श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ५२] विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन २२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| समन्तात्समतिक्रम्य सर्वान्द्रीन् प्रविभागशः।<br>नियोगाद्देवदेवस्य प्रविष्टा सा महार्णवम्॥ १०<br>अस्या विनिर्गता नद्यः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>सर्वद्वीपद्रिवर्षेषु बहवः परिकीर्तिताः॥ ११<br>क्षुद्रनद्यस्त्वसंख्याता गङ्गा यद्गां गताम्बरात्। | देवदेव शिवके आदेशसे महासागरमें प्रवेश करती है। इससे निकली हुई सैकड़ों-हजारों अनेक नदियाँ कही गयी हैं, जो सभी द्वीपों, पर्वतों तथा देशोंमें हैं। छोटी नदियाँ तो असंख्य हैं; गंगा आकाशसे पृथ्वीपर आयी हुई हैं, इसलिये वे गंगा कहलाती हैं॥ ९—११ १/२॥ |
| केतुमाले नराः कालाः सर्वे पनसभोजनाः॥ १२<br>स्त्रियश्चोत्पलवर्णाभा जीवितं चायुतं स्मृतम्।<br>भद्राश्वे शुक्लवर्णाश्च स्त्रियश्चन्द्रांशुसन्निभाः॥ १३<br>कालााम्रभोजनाः सर्वे निरातङ्का रतिप्रियाः।<br>दशवर्षसहस्राणि जीवन्ति शिवभाविताः॥ १४<br>हिरण्मया इवात्यर्थमीश्वरार्पितचेतसः। | केतुमालवर्षमें मनुष्य कृष्णवर्णवाले हैं, वे सब कटहलका आहार ग्रहण करते हैं। वहाँकी स्त्रियाँ उत्पलके वर्णवाली हैं। वहाँके लोगोंकी आयु दस हजार वर्ष कही गयी है। भद्राश्ववर्षमें स्त्रियाँ चन्द्रमाकी किरणोंके समान शुक्ल वर्णकी हैं। वहाँके सभी लोग कालााम्रका भोजन करनेवाले, भयरहित तथा रतिप्रिय हैं। शिवका ध्यान करनेवाले वे लोग दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। हिरण्मयवर्षके लोगोंके समान वे भी मनको ईश्वरमें लगाये रखते हैं॥ १२—१४ १/२॥ |
| तथा रमणके जीवा न्यग्रोधफलभोजनाः॥ १५<br>दशवर्षसहस्राणि शतानि दशपञ्च च।<br>जीवन्ति शुक्लास्ते सर्वे शिवध्यानपरायणाः॥ १६<br>हैरण्मया महाभागा हिरण्मयवनाश्रयाः।<br>एकादशसहस्राणि शतानि दशपञ्च च॥ १७<br>वर्षाणां तत्र जीवन्ति अश्वत्थाशनजीवनाः।<br>हिरण्मया इवात्यर्थमीश्वरार्पितमानसाः॥ १८ | रमणकवर्षमें लोग बरगदका फल ग्रहण करते हैं। वे ग्यारह हजार पाँच सौ वर्ष जीवित रहते हैं। वे सब शुक्लवर्णके होते हैं और शिवके ध्यानमें लगे रहते हैं। हिरण्मयवनका आश्रय लेकर महाभाग्यशाली हिरण्मय लोग रहते हैं। वे वहाँपर बारह हजार पाँच सौ वर्ष जीते हैं और अश्वत्थ (पीपल)-के आहारपर जीवित रहते हैं। हिरण्मयवर्षके लोग अपने मनको शिवमें लगाये रखते हैं॥ १५—१८॥ |
| कुरुवर्षे तु कुरवः स्वर्गलोकात्परिच्युताः।<br>सर्वे मैथुनजाताश्च क्षीरिणः क्षीरभोजनाः॥ १९<br>अन्योन्यमनुरक्ताश्च चक्रवाकसधर्मिणः।<br>अनामया ह्याशोकाश्च नित्यं सुखनिषेविणः॥ २०<br>त्रयोदशसहस्राणि शतानि दशपञ्च च।<br>जीवन्ति ते महावीर्या न चान्यस्त्रीनिषेविणः॥ २१<br>सहैव मरणं तेषां कुरूणां स्वर्गवासिनाम्।<br>हृष्टानां सुप्रवृद्धानां सर्वान्नामृतभोजिनाम्॥ २२<br>सदा तु चन्द्रकान्तानां सदा यौवनशालिनाम्।<br>श्यामाङ्गानां सदा सर्वभूषणास्पददेहिनाम्॥ २३<br>जम्बूद्वीपे तु तत्रापि कुरुवर्षं सुशोभनम्।<br>तत्र चन्द्रप्रभं शम्भोर्विमानं चन्द्रमौलिनः॥ २४ | कुरुवर्षमें कुरुलोग स्वर्गसे गिरे हुए हैं। वे सभी मैथुनक्रियासे उत्पन्न हुए हैं। वे दुग्धका पान तथा भोजन करते हैं। वे एक-दूसरेसे प्रेम करनेवाले, चक्रवाक पक्षीके समान गुण-धर्मवाले, रोगरहित, शोकमुक्त एवं सदा सुखोंका भोग करनेवाले हैं। वे चौदह हजार पाँच सौ वर्षतक जीते हैं। वे महातेजस्वी हैं और अन्य स्त्रीका सेवन नहीं करते हैं। हृष्ट-पुष्ट, अत्यन्त प्रबुद्ध, सभी प्रकारके अन्न तथा अमृतके आहारवाले, सदा चन्द्रमाके समान कान्तिमान्, सदा यौवनशाली, श्याम वर्णके शरीरवाले एवं सर्वदा सभी प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित शरीरवाले उन स्वर्गवासी कुरुओंका मरण साथ-साथ होता है। वहाँ जम्बूद्वीपमें भी अत्यन्त सुन्दर कुरुवर्ष है। चन्द्रशेखर शिवका चन्द्रमाकी प्रभाके समान एक विमान वहाँपर विद्यमान है॥ १९—२४॥ |
| २२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| वर्षे तु भारते मर्त्याः पुण्याः कर्मवशायुषः।<br>शतायुषः समाख्याता नानावर्णाल्पदेहिनः॥ २५<br><br>नानादेवार्चने युक्ता नानाकर्मफलाशिनः।<br>नानाज्ञानार्थसम्पन्ना दुर्बलाश्चाल्पभोगिनः॥ २६ | भारतवर्षमें मनुष्य पुण्यशाली, कर्मके अधीन आयुवाले, [प्रायः] सौ वर्षकी आयुवाले, अनेक रंगवाले, छोटे शरीरवाले, अनेक देवताओंकी पूजामें परायण, नानाविध कर्मोंका फल भोगनेवाले, अनेक ज्ञानके अर्थोंसे सम्पन्न, दुर्बल तथा अल्प सुखको भोगनेवाले कहे गये हैं॥ २५-२६॥ | | इन्द्रद्वीपे तथा केचित्तथैव च कसेरुके।<br>ताम्रद्वीपं गताः केचित्केचिद्देशं गभस्तिमत्॥ २७<br><br>नागद्वीपं तथा सौम्यं गान्धर्वं वारुणं गताः।<br>केचिन्म्लेच्छाः पुलिन्दाश्च नानाजातिसमुद्भवाः॥ २८<br><br>पूर्वे किरातास्तस्यान्ते पश्चिमे यवनाः स्मृताः।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च सर्वशः॥ २९<br><br>इज्ज्यायुद्धवणिज्याभिर्वर्तयन्तो व्यवस्थिताः।<br>तेषां संव्यवहारोऽयं वर्ततेऽत्र परस्परम्॥ ३०<br><br>धर्मार्थकामसंयुक्तो वर्णानां तु स्वकर्मसु।<br>सङ्कल्पश्चाभिमानश्च आश्रमाणां यथाविधि॥ ३१<br><br>इह स्वर्गापवर्गार्थं प्रवृत्तिर्यत्र मानुषी।<br>तेषां च युगकर्माणि नान्यत्र मुनिपुङ्गवाः॥ ३२ | उनमेंसे कुछ इन्द्रद्वीपमें, कुछ कसेरुकद्वीपमें, कुछ ताम्रद्वीपमें और कुछ गभस्तिमान् देशमें चले गये। कुछ नागद्वीपमें, कुछ सोमद्वीपमें, कुछ गन्धर्वद्वीपमें तथा कुछ वरुणद्वीपमें चले गये। कुछ लोग विविध जातियोंसे उत्पन्न म्लेच्छ और पुलिन्द हैं। उस द्वीपके पूर्वी भागमें किरात तथा पश्चिमी भागमें यवन बताये गये हैं। उसके मध्यभागमें सर्वत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र हैं। वे पूजन, युद्ध, वाणिज्य आदिके द्वारा जीविका चलाते हुए वहाँ व्यवस्थित हैं। उन वर्णोंका अपने-अपने कर्मोंमें परस्पर यह व्यवहार धर्म, अर्थ तथा कामसे सम्बन्धित है। उनमें संकल्प एवं अभिमान [ब्रह्मचर्य आदि] आश्रमोंमें उचित रूपमें विद्यमान है। वहाँपर स्वर्ग तथा मोक्षके लिये मनुष्योंकी जो प्रवृत्ति है और उनके जो युगकर्म हैं, हे मुनिश्रेष्ठो! वैसा अन्यत्र नहीं है॥ २७-३२॥ | | दशवर्षसहस्राणि स्थितिः किम्पुरुषे नृणाम्।<br>सुवर्णवर्णाश्च नराः स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः॥ ३३<br><br>अनामया ह्यशोकाश्च सर्वे ते शिवभाविताः।<br>शुद्धसत्त्वाश्च हेमाभाः सदाराः प्लक्षभोजनाः॥ ३४ | किम्पुरुषवर्षमें मनुष्योंकी स्थिति दस हजार वर्षतक रहती है। वहाँके पुरुष सुवर्णके रंगवाले होते हैं और स्त्रियाँ अप्सराओंके समान होती हैं। वे सब रोगरहित, शोकरहित, शिवभक्तिसे युक्त, विशुद्ध सत्त्वगुणसे सम्पन्न, स्वर्णके समान आभावाले, अपनी पत्नियोंके साथ रहनेवाले तथा गूलरका भोजन करनेवाले होते हैं॥ ३३-३४॥ | | महारजतसङ्काशा हरिवर्षेऽपि मानवाः।<br>देवलोकाच्च्युताः सर्वे देवाकाराश्च सर्वशः॥ ३५<br><br>हरं यजन्ति सर्वेशं पिबन्तीक्षुरसं शुभम्।<br>न जरा बाधते तेन न च जीर्यन्ति ते नराः॥ ३६<br><br>दशवर्षसहस्राणि तत्र जीवन्ति मानवाः।<br>मध्यमं यन्मया प्रोक्तं नाम्ना वर्षमिलावृतम्॥ ३७ | हरिवर्षमें भी मनुष्य महारजतके समान वर्णवाले होते हैं। वे सब देवलोकसे च्युत हुए हैं और हर प्रकारसे देवताओंके आकारके होते हैं। वे सर्वेश्वर शिवका पूजन करते हैं और पवित्र इक्षुरसका पान करते हैं, अतः उन्हें बुढ़ापा बाधित नहीं करता और वे लोग वृद्ध नहीं होते। वहाँ मनुष्य दस हजार वर्ष जीवित रहते हैं॥ ३५-३६ १/२॥ | | न तत्र सूर्यस्तपति न ते जीर्यन्ति मानवाः।<br>चन्द्रसूर्यो न नक्षत्रं न प्रकाशमिलावृते॥ ३८ | मध्यमें स्थित जो इलावृत नामक वर्ष कहा गया है, वहाँ सूर्य नहीं तपता है और वहाँ मनुष्य बूढ़े नहीं होते। इलावृतवर्षमें न सूर्य-चन्द्रमा हैं, न तारे हैं और |
| अध्याय ५२ ] | विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन | २२३ |
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| पद्मप्रभाः पद्ममुखाः पद्मपत्रनिभेक्षणाः।<br>पद्मपत्रसुगन्धाश्च जायन्ते भवभाविताः॥ ३९<br><br>जम्बूफलरसाहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः।<br>देवलोकागतास्तत्र जायन्ते ह्यजरामराः॥ ४०<br><br>त्रयोदशसहस्त्राणि वर्षाणां ते नरोत्तमाः।<br>आयुःप्रमाणं जीवन्ति वर्षे दिव्ये त्विलावृते॥ ४१<br><br>जम्बूफलरसं पीत्वा न जरा बाधते त्विमान्।<br>न क्षुधा न क्लमश्चापि न जनो मृत्युमांस्तथा॥ ४२<br><br>तत्र जाम्बूनदं नाम कनकं देवभूषणम्।<br>इन्द्रगोपप्रतीकाशं जायते भास्वरं तु तत्॥ ४३ | न तो प्रकाश ही है। वहाँके लोग कमलके समान प्रभाववाले, कमलके समान मुखवाले, कमलके पत्रके समान नेत्रोंवाले और कमलपत्रकी सुगन्धिसे युक्त होते हैं। वे शिवमें ध्यानपरायण रहते हैं। वे जामुनके फलके रसका आहार करनेवाले, धूपके प्रभावसे रहित तथा सुगन्धमय होते हैं। देवलोकसे आये हुए वे लोग अजर-अमर होते हैं। उस दिव्य इलावृतवर्षमें वे श्रेष्ठ मनुष्य तेरह हजार वर्षतक अपनी पूरी आयुभर जीवित रहते हैं। जामुनके फलका रस पीनेसे इन्हें न बुढ़ापा बाधित करता है, न भूख लगती है और न थकावट होती है। वहाँके लोग [समयसे पूर्व] मरते नहीं हैं। वहाँ जाम्बूनद नामक स्वर्ण होता है; वह देवताओंका आभूषण है तथा इन्द्रगोप (कीटविशेष)-के समान प्रकाशमान रहता है॥ ३७-४३॥ |
