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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
२२६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
श्लोकअर्थ
द्वीपस्यानन्तरो यस्तु समुद्रः सप्तमस्तु वै।<br>एवं द्वीपसमुद्राणां वृद्धिर्ज्ञेया परस्परम्॥ २९हैं। द्वीपके अनन्तर जो समुद्र है, वह सातवाँ समुद्र है। इस प्रकार द्वीपों तथा समुद्रोंकी परस्पर वृद्धिको जानना चाहिये॥ २७-२९॥
परेण पुष्करस्याथ अनुवृत्य स्थितो महान्।<br>स्वादूदकसमुद्रस्तु समन्तात्परिवेष्ट्य च॥ ३०<br>परेण तस्य महती दृश्यते लोकसंस्थितिः।<br>काञ्चनी द्विगुणा भूमिः सर्वा चैकशिलोपमा॥ ३१<br>तस्याः परेण शैलस्तु मर्यादापारमण्डलः।<br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते॥ ३२<br>दृश्यादृश्यगिरिर्यावत्तावदेषा धरा द्विजाः।<br>योजनानां सहस्त्राणि दश तस्योच्छ्रयः स्मृतः॥ ३३<br>तावांश्च विस्तरस्तस्य लोकालोकमहागिरेः।<br>अर्वाचीने तु तस्यार्धे चरन्ति रविरश्मयः॥ ३४<br>परार्धे तु तमो नित्यं लोकालोकस्ततः स्मृतः।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तो भूर्लोकस्य च विस्तरः॥ ३५पुष्करके बाहर उसे चारों ओरसे घेरकर स्वादिष्ट जलसे युक्त महान् समुद्र स्थित है। उसके बाहर महती लोकस्थिति दिखायी देती है, वहाँकी भूमि स्वर्णमयी है और विस्तारमें दुगुनी है। सम्पूर्ण भूमि एक शिलाके तुल्य है। उसके परे मर्यादामण्डलस्वरूप एक पर्वत है। इसका कुछ भाग प्रकाशमय तथा कुछ भाग अन्धकारमय रहता है, इसे लोकालोक [पर्वत] कहा जाता है। हे द्विजो! जितना यह दृश्य-अदृश्य पर्वत है, उतनी ही यह धरा है। उसकी (पर्वतकी) ऊँचाई दस हजार योजन कही गयी है। उस लोकालोक [नामक] महापर्वतका विस्तार भी उतना ही है। उसके आधे भागमें सूर्यकी किरणें पहुँचती हैं और दूसरे आधे भागमें सदा अन्धकार रहता है, इसलिये इसे लोकालोक कहा गया है। [हे द्विजो!] इस प्रकार मैंने संक्षेपमें भूलोकके विस्तारका वर्णन किया॥ ३०-३५॥
आभानोर्वै भुवः स्वस्तु आध्रुवान्मुनिसत्तमाः।<br>आवहाद्या निविष्टास्तु वायोर्वै सप्त नेमयः॥ ३६<br>आवहः प्रवहश्चैव ततश्चानुवहस्तथा।<br>संवहो विवहश्चाथ ततश्चोर्ध्वं परावहः॥ ३७<br>द्विजाः परिवहश्चेति वायोर्वै सप्त नेमयः।<br>बलाहकास्तथा भानुश्चन्द्रो नक्षत्रराशयः॥ ३८<br>ग्रहाणि ऋषयः सप्त ध्रुवो विप्राः क्रमादिह।हे श्रेष्ठ मुनियो! भूर्लोक सूर्यतक है और स्वर्लोक ध्रुवतक है। आवह आदि वायुकी सात नेमियाँ कही गयी हैं। हे द्विजो! आवह, प्रवह, अनुवह, संवह, विवह, परावह और परिवह—ये वायुकी सात नेमियाँ हैं। हे विप्रो! मेघ, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण, राशियाँ, ग्रह सप्तर्षि और ध्रुव—ये क्रमसे व्यवस्थित हैं॥ ३६-३८१/२॥
योजनानां महीपृष्ठादूर्ध्वं पञ्चदशाध्रुवात्॥ ३९<br>नियुतान्येकनियुतं भूपृष्ठाद्भानुमण्डलम्।<br>रथः षोडशसाहस्रो भास्करस्य तथोपरि॥ ४०<br>चतुराशीतिसाहस्रो मेरुश्चोपरि भूतलात्।<br>कोटियोजनमाक्रम्य महर्लोको ध्रुवाद् ध्रुवः॥ ४१<br>जनलोको महर्लोकात्तथा कोटिद्वयं द्विजाः।<br>जनलोकात्तपोलोकश्चतस्त्रः कोटयो मतः॥ ४२<br>प्राजापत्याद् ब्रह्मलोकः कोटिषट्कं विसृज्य तु।<br>पुण्यलोकास्तु सप्तैते ह्याण्डेऽस्मिन् कथिता द्विजाः॥ ४३पृथ्वीतलसे ऊपर ध्रुवलोकपर्यन्त पन्द्रह नियुत योजनकी दूरी है। भूपृष्ठसे भानुमण्डल एक नियुत योजन दूर है। उसके ऊपर सूर्यका रथ सोलह हजार योजन है। मेरु पर्वत पृथ्वीतलसे चौरासी हजार योजनपर है। ध्रुवसे एक करोड़ योजनके बाद महर्लोक है। हे द्विजो! महर्लोकसे दो करोड़ योजनकी दूरीपर जनलोक है। जनलोकसे चार करोड़ योजनकी दूरीपर तपोलोक कहा गया है। प्राजापत्यलोक (तपोलोक)-से छः करोड़ योजनकी दूरी छोड़कर ब्रह्मलोक स्थित है। हे ब्राह्मणो! इस प्रकार इस ब्रह्माण्डमें इन सात पुण्यलोकोंको मैंने बता दिया॥ ३९-४३॥
अधः सप्ततलानां तु नरकाणां हि कोटयः।<br>मायान्ताश्चैव घोराद्या अष्टाविंशतिरेव तु॥ ४४<br>पापिनस्तेषु पच्यन्ते स्वस्वकर्मानुरूपतः।<br>अवीच्यन्तानि सर्वाणि रौरवाद्यानि तेषु च॥ ४५सात तलोंके नीचे घोरसे लेकर मायात क अट्ठाईस कोटिके नरक हैं; पापीलोग उनमें अपने-अपने कर्मोंके अनुरूप दुःख भोगते हैं। उनमेंसे प्रत्येकमें रौरवसे लेकर

अध्याय ५३] भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौंचद्वीपोंके महापर्वतोंका वर्णन २२७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रत्येकं पञ्चकान्याहुर्नैरकाणि विशेषतः।<br>अण्डमादौ मया प्रोक्तमण्डस्यावरणानि च॥ ४६<br><br>हिरण्यगर्भसर्गश्च प्रसङ्गाद्बहुविस्तरात्।<br>अण्डानामीदृशानां तु कोट्यो ज्ञेयाः सहस्रशः॥ ४७अवीचितक सभी विशेष रूपसे पाँच नरक कहे गये हैं। मैंने आदिमें अण्डका वर्णन किया और अण्डके आवरणोंका भी वर्णन किया एवं प्रसंगवश ब्रह्माकी सृष्टिका भी विस्तारसे वर्णन किया। इस प्रकारके हजारों-करोड़ों ब्रह्माण्डोंको जानना चाहिये॥ ४४—४७॥
सर्वगत्वात्प्रधानस्य तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा।<br>अण्डेष्वेतेषु सर्वेषु भुवनानि चतुर्दश॥ ४८<br><br>प्रत्यण्डं द्विजशार्दूलास्तेषां हेतुर्महेश्वरः।<br>अण्डेषु चाण्डबाह्येषु तथाण्डावरणेषु च॥ ४९<br><br>तमोऽन्ते च तमःपारे चाष्टमूर्तिर्व्यवस्थितः।<br>अस्यात्मनो महेशस्य महादेवस्य धीमतः॥ ५०<br><br>अदेहिनस्त्वहो देहमखिलं परमात्मनः।<br>अस्याष्टमूर्तेः शर्वस्य शिवस्य गृहमेधिनः॥ ५१<br><br>गृहिणी प्रकृतिर्दिव्या प्रजाश्च महदादयः।<br>पशवः किङ्करास्तस्य सर्वे देहाभिमानिनः॥ ५२प्रधानके सर्वगामी होनेके कारण इन अण्डोंमें तिर्यक्, ऊपर तथा नीचे [सभी ओर] चौदह भुवन हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो! उनमें प्रत्येक अण्डके हेतु महेश्वर हैं। अष्टमूर्ति [शिव] अण्डोंमें, अण्डोंके बाहर, अण्डोंके आवरणोंमें, अन्धकारके भीतर तथा अन्धकारके परे भी विद्यमान हैं। सम्पूर्ण जगत् इन महेश्वर, महादेव, धीमान्, देहरहित परमात्माका शरीर है। गृहस्थरूप इन अष्टमूर्ति शर्व शिवकी गृहिणी दिव्य प्रकृति है, महत् आदि इनकी सन्तानें हैं और सभी देहाभिमानी पशु इनके सेवक हैं॥ ४८—५२॥
आद्यन्तहीनो भगवाननन्तः<br>पुमान् प्रधानप्रमुखश्च सप्त।<br>प्रधानमूर्तिस्त्वथ षोडशाङ्गो<br>महेश्वरश्चाष्टतनुः स एव॥ ५३<br><br>आज्ञाबलात्तस्य धरा स्थितेह<br>धराधरा वारिधराः समुद्राः।<br>ज्योतिर्गणः शक्रमुखाः सुराश्च<br>वैमानिकाः स्थावरजङ्गमाश्च॥ ५४वे [शिव] ही आदि-अन्तसे रहित, भगवान् अनन्त, पुरुष, प्रधान आदि (बुद्धि, अहंकार आदि) सात तत्त्व, प्रधान मूर्तिवाले, सोलह अंगोंवाले (पंचमहाभूत, दस इन्द्रियाँ, मन), अष्टमूर्ति तथा महेश्वर हैं। उन्हींकी आज्ञाके प्रभावसे पृथ्वी, पर्वत, मेघ, समुद्र, तारागण, इन्द्र आदि देवता, वैमानिक तथा स्थावर-जंगम सभी प्राणी स्थित हैं॥ ५३-५४॥
दृष्ट्वा यक्षं लक्षणैर्हीनमीशं<br>दृष्ट्वा सेन्द्रास्ते किमेतत्विहेति।<br>यक्षं गत्वा निश्चयात्पावकाद्याः<br>शक्तिक्षीणाश्चाभवन्यत्ततोऽपि ॥ ५५लक्षणोंसे रहित यक्षरूपी शिवको देखकर इन्द्रसहित अग्नि आदि वे देवता 'यहाँ यह क्या है?'—ऐसा

२२८ श्रीलिङ्गमहापुराण · [पूर्वभाग


सोचकर अनिश्चयकी दशामें यक्षके समीप जाकर वे शक्तिहीन हो गये॥ ५५॥
दग्धुं तृणं वापि समक्षमस्य<br>यक्षस्य वह्निर्न शशाक विप्राः।<br>वायुस्तृणं चालयितुं तथान्ये<br>स्वान् स्वान् प्रभावान् सकलामरेन्द्राः॥ ५६<br><br>तदा स्वयं वृत्ररिपुः सुरेन्द्रैः<br>सुरेश्वरः सर्वसमृद्धिहेतुः।<br>सुरेश्वरं यक्षमुवाच को वा<br>भवानितीत्थं सकुतूहलात्मा॥ ५७हे विप्रो! अग्निदेव उस यक्षके सामने तिनका भी नहीं जला सके, पवन उस तृणको उड़ानेमें समर्थ नहीं हुए, उसी प्रकार अन्य समस्त श्रेष्ठ देवता भी अपने-अपने प्रभाव प्रदर्शित करनेमें समर्थ नहीं हुए। तब सभी श्रेष्ठ देवताओंके साथ समस्त समृद्धियोंके कारणभूत वृत्रशत्रु उन देवेन्द्रने कुतूहलचित्त होकर यक्षरूप सुरेश्वरसे इस प्रकार कहा—आप कौन हैं?॥ ५६-५७॥
तदा हृद्यदृश्यं गत एव यक्ष-<br>स्तदाम्बिका हैमवती शुभास्या।<br>उमा शुभैराभरणैरनेकौः<br>सुशोभमाना त्वनु चाविरासीत्॥ ५८उसी समय यक्ष अदृश्य हो गये। तब सुन्दर मुखवाली तथा अनेक शुभ आभरणोंसे अत्यन्त शोभित होती हुई हैमवती अम्बिका उमा प्रकट हो गयीं॥ ५८॥
तां शक्रमुख्या बहुशोभमाना-<br>मुमामजां हैमवतीमपृच्छन्।<br>किमेतदीशे बहुशोभमाने<br>को वाम्बिके यक्षवपुश्चकास्ति॥ ५९इन्द्र आदिने सुशोभित होती हुई उन हैमवती अजा उमासे पूछा—हे ईशे! हे परम शोभायमान अम्बिके! यह यक्षदेहधारी कौन है?॥ ५९॥
निशम्य तद्यक्षमुमाम्बिकाह<br>त्वगोचरश्चेति सुराः सशक्राः।<br>प्रणेमुरेनां मृगराजगामिनी-<br>मुमामजां लोहितशुक्लकृष्णाम्॥ ६०यह सुनकर उमा अम्बिकाने कहा—यह अगोचर है; तब इन्द्रसहित सभी देवताओंने उस यक्षको तथा सिंहगामिनी और लोहित-शुक्ल-कृष्णवर्णवाली इन अजा उमाको प्रणाम किया॥ ६०॥
सम्भाविता सा सकलामरेन्द्रैः<br>सर्वप्रवृत्तिस्तु सुरासुराणाम्।<br>अहं पुरासं प्रकृतिश्च पुंसो<br>यक्षस्य चाज्ञावशगेत्यथाह॥ ६१सभी श्रेष्ठ देवताओंसे सत्कृत होकर देवताओं तथा दानवोंकी समस्त प्रवृत्तिरूपा उन देवीने कहा—मैं पूर्वकालमें इस यक्षरूप [परम] पुरुषकी आज्ञाके अधीन रहनेवाली प्रकृति थी*॥ ६१॥
तस्माद् द्विजाः सर्वमजस्य तस्य<br>नियोगतश्चाण्डमभूदजाद्वै ।<br>अजश्च अण्डादखिलं च तस्मात्<br>ज्योतिर्गणैर्लोक मजात्मकं तत्॥ ६२अतः हे द्विजो! उन्हीं अज (शिव)-के नियोगसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए, उन ब्रह्मासे अण्ड उत्पन्न हुआ और अण्डसे ज्योतिर्गणोंसहित समग्र विश्व उत्पन्न हुआ; इस प्रकार सब कुछ शिवात्मक है॥ ६२॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशविन्यासनिर्णयो नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशविन्यासनिर्णय' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५३॥


