कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
इति कबीर मन्शूर विषयानुक्रमणिका समाप्त ।
कबीर मन्शूर
<!-- image: ★ -->प्रारंभिक उपोद्घात
इस ग्रन्थका नाम "कबीर मन्शूर" उर्दूमें लिखा है, इसी नामसे हिन्दीमें भी प्रसिद्ध हो गया है।
मन्शूर शब्द अर्बी भाषाका है। "नशर" का बहुवचन है ॥ "नशर" शब्दका अर्थ है ज्योति, रोशनी, प्रकाश इत्यादि तो मन्शूरका अर्थ हुआ।
"ज्योतियाँ, रोशनियाँ, प्रकाशों" इत्यादि इस हिसाबसे कबीरमन्शूरका अर्थ हुआ, कबीरकी ज्योतियाँ, कबीरके प्रकाश इत्यादि, यदि इसका हिन्दी अनुवाद किया जाय तो "कबीरज्योति" अथवा "कबीर प्रकाश" नाम रखना चाहिये, किन्तु विशेष नामका अर्थ नहीं किया जाता है, जिस नामसे जो प्रसिद्ध होता है, उसी नामसे पुकारा जाता है। इसीलिये इस हिन्दी अनुवादमें भी इसका नाम कबीरमन्शूरही रखा है। दूसरी बात है कि, पहिली आवृत्तिमें यह इसी नामसे छप चुका है और यह नाम लोगोंमें इतना प्रसिद्ध हो गया है कि, अब इसका दूसरा नाम रखा जाना ठीक नहीं है।
स्वामी श्रीपरमानन्दजी साहबको ऐसे नामसे बड़ा प्रेम था आपने सबसे पहले ग्रंथ बनाया है उसका नाम "कबीरभानुप्रकाश" रक्खा है। कबीर मन्शूर भी उसी भावको लिये हुए है। अन्तमें आपने कबीरकौमुदी लिखी है। कौमुदीका अर्थ भी चांदनीका ही है। भेद इतनाही है, उपर्युक्त दोनों ग्रंथ सूर्यके समान उग्रतेजको लिये हुए हैं और कौमुदी चन्द्रमाकी चन्द्रिकाके समान शीतलयुक्त प्रकाशका स्रोतक है।
ग्रन्थकर्ताकी विज्ञप्ति
स्वामी परमानंदजी साहबने कबीर मन्शूर ग्रन्थ लिखकर सबसे पहले सम्बत् १९३७ के आश्विन (कुवार) मास मुताबिक सन ईस्वी १८८० महीना सितम्बरमें पूर्ण किया था और मार्च १८८१ ई. में वह ग्रंथ छपकर तय्यार हो गया, उस आवृत्तिके सब ग्रंथ आपने अधिकारियोंको बिना मूल्य दे दिया था। आपने ग्रंथ बनाया छपवाया और बाँट भी दिया। किन्तु, आपके अंदर भरे हुए कबीरपंथके खजाने इतने अधिक हो गये कि, यदि उसमेंसे खर्च न किया-जाय तो, सोमके धनके समान होजावे और दूसरे पंजाबके सिकखोंने कुछ आक्षेप भी किये तब आपने दूसरा ग्रंथ सं. १९४२ बिक्रमीमें “तालीम कबीरकलियुग” लिखा, जो दूसरी बार कबीरमन्शूर की संशोधित और वर्द्धित आवृत्ति कही जा सकती है। इतने पर भी आपको संतोष नहीं हुआ, तब आपने फिरसे तीसरी बार उसे हाथमें लिया और उसे बढ़ाकर बड़े कबीरमन्शूरके रूपमें तय्यार किया जो सम्बत् १९४४ वैशाखमुदी (२५-४-२७) में छपकर तय्यार हो गया। जो कबीरमन्शूर पहली आवृत्तिमें ३५० पृष्ठोंमें छपकर पूरा हो गया था इस बार १५०० सौ से भी अधिक पृष्ठोंमें समाप्त हुआ। इतनेहीसे समाप्ति नहीं हुई, आपने रसाले तनासुख, कबीरगुणसागर आदि अनेक छोटे भोटे ग्रन्थ बनाये और कितने शब्द और पदोंको संग्रह कर उनपर व्याख्या लिखे। अन्तमें आपने “कबीरकौमुदी” नामका कबीरमन्शूरके समानही बृहत्ग्रन्थ लिखा है जो आपके लिये और ग्रंथोंके समानही अमुद्रित पडा है।
स्वामी परमानन्दजीकी रचना
स्वामी परमानंदजी साहबने कबीरभानुप्रकाश, कबीरमन्शूर, तालीम कबीरकलियुग, रसाले तनासुख, कबीरगुणसागर, कबीरकौमुदी आदि कई ग्रंथ और बहुतसे शब्द और पदोंपर व्याख्या लिखे हैं, जिनमें से बहुतोंका संग्रह मेरे कबीरदर्शन पुस्तकालयमें रक्खा हुआ है।
कबीर भानुप्रकाश की रचनाका समय
कबीर भानु प्रकाशके अन्तमें लिखा है :—
चौपाई
सतगुरुकी दायामय पूरी । लिख्यो ग्रन्थ जो भूतल भूरी ॥
रच्यो जो निजहिय हुआ हुलासा । ग्रन्थ कबीर भानु परगासा ॥
पण्डित जन सो विनय हमारी । भूल चूक जो कतहुँ निहारी ॥
