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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

तकरीर (कहे हुए) हैं, उसके मुताबिक (अनुसार) मैं लिखा और कहता हूँ। बावजूद कहने और समझानेके उन लोगोंका नोकैजू (शत्रुता) दूर न हुआ और सन १८८५ में फिरोजपुरके चन्द सिकखोंने मेरे साथ कुछ फसाद करना चाहा तब मैंने उन लोगोंसे कहा कि, मैं तो नानक साहब और कबीर साहबको एक रूपही जानता हूँ, अगर आप नहीं राजी हों तो आइन्देको मैं न लिखूंगा। बावजूदे कि, उन लोगोंका मेरे साथ मुपाहसा और मजादला (झगडा और लड़ाई) इस बातपर न था कि, मैंने नानक साहबको कबीरसाहबका चेला क्यों लिखा, बल्कि और बातपर तकरार था, लेकिन अन्दरूनी (भीतरी) बोगभ (ईर्षा-की) इस बातका भी था। इस वास्ते फकीरने कबीर साहबके पांच हजार बरसकी तारीख लिखा और बनाम “तालीमकबीर कलियुग” मशहूर किया; ताकि हर खास व आमको इसकी असली हकीकत (यथार्थता) से आगाही हो। कबीर साहबके तीन युगोंका अहवाल मैंने साफ छोड़ दिया, फकत इब्तदाय (आरम्भ) कलियुगसे लिखा।

उपेयुक्त ग्रन्थकी समाप्तिपर आप लिखते हैं “खतम (समाप्त) हुई किताब “तालीमकबीरकलियुग” सतगुरुकी मेहरबानीसे। बमुकाम शहर फिरोजपुर ता० २२ अक्टोम्बर सन् १८८५ ई० बमुताबिक सम्बत १९४२ विक्रमी आश्विन सुदी १३ बरोज चहारशम्बा (बुध)। इसके पश्चात्-

बडे कबीरमन्शूर

की बारी आती है—आप उसकी दीबाइचा (प्रस्तावना) में इस प्रकार लिखते हैं—

दूसरी बार कबीरमन्शूरकी तरमीम (सुधार) व तरतीब (योजना) के सबब (कारण) का ब्यान।

यह किताब कबीरमन्शूर पहले एक बार मतबा (छापखाना) कोहनूर लाहौरमें छप चुकी है। और इस किताबके पढ़नेके शायक (अनुरागी) बहुत लोग थे, लेकिन मुसन्निक (ग्रंथकर्ता) किताबने, इस किताबका रिवाज आम (सर्वसाधारणमें) देना मुनासिब न समझा। और अपने खास (विशेष) लोग जहबहम्म (अपने पंथके) को मुफ्त दिया। बजह (कारण) इसकी यह थी कि, बाज बाज लोग स्वसम्बदस वाकफियत (जानकारी) रखते हैं, अक्सर (प्रायः) लोग बेखबर (अज्ञात) हैं और जो लोग वाकफ (जानकार) हैं,

उनको स्वसम्बेदकी तालीम (शिक्षा) के सिवाय (अतिरिक्त) और दूसरा कुछ पसन्दीदः नहीं है।

अगर कोई मेरी साबिक (प्रथम) के छापेकी किताब देखकर मुझपर किसी बातका तअनः (तानी) एवाह (अथवा) एतराज (तर्क) करे तो मैं हक्क तआला (सत्य पुरुष-सच्चे मालिक) के हुजूर उसका दामनगीर हूँगा. क्योंकि, मैंने अपनी सारी (कुल-सब) साबिक (पहलेकी) मिहनत और भर (द्रव्य-रुपया) लागत बरबाद करके अज सरैनौ (फिरसे) इसको दुरस्त (सुधार) किया है।

इस दुनियामें चार वेद और चार किताबको तो हर कोई जानता है, लेकिन (किंतु) स्वसम्बेदके बारे (विषय) में कहीं बाजपुरस (पूछताछ) नहीं है, इसलिये चन्द (कई) अशखास (लोग) मुअतरिज हुए (तर्क-किया-पूछा)

और दूसरी बजह यह है कि, जब यह किताब छपी, उस वक्त मुसन्निफ किताब सहीह और दुरस्त करनेकेलिये मौजूद न था; मुसन्निफकी गैरहाजिरीमें किताब छपी, इस सबबसे लोगोंने बेसमझी करके, चंद अलफाज (शब्द) बदल डाले, और मजहबी (साम्प्रदायिक) बातोंमें अलफाजका बदलना बड़ा कुसूर (दोष) है। और मुकाबला करनेवालेकी गफलत (भूल) से गलतियाँ (अशुद्धियाँ) वगैरही भी बहुत रह गयी। इस वास्ते सलाहबक्त (समयोचित) समझकर किताबका रिवाज देना (प्रकाशित) करना मुलतवी रखवा था। अब दूसरी बार इसको फिर तरमीम और तरतीब करके और बहुत मजामीन (विषयों) की ईजादी (वृद्धि) के साथ और खूब हवालेजात (प्रश्न सब) दिये और दुरस्त (सुधार) कर खास शायकीन (अनुरागियों) राह नजात (मोक्ष मार्ग) व मुजमअए खुशखुलक व नेकआदात (सदाचारियों-सुशीलों) व मुनसिफ मिजाज (न्यायी) के वास्ते इस किताबको मरौवज करना और वास्ते फायदा (लाभ) खास लोगोंके कि, जिनका दिल (मन-हृदय-अन्तःकरण) तअमुब (सांप्रदायिक पक्षपात) व तरफदारीसे दूर व तमीज (विवेक) इन-सानी (मानवी) से भरपूर है बाजिब और लाजिम (उचित) जागता हूँ।

सदहा शुक्र सलतनत इंग्लिशियाका है कि, बादशाह और हुक्काम दोनों दुवशा (त्यागी साधुओं) और आजिजों (दीनों) पर ऐसी हमेशा (सदा) हिफाजत (रक्षा) और नजर नबाजिश (दया दृष्टि) की रखते हैं कि, इस

अंगरेजी अहद (राज्य) में किसी मिस्कीन (गरीब) फक़िरपर कोई जुल्म व जोर नहीं कर सकता और वे लोग खुशीके साथ अपना मकसद (आशय) जाहिर कर सकते हैं। सब और झूठ सबका इजहार और इनसाफ होता है। कोई किसीपर किसी तरहका जब वतअदी (जो जुल्म) नहीं कर सकता। अब उन जालिमो (अत्याचारियों) की सलतनत (राज्य) जमीनसे उठगयी, जबकि मिस्कीन और बेगुनाह दुश्वेषोंको कद और कत्ल और तरह तरहकी स्यासत (शासन) करते थे, उस वक्त फुकरा अपनी रास्ती (सच्चाई) का इजहार (प्रकाश) नहीं कर सकते थे। अब बादशाह और हुकामोंकी मदे नजर देखकर इस फकीरने भी दिलेरीकी और जो इल्म इसमें था, और है, सीना (हृदय) से निकालकर सफीना (कागज) पर, बमुलाहिजे नाजरीनके रखकर उमीदवार इन्साफका है।”

इस बारभी आपने कबीरमन्शूरको आठही भागोंमें विभक्त किया है किंतु पहली आवृत्तिकी अपेक्षा, विषयमें वृद्धि और सुधारके अतिरिक्त क्रममें भी उलट पुलट किया है। वह इस प्रकार है -

