वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
१२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ है—कहीं तो 'आत्मन् आकाशः सम्भूतः' (तै० उ० २। १) इत्यादि श्रुतिके द्वारा आकाश आदिके क्रमसे सृष्टि बतायी गयी है। कहीं 'तत्तेजोऽसृजत' (छा० उ० ६। २। ३) इत्यादि मन्त्रोंद्वारा तेज आदिके क्रमसे सृष्टिका प्रतिपादन किया गया है। कहीं 'स प्राणमसृजत' (प्र० उ० ६।४) इत्यादि वाक्योंद्वारा प्राण आदिके क्रमसे सृष्टिका वर्णन किया गया है। कहीं 'स इमाँल्लोकानसृजत। अम्भो मरीचीर्मरमापः' (ऐ० उ० १।१।२) इत्यादि वचनोंद्वारा बिना किसी सुव्यवस्थित क्रमके ही सृष्टिका वर्णन मिलता है। इस प्रकार सृष्टि-क्रमके वर्णनमें भेद होनेपर भी कोई दोषकी बात नहीं है, बल्कि इस प्रकार विचित्र रचनाका वर्णन तो ब्रह्मके महत्त्वका ही द्योतक है। कल्पभेदसे ऐसा होना सम्भव भी है। इसलिये ब्रह्मको ही जगत्का कारण बताना सर्वथा सुसंगत है। सम्बन्ध—"उपनिषदोंमें कहीं तो यह कहा है कि 'पहले एकमात्र असत् ही था' (तै० उ० २।७), कहीं कहा है 'पहले केवल सत् ही था' (छा० उ० ६।२।१), कहीं 'पहले अव्याकृत था' (बृह० उ० १।४।७) ऐसा वर्णन आता है। उपर्युक्त 'असत्' आदि शब्द ब्रह्मके वाचक कैसे हो सकते हैं?'' ऐसी शंका होनेपर कहते हैं— समाकर्षात् ॥ १। ४। १५॥ समाकर्षात्=आगे-पीछे कहे हुए वाक्यका पूर्णरूपसे आकर्षण करके उसके साथ सम्बन्ध जोड़ लेनेसे ('असत्' आदि शब्द भी ब्रह्मके ही वाचक सिद्ध होते हैं)। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्में जो यह कहा है कि 'असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत।' (२।७) अर्थात् 'पहले यह असत् ही था। इसीसे सत् उत्पन्न हुआ।' यहाँ 'असत्' शब्द अभाव या मिथ्याका वाचक नहीं है; क्योंकि पहले अनुवाकमें ब्रह्मका लक्षण बताते हुए उसे सत्य, ज्ञान और अनन्त कहा गया है। फिर उसीसे आकाश आदिके क्रमसे समस्त जगत्की उत्पत्ति बतायी है। तदनन्तर छठे अनुवाकमें 'सोऽकामयत' के 'सः'
सूत्र १५ ] अध्याय १ १२५
सूत्र १५ ] अध्याय १ १२५ पदसे उसी पूर्वानुवाकमें वर्णित ब्रह्मका आकर्षण किया गया है। तत्पश्चात् अन्तमें कहा गया है कि यह जो कुछ है, वह सत्य ही है—सत्यस्वरूप ब्रह्म ही है।' उसके बाद इसी विषयमें प्रमाणरूपमें श्लोक कहनेकी प्रतिज्ञा करके सातवें अनुवाकमें, 'असद् वा इदमग्र आसीत्' इत्यादि मन्त्र प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार पूर्वापर-प्रसंगको देखते हुए इस मन्त्रमें आया हुआ 'असत्' शब्द मिथ्या या अभावका वाचक सिद्ध नहीं होता; अतः वहाँ 'असत्' का अर्थ 'अप्रकट ब्रह्म' और उससे होनेवाले 'सत्' का अर्थ जगत्-रूपमें 'प्रकट ब्रह्म' ही होगा। इसलिये यहाँ अर्थान्तरकी कल्पना अनावश्यक है। इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्में भी जो यह कहा गया है कि 'आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत्।' (छा० उ० ३।१९।१) अर्थात् 'आदित्य ब्रह्म है, यह उपदेश है, उसीका यह विस्तार है। पहले यह असत् ही था' इत्यादि। यहाँ भी तैत्तिरीयोपनिषद्की भाँति 'असत्' शब्द 'अप्रकट ब्रह्म' का ही वाचक है; क्योंकि इसी मन्त्रके अगले वाक्यमें 'तत्सदासीत्' कहकर उसका 'सत्' नामसे भी वर्णन आया है। इसके सिवा 'बृहदारण्यकोपनिषद्में स्पष्ट ही 'असत्' के स्थानमें 'अव्याकृत' शब्दका प्रयोग किया गया है। (बृह० उ० १।४।७) जो कि 'अप्रकट' का ही पर्याय है। अतः सब जगह पूर्वापरके प्रसंगमें कहे हुए शब्दों या वाक्योंका आकर्षण करके अन्वय करनेपर यही निश्चय होता है कि जगत्के कारणरूपसे भिन्न-भिन्न नामोंद्वारा उस पूर्णब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं। प्रकृति या प्रधानकी सार्थकता परमात्माकी एक शक्ति माननेसे ही हो सकती है; उनसे भिन्न स्वतन्त्र पदार्थान्तर माननेसे नहीं। सम्बन्ध—ब्रह्म ही सम्पूर्ण जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है, जड प्रकृति जगत्का कारण नहीं हो सकती। यह दृढ़ करनेके लिये सूत्रकार कौषीतकि-उपनिषद्के प्रसंगपर विचार करते हुए कहते हैं—
१२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
१२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ जगद्वाचित्वात्॥ १।४।१६॥ जगद्वाचित्वात्=सृष्टि या रचनारूप कर्म जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का वाचक है; इसलिये (चेतन परमेश्वर ही इसका कर्ता है, जड प्रकृति नहीं)। व्याख्या—कौषीतकि-ब्राह्मणोपनिषद्में अजातशत्रु और बालाकिके संवादका वर्णन है। वहाँ बालाकिने 'य एवैष आदित्ये पुरुषस्तमेवाहमुपासे।' (४।२) अर्थात् ‘जो सूर्यमें यह पुरुष है, उसकी मैं उपासना करता हूँ।' यहाँसे लेकर अन्तमें 'य एवैष सव्येऽक्षन् पुरुषस्तमेवाहमुपासे।' (४।१७)—'जो यह बायीं आँखमें पुरुष है, उसकी मैं उपासना करता हूँ।' यहाँतक क्रमशः सोलह पुरुषोंकी उपासना करनेवाला अपनेको बताया; परंतु उसकी प्रत्येक बातको अजातशत्रुने काट दिया। तब वह चुप हो गया। फिर अजातशत्रुने कहा—'बालाके! तू ब्रह्मको नहीं जानता, अतः मैं तुझे ब्रह्मका उपदेश करता हूँ। तेरे बताये हुए सोलह पुरुषोंका जो कर्ता है, जिसके ये सब कर्म हैं, वही जाननेयोग्य है।'