| एवं मया समाख्याता नववर्षानुवर्तिनः।<br>वर्णायुर्भोजनाद्यानि सङ्क्षिप्य न तु विस्तरात्॥ ४४ | इस प्रकार मैंने नौ वर्षोंके निवासियोंका वर्णन कर दिया। मैंने उनके वर्ण, आयु, भोजन आदिके विषयमें विस्तारसे नहीं बल्कि संक्षेपमें कहा है॥ ४४॥ |
| हेमकूटे तु गन्धर्वा विज्ञेयाश्चाप्सरोगणाः।<br>सर्वे नागाश्च निषधे शेषवासुकितक्षकाः॥ ४५<br><br>महाबलास्त्रयस्त्रिंशद्रमन्ते याज्ञिकाः सुराः।<br>नीले तु वैडूर्यमये सिद्धा ब्रह्मर्षयोऽमलाः॥ ४६ | हेमकूटपर्वतपर गन्धर्वों तथा अप्सराओंको रहनेवाला जानना चाहिये। शेष, वासुकि, तक्षक और सभी नाग निषधपर रहते हैं। तैंतीस महाबली याज्ञिक देवता, सिद्धगण तथा विशुद्धात्मा ब्रह्मर्षि वैदूर्य मणिवाले नीलपर्वतपर रहते हैं॥ ४५-४६॥ |
| दैत्यानां दानवानां च श्वेतः पर्वत उच्यते।<br>शृङ्गवान् पर्वतश्चैव पितॄणां निलयः सदा॥ ४७<br><br>हिमवान् यक्षमुख्यानां भूतानामीश्वरस्य च।<br>सर्वाद्रिषु महादेवो हरिणा ब्रह्मणाम्बया॥ ४८<br><br>नन्दिना च गणैश्चैव वर्षेषु च वनेषु च।<br>नीलश्वेतत्रिशृङ्गे च भगवान्नीललोहितः॥ ४९<br><br>सिद्धैर्देवैश्च पितृभिर्दृष्टो नित्यं विशेषतः।<br>नीलश्च वैडूर्यमयः श्वेतः शुक्लो हिरण्मयः॥ ५०<br><br>मयूरबर्हवर्णस्तु शातकुम्भस्त्रिशृङ्गवान्।<br>एते पर्वतराजानो जम्बूद्वीपे व्यवस्थिताः॥ ५१ | दैत्यों एवं दानवोंका निवासस्थान श्वेतपर्वत कहा जाता है। शृंगवान्पर्वत [सभी] पितरोंका निवासस्थान है। हिमवान् सभी यक्षों, भूतों तथा शिवका निवास है। महादेवजी श्रीविष्णु, ब्रह्मा, उमा, नन्दी और [अपने] गणोंके साथ सभी पर्वतों, वर्षों तथा वनोंमें निवास करते हैं। भगवान् नीललोहित नील, श्वेत एवं त्रिशृंग पर्वतोंपर विशेष रूपसे सिद्धों, देवताओं तथा पितरोंके साथ सदा दिखायी पड़ते हैं। नीलपर्वत वैदूर्यमय, श्वेतपर्वत शुक्लवर्णवाला, हिरण्यमयपर्वत मोरपंखके वर्णका और शृंगवान्पर्वत सुनहरे वर्णका है। ये सभी पर्वतराज जम्बूद्वीपमें स्थित हैं॥ ४७-५१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशस्वभाववर्णनं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशस्वभाववर्णन' नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५२॥
५३- भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौञ्चद्वीपोंके महापर्वतों, ऊर्ध्वलोकों तथा नरकोंका वर्णन, सर्वत्र सदाशिवकी व्यापकता एवं यक्षरूप शिव और भगवती उमाका माहात्म्य
| २२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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तिरपनवाँ अध्याय
भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौंचद्वीपोंके महापर्वतों, ऊर्ध्वलोकों तथा नरकोंका वर्णन, सर्वत्र सदाशिवकी व्यापकता एवं यक्षरूप शिव और भगवती उमाका माहात्म्य
| सूत उवाच | सूतजी बोले— प्लक्ष आदि सात द्वीपोंमें सात पर्वत हैं, जो सीधे, लम्बे तथा प्रत्येक दिशाओंमें फैले हुए हैं; वे वर्षपर्वतके रूपमें प्रतिष्ठित हैं॥ १॥ |
|---|---|
| प्लक्षद्वीपादिद्वीपेषु सप्त सप्तसु पर्वताः।<br>ऋज्वायताः प्रतिदिशं निविष्टा वर्षपर्वताः॥ १ | मैं प्लक्षद्वीपमें स्थित सातों दिव्य महापर्वतोंका वर्णन करूँगा। पहला गोमेदक तथा दूसरा चान्द्र कहा जाता है। तीसरा नारद तथा चौथा दुन्दुभि नामवाला कहा गया है। पाँचवाँ सोमक तथा छठा सुमनस् नामवाला कहा जाता है, उसे वैभव [नामवाला] भी कहा गया है। सातवाँ पर्वत वैभ्राज नामसे प्रसिद्ध है। विशेष रूपसे ये ही सात पर्वत प्लक्षद्वीपमें बताये गये हैं॥ २–४॥ |
| प्लक्षद्वीपे तु वक्ष्यामि सप्त दिव्यान् महाचलान्।<br>गोमेदकोऽत्र प्रथमो द्वितीयश्चान्द्र उच्यते॥ २ | |
| तृतीयो नारदो नाम चतुर्थो दुन्दुभिः स्मृतः।<br>पञ्चमः सोमको नाम सुमनाः षष्ठ उच्यते॥ ३ | |
| स एव वैभवः प्रोक्तो वैभ्राजः सप्तमः स्मृतः।<br>सप्तैते गिरयः प्रोक्ताः प्लक्षद्वीपे विशेषतः॥ ४ | |
| सप्त वै शाल्मलिद्वीपे तांस्तु वक्ष्याम्यनुक्रमात्।<br>कुमुदश्चोत्तमश्चैव पर्वतश्च बलाहकः॥ ५ | शाल्मलिद्वीपमें भी सात पर्वत हैं, मैं क्रमसे उन्हें बताऊँगा। कुमुद, उत्तम, बलाहक, द्रोण, कंक, महिष और सातवाँ ककुद्मान् कहा गया है। कुशद्वीपमें भी सात उपद्वीप और कुलपर्वत हैं। मैं केवल नामसे ही संक्षेपमें उन्हें बताऊँगा। पहला विद्रुम तथा दूसरा हेमपर्वत कहा गया है। तीसरा द्युतिमान् एवं चौथा पुष्पित नामवाला बताया गया है। पाँचवाँ कुशेशय तथा छठा हरिगिरि [नामवाला] कहा गया है। सातवाँ पर्वत शोभासम्पन्न मन्दर है, यह महादेवजीका निवासस्थान है। जलोंका नाम मन्दा है; इसीलिये जलोंको धारण करनेसे इसका नाम मन्दर है॥ ५–९॥ |
| द्रोणः कङ्कश्च महिषः ककुद्मान् सप्तमः स्मृतः।<br>कुशद्वीपे तु सप्तैव द्वीपाश्च कुलपर्वताः॥ ६ | |
| तांस्तु सङ्क्षेपतो वक्ष्ये नाममात्रेण वै क्रमात्।<br>विद्रुमः प्रथमः प्रोक्तो द्वितीयो हेमपर्वतः॥ ७ | |
| तृतीयो द्युतिमान्नाम चतुर्थः पुष्पितः स्मृतः।<br>कुशेशयः पञ्चमस्तु षष्ठो हरिगिरिः स्मृतः॥ ८ | |
| सप्तमो मन्दरः श्रीमान् महादेवनिकेतनम्।<br>मन्दा इति ह्यपां नाम मन्दरो धारणादपाम्॥ ९ | |
| तत्र साक्षाद् वृषाङ्कस्तु विश्वेशो विमलः शिवः।<br>सोमः सनन्दी भगवानास्ते हेमगृहोत्तमे॥ १० | साक्षात् भगवान् वृषभध्वज विश्वेश्वर अमलात्मा शिव वहाँ उत्तम सुवर्णगृहमें पार्वती तथा नन्दीके साथ रहते हैं। पूर्वकालमें मन्दरने महाक्षेत्र अविमुक्तमें [अपनी] तपस्यासे महेश्वरको प्रसन्न किया था और उनसे महावरदान प्राप्त किया था॥ १०-११॥ |
| तपसा तोषितः पूर्वं मन्दरेण महेश्वरः।<br>अविमुक्ते महाक्षेत्रे लेभे स परं वरम्॥ ११ | |
| प्रार्थितश्च महादेवो निवासार्थं सहाम्बया।<br>अविमुक्तादुपागम्य चक्रे वासं स मन्दरे॥ १२ | उसने महादेवजीसे उमाके साथ वहाँ निवास करनेके लिये प्रार्थना की, तब वे [शिव] अविमुक्तक्षेत्रसे आकर नन्दी, अपने गणों तथा उमाके साथ मन्दर [पर्वत]-पर निवास करने लगे, इसीलिये वे उस पर्वतको नहीं छोड़ते हैं॥ १२ १/२॥ |
| सनन्दी सगणः सोमस्तेनासौ तन्न मुञ्चति।<br>क्रौञ्चद्वीपे तु सप्तेह क्रौञ्चाद्याः कुलपर्वताः॥ १३ |
अध्याय ५३] भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौञ्चद्वीपोंके महापर्वतोंका वर्णन २२५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| क्रौञ्चो वामनकः पश्चात्तुतीयश्चान्धकारकः।<br>अन्धकारात्परश्चापि दिवावृन्नाम पर्वतः॥ १४<br><br>दिवावृतः परश्चापि विविन्दो गिरिरुच्यते।<br>विविन्दात्परतश्चापि पुण्डरीको महागिरिः॥ १५<br><br>पुण्डरीकात्परश्चापि प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः।<br>एते रत्नमयाः सप्त क्रौञ्चद्वीपस्य पर्वताः॥ १६ | क्रौञ्चद्वीपमें भी क्रौञ्च आदि सात कुलपर्वत हैं। [पहला] क्रौञ्च, [दूसरा] वामन तथा तीसरा अन्धकारक पर्वत है। अन्धकारकके बाद दिवावृत् नामक पर्वत है। दिवावृत्के बाद विविन्द पर्वत कहा जाता है। विविन्दके बाद पुण्डरीक नामक महान् पर्वत है और पुण्डरीकके बाद दुन्दुभिस्वन पर्वत कहा जाता है। क्रौञ्चद्वीपके ये सातों पर्वत रत्नमय हैं॥ १३-१६॥ |
| शाकद्वीपे च गिरयः सप्त तांस्तु निबोधत।<br>उदयो रैवतश्चापि श्यामको मुनिसत्तमाः॥ १७<br><br>राजतश्च गिरिः श्रीमानाम्बिकेयः सुशोभनः।<br>आम्बिकेयात्परो रम्यः सर्वौषधिसमन्वितः॥ १८<br><br>तथैव केसरीत्युक्तो यतो वायुः प्रजायते। | शाकद्वीपमें भी सात पर्वत हैं, उन्हें जानिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! उदय, रैवत, श्यामक, शोभासम्पन्न राजतपर्वत तथा अत्यन्त सुन्दर आम्बिकेय पर्वत हैं। आम्बिकेयके बाद सभी प्रकारकी औषधियोंसे युक्त रम्य नामक पर्वत है। उसके बाद केसरीपर्वत कहा गया है, जहाँसे वायु उत्पन्न होती है॥ १७-१८ १/२॥ |
| पुष्करे पर्वतः श्रीमान्नेक एव महाशिलः॥ १९<br><br>चित्रैर्मणिमयैः कूटैः शिलाजालैः समुच्छ्रितैः।<br>द्वीपस्य तस्य पूर्वार्धे चित्रसानुस्थितो महान्॥ २०<br><br>योजनानां सहस्त्राणि ऊर्ध्वं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>अधश्चैव चतुस्त्रिंशत्सहस्त्राणि महाचलः॥ २१<br><br>द्वीपस्यार्धे परिक्षिप्तः पर्वतो मानसोत्तरः।<br>स्थितो वेलासमीपे तु नवचन्द्र इवोदितः॥ २२ | पुष्करद्वीपमें महाशिल नामक एक ही शोभासम्पन्न पर्वत है; यह अद्भुत मणियोंवाले शिखरोंसे तथा शिलासमूहोंसे युक्त है। यह महान् पर्वत उस द्वीपके आधे पूर्वी भागमें अनेक रंगोंके किनारोंके साथ पचास हजार योजन ऊँचा उठा हुआ है। यह महान् पर्वत [भूतलसे] चौंतीस हजार योजन नीचेतक गया है। यह पर्वत द्वीपके आधे भागमें उत्तरकी ओर मानसशृंखलाके ऊपर फैला हुआ है। समुद्रके समीप स्थित यह पर्वत उगे हुए नवीन चन्द्रमाके समान प्रतीत होता है॥ १९-२२॥ |
| योजनानां सहस्त्राणि ऊर्ध्वं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>तावदेव तु विस्तीर्णः पार्श्वतः परिमण्डलः॥ २३<br><br>स एव द्वीपपश्चार्धे मानसः पृथिवीधरः।<br>एक एव महासानुः सन्निवेशाद् द्विधा कृतः॥ २४ | यह पचास हजार योजन ऊपरकी ओर उठा हुआ है। इसकी चौड़ाई तथा चारों ओरका घेरा भी उतना ही विस्तृत है। द्वीपके पश्चिमी आधे भागमें यही पर्वत मानस नामसे प्रतिष्ठित है। यह महापर्वत एक होता हुआ भी सन्निवेशके कारण दो भागोंमें विभक्त हो गया है॥ २३-२४॥ |
