कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
किया, जिसके कि बीचमें बहुत शुद्ध मीठे जलका एक सरोवर भरा हुआ था, मन्द सुगन्ध वायु चल रही थी जहाँ जानसे आत्मा प्रफुल्लित होती थी । फिर साहबने राजासे कहा ऐ राजा ! यहाँसे उत्तर की ओर देखो। कौसी उत्तम फूलवारी और ठण्डे जलसे भरा हुआ सरोवर दिखाई पड़ता है । राजाने कहा, महाराज ! आप यह क्या कहते हैं ? सहस्रों वर्षसे यह बात प्रसिद्ध है । मुझे भी प्रायः अनुभव हुआ है कि, इस पहाड़पर कहीं जल नहीं है आप ऐसी बात न कहिये जो सुनेगा वह हँसेगा एवं कहेगा कि, सद्गुरु झूठ बोलते हैं । उस समय राजाके प्रधानने राजाको समझाया कि, महाराज ! सद्गुरुके बचनको झूठ न जानिये, जो कहते हैं सो कीजिये। इसपर राजा सद्गुरुको दण्डवत् प्रणाम करके सेना सहित इधर उधर जल ढूंढ़ता हुआ उत्तरकी ओर चलता हुआ एक ऐसी जगह पहुँचा जहाँ सद्गुरुके बताये हुये उपवन और सरोवर सुशोभित थे ! वहाँ आम, दाड़िम, केला आदि नाना प्रकारके फलोंसे लदे हुये वृक्ष लगे हुए थे ! जिन्हें कि देखतेही चित्त प्रफुल्लित हो उठता था बार बार सद्गुरुको दण्डवत् नमस्कार करता हुआ धन्यवाद देने लगा कहा कि, हे सद्गुरु ! मेरा अपराध क्षमा करो, भविष्यतमें आपका बचन कभी उल्लंघन न करूँगा । सद्गुरुकी आज्ञा पाय सेना सहित फल फूल इत्यादि खाय जल पीकर शान्त हुआ 'तृषा सबनकी बुझिगई ऐसा निर्मल नीर' कबीर साहबने कहा कि, हे राजन् ! अब चलो, तब राजा कबीर साहबको हाथीपर सवार कराकर आपभी सवार हो सेना सहित राजधानीको चला । थोड़ी दूर आगे जाकर पीछे फिरके देखनेसे उसी स्थानपर जहाँ कि तलाव और बाग था, धूलही उड़ती हुई दिखाई दी ।
धन्य कबीर सरोवर रची, छूतहिं लीन जवाय ॥
जहंको जलले आयऊं, तहंको दीन पठाय ॥
सब लोग नगरमें पहुँचे, राजाने अन्तःपुरमें जाकर रानीसे आखेटका सब वृत्तान्त कहा । रानीने अत्यन्त श्रद्धा प्रेमके साथ सद्गुरुको दण्डवत् किया, राजाने साहबकी दीक्षा ली । पीछे राजाने सद्गुरुसे कहा कि, हे प्रभु ! मुझे अपना लोक दिखाइये । राजाको लेकर सद्गुरु सत्यलोकको चले, मार्गमें यमदूतोंने आकर राह रोकी और कहा कि, आप राजाको लेकर कहाँ चले ? कबीर साहबने दूतोंको समझाया कि, यह जीव सत्य पुरुषका स्वरूप पागया है । इतना सुनतेही यमदूत भाग गये, तब राजा वीरसिंहको सद्गुरु सब लोक दिखाने लगे, सत्य लोकको लेगये, वहाँ सत्यपुरुषका दर्शन कराया । राजा वहाँकी आनन्दशोभाको देखकर अत्यन्त मोहित होगया, यहाँ तक कि, जब सद्गुरुने उसे पीछे चलनेको
कहा, तब सद्गुरुके चरणोंपर पड़कर विनय करने लगा कि, हे प्रभु ! मुझे यहाँ ही रहने दीजिये । तब सद्गुरुने समझाया कि, जब तुम्हारी आयु पूरी हो जावेगी तब यहाँ आकर वास करना । पृथ्वी पर आकर राजाने सद्गुरुसे कहा, हे बन्दी छोर ! अब तक मैं यही जानता था कि, जैसे और सब साधु हैं वैसे आपभी हो परन्तु अब जान लिया कि, आप साक्षात् सत्यपुरुष सर्वशक्तिमान् निर्वाण स्वरूप हो, हे स्वामिन् ! जिस प्रकार मेरे ऊपर कृपा की उसी प्रकार मेरे पुरुषोंको, जो अनेक प्रकारके पाप कर्मोंको करते हुए मृत्युको प्राप्त हुए हैं उन पर भी करिये । सद्गुरुने दया करके राजा सहित अनेक जीवोंका उद्धार किया, यह काल्पनिक नहीं किन्तु ऐतिहासिक बात है ।
नौबाब बिजलीखाँ ।
नौबाब बिजलीखाँबोध नामक ग्रंथ तो मेरे पास नहीं पहुँचा परन्तु यह महाशय कबीर साहबके सुप्रसिद्ध शिष्योंमें एक हैं ये राजा बड़े प्रेमी भक्त और सत्यगुरुसे बड़ा अनुराग रखते थे । मैंने सुना है कि, कबीरसाहबके समयके लिखे हुये ग्रंथ अबतक उनके घरमें पाये जाते हैं । बिजलीखाँके घरानेके लोग सत्यगुरु की भक्ति करते हैं । जहाँ कबीर साहबकी समाधि बनी है वहाँ एक ओर हिन्दू और दूसरी ओर जो मुसलमान शिष्य बिजलीखाँके घरानेके लोग हैं ! दोनों सत्यगुरुका गुण गाते हैं । इसके अतिरिक्त उस देशमें सहृदयः मुसलमान कबीर साहबके भक्त हैं, जो मद मांस आदि निषिद्ध कर्मोंसे सदाही वर्जित हैं, हिन्दू-वैष्णवोंके समान आचार व्यवहार रखते हैं साधुओंसे परम प्रीति करते हैं । गुरु साहबकी बाणीपर पूरी श्रद्धा रखके बड़े प्रेमके साथ नित्य नियमसे पाठ करते हैं । कबीर पन्थके इतिहासमें उनका नाम बड़े आदरके साथ लिया जायगा । कबीर साहिबने इसीके राज्यमें शरीर छोड़ा है, वहाँ बीरसिंह इनकी दो दो चोंचें भी हो गई हैं ।
रविदास ।
जिस समय रविदासजीने कबीर साहिबसे बाद विवाद किया उस समय रविदासजीने अपने मनमें सोचा और समझा कि, मैं जिनको मानता हूँ जिन पर भरोसा रखता हूँ वह तो उस योग्य नहीं हैं । मैं भ्रमसे उसे मानता था । वह सब तो स्वयम् बंध और विवश हैं, मुझको क्या बचा सकते हैं । वाद विवादके अन्तमें रविदासजी कबीर साहबके चरणोंपर गिर कर शिष्य हो गये । इसी प्रकार सहस्रों जब अपनी अपनी मूर्खता तथा अज्ञानतासे विज्ञ हुए भली भाँति समझ लिया तब उनके मनका भ्रम टूट गया उन्होंने कबीर साहबकी शरण ली । यह
बात केवल यह तुच्छ वास तथा अन्यान्य कबीर पन्थी ही नहीं कहते वरन् अन्यान्य जातिके लोग भी लिखते चले आ रहे हैं । देखो किताब "तजकिरा गौसिया २५६ पृष्ठमें" रविदासजीके कबीर साहबका शिष्य होनेका हाल लिखा हुआ है, कितने मुसलमानी धर्मके प्रतिष्ठित महात्मा कबीर साहबकी श्रेष्ठता प्रगट करते आते हैं ।
हस्तावलम्बिनी कञ्जरी ।