प्रथम भागमें तीन अध्याय और अनेक प्रकरण हैं।

दूसरे भाग में दो अध्याय और सौ के लगभग प्रकरण हैं।

तीसरे भागमें भी दोही अध्याय और कई प्रकरण हैं।

चौथे भागमें आवागमनका विषय है जो कई अध्याय और अनेक प्रकरणोंमें वर्णित है।

पाँचवें भागमें - पशुओंकी बुद्धिमानीका वर्णन है। जिसमें छः अध्याय और प्रत्येक अध्यायोंमें अनेक प्रकरण हैं।

छठे भागमें तीन अध्याय और अनेक प्रकरणोंमें मद्यमांसादि निषेध पदार्थों का वर्णन है। इस छठे भागका विषय प्रथमके छोटे कबीरमन्शूरमें आठवें भागमें था सो अब छठे भागमें आगया है।

सातवें भागमें पाँच अध्याय और प्रत्येक अध्यायमें अनेक प्रकरण हैं। इस भागमें जो विषय वर्णित है सो पहले कबीरमन्शूरके छठे भागमें था।

आठवें भागमें गुरु शिष्यके सम्वादमें अनेक जानने योग्य विषय और उप-वेषोंका वर्णन है। जिसमें अनेक अध्याय और प्रकरण हैं।

इस प्रबंधसे बड़े कबीरमन्शूरको समाप्तकर अन्तमें आप उसकी समाप्तिकी तिथि लिखते हुए इस प्रकार लिखते हैं -

तारीख खातमा ।

शुक्र' बेहद' परम गुरु गोविंद । की सरंजाम' बूसख'ए दिलब'न्द ॥
करम' व फजल' उसपै सतगुरुका । जो समझकर पढे सुने यह पन्द' ॥
इससे हीरी' न कोइ शर्बत और । आवहैवा' न शोरब मिश'री कन्द ॥
पाव पहचान जो कोइ मृशिद'को । हो दफा' सब जहा'न का दुख दन्द ॥
कर अमल' गर' निगर' न चश्म' अपने । राज' महरिम' न हो तोबर' मन' खन्द' ॥
ईस्वी सन अठारह सौ अस्सी । उन्नीस सौ पैंतीस विक्रमा सने हिन्द ॥
महे' सितम्बर व हिन्दवी' आस्विन । खतम' तारीख' नुसख'ए' चारुमचन्द' ॥
मैं उसीका हूँ खादमान' खादिम । जिसके दरगह' न पहुँचे कोई परिन्द' ॥
आजिज' व तखलुस' आजिज । नाम जिसका है दास परमानन्द ॥

पहले (छोटे) कबीरमन्शूरमें भी समाप्तिकी यही तारीख लिखी हुई है, क्योंकि असलमें कबीरमन्शूर ग्रन्थ बही है किंतु इसमें, सुधारा बधारा करनेके कारण, अंतमें आपको, उसकी तिथि तारीख भी, जाननेकी जरूरत पड़ी, इसलिये आप लिखते हैं —

राकि साधु परमानन्ददासजी कबीर पंथी मुकीम शहर फिरोजपुर मुल्क पंजाब किस्मत लाहौर, तारीख तरमीम और तरतीब दूसरीबार मोबरखे २५ अपरेल सन १८८७ ई० व मुताबिक सम्बत १९४४ विक्रमी बैशाख सुदी २ सोमवार ।

इसके पश्चात यह ग्रंथ सन् १८९१ ई. माह सितम्बर व मुताबिक भादो सम्बत १९४८ विक्रमी में छपकर तैयार हुआ ।

अंति टाइटिल पेज (मुखपत्र) पर आप एक विज्ञप्ति, इस प्रकार लिखते हैं । बाजह हो कि, जो साहब दानाय दोरान इस किताब कबीरमंशूरको पढ़ें, अपने दिलमें खूब गौर और फिक्र करें कि, कबीर साहब कौन हैं ? कि, जिनका यह दिल और दीमाग है कि, दावा खुदाईका करते हैं और आपमें सारा जलाल लायजाल दिखाते हैं और आपका कौल बमोजिब फेलके हैं । कौल व फेल जाहिर व बातिन एकसा है सरेम फर्क नहीं ।

जिस हालतमें कि, सारे वेद व स्वसम्बेद और रिषिशरान हर से जमान भी जाहिर करते हैं कि, कबीर साहब खुद कादिर मुतलक खालिक आलम हैं,


१ धन्यवाद २ अनन्त ३ पूरा ४ किताब, ग्रन्थ ५ मनलगन, मनचाही, सुन्दर ६ कृपा ७ श्रेष्ठता ८ नसीहत, उपदेश ९ मीठा १० अमृत ११ पीनेकी वस्तु १२ गृह १३ नाश १४ संसार, जगत. १५ कर्म व्यवहार. १६ यदि १७ देखे १८ आँख १९ भेद २० जानकार २१ ऊपर २२ मेरे २३ हँसों २४ महीना २५ हिन्दी २६ समाप्ति २७ तिथि २८ पूर्ण चन्दके समान सुंदर २९ दासानुदास ३० दरबार ३१ पक्षी, उड़नेवाला भाव है बड़े बड़े बुद्धिमान् बुद्धि दो डानेवाले ३२ दीन ३३ उपनाम.

तो फिर यह फकीर दरबारे इजहार उन अकबालके पुरे तकसीर क्यों तसन्वर जिया जावे । इस वास्ते वाहि्यात इतराजोंसे यह मुआफ फरमाया जावे ।

वह कबीर सारे जहानका गुरु पीर अपनी बुजुर्गी और जलाल खु आप जाहिर करता है और जब चाहता है छुपा लेता है, यह इनसान जई फूल व्यान क्या लिखे और क्या कहे, फिरिश्तोंमें भी किसीको यह कुदरत नहीं कि, उसकी उलूहियत और रबूबियतमें दम मारके, उसके जलाल बेमिसाल कुल आलममें नशर और बाहर बयाने वशर है ।

इस दुनियाके आदमजाद बेखबर हैं कि, ब्रह्म क्या है, जीव क्या और माया क्या है ? खुदा क्या और बंदा क्या है ? खुदा परस्ती क्या और बुत परस्ती क्या ? सो सब इस किताबमें खोल खोल कर दिखला दिया है और खूब साबित कर दिया है कि, कुल आलम मायापरस्त है और जो माया परस्त है वही बुतपरस्त है । खुदापरस्तीकी खबर उसीको होती है जिसको सतगुरु कबीर साहब बतलाता और सिखलाता है और जो कोई खुदा परस्तीको जानता है वह तोहमातसे अलग होता है । खुदा परस्त हवस हैवानी और तनासुखसे बिलकुल मुबर्रा होता है ।

राकिम खाकसार—
साधु परमानन्द, मुसद्दिक.

इस प्रकारसे कबीरमन्शूरके आदि अन्तमें लिखा है ।

पाठकोंको यह जानना चाहिये कि, स्वामी परमानन्दजीने बारम्बार अपने ग्रन्थोंमें लिखा है कि, साम्प्रदायिक ग्रन्थोंमें सांकेतिक शब्दोंको बदलना या ग्रंथ-कर्ताके विरुद्ध उसमें सुधार करना पाप है । “जो कोई मेरे इस ग्रंथमें रद्दबदल करेगा तो मालिकके दरबारमें मैं उसका दामनगीर हूँगा । फिर ऐसी दशामें जब कि, ग्रंथकर्ता स्वतः अपने भले या बुरे लिखे हुएको पूरा पूरा ज्योंका त्यों रखवाया चाहता है, तो अनुवादकको कोई अधिकार नहीं है कि, इसमें कमी बेसी या रद्द बदल करे हों आवश्यकता पड़नेपर परस्तावना या स्थान स्थान २ की टिप्पणियों अपनी समझ बूझके अनुसार भाव अवश्य प्रकट किये जा सकते हैं, सो संतगुरुकी कृपासे शक्तिभर किया जायगा ।

इतने शब्द लिखनेकी आवश्यकता क्यों पड़ी ? इसका कारण परस्तावनामे देखनेसे ज्ञात होगा ।

सर्व संतमहंतोंका कृपाकांक्षी —
कबीराश्रमाचार्य

श्रीयुगलानन्द बिहारी,
अनुवादक.