| तस्मिन् द्वीपे स्मृतौ द्वौ तु पुण्यौ जनपदौ शुभौ।<br>राजतौ मानसस्याथ पर्वतस्यानुमण्डलौ॥ २५<br><br>महावीतं तु यद्वर्षं बाह्यतो मानसस्य तु।<br>तस्यैवाभ्यन्तरो यस्तु धातकीखण्ड उच्यते॥ २६ | उस द्वीपमें चाँदीके समान प्रभाववाले दो पुण्यमय तथा शुभ जनपद बताये गये हैं, जो इस मानस पर्वतको घेरे हुए हैं। मानसके बाहर जो महावीत नामक वर्ष है, उसके भीतर जो जनपद है, उसे धातकीखण्ड कहा जाता है॥ २५-२६॥ |
| स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः।<br>पुष्करद्वीपविस्तारविस्तीर्णोऽसौ समन्ततः॥ २७<br><br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पुष्करस्य समेन तु।<br>एवं द्वीपाः समुद्रैस्तु सप्तसप्तभिरावृताः॥ २८ | पुष्करद्वीप स्वादिष्ट जलवाले सागरसे घिरा हुआ है। यह [सागर] सभी ओर पुष्करद्वीपके विस्तारके बराबर विस्तीर्ण है। यह विस्तारमें तथा घेरेमें पुष्कर द्वीपके ही समान है। इस प्रकार सातों द्वीप सात समुद्रोंसे घिरे हुए |
| २२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| द्वीपस्यानन्तरो यस्तु समुद्रः सप्तमस्तु वै।<br>एवं द्वीपसमुद्राणां वृद्धिर्ज्ञेया परस्परम्॥ २९ | हैं। द्वीपके अनन्तर जो समुद्र है, वह सातवाँ समुद्र है। इस प्रकार द्वीपों तथा समुद्रोंकी परस्पर वृद्धिको जानना चाहिये॥ २७-२९॥ |
| परेण पुष्करस्याथ अनुवृत्य स्थितो महान्।<br>स्वादूदकसमुद्रस्तु समन्तात्परिवेष्ट्य च॥ ३०<br>परेण तस्य महती दृश्यते लोकसंस्थितिः।<br>काञ्चनी द्विगुणा भूमिः सर्वा चैकशिलोपमा॥ ३१<br>तस्याः परेण शैलस्तु मर्यादापारमण्डलः।<br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते॥ ३२<br>दृश्यादृश्यगिरिर्यावत्तावदेषा धरा द्विजाः।<br>योजनानां सहस्त्राणि दश तस्योच्छ्रयः स्मृतः॥ ३३<br>तावांश्च विस्तरस्तस्य लोकालोकमहागिरेः।<br>अर्वाचीने तु तस्यार्धे चरन्ति रविरश्मयः॥ ३४<br>परार्धे तु तमो नित्यं लोकालोकस्ततः स्मृतः।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तो भूर्लोकस्य च विस्तरः॥ ३५ | पुष्करके बाहर उसे चारों ओरसे घेरकर स्वादिष्ट जलसे युक्त महान् समुद्र स्थित है। उसके बाहर महती लोकस्थिति दिखायी देती है, वहाँकी भूमि स्वर्णमयी है और विस्तारमें दुगुनी है। सम्पूर्ण भूमि एक शिलाके तुल्य है। उसके परे मर्यादामण्डलस्वरूप एक पर्वत है। इसका कुछ भाग प्रकाशमय तथा कुछ भाग अन्धकारमय रहता है, इसे लोकालोक [पर्वत] कहा जाता है। हे द्विजो! जितना यह दृश्य-अदृश्य पर्वत है, उतनी ही यह धरा है। उसकी (पर्वतकी) ऊँचाई दस हजार योजन कही गयी है। उस लोकालोक [नामक] महापर्वतका विस्तार भी उतना ही है। उसके आधे भागमें सूर्यकी किरणें पहुँचती हैं और दूसरे आधे भागमें सदा अन्धकार रहता है, इसलिये इसे लोकालोक कहा गया है। [हे द्विजो!] इस प्रकार मैंने संक्षेपमें भूलोकके विस्तारका वर्णन किया॥ ३०-३५॥ |
| आभानोर्वै भुवः स्वस्तु आध्रुवान्मुनिसत्तमाः।<br>आवहाद्या निविष्टास्तु वायोर्वै सप्त नेमयः॥ ३६<br>आवहः प्रवहश्चैव ततश्चानुवहस्तथा।<br>संवहो विवहश्चाथ ततश्चोर्ध्वं परावहः॥ ३७<br>द्विजाः परिवहश्चेति वायोर्वै सप्त नेमयः।<br>बलाहकास्तथा भानुश्चन्द्रो नक्षत्रराशयः॥ ३८<br>ग्रहाणि ऋषयः सप्त ध्रुवो विप्राः क्रमादिह। | हे श्रेष्ठ मुनियो! भूर्लोक सूर्यतक है और स्वर्लोक ध्रुवतक है। आवह आदि वायुकी सात नेमियाँ कही गयी हैं। हे द्विजो! आवह, प्रवह, अनुवह, संवह, विवह, परावह और परिवह—ये वायुकी सात नेमियाँ हैं। हे विप्रो! मेघ, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण, राशियाँ, ग्रह सप्तर्षि और ध्रुव—ये क्रमसे व्यवस्थित हैं॥ ३६-३८१/२॥ |
| योजनानां महीपृष्ठादूर्ध्वं पञ्चदशाध्रुवात्॥ ३९<br>नियुतान्येकनियुतं भूपृष्ठाद्भानुमण्डलम्।<br>रथः षोडशसाहस्रो भास्करस्य तथोपरि॥ ४०<br>चतुराशीतिसाहस्रो मेरुश्चोपरि भूतलात्।<br>कोटियोजनमाक्रम्य महर्लोको ध्रुवाद् ध्रुवः॥ ४१<br>जनलोको महर्लोकात्तथा कोटिद्वयं द्विजाः।<br>जनलोकात्तपोलोकश्चतस्त्रः कोटयो मतः॥ ४२<br>प्राजापत्याद् ब्रह्मलोकः कोटिषट्कं विसृज्य तु।<br>पुण्यलोकास्तु सप्तैते ह्याण्डेऽस्मिन् कथिता द्विजाः॥ ४३ | पृथ्वीतलसे ऊपर ध्रुवलोकपर्यन्त पन्द्रह नियुत योजनकी दूरी है। भूपृष्ठसे भानुमण्डल एक नियुत योजन दूर है। उसके ऊपर सूर्यका रथ सोलह हजार योजन है। मेरु पर्वत पृथ्वीतलसे चौरासी हजार योजनपर है। ध्रुवसे एक करोड़ योजनके बाद महर्लोक है। हे द्विजो! महर्लोकसे दो करोड़ योजनकी दूरीपर जनलोक है। जनलोकसे चार करोड़ योजनकी दूरीपर तपोलोक कहा गया है। प्राजापत्यलोक (तपोलोक)-से छः करोड़ योजनकी दूरी छोड़कर ब्रह्मलोक स्थित है। हे ब्राह्मणो! इस प्रकार इस ब्रह्माण्डमें इन सात पुण्यलोकोंको मैंने बता दिया॥ ३९-४३॥ |
| अधः सप्ततलानां तु नरकाणां हि कोटयः।<br>मायान्ताश्चैव घोराद्या अष्टाविंशतिरेव तु॥ ४४<br>पापिनस्तेषु पच्यन्ते स्वस्वकर्मानुरूपतः।<br>अवीच्यन्तानि सर्वाणि रौरवाद्यानि तेषु च॥ ४५ | सात तलोंके नीचे घोरसे लेकर मायात क अट्ठाईस कोटिके नरक हैं; पापीलोग उनमें अपने-अपने कर्मोंके अनुरूप दुःख भोगते हैं। उनमेंसे प्रत्येकमें रौरवसे लेकर |
अध्याय ५३] भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौंचद्वीपोंके महापर्वतोंका वर्णन २२७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रत्येकं पञ्चकान्याहुर्नैरकाणि विशेषतः।<br>अण्डमादौ मया प्रोक्तमण्डस्यावरणानि च॥ ४६<br><br>हिरण्यगर्भसर्गश्च प्रसङ्गाद्बहुविस्तरात्।<br>अण्डानामीदृशानां तु कोट्यो ज्ञेयाः सहस्रशः॥ ४७ | अवीचितक सभी विशेष रूपसे पाँच नरक कहे गये हैं। मैंने आदिमें अण्डका वर्णन किया और अण्डके आवरणोंका भी वर्णन किया एवं प्रसंगवश ब्रह्माकी सृष्टिका भी विस्तारसे वर्णन किया। इस प्रकारके हजारों-करोड़ों ब्रह्माण्डोंको जानना चाहिये॥ ४४—४७॥ |
| सर्वगत्वात्प्रधानस्य तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा।<br>अण्डेष्वेतेषु सर्वेषु भुवनानि चतुर्दश॥ ४८<br><br>प्रत्यण्डं द्विजशार्दूलास्तेषां हेतुर्महेश्वरः।<br>अण्डेषु चाण्डबाह्येषु तथाण्डावरणेषु च॥ ४९<br><br>तमोऽन्ते च तमःपारे चाष्टमूर्तिर्व्यवस्थितः।<br>अस्यात्मनो महेशस्य महादेवस्य धीमतः॥ ५०<br><br>अदेहिनस्त्वहो देहमखिलं परमात्मनः।<br>अस्याष्टमूर्तेः शर्वस्य शिवस्य गृहमेधिनः॥ ५१<br><br>गृहिणी प्रकृतिर्दिव्या प्रजाश्च महदादयः।<br>पशवः किङ्करास्तस्य सर्वे देहाभिमानिनः॥ ५२ | प्रधानके सर्वगामी होनेके कारण इन अण्डोंमें तिर्यक्, ऊपर तथा नीचे [सभी ओर] चौदह भुवन हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो! उनमें प्रत्येक अण्डके हेतु महेश्वर हैं। अष्टमूर्ति [शिव] अण्डोंमें, अण्डोंके बाहर, अण्डोंके आवरणोंमें, अन्धकारके भीतर तथा अन्धकारके परे भी विद्यमान हैं। सम्पूर्ण जगत् इन महेश्वर, महादेव, धीमान्, देहरहित परमात्माका शरीर है। गृहस्थरूप इन अष्टमूर्ति शर्व शिवकी गृहिणी दिव्य प्रकृति है, महत् आदि इनकी सन्तानें हैं और सभी देहाभिमानी पशु इनके सेवक हैं॥ ४८—५२॥ |
| आद्यन्तहीनो भगवाननन्तः<br>पुमान् प्रधानप्रमुखश्च सप्त।<br>प्रधानमूर्तिस्त्वथ षोडशाङ्गो<br>महेश्वरश्चाष्टतनुः स एव॥ ५३<br><br>आज्ञाबलात्तस्य धरा स्थितेह<br>धराधरा वारिधराः समुद्राः।<br>ज्योतिर्गणः शक्रमुखाः सुराश्च<br>वैमानिकाः स्थावरजङ्गमाश्च॥ ५४ | वे [शिव] ही आदि-अन्तसे रहित, भगवान् अनन्त, पुरुष, प्रधान आदि (बुद्धि, अहंकार आदि) सात तत्त्व, प्रधान मूर्तिवाले, सोलह अंगोंवाले (पंचमहाभूत, दस इन्द्रियाँ, मन), अष्टमूर्ति तथा महेश्वर हैं। उन्हींकी आज्ञाके प्रभावसे पृथ्वी, पर्वत, मेघ, समुद्र, तारागण, इन्द्र आदि देवता, वैमानिक तथा स्थावर-जंगम सभी प्राणी स्थित हैं॥ ५३-५४॥ |
| दृष्ट्वा यक्षं लक्षणैर्हीनमीशं<br>दृष्ट्वा सेन्द्रास्ते किमेतत्विहेति।<br>यक्षं गत्वा निश्चयात्पावकाद्याः<br>शक्तिक्षीणाश्चाभवन्यत्ततोऽपि ॥ ५५ | लक्षणोंसे रहित यक्षरूपी शिवको देखकर इन्द्रसहित अग्नि आदि वे देवता 'यहाँ यह क्या है?'—ऐसा |
२२८ श्रीलिङ्गमहापुराण · [पूर्वभाग
| सोचकर अनिश्चयकी दशामें यक्षके समीप जाकर वे शक्तिहीन हो गये॥ ५५॥ | |
|---|---|
| दग्धुं तृणं वापि समक्षमस्य<br>यक्षस्य वह्निर्न शशाक विप्राः।<br>वायुस्तृणं चालयितुं तथान्ये<br>स्वान् स्वान् प्रभावान् सकलामरेन्द्राः॥ ५६<br><br>तदा स्वयं वृत्ररिपुः सुरेन्द्रैः<br>सुरेश्वरः सर्वसमृद्धिहेतुः।<br>सुरेश्वरं यक्षमुवाच को वा<br>भवानितीत्थं सकुतूहलात्मा॥ ५७ | हे विप्रो! अग्निदेव उस यक्षके सामने तिनका भी नहीं जला सके, पवन उस तृणको उड़ानेमें समर्थ नहीं हुए, उसी प्रकार अन्य समस्त श्रेष्ठ देवता भी अपने-अपने प्रभाव प्रदर्शित करनेमें समर्थ नहीं हुए। तब सभी श्रेष्ठ देवताओंके साथ समस्त समृद्धियोंके कारणभूत वृत्रशत्रु उन देवेन्द्रने कुतूहलचित्त होकर यक्षरूप सुरेश्वरसे इस प्रकार कहा—आप कौन हैं?॥ ५६-५७॥ |
| तदा हृद्यदृश्यं गत एव यक्ष-<br>स्तदाम्बिका हैमवती शुभास्या।<br>उमा शुभैराभरणैरनेकौः<br>सुशोभमाना त्वनु चाविरासीत्॥ ५८ | उसी समय यक्ष अदृश्य हो गये। तब सुन्दर मुखवाली तथा अनेक शुभ आभरणोंसे अत्यन्त शोभित होती हुई हैमवती अम्बिका उमा प्रकट हो गयीं॥ ५८॥ |
| तां शक्रमुख्या बहुशोभमाना-<br>मुमामजां हैमवतीमपृच्छन्।<br>किमेतदीशे बहुशोभमाने<br>को वाम्बिके यक्षवपुश्चकास्ति॥ ५९ | इन्द्र आदिने सुशोभित होती हुई उन हैमवती अजा उमासे पूछा—हे ईशे! हे परम शोभायमान अम्बिके! यह यक्षदेहधारी कौन है?॥ ५९॥ |