* परम पुरुषकी सर्वोत्कृष्टताको बतानेवाला यह 'हैमवती-आख्यान' मूलरूपसे सामवेदके तलवकारब्राह्मणके अन्तर्गत प्राप्त होनेवाले केनोपनिषद्में उपलब्ध होता है।

५४- ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन, सूर्यकी स्थिति तथा उसकी गतिसे होनेवाले अयन एवं ऋतुओंकी स्थिति, ध्रुवस्थान तथा मेघोंका स्वरूप और वृष्टिका प्रादुर्भाव

अध्याय ५४] ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २२९


चौवनवाँ अध्याय

ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन, सूर्यकी स्थिति तथा उसकी गतिसे होनेवाले अयन एवं ऋतुओंकी स्थिति, ध्रुवस्थान तथा मेघोंका स्वरूप और वृष्टिका प्रादुर्भाव

सूत उवाच
सूत उवाच<br>ज्योतिर्गणप्रचारं वै सङ्क्षिप्याण्डे ब्रवीम्यहम्।<br>देवक्षेत्राणि चालोक्य ग्रहचारप्रसिद्धये ॥ १सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] देवक्षेत्रोंको देखकर मैं ग्रहोंकी गतिके ज्ञानके लिये अण्डमें ज्योतिर्गणों (ग्रहों)-की गतिका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥
मानसोपरि माहेन्द्री प्राच्यां मेरोः पुरी स्थिता।<br>दक्षिणे भानुपुत्रस्य वरुणस्य च वारुणी ॥ २<br><br>सौम्ये सोमस्य विपुला तासु दिग्देवताः स्थिताः।<br>अमरावती संयमनी सुखा चैव विभा क्रमात् ॥ ३मेरुके पूर्वमें मानस पर्वतपर महेन्द्रकी पुरी स्थित है। दक्षिणमें सूर्यपुत्र यमकी, पश्चिममें वरुणकी और उत्तरमें सोमकी विशाल पुरी है। उनमें दिग्पाल रहते हैं। वे पुरियाँ क्रमसे अमरावती, संयमनी, सुखा तथा विभा [नामवाली] हैं ॥ २-३ ॥
लोकपालोपरिष्टात्तु सर्वतो दक्षिणायने।<br>काष्ठां गतस्य सूर्यस्य गतिर्या तां निबोधत ॥ ४<br><br>दक्षिणप्रक्रमे भानुः क्षिप्तेषुरिव धावति।<br>ज्योतिषां चक्रमादाय सततं परिगच्छति ॥ ५लोकपालोंकी पुरियोंके ऊपर सभी ओर दक्षिणायनमें बाणके समान गतिवाले सूर्यकी जो गति है, उसे [आपलोग] जानिये। दक्षिणायनमें सूर्य बाणकी तरह गमन करते हैं, वे नक्षत्रचक्रको साथ लेकर निरन्तर परिभ्रमण करते हैं ॥ ४-५ ॥
पुरान्तगो यदा भानुः शक्रस्य भवति प्रभुः।<br>सर्वैः सायमनेः सौरो ह्युदयो दृश्यते द्विजाः ॥ ६<br><br>स एव सुखवत्यां तु निशान्तस्थः प्रदृश्यते।<br>अस्तमेति पुनः सूर्यो विभायां विश्वदृग्विभुः ॥ ७हे द्विजो! जब प्रभु सूर्य इन्द्रकी पुरीमें प्रवेश करते हैं, तब संयमनीपुरीके सभी लोग सूर्यका उदय देखते हैं; जब वे सूर्य संयमनीपुरीमें होते हैं, तब [पश्चिममें] सुखावतीपुरीमें प्रातःकाल होता है। उस समय विश्वके नेत्रतुल्य भगवान् सूर्य विभापुरीमें अस्त होते हैं ॥ ६-७ ॥
मया प्रोक्तोऽमरावत्यां यथासौ वारितस्करः।<br>तथा संयमनीं प्राप्य सुखां चैव विभां खगः ॥ ८जिस प्रकार मैंने अमरावतीमें सूर्यकी गतिको कहा है, उसी प्रकार ये सूर्य संयमनीको पाकर 'सुखा' तथा 'विभा'को भी प्राप्त करते हैं ॥ ८ ॥
यदापराह्लस्त्वाग्नेय्यां पूर्वाह्नो नैर्ऋते द्विजाः।<br>तदा त्वपररात्रश्च वायुभागे सुदारुणः ॥ ९<br><br>ईशान्यां पूर्वरात्रस्तु गतिरेषा च सर्वतः।<br>एवं पुष्करमध्ये तु यदा सर्पति वारिपः ॥ १०<br><br>त्रिंशांशकं तु मेदिन्यां मुहूर्तेनैव गच्छति।<br>योजनानां मुहूर्तस्य इमां सङ्ख्यां निबोधत ॥ ११हे द्विजो! जब आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) भागमें अपराह्न होता है, तब नैर्ऋत (दक्षिण-पश्चिम) भागमें पूर्वाह्न, उस समय वायव्य (उत्तर-पश्चिम) भागमें भयानक रात्रिका उत्तरार्ध और उत्तर-पूर्व भागमें रात्रिका प्रथम काल होता है। सब प्रकारसे यही गति होती है। इसी प्रकार जब जलको सोखनेवाले सूर्य आकाशके मध्यमें संचरण करते हैं, तब वे एक मुहूर्तमें पृथ्वीपर तीस अंश चलते हैं। एक मुहूर्तमें सूर्यके द्वारा पार की गयी दूरीको योजनपरिमाणमें सुनिये ॥ ९-११ ॥

२३० | श्रीलिङ्गमहापुराणं | [ पूर्वभाग


| पूर्णा शतसहस्राणामेकत्रिंशत्तु सा स्मृता।<br>पञ्चाशच्च तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु॥ १२<br>मौहूर्तकी गतिर्ह्येषा भास्करस्य महात्मनः।<br>एतेन गतियोगेन यदा काष्ठां तु दक्षिणाम्॥ १३<br>पर्यपृच्छेत्पतङ्गोऽपि सौम्याशां चोत्तरेऽहनि।<br>मध्ये तु पुष्करस्याथ भ्रमते दक्षिणायने॥ १४<br>मानसोत्तरशैले तु महातेजा विभावसुः।<br>मण्डलानां शतं पूर्णं तदशीत्यधिकं विभुः॥ १५<br>बाह्यं चाभ्यन्तरं प्रोक्तमुत्तरायणदक्षिणे।<br>प्रत्यहं चरते तानि सूर्यो वै मण्डलानि तु॥ १६<br>कुलालचक्रपर्यन्तो यथा शीघ्रं प्रवर्तते।<br>दक्षिणप्रक्रमे देवस्तथा शीघ्रं प्रवर्तते॥ १७<br>तस्मात्प्रकृष्टं भूमिं तु कालेनाल्पेन गच्छति।<br>सूर्यो द्वादशभिः शीघ्रं मुहूर्तैर्दक्षिणायने॥ १८<br>त्रयोदशार्धमृक्षाणामह्ना तु चरते रविः।<br>मुहूर्तैस्तावदृक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन्॥ १९ | वह संख्या इकतीस लाख पचास हजार योजन कही गयी है। यह महात्मा भास्करकी एक मुहूर्तकी गति है। जब सूर्य इस गतिसे दक्षिण दिशाकी ओर जाते हैं, तब [वहाँ छः माह भ्रमण करनेके बाद] पुनः उत्तरायणकालमें उत्तर दिशाकी ओर लौटते हैं। दक्षिणायनके समय महातेजस्वी सूर्य मानसोत्तर पर्वतपर पुष्करके मध्य भ्रमण करते हैं। वे सूर्य एक सौ अस्सी मण्डलसे गुजरते हैं। उत्तरायण तथा दक्षिणायनको बाह्य एवं आभ्यन्तर कहा गया है। सूर्य प्रतिदिन उन्हीं मण्डलोंपर भ्रमण करते हैं। जैसे कुम्हारके चाकका बाहरी भाग शीघ्रतापूर्वक चारों ओर घूमता है, वैसे ही सूर्यदेव दक्षिणायनमें तेजीसे भ्रमण करते हैं। इसलिये वे थोड़े समयमें ही [अपेक्षाकृत] अधिक भूमिपर पहुँचते हैं। दक्षिणायनमें सूर्य मात्र बारह मुहूर्तोंमें शीघ्रतापूर्वक दिनमें साढ़े तेरह नक्षत्र चलते हैं, जबकि रात्रिमें अठारह मुहूर्तोंमें उतनी ही नक्षत्रकी दूरीको तय करते हैं॥ १२–१९॥ | | कुलालचक्रमध्यं तु यथा मन्दं प्रसर्पति।<br>तथोदगयने सूर्यः सर्पते मन्दविक्रमः॥ २०<br>तस्माद्दीर्घेण कालेन भूमिमल्पां तु गच्छति।<br>स रथोऽधिष्ठितो भानोरादित्यैर्मुनिभिस्तथा॥ २१<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः।<br>प्रदीपयन् सहस्रांशुरग्रतः पृष्ठतोऽप्यधः॥ २२<br>ऊर्ध्वतश्च करं त्यक्त्वा सभां ब्राह्मीमनुत्तमाम्।<br>अम्भोभिर्मुनिभिस्त्यक्तैः सन्ध्यायां तु निशाचरान्॥ २३<br>हत्वा हत्वा तु सम्प्राप्तान् ब्राह्मणैश्चरते रविः।<br>अष्टादश मुहूर्तं तु उत्तरायणपश्चिमम्॥ २४ | जैसे कुम्हारके चाकका मध्यभाग मन्द गतिसे चलता है, उसी प्रकार सूर्य उत्तरायणमें मन्दगतिसे भ्रमण करते हैं। इसलिये वे अधिक समयमें थोड़ी भूमिपर पहुँचते हैं। सूर्यका वह रथ आदित्यों, मुनियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणियों, सर्पों तथा राक्षसोंसे अधिष्ठित रहता है। हजार किरणोंवाले वे सूर्य आगेसे, पीछेसे, नीचेसे तथा ऊपरसे किरण छोड़कर ब्रह्माकी अत्युत्तम सभाको प्रकाशित करते हुए सन्ध्या-वन्दनके समय मुनियों तथा ब्राह्मणोंके द्वारा [अर्घ्यहेतु] छोड़े गये जलसे पास आनेवाले राक्षसोंको मार-मारकर आगे बढ़ते रहते हैं॥ २०–२३ १/२॥ | | अहर्भवति तच्चापि चरते मन्दविक्रमः।<br>त्रयोदशार्धमृक्षाणि नक्तं द्वादशभी रविः।<br>मुहूर्तैस्तावदृक्षाणि दिवाष्टादशभिश्चरन्॥ २५ | उत्तरायणके पश्चिम भागमें दिन अठारह मुहूर्तका होता है, उस समय सूर्य मन्दगतिवाले होकर चलते हैं। सूर्य रातमें बारह मुहूर्तमें साढ़े तेरह नक्षत्रदूरीको तय करते हैं और दिनमें चलते हुए वे उतनी ही नक्षत्रकी दूरी अठारह मुहूर्तोंमें तय करते हैं॥ २४-२५॥ | | ततो मन्दतरं नाभ्यां चक्रं भ्रमति वै यथा।<br>मृत्पिण्ड इव मध्यस्थो ध्रुवो भ्रमति वै तथा॥ २६ | जिस प्रकार नाभिमें चक्र अधिक मन्द गतिसे घूमता है, उसी प्रकार [चक्रके मध्यस्थित] मिट्टीके |

