कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
चौथे अध्याय—ब्रह्माने नारदसे कहा कि, हम तीनोंने इस महामायाके समीप जानेका उद्योग किया, इतनेमें एक विमान आकाशसे उतरा, उस विमानसे सहस्रों प्रकारकी स्त्रियोंको उतरती देखकर हम तीनोंको अत्यन्तआश्चर्य हुआ, उनमें कोई पुरुष नहीं था, सब स्त्रियाँ थीं, तब हम तीनों देवताओंने स्त्रीरूप धारण कर लिया, हमभी उन स्त्रियोंके बीचमें गए, उनका सौन्दर्य हमारे कथनसे बाहर है, इस महामायाको बड़के पत्तेपर सोया देखकर हम उसके चरणोंके समीप गए, तब समस्त स्त्रियोंने हमारी ओर देखा, उनको हमारे स्त्री होनेका ज्ञान नहीं हुआ। तब श्रीमहामाया मुसकराई, और प्रसन्न हुई, उस समय उस महामायाके चरणोंके नखोंमें एक कौतुक दिखलाई दिया कि, जैसे दर्पणमें मूर्तिका प्रतिबिम्ब दिखलाई देता है। वैसेही इसमें अनगिनती ब्रह्माण्ड और अनगिनती वृक्ष और पर्वत और अनगिनती ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, इत्यादि देखे बरुण, वीर त्वष्टा, विश्वआत्मा नारद, ऋषि, मुनि, गंधर्व, अश्विनीकुमार, सहस्रों प्रकारके नाग, वैकुण्ठ, स्वर्ग, पाताल और विष्णुकी नाभिकमलमें ब्रह्मा भी देखा, मधु कंटभकी लड़ाई भी देखी, इस मायाका पारपाया नहीं जाता। इस प्रकार सौ वर्ष पर्यन्त हमने मेधासमुद्रमें कौतुक देखा, इस कौतुक देखनेके उपरान्त विष्णु महाराज देवीकी स्तुति करनेको दंडायमान हुए कि, हे महामाये सच्चिदानन्द रूपिणी ! मैं तुमको नमस्कार करता हूँ कि, समस्त पृथ्वी आकाश पर्वत और जलके बीच आपही समा रही हो। हे मातः ! यह महाज्ञान हमको आपके चरणोंके प्रतापसे हुआ, समस्त कर्तव्याकर्तव्यको मैंने जाना, आपके चरणोंके प्रभाव विना किसीको ज्ञान नहीं होता, संसारमें यह बात स्तब्ध है कि विष्णु विना और दूसरा कोई नहीं, परन्तु आपके चरणोंके प्रभावसे यह ज्ञान मुझमें उत्पन्न हुआ, हे मातः ! जिस समय मुझको नींद आगई थी उस समयभी तुम्हारी कृपासे मधु कंटभका नाश हुआ, ब्रह्माकी रक्षा की थी। इस संसारमें देवता और मनुष्य जानते हैं कि, विष्णु पालन करता है। परन्तु विना आपके मुझको पालनेका सामर्थ्य नहीं है। हे मातः आपके नखोंमें अनेक ब्रह्मा और अनेक विष्णु और अनेक रुद्र इत्यादिको देखकर मेरी बुद्धि चक्कर खागई, अब मुझको ज्ञान हुआ कि, मैं स्त्रीरूप होकर सर्व आपकी सेवा किया करूँ।
पाँचवाँ अध्याय—विष्णुके उपरान्त शिवजीने बड़ी स्तुति की कि, हे मातः ! जो कुछ है सो सब तेरी लीला है। तेरे विना हम कौड़े मकोड़ेके समान भी नहीं, तेरीही कृपासे मैं जगत्का संहार करता हूँ। जब शिवजीने स्तुति की तब महामाया के मुखसे एक मंत्र निकला, उसको शिवजीने याद करलिया, उसके कारण प्रत्येक स्थानपर शिवजीको महामायाकी मूर्ति दिखलाई दी। फिर नारदजीने स्तुति की
६ अध्याय कुछ लीलाएं
छठवाँ अध्याय—तब महामाया मुसकराकर बोलीं, कि ऐ देवताओ ! तुममें और मुझमें कुछभी विभिन्नता नहीं, जो विभिन्नता मानता है वह नरकमें जायगा, ब्रह्मा और विष्णु और शिव सब मैं हूँ अन्य कोई नहीं, इस समस्त जगत्का कारण मैं हूँ । मैंने भिन्न भिन्न कार्योंके निमित्त अपने पृथक् २ नाम रखे हैं । समस्त वेद तथा शास्त्रोंमें मेरे पृथक् पृथक् नाम हैं । मेरीही कामनासे उत्पत्ति स्थिति और प्रलय सब कुछ है । ब्रह्माने महामायाकी स्तुति करके नवार्ण मन्त्र पाया । ब्रह्मा विष्णु और शिव तीनोंको उत्पत्ति स्थिति और विनाशके मन्त्र बतलाकर, महालक्ष्मी महाकाली और महासरस्वती विमानारूढ होकर अन्तर्धान हो गईं । ब्रह्माजीने नारदजीसे कहा कि, ए पुत्र ? तू समझ ।
सातवें अध्यायमें—ब्रह्माने नारदको निर्गुण और सगुणका समस्त रहस्य बतलाया । यह ब्रह्मा मायासे उत्पन्न हुवा । मायाही ब्रह्माका गुरु और पथदर्शक है । महामायाका उपदेश ब्रह्माको मिला ब्रह्माका उपदेश ऋषीश्वरोंको मिला । ऋषीश्वरोंका उपदेश समस्त जगत्को मिला । यह जगत् मायाका बन्धन है । काम क्रोधादिकी कामनाओंसे कलुषित हुआ है । ब्रह्मलोक कैलास आदिक सभीमें मायाका कौतुक है । अन्धा मनुष्य इसीमें भूल रहा है, यथार्थकी ढुढ़ाई कौन करे कि, वह क्या है ? जब ब्रह्माही बेसुध हुआ तो दूसरा कैसा सूचना पावे ? प्रत्येक मनुष्य बड़ोंसे सूचनाएँ पाते हैं । हमारा प्रपिता अति अज्ञानवश मायाके चक्करमें पड़ा डुबकियाँ खारहा है । मायाको समस्त संसारका बीज समझकर उसकी पूजामें संलग्न है तो अपनी सन्तानोंको क्यों न बही पथ बतावे । ब्रह्मा वेद पढ़ २ करभी मायाकी नदीमें डुबकियाँ खारहा है । इसी कारण मनुष्योंका हाथ पकड़नेके निमित्त तथा उनको मुक्तिपथ बतलानेके अर्थ किसी दूसरे गुरु तथा पथदर्शककी आवश्यकता है । ब्रह्मा तथा कर्मकी पथदर्शकताही अज्ञानी हम लोगोंके लिये बहुत नहीं है । ब्रह्मा बेचारा मुक्तिमार्गको क्या जाने उसकी पहुँच तो वेद ही पर्यन्त है । महामाया यथार्थ रहस्यको ब्रह्मासे कदापि न बतलाती । अपने भीतरसे बाहर न निकालती । पर ब्रह्मा इस भेदसे नितान्त ही अनभिज्ञ था, इस कारण माया उन सबोंसे श्रेष्ठ है । ब्रह्मा उसके अधीन है, सदैव उसको इस संसारके प्रबन्धका सोच करता है । जैसे प्रत्येक गृहस्थ अपने बाल बच्चोंके सोचमें रहता है वैसेही ब्रह्मा इस जगत्के विचारोंमें रहा करता है । यदि वह जानता कि, मैं क्या हूँ अथवा जगत् क्या है तो समस्त शंकाओंसे निवृत्त होकर अपने यथार्थ अंशकी ओर ध्यान देता । जब उसको अपने यथार्थ अंशसे मिलनेका ध्यान होगा तब वह निश्चय जगत्को तुच्छ मानेगा । फिर उसकी ओर वह दृष्टिपात भी नहीं करेगा । यह बात नहीं है,
यह उसी सत्य पुरुषकी आज्ञाका पालन कर रहा है तथा मोक्ष तक पालन करता रहेगा ।
शिवजी महाराजकी कथा ।
शिवजी समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ हैं । सबके अग्रणी हैं, विष्णुके समान शिवजी की पूजा भी तीनों लोकोंमें हुआ करती है, पुराणों तथा समस्त शास्त्रोंके देखनेसे विशेषतः शिवपुराणसे आपकी श्रेष्ठता तथा बड़ाई प्रगट होगी, ये शिवजी जगत्के संहार करनेवाले हैं; बड़े वीर तथा साहसी हैं ॥