| निशम्य तद्यक्षमुमाम्बिकाह<br>त्वगोचरश्चेति सुराः सशक्राः।<br>प्रणेमुरेनां मृगराजगामिनी-<br>मुमामजां लोहितशुक्लकृष्णाम्॥ ६० | यह सुनकर उमा अम्बिकाने कहा—यह अगोचर है; तब इन्द्रसहित सभी देवताओंने उस यक्षको तथा सिंहगामिनी और लोहित-शुक्ल-कृष्णवर्णवाली इन अजा उमाको प्रणाम किया॥ ६०॥ |
| सम्भाविता सा सकलामरेन्द्रैः<br>सर्वप्रवृत्तिस्तु सुरासुराणाम्।<br>अहं पुरासं प्रकृतिश्च पुंसो<br>यक्षस्य चाज्ञावशगेत्यथाह॥ ६१ | सभी श्रेष्ठ देवताओंसे सत्कृत होकर देवताओं तथा दानवोंकी समस्त प्रवृत्तिरूपा उन देवीने कहा—मैं पूर्वकालमें इस यक्षरूप [परम] पुरुषकी आज्ञाके अधीन रहनेवाली प्रकृति थी*॥ ६१॥ |
| तस्माद् द्विजाः सर्वमजस्य तस्य<br>नियोगतश्चाण्डमभूदजाद्वै ।<br>अजश्च अण्डादखिलं च तस्मात्<br>ज्योतिर्गणैर्लोक मजात्मकं तत्॥ ६२ | अतः हे द्विजो! उन्हीं अज (शिव)-के नियोगसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए, उन ब्रह्मासे अण्ड उत्पन्न हुआ और अण्डसे ज्योतिर्गणोंसहित समग्र विश्व उत्पन्न हुआ; इस प्रकार सब कुछ शिवात्मक है॥ ६२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशविन्यासनिर्णयो नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशविन्यासनिर्णय' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५३॥
* परम पुरुषकी सर्वोत्कृष्टताको बतानेवाला यह 'हैमवती-आख्यान' मूलरूपसे सामवेदके तलवकारब्राह्मणके अन्तर्गत प्राप्त होनेवाले केनोपनिषद्में उपलब्ध होता है।
५४- ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन, सूर्यकी स्थिति तथा उसकी गतिसे होनेवाले अयन एवं ऋतुओंकी स्थिति, ध्रुवस्थान तथा मेघोंका स्वरूप और वृष्टिका प्रादुर्भाव
अध्याय ५४] ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २२९
चौवनवाँ अध्याय
ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन, सूर्यकी स्थिति तथा उसकी गतिसे होनेवाले अयन एवं ऋतुओंकी स्थिति, ध्रुवस्थान तथा मेघोंका स्वरूप और वृष्टिका प्रादुर्भाव
| सूत उवाच | |
|---|---|
| सूत उवाच<br>ज्योतिर्गणप्रचारं वै सङ्क्षिप्याण्डे ब्रवीम्यहम्।<br>देवक्षेत्राणि चालोक्य ग्रहचारप्रसिद्धये ॥ १ | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] देवक्षेत्रोंको देखकर मैं ग्रहोंकी गतिके ज्ञानके लिये अण्डमें ज्योतिर्गणों (ग्रहों)-की गतिका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ |
| मानसोपरि माहेन्द्री प्राच्यां मेरोः पुरी स्थिता।<br>दक्षिणे भानुपुत्रस्य वरुणस्य च वारुणी ॥ २<br><br>सौम्ये सोमस्य विपुला तासु दिग्देवताः स्थिताः।<br>अमरावती संयमनी सुखा चैव विभा क्रमात् ॥ ३ | मेरुके पूर्वमें मानस पर्वतपर महेन्द्रकी पुरी स्थित है। दक्षिणमें सूर्यपुत्र यमकी, पश्चिममें वरुणकी और उत्तरमें सोमकी विशाल पुरी है। उनमें दिग्पाल रहते हैं। वे पुरियाँ क्रमसे अमरावती, संयमनी, सुखा तथा विभा [नामवाली] हैं ॥ २-३ ॥ |
| लोकपालोपरिष्टात्तु सर्वतो दक्षिणायने।<br>काष्ठां गतस्य सूर्यस्य गतिर्या तां निबोधत ॥ ४<br><br>दक्षिणप्रक्रमे भानुः क्षिप्तेषुरिव धावति।<br>ज्योतिषां चक्रमादाय सततं परिगच्छति ॥ ५ | लोकपालोंकी पुरियोंके ऊपर सभी ओर दक्षिणायनमें बाणके समान गतिवाले सूर्यकी जो गति है, उसे [आपलोग] जानिये। दक्षिणायनमें सूर्य बाणकी तरह गमन करते हैं, वे नक्षत्रचक्रको साथ लेकर निरन्तर परिभ्रमण करते हैं ॥ ४-५ ॥ |
| पुरान्तगो यदा भानुः शक्रस्य भवति प्रभुः।<br>सर्वैः सायमनेः सौरो ह्युदयो दृश्यते द्विजाः ॥ ६<br><br>स एव सुखवत्यां तु निशान्तस्थः प्रदृश्यते।<br>अस्तमेति पुनः सूर्यो विभायां विश्वदृग्विभुः ॥ ७ | हे द्विजो! जब प्रभु सूर्य इन्द्रकी पुरीमें प्रवेश करते हैं, तब संयमनीपुरीके सभी लोग सूर्यका उदय देखते हैं; जब वे सूर्य संयमनीपुरीमें होते हैं, तब [पश्चिममें] सुखावतीपुरीमें प्रातःकाल होता है। उस समय विश्वके नेत्रतुल्य भगवान् सूर्य विभापुरीमें अस्त होते हैं ॥ ६-७ ॥ |
| मया प्रोक्तोऽमरावत्यां यथासौ वारितस्करः।<br>तथा संयमनीं प्राप्य सुखां चैव विभां खगः ॥ ८ | जिस प्रकार मैंने अमरावतीमें सूर्यकी गतिको कहा है, उसी प्रकार ये सूर्य संयमनीको पाकर 'सुखा' तथा 'विभा'को भी प्राप्त करते हैं ॥ ८ ॥ |
| यदापराह्लस्त्वाग्नेय्यां पूर्वाह्नो नैर्ऋते द्विजाः।<br>तदा त्वपररात्रश्च वायुभागे सुदारुणः ॥ ९<br><br>ईशान्यां पूर्वरात्रस्तु गतिरेषा च सर्वतः।<br>एवं पुष्करमध्ये तु यदा सर्पति वारिपः ॥ १०<br><br>त्रिंशांशकं तु मेदिन्यां मुहूर्तेनैव गच्छति।<br>योजनानां मुहूर्तस्य इमां सङ्ख्यां निबोधत ॥ ११ | हे द्विजो! जब आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) भागमें अपराह्न होता है, तब नैर्ऋत (दक्षिण-पश्चिम) भागमें पूर्वाह्न, उस समय वायव्य (उत्तर-पश्चिम) भागमें भयानक रात्रिका उत्तरार्ध और उत्तर-पूर्व भागमें रात्रिका प्रथम काल होता है। सब प्रकारसे यही गति होती है। इसी प्रकार जब जलको सोखनेवाले सूर्य आकाशके मध्यमें संचरण करते हैं, तब वे एक मुहूर्तमें पृथ्वीपर तीस अंश चलते हैं। एक मुहूर्तमें सूर्यके द्वारा पार की गयी दूरीको योजनपरिमाणमें सुनिये ॥ ९-११ ॥ |
२३० | श्रीलिङ्गमहापुराणं | [ पूर्वभाग
| पूर्णा शतसहस्राणामेकत्रिंशत्तु सा स्मृता।<br>पञ्चाशच्च तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु॥ १२<br>मौहूर्तकी गतिर्ह्येषा भास्करस्य महात्मनः।<br>एतेन गतियोगेन यदा काष्ठां तु दक्षिणाम्॥ १३<br>पर्यपृच्छेत्पतङ्गोऽपि सौम्याशां चोत्तरेऽहनि।<br>मध्ये तु पुष्करस्याथ भ्रमते दक्षिणायने॥ १४<br>मानसोत्तरशैले तु महातेजा विभावसुः।<br>मण्डलानां शतं पूर्णं तदशीत्यधिकं विभुः॥ १५<br>बाह्यं चाभ्यन्तरं प्रोक्तमुत्तरायणदक्षिणे।<br>प्रत्यहं चरते तानि सूर्यो वै मण्डलानि तु॥ १६<br>कुलालचक्रपर्यन्तो यथा शीघ्रं प्रवर्तते।<br>दक्षिणप्रक्रमे देवस्तथा शीघ्रं प्रवर्तते॥ १७<br>तस्मात्प्रकृष्टं भूमिं तु कालेनाल्पेन गच्छति।<br>सूर्यो द्वादशभिः शीघ्रं मुहूर्तैर्दक्षिणायने॥ १८<br>त्रयोदशार्धमृक्षाणामह्ना तु चरते रविः।<br>मुहूर्तैस्तावदृक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन्॥ १९ | वह संख्या इकतीस लाख पचास हजार योजन कही गयी है। यह महात्मा भास्करकी एक मुहूर्तकी गति है। जब सूर्य इस गतिसे दक्षिण दिशाकी ओर जाते हैं, तब [वहाँ छः माह भ्रमण करनेके बाद] पुनः उत्तरायणकालमें उत्तर दिशाकी ओर लौटते हैं। दक्षिणायनके समय महातेजस्वी सूर्य मानसोत्तर पर्वतपर पुष्करके मध्य भ्रमण करते हैं। वे सूर्य एक सौ अस्सी मण्डलसे गुजरते हैं। उत्तरायण तथा दक्षिणायनको बाह्य एवं आभ्यन्तर कहा गया है। सूर्य प्रतिदिन उन्हीं मण्डलोंपर भ्रमण करते हैं। जैसे कुम्हारके चाकका बाहरी भाग शीघ्रतापूर्वक चारों ओर घूमता है, वैसे ही सूर्यदेव दक्षिणायनमें तेजीसे भ्रमण करते हैं। इसलिये वे थोड़े समयमें ही [अपेक्षाकृत] अधिक भूमिपर पहुँचते हैं। दक्षिणायनमें सूर्य मात्र बारह मुहूर्तोंमें शीघ्रतापूर्वक दिनमें साढ़े तेरह नक्षत्र चलते हैं, जबकि रात्रिमें अठारह मुहूर्तोंमें उतनी ही नक्षत्रकी दूरीको तय करते हैं॥ १२–१९॥ | | कुलालचक्रमध्यं तु यथा मन्दं प्रसर्पति।<br>तथोदगयने सूर्यः सर्पते मन्दविक्रमः॥ २०<br>तस्माद्दीर्घेण कालेन भूमिमल्पां तु गच्छति।<br>स रथोऽधिष्ठितो भानोरादित्यैर्मुनिभिस्तथा॥ २१<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः।<br>प्रदीपयन् सहस्रांशुरग्रतः पृष्ठतोऽप्यधः॥ २२<br>ऊर्ध्वतश्च करं त्यक्त्वा सभां ब्राह्मीमनुत्तमाम्।<br>अम्भोभिर्मुनिभिस्त्यक्तैः सन्ध्यायां तु निशाचरान्॥ २३<br>हत्वा हत्वा तु सम्प्राप्तान् ब्राह्मणैश्चरते रविः।<br>अष्टादश मुहूर्तं तु उत्तरायणपश्चिमम्॥ २४ | जैसे कुम्हारके चाकका मध्यभाग मन्द गतिसे चलता है, उसी प्रकार सूर्य उत्तरायणमें मन्दगतिसे भ्रमण करते हैं। इसलिये वे अधिक समयमें थोड़ी भूमिपर पहुँचते हैं। सूर्यका वह रथ आदित्यों, मुनियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणियों, सर्पों तथा राक्षसोंसे अधिष्ठित रहता है। हजार किरणोंवाले वे सूर्य आगेसे, पीछेसे, नीचेसे तथा ऊपरसे किरण छोड़कर ब्रह्माकी अत्युत्तम सभाको प्रकाशित करते हुए सन्ध्या-वन्दनके समय मुनियों तथा ब्राह्मणोंके द्वारा [अर्घ्यहेतु] छोड़े गये जलसे पास आनेवाले राक्षसोंको मार-मारकर आगे बढ़ते रहते हैं॥ २०–२३ १/२॥ | | अहर्भवति तच्चापि चरते मन्दविक्रमः।<br>त्रयोदशार्धमृक्षाणि नक्तं द्वादशभी रविः।<br>मुहूर्तैस्तावदृक्षाणि दिवाष्टादशभिश्चरन्॥ २५ | उत्तरायणके पश्चिम भागमें दिन अठारह मुहूर्तका होता है, उस समय सूर्य मन्दगतिवाले होकर चलते हैं। सूर्य रातमें बारह मुहूर्तमें साढ़े तेरह नक्षत्रदूरीको तय करते हैं और दिनमें चलते हुए वे उतनी ही नक्षत्रकी दूरी अठारह मुहूर्तोंमें तय करते हैं॥ २४-२५॥ | | ततो मन्दतरं नाभ्यां चक्रं भ्रमति वै यथा।<br>मृत्पिण्ड इव मध्यस्थो ध्रुवो भ्रमति वै तथा॥ २६ | जिस प्रकार नाभिमें चक्र अधिक मन्द गतिसे घूमता है, उसी प्रकार [चक्रके मध्यस्थित] मिट्टीके |