सत्यनाम

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिंत, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय
कबीर, सुरतियोगसंतायन, धनीधर्मदास, चारगुरु तथा
वंशनकी दया । मुक्तामनिनाम', चूरामणिनाम', सुदर्शननाम,
कुलपतिनाम', प्रमोधगुरुबा'लापीर, कमलनाम', अमोल'
नाम, मुरतिसनेहीनाम', हक्कनाम', पाकनाम', प्रगट
नाम', धीरजनाम', पं. श्री उग्रना' म साहब, पं० श्री
दया' नाम साहबकी दया । बंशब्यालीसकी
दया कबीर साहबके अधिकारी वंश—
प्रतापी वर्तमान आचार्य श्री १०८
महंत काशीदासजीसाहब की
दया । सर्व संत महंतन.
की दया ।

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श्रुति

मुण्डक उपनिषत् प्रथम प्रपाठक

द्वे विद्ये वेदितव्य इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥४॥
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं
निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥५॥
अथर्वणवेद ० मु० उ० ॥ १ ॥

अर्थ—विद्या दो भांतिकी हैं जिसको ब्रह्मवेत्ता लोग परा और अपरा कहते हैं । दोनोंमेंसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, और शिक्षा, कल्प, व्याकरणं निरुक्त, छन्द, ज्योतिष आदि सब मिलके अपरा विद्या (परसम्बेद) कहलाती हैं और जिससे अविनाशी ब्रह्मजाना जाता है उसे परा विद्या (स्वसम्बेद) कहते हैं ।

<!-- image: A decorative emblem featuring a central white cloud-like shape with the text 'सत्यनाम' (Saty Nam) written in bold Devanagari script. The cloud is surrounded by a dark, jagged, sunburst-like border. Be -->

अथ कबीरमन्शूर प्रारम्भ

मंगलां चरण

धन सतगुरु सतपुरुषतू, सत्यनाम इस्थीर ।
सतसुकृत मुनीन्द्र तुही, करुणा पूर्ण कबीर ॥ १ ॥
तेरे गुण गावत सदा, सिद्ध साधु मति धीर ।
हंस परमहंस सब गावहीं सत्य धाम सुखथीर ॥ २ ॥
तेरिहि कृपा कटाक्षते, कटे काल जंजाल ।
बार बार तोहि नमन है, होहु कृपालु दयाल ॥ ३ ॥
हौ अज्ञान जानू नहीं, तेरे गुण की गाथ ।
तुहि सतगुरु कृपाकरी, मोहि लखाऊ पाथ ॥ ४ ॥
विनु दया सतगुरु तेरी, नाहि मोर निरवाह ।
अपनी और निहारहू, लगे सु भवको थाह ॥ ५ ॥
माथ नवा तू लेखनी, लिख सतगुरु गुणगाथ ।
पूरन पुरुष कबीर है, सब नाथनको नाथ ॥ ६ ॥
विनु पारख नहिं पाइये, सब देवनको देव ।
कृपा करे सतगुरु सही, सहजे पावे भेव ॥ ७ ॥
जापर कृपा सतगुरुकी होई । पूरन पुरुषको जाने सोई ॥
पूरन पुरुष सु आपु कबीरा । करि कृपा मेटे सब पीरा ॥ १ ॥
सब महुँ पूरण अदली आपा । करि अदल मेटै सब तापा ॥
काल गवको तोडनहारा । टूटे दिलको जोडनहारा ॥ २ ॥

जाके दर पर माथ नवावें । सिद्ध औलिया भूप सब जावें ॥
आपे पुरुष सो आप कबीरा । अगम्य अपार गहिर गंभीरा ॥ ३ ॥
एकै पुरुष रूप दोउ आही । उहवों पुरुष कबीर जग माहीं ॥
सत्यपुरुष आज्ञा अस होई । जाहु कबीर जग पहुँचो सोई ॥ ४ ॥
काल निरंजन ठाठ बहु ठाटे । जगत जीव न पावैं वाटे ।
भूले जीव भून वह खावे । लाख जीव नित प्रति सतावे ॥ ५ ॥
ऐसा जाल निरंजन लाया । एको जीव न मो पुर आया ॥
अब ज्ञानी जाओ संसारा । सुकृत जीवन करो उबारा ॥ ६ ॥
अस पुरुष जब आज्ञा दीन्हा । तब ज्ञानी रख पृथ्वी कीन्हा ॥
सोई सतगुरु सत्यकबीरा । आज्ञा पाइ आये भव तीरा ॥ ७ ॥
सोई ज्ञानी पुरुष है, सतगुरु सत्यकबीर ॥
रज वीरज ते पैदा नहीं, स्वाँसा नहीं शरीर ॥

कर्म जाल काटे गुरु देवा । आप न बन्धे करमके भेवा ॥
ज्ञान ज्योति वह अपहि आपा । गुरु सरूप सबघट महँ व्यापा ॥ १ ॥
करि पारख जोइ कोइ जाने । अलख ज्योति वह परत पिछाने ॥
गुप्त रूप वह जगमें डोले । शब्द रूप वह घट घटबोले ॥ २ ॥
बिना काम वह रूप अनूपा । सम दृष्टि वह रंक औ भूपा ॥
काल अग्नि महँ सबको दाहे । विनु सतगुरु नहि होय निवाहे ॥ ३ ॥
देह विदेह वह आप सरूपा । जीव हेत धर देह अनूपा ॥
हंस होय सोई पाह्वाने । अगम अगोचर किहिं विधिजाने ॥ ४ ॥
जब जाने तब उघरे भागा । दोऊ लोक महँ परम सुभागा ॥
जेते इष्ट जगत महँ जानो । सब कर इष्ट ताहि पहिचानो ॥ ५ ॥
अहे विनह देह दिखलावे । विनु दया न पार कोई पावे ॥
बड अचरजको करै बखाना । किहिं विर्वाध जाने जीव जहाना ॥ ६ ॥
आवत सरधा गुरु जगावे । बाहर भीतर एक दिखावे ॥
देखतबुद्धि थकित ह्वै तबहीं । दरशे रूप पुरुषकर जबहीं ॥ ७ ॥
भवभय भंजन दुखहरन, अम्मर करन शरीर ।
आदि युगादी आप है, अदली अदल कबीर ॥
सत्यपुरुष औ सत्य कबीरा । दुई रूप दरसाये मतिधीरा ॥
इष्टरूप सतपुरुषहि जाना । गुरु रूप सति कबीर पिछाना ॥ १ ॥

