श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ६४] वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा २६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथापि भर्तृरहिता दीना नारी भवेदिह।<br>पाहि मां तत आर्येन्द्र परिभूता भविष्यति॥ ३८<br><br>पिता माता च पुत्राश्च पौत्राः श्वशुर एव च।<br>एते न बान्धवाः स्त्रीणां भर्ता बन्धुः परा गतिः॥ ३९ | ब्रह्मपुत्र! हे जगद्गुरो! इस दुःखसे मेरी रक्षा कीजिये। पतिरहित स्त्री इस लोकमें दीन तथा असहाय होती है, अतः हे आर्येन्द्र! मेरी रक्षा कीजिये। पिता, माता, पुत्र, पौत्र, श्वशुर—ये स्त्रियोंके बन्धु नहीं होते हैं; अर्थात् ये सब उसका सदाके लिये सम्पूर्ण हितसम्पादन करनेमें समर्थ नहीं होते, केवल पति ही उनका बन्धु तथा परम गति होता है॥ ३५-३९॥ |
| आत्मनो यद्धि कथितमप्यर्धमिति पण्डितैः।<br>तदप्यत्र मृषा ह्यासीद् गतः शक्तिरहं स्थिता॥ ४०<br><br>अहो ममात्र काठिन्यं मनसो मुनिपुङ्गव।<br>पतिं प्राणसमं त्यक्त्वा स्थिता यत्र क्षणं यतः॥ ४१<br><br>वसिष्ठाश्वत्थमाश्रित्य ह्यमृता तु यथा लता।<br>निर्मूलाप्यमृता भर्त्रा त्यक्ता दीना स्थिताप्यहम्॥ ४२ | विद्वानोंने जो कहा है कि पत्नी पतिका आधा अंग होती है, वह भी इसमें मिथ्या हो गया; [मेरे पति] शक्ति तो चले गये, किन्तु मैं [जीवित] रह गयी। हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे मनकी यह कठोरता है, जो प्राणतुल्य [अपने] पतिको छोड़कर मैं क्षणभरके लिये भी जीवित हूँ। हे वसिष्ठ! जैसे पीपलके वृक्षपर चढ़ी हुई लता जड़को काट देनेपर भी जीवित रहती है, वैसे ही अपने पतिसे परित्यक्त हुई मैं भी दीन होकर जीवित हूँ॥ ४०-४२॥ |
| स्नुषावाक्यं निशम्यैव वसिष्ठो भार्यया सह।<br>तदा चक्रे मतिं धीमान् यातुं स्वाश्रममाश्रमी॥ ४३<br><br>कृच्छ्रात्सभार्यो भगवान् वसिष्ठः स्वाश्रमं क्षणात्।<br>अदृश्यन्त्या च पुण्यात्मा संविवेश स चिन्तयन्॥ ४४ | तब पुत्रवधूका वचन सुनकर गृहस्थाश्रमवाले बुद्धिमान् वसिष्ठने [अपनी] भार्याके साथ अपने आश्रमको जानेका विचार किया। चिन्ता करते हुए उन भगवान् वसिष्ठने बड़े कष्टसे अपनी भार्या तथा [पुत्रवधू] अदृश्यन्तीके साथ क्षणभरमें अपने आश्रममें प्रवेश किया॥ ४३-४४॥ |
| सा गर्भं पालयामास कथञ्चिन्मुनिपुङ्गवाः।<br>कुलसन्धारणार्थाय शक्तिपत्नी पतिव्रता॥ ४५<br><br>ततः सासूत तनयं दशमे मासि सुप्रभम्।<br>शक्तिपत्नी यथा शक्तिं शक्तिमन्तमरुन्धती॥ ४६<br><br>असूत सादितिर्विष्णुं यथा स्वाहा गुहं सुतम्।<br>अग्निं यथारणिः पत्नी शक्तेः साक्षात्पराशरम्॥ ४७ | हे श्रेष्ठ मुनियो! उस पतिव्रता शक्तिभार्याने [अपनी] वंशपरम्पराको सुरक्षित रखनेके लिये किसी प्रकार [अपने] गर्भकी रक्षा की। तदनन्तर दसवें महीनेमें उस शक्तिपत्नीने अत्यन्त तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया, जैसे अरुन्धतीने शक्तिशाली शक्तिको जन्म दिया था। उस शक्तिपत्नीने साक्षात् पराशरको उसी तरह जन्म दिया, जैसे अदितिने विष्णुको, स्वाहाने गुहको और अरणिने अग्निको पुत्ररूपमें जन्म दिया था॥ ४५-४७॥ |
| यदा तदा शक्तिसूनुरवतीर्णो महीतले।<br>शक्तिस्त्यक्त्वा तदा दुःखं पितॄणां समतां ययौ॥ ४८<br><br>भ्रातृभिः सह पुण्यात्मा आदित्यैरिव भास्करः।<br>रराज पितृलोकस्थो वासिष्ठो मुनिपुङ्गवाः॥ ४९ | जब शक्तिके पुत्रने पृथ्वीतलपर अवतार लिया, तब शक्तिने दुःख त्यागकर पितरोंकी समताको प्राप्त किया। हे श्रेष्ठ मुनियो! वे पुण्यात्मा वसिष्ठपुत्र [शक्ति] पितृलोकमें स्थित होकर [अपने] भाइयोंके साथ उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे सूर्य आदित्योंके साथ सुशोभित होते हैं॥ ४८-४९॥ |
| श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| २७० |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जगूस्तदा च पितरो ननृतुश्च पितामहाः।<br>प्रपितामहाश्च विप्रेन्द्रा ह्यावतीर्णे पराशरे॥ ५०<br>ये ब्रह्मवादिनो भूमौ ननृतुर्दिवि देवताः।<br>पुष्कराद्याश्च ससृजुः पुष्पवर्षं च खेचराः॥ ५१<br>पुरेषु राक्षसानां च प्रणादं विषमं द्विजाः।<br>आश्रमस्थाश्च मुनयः समूहुर्हर्षसन्ततिम्॥ ५२ | हे विप्रेन्द्रो! पराशरके अवतार लेनेपर उस समय सभी पितामह-प्रपितामह आदि पितृगण नाचने तथा गाने लगे। जो ब्रह्मवादी लोग थे, वे पृथ्वीपर एवं देवता लोग स्वर्गमें नृत्य करने लगे। पुष्कर आदि मेघोंने जलकी तथा अन्य आकाशचारियोंने पुष्पोंकी वर्षा की। [उस समय] राक्षसोंके नगरोंमें गृध्रादि अमंगल ध्वनि करने लगे और आश्रममें स्थित मुनियोंने अपार हर्ष मनाया॥ ५०-५२॥ |
| अवतीर्णो यथा ह्यण्डाद्द्विजानुः सोऽपि पराशरः।<br>अदृश्यन्त्याश्चतुर्वक्त्रो मेघजालाद्दिवाकरः॥ ५३<br>सुखं च दुःखमभवददृश्यन्त्यास्तथा द्विजाः।<br>दृष्ट्वा पुत्रं पतिं स्मृत्वा अरुन्धत्या मुनेस्तथा॥ ५४<br>दृष्ट्वा च तनयं बाला पराशरमतिद्युतिम्।<br>ललाप विह्वला बाला सन्नकण्ठी पपात च॥ ५५ | जैसे अण्डसे चतुरानन (ब्रह्मा) और मेघसमूहोंसे सूर्य प्रकट होते हैं, उसी प्रकार वे पराशर भी अदृश्यन्तीसे अवतरित हुए। हे द्विजो! पुत्रको देखकर तथा पतिका स्मरण करके अदृश्यन्तीको सुख तथा दुःख दोनों ही हुआ और अरुन्धती तथा मुनि [वसिष्ठ]-को भी सुख-दुःख हुआ। अत्यधिक कान्तिवाले पुत्र पराशरको देखकर विह्वल तथा रुँधे कण्ठवाली वह बाला विलाप करने लगी और [भूमिपर] गिर पड़ी॥ ५३-५५॥ |
| सा पराशरमहो महामतिं<br>देवदानवगणैश्च पूजितम्।<br>जातमात्रमनघं शुचिस्मिता<br>बुध्य साश्रुनयना ललाप च॥ ५६<br>हा वसिष्ठसुत कुत्रचिद् गतः<br>पश्य पुत्रमनघं तवात्मजम्।<br>त्यज्य दीनवदनां वनान्तरे<br>पुत्रदर्शनपरामिमां प्रभो॥ ५७<br>शक्ते स्वं च सुतं पश्य भ्रातृभिः सह षण्मुखम्।<br>यथा महेश्वरोऽपश्यत्सगणो हृष्टिताननः॥ ५८ | पवित्र मुसकानवाली वह [अदृश्यन्ती] उत्पन्न हुए उस पराशरको महाबुद्धिमान्, देवताओं तथा दानवोंसे पूजित और निष्पाप जानकर आँखोंमें आँसू भरकर विलाप करने लगी—'हे वसिष्ठसुत [शक्ति]! हे प्रभो! पुत्र-दर्शनकी इच्छावाली इस दीनवदनाको तथा अपने पुत्रको वनके बीचमें छोड़कर आप कहाँ चले गये? अपने निष्पाप पुत्रका दर्शन कीजिये। हे शक्ते! आप भाइयोंके साथ अपने पुत्रको देखिये, जैसे महेश्वरने प्रसन्नमुख होकर [अपने] गणोंके साथ षण्मुख (कार्तिकेय)-को देखा था'॥ ५६-५८॥ |
| अथ तस्यास्तदालापं वसिष्ठो मुनिसत्तमः।<br>श्रुत्वा स्नुषामुवाचेदं मा रोदीरिति दुःखितः॥ ५९ | तत्पश्चात् उसके विलापको सुनकर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठने दुःखित होकर [अपनी] पुत्रवधूसे यह वचन कहा—'मत रोओ'॥ ५९॥ |
| आज्ञया तस्य सा शोकं वसिष्ठस्य कुलाङ्गना।<br>त्यक्त्वा ह्यापालयद् बालं बाला बालमृगेक्षणा॥ ६० | तब बालमृगके समान नेत्रोंवाली वह कुलीन बाला वसिष्ठकी आज्ञासे शोक त्याग करके [उस] बालकका पालन करने लगी॥ ६०॥ |
| दृष्ट्वा तामबलां प्राह मङ्गलाभरणैर्विना।<br>आसीनामाकुलां साध्वीं बाष्पपर्याकुलेक्षणाम्॥ ६१ | तदनन्तर आँसुओंसे भरे हुए नेत्रोंवाली तथा व्याकुल उस साध्वी अबलाको आभूषणोंसे रहित होकर बैठी देखकर पराशर यह कहने लगे॥ ६१॥ |
| अध्याय ६४ ] | वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा | २७१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शाकेय उवाच<br>अम्ब मङ्गलभूषणैर्विना<br>देहयष्टिरनघे न शोभते।<br>वक्तुमर्हसि तवाद्य कारणं<br>चन्द्रबिम्बरहितेव शर्वरी॥ ६२<br>मातर्मातः कथं त्यक्त्वा मङ्गलाभरणानि वै।<br>आसीना भर्तृहीनेव वक्तुमर्हसि शोभने॥ ६३ | शाक्तेय (शक्तिपुत्र पराशर) बोले— हे अम्ब! हे अनघे! जैसे चन्द्रमण्डलसे रहित रात्रि सुशोभित नहीं होती है, वैसे ही आपका यह शरीर मंगल आभूषणोंके बिना सुशोभित नहीं हो रहा है; कृपा करके आज इसका कारण बताइये। हे मात:! हे मात:! मंगल आभरणोंका त्याग करके पतिविहीनाकी भाँति आप क्यों बैठी हुई हैं? हे शोभने! कृपा करके बताइये॥ ६२-६३॥ |
| अदृश्यन्ती तदा वाक्यं श्रुत्वा तस्य सुतस्य सा।<br>न किञ्चिदब्रवीत्पुत्रं शुभं वा यदि वेतरत्॥ ६४ | तब उस पुत्रकी बात सुनकर उस अदृश्यन्तीने पुत्रसे अच्छा अथवा बुरा कुछ भी नहीं कहा॥ ६४॥ |
| अदृश्यन्तीं पुनः प्राह शाक्तेयो भगवान् मम।<br>मातः कुत्र महातेजाः पिता वद वदेति ताम्॥ ६५ | भगवान् शाक्तेय (पराशर)-ने उस अदृश्यन्तीसे पुनः कहा—‘हे मात:! मेरे महातेजस्वी पिता कहाँ हैं; इसे बताइये, बताइये'॥ ६५॥ |
| श्रुत्वा रुरोद सा वाक्यं पुत्रस्यातीव विह्वला।<br>भक्षितो रक्षसा तातस्तवेति निपपात च॥ ६६ | तब पुत्रका वचन सुनकर अत्यधिक व्याकुल होकर वह रोने लगी। 'हे तात! राक्षसने तुम्हारे पिताका भक्षण कर लिया'—ऐसा कहकर वह [भूमिपर] गिर पड़ी॥ ६६॥ |
| श्रुत्वा वसिष्ठोऽपि पपात भूमौ<br>पौत्रस्य वाक्यं स रुदन् दयालुः।<br>अरुन्धती चाश्रमवासिनस्तदा<br>मुनेर्वसिष्ठस्य मुनीश्वराश्च॥ ६७ | तब पौत्रकी बात सुनकर दयालु वसिष्ठ भी रोते हुए भूमिपर गिर पड़े। मुनि वसिष्ठके आश्रममें रहनेवाले श्रेष्ठ मुनिगण तथा अरुन्धती—ये सब भी गिर पड़े॥ ६७॥ |
| भक्षितो रक्षसा मातुः पिता तव मुखादिति।<br>श्रुत्वा पराशरो धीमान् प्राह चास्त्राविलेक्षणः॥ ६८ | 'तुम्हारे पिताको राक्षस खा गया'—माताके मुखसे ऐसा सुनकर अश्रुपूर्ण नेत्रवाले बुद्धिमान् पराशर कहने लगे॥ ६८॥ |
