बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
५०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ५०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| यति-पथिगतकूपारामाद्यवधारणवत् । | निश्चयके समान, श्रुति इन्द्रियों और प्राणोंके स्वरूपका निश्चय करती है। |
शिशुसंज्ञक मध्यम प्राणका उसके उपकरणोंसहित वर्णन
यो ह वै शिशुँ साधानँ सप्रत्याधानँ सस्थूणँ सदामं वेद सप्त ह द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्धि । अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणस्तस्येदमेवाधानमिदं प्रत्याधानं प्राणः स्थूणान्नं दाम ॥ १ ॥
जो कोई आधान, प्रत्याधान, स्थूणा और दाम (बन्धनरज्जु) के सहित शिशुको जानता है, वह अपनेसे द्वेष करनेवाले सात भ्रातृव्योंका अवरोध करता है। यह जो मध्यम प्राण है, वही शिशु है, उसका यह (शरीर) ही आधान है, यह (शिर) ही प्रत्याधान है, प्राण स्थूणा है और अन्न दाम है ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| यो ह वै शिशुं साधानं सप्रत्याधानं सस्थूणं सदामं वेद, तस्येदं फलम्; किं तत् ? सप्त सप्तसंख्याकान् ह द्विषतो द्वेषकर्तॄन् भ्रातृव्यान् । भ्रातृव्या हि द्विविधा भवन्ति, द्विषन्तोऽद्विषन्तश्च, तत्र द्विषन्तो ये भ्रातृव्यास्तान् द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्धि; सप्त ये शीर्षण्याः प्राणा विषयोपलब्धिद्वाराणि तत्प्रभवा विषयरागाः सहजत्वाद् भ्रातृव्याः । ते ह्यस्य स्वात्मस्थां दृष्टिं विषयविषयां | जो भी आधान, प्रत्याधान, स्थूणा और दामके सहित शिशुको जानता है, उसे यह फल प्राप्त होता है। वह फल क्या है ? वह द्वेष करनेवाले सात भ्रातृव्योंका अवरोध करता है। भ्रातृव्य दो प्रकारके होते हैं—द्वेष करनेवाले और द्वेष न करनेवाले, उनमें जो द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य होते हैं, उन द्वेषी भ्रातृव्योंका वह अवरोध करता है। शिरमें स्थित जो सात प्राण विषयोपलब्धिके द्वार हैं, उनसे होनेवाले विषयसम्बन्धी राग साथ-साथ उत्पन्न होनेवाले होनेके कारण भ्रातृव्य हैं; क्योंकि वे ही उसकी आत्मस्थ दृष्टिको |
| ब्राह्मण २] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५०३ |
| ब्राह्मण २] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५०३ |
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| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
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| कुर्वन्ति, तेन ते द्वेष्टारो भ्रातृव्याः। प्रत्यगात्मेक्षणप्रतिषेधकरत्वात्। काठके चोक्तम्—"पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्" इत्यादि। (२।१।१) तत्र यः शिश्वादीन्वेद, तेषां याथात्म्यमवधारयति, स एतान् भ्रातृव्यानवरुणद्ध्यपावृणोति विनाशयति। | विषयोन्मुख करते हैं, अतः वे द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य हैं; कारण, वे प्रत्यगात्मदर्शनको रोकनेवाले हैं। कठोपनिषद्में भी कहा है—"स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है, इसलिये जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्माको नहीं देखता" इत्यादि। सो, जो कोई इन शिशु आदिको जानता है, इनके यथार्थ स्वरूपका निश्चय करता है, वह इन भ्रातृव्योंका अवरोध-अपावरण अर्थात् विनाश कर देता है। |
| तस्मै फलश्रवणेनाभिमुखीभूतायाह—अयं वाव शिशुः। कोऽसौ? योऽयं मध्यमः प्राणः, शरीरमध्ये यः प्राणो लिङ्गात्मा, यः पञ्चधा शरीरमाविष्टः—बृहन्पाण्डरवासः सोम राजन्नित्युक्तः, यस्मिन्वाङ्मनःप्रभृतीनि करणानि विषक्तानि-पड्वीशशङ्कुनिदर्शनात्; स एष शिशुरिव, विषयेष्वितरकरणवदपटुत्वात्; | इस प्रकार फलश्रवणसे अभिमुख हुए उस (गार्ग्य) से [अजातशत्रु] कहता है—निश्चय यही शिशु है। यह कौन? जो यह मध्यम प्राण है। शरीरके मध्यमें जो यह लिङ्गात्मा प्राण है, जो पाँच प्रकारसे शरीरमें प्रविष्ट होकर बृहन्, पाण्डरवास, सोम और राजन् इन नामोंसे कहा जाता है, जिसमें वाणी और मन आदि इन्द्रियाँ विशेषरूपसे निबद्ध हैं, जैसा कि घोड़ेके पैर बाँधनेके मेखोंके दृष्टान्तसे बतलाया गया है; वह यह प्राण शिशुके समान अन्य इन्द्रियोंकी तरह विषयोंमें पटु न होनेके कारण शिशु है। |
| शिशुं साधानमित्युक्तम्। किं पुनस्तस्य शिशोर्वत्सस्थानीयस्य | मूल मन्त्रमें 'शिशुं साधानम्' ऐसा कहा गया है। सो उस वत्सस्थानीय |
| ५०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
| ५०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| Sanskrit | Hindi |
