महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
उस समय सुन्दर अंगोंवाली दमयन्तीने उनसे कहा—'भगवन्! निष्पाप महाभागगण! यहाँ तप, अग्निहोत्र, धर्म, मृग और पक्षियोंके पालन तथा अपने धर्मके आचरण आदि विषयोंमें आपलोग सकुशल हैं न?' तब उन महात्माओंने कहा—'भद्रे! यशस्विनि! सर्वत्र कुशल है ।। ७०-७१ ।।
ब्रूहि सर्वानवद्याङ्गि का त्वं किं च चिकीर्षसि ।
दृष्ट्वैव ते परं रूपं द्युतिं च परमामिह ।। ७२ ।।
विस्मयो नः समुत्पन्नः समाश्वसिहि मा शुचः ।
अस्यारण्यस्य देवी त्वमुताहोऽस्य महीभृतः ।। ७३ ।।
'सर्वांगसुन्दरी! बताओ, तुम कौन हो और क्या करना चाहती हो? तुम्हारे उत्तम रूप और परम सुन्दर कान्तिको यहाँ देखकर हमें बड़ा विस्मय हो रहा है। धैर्य धारण करो, शोक न करो। तुम इस वनकी देवी हो या इस पर्वतकी अधिदेवता ।। ७२-७३ ।।
अस्याश्च नद्याः कल्याणि वद सत्यमनिन्दिते ।
साब्रवीत् तानृषीन् नाहमरण्यस्यास्य देवता ।। ७४ ।।
न चाप्यस्य गिरेर्विप्रा नैव नद्याश्च देवता ।
मानुषीं मां विजानीत यूयं सर्वे तपोधनाः ।। ७५ ।।
'अनिन्दिते! कल्याणि! अथवा तुम इस नदीकी अधिष्ठात्री देवी हो, सच-सच बताओ।' दमयन्तीने उन ऋषियोंसे कहा—'तपस्याके धनी ब्राह्मणो! न तो मैं इस वनकी देवी हूँ, न पर्वतकी अधिदेवता और न इस नदीकी ही देवी हूँ। आप सब लोग मुझे मानवी समझें ।। ७४-७५ ।।
विस्तरेणाभिधास्यामि तन्मे शृणुत सर्वशः ।
विदर्भेषु महीपालो भीमो नाम महीपतिः ।। ७६ ।।
'मैं विस्तारपूर्वक अपना परिचय दे रही हूँ, आपलोग सुनें। विदर्भदेशमें भीम नामसे प्रसिद्ध एक भूमिपाल हैं ।। ७६ ।।
तस्य मां तनयां सर्वे जानीत द्विजसत्तमाः ।
निषधाधिपतिर्धीमान् नलो नाम महायशाः ।। ७७ ।।
वीरः संग्रामजिद् विद्वान् मम भर्ता विशाम्पतिः ।
देवताभ्यर्चनपरो द्विजातिजनवत्सलः ।। ७८ ।।
'द्विजवरो! आप सब महात्मा जान लें, मैं उन्हीं महाराजकी पुत्री हूँ। निषधदेशके स्वामी, संग्रामविजयी, वीर, विद्वान्, बुद्धिमान्, प्रजापालक महायशस्वी राजा नल मेरे पति हैं। वे देवताओंके पूजनमें संलग्न रहते हैं और ब्राह्मणोंके प्रति उनके हृदयमें बड़ा स्नेह है ।। ७७-७८ ।।
गोप्ता निषधवंशस्य महातेजा महाबलः ।
सत्यवान् धर्मवित् प्राज्ञः सत्यसंधोऽरिमर्दनः ।। ७९ ।।
ब्रह्मण्यो दैवतपरः श्रीमान् परपुरंजयः । नलो नाम नृपश्रेष्ठो देवराजसमद्युतिः ॥ ८० ॥ मम भर्ता विशालाक्षः पूर्णेन्दुवदनोऽरिहा । आहर्ता क्रतुमुख्यानां वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ८१ ॥ 'वे निषधकुलके रक्षक, महातेजस्वी, महाबली, सत्यवादी, धर्मज्ञ, विद्वान्, सत्यप्रतिज्ञ, शत्रुमर्दक, ब्राह्मणभक्त, देवोपासक, शोभा और सम्पत्तिसे युक्त तथा शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले हैं। मेरे स्वामी नृपश्रेष्ठ नल देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हैं। उनके नेत्र विशाल हैं, उनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान सुन्दर है, वे शत्रुओंका संहार करनेवाले, बड़े-बड़े यज्ञोंके आयोजक और वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् हैं ॥ ७९—८१ ॥
सपत्नानां मृधे हन्ता रविसोमसमप्रभः । स कैश्चिन्निकृतिप्रज्ञैरनार्यैरकृतात्मभिः ॥ ८२ ॥ आहूय पृथिवीपालः सत्यधर्मपरायणः । देवने कुशलैर्जिह्मैर्हृतं राज्यं वसूनि च ॥ ८३ ॥ 'युद्धमें उन्होंने कितने ही शत्रुओंका संहार किया है। वे सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी और कान्तिमान् हैं। एक दिन कुछ कपटकुशल, अजितेन्द्रिय, अनार्य, कुटिल तथा द्यूतनिपुण जुआरियोंने उन सत्य-धर्मपरायण महाराज नलको जूएके लिये आवाहन करके उनके सारे राज्य और धनका अपहरण कर लिया ॥
तस्य मामवगच्छध्वं भार्यां राजर्षभस्य वै । दमयन्तीति विख्यातां भर्तृदर्शनलालसाम् ॥ ८४ ॥ 'आप दमयन्ती नामसे विख्यात मुझे उन्हीं नृपश्रेष्ठ नलकी पत्नी जानें। मैं अपने स्वामीके दर्शनके लिये उत्सुक हो रही हूँ ॥ ८४ ॥
सा वनानि गिरींश्चैव सरांसि सरितस्तथा । पल्वलानि च सर्वाणि तथारण्यानि सर्वशः ॥ ८५ ॥ अन्वेषमाणा भर्तारं नलं रणविशारदम् । महात्मानं कृतास्त्रं च विचरामीह दुःखिता ॥ ८६ ॥ 'मेरे पति महामना नल युद्धकलामें कुशल और सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वान् हैं। मैं उन्हींकी खोज करती हुई वन, पर्वत, सरोवर, नदी, गड्ढे और सभी जंगलोंमें दुःखी होकर घूमती हूँ ॥ ८५-८६ ॥
कच्चिद् भगवतां रम्यं तपोवनमिदं नृपः । भवेत् प्राप्तो नलो नाम निषधानां जनाधिपः ॥ ८७ ॥ यत्कृतेऽहमिदं ब्रह्मन् प्रपन्ना भृशदारुणम् । वनं प्रतिभयं घोरं शार्दूलमृगसेवितम् ॥ ८८ ॥
'भगवन्! क्या आपके इस रमणीय तपोवनमें निषधनरेश नल आये थे? ब्रह्मन्! जिनके लिये मैं व्याघ्र, सिंह आदि पशुओंसे सेवित अत्यन्त दारुण, भयंकर, घोर वनमें आयी हूँ॥ ८७-८८ ॥
यदि कैश्चिदहोरात्रैर्न द्रक्ष्यामि नलं नृपम् । आत्मानं श्रेयसा योक्ष्ये देहस्यास्य विमोचनात् ॥ ८९ ॥ 'यदि कुछ ही दिन-रातमें मैं राजा नलको नहीं देखूँगी तो इस शरीरका परित्याग करके आत्माका कल्याण करूँगी ॥ ८९ ॥