| अध्याय ५४ | ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन | २३१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्रिंशन्मुहूर्तैरेवाहुरहोरात्रं पुराविदः।<br>उभयोः काष्ठयोर्मध्ये भ्रमतो मण्डलानि तु॥ २७<br><br>कुलालचक्रनाभिस्तु यथा तत्रैव वर्तते।<br>औत्तानपादो भ्रमति ग्रहैः सार्धं ग्रहाग्रणीः॥ २८<br><br>गणो मुनिज्योतिषां तु मनसा तस्य सर्पति।<br>अधिष्ठितः पुनस्तेन भानुस्तवादाय तिष्ठति॥ २९<br><br>किरणैः सर्वतस्तोयं देवो वै ससमीरणः।<br>औत्तानपादस्य सदा ध्रुवत्वं वै प्रसादतः॥ ३०<br><br>विष्णोरौत्तानपादेन चाप्तं तातस्य हेतुना।<br>आपः पीतास्तु सूर्येण क्रमन्ते शशिनः क्रमात्॥ ३१ | पिण्डकी भाँति मध्यमें स्थित ध्रुव घूमता है। प्राचीन विद्याके वेत्ता कहते हैं कि दिन और रात [मिलकर] तीस मुहूर्तके बराबर होते हैं। दोनों दिशाओंके बीचमें मण्डलोंमें सूर्य घूमता है। जैसे कुलालचक्रकी नाभि उसी स्थानपर रहती है और घूमती है, उसी प्रकार ग्रहोंमें श्रेष्ठ ध्रुव भी ग्रहोंके साथ घूमते हैं। मुनियों तथा नक्षत्रोंका समूह उसीके मनके अनुसार चलता है। उसी [ध्रुव]-के द्वारा अधिष्ठित सूर्यदेव वायुके साथ सभी ओरसे अपनी किरणोंके द्वारा जल ग्रहण करते हैं। उत्तानपादके पुत्रको ध्रुवपद भगवान् विष्णुकी कृपासे सुलभ हुआ और ध्रुवने इसे अपने पिताके कारण प्राप्त किया था॥ २६—३० १/२॥ |
| निशाकरान्निस्स्रवन्ते जीमूतान् प्रत्यपः क्रमात्।<br>वृन्दं जलमुचां चैव श्वसनेनाभिताडितम्॥ ३२<br><br>क्ष्मायां वृष्टिं विसृजतेऽभासयत्तेन भास्करः।<br>तोयस्य नास्ति वै नाशः तदैव परिवर्तते॥ ३३<br><br>हिताय सर्वजन्तूनां गतिः शर्वेण निर्मिता।<br>भूर्भुवः स्वस्तथा ह्यापो ह्यन्नं चामृतमेव च॥ ३४<br><br>प्राणा वै जगतामापो भूतानि भुवनानि च।<br>बहुनात्र किमुक्तेन चराचरमिदं जगत्॥ ३५<br><br>अपां शिवस्य भगवानाधिपत्ये व्यवस्थितः।<br>अपां त्वधिपतिर्देवो भव इत्येव कीर्तितः॥ ३६<br><br>भवात्मकं जगत्सर्वमिति किं चेह चाद्भुतम्।<br>नारायणत्वं देवस्य हरेश्चाद्भिः कृतं विभोः।<br>जगतामालयो विष्णुस्त्वापस्तस्यालयानि तु॥ ३७ | सूर्यके द्वारा ग्रहण किया गया वह जल क्रमसे चन्द्रमाको प्राप्त होता है और पुनः वह जल चन्द्रमासे मेघोंको प्राप्त होता है। इसके बाद वायुद्वारा आघात करनेपर मेघोंका समूह पृथ्वीपर वृष्टि करता है। सूर्य सबको भासित करते हैं, इसलिये वे भास्कर [नामवाले] हैं। जलका कभी नाश नहीं होता, वही जल पुनः परिवर्तित हो जाता है। भगवान् शिवने सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये जलकी इस गतिका निर्माण किया है। जल ही भूः, भुवः, स्वः, अन्न तथा अमृत है। जल सभी लोकोंका प्राण है। अधिक कहनेसे क्या लाभ—सभी प्राणी, समस्त भुवन एवं यह चराचर जगत् जलसे बना हुआ है। भगवान् भी शिवरूपी जलके आधिपत्यमें व्यवस्थित हैं। भगवान् शिव जलके अधिपति कहे गये हैं। यह सम्पूर्ण जगत् शिवमय है—इसमें आश्चर्य क्या है? सर्वव्यापी विष्णुदेवको नारायणपद जलसे ही प्राप्त हुआ है। विष्णु सम्पूर्ण जगत्के निवासस्थान हैं और जल उनका निवासस्थान है॥ ३१—३७॥ |
| दन्दह्यमानेषु चराचरेषु<br>गोधूमभूतास्त्वथ निष्क्रमन्ति।<br>या या ऊर्ध्वं मारुतेनेरिता वै<br>तास्तास्त्वभ्राण्यग्निना वायुना च॥ ३८<br><br>अतो धूमाग्निवातानां संयोगस्त्वभ्रमुच्यते।<br>वारीणि वर्षतीत्यभ्रमभ्रस्येशः सहस्रदृक्॥ ३९ | चराचर समस्त प्राणियोंके वायुद्वारा उत्तेजित अग्निसे जल जानेपर धुएँके रूपमें जो-जो निकलता है और वायुद्वारा ऊपर ले जाया जाता है, उन्हींको अभ्र कहा गया है। अतः धूम, अग्नि तथा वायुके संयोगको अभ्र कहा जाता है। जो जलकी वर्षा करता है, वह अभ्र है। हजार नेत्रोंवाले इन्द्र अभ्रके स्वामी हैं॥ ३८-३९॥ |
२३२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यज्ञधूमोद्भवं चापि द्विजानां हितकृत्सदा।<br>दावाग्निधूमसम्भूतमभ्रं वनहितं स्मृतम्॥ ४०<br><br>मृतधूमोद्भवं त्वभ्रमशुभाय भविष्यति।<br>अभिचाराग्निधूमोत्थं भूतनाशाय वै द्विजाः॥ ४१<br><br>एवं धूमविशेषेण जगतां वै हिताहितम्।<br>तस्मादाच्छादयेद्धूममभिचारकृतं नरः॥ ४२<br><br>अनाच्छाद्य द्विजः कुर्याद्धूमं यश्चाभिचारिकम्।<br>एवमुद्दिश्य लोकस्य क्षयकृच्च भविष्यति॥ ४३ | यज्ञके धुएँसे उत्पन्न अभ्र (मेघ) सदा द्विजोंका हित करनेवाला होता है और दावानलके धूमसे उत्पन्न अभ्र वनके लिये हितकर कहा गया है। मृत प्राणियोंके जलानेपर उठे हुए धूमसे उत्पन्न अभ्र अशुभके लिये होता है और हे द्विजो! अभिचाराग्निके धूमसे उत्पन्न अभ्र प्राणियोंके नाशके लिये होता है। इस प्रकार अलग-अलग धूमोंसे संसारका हित तथा अहित होता है। अतः मनुष्यको चाहिये कि अभिचारकर्मसे उत्पन्न धूमको ढँक दे। यदि कोई द्विज धूमको ढँके बिना अभिचारकर्म करता है, तो यह संसारके विनाशका कारण हो जाता है॥ ४०—४३॥ |
| अपां निधानं जीमूताः षण्मासानिह सुव्रताः।<br>वर्षन्त्येव जगतां हिताय पवनाज्ञया॥ ४४ | हे सुव्रतो! जलके भण्डारस्वरूप मेघ वायुकी आज्ञासे जगत्के हितके लिये इस लोकमें छः महीने वृष्टि करते हैं। |
| स्तनितं चेह वायव्यं वैद्युतं पावकोद्भवम्।<br>त्रिधा तेषामिहोत्पत्तिरभ्राणां मुनिपुङ्गवाः॥ ४५ | मेघका गर्जन वायुके द्वारा, विद्युत्के द्वारा तथा अग्निके द्वारा होता है। हे मुनिश्रेष्ठो! उन मेघोंकी उत्पत्ति तीन प्रकारसे होती है। |
| न भ्रश्यन्ति यतोऽभ्राणि मेहनान्मेघ उच्यते।<br>काष्ठा वाह्याश्च वैरिञ्च्याः पक्षाश्चैव पृथग्विधाः॥ ४६ | 'अभ्र' शब्दका अर्थ है 'जो नष्ट नहीं होता है।' 'मेहन' शब्दसे 'मेघ' व्युत्पन्न कहा गया है। काष्ठ, वाहन, वैरिञ्च्य तथा पक्ष—ये विभिन्न प्रकारके मेघ होते हैं। |
| आज्यानां काष्ठसंयोगादग्नेर्धूमः प्रवर्तितः।<br>द्वितीयानां च सम्भूतिर्विरिञ्चोच्छ्वास वायुना॥ ४७ | घृतका काष्ठसे संयोग होनेपर अग्निसे जो धूम निकलता है, उससे प्रथम प्रकारका मेघ बनता है। दूसरे प्रकारके मेघकी उत्पत्ति ब्रह्माकी श्वासवायुसे होती है। |
| भूभृतां त्वथ पक्षैस्तु मघवच्छेदितैस्ततः।<br>वाह्येयास्त्वथ जीमूतास्ताववहस्थानगाः शुभाः॥ ४८ | इन्द्रके द्वारा पर्वतोंके काटे गये पक्षोंसे तीसरे प्रकारके मेघ उत्पन्न होते हैं। अग्निसे उत्पन्न मेघ शुभ होते हैं और वे आवह नामक वायुके स्थानमें जाते हैं। |
| विरिञ्चोच्छ्वासजाः सर्वे प्रवहस्कन्धजास्ततः।<br>पक्षजाः पुष्कराद्याश्च वर्षन्ति च यदा जलम्॥ ४९ | ब्रह्माके श्वाससे उत्पन्न सभी मेघ प्रवह नामक वायुके स्कन्धपर रहते हैं। पुष्कर आदि मेघ पक्षसे उत्पन्न होते हैं। ये जब बरसते हैं, |
| मूकाः सशब्ददुष्टाशास्त्वेतैः कृत्यं यथाक्रमम्॥<br>क्षामवृष्टिप्रदा दीर्घकालं शीतसमीरिणः॥ ५० | तब क्रमसे शान्त, ध्वनि करनेवाले तथा विनाशकारी होते हैं; इनके द्वारा यथाक्रम यह कृत्य होता है। कुछ मेघ अल्प वृष्टि करनेवाले होते हैं और कुछ मेघ दीर्घ कालतक शीतल वायुवाले होते हैं। |
| जीवकाश्च तथा क्षीणा विद्युद्ध्वनिविवर्जिताः।<br>तिष्ठन्त्याक्रोशमात्रं तु धरापृष्ठादितस्ततः॥ ५१ | कुछ मेघ जीवक होते हैं। कुछ मेघ क्षीण होते हैं और वे विद्युत् तथा ध्वनिसे रहित होते हैं। कुछ मेघ पृथ्वीतलसे एक कोसके भीतर आकाशमें इधर-उधर रहते हैं। |
| अर्धक्रोशे तु सर्वे वै जीमूता गिरिवासिनः।<br>मेघा योजनमात्रं तु साध्यत्वाद्वहुतोयदाः॥ ५२ | पर्वतपर रहनेवाले सभी मेघ आधे कोसकी दूरीमें होते हैं। |
अध्याय ५४] ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २३३
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| धरापृष्ठाद् द्विजाः क्ष्मायां विद्युद्गुणसमन्विताः।<br>तेषां तेषां वृष्टिसर्गं त्रेधा कथितमत्र तु॥ ५३ | हे द्विजो! पृथ्वीतलसे योजन-मात्रकी दूरीवाले विद्युत्-युक्त मेघ साध्य होनेके कारण पृथ्वीपर अधिक जल-वृष्टि करनेवाले होते हैं। उन मेघोंका तीन प्रकारका वृष्टिसर्ग बता दिया गया॥ ४४-५३॥ |
| पक्षजाः कल्पजाः सर्वे पर्वतानां महत्त्माः।<br>कल्पान्ते ते च वर्षन्ति रात्रौ नाशाय शारदाः॥ ५४<br><br>पक्षजाः पुष्कराद्याश्च वर्षन्ति च यदा जलम्।<br>तदार्णवमभूत्सर्वं तत्र शेते निशीश्वरः॥ ५५<br><br>आग्नेयानां श्वासजानां पक्षजानां द्विजर्षभाः।<br>जलदानां सदा धूमो ह्याप्यायन इति स्मृतः॥ ५६ | पर्वतोंके [कटे हुए] पक्षोंसे उत्पन्न मेघ कल्पज होते हैं और वे अति महान् होते हैं। वे कल्पके अन्तमें विनाशके लिये रात्रिमें बरसते हैं। पुष्कर आदि पक्षजनित मेघ जब बरसते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् सागरमय हो जाता है और उसमें भगवान् रातमें शयन करते हैं। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अग्निसे उत्पन्न, [ब्रह्माके] श्वाससे उत्पन्न तथा [कटे हुए पर्वतोंके] पक्षसे उत्पन्न मेघोंका धूम सदा आप्यायन कहा गया है॥ ५४-५६॥ |
| पौण्ड्रास्तु वृष्टयः सर्वा विद्युताः शीतसस्यदाः।<br>पुण्ड्रदेशेषु पतिता नागानां शीकरा हिमाः॥ ५७<br><br>गाङ्गा गङ्गाम्बुसम्भूता पर्जन्येन परावहैः।<br>नगानां च नदीनां च दिग्गजानां समाकुलम्॥ ५८<br><br>मेघानां च पृथग्भूतं जलं प्रायादगादगम्।<br>परावहो यः श्वसनश्चानयत्यम्बिकागुरुम्॥ ५९<br><br>मेनापतिमतिक्रम्य वृष्टिशेषं द्विजाः परम्।<br>अभ्येति भारते वर्षे त्वपरान्तविवृद्धये॥ ६० | समस्त पौण्ड्र (पुण्ड्र देशमें होनेवाली) वृष्टि विद्युतन्मय, शीतल तथा अन्न प्रदान करनेवाली होती है। पुण्ड्र देशके मेघ बर्फके समान शीतल होते हैं और वे हाथीके सूँड़से गिरते हुए जलके छिड़कावकी भाँति प्रतीत होते हैं। गांग नामक मेघ गंगाके जलसे उत्पन्न होते हैं। ये परावहसंज्ञक वायुद्वारा पर्वतों, नदियों और दिग्गजोंको व्याकुल कर देते हैं। मेघोंसे अलग हुआ जल एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर पहुँचता है। परावह नामक जो वायु है, वह मेघोंको हिमालय (अम्बिकागुरु) पर्वतकी ओर ले जाती है। हे द्विजो! पुनः मेनापति हिमालयसे आगे बढ़कर ये मेघ समुद्रके मध्य देशोंकी वृद्धिके लिये भारतवर्षमें भारी वर्षा करते हैं॥ ५७-६०॥ |