कबीर कसोटीमें लिखा हुआ है कि, जब साहबके माहात्म्यकी प्रसिद्धि देश देशमें हुई, लाखों सेवक और शिष्य होगये । पन्थ भली भांति पृथिवीपर प्रचलित हुआ, समीपमें बड़ी भीड़ रहने लगी, उस समय साहबने एक ऐसा अनुपम कौतुक किया कि जिसके देखने तथा सुननेसे समस्त काशी नगरीमें हँसी हुई और प्रशंसाके स्थान आपकी निन्दा होने लगी ।
उपरोक्त घटना सम्बत् १६४५ विक्रमी फाल्गुन सुदी पूर्णिमासीमें है, होलीका दिवस था । उस दिवस कबीर साहब एक बगलमें कञ्जरी, दूसरीमें रविदास भगतको लेकर अपने हाथमें गङ्गाजल भरी हुई बोटल लिये हुए बाजार में से चले । यह कौतुक देखकर बनारसमें बड़ा ठठठा पड़ा, अच्छी धूल उड़ी । चारोंओरसे कबीर साहबकी हँसी मसखरी होने लगी । अब प्रथम उस कञ्जरीका वृत्तान्त सुनो । पूर्वकालमें सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि इत्यादि सभी भक्तोंकी भूमि पर भजन किया करते थे । कारण यह कि, भक्तोंका ऋषीश्वरोंकी तपस्याकी जगह बहुत दिनोंसे चली आई है । एक समय ऋषीश्वर भजन कर रहे थे उसी समय एक बरवर्णिनी अप्सरा आकाशसे उतरी, उसने चाहा कि, मैं इन ऋषीश्वरोंकी परीक्षा करूँ कि, इनको काम सताता है अथवा नहीं ? वह भड़कीले वस्त्र पहनकर लटकती मटकती तपस्वियोंके निकट गई । उन लोगोंने अपने तपके प्रभावसे जान लिया कि, यह दुष्टा हमारी तपस्या नष्ट करने आई है । तब उन लोगोंने उसको शाप दिया कि, तू कञ्जरी हो जा । कारण यह कि, तू हमारा धर्म बिगाड़नेको आई थी । यह शाप सुनकर वह अप्सरा डाढ़ें मारमारकर विलाप करने लगी । उसका हृदयवेधक रोना सुनकर परम दयालु दीनबंधु सद्गुरु कबीर साहब प्रगट हो गये, उससे कहा कि, तू मत रो धैर्य धर, मैं तेरी मुक्ति करूँगा ऋषीश्वरोंका वचन तो सत्य होगा परन्तु तू काशीमें (मेरे समयमें) कञ्जरी होवेगी । यह वही अप्सरा थी जो काशीमें कञ्जरी हुई । इसको साथ लेकर कबीर साहब काशीके बाजारोंमें घूमे तब बनारसके लोग ठठठा करने और ताली बजाने लगे । संन्यासियों तथा ब्राह्मणोंका भली प्रकार दौव घात लगा । बड़ा उपहास तथा निन्दा
करने लगे। जो बड़े बड़े अच्छे वणव सन्त थे वे शिर झुकाकर यही करते कि, ऐसे महात्माका चरित्र समझमें नहीं आता, कितने कुछ और कितने कुछ कहते थे। इसी अवस्थामें कबीर साहब काशिराजके दरबारमें गये, राजाने देखकर सिर नीचा कर लिया। कबीर साहबकी यह अवस्था देखकर बहुतसे शिष्योंका विश्वास ढीला हो गया। ब्राह्मण तथा संन्यासी तालियाँ बजाते हुए कहते थे कि, देखो चार दिनोंके वास्ते कबीर भी भक्त बन बैठे था अब अच्छी कलई खुलगई। कबीर साहब राजा बनारसके सामने इसी स्वरूपमें गये, राजाको शिर झुकाये देखा कि, झट उस बोटलका जल अपने पैर पर ढरका दिया। यह बात देखकर राजाको भय हुआ कि, कहीं साहबने रुष्ट होकर यह जल अपने पैरोंपर तो न ढरकाया हो, राजाने पूछा कि, महाराज? इसका क्या कारण है कि आपने यह जल डाला। रविदासजीने उत्तर दिया कि, जगन्नाथपुरीमें अटकाटूटकर पण्डेके पगोंपर गिर पड़ा, उसका पाँव बहुत जल गया है, इस जलसे कबीर साहबने आरोग्य किया है। उसके पाँव पर यह जल डाल दिया इसके पड़तेही वह अच्छा हो गया है। यह बात सुनकर राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ कि, जगन्नाथपुरी तो काशीसे बड़े अन्तर पर है, वहाँ पहुँच कर कबीर साहबने पण्डेका पैर कैसे चढ़ा किया। उसी समय राजाने दिन तारीख और समय लिख लिया। अपना सौड़नी सवार जगन्नाथपुरी को भेजा कि वह जाकर ठीक २ समाचार लावे। उस समय शाहसिकन्दर लोदी भी काशीमें उपस्थित था, उसनेभी अपने शीघ्रगामी सौड़नी सवारको यह वृत्तान्त जाननेके निमित्त भेजा जिसमें इस बातका भली प्रकार निश्चय हो। दोनों अधीश्वरोंके सौड़नी सवार जगदीशपुरीमें जा पहुँचे, वे उस पण्डेके पास जिसका पाँव जला था गये तो देखा कि, वहाँ कबीर साहब बैठे हैं। सवारोंने कबीर साहब को नमस्कार किया पण्डेसे सब वृत्तान्त पूछा कि, कैसे तुम्हारा पाँव जला एवं किस प्रकार अच्छा हो गया? पण्डेने बताया कि, मैं ठाकुरको भोग लगानेके लिये अटके प्रस्तुत करता था, वह फूटकर मेरे पैर पर पड़ा, मैं जलने लगा, महाराज कबीर साहबने मेरे पाँवपर जल डाल दिया। उस समय मैं चढ़ा हो गया। यह बात सुन पण्डेसे पत्र लिखवाकर दोनों सवार बनारसमें पहुँचे। राजा वीरसिंह तथा शाह शिकन्दरके हाथोंमें दोनोंने पंडेका पत्र दिया, उन्होंने पढ़ा। सवारोंने प्रगट किया कि कबीर साहब तो जैसे यहाँ थे वैसेही पुरुषोत्तमपुरीमें उपस्थित हैं, उनका भेद कुछ जाना नहीं जाता? यह बात जानकर राजा तथा बादशाह दोनोंको विश्वास हो गया। राजा वीरसिंहके मनमें बड़ा भय उत्पन्न हुआ कि, मुझसे महाराजकी अप्रतिष्ठा हुई। अब मैं क्या करूँ किस प्रकार अपना दोष क्षमा
शवपत्र सुदर्शन पांडवोंका सुदर्शनकी श्रेष्ठता दिखाना
कराऊँ । सत्यगुरु तो सर्व त्यागी हैं मुवर्ण तथा चाँदी आदिसे कोई सम्बन्ध नहीं रखते, न किसी वस्तुकी उनको इच्छा है ? तब राजा और रानी दोनों नङ्गे पाव होकर घासका पोला अपने सिरपर धरकर एक अगौछी अपने २ गलमें डाल, आकर सत्यगुरुके चरणोंपर गिर हाथ बांधकर निवेदन करने लगे कि, आप मेरे अपराधको क्षमा करो । कबीर साहबने राजा रानीका बड़ा भारी सम्मान करके कहा कि, हे राजा ! साधुओंके खेल तथा कौतुक जाने नहीं जा सकते, सांसारिक के विचारमें आ नहीं सकते । आप अत्यन्त नम्रतापूर्वक साधु तथा गुरुकी सेवा किया करो । यह कलिकाल महा कठिन समय है, इसमें लोग साधु तथा गुरुकी सेवा नहीं कर सकते । आप किसी बातका ध्यान न करो, यही नहीं सत्यगुरुने राजाके सब अपराध क्षमा कर दिये, राजा सकुटुम्ब कबीर साहबका सेवक बन गया । राजा तथा रानी बिदा होगये तब ब्राह्मण काजी तथा मुल्ला आदि झुके, कबीर साहबको दण्डवत् प्रणाम करके धन्य कबीर ! धन्य कबीर !! कहते हुए बड़ी नम्रताके साथ उनसे मिलने लगे । उस समय जितने कबीर साहबके सेवक शिष्य थे जिनका विश्वास सद्गुरुको कञ्जरीके साथ देखकर ठीला हो गया था, उनका विश्वास पुनः स्थिर होगया, वे सत्यगुरुकी प्रशंसा तथा गुणानुवाद करने लगे, अपनी मूर्खता तथा अदूरदर्शितापर खेद और दुःख करने लगे, अपने बुरे सन्देह करने पर पश्चात्ताप करने लगे बड़ेही लज्जित हुए ।
