भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र १७ ] अध्याय ४ ४२१

सूत्र १७ ] अध्याय ४ ४२१ विधान; तु=तो; तत्कार्याय=उन-उन विहित कर्मोंकी रक्षा करनेके लिये; एव=ही है; तद्दर्शनात्=यही श्रुतियों और स्मृतियोंमें देखा गया है। व्याख्या-ज्ञानी महापुरुषोंके लिये जो श्रुतिमें विधान किये हुए अपने आश्रम-सम्बन्धी अग्निहोत्रादि कर्म जीवनपर्यन्त करनेकी बात कही गयी है, (ब्र० सू० ३।४।३२) वह कथन उन कर्मोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही है। अर्थात् साधारण जनता उसकी देखा-देखी कर्मोंका त्याग करके भ्रष्ट न हो; अपितु अपने-अपने कर्मोंमें श्रद्धापूर्वक लगी रहे; इस प्रकार लोकसंग्रहके लिये वैसा कहा गया है, अन्य किसी उद्देश्यसे नहीं। यह बात श्रुतियों और स्मृतियोंमें भी देखी जाती है। श्रुतिमें तो जनक, अश्वपति, याज्ञवल्क्य आदि ज्ञानी महापुरुषोंके दृष्टान्तसे लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेका विधान सिद्ध किया गया है और श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान्ने स्वयं कहा है कि 'हे पार्थ ! मेरे लिये कुछ भी कर्तव्य नहीं है, मुझे तीनों लोकोंमें किसी भी अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति नहीं करनी है, तो भी मैं कर्मोंमें संलग्न रहता हूँ; क्योंकि यदि मैं कभी सावधानीके साथ कर्म न करूँ तो ये सब लोग मेरा अनुकरण करके नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं उनके नाशमें निमित्त बनूँ।' इत्यादि (३। २२ से २४)। तथा यह भी कहा है कि 'विद्वान् पुरुष कर्मासक्त अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भेद उत्पन्न न करे, किंतु स्वयं उन्हींकी भाँति कर्म करता हुआ उनको कर्मोंमें लगाये रखे' (३।२५)। 'यज्ञ-रक्षाके लिये किये जानेवाले कर्मोंसे भिन्न कर्मोंद्वारा ही यह मनुष्य बन्धनमें पड़ता है।' इत्यादि (३।९)। इस प्रकार श्रुति और स्मृतिप्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि विद्वान्के लिये कर्म करनेका कथन केवल लोकसंग्रहके लिये है। सम्बन्ध-आश्रमके लिये विहित कर्मोंके सिवा, अन्य कर्म उनके द्वारा किये जाते हैं या नहीं? इस जिज्ञासापर कहते हैं- अतोऽन्यापि ह्येकेषामुभयोः ॥ ४।१।१७॥ अतः=इनसे; अन्यापि=भिन्न क्रिया भी; उभयोः=ज्ञानी और साधक

४२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

४२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ दोनोंके लिये; हि=ही; एकेषाम्=किसी एक शाखावालोंके मतमें विहित है। व्याख्या - श्रुतिमें कहा है- 'आजीवन शास्त्रविहित कर्मोंको करते हुए ही इस लोकमें सौ वर्षतक जीनेकी इच्छा करे।' इत्यादि (ईशा० २) 'तथा जो कर्म और ज्ञान- इन दोनोंको साथ-साथ जानता है, वह कर्मोंद्वारा मृत्युसे तरकर ज्ञानसे अमृत्युको प्राप्त होता है।' (ईशा० ११) इस प्रकार किसी- किसी शाखावालोंके मतमें ज्ञानी और साधक दोनोंके लिये ही इन आश्रम- सम्बन्धी कर्मोंके सिवा अन्य सभी विहित कर्मोंका अनुष्ठान आजीवन करते रहनेका विधान है। अतः ज्ञानी लोकसंग्रहके लिये प्रत्येक शुभ कर्मका अनुष्ठान कर्तापनके अहंकारसे रहित तथा कर्मासक्ति और फलासक्तिसे सर्वथा अतीत हुआ कर सकता है; क्योंकि ज्ञानोत्तरकालमें किये जानेवाले किसी भी कर्मसे उसका लेप नहीं होता (गीता ४।२२; १८।१७) । सम्बन्ध - क्या विद्या और कर्मके समुच्चयका भी श्रुतिमें विधान है? इसपर कहते हैं- यदेव विद्ययेति हि॥४।१।१८॥ यत्=जो; एव=भी; विद्यया=विद्याके सहित (किया जाता है); इति = इस प्रकार कथन करनेवाली श्रुति है; हि = इसलिये (विद्या कर्मोंका अंग किसी जगह हो सकती है)। व्याख्या - श्रुतिमें कहा है कि 'जो कर्म विद्या, श्रद्धा और रहस्यज्ञानके सहित किया जाता है, वह अधिक सामर्थ्यसम्पन्न हो जाता है।' (छा० उ० १।१।१०) यह श्रुति कर्मोंके अंगभूत उद्गीथ आदिकी उपासनाके प्रकरणकी है, इसलिये इसका सम्बन्ध वैसी ही उपासनाओंसे है तथा यह विद्या भी ब्रह्मविद्या नहीं है। अतः ज्ञानीसे या परमात्माकी प्राप्तिके लिये अभ्यास करनेवाले अन्य उपासकोंसे इस श्रुतिका सम्बन्ध नहीं है। इसलिये यह सिद्ध होता है कि उस प्रकारकी उपासनामें कही हुई विद्या ही उन कर्मोंका अंग हो सकती है, ब्रह्मविद्या नहीं।

