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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

अध्याय ४८ ] भूमध्यमें स्थित मेरु ( सुमेरु ) पर्वत और इन्द्र आदि लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २०९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शराववत्संस्थितत्वाद् द्वात्रिंशन्मूर्ध्नि विस्तृतः।<br>विस्तारात्त्रिगुणश्चास्य परिणाहोऽनुमण्डलः॥ ३यह एक चौड़े शराव (कसोरा)-के समान स्थित है और बत्तीस हजार योजन चोटीपर फैला हुआ है। इसका घेरा इसके विस्तारसे तीन गुना है॥ २-३॥
हैमीकृतो महेशस्य शुभाङ्गस्पर्शनेन च।<br>धत्तूरपुष्पसङ्काशः सर्वदेवनिकेतनः॥ ४यह महेश्वरके शुभ शरीरके स्पर्शसे सुवर्णका हो गया है। यह धतूरेके पुष्पके समान आभावाला, सभी देवताओंका निवासस्थान तथा देवताओंकी क्रीड़ाभूमि है और अनेक आश्चर्योंसे भरा हुआ है॥ ४ १/२॥
क्रीडाभूमिश्च देवानामेकाश्चर्यसंयुतः।<br>लक्षयोजन आयामस्तस्यैवं तु महागिरेः॥ ५<br><br>ततः षोडशसाहस्रं योजनानि क्षितेरधः।<br>शेषञ्चोपरि विप्रेन्द्रा धरायास्तस्य शृङ्गिणः॥ ६<br><br>मूलायामप्रमाणं तु विस्तारान्मूलतो गिरेः।<br>ऊर्ध्वविस्तारमस्यैव द्विगुणं मूलतो गिरेः॥ ७इस महान् पर्वतका आयाम एक लाख योजन है। पृथ्वीके नीचे यह सोलह हजार योजनतक है और हे विप्रेन्द्रो! उस पर्वतका शेष भाग पृथ्वीके ऊपर है। इस पर्वतके मूलके आयाम (दैर्घ्य)-का प्रमाण विस्तारमें है; उसके विस्तारको पर्वतके मूलसे दुगुना कहा गया है॥ ५-७॥
पूर्वतः पद्मरागाभो दक्षिणे हेमसंन्निभः।<br>पश्चिमे नीलसङ्काश उत्तरे विद्रुमप्रभः॥ ८यह पूर्वमें पद्मरागकी आभाके समान, दक्षिणमें स्वर्णके समान, पश्चिममें नीलमणिके समान और उत्तरमें मूँगेके समान है॥ ८॥
अमरावती पूर्वभागे नानाप्रासादसङ्कुला।<br>नानादेवगणैः कीर्णा मणिजालसमावृता॥ ९<br><br>गोपुरैर्विविधाकारैर्हेमरत्नविभूषितैः ।<br>तोरणैर्हेमचित्रैस्तु मणिक्लृप्तैः पथि स्थितैः॥ १०<br><br>सँल्लापालापकुशलैः सर्वाभरणभूषितैः।<br>स्तनभारविनम्रैश्च मदघूर्णितलोचनैः॥ ११<br><br>स्त्रीसहस्रैः समाकीर्णा चाप्सरोभिः समन्ततः।<br>दीर्घिकाभिर्विचित्राभिः फुल्लाम्भोरुहसङ्कुलैः॥ १२<br><br>हेमसोपानसंयुक्तैर्हेमसैकतराशिभिः ।<br>नीलोत्पलैश्चोत्पलैश्च हैमैश्चापि सुगन्धिभिः॥ १३<br><br>एवंविधैस्तटाकैश्च नदीभिश्च नदैर्युता।<br>विराजते पुरी शुभ्रा तयासौ पर्वतः शुभः॥ १४इसके पूर्वभागमें अमरावती (इन्द्रपुरी) है, जो अनेक प्रकारके महलोंसे युक्त, अनेक देवताओंसे भरी हुई और मणिमय जालोंसे घिरी हुई है। यह विविध आकारवाले तथा स्वर्ण एवं रत्नोंसे विभूषित गोपुरों, सोने तथा मणियोंके बने हुए अद्भुत तोरणों, राजमार्गपर स्थित-वार्तालापमें प्रवीण-सभी आभूषणोंसे अलंकृत-स्तनके भारसे झुकी हुई एवं मदके कारण घूर्णित नेत्रोंवाली हजारों स्त्रियोंसे भरी और चारों ओरसे अप्सराओंसे घिरी हुई है। यह विचित्र बावलियोंसे युक्त है। यह खिले हुए कमलोंसे सुशोभित, स्वर्णकी बनी हुई सीढ़ियोंवाले, स्वर्णमय बालुओंवाले, नीलकमलों तथा अन्य प्रकारके कमलोंसे शोभायमान, सुगन्धित नील कमलों एवं स्वर्णकमलोंवाले इस प्रकारके सरोवरोंसे तथा नदियों और नदोंसे युक्त यह सुन्दर पुरी [अत्यन्त] शोभित है। उस पुरीसे यह सुन्दर पर्वत भी सुशोभित होता है॥ ९-१४॥
तेजस्विनी नाम पुरी आग्नेय्यां पावकस्य तु।<br>अमरावतीसमा दिव्या सर्वभोगसमन्विता॥ १५इस पर्वतके आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) भागमें अग्निदेवकी तेजस्विनी नामक पुरी है। यह अमरावतीतुल्य, दिव्य तथा समस्त भोगोंसे परिपूर्ण है॥ १५॥
२१०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वैवस्वती दक्षिणे तु यमस्य यमिनां वराः।<br>भवनैरावृता दिव्यैर्जाम्बूनदमयैः शुभैः॥ १६हे व्रतियोंमें श्रेष्ठ मुनिगण! इसके दक्षिणमें यमकी उत्तम वैवस्वती नामक पुरी है। यह सुवर्णमय, दिव्य तथा शुभ भवनोंसे घिरी हुई है॥ १६॥
नैर्ऋते कृष्णवर्णा च तथा शुद्धवती शुभा।<br>तादृशी गन्धवन्ती च वायव्यां दिशि शोभना॥ १७इसके नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)-में कृष्णवर्णकी सुन्दर शुद्धवतीपुरी है और वायव्य (पश्चिम-उत्तर) दिशामें उसी प्रकारकी सुन्दर पुरी गन्धवती है। इसके उत्तरमें महोदया तथा ईशान (उत्तर-पूर्व)-में यशोवती नामक पुरी है। इस प्रकार मेरु पर्वतकी सभी दिशाओंमें द्युलोकमें पुरियाँ सर्वदा सुशोभित रहती हैं॥ १७-१८॥
महोदया चोत्तरे च ऐशान्यां तु यशोवती।<br>पर्वतस्य दिगन्तेषु शोभते दिवि सर्वदा॥ १८
ब्रह्मविष्णुमहेशानां तथान्येषां निकेतनम्।<br>सर्वभोगयुतं पुण्यं दीर्घिकाभिर्नगोत्तमम्॥ १९यह पर्वत ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य देवताओंका निवासस्थान है। यह समस्त सुख-साधनोंसे सम्पन्न, पुण्यमय, अनेक झीलों और उत्तम वृक्षोंसे युक्त है। यह सिद्धों, यक्षों, गन्धर्वों, श्रेष्ठ मुनियों एवं विविध आकारवाले चारों प्रकारके प्राणियोंसे परिपूर्ण है॥ १९-२०॥
सिद्धैर्यक्षैस्तु सम्पूर्णं गन्धर्वैर्मुनिपुङ्गवैः।<br>तथान्यैर्विविधाकारैर्भूतसङ्घैश्चतुर्विधैः ॥ २०
गिरेरुपरि विप्रेन्द्राः शुद्धस्फटिकसन्निभम्।<br>सहस्रभौमं विस्तीर्णं विमानं वामतः स्थितम्॥ २१हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इस पर्वतके ऊपर शुद्ध स्फटिकके समान, हजार मण्डपोंसे युक्त तथा विस्तृत विमान बायीं ओर स्थित हैं। विशाल भुजाओंवाले तथा चन्द्र-सूर्य-अग्निरूप नेत्रोंवाले शिव उसमें मणिमय सिंहासनपर पार्वती-देवी तथा कार्तिकेयके साथ विराजमान रहते हैं॥ २१-२२॥
तस्मिन् महाभुजः शर्वः सोमसूर्याग्निलोचनः।<br>सिंहासने मणिमये देव्यास्ते षण्मुखेन च॥ २२
हरेस्तदर्धं विस्तीर्णं विमानं तत्र सोऽपि च।<br>पद्मरागमयं दिव्यं पद्मजस्य च दक्षिणे॥ २३वहाँ विष्णुका भी विमान है, जो उन शिवके विमानके आधे विस्तारवाला है और दक्षिणमें पद्मयोनि ब्रह्माका पद्मरागमय दिव्य विमान है॥ २३॥
तस्मिन् शक्रस्य विपुलं पुरं रम्यं यमस्य च।<br>सोमस्य वरुणस्याथ निर्ऋतेः पावकस्य च॥ २४उस मेरुपर शिवके भवनके चारों ओर इन्द्र, यम, चन्द्रमा, वरुण, निर्ऋति, पावक, वायु और रुद्रका विशाल तथा सुन्दर पुर है। विविध दिव्य विमानोंमें अन्य लोगोंका निवास है। उस ईश्वरक्षेत्र (शिवविमान)-में ईशानदिशामें नित्य पूजा होती रहती है। वहाँ भगवान् नन्दी सिद्धेश्वरोंके साथ रहते हैं और शिष्योंसहित सुरेश्वर सनत्कुमार सिद्धोंके साथ सुखपूर्वक आसीन रहते हैं। इसी प्रकार सनक, सनन्द और उन्हींके समान अन्य हजारों लोग विराजमान रहते हैं॥ २४-२७॥
वायोश्चैव तु रुद्रस्य सर्कालयसमन्ततः।<br>तेषां तेषां विमानेषु दिव्येषु विविधेषु च॥ २५
ईशान्यामीश्वरक्षेत्रे नित्यार्चा च व्यवस्थिता।<br>सिद्धेश्वरैश्च भगवाँच्छैलादिः शिष्यसम्मतः॥ २६
सनत्कुमारः सिद्धैस्तु सुखासीनः सुरेश्वरः।<br>सनकश्च सनन्दश्च सदृशाश्च सहस्रशः॥ २७
योगभूमिः क्वचित्त्तस्मिन् भोगभूमिः क्वचित्क्वचित्।<br>बालसूर्यप्रतीकाशं विमानं तत्र शोभनम्॥ २८उस पर्वतपर कहीं-कहीं योगभूमि है और कहीं-

४९- जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन, वहाँके कुलपर्वतों, नदियों, वनों तथा वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन

अध्याय ४९] जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन...वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन २११


शैलादिनः शुभं चास्ति तस्मिन्नास्ते गणेश्वरः।<br>षण्मुखस्य गणेशस्य गणानां तु सहस्रशः॥ २९<br><br>सुयशायाः सुनेत्रायाः मातृणां मदनस्य च।<br>तस्य जम्बूनदी नाम मूलमावेष्ट्य संस्थिता॥ ३०<br><br>तस्य दक्षिणपार्श्वे तु जम्बूवृक्षः सुशोभनः।<br>अत्युच्छ्रितः सुविस्तीर्णः सर्वकालफलप्रदः॥ ३१<br><br>मेरोः समन्ताद्विस्तीर्णं शुभं वर्षमिलावृतम्।<br>तत्र जम्बूफलाहाराः केचिच्चामृतभोजनाः॥ ३२<br><br>जाम्बूनदसमप्रख्या नानावर्णाश्च भोगिनः।<br>मेरुपादाश्रितो विप्रा द्वीपोऽयं मध्यमः शुभः॥ ३३<br><br>नववर्षान्वितश्चैव नदीनदगिरीश्वरैः।<br>नववर्षं तु वक्ष्यामि जम्बूद्वीपं यथातथम्॥ ३४<br><br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव योजनैश्च निबोधत॥ ३५।कहीं भोगभूमि है। वहाँ उगते हुए सूर्यके सदृश, सुन्दर तथा शुभ विमान है, उसमें वे गणेश्वर विराजमान रहते हैं। वहाँ छः मुखोंवाले कार्तिकेय, गणेश, हजारों गणों, सुयशा तथा सुनेत्रा—इन पार्वतीकी सखियों, सभी माताओं तथा मदन (कामदेव)-के भी विमान हैं॥ २८-२९¹/₂॥<br><br>उस पर्वतके मूलको चारों ओरसे घेरकर जम्बू नामक नदी प्रवाहित होती है। उसके दक्षिण भागमें अत्यन्त सुन्दर, बहुत ऊँचा, अतिविस्तृत तथा सभी समयोंमें फल प्रदान करनेवाला जम्बूवृक्ष है॥ ३०-३१॥<br><br>मेरु पर्वतके चारों ओर इलावृत नामक विस्तृत तथा सुन्दर वर्ष (देश) है। वहाँपर लोग जम्बूफलका आहार करनेवाले हैं और कुछ लोग अमृतका आहार करनेवाले हैं। वहाँके लोग स्वर्णके समान आभावाले तथा अन्य वर्णोंवाले भी हैं और [सब प्रकारके] सुखोंको भोगनेवाले हैं। हे विप्रो! यह द्वीप मेरुके मूलके चारों ओर फैला हुआ, सुन्दर, मध्यमें स्थित, नौ वर्षोंसे युक्त और नदियों-नदों तथा महान् पर्वतोंसे समन्वित है। अब मैं नौ वर्षोंसे युक्त जम्बूद्वीपका यथार्थ वर्णन करूँगा; योजनोंमें इसके विस्तार, मण्डल आदिको [आपलोग] सुनिये॥ ३२-३५॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मेरुगिरिवर्णनं नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मेरुगिरिवर्णन' नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४८॥