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| करणात्मन आधानम् ?<br><br>तस्येदमेव शरीरमाधानं कार्यात्मकम्—आधीयतेऽस्मिन्नित्याधानम्; तस्य हि शिशोः प्राणस्येदं शरीरमधिष्ठानम्, अस्मिन्हि करणान्यधिष्ठितानि लब्धात्मकान्युपलब्धिद्वाराणि भवन्ति, न तु प्राणमात्रे विषक्तानि । तथा हि दर्शितमजातशत्रुणा—उपसंहृतेषु करणेषु विज्ञानमयो नोपलभ्यते, शरीरदेशव्यूढेषु तु करणेषु विज्ञानमय उपलभमान उपलभ्यते—तच्च दर्शितं पाणिपेषप्रतिबोधनेन । | इन्द्रियरूप शिशुका आधान क्या है ?<br><br>उसका यह कार्यरूप भौतिक शरीर ही आधान है—जिसमें कुछ रखा जाय उसे आधान कहते हैं, अतः उस शिशु अर्थात् प्राणका यह शरीर अधिष्ठान है; क्योंकि इसमें अधिष्ठित होकर अपने स्वरूपको प्राप्त करनेवाली इन्द्रियाँ विषयोंकी उपलब्धिका द्वार होती हैं; वे केवल प्राणमात्रमें ही निबद्ध नहीं होतीं । ऐसा ही अजातशत्रुने दिखलाया भी है—इन्द्रियोंका उपसंहार हो जानेपर विज्ञानमयकी उपलब्धि नहीं होती । शरीरस्थानमें एकत्रित हुई इन्द्रियोंमें तो उपलब्धिकर्ताके रूपमें ही विज्ञानमयकी उपलब्धि होती है—यह बात हाथ दबाकर जगानेके द्वारा दिखायी गयी है । |
| इदं प्रत्याधानं शिरः; प्रदेशविशेषेषु—प्रति प्रत्याधीयत इति प्रत्याधानम् । प्राणः स्थूणा अन्नपानजनिताशक्तिः—प्राणो बलमिति पर्यायः । बलावष्टम्भो हि प्राणोऽस्मिञ्छरीरे—"स यत्रायमात्मा बल्यं न्येत्य सम्मोहमेव" (बृ० उ० ४।४।१) इति दर्शनात् । | यह शिर प्रत्याधान है । इसका प्रदेशविशेषोंके प्रति प्रत्याधान किया जाता है, इसलिये यह प्रत्याधान है । प्राण, स्थूणा अर्थात् अन्नपानजनित शक्ति है । प्राण और बल ये पर्याय-वाची हैं । इस शरीरमें बलका आधार ही प्राण है, जैसा कि "जिस अवस्थामें यह जीव शरीरको निर्बल करता हुआ सम्मोहको प्राप्त होता है" इस वाक्यमें देखा जाता है । |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५०५
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५०५
| यथा वत्सः स्थूणावष्टम्भ एवं शरीरपक्षपाती वायुः प्राणः स्थूणेति केचित् ।<br><br>अन्नं दाम—अन्नं हि भुक्तं त्रेधा परिणमते; यः स्थूलः परिणामः, स एतद्द्वयं भूत्वा इमामप्येति— मूत्रं च पुरीषं च । यो मध्यमो रसः स रसो लोहितादिक्रमेण स्वकार्यं शरीरं सप्तधातुकमुपचिनोति; स्वयोन्यन्नागमे हि शरीरमुपचीयतेऽन्नमयत्वात्; विपर्ययेऽपचीयते पतति; यस्त्वणिष्ठोरसः-अमृतम् ऊर्क् प्रभावः—इति च कथ्यते, स नाभेरूर्ध्वं हृदयदेशमागत्य, हृदयाद्विप्रसृतेषु द्वासप्ततिनाडीसहस्रेष्वनुप्रविश्य यत्तत्करणसङ्घातरूपं लिङ्गं शिशुसंज्ञकम्, तस्य | जिस प्रकार बछड़ा स्थूणा (खूँटे) के आश्रित होता है, उसी प्रकार शरीरपक्षपाती वायु-प्राण स्थूणा है—ऐसा किन्हींकाँ मत है।<br><br>अन्न दाम (बन्धन—रज्जु) है, क्योंकि भोजन किये जानेपर अन्न तीन प्रकारसे परिणामको प्राप्त हो जाता है। उसका जो स्थूल परिणाम होता है, वह मल और मूत्र दो रूपमें होकर इस भूमिको प्राप्त होता है। जो मध्यम परिणाम होता है वह रस है। वह रस लोहितादि क्रमसे अपने कार्यभूत सात धातुओंवाले शरीरको पुष्ट करता है। शरीर अन्नमय है, इसलिये अपने कारणभूत अन्नके आनेपर उसकी पुष्टि होती है, तथा उसके विपरीत होनेपर क्षीण होकर गिर जाता है। तथा जो सूक्ष्मतम रस होता है वह अमृत—ऊर्क् अथवा प्रभाव ऐसा कहा जाता है; वह नाभिसे ऊपर हृदयदेशमें आकर हृदयसे फैली हुई बहत्तर सहस्र नाड़ियोंमें प्रवेश कर स्थूणासंज्ञक बलको उत्पन्न करके जो शिशुसंज्ञक इन्द्रियसंघातरूप लिङ्गशरीर है, उसकी |
१. शरीरपक्षपाती वायुसे श्वासोच्छ्वास करनेवाला शरीरान्तर्वर्ती प्राण समझना चाहिये। उसके अधीन ही इन्द्रियाभिमानी प्राण ग्रहण किया जाता है, इसलिये यह उसके खूँटे (बन्धनस्थान) के समान है।
२. भर्तृप्रपञ्च आदिका।
५०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ५०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| शरीरे स्थितिकारणं भवति बलमुपजनयत्स्थूणाख्यम्; तेनान्नमुभयतः पाशवत्सदामवत् प्राणशरीरयोर्निबन्धनं भवति ॥१॥ | शरीरमें स्थिति रखनेका कारण होता है। इसीसे, जिसके दोनों ओर पाश हैं, ऐसी बछड़ा बाँधनेकी रस्सीके समान अन्न प्राण और शरीरका बन्धन है ॥ १ ॥ |
मध्यम प्राणरूप शिशुके नेत्रान्तर्गत सात अक्षितियाँ
| इदानीं तस्यैव शिशोः प्रत्याधान ऊढस्य चक्षुषि काश्चनोपनिषद उच्यन्ते— | अब प्रत्याधानमें आरूढ उसी शिशुके नेत्रमें कुछ उपनिषदें बतलायी जाती हैं— |
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तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते तद्या इमा अक्षन्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनꣳ रुद्रोऽन्वायत्तोऽथ या अक्षन्नापस्ताभिः पर्जन्यो या कनीनका तयादित्यो यत्कृष्णं तेनाग्निर्यच्छुक्लं तेनेन्द्रोऽधरयैनं वर्तन्या पृथिव्यन्वायत्ता द्यौरुत्तरया नास्यान्नं क्षीयते य एवं वेद ॥२॥
उसका ये सात अक्षितियाँ उपस्थान ( स्तवन ) करती हैं—उनमेंसे जो ये आँखमें लाल रेखाएँ हैं, उनके द्वारा रुद्र इस मध्यप्राणके अनुगत है और नेत्रमें जो जल है उसके द्वारा मेघ, जो कनीनका ( दर्शनशक्ति ) है उसके द्वारा आदित्य, जो कालिमा है उसके द्वारा अग्नि और जो शुक्लता है उसके द्वारा इन्द्र अनुगत है । नीचेके पलकद्वारा पृथिवी इसके अनुगत है एवं ऊपरके पलकद्वारा द्युलोक । जो इस प्रकार जानता है, उसका अन्न क्षीण नहीं होता ॥ २ ॥
| तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते—<br><br>तं करणात्मकं प्राणं शरीरेऽन्न- | उसमें ये सात अक्षितियाँ उपस्थान करती हैं—शरीरमें अन्नके कारण रहनेवाले नेत्रस्थानमें आरूढ़ उस |
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ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५०७
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५०७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| बन्धनं चक्षुष्यूढमेता वक्ष्यमाणाः सप्त सप्तसङ्ख्याका अक्षितयोऽक्षितिहेतुत्वादुपतिष्ठन्ते। यद्यपि मन्त्रकरणे तिष्ठतिरूपपूर्व आत्मनेपदी भवति, इहापि सप्त देवताभिधानांनि मन्त्रस्थानीयानि करणानि; तिष्ठतेरतोऽत्राप्यात्मनेपदं न विरुद्धम्। | इन्द्रियरूप प्राणमें ये आगे कही जानेवाली सात—सात संख्यावाली अक्षितियां जो अक्षिति (अक्षयता) का कारण होनेके कारण अक्षिति कहलाती हैं, रहती हैं। यद्यपि [उपान्मन्त्रकरणे (पा० सू० १। ३। २५) इस पाणिनिसूत्रके अनुसार] 'उप' पूर्वक 'स्था' धातु मन्त्रकरण अर्थमें आत्मनेपदी होता है, तथापि यहाँ भी रुद्रादि सप्त-देवतासंज्ञक करण मन्त्रस्थानीय ही हैं, इसलिये यहाँ भी उपपूर्वक 'स्था' धातुमें आत्मनेपद रहना विरुद्ध नहीं है। |
| कास्ता अक्षितयः? इत्युच्यन्ते—तत्तत्र या इमाः प्रसिद्धाः, अक्षन्नक्षणि लोहिन्यो लोहिता राजयो रेखाः, ताभिर्द्वारभूताभिरेनं मध्यं प्राणं रुद्रोऽन्वायत्तोऽनुगतः; अथ या अक्षन्नक्षण्यापो धूमादिसंयोगेनाभिव्यज्यमानाः, ताभिरद्भिर्द्वारभूताभिः पर्जन्यो देवतात्मान्वायत्तोऽनुगतः उपतिष्ठत इत्यर्थः। स चान्नभूतोऽक्षितिः प्राणस्य; “पर्जन्ये वर्षत्यानन्दिनः प्राणा भवन्ति” इति श्रुत्यन्तरात्। | वे अक्षितियाँ कौन-सी हैं? सो बतलायी जाती हैं—उनमें ये जो नेत्रके भीतर लोहित वर्णकी प्रसिद्ध राजियाँ—रेखाएँ हैं, उन द्वारभूता रेखाओंके द्वारा रुद्र इस मध्यम प्राणके अनुगत है। तथा नेत्रमें जो धूमादिके संयोगसे अभिव्यक्त होनेवाला जल है, उस द्वारभूत जलके द्वारा देवस्वरूप मेघ इसके अनुगत है। वह प्राणका अन्नभूत अक्षिति है जैसा कि “मेघके बरसनेपर प्राण आनन्दित हो जाते हैं” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। |
| या कनीनका दृक्शक्तिस्तया | जो कनीनका अर्थात् दर्शन-शक्ति |
५०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ५०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| कनीनकया द्वारेणादित्यो मध्यमं प्राणमुपतिष्ठते; यत्कृष्णं चक्षुषि तेनैनमग्निरुपतिष्ठते; यच्छुक्लं चक्षुषि तेनेन्द्रः; अधरया वर्तन्या पक्ष्मणैनं पृथिव्यन्वायत्ता, अधरत्व-सामान्यात् द्यौरुत्तरया, ऊर्ध्वत्व-सामान्यात्; एताः सप्तान्नभूताः प्राणस्य सन्ततमुपतिष्ठन्ते-इत्येवं यो वेद, तस्यैतत्फलम्-नास्यान्नं क्षीयते, य एवं वेद ॥ २ ॥ | है, उस कनीनकाके द्वारा आदित्य मध्यम प्राणमें प्रवेश करता है; नेत्र-में जो कृष्णवर्ण है उसके द्वारा अग्नि इसमें उपस्थित होता है; नेत्रमें जो शुक्लवर्ण है, उससे इन्द्र और नीचेके पलकद्वारा इसमें पृथिवी अनुगत है; क्योंकि इन दोनोंकी अधरत्वमें समानता है तथा ऊपरके पलकद्वारा द्युलोक अनुगत है; क्योंकि ऊर्ध्वत्वमें उन दोनोंकी समानता है; ये सातों निरन्तर प्राणके अन्न होकर उप-स्थित होते हैं, इस प्रकार जो जानता है उसे यह फल प्राप्त होता है—जो इस तरह उपासना करता है, उसके अन्नका कभी क्षय नहीं होता ॥ २ ॥ |
श्रोत्रादि प्राणोंके सहित शिरमें चमसदृष्टिका विधान
तदेष श्लोको भवति । अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपम् । तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति । अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्न इतीदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपमिति प्राणा वै यशो विश्वरूपं प्राणानेतदाह तस्यासत ऋषयः सप्त तीर इति प्राणा वा ऋषयः प्राणानेतदाह वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति वाग्घ्यष्टमी ब्रह्मणा संवित्ते ॥३॥
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५०९
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५०९