वाम मार्ग ।
वाममार्ग एक तरहका शिवका धर्म है । इस धर्ममें जाति पौत्तिका तनिक भी ध्यान नहीं किया जाता है । मंदिरा मांस मछली इत्यादि खाते पीते हैं । अघोर धर्म और अघोर क्रिया समस्त वाममार्गकी शिक्षासे है । विशेषतः योगी संन्यासी मुहम्मदी और शक्ति धर्मके अनेक प्रकारके मनुष्य सब इस मतमें भूत प्रेत राक्षस जिन्द और परी इत्यादि सब इसीमें हैं । यह पन्थ क्रोध लोभादिकका स्थल है । इस शिवका नाम भू है जिससे भवसागर स्थिर है । भव और भवानी दोनों इस भवसागरके सरदार हैं । प्रथम में लिख आया हूँ कि, उत्पत्तिके पूर्व महामाया तीनों भाइयोंको एक कौतुक दिखलाया कि, उन्होंने रक्तसे भरी हुई एक नदी देखा उसमें दुर्गन्धिसे भरा हुवा कूड़ा करकट देखा । इसे देखकर ब्रह्मा और विष्णु तो भाग गए परन्तु शिवजीने उसको चूतड़ोंके नीचे रखकर उसका आसन बना लिया । इस दुर्गन्धिमेंसे आदिभवानी निकल पड़ी वह शिवसे प्रसन्न हुई । शिवको अपना निजका किया । इस कारण भू और भवानी दोनों भवसागरके मूलही ठहरे । समस्त सौंसारिक वासनाएँ आपको भली जान पड़ीं । यह तमोगुण अज्ञानका मूल है । शिवजी क्रोधकी प्रतिमूर्ति हैं । जब तमोगुणी बुद्धि मनुष्यमें आती है तब समस्त कार्य सत्तोगुणके विरुद्ध करता है । तमोगुणी, मुक्ति एवं सत्तोगुणके विरुद्ध है । जब तमोगुण विजयी होता है तब मनुष्य भौति २ के दुष्कर्मों में फँसता है; उसका फल जो है सो संसारमें प्रगट है ॥
श्री कागभुसुण्डिकी उत्पत्ति ।
वसिष्ठ संहितामें अर्थवाद लिखा है कि, शिवजीके साथ अनेक स्त्रियाँ थीं वे समस्त देवियाँ कागके स्वरूपमें थीं । शिवजी विशेषतः पार्वतीजीसे प्रेमसंबंध जोड़ते हैं कारण यह कि, पार्वतीजी अत्यंत सुन्दरी तथा धर्मिष्ठा थीं । इस कारण अन्यान्य देवियाँ शिवजीसे विरुद्ध तथा पार्वतीजी को बँरिन होगईं । तब इनसबोंने आपसमें परामर्श करके एक दिवस पार्वतीजीको मार डाला । उनका सार पकाया
भैंसेसे वेदपाठ
पार्वतीके हाथ पावोंको काटकर समूचा रख लिया था । वह सार खानेके निमित्त शिवजीके सामने धर दिया । पार्वतीके कटे हुए हाथ पाँव भी साथही सामने रख दिए । वह पार्वतीका हाथ पाँव देखकर शिवजी अत्यंत दुःखी हुए कि, इन सबोंने पार्वतीको मार डाला, जब इन देवियोंने शिवजीको अत्यंत दुःखी देखा तब पार्वती को इन सब देवियोंने पुनः जीवित किया । पार्वती जैसे पूर्व थीं वैसेही पुनः शिवजी के पास बैठ गईं । तब शिवजी उन देवियोंसे नितान्तही प्रसन्न हुए । उन सबोंके साथ दृष्टिभोग किया वे सब गर्भवती हो गईं और उन देवियोंसे पुत्र उत्पन्न हुए । सो सब अपनी माताकी सूरतके थे । वे सब बच्चे तो अपना २ वय पूरा करके मर गए । परन्तु उनमेंसे एक कागभुसुंडी अमर हो गया । वह सदैव जीवित रहता है, महाप्रलयमें भी नहीं मरता, वह नीलगिरि पर्वतपर रहता है और बड़ा प्रसिद्ध ज्ञानी है ।
देवीभागवतके सप्तम स्कंधके तीसवें अध्यायमें लिखा है, कि एक बेर दुर्वासा ऋषि हाम्बूनदीश्वरी भगवतीका दर्शन करनेको गए । माया बीज मंत्रको जपा, तब भगवतीजीने हर्षितहोकर अपने गलेकी माला उतारकर दुर्वासाजीको दे दी, वह माला पहनकर दुर्वासाजी राजा दक्षजीके घर गए, सतीजीको दंडवत् प्रणाम किया, तब राजा दक्षने दुर्वासा ऋषिसे प्रार्थना करके वह माला माँगली । अपने गलेमें पहनकर रात्रिके समय राजाने वह माला उतारकर अपने पलँगपर रख दी और अपनी स्त्रीसहित इस पलँगपर लेट रहा । उस मालाकी अप्रतिष्ठा होनेके कारण भगवतीजी अत्यंत क्रुद्ध हो गईं । राजा दक्षकी बुद्धि भ्रष्ट होगई, वह शिवजीसे वैर करने लगा । सतीजीने राजाको शिवका विरोधी देखकर अपनेको अग्निकुण्डमें भस्म कर दिया । सतीजीके भस्म होनेसे शिवजीका क्रोध ऐसा भडका और शिवजीके शरीरसे ऐसी अग्नि बहिर्गत हुई कि, मानों वह तीनों लोकको भस्म किया चाहती है । इस अग्निमेंसे वीरभद्र उत्पन्न हुआ, वह वीरभद्र कालीके गणमेंसे था । इस वीरभद्रके तेजको देखकर समस्त देवता भयभीत हुए । शिवजी के शरण आए । तब शिवजीने कहा तुमको उससे कुछ भी आपत्ति नहीं तुम भयभीत न हो और वीरभद्रको आज्ञा दी कि, तुम राजा दक्षके गृह जाओ, उसको अपना भय दिखलाओ । वह वीरभद्र राजाके घर गया उसका शीश काट डाला । शिवजीने राजाके यज्ञके स्थाममें जाकर सतीजीके शवको राजाके यज्ञकुण्डसे निकाल लिया । अपने कंधेपर रखकर ढाढ़े मार २ कर रोने लगे, हाय सती ! हाय सती ! ! पुकारने लगे । ब्रह्मासे लेकर समस्त देवतागण चिन्तित हुए । शिवजी उस शवको अपने कंधेपर धरे रोते हाय सती ! हाय सती ! ! पुकारते विदेशको
जहांगीर, रामदास
चले । उस समय श्रीविष्णु भगवान् अपना तीर धनुष लेकर शिवजीके पीछे चले जहाँ २ शिवजी गए, वहाँ २ विष्णु भी गए। अपने तीर धनुषसे सतीजीके शरीरको तोड़ते गए । जिन २ स्थानोंपर शतीजीका शरीर गिरा उन उन स्थानोंपर मूर्तियाँ उत्पन्न होगईं । उन स्थानोंपर जो कोई तप जप करे शीघ्र सिद्ध हो जाता है । एक सौ आठ स्थानोंपर वह देह टूट २ कर गिरा, सो समस्त सिद्धस्थान होगा । उन स्थानोंपर लोग मंत्र इत्यादि सिद्ध करते हैं वे शीघ्र सिद्ध पाते हैं और तुरंत सिद्ध हो जाते हैं ।
फिर भोलानाथ महाराजने भस्मासुरको वरदान दिया कि, जिसके शीश पर तू हाथ धरेगा वह तुरन्तही भस्म हो जावेगा । इस दैत्यने चाहा कि, मैं शिवही को भस्म करके पार्वतीको लेलूँ । तब उसके भयसे शिवजी भागे । तब विष्णुने आपका प्राण रक्षा की और भस्मासुरको भस्म किया । इसलिये उस दिनसे वैसे वरदान नहीं देते । ये शिव बड़े दयालु हैं, वर आदि शीघ्रही देदेते हैं ।
निरञ्जनके चार दूत ।