सूत्र १९] अध्याय ४ ४२३

सूत्र १९] अध्याय ४ ४२३ सम्बन्ध—ज्ञानीके प्रारब्ध कर्मोंका नाश कैसे होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भोगेन त्वितरे क्षपयित्वा सम्पद्यते॥४।१।१९॥ इतरे = संचित और क्रियमाणके सिवा दूसरे प्रारब्धरूप शुभाशुभ कर्मोंको; तु = तो; भोगेन = उपभोगके द्वारा; क्षपयित्वा = क्षीण करके; सम्पद्यते = (वह ज्ञानी) परमात्माको प्राप्त हो जाता है। व्याख्या—ऊपर कहा जा चुका है कि विद्वान्के पूर्वकृत संचित कर्म तो भस्म हो जाते हैं और क्रियमाण कर्मोंसे उसका सम्बन्ध नहीं होता; शेष रहे शुभाशुभ प्रारब्ध कर्म, उन दोनोंका उपभोगके द्वारा नाश करके ज्ञानी पुरुष परम पदको प्राप्त हो जाता है; यह बात श्रुतिमें कही गयी है (छा० उ० ६।१४।२)। पहला पाद सम्पूर्ण

दूसरा पाद

दूसरा पाद पहले पादमें उपासनाविषयक निर्णय करके जिन जीवन्मुक्त महापुरुषोंका ब्रह्मलोकादिमें गमन नहीं होता, उनको किस प्रकार परमात्माकी प्राप्ति होती है, इस विषयपर विचार किया गया। अब इस दूसरे पादमें, जो ब्रह्मविद्याके उपासक ब्रह्मलोकमें जाते हैं, उनकी गतिका प्रकार बताया जाता है। साधारण मनुष्योंकी और ब्रह्मविद्याके उपासककी गतिमें कहाँतक समानता है, यह स्पष्ट करनेके लिये पहले साधारण गतिके वर्णनसे प्रकरण आरम्भ किया जाता है— वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच्च ॥ ४ । २ । १ ॥ वाक्=वाणी; मनसि=मनमें स्थित हो जाती है; दर्शनात्=प्रत्यक्ष देखनेसे; च=और; शब्दात्=वेद-वाणीसे भी यह बात सिद्ध होती है। व्याख्या—श्रुतिमें यह कहा गया है कि—‘अस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम्॥’ ‘इस मनुष्यके मरकर एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाते समय वाणी मनमें स्थित होती है, मन प्राणमें और प्राण तेजमें तथा तेज परदेवतामें स्थित होता है। (छा० उ० ६।८।६) इस वाक्यमें जो वाणीका मनमें स्थित होना कहा गया है, वह वाक्-इन्द्रियका ही स्थित होना है, केवल उसकी वृत्तिमात्रका नहीं; क्योंकि यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि मरणासन्न मनुष्यमें मन विद्यमान रहते हुए ही वाक्-इन्द्रियका कार्य बंद हो जाता है तथा श्रुतिमें तो स्पष्ट शब्दोंमें यह बात कही ही है। सम्बन्ध—‘वाणी मनमें स्थित हो जाती है', यह कहनेके बाद वहाँ अन्य इन्द्रियोंके विषयमें कुछ नहीं कहा गया। केवल मनकी प्राणमें स्थिति बतायी गयी, अतः अन्य इन्द्रियोंके विषयमें क्या समझना चाहिये ? इसपर कहते हैं— अत एव च सर्वाण्यनु ॥ ४ । २ । २ ॥

सूत्र ३-४ ] अध्याय ४ ४२५

सूत्र ३-४ ] अध्याय ४ ४२५ अत एव=इसीसे; च=यह भी (समझ लेना चाहिये कि); अनु=उनके साथ-साथ; सर्वाणि=समस्त इन्द्रियाँ (मनमें स्थित हो जाती हैं)। व्याख्या—प्रश्नोपनिषद्में कहा है कि—'तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भव- मिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥' 'अर्थात् जिसके शरीरकी गरमी शान्त हो चुकी है, ऐसा जीवात्मा मनमें स्थित हुई इन्द्रियोंके सहित पुनर्जन्मको प्राप्त होता है।' (प्र० उ० ३।९) इस प्रकार श्रुतिमें किसी एक इन्द्रियका मनमें स्थित होना न कहकर समस्त इन्द्रियोंकी मनमें स्थिति बतायी गयी है तथा सभी इन्द्रियोंके कर्मोंका बंद होना प्रत्यक्ष भी देखा जाता है। अतः पूर्वोक्त दोनों प्रमाणोंसे ही यह भी सिद्ध हो जाता है कि वाक्-इन्द्रियके साथ-साथ अन्य इन्द्रियाँ भी मनमें स्थित हो जाती हैं। सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तन्मनः प्राण उत्तरात्॥ ४। २। ३॥ उत्तरात्=उसके बादके कथनसे (यह स्पष्ट है कि); तत्=वह (इन्द्रियोंके सहित); मनः=मन; प्राणे=प्राणमें (स्थित हो जाता है)। व्याख्या—पूर्वोक्त श्रुतिमें जो दूसरा वाक्य है, 'मनः प्राणे' (छा० उ० ६। ८। ६) उससे यह भी स्पष्ट है कि वह मन इन्द्रियोंके साथ ही प्राणमें स्थित हो जाता है। सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः॥ ४। २। ४॥ तदुपगमादिभ्यः=उस जीवात्माके गमन आदिके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि; सः=वह प्राण, मन और इन्द्रियोंके साथ; अध्यक्षे=अपने स्वामी जीवात्मामें (स्थित हो जाता है)। व्याख्या—बृहदारण्यकमें कहा है कि 'उस समय यह आत्मा नेत्रसे या ब्रह्मरन्ध्रसे अथवा शरीरके अन्य किसी मार्गद्वारा शरीरसे बाहर निकलता है, उसके निकलनेपर उसीके साथ प्राण भी निकलता है और

