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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

६०- मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रहों एवं सूर्यके माहात्म्यका वर्णन

अध्याय ६० ] मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रहों एवं सूर्यके माहात्म्यका वर्णन २४९


हेमन्ते ताम्रवर्णस्तु शिशिरे लोहितो रविः ।<br>इति वर्णाः समाख्याता मया सूर्यसमुद्भवाः ॥ ४०श्वेतवर्ण और शरद्-ऋतुमें पाण्डुवर्णके होते हैं। रवि हेमन्त-ऋतुमें ताम्र वर्णवाले और शिशिर-ऋतुमें लोहित वर्णवाले होते हैं। इस प्रकार मैंने सूर्यमें होनेवाले रंगोंका वर्णन किया ॥ ३९-४० ॥
ओषधीषु बलं धत्ते स्वधया च पितृष्वपि ।<br>सूर्योऽमरेष्वप्यमृतं त्रयं त्रिषु नियच्छति ॥ ४१सूर्य औषधियोंको बल देते हैं, स्वधासे पितरोंको तृप्त करते हैं और देवताओंको अमृत प्रदान करते हैं, इस प्रकार वे उन तीनोंको तीन वस्तुएँ देते हैं। इस प्रकार सूर्यकी वे हजारों किरणें लोककल्याण करती हैं। शीत, उष्ण तथा वर्षा करनेवाली ये किरणें लोकमें पहुँचकर भिन्न-भिन्न रूप धारण करती हैं ॥ ४१-४२ ॥
एवं रश्मिसहस्रं तत्सौरं लोकार्थसाधकम् ।<br>भिद्यते लोकमासाद्य जलशीतोष्णनिःस्रवम् ॥ ४२
इत्येतन्मण्डलं शुक्लं भास्करं सूर्यसंज्ञितम् ।<br>नक्षत्रग्रहसोमानां प्रतिष्ठायानिरैव च ॥ ४३शुक्ल वर्णवाला तथा देदीप्यमान यह मण्डल सूर्य नामवाला है। यह नक्षत्रों, ग्रहों एवं चन्द्रमाकी प्रतिष्ठाका कारण है। चन्द्रमा, नक्षत्र तथा ग्रह—इन सभीको सूर्यसे उत्पन्न जानना चाहिये। चन्द्रमा नक्षत्रोंका अधिपति है और शिवजीका बायाँ नेत्र है। स्वयं सूर्य शिवजीके दाहिने नेत्र हैं। वे इस लोकमें लोगोंको ले जाते हैं, इसीलिये ये नयन कहे जाते हैं ॥ ४३-४५ ॥
चन्द्रर्क्षग्रहाः सर्वे विज्ञेयाः सूर्यसम्भवाः ।<br>नक्षत्राधिपतिः सोमो नयनं वाममीशितुः ॥ ४४
नयनं चैवमीशस्य दक्षिणं भास्करः स्वयम् ।<br>तेषां जनानां लोकेऽस्मिन्नयनं नयते यतः ॥ ४५

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सूर्यरश्मिस्वरूपकथनं नामैकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सूर्यरश्मिस्वरूपकथन' नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥


साठवाँ अध्याय

मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रहों एवं सूर्यके माहात्म्यका वर्णन