इस विषयमें यह श्लोक है। चमस नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ होता है, उसमें विश्वरूप यश निहित है, उसके तीरपर सात ऋषिगण और वेदके द्वारा संवाद करनेवाली आठवीं वाक् रहती है। जो नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ चमस है, वह शिर है; क्योंकि यही नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ चमस है। उसमें विश्वरूप यश निहित है—प्राण ही विश्वरूप यश हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। उसके तीरपर सात ऋषि रहते हैं, प्राण ही ऋषि हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। वेदके द्वारा संवाद करनेवाली वाक् आठवीं है, वही वेदके द्वारा संवाद करती है॥ ३॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्तत्रैतस्मिन्नर्थे एष श्लोको मन्त्रो भवति—अर्वाग्बिलश्चमस इत्यादिः। तत्र मन्त्रार्थमाचष्टे श्रुतिः—अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्न इति। कः पुनरसावर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः इदं तत् शिरः, चमसाकारं हि तत्। कथम् एष ह्यर्वाग्बिलो मुखस्य बिलरूपत्वात्, शिरसो बुध्नाकारत्वादूर्ध्वबुध्नः। | तहाँ इस अर्थमें यह श्लोक-मन्त्र है—‘अर्वाग्बिलश्चमसः’ इत्यादि। अब श्रुति इस मन्त्रका अर्थ बतलाती है—‘अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः’ इत्यादि। किंतु यह नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओरसे उठा हुआ चमस कौन है? वह यह शिर है; क्योंकि वह चमसके समान आकारवाला है। किस प्रकार? क्योंकि यह नीचेकी ओर छिद्रवाला है, कारण, मुख छिद्ररूप है और शिर बुध्नाकार होनेके कारण यह ऊर्ध्वबुध्न है। |
| तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपमिति यथा सोमचमसे, एवं तस्मिञ्छिरसि विश्वरूपं नानारूपं निहितं स्थितं भवति। किं पुनस्तद् यशः। | इसमें विश्वरूप यश निहित है। जिस प्रकार चमसमें सोम रहता है, इसी प्रकार उस शिरमें विश्वरूप—नानारूप अर्थात् अनेक रूपोंवाला यश निहित-स्थित है। वह यश क्या है? |
५१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ५१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| प्राणा वै यशो विश्वरूपम्—प्राणाः श्रोत्रादयो वायवश्च मरुतः सप्तधा तेषु प्रसृता यशः--इत्येतदाह मन्त्रः, शब्दादज्ञानहेतुत्वात् ।<br><br>तस्यासत ऋषयः सप्त तीर इति—प्राणाः परिस्पन्दात्मकाः, त एव च ऋषयः प्राणानेतदाह मन्त्रः। वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति—ब्रह्मणा संवादं कुर्वती अष्टमी भवति; तद्धेतुमाह—वाग्ध्यष्टमी ब्रह्मणा संवित्त इति ॥ ३ ॥ | प्राण ही अनेक रूपोंवाला यश है। प्राण अर्थात् सात श्रोत्रादि^१ और उनमें सात भागोंमें विभक्त होकर फैले हुए मरुत् यानी वायु यश हैं—ऐसा मन्त्र कहता है, क्योंकि वे (श्रोत्रादि) शब्दादि विषयोंके ज्ञानके हेतु हैं।<br><br>उसके तीरपर सात ऋषि रहते हैं—यहाँ स्फुरणात्मक प्राण ही समझने चाहिये, वे ही ऋषि हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। आठवीं वाक् वेदके द्वारा संवाद करती है। वह वेदके द्वारा संवाद करनेवाली वाक् आठवीं है। इसीसे कहा है—'वाक् ही आठवीं है, वह वेदके द्वारा संवाद करती है' इति ॥ ३ ॥ |
श्रोत्रादिमें विभागपूर्वक सप्तर्षि-दृष्टि
| के पुनस्तस्य चमसस्य तीर आसत ऋषय इति । | किंतु उस चमसके तीरपर कौन ऋषि रहते हैं, सो बतलाते हैं— |
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इमावेव गोतमभरद्वाजावयमेव गोतमोऽयं भरद्वाज इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी अयमेव विश्वामित्रोऽयं जमदग्निरिमावेव वसिष्ठकश्यपावयमेव वसिष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिर्वाचा ह्यन्नमद्यतेऽत्तिर्ह वै नामैतद्यदत्रिरिति सर्वस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥
१. दो कान, दो नेत्र, दो नासिका और एक रसना—ये सात श्रोत्रादि हैं।
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५११
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५११
ये दोनों [कान] ही गोतम और भरद्वाज हैं; यह ही गोतम है और यह [दूसरा] भरद्वाज है। ये दोनों [नेत्र] ही विश्वामित्र और जमदग्नि हैं; यह ही विश्वामित्र है और यह दूसरा जमदग्नि है। ये दोनों [नासारन्ध्र] ही वसिष्ठ और कश्यप हैं; यह ही वसिष्ठ है और यह दूसरा कश्यप है। तथा वाक् ही अत्रि है; क्योंकि वागिन्द्रियद्वारा ही अन्न भक्षण किया जाता है। जिसे अत्रि कहते हैं, वह निश्चय 'अत्ति' नामवाला ही है। जो इस प्रकार जानता है, वह सबका अत्ता (भक्षण करनेवाला) होता है, सब इसका अन्न हो जाता है ॥ ४ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| इमावेव गोतमभरद्वाजौ कर्णौ—<br>अयमेव गोतमोऽयं भरद्वाजो दक्षिणश्चोत्तरश्च, विपर्ययेण वा। त चक्षुषी उपदिशन्नुवाच—इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी दक्षिणं विश्वामित्रउत्तरं जमदग्निंविपर्ययेण वा।<br>इमावेव वसिष्ठकश्यपौ—नासिके उपदिशन्नुवाच; दक्षिणः पुटो भवति वसिष्ठः, उत्तरः कश्यपः पूर्ववत्। वागेवात्रिः अदनक्रियायोगात्सप्तमः; वाचा ह्यन्नमद्यते तस्मादत्तिर्ह वै प्रसिद्धं नामैतत्— | ये दोनों कर्ण ही गोतम और भरद्वाज हैं। ये दक्षिण और उत्तर कर्ण ही क्रमशः अथवा विपरीत क्रमसे गोतम और भरद्वाज हैं। इसी प्रकार नेत्रोंके विषयमें उपदेश करते हुए मन्त्रने कहा है कि ये ही विश्वामित्र और जमदग्नि हैं। इनमें दक्षिण नेत्र विश्वामित्र हे और वाम नेत्र जमदग्नि है, अथवा इससे विपरीत क्रमसे समझना चाहिये। फिर नासारन्ध्रोंके विषयमें उपदेश करते हुए मन्त्रने कहा है कि ये ही दोनों वसिष्ठ और कश्यप हैं; पूर्ववत् दायाँ छिद्र वसिष्ठ है और बायाँ कश्यप है। अदन (भक्षण) क्रियाका सम्बन्ध होनेके कारण वाक् ही सप्तम ऋषि अत्रि है; क्योंकि वागिन्द्रियके द्वारा ही अन्न भक्षण किया जाता है; अतः यह प्रसिद्ध अत्ति नामवाला है अर्थात् |