टूटे अक्षर जहँ लिख पाई । सो सुधारिके पढ़ँ बनाई ॥
सम्बत उन्नीस सौ पैंतीसा । शुक्ला यकादशी तिथि दीसा ॥
मंगल अरु ज्येष्ठ महीना । तादिन ग्रन्थ समापति कीना ॥
मही पंजाब देशके माँही । शहर फिरोजपुर इक आही ॥
नगर मुक्तसर तहँ यक अहई । दोदा ग्राम निकट तेहि कहई ॥
ताहि ग्राममें जब आसीना । भजन ध्यान प्रभुके लौलीना ॥
ग्रन्थ रचन गुरु आज्ञा पाई । लिख रच धर्म कथा समुदाई ॥
जेते अक्षर लिखे बनाई । जो कोइ घटि बढि ताहिमिलाई ॥
सो गुरु सन्मुख लेखा भरि है । भिन्न भेद जो कोऊ करिहै ॥
इति
कबीर मन्शूर (छोटा)
इसी प्रकार सम्बत् १९३७ के आश्विन मु० सेप्टेम्बर १९८० ई. को पहला कबीरमन्शूर जिसको छोटा कबीरमन्शूरके नामसे कहा जाता है। स्वामी परमानन्दजीने समाप्त किया था। आप स्वतः लिखते हैं कि, इस किताबको आठ भाग बीस अध्यायोंमें विभाजित करके कबीरमन्शूर नाम रखा।
पहले भागके ४ अध्याय हैं। १ पहले अध्यायमें स्वसम्बेदके अनुसार जगतकी उत्पत्तिका वर्णन है। २ दूसरे अध्याय में—कालपुरुषके पंथोंका वर्णन है।
३ तीसरे अध्यायमें—कबीर साहबके पृथ्वीपर आकर अपना पंथ प्रचलित करनेका वर्णन है। ४ चौथे अध्यायमें—कबीरसाहबकी परीक्षा और अन्तर्धान होनेका वर्णन है।
दूसरे भागके सात अध्याय हैं। १ पहले अध्यायमें—कबीरसाहबके नामोंका वर्णन है। २ दूसरे अध्यायमें—कबीरसाहबके अद्वितीय होनेका वर्णन है। ३ तीसरे अध्यायमें—कबीरसाहबके पंथके शुद्ध निर्दोष होनेका वर्णन है। ४ चौथे अध्यायमें—कबीरसाहबके लोक और हंसोंका वर्णन है। ५ पांचवें अध्यायमें—कबीरसाहबकी सिद्धिशक्तिका वर्णन है। ६ छठे अध्यायमें—कबीरसाहबकी धार्मिक शिक्षाका वर्णन है। ७ सातवें अध्यायमें—कबीरसाहबके पंथके नियमोंका वर्णन है।
तीसरे भागमें केवल एकही अध्याय है। जिसमें विषयवासना और मनके कृत्योंका वर्णन है।
चौथे भागमें भी एकही अध्याय है—जिसमें जीवोंके चौरासी लाख योनियें भ्रमण करने अर्थात् आवागमनका वर्णन है।
पाँचवें भागमें एकही अध्याय है जिसमें प्रत्येक मजहबों (पंथों) पर व्याख्यान (लेकचर) है।
छठे भागमें चार अध्याय हैं। १ पहले अध्यायमें—जगतके मिथ्या होनेका वर्णन है। २ दूसरे अध्यायमें—संसारसे घृणा और वैराग्यका वर्णन है। ३ तीसरे अध्यायमें—बुद्धि विचार, विवेक, एकैईश्वरवाद तथा मालिक पर भरोसा (विश्वास) का वर्णन है। ४ चौथे अध्यायमें—मनन और निदिध्यासन का वर्णन है।
सातवें भागमें एकही अध्याय है जिसमें शिष्य और गुरुके प्रश्नोत्तर हैं। इसमें शिष्यमुखके १२५ प्रश्न और गुरुमुखसे उनका उत्तर वर्णित है।
आठवें भाग में भी एक ही अध्याय है जिसमें हानिकारक निषेध वस्तुओं का वर्णन, उनसे हानि उनके त्याग से लाभ आदि का वर्णन करके, मानवधर्मके नियम (पटल) को लिखा है अन्तमें कबीरमन्शूरका उपसंहार, ग्रन्थसमाप्ति की प्रार्थना और समाप्ति की तिथि सन सम्बत् आदि का वर्णन है—यह ग्रन्थ मार्च १८८१ ई. में छपा गया था—कोहिनूर प्रेस लाहौर में छपा था।
तालीम कबीर कलियुग
स्वामी परमानन्दजी साहब अपने तीसरे ग्रन्थ "तालीमकबीरकलियुग" की भूमिकामें इस प्रकार लिखते हैं—
इस किताब "तालीम कबीरकलियुग" लिखनेकी यह वजह है कि, इस किताबके पहले इस फकीरने दो किताबें लिखी, १ एक का नाम कबीरभानु-प्रकाश, २ दूसरेका नाम कबीरमन्शूर। इन दोनों किताबोंमें फकीरने नानक शाह साहबको कबीर साहबका चेला लिखा, इस बातपर वे लोग जो इन दिनोंमें आपको नानक साहबके पैरू (अनुयायी) समझते हैं, नाराज हुए, बावजूदकि (यद्यपि) फकीरने उनको समझाया कि, मैं अपनी तरफसे यह बात नहीं समझता बल्कि जो कुछ कबीरसाहब और नानक साहबके तहरीर (लिखे हुए) व