४२६ वेदान्त-दर्शन [पाद २

४२६ वेदान्त-दर्शन [पाद २ प्राणके निकलनेपर उसके साथ सब इन्द्रियाँ निकलती हैं।' (बृह० उ० ४।४।२)। श्रुतिके इस गमनविषयक वाक्यसे यह सिद्ध हो जाता है कि इन्द्रिय और मनसहित प्राण अपने स्वामी जीवात्मामें स्थित होता है। यद्यपि पूर्व श्रुतिमें प्राणका तेजमें स्थित होना कहा है, किंतु बिना जीवात्माके केवल प्राण और मनसहित इन्द्रियोंका गमन सम्भव नहीं; इसलिये दूसरी श्रुतिमें कहे हुए जीवात्माको भी यहाँ सम्मिलित कर लेना उचित है। सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भूतेषु तच्छ्रुतेः ॥ ४।२।५ ॥ तच्छ्रुतेः = तद्विषयक श्रुति-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि; भूतेषु = (प्राण और मन-इन्द्रियोंसहित जीवात्मा) पाँचों सूक्ष्म भूतोंमें (स्थित होता है)। व्याख्या—पूर्वश्रुतिमें जो यह कहा है कि प्राण तेजमें स्थित होता है, उससे यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा, मन और समस्त इन्द्रियाँ— ये सब-के-सब सूक्ष्मभूत-समुदायमें स्थित होते हैं; क्योंकि सभी सूक्ष्मभूत तेजके साथ मिले हुए हैं। अतः तेजके नामसे समस्त सूक्ष्मभूत-समुदायका ही कथन है। सम्बन्ध—पूर्वश्रुतिमें प्राणका केवल तेजमें ही स्थित होना कहा गया है, अतः यदि सब भूतोंमें स्थित होना न मानकर एक तेजस्तत्त्वमें ही स्थित होना मान लिया जाय तो क्या हानि है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— नैकस्मिन्दर्शयतो हि ॥ ४।२।६ ॥ एकस्मिन् = एक तेजस्तत्त्वमें स्थित होना; न = नहीं माना जा सकता; हि = क्योंकि; दर्शयतः = श्रुति और स्मृति दोनों जीवात्माका पाँचों भूतोंसे युक्त होना दिखलाती हैं। व्याख्या—इस बातका निर्णय पहले (ब्रह्मसूत्र ३।१।२ में) कर दिया गया है कि एक जल या एक तेजके कथनसे पाँचों तत्त्वोंका ग्रहण

सूत्र ७ ] अध्याय ४ ४२७

सूत्र ७ ] अध्याय ४ ४२७ है; क्योंकि उस प्रकरणमें पृथिवी, जल और तेज-इन तीन तत्त्वोंकी उत्पत्तिका वर्णन करके तीनोंका मिश्रण करनेकी बात कही है। अतः जिस तत्त्वकी प्रधानता है, उसीके नामसे वहाँ वे तीनों तत्त्व पुकारे गये हैं; इससे, शरीर पांचभौतिक है, यह बात प्रत्यक्ष दिखायी देनेसे तथा श्रुतिमें भी पृथिवीमय, आपोमय, वायुमय, आकाशमय और तेजोमय (बृह० उ० ४।४।५)-इन विशेषणोंका जीवात्माके साथ प्रयोग देखा जानेसे यही सिद्ध होता है कि प्राण और मन-इन्द्रिय आदिके सहित जीवात्मा एकमात्र तेजस्तत्त्वमें स्थित नहीं होता; अपितु शरीरके बीजभूत पाँचों भूतोंके सूक्ष्म स्वरूपमें स्थित होता है। वही इसका सूक्ष्म शरीर है, जो कि कठोपनिषद्में रथके नामसे कहा गया है (क० उ० १।३।३) इसके सिवा स्मृतिमें भी कहा है- अण्व्यो मात्रा विनाशिन्यो दशार्धानां तु याः स्मृताः। ताभिः सार्धमिदं सर्वं सम्भवत्यनुपूर्वशः॥ 'पाँचों भूतोंकी जो विनाशशील पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द) कही गयी हैं, उनके साथ यह सम्पूर्ण जगत् क्रमशः उत्पन्न होता है।' (मनु० १।२७) सम्बन्ध- यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मरणकालकी गतिका जो वर्णन किया गया है, यह साधारण मनुष्योंके विषयमें है या ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले तत्त्ववेत्ताओंके विषयमें? इसपर कहते हैं- समाना चासृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य॥ ४। २। ७॥ आसृत्युपक्रमात् = देवयानमार्गद्वारा ब्रह्मलोकमें जानेका क्रम आरम्भ होनेतक; समाना = दोनोंकी गति समान; च=ही है; च=क्योंकि; अनुपोष = सूक्ष्म शरीरको सुरक्षित रखकर ही; अमृतत्वम् = ब्रह्मलोकमें अमृतत्व लाभ करना ब्रह्मविद्याका फल बताया गया है।

४२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

४२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—वाणी मनमें स्थित होती है, यहाँसे लेकर प्राण, मन और इन्द्रियोंसहित जो जीवात्माके सूक्ष्म भूतसमुदायमें स्थित होनेतकका यानी स्थूल शरीरसे निकलकर सूक्ष्म शरीरमें स्थित होनेतकका जो मार्ग बताया गया है, यहाँतक साधारण मनुष्योंकी और ब्रह्मलोकमें जानेवाले ज्ञानी पुरुषकी गति एक समान ही बतायी गयी है; क्योंकि सूक्ष्म शरीरके सुरक्षित रहते हुए ही इस लोकसे ब्रह्मलोकमें जाना होता है और वहाँ जाकर उसे अमृतस्वरूपकी प्राप्ति होती है। तथा अन्य लोकोंमें और शरीरोंमें भी सूक्ष्म शरीरद्वारा ही गमन होता है इसीलिये अलग-अलग वर्णन नहीं किया गया है। सम्बन्ध—उस प्रकरणके अन्तमें जो यह कहा गया है कि मन, इन्द्रियाँ और जीवात्माके सहित वह तेज परमदेवतामें स्थित होता है तो यह स्थित होना कैसा है; क्योंकि प्रकरण साधारण मनुष्योंका है, सभी समान भावसे परमदेव परमात्माको प्राप्त हो जायँ, यह सम्भव नहीं! इस जिज्ञासापर कहते हैं— तदापीतेः संसारव्यपदेशात् ॥ ४।२।८॥ संसारव्यपदेशात् = साधारण जीवोंका मरनेके बाद बार-बार जन्म ग्रहण करनेका कथन होनेके कारण (यही सिद्ध होता है कि); तत् = उनका वह सूक्ष्म शरीर; आ अपीतेः = मुक्तावस्था प्राप्त होनेतक रहता है, इसलिये नूतन स्थूल शरीर प्राप्त होनेके पहले-पहले उनका परमात्मामें स्थित रहना प्रलयकालकी भाँति है। व्याख्या—उस प्रकरणमें जो एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवालेका परम देवतामें स्थित होना कहा गया है, वह प्रलयकालकी भाँति कर्म- संस्कार और सूक्ष्म शरीरके सहित अज्ञानपूर्वक स्थित होना है। अतः वह परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति नहीं है; किंतु समस्त जगत् जिस प्रकार उस परम कारण परमात्मामें ही स्थित रहता है, उसी प्रकार स्थित होना है। यह स्थिति उस जीवात्माको जबतक अपने कर्मफल-उपभोगके उपयुक्त