* इस प्रकार वहाँ पुरुष-वाच्य जीवात्मा और उनके अधिष्ठानभूत जड शरीर दोनोंको ही परब्रह्म परमेश्वरका कर्म बताया गया है; अतः कर्म या कार्य शब्द जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का वाचक है। इसलिये जड प्रकृति इसका कारण नहीं हो सकती; परब्रह्म परमेश्वर ही इसका कारण है। सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकरणमें 'ज्ञेय' रूपसे बताया हुआ तत्त्व प्राण या जीव नहीं, ब्रह्म ही है, इसकी पुष्टिके लिये सूत्रकार कहते हैं— जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेत्तद् व्याख्यातम्॥ १।४।१७॥ चेत् इति=यदि ऐसा कहो कि; जीवमुख्यप्राणलिङ्गात्=(उस प्रसंगके वाक्यशेषमें) जीव तथा मुख्य प्राणके बोधक लक्षण पाये जाते हैं, इसलिये
- ब्रह्म ते ब्रवाणि स होवाच यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्यः । (४।१८)
सूत्र १८ ] अध्याय १ १२७
सूत्र १८ ] अध्याय १ १२७ (प्राणसहित जीव ही ज्ञेय तत्त्व होना चाहिये); न=ब्रह्म वहाँ ज्ञेय नहीं है; (तो) तद् व्याख्यातम्=इसका निराकरण पहले किया जा चुका है। व्याख्या—यदि यह कहो कि 'यहाँ वाक्यशेषमें जीव और मुख्य प्राणके सूचक लक्षणोंका स्पष्टरूपसे वर्णन है, इसलिये प्राणोंके सहित उसका अधिष्ठाता जीव ही जगत्का कर्ता एवं ज्ञेय बताया गया है, ब्रह्म नहीं।' तो यह उचित नहीं है; क्योंकि इस शंकाका निवारण पहले (१।१।३१ सूत्रमें) कर दिया गया है। वहाँ यह बता दिया गया है कि ब्रह्म सभी धर्मोंका आश्रय है, अतः जीव तथा प्राणके धर्मोंका उसमें बताया जाना अनुचित नहीं है। यदि जीव आदिको भी ज्ञेय तत्त्व मान लें तो त्रिविध उपासनाका प्रसंग उपस्थित हो सकता है, जो उचित नहीं है। सम्बन्ध—अब सूत्रकार इस विषयमें आचार्य जैमिनिकी सम्मति क्या है, यह बताते हैं— अन्यार्थं तु जैमिनिः प्रश्नव्याख्यानाभ्यामपि चैवमेके ॥ १ । ४ । १८ ॥ जैमिनिः = आचार्य जैमिनि; तु = तो (कहते हैं कि); अन्यार्थम् = (इस प्रकरणमें) जीवात्मा तथा मुख्य प्राणका वर्णन दूसरे ही प्रयोजनसे है; प्रश्नव्याख्यानाभ्याम्=क्योंकि प्रश्न और उत्तरसे यही सिद्ध होता है; च = तथा; एके = एक (काण्व) शाखावाले; एवम् अपि = ऐसा कहते भी हैं। व्याख्या—आचार्य जैमिनि पूर्व कथनका निराकरण करते हुए कहते हैं कि इस प्रकरणमें जो जीवात्मा और मुख्य प्राणका वर्णन आया है, वह मुख्य प्राण या जीवात्माको जगत्का कारण बतानेके लिये नहीं आया है, जिससे कि ब्रह्मको समस्त लक्षणोंका आश्रय बताकर उत्तर देनेकी आवश्यकता पड़े। यहाँ तो उनका वर्णन दूसरे ही प्रयोजनसे आया है। अर्थात् उनका ब्रह्ममें विलीन होना बताकर ब्रह्मको ही जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये उनका वर्णन है। भाव यह है कि जीवात्माकी सुषुप्ति-अवस्थाके वर्णनद्वारा सुषुप्तिके
१२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
१२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ दृष्टान्तसे प्रलयकालमें सबका ब्रह्ममें ही विलय और सृष्टिकालमें पुनः उसीसे प्राकट्य बताकर ब्रह्मको ही जगत्का कारण सिद्ध किया गया है। यह बात प्रश्न और उसके उत्तरमें कहे हुए वचनोंसे सिद्ध होती है। इसके सिवा, काण्वशाखावालोंने तो अपने ग्रन्थमें इस विषयको और भी स्पष्ट कर दिया है। वहाँ अजातशत्रुने कहा है कि ‘यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद् य एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते तानि यदा गृह्णत्यथ हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम।’ (बृह० उ० २।१।१७) अर्थात् ‘यह विज्ञानमय पुरुष (जीवात्मा) जब सुषुप्ति-अवस्थामें स्थित था (सोता था) तब यह बुद्धिके सहित समस्त प्राणोंको अर्थात् मुख्य प्राण और समस्त इन्द्रियोंकी वृत्तिको लेकर उस आकाशमें सो रहा था, जो हृदयके भीतर है। उस समय इसका नाम ‘स्वपिति’ होता है’ इत्यादि। इस वर्णनमें आया हुआ ‘आकाश’ शब्द परमात्माका वाचक है। अतः यह सिद्ध होता है कि यहाँ सुषुप्तिके दृष्टान्तसे यह बात समझायी गयी है कि जिस प्रकार यह जीवात्मा निद्राके समय समस्त प्राणोंके सहित परमात्मामें विलीन-सा हो जाता है, उसी प्रकार प्रलयकालमें यह जड़-चेतनात्मक समस्त जगत् परब्रह्ममें विलीन हो जाता है; तथा सृष्टिकालमें जाग्रत्की भाँति पुनः प्रकट हो जाता है। सम्बन्ध—आचार्य जैमिनि अपने मतकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— वाक्यान्वयात् ॥ १।४।१९॥ वाक्यान्वयात् = पूर्वापर वाक्योंके समन्वयसे (भी उस प्रकरणमें आये हुए जीव और मुख्य प्राणके लक्षणोंका प्रयोग दूसरे ही प्रयोजनसे हुआ है, यह सिद्ध होता है)। व्याख्या—प्रकरणके आरम्भ (कौ० उ० ४।१८)-में ब्रह्मको जानने- योग्य बताकर अन्तमें उसीको जाननेवालेकी महिमाका वर्णन किया गया है (कौ० उ० ४।२०)। इस प्रकार पूर्वापरके वाक्योंका समन्वय करनेसे
सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ १२९
सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ १२९ यही सिद्ध होता है कि बीचमें आया हुआ जीवात्मा और मुख्य प्राणका वर्णन भी उस परब्रह्म परमात्माको ही जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये है। सम्बन्ध - इसी विषयमें आश्मरथ्य आचार्यका मत उपस्थित करते हैं— प्रतिज्ञासिद्धेर्लिंगमित्याश्मरथ्यः ॥ १ । ४ । २० ॥ लिंगम् = उक्त प्रकरणमें जीवात्मा और मुख्य प्राणके लक्षणोंका वर्णन, ब्रह्मको ही जगत्का कारण बतानेके लिये हुआ है; प्रतिज्ञासिद्धेः = क्योंकि ऐसा माननेसे ही पहले की हुई प्रतिज्ञाकी सिद्धि होती है; इति = ऐसा; आश्मरथ्यः = आश्मरथ्य आचार्य मानते हैं। व्याख्या - आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि अजातशत्रुने जो यह प्रतिज्ञा की थी कि 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' — 'तुझे ब्रह्मका स्वरूप बताऊँगा।' उसकी सिद्धि परब्रह्मको ही जगत्का कारण माननेसे हो सकती है, इसलिये उस प्रसंगमें जो जीवात्मा तथा मुख्य प्राणके लक्षणोंका वर्णन आया है, वह इसी बातको सिद्ध करनेके लिये है कि जगत्का कारण परब्रह्म परमात्मा ही है। सम्बन्ध - अब इसी विषयमें आचार्य औडुलोमिका मत दिया जाता है— उत्क्रमिष्यत एवं भावादित्यौडुलोमिः ॥ १ । ४ । २१ ॥ उत्क्रमिष्यतः = शरीर छोड़कर परलोकमें जानेवाले ब्रह्मज्ञानीका; एवं भावात् = इस प्रकार ब्रह्ममें विलीन होना (दूसरी श्रुतिमें भी बताया गया) है, इसलिये; (यहाँ जीवात्मा और मुख्य प्राणका वर्णन परब्रह्मको ही जगत्का कारण बतानेके लिये है;) इति = ऐसा; औडुलोमिः = औडुलोमि आचार्य मानते हैं। व्याख्या - जिस प्रकार इस प्रकरणमें सोते हुए मनुष्यके समस्त प्राणोंसहित जीवात्माका परमात्मामें विलीन होना बताया गया है, इसी प्रकार शरीर छोड़कर ब्रह्मलोकमें जानेवाले ब्रह्मज्ञानीकी गतिका वर्णन करते हुए मुण्डकोपनिषद्में कहा गया है कि—
१३० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु। कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति॥ यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥ (३।२।७-८) 'ब्रह्मज्ञानी महापुरुषका जब देहपात होता है, तब पंद्रह कलाएँ और सम्पूर्ण देवता अपने-अपने कारणभूत देवताओंमें जाकर स्थित हो जाते हैं, फिर समस्त कर्म और विज्ञानमय जीवात्मा ये सब-के-सब परम अविनाशी ब्रह्ममें एक हो जाते हैं; जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपने नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं; वैसे ही विद्वान् ज्ञानी महात्मा नाम- रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परम पुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है।' इससे यह सिद्ध होता है कि उक्त प्रकरणमें जो जीवात्मा और मुख्य प्राणका वर्णन हुआ है, वह सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और प्रलयका कारण केवल परब्रह्मको बतानेके लिये ही है। ऐसा औडुलोमि आचार्य मानते हैं। सम्बन्ध—अब काशकृत्स्न आचार्यका मत उपस्थित करते हैं— अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः॥ १।४।२२॥ अवस्थितेः=प्रलयकालमें सम्पूर्ण जगत्की स्थिति उस परमात्मामें ही होती है, इसलिये (उक्त प्रकरणमें जीव और मुख्य प्राणका वर्णन परब्रह्मको जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये ही है)। इति=ऐसा; काशकृत्स्नः= काशकृत्स्न आचार्य मानते हैं। व्याख्या—काशकृत्स्न आचार्यका कहना है कि प्रलयकालमें सम्पूर्ण जगत्की स्थिति परमात्मामें ही बतायी गयी है (प्र० उ० ४।११),* इससे भी यही सिद्ध होता है कि उक्त प्रसंगमें जो सुषुप्तिकालमें प्राण और
- विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र।
सूत्र २३ ] अध्याय १ १३१ जीवात्माका परमात्मामें विलीन होना बताया है, वह परब्रह्मको जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये ही है। सम्बन्ध—‘‘वेदमें ‘शक्ति’ (श्वेता० ६।८), ‘अजा’ (श्वेता० १।९ तथा ४।५), ‘माया’ (श्वेता० ४।१०) तथा ‘प्रधान’ (श्वेता० १।१०) आदि नामोंसे जिसका वर्णन किया गया है, उसीको ईश्वरकी अध्यक्षतामें जगत्का कारण बताया गया है। गीता आदि स्मृतियोंमें भी ऐसा ही वर्णन है (गीता ९।१०)। इससे यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि जगत्का निमित्त कारण अर्थात् अधिष्ठाता, नियामक, संचालक तथा रचयिता तो अवश्य ही ईश्वर है; परंतु उपादान कारण ‘प्रकृति’ तथा ‘माया’ नामसे कहा हुआ ‘प्रधान’ ही है।‘’ ऐसा मान लें तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्॥ १।४।२३॥ प्रकृतिः=उपादान कारण; च=भी (ब्रह्म ही है); प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्= क्योंकि ऐसा माननेसे ही श्रुतिमें आये हुए प्रतिज्ञा-वाक्य तथा दृष्टान्त- वाक्य बाधित नहीं होंगे। व्याख्या—श्वेतकेतुके उपाख्यानमें उसके पिताने श्वेतकेतुसे पूछा है कि ‘उत तमादेशमप्राक्ष्यः॥ येनाश्रुतँ श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम्।’ (छा० उ० ६।१।२-३) अर्थात् ‘क्या तुमने अपने गुरुसे उस तत्त्वके उपदेशके लिये भी जिज्ञासा की है, जिसके जाननेसे बिना सुना हुआ सुना हुआ हो जाता है, बिना मनन किया हुआ मनन किया हुआ हो जाता है तथा बिना जाना हुआ जाना हुआ हो जाता है?’ यह सुनकर श्वेतकेतुने अपने पितासे पूछा—‘भगवन्! वह उपदेश कैसा है?’ तब उसके पिताने दृष्टान्त देकर समझाया—‘यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातँ स्यात्।’ (छा० उ० ६।१।४) अर्थात् ‘जिस प्रकार एक मिट्टीके ढेलेका तत्त्व जान लेनेपर मिट्टीकी बनी सब वस्तु जानी हुई हो जाती है कि ‘यह सब मिट्टी है।’ इसके बाद आरुणिने इसी प्रकार सोने और लोहेका भी दृष्टान्त दिया है। यहाँ पहले जो पिताने प्रश्न किया है, वह तो प्रतिज्ञा-वाक्य है और
१३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
१३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ मिट्टी आदिके उदाहरणसे जो समझाया गया है, वह दृष्टान्त-वाक्य है। यदि ब्रह्मसे भिन्न 'प्रधान' को यहाँ उपादान कारण मान लिया जाय तो उसके एक अंशको जाननेपर प्रधानका ही ज्ञान होगा, ब्रह्मका ज्ञान नहीं होगा। परंतु वहाँ ब्रह्मका ज्ञान कराना अभीष्ट है, अतः प्रतिज्ञा और दृष्टान्तकी सार्थकता भी जगत्का उपादान कारण ब्रह्मको माननेसे ही हो सकती है। मुण्डकोपनिषद् (१।१।२ तथा १।१।७)-में भी इसी प्रकार प्रतिज्ञा-वाक्य और दृष्टान्त- वाक्य मिलते हैं। बृहदारण्यकोपनिषद् (४।५।६, ८)-में भी प्रतिज्ञा तथा दृष्टान्तपूर्वक उपदेश मिलता है। उन सब स्थलोंमें भी उनकी सार्थकता पूर्ववत् ब्रह्मको जगत्का कारण माननेसे ही हो सकती है; यह समझ लेना चाहिये। श्वेताश्वतरोपनिषद् आदिमें अजा, माया, शक्ति और प्रधान आदि नामोंसे जिसका वर्णन है, वह कोई स्वतन्त्र तत्त्व नहीं है। वह तो भगवान्के अधीन रहनेवाली उन्हींकी शक्तिविशेषका वर्णन है। यह बात वहाँके प्रकरणको देखनेसे स्वतः स्पष्ट हो जाती है। आगे-पीछेके वर्णनपर विचार करनेसे भी यही सिद्ध होता है। श्वेताश्वतरोपनिषद्में यह स्पष्ट कहा गया है कि 'उस परमेश्वरकी ज्ञान, बल और क्रियारूप नाना प्रकारकी दिव्य शक्तियाँ स्वाभाविक सुनी जाती हैं, (६।८)१ तथा उस परमेश्वरका उससे भिन्न कोई कार्यकारण (शरीर-इन्द्रिय आदि) नहीं है।' (६।८)२ इससे भी यही सिद्ध होता है कि उस परमेश्वरकी शक्ति उससे भिन्न नहीं है। अग्निके उष्णत्व और प्रकाशकी भाँति उसका वह स्वभाव ही है। इसीलिये परमात्माको बिना मन और इन्द्रियोंके उन सबका कार्य करनेमें समर्थ कहा गया है (श्वेता० ३।१९)३ भगवद्गीतामें भी भगवान्ने जड प्रकृतिको सांख्योंकी भाँति जगत्का उपादान १-यह मन्त्र पृष्ठ २४ की टिप्पणीमें आया है। २-'न तस्य कार्यं करणं च विद्यते।' ३-अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥ 'वह परमात्मा हाथ-पैरसे रहित होकर भी समस्त वस्तुओंको ग्रहण करनेवाला तथा
सूत्र २४] अध्याय १ १३३
सूत्र २४] अध्याय १ १३३ कारण नहीं बताया है; किंतु अपनी अध्यक्षतामें अपनी ही स्वरूपभूता प्रकृतिको चराचर जगत्की उत्पत्ति करनेवाली कहा है (गीता ९।१०)। जड प्रकृति जड और चेतन दोनोंका उपादान कारण किसी प्रकार भी नहीं हो सकती। अतः इस वर्णनमें प्रकृतिको भगवान्की स्वरूपभूता शक्ति ही समझना चाहिये। इसके सिवा, भगवान्ने सातवें अध्यायमें परा और अपरा नामसे अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन करके (७।४-५) अपनेको समस्त जड-चेतनात्मक जगत्का प्रभव और प्रलय बताते हुए (७।६) सबका महाकारण बताया है (७।७)। अतः श्रुतियों और स्मृतियोंके वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का उपादान और निमित्त कारण है। सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये फिर कहते हैं— अभिध्योपदेशाच्च ॥ १।४।२४॥ अभिध्योपदेशात् = अभिध्या—चिन्तन अर्थात् संकल्पपूर्वक सृष्टि- रचनाका श्रुतिमें वर्णन होनेसे; च = भी (यही सिद्ध होता है कि जगत्का उपादान कारण ब्रह्म ही है)। व्याख्या—श्रुतिमें जहाँ सृष्टिरचनाका प्रकरण है, वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि ‘सोऽकामयत। बहु स्यां प्रजायेय' (तै० उ० २।६) अर्थात् ‘उसने संकल्प किया कि मैं एक ही बहुत हो जाऊँ, अनेक रूपोंमें प्रकट होऊँ।' तथा ‘तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय' (छा०उ० ६।२।३) ‘उसने ईक्षण—संकल्प किया कि मैं बहुत होऊँ, अनेक रूपोंमें प्रकट हो जाऊँ।' इस प्रकार अपनेको ही विविध रूपोंमें प्रकट करनेका संकल्प लेकर सृष्टिकर्ता परमात्माके सृष्टिरचनामें प्रवृत्त होनेका वर्णन श्रुतियोंमें उपलब्ध होता है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमेश्वर स्वयं ही जगत्का उपादान कारण है। इसके सिवा, श्रुतिमें यह भी कहा गया है कि वेगपूर्वक गमन करनेवाला है। आँखोंके बिना ही सब कुछ देखता है, बिना कानोंके ही सब कुछ सुनता है; जाननेमें आनेवाली सब वस्तुओंको जानता है, परंतु उसको जाननेवाला कोई नहीं है। ज्ञानीजन उसे महान् आदि पुरुष कहते हैं।'