सूत उवाच**सूतजी बोले—**सूर्य अग्निके रूपमें पढ़ा जाता है और चन्द्रमाको जल कहा गया है। शेष [भौम आदि] पाँच ग्रहोंको ईश्वर तथा इच्छाके अनुसार भ्रमण करनेवाला जानना चाहिये ॥ १ ॥
शेषाः पञ्च ग्रहा ज्ञेया ईश्वराः कामचारिणः ।<br>पठ्यते चाग्निरदित्य उदकं चन्द्रमाः स्मृतः ॥ १
शेषाणां प्रकृतिं सम्यग् वक्ष्यमाणां निबोधत ।<br>सुरसेनापतिः स्कन्दः पठ्यतेऽङ्गारको ग्रहः ॥ २[हे ऋषियो!] मैं शेष ग्रहोंकी प्रकृति भलीभाँति बताता हूँ, आपलोग सुनिये। भौम (मंगल) ग्रहको देवताओंका सेनापति स्कन्द कहा जाता है। ज्ञानीलोग बुधको नारायण देव कहते हैं। हे द्विजश्रेष्ठो! मन्द गतिवाला महाग्रह शनैश्चर समस्त लोकोंका स्वामी तथा लोकप्रभु साक्षात् यम है। देवताओं और असुरोंके गुरु भानुमान् महाग्रह बृहस्पति तथा शुक्र प्रजापतिके पुत्र कहे गये हैं। आदित्य ही सम्पूर्ण त्रैलोक्यका मूल है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २–५ ॥
नारायणं बुधं प्राहुर्देवं ज्ञानविदो जनाः ।<br>सर्वलोकप्रभुः साक्षाद्यमो लोकप्रभुः स्वयम् ॥ ३
महाग्रहो द्विजश्रेष्ठा मन्दगामी शनैश्चरः ।<br>देवासुरगुरू द्वौ तु भानुमन्तौ महाग्रहौ ॥ ४
प्रजापतिसुतावुक्तौ ततः शुक्रबृहस्पती ।<br>आदित्यमूलमखिलं त्रैलोक्यं नात्र संशयः ॥ ५
२५०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| भवत्यस्माज्जगत्कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम्।<br>रुद्रेन्द्रोपेन्द्रचन्द्राणां विप्रेन्द्राग्निदिवौकसाम्॥ ६<br><br>द्युतिर्द्युतिमRetainतां कृत्स्नं यत्तेजः सार्वलौकिकम्।<br>सर्वात्मा सर्वलोकेशो महादेवः प्रजापतिः॥ ७<br><br>सूर्य एव त्रिलोकेशो मूलं परमदैवतम्।<br>ततः सञ्जायते सर्वं तत्रैव प्रविलीयते॥ ८ | देवता, असुर तथा मनुष्यसहित सम्पूर्ण जगत् इसी [सूर्य]-से उत्पन्न होता है। वे सूर्य रुद्र, इन्द्र, उपेन्द्र, चन्द्रमा, श्रेष्ठ ब्राह्मणों, अग्नि एवं देवताओं—इन सब द्युतिसम्पन्न देवोंकी द्युति हैं। उनका जो सम्पूर्ण तेज है, वह सार्वलौकिक है। वे सबकी आत्मा, सभी लोकोंके ईश्वर, महादेव और प्रजापति हैं। सूर्य ही तीनों लोकोंके ईश, सबके कारणस्वरूप एवं परम देवता हैं। उन्हींसे सब कुछ उत्पन्न होता है और उन्हींमें विलीन हो जाता है॥ ६-८॥ | | भावाभावौ हि लोकानामादित्यान्निःसृतौ पुरा।<br>अविज्ञेयो ग्रहो विप्रा दीप्तिमान् सुप्रभो रविः॥ ९ | लोकोंके भाव तथा अभाव पूर्वकालमें आदित्यसे ही निकले थे। हे विप्रो! उत्तम प्रभाववाला दीप्तिमान् सूर्य [नामक] ग्रह अविज्ञेय है॥ ९॥ | | अत्र गच्छन्ति निधनं जायन्ते च पुनः पुनः।<br>क्षणा मुहूर्ता दिवसा निशाः पक्षाश्च कृत्स्नशः॥ १०<br><br>मासाः संवत्सराश्चैव ऋतवोऽथ युगानि च।<br>तदादित्यादृते ह्येषा कालसंख्या न विद्यते॥ ११<br><br>कालादृते न नियमो न दीक्षा नाह्निकक्रमः।<br>ऋतूनां च विभागश्च पुष्पं मूलं फलं कुतः॥ १२<br><br>कुतः सस्यविनिष्पत्तिस्तृणौषधिगणोऽपि च।<br>अभावो व्यवहाराणां जन्तूनां दिवि चेह च॥ १३<br><br>जगत्प्रतापनमृते भास्करं रुद्ररूपिणम्।<br>स एष कालश्चाग्निश्च द्वादशात्मा प्रजापतिः॥ १४ | क्षण, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, संवत्सर (वर्ष), ऋतु तथा युग इन्हीं सूर्यसे बार-बार उत्पन्न होते हैं और इन्हींमें समाप्त होते हैं। इसलिये सूर्यके बिना यह कालगणना नहीं होती है। कालके बिना न नियम हो सकता है, न दीक्षा हो सकती है और न दैनिक कृत्य ही हो सकता है। [इनके बिना] ऋतुओंका विभाजन, पुष्प, मूल तथा फल कैसे हो सकते हैं? धान्यकी उत्पत्ति कैसे सम्भव है और तृण तथा औषधियाँ भी कैसे हो सकती हैं? जगत्को तपानेवाले रुद्ररूप भास्करके बिना इस लोकमें तथा स्वर्गमें प्राणियोंके व्यवहारका अभाव हो जायगा। वे ही काल, अग्नि, द्वादश आत्मा तथा प्रजापति हैं॥ १०-१४॥ | | तपत्येष द्विजश्रेष्ठास्त्रैलोक्यं सचराचरम्।<br>स एष तेजसां राशिः समस्तः सार्वलौकिकः॥ १५<br><br>उत्तमं मार्गमास्थाय रात्र्यहोभिरिदं जगत्।<br>पार्श्वतोर्ध्वमधश्चैव तापयत्येष सर्वशः॥ १६<br><br>यथा प्रभाकरो दीपो गृहमध्येऽवलम्बितः।<br>पार्श्वतोर्ध्वमधश्चैव तमो नाशयते समम्॥ १७<br><br>तद्वत्सहस्रकिरणो ग्रहराजो जगत्प्रभुः।<br>सूर्यो गोभिर्जगत्सर्वमादीपयति सर्वतः॥ १८ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ये ही सूर्य चराचरसहित त्रैलोक्यको प्रकाश देते हैं। ये ही तेजोंकी राशि, सम्पूर्ण स्वरूपवाले तथा सार्वलौकिक हैं। उत्तम मार्गका आश्रय लेकर ये [सूर्य] ही इस जगत्को पार्श्वभागसे, ऊपरसे, नीचेसे, सभी ओरसे दिन-रात ताप प्रदान करते हैं। जिस प्रकार घरमें रखा हुआ प्रभा करनेवाला दीपक पार्श्वभागमें, ऊपर तथा नीचे समान रूपसे अन्धकारका नाश करता है, उसी तरह हजार किरणोंवाले ग्रहोंके राजा एवं जगत्के स्वामी सूर्य [अपनी] किरणोंसे सारे जगत्को सभी ओरसे प्रकाशित करते हैं॥ १५-१८॥ |

६१- ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूप तथा नक्षत्रों और ग्रहोंकी पारस्परिक स्थितिका वर्णन

