श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५५- योगमार्गके द्वारा भगवान् महेश्वरके ध्यानकी विधि, पाँच प्रकारके योग, शिवपाशुपतयोगकी महिमा, श्रीलिङ्गमहापुराणका परिचय तथा श्रीलिङ्गमहापुराणके श्रवण एवं पठनका माहात्म्य
| ७५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| एवं मन्त्रविधिं ज्ञात्वा शिवलिङ्गं समर्चयेत्।<br>तस्य पाशक्षयोऽतीव योगिनो मृत्युनिग्रहः॥ ३१<br><br>त्रियम्बकसमो नास्ति देवो वा घृणयान्वितः।<br>प्रसादशीलः प्रीतश्च तथा मन्त्रोऽपि सुव्रतः॥ ३२<br><br>तस्मात्सर्वं परित्यज्य त्रियम्बकमुमापतिम्।<br>त्रियम्बकेण मन्त्रेण पूजयेत्सुसमाहितः॥ ३३<br><br>सर्वावस्थां गतो वापि मुक्तोऽयं सर्वपातकैः।<br>शिवध्यानान्न सन्देहो यथा रुद्रस्तथा स्वयम्॥ ३४<br><br>हत्वा भित्त्वा च भूतानि भुक्त्वा चान्यायतोऽपि वा।<br>शिवमेकं सकृत्स्मृत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ३५ | इस प्रकार मन्त्रकी विधिको जानकर शिवलिङ्गकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे उस योगीके पाश (बन्धन)-का पूर्णरूपसे विनाश और उसके मृत्युका निग्रह हो जाता है। हे सुव्रतो! त्रियम्बकके समान कोई अन्य देवता दयालु नहीं हैं; वे सरलतासे प्रसन्न होनेवाले तथा प्रेममय हैं, उनका मन्त्र भी वैसा ही है। अतः सब कुछ छोड़कर दत्तचित्त होकर त्रियम्बकमन्त्रसे उमापति त्रियम्बककी पूजा करनी चाहिये। किसी भी दशाको प्राप्त मनुष्य शिवके ध्यानसे सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और जैसे रुद्र हैं; वैसे ही स्वयं हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। प्राणियोंका छेदन-भेदन करके तथा अन्यायपूर्वक वस्तुओंका भोग करके भी मनुष्य एकमात्र शिवका केवल एक बार ध्यान करके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ३१—३५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सार्थत्रियम्बकमन्त्रवर्णनं नाम चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'सार्थत्रियम्बकमन्त्रवर्णन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५४॥
पचपनवाँ अध्याय
योगमार्गके द्वारा भगवान् महेश्वरके ध्यानकी विधि, पाँच प्रकारके योग, शिवपाशुपत-योगकी महिमा, श्रीलिङ्गमहापुराणका परिचय तथा श्रीलिङ्गमहापुराणके श्रवण एवं पठनका माहात्म्य
| ऋषय ऊचुः<br>कथं त्रियम्बको देवो देवदेवो वृषध्वजः।<br>ध्येयः सर्वार्थसिद्धयर्थं योगमार्गेण सुव्रत॥ १<br>पूर्वमेवापि निखिलं श्रुतं श्रुतिसमं पुनः।<br>विस्तरेण च तत्सर्वं सङ्क्षेपाद्वक्तुमर्हसि॥ २ | **ऋषिगण बोले—**हे सुव्रत! सभी मनोरथोंकी सिद्धिके लिये योगमार्गके द्वारा तीन नेत्रोंवाले, देवोंके भी देव तथा वृषकी ध्वजावाले भगवान् शिवका ध्यान किस प्रकार करना चाहिये? पूर्वमें भी हम आपसे वेदतुल्य जो सम्पूर्ण प्रसंग विस्तारपूर्वक सुन चुके हैं, वह सब संक्षेपमें बतानेकी कृपा कीजिये॥ १-२॥ |
| सूत उवाच<br>एवं पैतामहेनैव नन्दी दिनकरप्रभः।<br>मेरुपृष्ठे पुरा पृष्टो मुनिसङ्घैः समावृतः॥ ३<br>सोऽपि तस्मै कुमाराय ब्रह्मपुत्राय सुव्रतः।<br>मिथः प्रोवाच भगवान् प्रणताय समाहितः॥ ४ | **सूतजी बोले—**हे सुव्रतो! इसी प्रकार पूर्वकालमें मेरुपर्वतके शिखरपर ब्रह्मापुत्र सनत्कुमारने सूर्यके समान प्रभाववाले तथा मुनियोंसे घिरे हुए नन्दीसे पूछा था। तब भगवान् नन्दी भी उन विनम्र ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारसे समाहितचित्त होकर कहने लगे॥ ३-४॥ |
| नन्दिकेश्वर उवाच<br>एवं पुरा महादेवो भगवान्नीललोहितः।<br>गिरिपुत्र्याम्बया देव्या भगवत्यैकशय्यया॥ ५<br>पृष्टः कैलासशिखरे हृष्टपुष्टतनूरुहः। | **नन्दिकेश्वर बोले—**यही बात पूर्व समयमें कैलास शिखरपर एक ही शय्यापर साथ-साथ विराजमान हिमालयपुत्री भगवती देवी पार्वती ने पुलकित रोमोंवाले |
अध्याय ५५ ] योगमार्गके द्वारा भगवान् महेश्वरके ध्यानकी विधि ७५७
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| भगवान् नीललोहित महादेवसे पूछा था॥ ५ १/२ ॥ | |
| श्रीदेव्युवाच<br>योगः कतिविधः प्रोक्तस्तत्कथं चैव कीदृशम् ॥ ६<br>ज्ञानं च मोक्षदं दिव्यं मुच्यन्ते येन जन्तवः । | श्रीदेवी बोलीं— योग कितने प्रकारका कहा गया है, उसका स्वरूप कैसा है तथा वह किस प्रकारका है ? वह दिव्य तथा मोक्षदायक ज्ञान कैसा है, जिसके द्वारा प्राणी [बन्धनसे] मुक्त हो जाते हैं?॥ ६ १/२ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>प्रथमो मन्त्रयोगश्च स्पर्शयोगो द्वितीयकः ॥ ७<br>भावयोगस्तृतीयः स्यादभावश्च चतुर्थकः ।<br>सर्वोत्तमो महायोगः पञ्चमः परिकीर्तितः ॥ ८ | श्रीभगवान् बोले— पहला मन्त्रयोग है, दूसरा स्पर्शयोग है, तीसरा भावयोग है और चौथा अभावयोग है; पाँचवाँ महायोग है, जो सर्वोत्तम कहा गया है॥ ७-८॥ |
| ध्यानयुक्तो जपाभ्यासो मन्त्रयोगः प्रकीर्तितः ।<br>नाडीशुद्ध्यधिको यस्तु रेचकादिक्रमान्वितः ॥ ९<br>समस्तव्यस्तयोगेन जयो वायोः प्रकीर्तितः ।<br>बलस्थिरक्रियायुक्तो धारणाद्यैश्च शोभनैः ॥ १०<br>धारणात्रयसन्दीप्तो भेदत्रयविशोधकः ।<br>कुम्भकावस्थितोऽभ्यासः स्पर्शयोगः प्रकीर्तितः ॥ ११<br>मन्त्रस्पर्शविनिर्मुक्तो महादेवं समाश्रितः ।<br>बहिरन्तर्विभागस्थस्फुरत्संहरणात्मकः ॥ १२<br>भावयोगः समाख्यातश्चित्तशुद्धिप्रदायकः ।<br>विलीनावयवं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ १३<br>शून्यं सर्वं निराभासं स्वरूपं यत्र चिन्त्यते ।<br>अभावयोगः सम्प्रोक्तश्चित्तनिर्वाणकारकः ॥ १४<br>नीरूपः केवलः शुद्धः स्वच्छन्दं च सुशोभनः ।<br>अनिर्देश्यः सदालोकः स्वयंवेद्यः समन्ततः ॥ १५<br>स्वभावो भासते यत्र महायोगः प्रकीर्तितः ।<br>नित्योदितः स्वयंज्योतिः सर्वचित्तसमुत्थितः ॥ १६<br>निर्मलः केवलो ह्यात्मा महायोग इति स्मृतः । | ध्यानसे युक्त जपका अभ्यास मन्त्रयोग कहा गया है। रेचक आदि प्राणायामके द्वारा नाड़ियोंका शुद्धीकरण समस्त-व्यस्त-योगसे प्राणका विजय कहा गया है। वाजीकरण क्रियासे युक्त [वीर्यस्तम्भनरूप] शोभन धारणादि अंगोंसे सम्पन्न, सात्त्विक आदि त्रिविध धारणासे प्रकाशित, विश्व-प्राज्ञ-तैजसरूप भेदत्रयका शोधक, कुम्भकमें स्थित ध्यानाभ्यास ही स्पर्शयोग कहा गया है। मन्त्र तथा स्पर्शयोगसे पृथक्, महादेवपर अवलम्बित, बाहर तथा भीतरकी दशाके स्फुरण तथा संहरणसे युक्त और चित्तको शुद्धि प्रदान करनेवाला योग भावयोग कहा गया है। चराचर सम्पूर्ण जगत् जिसमें विलीन है, जिसमें सम्पूर्ण स्वरूपका शून्य तथा आभासहीन रूपमें चिन्तन किया जाता है, चित्तका निर्वाण करनेवाले उस योगको अभावयोग कहा गया है। जो रूपहीन, अद्वितीय, निर्मल, स्वतन्त्र, अत्यन्त सुन्दर, अनिर्देश्य, सर्वदा प्रकाशमान, हर प्रकारसे स्वयं जाननेयोग्य है तथा जिसमें अपनी आत्माकी सत्ता भासित होती है, उसे महायोग कहा गया है। आत्मा सदा प्रकाशित है, स्वयं ज्योतिर्मय है, सम्पूर्ण चित्तोंसे ऊपर उठा हुआ है, विशुद्ध है तथा अद्वितीय है—यह अनुभव होना महायोग कहा गया है॥ ९-१६ १/२ ॥ |
| अणिमादिप्रदाः सर्वे सर्वे ज्ञानस्य दायकाः ॥ १७<br>उत्तरोत्तरवैशिष्ट्यमेषु योगेष्वनुक्रमात् ।<br>अहं सङ्गविनिर्मुक्तो महाकाशोपमः परः ॥ १८ | ये सभी योग अणिमा आदि सिद्धियोंको देनेवाले तथा ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं। इन योगोंमें क्रमशः एकके बाद दूसरेमें पूर्वकी अपेक्षा वैशिष्ट्य है। यह महायोग अहंके संगसे रहित, महान् आकाशके तुल्य, |
| ७५८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| सर्वावरणनिर्मुक्तो ह्यचिन्त्यः स्वरसेन तु।<br>ज्ञेयमेतत्समाख्यातमग्राह्यमपि दैवतैः॥ १९<br><br>प्रविलीनो महान् सम्यक् स्वयंवैद्यः स्वसाक्षिकः।<br>चकास्त्यानन्दवपुषा तेन ज्ञेयमिदं मतम्॥ २०<br><br>परीक्षिताय शिष्याय ब्राह्मणायहिताग्नये।<br>धार्मिकायाकृतघ्नाय दातव्यं क्रमपूर्वकम्॥ २१<br><br>गुरुदैवतभक्ताय अन्यथा नैव दापयेत्।<br>निन्दितो व्याधितोऽल्पायुस्तथा चैव प्रजायते॥ २२<br><br>दातुरप्येवमनघे तस्माज्ज्ञात्वैव दापयेत्।<br>सर्वसङ्गविनिर्मुक्तो मद्भक्तो मत्परायणः॥ २३<br><br>साधको ज्ञानसंयुक्तः श्रौतस्मार्तविशारदः।<br>गुरुभक्तश्च पुण्यात्मा योग्यो योगरतः सदा॥ २४ | सर्वोत्कृष्ट, समस्त आवरणोंसे मुक्त और यथार्थतः अचिन्त्य है। उस ज्ञानको देवताओंके द्वारा भी अग्राह्य कहा गया है। यह परमात्मामें विलीन कर देनेवाला, महान्, स्वयंवैद्य तथा स्वयं अपना साक्षी है और आनन्दपूर्ण शरीरसे प्रकाशित होनेवाला है। यह अहंकाररहित पुरुषके द्वारा ही जाननेयोग्य है। [मेरे द्वारा उपदिष्ट] इस मत (ज्ञान)-को परीक्षा किये गये शिष्य, अग्निहोत्री ब्राह्मण, धर्मपरायण, कृतज्ञ और गुरु-देवताके प्रति भक्ति रखनेवाले व्यक्तिको ही प्रदान करना चाहिये; अन्यको कभी नहीं देना चाहिये। अनधिकारी व्यक्ति निन्दित, रोगसे पीड़ित तथा अल्प आयुवाला होता है और इसे प्रदान करनेवालेकी भी यही दशा होती है; हे अनघे! इसलिये पूर्णरूपसे परीक्षा करके ही इसे देना चाहिये। इसे प्राप्त करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण आसक्तियोंसे रहित, मेरा भक्त, मेरे प्रति परायण, साधक, ज्ञानवान्, श्रुति-स्मृतिसम्बन्धी कर्मोंका ज्ञान रखनेवाला, गुरुमें भक्ति रखनेवाला, पुण्यात्मा, योग्यतासम्पन्न तथा सर्वदा योगमें निरत रहनेवाला होता है॥ १७—२४॥ | | एवं देवि समाख्यातो योगमार्गः सनातनः।<br>सर्ववेदागमाम्भोजमकरन्दः सुमध्यमे॥ २५<br><br>पीत्वा योगामृतं योगी मुच्यते ब्रह्मवित्तमः।<br>एवं पाशुपतं योगं योगैश्वर्यमनुत्तमम्॥ २६<br><br>अत्याश्रममिदं ज्ञेयं मुक्तये केन लभ्यते।<br>तस्मादिष्टैः समाचारैः शिवार्चनरतैः प्रिये॥ २७<br><br>इत्युक्त्वा भगवान् देवीमनुज्ञाप्य वृषध्वजः।<br>शङ्कुकर्णं समासाद्य युयोजात्मानमात्मनि॥ २८ | हे देवि! हे सुमध्यमे! इस प्रकार यह योगमार्ग सनातन और समस्त वेद तथा आगमरूपी कमलका मकरन्द कहा गया है। इस योगरूपी अमृतका पान करके ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ योगी [भवबन्धनसे] मुक्ति प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार यह पाशुपतयोग समस्त योगोंका ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला तथा सर्वोत्कृष्ट है। इसे ब्रह्मचर्य आदि किसी आश्रमकी अपेक्षा न रखनेवाला जानना चाहिये। अतः हे प्रिये! यह सभी प्राणियोंके हितकी कामना करनेवाले शिवपूजापरायण लोगोंको किसी अनिर्वचनीय सौभाग्यसे ही मुक्तिके लिये प्राप्त होता है। ऐसा कहनेके पश्चात् वृषध्वज भगवान् शिव देवी पार्वतीसे आज्ञा लेकर और अपने गण शंकुकर्णको द्वारपर नियुक्त करके स्वयं समाधिमें लीन हो गये॥ २५—२८॥ | | शैलादिरुवाच<br>तस्मात्त्वमपि योगीन्द्र योगाभ्यासरतो भव।<br>स्वयम्भुव परा मूर्तिर्नूनं ब्रह्ममयी वरा॥ २९ | **शैलादि बोले—**अतएव हे योगीन्द्र! आप भी योगाभ्यासमें संलग्न हो जाइये। स्वयंभू शिवकी परामूर्ति |