अध्याय ५४ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन२३१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्रिंशन्मुहूर्तैरेवाहुरहोरात्रं पुराविदः।<br>उभयोः काष्ठयोर्मध्ये भ्रमतो मण्डलानि तु॥ २७<br><br>कुलालचक्रनाभिस्तु यथा तत्रैव वर्तते।<br>औत्तानपादो भ्रमति ग्रहैः सार्धं ग्रहाग्रणीः॥ २८<br><br>गणो मुनिज्योतिषां तु मनसा तस्य सर्पति।<br>अधिष्ठितः पुनस्तेन भानुस्तवादाय तिष्ठति॥ २९<br><br>किरणैः सर्वतस्तोयं देवो वै ससमीरणः।<br>औत्तानपादस्य सदा ध्रुवत्वं वै प्रसादतः॥ ३०<br><br>विष्णोरौत्तानपादेन चाप्तं तातस्य हेतुना।<br>आपः पीतास्तु सूर्येण क्रमन्ते शशिनः क्रमात्॥ ३१पिण्डकी भाँति मध्यमें स्थित ध्रुव घूमता है। प्राचीन विद्याके वेत्ता कहते हैं कि दिन और रात [मिलकर] तीस मुहूर्तके बराबर होते हैं। दोनों दिशाओंके बीचमें मण्डलोंमें सूर्य घूमता है। जैसे कुलालचक्रकी नाभि उसी स्थानपर रहती है और घूमती है, उसी प्रकार ग्रहोंमें श्रेष्ठ ध्रुव भी ग्रहोंके साथ घूमते हैं। मुनियों तथा नक्षत्रोंका समूह उसीके मनके अनुसार चलता है। उसी [ध्रुव]-के द्वारा अधिष्ठित सूर्यदेव वायुके साथ सभी ओरसे अपनी किरणोंके द्वारा जल ग्रहण करते हैं। उत्तानपादके पुत्रको ध्रुवपद भगवान् विष्णुकी कृपासे सुलभ हुआ और ध्रुवने इसे अपने पिताके कारण प्राप्त किया था॥ २६—३० १/२॥
निशाकरान्निस्स्रवन्ते जीमूतान् प्रत्यपः क्रमात्।<br>वृन्दं जलमुचां चैव श्वसनेनाभिताडितम्॥ ३२<br><br>क्ष्मायां वृष्टिं विसृजतेऽभासयत्तेन भास्करः।<br>तोयस्य नास्ति वै नाशः तदैव परिवर्तते॥ ३३<br><br>हिताय सर्वजन्तूनां गतिः शर्वेण निर्मिता।<br>भूर्भुवः स्वस्तथा ह्यापो ह्यन्नं चामृतमेव च॥ ३४<br><br>प्राणा वै जगतामापो भूतानि भुवनानि च।<br>बहुनात्र किमुक्तेन चराचरमिदं जगत्॥ ३५<br><br>अपां शिवस्य भगवानाधिपत्ये व्यवस्थितः।<br>अपां त्वधिपतिर्देवो भव इत्येव कीर्तितः॥ ३६<br><br>भवात्मकं जगत्सर्वमिति किं चेह चाद्भुतम्।<br>नारायणत्वं देवस्य हरेश्चाद्भिः कृतं विभोः।<br>जगतामालयो विष्णुस्त्वापस्तस्यालयानि तु॥ ३७सूर्यके द्वारा ग्रहण किया गया वह जल क्रमसे चन्द्रमाको प्राप्त होता है और पुनः वह जल चन्द्रमासे मेघोंको प्राप्त होता है। इसके बाद वायुद्वारा आघात करनेपर मेघोंका समूह पृथ्वीपर वृष्टि करता है। सूर्य सबको भासित करते हैं, इसलिये वे भास्कर [नामवाले] हैं। जलका कभी नाश नहीं होता, वही जल पुनः परिवर्तित हो जाता है। भगवान् शिवने सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये जलकी इस गतिका निर्माण किया है। जल ही भूः, भुवः, स्वः, अन्न तथा अमृत है। जल सभी लोकोंका प्राण है। अधिक कहनेसे क्या लाभ—सभी प्राणी, समस्त भुवन एवं यह चराचर जगत् जलसे बना हुआ है। भगवान् भी शिवरूपी जलके आधिपत्यमें व्यवस्थित हैं। भगवान् शिव जलके अधिपति कहे गये हैं। यह सम्पूर्ण जगत् शिवमय है—इसमें आश्चर्य क्या है? सर्वव्यापी विष्णुदेवको नारायणपद जलसे ही प्राप्त हुआ है। विष्णु सम्पूर्ण जगत्के निवासस्थान हैं और जल उनका निवासस्थान है॥ ३१—३७॥
दन्दह्यमानेषु चराचरेषु<br>गोधूमभूतास्त्वथ निष्क्रमन्ति।<br>या या ऊर्ध्वं मारुतेनेरिता वै<br>तास्तास्त्वभ्राण्यग्निना वायुना च॥ ३८<br><br>अतो धूमाग्निवातानां संयोगस्त्वभ्रमुच्यते।<br>वारीणि वर्षतीत्यभ्रमभ्रस्येशः सहस्रदृक्॥ ३९चराचर समस्त प्राणियोंके वायुद्वारा उत्तेजित अग्निसे जल जानेपर धुएँके रूपमें जो-जो निकलता है और वायुद्वारा ऊपर ले जाया जाता है, उन्हींको अभ्र कहा गया है। अतः धूम, अग्नि तथा वायुके संयोगको अभ्र कहा जाता है। जो जलकी वर्षा करता है, वह अभ्र है। हजार नेत्रोंवाले इन्द्र अभ्रके स्वामी हैं॥ ३८-३९॥

२३२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यज्ञधूमोद्भवं चापि द्विजानां हितकृत्सदा।<br>दावाग्निधूमसम्भूतमभ्रं वनहितं स्मृतम्॥ ४०<br><br>मृतधूमोद्भवं त्वभ्रमशुभाय भविष्यति।<br>अभिचाराग्निधूमोत्थं भूतनाशाय वै द्विजाः॥ ४१<br><br>एवं धूमविशेषेण जगतां वै हिताहितम्।<br>तस्मादाच्छादयेद्धूममभिचारकृतं नरः॥ ४२<br><br>अनाच्छाद्य द्विजः कुर्याद्धूमं यश्चाभिचारिकम्।<br>एवमुद्दिश्य लोकस्य क्षयकृच्च भविष्यति॥ ४३यज्ञके धुएँसे उत्पन्न अभ्र (मेघ) सदा द्विजोंका हित करनेवाला होता है और दावानलके धूमसे उत्पन्न अभ्र वनके लिये हितकर कहा गया है। मृत प्राणियोंके जलानेपर उठे हुए धूमसे उत्पन्न अभ्र अशुभके लिये होता है और हे द्विजो! अभिचाराग्निके धूमसे उत्पन्न अभ्र प्राणियोंके नाशके लिये होता है। इस प्रकार अलग-अलग धूमोंसे संसारका हित तथा अहित होता है। अतः मनुष्यको चाहिये कि अभिचारकर्मसे उत्पन्न धूमको ढँक दे। यदि कोई द्विज धूमको ढँके बिना अभिचारकर्म करता है, तो यह संसारके विनाशका कारण हो जाता है॥ ४०—४३॥
अपां निधानं जीमूताः षण्मासानिह सुव्रताः।<br>वर्षन्त्येव जगतां हिताय पवनाज्ञया॥ ४४हे सुव्रतो! जलके भण्डारस्वरूप मेघ वायुकी आज्ञासे जगत्‌के हितके लिये इस लोकमें छः महीने वृष्टि करते हैं।
स्तनितं चेह वायव्यं वैद्युतं पावकोद्भवम्।<br>त्रिधा तेषामिहोत्पत्तिरभ्राणां मुनिपुङ्गवाः॥ ४५मेघका गर्जन वायुके द्वारा, विद्युत्‌के द्वारा तथा अग्निके द्वारा होता है। हे मुनिश्रेष्ठो! उन मेघोंकी उत्पत्ति तीन प्रकारसे होती है।
न भ्रश्यन्ति यतोऽभ्राणि मेहनान्मेघ उच्यते।<br>काष्ठा वाह्याश्च वैरिञ्च्याः पक्षाश्चैव पृथग्विधाः॥ ४६'अभ्र' शब्दका अर्थ है 'जो नष्ट नहीं होता है।' 'मेहन' शब्दसे 'मेघ' व्युत्पन्न कहा गया है। काष्ठ, वाहन, वैरिञ्च्य तथा पक्ष—ये विभिन्न प्रकारके मेघ होते हैं।
आज्यानां काष्ठसंयोगादग्नेर्धूमः प्रवर्तितः।<br>द्वितीयानां च सम्भूतिर्विरिञ्चोच्छ्वास वायुना॥ ४७घृतका काष्ठसे संयोग होनेपर अग्निसे जो धूम निकलता है, उससे प्रथम प्रकारका मेघ बनता है। दूसरे प्रकारके मेघकी उत्पत्ति ब्रह्माकी श्वासवायुसे होती है।
भूभृतां त्वथ पक्षैस्तु मघवच्छेदितैस्ततः।<br>वाह्येयास्त्वथ जीमूतास्ताववहस्थानगाः शुभाः॥ ४८इन्द्रके द्वारा पर्वतोंके काटे गये पक्षोंसे तीसरे प्रकारके मेघ उत्पन्न होते हैं। अग्निसे उत्पन्न मेघ शुभ होते हैं और वे आवह नामक वायुके स्थानमें जाते हैं।
विरिञ्चोच्छ्वासजाः सर्वे प्रवहस्कन्धजास्ततः।<br>पक्षजाः पुष्कराद्याश्च वर्षन्ति च यदा जलम्॥ ४९ब्रह्माके श्वाससे उत्पन्न सभी मेघ प्रवह नामक वायुके स्कन्धपर रहते हैं। पुष्कर आदि मेघ पक्षसे उत्पन्न होते हैं। ये जब बरसते हैं,
मूकाः सशब्ददुष्टाशास्त्वेतैः कृत्यं यथाक्रमम्॥<br>क्षामवृष्टिप्रदा दीर्घकालं शीतसमीरिणः॥ ५०तब क्रमसे शान्त, ध्वनि करनेवाले तथा विनाशकारी होते हैं; इनके द्वारा यथाक्रम यह कृत्य होता है। कुछ मेघ अल्प वृष्टि करनेवाले होते हैं और कुछ मेघ दीर्घ कालतक शीतल वायुवाले होते हैं।
जीवकाश्च तथा क्षीणा विद्युद्ध्वनिविवर्जिताः।<br>तिष्ठन्त्याक्रोशमात्रं तु धरापृष्ठादितस्ततः॥ ५१कुछ मेघ जीवक होते हैं। कुछ मेघ क्षीण होते हैं और वे विद्युत् तथा ध्वनिसे रहित होते हैं। कुछ मेघ पृथ्वीतलसे एक कोसके भीतर आकाशमें इधर-उधर रहते हैं।
अर्धक्रोशे तु सर्वे वै जीमूता गिरिवासिनः।<br>मेघा योजनमात्रं तु साध्यत्वाद्वहुतोयदाः॥ ५२पर्वतपर रहनेवाले सभी मेघ आधे कोसकी दूरीमें होते हैं।

अध्याय ५४] ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २३३


श्लोकअर्थ
धरापृष्ठाद् द्विजाः क्ष्मायां विद्युद्गुणसमन्विताः।<br>तेषां तेषां वृष्टिसर्गं त्रेधा कथितमत्र तु॥ ५३हे द्विजो! पृथ्वीतलसे योजन-मात्रकी दूरीवाले विद्युत्-युक्त मेघ साध्य होनेके कारण पृथ्वीपर अधिक जल-वृष्टि करनेवाले होते हैं। उन मेघोंका तीन प्रकारका वृष्टिसर्ग बता दिया गया॥ ४४-५३॥
पक्षजाः कल्पजाः सर्वे पर्वतानां महत्त्माः।<br>कल्पान्ते ते च वर्षन्ति रात्रौ नाशाय शारदाः॥ ५४<br><br>पक्षजाः पुष्कराद्याश्च वर्षन्ति च यदा जलम्।<br>तदार्णवमभूत्सर्वं तत्र शेते निशीश्वरः॥ ५५<br><br>आग्नेयानां श्वासजानां पक्षजानां द्विजर्षभाः।<br>जलदानां सदा धूमो ह्याप्यायन इति स्मृतः॥ ५६पर्वतोंके [कटे हुए] पक्षोंसे उत्पन्न मेघ कल्पज होते हैं और वे अति महान् होते हैं। वे कल्पके अन्तमें विनाशके लिये रात्रिमें बरसते हैं। पुष्कर आदि पक्षजनित मेघ जब बरसते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् सागरमय हो जाता है और उसमें भगवान् रातमें शयन करते हैं। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अग्निसे उत्पन्न, [ब्रह्माके] श्वाससे उत्पन्न तथा [कटे हुए पर्वतोंके] पक्षसे उत्पन्न मेघोंका धूम सदा आप्यायन कहा गया है॥ ५४-५६॥
पौण्ड्रास्तु वृष्टयः सर्वा विद्युताः शीतसस्यदाः।<br>पुण्ड्रदेशेषु पतिता नागानां शीकरा हिमाः॥ ५७<br><br>गाङ्गा गङ्गाम्बुसम्भूता पर्जन्येन परावहैः।<br>नगानां च नदीनां च दिग्गजानां समाकुलम्॥ ५८<br><br>मेघानां च पृथग्भूतं जलं प्रायादगादगम्।<br>परावहो यः श्वसनश्चानयत्यम्बिकागुरुम्॥ ५९<br><br>मेनापतिमतिक्रम्य वृष्टिशेषं द्विजाः परम्।<br>अभ्येति भारते वर्षे त्वपरान्तविवृद्धये॥ ६०समस्त पौण्ड्र (पुण्ड्र देशमें होनेवाली) वृष्टि विद्युतन्मय, शीतल तथा अन्न प्रदान करनेवाली होती है। पुण्ड्र देशके मेघ बर्फके समान शीतल होते हैं और वे हाथीके सूँड़से गिरते हुए जलके छिड़कावकी भाँति प्रतीत होते हैं। गांग नामक मेघ गंगाके जलसे उत्पन्न होते हैं। ये परावहसंज्ञक वायुद्वारा पर्वतों, नदियों और दिग्गजोंको व्याकुल कर देते हैं। मेघोंसे अलग हुआ जल एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर पहुँचता है। परावह नामक जो वायु है, वह मेघोंको हिमालय (अम्बिकागुरु) पर्वतकी ओर ले जाती है। हे द्विजो! पुनः मेनापति हिमालयसे आगे बढ़कर ये मेघ समुद्रके मध्य देशोंकी वृद्धिके लिये भारतवर्षमें भारी वर्षा करते हैं॥ ५७-६०॥
वृष्टयः कथिता ह्यद्य द्विधा वस्तुविवृद्धये।<br>सस्यद्वयस्य सङ्क्षेपात्प्रब्रवीमि यथामति॥ ६१<br><br>स्रष्टा भानुर्महातेजा वृष्टीनां विश्वदृग्विभुः।<br>सोऽपि साक्षाद् द्विजश्रेष्ठाश्चेशानः परमः शिवः॥ ६२<br><br>स एव तेजस्त्वोजस्तु बलं विप्रा यशः स्वयम्।<br>चक्षुः श्रोत्रं मनो मृत्युरात्मा मन्युर्विदिशोद्दिशः॥ ६३<br><br>सत्यं ऋतं तथा वायुरम्बरं खचरश्च सः।<br>लोकपालो हरिर्ब्रह्मा रुद्रः साक्षान्महेश्वरः॥ ६४<br><br>सहस्रकिरणः श्रीमानष्टहस्तः सुमङ्गलः।<br>अर्धनारीवपुः साक्षात्त्रिनेत्रस्त्रिदशाधिपः॥ ६५वस्तुओंकी वृद्धिके लिये होनेवाली वृष्टियाँ दो प्रकारकी कही गयी हैं। मैं बुद्धिके अनुसार उन दोनोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ। संसारके नेत्रस्वरूप महातेजस्वी भगवान् सूर्य वृष्टियोंका सृजन करनेवाले हैं। हे द्विजश्रेष्ठो! वे भी साक्षात् ईशान परमेश्वर शिव ही हैं। हे विप्रो! वे ही तेज, ओज, बल, यश, नेत्र, श्रोत्र, मन, मृत्यु, आत्मा, मन्यु (क्रोध), दिशाएँ और विदिशाएँ हैं। वे ही सत्य, ऋत, वायु, आकाश, ग्रह, लोकपाल, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र तथा साक्षात् महेश्वर हैं। वे हजार किरणोंवाले, श्रीमान्, आठ भुजाओंवाले, परम कल्याणकारी, अर्धनारीश्वर, तीन नेत्रोंवाले तथा देवताओंके अधिपति हैं॥ ६१-६५॥