अध्याय ६१ ]ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूपका वर्णन२५१
रवे रश्मिसहस्रं यत्प्राङ्मया समुदाहृतम्।<br>तेषां श्रेष्ठाः पुनः सप्त रश्मयो ग्रहयोनयः॥ १९<br>सुषुम्नो हरिकेशश्च विश्वकर्मा तथैव च।<br>विश्वव्यचाः पुनश्चाद्यः सन्नद्धश्च ततः परः॥ २०<br>सर्वावसुः पुनश्चान्यः स्वराडन्यः प्रकीर्तितः।<br>सुषुम्नः सूर्यरश्मिस्तु दक्षिणां राशिमैधयत्॥ २१<br>न्यगूर्ध्वाधः प्रचारोऽस्य सुषुम्नः परिकीर्तितः।<br>हरिकेशः पुरस्ताद्यो ऋक्षयोनिः प्रकीर्त्यते॥ २२<br>दक्षिणे विश्वकर्मा च रश्मिर्वर्धयते बुधम्।<br>विश्वव्यचास्तु यः पश्चाच्छुक्रयोनिः स्मृतो बुधैः॥ २३<br>सन्नद्धश्च तु यो रश्मिः स योनिर्लोहितस्य तु।<br>षष्ठः सर्वावसू रश्मिः स योनिस्तु बृहस्पतेः॥ २४<br>शनैश्चरं पुनश्चापि रश्मिराप्यायते स्वराट्।<br>एवं सूर्यप्रभावेन नक्षत्रग्रहतारकाः॥ २५<br>दृश्यन्ते दिवि ताः सर्वाः विश्वं चेदं पुनर्जगत्।<br>न क्षीयन्ते यतस्तानि तस्मान्नक्षत्रता स्मृता॥ २६मैं सूर्यकी जिन हजार किरणोंको पहले बता चुका हूँ, उनमें सात श्रेष्ठ किरणें ग्रहोंको उत्पन्न करनेवाली हैं। वे सुषुम्ना, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, सन्नद्ध, सर्वावसु और स्वराट् [नामवाली] कही गयी हैं। सूर्यकी सुषुम्ना [नामका] रश्मि दक्षिण राशिकी वृद्धि करती है। इस सुषुम्नाका गमन पार्श्व, ऊपर तथा नीचे सभी ओर कहा गया है। सामनेकी ओर जो हरिकेश [रश्मि] है, उसे नक्षत्रोंकी योनि कहा जाता है। विश्वकर्मा [नामक] रश्मि दक्षिणमें बुधको विकसित करती है। पीछेकी ओर जो विश्वव्यचा [नामक रश्मि] है, उसे विद्वानोंने शुक्रकी योनि कहा है। जो सन्नद्ध [नामक] रश्मि है, वह मंगलकी योनि है। छठी जो सर्वावसु रश्मि है, वह बृहस्पतिकी योनि है। इसके बाद स्वराट् रश्मि शनैश्चरको पोषित करती है। इस प्रकार सूर्यके ही प्रभावसे सभी नक्षत्र, ग्रह और तारे अन्तरिक्षमें दिखायी देते हैं और यह सम्पूर्ण जगत् दिखायी देता है। चूँकि वे नष्ट नहीं होते, इसलिये उन्हें नक्षत्र कहा गया है॥ १९-२६॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सूर्यप्रभाववर्णनं नाम षष्टितमोऽध्यायः॥ ६०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सूर्यप्रभाववर्णन' नामक साठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६०॥


इकसठवाँ अध्याय

ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूप तथा नक्षत्रों और ग्रहोंकी पारस्परिक स्थितिका वर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—
क्षेत्राण्येतानि सर्वाणि आतपन्ति गभस्तिभिः।<br>तेषां क्षेत्राण्यथादत्ते सूर्यो नक्षत्रतारकाः॥ १<br>चीर्णेन सुकृतेनेह सुकृतान्ते ग्रहाश्रयाः।<br>तारणात्तारका ह्येताः शुक्लत्वाच्चैव तारकाः॥ २[हे ऋषियो!] रात्रिमें सूर्यकिरणोंसे प्रकाशित होनेवाले ये सभी क्षेत्र भारतवर्षमें अनुष्ठित पुण्योंद्वारा पुण्यात्माओंके होते हैं, तदनन्तर सूर्य सुकृतोंके पूर्ण होनेपर ग्रहोंके आश्रयमें रहनेवाले [ग्रहाश्रित] नक्षत्र-तारोंको [अपने प्रभामण्डलमें] ले लेते हैं। शुक्ल होनेसे तथा तारक होनेसे ये तारे कहलाते हैं॥ १-२॥
दिव्यानां पार्थिवानां च नैशानां चैव सर्वशः।<br>आदानान्नित्यमादित्यस्तेजसां तमसामपि॥ ३<br>सवने स्यन्दनेऽर्थे च धातुरेष विभाव्यते।<br>सवनात्तेजसोऽपां च तेनासौ सविता मतः॥ ४<br>बहुलश्चन्द्र इत्येष ह्लादने धातुरुच्यते।<br>शुक्लत्वे चामृतत्वे च शीतत्वे च विभाव्यते॥ ५दिव्य, पार्थिव तथा रात्रिमें होनेवाले अन्धकारोंको अपने तेजसे ग्रहण कर लेनेके कारण वह आदित्य [नामवाला] है। फैलाने तथा बहाने अर्थमें यह [सु] धातु पढ़ी जाती है। अतः तेजको फैलाने तथा जलको बहानेके कारण इसे 'सविता' कहा गया है। यह [चदि] धातु आह्लाद करनेके अर्थमें कही जाती है, आह्लाद