कबीर साहबका वचन है कि, चार दूत सदैव निरञ्जनके दरबारमें उपस्थित रहते हैं, जो आज्ञा तथा उपदेश होते हैं उन्हें तुरंत कार्यमें परिणत करते हैं, समस्त कार्यवाहियाँ तथा काम धाम उन्हींकी आज्ञानुसार होते हैं । ब्रह्मा विष्णु शिव और यम इन्हींको अरबी भाषामें जिव राईल, मेकाईल, इसराफ़ील और इज़राईल कहा है । इसलामके हदीसोंमें इनका विवरण सविस्तार रूपसे किया गया है । परन्तु मैं संक्षेपतः लिखता हूँ कि, हदीस रसूल राबी इब्र अब्बासकी कहावत है कि, जगदीश्वरने आकाशमें अनगिनती देवता बनाए हैं । इनमें चार देवता बड़े हैं । प्रथम जिंवराईल । दूसरे मेकाईल । तीसरा इसराफ़ील । चौथा इज़राईल । इन चारोंको परमेश्वरने पृथक् कार्योंपर नियुक्त किया है । वे सदैव परमेश्वरके अधीन रहते हैं ।
हजरत जिंवराईलका यह काम है कि, जो परमेश्वरकी आज्ञा हो वह पैगम्बरोंके पास पहुँचाया करे । मेकाईलको यह कार्य सौंपा गया कि, वह वृष्टि कर । समस्त संसारको भोजन पहुँचाया करे । इसराफ़ीलके हाथमें नरसिंघा है कि, परमेश्वरकी आज्ञासे फूँके । उसके शब्दसे महाप्रलय हो जाता है । इज़राईल को आत्मा निकालनेकी आज्ञा है । जब इसराफ़ील उत्पन्न हुआ तब परमेश्वरसे बल मांगा कि, सबसे मुझमें अधिक बल हो। निदान समस्त जीवोंसे इसराफ़ीलमें बल विशेष है । जो माँगा सो परमेश्वरने प्रदान किया । इसराफ़ील के शरीरमें जितने बाल हैं प्रत्येकबालमें सहस्रों मुँह और प्रत्येक मुँहमें एक २ लाख जिह्वा
कमाल कमालीका जिलाना
हैं । प्रत्येक जिह्वाद्वारा परमेश्वरका गुणानुवाद करता है । प्रत्येक जिह्वासे एक दममें दश लाख नाम लेता है । प्रत्येक मालासे दशलाख देवता उत्पन्न होते हैं । वह भी परमेश्वरके गुणानुवादमें संलग्न होते हैं । उन समस्त फ़रिस्तोंकी सूरत इसराफ़ीलकी तरह है । उन समस्त फ़रिस्तोंका नाम परमेश्वरने मुकर्रंब रक्खा है ।
करामन कातबीनकी पुस्तकमें लिखा है कि, इसराफ़ील सदैव दुःखी रहता है । उसके नेत्रोंसे सदैव अश्रुधारा प्रवाहित रहती है और इतने आँसू चलते हैं कि, यदि वह समस्त जल एकत्रित किया जाता तो समस्त सृष्टि डूब मरती । इसराफ़ीलका क्रद इतना बड़ा है कि, यदि नूहके समयकी बाढ़का समस्त जल उसकी पीठपर डाला जावे तो वह समस्त जल उसकी पीठपरही सूख जावे और पृथ्वीपर न पहुँचे ।
इसराफ़ीलकी उत्पत्तिके पांच सौ वर्ष उपरान्त मेकाईल उत्पन्न हुवा । मेकाईलके दश लाख नेत्र हैं । परमेश्वरके भयसे सदैव रोया करता है । उसके प्रत्येक नेत्रसे सत्तर २ सहस्र धाराएँ आँसुओंकी बहती हैं जितनी बूँदें होती हैं, प्रत्येक बूँदसे परमेश्वर दश २ फ़रिश्ते उत्पन्न करता है । और वे समस्त फ़रिश्ते मेकाईलकी सूरतके होते हैं । वे सब सदैव परमेश्वरकी वंदनामें लगे रहा करते हैं । उन समस्त फ़रिस्तोंका नाम करीबी है उन समस्त फ़रिस्तोंका यह कार्य है कि, सबको रोजी पहुँचाया करें । पृथ्वीपर जितने अनाज और फल हैं प्रत्येकपर मेकाइलका एक चौकीदार फ़रिश्तः रहता है । ऐसे वृक्षका फल कोई नहीं जिस पर कि, मेकाईलका एक फ़रिश्तः न हो ।
जब पाँच सौ वर्षका वय मेकाइलका होचुका तब परमेश्वरने जिबराईल को उत्पन्न किया । और छः लाख डहने आपने जिबराईलको प्रदान किए । तीनसौ साठ बार प्रत्येक दिवस वह तेजकी नदीमें डुबकी मारा करता है । जब जब वह गोता मारता है जितनी बूँदें तेजकी उसकी शरीरसे गिरती हैं परमेश्वर उस प्रत्येक बूँदसे एक एक दूत उत्पन्न करता है । वे समस्त फ़रिश्ते जिबराईलकी प्रतिमूर्ति हैं । जिबराईलके आधीन रहते हैं । महाप्रलयपर्यन्त परमेश्वरकी प्रशंसा करते हुए उसीके शोचमें रहते हैं ।
जिबराईलके पांचसौ वर्ष उपरान्त परमेश्वरने इज़राईलको उत्पन्न किया । इज़राईलके उत्पन्न होनेके उपरान्त परमेश्वरने मृत्युको उत्पन्न किया । मृत्युका शरीर बहुत बड़ा पृथ्वीसे आकाशपर्यन्त था । बड़ाही भयानक था । जब पहले फ़रिश्तोंने मृत्युको देखा तो भयभीत होकर अचेत हो गए । सहस्र वर्षपर्यन्त चुपचाप
पुस्तकोंका लिखाजाना
अचेत पड़े रहे। इसराईलको परमेश्वरने इतना बल प्रदान किया कि, उसने मृत्यु को अपने वशमें कर लिया। यमको परमेश्वरने अनगितनी आँखें प्रदान की हैं। उसके चार पर हैं। जितने पृथ्वी तथा आकाश हैं। सबकी और उसकी एक आँख रहती है। जब कोई जीव मर जाता है तब उसकी एक आँख गिर पड़ती है। जब कोई उत्पन्न होता है तब उसकी एक आँख बढ़ जाती है। जब आदम उत्पन्न हुवा था, उसी समयसे मृत्यु उत्पन्न हुई थी।
यह तो मुसलमानी हदीसके अनुसार चारों फ़िरिश्तोंका हाल लिखा गया। पश्चिमदेशीय अम्बिया सहानुभावता प्रकाशित करते हैं। जो नबियों की हदीसे हैं, सूक्ष्म वेदसे कहीं २ मिलती हैं, कहीं २ विभिन्नता भी है। वो उनकी विद्याका दोष है। इसके अतिरिक्त कहनेवालोंने कुछ विभिन्नताकी अथवा लिखनेवालों ने कुछ औरका और लिख दिया परमेश्वरी वाक्य सब ठीक हैं परन्तु समझनेवालों में दोष है। जिनका हृदय कलुषित हैं वे परमेश्वरी वाक्यको समझ नहीं सकते।
यह समस्त संसार हरिण्यकशिपु फिर ऊन (परमात्माका वागी) इत्यादि सद्गुण अंधा और अज्ञानी है। अपनेको अपने कर्मोंका कर्ता तथा भोक्ता जानता है। जबलों यह अपनेको कर्मोंका कर्ताभोक्ता जानता है तबलों यह निश्चय उन तीनों के अधीन रहेगा। यह तीनों उसके परमेश्वर होंवेंगे। जब यह जान लेवेगा कि, मैं कर्मोंका कर्ता तथा भोक्ता नहीं हूँ, तब उसकी भीतरी आँखें खुल जावेंगी। तब यह फिरऊनी प्राणसे दूर भागेगा। सुतरां मूसाकी दूसरी पुस्तक खिरोजनामकका (७) वाब।
(१) फिर खुदावन्दने मूसासे कहा कि, देख मैंने तुझे फ़िरऊनके निमित्त परमेश्वरसा बनाया तेरा भाई हारूँ तेरा अनागतवक्ता होगा। (२) सब कुछ जिसकी मैं तुझको आज्ञा दूँ कहना। तेरा भाई हारूँ फिर ऊनसे कहेगा कि, बनी इसराईलको अपने देशसे जाने दो। मैं फ़िरऊनके हृदयको दृढ़ करूँगा। इत्यादि।
अब यहां पर दोनों कि, मूसा तो फ़िरउनका खुदा था। हारूँ रसूल अर्थात् भविष्यवक्ता था। इसी प्रकार इस संसारके ये तीन परमेश्वर हैं। समस्त धर्मों के अग्रगण्य भविष्यवक्ता हैं। यह संसारके मनुष्य पशुओं तथा डेंगरू डोरके सद्गुण हैं। ये तीनों इसके चरब हैं और परमेश्वर हैं। क्या भेड़ बकरियाँ अपने चरवाहेके अतिरिक्त और किसी परमेश्वरकी सुध पासकती हैं? कदापि नहीं।
इसी प्रकार अनगितनी ऋषि मुनि अपनी २ सृष्टिके परमेश्वर हैं। यथार्थ परमेश्वरको कौन जान सकता है?