तकरीर (कहे हुए) हैं, उसके मुताबिक (अनुसार) मैं लिखा और कहता हूँ। बावजूद कहने और समझानेके उन लोगोंका नोकैजू (शत्रुता) दूर न हुआ और सन १८८५ में फिरोजपुरके चन्द सिकखोंने मेरे साथ कुछ फसाद करना चाहा तब मैंने उन लोगोंसे कहा कि, मैं तो नानक साहब और कबीर साहबको एक रूपही जानता हूँ, अगर आप नहीं राजी हों तो आइन्देको मैं न लिखूंगा। बावजूदे कि, उन लोगोंका मेरे साथ मुपाहसा और मजादला (झगडा और लड़ाई) इस बातपर न था कि, मैंने नानक साहबको कबीरसाहबका चेला क्यों लिखा, बल्कि और बातपर तकरार था, लेकिन अन्दरूनी (भीतरी) बोगभ (ईर्षा-की) इस बातका भी था। इस वास्ते फकीरने कबीर साहबके पांच हजार बरसकी तारीख लिखा और बनाम “तालीमकबीर कलियुग” मशहूर किया; ताकि हर खास व आमको इसकी असली हकीकत (यथार्थता) से आगाही हो। कबीर साहबके तीन युगोंका अहवाल मैंने साफ छोड़ दिया, फकत इब्तदाय (आरम्भ) कलियुगसे लिखा।
उपेयुक्त ग्रन्थकी समाप्तिपर आप लिखते हैं “खतम (समाप्त) हुई किताब “तालीमकबीरकलियुग” सतगुरुकी मेहरबानीसे। बमुकाम शहर फिरोजपुर ता० २२ अक्टोम्बर सन् १८८५ ई० बमुताबिक सम्बत १९४२ विक्रमी आश्विन सुदी १३ बरोज चहारशम्बा (बुध)। इसके पश्चात्-
बडे कबीरमन्शूर
की बारी आती है—आप उसकी दीबाइचा (प्रस्तावना) में इस प्रकार लिखते हैं—
दूसरी बार कबीरमन्शूरकी तरमीम (सुधार) व तरतीब (योजना) के सबब (कारण) का ब्यान।
यह किताब कबीरमन्शूर पहले एक बार मतबा (छापखाना) कोहनूर लाहौरमें छप चुकी है। और इस किताबके पढ़नेके शायक (अनुरागी) बहुत लोग थे, लेकिन मुसन्निक (ग्रंथकर्ता) किताबने, इस किताबका रिवाज आम (सर्वसाधारणमें) देना मुनासिब न समझा। और अपने खास (विशेष) लोग जहबहम्म (अपने पंथके) को मुफ्त दिया। बजह (कारण) इसकी यह थी कि, बाज बाज लोग स्वसम्बदस वाकफियत (जानकारी) रखते हैं, अक्सर (प्रायः) लोग बेखबर (अज्ञात) हैं और जो लोग वाकफ (जानकार) हैं,
उनको स्वसम्बेदकी तालीम (शिक्षा) के सिवाय (अतिरिक्त) और दूसरा कुछ पसन्दीदः नहीं है।
अगर कोई मेरी साबिक (प्रथम) के छापेकी किताब देखकर मुझपर किसी बातका तअनः (तानी) एवाह (अथवा) एतराज (तर्क) करे तो मैं हक्क तआला (सत्य पुरुष-सच्चे मालिक) के हुजूर उसका दामनगीर हूँगा. क्योंकि, मैंने अपनी सारी (कुल-सब) साबिक (पहलेकी) मिहनत और भर (द्रव्य-रुपया) लागत बरबाद करके अज सरैनौ (फिरसे) इसको दुरस्त (सुधार) किया है।
इस दुनियामें चार वेद और चार किताबको तो हर कोई जानता है, लेकिन (किंतु) स्वसम्बेदके बारे (विषय) में कहीं बाजपुरस (पूछताछ) नहीं है, इसलिये चन्द (कई) अशखास (लोग) मुअतरिज हुए (तर्क-किया-पूछा)
और दूसरी बजह यह है कि, जब यह किताब छपी, उस वक्त मुसन्निफ किताब सहीह और दुरस्त करनेकेलिये मौजूद न था; मुसन्निफकी गैरहाजिरीमें किताब छपी, इस सबबसे लोगोंने बेसमझी करके, चंद अलफाज (शब्द) बदल डाले, और मजहबी (साम्प्रदायिक) बातोंमें अलफाजका बदलना बड़ा कुसूर (दोष) है। और मुकाबला करनेवालेकी गफलत (भूल) से गलतियाँ (अशुद्धियाँ) वगैरही भी बहुत रह गयी। इस वास्ते सलाहबक्त (समयोचित) समझकर किताबका रिवाज देना (प्रकाशित) करना मुलतवी रखवा था। अब दूसरी बार इसको फिर तरमीम और तरतीब करके और बहुत मजामीन (विषयों) की ईजादी (वृद्धि) के साथ और खूब हवालेजात (प्रश्न सब) दिये और दुरस्त (सुधार) कर खास शायकीन (अनुरागियों) राह नजात (मोक्ष मार्ग) व मुजमअए खुशखुलक व नेकआदात (सदाचारियों-सुशीलों) व मुनसिफ मिजाज (न्यायी) के वास्ते इस किताबको मरौवज करना और वास्ते फायदा (लाभ) खास लोगोंके कि, जिनका दिल (मन-हृदय-अन्तःकरण) तअमुब (सांप्रदायिक पक्षपात) व तरफदारीसे दूर व तमीज (विवेक) इन-सानी (मानवी) से भरपूर है बाजिब और लाजिम (उचित) जागता हूँ।