| पराशर उवाच<br>अभ्यर्च्य देवदेवेशं त्रैलोक्यं सचराचरम्।<br>क्षणेन मातः पितरं दर्शयामीति मे मतिः॥ ६९ | पराशर बोले— हे मात:! देवदेवेश्वर [शिव]-की पूजा करके तथा चराचरसहित तीनों लोकोंको दग्ध करके मैं क्षणभरमें पिताका दर्शन कराता हूँ—ऐसा मेरा विचार है॥ ६९॥ |
| सा निशम्य वचनं तदा शुभं<br>सस्मिता तनयमाह विस्मिता।<br>तथ्यमेतदिति तं निरीक्ष्य सा<br>पुत्र पुत्र भवमर्चयेति च॥ ७० | तब इस शुभ वचनको सुनकर वह आश्चर्यचकित हो गयी; उसकी ओर देखकर मुसकराकर उसने पुत्रसे कहा—हे पुत्र! हे पुत्र! यह सत्य है; तुम शिवकी पूजा करो॥ ७०॥ |
| ज्ञात्वा शक्तिसुतस्यास्य सङ्कल्पं मुनिपुङ्गवः।<br>वसिष्ठो भगवान् प्राह पौत्रं धीमान् घृणानिधिः॥ ७१ | तदनन्तर इस शक्तिपुत्र [पराशर]-के संकल्पको जानकर दयानिधि, बुद्धिमान् तथा मुनियोंमें श्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठने पौत्रसे कहा— |
| स्थाने पौत्र मुनिश्रेष्ठ सङ्कल्पस्तव सुव्रत।<br>तथापि शृणु लोकस्य क्षयं कर्तुं न चार्हसि॥ ७२<br>राक्षसानामभावाय कुरु सर्वेश्वरार्चनम्।<br>त्रैलोक्यं शृणु शाक्तेय अपराध्यति किं तव॥ ७३ | हे पौत्र! हे मुनिश्रेष्ठ! हे सुव्रत! सुनो; तुम्हारा संकल्प उचित है, फिर भी तुम [सम्पूर्ण] लोकका विनाश मत करो। तुम राक्षसोंके नाशके लिये |
| २७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वेश्वरका अर्चन करो। हे शक्तिपुत्र! सुनो, त्रैलोक्यने तुम्हारे प्रति क्या अपराध किया है?॥ ७१-७३॥ | |
| ततस्तस्य वसिष्ठस्य नियोगाच्छक्तिनन्दनः।<br>राक्षसानामभावाय मतिं चक्रे महामतिः॥ ७४<br>अदृश्यन्तीं वसिष्ठं च प्रणम्यारुन्धतीं ततः।<br>कृत्वैकलिङ्गं क्षणिकं पांसुना मुनिसन्निधौ॥ ७५<br>सम्पूज्य शिवसूक्तेन त्र्यम्बकेन शुभेन च।<br>जप्त्वा त्वरितरुद्रं च शिवसङ्कल्पमेव च॥ ७६<br>नीलरुद्रं च शाक्तेयस्तथा रुद्रं च शोभनम्।<br>वामीयं पवमानं च पञ्चब्रह्म तथैव च॥ ७७<br>होतारं लिङ्गसूक्तं च अथर्वशिर एव च।<br>अष्टाङ्गमर्घ्यं रुद्राय दत्त्वाभ्यर्च्य यथाविधि॥ ७८ | उसके बाद उन वसिष्ठकी आज्ञासे महाबुद्धिमान् शक्तिपुत्रने राक्षसोंके विनाशके लिये निश्चय किया। अदृश्यन्ती, वसिष्ठ तथा अरुन्धतीको प्रणाम करनेके अनन्तर मुनिके समीप मिट्टीका एक (पार्थिवेश्वर) क्षणिक लिङ्ग बनाकर शुभ शिवसूक्त तथा त्र्यम्बकमन्त्रसे विधिवत् पूजन करके त्वरितरुद्र, शिवसंकल्पसूक्त, नीलरुद्र, उत्तम रुद्र, वामीय, पवमान, पंचब्रह्म (सद्योजातादि पाँच मन्त्र), होतृसूक्त, लिङ्गसूक्त तथा अथर्वशीर्ष—इन मन्त्रोंका जप करके [भगवान्] रुद्रको अष्टांग अर्घ्य प्रदान करके यथाविधि अभ्यर्थनकर वे शाक्तेय (पराशर) प्रार्थना करने लगे॥ ७४-७८॥ |
| पराशर उवाच<br>भगवन् रक्षसा रुद्र भक्षितो रुधिरेण वै।<br>पिता मम महातेजा भ्रातृभिः सह शङ्कर॥ ७९<br>द्रष्टुमिच्छामि भगवन् पितरं भ्रातृभिः सह।<br>एवं विज्ञापयँल्लिङ्गं प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः॥ ८०<br>हा रुद्र रुद्र रुद्रेति रुरोद निपपात च। | पराशर बोले—'हे भगवन्! हे रुद्र! हे शंकर! राक्षस रुधिरने भाइयोंसहित मेरे महातेजस्वी पिताका भक्षण कर लिया। हे भगवन्! मैं अपने पिताको उनके भाइयोंसहित देखना चाहता हूँ।' इस प्रकार प्रार्थना करते हुए उस लिङ्गको बार-बार प्रणामकर 'हा रुद्र! रुद्र! रुद्र!'—यह कहते हुए वे रोने लगे और गिर पड़े॥ ७९-८० १/२॥ |
| तं दृष्ट्वा भगवान् रुद्रो देवीमाह च शङ्करः॥ ८१<br>पश्य बालं महाभागे बाष्पपर्याकुलेक्षणम्।<br>ममानुस्मरणे युक्तं मदाराधनतत्परम्॥ ८२ | तब उन्हें देखकर कल्याणकारी भगवान् रुद्रने देवी [पार्वती]-से कहा—हे महाभागे! अश्रुसे भरे हुए नेत्रोंवाले, मेरे स्मरणमें लगे हुए तथा मेरी आराधनामें तत्पर [इस] बालकको देखो॥ ८१-८२॥ |
| सा च दृष्ट्वा महादेवी पराशरमनिन्दिता।<br>दुःखात्संक्लिन्नसर्वाङ्गमस्त्राकुलविलोचनम् ॥ ८३<br>लिङ्गार्चनविधौ सक्तं हर रुद्रेति वादिनम्।<br>प्राह भर्तारमीशानं शङ्करं जगतामुमा॥ ८४ | तब निष्कलंक उन महादेवी उमाने दुःखसे दुर्बल अंगोंवाले, अश्रुपूरित नेत्रोंवाले, लिङ्गार्चनके कर्ममें संलग्न तथा 'हे हर! हे रुद्र'—ऐसा उच्चारण करनेवाले पराशरको देखकर सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी अपने पति शंकरसे कहा—हे परमेश्वर! आप प्रसन्न हो जाइये और इसे सम्पूर्ण अभीष्ट वर प्रदान कीजिये॥ ८३-८४ १/२॥ |
| ईप्सितं यच्छ सकलं प्रसीद परमेश्वर।<br>निशम्य वचनं तस्याः शङ्करः परमेश्वरः॥ ८५<br>भार्यामार्यामुमां प्राह ततो हालाहलाशनः।<br>रक्षाम्येनं द्विजं बालं फुल्लेन्दीवरलोचनम्॥ ८६<br>ददामि दृष्टिं मद्रूपदर्शनक्षम एष वै।<br>एवमुक्त्वा गणैर्दिव्यैर्भगवान्नीललोहितः॥ ८७ | तदनन्तर उनका वचन सुनकर विषपान करनेवाले परमेश्वर शंकरने [अपनी] भार्या साध्वी उमासे कहा—मैं खिले हुए कमलके समान नेत्रवाले इस ब्राह्मण बालककी रक्षा करूँगा। मैं इसे [दिव्य] दृष्टि दे रहा हूँ; [जिससे] यह मेरे रूपका दर्शन करनेमें समर्थ होगा॥ ८५-८६ १/२॥ |
अध्याय ६४] वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा २७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ब्रहेन्द्रविष्णुरुद्राद्यैः संवृतः परमेश्वरः।<br>ददौ च दर्शनं तस्मै मुनिपुत्राय धीमते॥ ८८ | ऐसा कहकर [अपने] दिव्य गणों तथा ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, रुद्र आदिसे घिरे हुए भगवान् नीललोहित परमेश्वरने उन बुद्धिमान् मुनिपुत्र [पराशर]-को दर्शन दिया॥ ८७-८८॥ |
| सोऽपि दृष्ट्वा महादेवमानन्दास्त्राविलेक्षणः।<br>निपपात च हृष्टात्मा पादयोस्तस्य सादरम्॥ ८९<br><br>पुनर्भावान्याः पादौ च नन्दिनश्च महात्मनः।<br>सफलं जीवितं मेऽद्य ब्रह्माद्यांस्तांस्तदाह सः॥ ९०<br><br>रक्षार्थमागतस्त्वद्य मम बालेन्दुभूषणः।<br>कोऽन्यः समो मया लोके देवो वा दानवोऽपि वा॥ ९१ | महादेवजीको देखकर आनन्दके अश्रुसे भरे हुए नेत्रोंवाले वे [पराशर] भी प्रसन्नचित्त होकर आदरपूर्वक उनके चरणोंपर गिर पड़े और पुनः भवानी [पार्वती] और महात्मा नन्दीके चरणोंपर गिर पड़े। तत्पश्चात् उन्होंने उन ब्रह्मा आदिसे कहा—'मेरा जीवन आज सफल हो गया। बाल चन्द्रमाके आभूषणवाले [साक्षात् शिवजी] मेरी रक्षाके लिये आज उपस्थित हुए हैं; अतः देवता अथवा दानव—दूसरा कौन इस लोकमें मेरे समान [भाग्यशाली] है'॥ ८९-९१॥ |
| अथ तस्मिन् क्षणादेव ददर्श दिवि संस्थितम्।<br>पितरं भ्रातृभिः सार्धं शाक्तेयस्तु पराशरः॥ ९२<br><br>सूर्यमण्डलसङ्काशे विमाने विश्वतोमुखे।<br>भ्रातृभिः सहितं दृष्ट्वा ननाम च जहर्ष च॥ ९३ | तदनन्तर शक्तिपुत्र पराशरने उसी क्षण [अपने] पिताको भाइयोंसहित अन्तरिक्षमें खड़े देखा। सूर्यमण्डलके समान [तेजवाले] तथा सभी ओर मुखवाले विमानमें [अपने] भाइयोंसहित पिताको देखकर उन्होंने प्रणाम किया और वे बहुत हर्षित हुए॥ ९२-९३॥ |
| तदा वृषभध्वजो देवः सभार्यः सगणेश्वरः।<br>वसिष्ठपुत्रं प्राहेदं पुत्रदर्शनतत्परम्॥ ९४ | तब अपनी भार्या तथा गणेश्वरोंसहित विराजमान भगवान् वृषभध्वज (शिव) पुत्रको देखनेमें तत्पर वसिष्ठ-पुत्र [शक्ति]-से यह कहने लगे॥ ९४॥ |
| श्रीदेव उवाच<br>शक्ते पश्य सुतं बालमानन्दास्त्राविलेक्षणम्।<br>अदृश्यन्तीं च विप्रेन्द्र वसिष्ठं पितरं तव॥ ९५<br><br>अरुन्धतीं महाभागां कल्याणीं देवतोपमाम्।<br>मातरं पितरं चोभौ नमस्कुरु महामते॥ ९६ | **श्रीदेव बोले—**हे शक्ते! हे विप्रेन्द्र! आनन्दके आँसुओंसे सिक्त नेत्रोंवाले अपने पुत्र इस बालकको और अदृश्यन्ती, अपने पिता वसिष्ठ, महाभाग्यशालिनी-कल्याणमयी तथा देवतातुल्य [माता] अरुन्धतीको देखो। हे महामते! [अपने] माता तथा पिता—इन दोनोंको नमस्कार करो॥ ९५-९६॥ |
| तदा हरं प्रणम्याशु देवदेवमुमां तथा।<br>वसिष्ठं च तदा श्रेष्ठं शक्तिर्वै शङ्कराज्ञया॥ ९७<br><br>मातरं च महाभागां कल्याणीं पतिदेवताम्।<br>अरुन्धतीं जगन्नाथनियोगात्प्राह शक्तिमान्॥ ९८ | तदनन्तर शंकरजीकी आज्ञासे देवदेव हरको, उमाको, श्रेष्ठ वसिष्ठको तथा अपने पतिको देवता माननेवाली महाभाग्यवती कल्याणी माता अरुन्धतीको शीघ्र प्रणाम करके शक्तिमान् शक्तिने [पुनः] जगन्नाथ [शिव]-की आज्ञा पाकर कहा॥ ९७-९८॥ |
| वासिष्ठ उवाच<br>भो वत्स वत्स विप्रेन्द्र पराशर महाद्युते।<br>रक्षितोऽहं त्वया तात गर्भस्थेन महात्मना॥ ९९ | **वासिष्ठ (शक्ति) बोले—**हे वत्स! हे वत्स! हे विप्रेन्द्र! हे पराशर! हे महाद्युते! हे तात! गर्भमें स्थित रहते हुए तुम महात्माने मेरी रक्षा की। हे वत्स! हे |
| अणिमादिगुणैश्वर्यं मया वत्स पराशर।<br>लब्धमद्याननं दृष्टं तव बाल ममाज्ञया॥ १०० |
| २७४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अदृश्यन्तीं महाभागां रक्ष वत्स महामते।<br>अरुन्धतीं च पितरं वसिष्ठं मम सर्वदा॥ १०१<br><br>अन्वयः सकलो वत्स मम सन्तारितस्त्वया।<br>पुत्रेण लोकान् जयतीत्युक्तं सद्भिः सदैव हि॥ १०२<br><br>ईप्सितं वरयेशानं जगतां प्रभवं प्रभुम्।<br>गमिष्याम्यभिवन्द्येशं भ्रातृभिः सह शङ्करम्॥ १०३ | पराशर! हे बाल! मैंने अणिमा आदि सिद्धियों तथा ऐश्वर्यको प्राप्त कर लिया, जो कि तुम्हारे मुखका आज मुझे दर्शन हुआ। हे वत्स! हे महामते! अब तुम मेरी आज्ञासे महाभाग्यशालिनी अदृश्यन्ती, [माता] अरुन्धती तथा मेरे पिता वसिष्ठकी सर्वदा रक्षा करते रहो। हे वत्स! तुमने मेरे समस्त कुलका उद्धार कर दिया; सज्जनोंने सदा यही कहा है कि [मनुष्य अपने] पुत्रके द्वारा [सभी] लोकोंको जीत लेता है। अब तुम जगत्को उत्पन्न करनेवाले प्रभु महेश्वरसे अभीष्ट वर माँगो और मैं अब भगवान् शंकरको प्रणाम करके भाइयोंके साथ जाऊँगा॥ ९९-१०३॥ |