सूत्र ९ ] अध्याय ४ ४२९

सूत्र ९ ] अध्याय ४ ४२९ कोई दूसरा शरीर नहीं मिलता, तबतक रहती है; क्योंकि उसके पुनर्जन्मका श्रुतिमें कथन है (क० उ० २।२।७)। इसलिये जबतक उसे मुक्ति प्राप्त नहीं होती, तबतक उसका सूक्ष्म शरीरसे सम्बन्ध रहता है; अतः वह मुक्त पुरुषकी भाँति परमात्मामें विलीन नहीं होता। सम्बन्ध—उस प्रकरणमें तो जीवात्माका सबके सहित आकाशादि भूतोंमें स्थित होना बताया गया है, वहाँ यह नहीं कहा गया कि वह सूक्ष्मभूत- समुदायमें स्थित होता है; अतः उसे स्पष्ट करते हैं— सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्धेः ॥४। २।९॥ प्रमाणतः=वेद-प्रमाणसे; च=और; तथोपलब्धेः=वैसी उपलब्धि होनेसे भी (यही सिद्ध होता है कि); सूक्ष्मम्=(जिसमें जीवात्मा स्थित होता है वह) भूतसमुदाय सूक्ष्म है। व्याख्या—मरणकालमें जिस आकाशादि भूतसमुदायमें सबके सहित जीवात्माका स्थित होना कहा गया है, वह भूतसमुदाय सूक्ष्म है, स्थूल नहीं है*—यह बात श्रुतिके प्रमाणसे तो सिद्ध है ही, प्रत्यक्ष उपलब्धिसे भी सिद्ध होती है; क्योंकि श्रुतिमें जहाँ परलोक-गमनका वर्णन किया गया है, वहाँ कहा है— शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका। तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ 'इस जीवात्माके हृदयमें एक सौ एक नाडियाँ हैं, उनमेंसे एक कपालकी ओर निकली हुई है, इसीको सुषुम्णा कहते हैं, उसके द्वारा ऊपर जाकर मनुष्य अमृतभावको प्राप्त होता है, दूसरी नाडियाँ मरणकालमें नाना योनियोंमें ले जानेवाली होती हैं।' (छा० उ० ८।६।६) इसमें जो नाडीद्वारा निकलकर जानेकी बात कही है, यह सूक्ष्म भूतोंमें स्थित जीवात्माके लिये ही सम्भव है; तथा मरणकालमें समीपवर्ती मनुष्योंको

  • यह विषय सूत्र १।४।२ में भी देखना चाहिये।

४३० वेदान्त-दर्शन [ पाद २

४३० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ उसका निकलना नेत्रेन्द्रिय आदिसे दिखलायी नहीं देता। इससे भी उन भूतोंका सूक्ष्म होना प्रत्यक्ष है। इस प्रकार श्रुतिप्रमाण और प्रत्यक्ष प्रमाणसे भी उस भूतसमुदायका सूक्ष्म होना सिद्ध होता है। सम्बन्ध— प्रकारान्तरसे उसी बातको सिद्ध करते हैं— नोपमर्देनातः ॥ ४।२।१०॥ अतः=वह भूतसमुदाय सूक्ष्म होता है, इसीलिये; उपमर्देन=इस स्थूल शरीरका दाह आदिके द्वारा नाश कर देनेसे; न=उसका नाश नहीं होता। व्याख्या— मरणकालमें जीवात्मा जिस आकाशादि भूत-समुदायरूप शरीरमें स्थित होता है, वह सूक्ष्म है; इसीलिये इस स्थूल शरीरका दाह आदिके द्वारा नाश कर देनेसे भी उस सूक्ष्म शरीरका कुछ नहीं बिगड़ता। जीवात्मा सूक्ष्म शरीरके साथ इस स्थूल शरीरसे निकल जाता है, इसीलिये इस स्थूल शरीरका दाह-संस्कार करनेपर भी जीवात्माको किसी प्रकारके कष्टका अनुभव नहीं होता। सम्बन्ध— उपर्युक्त कथनकी ही पुष्टि करते हुए कहते हैं— अस्यैव चोपपत्तेरेष ऊष्मा॥ ४।२।११॥ एषः=यह; ऊष्मा=गरमी (जो कि जीवित शरीरमें अनुभूत होती है); अस्य एव=इस सूक्ष्म शरीरकी ही है; उपपत्तेः=युक्तिसे; च=भी (यह बात सिद्ध होती है; क्योंकि सूक्ष्म शरीरके निकल जानेपर स्थूल शरीर गरम नहीं रहता)। व्याख्या— सूक्ष्म शरीरसहित जीवात्मा जब इस स्थूल शरीरसे निकल जाता है, उसके बाद इसमें गरमी नहीं रहती, स्थूल शरीरके रूप आदि लक्षण वैसे-के-वैसे रहते हुए ही वह ठंडा हो जाता है। इस युक्तिसे भी यह बात समझी जा सकती है कि जीवित शरीरमें जिस गरमीका अनुभव होता है, वह इस सूक्ष्म शरीरकी ही है। अतएव इसके निकल जानेपर वह नहीं रहती।