उनचासवाँ अध्याय

जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन, वहाँके कुलपर्वतों, नदियों, वनों तथा वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन

सूत उवाच<br>शतमेकं सहस्त्राणां योजनानां स तु स्मृतः।<br>अनुद्वीपं सहस्त्राणां द्विगुणं द्विगुणोत्तरम्॥ १<br><br>पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा ससमुद्रा धरा स्मृता।<br>द्वीपैश्च सप्तभिर्युक्ता लोकालोकावृता शुभा॥ २<br><br>नीलस्तथोत्तरे मेरोः श्वेतस्तस्योत्तरे पुनः।<br>शृङ्गी तस्योत्तरे विप्रास्त्रयस्ते वर्षपर्वताः॥ ३**सूतजी बोले—**यह द्वीप एक लाख योजन विस्तृत कहा गया है। इसके समीपमें स्थित प्लक्ष नामक द्वीप उसका दुगुना है और बादवाले द्वीप क्रमशः दुगुने विस्तारवाले हैं॥ १॥<br><br>समुद्रोंसहित यह पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तृत है। यह सात द्वीपोंसे युक्त, लोकालोक पर्वतसे घिरी हुई तथा [अत्यन्त] सुन्दर है॥ २॥<br><br>हे विप्रो! मेरुके उत्तरमें नील पर्वत, उसके उत्तरमें श्वेत पर्वत और पुनः उसके उत्तरमें शृंगी पर्वत है; वे

२१२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

तीनों वर्षपर्वत हैं॥ ३॥
जठरो देवकूटश्च पूर्वस्यां दिशि पर्वतौ।<br>निषधो दक्षिणे मेरोस्तस्य दक्षिणतो गिरिः।<br>हेमकूट इति ख्यातो हिमवांस्तस्य दक्षिणे॥ ४<br>मेरोः पश्चिमतश्चैव पर्वतौ द्वौ धराधरो।<br>माल्यवान् गन्धमादश्च द्वावेतावुद्गायतो॥ ५इसके पूर्वमें जठर तथा देवकूट पर्वत हैं। मेरुके दक्षिणमें निषध पर्वत है। उसके दक्षिणमें हेमकूट पर्वत कहा गया है और उसके दक्षिणमें हिमवान् पर्वत है। मेरुके पश्चिममें माल्यवान् एवं गन्धमादन नामक दो पर्वत हैं; ये दोनों पर्वत उत्तरकी ओर फैले हुए हैं॥ ४-५॥
एते पर्वतराजानः सिद्धचारणसेविताः।<br>तेषामन्तरविष्कम्भो नवसाहस्रमेकशः॥ ६<br>इदं हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम्।<br>हेमकूटं परं तस्मान्नाम्ना किम्पुरुषं स्मृतम्॥ ७<br>नैषधं हेमकूटात्तु हरिवर्षं तदुच्यते।<br>हरिवर्षात्परं चैव मेरोः शुभमिलावृतम्॥ ८<br>इलावृतात्परं नीलं रम्यकं नाम विश्रुतम्।<br>रम्यात्परतरं श्वेतं विख्यातं तद्धिरण्मयम्॥ ९<br>हिरण्मयात्परं चापि शृङ्गी चैव कुरुः स्मृतः।<br>धनुःसंस्थे तु विज्ञेये द्वे वर्षे दक्षिणोत्तरे॥ १०ये पर्वतराज सिद्धों तथा चारणोंसे सेवित हैं और उनके बीचमें नौ हजार योजनका अन्तर है। हिमवान्‌का वर्ष भारतवर्ष नामवाला कहा गया है; उसके बाद हेमकूट और उसके परे किम्पुरुष वर्ष कहा गया है। हेमकूटसे परे नैषध है, उसके परे हरिवर्ष कहा गया है। हरिवर्ष और मेरुसे परे शुभ इलावृत है। इलावृतसे परे नील एवं रम्यक् कहे गये हैं। रम्यक्‌से परे श्वेत है, उसके परे हिरण्मय नामक वर्ष कहा गया है। हिरण्मयसे परे शृङ्गी पर्वत है और उसके परे कुरुवर्ष कहा गया है। धनुषके आकारवाले इन दोनों वर्षोंको दक्षिण तथा उत्तरमें स्थित जानना चाहिये॥ ६-१०॥
दीर्घाणि तत्र चत्वारि मध्यतस्तदिलावृतम्।<br>मेरोः पश्चिमपूर्वेण द्वे तु दीर्घेतरे स्मृते॥ ११<br>अर्वाक्तु निषधस्याथ वेद्यर्धं चोत्तरं स्मृतम्।<br>वेद्यर्धे दक्षिणे त्रीणि वर्षाणि त्रीणि चोत्तरे॥ १२अन्य चार बड़े वर्ष हैं। मध्यमें इलावृत है। मेरुके पश्चिम-पूर्वमें दो वर्ष हैं, जो छोटे कहे गये हैं। निषधके बाद वेदीका अर्धभाग उत्तर माना गया है, वेदीके अर्ध भागमें दक्षिणमें तीन वर्ष और उत्तर भागमें भी तीन वर्ष माने गये हैं॥ ११-१२॥
तयोर्मध्ये च विज्ञेयं मेरुमध्यमिलावृतम्।<br>दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु॥ १३<br>उद्गायतो महाशैलो माल्यवान्नाम पर्वतः।<br>योजनानां सहस्रे द्वे उपरिष्टात्तु विस्तृतः॥ १४<br>आयामतश्चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि प्रकीर्तितः।नीलके दक्षिण तथा निषधके उत्तरमें उन दोनोंके बीच मेरुके मध्य इलावृतवर्षको जानना चाहिये। माल्यवान् नामक महापर्वत उत्तरकी ओर फैला हुआ है। यह ऊपरकी ओर दो हजार योजन फैला है। इसका आयाम चौंतीस हजार योजन बताया गया है॥ १३-१४ १/२॥
तस्य प्रतीच्यां विज्ञेयः पर्वतो गन्धमादनः॥ १५<br>आयामतः स विज्ञेयो माल्यवानिव विस्तृतः।<br>जम्बूद्वीपस्य विस्तारात्समेन तु समन्ततः॥ १६<br>प्रागायताः सुपर्वाणः षडेते वर्षपर्वताः।<br>अवगाढाश्चोभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ॥ १७उसके पश्चिममें गन्धमादन पर्वतको जानना चाहिये। उसे आयाममें माल्यवान्‌के समान विस्तृत समझना चाहिये। जम्बूद्वीपके विस्तारसे चारों ओर यह पर्वत बराबर फैला है। अच्छे पर्वोंवाले ये छः वर्षपर्वत पूर्वकी ओर फैले हुए हैं और पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्रोंसे दोनों ओरसे बँधे हुए हैं॥ १५-१७॥
हिमप्रायस्तु हिमवान् हेमकूटस्तु हेमवान्।<br>तरुणादित्यसङ्काशो हैरण्यो निषधः स्मृतः॥ १८हिमवान् सदा बर्फसे आच्छादित रहता है। हेमकूट

अध्याय ४९] जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन...वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन [२१३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चतुर्वर्णः स सौवर्णो मेरुश्चोध्र्वायतः स्मृतः।<br>वृत्ताकृतिपरीणाहश्चतुरस्रः समुत्थितः॥ १९<br><br>नीलश्च वैडूर्यमयः श्वेतः शुक्लो हिरण्मयः।<br>मयूरबर्हवर्णस्तु शातकुम्भस्त्रिशृङ्गवान्॥ २०स्वर्णयुक्त है। निषध पर्वत मध्याह्नकालीन सूर्यके समान स्वर्णमय कहा गया है। चार वर्णोंवाला वह सुवर्णमय मेरु पर्वत ऊपरकी ओर फैला हुआ बताया गया है। यह परिधिमें वृत्ताकार है और चौकोर ऊँचा उठा हुआ है। नील पर्वत वैडूर्यमय है। श्वेत पर्वत शुक्लवर्णवाला है एवं स्वर्णसे पूर्ण रहता है। तीन चोटियोंवाला शृंगी पर्वत सुवर्णमय तथा मोरके पंखके रंगका है॥ १८—२०॥
एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्ताः पुनः शृणु गिरीश्वरान्।<br>मन्दरो देवकूटश्च पूर्वस्यां दिशि पर्वतौ॥ २१<br><br>कैलासो गन्धमादश्च हेमवांश्चैव पर्वतौ।<br>पूर्वतश्चायतौवेतावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ २२<br><br>निषधः पारियात्रश्च द्वावेतौ वरपर्वतौ।<br>यथा पूर्वौ तथा याम्यावेतौ पश्चिमतः श्रितौ॥ २३<br><br>त्रिशृङ्गो जारुचिश्चैव उत्तरौ वरपर्वतौ।<br>पूर्वतश्चायतौवेतावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ २४<br><br>मर्यादापर्वतानेतानष्टावाहुर्मनीषिणः ।इस प्रकार पर्वतोंका वर्णन कर दिया गया, अब श्रेष्ठ पर्वतोंके विषयमें सुनिये। मन्दर तथा देवकूट पर्वत पूर्व दिशामें है। कैलास एवं स्वर्णमय गन्धमादन—ये दोनों पर्वत पूर्वकी ओर फैले हुए हैं और उनका अन्त समुद्रके भीतर होता है। निषध तथा पारियात्र—ये दोनों श्रेष्ठ पर्वत पश्चिमसे पूर्व तथा दक्षिणमें स्थित हैं। त्रिशृंग एवं जारुचि—ये दोनों महापर्वत उत्तरमें हैं तथा पूर्वकी ओर फैले हैं और समुद्रके भीतर व्यवस्थित हैं। विद्वान् लोग इन आठों पर्वतोंको मर्यादापर्वत कहते हैं॥ २१—२४ १/२॥
योऽसौ मेरुर्द्विजश्रेष्ठाः प्रांशुः कनकपर्वतः॥ २५<br><br>तस्य पादास्तु चत्वारश्चतुर्दिक्षु नगोत्तमाः।<br>यैर्विष्टब्धा न चलति सप्तद्वीपवती मही॥ २६<br><br>दशयोजनसाहस्रमायामस्तेषु पठ्यते।हे श्रेष्ठ द्विजो! मेरु नामक जो पर्वत है, वह ऊँचा स्वर्णमय पर्वत है। उसके चार चरणोंके रूपमें उसके चारों दिशाओंमें बड़े-बड़े चार उत्तम पर्वत हैं, जिनसे सहारा प्राप्त की हुई सात द्वीपवाली पृथ्वी हिलती नहीं है। उनका आयाम दस हजार योजन कहा गया है॥ २५-२६ १/२॥
पूर्वे तु मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादनः॥ २७<br><br>विपुलः पश्चिमे पार्श्वे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्मृतः।<br>महावृक्षाः समुत्पन्नाश्चत्वारो द्वीपकेतवः॥ २८<br><br>मन्दरस्य गिरेः शृङ्गे महावृक्षः स केतुराट्।<br>प्रलम्बशाखाशिखरः कदम्बश्चैत्यपादपः॥ २९पूर्वमें मन्दर, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिम भागमें विपुल और उत्तरमें सुपार्श्व नामक पर्वत कहा गया है। इनपर चार विशाल वृक्ष उगे हुए हैं, जो द्वीपके पताकातुल्य प्रतीत होते हैं। मन्दर पर्वतकी चोटीपर कदम्बका विशाल वृक्ष है। वह पताकाओंका राजा है और वह लम्बी लटकती हुई शाखाओंवाला है। यह कदम्बवृक्ष चैत्यपादप (पवित्र स्थानमें लगे वृक्ष)-के रूपमें प्रतिष्ठित है॥ २७—२९॥
दक्षिणस्यापि शैलस्य शिखरे देवसेविता।<br>जम्बूः सदा पुण्यफला सदा माल्योपशोभिता॥ ३०<br><br>सकेतुर्दक्षिणे द्वीपे जम्बूर्लोकेषु विश्रुता।<br>विपुलस्यापि शैलस्य पश्चिमे च महात्मनः॥ ३१दक्षिणमें स्थित [गन्धमादन] पर्वतके शिखरपर सदा देवताओंसे सेवित पवित्र फलोंसे सम्पन्न तथा पुष्पोंसे सुशोभित जम्बूवृक्ष है। यह जम्बूवृक्ष दक्षिण द्वीपमें पताकाके रूपमें है और सभी लोकोंमें प्रसिद्ध है॥ ३० १/२॥
२१४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सज्जातः शिखरेऽश्वत्थः स महान् चैत्यपादपः ।<br>सुपार्श्वस्योत्तरस्यापि शृङ्गे जातो महाद्रुमः ॥ ३२<br>न्यग्रोधो विपुलस्कन्धोऽनेकयोजनमण्डलः ।पश्चिममें महात्मा विपुल पर्वतकी चोटीपर पीपलका महान् वृक्ष उगा हुआ है, वह भी चैत्यपादप (पवित्र वृक्ष)-के रूपमें प्रतिष्ठित है। उत्तरमें सुपार्श्व पर्वतके शिखरपर विशाल बरगदका वृक्ष उगा हुआ है, जो मोटे स्कन्धवाला तथा अनेक योजन परिधिवाला है॥ ३१-३२१/२॥
तेषां चतुर्णां वक्ष्यामि शैलेन्द्राणां यथाक्रमम् ॥ ३३<br>अमानुष्याणि रम्याणि सर्वकालर्तुकानि च ।<br>मनोहराणि चत्वारि देवक्रीडनकानि च ॥ ३४<br>वनानि वै चतुर्दिक्षु नामतस्तु निबोधत ।<br>पूर्वे चैत्ररथं नाम दक्षिणे गन्धमादनम् ॥ ३५<br>वैभ्राजं पश्चिमे विद्यादुत्तरे सवितुर्व॑नम् ।<br>मित्रेश्वरं तु पूर्वे तु षष्ठेश्वरमतः परम् ॥ ३६<br>वर्येश्वरं पश्चिमे तु उत्तरे चाम्रकेश्वरम् ।अब मैं चारों महापर्वतोंके चार देवक्रीड़ा-स्थानोंका वर्णन करूँगा; जो मनुष्योंसे रहित, रम्य, सभी काल तथा ऋतुओंमें रहनेवाले एवं मनोहर हैं। वहाँ चारों दिशाओंमें वन हैं। उनके नाम सुनिये। पूर्वमें चैत्ररथ नामक वन, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें वैभ्राज और उत्तरमें सविता (शिव)-के [नन्दन नामक] वनको जानना चाहिये। पूर्वमें मित्रेश्वर, उसके बाद [दक्षिणमें] षष्ठेश्वर, पश्चिममें वर्येश्वर और उत्तरमें आम्रकेश्वर [शिवक्षेत्र] हैं॥ ३३-३६१/२॥
महासरांसि च तथा चत्वारि मुनिपुङ्गवाः ॥ ३७<br>यत्र क्रीडन्ति मुनयः पर्वतेषु वनेषु च।<br>अरुणोदं सरः पूर्वं दक्षिणं मानसं स्मृतम् ॥ ३८<br>सितोदं पश्चिमसरो महाभद्रं तथोत्तरम् ।<br>शाखस्य दक्षिणे क्षेत्रं विशाखस्य च पश्चिमे ॥ ३९<br>उत्तरे नैगमेयस्य कुमारस्य च पूर्वतः ।हे मुनिवरो! वहाँ चार बड़े सरोवर हैं, जहाँ पर्वतों तथा वनोंमें मुनिगण क्रीड़ा करते हैं। पूर्वमें अरुणोदसर, दक्षिणमें मानससर, पश्चिममें सितोदसर और उत्तरमें महाभद्रसर बताया गया है। दक्षिणमें शाखका क्षेत्र, पश्चिममें विशाखका क्षेत्र, उत्तरमें नैगमेयका क्षेत्र और पूर्वमें कुमारका क्षेत्र है॥ ३७-३९१/२॥
अरुणोदस्य पूर्वेण शैलेन्द्रा नामतः स्मृताः ॥ ४०<br>तांस्तु सङ्क्षेपतो वक्ष्ये न शक्यं विस्तरेण तु ।<br>सितान्तश्च कुरण्डश्च कुररश्चाचलोत्तमः ॥ ४१<br>विकरो मणिशैलश्च वृक्षवांश्चाचलोत्तमः ।<br>महानीलोऽथ रोचकः सबिन्दुर्दुरस्तथा ॥ ४२<br>वेणुमांश्च समेघश्च निषधो देवपर्वतः ।<br>इत्येते पर्वतवरा ह्यन्ये च गिरयस्तथा ॥ ४३<br>पूर्वेण मन्दरस्यैते सिद्धावासा उदाहृताः ।<br>तेषु तेषु गिरीन्द्रेषु गुहासु च वनेषु च ॥ ४४<br>रुद्रक्षेत्राणि दिव्यानि विष्णोर्नारायणस्य च।अरुणोदसरके पूर्वमें महापर्वत बताये गये हैं। मैं संक्षेपमें नामोंसे उनका वर्णन करूँगा; विस्तारपूर्वक उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। सितान्त, कुरण्ड, पर्वतश्रेष्ठ कुरर, विकर, मणिशैल, पर्वतश्रेष्ठ वृक्षवान्, महानील, रोचक, सबिन्दु, दर्दुर, वेणुमान्, समेघ, निषध, देवपर्वत—ये महापर्वत हैं; इसी प्रकार अन्य भी पर्वत हैं। मन्दरके पूर्वमें ये पर्वत सिद्धोंके निवासस्थान कहे गये हैं। उन-उन पर्वतोंपर, गुफाओंमें तथा वनोंमें रुद्र एवं नारायण विष्णुके दिव्य क्षेत्र हैं॥ ४०-४४१/२॥
सरसो मानसस्येह दक्षिणेन महाचलाः ॥ ४५<br>ये कीर्त्यमानास्तान् सर्वान् सङ्क्षिप्य प्रवदाम्यहम् ।<br>शैलश्च विशिराश्चैव शिखरश्चाचलोत्तमः ॥ ४६<br>एकशृङ्गो महाशूलो गजशैलः पिशाचकः ।<br>पञ्चशैलोऽथ कैलासो हिमवांश्चाचलोत्तमः ॥ ४७यहाँ मानससरके दक्षिणमें जो महान् पर्वत कहे जाते हैं, अब मैं संक्षेपमें उन सबका वर्णन करता हूँ। शैल, विशिर, पर्वतोंमें उत्तम शिखर, एकशृंग, महाशूल, गजशैल, पिशाचक, पंचशैल, कैलास, पर्वतश्रेष्ठ हिमवान्—