एकै रूप दरसै दुई भावा । जीव उबारन युक्ति बनावा ॥
ऐसी युक्ति न कबीर बनावत । नगत जीव न मारग पावत ॥ २ ॥
किहि विधि कहूँ कहा नहि जाई । आपे पुरुष सब माँहि रहाई ॥
घट घट महँ आप विराजे । आपे ब्रह्म जगत हँ छाजे ॥ ३ ॥
आपे आत्म परमात्म रूपा । जीव शीव सब आप अनपा ॥
द्वैत भाव न दरसे कोई । आपे पुरुष कबीर है सौई ॥ ४ ॥
आपे गुरु शिष्य पुनि आपै । एकै भाव जाप हुई जापै ॥
सिद्ध साधु औलिया जेते । बिन जाने जग भटकै तेते ॥ ५ ॥
करि कृपा जब आप लखावे । दे पारख जग भरम मिटावे ॥
काल जाल तबहीं टल जाई । निकटहि पावे पुरुष गुसाई ॥ ६ ॥
सत्य सत्य में कहूँ पुकारा । परमानंद अस वचन उचारा ॥
युगल आनन्द पाया तबहीं । उर्दू ते हिन्दी किया जबहीं ॥ ७ ॥

कबीर मन्शूर ग्रन्थको, आदि अरम्भन कौन ।

परमानन्द स्वामी रचे, उर्दू माहिं परवीन ॥

ताकी हिन्दी में करूँ, संत महंत आदेश ।

जो उर्दू जानत नहीं, पढि गुनि भिटै क्लेश ॥

उसी मङ्गला चरणका अनुवाद दूसरे छन्द में

कर वन्दना सद्गुरु चरण को आज ऐ तू लेखनी ? ।

लिखनी उन्ही की है कथा यह बात इतनी देखनी ॥

व्यापक सभीमें एकसा वह न्यायकारी पूर्ण है ।

अभिमानियोंका मान करता शीघ्र क्षणमें चूर्ण है ॥

सादृश्यता उसकी नहीं कोई कहीं भी कर सके ।

याचकोंकी पूर्ण इच्छा कौन दूजा कर सके ? ॥

दीनसे सम्राट तक तेरे हि भिक्षुक हैं सभी ।

तेरी दया बिन ज्ञानको कोई न पायेगा कभी ॥

आज्ञा पुरुषकी पायके सतलोकसे तुम आगये ।

आनन्द दायक मोद फिर सबके हृदय बिच छागये ॥

पापियोंके पारका बीड़ा उठाया आपने ।

सतलोकमें पहुँचा दिया फिर ज्ञान देकर आपने ॥

लक्ष जीवोंको जहाँपर काल खाता भूनकर ।

नित्य लीला थी यही जन सत्य पथका खूनकर ॥

उद्धार आपने उनका आकर किया है लोकमें ।

उनको बचाया शीघ्र ही जो थे बडेही शोकमें ॥

वह आपही कब्बीर हैं गुरु श्रेष्ठ सबसे ठीकही ।
उपदेश है प्रभु आपका पाषाण दृढ़ता लीकही ॥
माता पिता बिन जगतमें स्वयमेव आये आप हैं ।
ज्योती अलखसे हो प्रगट सबके मिटाये ताप हैं ॥
देही नहीं पर देह धारण की जगतमें आपने ।
दाय़ा दिखाई लोकमें कैसी जनोपर आपने ॥
आपके स्वसम्बेदका कुछ ज्ञान जिसने पालिया ।
त्रयलोककी सम्पत्ति सकल मानो उसीने पालिया ॥
पहचान जिसने आपकी शुभ ज्ञान पूर्वक कर लिया ।
शक्तिका भण्डार मानों पूर्ण दिलमें भरलिया ॥
सब दुःख दारुण शीघ्रही उसके हृदयसे छट गये ।
विज्ञानके गुरु श्रोतसे मानों सुधासे पट गये ॥
तर्कयुत सन्देह जब छाने लगे बहुजगतमें ।
सत् ज्ञानकी ज्योती जगाई पूर्ण अपने भक्तमें ॥
दाय़ा अलौकिक जो दिखाई आपने निज दास पर ।
बाहर व भीतर आपही भरपूर देखा आस धर ॥
गर न देते ज्ञान यह अज्ञान तम छाता बड़ा ।
मुक्ति पाता जीव नहीं यम जाल पासामें जड़ा ॥
माता पिता प्रभु आप हैं अरु ताप नाशक आप हैं ।
प्रत्येक जनमें बस रहे हरते विकट सन्ताप हैं ॥
सत्पुरुष ही प्रभु आप हैं यह ज्ञान योगी जानते ।
संत जन श्रद्धा सहित इसको सदाही मानते ॥
सिद्धि साधक और जितना साधुवृन्द महान है ।
केवल कृपापर आपकी गौरव सभीका मान है ॥
महिमा प्रभो हे ! आपकी मैं कौन वरणन कर सकूं ।
अति तुच्छ सेवक हूँ महा सब ज्ञान कैसे कर सकूं ॥
शक्ति मनुजमें है कहाँ गुणगान प्रभु तब कर सकें ।
महिमा अमित अगाध है तब पार क्योंकर कर सके ॥
केवल हमारी प्रेमयुत स्वीकार करिये वन्दना ।
अरु काटिये जंजालमय यह दीर्घ यमकी फन्दना ॥

अनुवादक—

साहित्यालङ्कार हंसदास शास्त्री
(सम्पादक कबीरचन्द्रोदय)

नीमा और नीरू

प्रथम आवृत्तिका मङ्गलाचरण

अनन्त धन्यवाद है उस महान् परमात्माको, जिसके गुणोंकी परमहंस गाकर, अपना कार्य सुधारते और मोक्षपदको प्राप्त करते हैं। उसकी दया अनन्त है, समस्त स्तुति और प्रार्थनाएँ उसीके निमित्त हैं।

शेर

नवा सीस अपना तु ऐ लेखनी । कि गुण तुझसे लिखने हैं जगदीश्वरी ॥
जो पूरनपुरुष सब जगह वरतमान । हृदयमें उन्हींका कराना है ज्ञान ॥
दया करके देगा जिसे वह समझ । तोफिर हरमेंहर उसको लेगानिरख ॥
कहीं भी कोई तेरा जोडा नहीं । तेरे न्यायसे है भरी सब जमीं ॥
घमंडीका तू दर्प करता है चूर्ण । हृदय भग्नकी आहत करता है पूर्ण ॥
तेरे द्वारके हैं भिखारी सभी । शाहंशाह राजा गदाओ वली ॥
पुरुषने कहा जाओ जगमें कवीर । मेरी आज्ञा लेके तुम ए गँभीर ॥
मेरे लोक पापी है आया नहीं । जहाँमें कोई मुक्ति पाया नहीं ॥
पुरुषकाल खाता उन्हें भूनकर । वह हर रोज लख जीवका खूनकर ॥
बचा लीजिए जो है शुद्धात्मा । जो स्वीकार करले मेरी आज्ञा ॥
वो है आदमी सारे गुरुका वपीर । जिसे कहते हैं सत्यसाहब कबीर ॥
न उसकी है माता है न कोई पिता । अलख ज्योतिसे है वह पैदा हुवा ॥
यहाँ आके उपदेश उसने किया । भटकतोंको राह उसने बतला दिया ॥
चले जाते थे जीव जो आगरपर । बचाया उन्हें आपने आनकर ॥
दया आगई लोगोंके शोकसे । चले आपले हुकम सतलोकसे ॥
सकल सृष्टिका है वही स्वामि एक । यही माने सब छोड़ कर अपनी टेक ॥
नहीं देह पर देह परगट हुआ । जो ज्ञानी हैं वे मनमेंले यह जमा ॥
उसे जानते दूर हो दुःख दंड । प्रशंसामें उसके जबों सबकी बंद ॥
कोई आदमी जो बड़ा बुद्धिमान । बढा करके बुद्धी लिया उसको जान ॥
नहीं देह पर देह जिसकी प्रकट । तअज्जुबकी बातें करूँ निष्कपट ॥
जब इस ध्यानमें गोता खाने लगा । दयालू गुरु तब जगाने लगा ॥
जो देखा तो बाहर व भीतर वही । सबी वस्तुमें है वही आपही ॥
मिहरबाँ दो सूरतको दिखलाया यों । गुरुहो मनुष्योंको सिखलाया यों ॥