सदहा शुक्र सलतनत इंग्लिशियाका है कि, बादशाह और हुक्काम दोनों दुवशा (त्यागी साधुओं) और आजिजों (दीनों) पर ऐसी हमेशा (सदा) हिफाजत (रक्षा) और नजर नबाजिश (दया दृष्टि) की रखते हैं कि, इस
अंगरेजी अहद (राज्य) में किसी मिस्कीन (गरीब) फक़िरपर कोई जुल्म व जोर नहीं कर सकता और वे लोग खुशीके साथ अपना मकसद (आशय) जाहिर कर सकते हैं। सब और झूठ सबका इजहार और इनसाफ होता है। कोई किसीपर किसी तरहका जब वतअदी (जो जुल्म) नहीं कर सकता। अब उन जालिमो (अत्याचारियों) की सलतनत (राज्य) जमीनसे उठगयी, जबकि मिस्कीन और बेगुनाह दुश्वेषोंको कद और कत्ल और तरह तरहकी स्यासत (शासन) करते थे, उस वक्त फुकरा अपनी रास्ती (सच्चाई) का इजहार (प्रकाश) नहीं कर सकते थे। अब बादशाह और हुकामोंकी मदे नजर देखकर इस फकीरने भी दिलेरीकी और जो इल्म इसमें था, और है, सीना (हृदय) से निकालकर सफीना (कागज) पर, बमुलाहिजे नाजरीनके रखकर उमीदवार इन्साफका है।”
इस बारभी आपने कबीरमन्शूरको आठही भागोंमें विभक्त किया है किंतु पहली आवृत्तिकी अपेक्षा, विषयमें वृद्धि और सुधारके अतिरिक्त क्रममें भी उलट पुलट किया है। वह इस प्रकार है -
प्रथम भागमें तीन अध्याय और अनेक प्रकरण हैं।
दूसरे भाग में दो अध्याय और सौ के लगभग प्रकरण हैं।
तीसरे भागमें भी दोही अध्याय और कई प्रकरण हैं।
चौथे भागमें आवागमनका विषय है जो कई अध्याय और अनेक प्रकरणोंमें वर्णित है।
पाँचवें भागमें - पशुओंकी बुद्धिमानीका वर्णन है। जिसमें छः अध्याय और प्रत्येक अध्यायोंमें अनेक प्रकरण हैं।
छठे भागमें तीन अध्याय और अनेक प्रकरणोंमें मद्यमांसादि निषेध पदार्थों का वर्णन है। इस छठे भागका विषय प्रथमके छोटे कबीरमन्शूरमें आठवें भागमें था सो अब छठे भागमें आगया है।
सातवें भागमें पाँच अध्याय और प्रत्येक अध्यायमें अनेक प्रकरण हैं। इस भागमें जो विषय वर्णित है सो पहले कबीरमन्शूरके छठे भागमें था।
आठवें भागमें गुरु शिष्यके सम्वादमें अनेक जानने योग्य विषय और उप-वेषोंका वर्णन है। जिसमें अनेक अध्याय और प्रकरण हैं।
इस प्रबंधसे बड़े कबीरमन्शूरको समाप्तकर अन्तमें आप उसकी समाप्तिकी तिथि लिखते हुए इस प्रकार लिखते हैं -
तारीख खातमा ।
शुक्र' बेहद' परम गुरु गोविंद । की सरंजाम' बूसख'ए दिलब'न्द ॥
करम' व फजल' उसपै सतगुरुका । जो समझकर पढे सुने यह पन्द' ॥
इससे हीरी' न कोइ शर्बत और । आवहैवा' न शोरब मिश'री कन्द ॥
पाव पहचान जो कोइ मृशिद'को । हो दफा' सब जहा'न का दुख दन्द ॥
कर अमल' गर' निगर' न चश्म' अपने । राज' महरिम' न हो तोबर' मन' खन्द' ॥
ईस्वी सन अठारह सौ अस्सी । उन्नीस सौ पैंतीस विक्रमा सने हिन्द ॥
महे' सितम्बर व हिन्दवी' आस्विन । खतम' तारीख' नुसख'ए' चारुमचन्द' ॥
मैं उसीका हूँ खादमान' खादिम । जिसके दरगह' न पहुँचे कोई परिन्द' ॥
आजिज' व तखलुस' आजिज । नाम जिसका है दास परमानन्द ॥
पहले (छोटे) कबीरमन्शूरमें भी समाप्तिकी यही तारीख लिखी हुई है, क्योंकि असलमें कबीरमन्शूर ग्रन्थ बही है किंतु इसमें, सुधारा बधारा करनेके कारण, अंतमें आपको, उसकी तिथि तारीख भी, जाननेकी जरूरत पड़ी, इसलिये आप लिखते हैं —