वह कौतुक जो होलीके दिवस काशीमें कबीर साहबने किया आज दिवस-पर्यन्त होलीके दिवसोंमें पूर्वके मनुष्य हँसी ठठठा करते हुए कबीर बोलते हैं । कञ्जरी सत्यगुरुकी कृपासे हंस कबीरके साथ मिलकर परम धामको पहुँच गई, जिसका सत्यगुरु हाथ पकड़े फिर उसका बुरा नहीं हो सकता ।
भक्त मीराबाई ।
मीराबाईका यह वृत्तात्त भगतमालमें लिखा है कि, मारवाड़ देशके राजाकी पुत्री थी, मीराकी माता ठाकुर पूजन किया करती थी एक दिवस किसी की बरात आई तो दुल्हा देखनेको सब चले, मीराकी माता अटारीपर चढ़ी देख रही थी । छोटी बालिका मीरा भी अपनी माताके साथ दुल्हा देखनेको गई । मीराने अपनी मातासे पूछा कि, हे माता ! मेरा दुल्हा कहाँ है ? तब मीराकी माँने हँसकर कहा कि, तेरा दुल्हा तो गिरधरलाल है । उसी दिनसे मीराको गिरधरलालसे बड़ा प्रेम हुआ । गिरधरलालकी मूर्तिको एक पेटारीमें रखकर बड़े चावसे पूजने लगी । गिरधरलालमें पूर्ण आसक्त होगई । मीराका उदयपुरके राना के साथ विवाह हुआ । विवाहके पीछे दुरागवन (गर्वने) में अपने घर (श्वशुरा-
लय) गई। मीराका पूर्ण प्रेम तो गिरधरलालसे था ही इस कारण साधुओंकी सेवा करना तथा गाना नाचना यही उसका मुख्य काम था। मीराकी यह दशा देखकर राना उदयपुरने बहुत मना किया कि, मीरा ! तू मेरी पत्नी होकर साधुओं में न जायाकर, इसमें मेरी नाम हँसाई होती है। यद्यपि रानाजीने बहुतेरा मना किया पर मीराने एक भी नहीं मानी साधुओंके पास आने जानेसे नहीं रुकी। अन्तमें रानाने मीराकी भक्तिसे घबराकर विषका प्याला भेजा एवं कहलाया कि, यह ठाकुरका चरणामृत है, तू पी तेरा कल्याण होजायगा। मीरा उसे प्रसन्नतापूर्वक * पीगई, वह (विष) अमृत होगया, अब तो मीरा और भी अधिक प्रेम और उत्साहसे नाचने गाने लगी, भगवान्की भक्ति करने लगी। फिर रानाने साँप भेजा वह साँप जब मीराके समीप पहुँचा उसने गलेमें डाल दिया जिससे वह फूलकी माला बनगया। फिर रानाने शेर छोड़ा वह भी मीराके सामने माथा टेके कर चला गया। मीराने देखा कि, अब मुझको रानाके घर रहना उचित नहीं है तब तीर्थके निमित्त निकल गई। मीराके जानेके पीछे उदयपुरके देशमें काल पड़ गया, लोग भूखसे मरने लगे, रानाने मीराको बुलाना चाहा, अपने कारबारियोंको भेजा कि, मीराको कह सुनकर ले आवें। कारबारियोंने बहुत कुछ कहा पर मीराने एकभी न सुना और कहा कि, अब मुझे भगवान् गिरधर लालके चरणोंको छोड़कर कहीं भी जाना नहीं चाहिये।
इस मीराने भक्ति तथा प्रेमका कर्तव्य पूर्णतया पालन किया। इसलिये उसको कबीर गुरु मिले। वह सत्यगुरुका हंस होकर जब परमधामको चली उस समय वह सशरीर विलोपित हो गई। किसीको तनिक भी सुधि नहीं मिली कि, मीरा कहाँ चली गई। श्रीकृष्णकी उपासना करनेमें जो परम प्रेम प्रगट किया तो उसको सत्यगुरु मिल गये और उसका काम पूरा हो गया। जिसको पति माना था अपने शरीरको भी उसीमें मिला दिया।
- मीराने विषका प्याला पीते समय जो भजन गाया था, पाठकगणके विनोदके लिये यहाँ लिखता हूँ—रानाजी जहर दियो मैं जानी ॥ जिन हरि मेरो नाम निबेज्यो; छन्यो दूध अरु पानी। जब लगि कंचन कसियत नाही होत न बाहिर वानी ॥ अपने कुलको परदा करियो, हम अवला वीरानी ॥ श्वपच भक्त धारौं तन मन, जैहों हौं हरि हाथ बिकानी ॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर, सन्त चरण लपटानी ॥ १ ॥ हमारे मन राधा श्याम वसी ॥ कोई कहे मीरा भई बावरी, कोई कहे कुलनासी ॥ खोलिके घूँघट पारिकैं गाती, हरि ढिग नाचत गली ॥ बुन्दावनकी कुंजगलिनमें भाल, तिलक उर लसी ॥ विषको प्याला रानाजी भेज्यो, पीवत मीरा हँसी ॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर, भक्तिमार्गमें फँसी ॥
सोरठा—मीरा यह पद गाय, विष प्याला पी हरि भज्यो।
गयो सो गरल विहाब, नशा न कीन्हयो नैकहू ॥
शाह सिकन्दर लोदीकी दीक्षा ।
शाहसिकन्दरने कबीर साहबके अनेक कौतुक देखे। जब उसको निश्चय होगया कि, यह कबीर साहब पृथ्वी तथा आकाशके बीच सच्चे गुरु हैं दूसरा कोई नहीं, तब वह सत्यगुरुकी शरण लेकर संसार सागरके पार उतर गया । शाह सिकन्दर तो पहलेही कौतुक पर विश्वास कर चुका था। फिर उसने इतने कौतुक देखे तब उसका विश्वास और भी दृढ़ हो गया । उसको भली भाँति मालूम हो चुका कि, कबीरही स्वयम् सत्यपुरुष परमात्मा हैं । सिवा कबीरके दूसरा कोई नहीं है इस बादशाहका विश्वास जैसा सच्चा हुआ वैसाही उसको फल मिला अर्थात् सत्यगुरु का प्यारा भक्त हुआ सच्चे धामका अधिकारी हुवा । कमाल बोधमें लिखा हुवा है कि —
रमैनी — शाह सिकन्दर शरना^१^ लीना । चौकाकर^२^ परवाना^३^ दीना ॥
भय मुरीद^४^ कबीरके आई । ताते सद्गुरु नाम फिराई ॥
शाह सिकन्दर दिल्ली आये । मुल्ला काजी वचन सुनाये ॥
शेख तक्री है शाहको पीरा । सब मिली कियो उन्हींसे जोरा^५^ ॥
ऐसा इल्म शाहको दीना । मुरीद तुम्हारे बहका^६^ लीना ॥
चले हैं काजी शाह दबार । शाहसे पूछे ज्ञान विचारा ॥
काजी मुल्ला वचन ।