इस सृष्टिकी दृष्टि व्यर्थ और बिलकुल रूढ़ी हुई है । इस कारण यह यथार्थ परमेश्वरको पहचान नहीं सकता ।
जैसे—एक पिपीलिका जो कागज पर फिरती अथवा बँठी हो वह देखती है कि, कागजपर अक्षर बनते जाते हैं । वह केवल लेखनीको देख सकती है विशेष दृष्टि उठावे तो उँगलियोंपर्यन्त देखे । तीन उँगलियोंको उसका कारण जाने । इसमें विशेष देखनेका सामर्थ्य नहीं । कोई बड़ा जीव बाजूपर्यन्त देख सकता है, कोई समस्त शरीर देखता है । कोई आत्माको देखता है, कोई अपने यथार्थ-तत्वसे विज्ञ है ।
कर खाब अपना दूर तू ग़फ़लतको छोड़ जाग ।
हर सिस्त हर मक़ामें लगी देखलीजे आग ॥
आँखोंको खोल आजिज़ उठ जल्द जाव भाग ।
है कामशशीशः एक फ़क़त दूरवीनका ॥
देखो जिधरको जाके तमाशा है तीनका ॥
मनु स्वायम्भूकी कथा ।
देवीभागवतके दशमस्कंधके प्रथम अध्यायमें लिखा है कि, विष्णुकी नाभि-कमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुवा, ब्रह्मासे मनु स्वायम्भू उत्पन्न हुवा । मनु स्वायम्भू क्षीर समुद्रके किनारेपर जा श्रीभगवतीजीकी मिट्टीकी मूर्ति बनाकर एक चरणसे खड़ा हो और बिना अन्नजलके बंदना करते हुए वाक्यबीजमंत्र पढ़ता रहा । अपने श्वास को रोककर वृक्षके सदृश खड़ा रहा । तब श्रीभगवतीजी सौ वर्षके उपरान्त प्रसन्न हो कहने लगीं कि, वरदान माँगो । तब मनुजीने निवेदन किया कि, मेरी इस बंदना में कुछ बिगाड़ न हो । इस बंदनासे मेरी कामना पूरी हो । भगवतीने कहा कि, तथास्तु । इसी मंत्रसे मनुने जगत्की रचना की ।
दशवें स्कंधके नववें तथा दशवें अध्यायमें देखो कि, सब मनु श्रीभगवतजी की पूजा करते रहे और देवीसे वरदान पाकर सांसारिककांक्षाओंको प्राप्त करते रहे यही मानवी सृष्टिके आदि प्रवर्तक हैं ।
राजा इन्द्रकी कथा ।
समस्त देवताओंका राजा इन्द्र है । यह बड़ा ज्ञानी है । समस्त देवता उसकी आज्ञामें रहते हुए सेवा करते हैं । यह इन्द्र कहता है कि, मैं समस्त संसारका सृजन करता हूँ, मुझसे ही उत्पत्ति स्थिति और मृत्यु सब कुछ है । सुतरां ऋग्वेदमें सकलोपनिषदमें लिखा है कि, यद्वात्थ नामक एक ऋषिको राजा इन्द्र वैकुण्ठमें उठा ले गया । तब उस ऋषिने पूछा कि, तू कौन है ? तब इन्द्रने उत्तर दिया कि, तू जप तप
हनुमान्को पान २ सर्वांनन्द तिल घोटकर पिलाना
देवताओंके प्रसन्न करनेको किया करता है। वे तो कुछ भी नहीं हैं, यदि उनमें कुछभी सामर्थ्य होती तो तुझको वे मेरे हाथसे छुडा लेते। (१) जो कर्मोंका फल देता है सो मैं हूँ, मेरे गुण संसारको पालनेवाले हैं। ब्रह्माके चारों मुँहसे यह तात्पर्य समझो कि, मेरे मुँह चारों ओर हैं। निदान तुझको चाहिये कि, किसी ओर ध्यान न कर सब मरनेवाले और मैं अमर हूँ, सबोंकी स्थिति दूसरोंके द्वारा है। मैं अपनेहीसे स्थिर हूँ, यज्ञका फलभी मैं हूँ, वह दूध जो यज्ञको शुद्ध करता है मैं हूँ। (२) वह अग्नि जो यज्ञके द्रव्योंको जलाती है मैं हूँ, समस्त संसारमें मैं हूँ, स्वसे पृथक् मैं हूँ, वर्नर जो सर्पस्वरूप है, पर्वतोंमें रहता है शौतान कहलाता है, नबको भयभीत करता तथा बहकाता है उसका मारनेवाला भी मैं ही हूँ। (३) तुझे उचित है कि, जैसा मेरे जाननेका धर्म है वैसा मुझे पहचान कि, मैं अद्वितीय और एक हूँ, मायाके कारण मेरी भिन्न भिन्न मूर्तियाँ दिखलाई देती हैं। (४) मैं निभंय हूँ, सबके हृदयमें बैठकर जो चाहता हूँ करता हूँ। (५) कोई मेरे यथार्थको नहीं जानता, मैं पृथ्वीमें हूँ आकाशमें हूँ और सबके प्रतिपालनका कारण हूँ, कर्म और यज्ञका करानेवाला मैं हूँ और सृष्टिको उत्पन्न करनेवाला मैं हूँ, समस्त सृष्टिका पिता मैं हूँ, जो ओसकी बूँदे गिरती हैं मैं हूँ, वेद तथा वेदका जानने वाला मैं हूँ। (६) वह अग्नि जो समुद्रमें है मैं हूँ, सूर्य जो बारहों मास यात्रा करता रहता है, वह और चन्द्र भी मैं हूँ। (७) जो कुछ देखने सुनने और बोलनेमें और ध्यान तथा सिद्धान्तमें आता है, अथवा इससे पृथक् है वो मैं हूँ, (८) मुझे अपने मनके गृहमें दूढे तो तू भी निभंय हो जावेगा मैं पाँच और दश और सहस्र प्रकारकी मूर्ति रखता हूँ, जो मुझे समझता है वो मुझसा होजाता है। (९) जो झूठ जानता है, झूठ बोलता है और पाप करता है वो यद्यपि वह सहस्र यज्ञ और जीवनपर्यन्त बंदना करे, अन्न जल शयन इत्यादि सभी त्याग दे, दान पुण्य भी करता रहे, तो भी वह मेरे समीप आने नहीं पाता है। (१०) मैं सबको खाता हूँ, मुझको कोई नहीं खा सकता है। (११) तूने जो बंदना किया और तात्पर्य मुझसे रक्खा, इस कारण मैं तुझको उठा लाया। अब जो मैं हूँ वही तू है। इसमें कोई संदेह न कर। पूर्वकालमें तू अज्ञानी था इस कारण मुझसे पृथक् था, अब तू ज्ञानी है और मुझसा होगया। समस्त संसारका रचयिता तथा पालन कर्ता मेरे गण हैं और भी कितनी ही जगह इन्द्रके ऐसे वाक्य आते हैं—‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस भावसे सत्यपुरुषको याद करता हुआही अपने कार्यमें रहता है।
बृहस्पति और शुक।
देवोंके गुरु बृहस्पति तथा असुरोंके गुरु शुक महाराज हैं। वाणीको
नानकशाहसे दूध मांगना
बूहती कहते हैं । उसके स्वामीको बूहस्पति कहते हैं । इस तरह यह स्वसंवेदके प्रगट करनेवाले सत्य पुरुषका नाम होता है । देवोंको देवगुर स्वसंवेद सुनाते रहते हैं । इस कारण ये भी उसी नामसे बोले जाते हैं । वेद और पुराणोंमें इनके अनेक तरहके आख्यान मिलते हैं । ताराके विषयको लेकर ये विशेष प्रसिद्ध हैं । कहीं २ तारा इनकी स्त्री तथा कहीं उसी प्रकरणमें तारा करके ब्रह्म विद्याका स्मरण किया है । शुक्र तेजको कहते हैं । इससे परमात्माका ग्रहण होता है ये अपने तेज तपस्या तथा दिव्य बलसे दैत्योंको तेजस्वी बनाये रहते हैं । इस कारण ये शुक्र कहलाते हैं ये दोनों सत्यपुरुषके नामोंसे बोले जाते हैं, यदि इनके सूक्ष्म जीवन पर विचार किया जाय तो ये गुरुपनेकी दशामें भी सत्य सच्चिदानन्द सत्य पुरुषके अत्यन्त समीपी प्रतीत होते हैं ।
नारद ।