५१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २
५१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २
| अत्तृत्वादत्तिरिति, अत्तिरेव सन् यदत्रिरित्युच्यते परोक्षेण । <br><br> सर्वस्यैतस्यान्नजातस्य प्राणस्यात्रिनिर्वचनविज्ञानादत्ता भवति । अत्तैव भवति नामुष्मिन्नन्नेन पुनः प्रतिपद्यत इत्येतदुक्तं भवति--सर्वमस्यान्नं भवतीति । य एवमेतद्यथोक्तं प्राणयाथात्म्यं वेद, स एवं मध्यमः प्राणो भूत्वा आधान-प्रत्याधानगतो भोक्तैव भवति, न भोज्यम्, भोज्याद् व्यावर्तत इत्यर्थः ॥ ४ ॥ | अत्ता होनेके कारण यह 'अत्ति' है; जो कि 'अत्ति' होते हुए ही परोक्ष-रूपसे 'अत्रि' कहा जाता है। <br><br> इस 'अत्रि' शब्दकी निरुक्तिका ज्ञान होनेसे पुरुष प्राणके इस सम्पूर्ण अन्नसमुदायका अत्ता (भक्षण करने-वाला) होता है। यह अन्न भक्षण करनेवाला ही होता है, परलोकमें पुनः अन्नसे युक्त नहीं होता; 'सर्वमस्यान्नं भवति' इस वाक्यसे यही बात कही गयी है। जो इस प्रकार इस उपर्युक्त प्राणके यथार्थ स्वरूपको जानता है, वह इस तरह मध्यम प्राण होकर आधान-प्रत्याधानगत भोक्ता ही होता है, भोज्य नहीं होता अर्थात् भोज्यवर्गसे निवृत्त हो जाता है ॥ ४ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये
द्वितीयं शिशुब्राह्मणम् ॥ २ ॥
तृतीय ब्राह्मण
| तत्र प्राणा वै सत्यमित्युक्तम् । याः प्राणानामुपनिषदः, ता ब्रह्मोपनिषत्प्रसङ्गेन व्याख्याताः--एते ते प्राणा इति च । ते किमात्मकाः ? | ऊपर यह कहा गया है कि प्राण ही सत्य हैं। जो प्राणोंकी उपनिषदें हैं, उनकी 'वे ये प्राण हैं' ऐसा कहकर ब्रह्मोपनिषद्के प्रसङ्गसे व्याख्या कर दी गयी है। अब यह बतलाना है कि उनका स्वरूप क्या |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५१३ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५१३ |
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| कथं वा तेषां सत्यत्वम् ? इति च वक्तव्यमिति पञ्चभूतानां सत्यानां कार्यकारणात्मकानां स्वरूपावधारणार्थमिदं ब्राह्मणमारभ्यते—यदुपाधिविशेषापनयद्वारेण 'नेति नेति' इति ब्रह्मणः सतत्त्वं निर्दिधारयिषितम्। | है और उनकी सत्यता किस प्रकार है ? अतः शरीर एवं इन्द्रियरूप 'सत्य' संज्ञक पञ्चभूतोंके स्वरूपका निश्चय करनेके लिये यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है, जिस उपाधिविशेषके निषेधद्वारा 'नेति-नेति' इत्यादि रूपसे श्रुतिको ब्रह्मके स्वरूपका निश्चय कराना अभीष्ट है। |
ब्रह्मके दो रूप
द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च मर्त्यं चामृतं च स्थितं च यच्च सच्च त्यच्च ॥ १ ॥
ब्रह्मके दो रूप हैं—मूर्त और अमूर्त, मर्त्य और अमृत, स्थित और यत् (चर) तथा सत् और त्यत् ॥ १ ॥
| तत्र द्विरूपं ब्रह्म पञ्चभूतजनितकार्यकरणसम्बद्धं मूर्तामूर्ताख्यं मर्त्यामृतस्वभावं तज्जनितवासनारूपं च सर्वज्ञं सर्वशक्ति सोपाख्यं भवति । क्रियाकारकफलात्मकं च सर्वव्यवहारास्पदम् । तदेव ब्रह्म विगतसर्वोपाधिविशेषं सम्यग्दर्शनविषयम् अजमजरममृतमभयम्, वाङ्मनसयोरप्यविषयमद्वै- | पञ्चभूतजनित देह और इन्द्रियोंसे सम्बद्ध ब्रह्म दो रूपोंवाला है, मूर्त और अमूर्त संज्ञावाला, मर्त्य और अमृत स्वभाववाला, तज्जनित वासना रूप एवं सर्वज्ञ और सर्वशक्ति ब्रह्म सोपाख्य<sup>१</sup> (सोपाधिक) है। वह क्रिया, कारक और फलस्वरूप तथा समस्त व्यवहारका आश्रय है। वही ब्रह्म समस्त उपाधिविशेषोंसे रहित, सम्यग्ज्ञानका विषय, अजन्मा, अजर, अमर, अभय, वाणी और मनका भी अविषय है तथा |
१. जो शब्द-प्रतीतिका विषय हो उसे सोपाख्य कहते हैं।
बृ० उ० ३३—
५१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ५१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तत्त्वात् ‘नेति नेति’ इति निर्दिश्यते। | अद्वैत होनेके कारण उसका ‘नेति-नेति’ इस प्रकार निर्देश किया जाता है। |