को नु मे जीवितेनार्थस्तमृते पुरुषर्षभम् । कथं भविष्याम्यद्याहं भर्तृशोकाभिपीडिता ॥ ९० ॥ 'उन पुरुषरत्न नलके बिना जीवन धारण करनेसे मेरा क्या प्रयोजन है? अब मैं पतिशोकसे पीड़ित होकर न जाने कैसी हो जाऊँगी?' ॥ ९० ॥
तथा विलपतीमेकामरण्ये भीमनन्दिनीम् । दमयन्तीमथोचुस्ते तापसाः सत्यदर्शिनः ॥ ९१ ॥ इस प्रकार वनमें अकेली विलाप करती हुई भीमनन्दिनी दमयन्तीसे सत्यका दर्शन करनेवाले उन तपस्वियोंने कहा— ॥ ९१ ॥
उदर्कस्तव कल्याणि कल्याणो भविता शुभे । वयं पश्याम तपसा क्षिप्रं द्रक्ष्यसि नैषधम् ॥ ९२ ॥ 'कल्याणि! शुभे! हम अपने तपोबलसे देख रहे हैं, तुम्हारा भविष्य परम कल्याणमय होगा। तुम शीघ्र ही निषधनरेश नलका दर्शन प्राप्त करोगी ॥ ९२ ॥
निषधानामधिपतिं नलं रिपुनिपातिनम् । भैमि धर्मभृतां श्रेष्ठं द्रक्ष्यसे विगतज्वरम् ॥ ९३ ॥ 'भीमकुमारी! तुम शत्रुओंका संहार करनेवाले निषधदेशके अधिपति और धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा नलको सब प्रकारकी चिन्ताओंसे रहित देखोगी ॥ ९३ ॥
विमुक्तं सर्वपापेभ्यः सर्वरत्नसमन्वितम् । तदेव नगरं श्रेष्ठं प्रशासतमरिंदमम् ॥ ९४ ॥ द्विषतां भयकर्तारं सुहृदां शोकनाशनम् । पतिं द्रक्ष्यसि कल्याणि कल्याणाभिजनं नृपम् ॥ ९५ ॥ 'तुम्हारे पति सब प्रकारके पापजनित दुःखोंसे मुक्त और सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न होंगे। शत्रुदमन राजा नल फिर उसी श्रेष्ठ नगरका शासन करेंगे। वे शत्रुओंके लिये भयदायक और सुहृदोंके लिये शोकका नाश करनेवाले होंगे। कल्याणि! इस प्रकार सत्कुलमें उत्पन्न अपने पतिको तुम (नरेशके पदपर प्रतिष्ठित) देखोगी' ॥ ९४-९५ ॥
एवमुक्त्वा नलस्येष्टां महिषीं पार्थिवात्मजाम् । अन्तर्हितास्तापसास्ते साग्निहोत्राश्रमास्तथा ॥ ९६ ॥
नलकी प्रियतमा महारानी राजकुमारी दमयन्तीसे ऐसा कहकर वे सभी तपस्वी अग्निहोत्र और आश्रमसहित अदृश्य हो गये ॥ ९६ ॥
सा दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मिता ह्यभवत् तदा ।
दमयन्त्यनवद्याङ्गी वीरसेननृपस्नुषा ॥ ९७ ॥
उस समय राजा वीरसेनकी पुत्रवधू सर्वाङ्गसुन्दरी दमयन्ती वह महान् आश्चर्यकी बात देखकर बड़े विस्मयमें पड़ गयी ॥ ९७ ॥
किं नु स्वप्नो मया दृष्टः कोऽयं विधिरिहाभवत् ।
क्व नु ते तापसाः सर्वे क्व तदाश्रममण्डलम् ॥ ९८ ॥
(उसने सोचा—) 'क्या मैंने कोई स्वप्न देखा है? यहाँ यह कैसी अद्भुत घटना हो गयी? वे सब तपस्वी कहाँ चले गये और वह आश्रममण्डल कहाँ है?' ॥ ९८ ॥
क्व सा पुण्यजला रम्या नदी द्विजनिषेविता ।
क्व नु ते ह नगा हृद्याः फलपुष्पोपशोभिताः ॥ ९९ ॥
'वह पुण्यसलिला रमणीय नदी, जिसपर पक्षी निवास कर रहे थे, कहाँ चली गयी? फल और फूलोंसे सुशोभित वे मनोरम वृक्ष कहाँ विलीन हो गये!' ॥ ९९ ॥
ध्यात्वा चिरं भीमसुता दमयन्ती शुचिस्मिता ।
भर्तृशोकपरा दीना विवर्णवदनाभवत् ॥ १०० ॥
पवित्र मुसकानवाली भीमपुत्री दमयन्ती बहुत देरतक इन सब बातोंपर विचार करती रही। तत्पश्चात् वह पतिशोकपरायण और दीन हो गयी तथा उसके मुखपर उदासी छा गयी ॥ १०० ॥
सा गत्वाथापरां भूमिं बाष्पसंदिग्धया गिरा ।
विललापाश्रुपूर्णाक्षी दृष्ट्वाशोकतरुं ततः ॥ १०१ ॥
उपगम्य तरुश्रेष्ठमशोकं पुष्पितं वने ।
पल्लवापीडितं हृद्यं विहङ्गैरनुनादितम् ॥ १०२ ॥
तदनन्तर वह दूसरे स्थानपर जाकर अश्रुगद्गद वाणीसे विलाप करने लगी। उसने आँसू भरे नेत्रोंसे देखा, वहाँसे कुछ ही दूरपर एक अशोकका वृक्ष था। दमयन्ती उसके पास गयी। वह तरुवर अशोक-फूलोंसे भरा था। उस वनमें पल्लवोंसे लदा हुआ और पक्षियोंके कलरवोंसे गुंजायमान वह वृक्ष बड़ा ही मनोरम जान पड़ता था ॥ १०१-१०२ ॥
अहो बतायमगमः श्रीमानस्मिन् वनान्तरे ।
आपीडैर्बहुभिर्भाति श्रीमान् पर्वतराडिव ॥ १०३ ॥
(उसे देखकर वह मन-ही-मन कहने लगी—) 'अहो! इस वनके भीतर यह अशोक बड़ा ही सुन्दर है। यह अनेक प्रकारके फल, फूल आदि अलंकारोंसे अलंकृत सुन्दर गिरिराजकी भाँति सुशोभित हो रहा है' ॥ १०३ ॥
विशोकां कुरु मां क्षिप्रमशोक प्रियदर्शन ।
वीतशोकभयाबाधं कच्चित् त्वं दृष्टवान् नृपम् ॥ १०४ ॥ नलं नामारिदमनं दमयन्त्याः प्रियं पतिम् । निषधानामधिपतिं दृष्टवानसि मे प्रियम् ॥ १०५ ॥ (अब उसने अशोकसे कहा—) ‘प्रियदर्शन अशोक! तुम शीघ्र ही मेरा शोक दूर कर दो। क्या तुमने शोक, भय और बाधासे रहित शत्रुदमन राजा नलको देखा है? क्या मेरे प्रियतम, दमयन्तीके प्राणवल्लभ, निषधनरेश नलपर तुम्हारी दृष्टि पड़ी है? ॥ १०४-१०५ ॥
एकवस्त्रार्धसंवीतं सुकुमारतनुत्वचम् । व्यसनेनार्दितं वीरमरण्यमिदमागतम् ॥ १०६ ॥ ‘उन्होंने एक साड़ीके आधे टुकड़ेसे अपने शरीरको ढँक रखा है, उनके अंगोंकी त्वचा बड़ी सुकुमार है। वे वीरवर नल भारी संकटसे पीड़ित होकर इस वनमें आये हैं ॥ १०६ ॥