जहां सच्चिदानन्द भगवान्के अनन्य भक्तोंका प्रसंग आ उपस्थित होता है वहां नारदजीकी खड़ी चोटीकी मूर्ति आ उपस्थित होती है । वेद पुराण कोई भी इनसे बाकी नहीं है । सब जगह इनका कुछ न कुछ प्रकरण अवश्य मिलता है कहीं कहीं तो यह भी लिखा मिलता है कि, यह सत्य पुरुषका मनही है । ज्ञानेच्छुओंको ज्ञान, भक्तिके प्यासोंको भक्ति एवम् लड़ाईके प्यासोंको घोर समर, दिलाना इनका कार्य रहा है । भक्ति से सब साधनोंके उपदेश इन्होंने अपने शरीर पर घटाकर दिये हैं । यहां तक बता दिया कि, सब कुछ जीत कर भी जीतके अभिमानको जबतक नहीं जीता तब तक कुछ भी नहीं है । नारदके मोहके प्रकरण सब इसी बातके उदाहरण हैं । ये सत्य पुरुषके समीपी तथा स्वसंवेदके प्राकट्य करनेवालोंमें एक हैं । शब्दोंसे भगवान्को रिझाने और स्मरण करने का कार्य उन्होंने प्रारंभ हुआ है । नारदीय शिक्षा तथा स्मृति एवम् भक्तिसूत्र आदि इन्होंने बनाए हुए भक्तिपथके परिचायक हैं । कबीरदासजीने भी इन्हें सिद्ध सुरुषोंमें मानकर स्मरण किया है ।
सन्तो मते मात जनरंगी ।
पीवत प्याला प्रेम सुधारस, मतवारे सतसंगी ॥ १ ॥
अर्ध ऊर्ध्व लै भाठी रोपी, ब्रह्म अगिनि उदगारी ।
मून्दे मदन कर्म कटि कसयल, सन्तत चूवे अभारी ॥ २ ॥
सच्चिदानन्द रामके सच्चे उपासक जिनके गुरु हैं ऐसे अथवा सुरति कमलपर बैठकर जो रकार बीजका उच्चारण करते हैं उन सिद्ध पुरुषोंके मुखसे वहाँ सुननेवाले पूरेरंगे पुरुष सन्त पुरुषोंके सिद्धान्तोंमें मस्त रहते हैं । क्योंकि,
गोरख कबीर
सतसंगी पुरुष रामचन्द्रजीकी प्रेमलक्षणा पराभक्तिरूप अमृतके प्यालेको पीते हैं और उसीके नशामें संसारको भूले हुए ध्येयके रूपमें निर्विकल्प रहते आते हैं। और प्रेम मदिरा कैसे तैयार की जाती है ! इस पर कबीर साहिब कहते हैं कि जैसे शराब खीचनेके लिये ऊपर नीचे दो हुन्डे नीचे ऊपर रखकर नली लगाकर खींच लेते हैं, इसी तरह प्रेम मदिरा खींचनेके लिये, ऊपर और नीचेके लोकोंके सारासारका विवेक कि, इनमें सार क्या तथा असार क्या है ! इसे लेकर भाठी-भट्ठी यानी लौरूपी भाठी रोप दी और ब्रह्मके स्वरूपके ध्यानरूपी अग्नि जला दी। मदन-महुआ और कामको कहते हैं जैसे-उन दोनोंमें महुआ भरा जाता है, उसी तरह कामका निरोध करनेपर कर्मरूपी मैलके निकलजाने पर सामनेही बुद्धिरूपपात्रमें निरन्तर चुबाने लगी।
गोरख दत्त वशिष्ठ व्यास कवि, नारद शुक् मुनि जोरी।
सभा बैठि शंभू सनकादिक, तहाँ फिरि अधर कटोरी ॥ ३ ॥
अम्बरीष औ याज्ञ जनक जड़, शेष सहस मुख पाना।
कहलों गिनो अनन्तकोटि लै, अमहल महल देवाना ॥ ४ ॥
इस प्रेम मंदिराको गोरख योगी, दत्तात्रेय, वशिष्ठ, व्यासदेव, शुक्ताचार्य्य और शुक् मुनिने इकट्ठा किया। यानी ये सब प्रेमरूपा पराभक्तिके ही उपासक थे। एवम् वही इन्होंने पूर्वोक्त भट्ठीपर खींची थी। जिस सभामें शंभू और सनकादिक बैठते हैं वहाँ वो प्रेम मदिराकी भरी कटोरी अपर-फिरती रही यानी उसे ये हाथों हाथ पीगये इतना भी सीकीको अवकाश नहीं मिला कि, उसको जमीनपर टेक तो लेता। अथवा जो रस मन वाणीमें न आये पान करते ही सब छक जायें वो रस इन्होंने पिया। अम्बरीष, याज्ञवल्क्य और जडभरत इन्होंने उसे पिया तथा शेषनाग हजार मुखसे पीगये। उस प्रेम मदिराके पीने-वाले अनन्त कोटि हैं जो सत्य पुरुषके सत्यलोकमें भी प्रेममदिरा पीकर अप्राकृत महलोंमें दीवाने बने बैठे हैं। अथवा निर्गुण और सगुण दोनोंसे विलक्षण केवल भक्तोंके लिये ही सब कुछ बने हुए हैं। प्रेम मदिराके दीवाने भक्त उसी सच्चिदानन्दमें निमग्न रहते आते हैं।
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण माते, माती शिवकी नारी।
सगुण ब्रह्म माते वृन्दावन, अनहुँ न छूटि खुमारी ॥ ५ ॥
सुर नर मुनि जेते पीर ओलिया, जिनरे पिया तिनजाना।
कहें कबीर गूंगे को शक्कर, क्योंकरि करे बखाना ॥ ६ ॥
इस प्रेमरूपी मदिराको पीकर ध्रुव प्रह्लाद और विभीषण तथा पार्वती
कमालीका ज्ञान
मतवाले हो गये । इस पराभक्तिरूपा प्रेम मदिराका नशा यहाँतक बड़ा कि, गोपियोंकी पी हुई प्रेममदिराके वश हो संगुण ब्रह्म भगवान् कृष्ण दीवानी गोपियोंके पीछे आप भी दीवाने बन कर छः मासकी रात की । उसका नशा अब भी नहीं गया है । वृन्दावनकी रास कुंजमें अब भी गोपियोंके साथ नाचना पड़ता है तथा वहाँ सामगानके साथ अपने स्वरूपको याद करते कराते रहते हैं । सुर नर मुनि पीर और ओलिया जिन्होंने पिया है उनको पता है क्योंकि, वो आनन्द-वाणीसे तो कहाही नहीं जाता । इसी कारण कबीरदासजी कहते हैं कि, गूंगा यदि सक्कर खाले तो वो उसका स्वाद कैसे बता सकता है कि, ऐसा स्वाद है । इन इन्द्रियोंमें वो बल नहीं जो उस आनन्दका अनुभव भी बखान कर सकें । ये हैं कबीर साहिबके अक्षर कि, वे गोरखनाथ, दत्तात्रेय, वशिष्ठ, व्यासदेव, शुक्राचार्य, नारद, शुक्रदेव, शिव, सनकादिक, अम्बरीष, याज्ञवल्क्य, जनक, जड़भरत, शेष, ध्रुव, प्रह्लाद, विभीषण, पार्वती और गोपियाँ ये सब सब सच्चिदानन्द सत्य पुरुषके परम भक्त हुए हैं । यहाँतक कि, कबीर साहिब भी इनका प्रेमके साथ स्मरण करते हैं इन्हें उस स्वादका लेनेवाला बताते हैं जो कि, वाणीसे न कहा जा सके । कबीरके प्रकाशमें ये भी स्मार्य रूपसे आगये हैं अतः इनकी भक्तिसे सनी जीवनीकाही उल्लेख होना चाहिये जैसी कि, इनमें कबीर साहिबकी श्रद्धा है ।
वसिष्ठजी ।
जिनका स्मरण कबीर साहिबने श्रद्धाके साथ किया है उनमें वसिष्ठजी भी आ गये हैं । आपने परा भक्तिरूप प्रेममदिरामें मस्त होकर ही केवल रामके दर्शनोंके लिये ही पौरोंहित्य स्वीकार किया था । आपका लिखा योगवासिष्ठ, मुक्तिपथका अपूर्व प्रदर्शक है । जीवनमुक्तिकी शिक्षा देनेके लिये तो वो सूर्यसे भी बढ़कर है । इनमें नामकी उपासनामें भी वो बल है कि, भगवान् राम उसके अहंग्रहके उपासकको भी अपना गुरु मानने लग जाते हैं । अभी कुछ दिन हुए अयोध्याके वसिष्ठजीके चरणामृतके मिले बिना सत्य पुरुष रोने लग जाया करते थे । जिस दिन तकलीफ होती थी तो सीताजी भी आकर कहती थीं कि, बाबा ! आज मेरा कलेवा नहीं रखा गया, यह है वसिष्ठजीका माहात्म्य । आज इस कराल कलिकालमें भी अपने को वसिष्ठ माननेवालोंको सीताजी बाबा कहके अभिवादन करती हैं । इनकी अनेकों कथाएँ पुराणोंमें लिखी हुई हैं । यदि समन्वयके साथ विचारी जायें तो आनन्दका सामान मिलेगा किन्तु जिसकी आखोंमें बही छाई हुई हैं उनका तो कहनाही क्या है ?