| तत्र यदपोहद्वारेण ‘नेति नेति’ इति निर्दिश्यते ब्रह्म, ते एते द्वे वाव—वावशब्दावधारणार्थः—द्वे एवेत्यर्थः—ब्रह्मणः परमात्मनो रूपे—रूप्यते याभ्याम्—रूपं परं ब्रह्म अविद्याध्यारोप्यमाणाभ्याम्। के ते द्वे ? मूर्तं चैव मूर्तमेव च। तथाऽमूर्तं चाऽमूर्तमेव चेत्यर्थः। अन्तर्णीतस्वात्मविशेषणे मूर्तामूर्ते द्वे एवेत्यवधार्यते। | इस प्रकार जिनके अपवादद्वारा ब्रह्मका ‘नेति-नेति’ इस प्रकार निर्देश किया जाता है वे उस परब्रह्म परमात्माके ये दो रूप हैं। यहाँ ‘वाव’ शब्द निश्चयार्थक है। अर्थात् अविद्याद्वारा आरोप किये जानेवाले जिन रूपोंके द्वारा अरूप परब्रह्म निरूपित होता है, वे ये दो ही रूप हैं। वे दो रूप कौन-से हैं ? ‘मूर्तं चैव’—मूर्त ही तथा ‘अमूर्तं च’—अमूर्त ही [वे रूप हैं]। अर्थात् जिनमें उनके अपने अन्य विशेषणोंका अन्तर्भाव हो जाता है, ऐसे ब्रह्मके ये मूर्त और अमूर्त दो ही रूप निश्चय किये जाते हैं। |
| कानि पुनस्तानि विशेषणानि मूर्तामूर्तयोः ? इत्युच्यन्ते—मर्त्यं च मर्त्यं मरणधर्मि, अमृतं च तद्विपरीतम्, स्थितं च—परिच्छिन्नं गतिपूर्वकं यत्स्थास्नु, यच्च—यातीति यत्—व्यापि—अपरिच्छिन्नं स्थितविपरीतम्, सच्च—सदित्यन्येभ्योविशेष्यमाणा- | किंतु मूर्त और अमूर्तके वे अन्य विशेषण कौन-से हैं ? सो बतलाये जाते हैं—‘मर्त्यं च,’ मर्त्य—मरणधर्मी और अमृत—मर्त्यसे विपरीत स्वभाववाला, स्थित—परिच्छिन्न अर्थात् जो गतिपूर्वक स्थित रहनेवाला है और यत्—जो जाता हो अर्थात् व्यापक, अपरिच्छिन्न यानी स्थितसे विपरीत स्वभाववाला, सत्—दूसरोंकी अपेक्षा विशेषरूपसे निरूपित किये जाने- |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५१५
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५१५
| साधारणधर्मविशेषवत्, त्यच्च-तद्विपरीतम् 'त्यत्' इत्येव सर्वदा परोक्षाभिधानार्हम् ॥ १ ॥ | वाले असाधारण धर्मविशेषवाला और त्यत्—सत्से विपरीत स्वभाववाला अर्थात् 'वह' इस प्रकार सर्वदा परोक्षरूपसे कहे जाने योग्य ॥ १ ॥ |
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मूर्तामूर्तके विभागपूर्वक मूर्तरूप और उसके रसका वर्णन
| तत्र चतुष्टयविशेषणविशिष्टं मूर्तं तथा अमूर्तं च। तत्र कानि मूर्तविशेषणानि? कानि चेतराणि? इति विभज्यते— | इस प्रकार मूर्त और अमूर्त चार विशेषण युक्त हैं। उनमें कौन-से विशेषण मूर्तके हैं और कौन-से अमूर्तके ? इसका विभाग किया जाता है— |
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तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्चान्तरिक्षाच्चैतन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत्सत्तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो य एष तपति सतो ह्येष रसः ॥ २ ॥
जो वायु और अन्तरिक्षसे भिन्न है, वह मूर्त है। यह मर्त्य है, यह स्थित है और यह सत् है। उस इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका, इस सत्का यह रस है, जो कि यह तपता है। यह सत्का ही रस है ॥ २ ॥
| तदेतन्मूर्तं मूर्च्छितावयवम् इतरेतरानुप्रविष्टावयवं घनं संहतमित्यर्थः । किं तत् ? यदन्यत्; कस्मादन्यत् ? वायोश्चान्तरिक्षाच्च भूतद्वयात्—परिशेषात् पृथिव्यादिभूतत्रयम् । | वह यह मूर्त अर्थात् मिले हुए अवयवोंवाला है, इसके अवयव एक दूसरेमें अनुप्रविष्ट रहते हैं, यह घनीभूत अर्थात् संहत है। वह क्या है ? जो अन्य है; किससे अन्य है ? वायु और अन्तरिक्ष इन दो भूतोंसे; अतः बचे हुए पृथिवी आदि तीन भूत ही मूर्त हैं। |
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५१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
५१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| एतन्मर्त्यम्--यदेतन्मूर्ताख्यं भूतत्रयमिदं मर्त्यं मरणधर्मि; कस्मात्? यस्मात्स्थितमेतत्; परिच्छिन्नं ह्यर्थान्तरेण सम्प्रयुज्यमानं विरुध्यते--यथा घटः स्तम्भकुड्यादिना; तथा मूर्तं स्थितं परिच्छिन्नम् अर्थान्तरसम्बन्धि ततोऽर्थान्तरविरोधान्मर्त्यम्; एतत्सद्विशेष्यमाणासाधारणधर्मवत्, तस्माद्धि परिच्छिन्नम्, परिच्छिन्नत्वान्मर्त्यम् अतो मूर्तम्; मूर्तत्वाद्वा मर्त्यम्, मर्त्यत्वात्स्थितम्, स्थितत्वात्सत् । अतोऽन्योन्याव्यभिचाराच्चतुर्णां धर्माणां यथेष्टं विशेषणविशेष्यभावो हेतुहेतुमद्भावश्च दर्शयितव्यः । सर्वथापि तु भूतत्रयं चतुष्टयविशेषणविशिष्टं मूर्तं रूपं ब्रह्मणः । तत्र चतुर्णामेकस्मिन्गृहीते विशेषणे इतरद्गृहीतमेव विशेषणमित्याह--तस्यैतस्य मूर्तस्य एतस्य मर्त्यस्य, एतस्य स्थितस्य, एतस्य | यह मर्त्य है--यह जो मूर्तसंज्ञक तीन भूत हैं मर्त्य--मरणधर्मी हैं। क्यों ? क्योंकि ये स्थित हैं। परिच्छिन्न वस्तु ही किसी अन्य वस्तुसे संयोग किये जानेपर उससे विरुद्ध रहती है, जिस तरह स्तम्भ और भित्ति आदिसे घट। इस प्रकार मूर्त स्थित, परिच्छिन्न और अर्थान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला है, अतः अर्थान्तरसे विरोध होनेके कारण वह मर्त्य है। यह सत् अर्थात् विशेष्यमाण असाधारण धर्मोंवाला है, इसीसे परिच्छिन्न है, परिच्छिन्न होनेके कारण मर्त्य है और इसीसे मूर्त है। अथवा मूर्त होनेके कारण मर्त्य है, मर्त्य होनेके कारण स्थित है और स्थित होनेके कारण सत् है। अतः इन चारों धर्मोंका एक-दूसरेमें व्यभिचार न होनेके कारण इनका यथेष्ट विशेष्य-विशेषणभाव और कार्य-कारणभाव दिखलाना उचित है। यह चार विशेषणोंसे युक्त भूतत्रय सभी प्रकार ब्रह्मका मूर्तरूप है। इन चार विशेषणोंमेंसे किसी एकको ग्रहण करनेपर अन्य विशेषण भी गृहीत हो ही जाते हैं; इसीसे श्रुति कहती है--उस इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५१७