कहो शाह तुम कह मत^७^ पाई । कैसे अपना इसिम फिराई ॥
चार बिहिश्त^८^ अल्ला फ़रमाये । उनको छोड़ आगे कहँ जावे ॥
दीनका मारग अहदसे^९^ पाई । सो तुम कैसे दीन मिटाई ।
दीन दुनीका^१०^ तुम सरदारू । कैसे भई अकिल तुमारू^११^ ॥
काफ़िरके^१२^ मुरीद तुम होई । दीनके घर कहँ टट परोई ॥
शाह सिकन्दर वचन ।
शाह कहे काजी और मुलाना । झूठी दीन दुनी फरमाना^१३^ ॥
दीनका जो घर उरे ले आई । बिन जाने तुम असल बताई ॥
किन वैकुण्ठ बिहिश्त बनाई । वेद कितेब^१४^ कहाँ ते आई ॥
कहो खुदाय कौन घर बासा । तन^१५^ छूटे कहँ होये निवासा ॥
साखी — सुने सुने तुम सब कहो, नहिं देखा दीदार^१६^ ।
पीर औलिया देखि सब, सद्गुरु^१७^ खेल अपार^१८^ ॥
१ शरण, २ चौकापूर्वकदीक्षा देकर, ३ सत्यलोकका ओडार, ४ सेवक, ५ आग्रह, ६ भुला, ७ बुद्धि, ८ स्वर्ग । ९ शर्त, १० संसार, ११ तुम्हारी, १२ ईश्वर, न माननेवाले, १३ कथन, १४ किताब, १५ शरीर, १६ दर्शन, १७ कबीर, १८ अनगिनत,
रमैनी – जमुना तीर पे आसन मारी । बैठे पीर मुरीद^१^ दोऊ पारी ॥
काजी मुल्ला लियउ बुलाई । शेख तक्की तहवां चलि आई ॥
शेख कहै तुम जुल्म जो कीन्हा । फेर मुरीद मेरा क्यों लीन्हा ॥
शेख कहै मुने मतिधीरा । जुल्म कीन्ह तुम दास कबीरा ॥
काजी कह तुम क्या मतपावा । शाहको सदा^२^ कौन सिखलावा ॥
निराकार जो कितेब बखाना । नूर^३^ जोति बाको सब जाना ॥
यही है खुद कि, और निनारा^४^ । ताको हमसे कहो विचारा ॥
साखी – शाहको किमि^५^ समझायो, सबहि दीन सरदार ॥
दोनों राह^६^ कैसे मिटे, यह कुछ बात अपार ॥
कबीर बचन ।
रमैनी – निरंकार है खुदका कीना । इनको तीन लोक जो दीना ॥
इन्हों रचे हैं वेद कितेबा । बिहिश्त वैकुण्ठ इन्हींको सेवा ॥
हमतो इल्म^७^ फ़कीरी बालें । समरथ^८^ नाम लिये जग डोलें ॥
साखी – निराकार निरगुण कहि, राजि रहा संसार ।
पीर पैगम्बर यहाँ रहे, समरथ नूर निनार ॥
कलमा कहूँ तो कल पड़े, विन कलमे कल नांहि ।
जो कलमेसे कलभये, सो कलमा तिस मांहि ॥
कमालजी ।
कबीर साहिबने कमालजीसे कहा कि, हे कमाल ! तुम पश्चिम देशके मनुष्योंको शिक्षा दो । तब कमालजी काशीसे चलकर अहमदाबाद पहुंचे । उस समय अहमदाबादका नवाब मुहम्मद शाहवली बादशाह था । इसके दीवानका नाम दरिया खान था । इसे कमालजीने सत्यपुरुषकी भक्तिमें लगाकर अपना शिष्य कर लिया, कमालजीका शिष्य होगया । ये यहीं निवास करने लगे । ये दिव्य वक्तव्य दिया करते थे, जिन्हें सुनकर वहांवाले इनके वैरी होगये यहांतक कि, वहांका हाकीम भी इनसे द्वेष करने लगा, लोग पत्थर मारने लगे । बादशाहने अपने मंत्रीसे भी कहा कि, तू भी पत्थर मार, उस समय वजीरने उत्तर दिया कि, यह तो मेरे गुरु हैं मैं इनपर पत्थर मारूँ ? यह कैसे हो सकता है, नौवाबने दरिया खांको खूब धमकाया कि, यदि तू पत्थर न मारेगा तो तुझे मंत्रीकी पदवीसे पृथक् कर दूंगा । नौवाबने बहुत धमकाया । उस समय दरियाखाने फूलकी एक पत्ती तोड़कर कमालजीपर चलाई । जब वह उनको लगी तो वे हा हा करके गिर
मरुडजी महाराज
पड़े । तब दरियाखों उनके समीप आकर कहने लगा कि, आपपर इतने पत्थर पड़े पर आपने आहतक नहीं कि, मैंने तो केवल एक फूलकी पाँखुरी ही चलाई थी । इसके लगते आप हाय हाय करके गिर पड़े इसका कारण क्या है ? कमालजीने कहा कि, सुन दरियाखों ! तू शिष्य था मैं तेरा गुरु था । तूने परमेश्वरका भय न किया मेरी इतनी अप्रतिष्ठा की । मुझको पत्थरोंने इतना घायल नहीं किया जितना तेरे फूलने किया है । तूने संबारको पसंद किया उससे मित्रता की । अब तेरी मुक्ति न होगी, तू भूत होगा । इस बातपर दरियाखों पश्चाताप करने लगा तथा दुखी होकर क्षमाकी प्रार्थना की, परम कमालजीने उसे क्षमा नहीं किया । इधर नौवाब मुहम्मदशाहके शरीरमें आग लग गयी वह जलने मरने लगा । तब क्षमा २ कहता हुआ कमालजीके चरणोंपर गिरकर कहने लगा कि, मेरा अपराध क्षमा करो मुझको अपना शिष्य बनाओ ।
मुहम्मद शाहकी अत्यन्त नश्रुता तथा निवेदनको देख, कमालजी दयालु हुए । शाहके शरीरकी जलन मिट गई, वह कमालजीका शिष्य हो गया । जब स्वयम् नौवाब उनका शिष्य हुआ तब कमालजी भली भाँति उपदेश तथा शिक्षा देने लगे । उस समय कमालजीके बहुत सेवक तथा साठ शिष्य होगये पर दरियाखोंका अपराध क्षमा नहीं किया । तब फिर कमालजी मुहम्मदशाह और दरियाखों इत्यादि मनुष्यों सहित बनारसमें कबीर साहबके निकट गये । उन सबोंने सत्य-गुरुको दण्डवत् प्रणाम करके द्रव्य तथा मणि माणिक भेंट किया । वह देखकर सत्यगुरुने कहा कि, हे कमाल ! तू मेरा योग्य शिष्य नहीं है । कंकर पत्थर धन दौलत काहेको लाद लाया, हम साधु हैं । इन सब वस्तुओंसे हमें क्या काम है ? यह कहकर सब गरीबोंको बाँट दिया । उस समय दरियाखोंने सत्यगुरुके सामने दोहाई दी कि, मुझसे यह दोष होगया । वो मैंने क्षमा प्रार्थना की पर मेरा अपराध क्षमा नहीं होता । आप मेरा अपराध क्षमा कीजिये । कबीर साहबने दरियाखोंसे कहा कि, यदि मैं तेरा अपराध क्षमा करदूँ तो मेरे धर्ममें विभिन्नता आती है । क्योंकि, गुरुकी श्रेष्ठता मैंनेही स्थापित की है वो मर्यादा न रहेगी । मेरे नियममें बाधा उपस्थित होगी । इस कारण तू अपने सत्यगुरुसे क्षमा माँग । कमालजीको डाँट दिया कि, तू जो इस प्रकार श्राप देगा तो गुरुवाई योग्य न होगा । तूने उसको श्राप क्यों दिया ? तू इसका अपराध क्षमा कर । * कमालजीने दरियाखोंका अप-