आमीनका ज्ञान
गौतम ऋषि ।
आपभी ज्ञानके अगाध भण्डार वेदके मंत्रोंके द्रष्टा हैं। अनेकों ऐसे शास्त्रोंके प्रवर्तक हैं, जिनसे मनुष्योंका कल्याण हो। अहल्या आपकी ही पत्नी थी, जिसे कि, भगवान् रामने पत्थरसे मनुष्य कर दिया था। आपके बहुतसे कार्य आपकी प्रसिद्धिके हैं पर यह काम सबसे अधिक है कि, आपकी भक्तिके वश ही भगवान् रामने आपकी शिला बन कर पड़ी हुई स्त्रीमें चरण लगाकर उसे फिर अहल्याही बना दिया। आपकी भक्तिकी कथा सदा भूमण्डलको पवित्र करती रहेगी।
कपिल मुनि ।
ये सांख्यशास्त्रके आदि प्रवर्तक हैं। आपने अज्ञानी पुरुषोंको आत्मतत्त्व बतानेके लिये कर्दमऋषिसे देवहूतिमें अवतार लिया था। इन्होंने तत्त्वोंका निर्णय माताको सुनाया था कि, संसारका कल्याण हो। इनका पूरा उपदेश श्रीमद्भागवतके तीसरे स्कन्धमें मिलता है। ये जीव ईश्वर और प्रकृति इन तीन पदार्थोंको मानते हैं। सांख्यशास्त्रका कपिलसूत्र इन्हींका बनाया हुआ है। सांख्य-कारिकाके निर्माता ईश्वर कृष्णपर आके इनके शास्त्रके दो भेद हो गये। यानी उसके इनके शास्त्रको निरीश्वरवादपर लगाया, केवल मुक्त पुरुषोंकोही ईश्वर माना। यह एक सत्य पुरुषका अवतार है जो लोगोंकी ज्ञान पिपासाको शान्त एवं सफलभूत करनेके लिये आपका अवतार हुआ था। आप ज्ञानियोंकी अवस्था दिखानेके लिये सदा योग समाधिमें ही रहे आते हैं।
दत्तात्रेय ।
ये भी प्रेम मदिराके दीवानोंमें गिने गये हैं। ये अत्रिमुनिके पुत्र तथा दुर्वासाके भाई ये अत्रिमुनि ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर सौवर्षतक कुलाद्रि पर पवनाहारी होकर एक पैरसे खड़े होकर तप करते रहे। जब इनके तपसे तीनों लोक विचलित हो उठे उस समय तीनों देव ऋषिजी महाराज के पास आ उपस्थित हुए। अत्रिने वर माँग लिया कि, आप मेरे घर जन्म लें तथा तीनों देवोंने भी इस बातको स्वीकार कर लिया। पीछे विष्णुके अंशसे दत्तात्रेय, शिवके अंशसे दुर्वास तथा ब्रह्माके अंशसे सोमकी उत्पत्ति हुई। ये परमहंसपथक प्रवर्तक थे। भगवानके भरोसे रहा करते थे लोगोंको दिखाते थे कि, प्रेम मदिराके दीवाने कैसे रहा करते हैं। एक बार ये सहस्रमुता कावेरीके किनारेके सानुपर पड़े हुए प्रह्लादको मिले। उस समय इन्हे कोई नहीं जान सकता था। कौनसे भी वर्ण आश्रम, आकृति और चिह्नोंसे नहीं पहिचान सकता था। प्रह्लादन चरणोंमें पड़कर पूछा कि, आप उद्यम तो कुछ भी नहीं करते परन्तु शरीर इतना
कबीर साहिबकी शिक्षा
मोटा है जैसे कि, भोगी धनियोंका हो, क्योंकि, बिना भोगके शरीर इतना मोटा कैसे रह सकता है ? आप तो शरीरके लिये भी कोई उद्योग नहीं करते । प्रह्लादजीके बचन सुनकर दत्तात्रेयजीने उत्तर दिया कि, भगवानकी कृपासे अनेक जन्मोंके पीछे मोक्षका द्वार यह मनुष्य देह मिला है । सुख पानके लिये घर गृहस्थ किया करते हैं परन्तु सुखकी जगह दुख देखकर यहाँ एकान्तमें आ बैठे हैं । आत्मप्रकाशका घातक तथा अवास्तविक समझ भोग तथा उद्यमका त्याग करके प्रारब्धपरही सन्तोष कर लेता हैं । सदा स्वरूपमें स्थिर रहकर सबको भुलाये रहता हैं । मुझे मौहरकी मखली और अजगरकी चव्या उत्तम लगी । उसी तरह उस प्रेम मदिरासे परितृप्त हुआ सदा यहीं रहा करता हैं । इसके सिवा और भी लोकोपकारिणी बात हुई जिनपर आरूढ़ होकर मनुष्य उत्तम लोकोंको पा सकता है । वे सब पुराण ग्रन्थोंमें विस्तारके साथ लिखी हुई हैं । प्रेम मदिराके दीवानोंका प्रकरण लेकर यहाँ थोडासा लिख दिया है ।
सनत्कुमार
ये परम भागवतोंमें हैं । इन्होंने निर्द्वन्द्व रहनेके लिये सदा बाल्यावस्था ही स्वीकार की है, ये किसीभी लोकमें आ जा सकते हैं, इनकी गति कहीं भी रुकी हुई नहीं है । हैं ये छोटेसेकी तरह रहनेवालेपर इनका ज्ञान यहाँतक बढ़ा हुआ है कि, नारदजीको भी इन्होंने उपदेश देकर सत्य पुरुषकी भक्तिमें लगाया था । ये सदा उस सुखका अनुभव करते हैं जिसकी कि, एक मात्रामें सारा संसार तृप्त रहता है । इनके जीवनकी अनेकों घटनाएँ उपनिषद् और पुराणोंमें भरी पड़ी हैं । जिन्हें इच्छा हो वो उठाकर देखलें, ये भी परा भक्ति, रूपा प्रेम मदिराको कबीर साहिबके कथनानुसार निकालकर पिये हुए मस्त दीवाने हैं ।
भवतबालक ध्रुव ।
विष्णुपुराणमें ध्रुवजीका वृत्तान्त इस प्रकार लिखा है कि, ध्रुवजी राजा उत्तानपाद चक्रवर्तीके पुत्र थे । जब ध्रुवजीका वय पाँच वर्षका था उस समय अपने पिताके गोदमें सिंहासनपर जा बैठे । उस समय ध्रुवजीकी सौतेली माता राजाके निकट बैठी थी । उसने ध्रुवजीको एक ऐसा थप्पड़ मारा कि, आप पृथ्वीपर गिर पड़े और कहा कि, तू सिंहासनारूढ़ होने योग्य नहीं । यदि तेरे भाग्यमें राज्य अथवा सिंहासन होता तो तू मेरे गर्भसे उत्पन्न होता । तब ध्रुवजी रोते २ अपनी माताके समीप गए और अपनी माताके व्यवहारका विवरण किया । तब ध्रुवकी माताने अपने पुत्रको गोदमें ले लिया और मुख चूम तथा प्यार करके कहने लगी कि, ए पुत्र ! इस संसारमें तेरा कोई नहीं । एक प्यारे परमेश्वरके अतिरिक्त तेरा कौन हैं ? तू उसीकी भक्ति कर । तब माताकी शिक्षासे ध्रुवजी
तपस्याके निमित्त बनको चले । राजा उत्तानपादने सुना कि, ध्रुव बनको जाता है, तब लोगोंको भेजा कि, ध्रुवको समझाओ, परन्तु ध्रुवने किसीका कहना न माना और बनको सिधारे, वहाँ उनको ऋषियोंका उपदेश मिला, एक अँगूठे पर अपने शरीरका समस्त बोझ देकर खड़ा हो गया । छः महीने पर्यन्त बराबर खड़ा रहा, सब अन्न जल छोड़ दिया, केवल वायुही उसका भोजन था । इस अवसरमें राजा इन्द्रको अत्यन्त भय उत्पन्न हुआ कि, ध्रुव ऐसी कठिन तपस्या कर रहा है ? मेरा राज्य न छीनले । ध्रुवजीको अनेक प्रकारके त्रास दिखलाने लगा, जिससे तपस्या छोड़कर भाग जावे, परन्तु ध्रुवजी तनिक भी नहीं भयभीत हुए । व्याघ्र सर्प अग्नि और राक्षस इत्यादि पशु जो उन्हींने देखे सबमें विष्णुको जाना दूसरा कुछ न जाना, तब विष्णुकी कृपा हुई नील वर्ण घनश्याम चतुर्भुज शंख चक्र गदा पद्म इत्यादि लिए, गरुडपर सवार हो ध्रुवजीके सामने आकर कहा कि, माँग क्या चाहता है ? ध्रुवजीने कहा कि, ए महाराज ! अटल पदकी श्रेणी दीजिये, जहाँसे मैं कभी न गिर्छूँ । विष्णुने आज्ञा देदी कि, अभी तो तू राज्य कर फिर शरीर छोड़कर अटल पद पावेगा । जबलें पृथ्वी तथा आकाश है तबलें तू अटल रहेगा । सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रादि सब तेरे चारों ओर फिरा करेंगे । फिर विष्णुने कहा कि और जो कुछ माँगेगा मैं तुझको दूंगा । तब ध्रुवने कहा कि, मुझे आत्मज्ञान प्रदान करो जिसके बलसे मैं यह जान सकूँकि, मैं क्या हूँ । तब विष्णुने कहा कि, ए ध्रुव ! यदि मैं तुझको इस प्रश्नका उत्तर देता हूँ तो मैं और अटल पद तीनों मिथ्या ठहरते हैं । इस कारण तुमको इस प्रश्नका उत्तर सन्त देवेंगे । इतना कहकर विष्णु तो चले गए । उसके उपरान्त तीन सन्त ध्रुवजीके समीप आए ; वामदेव, पराशर और दत्तजी । तब दत्तजीने कहा कि, ए ध्रुवजी ! तू अटल पदसे पृथक् है । तूने अटल पद क्यों माँग लिया ? ए मूर्ख ! तू सोच समझ कि, जब तू नहीं रहेगा तब अटल कहाँ रहेगा । आत्माको तो मृत्यु नहीं है । शरीर तो जैसे नवीन कपड़ा पहना और प्राचीन छोड़ दिया, इसी तरह है । तूने अपनेको अटल पदके बन्धनमें क्यों डाल दिया, जब उन श्रेष्ठपुरुषोंकी शिक्षासे ध्रुवको ज्ञान हुआ और अटल पदको मिथ्या जान लिया, तब पछताया । अटल पदके बखेड़ेसे मनको हटाकर सदा पराभक्तिमें लीन रहने लगा, इसकी दिव्यचर्या लोगोंको भक्तिका पाठ सिखानेवाली है । अब आप अटल पदपर विराजे हुए भी प्रेम मदिरामें मस्त रहा करते हैं । यहाँ तक कि, आपकी दीवानगीके गुण स्वयम् कबीर साहिबने भी गाये हैं ।