| एवं पुत्रमुपामन्त्र्य प्रणम्य च महेश्वरम्।<br>निरीक्ष्य भार्या सदसि जगाम पितरं वशी॥ १०४ | इस प्रकार पुत्रको परामर्श देकर महेश्वर तथा पिता वसिष्ठको प्रणाम करके सभामें [अपनी] भार्याकी ओर देखकर वे जितेन्द्रिय शक्ति चले गये॥ १०४॥ |
| गतं दृष्ट्वाथ पितरं तदाभ्यर्च्यैव शङ्करम्।<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः शाक्तेयः शशिभूषणम्॥ १०५ | तत्पश्चात् पिताको गया हुआ देखकर वे शक्तिपुत्र [पराशर] चन्द्रभूषण शंकरकी पूजा करके प्रिय शब्दोंद्वारा [उनकी] स्तुति करने लगे॥ १०५॥ |
| ततस्तुष्टो महादेवो मन्मथान्थकमर्दनः।<br>अनुगृह्याथ शाक्तेयं तत्रैवान्तरधीयत॥ १०६ | तदनन्तर कामदेव तथा अन्धकका नाश करनेवाले महादेव प्रसन्न हो गये और शक्तिपुत्र पराशरपर अनुग्रह करके वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ १०६॥ |
| गते महेश्वरे साम्बे प्रणम्य च महेश्वरम्।<br>ददाह राक्षसानां तु कुलं मन्त्रेण मन्त्रवित्॥ १०७ | तब पार्वतीसहित महेश्वरके चले जानेपर मन्त्रवेत्ता पराशर महेश्वरको प्रणाम करके मन्त्रके द्वारा राक्षसोंके कुलको जलाने लगे॥ १०७॥ |
| तदाह पौत्रं धर्मज्ञो वसिष्ठो मुनिभिर्वृतः।<br>अलमत्यन्तकोपेन तात मन्युमिमं जहि॥ १०८<br><br>राक्षसा नापराध्यन्ति पितुस्ते विहितं तथा।<br>मूढानामेव भवति क्रोधो बुद्धिमतां न हि॥ १०९<br><br>हन्यते तात कः केन यतः स्वकृतभुक्पुमान्।<br>सञ्चितस्यातिमहता वत्स क्लेशेन मानवैः॥ ११०<br><br>यशसस्तपसश्चैव क्रोधो नाशकरः स्मृतः।<br>अलं हि राक्षसैर्दग्धैर्दीनैरनपराधिभिः॥ १११<br><br>सत्रं ते विरमत्वेतत्क्षमासारा हि साधवः। | उस समय मुनियोंसे घिरे हुए धर्मज्ञ वसिष्ठने पौत्र [पराशर]–से कहा—'हे तात! ऐसा महाकोप मत करो; इस क्रोधका त्याग करो। राक्षसोंने अपराध नहीं किया है; तुम्हारे पिताके लिये वैसा ही विहित था। मूर्खोंको ही क्रोध होता है; बुद्धिमानोंको नहीं। हे तात! कौन किसे मारता है; मनुष्य तो अपने किये हुएका फल भोगता है। हे वत्स! क्रोध मनुष्योंके द्वारा अत्यधिक कष्टसे अर्जित किये गये यश तथा तपका नाश करनेवाला कहा गया है। अतः तुम दीन तथा निरपराध राक्षसोंको मत जलाओ और अपने इस यज्ञको बन्द करो; सज्जन लोग तो क्षमाशील होते हैं'॥ १०८-११११/२॥ |
| एवं वसिष्ठवाक्येन शाक्तेयो मुनिपुङ्गवः॥ ११२ | इस प्रकार वसिष्ठकी आज्ञासे तथा उनके वचनोंकी |
६५- सूर्यवंश तथा चंद्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम
अध्याय ६५ ] सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम २७५
| उपसंहृतवान् सत्रं सद्यस्तद्वाक्यगौरवात्।<br>ततः प्रीतश्च भगवान् वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥ ११३<br>सम्प्राप्तश्च तदा सत्रं पुलस्त्यो ब्रह्मणः सुतः।<br>वसिष्ठेन तु दत्तार्घ्यः कृतासनपरिग्रहः ॥ ११४<br>पराशरमुवाचेदं प्रणिपत्य स्थितं मुनिः।<br>वैरे महति यद्वाक्याद् गुरोर्द्याश्रिता क्षमा ॥ ११५<br>त्वया तस्मात्समस्तानि भवाञ्छास्त्राणि वेत्स्यति।<br>सन्ततेर्मम न च्छेदः क्रुद्धेनापि यतः कृतः ॥ ११६<br>त्वया तस्मान्महाभाग ददाम्यन्यं महावरम्।<br>पुराणसंहिताकर्ता भवान् वत्स भविष्यति ॥ ११७<br>देवतापरमार्थं च यथावद्वेत्स्यते भवान्।<br>प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा कर्मणस्तेऽमला मतिः ॥ ११८<br>मत्प्रसादादसन्दिग्धा तव वत्स भविष्यति।<br>ततश्च प्राह भगवान् वसिष्ठो वदतां वरः ॥ ११९<br>पुलस्त्येन यदुक्तं ते सर्वमेतद्भविष्यति।<br>अथ तस्य पुलस्त्यस्य वसिष्ठस्य च धीमतः ॥ १२०<br>प्रसादाद्वैष्णवं चक्रे पुराणं वै पराशरः।<br>षट्प्रकारं समस्तार्थसाधकं ज्ञानसञ्चयम् ॥ १२१<br>षट्सहस्रमितं सर्वं वेदार्थेन च संयुतम्।<br>चतुर्थं हि पुराणानां संहितासु सुशोभनम् ॥ १२२<br>एष वः कथितः सर्वो वासिष्ठानां समासतः।<br>प्रभवः शक्तिसूनोश्च प्रभावो मुनिपुङ्गवाः ॥ १२३ | गरिमाके कारण मुनिश्रेष्ठ पराशरने शीघ्र ही यज्ञको बन्द कर दिया। तब मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठ प्रसन्न हो गये ॥ ११२-११३ ॥<br>उसी समय ब्रह्माके पुत्र [ऋषि] पुलस्त्य यज्ञमें आये। वसिष्ठने उन्हें अर्घ्य प्रदान किया तथा आसन देकर बैठाया; तत्पश्चात् प्रणाम करके [सम्मुख] खड़े पराशरसे मुनि [पुलस्त्य]-ने कहा—'तुमने गुरुकी आज्ञासे आज महान् वैरमें क्षमाको आश्रित किया है, अतः तुम सभी शास्त्रोंको जान जाओगे और कुपित होनेपर भी तुमने मेरे वंशका नाश नहीं किया, अतः हे महाभाग! मैं तुम्हें अन्य महान् वर भी प्रदान करता हूँ—हे वत्स ! तुम पुराणसंहिताके कर्ता होओगे और देवताओंके परम रहस्यको वास्तविकरूपमें जानोगे। हे वत्स! मेरी कृपासे प्रवृत्ति तथा निवृत्तिके कर्मोंसे तुम्हारी बुद्धि विशुद्ध एवं सन्देहरहित होगी' ॥ ११४–११८ १/२ ॥<br>तदनन्तर वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठने कहा—'[हे वत्स!] ऋषि पुलस्त्यने तुम्हारे लिये जो कुछ कहा है, यह सब होकर रहेगा।' तब उन पुलस्त्य तथा बुद्धिमान् वसिष्ठकी कृपासे पराशरने विष्णुपुराणकी रचना की। यह छः अंशोंवाला, सभी कामनाओंको सिद्ध करनेवाला, ज्ञानका भण्डार, छः हजार श्लोकोंसे युक्त, वेदार्थसे समन्वित, पुराण-संहिताओंमें चतुर्थ तथा परम सुन्दर है ॥ ११९–१२२ ॥<br>हे श्रेष्ठ मुनियो ! मैंने आपलोगोंसे संक्षेपमें वसिष्ठके पुत्रोंकी उत्पत्ति तथा शक्तिपुत्र [पराशर]-के सम्पूर्ण प्रभावका वर्णन कर दिया ॥ १२३ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वासिष्ठकथनं नाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वासिष्ठकथन' नामक चौंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६४ ॥
पैंसठवाँ अध्याय
सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम *
| ऋषय ऊचुः<br>आदित्यवंशं सोमस्य वंशं वंशविदां वर।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं सङ्क्षेपाद्रोमहर्षण ॥ १<br><br>सूत उवाच<br>अदितिः सुषुवे पुत्रमादित्यं कश्यपाद् द्विजाः।<br>तस्यादित्यस्य चैवासीद्भार्यात्रयमथापरम् ॥ २<br>संज्ञा राज्ञी प्रभा छाया पुत्रांस्तासां वदामि वः।<br>संज्ञा त्वाष्ट्री च सुषुवे सूर्यान्मनुमनुत्तमम् ॥ ३ | ऋषिगण बोले—हे वंशविदोंमें श्रेष्ठ! हे रोमहर्षण! आप संक्षेपमें सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशके विषयमें हमलोगोंको बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥<br><br>सूतजी बोले—हे द्विजो! अदितिने कश्यपसे आदित्य नामक पुत्रको उत्पन्न किया। उस आदित्यकी ज्येष्ठ भार्याके अतिरिक्त तीन और भार्याएँ थीं। वे संज्ञा, राज्ञी, प्रभा तथा छाया थीं—मैं उनके पुत्रोंके विषयमें |
* यहाँ जो रुद्रसहस्रनामस्तोत्र दिया है, वह महाभारतके अनुशासन पर्व अ० १७ के अन्तर्गत आये शिवसहस्रनामस्तोत्र से साम्य रखता है, वहाँ उसका विस्तृत माहात्म्य भी पूर्वमें वर्णित है।
| २७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यमं च यमुनाञ्चैव राज्ञी रेवतमेव च।<br>प्रभा प्रभातमादित्याच्छायां संज्ञाप्यकल्पयत् ॥ ४ | आप लोगोंको बताता हूँ। त्वष्टाकी पुत्री संज्ञाने सूर्यसे श्रेष्ठ मनुको उत्पन्न किया। राज्ञीने यम, यमुना तथा रेवतको जन्म दिया। प्रभाने सूर्यसे प्रभातको जन्म दिया। संज्ञाने ही छायाको अपने स्थानपर नियोजित किया॥ २-४॥ |
| छाया च तस्मात्सुषुवे सावर्णिं भास्कराद् द्विजाः।<br>ततः शनिं च तपतीं विष्टिं चैव यथाक्रमम् ॥ ५<br><br>छाया स्वपुत्राभ्यधिकं स्नेहं चक्रे मनौ तदा।<br>पूर्वो मनुर्न चक्षाम यमस्तु क्रोधमूर्च्छितः ॥ ६<br><br>सन्ताडयामास रुषा पादमुद्यम्य दक्षिणम्।<br>यमेन ताडिता सा तु छाया वै दुःखिताभवत् ॥ ७ | हे द्विजो! छायाने उन सूर्यसे सावर्णि मनु, शनि, तपती तथा विष्टिको यथाक्रम जन्म दिया। छाया अपने पुत्र सावर्णि मनुसे अधिक स्नेह करती थी। पूर्व मनु (वैवस्वत मनु) तो इसे सहन कर गये, पर क्रोधसे विक्षुब्ध यम इसे सहन न कर सका और उसने क्रोधसे [अपना] दाहिना पैर उठाकर छायापर प्रहार किया। [पैरसे] यमके द्वारा मारे जानेपर वह छाया दुःखित हुई॥ ५-७॥ |
| छायाशापात्पदं चैकं यमस्य क्लिन्नमुत्तमम्।<br>पूयशोणितसम्पूर्णं कृमीणां निचयान्वितम् ॥ ८<br><br>सोऽपि गोकर्णमाश्रित्य फलकेनानिलाशनः।<br>आराधयन् महादेवं यावद्वर्षायुतायुतम् ॥ ९<br><br>भवप्रसादादागत्य लोकपालत्वमुत्तमम्।<br>पितॄणामाधिपत्यं तु शापमोक्षं तथैव च ॥ १०<br><br>लब्धवान् देवदेवस्य प्रभावाच्छूलपाणिनः। | तब छायाके शापसे यमका वह सुन्दर पैर खराब हो गया, वह मवाद तथा रक्तसे भर गया और कीड़ोंके समूहसे युक्त हो गया। तदनन्तर वह [यम] गोकर्णमें रहकर एक फलक (पटरे)-पर बैठकर [केवल] वायु पीता हुआ दस हजार वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना करता रहा। शिवकी कृपासे श्रेष्ठ लोकपालत्व तथा पितरोंका स्वामित्व प्राप्त करके उसने देवदेव शूलपाणि (शिव)-के प्रभावसे शापसे मुक्ति प्राप्त की॥ ८-१० १/२॥ |
