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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र ३ ] अध्याय १ २५

सूत्र ३ ] अध्याय १ २५ है¹ तथा समस्त विशेषणोंसे युक्त होकर भी निर्विशेष² है। इस प्रकार उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरमें विपरीत भावोंका समावेश स्वाभाविक होनेके कारण यहाँ शंकाके लिये स्थान नहीं है।³ सम्बन्ध—कर्तापन और भोक्तापनसे रहित, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्मको इस जगत्का कारण कैसे माना जा सकता है? इसपर कहते हैं— शास्त्रयोनित्वात् ॥ १ । १ । ३ ॥ शास्त्रयोनित्वात्= शास्त्र (वेद)-में उस ब्रह्मको जगत्का कारण बताया गया है, इसलिये (उसको जगत्का कारण मानना उचित है)। १-एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥ (श्वेता० ६। ११) 'वह एक देव ही सब प्राणियोंमें छिपा हुआ, सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोंका अन्तर्यामी परमात्मा है; वही सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सम्पूर्ण भूतोंका निवास-स्थान, सबका साक्षी, चेतनस्वरूप, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है।' २-एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ (मा० उ० ६) 'यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह सबका अन्तर्यामी है, यह सम्पूर्ण जगत्का कारण है; क्योंकि समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयका स्थान यही है।' नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ (मा० उ० ७) 'जो न भीतरकी ओर प्रज्ञावाला है, न बाहरकी ओर प्रज्ञावाला है, न दोनों ओर प्रज्ञावाला है, न प्रज्ञानघन है, न जाननेवाला है, न नहीं जाननेवाला है, जो देखा नहीं गया है, जो व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता, जो पकड़नेमें नहीं आ सकता, जिसका कोई लक्षण नहीं है, जो चिन्तन करनेमें नहीं आ सकता, जो बतलानेमें नहीं आ सकता, एकमात्र आत्माकी प्रतीति ही जिसका सार है, जिसमें प्रपंचका सर्वथा अभाव है, ऐसा सर्वथा शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्त्व परब्रह्म परमात्माका चतुर्थ पाद है, इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी मानते हैं। वह परमात्मा है, वह जाननेयोग्य है।' ३-इस विषयका निर्णय सूत्रकारने स्वयं किया है। देखो सूत्र ३।२।११ से ३।२।२३ तककी व्याख्या।

२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—वेदमें जिस प्रकार ब्रह्मके सत्य, ज्ञान और अनन्त (तै० उ० २।१) आदि लक्षण बताये गये हैं, उसी प्रकार उसको जगत्‌का कारण भी बताया गया है।१ इसलिये पूर्वसूत्रके कथनानुसार परब्रह्म परमेश्वरको जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण मानना सर्वथा उचित ही है। सम्बन्ध—मृत्तिका आदि उपादानोंसे घट आदि वस्तुओंकी रचना करनेवाले कुम्भकार आदिकी भाँति ब्रह्मको जगत्‌का निमित्त कारण बतलाना तो युक्तिसंगत हैं; परंतु उसे उपादान कारण कैसे माना जा सकता है? इसपर कहते हैं— तत्तु समन्वयात् ॥१।१।४॥ तु=तथा; तत्=वह ब्रह्म; समन्वयात्=समस्त जगत्‌में पूर्णरूपसे अनुगत (व्याप्त) होनेके कारण (उपादान भी हैं)। व्याख्या—जिस प्रकार अनुमान और शास्त्र-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि इस विचित्र जगत्‌का निमित्त कारण परब्रह्म परमेश्वर है, उसी प्रकार यह भी सिद्ध है कि वही इसका उपादान कारण भी है; क्योंकि वह इस जगत्‌में पूर्णतया अनुगत (व्याप्त) है, इसका अणुमात्र भी परमेश्वरसे शून्य नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी भगवान्‌ने कहा है कि 'चर या अचर, जड या चेतन, ऐसा कोई भी प्राणी या भूतसमुदाय नहीं है, जो मुझसे रहित हो।' (१०। ३९) 'यह सम्पूर्ण जगत् मुझसे व्याप्त है।' (गीता ९। ४) उपनिषदोंमें भी स्थान-स्थानपर यह बात दोहरायी गयी है कि 'उस परब्रह्म परमेश्वरसे यह समस्त जगत् व्याप्त है।'२ सम्बन्ध—सांख्यमतके अनुसार त्रिगुणात्मिका प्रकृति भी समस्त जगत्‌में १-'एष योनिः सर्वस्य' (मा० उ० ६) 'यह परमात्मा सम्पूर्ण जगत्‌का कारण है।' 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति।' (तै० उ० ३।१) 'ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं तथा अन्तमें प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसको जाननेकी इच्छा कर, वही ब्रह्म है।' २-ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। (ईशा० १)