अध्याय ४९ ] जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन...वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन २१५

SanskritHindi
इत्येते देवचरिता उत्कटाः पर्वतोत्तमाः।<br>तेषु तेषु च सर्वेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ ४८<br>रुद्रक्षेत्राणि दिव्यानि स्थापितानि सुरोत्तमैः।<br>दिग्भागे दक्षिणे प्रोक्ताः पश्चिमे च वदामि वः ॥ ४९<br>अपरेण सितोदश्च सुरपश्च महाबलः।<br>कुमुदो मधुमांश्चैव ह्यञ्जनो मुकुटस्तथा ॥ ५०<br>कृष्णाश्च पाण्डुरश्चैव सहस्रशिखरश्च यः।<br>पारिजातश्च शैलेन्द्रः श्रीशृङ्गश्चाचलोत्तमः ॥ ५१<br>इत्येते देवचरिता उत्कटाः पर्वतोत्तमाः।<br>सर्वे पश्चिमदिग्भागे रुद्रक्षेत्रसमन्विताः ॥ ५२ये सब देवताओंके द्वारा सेवित, उत्कट तथा उत्तम पर्वत हैं। उन-उन सभी पर्वतोंपर और वनोंमें श्रेष्ठ देवताओंके द्वारा दिव्य रुद्रक्षेत्र स्थापित किये गये हैं। इस प्रकार दक्षिण दिशामें स्थित पर्वतोंको बता दिया गया, अब मैं आपलोगोंको पश्चिममें विद्यमान पर्वतोंको बताता हूँ ॥ ४८–४९ ॥<br><br>सितोदके पश्चिममें सुरप, महाबल, कुमुद, मधुमान्, अंजन, मुकुट, कृष्ण, पाण्डुर, सहस्रशिखर, शैलेन्द्र, पारिजात और पर्वतोंमें उत्तम श्रीशृंग हैं। ये सभी उत्कट तथा उत्तम पर्वत पश्चिम दिशामें हैं, जो देवताओंके द्वारा सेवित हैं और रुद्रक्षेत्रोंसे युक्त हैं ॥ ५०–५२ ॥
महाभद्रस्य सरसश्चोत्तरे च महाबलाः।<br>ये स्थिताः कीर्त्यमानांस्तान् सङ्‌क्षिप्येह निबोधत ॥ ५३<br>शङ्खकूतो महाशैलो वृषभो हंसपर्वतः।<br>नागश्च कपिलश्चैव इन्द्रशैलश्च सानुमान् ॥ ५४<br>नीलः कण्टकशृङ्गश्च शतशृङ्गश्च पर्वतः।<br>पुष्पकोशः प्रशैलश्च विरजश्चाचलोत्तमः ॥ ५५<br>वराहपर्वतश्चैव मयूरश्चाचलोत्तमः।<br>जारुधिश्चैव शैलेन्द्र एत उत्तरसंस्थिताः ॥ ५६<br>तेषु शैलेषु दिव्येषु देवदेवस्य शूलिनः।<br>असंख्यातानि दिव्यानि विमानानि सहस्रशः ॥ ५७महाभद्रसरके उत्तरमें जो शक्तिशाली पर्वत स्थित हैं, मैं उनका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ, आपलोग सुनिये। शंखकूट, महाशैल, वृषभ, हंसपर्वत, नाग, कपिल, इन्द्रशैल, सानुमान्, नील, कण्टकश्रृंग, पर्वत शतश्रृंग, पुष्पकोश, प्रशैल, पर्वतश्रेष्ठ विरज, वराहपर्वत, पर्वतश्रेष्ठ मयूर तथा शैलराज जारुधि—ये सब उत्तरमें स्थित हैं। उन दिव्य पर्वतोंपर देवदेव शिवके असंख्य दिव्य विमान हैं ॥ ५३–५७ ॥
एतेषां शैलमुख्यानामन्तरेषु यथाक्रमम्।<br>सन्ति चैवान्तरद्रोण्यः सरांस्युपवनानि च ॥ ५८<br>वसन्ति देवा मुनयः सिद्धाश्च शिवभाविताः।<br>कृतवासाः सपत्नीकाः प्रसादात्परमेष्ठिनः ॥ ५९<br>लक्ष्म्याद्यानां बिल्ववने ककुभे कश्यपादयः।<br>तथा तालवने प्रोक्तमिन्द्रोपेन्द्रोरगात्मनाम् ॥ ६०<br>उदुम्बरे कर्दमस्य तथान्येषां महात्मनाम्।<br>विद्याधराणां सिद्धानां पुण्ये त्वाम्रावने शुभे ॥ ६१<br>नागानां सिद्धसङ्घानां तथा निम्बवने स्थितिः।<br>सूर्यस्य किंशुकवने तथा रुद्रगणस्य च ॥ ६२<br>बीजपूरवने पुण्ये देवाचार्यो व्यवस्थितः।<br>कौमुदे तु वने विष्णुप्रमुखानां महात्मनाम् ॥ ६३इन प्रमुख पर्वतोंके भीतर झरने, सरोवर तथा उपवन यथाक्रम स्थित हैं। यहाँ परमेष्ठी शिवकी कृपासे देवता, मुनि एवं सिद्ध शिवभक्तिसे युक्त होकर अपने निवासस्थान बनाकर पत्नियोंके साथ रहते हैं। लक्ष्मी आदिका निवास बिल्ववनमें है। कश्यप आदि ककुभ वनमें रहते हैं। इन्द्र, उपेन्द्र तथा श्रेष्ठ सर्पोंका निवास तालवनमें कहा गया है। कर्दम और अन्य महात्माओंका निवास उदुम्बरवनमें, विद्याधरों तथा सिद्धोंका निवास पवित्र एवं सुन्दर आम्रवनमें और नागों तथा सिद्धगणोंका निवास निम्बवनमें है। सूर्य तथा रुद्रगणोंका निवास किंशुकवनमें है। देवताओंके आचार्य पुण्यमय बीजपूरवन (बिजौरा नींबूका वन)-में निवास करते हैं। विष्णु आदि महात्माओंका वास कौमुद वनमें है ॥ ५८–६३ ॥
स्थलपद्मवनान्तस्थन्यग्रोधेऽशेषभोगिनः ।<br>शेषस्त्वशेषजगतां पतिरास्तेऽतिगर्वितः ॥ ६४सर्पगण स्थलपद्मवनके अन्दर स्थित न्यग्रोधवनमें रहते हैं और जो सम्पूर्ण जगत्‌के पति गर्वित शेषनाग हैं,

५०- भुवनविन्यासमें विभिन्न कुलाचल पर्वतोंपर रहनेवाली देवयोनियों आदिका वर्णन

२१६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| स एव जगतां कालः पाताले च व्यवस्थितः।<br>विष्णोर्विश्वगुरोमूर्त्तिर्दिव्यः साक्षाद्धलायुधः॥ ६५॥<br><br>शयनं देवदेवस्य स हरेः कङ्कणं विभोः।<br>वने पनसवृक्षाणां सशुक़ा दानवादयः॥ ६६॥<br><br>किन्नरैरुरगाश्चैव विशाखकवने स्थिताः।<br>मनोहरवने वृक्षाः सर्वकोटिसमन्विताः॥ ६७॥<br><br>नन्दीश्वरो गणवरैः स्तूयमानो व्यवस्थितः।<br>सन्तानकस्थलीमध्ये साक्षाद्देवी सरस्वती॥ ६८॥<br><br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्ता वनेषु वनवासिनः।<br>असंख्याता मयाप्यत्र वक्तुं नो विस्तरेण तु॥ ६९॥ | वे पातालमें रहते हैं; वे ही समस्त लोकोंके काल हैं। वे विश्वगुरु विष्णुकी दिव्य मूर्ति हैं, साक्षात् हलायुध हैं, देवदेव विष्णुकी शय्या हैं और प्रभु शिवके कंकण (कंगन)-स्वरूप हैं॥ ६४-६५ १/२ ॥<br><br>दानव आदि शुक्राचार्यके साथ कटहलके वृक्षोंके वनमें और सभी उरग किन्नरोंके साथ विशाखवन (नारिकेलवन)-में रहते हैं। विविध प्रकारकी जातियोंवाले वृक्ष उस मनोहरवनमें हैं। नन्दीश्वर भी श्रेष्ठ गणोंके द्वारा स्तुत होते हुए वहाँ विराजमान हैं। सन्तानक (कल्पवृक्ष) क्षेत्रके मध्यमें साक्षात् सरस्वती देवी रहती हैं॥ ६६-६८॥<br><br>[हे विप्रो!] इस प्रकार मैंने इन वनोंमें निवास करनेवाले लोगोंका संक्षेपमें वर्णन किया; ये असंख्य हैं, विस्तारपूर्वक इनका वर्णन करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ॥ ६९॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे जम्बूद्वीपवर्णनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'जम्बूद्वीपवर्णन' नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥


पचासवाँ अध्याय

भुवनविन्यासमें विभिन्न कुलाचल पर्वतोंपर रहनेवाली देवयोनियों आदिका वर्णन

| सूत उवाच<br>शितान्तशिखरे शक्रः पारिजातवने शुभे।<br>तस्य प्राच्यां कुमुदाद्रिकूटोऽसौ बहुविस्तरः॥ १॥<br>अष्टौ पुराप्युदीर्णानि दानवानां द्विजोत्तमाः।<br>सुवर्णकोटरे पुण्ये राक्षसानां महात्मनाम्॥ २॥<br>नीलकानां पुराण्याहुरष्टषष्टिर्द्विजोत्तमाः।<br>महानीलेऽपि शैलेन्द्रे पुराणि दश पञ्च च॥ ३॥<br>हयाननानां मुख्यानां किन्नराणां च सुव्रताः।<br>वेणुसौधे महाशैले विद्याधरपुरत्रयम्॥ ४॥<br>वैकुण्ठे गरुडः श्रीमान् करञ्जे नीललोहितः।<br>वसुधारे वसूनां तु निवासः परिकीर्तितः॥ ५॥<br>रत्नधारे गिरिवरे सप्तर्षीणां महात्मनाम्।<br>सप्तस्थानानि पुण्यानि सिद्धावासयुतानि च॥ ६॥<br>महत्प्रजापतेः स्थानमेकशृङ्गे नगोत्तमे।<br>गजशैले तु दुर्गाद्याः सुमेधे वसवस्तथा॥ ७॥ | सूतजी बोले—इन्द्र शितान्तके शिखरपर विद्यमान सुन्दर पारिजातवनमें रहते हैं। उसके पूर्वमें कुमुदपर्वतकी चोटी है, वह बहुत विस्तृत है। हे श्रेष्ठ द्विजो! वहाँ दानवोंके आठ पुर कहे गये हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो! पवित्र सुवर्णकोटरमें नीलक नामक महान् राक्षसोंके अड़सठ पुर बताये गये हैं॥ १-२ १/२ ॥<br><br>हे सुव्रतो! पर्वतश्रेष्ठ महानीलपर भी घोड़ेके समान मुखवाले प्रधान किन्नरोंके पन्द्रह पुर हैं और महान् पर्वत वेणुसौधपर विद्याधरोंके तीन पुर हैं॥ ३-४॥<br><br>श्रीमान् गरुड़ वैकुण्ठ पर्वतपर और नीललोहित रुद्र करंज पर्वतपर निवास करते हैं। वसुओंका निवास वसुधारमें बताया गया है। गिरिश्रेष्ठ रत्नधारपर महात्मा सप्तर्षियोंके सात पवित्र स्थान हैं, जो सिद्धोंके वाससे युक्त हैं॥ ५-६॥<br><br>पर्वतोंमें उत्तम एकशृंग पर्वतपर प्रजापतिका महान् आवास है। गजशैलपर दुर्गा आदि तथा सुमेधपर वसुगण |

अध्याय ५०] भुवनविन्यासमें विभिन्न कुलाचल पर्वतोंपर रहनेवाली देवयोनियों आदिका वर्णन २१७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आदित्याश्च तथा रुद्राः कृतावासास्तथाश्विनौ ।<br>अशीतिर्देवपुर्यस्तु हेमकक्षे नगोत्तमे ॥ ८<br>सुनीले रक्षसां वासाः पञ्चकोटिशतानि च ।<br>पञ्चकूटे पुराण्यासन् पञ्चकोटिप्रमाणतः ॥ ९<br>शतशृङ्गे पुरशतं यक्षाणाममितौजसाम् ।<br>ताम्राभे काद्रवेयाणां विशाखे तु गुहस्य वै ॥ १०रहते हैं। पर्वतोंमें उत्तम हेमकक्ष पर्वतपर अस्सी देवपुरियाँ हैं, वहाँ आदित्यगण, रुद्रगण तथा दोनों अश्विनीकुमार निवास करते हैं ॥ ७-८॥<br>सुनील पर्वतपर राक्षसोंके पाँच सौ करोड़ निवासस्थान हैं। पंचकूटपर पाँच करोड़ पुर हैं। शतशृंगपर अमित तेजस्वी यक्षोंके सौ पुर हैं। ताम्राभ पर्वतपर काद्रवेयोंका और विशाख पर्वतपर गुहका निवासस्थान है ॥ ९-१०॥
श्वेतोदरे मुनिश्रेष्ठाः सुपर्णस्य महात्मनः ।<br>पिशाचके कुबेरस्य हरिकूटे हरेर्गृहम् ॥ ११हे श्रेष्ठ मुनियो ! श्वेतोदर पर्वतपर महात्मा सुपर्णका, पिशाचकपर कुबेरका और हरिकूटपर विष्णुका आवास है ॥ ११ ॥
कुमुदे किन्नरावासस्त्वञ्जने चारणालयः ।<br>कृष्णे गन्धर्वनिलयः पाण्डुरे पुरसप्तकम् ॥ १२<br>विद्याधराणां विप्रेन्द्रा विश्वभोगसमन्वितम् ।<br>सहस्रशिखरे शैले दैत्यानामुग्रकर्मणाम् ॥ १३<br>पुराणां तु सहस्राणि सप्तशक्रारिणां द्विजाः ।<br>मुकुटे पन्नगावासः पुष्पकेतौ मुनीश्वराः ॥ १४<br>वैवस्वतस्य सोमस्य वायोर्नागाधिपस्य च ।<br>तक्षकै चैव शैलेन्द्रे चत्वार्यायतनानि च ॥ १५कुमुद पर्वतपर किन्नरोंका आवास है। अंजन पर्वतपर चारणोंका निवासस्थान है। कृष्णपर्वतपर गन्धर्वोंका निवासस्थान है। हे श्रेष्ठ विप्रो ! पाण्डुर पर्वतपर विद्याधरोंके सात पुर हैं, जो सभी प्रकारके भोगोंसे युक्त हैं। हे द्विजो ! सहस्रशिखर पर्वतपर भयानक कर्मवाले इन्द्रशत्रु दैत्योंके सात हजार पुर हैं। हे मुनीश्वरो ! पुष्पकेतु मुकुट पर्वतपर पन्नगोंका आवास है। वैवस्वत, सोम, वायु और नागाधिपतिके चार निवासस्थान शैलराज तक्षकपर हैं ॥ १२-१५ ॥
ब्रह्मेन्द्रविष्णुरुद्राणां गुहस्य च महात्मनः ।<br>कुबेरस्य च सोमस्य तथान्येषां महात्मनाम् ॥ १६<br>सन्त्यायतनमुख्यानि मर्यादापर्वतेष्वपि ।<br>श्रीकण्ठाद्रिगुहावासी सर्वावासः सहोमया ॥ १७<br>श्रीकण्ठस्याधिपत्यं वै सर्वदेवेश्वरस्य च ।<br>अण्डस्यास्य प्रवृत्तिस्तु श्रीकण्ठेन न संशयः ॥ १८ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, महात्मा गुह, कुबेर, सोम तथा अन्य महात्माओंके मुख्य निवासस्थान मर्यादा-पर्वतोंपर हैं। सर्वव्यापी शिव [भगवती] उमाके साथ श्रीकण्ठपर्वतकी गुफामें निवास करते हैं। सभी देवताओंके ईश्वर शिवका आधिपत्य श्रीकण्ठ पर्वतपर है। इस ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति श्रीकण्ठसे ही हुई है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १६-१८ ॥
अनन्तेशादयस्त्वेवं प्रत्येकं चाण्डपालकाः ।<br>चक्रवर्तिन इत्युक्तास्ततो विघ्नेश्वरास्त्विह ॥ १९<br>श्रीकण्ठाधिष्ठितान्यत्र स्थानानि च समासतः ।<br>मर्यादापर्वतेष्वद्य शृण्वन्तु प्रवदाम्यहम् ॥ २०<br>श्रीकण्ठाधिष्ठितं विश्वं चराचरमिदं जगत् ।<br>कालाग्निशिवपर्यन्तं कथं वक्ष्ये सविस्तरम् ॥ २१अनन्त, ईश आदि इनमेंसे प्रत्येक देवता ब्रह्माण्ड रक्षक हैं, अतः वे चक्रवर्ती तथा विघ्नेश्वर कहे गये हैं। अब मैं मर्यादापर्वतोंपर श्रीकण्ठसे अधिष्ठित स्थानोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ, आपलोग सुनिये। मैं श्रीकण्ठसे अधिष्ठित कालाग्निशिवपर्यन्त इस सम्पूर्ण चराचर जगत्‌का विस्तारपूर्वक वर्णन कैसे कर सकता हूँ ? ॥ १९-२१ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनविन्यासोद्देशस्थानवर्णनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनविन्यासोद्देशस्थानवर्णन' नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५० ॥

५१- दिव्य भूतवनमें महादेवके निवासस्थानका वर्णन, कैलास तथा वहाँकी पवित्र नदियोंका वर्णन

२१८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

इक्यावनवाँ अध्याय

दिव्य भूतवनमें महादेवके निवासस्थानका वर्णन, कैलास तथा वहाँकी पवित्र नदियोंका वर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—
देवकूटे गिरौ मध्ये महाकूटे सुशोभने।<br>हेमवैदूर्यमाणिक्यनीलगोमेदकान्तिभिः ॥ १<br>तथान्यैर्मणिमुख्यैश्च निर्मिते निर्मले शुभे।<br>शाखाशतसहस्राढ्ये सर्वद्रुमविभूषिते ॥ २<br>चम्पकाशोकपुन्नागबकुलासनमण्डिते ।<br>पारिजातकसम्पूर्णे नानापक्षिगणान्विते ॥ ३<br>नैकधा तु शतैश्चित्रे विचित्रकुसुमाकुले।<br>नितम्बपुष्पसालम्बे नैकसत्त्वगणान्विते ॥ ४<br>विमलस्वादुपानीये नैकप्रस्रवणैर्युते।<br>निर्झरैः कुसुमाकीर्णैरनेकैश्र्च विभूषिते ॥ ५<br>पुष्पोडुपवहाभिश्च स्रवन्तीभिरलङ्कृते।<br>स्निग्धवर्णं महामूलमनेकस्कन्धपादपम्॥ ६<br>रम्यं ह्यविरलच्छायं दशयोजनमण्डलम्।<br>तत्र भूतवनं नाम नानाभूतगणालयम्॥ ७बड़ी-बड़ी चोटियोंवाले, अत्यन्त सुन्दर, स्वर्ण-वैदूर्य, माणिक्य-नीलम-गोमेद तथा अन्य बहुमूल्य मणियोंसे निर्मित, स्वच्छ, पवित्र, सौ हजार शाखाओंसे युक्त, सभी प्रकारके वृक्षोंसे मण्डित, चम्पक-अशोक-पुन्नाग-बकुल तथा असनसे विभूषित, पारिजातसे परिपूर्ण, अनेक प्रकारके पक्षियोंसे भरे हुए, सैकड़ों प्रकारके धातुओंसे चित्रित, अद्भुत पुष्पोंसे युक्त, नीचेतक लटकती हुई पुष्प-शाखाओंसे युक्त नितम्बवाले, नानाविध पशु-समूहोंसे भरे हुए, अनेक धाराओंसे युक्त, स्वच्छ तथा स्वादिष्ट जलवाले, अनेकविध पुष्पोंसे भरे हुए निर्झरोंसे विभूषित और बहती हुई धाराओं तथा उनमें तैरते हुए पुष्पगुच्छोंसे सुशोभित देवकूट पर्वतपर उसके मध्यमें मनोहर वर्णवाला, गहरी जड़ों तथा अनेक स्कन्धोंसे युक्त वृक्षोंवाला, मनोहर, घनी छायावाला, दस योजन मण्डल (परिधि)-वाला तथा अनेक भूतगणोंके निवासस्थानोंसे समन्वित भूतवन नामक वन है॥ १—७॥
महादेवस्य देवस्य शङ्करस्य महात्मनः।<br>दीप्तमायतनं तत्र महामणिविभूषितम् ॥ ८<br>हेमप्राकारसंयुक्तं मणितोरणमण्डितम्।<br>स्फाटिकैश्च विचित्रैश्च गोपुरैश्च समन्वितम् ॥ ९<br>सिंहासनैर्मणिमयैः शुभास्तरणसंयुतैः।<br>क्षितावितस्ततः सम्यक् शर्वेणाधिष्ठितैः शुभैः ॥ १०<br>अम्लानमालानिचितैर्नानावर्णैर्गृहोत्तमैः ।<br>मण्डपैः सुविचित्रैस्तु स्फाटिकस्तम्भसंयुतैः ॥ ११<br>संयुतं सर्वभूतैन्द्रैर्ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रपूजितैः।<br>वराहगजसिंहर्क्षशार्दूलकरभाननैः ॥ १२<br>गृध्रोलूकमुलैश्चान्यैर्मृगोष्ट्राजमुखैरपि ।<br>प्रमथैर्विविधैः स्थूलैर्गिरिकूटोपमैः शुभैः ॥ १३<br>करालैर्हरिकेशैश्च रोमशैश्च महाभुजैः।<br>नानावर्णाकृतिधरैर्नानासंस्थानसंस्थितैः ॥ १४वहाँ महादेव महात्मा भगवान् शंकरका कान्तिमान् निवासस्थान है। वह महामणियोंसे विभूषित; स्वर्णकी चहारदीवारीसे युक्त; मणिमय तोरणोंसे मण्डित; स्फटिकके बने हुए विचित्र गोपुरोंसे युक्त; भूमिपर इधर-उधर शुभ आस्तरणोंसे ढके हुए, शिवजीके द्वारा अधिष्ठित, सुन्दर तथा मणिमय सिंहासनोंसे युक्त; कभी न मुरझानेवाले अनेक रंगके फूलोंसे विभूषित उत्तम भवनोंसे युक्त; स्फटिकके स्तम्भोंवाले अत्यन्त विचित्र मण्डपोंसे समन्वित; ब्रह्मा, इन्द्र तथा उपेन्द्रके द्वारा पूजित सभी भूतगणोंसे संयुक्त; वराह-गज-सिंह-ऋक्ष-शार्दूल, करभ, गीध, उल्लू-मृग-उष्ट्र तथा अजके समान मुखवाले, पर्वतके शिखरके समान स्थूल, सुन्दर, भयानक सिंहके समान केशों तथा रोमोंवाले, बड़ी भुजाओंवाले, अनेक वर्ण