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५१७
| सत:--चतुष्टयविशेषणस्य भूतत्रयस्येत्यर्थः, एष रसः सारः इत्यर्थः।<br><br>त्रयाणां हि भूतानां सारिष्ठः सविता; एतत्साराणि त्रीणि भूतानि, यत एतत्कृतविभज्यमानरूपविशेषणानि भवन्ति; आधिदैविकस्यै वै कार्यस्यैतद्रूपम्- यत्सविता यदेतन्मण्डलं तपति; सतो भूतत्रयस्य हि यस्मादेष रस इत्येतद्गृह्यते। मूर्तो ह्येष सविता तपति, सारिष्ठश्च। यत्त्वाधिदैविकं करणं मण्डलस्याभ्यन्तरम्, तद्वक्ष्यामः॥ २ ॥ | और इस सत्का अर्थात् इन चार विशेषणोंसे युक्त भूतत्रयका यह रस यानी सार है।<br><br>तीनों ही भूतोंका सारतम सविता है। तीनों भूत इसी सारवाले हैं, क्योंकि वे इसीके द्वारा विभक्त किये हुए विभिन्न रूपोंवाले होते हैं। यह जो सविता है, जो यह सवितृमण्डल तपता है, वह आधिदैविक कार्यका रूप है; क्योंकि यह सद्रूप भूतत्रयका रस है—इस प्रकार ग्रहण किया जाता है। यह मूर्त सविता ही तपता है और सारतम भी है। और जो मण्डलान्तर्गत आधिदैविक करण है, उसका हम आगे वर्णन करेंगे॥ २ ॥ |
विशेषणोंसहित अमूर्त रूप और उसके रसका वर्णन
अथामूर्तं वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतमेतद्यदेतत्तयत्सैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषस्त्यस्य ह्येष रस इत्यधिदैवतम् ॥ ३ ॥
तथा वायु और अन्तरिक्ष अमूर्त हैं, ये अमृत हैं, ये यत् हैं और ये ही त्यत् हैं। उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत्का, इस त्यत्का यह सार है, जो कि इस मण्डलमें पुरुष है, यही इस त्यत्का सार है। यह अधिदैवत-दर्शन है ॥ ३ ॥
५१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ५१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| अथामूर्तम्— अथाधुनामूर्तमुच्यते। वायुश्चान्तरिक्षं च यत्परिशेषितं भूतद्वयम्—एतदमृतम्, अमूर्तत्वात्; अस्थितम्, अथोऽविरुद्धयमानं केनचित्, अमृतममरणधर्मि। एतद्यत्स्थितविपरीतम्,व्यापि, अपरिच्छिन्नम्, यस्मात् 'यत्' एतद् अन्येभ्योऽप्रविभज्यमानविशेषम्, अतस्त्यत्, 'त्यत्' इति परोक्षाभिधानार्हमेव--पूर्ववत्। | अब अमूर्तका वर्णन किया जाता है। वायु और अन्तरिक्ष जो दो भूत रह गये हैं, वे अमृत हैं; क्योंकि वे अमूर्त हैं तथा अमूर्त होनेके कारण ही वे अस्थित हैं। अतः किसीसे भी उनका विरोध नहीं है, अमृत कहते हैं अमरणधर्मीको, यह यत् (चल) अर्थात् स्थितसे विपरीत व्यापी यानी अपरिच्छिन्न है, चूँकि दूसरोंसे इस 'यत्' के विशेषण विभक्त नहीं हैं, इसलिये यह 'त्यत्' है, अर्थात् 'त्यत्' इस प्रकार पूर्ववत् परोक्षरूपसे ही पुकारे जाने योग्य है। | | तस्यैतस्यामूर्तस्य तस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्य चतुष्टयविशेषणस्यामूर्तस्यैष रसः;कोऽसौ? | उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत् (गतिशील) का और इस त्यत् (परोक्ष) का अर्थात् इन चार विशेषणोंसे युक्त अमूर्तका यह रस है। वह कौन है? | | य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः— करणात्मको हिरण्यगर्भः प्राण इत्यभिधीयते यः, स एषोऽमूर्तस्य भूतद्वयस्य रसः पूर्ववत्सारिष्ठः। | जो कि यह इस मण्डलमें पुरुष यानी इन्द्रियात्मा हिरण्यगर्भ यानी प्राण—ऐसा कहा जाता है। वही इस अमूर्त भूतद्वयका रस अर्थात् पूर्ववत् सारतम भाग है। | | एतत्पुरुषसारं चामूर्तं भूतद्वयम्--<br>हैरण्यगर्भलिङ्गारम्भाय हि भूतद्वयाभिव्यक्तिरव्याकृतात्। तस्मात्तादर्थ्यात्तत्सारं भूतद्वयम्। | अमूर्त भूतद्वय इस पुरुषरूप सारवाले हैं। हिरण्यगर्भरूप लिङ्गात्माके आरम्भके लिये ही अव्याकृतसे इन दोनों भूतोंकी अभिव्यक्ति होती है। अतः उसके लिये अर्थात् उसके साधन होनेसे ये भूतद्वय उस पुरुष- |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५१९ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५१९ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| त्यस्य ह्येष रसः--यस्माद्यो मण्डलस्थः पुरुषो मण्डलवन्न गृह्यते सारश्च भूतद्वयस्य, तस्मादस्ति मण्डलस्थस्य पुरुषस्य भूतद्वयस्य च साधर्म्यम्, तस्माद्युक्तं प्रसिद्धवद्धेतूपादानम्--त्यस्य ह्येष रस इति। | रूप सारवाले ही हैं। यह त्यत्का ही सार है; क्योंकि यह जो मण्डलस्थ पुरुष है, इसे मण्डलके समान ग्रहण नहीं किया जा सकता; इसलिये यह भूतद्वयका सार है; अतः मण्डलस्थ पुरुष और इन दोनों भूतोंका साधर्म्य है, अतः 'यह त्यत्का ही सार है' इस प्रकार प्रसिद्धके समान [ त्यत्को इसका ] हेतु बतलाना उचित ही है। |