सूत्र ५-६ ] अध्याय १ २७

सूत्र ५-६ ] अध्याय १ २७ व्याप्त है, फिर व्याप्तिरूप हेतुसे जगत्का उपादान कारण ब्रह्मको ही क्यों मानना चाहिये, प्रकृतिको क्यों नहीं ? इसपर कहते हैं— ईक्षतेर्नाशब्दम् ॥ १।१।५॥ ईक्षतेः=श्रुतिमें 'ईक्ष' धातुका प्रयोग होनेके कारण; अशब्दम् = शब्द-प्रमाण-शून्य प्रधान (त्रिगुणात्मिका जड प्रकृति); न = जगत्का कारण नहीं है। व्याख्या—उपनिषदोंमें जहाँ सृष्टिका प्रसंग आया है, वहाँ 'ईक्ष' धातुकी क्रियाका प्रयोग हुआ है; जैसे 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० उ० ६।२।१) इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय' (छा० उ० ६।२।३) अर्थात् 'उस सत्ने ईक्षण-संकल्प किया कि मैं बहुत हो जाऊँ, अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ।' ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार दूसरी जगह भी 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीत्' इस प्रकार आरम्भ करके 'स ईक्षत लोकान्नु सृजै' (ऐ० उ० १।१।१) अर्थात् 'उसने ईक्षण— विचार किया कि निश्चय ही मैं लोकोंकी रचना करूँ।' ऐसा कहा है। परंतु त्रिगुणात्मिका प्रकृति जड है, उसमें ईक्षण या संकल्प नहीं बन सकता; क्योंकि वह (ईक्षण) चेतनका धर्म है; अतः शब्दप्रमाणरहित प्रधान (जड प्रकृति)-को जगत्का उपादान कारण नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—ईक्षण या संकल्प चेतनका धर्म होनेपर भी गौणीवृत्तिसे अचेतनके लिये प्रयोगमें लाया जा सकता है, जैसे लोकमें कहते हैं 'अमुक मकान अब गिरना ही चाहता है।' इसी प्रकार यहाँ भी ईक्षण-क्रियाका सम्बन्ध गौणरूपसे त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिके साथ मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं— गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ॥१।१।६॥ चेत् =यदि कहो; गौणः = ईक्षणका प्रयोग गौणवृत्तिसे (प्रकृतिके लिये) हुआ है, न = तो यह ठीक नहीं है; आत्मशब्दात् = क्योंकि वहाँ 'आत्म' शब्दका प्रयोग है।

२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या-ऊपर उद्धृत की हुई ऐतरेयकी श्रुतिमें ईक्षणका कर्ता आत्माको बताया गया है; अतः गौण-वृत्तिसे भी उसका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ नहीं हो सकता। इसलिये प्रकृतिको जगत्का कारण मानना वेदके अनुकूल नहीं है। सम्बन्ध- 'आत्म' शब्दका प्रयोग तो मन, इन्द्रिय और शरीरके लिये भी आता है; अतः उक्त श्रुतिमें 'आत्मा' को गौणरूपसे प्रकृतिका वाचक मानकर उसे जगत्का कारण मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं- तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॥ १।१।७॥ तन्निष्ठस्य = उस जगत्कारण (परमात्मा)-में स्थित होनेवालेकी; मोक्षोपदेशात् = मुक्ति बतलायी गयी है; इसलिये (वहाँ प्रकृतिको जगत्कारण नहीं माना जा सकता)। व्याख्या-तैत्तिरीयोपनिषद्की दूसरी वल्लीके सातवें अनुवाकमें जो सृष्टिका प्रकरण आया है, वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि 'तदात्मानं स्वय- मकुरुत' - 'उस ब्रह्मने स्वयं ही अपने-आपको इस जड-चेतनात्मक जगत्के रूपमें प्रकट किया।' साथ ही यह भी बताया गया है कि 'यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते । अथ सोऽभयं गतो भवति' । 'यह जीवात्मा जब उस देखनेमें न आनेवाले, अहंकाररहित, न बतलाये जानेवाले, स्थानरहित आनन्दमय परमात्मामें निर्भय निष्ठा करता है- अविचलभावसे स्थित होता है, तब यह अभय पदको पा लेता है।' इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्में भी श्वेतकेतुके प्रति उसके पिताने उस परम कारणमें स्थित होनेका फल मोक्ष बताया है; किंतु प्रकृतिमें स्थित होनेसे मोक्ष होना कदापि सम्भव नहीं है, अतः उपर्युक्त श्रुतियोंमें 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं है, इसीलिये प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध-उक्त श्रुतिमें आया हुआ 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता, इसमें दूसरा कारण बतलाते हैं-

सूत्र ८-९ ] अध्याय १ २९

सूत्र ८-९ ] अध्याय १ २९ हेयत्वावचनाच्च ॥ १।१।८॥ हेयत्वावचनात्=त्यागनेयोग्य नहीं बताये जानेके कारण; च=भी (उस प्रसंगमें 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं है)। व्याख्या—यदि 'आत्मा' शब्द वहाँ गौणवृत्तिसे प्रकृतिका वाचक होता तो आगे चलकर उसे त्यागनेके लिये कहा जाता और मुख्य आत्मामें निष्ठा करनेका उपदेश दिया जाता; किंतु ऐसा कोई वचन उपलब्ध नहीं होता है। जिसको जगत्‌का कारण बताया गया है, उसीमें निष्ठा करनेका उपदेश किया गया है; अतः परब्रह्म परमात्मा ही 'आत्म' शब्दका वाच्य है और वही इस जगत्‌का निमित्त एवं उपादान कारण है। सम्बन्ध— 'आत्मा' की ही भाँति इस प्रसंगमें 'सत्' शब्द भी प्रकृतिका वाचक नहीं है' यह सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— स्वाप्ययात् ॥ १।१।९॥ स्वाप्ययात्=अपनेमें विलीन होना बताया गया है, इसलिये (सत्- शब्द भी जड प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता)। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (६।८।१)-में कहा है कि 'यत्रैतत् पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनँ स्वपितीत्याचक्षते' अर्थात् 'हे सोम्य! जिस अवस्थामें यह पुरुष (जीवात्मा) सोता है, उस समय यह सत् (अपने कारण)- से सम्पन्न (संयुक्त) होता है; स्व—अपनेमें अपीत—विलीन होता है, इसलिये इसे 'स्वपिति' कहते हैं।'* इस प्रसंगमें जिस सत्‌को समस्त जगत्‌का कारण बताया है, उसीमें जीवात्माका विलीन होना कहा गया है और उस सत्‌को उसका स्वरूप

  • यहाँ स्व (अपने)-में विलीन होना कहा गया है; अतः यह संदेह हो सकता है कि 'स्व' शब्द जीवात्माका ही वाचक है, इसलिये वही जगत्‌का कारण है, परंतु ऐसा समझना