अध्याय ५१ ] दिव्य भूतवनमें महादेवके निवासस्थानका वर्णन २१९


श्लोकअर्थ
दीप्तास्यैर्दीप्तचरितैर्नन्दीश्वरमुखैः शुभैः।<br>ब्रह्मेन्द्रविष्णुसङ्काशैरणिमादिगुणान्वितैः ॥ १५<br><br>अशून्यममरैर्नित्यं महापार्षदैस्तथा।<br>तत्र भूतपतेर्देवाः पूजां नित्यं प्रयुञ्जते ॥ १६तथा आकारवाले, विभिन्न आसनोंसे बैठे हुए प्रभामय मुखवाले, भव्य चरितवाले, ब्रह्मा-इन्द्र-विष्णुके तुल्य प्रतीत होनेवाले तथा अणिमा आदि गुणोंसे समन्वित नन्दीश्वर आदि विविध प्रमथोंसे सुशोभित; देवताओं तथा महापार्षदोंसे नित्य परिपूर्ण रहता है। वहाँ देवतालोग भूतपति शिवकी नित्य पूजा करते हैं॥ ८—१६॥
झर्झरैः शङ्खपटहैर्भेरीडिण्डिमगोमुखैः।<br>ललितावासितोद्गीतैर्नृत्तवल्गितगर्जितैः ॥ १७<br><br>पूजितो वै महादेवः प्रमथैः प्रमथेश्वरः।<br>सिद्धर्षिदेवगन्धर्वैर्ब्रह्मणा च महात्मना ॥ १८<br><br>उपेन्द्रप्रमुखैश्चान्यैः पूजितस्तत्र शङ्करः।<br>विभक्तचारुशिखरं यत्र तच्छङ्खवर्चसम् ॥ १९प्रमथगण झाँझ, शंख, पटह, भेरी, डिण्डिम तथा गोमुख (वाद्ययन्त्रों)-द्वारा, ललित तथा मधुरगानोंके द्वारा, नाचने-कूदने तथा गर्जन-ध्वनिके द्वारा प्रमथपति महादेवकी पूजा करते हैं। वहाँ सिद्ध, ऋषि, देवता, गन्धर्व, महात्मा ब्रह्मा, उपेन्द्र आदि तथा अन्य लोग शंकरकी पूजा करते हैं। जहाँ शंकरकी पूजा होती है, वह सुन्दर शिखर दो भागोंमें बँटा हुआ तथा शंखके समान कान्तिमान् प्रतीत होता है॥ १७-१९॥
कैलासो यक्षराजस्य कुबेरस्य महात्मनः।<br>निवासः कोटियक्षाणां तथान्येषां महात्मनाम् ॥ २०<br><br>तत्रापि देवदेवस्य भवस्यायतनं महत्।<br>तस्मिन्नायतने सोमः सदास्ते सगणो हरः ॥ २१<br><br>यत्र मन्दाकिनी नाम नलिनी विपुलोदका।<br>सुवर्णमणिसोपाना कुबेरशिखरे शुभे ॥ २२<br><br>जाम्बूनदमयैः पद्मैर्गन्धस्पर्शगुणान्वितैः।<br>नीलवैडूर्यपत्रैश्च गन्धोपेतैर्महोत्पलैः ॥ २३<br><br>तथा कुमुदखण्डैश्च महापद्मैरलङ्कृत।<br>यक्षगन्धर्वनारीभिरप्सरोभिश्च सेविता ॥ २४<br><br>देवदानवगन्धर्वैर्यक्षराक्षसकिन्नरैः ।<br>उपस्पृष्टजला पुण्या नदी मन्दाकिनी शुभा ॥ २५कैलास यक्षोंके राजा महात्मा कुबेरका, करोड़ों यक्षोंका तथा अन्य महात्माओंका निवासस्थान है। वहाँ देवाधिदेव शिवका विशाल भवन है। शिवजी उस भवनमें उमा तथा [अपने] गणोंके साथ सदा विराजमान रहते हैं। वहाँ कुबेरके सुन्दर शिखरपर बहुत जलसे भरी हुई सोने तथा मणियोंसे निर्मित सीढ़ियोंवाली और कुमुदपुष्पोंसे युक्त मन्दाकिनी नामक नदी है। वह पुण्यदायिनी तथा पवित्र मन्दाकिनी नदी गन्ध-स्पर्शगुणोंसे युक्त सुवर्णमय कमलों, नील वैडूर्यके पत्तों, गन्धयुक्त विशाल उत्पलों और कुमुदों तथा महापद्मोंसे अलंकृत; यक्षों तथा गन्धर्वोंकी स्त्रियों और अप्सराओंसे सेवित एवं देवता-दानव-गन्धर्व-यक्ष-राक्षस-किन्नरोंके द्वारा उपस्पृष्ट (स्नान-पानके लिये उपयुक्त) जलवाली है॥ २०-२५॥
तस्याश्चोत्तरपार्श्वे तु भवस्यायतनं शुभम्।<br>वैडूर्यमणिसम्पन्नं तत्रास्ते शङ्करोऽव्ययः ॥ २६<br><br>द्विजाः कनकनन्दायास्तीरे वै प्राचिदक्षिणे।<br>वनं द्विजसहस्त्राढ्यं मृगपक्षिसमाकुलम् ॥ २७<br><br>तत्रापि सगणः साम्बः क्रीडतेऽद्रिसमे गृहे।<br>नन्दायाः पश्चिमे तीरे किञ्चिद्वै दक्षिणाश्रिते ॥ २८उसके उत्तरभागमें शिवजीका वैडूर्यमणिनिर्मित सुन्दर भवन है, वहाँ अविनाशी शंकर निवास करते हैं। हे द्विजो! उसके पूर्व-दक्षिणमें कनकनन्दाके तटपर हजारों द्विजोंसे सेवित और पशुओं तथा पक्षियोंसे भरा हुआ एक वन है। वहाँ भी कैलासपुल्य भवनमें शिवजी उमा तथा गणोंके साथ क्रीड़ा करते हैं॥ २६-२७ १/२॥<br><br>नन्दाके पश्चिमी तटपर थोड़ी दूर दक्षिणमें अनेक

५२- विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन, केतुमाल, कुरुवर्ष, भारतवर्ष, किम्पुरुष आदि वर्षोंमें रहनेवाले लोगों तथा उनकी लोकवृत्तिका वर्णन

२२०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
पुरं रुद्रपुरी नाम नानाप्रासादसङ्कुलम्।<br>तत्रापि शतधा कृत्वा ह्यात्मानं चाम्बया सह॥ २९<br>क्रीडते सगणः साम्बस्तच्छिवालयमुच्यते।<br>एवं शतसहस्राणि शर्वस्यायतनानि तु॥ ३०<br>प्रतिद्वीपे मुनिश्रेष्ठाः पर्वतेषु वनेषु च।<br>नदीनदतटाकानां तीरेष्वर्णवसन्धिषु॥ ३१महलोंसे युक्त रुद्रपुरी नामक नगर है। वहाँ भी शिवजी सैकड़ों रूप धारण करके उमा तथा गणोंके साथ क्रीड़ा करते हैं, उसे शिवालय कहा जाता है। इस प्रकार हे मुनिश्रेष्ठो! प्रत्येक द्वीपमें पर्वतोंपर, वनोंमें, नदी-नद-सरोवरोंके तटोंपर और समुद्रोंके संगमोंपर भगवान् शिवके सैकड़ों-हजारों निवासस्थान हैं॥ २८-३१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विविधद्वीपशोभावर्णनं नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विविधद्वीपशोभावर्णन' नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥


बावनवाँ अध्याय

विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन, केतुमाल, कुरुवर्ष, भारतवर्ष, किम्पुरुष आदि वर्षोंमें रहनेवाले लोगों तथा उनकी लोकवृत्तिका वर्णन

सूत उवाच<br>नद्यश्च बहवः प्रोक्ताः सदा बहुजलाः शुभाः।<br>सरोवरेभ्यः सम्भूतास्त्वसंख्याता द्विजोत्तमाः॥ १<br><br>प्राङ्मुखा दक्षिणास्यास्तु चोत्तरप्रभवाः शुभाः।<br>पश्चिमाग्राः पवित्राश्च प्रतिवर्षं प्रकीर्तिताः॥ २<br><br>आकाशाम्भवनिधैर्योऽसौ सोम इत्यभिधीयते।<br>आधारः सर्वभूतानां देवानाममृताकरः॥ ३<br><br>अस्मात्प्रवृत्ता पुण्योदा नदी त्वाकाशगामिनी।<br>सप्तमेनानिलपथा प्रवृत्ता चामृतोदका॥ ४<br><br>सा ज्योतींष्यनुवर्तन्ती ज्योतिर्गणनिषेविता।<br>ताराकोटिसहस्राणां नभसश्च समायुता॥ ५<br><br>परिवर्तत्यहरहो यथा सोमस्तथैव सा।<br>चत्वार्यशीतिश्च तथा सहस्राणां समुच्छ्रितः॥ ६<br><br>योजनानां महामेरुः श्रीकण्ठाक्रीडकोमलः।<br>तत्रासीनो यतः शर्वः साम्बः सह गणेश्वरैः॥ ७<br><br>क्रीडते सुचिरं कालं तस्मात्पुण्यजला शिवा।<br>गिरिं मेरुं नदी पुण्या सा प्रयाति प्रदक्षिणम्॥ ८<br><br>विभज्यमानसलिला सा जवेनानिलेन च।<br>मेरोरन्तरकूटेषु निपपात चतुर्ष्वपि॥ ९सूतजी बोले—हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! प्रत्येक वर्षमें सदा विपुल जलसे भरी हुई बहुत-सी असंख्य पवित्र नदियाँ बतायी गयी हैं, वे सरोवरोंसे निकली हुई हैं। वे पवित्र नदियाँ पूर्वकी ओर, दक्षिणकी ओर, उत्तरकी ओर तथा पश्चिमकी ओर प्रवाहित होनेवाली कही गयी हैं॥ १-२॥<br><br>आकाशमें जो जलसागर है, उसे सोम कहा जाता है। वह सभी प्राणियोंका आधार तथा देवताओंके लिये अमृतका भण्डार है; इससे निकली हुई पुण्य जलवाली नदी आकाशमें बहती है। सातवें वायुमार्गसे प्रवृत्त यह अमृतमय जलवाली नदी ज्योतिरूप गणोंके बीच प्रवाहित होती है। यह आकाशके हजारों-करोड़ों ताराओंसे घिरी हुई है। यह चन्द्रमाकी भाँति प्रतिदिन चारों ओर प्रवाहित होती रहती है॥ ३-५ १/२॥<br><br>महामेरु चौरासी हजार योजन ऊँचा है, वह भगवान् श्रीकण्ठका कोमल क्रीड़ास्थल है। वहाँ शिवजी उमा तथा गणेश्वरोंके साथ विराजमान रहते हैं और दीर्घकालतक क्रीड़ा करते हैं, अतः वह पवित्र जलवाली तथा कल्याणकारिणी है। वह पुण्यदायिनी नदी मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा करती है॥ ६-८॥<br><br>वायुके वेगके कारण विभाजित होते हुए जलवाली वह नदी मेरुके अन्तर्गत चारों कूटोंमें प्रवाहित होती है। सभी पर्वतोंको विभागपूर्वक सभी ओरसे लाँघकर वह