| असहन्ती पुरा भानोस्तेजोमयमनिन्दिता ॥ ११<br><br>रूपं त्वाष्ट्री स्वदेहात्तु छायाख्यां सा त्वकल्पयत्।<br>वडवारूपमास्थाय तपस्तेपे तु सुव्रता ॥ १२<br><br>कालात्प्रयत्नतो ज्ञात्वा छायां छायापतिः प्रभुः।<br>वडवामगमत्संज्ञामश्वरूपेण भास्करः ॥ १३<br><br>वडवा च तदा त्वाष्ट्री संज्ञा तस्माद्दिवाकरात्।<br>सुषुवे चाश्विनौ देवौ देवानां तु भिषग्वरौ ॥ १४ | पूर्वकालमें सूर्यके तेजोमय रूपको सहन न करती हुई त्वष्टाकी शुभ कन्या संज्ञाने अपने शरीरसे [दूसरी] छाया नामक स्त्रीकी रचना की और वह सुव्रता स्वयं वडवा (घोड़ी)-का रूप धारणकर तप करने लगी। कुछ समयके बाद प्रयत्नपूर्वक छायाको संज्ञाकी प्रतिकृति जानकर छायापति प्रभु सूर्यने घोड़ेका रूप धारणकर उस वडवारूपधारिणी संज्ञाके साथ रमण किया। तब घोड़ीके रूपवाली त्वष्टापुत्री संज्ञाने उन सूर्यसे देवस्वरूप दोनों अश्विनीकुमारोंको जन्म दिया; वे देवताओंके श्रेष्ठ वैद्य थे॥ ११-१४॥ |
| लिखितो भास्करः पश्चात्संज्ञा पित्रा महात्मना।<br>विष्णोश्चक्रं तु यद् घोरं मण्डलाद्भास्करस्य तु ॥ १५ | उसके बाद महान् आत्मावाले संज्ञापिता [त्वष्टा]-ने सूर्यको खरादा। भगवान् त्वष्टाने रुद्रकी कृपासे सूर्यके मण्डलसे विष्णुके चक्रका निर्माण किया, जो |
अध्याय ६५ ] सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम [ २७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निर्ममे भगवान्स्त्वष्टा प्रधानं दिव्यमायुधम्।<br>रुद्रप्रसादाच्च शुभं सुदर्शनमिति स्मृतम्॥ १६<br>लब्धवान् भगवांश्चक्रं कृष्णः कालाग्निसन्निभम्। | बड़ा भयानक था; वह उनका प्रधान तथा दिव्य अस्त्र था, जिसे शुभ सुदर्शन [चक्र] कहा गया है। भगवान् कृष्णने कालाग्निसदृश उस चक्रको प्राप्त किया था॥ १५-१६१/२॥ |
| मनोस्तु प्रथमस्यासन्नव पुत्रास्तु तत्समाः॥ १७<br>इक्ष्वाकुर्नभगश्चैव धृष्णुः शर्यातिरेव च।<br>नरिष्यन्तश्च वै धीमान् नाभागोऽरिष्ट एव च॥ १८<br>करूषश्च पृषध्रश्च नवैते मानवाः स्मृताः।<br>इला ज्येष्ठा वरिष्ठा च पुंस्त्वं प्राप च या पुरा॥ १९<br>सुद्युम्न इति विख्याता पुंस्त्वं प्राप्ता त्विला पुरा।<br>मित्रावरुणयोस्त्वत्र प्रसादान्मुनिपुङ्गवाः॥ २०<br>पुनः शरवणं प्राप्य स्त्रीत्वं प्राप्तो भवाज्ञया।<br>सुद्युम्नो मानवः श्रीमान् सोमवंशप्रवृद्धये॥ २१<br>इक्ष्वाकोरश्वमेधेन इला किम्पुरुषोऽभवत्।<br>इला किम्पुरुषत्वे च सुद्युम्न इति चोच्यते॥ २२ | प्रथम मनु [वैवस्वत]-के नौ पुत्र हुए, जो उन्हींके समान थे। इक्ष्वाकु, नभग, धृष्णु, शर्याति, नरिष्यन्त, बुद्धिमान् नाभाग, अरिष्ट, करुष तथा पृषध्र—ये नौ मनुपुत्र कहे गये हैं। उनकी ज्येष्ठ तथा वरिष्ठ पुत्री इला जो पूर्वकालमें पुरुष हो गयी थी, वह सुद्युम्न नामसे प्रसिद्ध हुई। हे श्रेष्ठ मुनियो! मित्र तथा वरुणकी कृपासे वह इला पूर्वकालमें पुरुषत्वको प्राप्त हुई थी; पुनः शिवकी आज्ञासे शरवण [नामक वन]-को प्राप्तकर सोमवंशकी वृद्धिके लिये वे मनुपुत्र श्रीमान् सुद्युम्न स्त्रीत्वको प्राप्त हुए। इक्ष्वाकुके अश्वमेधके समय वह इला किंपुरुष (पुरुष रूपवाली) हो गयी थी। वह इला किंपुरुष हो जानेपर 'सुद्युम्न'—इस नामसे कही जाती थी॥ १७-२२॥ |
| मासमेकं पुमान् वीरः स्त्रीत्वं मासमभूतपुनः।<br>इला बुधस्य भवनं सोमपुत्रस्य चाश्रिता॥ २३<br>बुधेनान्तरमासाद्य मैथुनाय प्रवर्तिता।<br>सोमपुत्राद् बुधाच्चापि ऐलो जज्ञे पुरूरवाः॥ २४<br>सोमवंशाग्रजो धीमान् भवभक्तः प्रतापवान्।<br>इक्ष्वाकोर्वंशविस्तारं पश्चाद्वक्ष्ये तपोधनाः॥ २५ | वह इला एक महीनेतक वीर पुरुषके रूपमें और पुनः एक महीनेतक स्त्रीके रूपमें रहती थी। वह चन्द्रमाके पुत्र बुधके भवनमें रहने लगी। अवसर पाकर वह बुधके साथ मैथुनके लिये तत्पर हुई। तब सोमपुत्र बुध और इलासे पुरूरवा उत्पन्न हुए; जो सोमवंशमें प्रथम उत्पन्न होने वाले, बुद्धिमान्, शिवभक्त तथा प्रतापी थे। हे तपोधनो! अब इसके बाद मैं इक्ष्वाकुवंशके विस्तारका वर्णन करूँगा॥ २३-२५॥ |
| पुत्रत्रयमभूतस्य सुद्युम्नस्य द्विजोत्तमाः।<br>उत्कलश्च गयश्चैव विनताश्वस्तथैव च॥ २६<br>उत्कलस्योत्कलं राष्ट्रं विनताश्वस्य पश्चिमम्।<br>गया गयस्य चाख्याता पुरी परमशोभना॥ २७<br>सुराणां संस्थितिय॑स्यां पितॄणां च सदा स्थितिः। | हे उत्तम द्विजो! उन सुद्युम्नके तीन पुत्र हुए—उत्कल, गय तथा विनताश्व। उत्कलका उत्कल [नामक] राष्ट्र था और विनताश्वका पश्चिमी प्रदेश था। गयकी गया [नामक] परम सुन्दर पुरी कही गयी है, जिसमें देवताओं तथा पितरोंकी स्थिति सर्वदा रहती है॥ २६-२७१/२॥ |
| इक्ष्वाकुज्येष्ठदायादो मध्यदेशमवाप्तवान्॥ २८<br>कन्याभावाच्च सुद्युम्नो नैव भागमवाप्तवान्।<br>वसिष्ठवचनाच्चासीत्प्रतिष्ठाने महाद्युतिः॥ २९<br>प्रतिष्ठा धर्मराजस्य सुद्युम्नस्य महात्मनः।<br>तत्पुरूरवसे प्रादाद्राज्यं प्राप्य महायशाः॥ ३० | इक्ष्वाकुके ज्येष्ठ पुत्रने मध्यदेश प्राप्त किया। कन्या प्रकृतिवाले होनेके कारण महातेजस्वी सुद्युम्न [अपना] भाग नहीं पा सके; किंतु वसिष्ठके कहनेसे प्रतिष्ठानपुरमें धर्मराज महात्मा सुद्युम्नकी प्रतिष्ठा स्थापित |
| २७८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मानवेयो महाभागः स्त्रीपुंसोर्लक्षणान्वितः।<br>इक्ष्वाकोरभवद्वीरो विकुक्षिर्धर्मवित्तमः॥ ३१ | हुई और स्त्री-पुरुषके लक्षणोंसे युक्त, महायशस्वी तथा महाभाग्यशाली मनुपुत्र [सुद्युम्न]-ने राज्य प्राप्त करके उसे पुरूरवाको दे दिया॥ २८-३०१/२॥<br><br>सौ पुत्रोंवाले इक्ष्वाकुके ज्येष्ठ पुत्र विकुक्षि थे; वे महान् धर्मज्ञ थे। |
| ज्येष्ठः पुत्रशतस्यासीद्दश पञ्च च तत्सुताः।<br>अभूज्ज्येष्ठः ककुत्स्थश्च ककुत्स्थात्तु सुयोधनः॥ ३२ | उनके पचास पुत्र हुए; उनमें ककुत्स्थ सबसे बड़े थे। ककुत्स्थसे सुयोधन उत्पन्न हुए। |
| ततः पृथुर्मुनिश्श्रेष्ठा विश्वकः पार्थिवस्तथा।<br>विश्वकस्यार्द्रको धीमान् युवनाश्वस्तु तत्सुतः॥ ३३ | हे श्रेष्ठ मुनियो! उन [सुयोधन]-से पृथु और पृथुसे विश्वक उत्पन्न हुए। विश्वकके पुत्र बुद्धिमान् आर्द्रक थे और उनके पुत्र युवनाश्व थे। |
| शाबस्तिश्च महातेजा वंशकस्तु ततोऽभवत्।<br>निर्मिता येन शाबस्ती गौडदेशे द्विजोत्तमाः॥ ३४ | हे श्रेष्ठ द्विजो! उनके पुत्र महातेजस्वी शाबस्ति थे, जिन्होंने गौड़देशमें शाबस्ती नगरीका निर्माण किया। |
| वंशाच्च बृहदश्वोऽभूत्कुवलाश्वस्तु तत्सुतः।<br>धुन्धुमारत्वमापन्नो धुन्धुं हत्वा महाबलम्॥ ३५ | उनसे वंशक [नामक पुत्र] उत्पन्न हुए और वंश [वंशक]-से बृहदश्व हुए। कुवलाश्व उन [बृहदश्वके] पुत्र थे; उन्होंने महाबली ‘धुन्धु’ को मारकर धुन्धुमार नाम प्राप्त किया था। |
| धुन्धुमारस्य तनयास्त्रयस्त्रैलोक्यविश्रुताः।<br>दृढाश्वश्चैव चण्डाश्वः कपिलाश्वश्च ते स्मृताः॥ ३६ | धुन्धुमारके तीन पुत्र हुए, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध थे; वे दृढाश्व, चण्डाश्व तथा कपिलाश्व [नामवाले] कहे गये हैं। |
| दृढाश्वस्य प्रमोदस्तु हर्यश्वस्तस्य वै सुतः।<br>हर्यश्वस्य निकुम्भस्तु संहताश्वस्तु तत्सुतः॥ ३७ | दृढाश्वके पुत्र प्रमोद और उनके पुत्र हर्यश्व थे। हर्यश्वके पुत्र निकुम्भ और उन [निकुम्भ]-के पुत्र संहताश्व थे। |
| कृशाश्वोऽथ रणाश्वश्च संहताश्वात्मजावुभौ।<br>युवनाश्वो रणाश्वस्य मान्धाता तस्य वै सुतः॥ ३८ | संहताश्वके कृशाश्व तथा रणाश्व [नामक] दो पुत्र थे। रणाश्वके पुत्र युवनाश्व थे और उन [युवनाश्व]-के पुत्र मान्धाता थे। |
| मान्धातुः पुरुकुत्सोऽभूदम्बरीषश्च वीर्यवान्।<br>मुचुकुन्दश्च पुण्यात्मा त्रयस्त्रैलोक्यविश्रुताः॥ ३९ | मान्धाताके तीन पुत्र हुए—पुरुकुत्स, पराक्रमी अम्बरीष तथा पुण्यात्मा मुचुकुन्द; |
| अध्याय ६५ ] | सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम | २७९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अम्बरीषस्य दायादो युवनाश्वोऽपरः स्मृतः ।<br>हरितो युवनाश्वस्य हरितास्तु यतः स्मृताः ॥ ४०<br>एते ह्याङ्गिरसः पक्षे क्षत्रोपेता द्विजातयः ।<br>पुरुकुत्सस्य दायादस्त्रसदस्युर्महायशाः ॥ ४१<br>नर्मदायां समुत्पन्नः सम्भूतिस्तस्य चात्मजः ।<br>विष्णुवृद्धः सुतस्तस्य विष्णुवृद्धा यतः स्मृताः ॥ ४२<br>एते ह्याङ्गिरसः पक्षे क्षत्रोपेताः समाश्रिताः ।<br>सम्भूतिरपरं पुत्रमनरण्यमजीजनत् ॥ ४३<br>रावणेन हतो योऽसौ त्रैलोक्यविजये द्विजाः ।<br>बृहदश्वोऽनरण्यस्य हर्यश्वस्तस्य चात्मजः ॥ ४४<br>हर्यश्वात्तु दृषद्वत्यां जज्ञे वसुमना नृपः ।<br>तस्य पुत्रोऽभवद्राजा त्रिधन्वा भवभावितः ॥ ४५<br>प्रसादाद् ब्रह्मसूनोर्वै तण्डिनः प्राप्य शिष्यताम् ।<br>अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्य तदाज्ञया ॥ ४६<br>गणैश्वर्यमनुप्राप्तो भवभक्तः प्रतापवान् ।<br>कथं चैवाश्वमेधं वै करोमीति विचिन्तयन् ॥ ४७<br>धनहीनश्च धर्मात्मा दृष्टवान् ब्रह्मणः सुतम् ।<br>तण्डिसंज्ञं द्विजं तस्माल्लब्धवान् द्विजसत्तमाः ॥ ४८<br>नाम्नां सहस्रं रुद्रस्य ब्रह्मणा कथितं पुरा ।<br>तेन नाम्नां सहस्रेण स्तुत्वा तण्डिर्महेश्वरम् ॥ ४९<br>लब्धवान् गाणपत्यं च ब्रह्मयोनिर्द्विजोत्तमः ।<br>ततस्तस्मान्नृपो लब्ध्वा तण्डिना कथितं पुरा ॥ ५०<br>नाम्नां सहस्रं जप्त्वा वै गाणपत्यमवाप्तवान् । | ये तीनों लोकोंमें विख्यात थे। अम्बरीषके पुत्र युवनाश्व द्वितीय बताये गये हैं। युवनाश्वके पुत्र हरित थे, जिनसे उत्पन्न सभी पुत्र 'हरित' [नामवाले] कहे गये हैं। ये सब अंगिराके वंशके ब्राह्मण थे, किन्तु क्षत्रिय-स्वभाववाले थे॥ ३१–४० १/२॥