५५- शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ तथा चैत्रादि बारह मासोंमें रथके साथ भ्रमण करनेवाले देवता, मुनि, नाग, गन्धर्व आदिका वर्णन

२३४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
अस्यैवेह प्रसादात्तु वृष्टिर्नानाभवद् द्विजाः।<br>सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते किरणैर्जलम् ॥ ६६<br><br>जलस्य नाशो वृद्धिर्वा नास्त्येवास्य विचारतः।<br>ध्रुवेणाधिष्ठितो वायुर्वृष्टिं संहरते पुनः ॥ ६७<br><br>ग्रहान्निःसृत्य सूर्यात्तु कृत्स्ने नक्षत्रमण्डले।<br>चारस्यान्ते विशत्यर्कं ध्रुवेण समधिष्ठिता ॥ ६८हे द्विजो! इन्हींकी कृपासे नाना प्रकारकी वृष्टि होती है। ये हजार गुना जल देनेके लिये अपनी किरणोंसे जल ग्रहण करते हैं। विचारपूर्वक देखा जाय तो इस जलका नाश अथवा वृद्धि होती ही नहीं। ध्रुवके द्वारा अधिष्ठित वायु वृष्टिका पुनः हरण कर लेती है। तदनन्तर यह सूर्यग्रहसे निकलकर सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डलमें फैलती है। उसके बाद ध्रुवके द्वारा अधिष्ठित यह वृष्टि पुनः सूर्यमें प्रवेश करती है॥ ६६–६८॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ज्योतिषचक्रे सूर्यगत्यादिकथनं नाम चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ज्योतिषचक्रमें सूर्यगत्यादिकथन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥


पचपनवाँ अध्याय

शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ तथा चैत्रादि बारह मासोंमें रथके साथ भ्रमण करनेवाले देवता, मुनि, नाग, गन्धर्व आदिका वर्णन

सूत उवाच<br>सौरं सङ्क्षेपतो वक्ष्ये रथं शशिन एव च।<br>ग्रहाणामितरेषां च यथा गच्छति चाम्बुपः ॥ १सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] मैं संक्षेपमें सूर्यके रथ और चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहोंके विषयमें बताऊँगा और जिस प्रकार जलका शोषण करनेवाले सूर्य गति करते हैं, उसका भी वर्णन करूँगा॥ १॥
सौरस्तु ब्रह्मणा सृष्टो रथस्त्वर्थवशेन सः।<br>संवत्सरस्यावयवैः कल्पितश्च द्विजर्षभाः ॥ २<br><br>त्रिनाभिना तु चक्रेण पञ्चारेण समन्वितः।<br>सौवर्णः सर्वदेवानामावासो भास्करस्य तु ॥ ३<br><br>नवयोजनसाहस्रो विस्तारायामतः स्मृतः।<br>द्विगुणोऽपि रथोपस्थादीषादण्डः प्रमाणतः ॥ ४<br><br>असङ्गैस्तु हयैर्युक्तो यतश्चक्रं ततः स्थितैः।<br>वाजिनस्तस्य वै सप्त छन्दोभिर्निर्मितास्तु ते ॥ ५<br><br>चक्रपक्षे निबद्धास्तु ध्रुवे चाक्षः समर्पितः।<br>सहाश्वचक्रो भ्रमते सहाक्षो भ्रमते ध्रुवः ॥ ६हे श्रेष्ठ द्विजो! ब्रह्माके द्वारा विशेष प्रयोजनके लिये निर्मित वह सूर्यरथ संवत्सरके अवयवोंसे कल्पित किया गया है। तीन नाभि तथा पाँच अरोंवाले चक्रसे युक्त यह सूर्यरथ सुवर्णमय है और सभी देवताओंका निवासस्थान है। यह लम्बाई तथा चौड़ाईमें नौ हजार योजनवाला कहा गया है। इसका ईषादण्ड प्रमाण (माप)-में रथोपस्थसे दुगुना है। जहाँ चक्र है, वहाँ स्थित अन्तरिक्षगामी घोड़ोंसे वह युक्त (जुता हुआ) है। उसके सातों घोड़े वेदके सात छन्दों [गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पंक्ति]-से निर्मित हैं। वे चक्रके बगलमें बँधे हुए हैं। ध्रुवमें [रथका] अक्ष लगा हुआ है। वह रथ घोड़ों तथा चक्रसहित घूमता है और ध्रुव अक्षके साथ घूमता है॥ २–६॥
अध्याय ५५ ]शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ आदिका वर्णन२३५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अक्षः सहैकचक्रेण भ्रमतेऽसौ ध्रुवेरितः।<br>प्रेरको ज्योतिषां धीमान् ध्रुवो वै वातरश्मिभिः॥ ७<br><br>युगाक्षकोटिसम्बद्धौ द्वौ रश्मी स्यन्दनस्य तु।<br>ध्रुवेण भ्रमते रश्मिनिबद्धः स युगाक्षयोः॥ ८वह अक्ष ध्रुवसे प्रेरित होकर एक ही चक्रके साथ घूमता है। बुद्धिमान् ध्रुव वायुकिरणोंके द्वारा ज्योतिर्गणों (ग्रह, नक्षत्र आदि)-को प्रेरित करता है। दो रश्मियाँ (किरणें) रथके जुए तथा अक्षके अग्रभागमें बँधी हुई हैं और [उन] जुए तथा अक्षमें रश्मियोंसे निबद्ध वह सूर्यरथ ध्रुवके द्वारा भ्रमण करता है॥ ७-८॥
भ्रमतो मण्डलानि स्युः खेचरस्य रथस्य तु।<br>युगाक्षकोटी ते तस्य दक्षिणे स्यन्दनस्य हि॥ ९<br><br>ध्रुवेण प्रगृहीते वै विचक्राश्वे च रज्जुभिः।<br>भ्रमन्तमनुगच्छन्ति ध्रुवं रश्मी च तावुभौ॥ १०इस प्रकार भ्रमण करते हुए आकाशमें विचरण करनेवाले रथके अनेक मण्डल होते हैं। वे [रश्मिनिबद्ध] जुए तथा अक्षकी कोटियाँ उस रथके दाहिनी ओर होती हैं। रज्जुओके द्वारा ध्रुवसे प्रगृहीत अरुण, चक्र तथा घोड़े और वे दोनों रश्मियाँ घूमते हुए ध्रुवका अनुगमन करते हैं॥ ९-१०॥
युगाक्षकोटिस्त्वेतस्य वातोर्मिस्यन्दनस्य तु।<br>कीले सक्ता यथा रज्जुर्भ्रमते सर्वतोदिशम्॥ ११<br><br>भ्राम्यतस्तस्य रश्मी तु मण्डलेषूत्तरायणे।<br>वर्धेते दक्षिणे चैव भ्रमतो मण्डलानि तु॥ १२<br><br>आकृष्येते यदा ते वै ध्रुवेणाधिष्ठिते तदा।<br>आभ्यन्तरस्थः सूर्योऽथ भ्रमते मण्डलानि तु॥ १३इस रथकी वायुलहरीरूपा युगाक्षकोटि (जुए तथा अक्षकी कोटि) कीलमें बँधी हुई रस्सीकी भाँति सभी दिशाओंमें घूमती है। उत्तरायणमें मण्डलोंमें घूमते हुए उस सूर्यकी दोनों रश्मियाँ बढ़ जाती हैं और दक्षिणायनमें मण्डलोंमें घूमते हुए सूर्यके द्वारा वे रश्मियाँ खिंच जाती हैं। जब वे [रश्मियाँ] ध्रुवके द्वारा प्रेरित की जाती हैं, तब [रथके] भीतर स्थित सूर्य मण्डलोंमें घूमता है। उस समय सूर्य दोनों दिशाओंके एक सौ अस्सी मण्डलोंका चक्कर लगाता है॥ ११-१३ १/२॥
अशीतिमण्डलशतं काष्ठयोरन्तरं द्वयोः।<br>ध्रुवेण मुच्यमानाभ्यां रश्मिभ्यां पुनरेव तु॥ १४<br><br>तथैव बाह्यतः सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु।<br>उद्वेष्टयन् स वेगेन मण्डलानि तु गच्छति॥ १५पुनः ध्रुवके द्वारा किरणोंके छोड़े जानेपर उसी भाँति सूर्य मण्डलोंके बाहर भ्रमण करता है; वह मण्डलोंको घेरते हुए वेगपूर्वक चलता है॥ १४-१५॥
देवाश्चैव तथा नित्यं मुनयश्च दिवानिशम्।<br>यजन्ति सततं देवं भास्करं भवमीश्वरम्॥ १६<br><br>स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्मुनिभिस्तथा।<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः॥ १७<br><br>एते वसन्ति वै सूर्ये द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु।<br>आप्याययन्ति चादित्यं तेजोभिर्भास्करं शिवम्॥ १८देवता तथा मुनिगण नित्य दिन-रात भवस्वरूप ईश्वर सूर्यदेवका निरन्तर पूजन करते हैं। वह रथ देवताओं, आदित्यों, मुनियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणियों, सर्पों तथा राक्षसोंके द्वारा अधिष्ठित है। ये लोग सूर्यमें दो-दो महीने क्रमसे निवास करते हैं और कल्याणकारी आदित्य भास्करको अपने तेजोंसे तृप्त करते हैं॥ १६-१८॥
ग्रथितैः स्वैर्वचोभिस्तु स्तुवन्ति मुनयो रविम्।<br>गन्धर्वाप्सरसश्चैव नृत्यगेयैरुपासते॥ १९<br><br>ग्रामणीयक्षभूतानि कुर्वतेऽभीषसङ्ग्रहम्।<br>सर्पा वहन्ति वै सूर्यं यातुधानानुयान्ति च॥ २०मुनिगण अपने वचनोंसे ग्रथित स्तुतियोंके द्वारा सूर्यका स्तवन करते हैं; गन्धर्व तथा अप्सराएँ गान एवं नृत्यके द्वारा उनकी उपासना करते हैं; ग्रामणी, यक्ष तथा भूतगण किरणोंका संग्रह करते हैं; सर्पगण सूर्यका वहन
२३६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद्रविम्।<br>इत्येते वै वसन्तीह द्वौ द्वौ मासौ दिवाकरे॥ २१<br>मधुश्च माधवश्चैव शुक्रश्च शुचिरेव च।<br>नभोनभस्यौ विप्रेन्द्रा इषश्चोर्जस्तथैव च॥ २२<br>सहःसहस्यौ च तथा तपस्यश्च तपः पुनः।<br>एते द्वादश मासास्तु वर्षं वै मानुषं द्विजाः॥ २३<br>वासन्तिकस्तथा ग्रैष्मः शुभो वै वार्षिकस्तथा।<br>शारदश्च हिमश्चैव शैशिरो ऋतवः स्मृताः॥ २४<br>धातार्यमाथ मित्रश्च वरुणश्चेन्द्र एव च।<br>विवस्वांश्चैव पूषा च पर्जन्योऽशुर्भगस्तथा॥ २५<br>त्वष्टा विष्णुः पुलस्त्यश्च पुलहश्चात्रिरेव च।<br>वसिष्ठश्चाङ्गिराश्चैव भृगुर्बुद्धिमतां वरः॥ २६<br>भारद्वाजो गौतमश्च कश्यपश्च क्रतुस्तथा।<br>जमदग्निः कौशिकश्च वासुकिः कङ्कणीकरः॥ २७<br>तक्षकश्च तथा नाग एलापत्रस्तथा द्विजाः।<br>शङ्खपालस्तथा चान्यस्तैरावत इति स्मृतः॥ २८<br>धनञ्जयो महापद्मस्तथा कर्कोटकः स्मृतः।<br>कम्बलोऽश्वतरश्चैव तुम्बुरुर्नारदस्तथा॥ २९<br>हाहा हूहूर्मुनिश्श्रेष्ठा विश्वावसुस्तनुत्तमः।<br>उग्रसेनोऽथ सुरुचिरन्यश्चैव परावसुः॥ ३०<br>चित्रसेनो महातेजाश्चोर्णायुश्चैव सुव्रताः।<br>धृतराष्ट्रः सूर्यवर्चा देवी साक्षात्कृतस्थला॥ ३१<br>शुभानना शुभश्रोणिर्दिव्या वै पुञ्जिकस्थला।<br>मेनका सहजन्या च प्रम्लोचाथ शुचिस्मिता॥ ३२<br>अनुम्लोचा घृताची च विश्वाची चोर्वशी तथा।<br>पूर्वचित्तिरिति ख्याता देवी साक्षात्तिलोत्तमा॥ ३३<br>रम्भा चाम्भोजवदना रथकृद् ग्रामणीः शुभः।<br>रथौजा रथचित्रश्च सुबाहुर्वै रथस्वनः॥ ३४<br>वरुणश्च तथैवान्यः सुषेणः सेनजिच्छुभः।<br>तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च क्षतजित्सत्यजित्तथा॥ ३५<br>रक्षो हेतिः प्रहेतिश्च पौरुषेयो वधस्तथा।<br>सर्पो व्याघ्रः पुनश्चापो वातो विद्युद्दिवाकरः॥ ३६<br>ब्रह्मोपेतश्च रक्षेन्द्रो यज्ञोपेतस्तथैव च।<br>एते देवादयः सर्वे वसन्त्यर्के क्रमेण तु॥ ३७<br>स्थानाभिमानिनो ह्येते गणा द्वादश सप्तकाः।<br>धात्रादिविष्णुपर्यन्ता देवा द्वादश कीर्तिताः॥ ३८ | करते हैं; यातुधान (राक्षसगण) उनका अनुगमन करते हैं और बालखिल्य [नामक ऋषिगण] उदयकालसे प्रारम्भ करके चारों ओरसे घेरकर सूर्यको अस्ताचलकी ओर ले जाते हैं। ये सब दो-दो महीने सूर्यमें निवास करते हैं॥ १९–२१॥<br><br>हे विप्रेन्द्रो! मधु (चैत्र), माधव (वैशाख), शुक्र (ज्येष्ठ), शुचि (आषाढ़), नभ (श्रावण), नभस्य (भाद्रपद), इष (आश्विन), ऊर्ज (कार्तिक), सह (मार्गशीर्ष), सहस्य (पौष), तपस्य (माघ) तथा तप (फाल्गुन)—ये बारह महीने मानव वर्षमें होते हैं। हे द्विजो! वसन्त, ग्रीष्म, शुभ वर्षा, शरद, हिम (हेमन्त) तथा शिशिर—ये ऋतुएँ कही गयी हैं॥ २२–२४॥<br><br>धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, पर्जन्य, अंशु, भग, त्वष्टा, विष्णु—ये बारह आदित्य हैं; पुलस्त्य, पुलह, अत्रि, वसिष्ठ, अंगिरा, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भृगु, भारद्वाज, गौतम, कश्यप, क्रतु, जमदग्नि तथा कौशिक—ये बारह ऋषि हैं; हे द्विजो! वासुकि, कंकणीकर, तक्षक, नाग, एलापत्र, शंखपाल, ऐरावत, धनंजय, महापद्म, कर्कोटक, कम्बल तथा अश्वतर—ये बारह सर्प कहे गये हैं; हे मुनिश्रेष्ठो! तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू, श्रेष्ठ विश्वावसु, उग्रसेन, सुरुचि, परावसु, चित्रसेन, महातेजस्वी ऊर्णायु, धृतराष्ट्र तथा सूर्यवर्चा—ये बारह गन्धर्व हैं; हे सुव्रतो! साक्षात् देवी कृतस्थला, सुन्दर मुखवाली—उत्तम श्रोणिवाली दिव्य पुंजिकस्थला, मेनका, सहजन्या, पवित्र मुसकानवाली प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, विश्वाची, उर्वशी, पूर्वचित्ति, साक्षात् देवी तिलोत्तमा तथा कमलके समान मुखवाली रम्भा—ये बारह अप्सराएँ कही गयी हैं; रथकृत्, शुभ रथौजा, रथचित्र, सुबाहु, रथस्वन, वरुण, सुषेण, शुभ सेनजित्, तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, क्षतजित् तथा सत्यजित्—ये बारह ग्रामणी हैं; हेति, प्रहेति, पौरुषेय, वध, सर्प, व्याघ्र, आप, वात, विद्युत्, दिवाकर, ब्रह्मोपेत और राक्षसराज यज्ञोपेत—ये बारह यातुधान (राक्षस) हैं—ये सभी देवता आदि क्रमसे सूर्यमें निवास करते हैं। बारहकी संख्यावाले ये सात गण अपने स्थानका अभिमान |