१ यह अनुवाद मूलका ठीक नहीं है क्योंकि मूलमें लिखा है 'जो आबे नजर इल्म की दूरबी' इसका अर्थ है जो ज्ञानकी दृष्टिसे देखा जाता है। इसी प्रकार पहले अनुवादमें मूलके विरुद्ध अगणित अशुद्धियाँ हैं।

अगर वह दो सूरत दिखाता नहीं । तो इनसान घर अपना पाता नहीं ॥
न हरगिज कोई छूटता कालसे । न वे उसके बचता था जंजालसे ॥
यह क्यों कर कहूँ तुमसे मैं माजरा । स्वयं सत्पुरुष आदमीमें बसा ॥
जहाँ देखो वह आपही आप है । वही सबकी माता वही बाप है ॥
स्वयम् सत्पुरुष बना है कबीर । जिसे जानते सब हैं शाही फ़कीर ॥
जती सिद्ध साधु औलिया बह गये । जिसे उसने रक्खा सोई रह गये ॥


प्रथम भाग

पहिला अध्याय

प्रथम प्रकरण

सत्पुरुषका वर्णन

सत्पुरुष यथार्थ जगत कर्ता है, वह पवित्र है—वह न कभी गर्भमें आता है न रज वीर्यसे उत्पन्न होता है । वह विषयवासनासे रहित एकरस और पूर्ण है, सब संसार उसीसे प्रकट होता और उसीके आश्रय स्थित रहता है, वही यथार्थमें सबका कर्ता धर्ता है। उसका किसीसे राग और द्वेष नहीं है, वह पूर्ण और निर्विकार है—उसीका गुणानुवाद सब योगी यती करते हैं तथा उसीके निमित्त कुल स्तुति तथा प्रशंसाएँ हैं, उसका पूर्ण वर्णन कोई कर नहीं सकता, उसकी अनुग्रह बिना किसीकी मुक्ति नहीं होती, वह सर्वशक्तिमान् है। यदि उसकी इच्छा हो तो समस्त संसारकी एक पलमें मुक्ति कर दे, वेदकी तो सामर्थ ही क्या है स्वसंबेद भी उसका गुण गाते गाते मौनावलम्बी हो जाता है और कहता है, कि उसमें यह बल नहीं कि, वह उसका वर्णन कर सके और जिन मुनियोंने उसे पहचाना उनका भी यही कथन है कि, किसी ऋषि, मुनि और सिद्ध साधु इत्यादिमें इतनी योग्यता नहीं है कि, वह उसकी व्याख्या कर सके। इस प्रकार जब समस्त वेद और मुनियोंकी जिह्वा उसकी प्रशंसामें बंद है तब ऐसी अवस्थामें मुझ अल्पबुद्धि, अल्पज्ञ, तुच्छ मनुष्यकी क्या सामर्थ्य है कि, उसका गुण गा सके, मैं इतनाही कहना उचित समझता हूँ कि, हे प्रभु ! तेरी महिमा तूही जान सकता है, मुझ दोषी पापी विचारे पर दया कर ।


दूसरा प्रकरण

सत्यपुरुषके प्रतिनिधि (रसूल)

जिन सत्य पुरुषका विवरण ऊपर किया गया, उनके (पाकरसूल पवित्र अनागत वक्ता ( कबीरसाहब हैं, और उस सत्य पुरुषके प्रतिनिधिमें सब गुण वही हैं जो स्वतःसत्य पुरुषमें हैं, यह और वह एकही है इसमें और उसमें बाल बराबर भी विभिन्नता नहीं है। ज्ञानी लोग दिव्यदृष्टिसे देखते हैं कि, यही पवित्र सत्यपुरुषका प्रतिनिधि समस्त संसारका सच्चा गुरु है और सब अगुवाओं का अग्रगण्य है समस्त पथदर्शकोंको पथ दिखाता है। वह स्त्रीके रज तथा पुरुषके वीर्यसे कदापि उत्पन्न नहीं होता, वह स्वेच्छासे मानुषिकशरीरमें प्रकट होकर मनुष्योंको मुक्ति प्रदान करता है—उसकी आज्ञा सर्व सृष्टिपर है, उसने कई बेर कहा है कि, यदि उसकी इच्छा हो तो वह समस्त संसारको मुक्ति दे दे और उसने समस्त स्वसंवेदमें कहा है कि, मैंही स्वयं सत्यपुरुष हूँ, यहाँ वहाँ मैं ही हूँ, दूसरा कोई नहीं—मैं ही स्वयं सत्यपुरुष और मैं ही स्वयं अपना प्रतिनिधि आप हूँ।

सांसारिक जीवोंके उद्धारके निमित्त मैं दो नामोंसे प्रख्यात होता हूँ मैं स्वतः निजात्मस्वरूपमें स्थित हूँ तथा अन्य सब अनात्म हूँ,

जब सत्यपुरुषकी आज्ञा होती है, तब सत्य कबीर पृथ्वीपर प्रकट होते हैं। आप अपनी इच्छानुसार बालक, युवा वा वृद्धके रूप धारण कर विचरते हैं। न आपका कोई विशेष वेष है, न कोई विशेष रूप है और न आपका कोई विशेष नाम है। आपके नाम अनन्त हैं—पर चारों युगमें आपके चार नाम विशेष रूपसे प्रसिद्ध होते हैं। पहले पहल जब संसार प्रकट होता है उस समय आप पृथ्वीपर आते और मनुष्योंको उपदेश करते हैं, तब आप उस समय अर्थात् सत्ययुगमें सत्य-स्वकृतके नामसे विख्यात होते हैं, उसी स्वकृत तथा सत्यमुकृतजीकी प्रार्थना स्तुति पाँचों वेद और समस्त ऋषि मुनिगण करते हैं और उसकी दया से परमपद को प्राप्त होते हैं। जब दूसरा त्रेतायुग आरंभ होता है तब आप मुनीन्द्रके नामसे प्रसिद्ध होते हैं और द्वापरयुगमें आप करुणामय ऋषि कहलाते हैं और जब द्वापर व्यतीत होके कलियुग आरम्भ होता है तब आप, सत्यकबीर, कबीर साहब, शेख कबीर और सैयद अहमद कबीरके नामसे सुप्रसिद्ध होते हैं और अपना पंथ प्रकट कर और करोड़ों व्यक्तियोंको परमधाम पहुँचाते हैं। पहले तीन युगोंमें आपका पंथ विशेष


१ रसूल शब्दका अर्थ है भेजा हुआ। सत्यपुरुषने सत्यकबीरको, जीवोंको चेताने के लिये भेजा, इसलिये रसूल लिखा और कबीर सत्यपुरुषके स्थानापन्न जगतमें है इसलिये प्रतिनिधि।

