनपर भी कबीर साहिबकी पूरी कृपा थी। इन्हें ज्ञान तो यों हुआ कि, कबीर साहिबने इन्हें नामका उपदेश दिया। उन्होंने २० वर्षतक गुफामें बैठकर उसका ध्यान किया, गुफाके बाहिर आतेही लोगोंसे भेट हुई इनके वचन साधारण नहीं कबीर साहब कैसे हैं यही कारण है कि, लोग इनके प्राणोंके ग्राहक बने थे इनमें यह शक्ति थी, कि वैरियोंके आक्रमणके समय अन्तर्धान हो गये। फिर इन्हें कौन ढूंढ सकता था? कौन ऐसा महाबली इस पृथ्वीपर था जो कि उनको पकड़ सकता था। परन्तु वे परमेश्वरकी भी वैसेही इच्छा देखकर स्वयम् उपस्थित हो गये। अपनेको स्वयम् ही हत्यारोंके हाथों पकड़ा दिया। मुसलमानोंने देखा तो पत्थर मारने लगे। उस समय शेख मन्शूर प्रसन्नता पूर्वक सब कठिनाइयोंको सहन कर रहे थे, यहाँ तक कि, ईश्वरेच्छा समझकर आह भी नहीं करते थे। उस समय मुसलमानोंने शेख शिबलीसे कहा कि, तू भी इस पर पत्थर मार। शिबलीने कहा कि, यह तो मेरा गुरुभाई है मैं ऐसा कार्य कभी भी न करूँगा। मुसलमानोंने शिबलीको भी पकड़ लिया बहुत विवश किया कि, तू इस पर अवश्यही पत्थर मार। उन्होंने एक पुष्प लेकर मन्शूरके ऊपर चलाया। जब वह पुष्प लगा तब आप गिर पड़े पुकारने लगे कि हाय मैं मर गया ! हाय मैं मर गया ! मन्शूरकी हाय हाय सुनकर शिबली उनके पास गये। पूछा कि इतने पत्थर आप पर पड़े आपने हाय नहीं की। मेरे एक पुष्पसे ऐसे घायल हुए कि हाय हाय करने लेंगे यह क्या बात है? मन्शूरने कहा कि, हे शिबली ! तुम्हारे एक पुष्पने जितना मुझे घायल किया वैसे पत्थरोंने नहीं किया। क्योंकि तुम भली प्रकार जानते हो कि, मैं कौन हूँ? तुम मेरे गुरुभाई हो। यह बात प्रसिद्ध है। लोग ऐसा गाते भी हैं कि, “शिबलीने फूल मारा। मन्शूर हा पुकारा” मुसलमानोंने जब उनको मारनेके लिये पकड़ लिया उस समय शेख कबीर आ पहुँचे। शेख कबीरको मुसलमानोंने घेर कर कहा कि, आप इसके मारनेकी आज्ञा दीजिये। शेख कबीर मुसलमानोंसे अन्यान्य बातें करते समझा रहे थे। परन्तु मुसलमानोंने मिथ्याही यह बात उडाली कि, शेख कबीरने बध करनेकी आज्ञा देदी है। शेख मन्शूरको पकड़ कर सूली पर चढ़ा दिया। जिस समय शेख मन्शूरको सूली पर चढ़ाया उस समय पृथ्वी कांपने लगी, अँधेरा छा गया और प्रलयके चिह्न दिखाई देने लगे।

कबीरसाहेबकी - रेखता।

मालिन पुकारे हे पिया। हाय हाय साहब तू ने क्या किया।
इक बूँद लज्जत कारने मन्शूर सूली यों दिया।

सबही बराती सज चले हैं व्याह करन उस पीवका ।
पहिरे गुलाबी सेहरा संशय पडा उस जीवका ।
होली तमाशे हो रहे सब देखनेको जायँगे ।
पीयसे रँगौली हो रहो रङ्ग देखिके ललचार्यँगे ।
जल जलकी रोवें माछली बन बनके रोवे बोरवा ।
महलोंकी रोवें वीबियाँ अल्ला इलाही क्या किया ।
कायाके अन्दर खोजले छज्जेमें तेरा जीव है ।
कहते कबीर गुरु ज्ञानसे तुझही में तेरा पीव है ।

जब शेख मन्शूरको सूलीपर चढ़ाया, उस समय आकाश पाताल तथा पृथिवी पर शोक छा गया पर उन्होंने तो अपना मारा जाना सहर्ष स्वीकार कर लिया । शेख मन्शूरका हाल संसारमें प्रसिद्ध है । तजकिरे मन्शूर नामक किताबमें भी विस्तारके साथ लिखा हुआ ।

गज्जल ।

चढ़ादार पर जब शेख मन्शूर । हुये उस वक्त सूरज चन्द बेनूर ॥
जमीं कौपी व कौपा आसमाँ भी । हुआ तब सारा आलम गमसे मामूर ॥
जमीं रोती व रोता आसमाँथा । बनी आदम मलायक गिरियः मेहूर ॥
उठा हजरत गजन्द आसेब सारा । दिया देह दुनिया पर उडा धूर ॥
यही खूबी है सदगुरु हंस आजिज । रजा रब्बानी तन मन धन हुआ दूर ॥

पश्चिम देशमें कबीर साहबके बहुतेरे शिष्य हैं । और उन देशोंमें कबीर साहब, सैयद अहमद कबीर शेख कबीरके नामसे प्रख्यात हैं। तथा बहुत स्थानोंपर कबीर साहबकी समाधि भी बनी हैं ।

तत्त्वा और जीवा ।

कबीर कसोटीमें लिखा है कि, तत्त्वा और जीवा नामक दो भाई जातिके ब्राह्मण दक्षिणदेश गुजरातमें नर्मदा नदीके किनारेपर रहकर साधुओंकी सेवा करते थे । उन्होंने बटकी एक सूखी लकड़ी ले अपने मकानके आँगनमें गाड़कर यह प्रण किया था कि, जिस साधुके चरणामृतसे इस बटकी सूखी लकड़ी हरी हो जावेगी हम उसीके शिष्य होंगे । चालीस वर्षतक सहस्रों साधुओंके चरण धो धोकर इस बटके सूखे ठूँठपर डालते रहे पर वह हरा नहीं हुआ । इससे उस देशमें साधुओंकी निन्दा तथा अप्रतिष्ठा होने लगी साधुसेवा बन्द हो चली । यह देख साधुओंने विचार किया कि, अब तो कबीर साहबके शरण चलना

चाहिये । उनके बिना, दूसरे किसीमें भी ऐसी सामर्थ्य नहीं है । कुछ साधु मिलकर दक्षिण देशसे काशीजीमें आये, कबीर साहबके पास जाकर सब वृत्तान्त इस प्रकार निवेदन किया कि, महाराज ! आपके होते हुये साधुओंकी इस प्रकार अप्रतिष्ठा होने लगी, अब कौनसी युक्ति करें ? कबीर साहब बोले कि—