३० वेदान्त-दर्शन [ पाद १

३० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ बताया गया है। अतः यहाँ 'सत्' नामसे कहा हुआ जगत्का कारण जडतत्त्व नहीं हो सकता। सम्बन्ध— यही बात प्रकारान्तरसे पुनः सिद्ध करते हैं— गतिसामान्यात् ॥ १ । १ । १० ॥ गतिसामान्यात् = सभी उपनिषद्-वाक्योंका प्रवाह समानरूपसे चेतनको ही जगत्का कारण बतानेमें है, इसलिये (जड प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता)। व्याख्या—'तस्माद् वा एतस्मादात्मनः आकाशः सम्भूतः' (तै० उ० २।१) 'निश्चय ही सर्वत्र प्रसिद्ध इस परमात्मासे आकाश उत्पन्न हुआ।' 'आत्मत एवेदँ सर्वम्' (छा० उ० ७। २६। १)—'परमात्मासे ही यह सब कुछ उत्पन्न हुआ है।' 'आत्मन एष प्राणो जायते' (प्र० उ० ३। ३)— 'परमात्मासे यह प्राण उत्पन्न होता है।' 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी॥' (मु० उ० २।१।३)—'इस परमेश्वरसे प्राण उत्पन्न होता है; तथा मन (अन्तःकरण), समस्त इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल और सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथिवी—ये सब उत्पन्न होते हैं।' इस प्रकार सभी उपनिषद्-वाक्योंमें समानरूपसे चेतन परमात्माको ही जगत्का कारण बताया गया है; इसलिये जड प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध— पुनः श्रुति-प्रमाणसे इसी बातको दृढ़ करते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं— ठीक नहीं है, क्योंकि पहले जीवात्माका सत् (जगत्के कारण)-से संयुक्त होना बताकर उसी सत्‌को पुनः 'स्व' नामसे कहा गया है और उसीमें जीवात्माके विलीन होनेकी बात कही गयी है। विलीन होनेवाली वस्तुसे लयका अधिष्ठान भिन्न होता है, अतः यहाँ लीन होनेवाली वस्तु जीवात्मा है और जिसमें वह लीन होता है, वह परमात्मा है। इसलिये यहाँ परमात्माको ही 'सत्' के नामसे जगत्‌का कारण बताया गया है, यही मानना ठीक है।

सूत्र ११ ] अध्याय १ ३१

सूत्र ११ ] अध्याय १ ३१ श्रुतत्वाच्च ॥ १। १। ११॥ श्रुतत्वात् = श्रुतियोंद्वारा जगह-जगह यही बात कही गयी है, इसलिये; च=भी (परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का कारण सिद्ध होता है)। व्याख्या—'स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः॥' (श्वेता० ६।९)—'वह परमात्मा सबका परम कारण तथा समस्त करणोंके अधिष्ठाताओंका भी अधिपति है। कोई भी न तो इसका जनक है और न स्वामी ही है।' 'स विश्वकृत्' (श्वेता० ६।१६)—'वह परमात्मा समस्त विश्वका स्रष्टा है।' 'अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे' (मु० उ० २।१।९) 'इस परमेश्वरसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं।'— इत्यादिरूपसे उपनिषदोंमें स्थान-स्थानपर यही बात कही गयी है कि सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का कारण है; अतः श्रुति- प्रमाणसे यही सिद्ध होता है कि सर्वाधार परमात्मा ही सम्पूर्ण जगत्का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है; जड प्रकृति नहीं। सम्बन्ध—'स्वाप्ययात्' १।१।९ सूत्रमें जीवात्माके स्व (परमात्मा)- में विलीन होनेकी बात कहकर यह सिद्ध किया गया कि जड प्रकृति जगत्का कारण नहीं है। किंतु 'स्व' शब्द प्रत्यक्चेतन (जीवात्मा)-के अर्थमें भी प्रसिद्ध है; अतः यह सिद्ध करनेके लिये कि प्रत्यक्चेतन भी जगत्का कारण नहीं है, आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है। तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीमें सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन करते हुए सर्वात्म-स्वरूप परब्रह्म परमेश्वरसे ही आकाश आदिके क्रमसे सृष्टि बतायी गयी है। (अनु० १, ६, ७)। उसी प्रसंगमें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय इन पाँचों पुरुषोंका वर्णन आया है। वहाँ क्रमशः अन्नमयका प्राणमयको, प्राणमयका मनोमयको, मनोमयका विज्ञानमयको और विज्ञानमयका आनन्दमयको अन्तरात्मा बताया गया है? आनन्दमयका अन्तरात्मा दूसरे किसीको नहीं बताया गया है; अपितु उसीसे जगत्की उत्पत्ति बताकर आनन्दकी महिमाका वर्णन करते हुए सर्वात्मा आनन्दमयको

३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ जाननेका फल उसीकी प्राप्ति बताया गया और वहीं ब्रह्मानन्दवल्लीको समाप्त कर दिया गया है। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि इस प्रकरणमें आनन्दमय नामसे किसका वर्णन हुआ है, परमेश्वरका? या जीवात्माका? अथवा अन्य किसीका? इसपर कहते हैं— आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १। १। १२ ॥ अभ्यासात् = श्रुतिमें बारम्बार 'आनन्द' शब्दका ब्रह्मके लिये प्रयोग होनेके कारण; आनन्दमयः = 'आनन्दमय' शब्द (यहाँ परब्रह्म परमेश्वरका ही वाचक है)। व्याख्या—किसी बातको दृढ़ करनेके लिये बारम्बार दुहरानेको 'अभ्यास' कहते हैं। तैत्तिरीय तथा बृहदारण्यक आदि 'अनेक उपनिषदोंमें 'आनन्द' शब्दका ब्रह्मके अर्थमें बारम्बार प्रयोग हुआ है; जैसे—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीके छठे अनुवाकमें 'आनन्दमय' का वर्णन आरम्भ करके सातवें अनुवाकमें उसके लिये 'रसो वै सः। रसँह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयाति।' (२।७) अर्थात् 'वह आनन्दमय ही रसस्वरूप है, यह जीवात्मा इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्दयुक्त हो जाता है। यदि वह आकाशकी भाँति परिपूर्ण आनन्दस्वरूप परमात्मा नहीं होता तो कौन जीवित रह सकता, कौन प्राणोंकी क्रिया कर सकता? सचमुच यह परमात्मा ही सबको आनन्द प्रदान करता है।' ऐसा कहा गया है। तथा 'सैषाऽऽनन्दस्य मीमाँसा भवति', 'एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति।' (तै० उ० २।८) 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन' (तै० उ० २।९) 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' (तै० उ० ३। ६) 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (बृह० उ० ३। ९। २८)—इत्यादि प्रकारसे श्रुतियोंमें जगह-जगह परब्रह्मके अर्थमें 'आनन्द' एवं 'आनन्दमय' शब्दका प्रयोग हुआ है। इसलिये 'आनन्दमय' नामसे यहाँ उस सर्वशक्तिमान्, समस्त जगत्के परम कारण,