अध्याय ५५ ] योगमार्गके द्वारा भगवान् महेश्वरके ध्यानकी विधि [ ७५९
| तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मोक्षार्थी पुरुषोत्तमः।<br>भस्मस्नायी भवेन्नित्यं योगे पाशुपते रतः॥ ३०<br>ध्येया यथाक्रमेणैव वैष्णवी च ततः परा।<br>माहेश्वरी परा पश्चात्सैव ध्येया यथाक्रमम्॥ ३१<br>योगेश्वरस्य या निष्ठा सैषा संहृत्य वर्णिता॥ ३२ | निश्चितरूपसे श्रेष्ठ तथा ब्रह्ममयी है। अतः मोक्षकी कामना करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषको पूर्ण प्रयत्नसे भस्म-स्नान करके पाशुपतयोगमें नित्य संलग्न रहना चाहिये। सर्वप्रथम ब्राह्मी शक्तिका ध्यान करना चाहिये, इसके बाद परा वैष्णवी शक्तिका और तत्पश्चात् परा माहेश्वरी शक्तिका ध्यान करना चाहिये। इस प्रकार योगेश्वर शिवकी जो पराकाष्ठा है, उसका मैंने संक्षेपमें वर्णन कर दिया॥ २९—३२॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>एवं शिलादपुत्रेण नन्दिना कुलनन्दिना।<br>योगः पाशुपतः प्रोक्तो भस्मनिष्ठेन धीमता॥ ३३<br>सनत्कुमारो भगवान् व्यासायामिततेजसे।<br>तस्मादहमपि श्रुत्वा नियोगात्सत्रिणामपि॥ ३४<br>कृतकृत्योऽस्मि विप्रेभ्यो नमो यज्ञेभ्य एव च।<br>नमः शिवाय शान्ताय व्यासाय मुनये नमः॥ ३५ | सूतजी बोले—इस प्रकार अपने कुलको आनन्द प्रदान करनेवाले भस्मधारी शिलादपुत्र बुद्धिमान् नन्दीने सनत्कुमारसे पाशुपतयोगका वर्णन किया। भगवान् सनत्कुमारने अमित तेजवाले व्यासजीको इसे बताया और उनसे सुनकर उनके आदेशसे मैंने यज्ञ-सत्रमें उपस्थित मुनियोंको बताया। मैं कृतकृत्य हूँ। विप्रोंको नमस्कार है, यज्ञोंको नमस्कार है, शान्त शिवको नमस्कार है और व्यासमुनिको नमस्कार है॥ ३३—३५॥ |
| ग्रन्थैकादशसाहस्रं पुराणं लैङ्गमुत्तमम्।<br>अष्टोत्तरशताध्यायमादिमांशमतः परम्॥ ३६<br>षट्चत्वारिंशदध्यायं* धर्मकामार्थमोक्षदम्।<br>अथ ते मुनयः सर्वे नैमिषेयाः समाहिताः॥ ३७<br>प्रणेमुर्देवमीशानं प्रीतिकण्टकितत्वचः।<br>शाखां पौराणिकामेवं कृत्वैकादशिकां प्रभुः॥ ३८<br>ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवानिदं वचनमब्रवीत्।<br>लैङ्गमाद्यन्तमखिलं यः पठेच्छृणुयादपि॥ ३९<br>द्विजेभ्यः श्रावयेद्वापि स याति परमां गतिम्।<br>तपसा चैव यज्ञेन दानेनाध्ययनेन च॥ ४०<br>या गतिस्तस्य विपुला शास्त्रविद्या च वैदिकी।<br>कर्मणा चापि मिश्रेण केवलं विद्ययापि वा॥ ४१<br>निवृत्तिश्चास्य विप्रस्य भवेद्भक्तिश्च शाश्वती।<br>मयि नारायणे देवे श्रद्धा चास्तु महात्मनः॥ ४२ | यह उत्तम श्रीलिङ्गपुराण ग्यारह हजार श्लोकोंमें निबद्ध है। इसके प्रथम भागमें एक सौ आठ अध्याय हैं और उत्तर भागमें पचपन अध्याय हैं। यह पुराण धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। तब प्रसन्नताके कारण रोमांचित नैमिषारण्यवासी उन सभी मुनियोंने एकाग्रचित्त होकर भगवान् ईशान (शिव)-को प्रणाम किया। पुराणोंकी ग्यारहवीं शाखाकी रचना करके स्वयंभू तथा प्रभुतासम्पन्न भगवान् ब्रह्माने यह वचन कहा था—‘जो मनुष्य इस सम्पूर्ण श्रीलिङ्गपुराणको आदिसे अन्ततक पढ़ता है, सुनता है अथवा द्विजोंको सुनाता है, वह परमगति प्राप्त करता है। तपस्यासे, यज्ञसे, दानसे, वेदाध्ययनसे, उत्तम कर्मसे, कर्म तथा ज्ञानके मिश्रित प्रभावसे अथवा केवल ज्ञानसे उसकी जो गति होती है, वह इस पुराणके पठन-श्रवणसे हो जाती है; उसे विपुल शास्त्रविद्या तथा वैदिकी विद्या प्राप्त हो जाती है; उस विप्रको शाश्वत शिवभक्ति मिल जाती है; उसका मोक्ष हो जाता है और उस महात्माकी श्रद्धा |
* अत्र षट् च नव च चत्वारिंशच्च षट्चत्वारिंशदिति मध्यमपदलोपिसमासो ज्ञेयः।
| ७६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| वंशस्य चाक्षया विद्या चाप्रमादश्च सर्वतः।<br>इत्याज्ञा ब्रह्मणस्तस्मात्तस्य सर्वं महात्मनः ॥ ४३<br><br>ऋषय प्रोचुः<br><br>ऋषेः सूतस्य चास्माकमेतेषामपि चास्य च।<br>नारदस्य च या सिद्धिस्तीर्थयात्रारतस्य च ॥ ४४<br><br>प्रीतिश्च विपुला यस्मादस्माकं रोमहर्षण ॥ ४५<br><br>सा सदास्तु विरूपाक्षप्रसादात्तु समन्ततः।<br>एवमुक्तेषु विप्रेषु नारदो भगवानपि ॥ ४६<br><br>कराभ्यां सुशुभाग्राभ्यां सूतं पस्पर्शवांस्त्वचि।<br>स्वस्त्यस्तु सूत भद्रं ते महादेवे वृषध्वजे ॥ ४७<br><br>श्रद्धा तवास्तु चास्माकं नमस्तस्मै शिवाय च ॥ ४८ | मुझमें, नारायणमें तथा शिवमें हो जाती है। उसके वंशमें अक्षय विद्या सुलभ रहती है और हर प्रकारसे अप्रमाद विद्यमान रहता है।' यह ब्रह्माजीकी आज्ञा है, अतः यह सब उन्हीं महात्माकी कृपासे हुआ है॥ ३६—४३॥<br><br>ऋषिगण बोले— हे रोमहर्षण! आप ऋषि सूतको, हम मुनियोंको, तीर्थयात्रामें रत इन नारदको, जो महान् सिद्धि तथा भगवत्प्रीति प्राप्त हुई; वह विरूपाक्ष भगवान् शिवकी कृपासे चारों ओर विद्यमान रहे। विप्रोंके ऐसा कहनेपर भगवान् नारदने भी अपने पवित्र हाथोंके अग्रभागसे सूतजीके शरीरका स्पर्श किया और इस प्रकार कहा—हे सूतजी! आपका मंगल हो, आपका कल्याण हो, वृषध्वज महादेवमें आपकी तथा हमलोगोंकी श्रद्धा रहे; उन भगवान् शिवको नमस्कार है—‘नमस्तस्मै शिवाय च’॥ ४४—४८॥ |
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पाशुपतयोगमार्गवर्णने लिङ्गपुराणश्रवणपठनमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें पाशुपतयोगमार्गवर्णनके प्रसंगमें 'लिङ्गपुराणश्रवणपठनमाहात्म्यवर्णन' नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५५ ॥
॥ सम्पूर्णमिदं श्रीलिङ्गमहापुराणम् ॥
॥ श्रीलिङ्गमहापुराण पूर्ण हुआ ॥
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः॥
श्रीलिङ्गमहापुराण-परिशिष्ट
[ वाराणसी-माहात्म्य ]
[ धर्मशास्त्रीय निबन्धग्रन्थोंकी परम्परामें पं० लक्ष्मीधरभट्ट-विरचित 'कृत्यकल्पतरु' अत्यन्त प्राचीन, बहुश्रुत तथा अत्यधिक प्रामाणिक ग्रन्थ है। इसके प्रणेता पं० लक्ष्मीधर कान्यकुब्जनरेश गोविन्दचन्द्रके महामन्त्री थे। पं० लक्ष्मीधरका समय १२वीं शताब्दी है। परवर्ती निबन्धकारोंने कृत्यकल्पतरुके वचनोंको अपने ग्रन्थोंमें सादर उपन्यस्त किया है। चतुर्वर्गचिन्तामणि-जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थके प्रणेता 'हेमाद्रि' तो इस ग्रन्थ तथा पं० लक्ष्मीधरके वैदुष्यसे इतने प्रभावित थे कि उन्होंने इन्हें 'भगवान्' शब्दसे सम्बोधित किया है।
'कृत्यकल्पतरु' धर्मशास्त्रीय कृत्योंके संग्रहका एक विशाल ग्रन्थ है। यह ब्रह्मचारिकाण्ड, गृहस्थकाण्ड, श्राद्धकाण्ड, दानकाण्ड, शुद्धिकाण्ड, व्यवहारकाण्ड, शान्तिकाण्ड, आचारकाण्ड तथा तीर्थविवेचनकाण्ड आदि कई काण्डोंमें विभक्त है। तत्तत् काण्डोंमें स्मृतियों तथा पुराणोंमें आये हुए धर्मशास्त्रीय विषयों जैसे—वर्णाश्रमधर्म, श्राद्ध, दान, प्रायश्चित्त, शान्ति, सदाचार तथा तीर्थविवेचन आदिका एक स्थानपर संग्रह हुआ है, इससे यह सौविध्य प्राप्त होता है कि एक ही स्थानपर विभिन्न स्मृतियों तथा पुराणादिमें उपन्यस्त तत्तद् विषयोंका संग्रह देखनेको मिल जाता है।
कृत्यकल्पतरुका तीर्थविवेचनकाण्ड प्रमुख तीर्थोंके माहात्म्यका महत्त्वपूर्ण संग्रह है। इसमें मुख्यरूपसे वाराणसी, प्रयाग, गंगा, गया, कुरुक्षेत्र, पुष्कर, मथुरा, उज्जयिनी, बदरिकाश्रम, द्वारका, केदार तथा नैमिषारण्य आदि तीर्थोंके माहात्म्य तथा तीर्थयात्रा आदिकी विधि विस्तारसे दी गयी है। इसमें अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका तथा यहाँके गुहायतनों, लिङ्गों, वापी, कुण्डों तथा हृदोंका जो वर्णन दिया गया है, वह विविध पुराणों आदिसे संगृहीत है। विशेष बात यह है कि इस ग्रन्थमें लिङ्गपुराणके नामसे सोलह अध्यायोंमें लगभग दो हजार श्लोकोंमें वाराणसीका माहात्म्य उपलब्ध है, किंतु यह सामग्री वर्तमानमें उपलब्ध लिङ्गपुराणके संस्करणोंमें प्राप्त नहीं है। वर्तमानमें जो लिङ्गपुराण उपलब्ध होता है, वह पूर्वभाग तथा उत्तरभाग नामसे दो खण्डोंमें विभक्त है। इसके पूर्वभागके ९२वें अध्यायमें १९० श्लोकोंमें वाराणसी तथा यहाँके तीर्थोंका जो माहात्म्य आया है, वह पूर्वोक्त कृत्यकल्पतरुके संग्रहसे भिन्न है।