प्रचलित नहीं होता, थोड़े लोग उद्धार पाते हैं, परन्तु इस कलियुगमें इस धर्मका विशेष आन्दोलन होगा, विशेषकर जब कलियुग पाँच सहस्र और पांचसौ वर्ष बीत जायेंगे, तब उस समयमें पृथ्वीके यावत् मनुष्य इस पंथको ग्रहण करेंगे । जब तक वह समय न आवेगा तबतक यह पंथ धीरे २ चलेगा, कभी न्यून और कभी अधिक होता रहेगा और जब वह समय आपहुँचेगा तब समस्त संसारको मुक्त करनेकी आज्ञा आवेगी और कबीर साहबकी कृपा कटाक्षसे समस्त मनुष्योंका अन्तःकरण शुद्ध हो जावेगा और सब पापोंसे अलग हो कर और सुकृत करनेकी ओर उद्यत होंगे और प्रत्येक घरोंमें सत्यनामकी पुकार होगी, सन्त महन्त ठौर ठौर फिर फिरके लोगोंको सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश देंगे और सब मनुष्योंके हृदय पवित्र होकर उस भक्तिको ग्रहण करेंगे तब कालपुरुषको पहचानके उससे दूर भागेंगे ।

तीसरा प्रकरण

स्वसम्बेदके प्राकट्यका वृत्तान्त ।

प्रथम सत्यपुरुष अकेला था, उसका न कोई साथी और न चेला था । जब उसने जगत् प्रकट करना चाहा तब उसने प्रथम ब्रह्मसृष्टि अर्थात् अपनी सन्तानों को प्रकट किया। उन सब सन्तानोंमें ज्ञानीजी अर्थात् अपनी सन्तानोंको प्रकट किया। उन सब सन्तानोंमें ज्ञानीजी अर्थात् कबीर साहब सबसे श्रेष्ठ हैं, अनेक बार कबीर साहबने स्वतः कहा है कि, वह जो सबसे ज्येष्ठ पुरुष कहलाता है स्वयं सत्यपुरुष है—अर्थात् मैं स्वयम् सत्य पुरुष हूँ, जिसे इस बातपर श्रद्धा है वह दूसरी ओर तनिक भी ध्यान नहीं देता और स्वयं कबीर साहबहीको सत्यपुरुष मानता है और जिसे इस बातका विश्वास नहीं है वह उन्हें सत्य पुरुषका भेजा हुआ मानता है । जब जैसा जिसका विश्वास होता है वैसाही उसका फल होता है । सो जब ब्रह्मसृष्टि उत्पन्न हुई तब कबीर साहब द्वारा ब्रह्मसृष्टिको स्वसंबेद मिला, और वह स्वसम्बेद कबीर साहबकी वाणी है । यह स्वसंबेद निष्कलंक तथा निर्दोष ब्रह्मसृष्टिमें प्रचलित हुआ । फिर सर्वशक्तिमानने जीवसृष्टिको उत्पन्न किया । ब्रह्म सृष्टि और जीवसृष्टि अर्थात् ब्रह्मकी रचना और जीवकी रचना अत्यंत पवित्र हैं । जैसे वे पवित्र तथा निर्दोष हैं वैसेही स्वसंबेद निर्मल तथा निष्कलंक हैं । इस स्वसंबेदमें किसी प्रकारकी अनुचित बात नहीं है अनुचित बातका उसमें चिह्नतक नहीं है यह स्वसंबेद अनन्त तथा असीम है । स्वसंबेद और उसकी

वाणीकी जो गिनती किया चाहे—वह समस्त पृथ्वीके पत्तोंकी गणना करे—अर्थात् पृथ्वीपरके वृक्षोंकी इतनी पत्तियाँ हैं और गङ्गाकी रेतमें इतने अणु कि, उनकी गिनती नहीं हो सकती है, ऐसाही असीम अनन्त स्वयंबेद है। जो उसकी गणना करनेका ध्यान करे वह विक्षिप्त है।

चौथा प्रकरण

ब्रह्मसृष्टि का वर्णन

सत्यपुरुषने जब सृष्टिके उत्पन्न करनेकी ओर ध्यान दिया तब पहले छः पुत्र प्रकट किये—१ सहज, २ अंकूर, ३ इच्छा, ४ सोहं, ५ अचिन्त और ६ अक्षर। यह छः पुत्र बड़े दयालु और प्राणीमात्रके निमित्त मुक्ति मार्ग दिखलानेवाले प्रकट हुए, जो सदैव सत्यपुरुषकी स्तुति करते रहते हैं। जब इन छः पुत्रोंको सत्यपुरुष प्रकट कर चुका तब उसने विचार किया कि, ये छः ब्रह्म दयालु और सब जीवोंको निर्भय कर देनेवाले प्रकट हुए हैं—पर भविष्यमें मनुष्य बहुत निर्लज्ज और निर्भय होकर, काम क्रोध लोभादिकोही, अपना ध्येय समझकर, सत्यपुरुषकी भक्तिसे विमुख होंगे और सुकृतकी ओर ध्यान न देंगे। यह विचार कर सत्यपुरुषने सातवें पुत्र अपने तेजसे प्रगट किया, यही अत्यंत बलवान् कालपुरुष सर्व जीवोंको दुःख-दायी हुआ। इसी प्रकार कहीं सात पुत्र, कहीं आठ पुत्र कहा है और कहीं सोलह पुत्र भी कहा है। ये सब ब्रह्मसृष्टिके अन्तर्गत हैं और कहीं ब्रह्म-कहीं हंस-द्वीप द्वीपान्तरोंपर अधिकृत कर दिये हैं। इस प्रकार सत्यपुरुषने अपने सब पुत्रोंको स्थान २ पर राज्य तथा प्रभुत्व देदिया—वे सब अपने २ द्वीपों और लोकोंमें राज्य करते हैं। पर ये सात पुत्र ऐसे हैं जिनकी पृथ्वी से लेकर सत्यपुरुषके लोकपर्यंत बराबर उनकी राहकी डोरी लगी हुई है—और जितने ब्रह्म भिन्न २ लोकों और द्वीपोंमें राज्य तथा प्रभुत्व भोगने हैं उनका वृत्तान्त स्वसंवेनमें दृढ़ने तथा उसके पाठ करनेपर प्रगट होगा। ये ब्रह्मसृष्टिके अधिकारी कभी बंधनमें नहीं आते केवल मायासृष्टिके लोगोंको बन्धन और कालका भय है। स्वसंवेदमें सृष्टिकी, उत्पत्तिके बहुतभेद हैं—यहां थोडासा लिखा गया है।

पाँचवां प्रकरण

काल पुरुषके प्राकट्यका वर्णन

अक्षर जो सत्य पुरुषका छठा पुत्र था, वह जहां बैठा था उस स्थानपर सारा जलहीजल था प्रत्येक स्थान जलसे परिपूर्ण था (देखो ग्रन्थ कबीरवाणी)

उस समय अक्षर ब्रह्म निद्राके वशीभूत हुआ अक्षरके ध्यान और सत्यपुरुषके शब्दसे एक अण्डा उत्पन्न हुआ वह अण्डा जलपर उतराता फिरता था । जब अक्षरकी नींद टूटी तब उसने अपने सामने जलके ऊपर तैरता हुआ एक अण्डा देखा और उस अण्डेके ऊपर एक वृत्तान्त लिखा गया पाया और वह वृत्तान्त सत्यपुरुषकी ओर से लिखा गया था, कि “हमने एक पुत्र भेजा है जो तुम्हारी बराबरी करेगा वह जहांतक आवे उसको आने देना, तीनलोक भवसागरका वह राज्य करेगा। सत्तरह असंख्य चौकडी युगतक उसके राज्यकी अवधि है—सो वह जब सत्तरह असंख्य चौकडी युग राज्य और भवसागरपर शासनका ठेका पूरा कर लेगा। तब वह हमारे समीप चला आवेगा। तदुपरान्त तुम्हारे शासन और अधिकारका समय आयेगा, जब तुम्हारा समय आवेगा तब सब मनुष्य मुक्त हो जावेंगे” इतना वृत्तान्त उस अण्डेके ऊपर लिखा हुआ था सो सब अक्षरने पढ़ लिया। जब अक्षरने वह पढ़लिया और जानलिया तब अक्षरके सामनेही उसके देखतेर वह अण्डा फूटा और उसमेंसे अत्यंत प्रबल कालपुरुष उत्पन्न हुआ तब अक्षरने उसको निरंजन कहकर पुकारा। इसी कारण उस कालपुरुषका नाम निरंजन पड़ा । (देखो उसका वृत्तान्त कबीरसाहब, ग्रन्थ कबीरवाणीमें लिखते हैं) ।