साखी — कबीर, साधु हमारी आ'तमा, हम साधुनकी देह' ॥

साधुनमें यों रम' रहा, जो बादलमें मेंह' ॥

कबीर, साधु हमारी आतमा, हम साधुनके जीव ।

साधुनमें हूं यों रमूँ, ज्यो गोर'समें घी'व ॥

कबीर, साधुनमें हूँ यों रमूँ, ज्यों फूलनमें बा'स

साधु हमारी आत'मा, हम साधुनमें स्वाँस ॥

यह कहकर साधुओंको तो बिदा करके कहा कि, तुम लोग चलो हम पहुँचेंगे । वे साधु लोग बिदा होकर छः मासके उपरान्त वहाँ पहुँचे, जहाँ कि, वह बटका सूखा ठूँठ गड़ा था । वहाँ जाकर देखा तो क्या देखते हैं कि, कबीर साहब पहलेहीसे उस बटके सूखे ठूँठके सामने टहल रहे हैं । उन साधुओंने उन्हें देखकर दण्डवत् प्रणाम किया । उन दोनों भाइयोंने कहा कि, अब तुमलोग कबीर साहबके चरण धोकर चरणामृतको इत वृक्षपर डालो । उन दोनोंने वेंसाही काम किया । जैसेही साहबके चरणका जल उस ठूँठे वृक्षपर पड़ा वैसेही तुरन्त उस ठूँठमें से हरी डाल निकल पड़ी उसी समय वह वृक्ष हराभरा होकर लहलहाने लगा । उससे बहुतसी डालियों फूटकर निकल पड़ीं । वे दोनों भाई सत्यगुरुके चरणोंपर गिरकर शिष्य हो गये । कबीरके सोटीमें इस प्रकरण पर एक दोहा लिखा है कि—

तत्त्वा जीवाको मिल, दक्षिण बीच दयाल ।

सूख ठूँठ हरा किया, ऐसे नजर निहाल ॥

पर उन दोनों ब्राह्मणोंका कार्य सम्पूर्ण कर एवं उनको भली भाँति उपदेश देकर कबीर साहब पुनः काशीको लौट आये ।

दक्षिण देशीय ब्राह्मण जातिका अभिमान कुछ विशेष रखते हैं । इस लिए जब तत्त्वा जीवा ब्राह्मणोंके लडकी लडके विवाह योग्य हुये तब उन्होंने चाहा कि, उनका विवाह करें । उस समय उनके सजातीय कहने लगे कि, तुमने तो कबीर साहबको अपना गुरु बनाया है, हम तुम्हारे साथ सम्बन्ध नहीं करेंगे । वे दोनों ब्राह्मण सत्यगुरुसे आकर निवेदन करने लगे कि, हे सत्यगुरु ! अब हम क्या करें ? हमारे भाई बिरादरीके लोग तो हमसे ऐसा व्यवहार करने लगे कि,

वज्र देशके राजा राजा योग धीर

हमारे साथ सम्बन्ध नहीं किया चाहते हैं। कबीर साहबने, उन दोनोंको समझा कर कहा कि, तुम्हारी जातिवाले तुम्हारे बराबर बैठने योग्य नहीं हैं। अब तुम दोनों भाई आपसमें सम्बन्ध कर लो बेटे बेटीका लेन देन करो। तब उन दोनों भाइयोंने जो सत्यगुरुके आज्ञाकारी थे, आपसमें सम्बन्धका प्रबंध किया। ब्राह्मणोंने देखा कि, वास्तवमें आपसमें सम्बन्ध करने लगे तो अच्छा न होगा, अतएव जातिके समस्त ब्राह्मण खुशामद करने लगे कि, तुम ऐसा काम मत करो, हम तुम्हारे साथ सम्बन्ध करेंगे, वहाँके ब्राह्मण प्रसन्नता पूर्वक बेटे बेटीका लेन देन करने लगे।

वह * बटका सूखा ठंठ जिसको कबीर साहबने हरा किया था उसका वृत्तान्त सुनो कि, वह वृक्ष बहुत बड़ा हुआ बहुत फल गया। गुजरातमें है, कबीर बट कहलाता है। बहुत पवित्र और शुद्ध माना जाता है। प्रत्येक सालके कार्तिक मासमें वहाँ एक बड़ा भारी मेला लगता है, उस वृक्षकी छायामें सुखसे सात सहस्र मनुष्य रह सकते हैं। हस्तामलक भूगोलमें इस कबीर बटका हाल लिखा है। शिक्षा विभागके अंग्रेजी पुस्तकोंमें प्रायः इस कबीर बटकी प्रशंसा लिखी है। सरजान मिलटन नामक, जो अंग्रेजी भाषाका एक बड़ा प्रतिष्ठित कवि हो गया है, उसने भी इस कबीर बटकी बड़ी प्रशंसा की है, उस वृक्षकी बड़ी २ डालियाँ और लटें चारों ओरसे इतनी झूल पड़ी है कि वृक्षकी जड़ पहचानी भी नहीं जाती कि, कौन है। दूर दूर तक उसकी छाया है उसके नीचे बहुत लोग विश्राम लेते हैं। गरमीसे जो लोग जलते चले आते हैं इस वृक्षकी छायामें आकर ठण्डे हो जाते हैं, उनके शरीरसे सब तपन दूर हो जाती है। भेड़ बकरियाँ डाङ्गर डोर चरानेवाले लोग इस वृक्षकी छायामें बड़ा आराम पाते हैं। इस वृक्षसे डाल पात छाता समान चारों ओर छाया कर रहे हैं। वास्तवमें इस वृक्षके देखनेसे परमेश्वरकी मायाका कौतुक दिखाई देता है। यह बड़ाही सुन्दर है। इसका सौन्दर्य आश्चर्यमें डालता है। लोगोंको इस वृक्षसे बड़ा लाभ है। इसका डाढ़ोंमें बड़े रेशे हैं जिस प्रकार अन्यान्य पौधे तथा पशुओंका मांस सड़ जाता है इस वृक्षके डाढ़के रेशे कदापि नहीं सड़ते हैं। इनमें जो बड़ा वृक्ष होता है वह अपनी डाढ़ जब पृथ्वीकी ओर छोड़ता है, तबवे रेशे पहले नरम रहते हैं फिर पृथ्वीसे मिलकर जड़ पकड़ते हुये भली भाँति दूढ़ होकर बड़े वृक्ष हो जाते हैं। हिन्दू लोग इस वृक्षको बहुत चाहते हैं देव करके मानते तथा पूजन करते हैं। उस कबीर बटके समीप दो एक मन्दिर भी बने हैं। ब्राह्मण लोग इस वृक्षके नीचे

  • आज कल उक्त वृक्ष नर्मदाके बीचोबीच पड़ गया है अर्थात् टापूके समान जान पड़ता है। वहाँ उसके दर्शनार्थी लोग नावपर चढ़के जाते हैं। सं. १९०२-ई०