कृत्यकल्पतरु १२वीं शताब्दीका अत्यन्त प्रामाणिक ग्रन्थ है। उस समय लिङ्गपुराणका जो संस्करण उपलब्ध था, उसमेंसे ही ग्रन्थकारने सामग्री संगृहीत की होगी। लिङ्गपुराणकी श्लोकसंख्या स्वयं लिङ्गपुराणने तथा नारदादि पुराणोंने ग्यारह हजार बतायी है, परंतु वर्तमानमें लगभग आठ हजारके आस-पास श्लोक मिलते हैं। साथ ही लिङ्गपुराणके नामसे अरुणाचलमाहात्म्य, पंचाक्षरमाहात्म्य, रामसहस्रनाम तथा रुद्राक्षमाहात्म्य आदि प्रकरणोंका भी उल्लेख प्राप्त होता है, किंतु ये प्रकरण वर्तमान संस्करणोंमें अनुपलब्ध हैं। कालातिरेकसे वर्तमानमें पुराणोंके संस्करणोंमें कुछ परिवर्तन आ गया है। कई माहात्म्य तथा प्रकरण आदि ऐसे हैं, जो उन-उन पुराणोंके नामसे प्राप्त तो होते हैं, किंतु वर्तमानमें वे उस पुराणमें उपलब्ध नहीं होते। उदाहरणके लिये प्रसिद्ध सत्यनारायणकथाकी पुष्पिकामें 'इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे' यह मिलता है, किंतु यह कथा वर्तमानमें प्राप्त रेवाखण्डमें प्राप्त नहीं होती। प्रसिद्ध माघमाहात्म्य वायुपुराणके नामसे मिलता है, किंतु वायुपुराणमें नहीं मिलता। ऐसे ही अध्यात्मरामायणको ब्रह्माण्डपुराणका अंश माना जाता है, किंतु वर्तमान ब्रह्माण्डपुराणके संस्करणमें वह प्राप्त नहीं होता। इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी समयमें पुराणादिका जो प्राचीन स्वरूप था, उसमें वह सब गुम्फित था। यही बात लिङ्गपुराणके वाराणसी-माहात्म्यके विषयमें भी है।
इस कृत्यकल्पतरुमें उद्धृत वाराणसी-माहात्म्य अत्यन्त महत्त्वका है, इसके अध्ययनसे प्राचीन समयके वाराणसीके लिङ्गायतननों एवं तीर्थोंके वास्तविक स्वरूपके विषयमें महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। काशीखण्ड आदिमें जो वाराणसीके विषयमें सामग्री उपलब्ध होती है, उससे भी विशिष्ट सामग्री इस प्राचीन लिङ्गमहापुराणमें
१- अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनका वर्णन
| ७६२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
मिलती है। अतः यह वर्णन बड़े महत्त्वका है। वहाँ वाराणसी-माहात्म्य-सम्बन्धी सामग्री कहीं स्फुट रूपमें तथा कहीं अध्यायोंमें उपनिबद्ध है, किंतु अध्यायोंमें श्लोकसंख्याका अंकन नहीं है। भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीके प्रधान संवादके रूपमें उपलब्ध वह सामग्री तीसरे अध्यायसे अठारहवें अध्यायतक वहाँ दी गयी है, किंतु सुविधाकी दृष्टिसे तीसरे अध्यायको प्रथम अध्याय मानकर सम्पूर्ण सामग्री जिस रूपमें तथा जिस क्रममें कृत्यकल्पतरुमें उपलब्ध है, उसी रूपमें तथा उसी क्रममें श्लोक-संख्या अंकितकर मूल श्लोकोंसहित उसका हिन्दीभावानुवाद यहाँ दिया जा रहा है। इसे पढ़कर भगवद्भक्तों तथा श्रद्धालुजनोंमें भगवान् साम्बसदाशिवके प्रति विशेष श्रद्धा जाग्रत् होगी तथा आशा है कि सभी पाठक महानुभाव इससे लाभ उठायेंगे— सम्पादक ]
पहला अध्याय
अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनका वर्णन
| ईश्वर उवाच | श्लोकार्थ |
|---|---|
| अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि उपायज्ञानसाधनम्।<br>यानि तीर्थानि चोक्तानि व्योमतन्त्रे पुरा मया॥ १<br>तेषामप्यधिकं तीर्थमविमुक्तं महामुने।<br>सर्वतीर्थानि च मया तस्मिन् स्थाने प्रतिष्ठिताः॥ २ | ईश्वर बोले—हे महामुने! अब मैं आपको ज्ञानप्राप्तिका अन्य साधन बताऊँगा। मैंने पूर्वमें व्योमतन्त्रमें जिन तीर्थोंका वर्णन किया था, उन सबसे बढ़कर अविमुक्त तीर्थ है। मैंने समस्त तीर्थोंको उस [अविमुक्त] स्थानमें स्थापित कर दिया है॥ १-२॥ |
| न कदाचिन्मया मुक्तं स्थानं च सततं मुने।<br>सर्वतीर्थमयं पुण्यं गुह्याद् गुह्यतरं महत्॥ ३ | हे मुने! मैं यहाँ सतत स्थित रहता हूँ, मैंने कभी भी इस स्थानका त्याग नहीं किया; यह सभी तीर्थोंसे युक्त, पुण्यप्रद, गुह्यसे भी गुह्यतर तथा महान् है॥ ३॥ |
| स्थानानां चैव सर्वेषामादिभूतं महेश्वरम्।<br>यत्र सिद्धिं परां प्राप्ता मुनयो मुनिसत्तम॥ ४<br>अनेनैव शरीरेण प्राप्ता निर्वाणमुत्तमम्।<br>तत्र चैव तु सम्भूतो ज्ञानं प्राप्नोति मानवः॥ ५ | हे मुनिश्रेष्ठ! महेश्वरका यह स्थान सभी स्थानोंके आदिमें प्रादुर्भूत हुआ, जहाँ मुनियोंने परम सिद्धि प्राप्त की और इसी शरीरसे उत्तम निर्वाण प्राप्त किया। वहाँपर उत्पन्न हुआ मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है॥ ४-५॥ |
| गच्छ वाराणसीं शीघ्रं यत्र देवः सनातनः।<br>देवताभिः समस्ताभिस्तत्र देवः पिनाकधृक्॥ ६<br>स्तूयते वरदो देवैर्ब्रह्मादिभिरभीक्ष्णशः।<br>तत्रासिवरणा चैव निम्नगे सिद्धसेविते॥ ७ | आप शीघ्र वाराणसी जाइये, जहाँ सनातन देव [शिवजी] समस्त देवताओंके साथ विद्यमान हैं। ब्रह्मा आदि देवता वर प्रदान करनेवाले पिनाकधारी शिवकी वहाँ निरन्तर स्तुति करते हैं। वहाँ सिद्धोंके द्वारा सेवित ‘असि’ तथा ‘वरणा’ [नामक] दो नदियाँ हैं॥ ६-७॥ |
| बहुजन्माप्तपापानां दुष्टानां देहिनां भुवि।<br>क्षालनं कुरुते देवि सा नदी यत्र जाह्नवी॥ ८<br>या दृशा सर्वथा स्वर्गे सा नदीनां सरिद्वरा।<br>या माता सर्वभूतानां सा गङ्गा यत्र निम्नगा॥ ९ | हे देवि! वहाँ गङ्गा नदी पृथ्वीतलपर दुष्ट प्राणियोंके अनेक जन्मोंके अर्जित पापोंका क्षालन करती हैं। जो सदा स्वर्गमें दृष्टिगत होती हैं तथा जो सभी प्राणियोंकी माता हैं, वे नदियोंमें श्रेष्ठ गंगा नदी वहाँ विद्यमान हैं॥ ८-९॥ |
| अविमुक्तं परं क्षेत्रं शङ्करस्य सदैव हि।<br>तत्र स्थानं प्रसिद्धं च त्रैलोक्ये शूलपाणिनः॥ १०<br>निम्नगाभ्यां पुरी सा च नाम्ना वाराणसी मुने।<br>कृतस्नानेन देवेन ओङ्कारे संस्थितेन वा।<br>तस्मिन् काले वरो दत्तो देवदेवेन शम्भुना॥ ११ | वहाँ शंकरजीका सदैव परम अविमुक्तक्षेत्र है, वह शूलपाणि शिवजीका तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध निवास-स्थान है। हे मुने! दोनों [वरणा तथा असि] नदियोंसे युक्त होनेके कारण वह पुरी ‘वाराणसी’ नामसे विख्यात है। स्नान करनेके अनन्तर ओंकारमें संस्थित देवदेव |
अध्याय १ ] अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनौंका वर्णन [ ७६३
| देवदेव उवाच | भगवान् शम्भुने उस समय इस प्रकार वर प्रदान किया था॥ १०-११॥<br><br> **देवदेव बोले—**जो मनुष्य उस अविमुक्त स्थानका सदा स्मरण करेंगे, वे सभी पापोंसे मुक्त हो जायेंगे और मेरे गणोंके तुल्य हो जायेंगे॥ १२॥ |
|---|---|
| ये स्मरिष्यन्ति तत्स्थानमविमुक्तं सदा नराः।<br>निर्धूतसर्वपापास्ते भविष्यन्ति गणोपमाः॥ १२ | |
| आगमिष्यन्ति ये द्रष्टुं ये जना योजनेन तु।<br>ते ब्रह्महत्यां मोक्ष्यन्ति भविष्यन्ति ममानुगाः॥ १३ | जो लोग मेरा दर्शन करनेके लिये [यहाँ] आयेंगे, वे एक योजन दूर रहनेपर ही ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जायेंगे और मेरे अनुचर बन जायेंगे॥ १३॥ |
| विदित्वा भङ्गुरं लोकं येऽस्मिन्वत्स्यन्ति मे पुरे।<br>अन्तकालेऽपि वत्स्यन्ति तेषां भवति मोक्षदम्॥ १४ | संसारको विनाशशील जानकर जो लोग मेरे इस पुरमें निवास करेंगे अथवा मृत्युके समय ही [यहाँ] निवास करेंगे, उनके लिये यह मोक्षप्रद होगा॥ १४॥ |
| मोक्षः सुदुर्लभो यस्मात् संसारश्चातिभीषणः।<br>अश्मना चरणौ भित्त्वा वाराणस्यां वसेन्नरः॥ १५ | चूँकि मोक्ष अत्यन्त दुर्लभ है और संसार अति भयंकर है, अतः पत्थरसे [अपने] दोनों पैरोंको भंग करके मनुष्यको वाराणसीमें निवास करना चाहिये॥ १५॥ |
| सर्वावस्थोऽपि यो मर्त्यो वाराणस्यां वसेत्सदा।<br>स यां गतिमवाप्नोति पुण्यदानैर्न सा गतिः॥ १६ | किसी भी अवस्थावाला जो मनुष्य सदा वाराणसीमें निवास करता है, वह जो गति प्राप्त करता है, वह गति पुण्य तथा दानोंसे भी सम्भव नहीं है। हे मुनिश्रेष्ठ! वह [गति] मनुष्योंके लिये तपस्यासे भी परम दुर्लभ है॥ १६ १/२ ॥ |
| दुर्लभा तपसा सा च मर्त्यानां मुनिसत्तम।<br>तत्र विप्र व्रज शीघ्रं मनस्स्थैर्यं यदीच्छसि॥ १७ | अतः हे विप्र! यदि आप मनकी स्थिरता [शान्ति] चाहते हैं, तो शीघ्र ही वहाँ जाइये; [वहाँ जानेसे] मनकी स्थिरताका कारण सुनिये; मैं बता रहा हूँ॥ १७ १/२ ॥ |
| मनसः स्थैर्यहेतुत्वं शृणुष्व गदतो मम।<br>दक्षिणं चोत्तरं चैव तस्मिन् स्थाने स्थितं सदा॥ १८ | उस पुरमें दक्षिण तथा उत्तर स्थान स्थित हैं; उसके मध्यमें विषुवक्षेत्र स्थित है, जो देवताओंको भी दुर्लभ है। कलियुगमें तो यह स्थान मनुष्योंके लिये मोक्षका साधनस्वरूप है; आराधना, स्नान, पूजन तथा तर्पणके द्वारा यहाँ [शिवकी] भक्ति करनी चाहिये। चारों वर्णोंमेंसे कोई भी व्यक्ति यहाँ इस ईश्वरपदको प्राप्त कर लेता है॥ १८-२०॥ |
| विषुवं चैव मध्यस्थं देवानामपि दुर्लभम्।<br>कलौ युगे तु मर्त्यानां स्थानं मोक्षावहेतुकम्॥ १९ | |
| भक्तिमाराधनेनैव स्नानपूजनतर्पणैः।<br>चातुर्वर्ण्यविभागस्य शरीरं वैश्वरं पदम्॥ २० | |
| पिङ्गला नाम या नाडी आग्नेयी सा प्रकीर्तिता।<br>शुष्का सरिच्च सा ज्ञेया लोलार्को यत्र तिष्ठति॥ २१ | पिंगला नामक जो नाडी है, वह आग्नेयी कही गयी है; उसे शुष्क सरित् (नदी) जानना चाहिये, जहाँ लोलार्क-कुण्ड स्थित है॥ २१॥ |
| इडानाम्नी च या नाडी सा सौम्या सम्प्रकीर्तिता।<br>वरणा नाम सा ज्ञेया केशवो यत्र संस्थितः॥ २२ | इडा नामक जो नाडी है, वह सौम्य कही गयी है; उसे वरणा नामवाली जानना चाहिये, जहाँ केशव विराजमान हैं। इन दोनों [पिंगला, इडा]-के मध्यमें जो नाडी है, वह सुषुम्ना कही गयी है; उसे मत्स्योदरी नामवाली जानना चाहिये, उसे विषुव कहा गया है॥ २२-२३॥ |