अध्याय ५२] विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन २२१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
समन्तात्समतिक्रम्य सर्वान्‍द्रीन् प्रविभागशः।<br>नियोगाद्देवदेवस्य प्रविष्टा सा महार्णवम्॥ १०<br>अस्या विनिर्गता नद्यः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>सर्वद्वीपद्रिवर्षेषु बहवः परिकीर्तिताः॥ ११<br>क्षुद्रनद्यस्त्वसंख्याता गङ्गा यद्गां गताम्बरात्।देवदेव शिवके आदेशसे महासागरमें प्रवेश करती है। इससे निकली हुई सैकड़ों-हजारों अनेक नदियाँ कही गयी हैं, जो सभी द्वीपों, पर्वतों तथा देशोंमें हैं। छोटी नदियाँ तो असंख्य हैं; गंगा आकाशसे पृथ्वीपर आयी हुई हैं, इसलिये वे गंगा कहलाती हैं॥ ९—११ १/२॥
केतुमाले नराः कालाः सर्वे पनसभोजनाः॥ १२<br>स्त्रियश्चोत्पलवर्णाभा जीवितं चायुतं स्मृतम्।<br>भद्राश्वे शुक्लवर्णाश्च स्त्रियश्चन्द्रांशुसन्निभाः॥ १३<br>कालााम्रभोजनाः सर्वे निरातङ्का रतिप्रियाः।<br>दशवर्षसहस्राणि जीवन्ति शिवभाविताः॥ १४<br>हिरण्मया इवात्यर्थमीश्वरार्पितचेतसः।केतुमालवर्षमें मनुष्य कृष्णवर्णवाले हैं, वे सब कटहलका आहार ग्रहण करते हैं। वहाँकी स्त्रियाँ उत्पलके वर्णवाली हैं। वहाँके लोगोंकी आयु दस हजार वर्ष कही गयी है। भद्राश्ववर्षमें स्त्रियाँ चन्द्रमाकी किरणोंके समान शुक्ल वर्णकी हैं। वहाँके सभी लोग कालााम्रका भोजन करनेवाले, भयरहित तथा रतिप्रिय हैं। शिवका ध्यान करनेवाले वे लोग दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। हिरण्मयवर्षके लोगोंके समान वे भी मनको ईश्वरमें लगाये रखते हैं॥ १२—१४ १/२॥
तथा रमणके जीवा न्यग्रोधफलभोजनाः॥ १५<br>दशवर्षसहस्राणि शतानि दशपञ्च च।<br>जीवन्ति शुक्लास्ते सर्वे शिवध्यानपरायणाः॥ १६<br>हैरण्मया महाभागा हिरण्मयवनाश्रयाः।<br>एकादशसहस्राणि शतानि दशपञ्च च॥ १७<br>वर्षाणां तत्र जीवन्ति अश्वत्थाशनजीवनाः।<br>हिरण्मया इवात्यर्थमीश्वरार्पितमानसाः॥ १८रमणकवर्षमें लोग बरगदका फल ग्रहण करते हैं। वे ग्यारह हजार पाँच सौ वर्ष जीवित रहते हैं। वे सब शुक्लवर्णके होते हैं और शिवके ध्यानमें लगे रहते हैं। हिरण्मयवनका आश्रय लेकर महाभाग्यशाली हिरण्मय लोग रहते हैं। वे वहाँपर बारह हजार पाँच सौ वर्ष जीते हैं और अश्वत्थ (पीपल)-के आहारपर जीवित रहते हैं। हिरण्मयवर्षके लोग अपने मनको शिवमें लगाये रखते हैं॥ १५—१८॥
कुरुवर्षे तु कुरवः स्वर्गलोकात्परिच्युताः।<br>सर्वे मैथुनजाताश्च क्षीरिणः क्षीरभोजनाः॥ १९<br>अन्योन्यमनुरक्ताश्च चक्रवाकसधर्मिणः।<br>अनामया ह्याशोकाश्च नित्यं सुखनिषेविणः॥ २०<br>त्रयोदशसहस्राणि शतानि दशपञ्च च।<br>जीवन्ति ते महावीर्या न चान्यस्त्रीनिषेविणः॥ २१<br>सहैव मरणं तेषां कुरूणां स्वर्गवासिनाम्।<br>हृष्टानां सुप्रवृद्धानां सर्वान्नामृतभोजिनाम्॥ २२<br>सदा तु चन्द्रकान्तानां सदा यौवनशालिनाम्।<br>श्यामाङ्गानां सदा सर्वभूषणास्पददेहिनाम्॥ २३<br>जम्बूद्वीपे तु तत्रापि कुरुवर्षं सुशोभनम्।<br>तत्र चन्द्रप्रभं शम्भोर्विमानं चन्द्रमौलिनः॥ २४कुरुवर्षमें कुरुलोग स्वर्गसे गिरे हुए हैं। वे सभी मैथुनक्रियासे उत्पन्न हुए हैं। वे दुग्धका पान तथा भोजन करते हैं। वे एक-दूसरेसे प्रेम करनेवाले, चक्रवाक पक्षीके समान गुण-धर्मवाले, रोगरहित, शोकमुक्त एवं सदा सुखोंका भोग करनेवाले हैं। वे चौदह हजार पाँच सौ वर्षतक जीते हैं। वे महातेजस्वी हैं और अन्य स्त्रीका सेवन नहीं करते हैं। हृष्ट-पुष्ट, अत्यन्त प्रबुद्ध, सभी प्रकारके अन्न तथा अमृतके आहारवाले, सदा चन्द्रमाके समान कान्तिमान्, सदा यौवनशाली, श्याम वर्णके शरीरवाले एवं सर्वदा सभी प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित शरीरवाले उन स्वर्गवासी कुरुओंका मरण साथ-साथ होता है। वहाँ जम्बूद्वीपमें भी अत्यन्त सुन्दर कुरुवर्ष है। चन्द्रशेखर शिवका चन्द्रमाकी प्रभाके समान एक विमान वहाँपर विद्यमान है॥ १९—२४॥

| २२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| वर्षे तु भारते मर्त्याः पुण्याः कर्मवशायुषः।<br>शतायुषः समाख्याता नानावर्णाल्पदेहिनः॥ २५<br><br>नानादेवार्चने युक्ता नानाकर्मफलाशिनः।<br>नानाज्ञानार्थसम्पन्ना दुर्बलाश्चाल्पभोगिनः॥ २६ | भारतवर्षमें मनुष्य पुण्यशाली, कर्मके अधीन आयुवाले, [प्रायः] सौ वर्षकी आयुवाले, अनेक रंगवाले, छोटे शरीरवाले, अनेक देवताओंकी पूजामें परायण, नानाविध कर्मोंका फल भोगनेवाले, अनेक ज्ञानके अर्थोंसे सम्पन्न, दुर्बल तथा अल्प सुखको भोगनेवाले कहे गये हैं॥ २५-२६॥ | | इन्द्रद्वीपे तथा केचित्तथैव च कसेरुके।<br>ताम्रद्वीपं गताः केचित्केचिद्देशं गभस्तिमत्॥ २७<br><br>नागद्वीपं तथा सौम्यं गान्धर्वं वारुणं गताः।<br>केचिन्म्लेच्छाः पुलिन्दाश्च नानाजातिसमुद्भवाः॥ २८<br><br>पूर्वे किरातास्तस्यान्ते पश्चिमे यवनाः स्मृताः।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च सर्वशः॥ २९<br><br>इज्ज्यायुद्धवणिज्याभिर्वर्तयन्तो व्यवस्थिताः।<br>तेषां संव्यवहारोऽयं वर्ततेऽत्र परस्परम्॥ ३०<br><br>धर्मार्थकामसंयुक्तो वर्णानां तु स्वकर्मसु।<br>सङ्कल्पश्चाभिमानश्च आश्रमाणां यथाविधि॥ ३१<br><br>इह स्वर्गापवर्गार्थं प्रवृत्तिर्यत्र मानुषी।<br>तेषां च युगकर्माणि नान्यत्र मुनिपुङ्गवाः॥ ३२ | उनमेंसे कुछ इन्द्रद्वीपमें, कुछ कसेरुकद्वीपमें, कुछ ताम्रद्वीपमें और कुछ गभस्तिमान् देशमें चले गये। कुछ नागद्वीपमें, कुछ सोमद्वीपमें, कुछ गन्धर्वद्वीपमें तथा कुछ वरुणद्वीपमें चले गये। कुछ लोग विविध जातियोंसे उत्पन्न म्लेच्छ और पुलिन्द हैं। उस द्वीपके पूर्वी भागमें किरात तथा पश्चिमी भागमें यवन बताये गये हैं। उसके मध्यभागमें सर्वत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र हैं। वे पूजन, युद्ध, वाणिज्य आदिके द्वारा जीविका चलाते हुए वहाँ व्यवस्थित हैं। उन वर्णोंका अपने-अपने कर्मोंमें परस्पर यह व्यवहार धर्म, अर्थ तथा कामसे सम्बन्धित है। उनमें संकल्प एवं अभिमान [ब्रह्मचर्य आदि] आश्रमोंमें उचित रूपमें विद्यमान है। वहाँपर स्वर्ग तथा मोक्षके लिये मनुष्योंकी जो प्रवृत्ति है और उनके जो युगकर्म हैं, हे मुनिश्रेष्ठो! वैसा अन्यत्र नहीं है॥ २७-३२॥ | | दशवर्षसहस्राणि स्थितिः किम्पुरुषे नृणाम्।<br>सुवर्णवर्णाश्च नराः स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः॥ ३३<br><br>अनामया ह्यशोकाश्च सर्वे ते शिवभाविताः।<br>शुद्धसत्त्वाश्च हेमाभाः सदाराः प्लक्षभोजनाः॥ ३४ | किम्पुरुषवर्षमें मनुष्योंकी स्थिति दस हजार वर्षतक रहती है। वहाँके पुरुष सुवर्णके रंगवाले होते हैं और स्त्रियाँ अप्सराओंके समान होती हैं। वे सब रोगरहित, शोकरहित, शिवभक्तिसे युक्त, विशुद्ध सत्त्वगुणसे सम्पन्न, स्वर्णके समान आभावाले, अपनी पत्नियोंके साथ रहनेवाले तथा गूलरका भोजन करनेवाले होते हैं॥ ३३-३४॥ | | महारजतसङ्काशा हरिवर्षेऽपि मानवाः।<br>देवलोकाच्च्युताः सर्वे देवाकाराश्च सर्वशः॥ ३५<br><br>हरं यजन्ति सर्वेशं पिबन्तीक्षुरसं शुभम्।<br>न जरा बाधते तेन न च जीर्यन्ति ते नराः॥ ३६<br><br>दशवर्षसहस्राणि तत्र जीवन्ति मानवाः।<br>मध्यमं यन्मया प्रोक्तं नाम्ना वर्षमिलावृतम्॥ ३७ | हरिवर्षमें भी मनुष्य महारजतके समान वर्णवाले होते हैं। वे सब देवलोकसे च्युत हुए हैं और हर प्रकारसे देवताओंके आकारके होते हैं। वे सर्वेश्वर शिवका पूजन करते हैं और पवित्र इक्षुरसका पान करते हैं, अतः उन्हें बुढ़ापा बाधित नहीं करता और वे लोग वृद्ध नहीं होते। वहाँ मनुष्य दस हजार वर्ष जीवित रहते हैं॥ ३५-३६ १/२॥ | | न तत्र सूर्यस्तपति न ते जीर्यन्ति मानवाः।<br>चन्द्रसूर्यो न नक्षत्रं न प्रकाशमिलावृते॥ ३८ | मध्यमें स्थित जो इलावृत नामक वर्ष कहा गया है, वहाँ सूर्य नहीं तपता है और वहाँ मनुष्य बूढ़े नहीं होते। इलावृतवर्षमें न सूर्य-चन्द्रमा हैं, न तारे हैं और |

अध्याय ५२ ]विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन२२३

पद्मप्रभाः पद्ममुखाः पद्मपत्रनिभेक्षणाः।<br>पद्मपत्रसुगन्धाश्च जायन्ते भवभाविताः॥ ३९<br><br>जम्बूफलरसाहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः।<br>देवलोकागतास्तत्र जायन्ते ह्यजरामराः॥ ४०<br><br>त्रयोदशसहस्त्राणि वर्षाणां ते नरोत्तमाः।<br>आयुःप्रमाणं जीवन्ति वर्षे दिव्ये त्विलावृते॥ ४१<br><br>जम्बूफलरसं पीत्वा न जरा बाधते त्विमान्।<br>न क्षुधा न क्लमश्चापि न जनो मृत्युमांस्तथा॥ ४२<br><br>तत्र जाम्बूनदं नाम कनकं देवभूषणम्।<br>इन्द्रगोपप्रतीकाशं जायते भास्वरं तु तत्॥ ४३न तो प्रकाश ही है। वहाँके लोग कमलके समान प्रभाववाले, कमलके समान मुखवाले, कमलके पत्रके समान नेत्रोंवाले और कमलपत्रकी सुगन्धिसे युक्त होते हैं। वे शिवमें ध्यानपरायण रहते हैं। वे जामुनके फलके रसका आहार करनेवाले, धूपके प्रभावसे रहित तथा सुगन्धमय होते हैं। देवलोकसे आये हुए वे लोग अजर-अमर होते हैं। उस दिव्य इलावृतवर्षमें वे श्रेष्ठ मनुष्य तेरह हजार वर्षतक अपनी पूरी आयुभर जीवित रहते हैं। जामुनके फलका रस पीनेसे इन्हें न बुढ़ापा बाधित करता है, न भूख लगती है और न थकावट होती है। वहाँके लोग [समयसे पूर्व] मरते नहीं हैं। वहाँ जाम्बूनद नामक स्वर्ण होता है; वह देवताओंका आभूषण है तथा इन्द्रगोप (कीटविशेष)-के समान प्रकाशमान रहता है॥ ३७-४३॥
एवं मया समाख्याता नववर्षानुवर्तिनः।<br>वर्णायुर्भोजनाद्यानि सङ्क्षिप्य न तु विस्तरात्॥ ४४इस प्रकार मैंने नौ वर्षोंके निवासियोंका वर्णन कर दिया। मैंने उनके वर्ण, आयु, भोजन आदिके विषयमें विस्तारसे नहीं बल्कि संक्षेपमें कहा है॥ ४४॥
हेमकूटे तु गन्धर्वा विज्ञेयाश्चाप्सरोगणाः।<br>सर्वे नागाश्च निषधे शेषवासुकितक्षकाः॥ ४५<br><br>महाबलास्त्रयस्त्रिंशद्रमन्ते याज्ञिकाः सुराः।<br>नीले तु वैडूर्यमये सिद्धा ब्रह्मर्षयोऽमलाः॥ ४६हेमकूटपर्वतपर गन्धर्वों तथा अप्सराओंको रहनेवाला जानना चाहिये। शेष, वासुकि, तक्षक और सभी नाग निषधपर रहते हैं। तैंतीस महाबली याज्ञिक देवता, सिद्धगण तथा विशुद्धात्मा ब्रह्मर्षि वैदूर्य मणिवाले नीलपर्वतपर रहते हैं॥ ४५-४६॥
दैत्यानां दानवानां च श्वेतः पर्वत उच्यते।<br>शृङ्गवान् पर्वतश्चैव पितॄणां निलयः सदा॥ ४७<br><br>हिमवान् यक्षमुख्यानां भूतानामीश्वरस्य च।<br>सर्वाद्रिषु महादेवो हरिणा ब्रह्मणाम्बया॥ ४८<br><br>नन्दिना च गणैश्चैव वर्षेषु च वनेषु च।<br>नीलश्वेतत्रिशृङ्गे च भगवान्नीललोहितः॥ ४९<br><br>सिद्धैर्देवैश्च पितृभिर्दृष्टो नित्यं विशेषतः।<br>नीलश्च वैडूर्यमयः श्वेतः शुक्लो हिरण्मयः॥ ५०<br><br>मयूरबर्हवर्णस्तु शातकुम्भस्त्रिशृङ्गवान्।<br>एते पर्वतराजानो जम्बूद्वीपे व्यवस्थिताः॥ ५१दैत्यों एवं दानवोंका निवासस्थान श्वेतपर्वत कहा जाता है। शृंगवान्पर्वत [सभी] पितरोंका निवासस्थान है। हिमवान् सभी यक्षों, भूतों तथा शिवका निवास है। महादेवजी श्रीविष्णु, ब्रह्मा, उमा, नन्दी और [अपने] गणोंके साथ सभी पर्वतों, वर्षों तथा वनोंमें निवास करते हैं। भगवान् नीललोहित नील, श्वेत एवं त्रिशृंग पर्वतोंपर विशेष रूपसे सिद्धों, देवताओं तथा पितरोंके साथ सदा दिखायी पड़ते हैं। नीलपर्वत वैदूर्यमय, श्वेतपर्वत शुक्लवर्णवाला, हिरण्यमयपर्वत मोरपंखके वर्णका और शृंगवान्पर्वत सुनहरे वर्णका है। ये सभी पर्वतराज जम्बूद्वीपमें स्थित हैं॥ ४७-५१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशस्वभाववर्णनं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशस्वभाववर्णन' नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५२॥