सूत्र १२-१३ ] अध्याय ४ ४३१

सूत्र १२-१३ ] अध्याय ४ ४३१ सम्बन्ध—जिनके समस्त संकल्प यहीं नष्ट हो चुके हैं, जिनके मनमें किसी प्रकारकी वासना शेष नहीं रही, जिनको इसी शरीरमें परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति हो गयी है, उनका ब्रह्मलोकमें गमन होना सम्भव नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उनके गमनका निषेध है। इस बातको दृढ़ करनेके लिये पूर्वपक्ष उपस्थित करके उसका उत्तर दिया जाता है— प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात् ॥ ४ । २ । १२ ॥ चेत्=यदि कहो; प्रतिषेधात्=प्रतिषेध होनेके कारण (उसका गमन नहीं होता); इति न=तो यह ठीक नहीं; शारीरात्=क्योंकि उस प्रतिषेध- वचनके द्वारा जीवात्मासे प्राणोंको अलग होनेका निषेध किया गया है। व्याख्या—पूर्वपक्षकी ओरसे कहा जाता है कि 'जो कामनारहित, निष्काम, पूर्णकाम और केवल परमात्माको ही चाहनेवाला है, उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते' (बृह० उ० ४।४।६)। इस श्रुतिमें कामनारहित, महापुरुषकी गतिका अभाव बताया जानेके कारण यह सिद्ध होता है कि उसका ब्रह्मलोकमें गमन नहीं होता, किंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उक्त श्रुतिमें जीवात्मासे प्राणोंके अलग होनेका निषेध है, न कि शरीरसे। अतः इससे गमनका निषेध सिद्ध नहीं होता, अपितु जीवात्मा प्राणोंके सहित ब्रह्मलोकमें जाता है, इसी बातकी पुष्टि होती है। सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सिद्धान्ती कहते हैं— स्पष्टो ह्येकेषाम् ॥ ४ । २ । १३ ॥ एकेषाम्=एक शाखावालोंकी श्रुतिमें; स्पष्टः=स्पष्ट ही शरीरसे प्राणोंके उत्क्रमण न होनेकी बात कही है; हि=इसलिये (यही सिद्ध होता है कि उसका गमन नहीं होता)। व्याख्या—एक शाखाकी श्रुतिमें स्पष्ट ही यही बात कही गयी है कि 'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति'—'उस आप्तकाम महापुरुषके प्राण उत्क्रमण नहीं करते, वहीं विलीन हो जाते हैं; वह ब्रह्म होकर ही ब्रह्मको प्राप्त होता

४३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

४३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ है।' (नृसिंहो० ५) इसके सिवा, बृहदारण्यकोपनिषद्के अगले मन्त्रमें यह भी कहा है कि 'अत्र ब्रह्म समश्नुते'—'वह यहीं ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है' (बृह० उ० ४।४।७)। दूसरी श्रुतिमें यह भी बताया गया है कि— विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र। तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ 'यह जीवात्मा समस्त प्राण, पाँचों भूत तथा अन्तःकरण और इन्द्रियोंके सहित जिसमें प्रतिष्ठित है, उस परम अविनाशी परमात्माको जो जान लेता है, हे सोम्य! वह सर्वज्ञ महापुरुष उस सर्वरूप परमात्मामें प्रविष्ट हो जाता है' (प्र० उ० ४।११)। इन सब श्रुतिप्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि उस महापुरुषका लोकान्तरमें गमन नहीं होता। तथा जीवात्मासे प्राणोंके उत्क्रमणके निषेधकी यहाँ आवश्यकता भी नहीं है; इसलिये उस श्रुतिके द्वारा जीवात्मासे प्राणोंके अलग होनेका निषेध मानना असंगत है। सम्बन्ध—स्मृति-प्रमाणसे उसी बातको दृढ़ करते हैं— स्मर्यते च॥ ४।२।१४॥ च=तथा; स्मर्यते=स्मृतिसे भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या—'जिसका मोह सर्वथा नष्ट हो गया है, ऐसा स्थितप्रज्ञ ब्रह्मवेत्ता ब्रह्ममें स्थित रहता हुआ न तो प्रियको पाकर हर्षित होता है और न अप्रियको पाकर उद्विग्न ही होता है१ (गीता ५।२०)। 'जिनके पाप सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, जो सब प्राणियोंके हितमें संलग्न हैं तथा जिनके समस्त संशय नष्ट हो चुके हैं, ऐसे विजितात्मा महापुरुष शान्त ब्रह्मको प्राप्त हैं'२ (गीता ५। २५)। 'उनके सब ओर ब्रह्म ही बरतता है'३ १-न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः॥ २-लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥ ३-अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥

सूत्र १५ ] अध्याय ४ ४३३

सूत्र १५ ] अध्याय ४ ४३३ (गीता ५।२६)। इस प्रकार स्मृतिमें जगह-जगह उन महापुरुषोंका जीवनकालमें ही ब्रह्मको प्राप्त होना कहा गया है तथा जहाँ गमनका प्रकरण आया है, वहाँ शरीरसे समस्त सूक्ष्म तत्त्वोंको साथ लेकर ही गमन करनेकी बात कही है (१५।७)। इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि जिन महापुरुषोंको जीवनकालमें ही परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है, उनका किसी भी परलोकमें गमन नहीं होता है। सम्बन्ध— जो महात्मा जीवनकालमें परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं, वे यदि परलोकमें नहीं जाते तो शरीरनाशके समय कहाँ रहते हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तानि परे तथा ह्याह॥ ४।२।१५॥ तानि=वे प्राण, अन्तःकरण, पाँच सूक्ष्मभूत तथा इन्द्रियाँ सब-के- सब; परे = उस परब्रह्ममें (विलीन हो जाते हैं); हि = क्योंकि; तथा = ऐसा ही; आह = श्रुति कहती है। व्याख्या—जो महापुरुष जीवनकालमें ही परमात्माको प्राप्त हो जाता है, वह एक प्रकारसे निरन्तर उस परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित रहता है; उससे कभी अलग नहीं होता तो भी लोकदृष्टिसे शरीरमें रहता है, अतः जब प्रारब्ध पूरा होनेपर शरीरका नाश हो जाता है, उस समय वह शरीर, अन्तःकरण और इन्द्रिय आदि सब कलाओंके सहित उस परमात्मामें ही विलीन हो जाता है। श्रुतिमें भी यही कहा है—'उस महापुरुषका जब देहपात होता है, उस समय पंद्रह कलाएँ और मनसहित समस्त इन्द्रियोंके देवता—ये सब अपने-अपने अभिमानी देवताओंमें स्थित हो जाते हैं, उनके साथ जीवन्मुक्तका कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसके बाद विज्ञानमय जीवात्मा, उसके समस्त कर्म और उपर्युक्त सब देवता—ये सब-के-सब परब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं' (मु० उ० ३।२।७)।*

  • यह मन्त्र सूत्र १।४।२१ की व्याख्यामें आ गया है।

४३४ वेदान्त-दर्शन [पाद २

४३४ वेदान्त-दर्शन [पाद २ सम्बन्ध - शरीरसम्बन्धी सब तत्त्वोंके सहित वह महापुरुष उस परमात्मामें किस प्रकार स्थित होता है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं- अविभागो वचनात् ॥ ४ । २ । १६ ॥ वचनात् = श्रुतिके कथनसे (यह मालूम होता है कि); अविभागः = विभाग नहीं रहता। व्याख्या - मरणकालमें साधारण मनुष्योंका जीवात्माके सहित उस परमदेवमें स्थित होना कहा गया है तथा अपने-अपने कर्मानुसार भिन्न- भिन्न योनियोंमें कर्मफलका उपभोग करनेके लिये वहाँसे उनका जाना भी बताया गया है (क० उ० २।५।७)। इसलिये प्रलयकी भाँति परमात्मामें स्थित होकर भी वे उनसे विभक्त ही रहते हैं; किंतु यह ब्रह्मज्ञानी महापुरुष तो सब तत्त्वोंके सहित यहीं परमात्मामें लीन होता है; अतः विभागरहित होकर अपने परम कारणभूत ब्रह्ममें मिल जाता है। श्रुति भी ऐसा ही वर्णन करती है- 'जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपना-अपना नाम-रूप छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ज्ञानी महात्मा नाम-रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परमपुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है।'* (मु० उ० ३।२।८) सम्बन्ध-ब्रह्मलोकमें जानेवालोंकी गतिका प्रकार बतानेके उद्देश्यसे प्रकरण आरम्भ करके सातवें सूत्रमें यह सिद्ध किया गया कि मृत्युकालमें प्राण, मन और इन्द्रियोंके सहित जीवात्मा स्थूल शरीरसे निकलते समय सूक्ष्म पाँच भूतोंके समुदायरूप सूक्ष्म शरीरमें स्थित होता है। यहाँतक तो साधारण मनुष्यके समान ही विद्वान्की भी गति है। उसके बाद आठवें सूत्रमें यह निर्णय किया गया कि साधारण मनुष्य तो सबके कारणरूप परमेश्वरमें प्रलयकालकी भाँति स्थित होकर परमेश्वरके विधानानुसार कर्मफलभोगके लिये दूसरे शरीरमें चले जाते हैं, किंतु

  • यह मन्त्र सूत्र १।३।२ की व्याख्यामें अर्थसहित आ गया है।

सूत्र १७ ] अध्याय ४ ४३५

सूत्र १७ ] अध्याय ४ ४३५ ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मलोकमें जाता है। फिर प्रसंगवश नवेंसे ग्यारहवें सूत्रतक सूक्ष्म शरीरकी सिद्धि की गयी और बारहवेंसे सोलहवेंतक, जिन महापुरुषोंको जीवनकालमें ही ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है, वे ब्रह्मलोकमें न जाकर यहीं ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं, यह निर्णय किया गया; अब इस सत्रहवें सूत्रसे ब्रह्मलोकमें जानेवाले विद्वान्‌की गतिके विषयमें पुनः विचार आरम्भ करते हैं। सूक्ष्म शरीरमें स्थित होनेके अनन्तर वह विद्वान् किस प्रकार ब्रह्मलोकमें जाता है, यह बतानेके लिये अगला प्रकरण प्रस्तुत किया जाता है— तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात्तच्छेषगत्य- नुस्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया॥ ४। २। १७॥ (स्थूल शरीरसे निकलते समय) तदोकोऽग्रज्वलनम्=उस जीवात्माका निवासस्थान जो हृदय है, उसके अग्रभागमें प्रकाश हो जाता है; तत्प्रकाशित- द्वारः=उस प्रकाशसे जिनके निकलनेका द्वार प्रकाशित हो गया है, ऐसा वह विद्वान् ; विद्यासामर्थ्यात्=ब्रह्मविद्याके प्रभावसे; च=तथा; तच्छेषगत्यनुस्मृति- योगात्=उस विद्याका शेष अंग जो ब्रह्मलोकमें गमन है, उस गमनविषयक संस्कारकी स्मृतिके योगसे; हार्दानुगृहीतः=हृदयस्थ परमेश्वरकी कृपासे अनुगृहीत हुआ; शताधिकया=एक सौ नाड़ियोंसे अधिक जो एक (सुषुम्णा) नाडी है, उसके द्वारा (ब्रह्मरन्ध्रसे निकलता है)। व्याख्या—श्रुतिमें मरणासन्न मनुष्यके समस्त इन्द्रिय, प्राण तथा अन्तः- करणके लिंगशरीरमें एक हो जानेकी बात कहकर हृदयके अग्रभागमें प्रकाश होनेका कथन आया है* (बृह० उ० ४। ४। २) तथा साधारण मनुष्य और ब्रह्मवेत्ताके निकलनेका रास्ता इस प्रकार भिन्न-भिन्न बताया है कि 'हृदयसे सम्बद्ध एक सौ एक नाड़ियाँ हैं, उनमेंसे एक मस्तककी ओर निकली है, उसके द्वारा ऊपरकी ओर जानेवाला विद्वान् अमृतत्वको प्राप्त होता है,