भक्त प्रह्लाद ।
विष्णुपुराणमें लिखा है तथा कबीर साहबका भी कथन है कि, जब प्रह्लादजीका वय सात वर्षका हुवा तब प्रह्लादका पिता जो कि, हिरण्यकशिपु था । वह बड़ा वेदान्ती था और कहता था कि, मैं स्वयम् परमेश्वर हूँ । दूसरा कौन है । सबसे अपनी पूजन करवाता था । प्रह्लाद उसका पुत्र बड़ा भक्त था । राम २ कहा करता था, कबीर साहबका वचन है कि, जब यह प्रह्लाद अपनी माताके गर्भमें था, तब नारदजीने उसकी माताके गर्भमें जाकर उसको रामनामकी दीक्षा दी थी । भक्ति सिखलायी थी ।
जिस समय यह प्रह्लाद अपनी माताके गर्भमें आया तब राजा इन्द्रको अत्यन्त भय उत्पन्न हुवा । कारण यह कि, इन्द्रने पूर्वही सुन रक्खा था जो हिरण्यकशिपुका पुत्र उत्पन्न होगा वह इन्द्रासनपर बैठकर राज्य करेगा । इस भयसे राजा इन्द्रने यह युक्ति की कि, जब प्रह्लाद गर्भमें आया तब वह प्रह्लादकी माताको चुराकर निज लोकमें ले गया । चाहा कि, गर्भ गिराकर बच्चाका वध करें । तब नारदजीने इन्द्रको समझाकर कहा कि, तुम ऐसा कार्य कदापि न करना इस स्त्रीके गर्भसे भक्त उत्पन्न होगा, वह सब सुखोंका देनेवाला होगा । तब नारदजीके कहनेसे इन्द्रने मान लिया । वह स्त्री पुनः अपने गृहमें आई । उसके गर्भसे प्रह्लाद उत्पन्न हुआ । सातवर्षके वयमें पिताने प्रह्लादको पढ़नेके लिए बँठाया । तब आप कुछ न पढ़ते थे केवल राम राम कहा करते थे । स्वयम् तो प्रह्लाद राम राम कहतेही थे पर समस्त पाठशालाके लड़कोंको भी सिखला दिया जिससे पाठशालाके समस्त छात्र राम राम कहते हुए प्रेममें मग्न हो गए । सभीने पढ़ना छोड़ दिया, पढ़नेकी ओरसे ध्यान छोड़ दिया । पण्डित राजा हिरण्यकशिपुके समीप दोहाई देते हुए कहने लगे कि, ऐ राजा ? प्रह्लादने पाठशालाके समस्त बालकोंको बहका दिया । न स्वयं पढ़ता है और न दूसरोंको पढ़ने देता है समस्त बालक राम राम कहनेके आनन्दमें मग्न हो रहे हैं । यह बात सुनकर हिरण्यकशिपुने प्रह्लादको बुलाकर समझाया कि, ए पुत्र ! तू पढ़, कारण यह कि, तू ही मेरे सिंहासनपर आरूढ़ होनेवाला है । तब प्रह्लादजीने उत्तर दिया कि, ए पिता ! मैं न पढ़ूंगा, न राज्य करूँगा, मैं तो राम राम कहूँगा, किसी वस्तुकी मुझको इच्छा नहीं है । तब हिरण्यकशिपुको अत्यंत क्रोध आया और कहा कि, मैं शिव हूँ, मेरे अतिरिक्त और दूसरा कौन है, प्रह्लादने तो रामनामके प्रेमका प्याला पीलिया था । पिताकी बात कौन सुने, राम राम कहनेसे न हटते थे । इस कारण पिता तथा पुत्रमें महा विरोध उत्पन्न हुवा, हिरण्यकशिपुने
प्रह्लादको दंड देना आरंभ किया। प्रह्लादको हिरण्यकशिपुने पर्वतपरसे नीचे डाल दिया, हाथी झँकाया, अग्निमें डाल दिया और और अनेक दंड दिए, परन्तु जब प्रह्लादको दंड देता था तब विष्णु प्रह्लादको सामने खड़े दिखाई दे समस्त कठिनाइयोंको रोक लिया करते थे। पर दूसरे किसीको दिखलाई नहीं देते थे। विष्णु प्रह्लादको इक्षित करते जाते थे कि, भयभीत न होना, सशंकित होनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं तेरा रखवाला तेरे सामने खड़ा हूँ। हिरण्यकशिपु प्रह्लादको स्तंभसे बाँधकर वधपर प्रस्तुत हुआ। तब स्तंभ फाड़कर वे नृसिंहजी निकल पड़े। हिरण्यकशिपुका वध किया, प्रह्लादको राज्य दिया। जब प्रह्लादजी-पर कठिनाई आन पडती, तब तो विष्णुका ध्यान करते और “विष्णु विष्णु” पुकारते और जब वह बाधा टलजाती तब वेदशास्त्रानुसार अपने स्वरूपका ध्यान करते। ऐसे विचारोंको देखकर विष्णुने प्रह्लादकी निष्ठा बढ़ानेके लिये कहा कि, ए प्रह्लाद ! कठिनाईके समय तो तू मुझे पुकारता है। जब बला टल जाती है तब तू अनुमान करता है कि, समस्त संसार मैं ही हूँ मैं ही हूँ समस्त संसार मेराही स्वरूप है। यदि समस्त संसारमें तूही तू है तो आपत्तिकालमें मुझको क्यों पुकारता है। तेरे चित्तकी दुविधा नहीं गई फिर विष्णुने प्रह्लादको सिंहासपर बैठा दिया तथा प्रह्लादके उत्तरको सुनकर परम प्रसन्न हुए। ये भी प्रेम मदिराके दीवाने हैं।
अम्बरीष ।
जब भक्तोंकी कथाएँ चलती हैं तो भक्तवर राजर्षि अम्बरीषकी जीवनी भी आखोंके सामने आ खड़ी होती है। ये परम भक्त थे सब कुछ होते हुए भी अपनेको भक्तोंके चरणकी धूलिही समझते थे। यद्यपि ये भक्त गोष्ठीसे तो छिपे हुए नहीं थे पर ऐसी घटना घटी कि, ये सर्व साधारणकी दृष्टिमें आगये। दुर्वासा ऋषि बड़े तपस्वी तथा अत्यंत क्रोधी थे। एक बार राजा अम्बरीषके गृह आप पधारे और वे राजा बड़े भक्त थेही और ठाकुर पूजा करतेही थे। राजाने ठाकुरका चरणामृत लिया तब दुर्वासाको अत्यंत क्रोध आया कि, विना मुझे भोजन कराए तूने चरणामृत क्यों लेलिया ? मैं तुझको शाप दूंगा। तब राजा हाथ बाँधकर खड़ा हो बोला कि, महाराज ! मेरा अपराध क्षमा करो। दुर्वासा ऋषि अत्यंत क्रोधमें थे। जब उन्होंने उसे मारनेके लिये कृत्या उत्पन्न की तो उस समय विष्णुका चक्र सुदर्शन दुर्वासाके ऊपर छूटा कि, भस्म करदो। तब दुर्वासा भागा। जहाँ जाते थे वहाँ चक्र सुदर्शन दुर्वासाके पीछे जाते। जब दुर्वासाने देखा कि, यह चक्र सुदर्शन मुझको न छोड़ेगा तब विष्णुके शरण गए कि,
मुझको चक्र सुदर्शनसे बचाओ । तब विष्णुने कहा कि, ए दुर्वासा ! तुम राजा अम्बरीषके शरणमें जाओ । तुमने भक्तसे क्यों वैर किया तब दुर्वासा भागकर राजाके शरणमें आए, राजासे अपना अपराध क्षमा करवाया । राजाने चक्र सुदर्शनकी बड़ी स्तुति की । चक्र सुदर्शन शान्त हुवा । दुर्वासाके प्राण बचे । कबीर साहिबने इन्हें भी परा भक्तिरूपी प्रेम मंदिराका दीवाना मानकर अत्यन्त आदरके साथ स्मरण किया है ।
भगवान् शुक्देव ।