| अध्याय ५५ ] | शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ आदिका वर्णन | २३७ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
करनेवाले हैं॥ २५-३७१/२॥
आदित्यं परमं भानुं भाभिराप्याययन्ति ते।<br>पुलस्त्याद्याः कौशिकान्ता मुनयो मुनिसत्तमाः॥ ३९<br><br>द्वादशैव स्तवैर्भानुं स्तुवन्ति च यथाक्रमम्।<br>नागाश्चाश्वतरान्तास्तु वासुकिप्रमुखाः शुभाः॥ ४०<br><br>द्वादशैव महादेवं वहन्त्येवं यथाक्रमम्।<br>क्रमेण सूर्यवर्चान्तास्तुम्बुरुप्रमुखाम्बुपम्॥ ४१<br><br>गीतैरेनमुपासन्ते गन्धर्वा द्वादशोत्त्तमाः।<br>कृतस्थलाद्या रम्भान्ता दिव्याश्चाप्सरसो रविम्॥ ४२<br><br>ताण्डवैः सरसैः सर्वाश्चोपासन्ते यथाक्रमम्।<br>दिव्याः सत्यजिदन्ताश्च ग्रामण्यो रथकृन्मुखाः॥ ४३<br><br>द्वादशास्य क्रमेणैव कुर्वते भीषुसङ्ग्रहम्।<br>प्रयान्ति यज्ञोपेतान्ता रक्षोहेतिमुखाः सह॥ ४४<br><br>सायुधा द्वादशैवैते राक्षसाश्च यथाक्रमम्।धातासे लेकर विष्णुपर्यन्त जो बारह देवता (आदित्य) कहे गये हैं, वे अपने तेजसे परम भानुको सन्तृप्त करते हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो! पुलस्त्यसे लेकर कौशिकतक [कहे गये] बारह मुनिगण यथाक्रम स्तुतियोंके द्वारा सूर्यका स्तवन करते हैं। इसी प्रकार वासुकिसे लेकर अश्वतरतक [कहे गये] बारह शुभ नाग यथाक्रम महादेव (सूर्य)-का वहन करते हैं। तुम्बुरुसे लेकर सूर्यवर्चातक [कहे गये] बारह उत्तम गन्धर्व क्रमसे गीतोंके द्वारा इन सूर्यकी उपासना करते हैं। कृतस्थलासे लेकर रम्भा-पर्यन्त [कही गयी] सभी दिव्य अप्सराएँ यथाक्रम सरस नृत्योंके द्वारा सूर्यकी उपासना करती हैं। रथकृत्से लेकर सत्यजित्पर्यन्त [कहे गये] बारह दिव्य ग्रामणी क्रमसे इस सूर्यकी रथरश्मियोंका संग्रह करते हैं। रक्षोहेतिसे लेकर यज्ञोपेततक [कहे गये]—ये प्रमुख बारह राक्षस शस्त्र धारण करके क्रमसे [सूर्यके] पीछे-पीछे चलते हैं॥ ३८-४४१/२॥
धातार्यमा पुलस्त्यश्च पुलहश्च प्रजापतिः॥ ४५<br><br>उरगो वासुकिश्चैव कङ्कणीकश्च तावुभौ।<br>तुम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वौ गायतां वरौ॥ ४६<br><br>कृतस्थलाप्सराश्चैव तथा वै पुञ्जिकस्थला।<br>ग्रामणी रथकृच्चैव रथौजाश्चैव तावुभौ॥ ४७<br><br>रक्षो हेतिः प्रहेतिश्च यातुधानावुदाहृतौ।<br>मधुमाधवयोरेष गणो वसति भास्करे॥ ४८धाता तथा अर्यमा [दो आदित्य], प्रजापति पुलस्त्य तथा पुलह [दो ऋषि], वे दोनों नाग वासुकि एवं कंकणीक, गान करनेवालोंमें श्रेष्ठ गन्धर्व तुम्बुरु तथा नारद, कृतस्थला एवं पुंजिकस्थला अप्सराएँ, वे दोनों ग्रामणी रथकृत् तथा रथौजा और यातुधान कहे गये राक्षस हेति तथा प्रहेति—यह समुदाय चैत्र एवं वैशाख महीनोंमें सूर्यमें निवास करता है॥ ४५-४८॥
वसन्ति ग्रीष्मकौ मासौ मित्रश्च वरुणश्च ह।<br>ऋषिरत्रिर्वसिष्ठश्च तक्षको नाग एव च॥ ४९<br><br>मेनका सहजन्या च गन्धर्वौ च हाहाहूहूः।<br>सुबाहुनामा ग्रामण्यौ रथचित्रश्च तावुभौ॥ ५०<br><br>पौरुषेयो वधश्चैव यातुधानावुदाहृतौ।<br>एते वसन्ति वै सूर्ये मासयोः शुचिशुक्रयोः॥ ५१इसी प्रकार ग्रीष्म ऋतुके दो महीनोंमें भी ये लोग निवास करते हैं। [दो आदित्य] मित्र तथा वरुण, ऋषि अत्रि एवं वसिष्ठ, [सर्प] तक्षक तथा नाग, [दो अप्सराएँ] मेनका और सहजन्या, दो गन्धर्व हाहा तथा हूहू, रथचित्र एवं सुबाहु नामक वे दोनों ग्रामणी और यातुधान कहे गये पौरुषेय तथा वध—ये सब शुक्र (ज्येष्ठ) तथा शुचि (आषाढ़) महीनोंमें सूर्यमें निवास करते हैं॥ ४९-५१॥
ततः सूर्ये पुनश्चान्या निवसन्तीह देवताः।<br>इन्द्रश्चैव विवस्वांश्च अङ्गिरा भृगुरेव च॥ ५२<br><br>एलापत्रस्तथा सर्पः शङ्खपालश्च तावुभौ।<br>विश्वावसुस्सुसेनौ च वरुणश्च रथस्वनः॥ ५३इसके बाद अन्य देवता सूर्यमें निवास करते हैं। [आदित्य] इन्द्र तथा विवस्वान्, [ऋषि] अंगिरा तथा भृगु, वे दोनों सर्प एलापत्र एवं शंखपाल, [गन्धर्व]
२३८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रम्लोचा चैव विख्याता अनुम्लोचा च ते उभे।<br>यातुधानास्तथा सर्पो व्याघ्रश्चैव तु तावुभौ॥ ५४<br>नभोनभस्ययोरेष गणो वसति भास्करे।विश्वावसु तथा उग्रसेन, [ग्रामणी] वरुण एवं रथस्वन, विख्यात प्रम्लोचा तथा अनुम्लोचा—वे दोनों अप्सराएँ और वे दोनों यातुधान सर्प तथा व्याघ्र—यह समुदाय नभ (श्रावण) तथा नभस्य (भाद्रपद) महीनोंमें सूर्यमें निवास करता है॥ ५२—५४ १/२॥
पर्जन्यश्चैव पूषा च भरद्वाजोऽथ गौतमः॥ ५५<br>धनञ्जय इरांवांश्च सुरुचिः सपरावसुः।<br>घृताची चाप्सरःश्रेष्ठा विश्वाची चातिशोभना॥ ५६<br>सेनजिच्च सुषेणश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ।<br>आपो वातश्च तावेतौ यातुधानावुभौ स्मृतौ॥ ५७<br>वसन्त्येते तु वै सूर्ये मास ऊर्ज इषे च ह।[आदित्य] पर्जन्य तथा पूषा, [ऋषि] भरद्वाज एवं गौतम, [सर्प] धनंजय तथा इरावान् (ऐरावत), [गन्धर्व] सुरुचि तथा परावसु, अप्सराओंमें श्रेष्ठ घृताची तथा परम सुन्दर विश्वाची, वे दोनों ग्रामणी—सेनानी सेनजित् तथा सुषेण और यातुधान कहे गये वे दोनों आप तथा वात—ये सब इष (आश्विन) तथा ऊर्ज (कार्तिक) महीनोंमें सूर्यमें निवास करते हैं॥ ५५—५७ १/२॥
हैमन्तिकौ तु द्वौ मासौ वसन्ति च दिवाकरे॥ ५८<br>अंशुर्भगश्च द्वावेतौ कश्यपश्च क्रतुः सह।<br>भुजङ्गश्च महापद्मः सर्पः कर्कोटकस्तथा॥ ५९<br>चित्रसेनश्च गन्धर्व ऊर्णायुश्चैव तावुभौ।<br>उर्वशी पूर्वचित्तिश्च तथैवाप्सरसावुभे॥ ६०<br>तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ।<br>विद्युद्दिवाकरश्चोभौ यातुधानावुदाहृतौ॥ ६१<br>सहे चैव सहस्ये च वसन्त्येते दिवाकरे।इसी प्रकार हेमन्त ऋतुके दो महीनोंमें भी ये लोग सूर्यमें निवास करते हैं। ये दोनों [आदित्य] अंशु तथा भग, [ऋषि] कश्यप तथा क्रतु, भुजंग महापद्म तथा सर्प कर्कोटक, वे दोनों गन्धर्व चित्रसेन तथा ऊर्णायु, दोनों अप्सराएँ उर्वशी तथा पूर्वचित्ति, ग्रामणी—सेनानी तार्क्ष्य तथा अरिष्टनेमि और यातुधान कहे गये दोनों विद्युत् तथा दिवाकर—ये सब सह (मार्गशीर्ष) तथा सहस्य (पौष) महीनोंमें सूर्यमें निवास करते हैं॥ ५८—६१ १/२॥
ततः शैशिरयोश्चापि मासयोर्निवसन्ति वै॥ ६२<br>त्वष्टा विष्णुर्जमदग्निर्विश्वामित्रस्तथैव च।<br>काद्रवेयौ तथा नागौ कम्बलाश्वतरावुभौ॥ ६३<br>धृतराष्ट्रः सगन्धर्वः सूर्यवर्चास्तथैव च।<br>तिलोत्तमाप्सराश्चैव देवी रम्भा मनोहरा॥ ६४<br>रथजित्सत्यजिच्चैव ग्रामण्यौ लोकविश्रुतौ।<br>ब्रह्मोपेतस्तथा रक्षो यज्ञोपेतश्च यः स्मृतः॥ ६५इसके बाद [आदित्य] त्वष्टा तथा विष्णु, [ऋषि] जमदग्नि तथा विश्वामित्र, कद्रूके पुत्र दोनों नाग कम्बल तथा अश्वतर, गन्धर्व धृतराष्ट्र तथा सूर्यवर्चा, मनोहर अप्सरा देवी रम्भा तथा तिलोत्तमा, लोकमें प्रसिद्ध ग्रामणी रथजित् तथा सत्यजित् और ब्रह्मोपेत तथा यज्ञोपेत—जो यातुधान कहे गये हैं—ये सब शिशिर ऋतुके दो महीनों (माघ और फाल्गुन)-में [सूर्यमें] निवास करते हैं॥ ६२—६५॥
एते देवा वसन्त्यर्के द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु।<br>स्थानाभिमानिनो ह्येते गणा द्वादश सप्तकाः॥ ६६<br>सूर्यमाप्याययन्त्येते तेजसा तेज उत्तमम्।<br>ग्रथितैः स्वैर्वचोभिस्तु स्तुवन्ति मुनयो रविम्॥ ६७<br>गन्धर्वाप्सरसश्चैव नृत्यगेयैरुपासते।<br>ग्रामणीयक्षभूतानि कुर्वतेऽभीषुसङ्ग्रहम्॥ ६८<br>सर्पा वहन्ति वै सूर्यं यातुधानानुयान्ति वै।<br>बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद्रविम्॥ ६९ये देवतागण क्रमसे दो-दो महीने सूर्यमें निवास करते हैं। बारहकी संख्यामें ये सात समूह अपने स्थानका अभिमान करनेवाले हैं। ये सब तेजके द्वारा उत्तम तेजवाले सूर्यको सन्तृप्त करते हैं। मुनिगण अपने द्वारा विरचित स्तुतियोंसे सूर्यका स्तवन करते हैं, गन्धर्व तथा अप्सराएँ नृत्य-गानोंसे उनकी उपासना करते हैं, ग्रामणी-यक्ष-भूत रथरश्मियोंको पकड़े रहते हैं, सर्पगण सूर्यका वहन करते हैं, यातुधान पीछे-पीछे चलते हैं और बालखिल्य