सूत्र १३-१४ ] अध्याय १ ३३

सूत्र १३-१४ ] अध्याय १ ३३ सर्वनियन्ता, सर्वव्यापी, सबके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं। सम्बन्ध - यहाँ यह शंका होती है कि 'आनन्दमय' शब्दमें जो 'मयट्' प्रत्यय है, वह विकार अर्थका बोधक है और परब्रह्म परमात्मा निर्विकार है। अतः जिस प्रकार अन्नमय आदि शब्द ब्रह्मके वाचक नहीं हैं, वैसे ही, उन्हींके साथ आया हुआ यह 'आनन्दमय' शब्द भी परब्रह्मका वाचक नहीं होना चाहिये। इसपर कहते हैं- विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ॥ १। १। १३॥ चेत् = यदि कहो; विकारशब्दात् = 'मयट्' प्रत्यय विकारका बोधक होनेसे; न=आनन्दमय शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता; इति = तो यह कथन; न=ठीक नहीं है; प्राचुर्यात्=क्योंकि 'मयट्' प्रत्यय यहाँ प्रचुरताका बोधक है (विकारका नहीं)। व्याख्या - 'तत्प्रकृतवचने मयट्' (पा० सू० ५। ४। २१) इस पाणिनिसूत्रके अनुसार प्रचुरताके अर्थमें भी 'मयट्' प्रत्यय होता है; अतः यहाँ 'आनन्दमय' शब्दमें जो 'मयट्' प्रत्यय है, वह विकारका नहीं, प्रचुरता-अर्थका ही बोधक है अर्थात् वह ब्रह्म आनन्दघन है, इसीका द्योतक है। इसलिये यह कहना ठीक नहीं है कि 'आनन्दमय' शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता। परब्रह्म परमेश्वर आनन्दघनस्वरूप है, इसलिये उसे 'आनन्दमय' कहना सर्वथा उचित है। सम्बन्ध - यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब 'मयट्' प्रत्यय विकारका बोधक भी होता है, तब यहाँ उसे प्रचुरताका ही बोधक क्यों माना जाय ? विकारबोधक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं- तद्धेतुव्यपदेशाच्च ॥ १। १। १४॥ तद्धेतुव्यपदेशात् =(उपनिषदोंमें ब्रह्मको) उस आनन्दका हेतु बताया गया है, इसलिये; च=भी (यहाँ 'मयट्' प्रत्यय विकार अर्थका बोधक नहीं है)।

३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमें आनन्दमयको आनन्द प्रदान करनेवाला बताया गया है (तै० उ० २। ७)।* जो सबको आनन्द प्रदान करता है, वह स्वयं आनन्दघन है, इसमें तो कहना ही क्या है; क्योंकि जो अखण्ड आनन्दका भण्डार होगा, वही सदा सबको आनन्द प्रदान कर सकेगा। इसलिये यहाँ मयट् प्रत्ययको विकारका बोधक न मानकर प्रचुरताका बोधक मानना ही ठीक है। सम्बन्ध—केवल मयट् प्रत्यय प्रचुरताका बोधक होनेसे ही यहाँ 'आनन्दमय' शब्द ब्रह्मका वाचक है, इतना ही नहीं, किंतु— मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॥ १ । १ । १५ ॥ च=तथा; मान्त्रवर्णिकम्=मन्त्राक्षरोंमें जिसका वर्णन किया गया है, उस ब्रह्मका; एव=ही; गीयते=(यहाँ) प्रतिपादन किया जाता है (इसलिये भी आनन्दमय ब्रह्म ही है)। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीके आरम्भमें जो यह मन्त्र आया है कि—‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्। सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता।' अर्थात् 'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है। वह ब्रह्म विशुद्ध आकाशस्वरूप परम धाममें रहते हुए ही सबके हृदयरूप गुफामें छिपा हुआ है; जो उसको जानता है, वह सबको भलीभाँति जाननेवाले ब्रह्मके साथ समस्त भोगोंका अनुभव करता है।' इस मन्त्रद्वारा वर्णित ब्रह्मको यहाँ 'मान्त्रवर्णित' कहा गया है। जिस प्रकार उक्त मन्त्रमें उस परब्रह्मको सबका अन्तरात्मा बताया गया है, उसी प्रकार ब्राह्मण-ग्रन्थमें 'आनन्दमय' को सबका अन्तरात्मा कहा है; इस प्रकार दोनों स्थलोंकी एकताके लिये यही मानना उचित है कि 'आनन्दमय' शब्द यहाँ ब्रह्मका ही वाचक है, अन्य किसीका नहीं। सम्बन्ध—यदि 'आनन्दमय' शब्दको जीवात्माका वाचक मान लिया जाय तो क्या हानि है? इस पर कहते हैं—