| २५२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| | करनेके कारण चन्द्रमाका नाम बहुल भी है। [इसके अतिरिक्त] यह शुक्लत्व, अमृतत्व तथा शीतत्वको भी प्रकट करता है॥ ३-५॥ | | सूर्याचन्द्रमसोर्दिव्ये मण्डले भास्वरे खगे।<br>जलतेजोमये शुक्ले वृत्तकुम्भनिभे शुभे॥ ६<br><br>घनतोयात्मकं तत्र मण्डलं शशिनः स्मृतम्।<br>घनतेजोमयं शुक्लं मण्डलं भास्करस्य तु॥ ७ | सूर्य तथा चन्द्रमाके मण्डल दिव्य, प्रकाशमान्, आकाशगामी, जल-तेजसे युक्त, शुक्लवर्णवाले, गोल घड़ेके समान तथा शुभ हैं। उनमें चन्द्रमाका मण्डल घने जलके स्वरूपवाला तथा सूर्यका मण्डल घने तेजके स्वरूपवाला शुक्लवर्णका कहा गया है॥ ६-७॥ | | वसन्ति सर्वदेवाश्च स्थानान्येतानि सर्वशः।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु ऋक्षसूर्यग्रहाश्रयाः॥ ८<br><br>तेन ग्रहा गृहाण्येव तदाख्यास्ते भवन्ति च।<br>सौरं सूर्योऽविशत्स्थानं सौम्यं सोमस्तथैव च॥ ९<br><br>शौक्रं शुक्लोऽविशत्स्थानं षोडशार्चिः प्रतापवान्।<br>बृहद् बृहस्पतिश्चैव लोहितश्चैव लोहितम्॥ १०<br><br>शनैश्चरं तथा स्थानं देवश्चापि शनैश्चरः।<br>बौधं बुधस्तु स्वर्भानुः स्वर्भानुस्थानमाश्रितः॥ ११<br><br>नक्षत्राणि च सर्वाणि नक्षत्राणि विशन्ति च।<br>गृहाण्येतानि सर्वाणि ज्योतींषि सुकृतात्मनाम्॥ १२<br><br>कल्पादौ सम्प्रवृत्तानि निर्मितानि स्वयम्भुवा।<br>स्थानान्येतानि तिष्ठन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १३<br><br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु देवस्थानानि तानि वै।<br>अभिमानिनोऽवतिष्ठन्ते देवाः स्थानं पुनः पुनः॥ १४<br><br>अतीतैस्तु सहैतानि भाव्याभाव्यैः सुरैः सह।<br>वर्तन्ते वर्तमानैश्च स्थानिभिस्तैः सुरैः सह॥ १५ | सभी देवता इन स्थानोंमें भलीभाँति निवास करते हैं। वे सभी मन्वन्तरोंमें नक्षत्रों, सूर्य तथा ग्रहोंका आश्रय ग्रहण करते हैं। इसलिये ग्रह [एक तरहसे] गृह ही हैं, और वे उन्हींके नामवाले होते हैं। सूर्यने सौरस्थानमें प्रवेश किया एवं सोम (चन्द्रमा)-ने सौम्यस्थानमें प्रवेश किया। सोलह किरणोंवाला प्रतापी शुक्र शौक्रस्थानमें प्रविष्ट हुआ। बृहस्पति बृहत् स्थानमें तथा लोहित (भौम) लोहितस्थानमें स्थित हुए। शनैश्चरदेव शनैश्चरस्थानमें, बुध बौधस्थानमें तथा स्वर्भानु (राहु) स्वर्भानुस्थानमें स्थित हुए। सभी नक्षत्र (अपने-अपने) नक्षत्र-स्थानोंमें प्रवेश करते हैं। ये सब ज्योतिस्थान पुण्यात्माओंके गृह हैं। ब्रह्माने इन स्थानोंको निर्मित किया है। ये कल्पके आदिमें प्रवृत्त हुए और प्रलयपर्यन्त बने रहते हैं। वे सभी मन्वन्तरोंमें देवताओंके निवासस्थान हुआ करते हैं। अभिमानी देवतालोग उनमें बार-बार निवास करते हैं। ये स्थान अतीत, भाव्य तथा अभाव्य देवताओंके साथ और वर्तमान स्थानी देवताओंके साथ विद्यमान रहते हैं॥ ८-१५॥ | | अस्मिन् मन्वन्तरे चैव ग्रहा वैमानिकाः स्मृताः।<br>विवस्वानदितेः पुत्रः सूर्यो वैवस्वतेऽन्तरे॥ १६<br><br>द्युतिमानृषिपुत्रस्तु सोमो देवो वसुः स्मृतः।<br>शुक्रो देवस्तु विज्ञेयो भार्गवोऽसुरयाजकः॥ १७<br><br>बृहत्तेजाः स्मृतो देवो देवाचार्योऽङ्गिरासुतः।<br>बुधो मनोहरश्चैव ऋषिपुत्रस्तु स स्मृतः॥ १८<br><br>शनैश्चरो विरूपस्तु संज्ञापुत्रो विवस्वतः।<br>अग्निर्विकेश्यां जज्ञे तु युवासौ लोहितार्चिषः॥ १९ | इस मन्वन्तरमें ग्रहोंको वैमानिक कहा गया है। वैवस्वत मन्वन्तरमें अदितिका पुत्र विवस्वान् सूर्य है। ऋषिपुत्र द्युतिमान् देवता वसुको सोम (चन्द्र) कहा गया है। असुरोंके याजक शुक्रदेवको भृगुका पुत्र जानना चाहिये। महातेजस्वी देवाचार्य बृहस्पतिको अंगिरारृषिका पुत्र कहा गया है। जो सुन्दर बुध है, उसे ऋषिपुत्र कहा गया है। विकृतरूपवाला शनैश्चर संज्ञाका पुत्र है; वह विवस्वान्‌से उत्पन्न हुआ है। लोहित आभावाला यह युवा भौम अग्निरूप रुद्रके द्वारा उनकी पत्नी विकेशीसे उत्पन्न |