- अहमदाबादमें कबीर पन्थियोंमें प्रसिद्ध है कि, कमाल साहबने दरियाखाँका अपराध क्षमा करते समय इस प्रकार कहा था कि, जब तुम्हारा कन्न फट जावेगा और गुम्मज दीख जायेगा उसी दिन भूतयोंनिसे मुक्त होंगे । कई वर्षोंसे दरियाखाँकी कन्न फट गई और गुम्मज तथा दीवारें आर पार दक्क गई हैं । इस घटनाके कारणसे लोगोंकी दन्तकथा प्रमाणित हुई है और लोगोंका विश्वास बहुत बढ़ा है । अहमदाबादमें कमाल टेकरा नामसे एक प्राचीन स्थान भी है—
राध क्षमा किया । सत्यगुरुने सबको दयादृष्टिसे देखा सबोंपर उसकी दया हुई सबोंने सत्यगुरुकी आज्ञा मानी एवं सभी प्रसन्नतापूर्वक बिदा होकर वहाँसे अपने स्थानको उछलते कूदते हुए चले आये तथा आज्ञाके अनुसार प्रचार करने लगे । गरीबदास ।
दिल्लीके पास हरियाना प्रान्तमें छोडियानी नामका एक गाँव है । उसीमें एक जाटके घर सम्बत् १७७४ विक्रमीमें गरीबदासजीका जन्म हुआ था । उन्होंने सम्बत् १७९७ विक्रमीमें कबीर साहबका दर्शन पाया था । सत्यगुरुके उपदेशसे गरीबदासजीका अंतःकरण शुद्ध हो गया था । उनकी जिह्वासे ज्ञानमयी वाणीकी झड़ी लग गई थी । उपदेश सुननेवालोंकी भीड़ अधिकाधिक होने लगी, अतएव अन्तमें पन्थ स्थापित हुआ, तो कबीर साहबके बारह पंथ कहे जाते हैं । गरीबदासजी उनमें अन्तिम पंथके आचार्य हैं । अपने ग्रंथमें गरीबदासजीने कबीर साहबकी बड़ी प्रशंसा लिखी है । कृतज्ञ शिष्यका कर्तव्य भी यही होना चाहिये । गरीबदासजी, गुरुकी श्रद्धा भक्ति तथा प्रेममें वैसेही दृढ़ थे । भादों सुदी दूज सम्बत् १८३५ विक्रमीमें, छोडियानीमें अचानक गुप्त हो गये । वहाँ अबभी उनकी समाधि बनी हुई है ; जिसके दर्शनके लिये सालमें कई एक बार मेला लगा करता है ।
ऐसा सुना जाता है कि, गोसाईं गरीबदासजी छोडियानीमें गुप्त होकर फिर राजपुतानामें प्रगट हुये । वहाँ एक दिन जंगलमें फिर रहे थे कि, जयपुर तथा जोधपुरके दोनों राजाओंको दर्शन प्राप्त हुआ । ये राजा उस समय शिकार खेलनेके लिये जंगलमें गये थे इनकी तेजस्विताको देखकर दोनों राजोंने विचार किया कि यह तो कोई बड़े श्रेष्ठ महात्मा हैं । दोनों राजोंने प्रार्थना की कि, महाराज ! हमें अपना शिष्य करलो । गोसाईं साहबने अस्वीकार किया कि हम किसीको अपना शिष्य नहीं बनाते । तब दोनों राजोंने बड़ा हठ किया कि, आप हमें अवश्यही अपना शिष्य बनालें । राजाओंने अत्यन्त विनीतभावसे विनय की कि उस समय गोसाईं गरीबदासजीने कहा कि, तीन नियमोंके स्वीकार करने पर तुम लोगोंको शिष्य करूँगा । प्रथम—अपना अपना आधा आधा राज्य मुझको दो । द्वितीय—अपनी अपनी लड़कीका डोला दो । तृतीय—मुझे पेट भर भोजन करा दो ।
यह बात सुनकर राजाने उत्तर दिया कि, महाराज ! हम अपना समस्त राज्य और अपनी सब लड़कियोंका डोला आपको देवेंगे परन्तु आपको पेट भर खिलानेकी प्रतिज्ञा हम नहीं कर सकते । फिर उनको बिना शिष्य किये ही वहाँसे अन्तर्धान होकर सहारनपुर नगरमें प्रगट हुये । पैंतीस वर्षतक सहारनपुरमें
रहे । भूमंड भक्त इत्यादिने आपसे बड़ा लाभ उठाया । गरीबदासजीने वहाँ अपने हाथसे एक बगीचा लगाया एवं अनेक लोगोंको कौतुक दिखाया । इसके पीछे जब उनकी मृत्यु हुई तब वहाँ उनकी समाधि तथा छतरी बन गई । उनकी बाटिका उनके सेवक भूमंड भक्तके आधीन रही । कुछ दिनोंके पीछे गोसाईं-जीकी बाटिकाके दोनों बेल मर गये, तब भूमंड भक्तने संकल्प किया कि अब बाटिकाको मैं बेच डालूंगा । जब भूमंड भक्तने ऐसी इच्छा की तब उसी रात गोसाईं गरीबदासजी स्वप्नमें मिले । भूमंड भक्तसे कहा कि तुम बाटिका न बेचो । तुमको आजसे आठवें दिवस अमुक सरायमें एक जोड़े बेल मिलेंगे । तुमको दोनों बेल मिल जावें तो तुम दोनों बेलोंको आरती करके लेआना ।
ऐसा हुआ कि नियत दिवस पर भूमंड भक्त उस सरायमें गये । अपने स्वप्नका वृत्तान्त अपने साथियोंसे पहलेही कह रक्खा था, इस कारण तीस चालीस मनुष्य यह कौतुक देखने उनके साथ सराय गये । जब सब आदमी सरायमें पहुँचे तब देखा तो लुझी पहने हुए एक मुसलमान एक जोड़ी नागौरी बेल लिये हुए खड़ा है । भूमंड भक्तने उसके समीप जाकर कहा कि, यह जोड़ी बेल मुझे दो, वह मुसलमान बोला कि यह जोड़ी तुम कैसे लोगे ? कोई चिन्ह बताओ, तब उक्त भक्तने उत्तर दिया कि, मैं आरती करके लूंगा । वह मुसलमान बेलोंकी जोड़ी सौंपकर चला गया । लोगोंके मनमें यह ध्यान नहीं हुआ कि, पूछें कि, वह मुसलमान कौन था कहाँसे आया, कहाँ चला गया, किसने यह बेल भेजा, कहाँसे ले आया, वह कौन है ? पीछे लोगों को यह बात स्मरण हुई कि, हम लोग बहुत भूले, यह न पूछा कि वह मुसलमान कौन था ! अस्तु भूमंड भक्त तो बेल लेकर चले आये, उनकी बगीची को सींचने लगे ।
सहारनपूरका रहनेवाला शेख बली नामक कलाल, हज्ज करने मक्का गया था जब वह पीछे आकर बम्बईमें उतरा तो वहाँ उसने गरीबदासजीको फिरते देख सलाम करके पूछा कि, महाराज ! आप सहारनपूर से चले आये ? गरीबदासजीने कहा कि, हाँ । उस शेख बलीको यह मालूम नहीं था कि, गोसाईंजी मर चुके हैं । जब शेख सहारनपूरमें आया तब लोगोंसे पूछा कि, गोसाईं गरीबदासजीका क्या हाल है ? तब लोगोंने उत्तर दिया कि, उनको स्वर्गवास हुये तीन बरस बीत गये । उनकी समाधि तथा छतरी बाटिकामें बनी हुई है । यह सुन शेख बली कलालने कहा कि, मैंने तो अभी उनको बम्बईमें फिरते देखा है मुझसे साक्षात् हुआ था । गोसाईंजी उसी स्वरूप, उसी अवस्था और उसी नामसे मुझको मिले, मुझसे भली प्रकार वार्तालाप हुआ । तीन वर्ष हो
चुके थे कि, सहारनपूरमें तो मर गये और बम्बईसे उसी समयमें जीवित होकर फिरने लगे। न जाने और कहाँ कहाँ सैर किया हो बेही जानते होंगे या उनके भक्त जानें दूसरेको क्या पता हो सकता है ?