५३- भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौञ्चद्वीपोंके महापर्वतों, ऊर्ध्वलोकों तथा नरकोंका वर्णन, सर्वत्र सदाशिवकी व्यापकता एवं यक्षरूप शिव और भगवती उमाका माहात्म्य

२२४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

तिरपनवाँ अध्याय

भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौंचद्वीपोंके महापर्वतों, ऊर्ध्वलोकों तथा नरकोंका वर्णन, सर्वत्र सदाशिवकी व्यापकता एवं यक्षरूप शिव और भगवती उमाका माहात्म्य

सूत उवाचसूतजी बोले— प्लक्ष आदि सात द्वीपोंमें सात पर्वत हैं, जो सीधे, लम्बे तथा प्रत्येक दिशाओंमें फैले हुए हैं; वे वर्षपर्वतके रूपमें प्रतिष्ठित हैं॥ १॥
प्लक्षद्वीपादिद्वीपेषु सप्त सप्तसु पर्वताः।<br>ऋज्वायताः प्रतिदिशं निविष्टा वर्षपर्वताः॥ १मैं प्लक्षद्वीपमें स्थित सातों दिव्य महापर्वतोंका वर्णन करूँगा। पहला गोमेदक तथा दूसरा चान्द्र कहा जाता है। तीसरा नारद तथा चौथा दुन्दुभि नामवाला कहा गया है। पाँचवाँ सोमक तथा छठा सुमनस् नामवाला कहा जाता है, उसे वैभव [नामवाला] भी कहा गया है। सातवाँ पर्वत वैभ्राज नामसे प्रसिद्ध है। विशेष रूपसे ये ही सात पर्वत प्लक्षद्वीपमें बताये गये हैं॥ २–४॥
प्लक्षद्वीपे तु वक्ष्यामि सप्त दिव्यान् महाचलान्।<br>गोमेदकोऽत्र प्रथमो द्वितीयश्चान्द्र उच्यते॥ २
तृतीयो नारदो नाम चतुर्थो दुन्दुभिः स्मृतः।<br>पञ्चमः सोमको नाम सुमनाः षष्ठ उच्यते॥ ३
स एव वैभवः प्रोक्तो वैभ्राजः सप्तमः स्मृतः।<br>सप्तैते गिरयः प्रोक्ताः प्लक्षद्वीपे विशेषतः॥ ४
सप्त वै शाल्मलिद्वीपे तांस्तु वक्ष्याम्यनुक्रमात्।<br>कुमुदश्चोत्तमश्चैव पर्वतश्च बलाहकः॥ ५शाल्मलिद्वीपमें भी सात पर्वत हैं, मैं क्रमसे उन्हें बताऊँगा। कुमुद, उत्तम, बलाहक, द्रोण, कंक, महिष और सातवाँ ककुद्मान् कहा गया है। कुशद्वीपमें भी सात उपद्वीप और कुलपर्वत हैं। मैं केवल नामसे ही संक्षेपमें उन्हें बताऊँगा। पहला विद्रुम तथा दूसरा हेमपर्वत कहा गया है। तीसरा द्युतिमान् एवं चौथा पुष्पित नामवाला बताया गया है। पाँचवाँ कुशेशय तथा छठा हरिगिरि [नामवाला] कहा गया है। सातवाँ पर्वत शोभासम्पन्न मन्दर है, यह महादेवजीका निवासस्थान है। जलोंका नाम मन्दा है; इसीलिये जलोंको धारण करनेसे इसका नाम मन्दर है॥ ५–९॥
द्रोणः कङ्कश्च महिषः ककुद्मान् सप्तमः स्मृतः।<br>कुशद्वीपे तु सप्तैव द्वीपाश्च कुलपर्वताः॥ ६
तांस्तु सङ्क्षेपतो वक्ष्ये नाममात्रेण वै क्रमात्।<br>विद्रुमः प्रथमः प्रोक्तो द्वितीयो हेमपर्वतः॥ ७
तृतीयो द्युतिमान्नाम चतुर्थः पुष्पितः स्मृतः।<br>कुशेशयः पञ्चमस्तु षष्ठो हरिगिरिः स्मृतः॥ ८
सप्तमो मन्दरः श्रीमान् महादेव‌निकेतनम्।<br>मन्दा इति ह्यपां नाम मन्दरो धारणादपाम्॥ ९
तत्र साक्षाद् वृषाङ्कस्तु विश्वेशो विमलः शिवः।<br>सोमः सनन्दी भगवानास्ते हेमगृहोत्तमे॥ १०साक्षात् भगवान् वृषभध्वज विश्वेश्वर अमलात्मा शिव वहाँ उत्तम सुवर्णगृहमें पार्वती तथा नन्दीके साथ रहते हैं। पूर्वकालमें मन्दरने महाक्षेत्र अविमुक्तमें [अपनी] तपस्यासे महेश्वरको प्रसन्न किया था और उनसे महावरदान प्राप्त किया था॥ १०-११॥
तपसा तोषितः पूर्वं मन्दरेण महेश्वरः।<br>अविमुक्ते महाक्षेत्रे लेभे स परं वरम्॥ ११
प्रार्थितश्च महादेवो निवासार्थं सहाम्बया।<br>अविमुक्तादुपागम्य चक्रे वासं स मन्दरे॥ १२उसने महादेवजीसे उमाके साथ वहाँ निवास करनेके लिये प्रार्थना की, तब वे [शिव] अविमुक्तक्षेत्रसे आकर नन्दी, अपने गणों तथा उमाके साथ मन्दर [पर्वत]-पर निवास करने लगे, इसीलिये वे उस पर्वतको नहीं छोड़ते हैं॥ १२ १/२॥
सनन्दी सगणः सोमस्तेनासौ तन्न मुञ्चति।<br>क्रौञ्चद्वीपे तु सप्तेह क्रौञ्चाद्याः कुलपर्वताः॥ १३

अध्याय ५३] भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौञ्चद्वीपोंके महापर्वतोंका वर्णन २२५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
क्रौञ्चो वामनकः पश्चात्तुतीयश्चान्धकारकः।<br>अन्धकारात्परश्चापि दिवावृन्नाम पर्वतः॥ १४<br><br>दिवावृतः परश्चापि विविन्दो गिरिरुच्यते।<br>विविन्दात्परतश्चापि पुण्डरीको महागिरिः॥ १५<br><br>पुण्डरीकात्परश्चापि प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः।<br>एते रत्नमयाः सप्त क्रौञ्चद्वीपस्य पर्वताः॥ १६क्रौञ्चद्वीपमें भी क्रौञ्च आदि सात कुलपर्वत हैं। [पहला] क्रौञ्च, [दूसरा] वामन तथा तीसरा अन्धकारक पर्वत है। अन्धकारकके बाद दिवावृत् नामक पर्वत है। दिवावृत्‌के बाद विविन्द पर्वत कहा जाता है। विविन्दके बाद पुण्डरीक नामक महान् पर्वत है और पुण्डरीकके बाद दुन्दुभिस्वन पर्वत कहा जाता है। क्रौञ्चद्वीपके ये सातों पर्वत रत्नमय हैं॥ १३-१६॥
शाकद्वीपे च गिरयः सप्त तांस्तु निबोधत।<br>उदयो रैवतश्चापि श्यामको मुनिसत्तमाः॥ १७<br><br>राजतश्च गिरिः श्रीमानाम्बिकेयः सुशोभनः।<br>आम्बिकेयात्परो रम्यः सर्वौषधिसमन्वितः॥ १८<br><br>तथैव केसरीत्युक्तो यतो वायुः प्रजायते।शाकद्वीपमें भी सात पर्वत हैं, उन्हें जानिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! उदय, रैवत, श्यामक, शोभासम्पन्न राजतपर्वत तथा अत्यन्त सुन्दर आम्बिकेय पर्वत हैं। आम्बिकेयके बाद सभी प्रकारकी औषधियोंसे युक्त रम्य नामक पर्वत है। उसके बाद केसरीपर्वत कहा गया है, जहाँसे वायु उत्पन्न होती है॥ १७-१८ १/२॥
पुष्करे पर्वतः श्रीमान्नेक एव महाशिलः॥ १९<br><br>चित्रैर्मणिमयैः कूटैः शिलाजालैः समुच्छ्रितैः।<br>द्वीपस्य तस्य पूर्वार्धे चित्रसानुस्थितो महान्॥ २०<br><br>योजनानां सहस्त्राणि ऊर्ध्वं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>अधश्चैव चतुस्त्रिंशत्सहस्त्राणि महाचलः॥ २१<br><br>द्वीपस्यार्धे परिक्षिप्तः पर्वतो मानसोत्तरः।<br>स्थितो वेलासमीपे तु नवचन्द्र इवोदितः॥ २२पुष्करद्वीपमें महाशिल नामक एक ही शोभासम्पन्न पर्वत है; यह अद्भुत मणियोंवाले शिखरोंसे तथा शिलासमूहोंसे युक्त है। यह महान् पर्वत उस द्वीपके आधे पूर्वी भागमें अनेक रंगोंके किनारोंके साथ पचास हजार योजन ऊँचा उठा हुआ है। यह महान् पर्वत [भूतलसे] चौंतीस हजार योजन नीचेतक गया है। यह पर्वत द्वीपके आधे भागमें उत्तरकी ओर मानसशृंखलाके ऊपर फैला हुआ है। समुद्रके समीप स्थित यह पर्वत उगे हुए नवीन चन्द्रमाके समान प्रतीत होता है॥ १९-२२॥
योजनानां सहस्त्राणि ऊर्ध्वं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>तावदेव तु विस्तीर्णः पार्श्वतः परिमण्डलः॥ २३<br><br>स एव द्वीपपश्चार्धे मानसः पृथिवीधरः।<br>एक एव महासानुः सन्निवेशाद् द्विधा कृतः॥ २४यह पचास हजार योजन ऊपरकी ओर उठा हुआ है। इसकी चौड़ाई तथा चारों ओरका घेरा भी उतना ही विस्तृत है। द्वीपके पश्चिमी आधे भागमें यही पर्वत मानस नामसे प्रतिष्ठित है। यह महापर्वत एक होता हुआ भी सन्निवेशके कारण दो भागोंमें विभक्त हो गया है॥ २३-२४॥
तस्मिन् द्वीपे स्मृतौ द्वौ तु पुण्यौ जनपदौ शुभौ।<br>राजतौ मानसस्याथ पर्वतस्यानुमण्डलौ॥ २५<br><br>महावीतं तु यद्वर्षं बाह्यतो मानसस्य तु।<br>तस्यैवाभ्यन्तरो यस्तु धातकीखण्ड उच्यते॥ २६उस द्वीपमें चाँदीके समान प्रभाववाले दो पुण्यमय तथा शुभ जनपद बताये गये हैं, जो इस मानस पर्वतको घेरे हुए हैं। मानसके बाहर जो महावीत नामक वर्ष है, उसके भीतर जो जनपद है, उसे धातकीखण्ड कहा जाता है॥ २५-२६॥
स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः।<br>पुष्करद्वीपविस्तारविस्तीर्णोऽसौ समन्ततः॥ २७<br><br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पुष्करस्य समेन तु।<br>एवं द्वीपाः समुद्रैस्तु सप्तसप्तभिरावृताः॥ २८पुष्करद्वीप स्वादिष्ट जलवाले सागरसे घिरा हुआ है। यह [सागर] सभी ओर पुष्करद्वीपके विस्तारके बराबर विस्तीर्ण है। यह विस्तारमें तथा घेरेमें पुष्कर द्वीपके ही समान है। इस प्रकार सातों द्वीप सात समुद्रोंसे घिरे हुए
२२६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
श्लोकअर्थ
द्वीपस्यानन्तरो यस्तु समुद्रः सप्तमस्तु वै।<br>एवं द्वीपसमुद्राणां वृद्धिर्ज्ञेया परस्परम्॥ २९हैं। द्वीपके अनन्तर जो समुद्र है, वह सातवाँ समुद्र है। इस प्रकार द्वीपों तथा समुद्रोंकी परस्पर वृद्धिको जानना चाहिये॥ २७-२९॥
परेण पुष्करस्याथ अनुवृत्य स्थितो महान्।<br>स्वादूदकसमुद्रस्तु समन्तात्परिवेष्ट्य च॥ ३०<br>परेण तस्य महती दृश्यते लोकसंस्थितिः।<br>काञ्चनी द्विगुणा भूमिः सर्वा चैकशिलोपमा॥ ३१<br>तस्याः परेण शैलस्तु मर्यादापारमण्डलः।<br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते॥ ३२<br>दृश्यादृश्यगिरिर्यावत्तावदेषा धरा द्विजाः।<br>योजनानां सहस्त्राणि दश तस्योच्छ्रयः स्मृतः॥ ३३<br>तावांश्च विस्तरस्तस्य लोकालोकमहागिरेः।<br>अर्वाचीने तु तस्यार्धे चरन्ति रविरश्मयः॥ ३४<br>परार्धे तु तमो नित्यं लोकालोकस्ततः स्मृतः।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तो भूर्लोकस्य च विस्तरः॥ ३५पुष्करके बाहर उसे चारों ओरसे घेरकर स्वादिष्ट जलसे युक्त महान् समुद्र स्थित है। उसके बाहर महती लोकस्थिति दिखायी देती है, वहाँकी भूमि स्वर्णमयी है और विस्तारमें दुगुनी है। सम्पूर्ण भूमि एक शिलाके तुल्य है। उसके परे मर्यादामण्डलस्वरूप एक पर्वत है। इसका कुछ भाग प्रकाशमय तथा कुछ भाग अन्धकारमय रहता है, इसे लोकालोक [पर्वत] कहा जाता है। हे द्विजो! जितना यह दृश्य-अदृश्य पर्वत है, उतनी ही यह धरा है। उसकी (पर्वतकी) ऊँचाई दस हजार योजन कही गयी है। उस लोकालोक [नामक] महापर्वतका विस्तार भी उतना ही है। उसके आधे भागमें सूर्यकी किरणें पहुँचती हैं और दूसरे आधे भागमें सदा अन्धकार रहता है, इसलिये इसे लोकालोक कहा गया है। [हे द्विजो!] इस प्रकार मैंने संक्षेपमें भूलोकके विस्तारका वर्णन किया॥ ३०-३५॥
आभानोर्वै भुवः स्वस्तु आध्रुवान्मुनिसत्तमाः।<br>आवहाद्या निविष्टास्तु वायोर्वै सप्त नेमयः॥ ३६<br>आवहः प्रवहश्चैव ततश्चानुवहस्तथा।<br>संवहो विवहश्चाथ ततश्चोर्ध्वं परावहः॥ ३७<br>द्विजाः परिवहश्चेति वायोर्वै सप्त नेमयः।<br>बलाहकास्तथा भानुश्चन्द्रो नक्षत्रराशयः॥ ३८<br>ग्रहाणि ऋषयः सप्त ध्रुवो विप्राः क्रमादिह।हे श्रेष्ठ मुनियो! भूर्लोक सूर्यतक है और स्वर्लोक ध्रुवतक है। आवह आदि वायुकी सात नेमियाँ कही गयी हैं। हे द्विजो! आवह, प्रवह, अनुवह, संवह, विवह, परावह और परिवह—ये वायुकी सात नेमियाँ हैं। हे विप्रो! मेघ, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण, राशियाँ, ग्रह सप्तर्षि और ध्रुव—ये क्रमसे व्यवस्थित हैं॥ ३६-३८१/२॥
योजनानां महीपृष्ठादूर्ध्वं पञ्चदशाध्रुवात्॥ ३९<br>नियुतान्येकनियुतं भूपृष्ठाद्भानुमण्डलम्।<br>रथः षोडशसाहस्रो भास्करस्य तथोपरि॥ ४०<br>चतुराशीतिसाहस्रो मेरुश्चोपरि भूतलात्।<br>कोटियोजनमाक्रम्य महर्लोको ध्रुवाद् ध्रुवः॥ ४१<br>जनलोको महर्लोकात्तथा कोटिद्वयं द्विजाः।<br>जनलोकात्तपोलोकश्चतस्त्रः कोटयो मतः॥ ४२<br>प्राजापत्याद् ब्रह्मलोकः कोटिषट्कं विसृज्य तु।<br>पुण्यलोकास्तु सप्तैते ह्याण्डेऽस्मिन् कथिता द्विजाः॥ ४३पृथ्वीतलसे ऊपर ध्रुवलोकपर्यन्त पन्द्रह नियुत योजनकी दूरी है। भूपृष्ठसे भानुमण्डल एक नियुत योजन दूर है। उसके ऊपर सूर्यका रथ सोलह हजार योजन है। मेरु पर्वत पृथ्वीतलसे चौरासी हजार योजनपर है। ध्रुवसे एक करोड़ योजनके बाद महर्लोक है। हे द्विजो! महर्लोकसे दो करोड़ योजनकी दूरीपर जनलोक है। जनलोकसे चार करोड़ योजनकी दूरीपर तपोलोक कहा गया है। प्राजापत्यलोक (तपोलोक)-से छः करोड़ योजनकी दूरी छोड़कर ब्रह्मलोक स्थित है। हे ब्राह्मणो! इस प्रकार इस ब्रह्माण्डमें इन सात पुण्यलोकोंको मैंने बता दिया॥ ३९-४३॥
अधः सप्ततलानां तु नरकाणां हि कोटयः।<br>मायान्ताश्चैव घोराद्या अष्टाविंशतिरेव तु॥ ४४<br>पापिनस्तेषु पच्यन्ते स्वस्वकर्मानुरूपतः।<br>अवीच्यन्तानि सर्वाणि रौरवाद्यानि तेषु च॥ ४५सात तलोंके नीचे घोरसे लेकर मायात क अट्ठाईस कोटिके नरक हैं; पापीलोग उनमें अपने-अपने कर्मोंके अनुरूप दुःख भोगते हैं। उनमेंसे प्रत्येकमें रौरवसे लेकर