बैठकर पूजा पाठ किया करते हैं । प्रत्येक जाति तथा प्रत्येक मतके मनुष्य इस वृक्षकी छायामें बैठना पसन्द करते हैं । प्रत्येक मनुष्य छज्जेनुमा खेमेके सदृश डालियाँ देखनेको उत्सुक हैं । इस वृक्षके छायामें सूर्य्यकी तपन गरमीके मौसममें बिलकुलही असर नहीं करती । हिन्दुस्तानी फौजेंभी इस वृक्षके नीचे पड़ाव डालती है । नियत ऋतुमें सहस्रों हिन्दू इस वृक्षके नीचे एकत्रित होते हैं । विश्वासियोंकी मनोकामना पूर्ण होती है । अंग्रेज लोग जब उधर आखेटके निमित्त जाते हैं तो कई एक सप्ताहपर्यन्त वहाँ रहते हैं । इस सुन्दर तथा खेमावार वृक्षपर शुक्र, मयूर, पंङ्ङुङुङ इत्यादि सहस्रों प्रकारके पक्षियोंका निवास हुआ करता है लालबन्दर तथा बड़ेडील डौलके अनेक चमगीदङ्ङ इसपर रहते हैं । इससे एकही लाभ नहीं बरन् अनेकों लाभ हैं ; इसका फल बड़ाही सुन्दर तथा स्वादिष्ट होता है । पशु तथा मनुष्य दोनोंही इसको खाकर तृप्त हो जाते हैं, सहस्रों जीवों का प्रतिपालन इसके फलसे होता है, मनुष्य तथा पशु दोनोंको यह वृक्ष बड़ा लाभ पहुँचाता है । पहले तो यह बहुत बड़ा था पर अब कुछ कम हो गया है । दूरसे जो लोग इस कबीर बटके दर्शनके लिये जाते हैं वे इस बटवृक्षके पत्रोंको प्रसादतुल्य मानकर अपने घर लाते हैं । वर्तमान कालमें यह वृक्ष कबीर साहबके कौतुक का एक चिन्ह खड़ा वहाँ मौजूद है । जिस किसीको देखनेका उत्साह हो सो वहाँ जाकर देखकर अपनको कृतकृत्य करले, मैं इसकी विशेष प्रशंसा नहीं करता किन्तु अन्य जातिवाले इसकी विशेष प्रशंसा किया करते हैं । तत्त्वा जावा दोनोंकी हार्दिक आकांक्षाको सत्यगुरुने पूरा किया । जिन जिनने कबीर गुरु पाया वे सत्यगुरुके हंस होकर सत्यगुरुके देशमें विराजमान होगये । उनकी प्रशंसा शेष और शारदा भी नहीं कर सकते फिर मैं क्या चीज हूँ ? ॥

कबीरपन्थके प्रवर्तक महत्त्मा धर्मदासजी ।

कबीर साहब धर्मदासजीकी बड़ी प्रशंसा लिखते हैं । धर्मदास बोधमें इनका पूरा समाचार लिखा हुआ है । इनका वृत्तान्त यह है कि, इनका वैश्यके घर में जन्म हुआ था, बड़े धनाढ्य सेठ थे, नीमावत वैष्णव थे, ठाकुर पूजा किया करते थे, मूर्तिपूजाका बड़ा सामान साथ लिये तीर्थोंमें फिरा करते थे जब तीर्थों में घूमते यथुरा नगरीमें आये तो मूर्ति पूजाके परिपाकके समय वहाँ सत्यगुरुसे साक्षात्कार हुआ ।

धर्मदासजी बड़े आचारी थे अत्यन्त पवित्रता तथा शुद्धतापूर्वक रहा करते थे. अतुल सम्पत्ति होनेपर भी हाथसे रोटी बनाकर खाया करते थे, क्योंकि,

राजा भूपाल

यह स्वयम्पाकी थे, लकड़ियाँ भी धो धोकर जलाया करते, जिस समय धर्म-दासजी (मथुरामें) रसोई बना रहे थे उस समय कबीर साहब जिन्दा फकीरकी, सूरतमें सामने दिखलाई दिये, उसी समय धर्मदासजीने क्या देखा कि, आगमें जो लकड़ियाँ जल रहीं थीं उनमें से बहुतसी चीटियाँ निकल रही हैं। कुछ चीटियाँ जलभी गईं थी, बाकीको जल्दीसे चूल्हेके बाहर निकाल लिया। बड़ा खेद किया कि, इतनी चीटियाँ जल मरें। यहाँ तक कि, खेदवश उस दिन भोजन भी नहीं किया। कबीर साहब बोले कि, हे धर्मदास ! तुम रोज भगवानकी मूर्त्तिकी पूजा करते हो, तुमने उस समय इनसे न पूछ लिया कि, इन लकड़ियोंके भीतर क्या है ? धर्मदासजीने कहा कि, यदि भगवानसे पूछ लेता तो ऐसा पाप क्यों करता ? धर्मदास साहबको अपने पापका बड़ा दुःख हुआ देख कबीर साहबने गुप्त ज्ञान की बातें सुनाई, जिनको सुनकर धर्मदासजी कुछ अनुरागी हुए। पीछे जिन्दा-बाबा मथुरा नगरसे विलुप्त होगये, बनारसमें आ पहुँचे, धर्मदासको बड़ा प्रेम उत्पन्न हुआ, मथुरा नगरमें बहुत खोजा परन्तु न पाया। जब सत्यगुरुको न पाया तब मनमें बड़ी बिथा उपस्थित हुई कि, अब जिन्दा फकीरको कहाँ ढूँढ़ूं ? इसी सोचमें सत्यगुरुको स्थान स्थानपर ढूँढ़ने लगे, भण्डारे करने लगे, बहुत साधुओंको बुला बुलाकर भोजन देने लगे; इस ध्यानसे कि, हमारे भण्डारेमें दूसरे साधुओंके साथ जिन्दा बाबा भी आ जावें। बहुतही युक्तियाँ की तो भी जिन्दा बाबाका दर्शन नहीं हुआ, नगर नगरमें ढूँढ़ते फिरे कि, किसी प्रकार भी जिन्दा फकीरकी खबर मिले पर कहीं पता नहीं लगा। इसी प्रकार ढूँढ़ते २ बनारसमें पहुँचे तो देखा कि, एक स्थानपर कबीर साहब खड़े बक्तूता दे रहे हैं। चारों तरफसे बड़ी भीड़ खड़ी २ सुन रही है। तब उस भीड़को चीरकर धर्मदासजी भीतर घुसे। देखा तो कबीर साहब खड़े लोगोंको शिक्षा दे रहे हैं, पर बनारसमें कबीर साहबका जिन्दा भेषके स्थानमें वैष्णव भेष था। कण्ठी, तिलक, माला, जनेऊ और धोती इत्यादि देखकर धर्मदासको मनमें कुछ सन्देह उत्पन्न हुआ परन्तु पहचान लिया कि, यह वही जिन्दा बाबा हैं; जिसके कि, प्रेममें मैं पागलके समान हो रहा हूँ। सत्यगुरुको पहचानकर चरणोंपर गिर पड़े कहा कि, हे सत्यगुरु ! मुझको आप अपने शरणमें लीजिये कबीर साहबने कहा कि हे धर्मदास ! तुम बड़े भाग्यवान् हो कि, तुमने मुझको पहचान लिया। अब मैं तुम्हारे जनम मरणका दुःख दूर करूँगा। पश्चात् धर्मदासजी सद्गुरुको अपने मकानपर बांधो गढ़ लेगये।

सद्गुरुने विधि पूर्वक चौका आरती करके दीक्षा दिया, उस, समय धर्म-दासजीके पास छप्पन करोड़ रुपया था। वह सब सद्गुरुके भेंट किया। सद्गुरुने वह सब रुपया भूँखे, नंगे, लूले, अंधे, गरीब तथा सन्त साधुओंमें लुटा दिया।

पीछे धर्मदास साहबने वैराग्य लिया । सद्गुरुके उपदेशको धारण कर परंधामको पहुँचे, उनके वंशको साहबने गुरुवाई प्रदान की, जो बयालीश वंशके नामसे प्रसिद्ध है; ये ही वर्तमान कबीरपंथके प्रवर्तक हैं । कबीरपंथी अपनी अपनी आजकी नूतन कृतियोंको भी प्रायः उन्हींके नामपर बनाते हैं यह उनके नामकी महिमा है ।