| रसः कारणं हिरण्यगर्भविज्ञानात्मा चेतन इति केचित्। तत्र च किल हिरण्यगर्भविज्ञानात्मनः कर्म वाय्वन्तरिक्षयोः प्रयोक्तृ, तत्कर्म वाय्वन्तरिक्षाधारं सदन्येषां भूतानां प्रयोक्तृ भवति; तेन स्वकर्मणा वाय्वन्तरिक्षयोः प्रयोक्तेति तयो रसः कारणमुच्यत इति। | किन्हींका मत है¹ कि हिरण्यगर्भविज्ञानात्मा चेतन रस यानी कारण है। उस अवस्थामें हिरण्यगर्भविज्ञानात्माका कर्म वायु और अन्तरिक्षका प्रेरक है, वह कर्म वायु और अन्तरिक्षरूप आधारवाला होकर अन्य भूतोंका प्रेरक होता है; उस अपने कर्मके द्वारा हिरण्यगर्भविज्ञानात्मा वायु और अन्तरिक्षका प्रेरक है, इसलिये उनका रस यानी कारण कहा जाता है। |
| तन्न, मूर्तरसेनातुल्यत्वात्। <br><br> मूर्तस्य तु भूतत्रयस्य रसो मूर्तमेव मण्डलं दृष्टं भूतत्रयसमानजातीयम्, न चेतनः; तथामूर्तयोरपि भूत- | किंतु ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि मूर्तके रस (सार) से इसकी सदृशता नहीं है। तीन मूर्त भूतोंका रस तो मूर्तमण्डल ही देखा गया है, जो भूतत्रयसे समान जातिवाला अर्थात् जड है, उनका रस चेतन नहीं है। इसी प्रकार अमूर्त भूतोंका |
१. भर्तृप्रपञ्चका।
५२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ५२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| योस्तत्समानजातीयेनैवामूर्तरसेन युक्तं भवितुम्; वाक्यप्रवृत्तेस्तुल्यत्वात्; यथा हि मूर्तामूर्ते चतुष्टयधर्मवती विभज्येते, तथा रसरसवतोरापि मूर्तामूर्तयोस्तुल्येनैव न्यायेन युक्तो विभागः, न त्वर्धवैशसम् । | भी उनके समानजातीय ही अमूर्त रस होना चाहिये¹; क्योंकि इन दोनों वाक्योंकी प्रवृत्ति समान ही है। जिस प्रकार चार धर्मोंसे युक्त मूर्त और अमूर्तका विभाग किया गया है² उसी प्रकार उसी न्यायसे मूर्तरसवान् और रस तथा अमूर्त्त रसवान् और रसका भी विभाग करना उचित है³; अर्धजरतीय न्यायका आश्रय लेना उचित नहीं है। | | मूर्तरसेऽपि मण्डलोपाधिश्चेतनो विवक्ष्यत इति चेत् ? | पूर्व०—[जिस प्रकार हम अमूर्त भूतोंके रसको चेतन मानते हैं, उसी प्रकार] यदि मूर्तभूतोंके रसमें भी मण्डलोपाधिक चेतन ही विवक्षित मानें तो ? | | अत्यल्पमिदमुच्यते, सर्वत्रैव तु मूर्तामूर्तयोर्ब्रह्मरूपेण विवक्षितत्वात् । | सिद्धान्ती—तुम्हारा यह कथन बहुत थोड़ा है, क्योंकि यहाँ [ मूर्त और अमूर्त रस ही नहीं] सर्वत्र ही मूर्त और अमूर्त भूतमात्र ब्रह्मरूपसे विवक्षित हैं। |
१. अर्थात् जिस प्रकार अमूर्त भूत—वायु और अन्तरिक्ष जड जातिके हैं, उसी प्रकार उनका रस भी अमूर्त एवं जड होना उचित है।
२. जैसे कि मन्त्र २ और ३ में यह बतलाया है कि ब्रह्मका मूर्त रूप 'मूर्तिमान्, मर्त्य, स्थित (परिच्छिन्न) और सत् है तथा अमूर्त रूप अमूर्तिमान्, अमृत, अस्थित (अपरिच्छिन्न) और त्यत् है।
३. जैसे रसवान् (भूत) मूर्त और अमूर्त दो प्रकारके हैं, तथा जड हैं, उसी प्रकार रस भी मूर्त और अमूर्त—दो प्रकारका तथा जड होना चाहिये। ऐसा विभाग नहीं करना चाहिये कि मूर्त रस तो जड है और अमूर्त रस चेतन है। क्योंकि ऐसी कल्पना अर्धजरतीय होगी, जो अनुचित है।
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२१
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२१
| पुरुषशब्दोऽचेतनेऽनुपपन्न इति चेत् ! <br><br> न, पक्षपुच्छादिविशिष्टस्यैव लिङ्गस्य पुरुषशब्ददर्शनात् । "न वा इत्थं सन्तः शक्ष्यामः प्रजाः प्रजनयितुमिमान्सप्त पुरुषानेकं पुरुषं करवामेति त एतान्सप्त पुरुषानेकं पुरुषमकुर्वन्" इत्यादौ अन्नरसमयादिषु च श्रुत्यन्तरे पुरुषशब्दप्रयोगात्। इत्यधिदैवतमित्युक्तोपसंहारोऽध्यात्मविभागोक्त्यर्थः ॥ ३ ॥ | पूर्व०-किंतु 'पुरुष' शब्दका अचेतनमें प्रयोग होना तो सम्भव नहीं है ! <br><br> सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है; [ तैत्तिरीय-श्रुतिमें तो ] पक्ष और पुच्छविशिष्ट लिङ्गशरीरको ही पुरुष-शब्दवाची देखा गया है । तथा "हम इस प्रकार अलग-अलग रहते हुए प्रजा उत्पन्न नहीं कर सकते । अतः इन सात^१ पुरुषोंको हम एक कर दें—ऐसा विचारकर उन्होंने इन सात पुरुषोंको एक कर दिया" इत्यादि अन्यश्रुतियोंके वाक्योंमें अन्नरसमयादिके अर्थमें पुरुष शब्दका प्रयोग किया गया है । 'यह अधिदैवत मूर्तामूर्त है' ऐसा कहकर जो पूर्वोक्तका उपसंहार किया गया है, वह अध्यात्म मूर्तामूर्तका विभाग बतलानेके लिये है ॥ ३ ॥ |
अध्यात्म मूर्तामूर्तके विभागपूर्वक मूर्तका वर्णन
अथाध्यात्ममिदमेव मूर्तं यदन्यत्प्राणाच्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत्सतस्त्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो यच्चक्षुः सतो ह्येष रसः ॥ ४ ॥
अब अध्यात्म मूर्तामूर्तका वर्णन किया जाता है। जो प्राणसे तथा यह जो देहान्तर्गत आकाश है उससे भिन्न है, यही मूर्त है। यह मर्त्य है,
१. सात पुरुष ये हैं—श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण, वाक् और मन।