अध्याय ५५] शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ आदिका वर्णन [२३१

एतेषामेव देवानां यथा तेजो यथा तपः।<br>यथायोगं यथामन्त्रं यथाधर्मं यथाबलम्॥ ७०<br><br>तथा तपत्यसौ सूर्यस्तेषामिद्धस्तु तेजसा।<br>इत्येते वै वसन्तीह द्वौ द्वौ मासौ दिवाकरे॥ ७१<br><br>ऋषयो देवगन्धर्वपन्नगाप्सरसां गणाः।<br>ग्रामण्यश्च तथा यक्षा यातुधानाश्च मुख्यतः॥ ७२<br><br>एते तपन्ति वर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च।<br>भूतानामशुभं कर्म व्यपोहन्तीह कीर्तिताः॥ ७३<br><br>मानवानां शुभं ह्येते हरन्ति च दुरात्मनाम्।<br>दुरितं सुप्रचाराणां व्यपोहन्ति क्वचित्क्वचित्॥ ७४[ऋषिगण] चारों ओरसे घेरकर सूर्यको उदयसे अस्तकी प्राप्ति कराते हैं॥ ६६-६९॥<br><br>इन्हीं देवताओंका जैसा तेज, जैसा तप, जैसा योग, जैसा मन्त्र, जैसा धर्म तथा जैसा बल होता है, उनसे समृद्ध होकर वे सूर्य तेजयुक्त होकर तपते हैं। ये सभी सूर्यमें दो-दो महीने निवास करते हैं। ऋषिगण, देवता, गन्धर्व, सर्प, अप्सराओंके समूह, ग्रामणी, यक्ष तथा यातुधान (राक्षस) ये ही मुख्यरूपसे तपते हैं, बरसते हैं, प्रकाश करते हैं, सृजन करते हैं और आराधित होकर प्राणियोंके अशुभ कर्मका नाश करते हैं। ये लोग दुरात्मा मनुष्योंके शुभका नाश करते हैं और कहीं-कहीं सज्जनोंके पापका हरण करते हैं॥ ७०-७४॥
विमाने च स्थिता दिव्ये कामगे वातरंहसि।<br>एते सहैव सूर्येण भ्रमन्ति दिवसानुगाः॥ ७५<br><br>वर्षन्तश्च तपन्तश्च ह्लादयन्तश्च वै द्विजाः।<br>गोपायन्तीह भूतानि सर्वाणि ह्यामन्वक्षयात्॥ ७६ये इच्छानुसार चलनेवाले तथा वायुवेगसे गमन करनेवाले दिव्य विमानमें स्थित होकर सूर्यके साथ पूरे दिन भ्रमण करते हैं। हे द्विजो! ये वर्षा करते हुए, तपते हुए और [सबको] आह्लादित करते हुए सभी प्राणियोंको एक मन्वन्तरपर्यन्त विनाशसे बचाते हैं॥ ७५-७६॥
स्थानाभिमानिनामेतत्स्थानं मन्वन्तरेषु वै।<br>अतीतानागतानां वै वर्तन्ते साम्प्रतं च ये॥ ७७<br><br>एते वसन्ति वै सूर्ये सप्तकास्ते चतुर्दश।<br>चतुर्दशसु सर्वेषु गणा मन्वन्तरेष्विह॥ ७८अतीत तथा अनागत (भविष्यमें होनेवाले) स्थानाभिमानियोंका तथा इस समय जो विद्यमान हैं, उन सभीका यह स्थान सभी मन्वन्तरोंमें हुआ करता है। ये चौदह गण सात-सातके समूहमें सभी चौदह मन्वन्तरोंमें सूर्यमें निवास करते हैं॥ ७७-७८॥
सङ्क्षेपादद्विस्तराच्चैव यथावृत्तं यथाश्रुतम्।<br>कथितं मुनिशार्दूला देवदेवस्य धीमतः॥ ७९<br><br>एते देवा वसन्त्यर्के द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु।<br>स्थानाभिमानिनो ह्येते गणा द्वादश सप्तकाः॥ ८०हे श्रेष्ठ मुनियो! मैंने बुद्धिमान् देवदेवके क्रिया-कलापका संक्षेपमें तथा विस्तारसे वर्णन कर दिया, जैसा घटित हुआ था और जैसा मैंने सुना था। ये देवता दो-दो महीने क्रमसे सूर्यमें निवास करते हैं। बारह-बारह देवताओंके ये सात समूह अपने स्थान (पद)-का अभिमान करनेवाले हैं॥ ७९-८०॥
इत्येष एकचक्रेण सूर्यस्तूर्णं रथेन तु।<br>हरितैरक्षरैरश्वैः सर्पतेऽसौ दिवाकरः॥ ८१<br><br>अहोरात्रं रथेनासावेकचक्रेण तु भ्रमन्।<br>सप्तद्वीपसमुद्रां गां सप्तभिः सर्पते दिवि॥ ८२इस प्रकार ये दिवाकर सूर्य हरितवर्णके [सात] अविनाशी अश्वोंद्वारा खींचे जाते हुए एक चक्रवाले रथसे वेगपूर्वक चलते हैं। ये सूर्य एक चक्रवाले रथसे [उक्त] सात समूहोंके साथ आकाशमें दिन-रात भ्रमण करते हुए सात द्वीपों तथा समुद्रोंवाली पृथ्वीके ऊपर भ्रमण करते हैं॥ ८१-८२॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सूर्यरथनिर्णयो नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सूर्यरथनिर्णय' नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५५॥

५६- सोम (चन्द्रमा)-की स्थिति एवं गतिका निरूपण, चन्द्रकलाओंके ह्रास तथा वृद्धिका वर्णन

२४० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग छप्पनवाँ अध्याय सोम (चन्द्रमा)-की स्थिति एवं गतिका निरूपण, चन्द्रकलाओंके ह्रास तथा वृद्धिका वर्णन सूत उवाच वीथ्याश्रयाणि चरति नक्षत्राणि निशाकरः। त्रिचक्रोभयतोऽश्वश्च विज्ञेयस्तस्य वै रथः॥ १ शतारैश्च त्रिभिश्चक्रैर्युक्तः शुक्लैर्हयोत्तमैः। दशभिस्त्वकृशैर्दिव्यैरसङ्गैस्तैर्मनोजवैः ॥ २ रथेनानेन देवैश्च पितृभिश्चैव गच्छति। सोमो ह्यम्बुमयैर्गोभिः शुक्लैः शुक्लगभस्तिमान्॥ ३ क्रमते शुक्लपक्षादौ भास्करात्परमास्थितः। आपूर्यते परस्यान्तः सततं दिवसक्रमात्॥ ४ देवैः पीतं क्षये सोममाप्याययति नित्यशः। पीतं पञ्चदशाहं तु रश्मिनैकेन भास्करः॥ ५ आपूर्यन् सुषुम्नेन भागं भागमनुक्रमात्। इत्येषा सूर्यवीर्येण चन्द्रस्याप्यायिता तनुः॥ ६ स पौर्णमास्यां दृश्येत शुक्लः सम्पूर्णमण्डलः। एवमाप्यायितं सोमं शुक्लपक्षे दिनक्रमात्॥ ७ ततो द्वितीयाप्रभृति बहुलस्य चतुर्दशीम्। पिबन्त्यम्बुमयं देवा मधु सौम्यं सुधामृतम्॥ ८ सम्भृतं त्वर्धमासेन ह्यमृतं सूर्यतेजसा। पानार्थममृतं सोमं पौर्णमास्यामुपासते॥ ९ एकरात्रं सुराः सर्वे पितृभिस्त्वृषिभिः सह। सोमस्य कृष्णपक्षादौ भास्कराभिमुखस्य च॥ १० प्रक्षीयन्ते परस्यान्तः पीयमानाः कलाः क्रमात्। त्रयस्त्रिंशच्छताश्चैव त्रयस्त्रिंशत्तथैव च॥ ११ त्रयस्त्रिंशत्सहस्त्राणि देवाः सोमं पिबन्ति वै। एवं दिनक्रमात्पीते विबुधैस्तु निशाकरे॥ १२ पीत्वार्धमासं गच्छन्ति अमावास्यां सुरोत्तमाः। पितरश्चोपतिष्ठन्ति अमावास्यां निशाकरम्॥ १३ सूतजी बोले—चन्द्रमा वीथियोंमें स्थित नक्षत्रोंमें चलता है। उसके रथको तीन पहियोंवाला तथा दोनों ओर घोड़ोंसे युक्त जानना चाहिये। यह सौ अरों (तीलियों)-वाले तीन पहियोंसे युक्त है एवं श्वेतवर्णवाले, उत्तम, पुष्ट, दिव्य जुएसे बिना नथे हुए और मनके समान वेगवाले दस घोड़ोंसे समन्वित है। श्वेत किरणोंवाले चन्द्रमा श्वेत रंगके अम्बुमय दस घोड़ोंसहित देवताओं तथा पितरोंके साथ इस रथसे चलते हैं॥ १-३॥ सूर्यसे दूरस्थित यह शुक्लपक्षके आदिसे क्रमशः बढ़ता है। दिनके क्रमसे यह निरन्तर शुक्लपक्षसे अन्ततक वृद्धिको प्राप्त होता है। सूर्य इस चन्द्रमाको विकसित करता है। देवतागण [कृष्णपक्षमें] इसको पीते हैं। देवताओंके द्वारा यह पन्द्रह दिनतक पीया जाता है। सूर्य [अपनी] सुषुम्ना नामक एक किरणके द्वारा क्रमशः इसके एक-एक भागको पूर्ण करते हैं। इन सूर्यके तेजसे चन्द्रमाका शरीर विकसित होता है। ये पूर्णिमा तिथिको पूर्णमण्डलवाले होकर श्वेतवर्णके दिखायी पड़ते हैं। इस शुक्लपक्षमें दिनके क्रमसे चन्द्रमा बढ़ते रहते हैं॥ ४-७॥ तत्पश्चात् कृष्णपक्षकी द्वितीयासे प्रारम्भ करके चतुर्दशी तिथितक देवतालोग चन्द्रमाके जलमय मधुर सुधामृतका पान करते हैं। वह अमृत सूर्यके तेजसे आधे महीनेतक चन्द्रमामें भरा रहता है। उस अमृतको पीनेके लिये पूर्णिमा तिथिको पूरी रात सभी देवता पितरों तथा ऋषियोंके साथ चन्द्रमाके पास स्थित रहते हैं। कृष्णपक्षके आदिसे सूर्याभिमुख चन्द्रमाकी पी जाती हुई कलाएँ क्रमशः क्षीण होती जाती हैं। वसु (८), रुद्र (११), आदित्य (१२) तथा अश्विनीद्वय (२)—ये तैंतीस देवता एवं इनके पुत्र-पौत्ररूप तैंतीस सौ तथा तैंतीस हजार देवता चन्द्रमाका पान करते हैं। इस प्रकार दिनके क्रमसे देवताओंके द्वारा चन्द्रमाका पान किये जानेपर