राकि साधु परमानन्ददासजी कबीर पंथी मुकीम शहर फिरोजपुर मुल्क पंजाब किस्मत लाहौर, तारीख तरमीम और तरतीब दूसरीबार मोबरखे २५ अपरेल सन १८८७ ई० व मुताबिक सम्बत १९४४ विक्रमी बैशाख सुदी २ सोमवार ।
इसके पश्चात यह ग्रंथ सन् १८९१ ई. माह सितम्बर व मुताबिक भादो सम्बत १९४८ विक्रमी में छपकर तैयार हुआ ।
अंति टाइटिल पेज (मुखपत्र) पर आप एक विज्ञप्ति, इस प्रकार लिखते हैं । बाजह हो कि, जो साहब दानाय दोरान इस किताब कबीरमंशूरको पढ़ें, अपने दिलमें खूब गौर और फिक्र करें कि, कबीर साहब कौन हैं ? कि, जिनका यह दिल और दीमाग है कि, दावा खुदाईका करते हैं और आपमें सारा जलाल लायजाल दिखाते हैं और आपका कौल बमोजिब फेलके हैं । कौल व फेल जाहिर व बातिन एकसा है सरेम फर्क नहीं ।
जिस हालतमें कि, सारे वेद व स्वसम्बेद और रिषिशरान हर से जमान भी जाहिर करते हैं कि, कबीर साहब खुद कादिर मुतलक खालिक आलम हैं,
१ धन्यवाद २ अनन्त ३ पूरा ४ किताब, ग्रन्थ ५ मनलगन, मनचाही, सुन्दर ६ कृपा ७ श्रेष्ठता ८ नसीहत, उपदेश ९ मीठा १० अमृत ११ पीनेकी वस्तु १२ गृह १३ नाश १४ संसार, जगत. १५ कर्म व्यवहार. १६ यदि १७ देखे १८ आँख १९ भेद २० जानकार २१ ऊपर २२ मेरे २३ हँसों २४ महीना २५ हिन्दी २६ समाप्ति २७ तिथि २८ पूर्ण चन्दके समान सुंदर २९ दासानुदास ३० दरबार ३१ पक्षी, उड़नेवाला भाव है बड़े बड़े बुद्धिमान् बुद्धि दो डानेवाले ३२ दीन ३३ उपनाम.
तो फिर यह फकीर दरबारे इजहार उन अकबालके पुरे तकसीर क्यों तसन्वर जिया जावे । इस वास्ते वाहि्यात इतराजोंसे यह मुआफ फरमाया जावे ।
वह कबीर सारे जहानका गुरु पीर अपनी बुजुर्गी और जलाल खु आप जाहिर करता है और जब चाहता है छुपा लेता है, यह इनसान जई फूल व्यान क्या लिखे और क्या कहे, फिरिश्तोंमें भी किसीको यह कुदरत नहीं कि, उसकी उलूहियत और रबूबियतमें दम मारके, उसके जलाल बेमिसाल कुल आलममें नशर और बाहर बयाने वशर है ।
इस दुनियाके आदमजाद बेखबर हैं कि, ब्रह्म क्या है, जीव क्या और माया क्या है ? खुदा क्या और बंदा क्या है ? खुदा परस्ती क्या और बुत परस्ती क्या ? सो सब इस किताबमें खोल खोल कर दिखला दिया है और खूब साबित कर दिया है कि, कुल आलम मायापरस्त है और जो माया परस्त है वही बुतपरस्त है । खुदापरस्तीकी खबर उसीको होती है जिसको सतगुरु कबीर साहब बतलाता और सिखलाता है और जो कोई खुदा परस्तीको जानता है वह तोहमातसे अलग होता है । खुदा परस्त हवस हैवानी और तनासुखसे बिलकुल मुबर्रा होता है ।
राकिम खाकसार—
साधु परमानन्द, मुसद्दिक.
इस प्रकारसे कबीरमन्शूरके आदि अन्तमें लिखा है ।
पाठकोंको यह जानना चाहिये कि, स्वामी परमानन्दजीने बारम्बार अपने ग्रन्थोंमें लिखा है कि, साम्प्रदायिक ग्रन्थोंमें सांकेतिक शब्दोंको बदलना या ग्रंथ-कर्ताके विरुद्ध उसमें सुधार करना पाप है । “जो कोई मेरे इस ग्रंथमें रद्दबदल करेगा तो मालिकके दरबारमें मैं उसका दामनगीर हूँगा । फिर ऐसी दशामें जब कि, ग्रंथकर्ता स्वतः अपने भले या बुरे लिखे हुएको पूरा पूरा ज्योंका त्यों रखवाया चाहता है, तो अनुवादकको कोई अधिकार नहीं है कि, इसमें कमी बेसी या रद्द बदल करे हों आवश्यकता पड़नेपर परस्तावना या स्थान स्थान २ की टिप्पणियों अपनी समझ बूझके अनुसार भाव अवश्य प्रकट किये जा सकते हैं, सो संतगुरुकी कृपासे शक्तिभर किया जायगा ।
इतने शब्द लिखनेकी आवश्यकता क्यों पड़ी ? इसका कारण परस्तावनामे देखनेसे ज्ञात होगा ।
सर्व संतमहंतोंका कृपाकांक्षी —
कबीराश्रमाचार्य
श्रीयुगलानन्द बिहारी,
अनुवादक.