यथा विशोका गच्छेयमशोकनग तत् कुरु । सत्यनामा भवाशोक अशोकः शोकनाशनः ॥ १०७ ॥ ‘अशोकवृक्ष! तुम ऐसा करो, जिससे मैं यहाँसे शोकरहित होकर जाऊँ। अशोक उसे कहते हैं, जो शोकका नाश करनेवाला हो, अतः अशोक! तुम अपने नामको सत्य एवं सार्थक करो’ ॥ १०७ ॥
एवं साशोकवृक्षं तमार्ता वै परिगम्य ह । जगाम दारुणतरं देशं भैमी वराङ्गना ॥ १०८ ॥ इस प्रकार शोकार्त हुई सुन्दरी दमयन्ती उस अशोकवृक्षकी परिक्रमा करके वहाँसे अत्यन्त भयंकर स्थानकी ओर गयी ॥ १०८ ॥
सा ददर्श नगान् नैकान् नैकाश्च सरितस्तथा । नैकांश्च पर्वतान् रम्यान् नैकांश्च मृगपक्षिणः ॥ १०९ ॥ कन्दरांश्च नितम्बांश्च नदीश्चाद्भुतदर्शनाः । ददर्श तान् भीमसुता पतिमन्वेषती तदा ॥ ११० ॥ गत्वा प्रकृष्टमध्वानं दमयन्ती शुचिस्मिता । ददर्शाथ महासार्थं हस्त्यश्वरथसंकुलम् ॥ १११ ॥ उत्तरन्तं नदीं रम्यां प्रसन्नसलिलां शुभाम् । सुशीततोयां विस्तीर्णां हृदिनीं वेतसैर्वृताम् ॥ ११२ ॥ उसने अनेक प्रकारके वृक्ष, अनेकानेक सरिताओं, बहुसंख्यक रमणीय पर्वतों, अनेक मृग-पक्षियों, पर्वतकी कन्दराओं तथा उनके मध्यभागों और अद्भुत नदियोंको देखा। पतिका अन्वेषण करनेवाली दमयन्तीने उस समय पूर्वोक्त सभी वस्तुओंको देखा। इस तरह बहुत दूरतकका मार्ग तय कर लेनेके बाद पवित्र मुसकानवाली दमयन्तीने एक बहुत बड़े सार्थ (व्यापारियोंके दल)-को देखा, जो हाथी, घोड़े तथा रथसे व्याप्त था। वह व्यापारियोंका
समूह स्वच्छ जलसे सुशोभित एक सुन्दर रमणीय नदीको पार कर रहा था। नदीका जल बहुत ठंडा था। उसका पाट चौड़ा था। उसमें कई कुण्ड थे और वह किनारेपर उगे हुए बेंतके वृक्षोंसे आच्छादित हो रही थी ॥ १०९—११२ ॥
प्रोद्घुष्टां क्रौञ्चकुररैश्चक्रवाकोपकूजिताम् । कूर्मग्राहझषाकीर्णां विपुलद्वीपशोभिताम् ॥ ११३ ॥
उसके तटपर क्रौंच, कुरर और चक्रवाक आदि पक्षी कूज रहे थे। कछुए, मगर और मछलियोंसे भरी हुई वह नदी विस्तृत टापूसे सुशोभित हो रही थी ॥ ११३ ॥
सा दृष्ट्वैव महासार्थं नलपत्नी यशस्विनी । उपसर्प्य वरारोहा जनमध्यं विवेश ह ॥ ११४ ॥
उस बहुत बड़े समूहको देखते ही यशस्विनी नलपत्नी सुन्दरी दमयन्ती उसके पास पहुँच कर लोगोंकी भीड़में घुस गयी ॥ ११४ ॥
उन्मत्तरूपा शोकार्ता तथा वस्त्रार्धसंवृता । कृशा विवर्णा मलिना पांसुध्वस्तशिरोरुहा ॥ ११५ ॥
उसका रूप उन्मत्त स्त्रीका-सा जान पड़ता था, वह शोकसे पीड़ित, दुर्बल, उदास और मलिन हो रही थी। उसने आधे वस्त्रसे अपने शरीरको ढक रखा था और उसके केशोंपर धूल जम गयी थी ॥ ११५ ॥
तां दृष्ट्वा तत्र मनुजाः केचिद् भीताः प्रदुद्रुवुः । केचिच्चिन्तापरा जग्मुः केचित् तत्र विचुक्रुशुः ॥ ११६ ॥
वहाँ दमयन्तीको सहसा देखकर कितने ही मनुष्य भयसे भाग खड़े हुए। कोई-कोई भारी चिन्तामें पड़ गये और कुछ लोग तो चीखने-चिल्लाने लगे ॥ ११६ ॥
प्रहसन्ति स्म तां केचिदभ्यसूयन्ति चापरे । अकुर्वत दयां केचित् पप्रच्छुश्चापि भारत ॥ ११७ ॥
कुछ लोग उसकी हँसी उड़ाते थे और कुछ उसमें दोष देख रहे थे। भारत! उन्हींमें कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें उसपर दया आ गयी और उन्होंने उसका समाचार पूछा — ॥ ११७ ॥
कासि कस्यासि कल्याणि किं वा मृगयसे वने । त्वां दृष्ट्वा व्यथिताः स्मेह कच्चित् त्वमसि मानुषी ॥ ११८ ॥
'कल्याणि! तुम कौन हो? किसकी स्त्री हो और इस वनमें क्या खोज रही हो? तुम्हें देखकर हम बहुत दुःखी हैं। क्या तुम मानवी हो? ॥ ११८ ॥
वद सत्यं वनस्यास्य पर्वतस्याथवा दिशः । देवता त्वं हि कल्याणि त्वां वयं शरणं गताः ॥ ११९ ॥
'कल्याणि! सच बताओ, तुम इस वन, पर्वत अथवा दिशाकी अधिष्ठात्री देवी तो नहीं हो? हम सब लोग तुम्हारी शरणमें आये हैं ॥ ११९ ॥
यक्षी वा राक्षसी वा त्वमुताहोऽसि वराङ्गना । सर्वथा कुरु नः स्वस्ति रक्ष वास्माननिन्दिते ॥ १२० ॥ यथायं सर्वथा सार्थः क्षेमी शीघ्रमितो व्रजेत् । तथा विधत्स्व कल्याणि यथा श्रेयो हि नो भवेत् ॥ १२१ ॥ 'तुम यक्षी हो या राक्षसी अथवा कोई श्रेष्ठ देवांगना हो? अनिन्दिते! सर्वथा हमारा कल्याण एवं संरक्षण करो। कल्याणि! यह हमारा समूह शीघ्र कुशलपूर्वक यहाँसे चला जाय और हमलोगोंका सब प्रकारसे भला हो, ऐसी कृपा करो' ॥ १२०-१२१ ॥ तथोक्ता तेन सार्थेन दमयन्ती नृपात्मजा । प्रत्युवाच ततः साध्वी भर्तृव्यसनपीडिता ॥ १२२ ॥ उस यात्रीदलके द्वारा जब ऐसी बात कही गयी, तब पतिके वियोगजनित दुःखसे पीड़ित साध्वी राजकुमारी दमयन्तीने उन सबको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ १२२ ॥ सार्थवाहं च सार्थं च जना ये चात्र केचन । युवस्थविरबालाश्च सार्थस्य च पुरोगमाः ॥ १२३ ॥ मानुषीं मां विजानीत मनुजाधिपतेः सुताम् । नृपस्नुषां राजभार्यां भर्तृदर्शनलालसाम् ॥ १२४ ॥ 'इस जनसमुदायके जो सरदार हों, उनसे, इस जनसमूहसे तथा इसके (भीतर रहनेवाले और) आगे चलनेवाले जो बाल-वृद्ध और युवक मनुष्य हों, उन सबसे मेरा यह कहना है कि आप सब लोग मुझे मानवी समझें। मैं एक नरेशपुत्री, महाराजकी पुत्रवधू तथा राजपत्नी हूँ। अपने स्वामीके दर्शनकी इच्छासे इस वनमें भटक रही हूँ ॥ १२३-१२४ ॥ विदर्भराण्मम पिता भर्ता राजा च नैषधः । नलो नाम महाभागस्तं मृग्याम्यपराजितम् ॥ १२५ ॥ 'विदर्भराज भीम मेरे पिता हैं, निषधनरेश महाभाग राजा नल मेरे पति हैं। मैं उन्हीं अपराजित वीर नलकी खोज कर रही हूँ ॥ १२५ ॥ यदि जानीत नृपतिं क्षिप्रं शंसत मे प्रियम् । नलं पुरुषशार्दूलममित्रगणसूदनम् ॥ १२६ ॥ 'यदि आपलोग शत्रुसमूहका संहार करनेवाले मेरे प्रियतम पुरुषसिंह महाराज नलके विषयमें कुछ जानते हों तो शीघ्र बतावें' ॥ १२६ ॥ तामुवाचानवद्याङ्गीं सार्थस्य महतः प्रभुः । सार्थवाहः शुचिर्नाम शृणु कल्याणि मद्वचः ॥ १२७ ॥ उस महान् समूहका मालिक और समस्त यात्रीदलका संचालक (वणिक्) शुचिनामसे प्रसिद्ध था। उसने उस सुन्दरीसे कहा—'कल्याणि! मेरी बात सुनो'— ॥ १२७ ॥ अहं सार्थस्य नेता वै सार्थवाहः शुचिस्मिते । मनुष्यं नलनामानं न पश्यामि यशस्विनि ॥ १२८ ॥
‘शुचिस्मिते! मैं इस दलका नेता और संचालक हूँ। यशस्विनि! मैंने नल नामधारी किसी मनुष्यको इस वनमें नहीं देखा है ।। १२८ ।।
कुञ्जरद्वीपिमहिषशार्दूलर्क्षमृगानपि ।
पश्याम्यस्मिन् वने कृत्स्ने ह्यमनुष्यनिषेविते ।। १२९ ।।
‘यह सम्पूर्ण वन मनुष्येतर प्राणियोंसे भरा है। इसके भीतर हाथियों, चीतों, भैंसों, सिंहों, रीछों और मृगोंको ही मैं देखता आ रहा हूँ’ ।। १२९ ।।
ऋते त्वां मानुषीं मर्त्यं न पश्यामि महावने ।
तथा नो यक्षराडद्य मणिभद्रः प्रसीदतु ।। १३० ।।
‘तुम-जैसी मानव-कन्याके सिवा और किसी मनुष्यको मैं इस विशाल वनमें नहीं देख रहा हूँ। इसलिये यक्षराज मणिभद्र आज हमपर प्रसन्न हों’ ।। १३० ।।
साब्रवीद् वणिजः सर्वान् सार्थवाहं च तं ततः ।
क्व नु यास्यति सार्थोऽयमेतदाख्यातुमर्हसि ।। १३१ ।।
तब दमयन्तीने उन सब व्यापारियों तथा दलके संचालकसे कहा—‘आपका यह दल कहाँ जायगा? यह मुझे बताइये’ ।। १३१ ।।
सार्थवाह उवाच
सार्थोऽयं चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यदर्शिनः ।
क्षिप्रं जनपदं गन्ता लाभाय मनुजात्मजे ।। १३२ ।।
**सार्थवाहने कहा—**राजकुमारी! हमारा यह दल शीघ्र ही सत्यदर्शी चेदिराज सुबाहुके जनपद (नगर)-में विशेष लाभके उद्देश्यसे जायगा ।। १३२ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीसार्थवाहसंगमे
चतुःषष्टितमोऽध्यायः ।। ६४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीकी सार्थवाहसे भेंटविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६४ ।।
अध्याय (पृष्ठ 464)
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः
जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दुःखित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास
बृहदश्व उवाच
सा तच्छ्रुत्वानवद्याङ्गी सार्थवाहवचस्तदा ।
जगाम सह तेनैव सार्थेन पतिलालसा ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं— राजन्! दलके संचालककी वह बात सुनकर निर्दोष एवं सुन्दर अंगोंवाली दमयन्ती पतिदेवके दर्शनके लिये उत्सुक हो व्यापारियोंके उस दलके साथ ही यात्रा करने लगी ॥ १ ॥
अथ काले बहुतिथे वने महति दारुणे ।
तडागं सर्वतोभद्रं पद्मंसौगन्धिकं महत् ॥ २ ॥
ददृशुर्वणिजो रम्यं प्रभूतयवसेन्धनम् ।
बहुपुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् ॥ ३ ॥
तदनन्तर बहुत समयके बाद एक भयंकर विशाल वनमें पहुँचकर उन व्यापारियोंने एक महान् सरोवर देखा, जिसका नाम था, पद्मसौगन्धिक। वह सब ओरसे कल्याणप्रद जान पड़ता था। उस रमणीय सरोवरके पास घास और ईंधनकी अधिकता थी, फूल और फल भी वहाँ प्रचुर मात्रामें उपलब्ध होते थे। उस तालाबपर बहुत-से पक्षी निवास करते थे ॥ २-३ ॥
निर्मलस्वादुसलिलं मनोहारि सुशीतलम् ।
सुपरिश्रान्तवाहास्ते निवेशाय मनो दधुः ॥ ४ ॥
सरोवरका जल स्वच्छ और स्वादु था, वह देखनेमें बड़ा ही मनोहर और अत्यन्त शीतल था। व्यापारियोंके वाहन बहुत थक गये थे। इसलिये उन्होंने वहीं पड़ाव डालनेका निश्चय किया ॥ ४ ॥
सम्मते सार्थवाहस्य विविशुर्वनमुत्तमम् ।
उवास सार्थः सुमहान् वेलामासाद्य पश्चिमाम् ॥ ५ ॥
समूहके अधिपतिसे अनुमति लेकर सब लोगोंने उस उत्तम वनमें प्रवेश किया और वह महान् जनसमुदाय सरोवरके पश्चिम तटपर ठहर गया ॥ ५ ॥
अथार्धरात्रसमये निःशब्दस्तिमिते तदा ।
सुप्ते सार्थे परिश्रान्ते हस्तियूथमुपागमत् ॥ ६ ॥
पानीयार्थं गिरिनदीं मदप्रस्रवणाविलाम् ।
अथापश्यत सार्थं तं सार्थजान् सुबहून् गजान् ।। ७ ।।
तत्पश्चात् आधी रातके समय जब कहींसे भी कोई शब्द सुनायी नहीं देता था और उस दलके सभी लोग थककर सो गये थे, उस समय गजराजोंके मदकी धारासे मलिन जलवाली पहाड़ी नदीमें पानी पीनेके लिये (जंगली) हाथियोंका एक झुंड आ निकला। उस झुंडने व्यापारियोंके सोये हुए दलको और उसके साथ आये हुए बहुत-से हाथियोंको भी देखा ।। ६-७ ।।
ते तान् ग्राम्यगजान् दृष्ट्वा सर्वे वनगजास्तदा ।
समाद्रवन्त वेगेन जिघांसन्तो मदोत्कटाः ।। ८ ।।
तब वनमें रहनेवाले उन सभी मदोन्मत्त गजोंने उन ग्रामीण हाथियोंको देखकर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे उनपर वेगपूर्वक आक्रमण किया ।। ८ ।।