उसी अण्डेकी सूचना ऋग्वेदके असर्वोपनिषदमें लिखी है “जलके ऊपर अंडेका एक आकार प्रगट हुआ वह आकार स्थिर था फिर उस अण्डेमें मुँहके स्थान एक छिद्र प्रगट हुआ और उस मुँहसे अग्नि देवता उत्पन्न हुए, फिर नेत्रके स्थान दो छिद्र प्रगट हुए, इसी प्रकार सब इन्द्रियाँ प्रगट होगयी—” इसी अण्डेके विषयमें मनुसंहिताके पहले अध्यायमें लिखा है, देखो :—

“तदण्डमभवद्वैमं सहस्रांशुसमप्रभम् ।

तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥ ” (मनु. अ. १ श्लो. ९)

उसी अण्डेसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए, जो समस्त संसारके पिता और समस्त पिताओंके पिता हैं । यही बड़ा ब्रह्मा है और इसी मायावीकी माया समस्त संसार है।

फिर उसी अण्डेका उल्लेख तौरैतमें उत्पत्तिकी किताबमें है कि, सबसे पहले जल था और उस जलपर खुदाकी रूह कबूतरके सद्गुण तैरती फिरती थी—इसीका विवरण जबरूम है कि, खुदाबन्द जलोपर गरजता है।

उसी अण्डेका समाचार समावेदमें है कि, एक अंडेके दो भाग हुए, आधेसे

पृथ्वी हुई और आधेसे आकाश, हुआ ; वेही दोनों स्त्री पुरुष हुए, और समस्त संसारमें फैल गये.

उसी अण्डेका सभाचार योहन्ना इञ्जीलमें प्रगट करता है, यही अण्डा समस्त संसारका सृष्टिकर्ता तथा स्वामी है, वही शब्द है उसे शब्द कहो वा वाणी कहो—यही अंडा आदिमें प्रगट हुआ.

यही प्रथम ब्रह्म वा ब्रह्मा माना गया है ।

कबीर साहबने कहा है कि, यह कालपुरुष सत्यपुरुषकी क्रोधाग्निके भागसे उत्पन्न हुआ इससे यह पूर्णतया अग्नि है । यही कुल जगतको भस्म करनेवाली आग है, और उसमें अहंकार बहुत है इसके शरीरको सत्यपुरुषने विषय वासना द्वारा निर्मित किया है इसलिये यह शारीरिक भोग वृत्तियाँ और राज्य प्रभुत्व तथा अन्यान्य सांसारिक कामनाओंसे परिपूर्ण है, इसके गृह सतपुरुषने ऐसेही बनाये हैं । तीन लोकमें जितने जीवधारी हैं सो सब उसीकी संतति हैं और इसी का प्रभाव तथा विष समस्त देहधारियोंमें प्रवेशित हुआ है । यह अनेक नामोंसे इस संसारमें विख्यात हुआ है । इसका सबसे पहला नाम तो निरंजन है, काल, कैल, अंकार, ओङ्कार, निरंकार, निर्गुण, ब्रह्म, बह्मा, धर्मराज, खुदा, अल्ला, करीम, ब्रह्म, अद्वैत, केशव, नारायण, हरि, हर, विश्वम्भर, वासुदेव, जगदीश, जगन्नाथ, जगत्पति, राजेश्वर, ईश, परमेश्वर, विश्वनाथ, खालिक, रब, रबिल आलमीन, हक, इत्यादि अनन्त नाम इस कालपुरुषके हैं और वेदों तथा पुराणोंमें सब उसीके नाम हैं और समस्त भूमण्डलमें उसी जगदीश्वरकी श्रेष्ठता और बंदना पूजा कही है और इसीकी आज्ञापालनमें और पूजनमें समस्त संसार संलग्न है और इसी अग्निकी पूजन बंदन हो रही है, उस परमेश्वरका मुँह अग्नि है इसीलिये जो कुछ उसके नामसे आगमें डाला जाता है सो सब उसीको पहुँचता है । बलिप्रदान और महाबलिप्रदान सब इसी परमेश्वरके निमित्त हैं और यही परमेश्वर तीन लोकमें पूजा जाता है इस भवसागरमें इसीका राज्य और अधिकार है सब प्राणी उसीके अधीन हैं और उसीका नाम जपते हैं ।

छठी प्रकरण

कालपुरुषके तप करके तीनोंलोकका राज्य पानेका वर्णन

इच्छाओंसे आकर्षित हुआ यह कालपुरुष, एक चरणसे खड़ा होके तप करने में तत्पर हुआ और सत्तर युगों पर्यन्त बराबर एकही पगसे खड़ा होके सत्य पुरुषका

ध्यान करता रहा । तब सत्यपुरुष दयालु होके बोले कि, हे पुत्र ! माँग ! तू क्या वर माँगता है ? जो कुछ तू माँगेगा मैं तुझे प्रदान करूँगा । सत्यपुरुषने दयालु होके ऐसा कहा—तब निरंजनने विनय करके कहा कि, हे प्रभु ! यदि आप दयालु हुए हैं तो मुझे तीनोंलोक भवसागरका राज्य प्रदान कीजिये, जिससे मैं तीनलोक भवसागरकी रचना करूँ और सृष्टि करके रचनाको अपने अधीन करूँ और सारे भवसागरमें मेरा राज्य रहे । (देखो ग्रन्थ कबीरवाणीमें) ।

यह प्रार्थना निरञ्जनकी स्वीकृत हुई और सत्यपुरुषने कहा, हे पुत्र ! जो कुछ तूने माँगा, मैंने तुझे प्रदान किया, पर सृष्टिकी उत्पत्तिका कुल सामान कूर्मजीके पास है । तू उनके पास जा और सृष्टिकी उत्पत्तिका कुल सामान उनसे माँग । जब तू कूर्मजीके समीप जाना तो उनसे अत्यंत विनीत भावसे मिलना और दंडवत् प्रणाम करके अत्यंत नम्रतासे रचनाका सामान माँगना और जब कूर्मजी हर्षपूर्वक देवें तब तुम वह सामान लेके तीनलोक भवसागरकी रचना करना । यह बात सुनके निरञ्जनको अत्यंत हर्ष हुआ और वह आनन्दसे भग्न हो गया कि, अब तो सत्यपुरुषने तीनलोक भवसागरका राज्य हमको प्रदान कर दिया । भौति २ के हर्षमय ध्यान उसके मनमें उत्पन्न हो रहे थे और वह सोचता था कि, अब तो मैं तीनोंलोकोंका राजा हुआ हमारें बराबर दूसरा और कौन है । इसी प्रकार भग्न निरञ्जन पाताललोकको चला ।