| आभ्यां मध्ये तु या नाडी सुषुम्ना च प्रकीर्तिता।<br>मत्स्योदरी च सा ज्ञेया विषुवं तत्प्रकीर्तितम्॥ २३ |
७६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्वा कलियुगं घोरमल्पायुषमधार्मिकम्।<br>सिद्धक्षेत्रं न सेवन्ते जायन्ते च म्रियन्ति च॥ २४ | कलियुगको भयंकर, अल्पायु तथा अधार्मिक समझकर भी जो लोग इस सिद्धक्षेत्रका सेवन नहीं करते हैं, वे ही बार-बार जन्म लेते हैं और मृत्युको प्राप्त होते हैं। |
| लिङ्गरूपधरास्तीर्थे दृगिचण्डेश्वरादयः।<br>अविमुक्ते स्थिताः सर्वे शुद्ध्यन्ते पापकर्मिणः॥ २५ | लिङ्गरूपधारी दृगिचण्डेश्वर आदि इस अविमुक्त तीर्थमें स्थित रहते हैं; पापकर्म करनेवाले सभी लोग यहाँ शुद्ध हो जाते हैं॥ २४-२५॥ |
| अविमुक्तं परं क्षेत्रमविमुक्ते परा गतिः।<br>अविमुक्ते परा सिद्धिरविमुक्ते परं पदम्॥ २६ | अविमुक्त परम क्षेत्र है; [इस] अविमुक्तक्षेत्रमें परा गति प्राप्त होती है, अविमुक्तक्षेत्रमें परा सिद्धि मिलती है और अविमुक्तक्षेत्रमें परमपद प्राप्त होता है॥ २६॥ |
| अन्तकाले मनुष्याणां भिद्यमानेषु मर्मसु।<br>वायुना प्रेर्यमाणानां स्मृतिर्नैवोपजायते॥ २७ | मृत्युके समय मर्मोंके भेदे जानेपर वायुके द्वारा प्रेरित किये गये मनुष्योंको स्मृति नहीं रह जाती है॥ २७॥ |
| येऽविमुक्ते स्थिता रुद्रा भक्तानां प्रीतिदायकाः।<br>कर्णजापं प्रयच्छन्ति दृगिचण्डेश्वरादयः॥ २८ | भक्तोंको प्रीति प्रदान करनेवाले जो दृगिचण्डेश्वर आदि रुद्र अविमुक्तमें स्थित हैं, वे [भक्तोंके] कानमें तारक मन्त्र प्रदान करते हैं॥ २८॥ |
| अविमुक्तं महत्क्षेत्रं पुण्यकृद्भिर्निषेवितम्।<br>सर्वपापक्षयकरं साक्षाच्छिवपुरं महत्॥ २९<br><br>श्मशानं परमं विद्धि क्षेत्राणां परमं तथा।<br>पाप्मानमुत्सृजत्याशु प्रविष्टस्तत्र वै पुमान्॥ ३० | अविमुक्तक्षेत्र महान्, पुण्य करनेवालोंके द्वारा सेवित, सभी पापोंका नाश करनेवाला तथा साक्षात् शिवका महान् पुर है। श्मशानको परम क्षेत्र जानिये; यह सभी क्षेत्रोंमें महान् है। वहाँ प्रविष्ट हुआ मनुष्य शीघ्र ही पापसे मुक्त हो जाता है॥ २९-३०॥ |
| वारणस्यां तु यः कश्चित् प्रविष्टो ब्रह्मघातकः।<br>तिष्ठते क्षेत्रबाह्ये तु निर्गते गृह्यते पुनः॥ ३१ | जो कोई भी ब्रह्मघाती वाराणसीमें प्रवेश करता है, तो उसी समय उसकी ब्रह्महत्या क्षेत्रके बाहर ही रह जाती है और पुनः उस व्यक्तिके इस क्षेत्रसे बाहर चले जानेपर वह ब्रह्महत्या उसे पुनः घेर लेती है॥ ३१॥ |
| लिङ्गरूपधरा मूर्ताः सप्तकोट्यस्तु सर्वतः।<br>अविमुक्ते स्थिता रुद्रा भक्तानां सिद्धिदायकाः॥ ३२ | लिङ्गरूप धारण किये हुए मूर्तिमान् सात करोड़ रुद्र अविमुक्तक्षेत्रमें सभी ओर स्थित हैं; वे भक्तोंको सिद्धि देनेवाले हैं॥ ३२॥ |
| कृत्तिवाससमारभ्य क्रोशं क्रोशं चतुर्दिशम्।<br>योजनं तत्र तत्क्षेत्रं गणै रुद्रैश्च संवृतम्॥ ३३<br><br>तस्य मध्ये यदा लिङ्गं भूमिं भित्त्वा समुत्थितम्।<br>मध्यमेश्वरनामाख्यं ख्यातं सर्वसुरासुरैः॥ ३४ | कृत्तिवाससे आरम्भ करके कोस-कोसकी दूरीपर चारों दिशाओंमें योजन-परिमाणमें वह क्षेत्र गणों तथा रुद्रोंसे घिरा हुआ है। उसके मध्यमें भूमिको भेदन करके जो लिङ्ग प्रकट हुआ है, उसे सभी देवता तथा असुर मध्यमेश्वर नामवाला कहते हैं॥ ३३-३४॥ |
| अस्मादारभ्य लिङ्गात्तु क्रोशं क्रोशं चतुर्ष्वपि।<br>योजनं विद्धि तत्क्षेत्रं मृत्युकालेऽमृतप्रदम्॥ ३५<br><br>एवं क्षेत्रस्य संन्यासः पुराणे परिकीर्तितः।<br>अस्मात्तु परतो देवि विहारो नैव विद्यते॥ ३६ | इस लिङ्गसे आरम्भ करके चारों दिशाओंमें कोस-कोसकी दूरीपर योजनभर उस [अविमुक्त] क्षेत्रको जानिये; वह क्षेत्र मृत्युकालमें अमरता प्रदान करनेवाला है। इस प्रकार पुराणमें इस क्षेत्रका माहात्म्य बताया गया है; हे देवि! इस क्षेत्रसे बढ़कर [कोई भी] आनन्दका स्थान नहीं है॥ ३५-३६॥ |
अध्याय १] अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनोंका वर्णन ७६५
| देव्युवाच | देवी बोलीं— |
|---|---|
| वाराणस्यां तु किं गुह्यं स्थानं किं च तव प्रियम्।<br>किं रहस्यं च लिङ्गानां के ह्रदास्तत्र विश्रुताः॥ ३७॥<br><br>के कूपाः कानि कुण्डानि लिङ्गानां स्थापकाश्च के।<br>कस्मिन् स्थाने कृतं कर्म ज्ञाननिष्ठं प्रजायते।<br>एतदाचक्ष्व मे सर्वं यदनुग्रहभागहम्॥ ३८॥ | वाराणसीमें कौन-सा गुह्य स्थान है, कौन-सा स्थान आपको प्रिय है, लिङ्गोंका क्या रहस्य है, वहाँ कौन-से प्रसिद्ध सरोवर हैं, कौन-कौन कूप हैं, कौन-कौन कुण्ड हैं, लिङ्गोंके स्थापक कौन हैं और किस स्थानमें किया गया कर्म ज्ञानमें निष्ठा उत्पन्न करनेवाला होता है? यदि मैं अनुग्रहकी भागिनी होऊँ, तो मुझे यह सब बतायें॥ ३७—३८॥ |
| देवदेव उवाच<br>रुचिरं स्थानमासाद्य अविमुक्तं तु मे गृहम्।<br>न कदाचिन्मया मुक्तमविमुक्तं ततः स्मृतम्॥ ३९॥<br><br>अनेनैव प्रकारेण अविमुक्तं तु कथ्यते।<br>अविशब्देन पापं तु कथ्यते वेदवादिभिः।<br>तेन पापेन तत् क्षेत्रं वर्जितं वरवर्णिनि॥ ४०॥ | **देवदेव बोले—**मैंने इस सुन्दर अविमुक्तक्षेत्रको प्राप्तकर इसे अपना गृह (निवासस्थान) बनाया। मैंने कभी भी इसका त्याग नहीं किया, इसलिये इसे अविमुक्त कहा गया है। वेदवादियोंके द्वारा 'अवि' शब्दसे पापको कहा जाता है। हे वरवर्णिनि! वह क्षेत्र उस पापसे रहित है; इस प्रकारसे यह अविमुक्त कहा जाता है॥ ३९-४०॥ |
| सिद्धाः पाशुपताः श्रेष्ठास्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।<br>उपासते च मां नित्यं तस्मिन् स्थाने स्थिताः सदा॥ ४१॥ | सिद्धजन तथा श्रेष्ठ पाशुपत भक्त मेरे प्रति निष्ठावान् तथा परायण होकर उस स्थानमें रहकर नित्य मेरी उपासना करते हैं॥ ४१॥ |
| पूर्वोत्तरे दिग्विभागे तस्मिन् क्षेत्रे तु सुन्दरि।<br>सुरासुरैः स्तुतश्चाहं तत्र स्थाने यशस्विनि॥ ४२॥<br><br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु स्तुतोऽहं विविधैः स्तवैः।<br>उत्पन्नं मम लिङ्गं तु भित्त्वा भूमिं यशस्विनि॥ ४३॥<br><br>तेषामनुग्रहार्थाय लोकानां भक्तिभावतः।<br>वाराणस्यां महादेवि तत्र स्थाने स्थितो ह्यहम्॥ ४४॥<br><br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि पशुपाशैर्विमुच्यते॥ ४५ | हे सुन्दरि! उस क्षेत्रमें पूर्वोत्तर दिशामें देवताओं तथा असुरोंके द्वारा मेरी स्तुति की गयी थी। हे यशस्विनि! उस स्थानमें दिव्य हजार वर्षोंतक अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे मेरी स्तुति की गयी थी; तब हे यशस्विनि! उन सभीके भक्तिभावसे प्रसन्न होकर उनपर अनुग्रह करनेहेतु भूमिका भेदन करके मेरा लिङ्ग प्रकट हुआ और हे महादेवि! वाराणसीमें उस स्थानपर मैं स्थित हो गया। हे देवि! उस लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ४२—४५॥ |
| कूपस्तत्रैव संल्लग्नो महादेवस्य चैव हि।<br>तत्रोपस्पर्शनाद्देवि लभेद्वैागीश्वरीं गतिम्॥ ४६॥ | हे देवि! वहींपर महादेवके समीप एक कूप है; वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य वागीश्वरी गति (सारस्वतलोक) प्राप्त करता है॥ ४६॥ |
| तत्र वाराणसी देवी स्थिता विग्रहरूपिणी।<br>मानवानां हितार्थाय स्थिता कूपस्य पश्चिमे॥ ४७॥ | वहाँपर कूपके पश्चिमभागमें मनुष्योंके कल्याणके लिये विग्रहरूप धारणकर देवी वाराणसी विराजमान हैं॥ ४७॥ |
| वाराणसीं तु यो दृष्ट्वा भक्त्या चैव नमस्यति।<br>तस्य तुष्टा च सा देवी वसतिं च प्रयच्छति॥ ४८ | [देवी] वाराणसीका दर्शन करके जो मनुष्य भक्तिपूर्वक उन्हें नमस्कार करता है, उसके ऊपर प्रसन्न होकर वे देवी उसे काशीवास प्रदान करती हैं॥ ४८॥ |
| महादेवस्य पूर्वेण गोप्रेक्षमिति विश्रुतम्।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि पूर्वोक्तं फलमाप्नुयात्॥ ४९ | हे सुश्रोणि! महादेवके पूर्वमें गोप्रेक्ष नामक स्थान प्रसिद्ध है, जिसके दर्शनसे मनुष्य पूर्वोक्त फल प्राप्त |
| ७६६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| करता है अर्थात् भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ४९॥ | |
| ईश्वर उवाच<br>गोप्रेक्ष्यस्योत्तरेणाथ अनसूयाख्यलिङ्गकम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि गतिं च लभते पराम्॥ ५०<br>पश्चान्मुखं च तल्लिङ्गमनसूयाप्रतिष्ठितम्। | ईश्वर बोले—हे देवि! गोप्रेक्षके उत्तरमें अनसूया नामक लिङ्ग है; उसका दर्शन करके मनुष्य परा गतिको प्राप्त करता है। पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग [देवी] अनसूयाके द्वारा स्थापित किया गया है॥ ५० १/२॥ |
| अनसूयेश्वरस्याग्रे गणेश्वरमिति स्मृतम्॥ ५१<br>तेन दृष्टेन लभते गणेशस्य सलोकताम्। | अनसूयेश्वर-लिङ्गके आगे गणेश्वर [लिङ्ग] बताया गया है, उसके दर्शनसे मनुष्य गणेशजीका सालोक्य प्राप्त करता है॥ ५१ १/२॥ |
| गणेश्वरात् पश्चिमेन हिरण्यकशिपुः पुरा॥ ५२<br>स्थापयामास मे लिङ्गं कूपस्यैव समीपतः।<br>तस्यैव पश्चिमे देवि लिङ्गं सिद्धेश्वरं स्मृतम्॥ ५३<br>दर्शनादेव मे लिङ्गं सर्वसिद्धिप्रदायकम्। | हिरण्यकशिपुने पूर्वकालमें गणेश्वरके पश्चिममें कूपके पासमें ही मेरे लिङ्गकी स्थापना की थी। हे देवि! उसीके पश्चिममें सिद्धेश्वरलिङ्ग बताया गया है; दर्शन-मात्रसे मेरा वह लिङ्ग सर्वसिद्धि प्रदान करनेवाला है॥ ५२-५३ १/२॥ |