तेषामापततां वेगः करिणां दुःसहोऽभवत् ।
नगाग्रादिव शीर्णानां शृङ्गाणां पततां क्षितौ ।। ९ ।।
पर्वतकी चोटीसे टूटकर पृथ्वीपर गिरनेवाले बड़े-बड़े शिखरोंके समान उन आक्रमणकारी जंगली हाथियोंका वेग (उस यात्रीदलके लिये) अत्यन्त दुःसह था ।। ९ ।।
स्पन्दतामपि नागानां मार्गा नष्टा वनोद्भवाः ।
मार्गं संरुध्य संसुप्तं पद्मिन्याः सार्थमुत्तमम् ।। १० ।।
ग्रामीण हाथियोंपर आक्रमण करनेकी चेष्टावाले उन वनवासी गजराजोंके वन्य मार्ग अवरुद्ध हो गये थे। सरोवरके तटपर व्यापारियोंका महान् समुदाय उनका मार्ग रोककर सो रहा था ।। १० ।।
ते तं ममर्दुः सहसा चेष्टमानं महीतले ।
हाहाकारं प्रमुञ्चन्तः सार्थिकाः शरणार्थिनः ।। ११ ।।
वनगुल्मांश्च धावन्तो निद्रान्धा बहवोऽभवन् ।
केचिद् दन्तैः करैः केचित् केचित् पद्भ्यां हता गजैः ।। १२ ।।
उन हाथियोंने सहसा पहुँचकर समूचे दलको कुचल दिया। कितने ही मनुष्य धरतीपर पड़े-पड़े छटपटा रहे थे। उस दलके कितने ही पुरुष हाहाकार करते हुए बचावकी जगह खोजते हुए जंगलके पौधोंके समूहमें भाग गये। बहुत-से मनुष्य तो नींदके मारे अन्धे हो रहे थे। हाथियोंने किन्हींको दाँतोंसे, किन्हींको सूँडोंसे और कितनोंको पैरोंसे घायल कर दिया ।। ११-१२ ।।
निहतोष्ट्राश्वबहुलाः पदातिजनसंकुलाः । भयादाधावमानाश्च परस्परहतास्तदा ॥ १३ ॥ घोरान् नादान् विमुञ्चन्तो निपेतुर्धरणीतले । वृक्षेष्वारुह्य संरब्धाः पतिता विषमेषु च ॥ १४ ॥ उनके बहुत-से ऊँट और घोड़े मारे गये और उस समुदायमें बहुत-से पैदल लोग भी थे। वे सब लोग उस समय भयसे चारों ओर भागते हुए एक-दूसरेसे टकराकर चोट खा जाते थे। घोर आर्तनाद करते हुए सभी लोग धरतीपर गिरने लगे। कुछ लोग बड़े वेगसे वृक्षोंपर चढ़ते हुए नीचेकी विषम भूमियोंपर गिर पड़ते थे ॥ १३-१४ ॥
एवं प्रकारैर्बहुभिर्देवेनाक्रम्य हस्तिभिः । राजन् विनिहतं सर्वं समृद्धं सार्थमण्डलम् ॥ १५ ॥ राजन्! इस प्रकार दैववश बहुतेरे जंगली हाथियोंने आक्रमण करके (प्रायः) उस सम्पूर्ण समृद्धिशाली व्यापारियोंके समुदायको नष्ट कर दिया ॥ १५ ॥
आरावः सुमहांश्चासीत् त्रैलोक्यभयकारकः । एषोऽग्निरुत्थितः कष्टस्त्रायध्वं धावताधुना ॥ १६ ॥ रत्नराशिविशीर्णोऽयं गृह्णीध्वं किं प्रधावत ।
उस समय वहाँ तीनों लोकोंको भयमें डालनेवाला महान् आर्तनाद एवं चीत्कार हो रहा था। कोई कहता—‘अरे! इधर बड़े जोरकी आग प्रज्वलित हो उठी है। यह भारी संकट आ गया (अब) दौड़ो और बचाओ।’ दूसरा कहता—‘अरे! ये ढेर-के-ढेर रत्न बिखरे पड़े हैं, इन्हें सँभालकर रखो। इधर-उधर भागते क्यों हो?’ ।। १६½ ।। सामान्यमेतद् द्रविणं न मिथ्यावचनं मम ।। १७ ।। तीसरा कहता था—‘भाई! इस धनपर सबका समान अधिकार है, मेरी यह बात झूठी नहीं है’ ।। १७ ।। एवमेवाभिभाषन्तो विद्रवन्ति भयात् तदा । पुनरेवाभिधास्यामि चिन्तयध्वं सुकातराः ।। १८ ।। कोई कहता—‘ऐ कायरो! मैं फिर तुमसे बात करूँगा, अभी अपनी रक्षाकी चिन्ता करो।’ इस तरहकी बातें करते हुए सब लोग भयसे भाग रहे थे ।। १८ ।। तस्मिंस्तथा वर्तमाने दारुणे जनसंक्षये । दमयन्ती च बुबुधे भयसंत्रस्तमानसा ।। १९ ।। इस प्रकार जब वहाँ भयानक नरसंहार हो रहा था, उसी समय दमयन्ती भी जाग उठी। उसका हृदय भयसे संत्रस्त हो उठा ।। १९ ।। अपश्यद् वैशसं तत्र सर्वलोकभयंकरम् । अदृष्टपूर्वं तद् दृष्ट्वा बाला पद्मनिभेक्षणा ।। २० ।। संसक्तवदनाश्वासा उत्तस्थौ भयविह्वला । ये तु तत्र विनिर्मुक्ताः सार्थात् केचिदविक्षताः ।। २१ ।। तेऽब्रुवन् सहिताः सर्वे कस्येदं कर्मणः फलम् । नूनं न पूजितोऽस्माभिर्मणिभद्रो महायशाः ।। २२ ।। तथा यक्षाधिपः श्रीमान् न वै वैश्रवणः प्रभुः । न पूजा विघ्नकर्तॄणामथवा प्रथमं कृता ।। २३ ।। शकुनानां फलं वाथ विपरीतमिदं ध्रुवम् । ग्रहा न विपरीतास्तु किमन्यदिदमागतम् ।। २४ ।। वहाँ उसने वह महासंहार अपनी आँखों देखा, जो सब लोगोंके लिये भयंकर था। उसने ऐसी दुर्घटना पहले कभी नहीं देखी थी। यह सब देखकर वह कमलनयनी बाला भयसे व्याकुल हो उठी। उसको कहींसे कोई सान्त्वना नहीं मिल रही थी। वह इस प्रकार स्तब्ध हो रही थी, मानो धरतीसे सट गयी हो। तदनन्तर वह किसी प्रकार उठकर खड़ी हुई। दलके जो लोग उस संकटसे मुक्त हो आघातसे बचे हुए थे, वे सब एकत्र हो कहने लगे कि ‘यह हमारे किस कर्मका फल है? निश्चय ही हमने महायशस्वी मणिभद्रका पूजन नहीं किया है। इसी प्रकार हमने श्रीमान् यक्षराज कुबेरकी भी पूजा नहीं की है अथवा विघ्नकर्ता विनायकोंकी भी पहले पूजा नहीं कर ली थी। अथवा हमने पहले जो-जो शकुन देखे थे, उसका यह
विपरीत फल है। यदि हमारे ग्रह विपरीत न होते तो और किस हेतुसे यह संकट हमारे ऊपर कैसे आ सकता था?' ।। २०—२४ ।।
अपरे त्वब्रुवन् दीना ज्ञातिद्रव्यविनाकृताः ।
यासावद्य महासार्थे नारी ह्युन्मत्तदर्शना ।। २५ ।।
प्रविष्टा विकृताकारा कृत्वा रूपममानुषम् ।
तयेयं विहिता पूर्वं माया परमदारुणा ।। २६ ।।