अध्याय ६१ ]ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूपका वर्णन२५३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नक्षत्रऋक्षनामिन्यो दाक्षायण्यस्तु ताः स्मृताः।<br>स्वर्भानुः सिंहिकापुत्रो भूतसन्तापनोऽसुरः॥ २०<br><br>सोमर्क्षग्रहसूर्येषु कीर्तितास्त्वभिमानिनः।<br>स्थानान्येतान्यथोक्तानि स्थानिन्यश्चैव देवताः॥ २१हुआ है। नक्षत्र-ऋक्ष नामवाली जो भी हैं, वे दक्षकी पुत्रियाँ कही गयी हैं। प्राणियोंके लिये कष्टकारी असुर राहु सिंहिकापुत्र है। इस प्रकार सोम, ऋक्ष, ग्रह तथा सूर्यमें उनके निवासस्थान हैं। इन स्थानोंका वर्णन मैंने कर दिया और अपने-अपने स्थानका अभिमान करनेवाले स्थानी देवताओंका भी वर्णन कर दिया॥ १६-२१॥
सौरमग्निमयं स्थानं सहस्रांशोर्विवस्वतः।<br>हिमांशोस्तु स्मृतं स्थानमम्मयं शुक्लमेव च॥ २२<br><br>आप्यं श्यामं मनोज्ञं च बुधरश्मिगृहं स्मृतम्।<br>शुक्लस्याप्यम्मयं शुक्लं पदं षोडशरश्मिवत्॥ २३<br><br>नवरश्मि तु भौमस्य लोहितं स्थानमुत्तमम्।<br>हरिद्राभं बृहच्चापि षोडशार्चिर्बृहस्पतेः॥ २४<br><br>अष्टरश्मिगृहं चापि प्रोक्तं कृष्णं शनैश्चरे।<br>स्वर्भानोस्तामसं स्थानं भूतसन्तापनालयम्॥ २५<br><br>विज्ञेयास्तारकाः सर्वास्त्वृषयस्त्वेकरश्मयः।<br>आश्रयाः पुण्यकीर्तीनां शुक्लाश्चापि स्ववर्णतः॥ २६<br><br>घनतोयात्मिका ज्ञेयाः कल्पादावेव निर्मिताः।<br>आदित्यरश्मिसंयोगात्सम्प्रकाशात्मिकाः स्मृताः॥ २७हजार किरणोंवाले सूर्यका अग्निमय सौरस्थान है। चन्द्रमाका स्थान जलमय तथा शुक्लवर्णका कहा गया है। बुधग्रहका निवासस्थान जलमय, श्याम तथा मनोहर बताया गया है। शुक्रका निवासस्थान भी जलमय, शुक्लवर्णवाला तथा सोलह किरणोंसे युक्त है। भौम (मंगल)-का स्थान उत्तम, लोहितवर्णवाला तथा नौ रश्मियोंसे युक्त है। बृहस्पतिका स्थान हरिद्रा (हल्दी)-की आभावाला, विशाल तथा सोलह रश्मियोंसे युक्त है। शनैश्चरका स्थान आठ रश्मियोंसे युक्त तथा कृष्ण वर्णवाला कहा गया है। राहुका स्थान अन्धकारमय है; यह प्राणियोंके लिये कष्टकारी स्थान है। सभी तारागणोंको ऋषिरूप तथा एक रश्मिवाला जानना चाहिये, ये पुण्यकीर्तिवालोंके आश्रय हैं तथा अपने वर्णसे शुक्ल हैं। इन्हें घने जलके स्वरूपवाला जानना चाहिये। ये कल्पके प्रारम्भमें ही निर्मित किये गये थे; ये सूर्यकी रश्मियोंके संयोगके कारण उत्तम प्रकाशसे युक्त कहे गये हैं॥ २२-२७॥
नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>त्रिगुणस्तस्य विस्तारो मण्डलस्य प्रमाणतः॥ २८<br><br>द्विगुणः सूर्यविस्ताराद्विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>तुल्यस्तयोस्तु स्वर्भानुर्भूत्वाधस्तात्प्रसर्पति॥ २९<br><br>उद्धृत्य पृथिवीछायां निर्मितां मण्डलाकृतिम्।<br>स्वर्भानोस्तु बृहत्स्थानं तृतीयं यत्तमोमयम्॥ ३०<br><br>आदित्यात्तच्च निष्क्रम्य समं गच्छति पर्वसु।<br>आदित्यमेति सोमाच्च पुनः सौरेषु पर्वसु॥ ३१<br><br>स्वर्भानुं नुदते यस्मात्तस्मात्स्वर्भानुरुच्यते।सूर्यका विष्कम्भ (व्यास) नौ हजार योजन बताया गया है और मण्डलके प्रमाणसे उसका विस्तार तीन गुना है। चन्द्रमाका विस्तार सूर्यके विस्तारसे दुगुना कहा गया है। उन दोनोंके समान [विस्तारवाला] होकर राहु उनके नीचे गमन करता है। मण्डलके आकारकी बनी हुई पृथ्वी-छायाको लेकर राहुका तीसरा बड़ा स्थान है, जो अन्धकारमय है। वह राहु [चन्द्र] पर्वोंमें सूर्यसे निकलकर चन्द्रमाकी ओर जाता है और सौर पर्वोंमें चन्द्रमासे [निकलकर] सूर्यकी ओर जाता है। चूँकि राहु भानु (सूर्य)-को प्रेरित करता है, अतः इसे स्वर्भानु कहा जाता है॥ २८-३११/२॥
चन्द्रस्य षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते॥ ३२शुक्रका विस्तार योजनके प्रमाणसे विष्कम्भ तथा
२५४श्रीलिङ्गमहापुराणं[ पूर्वभाग