५७- बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप, ग्रह-नक्षत्रों एवं तारागणोंद्वारा ध्रुवका परिभ्रमण, ग्रहोंका स्वरूप-विस्तार तथा उनकी गतिका निरूपण

अध्याय ५७] बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप तथा उनकी गतिका निरूपण २४१ ततः पञ्चदशे भागे किञ्चिच्छिष्टे कलात्मके। आधे महीनेतक पान करके वे श्रेष्ठ देवता अमावास्या अपराह्ने पितृगणा जघन्यं पर्युपासते॥ १४ तिथिको चले जाते हैं, उसके बाद उसी अमावास्या तिथिको पितृगण चन्द्रमाके पास स्थित होते हैं और पिबन्ति द्विकलां कालं शिष्टा तस्य कला तु या। शुक्लपक्षकी प्रतिपदातक बचे हुए अमृतका पान करते निःसृतं तदमावास्यां गभस्तिभ्यः स्वधामृतम्॥ १५ हैं। अन्तिम कलाके रूपमें पन्द्रहवें भागके शेष रहनेपर अपराह्नमें पितृगण चन्द्रमाके पास आ जाते हैं और मासतृप्तिमवाप्याग्र्यां पीत्वा गच्छन्ति तेऽमृतम्। उसकी जो कला बची रहती है, उसका पान दो पितृभिः पीयमानस्य पञ्चदश्यां कला तु या॥ १६ कलावाले समय (दो घड़ी)-तक करते हैं। अमावास्या तिथिको किरणोंसे निकले हुए स्वधामृतको पीते हैं। इस यावत्तु क्षीयते तस्य भागः पञ्चदशस्तु सः। प्रकार अमृत पीकर महीनेभरकी तृप्ति प्राप्त करके वे अमावास्यां ततस्तस्या अन्तरा पूर्यते पुनः॥ १७ चले जाते हैं। प्रत्येक पक्षके आरम्भमें सोलहवें दिन चन्द्रमाकी वृद्धि तथा क्षयका होना बताया गया है। इस वृद्धिक्षयौ वै पक्षादौ षोडश्यां शशिनः स्मृतौ। प्रकार पक्षमें चन्द्रमामें होनेवाली यह वृद्धि सूर्यके कारण एवं सूर्यनिमित्तैषा पक्षवृद्धिर्निशाकरे॥ १८ होती है॥ ८-१८॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सोमवर्णनं नाम षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सोमवर्णन' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥ सत्तावनवाँ अध्याय बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप, ग्रह-नक्षत्रों एवं तारागणोंद्वारा ध्रुवका परिभ्रमण, ग्रहोंका स्वरूप-विस्तार तथा उनकी गतिका निरूपण सूत उवाच सूतजी बोले- [हे ऋषियो!] चन्द्रमाके पुत्र अष्टभिश्च हयैर्युक्तः सोमपुत्रस्य वै रथः। [बुध]-का रथ जल-अग्निमय और पिशांगवर्णवाले वारितेजोमयश्चाथ पिशाङ्गैश्चैव शोभनैः ॥ १ सुन्दर आठ घोड़ोंसे युक्त है। दैत्योंके आचार्य बुद्धिमान् दशभिश्चाकृशैश्शश्वैर्नानावर्णै रथः स्मृतः। शुक्रका रथ पुष्ट, विभिन्न वर्णोंवाले तथा पृथ्वीयम दस शुक्रस्य क्षमामयैर्युक्तो दैत्याचार्यस्य धीमतः ॥ २ घोड़ोंसे युक्त कहा गया है। मंगलका रथ सुवर्णमय, परम अष्टाश्वश्चाथ भौमस्य रथो हैमः सुशोभनः। सुन्दर एवं आठ घोड़ोंवाला है। बृहस्पतिका रथ सुवर्णमय जीवस्य हैमश्चाष्टाश्वो मन्दस्यायसनिर्मितः ॥ ३ है तथा आठ घोड़ोंसे युक्त है। शनैश्चरका रथ लोहेका बना हुआ है और वह काले वर्णवाले जलमय दस रथ आपोमयैरश्वैर्दशभिस्तु सितेतरैः। घोड़ोंसे युक्त है। राहु-केतुका रथ आठ घोड़ोंवाला कहा स्वर्भानोर्भास्करारेश्च तथा चाष्टहयः स्मृतः॥ ४ गया है ॥ १-४॥ सर्वे ध्रुवनिबद्धा वै ग्रहास्ते वातरश्मिभिः। वे सभी ग्रह वायुरश्मियोंके द्वारा ध्रुवसे बँधे हुए एतेन भ्राम्यमाणाश्च यथायोगं व्रजन्ति वै॥५ हैं। इसके द्वारा घुमाये जाते हुए वे यथायोग चलते हैं। यावन्त्यश्चैव ताराश्च तावन्तश्चैव रश्मयः। जितने तारे हैं, उतनी ही [वात] रश्मियाँ हैं। वे सब सर्वे ध्रुवनिबद्धाश्च भ्रमन्तो भ्रामयन्ति तम्॥ ६ ध्रुवसे बँधे हुए हैं और [स्वयं] घूमते हुए उस ध्रुवको

२४२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत (मूल श्लोक)हिन्दी अनुवाद
अलातचक्रवद्यान्ति वातचक्रेरितानि तु।<br>यस्माद्वहति ज्योतींषि प्रवहस्तेन स स्मृतः॥ ७घुमाते हैं। वातचक्रसे प्रेरित तारागण अंगारचक्रके समान घूमते हैं। चूँकि इन ग्रह-नक्षत्रोंका वहन वायु करता है, इसलिये उसे प्रवह कहा गया है॥ ५-७॥
नक्षत्रसूर्य्याश्च तथा ग्रहतारागणैः सह।<br>उन्मुखाभिमुखाः सर्वे चक्रभूताः श्रिता दिवि॥ ८<br>ध्रुवेणाधिष्ठिताश्चैव ध्रुवमेव प्रदक्षिणम्।<br>प्रयान्ति चेश्वरं द्रष्टुं मेढीभूतं ध्रुवं दिवि॥ ९ग्रहों तथा तारागणोंके साथ नक्षत्र तथा सूर्य सब-के-सब चक्ररूपमें उन्मुख एवं अभिमुख होकर आकाशमें स्थित हैं। ध्रुवके द्वारा नियन्त्रित वे सब ध्रुवकी प्रदक्षिणा करते हैं। वे धुरीरूप ईश्वर ध्रुवको देखनेके लिये आकाशमें भ्रमण करते हैं॥ ८-९॥
नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>त्रिगुणस्तस्य विस्तारो मण्डलस्य प्रमाणतः॥ १०<br>द्विगुणः सूर्य्यविस्ताराद्विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>तुल्यस्तयोस्तु स्वर्भानुर्भूत्वाधस्तात्प्रसर्पति॥ ११<br>उद्धृत्य पृथिवीछायां निर्मितां मण्डलाकृतिम्।<br>स्वर्भानोस्तु बृहत्स्थानं तृतीयं यत्तमोमयम्॥ १२सूर्यका व्यास नौ हजार योजन कहा गया और इस प्रमाणके अनुसार उनके मण्डलका विस्तार तीन गुना है। चन्द्रमाका विस्तार सूर्यके विस्तारसे दुगुना बताया गया है। उन दोनोंके बराबर होकर राहु नीचेसे चलता है। मण्डलाकार बनी हुई पृथ्वीछायाको लेकर राहुका तीसरा बड़ा स्थान है, जो अन्धकारमय है॥ १०-१२॥
चन्द्रस्य षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते।<br>विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव योजनाच्च प्रमाणतः॥ १३<br>भार्गवात्पादहीनस्तु विज्ञेयो वै बृहस्पतिः।<br>पादहीनौ वक्रसौरी तथायामप्रमाणतः॥ १४<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पादहीनस्तयोर्बुधः।<br>तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै॥ १५<br>बुधेन तानि तुल्यानि विस्तारान्मण्डलादपि।<br>प्रायशश्चन्द्रयोगीनि विद्यादृक्षाणि तत्त्ववित्॥ १६योजनके प्रमाणसे शुक्रका व्यास तथा मण्डल चन्द्रमाके व्यास एवं मण्डलका सोलहवाँ भाग कहा गया है। [आकारमें] बृहस्पतिको शुक्रसे एक चौथाई कम कहा गया है। विस्तारके प्रमाणसे मंगल तथा शनि बृहस्पतिसे एक चौथाई कम हैं। [अर्थात् मंगल एवं शनि विस्तारमें बृहस्पतिके तीन चौथाई हैं] बुध विस्तार तथा मण्डलमें उन दोनोंका तीन चौथाई है। तारा-नक्षत्ररूप जो पिण्ड हैं, वे विस्तार तथा मण्डलमें बुधके तुल्य हैं, तत्त्ववेत्ताको चन्द्रमासे युक्त उन नक्षत्रोंको 'ऋक्ष' नामसे जानना चाहिये॥ १३-१६॥
तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परम्।<br>शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैव योजने॥ १७<br>सर्वोपरि निकृष्टानि तारकामण्डलानि तु।<br>योजनद्वयमात्राणि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते॥ १८<br>उपरिष्टात्रयस्तेषां ग्रहा ये दूरसर्पिणः।<br>सौरौऽङ्गिराश्च वक्रश्च ज्ञेया मन्दविचारिणः॥ १९<br>तेभ्योऽधस्तात्तु चत्वारः पुनरन्ये महाग्रहाः।<br>सूर्यः सोमो बुधश्चैव भार्गवश्चैव शीघ्रगाः॥ २०छोटे-छोटे असंख्य तारे तथा नक्षत्र परस्पर पाँच, चार, तीन एवं दो योजनकी दूरीपर हैं। सबसे ऊपर अत्यन्त छोटे तारामण्डल हैं, जो केवल दो योजन विस्तारवाले हैं, उनसे छोटे तारे नहीं हैं। उनके ऊपर तीन ग्रह शनि, बृहस्पति तथा मंगल; जो दूरकी यात्रा करनेवाले हैं, उन्हें मन्दगतिवाला जानना चाहिये। उनके नीचे चार अन्य बड़े ग्रह सूर्य, चन्द्रमा, बुध तथा शुक्र हैं, जो तेजीसे चलनेवाले हैं॥ १७-२०॥
तावन्त्यस्तारकाः कोट्यो यावन्त्यृक्षाणि सर्वशः।<br>ध्रुवात्तु नियमाच्चैषामृक्षमार्गे व्यवस्थितिः॥ २१<br>सप्ताश्वस्यैव सूर्यस्य नीचोच्चत्वमनुक्रमात्।<br>उत्तरायणमार्गस्थो यदा पर्वसु चन्द्रमाः॥ २२तारागण उतने ही करोड़ हैं, जितने सभी ऋक्ष (नक्षत्र) हैं। ऋक्षमार्गमें उनकी भी स्थिति ध्रुवके नियन्त्रणसे ही है। सात घोड़ोंवाले सूर्यका अनुक्रमसे

अध्याय ५७ ] बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप तथा उनकी गतिका निरूपण २४३