दूसरे लोग जो अपने कुटुम्बीजनों और धनके विनाशसे दीन हो रहे थे, वे इस प्रकार कहने लगे—'आज हमारे विशाल जनसमूहके साथ वह जो उन्मत्त-जैसी दिखायी देनेवाली नारी आ गयी थी, वह विकराल आकारवाली राक्षसी थी तो भी अलौकिक सुन्दर रूप धारण करके हमारे दलमें घुस गयी थी। उसीने पहलेसे ही यह अत्यन्त भयंकर माया फैला रखी थी ।। २५-२६ ।।
राक्षसी वा ध्रुवं यक्षी पिशाची वा भयंकरी ।
तस्याः सर्वमिदं पापं नात्र कार्या विचारणा ।। २७ ।।
पश्यामो यदि तां पापां सार्थघ्नीं नैकदुःखदाम् ।
लोष्ठभिः पांसुभिश्चैव तृणैः काष्ठैश्च मुष्टिभिः ।। २८ ।।
अवश्यमेव हन्यामः सार्थस्य किल कृत्यकाम् ।
'निश्चय ही वह राक्षसी, यक्षी अथवा भयंकर पिशाची थी—इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं कि यह सारा पापपूर्ण कृत्य उसीका किया हुआ है। उसने हमें अनेक प्रकारका दुःख दिया और प्रायः सारे दलका विनाश कर डाला। वह पापिनी समूचे सार्थके लिये अवश्य ही कृत्या बनकर आयी थी। यदि हम उसे देख लेंगे तो ढेलोंसे, धूल और तिनकोंसे, लकड़ियों और मुक्कोंसे भी अवश्य मार डालेंगे ।। २७-२८ १/२ ।।
दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं तेषां सुदारुणम् ।। २९ ।।
ह्रीता भीता च संविग्ना प्राद्रवद् यत्र काननम् ।
आशङ्कमाना तत्पापमात्मानं पर्यदेवयत् ।। ३० ।।
'उनका वह अत्यन्त भयंकर वचन सुनकर दमयन्ती लज्जासे गड़ गयी और भयसे व्याकुल हो उठी। उनके पापपूर्ण संकल्पके संघटित होनेकी आशंका करके वह उसी ओर भाग गयी, जहाँ घना जंगल था। वहाँ जाकर अपनी इस परिस्थितिपर विचार करके वह विलाप करने लगी— ।। २९-३० ।।
अहो ममोपरि विधेः संरम्भो दारुणो महान् ।
नानुबध्नाति कुशलं कस्येदं कर्मणः फलम् ।। ३१ ।।
'अहो! मुझपर विधाताका अत्यन्त भयानक और महान् कोप है, जिससे मुझे कहीं भी कुशल-क्षेमकी प्राप्ति नहीं होती। न जाने, यह हमारे किस कर्मका फल है? ।। ३१ ।।
न स्मराम्यशुभं किंचित् कृतं कस्यचिदण्वपि ।
कर्मणा मनसा वाचा कस्येदं कर्मणः फलम् ॥ ३२ ॥
‘मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी किसीका थोड़ा-सा भी अमंगल किया हो, इसकी याद नहीं आती, फिर यह मेरे किस कर्मका फल मिल रहा है? ॥ ३२ ॥
नूनं जन्मान्तरकृतं पापमापतितं महत् ।
अपश्चिमामिमां कष्टामापदं प्राप्तवत्यहम् ॥ ३३ ॥
‘निश्चय ही यह मेरे दूसरे जन्मोंके किये हुए पापका महान् फल प्राप्त हुआ है, जिससे मैं इस अनन्त कष्टमें पड़ गयी हूँ ॥ ३३ ॥
भर्तृराज्यापहरणं स्वजनाच्च पराजयः ।
भर्त्रा सह वियोगश्च तनयाभ्यां च विच्युतिः ॥ ३४ ॥
‘मेरे स्वामीके राज्यका अपहरण हुआ, उन्हें आत्मीयजनसे ही पराजित होना पड़ा, मेरा अपने पतिदेवसे वियोग हुआ और अपनी संतानोंके दर्शनसे भी वंचित हो गयी हूँ ॥ ३४ ॥
निर्नाथता वने वासो बहुव्यालनिषेविते ।
‘इतना ही नहीं, असंख्य सर्प आदि जन्तुओंसे भरे हुए इस वनमें मुझे अनाथकी-सी दशामें रहना पड़ता है' ॥
अथापरेद्युः सम्प्राप्ते हतशिष्टा जनास्तदा ॥ ३५ ॥
देशात् तस्माद् विनिष्क्रम्य शोचन्ते वैशसं कृतम् ।
भ्रातरं पितरं पुत्रं सखायं च नराधिप ॥ ३६ ॥
तदनन्तर दूसरा दिन प्रारम्भ होनेपर मरनेसे बचे हुए लोग उस स्थानसे निकलकर उस विकट संहारके लिये शोक करने लगे। राजन्! कोई भाईके लिये दुःखी था, कोई पिताके लिये; किसीको पुत्रका शोक था और किसीको मित्रका ॥ ३५-३६ ॥
अशोचत् तत्र वैदर्भी किं नु मे दुष्कृतं कृतम् ।
योऽपि मे निर्जनेऽरण्ये सम्प्राप्तोऽयं जनार्णवः ॥ ३७ ॥
स हतो हस्तियूथेन मन्दभाग्यान्ममैव तत् ।
प्राप्तव्यं सुचिरं दुःखं नूनमद्यापि वै मया ॥ ३८ ॥
विदर्भराजकुमारी दमयन्ती भी इसके लिये शोक करने लगी कि ‘मैंने कौन-सा पाप किया है, जिससे इस निर्जन वनमें मुझे जो यह समुद्रके समान जनसमुदाय प्राप्त हो गया था, वह भी मेरे ही दुर्भाग्यसे हाथियोंके झुंडद्वारा मारा गया। निश्चय ही मुझे अभी दीर्घकालतक दुःख-ही-दुःख भोगना है ॥ ३७-३८ ॥
नाप्राप्तकालो म्रियते श्रुतं वृद्धानुशासनम् ।
या नाहमद्य मृदिता हस्तियूथेन दुःखिता ॥ ३९ ॥
‘जिसकी मृत्युका समय नहीं आया है, वह इच्छा होते हुए भी मर नहीं सकता। वृद्ध पुरुषोंका यह जो उपदेश मैंने सुन रखा है, यह ठीक ही जान पड़ता है, तभी तो आज मैं
दुःखित होनेपर भी हाथियोंके झुंडसे कुचलकर मर न सकी ॥ ३९ ॥
न ह्यदैवकृतं किंचिन्नराणामिह विद्यते ।
न च मे बालभावेऽपि किंचित् पापकृतं कृतम् ॥ ४० ॥
कर्मणा मनसा वाचा यदिदं दुःखमागतम् ।
‘मनुष्योंको इस जगत्में कोई भी सुख या दुःख ऐसा नहीं मिलता, जो विधाताका दिया हुआ न हो। मैंने बचपनमें भी मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा ऐसा पाप नहीं किया है, जिससे मुझे यह दुःख प्राप्त होता ॥ ४० १/२ ॥
मन्ये स्वयंवरकृते लोकपालाः समागताः ॥ ४१ ॥
प्रत्याख्याता मया तत्र नलस्यार्थाय देवताः ।
नूनं तेषां प्रभावेण वियोगं प्राप्तवत्यहम् ॥ ४२ ॥
एवमादीनि दुःखार्ता सा विलप्य वराङ्गना ।
प्रलापानि तदा तानि दमयन्ती पतिव्रता ॥ ४३ ॥