<br><br>पुरुकुत्सके पुत्र महायशस्वी त्रसदस्यु थे। उनके पुत्र सम्भूति थे, जो नर्मदाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। उन [सम्भूति]-के पुत्र विष्णुवृद्ध थे। विष्णुवृद्धके सभी वंशज विष्णुवृद्ध [नामवाले] कहे गये हैं। ये सब भी अंगिराके वंशमें [ब्राह्मण] थे, किन्तु क्षत्रिय-स्वभावसे युक्त थे। हे द्विजो! सम्भूतिने अनरण्य नामक दूसरे पुत्रको उत्पन्न किया, जो त्रैलोक्य-विजयके समय रावणके द्वारा मार दिये गये। अनरण्यके पुत्र बृहदश्व और बृहदश्वके पुत्र हर्यश्व थे। हर्यश्वसे [उनकी पत्नी] दृषद्वतीके गर्भसे राजा 'वसुमना' उत्पन्न हुए। उनके त्रिधन्वा नामक पुत्र हुए; वे शिवभक्त थे। उन प्रतापी तथा शिवभक्तने ब्रह्माके पुत्र तण्डीकी कृपासे उनकी शिष्यता प्राप्त करके और उनकी आज्ञासे हजार अश्वमेधका फल प्राप्तकर गणोंके स्वामीका पद ग्रहण कर लिया था। 'मैं अश्वमेध कैसे करूँ'—[किसी समय] ऐसा सोचते हुए उन धनहीन धर्मात्मा [त्रिधन्वा]-ने ब्रह्माके पुत्र तण्डी नामक ब्राह्मणको देखा और हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! रुद्रसहस्रनामको उनसे प्राप्त कर लिया। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने [तण्डीको] रुद्रसहस्रनाम बताया था; उसी सहस्रनामसे महेश्वरकी स्तुति करके ब्रह्माजीके पुत्र द्विजश्रेष्ठ तण्डीने गणाधिप पद प्राप्त किया था। तदनन्तर पूर्वकालमें तण्डीके द्वारा बताये गये रुद्र सहस्रनामको ग्रहण करके राजा [त्रिधन्वा]-ने भी गणाधिप पद प्राप्त किया॥ ४१–५० १/२ ॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>नाम्नां सहस्रं रुद्रस्य तण्डिना ब्रह्मयोनिना ॥ ५१<br>कथितं सर्ववेदार्थसञ्चयं सूत सुव्रत ।<br>नाम्नां सहस्रं विप्राणां वक्तुमर्हसि शोभनम् ॥ ५२ | **ऋषिगण बोले—**ब्रह्माके पुत्र तण्डीके द्वारा कहा गया रुद्रसहस्रनाम समग्र वेदार्थोंसे परिपूर्ण है; हे सूतजी! हे सुव्रत! उस उत्तम सहस्रनामको कृपा करके [हम] विप्रोंको बताइये॥ ५१–५२॥ |
| सूत उवाच<br>सर्वभूतात्मभूतस्य हरस्यामिततेजसः ।<br>अष्टोत्तरसहस्रं तु नाम्नां शृणुत सुव्रताः ॥ ५३ | **सूतजी बोले—**हे सुव्रतो! हे श्रेष्ठ मुनियो! सभी प्राणियोंके आत्मस्वरूप तथा अमित तेजवाले रुद्रके एक |
| २८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत मूल (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यज्जप्त्वा तु मुनिश्रेष्ठा गाणपत्यमवाप्तवान्। | हजार आठ नामोंवाले स्तोत्रको सुनिये, जिसका जप करके तण्डीने गणाधिप पद प्राप्त किया था॥ ५३ १/२॥ |
| ॐस्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भानुः प्रवरो वरदो वरः॥ ५४<br>सर्वात्मा सर्वविख्यातः सर्वः सर्वकरो भवः।<br>जटी दण्डी शिखण्डी च सर्वगः सर्वभावनः॥ ५५<br>हरिश्च हरिणाक्षश्च सर्वभूतहरः स्मृतः।<br>प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च शान्तात्मा शाश्वतो ध्रुवः॥ ५६<br>श्मशानवासी भगवान् खचरो गोचरोऽर्दनः।<br>अभिवाद्यो महाकर्मा तपस्वी भूतधारणः॥ ५७<br>उन्मत्तवेषः प्रच्छन्नः सर्वलोकः प्रजापतिः।<br>महारूपो महाकायः सर्वरूपो महायशाः॥ ५८ | ‘ॐ स्थिर, स्थाणु, प्रभु, भानु, प्रवर, वरद, वर, सर्वात्मा, सर्वविख्यात, सर्व, सर्वकर, भव, जटी, दण्डी, शिखण्डी, सर्वग, सर्वभावन, हरि, हरिणाक्ष, सर्वभूतहर, स्मृत, प्रवृत्ति, निवृत्ति, शान्तात्मा, शाश्वत, ध्रुव, श्मशानवासी, भगवान्, खचर, गोचर, अर्दन, अभिवाद्य, महाकर्मा, तपस्वी, भूतधारण, उन्मत्तवेष, प्रच्छन्न, सर्वलोक, प्रजापति, महारूप, महाकाय, सर्वरूप, महायश॥ ५४—५८॥ |
| महात्मा सर्वभूतश्च विरूपो वामनो नरः।<br>लोकपालोऽन्तर्हितात्मा प्रसादोऽभयदो विभुः॥ ५९<br>पवित्रश्च महांश्चैव नियतो नियताश्रयः।<br>स्वयम्भूः सर्वकर्मा च आदिरादिकरो निधिः॥ ६०<br>सहस्राक्षो विशालाक्षः सोमो नक्षत्रसाधकः।<br>चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्ग्रहो ग्रहपतिर्मतः॥ ६१<br>राजा राज्योदयः कर्ता मृगबाणार्पणो घनः।<br>महातपा दीर्घतपा अदृश्यो धनसाधकः॥ ६२ | महात्मा, सर्वभूत, विरूप, वामन, नर, लोकपाल, अन्तर्हितात्मा, प्रसाद, अभयद, विभु, पवित्र, महान्, नियत, नियताश्रय, स्वयम्भू, सर्वकर्मा, आदि, आदिकर, निधि, सहस्राक्ष, विशालाक्ष, सोम, नक्षत्रसाधक, चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु, ग्रह (मंगल), ग्रहपति (बृहस्पति), मत (बुध), राजा (शुक्र), राज्योदय (राहु), कर्ता, मृगबाणार्पण, घन, महातप, दीर्घतप, अदृश्य, धनसाधक॥ ५९—६२॥ |
| संवत्सरः कृतो मन्त्रः प्राणायामः परन्तपः।<br>योगी योगो महाबीजो महारेता महाबलः॥ ६३<br>सुवर्णरेताः सर्वज्ञः सुबीजो वृषवाहनः।<br>दशबाहुस्त्वनिमिषो नीलकण्ठ उमापतिः॥ ६४<br>विश्वरूपः स्वयंश्रेष्ठो बलवीरो बलाग्रणीः।<br>गणकर्ता गणपतिर्दिग्वासाः काम्य एव च॥ ६५<br>मन्त्रवित्परमो मन्त्रः सर्वभावकरो हरः।<br>कमण्डलुधरो धन्वी बाणहस्तः कपालवान्॥ ६६ | संवत्सर, कृत, मन्त्र, प्राणायाम, परन्तप, योगी, योग, महाबीज, महारेता, महाबल, सुवर्णरेता, सर्वज्ञ, सुबीज, वृषवाहन, दशबाहु, अनिमिष, नीलकण्ठ, उमापति, विश्वरूप, स्वयंश्रेष्ठ, बलवीर, बलाग्रणी, गणकर्ता, गणपति, दिग्वास, काम्य, मन्त्रवित्, परम, मन्त्र, सर्व-भावकर, हर, कमण्डलुधर, धन्वी, बाणहस्त, कपालवान्॥ ६३—६६॥ |
| शरी शतघ्नी खड्गी च पट्टिशी चायुधी महान्।<br>अजश्च मृगरूपश्च तेजस्तेजस्करो विधिः॥ ६७<br>उष्णीषी च सुवक्त्रश्च उदग्रो विनतस्तथा।<br>दीर्घश्च हरिकेशश्च सुतीर्थः कृष्ण एव च॥ ६८<br>शृगालरूपः सर्वार्थो मुण्डः सर्वशुभङ्करः।<br>सिंहशार्दूलरूपश्च गन्धकारी कपर्द्यपि॥ ६९<br>ऊर्ध्वरेतोर्ध्वलिङ्गी च ऊर्ध्वशायी नभस्तलः।<br>त्रिजटी चीरवासाश्च रुद्रः सेना पतिर्विभुः॥ ७०<br>अहोरात्रं च नक्तं च तिग्ममन्युः सुवर्चसः।<br>गजहा दैत्यहा कालो लोकधाता गुणाकरः॥ ७१ | शरी, शतघ्नी, खड्गी, पट्टिशी, आयुधी, महान्, अज, मृगरूप, तेज, तेजस्कर, विधि, उष्णीषी, सुवक्त्र, उदग्र, विनत, दीर्घ, हरिकेश, सुतीर्थ, कृष्ण, शृगालरूप, सर्वार्थ, मुण्ड, सर्वशुभंकर, सिंहशार्दूलरूप, गन्धकारी, कपर्दी, ऊर्ध्वरेता, ऊर्ध्वलिङ्गी, ऊर्ध्वशायी, नभ, तल, त्रिजटी, चीरवासा, रुद्र, सेना, पति, विभु, अहोरात्र, नक्त, तिग्ममन्यु, सुवर्चस, गजहा, दैत्यहा, काल, लोकधाता, गुणाकर॥ ६७—७१॥ |
| सिंहशार्दूलरूपाणामाई्र्रचर्माम्बरन्धरः ।<br>कालयोगी महानादः सर्वावासश्चतुष्पथः॥ ७२ | सिंहशार्दूलरूपाणामाई्र्रचर्माम्बरंधर, कालयोगी, महा- |
अध्याय ६५] सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम २८१
| श्लोक | नाम-सूची |
|---|---|
| निशाचरः प्रेतचारी सर्वदर्शी महेश्वरः।<br>बहु भूतो बहुधनः सर्वसारोऽमृतेश्वरः॥ ७३<br>नृत्यप्रियो नित्यनृत्यो नर्तनः सर्वसाधकः।<br>सकार्मुको महाबाहुर्महाघोरो महातपाः॥ ७४<br>महाशरो महापाशो नित्यो गिरिचरोऽमतः।<br>सहस्रहस्तो विजयो व्यवसायो ह्यनिन्दितः॥ ७५<br>अमर्षणो मर्षणात्मा यज्ञहा कामनाशनः।<br>दक्षहा परिचारी च प्रहसो मध्यमस्तथा॥ ७६ | नाद, सर्वावास, चतुष्पथ, निशाचर, प्रेतचारी, सर्वदर्शी, महेश्वर, बहु, भूत, बहुधन, सर्वसार, अमृतेश्वर, नृत्यप्रिय, नित्यनृत्य, नर्तन, सर्वसाधक, सकार्मुक, महाबाहु, महाघोर, महातप, महाशर, महापाश, नित्य, गिरिचर, अमत, सहस्रहस्त, विजय, व्यवसाय, अनिन्दित, अमर्षण, मर्षणात्मा, यज्ञहा, कामनाशन, दक्षहा, परिचारी, प्रहस, मध्यम॥ ७२—७६॥ |
| तेजोऽपहारी बलवान् विदितोऽभ्युदितोऽबहुः।<br>गम्भीरघोषो योगात्मा यज्ञहा कामनाशनः॥ ७७<br>गम्भीररोषो गम्भीरो गम्भीरबलवाहनः।<br>न्यग्रोधरूपो न्यग्रोधो विश्वकर्मा च विश्वभुक्॥ ७८<br>तीक्ष्णोपायश्च हर्यश्वः सहायः कर्म कालवित्।<br>विष्णुः प्रसादितो यज्ञः समुद्रो वडवामुखः॥ ७९<br>हुताशनसहायश्च प्रशान्तात्मा हुताशनः।<br>उग्रतेजा महातेजा जयो विजयकालवित्॥ ८० | तेज, अपहारी, बलवान्, विदित, अभ्युदित, अबहु, गम्भीरघोष, योगात्मा, यज्ञहा, कामना, अशन, गम्भीररोष, गम्भीर, गम्भीरबलवाहन, न्यग्रोधरूप, न्यग्रोध, विश्वकर्मा, विश्वभुक्, तीक्ष्णोपाय, हर्यश्व, सहाय, कर्म, कालवित्, विष्णु, प्रसादित, यज्ञ, समुद्र, वडवामुख, हुताशनसहाय, प्रशान्तात्मा, हुताशन, उग्रतेज, महातेज, जय, विजय-कालवित्॥ ७७—८०॥ |
| ज्योतिषामयनं सिद्धिः सन्धिविग्रह एव च।<br>खड्गी शङ्खी जटी ज्वाली खचरो द्युचरो बली॥ ८१<br>वैणवी पणवी कालः कालकण्ठः कटङ्कटः।<br>नक्षत्रविग्रहो भावो निभावः सर्वतोमुखः॥ ८२<br>विमोचनस्तु शरणो हिरण्यकवचोद्भवः।<br>मेखला कृतिरूपश्च जलाचारः स्तुतस्तथा॥ ८३<br>वीणी च पणवी ताली नाली कलिकदुस्तथा।<br>सर्वतूर्यनिनादी च सर्वव्याप्यपरिग्रहः॥ ८४ | ज्योतिषामयन, सिद्धि, सन्धि, विग्रह, खड्गी, शंखी, जटी, ज्वाली, खचर, द्युचर, बली, वैणवी, पणवी, काल, कालकण्ठ, कटंकट, नक्षत्रविग्रह, भाव, निभाव, सर्वतोमुख, विमोचन, शरण, हिरण्यकवचोद्भव, मेखला, कृतिरूप, जलाचार, स्तुत, वीणी, पणवी, ताली, नाली कलिकदु, सर्वतूर्यनिनादी, सर्वव्याप्य-परिग्रह॥ ८१—८४॥ |
| व्यालरूपी बिलावासी गुहावासी तरङ्गवित्।<br>वृक्षः श्रीमालकर्मा च सर्वबन्धविमोचनः॥ ८५<br>बन्धनस्तु सुरेन्द्राणां युधि शत्रुविनाशनः।<br>सखा प्रवासो दुर्वापः सर्वसाधुनिषेवितः॥ ८६<br>प्रस्कन्दोऽप्यविभावश्च तुल्यो यज्ञविभागवित्।<br>सर्ववासः सर्वचारी दुर्वासा वासवो मतः॥ ८७<br>हैमो हेमकरो यज्ञः सर्वधारी धरोत्तमः।<br>आकाशो निर्विरूपश्च विवासा उरगः खगः॥ ८८ | व्यालरूपी, बिलावासी, गुहावासी, तरंगवित्, वृक्ष, श्रीमालकर्मा, सर्वबन्धविमोचन, बन्धन, सुरेन्द्राणां युधि-शत्रुविनाशन, सखा, प्रवास, दुर्वाप, सर्वसाधु-निषेवित, प्रस्कन्द, अविभाव, तुल्य, यज्ञविभागवित्, सर्ववास, सर्वचारी, दुर्वासा, वासव, मत, हैम, हेमकर, यज्ञ, सर्वधारी, धरोत्तम, आकाश, निर्विरूप, विवास, उरग, खग॥ ८५—८८॥ |