| वृष्टयः कथिता ह्यद्य द्विधा वस्तुविवृद्धये।<br>सस्यद्वयस्य सङ्क्षेपात्प्रब्रवीमि यथामति॥ ६१<br><br>स्रष्टा भानुर्महातेजा वृष्टीनां विश्वदृग्विभुः।<br>सोऽपि साक्षाद् द्विजश्रेष्ठाश्चेशानः परमः शिवः॥ ६२<br><br>स एव तेजस्त्वोजस्तु बलं विप्रा यशः स्वयम्।<br>चक्षुः श्रोत्रं मनो मृत्युरात्मा मन्युर्विदिशोद्दिशः॥ ६३<br><br>सत्यं ऋतं तथा वायुरम्बरं खचरश्च सः।<br>लोकपालो हरिर्ब्रह्मा रुद्रः साक्षान्महेश्वरः॥ ६४<br><br>सहस्रकिरणः श्रीमानष्टहस्तः सुमङ्गलः।<br>अर्धनारीवपुः साक्षात्त्रिनेत्रस्त्रिदशाधिपः॥ ६५ | वस्तुओंकी वृद्धिके लिये होनेवाली वृष्टियाँ दो प्रकारकी कही गयी हैं। मैं बुद्धिके अनुसार उन दोनोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ। संसारके नेत्रस्वरूप महातेजस्वी भगवान् सूर्य वृष्टियोंका सृजन करनेवाले हैं। हे द्विजश्रेष्ठो! वे भी साक्षात् ईशान परमेश्वर शिव ही हैं। हे विप्रो! वे ही तेज, ओज, बल, यश, नेत्र, श्रोत्र, मन, मृत्यु, आत्मा, मन्यु (क्रोध), दिशाएँ और विदिशाएँ हैं। वे ही सत्य, ऋत, वायु, आकाश, ग्रह, लोकपाल, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र तथा साक्षात् महेश्वर हैं। वे हजार किरणोंवाले, श्रीमान्, आठ भुजाओंवाले, परम कल्याणकारी, अर्धनारीश्वर, तीन नेत्रोंवाले तथा देवताओंके अधिपति हैं॥ ६१-६५॥ |
५५- शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ तथा चैत्रादि बारह मासोंमें रथके साथ भ्रमण करनेवाले देवता, मुनि, नाग, गन्धर्व आदिका वर्णन
| २३४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| अस्यैवेह प्रसादात्तु वृष्टिर्नानाभवद् द्विजाः।<br>सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते किरणैर्जलम् ॥ ६६<br><br>जलस्य नाशो वृद्धिर्वा नास्त्येवास्य विचारतः।<br>ध्रुवेणाधिष्ठितो वायुर्वृष्टिं संहरते पुनः ॥ ६७<br><br>ग्रहान्निःसृत्य सूर्यात्तु कृत्स्ने नक्षत्रमण्डले।<br>चारस्यान्ते विशत्यर्कं ध्रुवेण समधिष्ठिता ॥ ६८ | हे द्विजो! इन्हींकी कृपासे नाना प्रकारकी वृष्टि होती है। ये हजार गुना जल देनेके लिये अपनी किरणोंसे जल ग्रहण करते हैं। विचारपूर्वक देखा जाय तो इस जलका नाश अथवा वृद्धि होती ही नहीं। ध्रुवके द्वारा अधिष्ठित वायु वृष्टिका पुनः हरण कर लेती है। तदनन्तर यह सूर्यग्रहसे निकलकर सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डलमें फैलती है। उसके बाद ध्रुवके द्वारा अधिष्ठित यह वृष्टि पुनः सूर्यमें प्रवेश करती है॥ ६६–६८॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ज्योतिषचक्रे सूर्यगत्यादिकथनं नाम चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ज्योतिषचक्रमें सूर्यगत्यादिकथन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥
पचपनवाँ अध्याय
शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ तथा चैत्रादि बारह मासोंमें रथके साथ भ्रमण करनेवाले देवता, मुनि, नाग, गन्धर्व आदिका वर्णन
| सूत उवाच<br>सौरं सङ्क्षेपतो वक्ष्ये रथं शशिन एव च।<br>ग्रहाणामितरेषां च यथा गच्छति चाम्बुपः ॥ १ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] मैं संक्षेपमें सूर्यके रथ और चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहोंके विषयमें बताऊँगा और जिस प्रकार जलका शोषण करनेवाले सूर्य गति करते हैं, उसका भी वर्णन करूँगा॥ १॥ |
| सौरस्तु ब्रह्मणा सृष्टो रथस्त्वर्थवशेन सः।<br>संवत्सरस्यावयवैः कल्पितश्च द्विजर्षभाः ॥ २<br><br>त्रिनाभिना तु चक्रेण पञ्चारेण समन्वितः।<br>सौवर्णः सर्वदेवानामावासो भास्करस्य तु ॥ ३<br><br>नवयोजनसाहस्रो विस्तारायामतः स्मृतः।<br>द्विगुणोऽपि रथोपस्थादीषादण्डः प्रमाणतः ॥ ४<br><br>असङ्गैस्तु हयैर्युक्तो यतश्चक्रं ततः स्थितैः।<br>वाजिनस्तस्य वै सप्त छन्दोभिर्निर्मितास्तु ते ॥ ५<br><br>चक्रपक्षे निबद्धास्तु ध्रुवे चाक्षः समर्पितः।<br>सहाश्वचक्रो भ्रमते सहाक्षो भ्रमते ध्रुवः ॥ ६ | हे श्रेष्ठ द्विजो! ब्रह्माके द्वारा विशेष प्रयोजनके लिये निर्मित वह सूर्यरथ संवत्सरके अवयवोंसे कल्पित किया गया है। तीन नाभि तथा पाँच अरोंवाले चक्रसे युक्त यह सूर्यरथ सुवर्णमय है और सभी देवताओंका निवासस्थान है। यह लम्बाई तथा चौड़ाईमें नौ हजार योजनवाला कहा गया है। इसका ईषादण्ड प्रमाण (माप)-में रथोपस्थसे दुगुना है। जहाँ चक्र है, वहाँ स्थित अन्तरिक्षगामी घोड़ोंसे वह युक्त (जुता हुआ) है। उसके सातों घोड़े वेदके सात छन्दों [गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पंक्ति]-से निर्मित हैं। वे चक्रके बगलमें बँधे हुए हैं। ध्रुवमें [रथका] अक्ष लगा हुआ है। वह रथ घोड़ों तथा चक्रसहित घूमता है और ध्रुव अक्षके साथ घूमता है॥ २–६॥ |
| अध्याय ५५ ] | शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ आदिका वर्णन | २३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अक्षः सहैकचक्रेण भ्रमतेऽसौ ध्रुवेरितः।<br>प्रेरको ज्योतिषां धीमान् ध्रुवो वै वातरश्मिभिः॥ ७<br><br>युगाक्षकोटिसम्बद्धौ द्वौ रश्मी स्यन्दनस्य तु।<br>ध्रुवेण भ्रमते रश्मिनिबद्धः स युगाक्षयोः॥ ८ | वह अक्ष ध्रुवसे प्रेरित होकर एक ही चक्रके साथ घूमता है। बुद्धिमान् ध्रुव वायुकिरणोंके द्वारा ज्योतिर्गणों (ग्रह, नक्षत्र आदि)-को प्रेरित करता है। दो रश्मियाँ (किरणें) रथके जुए तथा अक्षके अग्रभागमें बँधी हुई हैं और [उन] जुए तथा अक्षमें रश्मियोंसे निबद्ध वह सूर्यरथ ध्रुवके द्वारा भ्रमण करता है॥ ७-८॥ |
| भ्रमतो मण्डलानि स्युः खेचरस्य रथस्य तु।<br>युगाक्षकोटी ते तस्य दक्षिणे स्यन्दनस्य हि॥ ९<br><br>ध्रुवेण प्रगृहीते वै विचक्राश्वे च रज्जुभिः।<br>भ्रमन्तमनुगच्छन्ति ध्रुवं रश्मी च तावुभौ॥ १० | इस प्रकार भ्रमण करते हुए आकाशमें विचरण करनेवाले रथके अनेक मण्डल होते हैं। वे [रश्मिनिबद्ध] जुए तथा अक्षकी कोटियाँ उस रथके दाहिनी ओर होती हैं। रज्जुओके द्वारा ध्रुवसे प्रगृहीत अरुण, चक्र तथा घोड़े और वे दोनों रश्मियाँ घूमते हुए ध्रुवका अनुगमन करते हैं॥ ९-१०॥ |
| युगाक्षकोटिस्त्वेतस्य वातोर्मिस्यन्दनस्य तु।<br>कीले सक्ता यथा रज्जुर्भ्रमते सर्वतोदिशम्॥ ११<br><br>भ्राम्यतस्तस्य रश्मी तु मण्डलेषूत्तरायणे।<br>वर्धेते दक्षिणे चैव भ्रमतो मण्डलानि तु॥ १२<br><br>आकृष्येते यदा ते वै ध्रुवेणाधिष्ठिते तदा।<br>आभ्यन्तरस्थः सूर्योऽथ भ्रमते मण्डलानि तु॥ १३ | इस रथकी वायुलहरीरूपा युगाक्षकोटि (जुए तथा अक्षकी कोटि) कीलमें बँधी हुई रस्सीकी भाँति सभी दिशाओंमें घूमती है। उत्तरायणमें मण्डलोंमें घूमते हुए उस सूर्यकी दोनों रश्मियाँ बढ़ जाती हैं और दक्षिणायनमें मण्डलोंमें घूमते हुए सूर्यके द्वारा वे रश्मियाँ खिंच जाती हैं। जब वे [रश्मियाँ] ध्रुवके द्वारा प्रेरित की जाती हैं, तब [रथके] भीतर स्थित सूर्य मण्डलोंमें घूमता है। उस समय सूर्य दोनों दिशाओंके एक सौ अस्सी मण्डलोंका चक्कर लगाता है॥ ११-१३ १/२॥ |
| अशीतिमण्डलशतं काष्ठयोरन्तरं द्वयोः।<br>ध्रुवेण मुच्यमानाभ्यां रश्मिभ्यां पुनरेव तु॥ १४<br><br>तथैव बाह्यतः सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु।<br>उद्वेष्टयन् स वेगेन मण्डलानि तु गच्छति॥ १५ | पुनः ध्रुवके द्वारा किरणोंके छोड़े जानेपर उसी भाँति सूर्य मण्डलोंके बाहर भ्रमण करता है; वह मण्डलोंको घेरते हुए वेगपूर्वक चलता है॥ १४-१५॥ |
| देवाश्चैव तथा नित्यं मुनयश्च दिवानिशम्।<br>यजन्ति सततं देवं भास्करं भवमीश्वरम्॥ १६<br><br>स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्मुनिभिस्तथा।<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः॥ १७<br><br>एते वसन्ति वै सूर्ये द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु।<br>आप्याययन्ति चादित्यं तेजोभिर्भास्करं शिवम्॥ १८ | देवता तथा मुनिगण नित्य दिन-रात भवस्वरूप ईश्वर सूर्यदेवका निरन्तर पूजन करते हैं। वह रथ देवताओं, आदित्यों, मुनियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणियों, सर्पों तथा राक्षसोंके द्वारा अधिष्ठित है। ये लोग सूर्यमें दो-दो महीने क्रमसे निवास करते हैं और कल्याणकारी आदित्य भास्करको अपने तेजोंसे तृप्त करते हैं॥ १६-१८॥ |
| ग्रथितैः स्वैर्वचोभिस्तु स्तुवन्ति मुनयो रविम्।<br>गन्धर्वाप्सरसश्चैव नृत्यगेयैरुपासते॥ १९<br><br>ग्रामणीयक्षभूतानि कुर्वतेऽभीषसङ्ग्रहम्।<br>सर्पा वहन्ति वै सूर्यं यातुधानानुयान्ति च॥ २० | मुनिगण अपने वचनोंसे ग्रथित स्तुतियोंके द्वारा सूर्यका स्तवन करते हैं; गन्धर्व तथा अप्सराएँ गान एवं नृत्यके द्वारा उनकी उपासना करते हैं; ग्रामणी, यक्ष तथा भूतगण किरणोंका संग्रह करते हैं; सर्पगण सूर्यका वहन |