| अन्यदायतनं भद्रे शृणुष्व गदतो मम॥ ५४<br>वृषभेश्वरनामानं लिङ्गं तत्रैव तिष्ठति।<br>पूर्वामुखं महेशानि गोप्रेक्ष्यस्य तु नैर्ऋते।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि अभीष्टं फलमाप्नुयात्॥ ५५ | हे भद्रे! अन्य आयतन (लिङ्ग)-के विषयमें सुनिये; मैं बता रहा हूँ। हे महेशानि! वहींपर वृषभेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, जो पूर्वकी ओर मुखवाला है तथा गोप्रेक्षके नैर्ऋत (दक्षिण-पश्चिम)-में स्थित है। हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे मनुष्य अभीष्ट फल प्राप्त करता है॥ ५४-५५॥ |
| गोप्रेक्ष्यस्य दक्षिणतः स्थापितं लिङ्गमुत्तमम्।<br>दधीचेश्वरनामानं सर्वकामफलप्रदम्॥ ५६ | गोप्रेक्षके दक्षिणमें सभी कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला दधीचेश्वर नामक उत्तम लिङ्ग स्थापित है॥ ५६॥ |
| दधीचेश्वरसामीप्ये दक्षिणे वरवर्णिनि।<br>अत्रिणा स्थापितं लिङ्गं दैवमार्तिहरं शुभम्॥ ५७ | हे वरवर्णिनि! दधीचेश्वरलिङ्गके समीपमें दक्षिण दिशामें [मुनि] अत्रिके द्वारा शिवजीका लिङ्ग स्थापित किया गया है; यह दैविक कष्टको दूर करनेवाला तथा मंगलकारक है॥ ५७॥ |
| अत्रीश्वराद्दक्षिणतः सूर्यखण्डमुखेऽपि च।<br>मधुकैटभाभ्यां सुश्रोणि लिङ्गसंस्थापनं कृतम्॥ ५८<br>तत्र पश्चान्मुखो देवि विसमन्थाः प्रपठ्यते।<br>पूर्वामुखं कैटभस्य लिङ्गं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ ५९ | हे सुश्रोणि! अत्रीश्वरके दक्षिणमें सूर्यखण्डमुखमें भी मधु तथा कैटभके द्वारा लिङ्गकी स्थापना की गयी है। हे देवि! वहाँपर मधुके द्वारा स्थापित लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला कहा जाता है और कैटभके द्वारा स्थापित त्रिलोक-प्रसिद्ध लिङ्ग पूर्वकी ओर मुखवाला है॥ ५८-५९॥ |
| गोप्रेक्षकस्य पूर्वेण लिङ्गं वै बालकेश्वरम्।<br>बालकेश्वरसामीप्ये विज्ज्वरेश्वरसंज्ञितम्॥ ६०<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि ज्वरो नश्यति तत्क्षणात्। | गोप्रेक्षके पूर्वमें बालकेश्वरलिङ्ग है। बालकेश्वरके समीपमें विज्ज्वरेश्वर नामक लिङ्ग है; हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे ज्वर तत्काल नष्ट हो जाता है॥ ६० १/२॥ |
| विज्ज्वरेश्वरपूर्वेण वेदेश्वरमिति श्रुतम्॥ ६१<br>ईशानाभिमुखं लिङ्गं कोणे तस्य मुखानि वै।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि चतुर्वेदो भवेद्द्विजः॥ ६२ | विज्ज्वरेश्वरके पूर्वमें वेदेश्वर लिङ्ग है—ऐसा कहा गया है; वह लिङ्ग ईशानकी ओर मुखवाला है, उसके कोणमें [अनेक] मुख हैं। हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे |
अध्याय १] अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनोंका वर्णन ७६७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| द्विज चारों वेदोंका ज्ञाता हो जाता है॥ ६१-६२॥ | |
| वेदेश्वरस्योत्तरतः स्वयं तिष्ठति केशवः।<br>क्षेत्रस्य कारणं चास्य क्षेत्रज्ञ इति चोच्यते॥ ६३<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि सर्वं दृष्टं चराचरम्। | वेदेश्वरके उत्तरमें स्वयं केशव विराजमान हैं; वे इस क्षेत्रके कारणभूत क्षेत्रज्ञ कहे जाते हैं। हे सुश्रोणि! उनके दर्शनसे समस्त चराचर [जगत्] दृष्टिगत हो जाता है॥ ६३ १/२॥ |
| तत्समीपे तु सुश्रोणि लिङ्गं मे सङ्गमेश्वरम्।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि शिष्टैः सह समागमः॥ ६४ | हे सुश्रोणि! उनके समीपमें मेरा संगमेश्वरलिङ्ग विद्यमान है; उसके दर्शनसे हे सुश्रोणि! सज्जनोंके साथ समागम होता है॥ ६४॥ |
| सङ्गमेशस्य पूर्वेण लिङ्गं चैव चतुर्मुखम्।<br>ब्रह्मणा स्थापितं भद्रे प्रयागमिति कीर्त्यते॥ ६५<br>तेन दृष्टेन लभते ब्रह्मणः पदमुत्तमम्।<br>तत्र सा शाङ्करी देवी ब्रह्मवृक्षेऽवतिष्ठते॥ ६६<br>शान्तिं करोति सर्वेषां ये च तीर्थनिवासिनः।<br>अतः परं तु संवेद्यं गङ्गावरणसङ्गमम्॥ ६७ | संगमेश्वरके पूर्वमें चारमुखवाला लिङ्ग है; हे भद्रे! ब्रह्माके द्वारा स्थापित किया गया वह प्रयाग नामसे पुकारा जाता है। उसके दर्शनसे मनुष्य उत्तम ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। वहाँपर वे शांकरीदेवी ब्रह्मवृक्षमें विद्यमान हैं और जो लोग तीर्थमें निवास करनेवाले हैं, उन सबको वे शान्ति प्रदान करती हैं। इसके बाद गंगा तथा वरणाके संगमको जानना चाहिये॥ ६५-६७॥ |
| श्रवणद्वादशीयोगो बुधवारे यदा भवेत्।<br>तदा तस्मिन्नरः स्नात्वा सन्निहत्या फलं लभेत्॥ ६८<br>श्राद्धं कृत्वा तु यस्तत्र तस्मिन् काले यशस्विनि।<br>तारयित्वा पितॄन् सर्वान् विष्णुलोकं स गच्छति॥ ६९ | जब बुधवारके दिन श्रवण-द्वादशीका योग उपस्थित हो, उस समय उसमें स्नान करके मनुष्य क्षेत्रसन्निधिका फल प्राप्त करता है। हे यशस्विनि! उस कालमें वहाँपर जो [मनुष्य] श्राद्ध करता है, वह समस्त पितरोंका उद्धार करके विष्णुलोक जाता है॥ ६८-६९॥ |
| वरणायास्तटे पूर्वे कुम्भीश्वरमिति स्मृतम्।<br>कुम्भीश्वरात्तु पूर्वेण कालेश्वरमिति स्मृतम्॥ ७०<br>कालेश्वरस्योत्तरतो महातीर्थं वरानने।<br>कपिलाह्रदनामानं ख्यातं सर्वसुरासुरैः॥ ७१<br>तस्मिन् हृदे तु यः स्नानं कुर्याद्भक्तिपरायणः।<br>वृषध्वजं च वै दृष्ट्वा राजसूयफलं लभेत्॥ ७२ | वरणाके पूर्व-तटपर कुम्भीश्वर [लिङ्ग] बताया गया है। कुम्भीश्वरके पूर्वमें कालेश्वर [लिङ्ग] कहा गया है। हे वरानने! कालेश्वरके उत्तरमें सभी देवताओं तथा असुरोंके द्वारा कपिलाह्रद नामक महातीर्थ कहा गया है। जो [मनुष्य] उस ह्रद (सरोवर) में भक्ति-परायण होकर स्नान करता है और वृषध्वजका दर्शन करता है, वह राजसूय [यज्ञ]-का फल प्राप्त करता है॥ ७०-७२॥ |
| नरकस्थास्ततो देवि पितरः सपितामहाः।<br>पितृलोकं प्राप्नुवन्ति तस्मिन् श्राद्धे कृते तु वै॥ ७३<br>गयायां चाष्टगुणितं पुण्यं प्रोक्तं महर्षिभिः।<br>तस्मिन् श्राद्धे कृते भद्रे पितॄणामनृणो भवेत्॥ ७४ | हे देवि! वहाँ श्राद्ध किये जानेपर नरकमें स्थित पितामहसहित सभी पितर पितृलोक प्राप्त करते हैं। महर्षियोंने वहाँ किये गये श्राद्धको गयामें किये गये श्राद्धसे आठ गुना पुण्यप्रद बताया है। हे भद्रे! वहाँ श्राद्ध करनेपर मनुष्य पितरोंके ऋणसे मुक्त हो जाता है॥ ७३-७४॥ |
| पश्चिमे तु दिशाभागे महादेवस्य भामिनि।<br>स्कन्देन स्थापितं लिङ्गं मम भक्त्या सुरेश्वरि॥ ७५<br>तेन दृष्टेन गच्छन्ति स्कन्दस्यैव सलोकताम्।<br>तत्र शाखैर्विशाखैश्च नैगमेयैश्च सुन्दरि।<br>स्थापितानि च लिङ्गानि गणैः सर्वैर्बहूनि च॥ ७६ | हे भामिनि! हे सुरेश्वरि! महादेवके पश्चिम दिशाभागमें स्कन्दने भक्तिपूर्वक मेरा लिङ्ग स्थापित किया है; उसके दर्शनसे लोग स्कन्दका सालोक्य प्राप्त करते हैं। हे सुन्दरि! वहाँ शाख, विशाख तथा नैगमेय— |
| ७६८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इन सभी गणोंके द्वारा मेरे बहुत-से लिङ्ग स्थापित किये गये हैं॥ ७५-७६॥ | |
| स्कन्देश्वरस्योत्तरतो बलभद्रप्रतिष्ठितम्।<br>तेन दृष्टेन देवेशि अनन्तफलमाप्नुयात् ॥ ७७<br><br>स्कन्देश्वराद्दक्षिणतो महालिङ्गं प्रतिष्ठितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं स्थापितं नन्दिना पुरा ॥ ७८<br><br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि नन्दिलोकमवाप्नुयात्। | हे देवेशि! स्कन्देश्वरके उत्तरमें बलभद्रजीके द्वारा लिङ्ग स्थापित किया गया है; उसके दर्शनसे मनुष्य अनन्त फल प्राप्त करता है। स्कन्देश्वरके दक्षिणमें महालिङ्ग विराजमान है; पूर्वकालमें नन्दीने पश्चिमकी ओर मुखवाले उस लिङ्गको स्थापित किया था। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य नन्दीका लोक प्राप्त करता है॥ ७७-७८ १/२ ॥ |
| नन्दीश्वरात् पश्चमतो लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम् ॥ ७९<br><br>स्वर्लीनसदृशं भद्रे नन्दिपित्रा प्रतिष्ठितम्।<br>शिलाक्षेश्वरनामानं सुरसङ्घैः प्रपूजितम् ॥ ८० | नन्दीश्वरके पश्चिममें पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! स्वर्लीनसदृश शिलाक्षेश्वर नामक वह लिङ्ग नन्दीके पिताके द्वारा स्थापित किया गया है, जो देवसमुदायके द्वारा पूजित है॥ ७९-८०॥ |
| अन्यत्तत्र तु विख्यातं हिरण्याक्षेश्वरं विभुम्।<br>हिरण्याक्षेण दैत्येन स्थापितं मम भक्तितः ॥ ८१<br><br>हिरण्याख्यस्य सामीप्ये अन्यैर्देवैः सहस्रशः।<br>स्थापितानि च लिङ्गानि भक्त्या चैव फलार्थिभिः ॥ ८२ | वहाँपर हिरण्याक्षदैत्यने मेरी भक्तिसे हिरण्याक्षेश्वर नामक अन्य प्रसिद्ध तथा सर्वव्यापी लिङ्गकी भी स्थापना की है। फलकी आकांक्षावाले अन्य देवताओंके द्वारा हिरण्याक्षेश्वरके समीपमें भक्तिपूर्वक हजारों लिङ्ग स्थापित किये गये हैं॥ ८१-८२॥ |
| अन्यद्वै देवदेवस्य स्थितं पश्चान्मुखं स्मृतम्।<br>तत्र स्थाने वरारोहे हिरण्याक्षस्य दक्षिणे ॥ ८३ | हे वरारोहे! उस स्थानपर हिरण्याक्षके दक्षिणमें देवदेव [शिव]-का अन्य पश्चिममुखवाला लिङ्ग भी बताया गया है॥ ८३॥ |
| तेषां पश्चिमदिग्भागे अट्टहासं स्थितं शुभम्।<br>मुखं लिङ्गं तु तद्देवि पश्चिमाभिमुखं स्थितम् ॥ ८४<br><br>प्रसन्नवदने देवि सर्वपातकनाशकम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि ऐशानं लोकमाप्नुयात् ॥ ८५ | उनके पश्चिम दिशाभागमें अट्टहास नामक शुभ लिङ्ग स्थित है। हे देवि! वह मुखलिङ्ग पश्चिमकी ओर मुख किये हुए विराजमान है, हे प्रसन्न मुखवाली देवि! वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है; हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य ईशानलोक प्राप्त करता है॥ ८४-८५॥ |