| भिक्षुश्च भिक्षुरूपी च रौद्ररूपः सुरूपवान्।<br>वसुरेताः सुवर्चस्वी वसुवेगो महाबलः॥ ८९<br>मनो वेगो निशाचारः सर्वलोकशुभप्रदः।<br>सर्वावासी त्रयीवासी उपदेशकरो धरः॥ ९०<br>मुनिरात्मा मुनिर्लोकः सभाग्यश्च सहस्रभुक्।<br>पक्षी च पक्षरूपश्च अतिदीप्तो निशाकरः॥ ९१ | भिक्षु, भिक्षुरूपी, रौद्ररूप, सुरूपवान्, वसुरेता, सुवर्चस्वी, वसुवेग, महाबल, मन, वेग, निशाचार, सर्वलोकशुभप्रद, सर्वावासी, त्रयीवासी, उपदेशकर, धर, मुनि, आत्मा, मुनि, लोक, सभागय, सहस्रभुक्, पक्षी, |
२८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ अध्याय ६५ ---|---
| समीरो दमनाकारो ह्यर्थो ह्यर्थकरो वशः ।<br>वासुदेवश्च देवश्च वामदेवश्च वामनः ॥ ९२ | पक्षरूप, अतिदीप्त, निशाकर, समीर, दमनाकार, अर्थ, अर्थकर, वश, वासुदेव, देव, वामदेव, वामन ॥ ८९–९२ ॥ | | सिद्धिद्योगापहारी च सिद्धः सर्वार्थसाधकः ।<br>अक्षूणः क्षूणरूपश्च वृषणो मृदुरव्ययः ॥ ९३<br>महासेनो विशाखश्च षष्टिभागो गवां पतिः ।<br>चक्रहस्तस्तु विष्टम्भी मूलस्तम्भन एव च ॥ ९४<br>ऋतुर्ऋतुकरस्तालो मधुर्मधुकरो वरः ।<br>वानस्पत्यो वाजसनो नित्यमाश्रमपूजितः ॥ ९५<br>ब्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी सुचारवित् ।<br>ईशान ईश्वरः कालो निशाचारी ह्यनेकदृक् ॥ ९६ | सिद्धिद्योगापहारी, सिद्ध, सर्वार्थसाधक, अक्षूण, क्षूणरूप, वृषण, मृदु, अव्यय, महासेन, विशाख, षष्टिभाग, गवां पति, चक्रहस्त, विष्टम्भी, मूलस्तम्भन, ऋतु, ऋतुकर, ताल, मधु, मधुकर, वर, वानस्पत्य, वाजसन, नित्य, आश्रमपूजित, ब्रह्मचारी, लोकचारी, सर्वचारी, सुचारवित्, ईशान, ईश्वर, काल, निशाचारी, अनेकदृक् ॥ ९३–९६ ॥ | | निमित्तस्थो निमित्तं च नन्दिर्नन्दिकरो हरः ।<br>नन्दीश्वरः सुनन्दी च नन्दनो विषमर्दनः ॥ ९७<br>भगहारी नियन्ता च कालो लोकपितामहः ।<br>चतुर्मुखो महालिङ्गश्चारुलिङ्गस्तथैव च ॥ ९८<br>लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षः कालाध्यक्षो युगावहः ।<br>बीजाध्यक्षो बीजकर्ता अध्यात्मानुगतो बलः ॥ ९९<br>इतिहासश्च कल्पश्च दमनो जगदीश्वरः ।<br>दम्भो दम्भकरो दाता वंशो वंशकरः कलिः ॥ १०० | निमित्तस्थ, निमित्त, नन्दि, नन्दिकर, हर, नन्दीश्वर, सुनन्दी, नन्दन, विषमर्दन, भगहारी, नियन्ता, काल, लोकपितामह, चतुर्मुख, महालिङ्ग, चारुलिङ्ग, लिङ्गाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, कालाध्यक्ष, युगावह, बीजाध्यक्ष, बीजकर्ता, अध्यात्म, अनुगत, बल, इतिहास, कल्प, दमन, जगदीश्वर, दम्भ, दम्भकर, दाता, वंश, वंशकर, कलि ॥ ९७–१०० ॥ | | लोककर्ता पशुपतिर्महाकर्ता ह्यधोक्षजः ।<br>अक्षरं परमं ब्रह्म बलवाञ्छुक्र एव च ॥ १०१<br>नित्यो ह्यनीशः शुद्धात्मा शुद्धो मानो गतिर्हविः ।<br>प्रासादस्तु बलो दर्पो दर्पणो हव्य इन्द्रजित् ॥ १०२<br>वेदकारः सूत्रकारो विद्वांश्च परमर्दनः ।<br>महामेघनिवासी च महाघोरो वशी करः ॥ १०३<br>अग्निज्वलो महाज्वालः परिधूम्रावृतो रविः ।<br>धिषणः शङ्करोऽनित्यो वर्चस्वी धूम्रलोचनः ॥ १०४ | लोककर्ता, पशुपति, महाकर्ता, अधोक्षज, अक्षर, परम, ब्रह्म, बलवान्, शुक्र, नित्य, अनीश, शुद्धात्मा, शुद्ध, मान, गति, हवि, प्रासाद, बल, दर्प, दर्पण, हव्य, इन्द्रजित्, वेदकार, सूत्रकार, विद्वान्, परमर्दन, महामेघनिवासी, महाघोर, वशी, कर, अग्निज्वाल, महाज्वाल, परिधूम्रावृत, रवि, धिषण, शंकर, अनित्य, वर्चस्वी, धूम्रलोचन ॥ १०१–१०४ ॥ | | नीलस्तथाऽङ्गुलुप्तश्च शोभनो नरविग्रहः ।<br>स्वस्ति स्वस्तिस्वभावश्च भोगी भोगकरो लघुः ॥ १०५<br>उत्सङ्गश्च महाङ्गश्च महागर्भः प्रतापवान् ।<br>कृष्णवर्णः सुवर्णश्च इन्द्रियः सर्ववर्णिकः ॥ १०६<br>महापादो महाहस्तो महाकायो महायशाः ।<br>महामूर्धा महामात्रो महामित्रो नगालयः ॥ १०७<br>महास्कन्धो महाकर्णो महोष्ठश्च महाहनुः ।<br>महानासो महाकण्ठो महाग्रीवः श्मशानवान् ॥ १०८ | नील, अंग्लुप्त, शोभन, नरविग्रह, स्वस्ति, स्वस्तिस्वभाव, भोगी, भोगकर, लघु, उत्संग, महांग, महागर्भ, प्रतापवान्, कृष्णवर्ण, सुवर्ण, इन्द्रिय, सर्ववर्णिक, महापाद, महाहस्त, महाकाय, महायश, महामूर्धा, महामात्र, महामित्र, नगालय, महास्कन्ध, महाकर्ण, महोष्ठ, महाहनु, महानास, महाकण्ठ, महाग्रीव, श्मशानवान् ॥ १०५–१०८ ॥ | | महाबलो महातेजा ह्यन्तरात्मा मृगालयः ।<br>लम्बितोष्ठश्च निष्ठश्च महामायः पयोनिधिः ॥ १०९<br>महादन्तो महादंष्ट्रो महाजिह्वो महामुखः ।<br>महानखो महारोमा महाकेशो महाजटः ॥ ११० | महाबल, महातेज, अन्तरात्मा, मृगालय, लम्बितोष्ठ, निष्ठ, महामाय, पयोनिधि, महादन्त, महाद्रंष्ट्र महाजिह्व, महामुख, महानख, महारोम, महाकेश, महाजट, |
अध्याय ६५ ] सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम २८३
| श्लोक | नामावली / अर्थ |
|---|---|
| असपत्नः प्रसादश्च प्रत्ययो गीतसाधकः।<br>प्रस्वेदनोऽस्वहेनश्च आदिकश्च महामुनिः॥ १११<br>वृषको वृषकेतुश्च अनलो वायुवाहनः।<br>मण्डली मेरुवासश्च देववाहन एव च॥ ११२ | असपत्न, प्रसाद, प्रत्यय, गीतसाधक, प्रस्वेदन, अस्वहेन, आदिक, महामुनि, वृषक, वृषकेतु, अनल, वायुवाहन, मण्डली, मेरुवास, देववाहन॥ १०९—११२॥ |
| अथर्वशीर्षः सामास्य ऋक्सहस्रोजितेक्षणः।<br>यजुःपादभुजो गुह्यः प्रकाशौजस्तथैव च॥ ११३<br>अमोघार्थप्रसादश्च अन्तर्भाव्यः सुदर्शनः।<br>उपहारः प्रियः सर्वः कनकः काञ्चनस्थितः॥ ११४<br>नाभिर्नन्दिकरो हर्म्यः पुष्करः स्थपतिः स्थितः।<br>सर्वशास्त्रो धनश्चाद्यो यज्ञो यज्वा समाहितः॥ ११५<br>नगो नीलः कविः कालो मकरः कालपूजितः।<br>सगणो गणकारश्च भूतभावनसारथिः॥ ११६ | अथर्वशीर्ष, सामास्य, ऋक्सहस्रोजितेक्षण, यजुःपादभुज, गुह्य, प्रकाशौज, अमोघार्थप्रसाद, अन्तर्भाव्य, सुदर्शन, उपहार, प्रिय, सर्व, कनक, काञ्चनस्थित, नाभि, नन्दिकर, हर्म्य, पुष्कर, स्थपति, स्थित, सर्वशास्त्र, धन, आद्य, यज्ञ, यज्वा, समाहित, नग, नील, कवि, काल, मकर, कालपूजित, सगण, गणकार, भूतभावन-सारथि॥ ११३—११६॥ |
| भस्मशायी भस्मगोप्ता भस्मभूततनुर्गणः।<br>आगमश्च विलोपश्च महात्मा सर्वपूजितः॥ ११७<br>शुक्लः स्त्रीरूपसम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः।<br>आश्रमस्थः कपोतस्थो विश्वकर्मा पतिर्विराट्॥ ११८<br>विशालशाखस्ताम्रोष्ठो ह्यम्बुजालः सुनिश्चितः।<br>कपिलः कलशः स्थूल आयुधश्चैव रोमशः॥ ११९<br>गन्धर्वो ह्यदितिस्तार्क्ष्यो ह्यविज्ञेयः सुशारदः।<br>परश्वधायुधो देवो ह्यर्थकारी सुबान्धवः॥ १२० | भस्मशायी, भस्मगोप्ता, भस्मभूततनु, गण, आगम, विलोप, महात्मा, सर्वपूजित, शुक्ल, स्त्रीरूपसम्पन्न, शुचि, भूतनिषेवित, आश्रमस्थ, कपोतस्थ, विश्वकर्मा, पति, विराट्, विशालशाख, ताम्रोष्ठ, अम्बुजाल, सुनिश्चित, कपिल, कलश, स्थूल, आयुध, रोमश, गन्धर्व, अदिति, तार्क्ष्य, अविज्ञेय, सुशारद, परश्वधायुध, देव, अर्थकारी, सुबान्धव॥ ११७—१२०॥ |
| तुम्बवीणो महाकोप ऊर्ध्वरेता जलेशयः।<br>उग्रो वंशकरो वंशो वंशवादी ह्यनिन्दितः॥ १२१<br>सर्वाङ्गरूपी मायावी सुहृदो ह्यनिलो बलः।<br>बन्धनो बन्धकर्ता च सुबन्धनविमोचनः॥ १२२<br>राक्षसघ्नोऽथ कामारिर्महादंष्ट्रो महायुधः।<br>लम्बितो लम्बितोष्ठश्च लम्बहस्तो वरप्रदः॥ १२३<br>बाहुस्त्वनिन्दितः सर्वः शङ्करोऽथाप्यकोपनः।<br>अमरेशो महाघोरो विश्वदेवः सुरारिहा॥ १२४ | तुम्बवीण, महाकोप, ऊर्ध्वरेता, जलेशय, उग्र, वंशकर, वंश, वंशवादी, अनिन्दित, सर्वाङ्गरूपी, मायावी, सुहृद, अनिल, बल, बन्धन, बन्धकर्ता, सुबन्धन-विमोचन, राक्षसघ्न, कामारि, महादंष्ट्र, महायुध, लम्बित, लम्बितोष्ठ, लम्बहस्त, वरप्रद, बाहु, अनिन्दित, सर्व, शंकर, अकोपन, अमरेश, महाघोर, विश्वदेव, सुरारिहा॥ १२१—१२४॥ |
| अहिर्बुध्न्यो निर्ऋतिश्च चेकितानो हली तथा।<br>अजैकपाच्च कापाली शं कुमारो महागिरिः॥ १२५<br>धन्वन्तरिर्धूमकेतुः सूर्यो वैश्रवणस्तथा।<br>धाता विष्णुश्च शक्रश्च मित्रस्त्वष्टा धरो ध्रुवः॥ १२६<br>प्रभासः पर्वतो वायुरर्यमा सविता रविः।<br>धृतिश्चैव विधाता च मान्धाता भूतभावनः॥ १२७<br>नीरस्तीर्थश्च भीमश्च सर्वकर्मा गुणोद्वहः।<br>पद्मगर्भो महागर्भश्चन्द्रवक्त्रो नभोऽनघः॥ १२८ | अहिर्बुध्न्य, निर्ऋति, चेकितान, हली, अजैकपात्, कापाली, शं, कुमार, महागिरि, धन्वन्तरि, धूमकेतु, सूर्य, वैश्रवण, धाता, विष्णु, शक्र, मित्र, त्वष्टा, धर, ध्रुव, प्रभास, पर्वत, वायु, अर्यमा, सविता, रवि, धृति, विधाता, मान्धाता, भूतभावन, नीर, तीर्थ, भीम, सर्वकर्मा, गुणोद्वह, पद्मगर्भ, महागर्भ, चन्द्रवक्त्र, नभ, अनघ॥ १२५—१२८॥ |
| बलवांश्चोपशान्तश्च पुराणः पुण्यकृत्तमः।<br>क्रूरकर्ता क्रूरवासी तनुरात्मा महौषधः॥ १२९ | बलवान्, उपशान्त, पुराण, पुण्यकृत्, तम, क्रूरकर्ता, |
| २८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| श्लोक | अर्थ / नाम |
|---|---|
| सर्वशयः सर्वचारी प्राणेशः प्राणिनां पतिः।<br>देवदेवः सुखोत्सिक्तः सदसत्सर्वरत्नवित्॥ १३०॥<br>कैलासस्थो गुहावासी हिमवद् गिरिसंश्रयः।<br>कुलहारी कुलाकर्ता बहुवित्तो बहुप्रजः॥ १३१॥<br>प्राणेशो बन्धकी वृक्षो नकुलश्चाद्रिकस्तथा।<br>ह्रस्वग्रीवो महाजानुरलोलश्च महौषधिः॥ १३२॥ | क्रूरवासी, तनु, आत्मा, महौषध, सर्वशय, सर्वचारी, प्राणेश, प्राणिनांपति, देवदेव, सुखोत्सिक्त, सत्, असत्, सर्वरत्नवित्, कैलासस्थ, गुहावासी, हिमवद्, गिरिसंश्रय, कुलहारी, कुलाकर्ता, बहुवित्त, बहुप्रज, प्राणेश, बन्धकी, वृक्ष, नकुल, अद्रिक, ह्रस्वग्रीव, महाजानु, अलोल, महौषधि ॥ १२९—१३२ ॥ |