१३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
१३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत।' (छा० उ० ३।१४।१) अर्थात् 'निश्चय ही यह सब कुछ ब्रह्म है; क्योंकि उससे उत्पन्न होता, उसीमें स्थित रहता तथा अन्तमें उसीमें लीन होता है, इस प्रकार शान्तचित्त होकर उपासना (चिन्तन) करे।' इससे भी उपर्युक्त बातकी ही सिद्धि होती है। सम्बन्ध—उक्त मतकी पुष्टिके लिये सूत्रकार कहते हैं— साक्षाच्चोभयाम्नानात् ॥ १।४।२५॥ साक्षात्=श्रुति साक्षात् अपने वचनोंद्वारा; च=भी; उभयाम्नानात्=ब्रह्मके उभय (उपादान और निमित्त) कारण होनेकी बात दोहराती है, इससे भी (ब्रह्म ही उपादान कारण सिद्ध होता है, प्रकृति नहीं)। व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद्में इस प्रकार वर्णन आता है—'एक समय कुछ महर्षि यह विचार करनेके लिये एकत्र हुए कि जगत्का कारण कौन है? हम किससे उत्पन्न हुए हैं? किससे जी रहे हैं? हमारी स्थिति कहाँ है? हमारा अधिष्ठाता कौन है? कौन हमें नियमपूर्वक सुख-दुःखमें नियुक्त करता है? उन्होंने सोचा, कोई कालको, कोई स्वभावको, कोई कर्मको, कोई होनहारको, कोई पाँचों महाभूतोंको, कोई उनके समुदायको कारण मानते हैं। इनमें ठीक-ठीक कारण कौन है? यह निश्चय करना चाहिये। फिर उनके मनमें यह विचार उठा कि इनमेंसे एक या इनका समुदाय जगत्का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि ये चेतनके अधीन हैं, स्वतन्त्र नहीं हैं तथा जीवात्मा भी कारण नहीं हो सकता; क्योंकि वह सुख-दुःखका भोक्ता और पराधीन है। * फिर उन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर अपने गुणोंसे छिपी
- किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः। अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम्॥ कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या। संयोग एषां न त्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः॥ (श्वेता० १। १-२)
उपर्युक्त वर्णनमें स्पष्ट ही उस परमात्माको सबका उपादान कारण
सूत्र २६-२७ ] अध्याय १ १३५ हुई उस परमदेव परमेश्वरकी स्वरूपभूता शक्तिका 'कारणरूपमें' दर्शन किया; जो परमेश्वर अकेला ही पूर्वोक्त कालसे लेकर आत्मातक समस्त कारणोंपर शासन करता है।'* उपर्युक्त वर्णनमें स्पष्ट ही उस परमात्माको सबका उपादान कारण और संचालक (निमित्त कारण) बताया है। इसके सिवा इसी उपनिषद्के २।१६ में तथा दूसरे-दूसरे उपनिषदोंमें भी जगह-जगह उस परमात्माको सर्वरूप कहा है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ही इस जगत्का उपादान और निमित्त कारण है। सम्बन्ध—अब उक्त बातकी सिद्धिके लिये ही दूसरा प्रमाण देते हैं— आत्मकृतेः॥ १।४। २६॥ आत्मकृतेः = स्वयं अपनेको जगत्-रूपमें प्रकट करनेका वर्णन होनेसे (ब्रह्म ही जगत्का उपादान कारण सिद्ध होता है)। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद् (२।७)-में कहा है कि 'प्रकट होनेसे पहले यह जगत् अव्यक्तरूपमें था, उससे ही यह प्रकट हुआ है, उस परब्रह्म परमेश्वरने स्वयं अपनेको ही इस जगत्के रूपमें प्रकट किया।' इस प्रकार कर्ता और कर्मके रूपमें उस एक ही परमात्माका वर्णन होनेसे स्पष्ट ही श्रुतिका यह कथन हो जाता है कि ब्रह्म ही इसका निमित्त और उपादान कारण है। सम्बन्ध—यहाँ यह शंका होती है कि परमात्मा तो पहलेसे ही नित्य कर्त्तारूपमें स्थित है, वह कर्म कैसे हो सकता है? इसपर कहते हैं— परिणामात् ॥ १ । ४ । २७॥ परिणामात् = श्रुतिमें उसके जगत्-रूपमें परिणत होनेका वर्णन होनेसे (यही मानना चाहिये कि वह ब्रह्म ही इस जगत्का कर्ता है और वह स्वयं ही इस रूपमें बना है)।
- यह मन्त्र पृष्ठ ११४ में और सूत्र १।४।८ की व्याख्यामें आ गया है।
१३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
१३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद् (२।६)—में कहा है कि ‘तत्सृष्ट्वा तदेवानु- प्राविशत्। तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत्। निरुक्तं चानिरुक्तं च। निलयनं चानिलयनं च। विज्ञानं चाविज्ञानं च। सत्यं चानृतं च सत्यमभवत्। यदिदं किञ्च। तत्सत्यमित्याचक्षते।’ अर्थात् ‘उस जगत्की रचना करनेके अनन्तर वह परमात्मा स्वयं उसमें जीवके साथ-साथ प्रविष्ट हो गया। उसमें प्रविष्ट होकर वह स्वयं ही सत् (मूर्त) और त्यत् (अमूर्त) भी हो गया। बतानेमें आनेवाले और न आनेवाले, आश्रय देनेवाले और न देनेवाले तथा चेतन और जड, सत्य और मिथ्या—इन सबके रूपमें सत्यस्वरूप परमात्मा ही हो गया। जो कुछ भी यह दीखता और अनुभवमें आता है, वह सत्य ही है, इस प्रकार ज्ञानीजन कहते हैं।’ इस प्रकार श्रुतिने परब्रह्म परमात्माके ही सब रूपोंमें परिणत होनेका प्रतिपादन किया है; इसलिये वही जगत्का उपादान और निमित्त कारण है। परिणामका अर्थ यहाँ विकार नहीं है। जैसे सूर्य अपनी अनन्त किरणोंका सब ओर प्रसार करते हैं, उसी प्रकार परमेश्वर अपनी अनन्त अचिन्त्य ऐश्वर्यशक्तियोंका निक्षेप करते हैं; उनके इस शक्तिनिक्षेपसे ही विचित्र जगत्का प्रादुर्भाव स्वतः होने लगता है। अतः यही समझना चाहिये कि निर्विकार एकरस परमात्मा अपने स्वरूपसे अच्युत एवं अविकृत रहते हुए ही अपनी अचिन्त्य शक्तियोंद्वारा जगत्के रूपमें प्रकट हो जाते हैं; अतः उनका कर्ता और कर्म होना—उपादान एवं निमित्त कारण होना सर्वथा सुसंगत है। सम्बन्ध—इसीके समर्थनमें सूत्रकार दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— योनिश्च हि गीयते॥ १। ४। २८॥ हि=क्योंकि; योनिः=(वेदान्तमें ब्रह्मको) योनि; च=भी; गीयते=कहा जाता है (इसलिये ब्रह्म ही उपादान कारण है)। व्याख्या—‘योनि’ का अर्थ उपादान कारण होता है। उपनिषदोंमें अनेक स्थलोंपर परब्रह्म परमात्माको ‘योनि’ कहा गया है; जैसे—‘कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’ (मु० उ० ३। १। ३) अर्थात् ‘जो सबके कर्ता, सबके शासक तथा ब्रह्माजीकी भी योनि (उपादान कारण) परम पुरुषको देखता है।’ ‘भूतयोनिं
सूत्र २९ ] अध्याय १ १३७
सूत्र २९ ] अध्याय १ १३७
परिपश्यन्ति धीराः' (मु० उ० १। १। ६) - 'उस समस्त प्राणियोंकी योनि (उपादान कारण) - को ज्ञानीजन सर्वत्र परिपूर्ण देखते हैं।' इस प्रकार स्पष्ट शब्दोंमें परब्रह्म परमात्माको समस्त भूत-प्राणियोंकी 'योनि' बताया गया है; इसलिये वही सम्पूर्ण जगत्का उपादान कारण है। 'यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च' (मु० उ० १। १। ७) इत्यादि मन्त्रके द्वारा यह बताया गया है कि 'जैसे मकड़ी अपने शरीरसे ही जालेको बनाती और फिर उसीमें निगल लेती है, उसी प्रकार अक्षरब्रह्मसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकट होता है।' इसके अनुसार भी यही सिद्ध होता है कि एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही इस जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का निमित्त और उपादान कारण है। अतः यह समस्त चराचर विश्व भगवान्का ही स्वरूप है। ऐसा समझकर मनुष्यको उनके भजन-स्मरणमें लग जाना चाहिये और सबके साथ व्यवहार करते समय भी इस बातको सदा ध्यानमें रखना चाहिये। सम्बन्ध-इस प्रकार अपने मतकी स्थापना और अपनेसे विरुद्ध मतोंका खण्डन करनेके पश्चात् इस अध्यायके अन्तमें सूत्रकार कहते हैं- एतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याताः ॥ १। ४। २९ ॥ एतेन = इस विवेचनसे; सर्वे व्याख्याताः = सभी पूर्वपक्षियोंके प्रश्नोंका उत्तर दे दिया गया; व्याख्याताः = उत्तर दे दिया गया। व्याख्या-इस प्रकार विवेचनपूर्वक यह सिद्धान्त स्थिर कर दिया गया कि 'ब्रह्म ही जगत्का उपादान और निमित्त कारण है; सांख्यकथित प्रधान (जडप्रकृति) नहीं।' इस विवेचनसे प्रधानकारणवादी सांख्योंकी ही भाँति परमाणुकारणवादी नैयायिक आदिके मतोंका भी निराकरण कर दिया गया- यह सूत्रकार स्पष्ट शब्दोंमें घोषित करते हैं। 'व्याख्याताः' पदको दो बार प्रयोग अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है। चौथा पाद सम्पूर्ण श्रीवेदव्यासरचित वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-का पहला अध्याय पूरा हुआ।
दूसरा अध्याय
श्रीपरमात्मने नमः दूसरा अध्याय पहला पाद सम्बन्ध—पहले अध्यायमें यह सिद्ध किया गया कि समस्त वेदान्तवाक्य एक स्वरसे परब्रह्म परमेश्वरको ही जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण बताते हैं। इसीलिये उस अध्यायको ‘समन्वयाध्याय’ कहते हैं। ब्रह्म ही सम्पूर्ण विश्वका कारण है; इस विषयको लेकर श्रुतियोंमें कोई मतभेद नहीं है। प्रधान आदि अन्य जडवर्गको कारण बतानेवाले सांख्य आदिके मतोंको शब्दप्रमाणशून्य बताकर तथा अन्य भी बहुत-से हेतु देकर उनका निराकरण किया गया है। अब यह सिद्ध करनेके लिये कि श्रुतियोंका न तो स्मृतियोंसे विरोध है और न आपसमें ही एक श्रुतिसे दूसरी श्रुतिका विरोध है; यह ‘अविरोध’ नामक दूसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले सांख्यवादीकी ओरसे शंका उपस्थित करके सूत्रकार उसका समाधान करते हैं— स्मृत्यनवकाशदोषप्रसंग इति चेन्नान्यस्मृत्य- नवकाशदोषप्रसंगात् ॥ २ । १ । १ ॥ चेत् = यदि कहो; स्मृत्यनवकाशदोषप्रसंगः = प्रधानको जगत्का कारण न माननेसे सांख्यस्मृतिको अवकाश (मान्यता) न देनेका दोष उपस्थित होगा; इति न = तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अन्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसंगात् = क्योंकि उसको मान्यता देनेपर दूसरी अनेक स्मृतियोंको मान्यता न देनेका दोष आता है। व्याख्या—‘‘यदि कहा जाय कि ‘प्रधान’ को जगत्का कारण न मानकर ‘ब्रह्म’ को ही माना जायगा तो सर्वज्ञ कपिल ऋषिद्वारा बनायी हुई सांख्यस्मृति- को अवकाश न देनेका—उसे प्रमाण न माननेका प्रसंग आयेगा, इसलिये
सूत्र १ ] अध्याय २ १३९