| अट्टहाससमीपेन पश्चिमेन यशस्विनि।<br>मित्रावरुणनामानौ पूर्वद्वारे व्यवस्थितौ ॥ ८६<br><br>मित्रावरुणलोकस्तु तयोः सन्दर्शनाद्भवेत्।<br>अन्यत्तत्रैव विख्यातं वसिष्ठेशमिति स्थितम् ॥ ८७ | हे यशस्विनि! अट्टहासके समीप पश्चिममें पूर्वद्वारपर मित्रावरुण नामक दो लिङ्ग स्थित हैं; उन दोनोंके दर्शनसे मित्रावरुणलोक प्राप्त होता है। वहींपर वसिष्ठेश नामक अन्य प्रसिद्ध लिङ्ग भी विराजमान है॥ ८६-८७॥ |
| स्थापितं तत्र तल्लिङ्गं याज्ञवल्क्येन वै पुरा।<br>चतुर्मुखं च तल्लिङ्गं सर्वपापक्षयकरम् ॥ ८८ | पूर्वकालमें [महर्षि] याज्ञवल्क्यने भी लिङ्गको स्थापित किया था; चार मुखोंवाला वह लिङ्ग सभी पापोंका नाश करनेवाला है॥ ८८॥ |
| अन्यत्तत्रैव संलग्नं मैत्रेय्या स्थापितं शुभम्।<br>तेन दृष्टेन लभते परं ज्ञानं सुदुर्लभम् ॥ ८९ | वहींपर समीपमें मैत्रेयीके द्वारा स्थापित अन्य शुभ लिङ्ग विद्यमान है; उसके दर्शनसे मनुष्य अति दुर्लभ परम ज्ञान प्राप्त करता है॥ ८९॥ |
अध्याय १ ] अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनौंका वर्णन ७६९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| याज्ञवल्क्येश्वरस्यापि पश्चिमे पश्चिमाननम्।<br>प्रह्लादेश्वरनामानमद्वैतफलदायकम् ।<br>प्रह्लादेश्वरात् पुरतः स्वयँलीनं तु तिष्ठति॥ ९०<br><br>स्वर्लीनेश्वरनामानं सुमहाफलदायकम्।<br>ज्ञानविज्ञाननिष्ठानां परमानन्दमिच्छताम्॥ ९१ | याज्ञवल्क्येश्वरके भी पश्चिम भागमें पश्चिमकी ओर मुखवाला प्रह्लादेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है; यह अद्वैत फल देनेवाला है। प्रह्लादेश्वरके सामने स्वयंलीन स्वर्लीनेश्वर नामक लिङ्ग विराजमान है; यह अत्यधिक फल प्रदान करनेवाला है। ज्ञान-विज्ञानमें निष्ठ तथा परम आनन्दकी अभिलाषा करनेवालोंकी जो गति होती है, वह गति स्वर्लीन [तीर्थ]-में मरनेवालेकी होती है॥ ९०-९१ १/२॥ |
| या गतिर्विहिता तेषां स्वर्लीने तु मृतस्य च।<br>स्वर्लीनात् पुरतो लिङ्गं स्थितं पूर्वमुखं शुभम्॥ ९२ | स्वर्लीनके आगे पूर्वकी ओर मुखवाला वैरोचनेश्वर नामक शुभ लिङ्ग स्थित है; यह दैत्य-पुत्रद्वारा स्थापित किया गया है॥ ९२ १/२॥ |
| वैरोचनेश्वरं नाम स्थापितं दैत्यसूनुना।<br>तस्य चैवोत्तरे देवि लिङ्गं पश्चान्मुखं स्मृतम्॥ ९३<br><br>बलिना स्थापितं तत्तु शिवालोकपरायणम्।<br>अन्यच्चैतत् स्थिरं लिङ्गं बाणेश्वर इति स्थितम्॥ ९४ | हे देवि! उसके उत्तरमें भी पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग बताया गया है; शिवालोक प्रदान करनेवाला वह [लिङ्ग] बलिके द्वारा स्थापित किया गया है। वहाँ बाणेश्वर नामक अन्य स्थिर लिङ्ग भी विराजमान है॥ ९३-९४॥ |
| राक्षसी तु महाभीमा नाम्ना शालकटङ्कटा।<br>तया च स्थापितं भद्रे तस्य चोत्तरतः शुभम्॥ ९५ | हे भद्रे! शालकटंकटा नामक [एक] महाभयंकर राक्षसी थी, उसके द्वारा उस [बाणेश्वर]-के उत्तरमें शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ ९५॥ |
| अन्यदायतनं पुण्यं तस्मिन् स्थाने यशस्विनि।<br>हिरण्यगर्भं विख्यातं पुण्यं तस्यापि दर्शनम्॥ ९६ | हे यशस्विनि! हिरण्यगर्भ नामसे प्रसिद्ध अन्य पुण्यप्रद आयतन [लिङ्ग] भी उस स्थानपर विद्यमान है; उसका भी दर्शन पुण्य प्रदान करनेवाला है॥ ९६॥ |
| मोक्षेश्वरं तु तत्रैव स्वर्गेश्वरमतः परम्।<br>एतौ दृष्ट्वा सुरेशाने स्वर्गं मोक्षं च विन्दति॥ ९७ | हे सुरेशाने! इसके बाद वहींपर मोक्षेश्वर तथा स्वर्गेश्वर विद्यमान हैं; इनका दर्शन करके स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्ति होती है॥ ९७॥ |
| वासुकीश्वरनामानं तयोश्चोत्तरतः शुभम्।<br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गं सर्वकामफलप्रदम्॥ ९८ | उन दोनोंके उत्तरमें वासुकीश्वर नामक चार मुखवाला शुभ लिङ्ग स्थित है; वह लिङ्ग समस्त कामनाओंका फल देनेवाला है॥ ९८॥ |
| तस्यैव पूर्वखण्डे तु वासुकेस्तीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नातो वरारोहे रोगैर्नैवाभिभूयते॥ ९९ | उसीके पूर्वभागमें वासुकिका उत्तम तीर्थ विद्यमान है; हे वरारोहे! उसमें स्नान करके मनुष्य रोगोंसे आक्रान्त नहीं होता है॥ ९९॥ |
| तस्यैव च समीपे तु चन्द्रेण स्थापितं शुभम्।<br>चन्द्रेश्वरस्य पूर्वेण लिङ्गं विद्येश्वरं शुभम्॥ १००<br><br>लभेद्द्याधरं लोकं तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्॥ १०१ | उसीके समीपमें चन्द्रमाके द्वारा शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। चन्द्रेश्वरके पूर्वमें विद्येश्वर नामक शुभ लिङ्ग विद्यमान है; उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य विद्याधरका लोक प्राप्त करता है॥ १००-१०१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे अविमुक्तक्षेत्रमाहात्म्यवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'अविमुक्तक्षेत्रमाहात्म्यवर्णन' नामक प्रथम अध्याय पूर्ण हुआ॥ १॥
२- मातृमण्डल और आकाशलिङ्गका वर्णन
७७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट ]
दूसरा अध्याय
मातृमण्डल और आकाशलिङ्गका वर्णन
| संस्कृत मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देव्युवाच<br>कथं वीरेश्वरो देव एतदिच्छामि वेदितुम्।<br>कथयस्व प्रसादेन देवदेव महेश्वर॥ १ | देवी बोलीं—हे देव! वीरेश्वर कैसे उत्पन्न हुए, मैं यह जानना चाहती हूँ; हे देवदेव! हे महेश्वर! आप कृपापूर्वक यह बतायें॥ १॥ |
| ईश्वर उवाच<br>इह आसीत्पुरा राजा नियुक्तिर्नाम विश्रुतः।<br>तस्य भार्या महादेवि अरजा नाम विश्रुता॥ २ | ईश्वर बोले—हे महादेवि! इस लोकमें पूर्वकालमें नियुक्ति नामसे प्रसिद्ध [एक] राजा था, उसकी भार्या अरजा नामसे विख्यात थी॥ २॥ |
| एकः पुत्रस्तया जातः कालेन बहुना तदा।<br>पादे द्वितीये सम्भूते मूलनक्षत्रसंज्ञके॥ ३<br>मन्त्रिभिश्च तदा देवि उक्ता तत्रेशभामिनी।<br>जातोऽयं दारको देवि पापनक्षत्रसम्भवः॥ ४<br>तस्मात्त्याज्यस्तु बालोऽयं राज्ञा चैव हितार्थिना। | बहुत समयके बाद उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। मूल नक्षत्रके दूसरे चरणमें उसके उत्पन्न होनेपर मन्त्रियोंने राजाकी पत्नीसे कहा—हे देवि! यह बालक पापनक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है, अतः [अपने] कल्याणकी इच्छावाले राजाको इस बालकका त्याग कर देना चाहिये॥ ३-४१/२॥ |
| एवमुक्ता तु सा देवि मन्त्रिभिर्हितकाम्यया॥ ५<br>ध्यात्वा चाधोमुखी दीना प्रतिपेदे महेश्वरीम्। | हे देवि! हितकी कामनासे मन्त्रियोंके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर दुःखी होकर नीचेकी ओर मुख की हुई उस रानीने ध्यान करके महेश्वरीकी शरण ली॥ ५१/२॥ |
| प्रोवाचेदं तदा धात्रीं बालं गृहीष्व मा चिरम्॥ ६<br>स्वर्लीनस्योत्तरे पार्श्वे मातृभ्यश्च समर्पितम्।<br>रक्षतामिति बालोऽयं मम पुत्र इत्यब्रवीत्॥ ७ | तब उसने धात्रीसे यह कहा—तुम बालकको शीघ्र ग्रहण करो और स्वर्लीनके उत्तरभागमें इसे मातृकाओंको समर्पित कर दो तथा [उनसे] कहो कि मेरे इस पुत्रकी रक्षा कीजिये॥ ६-७॥ |
| राज्ञ्यास्तु वचनं सर्वं कृतं धातुकया तदा।<br>मातृणां हि तदा बालं निक्षेप्तुमुपचक्रमे॥ ८ | तदनन्तर धात्रीने रानीके समस्त वचनका पालन किया और उस बालकको मातृकाओंके पास रखनेका उपक्रम किया॥ ८॥ |
| कदाचित्कालपर्याये मातृभिः परिचिन्तितम्।<br>अस्माकं पुत्रतां प्राप्त एष बालो न संशयः॥ ९ | तब किसी समय कालपर्यायसे मातृकाओंने सोचा कि यह बालक हमलोगोंके पुत्रत्वको प्राप्त हो चुका है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ९॥ |
| अस्माभिर्गन्तुमारब्धं खेचरीचक्रमुत्तमम्।<br>ब्रह्माणी चाब्रवीद्देवि योगपीठं तु नीयताम्॥ १०<br>योगपीठेन दृष्टेन बालो राज्यक्षमो भवेत्।<br>सर्वाभिर्मातृभिश्चाथ तद्वाक्यमभिनन्दितम्॥ ११ | अब हमलोग उत्तम खेचरीचक्रको जाना आरम्भ करें। इसके बाद हे देवि! ब्रह्माणीने कहा कि इसे योगपीठ ले जाओ, योगपीठके दर्शनसे [यह] बालक राज्य प्राप्त करनेमें समर्थ होगा। तत्पश्चात् सभी मातृकाओंने उस बातका समर्थन किया॥ १०-११॥ |
| नीतो विद्याधरं लोकं योगपीठं च दर्शितम्।<br>आश्वासितो मातृगणैः स्पृष्टः तत्र स बालकः॥ १२<br>कथ्यतां पूर्ववृत्तान्तः पुत्र बालकुमारक। | वे उसे विद्याधरलोक ले गयीं और उसे योगपीठका दर्शन कराया। इसके बाद मातृगणोंने उसे आश्वस्त किया और उस बालकसे पूछा—हे पुत्र! हे बालकुमार! अपना पूर्ववृत्तान्त बताओ॥ १२१/२॥ |
| कस्य त्वं पूर्णचन्द्राभ कथं प्राप्तोऽसि नो गृहम्।<br>एवमुक्तस्तदा बालो न किञ्चित्प्रत्यभाषत॥ १३ | हे पूर्णचन्द्रके समान आभावाले! तुम किसके पुत्र हो और हमलोगोंके घर कैसे आये? तब उनके ऐसा कहनेपर उस बालकने कुछ नहीं कहा॥ १३॥ |
अध्याय २ ] मातृमण्डल और आकाशलिङ्गका वर्णन ७७१
| पञ्चमुद्रोवाच | पंचमुद्रा बोली— |
|---|---|
| तथा राज्यक्षमो बालस्तथा त्वं कर्तुमर्हसि।<br>एवं श्रुत्वा तु तत्सर्वा मातरोऽभिमुखाभवन्॥ १४ | —यह बालक जिस भी तरह राज्य करनेमें समर्थ हो, वैसा तुम करो। यह सुनकर वे सभी माताएँ अभिमुख हुईं और बोलीं—'ऐसा ही होगा'—यह कहकर खेचरीसमुदाय प्रसन्न हो गया॥ १४ १/२ ॥ |
| एवं भविष्यतीत्युक्त्वा तुष्टो वै खेचरीगणः।<br>गच्छ पुत्र स्वयं राज्यं पालयस्व यथासुखम्॥ १५ | उन्होंने कहा—'हे पुत्र! अब जाओ और सुखपूर्वक अपने राज्यका पालन करो'॥ १५॥ |
| बालेन प्रार्थिताः सर्वाः प्रजाकामेन सुन्दरि।<br>यदाहं भविता चोर्व्यां सर्वलोकेषु पार्थिवः॥ १६<br>अवतारस्तदा कार्यो मद्भक्त्या परया तदा। | हे सुन्दरि! तब प्रजाकी कामनावाले बालकने सभी माताओंसे प्रार्थना की कि जब मैं पृथ्वीपर सभी लोकोंका राजा बनूँ, तब मेरी परम भक्तिसे आपलोग अवतार ग्रहण करें॥ १६ १/२ ॥ |