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव योजनाग्रात्प्रमाणतः।<br>भार्गवात्पादहीनस्तु विज्ञेयो वै बृहस्पतिः॥ ३३<br>बृहस्पतेः पादहीनौ वक्रसौरी उभौ स्मृतौ।<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पादहीनस्तयोर्बुधः॥ ३४<br>तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै।<br>बुधेन तानि तुल्यानि विस्तारान्मण्डलाच्च वै॥ ३५मण्डल (घेरा)-में चन्द्रमाका सोलहवाँ भाग कहा गया है। बृहस्पतिको शुक्रसे एक चौथाई कम जानना चाहिये। बृहस्पतिसे एक चौथाई कम मंगल तथा शनि—ये दोनों बताये गये हैं। बुध विस्तार तथा मण्डलमें उन दोनोंसे एक चौथाई कम है। तारा-नक्षत्ररूपवाले जो पिण्ड हैं, वे विस्तार तथा मण्डलमें बुधके बराबर हैं॥ ३२—३५॥
प्रायशश्चन्द्रयोगीनि विद्यादृक्षाणि तत्त्ववित्।<br>तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परम्॥ ३६<br>शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैव योजने।<br>सर्वोपरि निकृष्टानि तारकामण्डलानि तु॥ ३७<br>योजनान्यर्धमात्राणि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते।<br>उपरिष्टात्त्रयस्तेषां ग्रहास्ते दूरसर्पिणः॥ ३८<br>सौरोऽङ्गिरसश्च वक्रश्च ज्ञेया मन्दविचारिणः।<br>पूर्वमेव समाख्याता गतिस्तेषां यथाक्रमम्॥ ३९तत्त्ववेत्ताको प्रायः सभी नक्षत्रोंको चन्द्रमासे सम्बद्ध जानना चाहिये। तारा-नक्षत्ररूपवाले वे परस्पर बहुत छोटे हैं। वे [छोटे तारे] पाँच, चार, तीन तथा दो योजन विस्तारवाले हैं। इन सबके ऊपर अत्यन्त छोटे तारा-मण्डल हैं, जो केवल आधे योजनके हैं, उनसे छोटा कोई तारा नहीं है। उनके ऊपर तीन ग्रह हैं, वे दूर-दूर भ्रमण करनेवाले हैं। वे सौर, अंगिरा (बृहस्पति) तथा वक्र (भौम) हैं, इन्हें मन्दगतिसे भ्रमण करनेवाला जानना चाहिये। उनकी गतिके विषयमें पहले ही क्रमसे बता दिया गया है॥ ३६—३९॥
एतेष्वेव ग्रहाः सर्वे नक्षत्रेषु समुत्थिताः।<br>विवस्वानदितेः पुत्रः सूर्यो वै मुनिसत्तमाः॥ ४०<br>विशाखासु समुत्पन्नो ग्रहाणां प्रथमो ग्रहः।<br>त्विषिमान् धर्मपुत्रस्तु सोमो देवो वसुस्तु सः॥ ४१<br>शीतरश्मिः समुत्पन्नः कृत्तिकासु निशाकरः।<br>षोडशार्चिर्भृगोः पुत्रः शुक्रः सूर्यादनन्तरम्॥ ४२<br>ताराग्रहाणां प्रवरस्तिष्ये क्षेत्रे समुत्थितः।<br>ग्रहश्चाङ्गिरसः पुत्रो द्वादशार्चिर्बृहस्पतिः॥ ४३<br>फाल्गुनीषु समुत्पन्नः पूर्वाख्यासु जगद्गुरुः।<br>नवार्चिर्लोहिताङ्गश्च प्रजापतिसुतो ग्रहः॥ ४४<br>आषाढास्विह पूर्वांसु समुत्पन्न इति स्मृतः।<br>रेवतीष्वेव सप्ताचिःस्थाने सौरिः शनैश्चरः॥ ४५<br>सौम्यो बुधो धनिष्ठासु पञ्चार्चिरुदितो ग्रहः।<br>तमोमयो मृत्युसुतः प्रजाक्षयकरः शिखी॥ ४६<br>आश्लेषासु समुत्पन्नः सर्वहारी महाग्रहः।<br>तथा स्वनामधेयेषु दाक्षायण्यः समुत्थिताः॥ ४७<br>तमोवीर्यमयो राहुः प्रकृत्या कृष्णमण्डलः।<br>भरणीषु समुत्पन्नो ग्रहश्चन्द्रार्कमर्दनः॥ ४८सभी ग्रह इन्हीं नक्षत्रोंमें उत्पन्न हुए हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो! अदितिका पुत्र विवस्वान् सूर्य, जो ग्रहोंमें प्रथम है, विशाखा नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। धर्मका पुत्र ओजस्वी सोम वसु देवता है, वह शीत रश्मिवाला चन्द्रमा कृत्तिका नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। सोलह रश्मियोंवाला भृगुपुत्र शुक्र जो ताराग्रहोंमें श्रेष्ठ है, सूर्यके बाद तिष्य नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। बारह किरणोंवाला अंगिरापुत्र जगद्गुरु बृहस्पति ग्रह पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। नौ किरणोंसे युक्त तथा लोहित अंगवाला प्रजापतिपुत्र भौमग्रह पूर्वाषाढ नक्षत्रमें उत्पन्न होनेवाला कहा गया है। सात किरणोंसे युक्त सूर्यपुत्र शनैश्चर रेवती नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। पाँच किरणोंवाला चन्द्रपुत्र बुध ग्रह धनिष्ठा नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। अन्धकारमय, प्रजाका क्षय करनेवाला तथा सबका विनाशक महाग्रह मृत्युपुत्र शिखी (केतु) आश्लेषा नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। दक्षकी पुत्रियाँ अपने-अपने नामवाले नक्षत्रोंमें उत्पन्न हुई हैं। अन्धकार तथा ओजसे परिपूर्ण, प्रकृतिसे काले मण्डलवाला और सूर्य-चन्द्रका मर्दन करनेवाला ग्रह राहु भरणी नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है॥ ४०—४८॥