श्लोक (संस्कृत)अर्थ (हिन्दी)
उच्चत्वाद दृश्यते शीघ्रं नातिव्यक्तैर्गभस्तिभिः।<br>तदा दक्षिणमार्गस्थो नीचां वीथीमुपाश्रितः॥ २३<br><br>भूमिरेखावृतः सूर्यः पौर्णिमावास्ययोस्तदा।<br>ददृशे च यथाकालं शीघ्रमस्तमुपैति च॥ २४<br><br>तस्मादुत्तरमार्गस्थो ह्यमावास्यां निशाकरः।<br>ददृशे दक्षिणे मार्गे नियमाद् दृश्यते न च॥ २५नीचोच्चत्व (नीचा तथा ऊँचा होना) होता रहता है। जब सूर्य उत्तरायणमार्गमें स्थित होते हैं और चन्द्रमा पूर्ण मण्डलमें होते हैं, तब सूर्य कुछ अस्पष्ट किरणोंके साथ उच्चत्वके कारण शीघ्र दिखायी पड़ते हैं। जब सूर्य दक्षिणायनमार्गमें स्थित होते हैं, तब वे नीचेवाली वीथीमें रहते हैं। पृथ्वीकी रेखाद्वारा ढँका हुआ सूर्य उससे नीचे होता है। पूर्णिमा तथा अमावास्याके दिनोंमें यथासमय दिखायी देता है; क्योंकि यह शीघ्र अस्त हो जाता है। अतः नये चन्द्रमाकी तिथि [अमावास्या]-पर चन्द्रमा उत्तरायणमें होता है। यह दक्षिण मार्गमें दिखायी नहीं पड़ता; क्योंकि नक्षत्रोंके गतियोगके कारण यह [चन्द्रमा] सूर्यके अन्धकारसे ढँका हुआ होता है॥ २१—२५ १/२ ॥
ज्योतिषां गतियोगेन सूर्यस्य तमसा वृतः।<br>समानकालास्तमयौ विषुवत्सु समोदयौ॥ २६<br><br>उत्तरासु च वीथीषु व्यन्तरास्तमनोदयौ।<br>पौर्णिमावास्ययोर्ज्ञेयौ ज्योतिष्चक्रानुवर्तिनौ॥ २७<br><br>दक्षिणायनमार्गस्थौ यदा चरति रश्मिवान्।<br>ग्रहाणां चैव सर्वेषां सूर्योऽधस्तात्प्रसर्पति॥ २८<br><br>विस्तीर्णं मण्डलं कृत्वा तस्योर्ध्वं चरते शशी।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं सोमादूर्ध्वं प्रसर्पति॥ २९<br><br>नक्षत्रेभ्यो बुधश्चोर्ध्वं बुधादूर्ध्वं तु भार्गवः।<br>वक्रस्तु भार्गवादूर्ध्वं वक्रादूर्ध्वं बृहस्पतिः॥ ३०<br><br>तस्माच्छनैश्चरश्चोर्ध्वं तस्मात्सप्तर्षिमण्डलम्।<br>ऋषीणां चैव सप्तानां ध्रुवस्योर्ध्वं व्यवस्थितिः॥ ३१<br><br>तं विष्णुलोकं परमं ज्ञात्वा मुच्येत किल्बिषात्।सूर्य तथा चन्द्रमा विषुवत् स्थानोंपर समान कालमें अस्त एवं उदय होते हैं। उत्तरायणमें पूर्णिमा तथा अमावास्या तिथियोंपर ज्योतिष्चक्रका अनुसरण करनेवाले इन दोनोंको बिना किसी अन्तरके उदय तथा अस्त होनेवाला जानना चाहिये। जब सूर्य दक्षिणायनमार्गमें स्थित होकर चलता है, तब वह सभी ग्रहोंके नीचेसे गुजरता है, उस समय चन्द्रमा अपने मण्डलको विस्तृत करके उस [सूर्य]-के ऊपर चलते हैं और सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है। नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल, मंगलसे ऊपर बृहस्पति, उस बृहस्पतिसे ऊपर शनि और उससे ऊपर सप्तर्षिमण्डल विद्यमान है। सात ऋषियोंके ऊपर ध्रुवकी स्थिति है। उस परम विष्णुलोकको जानकर मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है॥ २६—३१ १/२ ॥
द्विगुणेषु सहस्रेषु योजनानां शतेषु च॥ ३२<br><br>ग्रहनक्षत्रतारासु उपरिष्टाद्यथाक्रमम्।<br>ग्रहाश्च चन्द्रसूर्यौ च युतौ दिव्येन तेजसा॥ ३३<br><br>नित्यमृक्षेषु युज्यन्ते गच्छन्तोऽहर्निशं क्रमात्।<br>ग्रहनक्षत्रसूर्यास्ते नीचोच्चऋजुसंस्थिताः॥ ३४<br><br>समागमे च भेदे च पश्यन्ति युगपत्प्रजाः।<br>ऋतवः षट् स्मृताः सर्वे समागच्छन्ति पञ्चधा॥ ३५<br><br>परस्परास्थिता ह्येते युज्यन्ते च परस्परम्।<br>असङ्करेण विज्ञेयस्तेषां योगस्तु वै बुधैः॥ ३६दो सौ हजार योजन दूरीपर ग्रह-नक्षत्र-तारोंसे ऊपर यथाक्रम सभी ग्रह और दिव्य तेजसे युक्त चन्द्रमा-सूर्य दिन-रात भ्रमण करते हुए सदा नक्षत्रोंसे जुड़े रहते हैं। वे ग्रह, नक्षत्र तथा सूर्य कभी नीचे, कभी ऊँचे एवं कभी सीधी रेखामें स्थित रहते हैं। समागम तथा भेद दोनों स्थितियोंमें वे प्रजाओंको एक साथ देखते हैं। ऋतुएँ छः कही गयी हैं, वे सब पाँच प्रकारसे आती हैं। एक-दूसरेपर आश्रित होनेके कारण ये परस्पर जुड़ी

५८- ब्रह्माद्वारा शिवके आदेशसे ग्रहों, नक्षत्रों, जलों आदिके अधिपतिके रूपमें सूर्य, चन्द्रमा, वरुण आदिकी प्रतिष्ठाका निरूपण

२४४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
एवं सङ्क्षिप्य कथितं ग्रहाणां गमनं द्विजाः।<br>भास्करप्रमुखानां च यथादृष्टं यथाश्रुतम्॥ ३७<br><br>ग्रहाधिपत्ये भगवान् ब्रह्मणा पद्मयोनिना।<br>अभिषिक्तः सहस्रांशू रुद्रेण तु यथा गुहः॥ ३८<br><br>तस्माद् ग्रहार्थना कार्या अग्नौ चोद्यं यथाविधि।<br>आदित्यग्रहपीडायां सद्भिः कार्यार्थसिद्धये॥ ३९होती हैं, किंतु उनका यह योग एक-दूसरेके साथ बिना संकर (मिश्रण)-के ही होता है—ऐसा विद्वानोंको जानना चाहिये॥ ३२–३६॥<br><br>हे द्विजो! इस प्रकार मैंने जैसा देखा तथा सुना है, उसके अनुसार संक्षेपमें सूर्य आदि ग्रहोंकी गतिका वर्णन किया। पद्मयोनि ब्रह्माने ग्रहोंके अधिपतिके रूपमें हजार किरणोंवाले भगवान् सूर्यको अभिषिक्त किया है। जैसे रुद्रने कार्तिकेयको अभिषिक्त किया है। अतः सज्जनोंको [अपने] कार्यकी सिद्धिके लिये सूर्य ग्रहकी पीड़ाके समय कहे गये विधानके अनुसार यथाविधि अग्निमें ग्रहर्चन करना चाहिये॥ ३७–३९॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ज्योतिषचक्रे ग्रहचारकथनं नाम सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ज्योतिषचक्रमें ग्रहचारकथन' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५७॥


अट्टावनवाँ अध्याय

ब्रह्माद्वारा शिवके आदेशसे ग्रहों, नक्षत्रों, जलों आदिके अधिपतिके रूपमें सूर्य, चन्द्रमा, वरुण आदिकी प्रतिष्ठाका निरूपण

ऋषय ऊचुः<br>अभ्यषिञ्चत्कथं ब्रह्मा चाधिपत्ये प्रजापतिः।<br>देवदैत्यमुखान् सर्वान् सर्वात्मा वद साम्प्रतम्॥ १ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] सर्वात्मा प्रजापति ब्रह्माजीने सभी प्रमुख देवताओं तथा दैत्योंको अधिपतिके रूपमें किस प्रकार अभिषिक्त किया, इस समय [हमलोगोंको] बताइये॥ १॥
सूत उवाच<br>ग्रहाधिपत्ये भगवानभ्यषिञ्चद्दिवाकरम्।<br>ऋक्षाणामोषधीनां च सोमं ब्रह्मा प्रजापतिः॥ २सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] भगवान् ब्रह्माने ग्रहोंके अधिपतिके रूपमें सूर्यका और नक्षत्रों तथा औषधियोंके अधिपतिके रूपमें चन्द्रमाका अभिषेक किया॥ २॥
अपां च वरुणं देवं धनानां यक्षपुङ्गवम्।<br>आदित्यानां तथा विष्णुं वसूनां पावकं तथा॥ ३<br><br>प्रजापतीनां दक्षं च मरुतां शक्रमेव च।<br>दैत्यानां दानवानां च प्रह्लादं दैत्यपुङ्गवम्॥ ४<br><br>धर्मं पितॄणामधिपं निर्ऋतिं पिशिताशिनाम्।<br>रुद्रं पशूनां भूतानां नन्दिनां गणनायकम्॥ ५<br><br>वीराणां वीरभद्रं च पिशाचानां भयङ्करम्।<br>मातॄणां चैव चामुण्डां सर्वदेवनमस्कृताम्॥ ६उन पितामहने वरुणदेवको जलोंका अधिपति, यक्षोंमें श्रेष्ठ कुबेरको धनोंका अधिपति, विष्णुको आदित्योंका अधिपति, अग्निको वसुओंका अधिपति, दक्षको प्रजापतियोंका अधिपति, इन्द्रको मरुतोंका अधिपति, दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लादको दैत्यों तथा दानवोंका अधिपति, धर्मको पितरोंका अधिपति, निर्ऋतिको राक्षसोंका अधिपति, रुद्रको पशुओंका अधिपति, गणोंके नायक नन्दीको भूतोंका अधिपति, भयंकर वीरभद्रको वीर पिशाचोंका अधिपति, सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत चामुण्डाको
अध्याय ५८ ]ब्रह्माद्वारा शिवके आदेशसे ग्रहों आदिकी प्रतिष्ठाका निरूपण२४५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रुद्राणां देवदेवेशं नीललोहितमीश्वरम्।<br>विघ्नानां व्योमजं देवं गजास्यं तु विनायकम्॥ ७<br>स्त्रीणां देवीमुमादेवीं वचसां च सरस्वतीम्।<br>विष्णुं मायाविनां चैव स्वात्मानं जगतां तथा॥ ८<br>हिमवन्तं गिरीणां तु नदीनां चैव जाह्नवीम्।<br>समुद्राणां च सर्वेषामधिपं पयसां निधिम्॥ ९<br>वृक्षाणां चैव चाश्वत्थं प्लक्षं च प्रपितामहः॥ १०मातृगणोंका अधिपति, देवदेवेश ईश्वर नीललोहितको रुद्रोंका अधिपति, व्योमसे उत्पन्न तथा हाथीके समान मुखवाले विनायकको विघ्नोंका अधिपति, देवी उमाको स्त्रियोंका अधिपति, देवी सरस्वतीको वाणीका अधिपति, विष्णुको मायावियोंका अधिपति, स्वयं अपनेको सम्पूर्ण जगत्का अधिपति, हिमालयको पर्वतोंका अधिपति, गंगाको नदियोंका अधिपति, जलनिधि (महासागर)-को सभी समुद्रोंका अधिपति और अश्वत्थ तथा प्लक्षको वृक्षोंका अधिपति बनाया॥ ३-१०॥
गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणा-<br>मीशं पुनश्चित्ररथं चकार।<br>नागाधिपं वासुकिमुग्रवीर्यं<br>सर्पाधिपं तक्षकमग्रवीर्यम्॥ ११उन्होंने चित्ररथको गन्धर्वों-विद्याधरों तथा किन्नरोंका अधिपति, उग्र तेजवाले वासुकिको नागोंका अधिपति और उग्र वीर्यवाले तक्षकको सर्पोंका अधिपति बनाया॥ ११॥
दिग्वारणानामधिपं चकार<br>गजेन्द्रमैरावतमुग्रवीर्यम् ।<br>सुपर्णमीशं पततामथाश्व-<br>राजानमुच्चैःश्रवसं चकार॥ १२उन्होंने उग्र पराक्रमवाले गजेन्द्र ऐरावतको दिग्गजोंका स्वामी, गरुड़को पक्षियोंका स्वामी और उच्चैःश्रवाको घोड़ोंका स्वामी बनाया॥ १२॥
सिंहं मृगाणां वृषभं गवां च<br>मृगाधिपानां शरभं चकार।<br>सेनाधिपानां गुहमप्रमेयं<br>श्रुतिस्मृतीनां लकुलीशमीशम्॥ १३उन्होंने सिंहको मृगोंका स्वामी, वृषभको गौओंका स्वामी, शरभको सिंहोंका स्वामी, अतुलनीय गुह (कार्तिकेय)-को सेनाधिपोंका स्वामी और लकुलीशको श्रुतियों तथा स्मृतियोंका स्वामी बनाया॥ १३॥
अभ्यषिञ्चत्सुधर्माणं तथा शङ्खपदं दिशाम्।<br>केतुमन्तं क्रमेणैव हेमरोमाणमेव च॥ १४<br>पृथिव्यां पृथुमीशानं सर्वेषां तु महेश्वरम्।<br>चतुर्मूर्तिषु सर्वज्ञं शङ्करं वृषभध्वजम्॥ १५उन्होंने सुधर्मा, शंखपद, केतुमान् तथा हेमरोमको क्रमशः सभी दिशाओंके अधिपति रूपमें अभिषिक्त किया। उन्होंने पृथुको पृथ्वीका स्वामी, महेश्वरको सबका स्वामी और सब कुछ जाननेवाले वृषभध्वज शंकरको चारों (विश्व, प्राज्ञ, तैजस, तुरीय) मूर्तियोंका स्वामी बनाया॥ १४-१५॥
प्रसादाद्गगवाञ्छम्भोश्चाभ्यषिञ्चद्यथाक्रमम्।<br>पुराभिषिच्य पुण्यात्मा रराज भुवनेश्वरः॥ १६इस प्रकार भगवान् ब्रह्माने शम्भुकी कृपासे पूर्वकालमें [इन सभीको] क्रमसे अभिषिक्त किया। इन्हें अभिषिक्त करके लोकोंके स्वामी पुण्यात्मा ब्रह्मा बहुत प्रसन्न हो गये॥ १६॥
एतद्वो विस्तरेणैव कथितं मुनिपुङ्गवाः।<br>अभिषिक्तास्ततस्वेते विशिष्टा विश्वयोनिना॥ १७हे श्रेष्ठ मुनियो! मैंने आपलोगोंको यह विस्तारसे बता दिया; विश्वको उत्पन्न करनेवाले ब्रह्माने [इसी तरहसे] विशिष्ट गुणोंसे युक्त इन सबको अभिषिक्त किया था॥ १७॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सूर्याद्याभिषेककथनं नामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सूर्य आदिका अभिषेककथन' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