हंस कबीर जैसे आदिमें थे वैसेही (अजर और अमर) लोकमें अब भी हैं कुछ भी विभिन्नता नहीं है। न उन्हें मृत्यु है, एवं न कभी आवागमन ही होता है न कभी विषय वासनाकी मृगतृष्णाही उनको फँसा सकती है।
गरीब दासजीके * ग्रन्थमें कबीर साहबके चेलोंका अंग।
साखी - गरीब-नानक तो निर्भय किया, वाह गुरु सतजान ।
अदली पुरुष पहचानिये, निर्गुण पद निर्वािन ॥
गरीब-दादूके सिरपर, सदा, अदली अदल कबीर ।
टक मारेमें जदि मिले, फिर सामरके तीर ॥
गरीब-नौलख नानकनावमें, दस लख गोरख तीर ॥
लाख दत्त सङ्गत सदा, पड़े चरण कबीर ॥ ३६ ॥
पारख अङ्गकी साखी।
गरीब-नौलख नानक नावमें, दसलख गोरख पास ।
अनन्त सन्त पदमें मिले, कोटि तरे रबिदास ॥ ३७ ॥
गरीब-रामानन्दसे लख गुरु, तारे चेले भाई ॥
चेलोंकी गिनती नहीं, पदमें रहे समाई ॥ ३२ ॥
गरीब-मीराबाई पद मिली, सद्गुरु पीर कबीर ।
सहित देह लौलीन हो, पाया नहीं शरीर ॥
गरीब-उत्पत्ति परलय जात है, अनन्त कोटि ब्रह्मण्ड ।
जोग जीत समझाय जब, उधरै काग भुसुण्ड ॥ ४८ ॥
गरीब-वसिष्ठ विश्वामित्रसे, आवैं जाँय अनेक ।
काग भुसुण्डके पलकमें, जो चाहे सो देख ॥ ४९ ॥
गरीब-ऐसे काग भुसुण्ड से, योगजीतके दास ।
चकवैं ज्ञान सुनायसे, दीन्हा पदमें वास ॥
गरीब शिवलीको सद्गुरु मिले, सँग भाई मन्शूर ॥
प्याला उतरा अर्श से, काढ़े कौन कुसूर ॥
अचल अङ्गकी साखी ३६२॥
गरीब-मुहम्मदके मुरशिद सही, कलमः रोजा दीन ॥
मुसलमान मानै नहीं, मुहम्मद केर यकीन ॥
गरीबदासजी कृत हिरम्बर बाघ देखो।
सर्वाङ्ग अङ्गकी साखी ॥ १० ॥
सा० — गरीब-सुलतानाके तीर लगा, बलख बुखारा त्याग ।
जिन्दाका चोला दिया, सद्गुरु सत्य बैराग ॥ ११ ॥
गरीब-बहुरङ्गी बिरियामहै, मिला नीरमें नीर ॥
गोरखके मस्तक गहे, अदली अदल कबीर ॥
गरीब-ऋषभ देवके आये, करुणामय करतार ।
नौ योगेश्वर पद रमें, जनक विदेह उरधार ॥
भागवतके ग्यारहवें स्कन्धके दूसरे अध्यायमें लिखा है कि, मनुकी संतानमें ऋषभदेव नामक एक राजा हुआ । उसके एकसौ पुत्र थे । उनमेंसे एकका नाम भरत था, जिसके भी नामसे यह भरतखण्ड प्रसिद्ध हुआ है । उन्हीं-मेंसे नौ परम योगीश्वर तथा ज्ञानी हो गये हैं । उन्हींने राजा जनकको ज्ञानोपदेश किया था । उन्हीं नौ योगेश्वरोंका वृत्तान्त गरीबदासजी लिखते हैं कि, ये नौ योगीश्वर राजा जनक सहित करुणामय कबीर साहबके कृपापात्र शिष्य होकर परमधामको सिधार गये । जिनकी कि, लोग आज कथाएँ गाते हैं ।
अचल अङ्गकी साखी २७॥
सा० — गरीब-नारद सनकादिक सही, बज्र दण्ड वैराग ॥
जोगजीत सद्गुरु मिले, उपजा अति अनुराग ॥ ५१ ॥
गरीब-दुर्वासा और गरुड़को, दीन्हा ज्ञान अपार ।
दृष्टि खुली निज ध्यानसे, फिर नहिं लगे लगाए ॥ १० ॥
मुहम्मदकी जो चली है, रूह, दरगह देखे दूबर दूह ।
पीर कबीरा जिन्दा ख्याल, मारग मंतर तारंग बाल ॥
ये कबीर साहिबके बारह पन्थोंमेंसे अन्तिम पन्थके आचार्य थे, ये सत्य-गुरुके हुक्मके मुताबिक जगह जगह उपदेश देते हुए वृन्दावन पहुंचकर लोगोंको सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश सुनाने लगे । वहाँके लोगोंने आपसे कहाकि, वैष्णवोंकी तरह भगवान्की पूजा करके फिर हमें उपदेश दोगे तो मानेंगे नहीं तो हमारे दिलोंमें आपके उपदेशके लिये स्थान नहीं है । गरीबदासजीने कहा कि, अब मैं हृदयमें ही ध्यान किया करता हूँ वही मेरी मूर्तिपूजा है । मैं, मूर्तिपूजाको बुरा नहीं । कह रहा हूँ मेरी श्रद्धा पूजामें है पर मैं इसे ज्ञानपूर्वक चाहता हूँ, पर भक्तिके दीवाने व्रजवासियोंने उनकी बातको स्वीकार नहीं किया आप भी व्रजवासियोंकी अचल भक्ति देखकर प्रसन्न हो स्थानान्तरित होगये । उनकी पारस अंगकी कुछ साखियोंको यहाँ उद्धृत करते हैं ।
दुर्वासा ऋषि
साखी - काशीपुरको कसद किया, उतरे अधर अधार ।
मोमिनका मुजुरा हुआ, जङ्गलमें दीदार ॥
गरीब-कोटि किरन शशि भानु सुधि, आसन अधर विमान ।
परसत पूरण ब्रह्मको, शीतल पिण्ड औ प्रान ॥
गरीब-गोदलिया मुख चूमके, हेम रूप झलकन्त ।
जगर मगर काया करे, दमके पद्म अनन्त ॥
गरीब-काशी उमड़ी गुल भया, मोमिनका घर घेर ।
कोई कह ब्रह्मा विष्णु है, कोई कहें इन्द्र कुबेर ॥
गरीब-कोई कह वरुण धरमराय है, कोइ कोइ कहता ईश ।
सोलह कला सुभान गति, कोई कहें जगदीश ॥
गरीब-भगति मुक्ति ले ऊतरे, मेटन तीनों ताप ।
मोमिन घर डेरा लिया, कहें कबीरा वाप ॥
गरीब-दूध न पीवे न अन्न भखे, नहिं पलने झूलन्त ।
अधर आसन है ध्यानमें, कमल खिला फूलन्त ॥
गरीब-कोई कह छल ईश्वर नहीं, कोई किन्नर कहलाय ।
कोई कहें गुण ईशका ज्यों ज्यों मारिये साय ॥
गरीब-काशीमें अचरज भया, गयी जगतकी निन्द ।
ऐसे दूल्हा ऊतरे, ज्यों कन्या बरबिन्द ॥
गरीब-खल्क मुल्क देखन गया, राजा परजा रीति ।
जम्बूद्वीप जहानमें, उतरे शब्द अतीति ॥
गरीब-दुखी कहें यह देह है, देव कहें यह ईश ।
ईश कहें परब्रह्म है, पूरन विश्वे बीस ॥
गरीब-काजी गये कुरान ले, धर लड़केका नौउ ॥