| २३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद्रविम्।<br>इत्येते वै वसन्तीह द्वौ द्वौ मासौ दिवाकरे॥ २१<br>मधुश्च माधवश्चैव शुक्रश्च शुचिरेव च।<br>नभोनभस्यौ विप्रेन्द्रा इषश्चोर्जस्तथैव च॥ २२<br>सहःसहस्यौ च तथा तपस्यश्च तपः पुनः।<br>एते द्वादश मासास्तु वर्षं वै मानुषं द्विजाः॥ २३<br>वासन्तिकस्तथा ग्रैष्मः शुभो वै वार्षिकस्तथा।<br>शारदश्च हिमश्चैव शैशिरो ऋतवः स्मृताः॥ २४<br>धातार्यमाथ मित्रश्च वरुणश्चेन्द्र एव च।<br>विवस्वांश्चैव पूषा च पर्जन्योऽशुर्भगस्तथा॥ २५<br>त्वष्टा विष्णुः पुलस्त्यश्च पुलहश्चात्रिरेव च।<br>वसिष्ठश्चाङ्गिराश्चैव भृगुर्बुद्धिमतां वरः॥ २६<br>भारद्वाजो गौतमश्च कश्यपश्च क्रतुस्तथा।<br>जमदग्निः कौशिकश्च वासुकिः कङ्कणीकरः॥ २७<br>तक्षकश्च तथा नाग एलापत्रस्तथा द्विजाः।<br>शङ्खपालस्तथा चान्यस्तैरावत इति स्मृतः॥ २८<br>धनञ्जयो महापद्मस्तथा कर्कोटकः स्मृतः।<br>कम्बलोऽश्वतरश्चैव तुम्बुरुर्नारदस्तथा॥ २९<br>हाहा हूहूर्मुनिश्श्रेष्ठा विश्वावसुस्तनुत्तमः।<br>उग्रसेनोऽथ सुरुचिरन्यश्चैव परावसुः॥ ३०<br>चित्रसेनो महातेजाश्चोर्णायुश्चैव सुव्रताः।<br>धृतराष्ट्रः सूर्यवर्चा देवी साक्षात्कृतस्थला॥ ३१<br>शुभानना शुभश्रोणिर्दिव्या वै पुञ्जिकस्थला।<br>मेनका सहजन्या च प्रम्लोचाथ शुचिस्मिता॥ ३२<br>अनुम्लोचा घृताची च विश्वाची चोर्वशी तथा।<br>पूर्वचित्तिरिति ख्याता देवी साक्षात्तिलोत्तमा॥ ३३<br>रम्भा चाम्भोजवदना रथकृद् ग्रामणीः शुभः।<br>रथौजा रथचित्रश्च सुबाहुर्वै रथस्वनः॥ ३४<br>वरुणश्च तथैवान्यः सुषेणः सेनजिच्छुभः।<br>तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च क्षतजित्सत्यजित्तथा॥ ३५<br>रक्षो हेतिः प्रहेतिश्च पौरुषेयो वधस्तथा।<br>सर्पो व्याघ्रः पुनश्चापो वातो विद्युद्दिवाकरः॥ ३६<br>ब्रह्मोपेतश्च रक्षेन्द्रो यज्ञोपेतस्तथैव च।<br>एते देवादयः सर्वे वसन्त्यर्के क्रमेण तु॥ ३७<br>स्थानाभिमानिनो ह्येते गणा द्वादश सप्तकाः।<br>धात्रादिविष्णुपर्यन्ता देवा द्वादश कीर्तिताः॥ ३८ | करते हैं; यातुधान (राक्षसगण) उनका अनुगमन करते हैं और बालखिल्य [नामक ऋषिगण] उदयकालसे प्रारम्भ करके चारों ओरसे घेरकर सूर्यको अस्ताचलकी ओर ले जाते हैं। ये सब दो-दो महीने सूर्यमें निवास करते हैं॥ १९–२१॥<br><br>हे विप्रेन्द्रो! मधु (चैत्र), माधव (वैशाख), शुक्र (ज्येष्ठ), शुचि (आषाढ़), नभ (श्रावण), नभस्य (भाद्रपद), इष (आश्विन), ऊर्ज (कार्तिक), सह (मार्गशीर्ष), सहस्य (पौष), तपस्य (माघ) तथा तप (फाल्गुन)—ये बारह महीने मानव वर्षमें होते हैं। हे द्विजो! वसन्त, ग्रीष्म, शुभ वर्षा, शरद, हिम (हेमन्त) तथा शिशिर—ये ऋतुएँ कही गयी हैं॥ २२–२४॥<br><br>धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, पर्जन्य, अंशु, भग, त्वष्टा, विष्णु—ये बारह आदित्य हैं; पुलस्त्य, पुलह, अत्रि, वसिष्ठ, अंगिरा, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भृगु, भारद्वाज, गौतम, कश्यप, क्रतु, जमदग्नि तथा कौशिक—ये बारह ऋषि हैं; हे द्विजो! वासुकि, कंकणीकर, तक्षक, नाग, एलापत्र, शंखपाल, ऐरावत, धनंजय, महापद्म, कर्कोटक, कम्बल तथा अश्वतर—ये बारह सर्प कहे गये हैं; हे मुनिश्रेष्ठो! तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू, श्रेष्ठ विश्वावसु, उग्रसेन, सुरुचि, परावसु, चित्रसेन, महातेजस्वी ऊर्णायु, धृतराष्ट्र तथा सूर्यवर्चा—ये बारह गन्धर्व हैं; हे सुव्रतो! साक्षात् देवी कृतस्थला, सुन्दर मुखवाली—उत्तम श्रोणिवाली दिव्य पुंजिकस्थला, मेनका, सहजन्या, पवित्र मुसकानवाली प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, विश्वाची, उर्वशी, पूर्वचित्ति, साक्षात् देवी तिलोत्तमा तथा कमलके समान मुखवाली रम्भा—ये बारह अप्सराएँ कही गयी हैं; रथकृत्, शुभ रथौजा, रथचित्र, सुबाहु, रथस्वन, वरुण, सुषेण, शुभ सेनजित्, तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, क्षतजित् तथा सत्यजित्—ये बारह ग्रामणी हैं; हेति, प्रहेति, पौरुषेय, वध, सर्प, व्याघ्र, आप, वात, विद्युत्, दिवाकर, ब्रह्मोपेत और राक्षसराज यज्ञोपेत—ये बारह यातुधान (राक्षस) हैं—ये सभी देवता आदि क्रमसे सूर्यमें निवास करते हैं। बारहकी संख्यावाले ये सात गण अपने स्थानका अभिमान |
| अध्याय ५५ ] | शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ आदिका वर्णन | २३७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| करनेवाले हैं॥ २५-३७१/२॥ | |
| आदित्यं परमं भानुं भाभिराप्याययन्ति ते।<br>पुलस्त्याद्याः कौशिकान्ता मुनयो मुनिसत्तमाः॥ ३९<br><br>द्वादशैव स्तवैर्भानुं स्तुवन्ति च यथाक्रमम्।<br>नागाश्चाश्वतरान्तास्तु वासुकिप्रमुखाः शुभाः॥ ४०<br><br>द्वादशैव महादेवं वहन्त्येवं यथाक्रमम्।<br>क्रमेण सूर्यवर्चान्तास्तुम्बुरुप्रमुखाम्बुपम्॥ ४१<br><br>गीतैरेनमुपासन्ते गन्धर्वा द्वादशोत्त्तमाः।<br>कृतस्थलाद्या रम्भान्ता दिव्याश्चाप्सरसो रविम्॥ ४२<br><br>ताण्डवैः सरसैः सर्वाश्चोपासन्ते यथाक्रमम्।<br>दिव्याः सत्यजिदन्ताश्च ग्रामण्यो रथकृन्मुखाः॥ ४३<br><br>द्वादशास्य क्रमेणैव कुर्वते भीषुसङ्ग्रहम्।<br>प्रयान्ति यज्ञोपेतान्ता रक्षोहेतिमुखाः सह॥ ४४<br><br>सायुधा द्वादशैवैते राक्षसाश्च यथाक्रमम्। | धातासे लेकर विष्णुपर्यन्त जो बारह देवता (आदित्य) कहे गये हैं, वे अपने तेजसे परम भानुको सन्तृप्त करते हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो! पुलस्त्यसे लेकर कौशिकतक [कहे गये] बारह मुनिगण यथाक्रम स्तुतियोंके द्वारा सूर्यका स्तवन करते हैं। इसी प्रकार वासुकिसे लेकर अश्वतरतक [कहे गये] बारह शुभ नाग यथाक्रम महादेव (सूर्य)-का वहन करते हैं। तुम्बुरुसे लेकर सूर्यवर्चातक [कहे गये] बारह उत्तम गन्धर्व क्रमसे गीतोंके द्वारा इन सूर्यकी उपासना करते हैं। कृतस्थलासे लेकर रम्भा-पर्यन्त [कही गयी] सभी दिव्य अप्सराएँ यथाक्रम सरस नृत्योंके द्वारा सूर्यकी उपासना करती हैं। रथकृत्से लेकर सत्यजित्पर्यन्त [कहे गये] बारह दिव्य ग्रामणी क्रमसे इस सूर्यकी रथरश्मियोंका संग्रह करते हैं। रक्षोहेतिसे लेकर यज्ञोपेततक [कहे गये]—ये प्रमुख बारह राक्षस शस्त्र धारण करके क्रमसे [सूर्यके] पीछे-पीछे चलते हैं॥ ३८-४४१/२॥ |
| धातार्यमा पुलस्त्यश्च पुलहश्च प्रजापतिः॥ ४५<br><br>उरगो वासुकिश्चैव कङ्कणीकश्च तावुभौ।<br>तुम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वौ गायतां वरौ॥ ४६<br><br>कृतस्थलाप्सराश्चैव तथा वै पुञ्जिकस्थला।<br>ग्रामणी रथकृच्चैव रथौजाश्चैव तावुभौ॥ ४७<br><br>रक्षो हेतिः प्रहेतिश्च यातुधानावुदाहृतौ।<br>मधुमाधवयोरेष गणो वसति भास्करे॥ ४८ | धाता तथा अर्यमा [दो आदित्य], प्रजापति पुलस्त्य तथा पुलह [दो ऋषि], वे दोनों नाग वासुकि एवं कंकणीक, गान करनेवालोंमें श्रेष्ठ गन्धर्व तुम्बुरु तथा नारद, कृतस्थला एवं पुंजिकस्थला अप्सराएँ, वे दोनों ग्रामणी रथकृत् तथा रथौजा और यातुधान कहे गये राक्षस हेति तथा प्रहेति—यह समुदाय चैत्र एवं वैशाख महीनोंमें सूर्यमें निवास करता है॥ ४५-४८॥ |
| वसन्ति ग्रीष्मकौ मासौ मित्रश्च वरुणश्च ह।<br>ऋषिरत्रिर्वसिष्ठश्च तक्षको नाग एव च॥ ४९<br><br>मेनका सहजन्या च गन्धर्वौ च हाहाहूहूः।<br>सुबाहुनामा ग्रामण्यौ रथचित्रश्च तावुभौ॥ ५०<br><br>पौरुषेयो वधश्चैव यातुधानावुदाहृतौ।<br>एते वसन्ति वै सूर्ये मासयोः शुचिशुक्रयोः॥ ५१ | इसी प्रकार ग्रीष्म ऋतुके दो महीनोंमें भी ये लोग निवास करते हैं। [दो आदित्य] मित्र तथा वरुण, ऋषि अत्रि एवं वसिष्ठ, [सर्प] तक्षक तथा नाग, [दो अप्सराएँ] मेनका और सहजन्या, दो गन्धर्व हाहा तथा हूहू, रथचित्र एवं सुबाहु नामक वे दोनों ग्रामणी और यातुधान कहे गये पौरुषेय तथा वध—ये सब शुक्र (ज्येष्ठ) तथा शुचि (आषाढ़) महीनोंमें सूर्यमें निवास करते हैं॥ ४९-५१॥ |
| ततः सूर्ये पुनश्चान्या निवसन्तीह देवताः।<br>इन्द्रश्चैव विवस्वांश्च अङ्गिरा भृगुरेव च॥ ५२<br><br>एलापत्रस्तथा सर्पः शङ्खपालश्च तावुभौ।<br>विश्वावसुस्सुसेनौ च वरुणश्च रथस्वनः॥ ५३ | इसके बाद अन्य देवता सूर्यमें निवास करते हैं। [आदित्य] इन्द्र तथा विवस्वान्, [ऋषि] अंगिरा तथा भृगु, वे दोनों सर्प एलापत्र एवं शंखपाल, [गन्धर्व] |
| २३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रम्लोचा चैव विख्याता अनुम्लोचा च ते उभे।<br>यातुधानास्तथा सर्पो व्याघ्रश्चैव तु तावुभौ॥ ५४<br>नभोनभस्ययोरेष गणो वसति भास्करे। | विश्वावसु तथा उग्रसेन, [ग्रामणी] वरुण एवं रथस्वन, विख्यात प्रम्लोचा तथा अनुम्लोचा—वे दोनों अप्सराएँ और वे दोनों यातुधान सर्प तथा व्याघ्र—यह समुदाय नभ (श्रावण) तथा नभस्य (भाद्रपद) महीनोंमें सूर्यमें निवास करता है॥ ५२—५४ १/२॥ |
| पर्जन्यश्चैव पूषा च भरद्वाजोऽथ गौतमः॥ ५५<br>धनञ्जय इरांवांश्च सुरुचिः सपरावसुः।<br>घृताची चाप्सरःश्रेष्ठा विश्वाची चातिशोभना॥ ५६<br>सेनजिच्च सुषेणश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ।<br>आपो वातश्च तावेतौ यातुधानावुभौ स्मृतौ॥ ५७<br>वसन्त्येते तु वै सूर्ये मास ऊर्ज इषे च ह। | [आदित्य] पर्जन्य तथा पूषा, [ऋषि] भरद्वाज एवं गौतम, [सर्प] धनंजय तथा इरावान् (ऐरावत), [गन्धर्व] सुरुचि तथा परावसु, अप्सराओंमें श्रेष्ठ घृताची तथा परम सुन्दर विश्वाची, वे दोनों ग्रामणी—सेनानी सेनजित् तथा सुषेण और यातुधान कहे गये वे दोनों आप तथा वात—ये सब इष (आश्विन) तथा ऊर्ज (कार्तिक) महीनोंमें सूर्यमें निवास करते हैं॥ ५५—५७ १/२॥ |
| हैमन्तिकौ तु द्वौ मासौ वसन्ति च दिवाकरे॥ ५८<br>अंशुर्भगश्च द्वावेतौ कश्यपश्च क्रतुः सह।<br>भुजङ्गश्च महापद्मः सर्पः कर्कोटकस्तथा॥ ५९<br>चित्रसेनश्च गन्धर्व ऊर्णायुश्चैव तावुभौ।<br>उर्वशी पूर्वचित्तिश्च तथैवाप्सरसावुभे॥ ६०<br>तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ।<br>विद्युद्दिवाकरश्चोभौ यातुधानावुदाहृतौ॥ ६१<br>सहे चैव सहस्ये च वसन्त्येते दिवाकरे। | इसी प्रकार हेमन्त ऋतुके दो महीनोंमें भी ये लोग सूर्यमें निवास करते हैं। ये दोनों [आदित्य] अंशु तथा भग, [ऋषि] कश्यप तथा क्रतु, भुजंग महापद्म तथा सर्प कर्कोटक, वे दोनों गन्धर्व चित्रसेन तथा ऊर्णायु, दोनों अप्सराएँ उर्वशी तथा पूर्वचित्ति, ग्रामणी—सेनानी तार्क्ष्य तथा अरिष्टनेमि और यातुधान कहे गये दोनों विद्युत् तथा दिवाकर—ये सब सह (मार्गशीर्ष) तथा सहस्य (पौष) महीनोंमें सूर्यमें निवास करते हैं॥ ५८—६१ १/२॥ |