कबीर साहिब तथा धर्मदासजीमें सदा धार्मिक संवाद ही हुआ करते थे । सद्गुरु धर्मदाससे खुली बातें करते थे । अणुमात्र भी अपने स्वरूपको नहीं छिपाते थे । यहां उनकी बात चीतोंकी साखी रखता हूं ।

साखी — हम साहब सत्यरुष हैं, यह सब रूप हमार ।

जिन्द कहे धरमदाससे, सत्य शब्द घनसार ॥

सकल सृष्टिमें रमि रहा, हूं सब जात अजात ।

गरीब दास जिन्दा कहे, मेरे दिवस न रात ॥

बोले जिन्द कबीर जी, सुनु वाणी धरमदास ।

हम खालिक हम खलक हैं, सकल हमार प्रकाश ॥

गरुड़बोध बेदी रची, राम कृष्ण हैरान ।

लंकापर धाये जबे, तब का करूँ बखान ॥

दुर्वासा मुनि इन्द्रका, हुआ ज्ञान संवाद ।

दत्त तत्त्वमें मिल गये, जा घर वेद न बाद ॥

गरीब-सिख बन्दी सद्गुरु सही, चकवै ज्ञानअमान ।

शीश कटा मन्सूरका, फेरि दिया जिव दान ॥

धर्मदासजीकी तरह गरीबदासजी भी सद्गुरुके चरणोंके दासही रहे हैं ।

उनकी श्रद्धाको सूचित करनेवाले कुछ पद्य उद्धृत करता हूं —

सर्वांगकी साखी ।

गरीब-नामोंको सद्गुरु मिले, देवल देता फेर ।

पण्डा तो इतही रहा, शब्द कहा हम टेर ॥

गरीब-रबिदास रसायन पीवते, झूले धरे अनन्त ।

चलत बार पाये नहीं, धन्य सद्गुरु भगवन्त ॥

संगतअङ्गकी साखी

गरी-ऐसी सङ्गति जो मिली, भक्ति गही प्रह्लाद ।

नारदसे सद्गुरु मिले, सूझी अगम अगाध ॥

धर्मदास साहबके खास मुख वचन मंगल धेला ।

प्रगट होनेकी-साखी ।

प्रगट हंस उबारने, मनमें कियो विचार ।
जेठ मास बरसातमें, पगधारे चँदबार ॥
चहुँ दिशि दमके दामिनी, श्वेत भँवर गुञ्जार ।
तहवौ आप विराजिहैं, जल पर सेज सँवार ॥
बालक कोठिन ठाठके, निकट सरोवर तीर ।
सुर नर मुनि जन हरषिया, साहब धन्यो शरीर ॥
चंदन साहुकी स्त्री, स्नान करन को जाय ।
सुन्दर बालक देखिके, कर गहि लियो उठाय ॥
प्रेम प्रीति करले चली, हँसत खेलत घर आय ।
चन्दन देखि रिसावई, तुम बालक कहाँ पाय ॥
बालक मोहि कर्ता दियो, सुनो साहु सतभाउ ।
यह बालक प्रतिपालिहैं, चलै तुम्हारो नाँउ ॥
डार डार यह बालक, मानो बचन हमार ।
सजन कुटुम्ब हाँसी करें, हँसि मारे परिवार ॥
यह बेश्याका बालका, सो तू लाई नार ।
लोग कुटुम्ब सब देखी हैं, तुमको देही बडार ॥
दासी हाथ बालक दियो, जलमें दीन्हों डार ।
देह धरे दुख पायो मैं, चेतो मूढ गँवार ॥
नीरू नाम जुलाहा, गमन किये घर आय ।
तासु नारि बड भागिनी, जलमें बालक पाय ॥
नीरू देखि रिसावही, बालक दे तू डार ।
सजन कुटुम्ब हाँसी करे, हँसि मारे परिवार ॥
जब साहब होँकारिया, ले चल अपने धाम ।
मुक्ति संदेश सुनाइहौं, मैं आयों यहि काम ॥
पूर्व जन्म तुम ब्रह्म ना, सुरति बिसारी मोहि ।
पिछिली प्रीति के कारने, दर्शन दीनों तोहि ॥
कर गहि वेग उठाइयाँ, लीन्हो कण्ठ लगाय ।
नारि पुरुष दोउ दरशिया, रङ्ग महाधन पाय ॥
भाव भक्ति करि ले चले, काशी नगर मझार ।
धन्य, भाग्य उस देशका, सद्गुरु जहाँ पगधार ॥

राजा अमरसिंह

अन्न पानि नहिं ग्रासहीं, दिन दिन बाढे अङ्ग ।
नारि पुरुष दोउ हरषिया, चडे, सवाया रङ्ग ॥
महादेव तेहि अवसर, जात रहे कैलास ।
नीमा पग धरि बूझही, पूजी मनकी आश ॥
तू नीमा बड भागिनी, पूर्व जन्म तप कीन्ह ।
तोरें घर प्रभु आइया, हँसि प्रभु दर्शन दीन्ह ॥
अक्षय वृक्ष फल पायके, सुख सम्पत्ति परिवार ।
दे भाँवर बर पूजले, गावें मङ्गल चार, ॥
धरमदास बर पावल, आपन रह्यो निनार ।
साहब कबीर जूको मङ्गल, गावें सुरति सम्हार ॥

तात्पर्य — जब कबीर साहब पहले चँदबारेमें प्रगट हुए थे जिसका कि, विवरण में पहिले कर आया हूँ, उस समय पहले कबीर साहब चन्दन साहूकार की स्त्रीको मिलें उस स्त्रीके भी कोई सन्तान नहीं थी । तब चन्दन साहूकारने अपनी दासीके हाथोंसे फिर उसी तालाबमें फिकवा दिया । उसके पीछे लक्ष्मणा ब्राह्मणीको मिले जैसा कि, अनुरागसागरमें दिखा है । इसके बाद नीमा और नीरू जुलाहेके घर आये । उस समय शिवजी महाराज कैलाशको जाते थे, वे नीमाके समीप जाकर कहने लगे—ऐ नीमा ! तू धन्य है ! बड़ी भाग्यवती है कि, स्वयम् साहब तेरे घर आये ।

यह सब वार्ता धर्मदास साहब और रामानन्द स्वामी इत्यादि सभी हंस लोग कहते चले आ रहे हैं यही बात गरीबदासजीने भी कही है; वे सब सर्वज्ञता के बलसे कहते आते हैं । ये बातें देखने तथा पढ़ने सुननेकी नहीं हैं । कबीर साहब जब जैसे काशीके लहर तालाबमें प्रगट हुए थे उसी तरह चँदबारेके तालाबमें तथा नरहर ब्राह्मण और लक्ष्मणा ब्राह्मणीके घर गये । चँदबारे तालाबकी वही शोभा थी जो काशीके लहर तालाबकी थी । इसी प्रकार कबीर साहब नरहर ब्राह्मणके घरमें जाकर रहे ।

महाराजा वीरसिंह ।

पृ. ३०० में लिख चुके हैं कि, कबीर साहबकी अन्त्येष्टि किया हिन्दू-रीतिके अनुसार करनेके लिये वीर सिंहजी वधेले मगहरके पठानसे लडने पहुँचे थे उन्हें कैसे बोध हुआ इस विषयपर वीरसिंह बोध एक ग्रन्थ है जो कबीर सागर नं० ४ बोधसागरमें सामिल है, उसके कुछ-बचनोंको वहीं उद्धृत करते हैं —