| एवं वै प्रार्थिताः सर्वा मातरो लोकमातरः॥ १७<br>अवतेरुर्यथायोगं कृष्णपक्षे चतुर्दशीम्।<br>पञ्चमुद्रा तु बालं तमनयन्नगरं पुनः॥ १८ | इस प्रकार [उसके द्वारा] प्रार्थित सभी लोकमातृस्वरूपा मातृकाओंने समयानुसार कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथिको अवतार लिया। पंचमुद्रा उस बालकको पुनः नगरमें ले गयीं॥ १७-१८॥ |
| आगत्य च यथायोगमर्धरात्रे व्यवस्थितम्।<br>अवतेरुस्तदा हृष्टाः पञ्चमुद्रा विमातरः॥ १९ | वहाँ आ करके वे यथायोग अर्धरात्रिमैं व्यवस्थित हो गयीं। तब पंचमुद्रा तथा विमाताओंने प्रसन्न होकर अवतार लिया॥ १९॥ |
| बालेन पूजिताः सर्वाः प्रतिष्ठाप्य यथाविधि।<br>पूजां गृहीत्वा बालस्य आकाशं तु पुनर्गताः॥ २० | इसके बाद उस बालकने विधिपूर्वक प्रतिष्ठा करके सभी माताओंकी पूजा की और बालककी पूजा ग्रहण करके वे पुनः आकाशमें चली गयीं॥ २०॥ |
| अद्यापि दृश्यते व्योम्नि मातृणां गणमण्डलम्।<br>निरीक्ष्यते पुण्यकर्मा उत्तराभिमुखं स्थितम्॥ २१ | मातृगणोंका समूहमण्डल आज भी आकाशमें देखा जाता है। पुण्यकर्मवाला व्यक्ति उत्तराभिमुखस्थित उस मण्डलको देख सकता है॥ २१॥ |
| यदेतद्दृश्यते व्योम्नि मातृणां तु समीपतः।<br>आकाशलिङ्गमित्युक्तमयं स्वर्लीन उच्यते॥ २२ | मातृकाओंके समीप आकाशमें जो यह देखा जाता है, उसे आकाशलिङ्ग कहा गया है; इसीको स्वर्लीन कहा जाता है॥ २२॥ |
| यथाकाशे तथा भूमौ एवं सर्वत्र दृश्यते।<br>एवमालोक्य तं सर्वं गगने मातृमण्डलम्॥ २३<br>मातृणां तु प्रभावेण नरो भवति सिद्धिभाक्। | जैसे यह आकाशमें वैसे ही पृथ्वीपर दिखायी पड़ता है; इस प्रकार यह सर्वत्र दिखायी देता है। इस तरह उस सम्पूर्ण मातृमण्डलको आकाशमें देखकर मनुष्य मातृगणोंके प्रभावसे सिद्धिका भागी हो जाता है॥ २३ १/२ ॥ |
| ततः प्रभृति देवेशि अस्मिन् क्षेत्रे व्यवस्थिता॥ २४<br>विपद्भियागता यस्माद्विकटा प्रोच्यते बुधैः।<br>बालो वीरत्वमापन्नो मत्प्रसादाद्यशस्विनि॥ २५<br>बालेन चाप्यहं देवि अस्मिन् देशे सुखोषितः॥ २६ | हे देवेशि! उसी समयसे वे देवी इस क्षेत्रमें विराजमान हो गयीं; वे विपत्तिके भयसे आयीं, अतः विद्वान् लोग उन्हें विकटा कहते हैं। हे यशस्विनि! वह बालक मेरी कृपासे वीरत्वसे युक्त हो गया और मैं भी बालकके साथ इस स्थानपर सुखपूर्वक रहने लगा॥ २४–२६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥
३- सगेश्वर, भद्रेश्वर, शूलेश्वर, नारदेश्वर, वरणेश्वर तथा कोटीश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन
| ७७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
तीसरा अध्याय
सगरेश्वर, भद्रेश्वर, शूलेश्वर, नारदेश्वर, वरणेश्वर तथा कोटीश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| वायव्ये तु दिशाभागे तस्य पीठस्य सुन्दरि।<br>सगरेण पुरा देवि तस्मिन् देशे प्रतिष्ठितम्॥ १<br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गं सर्वपापप्रणाशनम्। | हे सुन्दरि! हे देवि! उस पीठके वायव्य (पश्चिम-उत्तर) दिशाभागमें उस स्थानपर पूर्वकालमें सगरके द्वारा चार मुखवाला लिङ्ग स्थापित किया गया है; वह लिङ्ग समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ १<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| तस्यैवोत्तरपूर्वेण नाम्ना वालीश्वरं शुभम्॥ २<br>वालिना स्थापितं लिङ्गं कपिना सुमहात्मना।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि तिर्यग्योनिं न गच्छति॥ ३ | उसीके उत्तर-पूर्वमें परम महात्मा कपि वालिके द्वारा वालीश्वर नामक शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य तिर्यक् (पशु-पक्षी)-योनि नहीं प्राप्त करता है॥ २-३॥ |
| तस्य चोत्तरदिग्भागे सुग्रीवस्य महात्मनः।<br>लिङ्गं तस्य शुभं भद्रे सर्वकिल्बिषनाशनम्॥ ४<br>तथा हनुमतात्रैव स्थापितं लिङ्गमुत्तमम्। | उसके उत्तर दिशाभागमें महात्मा सुग्रीवके द्वारा शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है; हे भद्रे! वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है और यहींपर हनुमान्जीने भी उत्तम लिङ्गकी स्थापना की है॥ ४<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| सगरात्पश्चिमेनैव लिङ्गं तत्र प्रतिष्ठितम्॥ ५<br>मम भक्त्या च सुश्रोणि अश्विभ्यां परमेश्वरि। | हे सुश्रोणि! हे परमेश्वरि! वहींपर सगरेश्वरके पश्चिममें दोनों अश्विनीकुमारोंने भक्तिपूर्वक मेरे लिङ्गकी स्थापना की है॥ ५<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| तस्यैवोत्तरपार्श्वे तु भद्रदोहमिति स्मृतम्॥ ६<br>गवां क्षीरेण सञ्जातं सर्वपातकनाशनम्।<br>कपिलानां सहस्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम्।<br>तत्फलं लभते मर्त्यः स्नातस्तत्र न संशयः॥ ७ | उसीके उत्तरभागमें भद्रदोह [लिङ्ग] बताया गया है; गायोंके दुग्धसे निर्मित वह लिङ्ग सभी पापोंका नाश करनेवाला है। उसमें स्नान किया हुआ मनुष्य हजार कपिला गायोंके दानका जो फल होता है, उस फलको प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६-७॥ |
| पूर्वभाद्रपदायुकता पौर्णमासी यदा भवेत्।<br>तदा पुण्यतमः कालो ह्यश्वमेधफलप्रदः॥ ८ | पूर्वभाद्रपदसे युक्त पूर्णिमा जब हो, उस समयका पुण्यतम काल अश्वमेधयज्ञका फल देनेवाला होता है॥ ८॥ |
| ह्रदस्य पश्चिमे तीरे भद्रेश्वरमिति स्थितम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो भद्रे गोलोकं लभते ध्रुवम्॥ ९ | [उस] ह्रद (सरोवर)-के पश्चिम तटपर भद्रेश्वर [लिङ्ग] स्थित है; हे भद्रे! उसका दर्शन करके मनुष्य निश्चित रूपसे गोलोक प्राप्त करता है॥ ९॥ |
| भद्रेश्वरस्य दिग्भागे नैर्ऋते तु यशस्विनि।<br>उपशान्तशिवं नाम ख्यातं सर्वसुरासुरैः॥ १०<br>उपशान्तस्य देवस्य उत्तरे वरवर्णिनि।<br>चक्रेश्वरमिति ख्यातं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ११<br>पश्चिमाभिमुखं देवि ह्रदस्तस्यैव चाग्रतः।<br>तस्मिन् ह्रदे नरः स्नात्वा पूजयित्वा महेश्वरम्॥ १२<br>शिवलोकमवाप्नोति भावितेनान्तरात्मना। | हे यशस्विनि! भद्रेश्वरके नैर्ऋत्य दिशाभागमें उपशान्तशिव नामक लिङ्ग बताया गया है। हे वरवर्णिनि! उपशान्तदेवके उत्तरमें सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत पश्चिमकी ओर मुखवाला चक्रेश्वरलिङ्ग कहा गया है। हे देवि! उसीके आगे [एक] सरोवर है; उस सरोवरमें स्नान करके तथा भक्तियुक्त मनसे महेश्वरकी पूजा करके मनुष्य शिवलोक प्राप्त करता है॥ १०-१२<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| तस्य पश्चिमदिग्भागे शूलेश्वरमिति स्थितम्॥ १३ | उसके पश्चिम दिशाभागमें शूलेश्वरलिङ्ग विराजमान |
अध्याय ३ ] सगरेश्वर, भद्रेश्वर, शूलेश्वर, नारदेश्वर, वरणेश्वर तथा कोटीश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन ७७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शूलयन्त्रं पुरा न्यस्तं स्नानार्थं वरवर्णिनि।<br>ह्रदस्तत्र समुत्पन्नो देवदेवस्य चाग्रतः॥ १४<br>स्नानं कृत्वा ह्रदे तस्मिन् दृष्ट्वा शूलेश्वरं प्रभुम्।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति त्यक्त्वा संसारसागरम्॥ १५ | है; पूर्वकालमें वहाँ शूलयन्त्र स्थापित किया गया है। हे वरवर्णिनि! वहाँ देवदेवके समक्ष स्नानके लिये ह्रद उत्पन्न हुआ है; उस ह्रदमें स्नान करके तथा भगवान् शूलेश्वरका दर्शनकर मनुष्य संसार-सागरका त्याग करके रुद्रलोक प्राप्त करता है॥ १३-१५॥ |
| शूलेश्वरस्य पूर्वेण अन्यदायतनं शुभम्।<br>तप्तं तत्र तपस्तीव्रं नारदेन सुरर्षिणा॥ १६<br>स्थापितं मम लिङ्गं तु कुण्डस्य पुरतः शुभम्।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै नारदेश्वरम्॥ १७<br>संसारमाया या घोरा तां तरेन्नात्र संशयः।<br>नारदेशस्य पूर्वेण नाम्ना धर्मेश्वरं शुभम्॥ १८ | शूलेश्वरके पूर्वमें दूसरा शुभ आयतन (तीर्थ) स्थित है, देवर्षि नारदने वहाँ घोर तपस्या की थी। कुण्डके सामने मेरा [एक] शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। उस कुण्डमें स्नान करके नारदेश्वरका दर्शन करके मनुष्य जो घोर संसारमाया है, उसे पार कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ १६-१७ १/२॥ |
| स्थापितं मम लिङ्गं तु कुण्डस्य पुरतः शुभे।<br>वायव्ये तु दिशाभागे तस्य देवस्य सुन्दरि॥ १९<br>विनायकमिति ख्यातं कुण्डं तत्र शुभोदकम्।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चैव विनायकम्॥ २०<br>सर्वविघ्नविनिर्मुक्तो ह्यस्मिन् क्षेत्रे वसेच्चिरम्।<br>विनायकस्य संलग्न उत्तरेण यशस्विनि॥ २१ | हे शुभे! नारदेश्वरके पूर्वमें तथा कुण्डके सामने ही धर्मेश्वर नामक मेरा शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। हे सुन्दरि! उन देवके वायव्य (पश्चिम-उत्तर) दिशाभागमें विनायक बताये गये हैं, वहाँपर पवित्र जलवाला एक कुण्ड है। उस कुण्डमें स्नान करके तथा विनायकका दर्शनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर इस क्षेत्रमें चिरकालतक वास करता है॥ १८-२० १/२॥ |
| ह्रदस्तत्र सुविख्यातोऽमरको नाम नामतः।<br>दक्षिणेन तु कुण्डस्य मुखलिङ्गं तु तिष्ठति॥ २२<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चामरकेश्वरम्।<br>अज्ञानाच्चैव यत्किञ्चिदिह क्षेत्रे तु यत्कृतम्॥ २३<br>विलयं याति तत्सर्वं दृष्ट्वा तल्लिङ्गमुत्तमम्।<br>तस्य चोत्तरदिग्भागे नातिदूरे यशस्विनि॥ २४ | हे यशस्विनि! विनायकके समीपमें उत्तर दिशामें वहाँपर अति प्रसिद्ध ह्रद है और उस कुण्डके दक्षिणमें अमरक नामसे विख्यात मुखलिङ्ग स्थित है; उस कुण्डमें स्नान करके और उस उत्तम अमरकेश्वरलिङ्गका दर्शन करके [मनुष्यके द्वारा] इस क्षेत्रमें अज्ञानपूर्वक जो भी [पाप] किया गया रहता है, वह सब नष्ट हो जाता है॥ २१-२३ १/२॥ |