  • देखो सूत्र १२ की व्याख्या।

सूत्र १६-१७ ] अध्याय १ ३५

सूत्र १६-१७ ] अध्याय १ ३५ नेतरोऽनुपपत्तेः ॥ १ । १ । १६ ॥ इतरः:=ब्रह्मसे भिन्न जो जीवात्मा है, वह; न=आनन्दमय नहीं हो सकता; अनुपपत्तेः:=क्योंकि पूर्वापरके वर्णनसे यह बात सिद्ध नहीं होती। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीमें आनन्दमयका वर्णन करनेके अनन्तर यह बात कही गयी है कि 'सोऽकामयत। बहु स्यां प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा इद ँ सर्वमसृजत।' 'उस आनन्दमय परमात्माने यह इच्छा की कि मैं बहुत होऊँ, जन्म ग्रहण करूँ, फिर उसने तप (संकल्प) किया। तप करके समस्त जगत्की रचना की।' (तै० उ० २। ६) यह कथन जीवात्माके लिये उपयुक्त नहीं है, क्योंकि जीवात्मा अल्पज्ञ और परिमित शक्तिवाला है, जगत्की रचना आदि कार्य करनेकी उसमें सामर्थ्य नहीं है। अतः 'आनन्दमय' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं हो सकता। सम्बन्ध—यही बात सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण बतलाते हैं— भेदव्यपदेशाच्च ॥ १ । १ । १७ ॥ भेदव्यपदेशात्=जीवात्मा और परमात्माको एक-दूसरेसे भिन्न बतलाया गया है, इसलिये; च=भी ('आनन्दमय' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं हो सकता)। व्याख्या—उक्त वल्लीमें आगे चलकर (सातवें अनुवाकमें) कहा है कि 'यह जो ऊपरके वर्णनमें 'सुकृत' नामसे कहा गया है वही रसस्वरूप है। यह जीवात्मा इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्दयुक्त हो जाता है।'* इस प्रकार यहाँ परमात्माको आनन्ददाता और जीवात्माको उसे पाकर आनन्दयुक्त होनेवाला बताया गया है। इससे दोनोंका भेद सिद्ध होता है। इसलिये भी 'आनन्दमय' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है।

  • देखो सूत्र १२ की व्याख्या।

३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सम्बन्ध- आनन्दका हेतु जो सत्त्वगुण है, वह त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिमें भी विद्यमान है ही; अतः 'आनन्दमय' शब्दको प्रकृतिका ही वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— कामाच्च नानुमानापेक्षा ॥ १ । १ । १८ ॥ च=तथा; कामात्=('आनन्दमय' में) कामनाका कथन होनेसे; अनुमानापेक्षा= (यहाँ) अनुमान-कल्पित जड प्रकृतिको 'आनन्दमय' शब्दसे ग्रहण करनेकी आवश्यकता; न=नहीं है। व्याख्या-उपनिषद्में जहाँ 'आनन्दमय' का प्रसंग आया है, वहाँ 'सोऽकामयत' इस वाक्यके द्वारा आनन्दमयमें सृष्टिविषयक कामनाका होना बताया गया है, जो कि जड प्रकृतिके लिये असम्भव है। अतः उस प्रकरणमें वर्णित 'आनन्दमय' शब्दसे जड प्रकृतिको नहीं ग्रहण किया जा सकता। सम्बन्ध - परब्रह्म परमात्माके सिवा, प्रकृति या जीवात्मा कोई भी 'आनन्दमय' शब्दसे गृहीत नहीं हो सकता; इस बातको दृढ़ करते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं— अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १ । १ । १९॥ च=इसके सिवा; अस्मिन् = इस प्रकरणमें ( श्रुति); अस्य = इस जीवात्माका; तद्योगम् =उस आनन्दमयसे संयुक्त होना (मिल जाना); शास्ति= बतलाती है (इसलिये जड तत्त्व या जीवात्मा आनन्दमय नहीं है)। व्याख्या-तै० उ० (२।८)-में श्रुति कहती है कि 'स य एवंविद् .... एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति' अर्थात् 'इस आनन्दमय परमात्माके तत्त्वको इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् अन्नमयादि समस्त शरीरोंके आत्मस्वरूप आनन्दमय ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' बृहदारण्यकमें भी श्रुतिका कथन है कि 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति' - (कामनारहित आप्तकाम पुरुष) ब्रह्मरूप होकर ही ब्रह्ममें लीन होता है' (बृ० उ० ४ । ४ । ६)। श्रुतिके इन वचनोंसे यह

सूत्र २० ] अध्याय १ ३७

सूत्र २० ] अध्याय १ ३७ स्वतः सिद्ध हो जाता है कि जड प्रकृति या जीवात्माको 'आनन्दमय' नहीं माना जा सकता; क्योंकि चेतन जीवात्माका जड प्रकृतिमें अथवा अपने ही-जैसे परतन्त्र दूसरे किसी जीवमें लय होना नहीं बन सकता। इसलिये एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही 'आनन्दमय' शब्दका वाच्यार्थ है और वही सम्पूर्ण जगत्का कारण है; दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध — तैत्तिरीय-श्रुतिमें जहाँ आनन्दमयका प्रकरण आया है, वहाँ 'विज्ञानमय' शब्दसे जीवात्माको ग्रहण किया गया है, किंतु बृहदारण्यक (४। ४।२२)-में 'विज्ञानमय' को हृदयाकाशमें शयन करनेवाला अन्तरात्मा बताया गया है। अतः जिज्ञासा होती है कि वहाँ 'विज्ञानमय' शब्द जीवात्माका वाचक है अथवा ब्रह्मका ? इसी प्रकार छान्दोग्य (१।६।६)-में जो सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुषका वर्णन आया है, वहाँ भी यह शंका हो सकती है कि इस मन्त्रमें सूर्यके अधिष्ठाता देवताका वर्णन हुआ है या ब्रह्मका ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है- अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ १। १। २०॥ अन्तः=हृदयके भीतर शयन करनेवाला विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलके भीतर स्थित हिरण्यमय पुरुष ब्रह्म है; तद्धर्मोपदेशात् = क्योंकि (उसमें) उस ब्रह्मके धर्मोंका उपदेश किया गया है। व्याख्या - उपर्युक्त बृहदारण्यक श्रुतिमें वर्णित विज्ञानमय पुरुषके लिये इस प्रकार विशेषण आये हैं— 'सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः... एष सर्वेश्वर एष भूतपालः' इत्यादि। तथा छान्दोग्यवर्णित सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती पुरुषके लिये 'सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः' (सब पापोंसे ऊपर उठा हुआ) यह विशेषण दिया गया है। ये विशेषण परब्रह्म परमेश्वरमें ही सम्भव हो सकते हैं। किसी भी स्थितिको प्राप्त देव, मनुष्य आदि योनियोंमें रहनेवाले जीवात्माके ये धर्म नहीं हो सकते। इसलिये वहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष समझना चाहिये; अन्य किसीको नहीं।