अच्छर अच्छरमें फुरे, धन्य कबीर बल जाऊँ ॥
गरीब-सकल कुरान कबीर है, हरफ लिखे जो लेख ।
काशीके काजी कहें गयी दीनकी टेक ॥
गरीब-शिव उतरे शिवपुरीसे, अविगत वदन विनोद ।
महके कमल खुशी भया, लिया ईशको गोद ॥
गरीब-नजर नजरसे मिल गयी, किया दर्श परणाम ॥
धन्य मोमिन धन्य पूरना, धन्य काशी निष्काम ॥
गरीब-सात बार चर्चा करे बोले बालक बैन ।
राजा जग जीवन
शिव सो कर मस्तक धन्यो, ला मोमिन यक धेनु ॥
गरीब-अनब्यावरको दुहतही, दूध दिया ततकाल ।
पीयो बालक ब्रह्म गति, वहाँ शिव भये दयाल ॥
गरीब-कष्ट मानुषके जब भई, नित दुनिया वर देहि ।
चरण चले तत पुरीमें, यहि शिक्षा निति लेहि ॥
रामानन्द स्वामी और कबीर, साहब की बातेंलाप की साखी ।
गरीब-भक्ति द्रावड देशथी, यहाँ नहीं एक विरञ्च ।
ऊत भूतको घ्यावना, पाखण्ड और परपञ्च ॥
गरीब-रामानन्द अनन्द भये, काशी नगर मँझार ।
देश द्राविड़ छाड़िके, आये पुरी विचार ॥
गरीब-योग युक्ति प्राणायाम करि, जीता, सकल शरीर ।
तिरवेणीके घाटमें अटक रहे बलवीर ॥
गरीब-तीर्थ बरत एकादशी, गंगोदक अस्नान ।
पूजा विधि विधानसो, सर्वकलासों गान ॥
गरीब-करे मानसी सेवनित, आत्म तत्वको ध्यान ।
षट पूजा आदि भेद गति, धूप औ दीप विधान ॥
गरीब-चौदह सौ चले किये, काशीनगर मँझार ।
चार सम्प्रदा चलत हैं, और है बावन द्वार ॥
गरीब-पांच बरसके जब भये, काशी माहिं कबीर ।
दास गरीब अजीब कला, ज्ञान ध्यान गुण थीर ॥
गुल भया काशीपुरी, में अटपट वैन विहंग ।
दास गरीब गुणी थके, सुनि जुलहा परसंग ॥
रामानन्द अधिकार है, सुनि जोलहा जगदीश ।
दास गरीब विलम्ब ना, ताहि नवावत शीश ॥
रामानन्दको गुरु कहै, तनसे नहीं मिलाय ।
दास गरीब दरस भये, पैयन लगी जो लाय ॥
पन्थ चलत ठोकर लगे, राम नाम कहि दीन ।
दास गरीब कसर नहीं, सीख लिये परवीन ॥
आड़ा परदा देइके, रामानन्द बुझन्त ।
दास गरीब उलझ छबि, अधर डाक कूदन्त ॥
कौन जाति कुल पन्थ है, कौन तुम्हारा नाउँ ।
दास गरीब अधीन गति, बोलतही बलि जाऊँ ॥
जाति हमारी जगद्गुरु, परमेश्वर यह पन्थ ॥
दास गरीब लिखत परे, नाम निरञ्जन कन्त ॥
रे बालक दुर्बुद्धि सुनू, बट मठ तन आकार ।
दास गरीब दर दर लगे, बोले सिरजनहार । ।
तू मोमिनके पालुवा, जुलहे के घर वास ।
दास गरीब अज्ञान गति, एता दूढ़ विश्वास ॥
मान बड़ाई छाडिके, बोलै बालक वैन ।
दास गरीब अधम मुखी, इतना तुम घर फैन ॥
कलियुग क्षेत्रदपाल है, क्या भैरो कोई भूत ।
दास गरीब विडंबना, गया जगत सब ऊत ॥
मनी मग्ज माया तजो, तजिये मान गुमान ।
दास गरीब सो बात कहि, नहीं पावेगो जान ॥
हे बालक बुधि तोरि गति, कौडी साखन भाँड ।
दास गरीबहि हूदेस करि, नहीं लेवेंगे डाँड ॥
शाह सिकन्दर के बधे, पग ऊपर तर शीश ।
दास गरीब अगाधि गति, तोर कहा जगदीश ॥
कान काट बूचा करे, नली भरत रे नीच ।
दास गरीब जहान मैं, तुम सर जोरा मीच ॥
मरत मरत सब जग मुवा, लखै नऽ स्थिर ठौर ।
दास गरीब जहानमें, तुमसा नीच न औरू ॥
नादबिन्दकी देहमें, येता गर्व न कीन ।
दास गरीब पलक फना, जैसे बुद बुद लीन ॥
तिरन कत लों से बोलते, रामानन्द सुजान ।
दास गरीब कुजाति है, आखिर नीच निदान ॥
नीच मीच से ना डरे, काल कुल्हाड़ अशीश ।
दास गरीब अदत्त है, तँ जो कहा जगदीश ॥
जड़िहों हाथ हथकडी, गले तौक जञ्जीर ।
दास गरीब परख बिना, यह बाणी गुणगीर ॥
परख निरख नहीं तोहिको, नीच कुलीन कुजात ।
दास गरीब अकल बिना, तू जो कही क्या बात ॥
हे बालक नीची कला, तुमही बोलो ऊँच ।
दास गरीब पलक धरि, खबर नहीं हम कूँच ॥
महँके बरन खलास करि, सुन स्वामी परवीन ।
दास गरीब मनी मरी, मैं अजिज आधीन ॥
मैं अविगत गतिसे परे, चारवेद से दूर ।
दास गरीब दशो दिशा, सकल सिन्धु भरपूर ॥
सकल सिन्धु भरपूर हूँ, खालिक हमरो नाउँ ।
दास गरीब अजात हूँ, तेजि कहा बलि जाउँ ॥
जात पाँत मेरे नहीं, नहीं स्त्री नहीं गाउँ ।
दास गरीब अनन्य गति, नहीं हमारे नाउँ ॥
नाद विन्द मेरे नहीं, नहि गोद नहि गात ।
दास गरीब शब्द सजग, नहीं किसीका साथ ॥
सब सङ्गी बिछुरु नहीं, आदि अन्त बहु जाँहि ।
दास गरीब सकल बसों, बाहर भीतर माँहि ॥
हे स्वामी मैं सृष्टिमें, सृष्टि हमारे तीरू ।
दास गरीब अधर बसूं, अविगत पुरुष कबीर ॥
अनन्त कोटिसलिता बडो, अनन्त कोटि घर ऊँच ।
दास गरीब सदा रहूँ, नहीं हमारे कूँच ॥
पुहमी धरनी अकाशमें, मैं व्यापक सब ठौर ।
दास गरीब न दूसरा, हम सम तुल नहि और ॥
मैं माया मैं कालहूँ, मैं हंसा मैं बंस ।
दास गरीब दयाल हम, हमहीं करें विध्वंस ॥
ममता माया हम रची, काल जाल सब जीव ।
दास गरीब प्राण पद, हम दासा तन पीव ॥
हम दासनके दास हैं, कर्ता पुरुष करीम ।
दास गरीब अवधूत हम, हम ब्रह्मचारी सीम ॥
हम मौला सब मुल्कमें, मुल्क हमारे माँहि ।
दास करीब दलाल हम, हम दूसर कछु नाँहि ॥
हम मोती मुक्ताहल, हम दरिया दरवेश ।
दास गरीब हम नित रहें हम तजि जात हमेश ॥
हमहीं लाल गुलाल है, हम पारस पद सार ।
दस गरीब अदालतंग, हम राजा संसार ॥