| वरणायास्तटे शुद्धे लिङ्गं तत्रैव संस्थितम्।<br>वरणेश्वरं तु विख्यातं पश्चिमाभिमुखं स्थितम्॥ २५<br>तस्मिन् पाशुपतः सिद्ध अश्वपादो यशस्विनि।<br>अनेनैव शरीरेण शाश्वतीं सिद्धिमङ्गतः॥ २६ | हे यशस्विनि! उसके उत्तर दिशामें वहींपर समीपमें ही वरणाके पवित्र तटपर एक लिङ्ग स्थित है; वरणेश्वर नामसे विख्यात वह लिङ्ग पश्चिमाभिमुख स्थित है॥ २४-२५॥<br>हे यशस्विनि! अश्वपाद नामक सिद्ध पाशुपत उसमें इसी शरीरसे शाश्वत सिद्धिको प्राप्त हुए हैं॥ २६॥ |
| ममापि तत्र सान्निध्यं तस्मिँल्लिङ्गे यशस्विनि।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि गन्धर्वत्वं च विन्दति॥ २७ | हे यशस्विनि! वहाँ उस लिङ्गमें [सदा] मेरा भी सान्निध्य रहता है; हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे गन्धर्वत्वकी प्राप्ति होती है॥ २७॥ |
| तस्य पश्चिमदिग्भागे नाम्ना शैलेश्वरं शुभम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि पूर्वोक्तं लभते फलम्॥ २८ | हे देवि! उसके पश्चिम दिशाभागमें शैलेश्वर नामक शुभ लिङ्ग है; उसका दर्शन करके मनुष्य पूर्वोक्त [समस्त] फल प्राप्त करता है॥ २८॥ |
४- कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य
| ७७४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| दक्षिणे चापि तस्यैव कोटीश्वरमिति स्थितम्।<br>यत्र सा दृश्यते देवि विश्रुता भीष्मचण्डिका॥ २९ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें कोटीश्वर [नामक] लिङ्ग भी स्थित है, जहाँ वे प्रसिद्ध भीष्मचण्डिका दिखायी देती हैं॥ २९॥ |
| बीभत्सविकृते भीमे श्मशाने वसते सदा।<br>तेन सा प्रोच्यते देवि विश्रुता भीष्मचण्डिका॥ ३० | हे देवि! वे सदा बीभत्स रूपवाले भयानक श्मशानमें वास करती हैं, इसलिये वे प्रसिद्ध भीष्मचण्डिका कही जाती हैं॥ ३०॥ |
| कोटितीर्थेषु यः स्नात्वा कोटीश्वरमथार्चयेत्।<br>गवां कोटिप्रदानेन यत्फलं लभते नरः॥ ३१ | कोटितीर्थोंमें स्नान करके कोटीश्वरका पूजन करना चाहिये। हे सुन्दरि! मनुष्य करोड़ों गायोंके दानसे जो फल प्राप्त करता है, वह सम्पूर्ण फल उसे यहाँपर मात्र एक बार स्नान करनेसे प्राप्त हो जाता है॥ ३१ १/२॥ |
| तत्फलं सकलं तस्य स्नानेनैकेन सुन्दरि।<br>कोटीश्वरस्य पूर्वेण ऋषिभिश्चैः प्रतिष्ठितम्॥ ३२ | कोटीश्वरके पूर्वमें ऋषियोंके द्वारा एक लिङ्ग स्थापित किया गया है; उस लिङ्गके दर्शनसे चराचरसहित सम्पूर्ण जगत् दृष्टिगत हो जाता है॥ ३२-३३॥ |
| तेन लिङ्गेन दृष्टेन दृष्टं स्यात् सचराचरम्॥ ३३ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३॥
चौथा अध्याय
कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| कोटीश्वरस्य देवस्य आग्नेय्यां दिशि संस्थितः।<br>श्मशानस्तम्भसंज्ञेति विख्यातः सुप्रतिष्ठितः॥ १ | देवकोटीश्वरके आग्नेय दिशामें प्रसिद्ध तथा सुप्रतिष्ठित श्मशानस्तम्भ स्थित है। वहाँपर वे मनुष्य गिराये जाते हैं, जिन्होंने इस लोकमें बुरा कर्म किया है॥ १ १/२॥ |
| मानवास्तत्र पात्यन्ते इह यैर्दुष्कृतं कृतम्।<br>यत्र स्तम्भे सदा देवि अहं तिष्ठामि भामिनि॥ २ | हे भामिनि! हे देवि! मैं उस स्तम्भमें सदा विराजमान हूँ। हे देवि! वहाँ जाकर जो मेरी पूजा करेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा और परम गति प्राप्त करेगा॥ २-३॥ |
| तत्र गत्वा तु यः पूजां मम देवि करिष्यति।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो गच्छेच्च परमां गतिम्॥ ३ | |
| अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि महातीर्थं यशस्विनि।<br>कपालमोचनं नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ ४ | हे यशस्विनि! अब मैं तुम्हें तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध कपालमोचन नामक महातीर्थके विषयमें बताऊँगा॥ ४॥ |
| कपालं पतितं तत्र स्नातस्य मम सुन्दरि।<br>तस्मिन् स्नातो वरारोहे ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ ५ | हे सुन्दरि! वहाँ स्नान करते हुए मेरा कपाल गिर पड़ा था; हे वरारोहे! उसमें स्नान करनेवाला ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है॥ ५॥ |
| कपालेश्वरनामानं तस्मिंस्तीर्थे व्यवस्थितम्।<br>अश्वमेधमवाप्नोति दर्शनात्तस्य सुन्दरि॥ ६ | उस तीर्थमें कपालेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है; हे सुन्दरि! उसके दर्शनसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है॥ ६॥ |
| तस्यैव चोत्तरे पार्श्वे तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>तत्र स्नात्वा वरारोहे ऋणैर्मुक्त्तो भवेन्नरः॥ ७ | उसीके उत्तरमें पासमें ही त्रैलोक्यप्रसिद्ध एक तीर्थ है, हे वरारोहे! उसमें स्नान करके मनुष्य [सभी] ऋणोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७॥ |
अध्याय ४] कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य [७७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋणमोचनकं नाम्ना विख्यातं भुवि सुन्दरि।<br>त्रीणि लिङ्गानि तिष्ठन्ति तत्रैव मम सुन्दरि॥ ८<br>तानि दृष्ट्वा तु सुश्रोणि नश्यति त्रिविधम् ऋणम्। | हे सुन्दरि! वह [तीर्थ] ऋणमोचन नामसे पृथ्वीलोकमें विख्यात है। हे सुन्दरि! वहींपर मेरे तीन लिङ्ग स्थित हैं; हे सुश्रोणि! उनका दर्शन करनेसे तीनों प्रकारके ऋण विनष्ट हो जाते हैं॥ ८ १/२॥ |
| दक्षिणे तु दिशाभागे तस्य तीर्थस्य सुन्दरि॥ ९<br>अङ्गारेश्वरनामानं मुखलिङ्गं व्यवस्थितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं देवि कुण्डस्य पुरतः स्थितम्॥ १० | हे सुन्दरि! उस तीर्थके दक्षिण दिशाभागमें अंगारेश्वर नामक मुखलिङ्ग विराजमान है। हे देवि! पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग कुण्डके सामने स्थित है॥ ९-१०॥ |
| अङ्गारेण यदा योगश्चतुर्थ्यामष्टमीषु वा।<br>तीर्थे तस्मिन्नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै मङ्गलेश्वरम्॥ ११<br>व्याधिभिश्च विनिर्मुक्तो यत्र तत्राभिजायते। | जब अंगार [मंगल]-के साथ चतुर्थी अथवा अष्टमीका योग हो, तब उस तीर्थमें स्नान करके तथा मंगलेश्वरका दर्शन करके मनुष्य जहाँ-कहीं भी रहे, व्याधियोंसे पूर्णतः मुक्त हो जाता है॥ ११ १/२॥ |
| तस्यैव च समीपस्थमुत्तरेण यशस्विनि॥ १२<br>लिङ्गं तु सुमहत् पुण्यं विश्वकर्मप्रतिष्ठितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं दृष्ट्वा सर्वज्ञत्वमवाप्नुयात्॥ १३ | हे यशस्विनि! इसीके समीप उत्तर दिशामें विश्वकर्माके द्वारा स्थापित महापुण्यप्रद पश्चिमाभिमुख लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य सर्वज्ञत्व प्राप्त कर लेता है॥ १२-१३॥ |
| बुधेश्वरं तु तत्रैव दृष्ट्वा भक्त्या दृढव्रतः।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति दृष्ट्वा देवं बुधेश्वरम्॥ १४ | वहींपर देव बुधेश्वरका भक्तिपूर्वक दर्शन करके दृढ व्रतवाला भक्त सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥ १४॥ |
| बुधेश्वराद्दक्षिणतो लिङ्गं चैव चतुर्मुखम्।<br>महामुण्डेश्वरं नाम सर्वसिद्धिप्रदायकम्॥ १५ | बुधेश्वरके दक्षिणमें सभी सिद्धियोंको देनेवाला महामुण्डेश्वर नामक चतुर्मुखलिङ्ग है॥ १५॥ |
| तस्य देवस्य पुरतः कूपस्तिष्ठति वै शुभः।<br>तस्य कूपस्य सा देवी उपरिष्टात् स्थिता शुभा॥ १६<br>स्नानार्थं तत्र सा क्षिप्ता माला मुण्डमयी मया।<br>तेन सम्प्रोच्यते देवि महामुण्डेति मानवैः॥ १७ | उन देवके समक्ष [एक] शुभ कूप विद्यमान है, उस कूपके ऊपर वे कल्याणमयी देवी विराजमान हैं। स्नानके लिये वहाँ मेरे द्वारा वह मुण्डमयी माला प्रक्षिप्त की गयी है, अतः हे देवि! मनुष्य उन्हें महामुण्डा कहते हैं॥ १६-१७॥ |
| खट्वाङ्गं तत्र वै क्षिप्तं स्नानार्थं वरवर्णिनि।<br>खट्वाङ्गेश्वर नाम्ना तु स्थितं तत्रैव सुव्रते॥ १८ | हे वरवर्णिनि! स्नानहेतु वहींपर खट्वांग भी प्रक्षिप्त किया गया है; हे सुव्रते! वहींपर खट्वांगेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है॥ १८॥ |
| भुवनेश्वरनाम्ना तु लिङ्गं देवि फलप्रदम्।<br>उत्तराभिमुखं लिङ्गं कुण्डाद्वै दक्षिणे तटे॥ १९<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै भुवनेश्वरम्।<br>न दुर्गतिमवाप्नोति कल्मषैश्च विमुच्यते॥ २० | हे देवि! वहाँ कुण्डके दक्षिण तटपर भुवनेश्वर नामक फलदायक लिङ्ग विराजमान है; वह लिङ्ग उत्तरकी ओर मुखवाला है। उस कुण्डमें स्नान करके तथा भुवनेश्वरका दर्शन करके मनुष्य दुर्गति नहीं प्राप्त करता है और पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १९-२०॥ |
| दक्षिणे भुवनेशस्य कुण्डमन्यच्च तिष्ठति।<br>नाम्ना विमलमीशं च लिङ्गं तस्यैव पूर्वतः॥ २१ | भुवनेश्वरके दक्षिणमें एक अन्य कुण्ड भी स्थित है, उसीके पूर्वमें विमलेश नामक लिङ्ग है॥ २१॥ |
| वैमल्यं तु नरा यान्ति तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्।<br>तत्र स्नात्वा वरारोहे मोदते दिवि देवतैः॥ २२ | उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं। हे वरारोहे! वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गमें देवताओंके साथ आनन्दित रहता है॥ २२॥ |