अध्याय ५३] भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौंचद्वीपोंके महापर्वतोंका वर्णन २२७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रत्येकं पञ्चकान्याहुर्नैरकाणि विशेषतः।<br>अण्डमादौ मया प्रोक्तमण्डस्यावरणानि च॥ ४६<br><br>हिरण्यगर्भसर्गश्च प्रसङ्गाद्बहुविस्तरात्।<br>अण्डानामीदृशानां तु कोट्यो ज्ञेयाः सहस्रशः॥ ४७अवीचितक सभी विशेष रूपसे पाँच नरक कहे गये हैं। मैंने आदिमें अण्डका वर्णन किया और अण्डके आवरणोंका भी वर्णन किया एवं प्रसंगवश ब्रह्माकी सृष्टिका भी विस्तारसे वर्णन किया। इस प्रकारके हजारों-करोड़ों ब्रह्माण्डोंको जानना चाहिये॥ ४४—४७॥
सर्वगत्वात्प्रधानस्य तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा।<br>अण्डेष्वेतेषु सर्वेषु भुवनानि चतुर्दश॥ ४८<br><br>प्रत्यण्डं द्विजशार्दूलास्तेषां हेतुर्महेश्वरः।<br>अण्डेषु चाण्डबाह्येषु तथाण्डावरणेषु च॥ ४९<br><br>तमोऽन्ते च तमःपारे चाष्टमूर्तिर्व्यवस्थितः।<br>अस्यात्मनो महेशस्य महादेवस्य धीमतः॥ ५०<br><br>अदेहिनस्त्वहो देहमखिलं परमात्मनः।<br>अस्याष्टमूर्तेः शर्वस्य शिवस्य गृहमेधिनः॥ ५१<br><br>गृहिणी प्रकृतिर्दिव्या प्रजाश्च महदादयः।<br>पशवः किङ्करास्तस्य सर्वे देहाभिमानिनः॥ ५२प्रधानके सर्वगामी होनेके कारण इन अण्डोंमें तिर्यक्, ऊपर तथा नीचे [सभी ओर] चौदह भुवन हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो! उनमें प्रत्येक अण्डके हेतु महेश्वर हैं। अष्टमूर्ति [शिव] अण्डोंमें, अण्डोंके बाहर, अण्डोंके आवरणोंमें, अन्धकारके भीतर तथा अन्धकारके परे भी विद्यमान हैं। सम्पूर्ण जगत् इन महेश्वर, महादेव, धीमान्, देहरहित परमात्माका शरीर है। गृहस्थरूप इन अष्टमूर्ति शर्व शिवकी गृहिणी दिव्य प्रकृति है, महत् आदि इनकी सन्तानें हैं और सभी देहाभिमानी पशु इनके सेवक हैं॥ ४८—५२॥
आद्यन्तहीनो भगवाननन्तः<br>पुमान् प्रधानप्रमुखश्च सप्त।<br>प्रधानमूर्तिस्त्वथ षोडशाङ्गो<br>महेश्वरश्चाष्टतनुः स एव॥ ५३<br><br>आज्ञाबलात्तस्य धरा स्थितेह<br>धराधरा वारिधराः समुद्राः।<br>ज्योतिर्गणः शक्रमुखाः सुराश्च<br>वैमानिकाः स्थावरजङ्गमाश्च॥ ५४वे [शिव] ही आदि-अन्तसे रहित, भगवान् अनन्त, पुरुष, प्रधान आदि (बुद्धि, अहंकार आदि) सात तत्त्व, प्रधान मूर्तिवाले, सोलह अंगोंवाले (पंचमहाभूत, दस इन्द्रियाँ, मन), अष्टमूर्ति तथा महेश्वर हैं। उन्हींकी आज्ञाके प्रभावसे पृथ्वी, पर्वत, मेघ, समुद्र, तारागण, इन्द्र आदि देवता, वैमानिक तथा स्थावर-जंगम सभी प्राणी स्थित हैं॥ ५३-५४॥
दृष्ट्वा यक्षं लक्षणैर्हीनमीशं<br>दृष्ट्वा सेन्द्रास्ते किमेतत्विहेति।<br>यक्षं गत्वा निश्चयात्पावकाद्याः<br>शक्तिक्षीणाश्चाभवन्यत्ततोऽपि ॥ ५५लक्षणोंसे रहित यक्षरूपी शिवको देखकर इन्द्रसहित अग्नि आदि वे देवता 'यहाँ यह क्या है?'—ऐसा

२२८ श्रीलिङ्गमहापुराण · [पूर्वभाग


सोचकर अनिश्चयकी दशामें यक्षके समीप जाकर वे शक्तिहीन हो गये॥ ५५॥
दग्धुं तृणं वापि समक्षमस्य<br>यक्षस्य वह्निर्न शशाक विप्राः।<br>वायुस्तृणं चालयितुं तथान्ये<br>स्वान् स्वान् प्रभावान् सकलामरेन्द्राः॥ ५६<br><br>तदा स्वयं वृत्ररिपुः सुरेन्द्रैः<br>सुरेश्वरः सर्वसमृद्धिहेतुः।<br>सुरेश्वरं यक्षमुवाच को वा<br>भवानितीत्थं सकुतूहलात्मा॥ ५७हे विप्रो! अग्निदेव उस यक्षके सामने तिनका भी नहीं जला सके, पवन उस तृणको उड़ानेमें समर्थ नहीं हुए, उसी प्रकार अन्य समस्त श्रेष्ठ देवता भी अपने-अपने प्रभाव प्रदर्शित करनेमें समर्थ नहीं हुए। तब सभी श्रेष्ठ देवताओंके साथ समस्त समृद्धियोंके कारणभूत वृत्रशत्रु उन देवेन्द्रने कुतूहलचित्त होकर यक्षरूप सुरेश्वरसे इस प्रकार कहा—आप कौन हैं?॥ ५६-५७॥
तदा हृद्यदृश्यं गत एव यक्ष-<br>स्तदाम्बिका हैमवती शुभास्या।<br>उमा शुभैराभरणैरनेकौः<br>सुशोभमाना त्वनु चाविरासीत्॥ ५८उसी समय यक्ष अदृश्य हो गये। तब सुन्दर मुखवाली तथा अनेक शुभ आभरणोंसे अत्यन्त शोभित होती हुई हैमवती अम्बिका उमा प्रकट हो गयीं॥ ५८॥
तां शक्रमुख्या बहुशोभमाना-<br>मुमामजां हैमवतीमपृच्छन्।<br>किमेतदीशे बहुशोभमाने<br>को वाम्बिके यक्षवपुश्चकास्ति॥ ५९इन्द्र आदिने सुशोभित होती हुई उन हैमवती अजा उमासे पूछा—हे ईशे! हे परम शोभायमान अम्बिके! यह यक्षदेहधारी कौन है?॥ ५९॥
निशम्य तद्यक्षमुमाम्बिकाह<br>त्वगोचरश्चेति सुराः सशक्राः।<br>प्रणेमुरेनां मृगराजगामिनी-<br>मुमामजां लोहितशुक्लकृष्णाम्॥ ६०यह सुनकर उमा अम्बिकाने कहा—यह अगोचर है; तब इन्द्रसहित सभी देवताओंने उस यक्षको तथा सिंहगामिनी और लोहित-शुक्ल-कृष्णवर्णवाली इन अजा उमाको प्रणाम किया॥ ६०॥
सम्भाविता सा सकलामरेन्द्रैः<br>सर्वप्रवृत्तिस्तु सुरासुराणाम्।<br>अहं पुरासं प्रकृतिश्च पुंसो<br>यक्षस्य चाज्ञावशगेत्यथाह॥ ६१सभी श्रेष्ठ देवताओंसे सत्कृत होकर देवताओं तथा दानवोंकी समस्त प्रवृत्तिरूपा उन देवीने कहा—मैं पूर्वकालमें इस यक्षरूप [परम] पुरुषकी आज्ञाके अधीन रहनेवाली प्रकृति थी*॥ ६१॥
तस्माद् द्विजाः सर्वमजस्य तस्य<br>नियोगतश्चाण्डमभूदजाद्वै ।<br>अजश्च अण्डादखिलं च तस्मात्<br>ज्योतिर्गणैर्लोक मजात्मकं तत्॥ ६२अतः हे द्विजो! उन्हीं अज (शिव)-के नियोगसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए, उन ब्रह्मासे अण्ड उत्पन्न हुआ और अण्डसे ज्योतिर्गणोंसहित समग्र विश्व उत्पन्न हुआ; इस प्रकार सब कुछ शिवात्मक है॥ ६२॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशविन्यासनिर्णयो नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशविन्यासनिर्णय' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५३॥


* परम पुरुषकी सर्वोत्कृष्टताको बतानेवाला यह 'हैमवती-आख्यान' मूलरूपसे सामवेदके तलवकारब्राह्मणके अन्तर्गत प्राप्त होनेवाले केनोपनिषद्में उपलब्ध होता है।