सत्यनाम
सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिंत, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय
कबीर, सुरतियोगसंतायन, धनीधर्मदास, चारगुरु तथा
वंशनकी दया । मुक्तामनिनाम', चूरामणिनाम', सुदर्शननाम,
कुलपतिनाम', प्रमोधगुरुबा'लापीर, कमलनाम', अमोल'
नाम, मुरतिसनेहीनाम', हक्कनाम', पाकनाम', प्रगट
नाम', धीरजनाम', पं. श्री उग्रना' म साहब, पं० श्री
दया' नाम साहबकी दया । बंशब्यालीसकी
दया कबीर साहबके अधिकारी वंश—
प्रतापी वर्तमान आचार्य श्री १०८
महंत काशीदासजीसाहब की
दया । सर्व संत महंतन.
की दया ।
श्रुति
मुण्डक उपनिषत् प्रथम प्रपाठक
द्वे विद्ये वेदितव्य इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥४॥
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं
निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥५॥
अथर्वणवेद ० मु० उ० ॥ १ ॥
अर्थ—विद्या दो भांतिकी हैं जिसको ब्रह्मवेत्ता लोग परा और अपरा कहते हैं । दोनोंमेंसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, और शिक्षा, कल्प, व्याकरणं निरुक्त, छन्द, ज्योतिष आदि सब मिलके अपरा विद्या (परसम्बेद) कहलाती हैं और जिससे अविनाशी ब्रह्मजाना जाता है उसे परा विद्या (स्वसम्बेद) कहते हैं ।
अथ कबीरमन्शूर प्रारम्भ
मंगलां चरण
धन सतगुरु सतपुरुषतू, सत्यनाम इस्थीर ।
सतसुकृत मुनीन्द्र तुही, करुणा पूर्ण कबीर ॥ १ ॥
तेरे गुण गावत सदा, सिद्ध साधु मति धीर ।
हंस परमहंस सब गावहीं सत्य धाम सुखथीर ॥ २ ॥
तेरिहि कृपा कटाक्षते, कटे काल जंजाल ।
बार बार तोहि नमन है, होहु कृपालु दयाल ॥ ३ ॥
हौ अज्ञान जानू नहीं, तेरे गुण की गाथ ।
तुहि सतगुरु कृपाकरी, मोहि लखाऊ पाथ ॥ ४ ॥
विनु दया सतगुरु तेरी, नाहि मोर निरवाह ।
अपनी और निहारहू, लगे सु भवको थाह ॥ ५ ॥
माथ नवा तू लेखनी, लिख सतगुरु गुणगाथ ।
पूरन पुरुष कबीर है, सब नाथनको नाथ ॥ ६ ॥
विनु पारख नहिं पाइये, सब देवनको देव ।
कृपा करे सतगुरु सही, सहजे पावे भेव ॥ ७ ॥
जापर कृपा सतगुरुकी होई । पूरन पुरुषको जाने सोई ॥
पूरन पुरुष सु आपु कबीरा । करि कृपा मेटे सब पीरा ॥ १ ॥
सब महुँ पूरण अदली आपा । करि अदल मेटै सब तापा ॥
काल गवको तोडनहारा । टूटे दिलको जोडनहारा ॥ २ ॥
जाके दर पर माथ नवावें । सिद्ध औलिया भूप सब जावें ॥
आपे पुरुष सो आप कबीरा । अगम्य अपार गहिर गंभीरा ॥ ३ ॥
एकै पुरुष रूप दोउ आही । उहवों पुरुष कबीर जग माहीं ॥
सत्यपुरुष आज्ञा अस होई । जाहु कबीर जग पहुँचो सोई ॥ ४ ॥
काल निरंजन ठाठ बहु ठाटे । जगत जीव न पावैं वाटे ।
भूले जीव भून वह खावे । लाख जीव नित प्रति सतावे ॥ ५ ॥
ऐसा जाल निरंजन लाया । एको जीव न मो पुर आया ॥
अब ज्ञानी जाओ संसारा । सुकृत जीवन करो उबारा ॥ ६ ॥
अस पुरुष जब आज्ञा दीन्हा । तब ज्ञानी रख पृथ्वी कीन्हा ॥
सोई सतगुरु सत्यकबीरा । आज्ञा पाइ आये भव तीरा ॥ ७ ॥
सोई ज्ञानी पुरुष है, सतगुरु सत्यकबीर ॥
रज वीरज ते पैदा नहीं, स्वाँसा नहीं शरीर ॥
कर्म जाल काटे गुरु देवा । आप न बन्धे करमके भेवा ॥
ज्ञान ज्योति वह अपहि आपा । गुरु सरूप सबघट महँ व्यापा ॥ १ ॥
करि पारख जोइ कोइ जाने । अलख ज्योति वह परत पिछाने ॥