सूत्र १ ] अध्याय २ १३९ प्रधानको जगत्का कारण अवश्य मानना चाहिये'' तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि सांख्यशास्त्रको मान्यता देकर यदि प्रकृतिको जगत्का कारण मान लें तो दूसरे-दूसरे महर्षियोंद्वारा बनायी हुई स्मृतियोंको न माननेका दोष उपस्थित हो सकता है; इसलिये वेदानुकूल स्मृतियोंको ही प्रमाण मानना उचित है; न कि वेदके प्रतिकूल अपनी इच्छाके अनुसार बनायी हुई स्मृतिको। दूसरी स्मृतियोंमें स्पष्ट ही परब्रह्म परमेश्वरको जगत्का कारण बताया है। श्रीमद्भगवद्गीता,१ विष्णुपुराण२ और मनुस्मृति३ आदिमें समस्त जगत्की उत्पत्ति परमात्मासे ही बतायी गयी है। इसलिये वास्तवमें श्रुतियोंके साथ स्मृतियोंका कोई विरोध नहीं है। यदि कहीं विरोध हो भी तो वहाँ स्मृतिको छोड़कर श्रुतिके कथनको ही मान्यता देनी चाहिये; क्योंकि वेद और स्मृतिके विरोधमें वेद ही बलवान् माना गया है। १-एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥ (गीता ७।६) 'पहले कही हुई मेरी परा और अपरा प्रकृतियाँ सम्पूर्ण प्राणियोंकी योनि हैं, ऐसा समझो। तथा मैं जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और प्रलयका कारण हूँ।' प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥ (गीता ९।८) 'मैं अपनी प्रकृतिका अवलम्बन करके, प्रकृतिके वशसे विवश हुए इस समस्त भूत- समुदायको बारम्बार नाना प्रकारसे रचता हूँ।' २-विष्णोः सकाशादुद्भूतं जगत्तत्रैव च स्थितम्। स्थितिसंयमकर्ताऽसौ जगतोऽस्य जगच्च सः॥ (वि० पु० १।१।३१) 'यह सम्पूर्ण जगत् भगवान् विष्णुसे उत्पन्न हुआ है और उन्हींमें स्थित है। वे इस जगत्के पालक और संहारकर्ता हैं तथा सम्पूर्ण जगत् उन्हींका स्वरूप है।' ३-सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः। अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत्॥ (मनु० १।८) 'उन्होंने अपने शरीरसे नाना प्रकारकी प्रजाको उत्पन्न करनेकी इच्छासे संकल्प करके पहले जलकी ही सृष्टि की, फिर उस जलमें अपनी शक्तिरूप वीर्यका आधान किया।'
१४० वेदान्त-दर्शन [ पाद १
१४० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सम्बन्ध— सांख्यशास्त्रोक्त 'प्रधान' को जगत्का कारण न माननेमें कोई दोष नहीं है, इस बातकी पुष्टिके लिये दूसरा कारण उपस्थित करते हैं— इतरेषां चानुपलब्धेः ॥ २ । १ । २ ॥ च=तथा; इतरेषाम्=अन्य स्मृतिकारोंके (मतमें); अनुपलब्धेः=प्रधान- कारणवादकी उपलब्धि नहीं होती, इसलिये (भी प्रधानको जगत्का कारण न मानना उचित ही है)। व्याख्या— मनु आदि जो दूसरे स्मृतिकार हैं, उनके ग्रन्थोंमें सांख्य- शास्त्रोक्त प्रक्रियाके अनुसार प्रधानको कारण मानने और उससे सृष्टिके होनेका वर्णन नहीं मिलता है; इसलिये इस विषयमें सांख्यशास्त्रको प्रमाण न मानना उचित ही है। सम्बन्ध— सांख्यकी सृष्टि-प्रक्रियाको योगशास्त्रके प्रवर्तक पातंजल भी मानते हैं, अतः उसको मान्यता क्यों न देनी चाहिये ? इसपर कहते हैं— एतेन योगः प्रत्युक्तः ॥ २ । १ । ३ ॥ एतेन=इस पूर्वोक्त विवेचनसे; योगः=योगशास्त्रका भी; प्रत्युक्तः=प्रत्युत्तर हो गया। व्याख्या— उपर्युक्त विवेचनसे अर्थात् पूर्वसूत्रोंमें जो कारण बताये गये हैं, उन्हींसे पातंजल-योगशास्त्रकी भी उस मान्यताका निराकरण हो गया, जिसमें उन्होंने दृश्य (जडप्रकृति)-को जगत्का स्वतन्त्र कारण कहा है; क्योंकि अन्य विषयोंमें योगका सांख्यके साथ मतभेद होनेपर भी जड प्रकृतिको जगत्का कारण माननेमें दोनों एकमत हैं; अतः एकके ही निराकरणसे दोनोंका निराकरण हो गया। सम्बन्ध— पूर्वप्रकरणमें यह कहा गया है कि वेदानुकूल स्मृतियोंको ही प्रमाण मानना आवश्यक है, इसलिये वेदविरुद्ध सांख्यस्मृतियोंको मान्यता न देना अनुचित नहीं है। इसलिये पूर्वपक्षी वेदके वर्णनसे सांख्यमतकी एकता दिखानेके लिये कहता है—
सूत्र ४-५ ] अध्याय २ १४१
सूत्र ४-५ ] अध्याय २ १४१ न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ॥ २ । १ । ४ ॥ न=चेतन ब्रह्म जगत्का कारण नहीं है; अस्य विलक्षणत्वात्=क्योंकि यह कार्यरूप जगत् उस (कारण)-से विलक्षण (जड) है; च=और; तथात्वम्= उसका जड होना; शब्दात्=शब्द (वेद) प्रमाणसे सिद्ध है। व्याख्या— श्रुतिमें परब्रह्म परमात्माको ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ (तै० उ० २। १) इस प्रकार सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त आदि लक्षणोंवाला बताया गया है और जगत्को ज्ञानरहित विचारणीय (तै० उ० १। ७) अर्थात् जड कहा गया है। अतः श्रुति-प्रमाणसे ही इसकी परमेश्वरसे विलक्षणता सिद्ध होती है। कारणसे कार्यका विलक्षण होना युक्तिसंगत नहीं है; इसलिये चेतन परब्रह्म परमात्माको अचेतन जगत्का उपादान कारण नहीं मानना चाहिये। सम्बन्ध— यदि कहो, अचेतन कहे जानेवाले आकाश आदि तत्त्वोंका भी श्रुतिमें चेतनकी भाँति वर्णन मिलता है। जैसे—‘तत्तेज ऐक्षत’ (छा० उ० ६। २। ३) ‘उस तेजने विचार किया।’ ‘ता आप ऐक्षन्त’ (छा० उ० ६। २। ४) ‘उस जलने विचार किया’ इत्यादि। तथा पुराणोंमें नदी, समुद्र, पर्वत आदिका भी चेतन-जैसा वर्णन किया गया है। इस प्रकार चेतन होनेके कारण यह जगत् चेतन परमात्मासे विलक्षण नहीं है, इसलिये चेतन परमात्माको इसका कारण माननेमें कोई आपत्ति नहीं है तो इसका उत्तर इस प्रकार दिया जाता है— अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥ २ । १ । ५ ॥ तु=किंतु; (वहाँ तो) अभिमानिव्यपदेशः=उन-उन तत्त्वोंके अभिमानी देवताओंका वर्णन है; (यह बात) विशेषानुगतिभ्याम्=विशेष शब्दोंके प्रयोगसे तथा उन तत्त्वोंमें देवताओंके प्रवेशका वर्णन होनेसे (सिद्ध होती है)। व्याख्या— श्रुतिमें जो ‘तेज, जल आदिने विचार किया’ इत्यादि रूपसे जड तत्त्वोंमें चेतनके व्यवहारका कथन है, वह तो उन तत्त्वोंके अभिमानी देवताओंको लक्ष्य करके है। यह बात उन-उन स्थलोंमें प्रयुक्त हुए विशेष शब्दोंसे सिद्ध होती है। जैसे तेज, जल और अन्न—इन तीनोंकी उत्पत्तिका वर्णन करनेके बाद इन्हें ‘देवता’ कहा गया है (छा० उ० ६। ३। २)। तथा
१४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
१४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ऐतरेयोपनिषद् (१।२।४)-में 'अग्नि वाणी बनकर मुखमें प्रविष्ट हुआ, वायु प्राण बनकर नासिकामें प्रविष्ट हुआ।' इस प्रकार उनकी अनुगतिका उल्लेख होनेसे भी उनके अभिमानी देवताओंका ही वर्णन सिद्ध होता है। इसलिये ब्रह्मको जगत्का उपादान कारण बताना युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि आकाश आदि जड तत्त्व भी इस जगत्में उपलब्ध होते हैं; जो कि चेतन ब्रह्मके धर्मोंसे सर्वथा विपरीत लक्षणोंवाले हैं। सम्बन्ध—ऊपर उठायी हुई शंकाका ग्रन्थकार उत्तर देते हैं— दृश्यते तु॥ २। १। ६॥ तु=किंतु; दृश्यते=श्रुतिमें उपादानसे विलक्षण वस्तुकी उत्पत्तिका वर्णन भी देखा जाता है (अतः ब्रह्मको जगत्का उपादान कारण मानना अनुचित नहीं है)। व्याख्या—यह कहना ठीक नहीं है कि उपादानसे उत्पन्न होनेवाला कार्य उससे विलक्षण नहीं हो सकता; क्योंकि मनुष्य आदि चेतन व्यक्तियोंसे नख-लोम आदि जड वस्तुओंकी उत्पत्तिका वर्णन वेदमें देखा जाता है। जैसे—'यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्॥' (मु० उ० १।१।७) अर्थात् 'जैसे जीवित मनुष्यसे केश और रोएँ उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अविनाशी परब्रह्मसे यह सब जगत् उत्पन्न होता है।' सजीव चेतन पुरुषसे जड नख-लोम आदिकी उत्पत्ति उससे सर्वथा विलक्षण ही तो है। अतः ब्रह्मको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत तथा श्रुति- स्मृतियोंसे अनुमोदित है। इसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—इसी विषयमें दूसरी शंका उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात्॥ २। १। ७॥ चेत्=यदि कहो; (ऐसा माननेसे) असत्=असत्कार्यवाद अर्थात् जिसकी सत्ता नहीं है, ऐसी वस्तुकी उत्पत्तिका प्रसंग उपस्थित होगा; इति न=तो ऐसी
सूत्र ८ ] अध्याय २ १४३
सूत्र ८ ] अध्याय २ १४३ बात नहीं है; प्रतिषेधमात्रत्वात् = क्योंकि वहाँ 'असत्' शब्द प्रतिषेधमात्रका अर्थात् सर्वथा अभावका बोधक है। व्याख्या - यदि कहो 'अवयवरहित चेतन ब्रह्मसे सावयव जड वर्गकी उत्पत्ति माननेपर जो वस्तु पहले नहीं थी, उसकी उत्पत्ति माननेका दोष उपस्थित होगा, जो कि श्रुति-प्रमाणके विरुद्ध है, क्योंकि वेदमें असत्से सत्की उत्पत्तिको असम्भव बताया गया है।' तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वहाँ वेदमें कारणसे विलक्षण कार्यकी उत्पत्तिका निषेध नहीं है; अपितु 'असत्' शब्दवाच्य अभावसे भावकी उत्पत्तिको असम्भव कहा गया है। वेदान्त-शास्त्रमें अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं मानी गयी है; किंतु सत्स्वरूप सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमात्मामें जो जड-चेतनात्मक जगत् शक्तिरूपसे विद्यमान होते हुए भी अप्रकट रहता है, उसीका उसके संकल्पसे प्रकट होना उत्पत्ति है। इसलिये परब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति मानना असत्से सत्की उत्पत्ति मानना नहीं है। सम्बन्ध - इसपर पुनः पूर्वपक्षिकी ओरसे शंका उपस्थित की जाती है— अपीतौ तद्वत्प्रसंगादसमंजसम् ॥ २ । १ । ८ ॥ अपीतौ = (ऐसा माननेपर) प्रलयकालमें; तद्वत्प्रसंगात् = ब्रह्मको उस संसारके जडत्व और सुख-दुःखादि धर्मोंसे युक्त माननेका प्रसंग उपस्थित होगा, इसलिये; असमंजसम् = उपर्युक्त मान्यता युक्तिसंगत नहीं है। व्याख्या - यदि प्रलयकालमें भी सम्पूर्ण जगत्का उस परब्रह्म परमात्मामें विद्यमान रहना माना जायगा, तब तो उस ब्रह्मको जड प्रकृतिके जडत्व तथा जीवोंके सुख-दुःख आदि धर्मोंसे युक्त माननेका प्रसंग आ जायगा, जो किसीको मान्य नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उस परब्रह्म परमेश्वरको सदैव जडत्व आदि धर्मोंसे रहित, निर्विकार और सर्वथा विशुद्ध बताया गया है। इसलिये उपर्युक्त मान्यता युक्तियुक्त नहीं है। सम्बन्ध - अब सूत्रकार उपर्युक्त शंकाका निराकरण करते हैं—