| ततः शैशिरयोश्चापि मासयोर्निवसन्ति वै॥ ६२<br>त्वष्टा विष्णुर्जमदग्निर्विश्वामित्रस्तथैव च।<br>काद्रवेयौ तथा नागौ कम्बलाश्वतरावुभौ॥ ६३<br>धृतराष्ट्रः सगन्धर्वः सूर्यवर्चास्तथैव च।<br>तिलोत्तमाप्सराश्चैव देवी रम्भा मनोहरा॥ ६४<br>रथजित्सत्यजिच्चैव ग्रामण्यौ लोकविश्रुतौ।<br>ब्रह्मोपेतस्तथा रक्षो यज्ञोपेतश्च यः स्मृतः॥ ६५ | इसके बाद [आदित्य] त्वष्टा तथा विष्णु, [ऋषि] जमदग्नि तथा विश्वामित्र, कद्रूके पुत्र दोनों नाग कम्बल तथा अश्वतर, गन्धर्व धृतराष्ट्र तथा सूर्यवर्चा, मनोहर अप्सरा देवी रम्भा तथा तिलोत्तमा, लोकमें प्रसिद्ध ग्रामणी रथजित् तथा सत्यजित् और ब्रह्मोपेत तथा यज्ञोपेत—जो यातुधान कहे गये हैं—ये सब शिशिर ऋतुके दो महीनों (माघ और फाल्गुन)-में [सूर्यमें] निवास करते हैं॥ ६२—६५॥ |
| एते देवा वसन्त्यर्के द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु।<br>स्थानाभिमानिनो ह्येते गणा द्वादश सप्तकाः॥ ६६<br>सूर्यमाप्याययन्त्येते तेजसा तेज उत्तमम्।<br>ग्रथितैः स्वैर्वचोभिस्तु स्तुवन्ति मुनयो रविम्॥ ६७<br>गन्धर्वाप्सरसश्चैव नृत्यगेयैरुपासते।<br>ग्रामणीयक्षभूतानि कुर्वतेऽभीषुसङ्ग्रहम्॥ ६८<br>सर्पा वहन्ति वै सूर्यं यातुधानानुयान्ति वै।<br>बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद्रविम्॥ ६९ | ये देवतागण क्रमसे दो-दो महीने सूर्यमें निवास करते हैं। बारहकी संख्यामें ये सात समूह अपने स्थानका अभिमान करनेवाले हैं। ये सब तेजके द्वारा उत्तम तेजवाले सूर्यको सन्तृप्त करते हैं। मुनिगण अपने द्वारा विरचित स्तुतियोंसे सूर्यका स्तवन करते हैं, गन्धर्व तथा अप्सराएँ नृत्य-गानोंसे उनकी उपासना करते हैं, ग्रामणी-यक्ष-भूत रथरश्मियोंको पकड़े रहते हैं, सर्पगण सूर्यका वहन करते हैं, यातुधान पीछे-पीछे चलते हैं और बालखिल्य |
अध्याय ५५] शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ आदिका वर्णन [२३१
| एतेषामेव देवानां यथा तेजो यथा तपः।<br>यथायोगं यथामन्त्रं यथाधर्मं यथाबलम्॥ ७०<br><br>तथा तपत्यसौ सूर्यस्तेषामिद्धस्तु तेजसा।<br>इत्येते वै वसन्तीह द्वौ द्वौ मासौ दिवाकरे॥ ७१<br><br>ऋषयो देवगन्धर्वपन्नगाप्सरसां गणाः।<br>ग्रामण्यश्च तथा यक्षा यातुधानाश्च मुख्यतः॥ ७२<br><br>एते तपन्ति वर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च।<br>भूतानामशुभं कर्म व्यपोहन्तीह कीर्तिताः॥ ७३<br><br>मानवानां शुभं ह्येते हरन्ति च दुरात्मनाम्।<br>दुरितं सुप्रचाराणां व्यपोहन्ति क्वचित्क्वचित्॥ ७४ | [ऋषिगण] चारों ओरसे घेरकर सूर्यको उदयसे अस्तकी प्राप्ति कराते हैं॥ ६६-६९॥<br><br>इन्हीं देवताओंका जैसा तेज, जैसा तप, जैसा योग, जैसा मन्त्र, जैसा धर्म तथा जैसा बल होता है, उनसे समृद्ध होकर वे सूर्य तेजयुक्त होकर तपते हैं। ये सभी सूर्यमें दो-दो महीने निवास करते हैं। ऋषिगण, देवता, गन्धर्व, सर्प, अप्सराओंके समूह, ग्रामणी, यक्ष तथा यातुधान (राक्षस) ये ही मुख्यरूपसे तपते हैं, बरसते हैं, प्रकाश करते हैं, सृजन करते हैं और आराधित होकर प्राणियोंके अशुभ कर्मका नाश करते हैं। ये लोग दुरात्मा मनुष्योंके शुभका नाश करते हैं और कहीं-कहीं सज्जनोंके पापका हरण करते हैं॥ ७०-७४॥ |
| विमाने च स्थिता दिव्ये कामगे वातरंहसि।<br>एते सहैव सूर्येण भ्रमन्ति दिवसानुगाः॥ ७५<br><br>वर्षन्तश्च तपन्तश्च ह्लादयन्तश्च वै द्विजाः।<br>गोपायन्तीह भूतानि सर्वाणि ह्यामन्वक्षयात्॥ ७६ | ये इच्छानुसार चलनेवाले तथा वायुवेगसे गमन करनेवाले दिव्य विमानमें स्थित होकर सूर्यके साथ पूरे दिन भ्रमण करते हैं। हे द्विजो! ये वर्षा करते हुए, तपते हुए और [सबको] आह्लादित करते हुए सभी प्राणियोंको एक मन्वन्तरपर्यन्त विनाशसे बचाते हैं॥ ७५-७६॥ |
| स्थानाभिमानिनामेतत्स्थानं मन्वन्तरेषु वै।<br>अतीतानागतानां वै वर्तन्ते साम्प्रतं च ये॥ ७७<br><br>एते वसन्ति वै सूर्ये सप्तकास्ते चतुर्दश।<br>चतुर्दशसु सर्वेषु गणा मन्वन्तरेष्विह॥ ७८ | अतीत तथा अनागत (भविष्यमें होनेवाले) स्थानाभिमानियोंका तथा इस समय जो विद्यमान हैं, उन सभीका यह स्थान सभी मन्वन्तरोंमें हुआ करता है। ये चौदह गण सात-सातके समूहमें सभी चौदह मन्वन्तरोंमें सूर्यमें निवास करते हैं॥ ७७-७८॥ |
| सङ्क्षेपादद्विस्तराच्चैव यथावृत्तं यथाश्रुतम्।<br>कथितं मुनिशार्दूला देवदेवस्य धीमतः॥ ७९<br><br>एते देवा वसन्त्यर्के द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु।<br>स्थानाभिमानिनो ह्येते गणा द्वादश सप्तकाः॥ ८० | हे श्रेष्ठ मुनियो! मैंने बुद्धिमान् देवदेवके क्रिया-कलापका संक्षेपमें तथा विस्तारसे वर्णन कर दिया, जैसा घटित हुआ था और जैसा मैंने सुना था। ये देवता दो-दो महीने क्रमसे सूर्यमें निवास करते हैं। बारह-बारह देवताओंके ये सात समूह अपने स्थान (पद)-का अभिमान करनेवाले हैं॥ ७९-८०॥ |
| इत्येष एकचक्रेण सूर्यस्तूर्णं रथेन तु।<br>हरितैरक्षरैरश्वैः सर्पतेऽसौ दिवाकरः॥ ८१<br><br>अहोरात्रं रथेनासावेकचक्रेण तु भ्रमन्।<br>सप्तद्वीपसमुद्रां गां सप्तभिः सर्पते दिवि॥ ८२ | इस प्रकार ये दिवाकर सूर्य हरितवर्णके [सात] अविनाशी अश्वोंद्वारा खींचे जाते हुए एक चक्रवाले रथसे वेगपूर्वक चलते हैं। ये सूर्य एक चक्रवाले रथसे [उक्त] सात समूहोंके साथ आकाशमें दिन-रात भ्रमण करते हुए सात द्वीपों तथा समुद्रोंवाली पृथ्वीके ऊपर भ्रमण करते हैं॥ ८१-८२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सूर्यरथनिर्णयो नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सूर्यरथनिर्णय' नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५५॥
५६- सोम (चन्द्रमा)-की स्थिति एवं गतिका निरूपण, चन्द्रकलाओंके ह्रास तथा वृद्धिका वर्णन
२४० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग छप्पनवाँ अध्याय सोम (चन्द्रमा)-की स्थिति एवं गतिका निरूपण, चन्द्रकलाओंके ह्रास तथा वृद्धिका वर्णन सूत उवाच वीथ्याश्रयाणि चरति नक्षत्राणि निशाकरः। त्रिचक्रोभयतोऽश्वश्च विज्ञेयस्तस्य वै रथः॥ १ शतारैश्च त्रिभिश्चक्रैर्युक्तः शुक्लैर्हयोत्तमैः। दशभिस्त्वकृशैर्दिव्यैरसङ्गैस्तैर्मनोजवैः ॥ २ रथेनानेन देवैश्च पितृभिश्चैव गच्छति। सोमो ह्यम्बुमयैर्गोभिः शुक्लैः शुक्लगभस्तिमान्॥ ३ क्रमते शुक्लपक्षादौ भास्करात्परमास्थितः। आपूर्यते परस्यान्तः सततं दिवसक्रमात्॥ ४ देवैः पीतं क्षये सोममाप्याययति नित्यशः। पीतं पञ्चदशाहं तु रश्मिनैकेन भास्करः॥ ५ आपूर्यन् सुषुम्नेन भागं भागमनुक्रमात्। इत्येषा सूर्यवीर्येण चन्द्रस्याप्यायिता तनुः॥ ६ स पौर्णमास्यां दृश्येत शुक्लः सम्पूर्णमण्डलः। एवमाप्यायितं सोमं शुक्लपक्षे दिनक्रमात्॥ ७ ततो द्वितीयाप्रभृति बहुलस्य चतुर्दशीम्। पिबन्त्यम्बुमयं देवा मधु सौम्यं सुधामृतम्॥ ८ सम्भृतं त्वर्धमासेन ह्यमृतं सूर्यतेजसा। पानार्थममृतं सोमं पौर्णमास्यामुपासते॥ ९ एकरात्रं सुराः सर्वे पितृभिस्त्वृषिभिः सह। सोमस्य कृष्णपक्षादौ भास्कराभिमुखस्य च॥ १० प्रक्षीयन्ते परस्यान्तः पीयमानाः कलाः क्रमात्। त्रयस्त्रिंशच्छताश्चैव त्रयस्त्रिंशत्तथैव च॥ ११ त्रयस्त्रिंशत्सहस्त्राणि देवाः सोमं पिबन्ति वै। एवं दिनक्रमात्पीते विबुधैस्तु निशाकरे॥ १२ पीत्वार्धमासं गच्छन्ति अमावास्यां सुरोत्तमाः। पितरश्चोपतिष्ठन्ति अमावास्यां निशाकरम्॥ १३ सूतजी बोले—चन्द्रमा वीथियोंमें स्थित नक्षत्रोंमें चलता है। उसके रथको तीन पहियोंवाला तथा दोनों ओर घोड़ोंसे युक्त जानना चाहिये। यह सौ अरों (तीलियों)-वाले तीन पहियोंसे युक्त है एवं श्वेतवर्णवाले, उत्तम, पुष्ट, दिव्य जुएसे बिना नथे हुए और मनके समान वेगवाले दस घोड़ोंसे समन्वित है। श्वेत किरणोंवाले चन्द्रमा श्वेत रंगके अम्बुमय दस घोड़ोंसहित देवताओं तथा पितरोंके साथ इस रथसे चलते हैं॥ १-३॥ सूर्यसे दूरस्थित यह शुक्लपक्षके आदिसे क्रमशः बढ़ता है। दिनके क्रमसे यह निरन्तर शुक्लपक्षसे अन्ततक वृद्धिको प्राप्त होता है। सूर्य इस चन्द्रमाको विकसित करता है। देवतागण [कृष्णपक्षमें] इसको पीते हैं। देवताओंके द्वारा यह पन्द्रह दिनतक पीया जाता है। सूर्य [अपनी] सुषुम्ना नामक एक किरणके द्वारा क्रमशः इसके एक-एक भागको पूर्ण करते हैं। इन सूर्यके तेजसे चन्द्रमाका शरीर विकसित होता है। ये पूर्णिमा तिथिको पूर्णमण्डलवाले होकर श्वेतवर्णके दिखायी पड़ते हैं। इस शुक्लपक्षमें दिनके क्रमसे चन्द्रमा बढ़ते रहते हैं॥ ४-७॥ तत्पश्चात् कृष्णपक्षकी द्वितीयासे प्रारम्भ करके चतुर्दशी तिथितक देवतालोग चन्द्रमाके जलमय मधुर सुधामृतका पान करते हैं। वह अमृत सूर्यके तेजसे आधे महीनेतक चन्द्रमामें भरा रहता है। उस अमृतको पीनेके लिये पूर्णिमा तिथिको पूरी रात सभी देवता पितरों तथा ऋषियोंके साथ चन्द्रमाके पास स्थित रहते हैं। कृष्णपक्षके आदिसे सूर्याभिमुख चन्द्रमाकी पी जाती हुई कलाएँ क्रमशः क्षीण होती जाती हैं। वसु (८), रुद्र (११), आदित्य (१२) तथा अश्विनीद्वय (२)—ये तैंतीस देवता एवं इनके पुत्र-पौत्ररूप तैंतीस सौ तथा तैंतीस हजार देवता चन्द्रमाका पान करते हैं। इस प्रकार दिनके क्रमसे देवताओंके द्वारा चन्द्रमाका पान किये जानेपर