३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— भेदव्यपदेशाच्चान्यः ॥ १ । १ । २१ ॥ च=तथा; भेदव्यपदेशात्=भेदका कथन होनेसे; अन्यः=सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भिन्न है। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्के अन्तर्यामिब्राह्मणमें कहा है कि—'य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।' ‘अर्थात् जो सूर्यमें रहनेवाला सूर्यका अन्तर्वर्ती है, जिसे सूर्य नहीं जानता, सूर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर सूर्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।' इस प्रकार वहाँ सूर्यान्तर्वर्ती पुरुषका सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भेद बताया गया है; इसलिये वह हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठातासे भिन्न परब्रह्म परमात्मा ही है। सम्बन्ध—यहाँतकके विवेचनसे यह सिद्ध किया गया कि जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका निमित्त और उपादान कारण परब्रह्म परमेश्वर ही है; जीवात्मा या जड प्रकृति नहीं। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि श्रुति (छा० उ० १।९।१)—में जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण आकाशको भी बताया गया है, फिर ब्रह्मका लक्षण निश्चित करते हुए यह कैसे कहा गया कि जिससे जगत्के जन्म आदि होते हैं, वह ब्रह्म है। इसपर कहते हैं— आकाशस्तल्लिङ्गात् ॥ १ । १ । २२ ॥ आकाशः=(वहाँ) ‘आकाश’ शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, तल्लिङ्गात्=क्योंकि (उक्त मन्त्रमें) जो लक्षण बताये गये हैं, वे उस ब्रह्मके ही हैं। व्याख्या—छान्दोग्य (१।९।१)-में इस प्रकार वर्णन आया है— 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम्।' अर्थात् ‘ये समस्त

सूत्र २३ ] अध्याय १ ३९

सूत्र २३ ] अध्याय १ ३९ भूत (पंचतत्त्व और समस्त प्राणी) निःसन्देह आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं और आकाशमें ही विलीन होते हैं। आकाश ही इन सबसे श्रेष्ठ और बड़ा है। वही इन सबका परम आधार है।' इसमें आकाशके लिये जो विशेषण आये हैं वे भूताकाशमें सम्भव नहीं हैं; क्योंकि भूताकाश तो स्वयं भूतोंके समुदायमें आ जाता है। अतः उससे भूतसमुदायकी या प्राणियोंकी उत्पत्ति बतलाना सुसंगत नहीं है। उक्त लक्षण एकमात्र परब्रह्म परमात्मामें ही संगत हो सकते हैं। वही सर्वश्रेष्ठ, सबसे बड़ा और सर्वाधार है; अन्य कोई नहीं। इसलिये यही सिद्ध होता है कि उस श्रुतिमें 'आकाश' नामसे परमेश्वरको ही जगत्का कारण बताया गया है। सम्बन्ध — अब प्रश्न उठता है कि श्रुति (छा० उ० १ । ११ । ५)-में आकाशकी ही भाँति प्राणको भी जगत्का कारण बतलाया गया है; वहाँ 'प्राण' शब्द किसका वाचक है? इसपर कहते हैं— अत एव प्राणः ॥ १। १। २३॥ अत एव = इसीलिये अर्थात् श्रुतिमें कहे हुए लक्षण ब्रह्ममें ही सम्भव हैं, इस कारण वहाँ; प्राणः = प्राण (भी ब्रह्म ही हैं)। व्याख्या — छान्दोग्य० (१।११।५)-में कहा है कि 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते।' अर्थात् 'निश्चय ही ये सब भूत प्राणमें ही विलीन होते हैं और प्राणसे ही उत्पन्न होते हैं।' ये लक्षण प्राणवायुमें नहीं घट सकते; क्योंकि समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण प्राणवायु नहीं हो सकता। अतः यहाँ 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन हुआ है, ऐसा मानना चाहिये। सम्बन्ध — पूर्व प्रकरणमें तो ब्रह्मसूचक लक्षण होनेसे आकाश तथा प्राणको ब्रह्मका वाचक मानना उचित है; किंतु छान्दोग्योपनिषद् (३।१३। ७)-में जिस ज्योति (तेज)-को समस्त विश्वसे ऊपर सर्वश्रेष्ठ परमधाममें प्रकाशित बताया है तथा जिसकी शरीरान्तर्वर्ती पुरुषमें स्थित ज्योतिके साथ