‘मैं समझती हूँ, स्वयंवरके लिये जो लोकपाल देवगण पधारे थे, नलके कारण मैंने उनका तिरस्कार कर दिया था। अवश्य उन्हीं देवताओंके प्रभावसे आज मुझे वियोगका कष्ट प्राप्त हुआ है।’ इस प्रकार दुःखसे आतुर हुई सुन्दरी पतिव्रता दमयन्तीने उस समय अनेक प्रकारसे विलाप एवं प्रलाप किये ॥ ४१—४३ ॥
हतशेषैः सह तदा ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।
अगच्छद् राजशार्दूल चन्द्रलेखेव शारदी ॥ ४४ ॥
गच्छन्ती साचिराद् बाला पुरमासादयन्महत् ।
सायाह्ने चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यदर्शिनः ॥ ४५ ॥
नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर मरनेसे बचे हुए वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ यात्रा करती हुई शरत्कालके चन्द्रमाकी कलाके समान वह सुन्दरी युवती थोड़े ही समयमें संध्या होते-होते सत्यदर्शी चेदिराज सुबाहुकी राजधानीमें जा पहुँची ॥ ४४-४५ ॥
अथ वस्त्रार्धसंवीता प्रविवेश पुरोत्तमम् ।
तं विह्वलां कृशां दीनां मुक्तकेशीममार्जिताम् ॥ ४६ ॥
शरीरमें आधी साड़ीको लपेटे हुए ही उसने उस उत्तम नगरमें प्रवेश किया। वह विह्वल, दीन और दुर्बल हो रही थी। उसके सिरके बाल खुले हुए थे। उसने स्नान नहीं किया था ॥ ४६ ॥
उन्मत्तामिव गच्छन्तीं ददृशुः पुरवासिनः ।
प्रविशन्तीं तु तां दृष्ट्वा चेदिराजपुरीं तदा ॥ ४७ ॥
अनुजग्मुस्तत्र बाला ग्रामिपुत्राः कुतूहलात् ।
सा तैः परिवृतागच्छत् समीपं राजवेश्मनः ॥ ४८ ॥
पुरवासियोंने उसे उन्मत्ताकी भाँति जाते देखा। चेदिनरेशकी राजधानीमें उसे प्रवेश करते देख उस समय बहुत-से ग्रामीण बालक कौतूहलवश उसके साथ हो लिये थे। उनसे घिरी हुई दमयन्ती राजमहलके समीप गयी॥ ४७-४८॥
तां प्रासादगतापश्यद् राजमाता जनैर्वृताम्।
धात्रीमुवाच गच्छैनामानयेह ममान्तिकम् ॥ ४९ ॥
उस समय राजमाताने उसे महलपरसे देखा। वह जनसाधारणसे घिरी हुई थी। राजमाताने धायसे कहा—‘जाओ, इस युवतीको मेरे पास ले आओ ॥ ४९ ॥
जनेन क्लिश्यते बाला दुःखिता शरणार्थिनी।
तादृग् रूपं च पश्यामि विद्योतयति मे गृहम् ॥ ५० ॥
‘इसे लोग तंग कर रहे हैं। यह दुःखिनी युवती कोई आश्रय चाहती है। मुझे इसका रूप ऐसा दिखायी देता है, जो मेरे घरको प्रकाशित कर देगा ॥ ५० ॥
उन्मत्तवेषा कल्याणी श्रीरिवायतलोचना।
सा जनं वारयित्वा तं प्रासादतलमुत्तमम् ॥ ५१ ॥
आरोप्य विस्मिता राजन् दमयन्तीमपृच्छत।
एवमप्यसुखाविष्टा बिभर्षि परमं वपुः ॥ ५२ ॥
‘इसका वेष तो उन्मत्तके समान है, परंतु यह विशाल नेत्रोंवाली युवती कल्याणमयी लक्ष्मीके समान जान पड़ती है।' धाय उन सब लोगोंको हटाकर उसे उत्तम राजमहलकी अट्टालिकापर चढ़ा ले आयी। राजन्! तत्पश्चात् विस्मित होकर राजमाताने दमयन्तीसे पूछा—‘अहो! तुम इस प्रकार दुःखसे दबी होनेपर भी इतना सुन्दर रूप कैसे धारण करती हो? ॥ ५१-५२ ॥
भासि विद्युदिवाभ्रेषु शंस मे कासि कस्य वा ।
न हि ते मानुषं रूपं भूषणैरपि वर्जितम् ॥ ५३ ॥
असहाया नरेभ्यश्च नोद्विजस्यमरप्रभे ।
‘मेघमालामें प्रकाशित होनेवाली बिजलीकी भाँति तुम इस दुःखमें भी कैसी तेजस्विनी दिखायी देती हो। मुझसे बताओ, तुम कौन हो? किसकी स्त्री हो? यद्यपि तुम्हारे शरीरपर कोई आभूषण नहीं है तो भी तुम्हारा यह रूप मानव-जगत्का नहीं जान पड़ता। देवताकी-सी दिव्य कान्ति धारण करनेवाली वत्से! तुम असहाय-अवस्थामें होकर भी लोगोंसे डरती क्यों नहीं?’ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या भैमी वचनमब्रवीत् ॥ ५४ ॥
उसकी वह बात सुनकर भीमकुमारीने कहा— ॥ ५४ ॥
मानुषीं मां विजानीहि भर्तारं समनुव्रताम् ।
सैरन्ध्रीजातिसम्पन्नां भुजिष्यां कामवासिनीम् ॥ ५५ ॥
‘माताजी! आप मुझे मानव-कन्या ही समझिये। मैं अपने पतिके चरणोंमें अनुराग रखनेवाली एक नारी हूँ। मेरी अन्तःपुरमें काम करनेवाली सैरन्ध्री जाति है। मैं सेविका हूँ और जहाँ इच्छा होती है, वहीं रहती हूँ ॥
फलमूलाशनामेकां यत्रसायंप्रतिश्रयाम् ।
असंख्येयगुणो भर्ता मां च नित्यमनुव्रतः ॥ ५६ ॥
'मैं अकेली हूँ, फल-मूल खाकर जीवन-निर्वाह करती हूँ और जहाँ साँझ होती है, वहीं टिक जाती हूँ। मेरे स्वामीमें असंख्य गुण हैं, उनका मेरे प्रति सदा अत्यन्त अनुराग है ।। ५६ ।।
भक्ताहमपि तं वीरं छायेवानुगता पथि ।
तस्य दैवात् प्रसङ्गोऽभूदतिमात्रं सुदेवने ।। ५७ ।।
'जैसे छाया राह चलनेवाले पथिकके पीछे-पीछे चलती है, उसी प्रकार मैं भी अपने वीर पतिदेवमें भक्तिभाव रखकर सदा उन्हींका अनुसरण करती हूँ। दुर्भाग्यवश एक दिन मेरे पतिदेव जूआ खेलनेमें अत्यन्त आसक्त हो गये ।। ५७ ।।
द्यूते स निर्जितश्चैव वनमेक उपेयिवान् ।
तमेकवसनं वीरमुन्मत्तमिव विह्वलम् ।। ५८ ।।
आश्वासयन्ती भर्तारमहमप्यगमं वनम् ।
स कदाचिद् वने वीरः कस्मिंश्चित् कारणान्तरे ।। ५९ ।।
'और उसीमें अपना सब कुछ हारकर वे अकेले ही वनकी ओर चल दिये। एक वस्त्र धारण किये उन्मत्त और विह्वल हुए अपने वीर स्वामीको सान्त्वना देती हुई मैं भी उनके साथ वनमें चली आयी। एक दिनकी बात है, मेरे वीर स्वामी किसी कारणवश वनमें गये ।। ५८-५९ ।।