धर्मदास वचन ।

चौ० – धर्म दास पूछै 'अर्थार्ई । साहब मोहिं कहो समुझाई ॥
वीरसिंह राय कीन्ह तुम' सेवा । दयाकरी' कहिये गुखदेवा ।
वीरसिंह देव बड ज्ञानी' । कैसे साहब सेवा ठानी ॥
सो वृत्तान्त कहो मोहि स्वामी । दया करी कहिये सुखधामी' ॥

सद्गुरुवचन ।

धर्मदास भल वृक्षेउ वात्प । तुमसे वरणि कहो विख्याता ॥
तनमन धनको मोह न लावै' । सो' जिव हमरे संग सिध्दावै ॥
प्रथमहि चलै भक्त पहुँजाई' । सकल सन्त जहँ भक्ति कराई ॥
नामदेव भक्तिहि' मन लावा । सैन' औ धना जाट तहँ आवा ॥
रंका' बंका' सदन कसाई । पद्मावति' दीपक तहँ लाई ॥
छूटे' तान चंदेवा दीन्हा । ठाढ़े भगत तहँ गावन लीन्हा ॥
नामदेव लोटन कर' भाई । हात ताल रविदास' बजाई ॥
धना मृदङ्ग पद्म' उँजियारा । जुड़े सन्त सब भगत अपारा ॥
धर्मदास तहँवों हम गयऊ । राम राम सबही मिलि कहेऊ ।
तब हम एक वचन कहि लीना । सकल भगतकाको मन दीना ॥
नामदेव केहि पूर्णहि ध्यावो । भक्ति करो काको मन लावो ॥

नामदेव वचन ।

नामदेव कह सन्त भुलाये । दूजा पुरुष कहाँ ठहराये ॥
हरिहर ब्रह्मा है बड़ देवा । करे सकल जग तिनकी सेवा ॥
यह प्रभु आदि मध्य औ अन्ता । शीश मुड़ाय जीव कहे सन्ता ।

सद्गुरु वचन ।

हरि ब्रह्मा शिव शक्ति जपाई । इनकी उत्तपति कहों बुझाई ।
बिना भेद भूले सब ज्ञानी । ताते काल बाँधि जिव तानी ॥
अजर अमर है देश दुहेला । सो वहि कहिये पर्मे सुहेला ॥
ताका मर्म सिद्ध नहीं जाना । कृत्रिम करता ते मन माना ॥

साखी – कृत्रिम रङ्ग सब भेदिया, वह पुरुष नीनार ॥
तीनलोक पर अलख है, पुरुष ताहिके पार ॥


१ चितलाई, २ किमिकीनी, ३ करिके दया, ४ बडा अभिमानी, ५ बहुनामी, ६ अरु, ७ जो, ८ गयऊ, ९ करन, १० सेना, ११ राका, १२ बाका, १३ पद्मावती, १४ ले, १५ चौहटे १६ सब । यह पाठ भेद हैं । १७ करे, १८ रैदास, १९ पद, ऐसा अनेक जगह पाठ भेद तथा उलटा पलटा है पाठक समन्वयके साथ पढ़ें ।

चौ० – बीरसिंह देव बघेला राजा । बैठे आनि महल चढ़ि छाजा ॥
राजा नजर सबनपै कीन्हा । सब बडे भाव भक्ति चित दीन्हा ॥
गावैं भक्त अनन्त व्यवहारा । एक भक्त कस बैठा न्यारा ॥
टोपी एक अनूपम दीन्है । माला तिलक कूवरी लीहे ॥
श्वेत स्वरूप भक्तिकी काया । महा अनन्द रूप छबि छाया ॥

राजाबीरसिंह वचन ।

राजा छरीदार हँकराई । नामदेव कहैं आनि बुलाई ॥
वेगसो छरीदार चलि आये । नामदेव राजा बुलवाये ॥

नामदेव वचन ।

नामदेव पूंछे चितलाई । राव सँग कोई और हे भाई ॥
छरीदार पुनि वचन सुनाइ । कोई नहिं रावके भाई ॥
नामदेव छड़ी हाथमें लियऊ । चलै चले राजापै गयऊ ॥
राजा देख ठाढ़ तब भयऊ । कर गहिंके आशन बैठयऊ ॥

राजाबीरसिंह वचन ।

सा० – भक्ति करो गोविन्दकी, एक चित ध्यान लगाय ॥
श्वेत स्वरूपी भक्त यक, सो कस न्यार रहाय ॥

भावारथ—कबीर साहिब धर्मदासजीसे कह रहे हैं कि, एकवार नामदेव लोटन, रबिदास आदि हरिकीर्तन करते हुए ज्ञानचर्चा कर रहे थे, महाराज वीर सिंहजी भी ऊपर बैठे सुन रहे थे कि, मैं भी वहाँ पहुँच गया पर मैं सबसे अलग बैठा हुआ था इसी पर राजाको सन्देह हुआ था, इसी संदेहको मिटानेके लिये राजा ने छड़ीदारके हाथ नामदेवजीको बुलाया एवं यही प्रश्न किया ।

नामदेव वचन ।

चौ० – राजा सुनहु वचन एक मोरा । हम तुम हरिहर ब्रह्मा दोरा ॥
ता हरि भक्ति करै बहु धासी । कहे एक पुरुष और अविनासी ॥
माला भेष ले साधु शरीरा । डीरा जोलाहा दास कबीरा ॥
कृत्रिम कहे सकल सब देवा । कहीं सौंच नहिं देखूं सेवा ॥
ऐसे कहत कबीर जुलाहा । झूठ दिबाना मन हम आहा ॥

साखी – जुलाहा निन्दत सबनको, बन्दत कोही नाहिं ।
झूठ कहत हर ब्रह्मा, कह निर्गुण यक आहिं ॥

सत्य-व्रता और हापरके हंस

राजावीरसिंह वचन ।

चौ० – राजा ! नामदेव कह वानी । अगम ज्ञान वह करत वखानी ॥

नामदेव वचन ।

जो नर निर्गुण नामहिं ध्यावे । योनि संकट बहुरि न आवे ॥

राजा छरीदास पठवाई । जाय कबीर कहँ आनि बुलाई ॥

राजा वीरसिंह वचन ।

जो कोइ निर्गुण नाम सुनावे । परम प्रेम हमरे उर आवे ॥

अस्तुति वेद करत है जाको । पार न पावैं हरिहर ताको ॥

अहिपति अस्तुति करत हैं जाही । सुरपति निशि दिन गावैं ताही ॥

साखी – राजा छरीदार कह, आनु कबीर बुलाय ।

वचन एक हम पूँछि हैं, कहैं उन सुरति लगाय ॥

चौ० – छरीदार तुरतहि चलि जाई । बैठे जहाँ कबीर रहाई ॥

छरीदार तब बिनती लाये । अहो कबीरजी राय बुलाये ॥

बिनती राय करे कर जोरी । लाओ कबीर वेग तेहि ठौरी ॥

सतगुरु वचन ।

कहैं कबीर वचन अरथाई । केहि कारण मोहि राम बुलाई ॥

ना मैं पाठी ना परधाना । ना ठाकुर चाकर तेहि जाना ॥

ना मैं परजा देश बसाऊँ । ना मैं नाटक चेटक लाऊँ ॥

पैसा दमडी नाहिं हमारे । केहि कारण मोहि राम हँकारे ॥

साखी – छरीदार तुम जायके, कहो रायके पास ॥

महा प्रचण्ड बघेल हैं, हम नहिं मानैं त्रास ॥

जब नामदेवजीने कह दिया कि, वो सिवा रामके दूसरे देवको नहीं मानता । राजाने छरीदारके हाथोंसे बुलाया पर जब कबीर साहब छरीदासके कहनेपर नहीं गये तो वह क्रोधित हो राजाके पास जाकर कहने लगा कि, महाराज ? कबीर बड़ा अहंकारी है, मेरे बुलानेसे वह नहीं आता सर्कारको तूण समान भी नहीं समझता । इतनी बात सुनकर राजा अपने मनमें विचार करने लगा, इतनेहीमें नामदेवजी बोले कि, वह जुलाहा यहां नहीं आवेगा. वह बड़ा घमण्डी और अहंकारी है । राजाने अपने मनमें निश्चय कर लिया कि, वह सत्यभक्ती करते हैं । उनको मेरा क्या भय है ? इसलिये मैं ही उनके पास चलूँ तो अच्छा होगा । राजाने सवारी मँगा बहुतसे मुसाहिबोंको साथ लेकर कबीर साहबके पास गया वहां जाकर क्या देखता है कि, कबीर साहब माला, टोपी, तिलक, कूबरी आदिसे