| सिद्धान्तकारी सिद्धार्थश्छन्दो व्याकरणोद्भवः।<br>सिंहनादः सिंहदंष्ट्रः सिंहास्यः सिंहवाहनः॥ १३३॥<br>प्रभावात्मा जगत्कालः कालः कम्पी तरुस्तनुः।<br>सारङ्गो भूतचक्राङ्कः केतुमाली सुवेधकः॥ १३४॥<br>भूतालयो भूतपतिरहोरात्रो मलोऽमलः।<br>वसुभृत्सर्वभूतात्मा निश्चलः सुविदुर्बुधः॥ १३५॥<br>असुहृत्सर्वभूतानां निश्चलश्चलविद् बुधः।<br>अमोघः संयमो हृष्टो भोजनः प्राणधारणः॥ १३६॥ | सिद्धान्तकारी, सिद्धार्थ, छन्द, व्याकरणोद्भव, सिंहनाद, सिंहदंष्ट्र, सिंहास्य, सिंहवाहन, प्रभावात्मा, जगत्काल, काल, कम्पी, तरु, तनु, सारंग, भूतचक्रांक, केतुमाली, सुवेधक, भूतालय, भूतपति, अहोरात्र, मल, अमल, वसुभृत्, सर्वभूतात्मा, निश्चल, सुविद्, बुध, सर्वभूतानामसुहृत्, निश्चल, चलविद्, बुध, अमोघ, संयम, हृष्ट, भोजन, प्राणधारण ॥ १३३—१३६ ॥ |
| धृतिमान् मतिमांस्त्र्यक्षः सुकृतस्तु युधांपतिः।<br>गोपालो गोपतिर्ग्रामो गोचर्मवसनो हरः॥ १३७॥<br>हिरण्यबाहुश्च तथा गुहावासः प्रवेशनः।<br>महामना महाकामो चित्तकामो जितेन्द्रियः॥ १३८॥<br>गान्धारश्च सुरापश्च तापकर्मरतो हितः।<br>महाभूतो भूतवृतो ह्यप्सरो गणसेवितः॥ १३९॥<br>महाकेतुर्धराधाता नैकतानरतः स्वरः।<br>अवेदनीय आवेद्यः सर्वगश्च सुखावहः॥ १४०॥ | धृतिमान्, मतिमान्, त्र्यक्ष, सुकृत, युधांपति, गोपाल, गोपति, ग्राम, गोचर्मवसन, हर, हिरण्यबाहु, गुहावास, प्रवेशन, महामना, महाकाम, चित्तकाम, जितेन्द्रिय, गान्धार, सुराप, तापकर्मरत, हित, महाभूत, भूतवृत, अप्सर, गणसेवित, महाकेतु, धराधाता, नैकतानरत, स्वर, अवेदनीय, आवेद्य, सर्वग, सुखावह ॥ १३७—१४० ॥ |
| तारणश्चरणो धाता परिधा परिपूजितः।<br>संयोगी वर्धनो वृद्धो गणिकोऽथ गणाधिपः॥ १४१॥<br>नित्यो धाता सहायश्च देवासुरपतिः पतिः।<br>युक्तश्च युक्तबाहुश्च सुदेवोऽपि सुपर्वणः॥ १४२॥<br>आषाढश्च सुषाढश्च स्कन्धदो हरितो हरः।<br>वपुरावर्तमानोऽन्यो वपुःश्रेष्ठो महावपुः॥ १४३॥<br>शिरो विमर्शनः सर्वलक्ष्यलक्षणभूषितः।<br>अक्षयो रथगीतश्च सर्वभोगी महाबलः॥ १४४॥ | तारण, चरण, धाता, परिधा, परिपूजित, संयोगी, वर्धन, वृद्ध, गणिक, गणाधिप, नित्य, धाता, सहाय, देवासुरपति, पति, युक्त, युक्तबाहु, सुदेव, सुपर्वण, आषाढ़, सुषाढ़, स्कन्धद, हरित, हर, वपु, आवर्तमान, अन्य, वपुश्रेष्ठ, महावपु, शिर, विमर्शन, सर्वलक्ष्य-लक्षण-भूषित, अक्षय, रथगीत, सर्वभोगी, महाबल ॥ १४१—१४४ ॥ |
| साम्नायोऽथ महाम्नायस्तीर्थदेवो महायशाः।<br>निर्जीवो जीवनो मन्त्रः सुभगो बहुकर्कशः॥ १४५॥<br>रत्नभूतोऽथ रत्नाङ्गो महार्णवनिपातवित्।<br>मूलं विशालो ह्यमृतं व्यक्ताव्यक्तस्तपोनिधिः॥ १४६॥<br>आरोहणोऽधिरोहश्च शीलधारी महातपाः।<br>महाकण्ठो महायोगी युगो युगकरो हरिः॥ १४७॥<br>युगरूपो महारूपो वहनो गहनो नगः।<br>न्यायो निर्वापणोऽपादः पण्डितो ह्यचलोपमः॥ १४८॥ | साम्नाय, महाम्नाय, तीर्थदेव, महायश, निर्जीव, जीवन, मन्त्र, सुभग, बहुकर्कश, रत्नभूत, रत्नांग, महार्णवनिपातवित्, मूल, विशाल, अमृत, व्यक्ताव्यक्त, तपोनिधि, आरोहण, अधिरोह, शीलधारी, महातप, महाकण्ठ, महायोगी, युग, युगकर, हरि, युगरूप, महारूप, वहन, गहन, नग, न्याय, निर्वापण, अपाद, पण्डित, अचलोपम ॥ १४५—१४८ ॥ |
अध्याय ६५] सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम २८५
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| बहुमालो महामालः शिपिविष्टः सुलोचनः।<br>विस्तारो लवणः कूपः कुसुमाङ्गः फलोदयः॥ १४९<br>ऋषभो वृषभो भङ्गो मणिबिम्बजटाधरः।<br>इन्दुविसर्गः सुमुखः शूरः सर्वायुधः सहः॥ १५०<br>निवेदनः सुधाजातः स्वर्गद्वारो महाधनुः।<br>गिरावासो विसर्गश्च सर्वलक्षणलक्षितवित्॥ १५१<br>गन्धमाली च भगवाननन्तः सर्वलक्षणः।<br>सन्तानो बहुलो बाहुः सकलः सर्वपावनः॥ १५२ | बहुमाल, महामाल, शिपिविष्ट, सुलोचन, विस्तार, लवण, कूप, कुसुमांग, फलोदय, ऋषभ, वृषभ, भंग, मणिबिम्बजटाधर, इन्दु, विसर्ग, सुमुख, शूर, सर्वायुध, सह, निवेदन, सुधाजात, स्वर्गद्वार, महाधनु, गिरावास, विसर्ग, सर्वलक्षणलक्षितवित्, गन्धमाली, भगवान्, अनन्त, सर्वलक्षण, सन्तान, बहुल, बाहु, सकल, सर्वपावन॥ १४९-१५२॥ |
| करस्थाली कपाली च ऊर्ध्वसंहननो युवा।<br>यन्त्रतन्त्रसुविख्यातो लोकः सर्वाश्रयो मृदुः॥ १५३<br>मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डी कुण्डी विकुर्वणः।<br>वार्यक्षः ककुभो वज्री दीप्ततेजाः सहस्रपात्॥ १५४<br>सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वदेवमयो गुरुः।<br>सहस्रबाहुः सर्वाङ्गः शरण्यः सर्वलोककृत्॥ १५५<br>पवित्रं त्रिमधुर्मन्त्रः कनिष्ठः कृष्णपिङ्गलः।<br>ब्रह्मदण्डविनिर्माता शतघ्नः शतपाशधृक्॥ १५६ | करस्थाली, कपाली, ऊर्ध्वसंहनन, युवा, यन्त्रतन्त्रसुविख्यात, लोक, सर्वाश्रय, मृदु, मुण्ड, विरूप, विकृत, दण्डी, कुण्डी, विकुर्वण, वार्यक्ष, ककुभ, वज्री, दीप्ततेज, सहस्रपात्, सहस्रमूर्धा, देवेन्द्र, सर्वदेवमय, गुरु, सहस्रबाहु, सर्वांग, शरण्य, सर्वलोककृत्, पवित्र, त्रिमधु, मन्त्र, कनिष्ठ, कृष्णपिंगल, ब्रह्मदण्डविनिर्माता, शतघ्न, शतपाशधृक्॥ १५३-१५६॥ |
| कला काष्ठा लवो मात्रा मुहूर्तोऽहः क्षपा क्षणः।<br>विश्वक्षेत्रप्रदो बीजं लिङ्गमाद्यस्तु निर्मुखः॥ १५७<br>सदसद् व्यक्तमव्यक्तं पिता माता पितामहः।<br>स्वर्गद्वारं मोक्षद्वारं प्रजाद्वारं त्रिविष्टपः॥ १५८<br>निर्वाणं हृदयञ्चैव ब्रह्मलोकः परागतिः।<br>देवासुरविनिर्माता देवासुरपरायणः॥ १५९<br>देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः।<br>देवासुरमहामात्रो देवासुरगणाश्रयः॥ १६० | कला, काष्ठा, लव, मात्रा, मुहूर्त, अहः, क्षपा, क्षण, विश्वक्षेत्रप्रद, बीज, लिङ्ग, आद्य, निर्मुख, सदसद्, व्यक्त, अव्यक्त, पिता, माता, पितामह, स्वर्गद्वार, मोक्षद्वार, प्रजाद्वार, त्रिविष्टप, निर्वाण, हृदय, ब्रह्मलोक, परागति, देवासुर-विनिर्माता, देवासुरपरायण, देवासुरगुरु, देव, देवासुरनमस्कृत, देवासुर-महामात्र, देवासुर-गणाश्रय॥ १५७-१६०॥ |
| देवासुरगणाध्यक्षो देवासुरगणाग्रणीः।<br>देवाधिदेवो देवर्षिर्देवासुरवरप्रदः॥ १६१<br>देवासुरेश्वरो विष्णुर्देवासुरमहेश्वरः।<br>सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवतात्मा स्वयम्भवः॥ १६२<br>उद्गतस्त्रिक्रमो वैद्यो वरदोऽवरजोऽम्बरः।<br>इज्यो हस्ती तथा व्याघ्रो देवसिंहो महर्षभः॥ १६३<br>विबुधाग्र्यः सुरः श्रेष्ठः स्वर्गदेवस्तथोत्तमः।<br>संयुक्तः शोभनो वक्ता आशानां प्रभवोऽव्ययः॥ १६४ | देवासुरगणाध्यक्ष, देवासुरगणाग्रणी, देवाधिदेव, देवर्षि, देवासुरवरप्रद, देवासुरेश्वर, विष्णु, देवासुरमहेश्वर, सर्वदेवमय, अचिन्त्य, देवतात्मा, स्वयम्भव, उद्गत, त्रिक्रम, वैद्य, वरद, अवरज, अम्बर, इज्य, हस्ती, व्याघ्र, देवसिंह, महर्षभ, विबुधाग्र्य, सुर, श्रेष्ठ, स्वर्गदेव, उत्तम, संयुक्त, शोभन, वक्ता, आशानांप्रभव, अव्यय॥ १६१-१६४॥ |
| गुरुः कान्तो निजः सर्गः पवित्रः सर्ववाहनः।<br>शृङ्गी शृङ्गप्रियो बभ्रू राजराजो निरामयः॥ १६५<br>अभिरामः सुशरणो निरामः सर्वसाधनः।<br>ललाटाक्षो विश्वदेहो हरिणो ब्रह्मवर्चसः॥ १६६<br>स्थावराणां पतिश्चैव नियतेन्द्रियवर्तनः।<br>सिद्धार्थः सर्वभूतार्थोऽचिन्त्यः सत्यः शुचिव्रतः॥ १६७<br>व्रताधिपः परं ब्रह्म मुक्तानां परमा गतिः।<br>विमुक्तो मुक्तकेशश्च श्रीमाञ्छ्रीवर्धनो जगत्॥ १६८ | गुरु, कान्त, निज, सर्ग, पवित्र, सर्ववाहन, शृंगी, शृंगप्रिय, बभ्रू, राजराज, निरामय, अभिराम, सुशरण, निराम, सर्वसाधन, ललाटाक्ष, विश्वदेह, हरिण, ब्रह्मवर्चस, स्थावराणां पति, नियतेन्द्रियवर्तन, सिद्धार्थ, सर्वभूतार्थ, अचिन्त्य, सत्य, शुचिव्रत, व्रताधिप, परब्रह्म, मुक्तानां परमा गति, विमुक्त, मुक्तकेश, श्रीमान्, श्रीवर्धन, जगत्॥ १६५-१६८॥ |
६६- इक्ष्वाकुवंशी राजाओंकी कथा तथा ययातिवंश-वर्णन
| २८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| यथाप्रधानं भगवानिति भक्त्या स्तुतो मया।<br>भक्तिमेवं पुरस्कृत्य मया यज्ञपतिर्विभुः ॥ १६९<br><br>ततो ह्यनुज्ञां प्राप्यैवं स्तुतो भक्तिमतां गतिः।<br>तस्माल्लब्ध्वा स्तवं शम्भोर्नृपस्त्रैलोक्यविश्रुतः ॥ १७०<br><br>अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्य महायशाः।<br>गणाधिपत्यं सम्प्राप्तस्तण्डिनस्तेजसा प्रभोः ॥ १७१ | इन नामोंकी प्रधानताके अनुसार मैंने भक्तिपूर्वक समाहितचित्त होकर भगवान् यज्ञपति विभु शिवकी स्तुति की। इस प्रकार उनसे आज्ञा पाकर मैंने भक्तोंकी गतिस्वरूप शिवकी स्तुति की। उन तण्डीसे शिवजीका स्तोत्र प्राप्त करके तीनों लोकोंमें विख्यात तथा महायशस्वी राजा [त्रिधन्वा]-ने हजार अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्तकर प्रभु तण्डीके तेजसे गणाधिपपद प्राप्त किया ॥ १६९-१७१ ॥ | | यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद् ब्राह्मणानपि।<br>अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति वै द्विजाः ॥ १७२<br><br>ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः।<br>शरणागतघाती च मित्रविश्वासघातकः ॥ १७३<br><br>मातृहा पितृहा चैव वीरहा भ्रूणहा तथा।<br>संवत्सरं क्रमाज्जप्त्वा त्रिसन्ध्यं शङ्कराश्रमे ॥ १७४<br><br>देवमिष्ट्वा त्रिसन्ध्यं च सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १७५ | हे द्विजो! जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह हजार अश्वमेधयज्ञका फल अवश्य प्राप्त करता है। ब्राह्मणका वध करनेवाला, सुरापान करनेवाला, सुवर्ण चुरानेवाला, गुरुपत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाला, शरणमें आये हुएका वध करनेवाला, मित्रके साथ विश्वासघात करनेवाला, माता-पिताका वध करनेवाला, वीर-हत्या करनेवाला तथा भ्रूणहत्या करनेवाला भी शिवमन्दिरमें वर्षपर्यन्त तीनों सन्ध्याकालोंमें क्रमसे [इन नामोंका] जप करके एवं तीनों सन्ध्याकालोंमें देव [शिव]-का पूजन करके समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १७२-१७५ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे रुद्रसहस्रनामकथनं नाम पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'रुद्रसहस्रनामकथन' नामक पैंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६५ ॥