क्षुत्परीतस्तु विमनास्तदप्येकं व्यसर्जयात् ।
तमेकवसना नग्नमुन्मत्तवदचेतसम् ।। ६० ।।
अनुव्रजन्ती बहुला न स्वपामि निशास्तदा ।
ततो बहुतिथे काले सुप्तामुत्सृज्य मां क्वचित् ।। ६१ ।।
वाससोऽर्धं परिच्छिद्य त्यक्तवान् मामनागसम् ।
तं मार्गमाणा भर्तारं दह्यमाना दिवानिशम् ।। ६२ ।।
'उस समय वे भूखसे पीड़ित और अनमने हो रहे थे। अतः उन्होंने अपने उस एक वस्त्रको भी कहीं वनमें ही छोड़ दिया। मेरे शरीरपर भी एक ही वस्त्र था। वे नग्न, उन्मत्त-जैसे और अचेत हो रहे थे। उसी दशामें सदा उनका अनुसरण करती हुई अनेक रात्रियोंतक कभी सो न सकी। तदनन्तर बहुत समयके पश्चात् एक दिन जब मैं सो गयी थी, उन्होंने मेरी आधी साड़ी फाड़ ली और मुझ निरपराधिनी पत्नीको वहीं छोड़कर वे कहीं चल दिये। मैं दिन-रात वियोगाग्निमें जलती हुई निरन्तर उन्हीं पतिदेवको ढूँढ़ती फिरती हूँ ।। ६०—६२ ।।
साहं कमलगर्भाभमपश्यन्ती हृदि प्रियम् ।
न विन्दाम्यमरप्रख्यं प्रियं प्राणेश्वरं प्रभुम् ।। ६३ ।।
'मेरे प्रियतमकी कान्ति कमलके भीतरी भागके समान है। वे देवताओंके समान तेजस्वी, मेरे प्राणोंके स्वामी और शक्तिशाली हैं। बहुत खोजनेपर भी मैं अपने प्रियको न तो
देख सकी हूँ और न उनका पता ही पा रही हूँ' ।। ६३ ।। तामश्रुपरिपूर्णाक्षीं विलपन्तीं तथा बहु । राजमाताब्रवीदार्ता भैमीमार्तस्वरां स्वयंम् ।। ६४ ।। वसस्व मयि कल्याणि प्रीतिर्मे परमा त्वयि । मृगयिष्यन्ति ते भद्रे भर्तारं पुरुषा मम ।। ६५ ।। भीमकुमारी दमयन्तीके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे एवं वह आर्तस्वरसे बहुत विलाप कर रही थी। राजमाता स्वयं भी उसके दुःखसे दुःखी हो बोली—'कल्याणि! तुम मेरे पास रहो। तुमपर मेरा बहुत प्रेम है। भद्रे! मेरे सेवक तुम्हारे पतिकी खोज करेंगे ।। ६४-६५ ।। अपि वा स्वयमागच्छेत् परिधावन्नितस्ततः । इहैव वसती भद्रे भर्तारमुपलप्स्यसे ।। ६६ ।। 'अथवा यह भी सम्भव है, वे इधर-उधर भटकते हुए स्वयं ही इधर आ निकलें। भद्रे! तुम यहीं रहकर अपने पतिको प्राप्त कर लोगी' ।। ६६ ।। राजमातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती वचोऽब्रवीत् । समयेनोत्सहे वस्तुं त्वयि वीरप्रजायिनि ।। ६७ ।। राजमाताकी यह बात सुनकर दमयन्तीने कहा—'वीरमातः! मैं एक नियमके साथ आपके यहाँ रह सकती हूँ ।। ६७ ।। उच्छिष्टं नैव भुञ्जीयां न कुर्यां पादधावनम् । न चाहं पुरुषानन्यान् प्रभाषेयं कथंचन ।। ६८ ।। 'मैं किसीका जूठा नहीं खाऊँगी, किसीके पैर नहीं धोऊँगी और किसी भी दूसरे पुरुषसे किसी तरह भी वार्तालाप नहीं करूँगी ।। ६८ ।। प्रार्थयेद् यदि मां कश्चिद् दण्ड्यस्ते स पुमान् भवेत् । वध्यश्च तेऽसकृन्मन्द इति मे व्रतमाहितम् ।। ६९ ।। 'यदि कोई पुरुष मुझे प्राप्त करना चाहे तो वह आपके द्वारा दण्डनीय हो और बार-बार ऐसे अपराध करनेवाले मूढ़को आप प्राणदण्ड भी दें, यही मेरा निश्चित व्रत है ।। ६९ ।। भर्तुरन्वेषणार्थं तु पश्येयं ब्राह्मणानहम् । यद्येवमिह वत्स्यामि त्वत्सकाशे न संशयः ।। ७० ।। 'मैं अपने पतिकी खोजके लिये केवल ब्राह्मणोंसे मिल सकती हूँ। यदि यहाँ ऐसी व्यवस्था हो सके तो निश्चय ही आपके निकट निवास करूँगी। इसमें संशय नहीं है ।। अतोऽन्यथा न मे वासो वर्तते हृदये क्वचित् । तां प्रहृष्टेन मनसा राजमातेदमब्रवीत् ।। ७१ ।। 'यदि इसके विपरीत कोई बात हो तो कहीं भी रहनेका मेरे मनमें संकल्प नहीं हो सकता।' यह सुनकर राजमाता प्रसन्नचित्त होकर उससे बोली— ।। ७१ ।। सर्वमेतत् करिष्यामि दिष्ट्या ते व्रतमीदृशम् ।
एवमुक्त्वा ततो भैमीं राजमाता विशाम्पते ॥ ७२ ॥ उवाचेदं दुहितरं सुनन्दां नाम भारत । सैरन्ध्रीमभिजानीष्व सुनन्दे देवरूपिणीम् ॥ ७३ ॥ ‘बेटी! मैं यह सब करूँगी। सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा व्रत ऐसा उत्तम है।’ राजा युधिष्ठिर! दमयन्तीसे ऐसा कहकर राजमाता अपनी पुत्री सुनन्दासे बोली—‘सुनन्दे! इस सैरन्ध्रीको तुम देवीस्वरूपा समझो ॥ ७२-७३ ॥
वयसा तुल्यतां प्राप्ता सखी तव भवत्वियम् । एतया सह मोदस्व निरुद्विग्नमनाः सदा ॥ ७४ ॥ ‘यह अवस्थामें तुम्हारे समान है, अतः तुम्हारी सखी होकर रहे। तुम इसके साथ सदा प्रसन्नचित्त एवं आनन्दमग्न रहो’ ॥ ७४ ॥
ततः परमसंहृष्टा सुनन्दा गृहमागमत् । दमयन्तीमुपादाय सखीभिः परिवारिता ॥ ७५ ॥ तब सखियोंसे घिरी हुई सुनन्दा अत्यन्त हर्षोल्लासमें भरकर दमयन्तीको साथ ले अपने भवनमें आयी ॥ ७५ ॥
स तत्र पूज्यमाना वै दमयन्ती व्यनन्दत । सर्वकामैः सुविहितैर्निरुद्वेगावसत् तदा ॥ ७६ ॥ सुनन्दा दमयन्तीके इच्छानुसार सब प्रकारकी व्यवस्था करके उसे बड़े आदर-सत्कारके साथ रखने लगी। इससे दमयन्तीको बड़ी प्रसन्नता हुई और वह वहाँ उद्वेगरहित हो रहने लगी ॥ ७६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीचेदिराजगृहवासे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें निवासविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