अध्याय ६१] ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूपका वर्णन २५५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एते तारा ग्रहाश्चापि बोद्धव्या भार्गवादयः।<br>जन्मनक्षत्रपीडासु यान्ति वैगुण्यतां यतः॥ ४९<br>मुच्यते तेन दोषेण ततस्तद् ग्रहभक्तितः।<br>सर्वग्रहाणामेतेषामादिरादित्य उच्यते॥ ५०<br>ताराग्रहाणां शुक्रस्तु केतूनां चापि धूमवान्।<br>ध्रुवः किल ग्रहाणां तु विभक्तानां चतुर्दिशम्॥ ५१<br>नक्षत्राणां श्रविष्ठा स्यादयनानां तथोत्तरम्।<br>वर्षाणां चैव पञ्चानामाद्यः सम्वत्सरः स्मृतः॥ ५२<br>ऋतूनां शिशिरश्चापि मासानां माघ उच्यते।<br>पक्षाणां शुक्लपक्षस्तु तिथीनां प्रतिपत्तथा॥ ५३<br>अहोरात्रविभागानामहश्चादिः प्रकीर्तितः।<br>मुहूर्तानां तथैवादिर्मुहूर्तो रुद्रदैवतः॥ ५४इन शुक्र आदि ग्रहोंको ताराके नामसे भी जानना चाहिये। ये अपने-अपने जन्म-नक्षत्रोंमें उत्पन्न पीड़ाओंमें वैगुण्यताको प्राप्त होते हैं, तब उस ग्रहकी पूजा करनेसे मनुष्य उस दोषसे मुक्त हो जाता है। इन सभी ग्रहोंमें आदित्य (सूर्य) आदि (प्रधान) ग्रह कहा जाता है। ताराग्रहोंमें शुक्र, केतुओंमें धूमवान् तथा चारों दिशाओंमें विभक्त ग्रहोंमें ध्रुव प्रधान है। नक्षत्रोंमें धनिष्ठा और अयनोंमें उत्तरायण प्रधान है। पाँचों वर्षोंमें संवत्सरको प्रधान कहा गया है। ऋतुओंमें शिशिर तथा मासोंमें माघको आदिमास कहा जाता है। पक्षोंमें शुक्लपक्ष और तिथियोंमें प्रतिपदा प्रधान है। दिन तथा रातके विभागोंमें दिनको आदि कहा गया है। मुहूर्तोंमें रुद्रदैवत आदिमुहूर्त है॥ ४९—५४॥
क्षणश्चापि निमेषादिः कालः कालविदां वराः।<br>श्रवणान्तं धनिष्ठादि युगं स्यात्पञ्चवार्षिकम्॥ ५५<br>भानोर्गतिविशेषेण चक्रवत्परिवर्तते।<br>दिवाकरः स्मृतस्तस्मात्कालकृद्भूरिश्वरः॥ ५६<br>चतुर्विधानां भूतानां प्रवर्तकनिवर्तकः।<br>तस्यापि भगवान् रुद्रः साक्षाद्देवः प्रवर्तकः॥ ५७<br>इत्येष ज्योतिषामेवं सन्निवेशोऽर्थनिश्चयः।<br>लोकसंव्यवहारार्थं महादेवेन निर्मितः॥ ५८<br>बुद्धिपूर्वं भगवता कल्पादौ सम्प्रवर्तितः।<br>स आश्रयोऽभिमानी च सर्वस्य ज्योतिरात्मकः॥ ५९हे कालवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! क्षणोंमें निमेष आदिकाल है। धनिष्ठासे श्रवणपर्यन्त पाँच वर्षोंका युग होता है। भानुकी विशेष गतिके कारण जगत् चक्रकी भाँति परिवर्तित होता रहता है, इसलिये सूर्यको कालकी रचना करनेवाला, व्यापक तथा ईश्वर कहा गया है। सूर्य चारों प्रकारके प्राणियोंका प्रवर्तक एवं निवर्तक है और साक्षात् भगवान् रुद्रदेव उस (सूर्य)-के भी प्रवर्तक हैं। इस प्रकार महादेवने लोकव्यवहारके लिये नक्षत्रोंका अर्थनिश्चयवाला यह सन्निवेश निर्मित किया है। उन भगवान्ने ही कल्पके आरम्भमें बुद्धिपूर्वक इनका प्रवर्तन किया है। वे सबके आश्रय, अभिमानी तथा ज्योतिस्वरूप हैं॥ ५५—५९॥
एकरूपप्रधानस्य परिणामोऽयमद्भुतः।<br>नैष शक्यः प्रसंख्यातुं याथातथ्येन केनचित्॥ ६०<br>गतागतं मनुष्येण ज्योतिषां मांसचक्षुषा।<br>आगमादनुमानाच्च प्रत्यक्षादुपपत्तितः॥ ६१<br>परीक्ष्य निपुणं बुद्ध्या श्रद्धातव्यं विपश्चिता।<br>चक्षुः शास्त्रं जलं लेख्यं गणितं मुनिसत्तमाः॥ ६२<br>पञ्चैते हेतवो ज्ञेया ज्योतिर्मानविनिर्णये॥ ६३एक रूपवाले उन प्रधानका यह अद्भुत परिणाम है। यथार्थरूपसे इसका वर्णन किसीके द्वारा नहीं किया जा सकता है। भौतिक दृष्टिवाले विद्वान् मनुष्यको इन ज्योतिर्गणोंके प्रमाण तथा गतिके विषयमें आगम (वेद, शास्त्र), अनुमान, प्रत्यक्ष और उपपत्तिके द्वारा सावधानीपूर्वक बुद्धिसे परीक्षण करके इनपर श्रद्धा करनी चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! चक्षु, शास्त्र, जल, लेख्य तथा गणित—इन पाँचोंको नक्षत्रोंके प्रमाणके निर्णयमें साधन समझना चाहिये॥ ६०—६३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ग्रहसंख्यावर्णनं नामैकषष्टितमोऽध्यायः॥ ६१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ग्रहसंख्यावर्णन' नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६१॥