चरणाभिधानात् = (उस प्रसंगमें) उक्त ज्योतिके चार पादोंका

एकता बतायी गयी है, उसके लिये वहाँ कोई ऐसा लक्षण नहीं बताया गया है, जिससे उसको ब्रह्मका वाचक माना जाय। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त 'ज्योतिः' शब्द किसका वाचक है? इसपर कहते हैं— ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॥ १। १। २४॥ चरणाभिधानात् = (उस प्रसंगमें) उक्त ज्योतिके चार पादोंका कथन होनेसे; ज्योतिः='ज्योतिः' शब्द वहाँ ब्रह्मका वाचक है। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमें 'ज्योतिः' का वर्णन इस प्रकार हुआ है— 'अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिः ॥' (३। १३। ७) अर्थात् 'जो इस स्वर्गलोकसे ऊपर परम ज्योति प्रकाशित हो रही है, वह समस्त विश्वके पृष्ठपर (सबके ऊपर), जिससे उत्तम दूसरा कोई लोक नहीं है, उस सर्वोत्तम परमधाममें प्रकाशित हो रही है, वह निस्सन्देह यही है जो कि इस पुरुषमें आन्तरिक ज्योति है।' इस प्रसंगमें आया हुआ 'ज्योतिः' शब्द जड प्रकाशका वाचक नहीं है, यह बात तो इसमें वर्णित लक्षणोंसे ही स्पष्ट हो जाती है तथापि यह 'ज्योतिः' शब्द किसका वाचक है? ज्ञानका या जीवात्माका अथवा ब्रह्मका? इसका निर्णय नहीं होता; अतः सूत्रकार कहते हैं कि यहाँ जो 'ज्योतिः' शब्द आया है, वह ब्रह्मका ही वाचक है; क्योंकि इसके पूर्व बारहवें खण्डमें इस ज्योतिर्मय ब्रह्मके चार पादोंका कथन है और समस्त भूतसमुदायको उसका एक पाद बताकर शेष तीन पादोंको अमृतस्वरूप तथा परमधाममें स्थित बताया है।* इसलिये इस प्रसंगमें आया हुआ 'ज्योतिः' शब्द ब्रह्मके सिवा अन्य किसीका वाचक नहीं हो सकता। माण्डूक्योपनिषद् मन्त्र ४ और १० में आत्माके चार पादोंका वर्णन

  • वह मन्त्र इस प्रकार है— तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (छा० उ० ३। १२। ६)

करते हुए उसके दूसरे पादको 'तैजस' कहा है। यह 'तैजस' भी

सूत्र २५ ] अध्याय १ ४१ करते हुए उसके दूसरे पादको 'तैजस' कहा है। यह 'तैजस' भी 'ज्योति' का पर्याय ही है। अतः 'ज्योतिः' की भाँति 'तैजस' शब्द भी ब्रह्मका ही वाचक है, जीवात्मा या अन्य किसी प्रकाशका नहीं। इस बातका निर्णय भी इसी प्रसंगके अनुसार समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध — यहाँ यह शंका होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायके बारहवें खण्डमें 'गायत्री' के नामसे प्रकरणका आरम्भ हुआ है। गायत्री एक छन्दका नाम है। अतः उस प्रसंगमें ब्रह्मका वर्णन है, यह कैसे माना जाय ? इसपर कहते हैं— छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगदात् तथा हि दर्शनम् ॥ १ । १ । २५ ॥ चेत्=यदि कहो (उस प्रकरणमें); छन्दोऽभिधानात्=गायत्रीछन्दका कथन होनेके कारण (उसीके चार पादोंका वर्णन है); न=ब्रह्मके चार पादोंका वर्णन नहीं है; इति न=तो यह ठीक नहीं (क्योंकि); तथा=उस प्रकारके वर्णनद्वारा; चेतोऽर्पणनिगदात्=ब्रह्ममें चित्तका समर्पण बताया गया है; तथा हि दर्शनम्=वैसा ही वर्णन दूसरी जगह भी देखा जाता है। व्याख्या — पूर्व प्रकरणमें 'गायत्री ही यह सब कुछ है' (छा० उ० ३ । १२ । १) इस प्रकार गायत्रीछन्दका वर्णन होनेसे उसीके चार पादोंका वहाँ वर्णन है, ब्रह्मका नहीं; ऐसी धारणा बना लेना ठीक नहीं है; क्योंकि गायत्री नामक छन्दके लिये यह कहना नहीं बन सकता कि यह जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् गायत्री ही है। इसलिये यहाँ ऐसा समझना चाहिये कि सबके परम कारण सर्वात्मक परब्रह्म परमेश्वरमें चित्तका समाधान करनेके लिये उस ब्रह्मका ही वहाँ इस प्रकार गायत्री-नामसे वर्णन किया गया है। इसी तरह अन्यत्र भी उद्गीथ, प्रणव आदि नामोंके द्वारा ब्रह्मका वर्णन देखा जाता है। सूक्ष्म- तत्त्वमें बुद्धिका प्रवेश करानेके लिये, किसी प्रकारकी समानताको लेकर स्थूल वस्तुके नामसे उसका वर्णन करना उचित ही हैं।

४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

सम्बन्ध-इस प्रकरणमें 'गायत्री' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है, इस बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं- भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् ॥ १। १। २६ ॥ भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः = (यहाँ ब्रह्मको ही गायत्रीके नामसे कहा गया है, यह माननेसे ही) भूत आदिको पाद बतलाना युक्तिसंगत हो सकता है, इसलिये; च = भी; एवम् = ऐसा ही है। व्याख्या-छान्दोग्य० (३।१२)-के प्रकरणमें गायत्रीको भूत, पृथिवी, शरीर और हृदयरूप चार पादोंसे युक्त बताया गया है। फिर उसकी महिमाका वर्णन करते हुए 'पुरुष' नामसे प्रतिपादित परब्रह्म परमात्माके साथ उसकी एकता करके समस्त भूतोंको (अर्थात् प्राणि-समुदायको) उसका एक पाद बतलाया गया है और अमृतस्वरूप तीन पादोंको परमधाममें स्थित कहा गया है (छा० उ० ३।१२।६)*। इस वर्णनकी संगति तभी लग सकती है, जब कि 'गायत्री' शब्दको गायत्रीछन्दका वाचक न मानकर परब्रह्म परमात्माका वाचक माना जाय। इसलिये यही मानना ठीक है। सम्बन्ध-उक्त सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शंका उपस्थित करके उसका समाधान करते हैं- उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ १। १। २७ ॥ चेत् = यदि कहो; उपदेशभेदात् = उपदेशमें भिन्नता होनेसे; न = गायत्री- शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं है; इति न = तो यह कथन ठीक नहीं है; उभयस्मिन् अपि अविरोधात् = क्योंकि दो प्रकारका वर्णन होनेपर भी (वास्तवमें) कोई विरोध नहीं है। व्याख्या-यदि कहा जाय कि पूर्वमन्त्र (३।१२।६)-में तो 'तीन पाद दिव्यलोकमें हैं' यह कहकर दिव्य लोकको ब्रह्मके तीन पादोंका आधार बताया गया है और बादमें आये हुए मन्त्र (३।१३।७)-में 'ज्योतिः'