हम पानी हम पवन हैं, हमहीं धरणि अकाश ।
दास गरीब तत्त्वपञ्चमैं, हमहीं शब्द निवास ॥
सुनु स्वामी सत भाखहूँ, झूठ न हमरो रञ्च ।
दास गरीब हम रूप विन, और सकल परपञ्च ॥
हम रोवत हैं सृष्टिको, वो रोवति है मोंहि ।
दास गरीब वियोगको, और न वृक्ष कोइ ॥
मैं बूझू मैंही कहूँ, मैंही किया वियोग ।
गरीब दास गलतान हम, शब्द हमारा योग ॥
चारो जुगनमें हम फिरेँ, नहिं आवेँ न जाउँ ।
गरीब दास गुरु भेदसे, लखे हमारा ठाउँ ॥
रजगुण सतगुण तमगुण, रजबीरज हम कीन्ह ।
गरीबदास हम सकलमें, हम दुनियाँ हम दीन ॥
लगी महम गनीम पर, काल कटक कटकन्त ।
गरीबदास निर्भय करूँ, जो कोइ नाम जपन्त ॥
मैं बालक मैं वृद्ध हूँ, मैं ही जवाँ जमान ।
गरीबदास निज ब्रह्म हूँ, हमहीं चारों खान ॥
गगन सुन्य गुप्ता रहूँ, हम परगट परवाह ।
गरीबदास घट घट बसूँ, विकट हमारी राह ॥
आवत जात न दीसहूँ, रहता सकल समीप ।
गरीबदास जलतरङ्ग ज्यों, हमहीं सायर सीप ॥
गोता लाऊँ स्वर्गमें, फिर पैठूँ पाताल ।
गरीबदास दृढ़त फिरूँ, हीरे माणिक लाल ॥
इस दरिया कङ्कर बहुत, लाल कहीं कहिं ठाऊँ ।
गरीबदास माणिक चुगूँ, हम मरजीवा नाउँ ॥
बोले रामानन्दजी, हम घर बड़ा सुकाल ।
गरीबदास पूजा करें, मुकुट फई जद माल ॥
सेवा करो सम्हालके, सुन स्वामी सुरज्ञान ।
गरीबदास सिरधर मुकुट, माला अटकी जान ॥
स्वामी घुण्डी खोलके, फिर माला गले डार ।
गरीबदास इस भजनको, जानत है करतार ॥
राजा जगजीवनकी रानियोंके नाम
डचोढ़ी, परदा दूरकर, लीना कण्ठ लगाय ।
गरीबदास गुजरी बहुत, बदनन बदन मिलाय ॥
मनकी पूजा तुम लखी, मुकुट माल पर वेश ।
गरीबदास किनको लखे, कौन वरन क्या भेष ॥
यह तो तुम शिक्षा दयी मान लिये मत मोर ।
गरीबदास कोमल पुरुष, हमरो बदन कठोर ॥
हे स्वामी तुम स्वर्गकी, छाड़ो आशा रीत ।
गरीबदास तुम कारणे, उतरे शब्द अतीत ॥
सुन बच्चा मैं स्वर्गकी, कैसे छाड़ूँ रीत ।
गरीबदास गुदड़ी लगी, जन्म जात है बीत ॥
चार मुक्ति वैकुण्ठमें, जिनकी मोरे चाह ।
गरीबदास घर अगमके, कैसे पाऊ बाह ॥
हेम रूप जहाँ धरणि है, रत्न जड़े बहु सोभ ।
गरीबदास वैकुण्ठको, तन मन हमरो लोभ ॥
शंख चक्र गदा पद्म है, मोहन मदन मुरारि ।
गरीबदास मुरली बजै, स्वर्ग लोक दरबार ॥
दूधोंकी नदियाँ बगें, श्वेत वृक्ष शोभान ।
गरीबदास मन्दिर मुकुट, स्वर्गपुरी अस्थान ॥
रत्नन जड़ाऊ मनुष सब, गण गँधर्व सब सेब ।
गरीबदास उस धामकी, कैसे छाड़ूँ सेव ॥
चार वेद गावें उसे, सुर नर मुनी मिलाप ।
गरीबदास ध्रुव पुर यश, मिट गये तीनों ताप ॥
नारद, ब्रह्मा यश रटें, गावें शेष गणेश ।
गरीबदास वैकुण्ठसे, और परेको देश ॥
सुनुस्वामी निज मूल गति, कहि समझाऊँ तोहि ।
गरीबदास भगवानको, राखा जगत समोय ॥
तीन लोकके जीव सब, विषय बासना भाय ।
गरीबदास हमको जपैं, तिसको धाम दिखाय ॥
कृष्ण विष्णु भगवान्के, जहाँ गये हैं जीव ।
गरीबदास त्रिलोकमें, काल कर्म सर शीव ॥
सुनु स्वामी तोसों कहूँ, अगम द्रौपकी सैल ।
१५ अध्याय कबीर साहबके कलियुगके शिष्य
गरीबदास डूबे परे, पुस्तक लादे बैल ॥
कहो स्वामी कहाँ रहोगे, चौदह भुवन विहण्ड ।
गरीबदास बीजक कहो, चलत प्राण औ पिण्ड ॥
बोलत रामानन्दजी, सुन कबीर करतार ।
गरीब दास सब रूपमें, तुमहीं बोलनहार ।
तुम साहब तुम सन्त हो, तुम सद्गुरु हम हंस ।
गरीब दास तुम रूप विनु, और न पूजो बंस ॥
मैं भक्ता मुक्ता भया, किया कर्म कुल नाश ।
गरीब दास अविगत मिले, मिटी मनकी प्यास ॥
दोनों ठौरमें एक तू, भया एकसे दोय ।
गरीबदास हमकारने, उतरे मगम जोय ॥
बोले रामानन्दजी, सुनु कबीर सुजान ।
गरीबदास मुवित भयी, उधरे पिण्ड ओ प्राण ॥
गुष्ठि रामानन्दसे, काशीनगर मझार ।
गरीबदास जिन्द पीरकी, हम पाये दीदार ॥
पृ. २९६ में कबीर साहिबके १२ पन्थोंका सामान्य परिचय दिया जा चुका है अनुरागसागरकी भूमिकामें इनका विस्तारके साथ वर्णन किया है तथा उनकी परंपराभी दिखाई है उन्हींके विषयमें कथन है कि, बारहों पन्थोंके आचार्य हंस कबीर हैं। वे सब सद्गुरुके धामको पहुँचेंगे।
रहन सहन
भारतवर्षमें कबीर साहबके अनुयायी बहुत हैं। वे लोग वेद धर्मियोंके साथ मिले मिलाये रहते हैं। वे भ्रम भूतकी पूजासे दूर भागते हैं। वे तीर्थोंमें श्रद्धाके साथ जाते हैं। दान पुण्य आदि करते हैं। जो ठीक कबीरपन्थी नहीं, नाममात्रको कबीरपन्थी बन बैठे हैं उनके विचार तथा ध्यान दूसरेही प्रकारके हैं। कबीर साहबका कथन है कि, हे धर्मदास ! जिसमें तुम ऐसे चिन्ह पाओ उसको उपदेश दो। जिसमें भक्ति, दीनता, साधुसेवा, गुरुसेवा न हो उसको अपने हंसोंमें भूलकर भी स्थान न देना। जिस समय मित्र आदि रविदासजीके जब सब सहायक हार मान गये तब रविदासजीने सत्यगुरुको पहचाना। कपटियोंका भरोसा छोड़कर कबीर साहबके शिष्य हो परमानन्दमें बहने लगे।
भारतवर्षमें बहुत लोग हैं, जो अपनेको कबीरपन्थी कहते हैं, परन्तु उन लोगोंको आज्ञा है कि तुमलोग जब धर्मदास साहबके बचन चूड़ामणिदासकी