  • 'तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति।' 'इसके उस हृदयका अग्रभाग प्रकाशित होने लगता है, उसीसे यह आत्मा निकलता है।'

[ पाद २

४३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ शरीरसे जाते समय अन्य नाडियाँ इधर-उधरके मार्गसे नाना योनियोंमें ले जानेवाली होती है',१ (छा० उ० ८। ६। ६) इन श्रुतिप्रमाणोंसे यही निश्चय होता है कि मरणकालमें वह महापुरुष हृदयके अग्रभागमें होनेवाले प्रकाशसे प्रकाशित ब्रह्मरन्ध्रके मार्गसे इस स्थूल शरीरके बाहर निकलता है और ब्रह्मविद्याके प्रभावसे उसके फलस्वरूप ब्रह्मलोककी प्राप्तिके संस्कारकी स्मृतिसे युक्त हो हृदयस्थित सर्वसुहृद् परब्रह्म परमेश्वरसे अनुगृहीत हुआ सूर्यकी रश्मियोंमें चला जाता है। सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— रश्म्यनुसारी ॥ ४।२।१८ ॥ रश्म्यनुसारी = सूर्यकी रश्मियोंमें स्थित हो उन्हींका अवलम्बन करके (वह सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है)। व्याख्या—'इस स्थूल शरीरसे बाहर निकलकर वह जीवात्मा इन सूर्यकी रश्मियोंद्वारा ऊपर चढ़ता है, वहाँ 'ॐ' ऐसा कहता हुआ जितनी देरमें मन जाता है, उतने ही समयमें सूर्यलोकमें पहुँच जाता है, यह सूर्य ही विद्वानोंके लिये ब्रह्मलोकमें जानेका द्वार है, यह अविद्वानोंके लिये बंद रहता है; इसलिये वे नीचेके लोकोंमें जाते हैं',२ (छा० उ० ८।६।५)। इस श्रुतिके कथनसे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मरन्ध्रके मार्गद्वारा स्थूल शरीरसे बाहर निकलकर ब्रह्मवेत्ता सूर्यकी रश्मियोंमें स्थित होकर उन्हींका आश्रय ले सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है; उसमें उसको विलम्ब नहीं होता। सम्बन्ध—रात्रिके समय तो सूर्यकी रश्मियाँ नहीं रहतीं, अतः यदि १-यह मन्त्र ४।२।९ की व्याख्यामें अर्थसहित आ गया है। २-'अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद् वा मीयते स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद् वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम्॥'

सूत्र १९ ] अध्याय ४ ४३७

सूत्र १९ ] अध्याय ४ ४३७ किसी ज्ञानीका देहपात रात्रिके समय हो तो उसका क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— निशि नेति चेन्न सम्बन्धस्य यावद्देहभावित्वा- दर्शयति च॥ ४।२।१९॥ चेत्=यदि कहो कि; निशि=रात्रिमें; न=सूर्यकी रश्मियोंसे नाडीद्वारा उसका सम्बन्ध नहीं होता; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं; (हि)=क्योंकि; सम्बन्धस्य=नाडी और सूर्य-रश्मियोंके सम्बन्धकी; यावद्देहभावित्वात्=जब- तक शरीर रहता है; तबतक सत्ता बनी रहती है, इसलिये (दिन हो या रात, कभी भी नाडी और सूर्य-रश्मियोंका सम्बन्ध विच्छिन्न नहीं होता); दर्शयति च=यही बात श्रुति भी दिखाती है। व्याख्या—यदि कोई ऐसा कहे कि रात्रिमें देहपात होनेपर नाड़ियोंसे सूर्य-किरणोंका सम्बन्ध नहीं होगा, इसलिये उस समय मृत्युको प्राप्त हुआ विद्वान् सूर्यलोकके मार्गसे गमन नहीं कर सकता, तो उसका यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें कहा है कि—'इस सूर्यकी ये रश्मियाँ इस लोकमें और उस सूर्यलोकमें—दोनों जगह गमन करती हैं, वे सूर्यमण्डलसे निकलती हुई शरीरकी नाडियोंमें व्याप्त हो रही हैं तथा नाडियोंसे निकलती हुई सूर्यमें फैली हुई हैं।'* (छा० उ० ८।६।२) इसलिये श्रुतिके इस कथनानुसार जबतक शरीर रहता है, तबतक हर जगह और हर समय सूर्यकी रश्मियाँ उसकी नाडियोंमें व्याप्त रहती हैं; अतः किसी समय भी देहपात होनेपर सूक्ष्म शरीरसहित जीवात्माका नाड़ियोंके द्वारा तत्काल सूर्यकी रश्मियोंसे सम्बन्ध होता है और वह विद्वान् सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है। सम्बन्ध—क्या दक्षिणायनकालमें मरनेपर भी विद्वान् ब्रह्मलोकमें चला जाता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