प्रेम मंदिराके दीवानोंमें व्यासपुत्र शुक्देवजीका नाम बड़े आदरके साथ लिया जाया करता है । ऋषियोंमें वामदेव और शुक् सत्यलोकवासी संभाले जाते हैं । देवीभागवतमें इन्हें अयोनिज तथा अरणिसे उत्पन्न हुआ कहा है । ये किस तरह प्रकट हुए इस प्रकरणपर विचार किया जाता है । जब व्यासजी सरस्वती नदीके किनारे गए देखो देवीभागवत १-स्कंध, ४-अध्यायमें इस प्रकार लिखा है कि, इस नदीके तटपर बैठकर तपस्या करने लगे उस समय आपके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं थी । इस नदीतटपर गुलबंग नामक एक पक्षी रहता था, इस गुलबंगकी स्त्री गर्भिणी थी, अल्पकालके उपरान्त उसको बच्चा उत्पन्न हुवा । बच्चा जन्मनेसे गुलबंग अतिहर्षित हुवा, बारम्बार बच्चेको चाटने और प्यार करने लगा । इस पक्षीको देखकर व्यासजीके मनमें यह कामना उत्पन्न हुई कि, यदि मेरा पुत्र भी उत्पन्न होता तो कैसा अच्छा होता, कारण, यह कि, बिना पुत्रके गति नहीं । इस समय व्यासजीके बुढ़ापेका समय था, समस्त पुराण और वेद महाभारतादि बनाचुके थे । तब इस नदीतटपर पुत्रकामनासे तपस्या करने लगे । तब समस्त देवतागण प्रसन्न हो, व्यासजीके सामने आए । तब नारदजीने व्याससे कहा कि ए व्यास ! सब देवता भगवतीके पूजनसे अपने मनोरथको पहुँचते हैं इस कारण तुम देवीका पूजन करो । तब नारदके उपदेशानुसार वे भगवतीकी वंदनामें लगे ।
फिर देखो दशवें अध्यायमें लिखा है कि, व्यासजीने पर्वतकी चोटीपर जाकर समाधि लगादी । जब आधी तपस्या होचुकी तब राजा इन्द्रको भय उत्पन्न हुवा कि, व्यास जो कठिन तपस्या कर रहा है कहीं मेरा सिंहासन नछीनले, और शिवजीसे जाकर कहा तब शिवजीने समझाया कि, तुम भय न करो । व्यासजी बरदान लेकर अपने स्थानपर आये वहाँ अग्निहोत्रके लिये अरणि मथन करते सोचने लगे कि जैसे नीचेकी अरणिसे मन्थाके संयोगसे मथनेसे अग्नि प्रकट हो जाता है, इसी तरह मुझे भी पुत्र मिलजाय । इसके साथही गृहस्थाश्रम
को तुच्छसमझनेवाली ज्ञानधारा भी बहती जाती थी। इतनेहीमें बहो घृताची नामकी अप्सरा आ उपस्थित हुई पर उसे उन्होंने अपने लिये उचित न समझा अतः उसके शरीरको न छुआ तथा न मुग्धदृष्टिसे देखाही ऋषिकी स्थिर वृत्तिसे तपस्वियोंके ठगनेवाली वो लचीली अप्सरा तोती बनकर उड़ती बनी। अरणीके प्रति जो अग्नि जैसे पुत्रकी भावना हुई थी वो इतनी प्रबल हो उठी कि, उन्हें इसका भान भी न हुआ उनका तेज अरणिमें प्रविष्ट हो गया, मथते मथते व्यास जैसी आकृतिके शुक्रदेव उसीसे प्रकट हो गये। भगवान् व्यास देवके इन्हें गृहस्थके उपदेश देनेपर इन्होंने पितासे कह दिया कि, मैं गृहस्थ न होऊँगा न कर्मकाण्ड ही पढ़ूँगा। मुझे योग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, तथा और भी प्रारब्धके भंजक शास्त्रोंको पढ़ाइये, दूसरे विषयोंको मैं कदापि न पढ़ूँगा। पुत्रके ऐसे भावोंको देखकर व्यासदेवजीने उन्हें बेही शास्त्र पढ़ाये तथा परमहंसोंकी संहिता श्रीमद्भागवत भी पढ़ा दी। अन्तमें जीवन्मुक्तिका उपदेश लेनेके लिये जनकजीके पास भेजा कि, बहो इनकी रही सही कमी पूरी हो जाय। ये गृहस्थचव्यसि नितान्त उदासीन थे। राजा जनकके समझानेपर जीवन्मुक्तोंकी तरह गृहस्थों में रहे। पीछे सबका त्याग करके संन्यासी हो गये। पीछे महाराज परिक्षित् को उपदेश देनेके लिये हस्तिनापुर पधारे थे। बहोसे आपने परीक्षित्को मुक्त करनेके लिये भागवत सुनाई थी। आपके तेजके सामने सबका तेज फीका पड़ जाया करता था। कबीर साहिबने इन्हें अधर कटोरीक दीवानोंमें याद किया है कि, ये अब भी पराभक्तिरूपी प्रेम मदिराको पीकर दीवाने बने फिर रहे हैं।
भगवान् व्यास।
संसारमें ऐसा कोई व्यक्ति न होगा जो भगवान् व्यासदेवको न जानता हो। चाहे कोई हिन्दू हो वा अहिन्दू सबको इसीका अध्यात्मप्रकाश मिल रहा है। इसीके बनाये ब्रह्मसूत्रके भाष्योंका निर्माण करके आज आचार्य कहलाये जा रहे हैं। शुक्र जैसे पुत्र पानेका सौभाग्य आपको ही मिला था।
उनके अवतार।
सूतजी कहते हैं कि, सातवें मन्वन्तरमें और अट्ठाईसवें युगमें जो मनु उत्पन्न हुवा वह व्यास था और उन्नीसवें युगमें द्रोणी नामक व्यास उत्पन्न होगा और सातवें युगमें अनन्त नामक व्यास होंगे। यह बात सुनकर शौनकजीने सूतजीसे पूछा कि, ए महाराज! व्यासजीके अवतारोंका विवरण सविस्तार रूपसे कहो कि, किस २ युगमें कौन २ अवतार हुए? तब सूतजीने कहा कि, पहले द्वापरमें (१) स्वयम् वेद नामक व्यास जिसको स्वयम्भू कहते हैं
उत्पन्न हुए । (२) दूसरे द्वापरमें प्रजापति नाम हुआ । (३) कृष्ण (४) बृहस्पति (५) सिवता (६) सविता (६) भूत (७) मध्वा (८) वसिष्ठ (९) सारस्वत (१०) धाता (११) भारद्वाज (१२) तृवृष (१३) अन्तर्यक्ष (१४) धर्म (१५) त्रिपुरारणी (१६) धनञ्जय (१७) मेधातिथि (१८) व्रती (१९) अत्रि (२०) गौतम (२१) उत्तम (२२) बाजश्रवा (२३) त्रोतलवेदव्यास (२४) भार्गव (२५) आग्नेय (२६) मुक्ति (२७) महामति (२८) कृष्णद्वैपायन व्यास ।
ये सब वेदव्यास जीवन्मुक्त हैं । पहले भी जीवन्मुक्त थे अब भी जीवन्मुक्त हैं और भविष्यमें जब उत्पन्न होंगे, तब भी श्रद्धेय जीवन्मुक्तिके पदको प्राप्त प्राप्त होंगे । कबीर साहबने इन्हें अपने प्रेम मदिराके दीवानोंमें मानकर वही श्रद्धा प्रकट की है ।
जैनके तीर्थंकर ।
ऐसेही जैनके चौबीस समस्त तीर्थंकर हैं, पहले तीर्थंकर ऋषभनाथजी थे, इनका विवरण देखनेसे जान पड़ेगा । कबीर साहबका कथन है कि वनमें आग लगी निर्मही आप जल मरे । येही परमहंसचर्याके प्रवर्तक हैं । जबलों ये तीर्थंकर जीवित रहते हैं तबही आपके दिव्य ज्ञानका निर्णय हो जाता है । जैसे वेदधर्मके केवल ज्ञानियोंकी दशा है वैसेहीवही जैनधर्मके केवल ज्ञानियोंका विवरण है । तनिक भी विभिन्नता नहीं । ये केवल ज्ञानी चाहें जीवन्मुक्त है, नाम मात्रके निमित्त है प्रारब्धसे करते रहते हैं । केवल ज्ञानी कहलाते हैं । यथार्थमें हैं भी । अन्तके तीर्थंकर महावीर हैं महावीरनाथका यह विवरण है कि, कशाला नामक एक मनुष्यके शापसे आपको छः मासपर्यन्त बराबर रक्त पड़ता रहा, बड़ा कष्ट पाया, पर उन्हें कुछ भी पता न चला क्योंकि शरीर-राध्यास नहीं था और व्यवहारसूत्रके चूलकामें लिखा है कि, पाँचवें कालमें मुक्ति नहीं । दूसरे उत्तरार्धसूत्रमें भी यही लिखा है कि, पाँचवें कालमें किसी मनुष्यकी मुक्ति नहीं होगी । इनके उपदेशकी शैली मनोहर है ।
चौबीस तीर्थंकरसे लेकर जितने तिरसठ शलाका पुरुष हैं सबके वृत्तान्तकी जाँच करनेसे समस्त विवरण भली प्रकार मालूम हो जावेगा कि, प्रत्येक संप्रदायके विशिष्ट पुरुषमें कुछ सार अवश्यही होता है । मुक्तिका विचार करते २ एक जगह आपने कह डाला है कि, मुक्तिपथमें किसी संप्रदायका नियम नहीं हैं कि, इसके मुक्त हों इसके न हों किन्तु, यही नियम है कि, चाहें कोई हो “सम-