महान् शोभायमान हो पृथ्वीसे सवा हाथ ऊंचे अधरमें विराजमान हैं, यह देख अपने साथियों सहित राजा आश्चर्यको प्राप्त हो कहने लगा कि, यह तो कोई बड़े अगम्य पुरुष देख पड़ते हैं ! ऐसे पुरुष कभी देखनेमें नहीं आये, पीछे धन्य धन्य कहता हुआ हाथ जोड़कर कबीर साहिबके शरणागत हो सच्चे सुखका अनुभव करने लगा और प्रार्थना करने लगा कि —

छन्द— अस्तुति करत नृप है खडा तुम ब्रह्म निर्गुण आप हो ।

तू अनाथते नाथ कर देव माथ हाथ अनाथ हों ॥

आपनो कर जानि साहब दरश दीन्हें आय हो ।

कीजे कृपा अब दासपर चलो भवन दरश दिखाय हो ॥

सोरठा— कृपा कीन्ह जस मोहिं, तस मन्दिर पग दीजिये ।

विनय करौं प्रभु तोहिं, वेगि विलम्ब न कीजिये ।

सद्गुरु वचन ।

चौ०— कहैं कबीर वहाँ नहि काजा । तैं परचण्ड बघेला राजा ॥

काम कोध मद लोभ बढाई । रोम रोम अभिमान समाई ॥

तूरि सवालख चल सँग तोरे । लाख सवादो प्यादा दौरे ॥

हस्ती चलत सहस दश संगा । निशिदिन भूला काम तरंगा ॥

कञ्चन कलशा महल अटारी । कैसे शब्द गहे नरनारी ॥

हम भिक्षुक जाने संसारा । कौन काज है वहाँ हमारा ॥

वीरसिंह वचन ।

तुम सहाब हौं दीनदयाला । करमवशी जिव आहिं बेहाला ॥

माया तिमिरनयन पट लागी । दर्शन पाई भये अनुरागी ॥

कर सुदृष्टि आपन कर लीजे । दास जानि आयसु प्रभु दीजे ॥

साखी—भक्तराज दाता अहो, कीजे मोहिं सनाथ ॥

हम आधीन चरन तुव चलो हमारे साथ ॥

राजाके बहुत प्रकारसे विनय करनेपर उसकी सच्ची भक्ति देख कबीर साहबने उसके निवेदनको स्वीकार किया । राजाने बड़े उमंगके साथ अपनी सवारी के गजराजपर साहबको बैठा अनेक तरहके बाजों गाजाके साथ राजमहलको ले चला, हाथीपर भी सतगुरुका आसन उसी प्रकार सवा हाथ ऊंचा था जैसा कि, जमीनपर था । राजमहलमें पहुँच कर सब पटरानियोंमें श्रेष्ठ रानी मानौक देईको बुलाकर राजाने कहा कि, प्यारी ! मैंने कबीर साहबको गुरु किया है, ये आदि-पुरुष परब्रह्मके परम भक्त हैं । तुम चरण धोकर चरणामृत लेओ जिससे

सर्व पाप दूर होकर परम सुख प्राप्त हो । रानीने परदेके भीतरसे कहा कि, महाराज ? आप परमज्ञानी विद्वान् हो, इतनी विनय मेरी स्वीकार करिये । गुरु समझ बूझके करना चाहिये, राजाने कहा, प्यारी ! तुम स्त्री हो सत्यभक्ती नहीं जानतीं । कबीर साहेबकी महिमाको कैसे जानो, साहबकी बड़ी महिमा है, स्वयं सर्वशक्तिवान् परमात्माने भक्तरूप होकर दर्शन दिया है । इतना सुन रानीने बड़े आश्चर्य में आ भक्तिपूर्वक सद्गुरुके चरण पखारकर चरणामृत लिया । फिर नानाप्रकारके व्यंजनोंसे सजा हुआ सुवर्ण थाल लगा राजाके साथ साहिबको भोजन कराया । पीछे सद्गुरुके साथ राजा दरबारमें आया, साहबको राजाने ऊँचे सिंहासनपर बैठाया । नामदेवजी प्रथमहीसे वहाँ उपस्थित थे, वे भी साहब के निकट आकर बैठकर पूछने लगे कि, हे साहब ! आपने शब्द कहाँसे पाया वह साहब कौन है जो सबके पार है ? तुम किसका ध्यान करते हो ? मुक्ति कहाँ है ? आप कहाँ सुरति लगाते हो ? किस तरहसे यमयातनासे बच सकते हैं ? मुझसे पृथक् २ वर्णन कीजिये” जब आप ब्रह्मा, विष्णु और शिव जो जीवोंके उद्धार करनेवाले हैं उनको कुछ समझतेही नहीं तो राजाको क्या उपदेश करोगे । चाहे कोई कितनाही करे परन्तु विष्णुकी भक्ति बिना मार्ग नहीं मिल सकता । नामदेवके इतने कहनेके पीछे कबीर साहब बोले कि, हे नामदेव ! जैसे तुम भूले हो मुझे वैसा न समझो “निर्गुण पुरुष सबसे न्यारा है । उसीका सगुण नाम विष्णु है जिसका कि, वेद गुण गाते हैं, ऋषि, मुनि, सब ध्यान धरते हैं पर पार नहीं पाते, सद्गुरुकी कृपासे कोई सन्त जान सकता है ।” तुम जड़ मूर्तिकी पूजा करते हो यह मूर्ति भी उसी की है जो उत्पन्न करता और खा जाता है । इतनेमें सभाके उठनेका समय हुआ, सब लोग अपने अपने घरको गए ॥

दूसरे दिन राजाने शिकार खेलनेकी तैयारी की । “तब राजा अस वचन उचारा, हम संगसाहिब चलो शिकारा ।” आवश्यक समान लेकर रवाना हुआ, कबीर साहब तथा बहुतेक सेनाभी साथमें थी । उस दिन राजाके बहुत परिश्रम करनेपर भी कोई आखेट न मिला, सब बहुत दूर चले गये । थककर पीछे फिरने पर राजाने देखा कि, सब सेना तृष्णासे पीड़ित होरही है, राजाने आज्ञा दी कि, जलका खोज करो कितने लोग तो पीछे भाग गये, कितने इधर उधर झूल गये, कितने जनोंने थककर राजासे आके कहा—महाराज ! पानीका पता कहीं नहीं मिलता, हम लोगोंके प्राण जाते हैं; इतना कह कर सब व्याकुल हो गये यह देख राजा बहुत घबड़ाया, उस समय कबीर साहबने अपनी शक्तिसे नानाप्रकारके सुगन्धित फूलों तथा मिष्ठ सुरत फलोंसे लदे वृक्षों सहित एक ऐसा उपवन प्रगट