सातवाँ प्रकरण

निरञ्जनका कूर्मके पास जाकर तीनों लोक की रचनाकी सामग्री माँगनेका वर्णन

इसी प्रसन्नता तथा उत्सुकताकी अवस्थामें निरञ्जन कूर्मजीके पास पहुँचा और देखा कि, कूर्मजीका शरीर अट्ठानवें करोड़ योजनाका है । इस कूर्मजी को सत्यपुरुष ने रचनाकी कुल सामग्री प्रदान करके भण्डारी बनाया है । रचना की समस्त सामग्री आपहीके पास उपस्थित रहती हैं, जब निरञ्जन कूर्मजीके पास पहुँचा, तो अपने घमंडमें आके कूर्मजीको दंडवत् प्रणाम कुछ न किया और यों कहा कि, हे कूर्मजी ! मुझको सत्यपुरुषने तीनोंलोक भवसागरका राज्य दिया है और कहा है कि, कूर्मजीसे रचनाका सब सामान लो । इस कारण मैं तुम्हारे पास आया हूँ कि, तुम मुझको सृष्टिकी सामग्री दो । यदि तुम मुझे न दोगे तो मैं तुमको

१. देखो परिशिष्ट प्रथम भाग प्रथम अध्याय । २. यह कूर्मजी कछुके आकार के हैं उनके सोलह शिर तथा चाँसठ हाथ हैं यह सत्यपुरुष के पुत्र पाताल में रहते हैं ।

मारके बलपूर्वक ले लूँगा । जब कूर्मजीने निरञ्जनकी ऐसी बातें सुनी तो जान लिया कि, यह अभिमानी और घमंडी काल उत्पन्न हुआ है जो ऐसी अभिमानयुक्त बातें कर रहा है । फिर उन्होंने निरंजनसे कहा कि, तुम यहाँसे चलेजाओ, मैं तुमको कुछ न दूँगा। क्योंकि, सत्यपुरुषकी कोई आज्ञा मुझे नहीं मिली है तुम सत्यपुरुषके पास चले जाओ । कूर्मजीके यह वाक्य सुनके कालपुरुष, जिसका शरीर कूर्मजीके शरीरसे आधा था, अत्यंत क्रुद्ध हुआ । तपके कारण निरञ्जन अति बलिष्ठ होगया था, कूर्मजीको युद्धके निमित्त ललकारा और लड़ाईके लिये प्रस्तुत होगया तथा क्रोधमें बकता झकता कूर्मजीपर आन टूटा । दोनोंमें द्वंद्व युद्ध होने लगा । महाभयंकर युद्ध हुआ । निरंजन वह दाब पेश करने लगा कि, जिसमें वह सृष्टिकी रचनाका समान पाजावे । अन्तमें निरञ्जनने कूर्मजीपर अत्यंत कठिन आक्रमण किया और अपने नखोंद्वारा उनके तीन सौस काट डाले। जब कूर्मजीके तीन सिर कटे तब उनके पेटके भीतरसे रचनाकी समस्त सामग्री बहिर्गत हो गयी । सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, पञ्चतत्त्व, तीन गुण इत्यादि उनके पेट भण्डारसे बाहर निकल आये । सब चल तथा अचल तारे छिटक गये, पृथ्वी आकाशकी उत्पत्तिकी प्रगट हो गई और रचनाकी कुल सामग्री अव्यक्तसे व्यक्त होगयी ॥

आठवाँ प्रकरण

कूर्मजीका सत्यपुरुषके पास फरियाद करना और निरंजनको दण्ड मिलना

जब निरंजनने कूर्मजीसे ऐसी धृष्टता की, तब कूर्मजीने अपने ध्यानमें सत्यपुरुषकी सेवामें बिनती की और कहा कि, अहो सत्यपुरुष ! निरंजनने मुझसे इस प्रकारकी धृष्टता और बल प्रयोग किया है जिससे मुझे नितान्तही कष्ट पहुँचा है । जब कूर्मजीने इस प्रकार दोहाई दी तब दयालु सत्यपुरुषने ऐसा उत्तर दिया कि, यह काल निरञ्जन बड़ाही घमंडी हुआ है—यदि मैं उसे इसी समय विलोपित कर दूँ तब तो यह जो रचनाका कौतुक है सो सब नष्ट हो जावेगा। कारण यह कि, मेरे समस्त पुत्रोंकी नाल एकही धागेंमें बँधे रहनेके कारण, एकको नष्ट करते ही सब नष्ट हो जावेंगे। और मेरी समस्त रचना भी नष्ट हो जायगी । इस कारण मैं अब इसका नाश तो नहीं करता किन्तु, उसे यह दण्ड देता हूँ कि, भविष्यमें वह अब मेरे दर्शन न पा सकेगा और यह काल एक लाख जीव प्रतिदिवस खावेगा और सवालक्ष उत्पन्न करेगा । इतना सत्यपुरुषने कूर्मजीसे कहा ।

नवों प्रकरण

निरंजनका पुनः तपस्याकर बीजखेत माँगना

अब निरंजनका बूत्तान्त सुनो कि, उसने जो कूर्मजीके तीन शीश काट लिये थे उन तीनों सिरोंको खालिया और फिर शून्यमें जाके फिर एक पगसे खड़ा हो योग समाधि लगाकर भहा कठिन तपस्या करने लगा । इस प्रकार अटल तपस्या करते २ सोलहयुग बीत गये, तब पुनः सत्यपुरुषकी वाणी आयी कि, अब क्या चाहता है ? तब निरंजनने निवेदन किया कि, मुझे अब बीजखेत प्रदान कीजिये—कारण यह कि, बिना बीजखेतके उत्पत्ति नहीं हो सकती—तब सत्यपुरुषने कहा—तथास्तु ।

दसवों प्रकरण

बीजखेत, अर्थात् आदिभवानीकी उत्पत्तिका वर्णन

जब निरंजनने बीजखेतकी प्रार्थना की, तब सत्यपुरुषने एक कन्या प्रकट की । वही आगे अधाके नामसे प्रसिद्ध हुई । यह ऐसी सुन्दरी तथा हावभाववाली प्रकट हुई कि, जिसको देखतेही चित्त चञ्चल हो आसक्त हो जावे—उस मोहिनी मूर्ति तथा मनोहर रूपका बहुत कुछ विवरण स्वसंबेदमें है । जब वह आदि कुमारी उत्पन्न हुई तब सत्यपुरुषने कहा कि प्यारी बेटी ! तू निरंजनके पास जा, तेरे ऊपर सदैव मेरी दया रहेगी । तब वह कन्या निरंजनके पास आयी और जहाँ निरंजन योग समाधि लगाकर बैठा था वहाँ आकर एक पैरसे खड़ी हुई । जब निरंजनकी समाधि खुली तो अपने सामने कन्याको देखकर कहा कि, हे भवानी ! तुझको मेरे निमित्त सत्यपुरुषने उत्पन्न किया है, आओ हम तुम दोनों मिलकर तीनलोक भवसागरकी रचना करें । उस समय निरंजन कामातुर हुआ । तब अध्याने कहा कि हम तुम दोनों भाई बहिन हैं—मेरा तुम्हारा सम्बन्ध उचित नहीं है । तब निरंजनने उसे बहुत कुछ समझाया, परन्तु भवानीने नहीं माना, तब वह अत्यंत क्रोधित होकर अधाको पकड़ अपने मुँहमें रखकर निगलने लगा । निगलने के समय अध्याने सत्यपुरुष ! सत्यपुरुष !! कहकर पुकारा । इतनेमें कालपुरुष भवानीको निगलही गया । अधाको पुकार सुनकर सत्यपुरुषकी आत्से तुरन्त जोगजीतजी प्रकट हुए—और सुरतिके तीरसे कालको मारा, तब उसने उसी समय अधाको अपने मुँहके बाहर डाल दिया । जोगजीतजी उसी समय अन्तर्धान हो