गुप्त रूप वह जगमें डोले । शब्द रूप वह घट घटबोले ॥ २ ॥
बिना काम वह रूप अनूपा । सम दृष्टि वह रंक औ भूपा ॥
काल अग्नि महँ सबको दाहे । विनु सतगुरु नहि होय निवाहे ॥ ३ ॥
देह विदेह वह आप सरूपा । जीव हेत धर देह अनूपा ॥
हंस होय सोई पाह्वाने । अगम अगोचर किहिं विधिजाने ॥ ४ ॥
जब जाने तब उघरे भागा । दोऊ लोक महँ परम सुभागा ॥
जेते इष्ट जगत महँ जानो । सब कर इष्ट ताहि पहिचानो ॥ ५ ॥
अहे विनह देह दिखलावे । विनु दया न पार कोई पावे ॥
बड अचरजको करै बखाना । किहिं विर्वाध जाने जीव जहाना ॥ ६ ॥
आवत सरधा गुरु जगावे । बाहर भीतर एक दिखावे ॥
देखतबुद्धि थकित ह्वै तबहीं । दरशे रूप पुरुषकर जबहीं ॥ ७ ॥
भवभय भंजन दुखहरन, अम्मर करन शरीर ।
आदि युगादी आप है, अदली अदल कबीर ॥
सत्यपुरुष औ सत्य कबीरा । दुई रूप दरसाये मतिधीरा ॥
इष्टरूप सतपुरुषहि जाना । गुरु रूप सति कबीर पिछाना ॥ १ ॥
एकै रूप दरसै दुई भावा । जीव उबारन युक्ति बनावा ॥
ऐसी युक्ति न कबीर बनावत । नगत जीव न मारग पावत ॥ २ ॥
किहि विधि कहूँ कहा नहि जाई । आपे पुरुष सब माँहि रहाई ॥
घट घट महँ आप विराजे । आपे ब्रह्म जगत हँ छाजे ॥ ३ ॥
आपे आत्म परमात्म रूपा । जीव शीव सब आप अनपा ॥
द्वैत भाव न दरसे कोई । आपे पुरुष कबीर है सौई ॥ ४ ॥
आपे गुरु शिष्य पुनि आपै । एकै भाव जाप हुई जापै ॥
सिद्ध साधु औलिया जेते । बिन जाने जग भटकै तेते ॥ ५ ॥
करि कृपा जब आप लखावे । दे पारख जग भरम मिटावे ॥
काल जाल तबहीं टल जाई । निकटहि पावे पुरुष गुसाई ॥ ६ ॥
सत्य सत्य में कहूँ पुकारा । परमानंद अस वचन उचारा ॥
युगल आनन्द पाया तबहीं । उर्दू ते हिन्दी किया जबहीं ॥ ७ ॥
कबीर मन्शूर ग्रन्थको, आदि अरम्भन कौन ।
परमानन्द स्वामी रचे, उर्दू माहिं परवीन ॥
ताकी हिन्दी में करूँ, संत महंत आदेश ।
जो उर्दू जानत नहीं, पढि गुनि भिटै क्लेश ॥
उसी मङ्गला चरणका अनुवाद दूसरे छन्द में
कर वन्दना सद्गुरु चरण को आज ऐ तू लेखनी ? ।
लिखनी उन्ही की है कथा यह बात इतनी देखनी ॥
व्यापक सभीमें एकसा वह न्यायकारी पूर्ण है ।
अभिमानियोंका मान करता शीघ्र क्षणमें चूर्ण है ॥
सादृश्यता उसकी नहीं कोई कहीं भी कर सके ।
याचकोंकी पूर्ण इच्छा कौन दूजा कर सके ? ॥
दीनसे सम्राट तक तेरे हि भिक्षुक हैं सभी ।
तेरी दया बिन ज्ञानको कोई न पायेगा कभी ॥
आज्ञा पुरुषकी पायके सतलोकसे तुम आगये ।
आनन्द दायक मोद फिर सबके हृदय बिच छागये ॥
पापियोंके पारका बीड़ा उठाया आपने ।
सतलोकमें पहुँचा दिया फिर ज्ञान देकर आपने ॥
लक्ष जीवोंको जहाँपर काल खाता भूनकर ।
नित्य लीला थी यही जन सत्य पथका खूनकर ॥
उद्धार आपने उनका आकर किया है लोकमें ।
उनको बचाया शीघ्र ही जो थे बडेही शोकमें ॥
वह आपही कब्बीर हैं गुरु श्रेष्ठ सबसे ठीकही ।
उपदेश है प्रभु आपका पाषाण दृढ़ता लीकही ॥
माता पिता बिन जगतमें स्वयमेव आये आप हैं ।
ज्योती अलखसे हो प्रगट सबके मिटाये ताप हैं ॥
देही नहीं पर देह धारण की जगतमें आपने ।
दाय़ा दिखाई लोकमें कैसी जनोपर आपने ॥
आपके स्वसम्बेदका कुछ ज्ञान जिसने पालिया ।
त्रयलोककी सम्पत्ति सकल मानो उसीने पालिया ॥
पहचान जिसने आपकी शुभ ज्ञान पूर्वक कर लिया ।
शक्तिका भण्डार मानों पूर्ण दिलमें भरलिया ॥
सब दुःख दारुण शीघ्रही उसके हृदयसे छट गये ।