किया, जिसके कि बीचमें बहुत शुद्ध मीठे जलका एक सरोवर भरा हुआ था, मन्द सुगन्ध वायु चल रही थी जहाँ जानसे आत्मा प्रफुल्लित होती थी । फिर साहबने राजासे कहा ऐ राजा ! यहाँसे उत्तर की ओर देखो। कौसी उत्तम फूलवारी और ठण्डे जलसे भरा हुआ सरोवर दिखाई पड़ता है । राजाने कहा, महाराज ! आप यह क्या कहते हैं ? सहस्रों वर्षसे यह बात प्रसिद्ध है । मुझे भी प्रायः अनुभव हुआ है कि, इस पहाड़पर कहीं जल नहीं है आप ऐसी बात न कहिये जो सुनेगा वह हँसेगा एवं कहेगा कि, सद्गुरु झूठ बोलते हैं । उस समय राजाके प्रधानने राजाको समझाया कि, महाराज ! सद्गुरुके बचनको झूठ न जानिये, जो कहते हैं सो कीजिये। इसपर राजा सद्गुरुको दण्डवत् प्रणाम करके सेना सहित इधर उधर जल ढूंढ़ता हुआ उत्तरकी ओर चलता हुआ एक ऐसी जगह पहुँचा जहाँ सद्गुरुके बताये हुये उपवन और सरोवर सुशोभित थे ! वहाँ आम, दाड़िम, केला आदि नाना प्रकारके फलोंसे लदे हुये वृक्ष लगे हुए थे ! जिन्हें कि देखतेही चित्त प्रफुल्लित हो उठता था बार बार सद्गुरुको दण्डवत् नमस्कार करता हुआ धन्यवाद देने लगा कहा कि, हे सद्गुरु ! मेरा अपराध क्षमा करो, भविष्यतमें आपका बचन कभी उल्लंघन न करूँगा । सद्गुरुकी आज्ञा पाय सेना सहित फल फूल इत्यादि खाय जल पीकर शान्त हुआ 'तृषा सबनकी बुझिगई ऐसा निर्मल नीर' कबीर साहबने कहा कि, हे राजन् ! अब चलो, तब राजा कबीर साहबको हाथीपर सवार कराकर आपभी सवार हो सेना सहित राजधानीको चला । थोड़ी दूर आगे जाकर पीछे फिरके देखनेसे उसी स्थानपर जहाँ कि तलाव और बाग था, धूलही उड़ती हुई दिखाई दी ।

धन्य कबीर सरोवर रची, छूतहिं लीन जवाय ॥

जहंको जलले आयऊं, तहंको दीन पठाय ॥

सब लोग नगरमें पहुँचे, राजाने अन्तःपुरमें जाकर रानीसे आखेटका सब वृत्तान्त कहा । रानीने अत्यन्त श्रद्धा प्रेमके साथ सद्गुरुको दण्डवत् किया, राजाने साहबकी दीक्षा ली । पीछे राजाने सद्गुरुसे कहा कि, हे प्रभु ! मुझे अपना लोक दिखाइये । राजाको लेकर सद्गुरु सत्यलोकको चले, मार्गमें यमदूतोंने आकर राह रोकी और कहा कि, आप राजाको लेकर कहाँ चले ? कबीर साहबने दूतोंको समझाया कि, यह जीव सत्य पुरुषका स्वरूप पागया है । इतना सुनतेही यमदूत भाग गये, तब राजा वीरसिंहको सद्गुरु सब लोक दिखाने लगे, सत्य लोकको लेगये, वहाँ सत्यपुरुषका दर्शन कराया । राजा वहाँकी आनन्दशोभाको देखकर अत्यन्त मोहित होगया, यहाँ तक कि, जब सद्गुरुने उसे पीछे चलनेको

कहा, तब सद्गुरुके चरणोंपर पड़कर विनय करने लगा कि, हे प्रभु ! मुझे यहाँ ही रहने दीजिये । तब सद्गुरुने समझाया कि, जब तुम्हारी आयु पूरी हो जावेगी तब यहाँ आकर वास करना । पृथ्वी पर आकर राजाने सद्गुरुसे कहा, हे बन्दी छोर ! अब तक मैं यही जानता था कि, जैसे और सब साधु हैं वैसे आपभी हो परन्तु अब जान लिया कि, आप साक्षात् सत्यपुरुष सर्वशक्तिमान् निर्वाण स्वरूप हो, हे स्वामिन् ! जिस प्रकार मेरे ऊपर कृपा की उसी प्रकार मेरे पुरुषोंको, जो अनेक प्रकारके पाप कर्मोंको करते हुए मृत्युको प्राप्त हुए हैं उन पर भी करिये । सद्गुरुने दया करके राजा सहित अनेक जीवोंका उद्धार किया, यह काल्पनिक नहीं किन्तु ऐतिहासिक बात है ।

नौबाब बिजलीखाँ ।

नौबाब बिजलीखाँबोध नामक ग्रंथ तो मेरे पास नहीं पहुँचा परन्तु यह महाशय कबीर साहबके सुप्रसिद्ध शिष्योंमें एक हैं ये राजा बड़े प्रेमी भक्त और सत्यगुरुसे बड़ा अनुराग रखते थे । मैंने सुना है कि, कबीरसाहबके समयके लिखे हुये ग्रंथ अबतक उनके घरमें पाये जाते हैं । बिजलीखाँके घरानेके लोग सत्यगुरु की भक्ति करते हैं । जहाँ कबीर साहबकी समाधि बनी है वहाँ एक ओर हिन्दू और दूसरी ओर जो मुसलमान शिष्य बिजलीखाँके घरानेके लोग हैं ! दोनों सत्यगुरुका गुण गाते हैं । इसके अतिरिक्त उस देशमें सहृदयः मुसलमान कबीर साहबके भक्त हैं, जो मद मांस आदि निषिद्ध कर्मोंसे सदाही वर्जित हैं, हिन्दू-वैष्णवोंके समान आचार व्यवहार रखते हैं साधुओंसे परम प्रीति करते हैं । गुरु साहबकी बाणीपर पूरी श्रद्धा रखके बड़े प्रेमके साथ नित्य नियमसे पाठ करते हैं । कबीर पन्थके इतिहासमें उनका नाम बड़े आदरके साथ लिया जायगा । कबीर साहिबने इसीके राज्यमें शरीर छोड़ा है, वहाँ बीरसिंह इनकी दो दो चोंचें भी हो गई हैं ।

रविदास ।

जिस समय रविदासजीने कबीर साहिबसे बाद विवाद किया उस समय रविदासजीने अपने मनमें सोचा और समझा कि, मैं जिनको मानता हूँ जिन पर भरोसा रखता हूँ वह तो उस योग्य नहीं हैं । मैं भ्रमसे उसे मानता था । वह सब तो स्वयम् बंध और विवश हैं, मुझको क्या बचा सकते हैं । वाद विवादके अन्तमें रविदासजी कबीर साहबके चरणोंपर गिर कर शिष्य हो गये । इसी प्रकार सहस्रों जब अपनी अपनी मूर्खता तथा अज्ञानतासे विज्ञ हुए भली भाँति समझ लिया तब उनके मनका भ्रम टूट गया उन्होंने कबीर साहबकी शरण ली । यह