  • एता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥

४३८ वेदान्त-दर्शन [पाद २

४३८ वेदान्त-दर्शन [पाद २ अतश्चायनेऽपि दक्षिणे ॥ ४।२।२०॥ अतः = इस पूर्वमें कहे हुए कारणसे; च = ही; दक्षिणे = दक्षिण; अयने = अयनमें; अपि = (मरनेवालेका) भी (ब्रह्मलोकमें गमन हो जाता है)। व्याख्या - पूर्वसूत्रके कथनानुसार जिस प्रकार रात्रिके समय सूर्यकी रश्मियोंसे सम्बन्ध हो जानेमें कोई बाधा नहीं होती, उसी प्रकार दक्षिणायन कालमें भी कोई बाधा न होनेसे वह विद्वान् सूर्यलोकके मार्गसे जा सकता है। इसलिये यही समझना चाहिये कि दक्षिणायनके समय शरीर छोड़कर जानेवाला महापुरुष भी ब्रह्मविद्याके प्रभावसे सूर्यलोकके द्वारसे तत्काल ब्रह्मलोकमें पहुँच जाता है। भीष्म आदि महापुरुषोंके विषयमें जो उत्तरायणकालकी प्रतीक्षाका वर्णन आता है उसका आशय यह हो सकता है कि भीष्मजी वसु देवता थे, उनको देवलोकमें जाना था और दक्षिणायनके समय देवलोकमें रात्रि रहती है। इसलिये वे कुछ दिनोंतक प्रतीक्षा करते रहे। सम्बन्ध - यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'हे अर्जुन! जिस कालमें शरीर त्यागकर गये हुए योगीलोग पीछे न लौटनेवाली और पीछे लौटनेवाली गतिको प्राप्त होते हैं, वह काल मैं तुझे बतलाता हूँ' (गीता ८।२३)- इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण आदि कालको तो अपुनरावृत्तिकारक बताया गया है तथा रात्रि और दक्षिणायन आदिको पुनरावृत्तिका काल नियत किया गया है; फिर यहाँ कैसे कहा गया कि रात्रि और दक्षिणायनमें भी देहत्याग करनेवाला विद्वान् ब्रह्मलोकमें जा सकता है? इसपर कहते हैं- योगिनः प्रति च स्मर्यते स्मार्ते चैते ॥ ४।२।२१॥ च = इसके सिवा; योगिनः = योगीके; प्रति = लिये (यह कालविशेषका नियम); स्मर्यते = स्मृतिमें कहा जाता है; च = तथा; एते = (वहाँ कहे हुए) ये अपुनरावृत्ति और पुनरावृत्तिरूप दोनों मार्ग; स्मार्ते = स्मार्त हैं। व्याख्या - गीतामें जिन दो गतियोंका वर्णन है, वे स्मार्त अर्थात्

सूत्र २१ ] अध्याय ४ ४३९

सूत्र २१ ] अध्याय ४ ४३९ श्रुतिवर्णित मार्गसे भिन्न हैं। इसके सिवा वे योगीके लिये कहे गये हैं। इस प्रकार विषयका भेद होनेके कारण वहाँ आवृत्ति और अनावृत्तिके लिये नियत किये हुए कालविशेषसे इस श्रुतिनिरूपित गतिमें कोई विरोध नहीं आता। जो लोग गीताके श्लोकोंमें काल शब्दके प्रयोगसे दिन, रात, शुक्लपक्ष, कृष्णपक्ष, उत्तरायण, दक्षिणायन— इन शब्दोंको कालवाचक मानकर उनसे कालविशेषको ही ग्रहण करते हैं, उन्हींके लिये यह समाधान किया गया है; किंतु यदि उन शब्दोंका अर्थ लोकान्तरमें पहुँचानेवाले उन-उन कालोंके अभिमानी देवता मान लिया जाय तो श्रुतिके वर्णनसे कोई विरोध नहीं है। दूसरा पाद सम्पूर्ण

तीसरा पाद

तीसरा पाद दूसरे पादमें यह बताया गया कि ब्रह्मलोकमें जानेके मार्गका आरम्भ होनेसे पूर्वतककी गति (वाणीका मनमें लय होना आदि) विद्वान् और अविद्वान् दोनोंके लिये एक समान हैं; फिर अविद्वान् कर्मानुसार संसारमें पुनः नूतन शरीर ग्रहण करता है और ज्ञानी महापुरुष ज्ञानसे प्रकाशित मोक्षनाडीद्वारका आश्रय ले सूर्यकी रश्मियोंद्वारा सूर्यलोकमें पहुँचकर वहाँसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है। रात्रि और दक्षिणायन-कालमें भी विद्वान्‌की इस ऊर्ध्वगतिमें कोई बाधा नहीं आती; किंतु ब्रह्मलोकमें जानेका जो मार्ग है, उसका वर्णन कहीं अर्चिमार्ग, कहीं उत्तरायणमार्ग और कहीं देवयानमार्गके नामसे किया गया है तथा इन मार्गोंके चिह्न भी भिन्न-भिन्न बताये गये हैं। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उपासना और अधिकारीके भेदसे ये मार्ग भिन्न-भिन्न हैं या एक ही मार्गके ये सभी नाम हैं? इसके सिवा, मार्गमें कहीं तो नाना देवताओंके लोकोंका वर्णन आता है, कहीं दिन, पक्ष, मास, अयन और संवत्सरका वर्णन आता है और कहीं केवल सूर्यरश्मियों तथा सूर्यलोकका ही वर्णन आता है; यह वर्णनका भेद एक मार्ग माननेसे किस प्रकार संगत होगा ? अतः इस विषयका निर्णय करनेके लिये तीसरा पाद तथा अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ॥ ४। ३। १॥ अर्चिरादिना = अर्चिसे आरम्भ होनेवाले एक ही मार्गसे ( ब्रह्मलोकको जाते हैं); तत्प्रथितेः = क्योंकि ब्रह्मज्ञानियोंके लिये यह एक ही मार्ग (विभिन्न नामोंसे) प्रसिद्ध है। व्याख्या — श्रुतियोंमें ब्रह्मलोकमें जानेके लिये विभिन्न नामोंसे जिसका वर्णन किया गया है, वह एक ही मार्ग है, अनेक मार्ग नहीं हैं।