विज्ञानके गुरु श्रोतसे मानों सुधासे पट गये ॥
तर्कयुत सन्देह जब छाने लगे बहुजगतमें ।
सत् ज्ञानकी ज्योती जगाई पूर्ण अपने भक्तमें ॥
दाय़ा अलौकिक जो दिखाई आपने निज दास पर ।
बाहर व भीतर आपही भरपूर देखा आस धर ॥
गर न देते ज्ञान यह अज्ञान तम छाता बड़ा ।
मुक्ति पाता जीव नहीं यम जाल पासामें जड़ा ॥
माता पिता प्रभु आप हैं अरु ताप नाशक आप हैं ।
प्रत्येक जनमें बस रहे हरते विकट सन्ताप हैं ॥
सत्पुरुष ही प्रभु आप हैं यह ज्ञान योगी जानते ।
संत जन श्रद्धा सहित इसको सदाही मानते ॥
सिद्धि साधक और जितना साधुवृन्द महान है ।
केवल कृपापर आपकी गौरव सभीका मान है ॥
महिमा प्रभो हे ! आपकी मैं कौन वरणन कर सकूं ।
अति तुच्छ सेवक हूँ महा सब ज्ञान कैसे कर सकूं ॥
शक्ति मनुजमें है कहाँ गुणगान प्रभु तब कर सकें ।
महिमा अमित अगाध है तब पार क्योंकर कर सके ॥
केवल हमारी प्रेमयुत स्वीकार करिये वन्दना ।
अरु काटिये जंजालमय यह दीर्घ यमकी फन्दना ॥
अनुवादक—
साहित्यालङ्कार हंसदास शास्त्री
(सम्पादक कबीरचन्द्रोदय)
नीमा और नीरू
प्रथम आवृत्तिका मङ्गलाचरण
अनन्त धन्यवाद है उस महान् परमात्माको, जिसके गुणोंकी परमहंस गाकर, अपना कार्य सुधारते और मोक्षपदको प्राप्त करते हैं। उसकी दया अनन्त है, समस्त स्तुति और प्रार्थनाएँ उसीके निमित्त हैं।
शेर
नवा सीस अपना तु ऐ लेखनी । कि गुण तुझसे लिखने हैं जगदीश्वरी ॥
जो पूरनपुरुष सब जगह वरतमान । हृदयमें उन्हींका कराना है ज्ञान ॥
दया करके देगा जिसे वह समझ । तोफिर हरमेंहर उसको लेगानिरख ॥
कहीं भी कोई तेरा जोडा नहीं । तेरे न्यायसे है भरी सब जमीं ॥
घमंडीका तू दर्प करता है चूर्ण । हृदय भग्नकी आहत करता है पूर्ण ॥
तेरे द्वारके हैं भिखारी सभी । शाहंशाह राजा गदाओ वली ॥
पुरुषने कहा जाओ जगमें कवीर । मेरी आज्ञा लेके तुम ए गँभीर ॥
मेरे लोक पापी है आया नहीं । जहाँमें कोई मुक्ति पाया नहीं ॥
पुरुषकाल खाता उन्हें भूनकर । वह हर रोज लख जीवका खूनकर ॥
बचा लीजिए जो है शुद्धात्मा । जो स्वीकार करले मेरी आज्ञा ॥
वो है आदमी सारे गुरुका वपीर । जिसे कहते हैं सत्यसाहब कबीर ॥
न उसकी है माता है न कोई पिता । अलख ज्योतिसे है वह पैदा हुवा ॥
यहाँ आके उपदेश उसने किया । भटकतोंको राह उसने बतला दिया ॥
चले जाते थे जीव जो आगरपर । बचाया उन्हें आपने आनकर ॥
दया आगई लोगोंके शोकसे । चले आपले हुकम सतलोकसे ॥
सकल सृष्टिका है वही स्वामि एक । यही माने सब छोड़ कर अपनी टेक ॥
नहीं देह पर देह परगट हुआ । जो ज्ञानी हैं वे मनमेंले यह जमा ॥
उसे जानते दूर हो दुःख दंड । प्रशंसामें उसके जबों सबकी बंद ॥
कोई आदमी जो बड़ा बुद्धिमान । बढा करके बुद्धी लिया उसको जान ॥
नहीं देह पर देह जिसकी प्रकट । तअज्जुबकी बातें करूँ निष्कपट ॥
जब इस ध्यानमें गोता खाने लगा । दयालू गुरु तब जगाने लगा ॥
जो देखा तो बाहर व भीतर वही । सबी वस्तुमें है वही आपही ॥
मिहरबाँ दो सूरतको दिखलाया यों । गुरुहो मनुष्योंको सिखलाया यों ॥
१ यह अनुवाद मूलका ठीक नहीं है क्योंकि मूलमें लिखा है 'जो आबे नजर इल्म की दूरबी' इसका अर्थ है जो ज्ञानकी दृष्टिसे देखा जाता है। इसी प्रकार पहले अनुवादमें मूलके विरुद्ध अगणित अशुद्धियाँ हैं।