  • सूत्र १।१।२४ की टिप्पणीमें यह मन्त्र आ गया है।

सूत्र २८ ] अध्याय १ ४३

सूत्र २८ ] अध्याय १ ४३

नामसे वर्णित ब्रह्मको उस दिव्यलोकसे परे बताया है। इस प्रकार पूर्वापरके वर्णनमें भेद होनेके कारण गायत्रीको ब्रह्मका वाचक बताना संगत नहीं है, तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि दोनों जगहके वर्णनकी शैलीमें किंचित् भेद होनेपर भी वास्तवमें कोई विरोध नहीं है। दोनों स्थलोंमें श्रुतिका उद्देश्य गायत्रीशब्दवाच्य तथा ज्योतिःशब्दवाच्य ब्रह्मको सर्वोपरि परम धाममें स्थित बतलाना ही है। सम्बन्ध — 'अत एव प्राणः' (१।१।२३) इस सूत्रमें यह सिद्ध किया गया है कि उस श्रुतिमें 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन है; किंतु कौषीतकि- उपनिषद् (३।२)-में प्रतर्दनके प्रति इन्द्रने कहा है कि 'मैं ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ, तू आयु तथा अमृतरूपसे मेरी उपासना कर।' इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि इस प्रकरणमें आया हुआ 'प्राण' शब्द किसका वाचक है? इन्द्रका? प्राणवायुका? जीवात्माका? अथवा ब्रह्मका? इसपर कहते हैं— प्राणस्तथानुगमात् ॥ १।१।२८॥ प्राणः = प्राणशब्द (यहाँ भी ब्रह्मका ही वाचक है); तथानुगमात् = क्योंकि पूर्वापरके प्रसंगपर विचार करनेसे ऐसा ही ज्ञात होता है। व्याख्या — इस प्रकरणमें पूर्वापर प्रसंगपर भलीभाँति विचार करनेसे 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक सिद्ध होता है, अन्य किसीका नहीं; क्योंकि आरम्भमें प्रतर्दनने परम पुरुषार्थरूप वर माँगा है। उसके लिये परम हितपूर्ण इन्द्रके उपदेशमें कहा हुआ 'प्राण', 'ब्रह्म' ही होना चाहिये। ब्रह्मज्ञानसे बढ़कर दूसरा कोई हितपूर्ण उपदेश नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त उक्त प्राणको वहाँ प्रज्ञान-स्वरूप बतलाया गया है जो कि ब्रह्मके ही अनुरूप है तथा अन्तमें उसीको आनन्दस्वरूप अजर एवं अमर कहा गया है। फिर उसीको समस्त लोकोंका पालक, अधिपति एवं सर्वेश्वर बताया गया है।* ये सब बातें

  • कौषीतकि-उपनिषद्में यह प्रसंग इस प्रकार है—

४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ब्रह्मके ही उपयुक्त हैं। प्रसिद्ध प्राणवायु, इन्द्र अथवा जीवात्माके लिये ऐसा कहना उपयुक्त नहीं हो सकता। इसलिये यही समझना चाहिये कि यहाँ 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है। सम्बन्ध—उक्त प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्ट शब्दोंमें स्वयं अपनेको ही प्राण कहा है। इन्द्र एक प्रभावशाली देवता तथा अजर, अमर हैं ही; फिर वहाँ 'प्राण' शब्दको इन्द्रका ही वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन् ॥१। १। २९॥ चेत्=यदि कहो; वक्तुः=वक्ता (इन्द्र)-का (उद्देश्य); आत्मोप- देशात्=अपनेको ही 'प्राण' नामसे बतलाना है, इसलिये; न=प्राणशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता; इति=(तो) यह कथन; (न)=ठीक नहीं है; हि=क्योंकि; अस्मिन्=इस प्रकरणमें, अध्यात्मसम्बन्धभूमा= अध्यात्मसम्बन्धी उपदेशकी बहुलता है। व्याख्या—यदि कहो कि इस प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्टरूपसे अपने- आपको ही प्राण बतलाया है, ऐसी परिस्थितिमें 'प्राण' शब्दको इन्द्रका वाचक न मानकर ब्रह्मका वाचक मानना ठीक नहीं है; तो ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि इस प्रकरणमें अध्यात्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता है।* यहाँ आधिदैविक वर्णन नहीं है; अतः उपास्यरूपसे बतलाया हुआ तत्त्व इन्द्र नहीं हो सकता। इसलिये यहाँ 'प्राण' शब्दको ब्रह्मका ही वाचक समझना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँ यह प्रश्न उठता है कि यदि 'प्राण' शब्द इन्द्रका वाचक 'स होवाच प्रतर्दनस्त्वमेव वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यस इति....।' (कौ० उ० ३।१) 'स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा।' (कौ० उ० ३। २) 'एष प्राण एव प्रज्ञात्मा- ऽऽनन्दोऽजरोऽमृत..... एष लोकपाल एष लोकाधिपतिरेष सर्वेश्वरः।' (कौ० उ० ३। ९)

  • इस प्रसंगमें अध्यात्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता किस प्रकार है, यह पूर्वसूत्रकी टिप्पणीमें देखें।