बात केवल यह तुच्छ वास तथा अन्यान्य कबीर पन्थी ही नहीं कहते वरन् अन्यान्य जातिके लोग भी लिखते चले आ रहे हैं । देखो किताब "तजकिरा गौसिया २५६ पृष्ठमें" रविदासजीके कबीर साहबका शिष्य होनेका हाल लिखा हुआ है, कितने मुसलमानी धर्मके प्रतिष्ठित महात्मा कबीर साहबकी श्रेष्ठता प्रगट करते आते हैं ।

हस्तावलम्बिनी कञ्जरी ।

कबीर कसोटीमें लिखा हुआ है कि, जब साहबके माहात्म्यकी प्रसिद्धि देश देशमें हुई, लाखों सेवक और शिष्य होगये । पन्थ भली भांति पृथिवीपर प्रचलित हुआ, समीपमें बड़ी भीड़ रहने लगी, उस समय साहबने एक ऐसा अनुपम कौतुक किया कि जिसके देखने तथा सुननेसे समस्त काशी नगरीमें हँसी हुई और प्रशंसाके स्थान आपकी निन्दा होने लगी ।

उपरोक्त घटना सम्बत् १६४५ विक्रमी फाल्गुन सुदी पूर्णिमासीमें है, होलीका दिवस था । उस दिवस कबीर साहब एक बगलमें कञ्जरी, दूसरीमें रविदास भगतको लेकर अपने हाथमें गङ्गाजल भरी हुई बोटल लिये हुए बाजार में से चले । यह कौतुक देखकर बनारसमें बड़ा ठठठा पड़ा, अच्छी धूल उड़ी । चारोंओरसे कबीर साहबकी हँसी मसखरी होने लगी । अब प्रथम उस कञ्जरीका वृत्तान्त सुनो । पूर्वकालमें सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि इत्यादि सभी भक्तोंकी भूमि पर भजन किया करते थे । कारण यह कि, भक्तोंका ऋषीश्वरोंकी तपस्याकी जगह बहुत दिनोंसे चली आई है । एक समय ऋषीश्वर भजन कर रहे थे उसी समय एक बरवर्णिनी अप्सरा आकाशसे उतरी, उसने चाहा कि, मैं इन ऋषीश्वरोंकी परीक्षा करूँ कि, इनको काम सताता है अथवा नहीं ? वह भड़कीले वस्त्र पहनकर लटकती मटकती तपस्वियोंके निकट गई । उन लोगोंने अपने तपके प्रभावसे जान लिया कि, यह दुष्टा हमारी तपस्या नष्ट करने आई है । तब उन लोगोंने उसको शाप दिया कि, तू कञ्जरी हो जा । कारण यह कि, तू हमारा धर्म बिगाड़नेको आई थी । यह शाप सुनकर वह अप्सरा डाढ़ें मारमारकर विलाप करने लगी । उसका हृदयवेधक रोना सुनकर परम दयालु दीनबंधु सद्गुरु कबीर साहब प्रगट हो गये, उससे कहा कि, तू मत रो धैर्य धर, मैं तेरी मुक्ति करूँगा ऋषीश्वरोंका वचन तो सत्य होगा परन्तु तू काशीमें (मेरे समयमें) कञ्जरी होवेगी । यह वही अप्सरा थी जो काशीमें कञ्जरी हुई । इसको साथ लेकर कबीर साहब काशीके बाजारोंमें घूमे तब बनारसके लोग ठठठा करने और ताली बजाने लगे । संन्यासियों तथा ब्राह्मणोंका भली प्रकार दौव घात लगा । बड़ा उपहास तथा निन्दा

करने लगे। जो बड़े बड़े अच्छे वणव सन्त थे वे शिर झुकाकर यही करते कि, ऐसे महात्माका चरित्र समझमें नहीं आता, कितने कुछ और कितने कुछ कहते थे। इसी अवस्थामें कबीर साहब काशिराजके दरबारमें गये, राजाने देखकर सिर नीचा कर लिया। कबीर साहबकी यह अवस्था देखकर बहुतसे शिष्योंका विश्वास ढीला हो गया। ब्राह्मण तथा संन्यासी तालियाँ बजाते हुए कहते थे कि, देखो चार दिनोंके वास्ते कबीर भी भक्त बन बैठे था अब अच्छी कलई खुलगई। कबीर साहब राजा बनारसके सामने इसी स्वरूपमें गये, राजाको शिर झुकाये देखा कि, झट उस बोटलका जल अपने पैर पर ढरका दिया। यह बात देखकर राजाको भय हुआ कि, कहीं साहबने रुष्ट होकर यह जल अपने पैरोंपर तो न ढरकाया हो, राजाने पूछा कि, महाराज? इसका क्या कारण है कि आपने यह जल डाला। रविदासजीने उत्तर दिया कि, जगन्नाथपुरीमें अटकाटूटकर पण्डेके पगोंपर गिर पड़ा, उसका पाँव बहुत जल गया है, इस जलसे कबीर साहबने आरोग्य किया है। उसके पाँव पर यह जल डाल दिया इसके पड़तेही वह अच्छा हो गया है। यह बात सुनकर राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ कि, जगन्नाथपुरी तो काशीसे बड़े अन्तर पर है, वहाँ पहुँच कर कबीर साहबने पण्डेका पैर कैसे चढ़ा किया। उसी समय राजाने दिन तारीख और समय लिख लिया। अपना सौड़नी सवार जगन्नाथपुरी को भेजा कि वह जाकर ठीक २ समाचार लावे। उस समय शाहसिकन्दर लोदी भी काशीमें उपस्थित था, उसनेभी अपने शीघ्रगामी सौड़नी सवारको यह वृत्तान्त जाननेके निमित्त भेजा जिसमें इस बातका भली प्रकार निश्चय हो। दोनों अधीश्वरोंके सौड़नी सवार जगदीशपुरीमें जा पहुँचे, वे उस पण्डेके पास जिसका पाँव जला था गये तो देखा कि, वहाँ कबीर साहब बैठे हैं। सवारोंने कबीर साहब को नमस्कार किया पण्डेसे सब वृत्तान्त पूछा कि, कैसे तुम्हारा पाँव जला एवं किस प्रकार अच्छा हो गया? पण्डेने बताया कि, मैं ठाकुरको भोग लगानेके लिये अटके प्रस्तुत करता था, वह फूटकर मेरे पैर पर पड़ा, मैं जलने लगा, महाराज कबीर साहबने मेरे पाँवपर जल डाल दिया। उस समय मैं चढ़ा हो गया। यह बात सुन पण्डेसे पत्र लिखवाकर दोनों सवार बनारसमें पहुँचे। राजा वीरसिंह तथा शाह शिकन्दरके हाथोंमें दोनोंने पंडेका पत्र दिया, उन्होंने पढ़ा। सवारोंने प्रगट किया कि कबीर साहब तो जैसे यहाँ थे वैसेही पुरुषोत्तमपुरीमें उपस्थित हैं, उनका भेद कुछ जाना नहीं जाता? यह बात जानकर राजा तथा बादशाह दोनोंको विश्वास हो गया। राजा वीरसिंहके मनमें बड़ा भय उत्पन्न हुआ कि, मुझसे महाराजकी अप्रतिष्ठा हुई। अब मैं क्या करूँ किस प्रकार अपना दोष क्षमा