छाछठवाँ अध्याय
इक्ष्वाकुवंशी राजाओंकी कथा तथा ययातिवंश-वर्णन
| सूत उवाच | |
|---|---|
| त्रिधन्वा देवदेवस्य प्रसादात्तण्डिनस्तथा।<br>अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्य प्रयत्नतः ॥ १<br><br>गाणपत्यं दृढं प्राप्तः सर्वदेवनमस्कृतः।<br>आसीत्त्रिधन्वनश्चापि विद्वांस्त्रय्यारुणो नृपः ॥ २<br><br>तस्य सत्यव्रतो नाम कुमारोऽभून्महाबलः।<br>तेन भार्या विदर्भस्य हृता हत्वामितौजसम् ॥ ३<br><br>पाणिग्रहणमन्त्रेषु निष्ठामप्रापितेष्विह।<br>तेनाधर्मेण संयुक्तं राजा त्रय्यारुणोऽत्यजत् ॥ ४ | सूतजी बोले—[हे द्विजो!] त्रिधन्वाने देवदेव तण्डीकी कृपासे प्रयत्नपूर्वक हजार अश्वमेधयज्ञोंका फल प्राप्त करके सभी देवताओंसे नमस्कृत होकर महान् गणाधिपपद प्राप्त कर लिया। उन त्रिधन्वाके पुत्र विद्वान् राजा त्रय्यारुण थे। उन [त्रय्यारुण]-का सत्यव्रत नामक महाबली पुत्र हुआ। उसने अमित तेजवाले विदर्भ देशके राजाको मारकर पाणिग्रहणके मन्त्रोंके पूर्ण होनेसे पहले ही उसकी पत्नीका हरण कर लिया। तब राजा त्रय्यारुणने उस अधर्मसे युक्त [अपने] पुत्रका त्याग कर दिया ॥ १-४ ॥ |
| पितरं सोऽब्रवीत्त्यक्तः क्व गच्छामीति वै द्विजाः।<br>पिता त्वेनमथोवाच श्वपाकैः सह वर्तय ॥ ५ | हे द्विजो! तत्पश्चात् [पिताके द्वारा] त्यक्त उस [सत्यव्रत]-ने पितासे कहा—'मैं कहाँ जाऊँ?' तब |
अध्याय ६६] इक्ष्वाकुवंशी राजाओंकी कथा तथा ययातिवंश-वर्णन २८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पिताने उससे कहा—'तुम चाण्डालोंके साथ रहो'॥ ५॥ | |
| इत्युक्तः स विचक्राम नगराद्वचनात्पितुः।<br>स तु सत्यव्रतो धीमाञ्छ्वपाकावसथान्तिके ॥ ६<br>पित्रा त्यक्तोऽवसद्वीरः पिता चास्य वनं ययौ।<br>सर्वलोकेषु विख्यातस्त्रिशङ्कुरिति वीर्यवान् ॥ ७<br>वसिष्ठकोपात्पुण्यात्मा राजा सत्यव्रतः पुरा।<br>विश्वामित्रो महातेजा वरं दत्त्वा त्रिशङ्कवे ॥ ८<br>राज्येऽभिषिच्य तं पित्र्ये याजयामास तं मुनिः।<br>मिषतां देवतानां च वसिष्ठस्य च कौशिकः ॥ ९<br>सशरीरं तदा तं वै दिवमारोपयद्विभुः। | इस प्रकार कहा गया वह [सत्यव्रत] पिताके आदेशसे नगरसे निकल गया और पिताके द्वारा त्यक्त वह बुद्धिमान् सत्यव्रत चाण्डालोंके निवासस्थानके समीप रहने लगा और उसके पिता वनमें चले गये। पूर्वकालमें वसिष्ठके कोपके कारण वह पुण्यात्मा राजा सत्यव्रत सभी लोकोंमें पराक्रमी त्रिशंकु—इस नामसे विख्यात हुआ। उसके बाद महातेजस्वी मुनि विश्वामित्रने त्रिशंकुको वर प्रदानकर उसे पिताके राज्यपर अभिषिक्त करके उससे यज्ञ कराया था। देवताओं तथा वसिष्ठके निषेध करनेपर भी ऐश्वर्यशाली विश्वामित्रने उसे सशरीर स्वर्ग भेज दिया था॥ ६—९ १/२॥ |
| तस्य सत्यव्रता नाम भार्या कैकयवंशजा ॥ १०<br>कुमारं जनयामास हरिश्चन्द्रमकल्मषम्।<br>हरिश्चन्द्रस्य च सुतो रोहितो नाम वीर्यवान् ॥ ११<br>हरितो रोहितस्याथ धुन्धुर्हारित उच्यते।<br>विजयश्च सुतेजाश्च धुन्धुपुत्रौ बभूवतुः ॥ १२<br>जेता क्षत्रस्य सर्वत्र विजयस्तेन स स्मृतः।<br>रुचकस्तस्य तनयो राजा परमधार्मिकः ॥ १३<br>रुचकस्य वृकः पुत्रस्तस्माद् बाहुश्च जज्ञिवान्।<br>सगरस्तस्य पुत्रोऽभूद्राजा परमधार्मिकः ॥ १४ | कैकयवंशमें उत्पन्न उसकी सत्यव्रता नामक भार्याने निष्पाप हरिश्चन्द्र नामक पुत्रको जन्म दिया। हरिश्चन्द्रका रोहित नामक पराक्रमी पुत्र था। रोहितका पुत्र हरित था। हरितका पुत्र धुंधु कहा जाता है। धुंधुके दो पुत्र हुए—विजय और सुतेज। उस [विजय]-ने समस्त क्षत्रियोंको जीत लिया था, अतः उसे विजय कहा गया है। उसका पुत्र रुचक महान् धार्मिक राजा था। रुचकका पुत्र वृक था। उस [वृक]-से बाहु उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र सगर हुआ; वह परम धार्मिक राजा था॥ १०—१४॥ |
| द्वे भार्ये सगरस्यापि प्रभा भानुमती तथा।<br>ताभ्यामाराधितः पूर्वमौर्वोऽग्निः पुत्रकाम्यया ॥ १५<br>और्वस्तुष्टस्तयोः प्रादाद्यथेष्टं वरमुत्तमम्।<br>एका षष्टिसहस्राणि सुतमेकं परा तथा ॥ १६ | सगरकी भी प्रभा तथा भानुमती [नामक] दो भार्याएँ थीं। उन दोनोंने पूर्वकालमें पुत्रकी कामनासे अग्निसदृश और्व ऋषिकी आराधना की थी; और्वने प्रसन्न होकर उन्हें यथेष्ट उत्तम वर प्रदान किया। उनमेंसे एक [रानी]-ने |
| २८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अगृह्णाद्वंशकर्तारं प्रभागृह्णात्सुतान् बहून्।<br>एकं भानुमतिः पुत्रमगृह्णादसमञ्जसम्॥ १७<br>ततः षष्टिसहस्राणि सुषुवे सा तु वै प्रभा।<br>खनन्तः पृथिवीं दग्धा विष्णुहुङ्कारमार्गणैः॥ १८ | साठ हजार तथा दूसरीने वंशको बढ़ानेवाले एक पुत्रको माँगा था। प्रभाने बहुत पुत्रोंको प्राप्त किया और भानुमतीने असमंजस नामक एक पुत्रको प्राप्त किया। उसके बाद प्रभाने जिन साठ हजार पुत्रोंको जन्म दिया था, वे पृथ्वीको खोदते हुए कपिलरूप विष्णुके हुंकाररूपी बाणोंसे दग्ध हो गये॥ १५-१८॥ |
| असमञ्जस्य तनयः सोऽंशुमान्नाम विश्रुतः।<br>तस्य पुत्रो दिलीपस्तु दिलीपात्तु भगीरथः॥ १९<br>येन भागीरथी गङ्गा तपः कृत्वावतारिता।<br>भगीरथसुतश्चापि श्रुतो नाम बभूव ह॥ २०<br>नाभागस्तस्य दायादो भवभक्तः प्रतापवान्।<br>अम्बरीषः सुतस्तस्य सिन्धुद्वीपस्ततोऽभवत्॥ २१<br>नाभागेनाम्बरीषेण भुजाभ्यां परिपालिता।<br>बभूव वसुधात्यर्थं तापत्रयविवर्जिता॥ २२ | असमंजसके पुत्र अंशुमान् नामसे विख्यात हुए। उन [अंशुमान्]-के पुत्र दिलीप थे और दिलीपसे भगीरथ हुए, जिन्होंने तपस्या करके भागीरथी गंगाका अवतरण कराया। भगीरथके श्रुत नामक पुत्र हुए। उन [श्रुत]-के पुत्र नाभाग हुए, जो शिवभक्त तथा प्रतापशाली थे। उन [नाभाग]-के अम्बरीष नामक पुत्र हुए। उन [अम्बरीष]-से सिन्धुद्वीप उत्पन्न हुए। नाभागपुत्र अम्बरीषके द्वारा भुजाओंसे भली-भाँति पालित की गयी पृथ्वी [दैहिक, दैविक, भौतिक] तीनों प्रकारके तापोंसे पूर्णरूपसे विहीन हो गयी थी॥ १९-२२॥ |
| अयुतायुः सुतस्तस्य सिन्धुद्वीपस्य वीर्यवान्।<br>पुत्रोऽयुतायुषो धीमानृतुपर्णो महायशाः॥ २३<br>दिव्याक्षहृदयज्ञो वै राजा नलसखो बली।<br>नलौ द्वावेव विख्यातौ पुराणेषु दृढव्रतौ॥ २४<br>वीरसेनसुतश्चान्यो यश्चेक्ष्वाकुकुलोद्भवः।<br>ऋतुपर्णस्य पुत्रोऽभूत्सार्वभौमः प्रजेश्वरः॥ २५<br>सुदासस्तस्य तनयो राजा त्विन्द्रसमोऽभवत्।<br>सुदासस्य सुतः प्रोक्तः सौदासो नाम पार्थिवः॥ २६<br>ख्यातः कल्माषपादो वै नाम्ना मित्रसहश्च सः।<br>वसिष्ठस्तु महातेजाः क्षेत्रे कल्माषपादके॥ २७<br>अश्मकं जनयामास इक्ष्वाकुकुलवर्धनम्।<br>अश्मकस्योत्तरायां तु मूलकस्तु सुतोऽभवत्॥ २८<br>स हि रामभयाद्राजा स्त्रीभिः परिवृतो वने।<br>बिभर्ति त्राणमिच्छन् वै नारीकवचमुत्तमम्॥ २९<br>मूलकस्यापि धर्मात्मा राजा शतरथः सुतः।<br>तस्माच्छतरथाज्जज्ञे राजा त्विलविलो बली॥ ३०<br>आसीच्चैलविलिः श्रीमान् वृद्धशर्मा प्रतापवान्।<br>पुत्रो विश्वसहस्तस्य पितृकन्या व्यजीजनत्॥ ३१<br>दिलीपस्तस्य पुत्रोऽभूत्खट्वाङ्ग इति विश्रुतः।<br>येन स्वर्गादिहागत्य मुहूर्तं प्राप्य जीवितम्॥ ३२<br>त्रयोऽग्नयस्त्रयो लोका बुद्ध्या सत्येन वै जिताः।<br>दीर्घबाहुः सुतस्तस्य रघुस्तस्मादजायत॥ ३३ | उन सिन्धुद्वीपके अयुतायु नामक पराक्रमी पुत्र हुए। अयुतायुके ऋतुपर्ण नामक पुत्र हुए; वे बुद्धिमान् तथा महायशस्वी थे। वे बलवान् राजा [ऋतुपर्ण] नलके सखा और दिव्य द्यूतक्रीड़ाके मर्मज्ञ थे। पुराणोंमें दृढ़व्रतवाले दो नल प्रसिद्ध हैं। एक तो वीरसेनका पुत्र था और दूसरा इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुआ था, ऋतुपर्णके पुत्र राजा सार्वभौम हुए और उनके पुत्र सुदास हुए, वे इन्द्रके समान थे। सुदासके पुत्र राजा सौदास कहे गये हैं। उनका नाम मित्रसह था, किंतु वे कल्माषपाद नामसे प्रसिद्ध हुए। महातेजस्वी वसिष्ठने कल्माषपादके क्षेत्रमें इक्ष्वाकुकुलकी वृद्धि करनेवाले अश्मकको उत्पन्न किया। उत्तराके गर्भसे अश्मकके मूलक नामक पुत्र उत्पन्न हुए। वे परशुरामके भयसे स्त्रियोंसे घिरे रहते थे और वनमें अपनी रक्षाकी इच्छा करते हुए उत्तम नारीकवच धारण किये रहते थे। मूलकके शतरथ नामक पुत्र हुए, वे धर्मात्मा राजा थे। उन शतरथसे बलशाली राजा इलविल उत्पन्न हुए। इलविलके पुत्र वृद्धशर्मा थे, जो ऐश्वर्यसम्पन्न तथा प्रतापशाली थे। उनके पुत्र विश्वसह थे, जिन्हें पितृकन्याने जन्म दिया था। उनके पुत्र दिलीप हुए; वे खट्वांग नामसे प्रसिद्ध हुए, जिन्होंने एक मुहूर्तका जीवन प्राप्त करके स्वर्गसे इस लोकमें आकर [अपनी] बुद्धि एवं सत्यके द्वारा तीनों अग्नियों तथा तीनों लोकोंको जीत लिया था। उनके पुत्र दीर्घबाहु |