६२- उत्तानपादके पुत्र ध्रुवका आख्यान, ध्रुवकी तपस्या तथा ध्रुवलोकसंस्थानका वर्णन

२५६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

बासठवाँ अध्याय

उत्तानपादके पुत्र ध्रुवका आख्यान, ध्रुवकी तपस्या तथा ध्रुवलोकसंस्थानका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>कथं विष्णोः प्रसादाद्वै ध्रुवो बुद्धिमतां वरः।<br>मेढीभूतो ग्रहाणां वै वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ ध्रुव भगवान् विष्णुकी कृपासे ग्रहोंके मेढ़ीभूत (मध्य स्थानवाले) किस प्रकार हुए, [हमलोगोंको] इस समय बताइये॥ १॥
सूत उवाच<br>एतमर्थं मया पृष्टो नानाशास्त्रविशारदः।<br>मार्कण्डेयः पुरा प्राह मह्यं शुश्रूषवे द्विजाः॥ २**सूतजी बोले—**हे द्विजो! मैंने पूर्वकालमें अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता मार्कण्डेयजीसे इसी बातको पूछा था, तब उन्होंने सुननेकी इच्छावाले मुझको बताया था॥ २॥
मार्कण्डेय उवाच<br>सार्वभौमो महातेजाः सर्वशस्त्रभृतां वरः।<br>उत्तानपादो राजा वै पालयामास मेदिनीम्॥ ३<br>तस्य भार्याद्वयमभूत्सुनीतिः सुरुचिस्तथा।<br>अग्रजायामभूत्पुत्रः सुनीत्यां तु महायशाः॥ ४<br>ध्रुवो नाम महाप्राज्ञः कुलदीपो महामतिः।<br>कदाचित्सप्तवर्षोऽपि पितुरङ्कमुपाविशत्॥ ५<br>सुरुचिस्तं विनिर्धूय स्वपुत्रं प्रीतिमानसा।<br>निवेशयत्तं विप्रेन्द्रा ह्यङ्कं रूपेण मानिता॥ ६मार्कण्डेयजी बोले—[प्राचीन कालमें] सार्वभौम (चक्रवर्ती सम्राट्), महान् तेजस्वी तथा सभी शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ राजा उत्तानपाद पृथ्वीका पालन करते थे। सुनीति तथा सुरुचि—ये उनकी दो भार्याएँ थीं। उनकी ज्येष्ठ भार्या सुनीतिसे ध्रुव नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था; वह महायशस्वी, महाज्ञानी, कुलका दीपक तथा महाबुद्धिमान् था। जब वह सात वर्षका था, तब किसी समय अपने पिताकी गोदमें बैठ गया। हे विप्रेन्द्रो! उस समय अपने रूपपर गर्व करनेवाली सुरुचिने उसे [गोदसे] उतारकर प्रसन्नचित्त होकर अपने पुत्रको [राजाकी] गोदमें बैठा दिया॥ ३-६॥
अलब्ध्वा स पितुर्धीमानङ्कं दुःखितमानसः।<br>मातुः समीपमागम्य रुरोद स पुनः पुनः॥ ७तदनन्तर पिताकी गोद न पाकर उस बुद्धिमान् [ध्रुव]-के हृदयमें दुःख हुआ और वह [अपनी] माताके पास आकर बार-बार रोने लगा॥ ७॥
रुदन्तं पुत्रमाहेदं माता शोकपरिप्लुता।<br>सुरुचिर्दयिता भर्तुस्तस्याः पुत्रोऽपि तादृशः॥ ८<br>मम त्वं मन्दभाग्याया जातः पुत्रोऽप्यभाग्यवान्।<br>किं शोचसि किमर्थं त्वं रोदमानः पुनः पुनः॥ ९<br>सन्तप्तहृदयो भूत्वा मम शोकं करिष्यसि।<br>स्वस्थस्थानं ध्रुवं पुत्र स्वशक्त्या त्वं समाप्नुयाः॥ १०तब शोकमें डूबी हुई माताने रोते हुए पुत्रसे कहा—सुरुचि [अपने] पतिकी प्रिय पत्नी है और उसका पुत्र भी उसी प्रकार उन्हें प्रिय है। तुम मुझ अभागिनके अभागे पुत्र उत्पन्न हुए हो। तुम क्यों चिन्ता करते हो और बार-बार किसलिये रो रहे हो? तुम दुःखितचित्त होकर मेरे शोकको ही बढ़ाओगे। हे पुत्र! तुम्हें अपनी शक्तिसे शान्त तथा अटल स्थान प्राप्त करना चाहिये॥ ८-१०॥
इत्युक्तः स तु मात्रा वै निर्जगाम तदा वनम्।<br>विश्वामित्रं ततो दृष्ट्वा प्रणिपत्य यथाविधि॥ ११<br>उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा भगवन् वक्तुमर्हसि।<br>सर्वेषामुपरिस्थानं केन प्राप्स्यामि सत्तम॥ १२तब माताके इस प्रकार कहनेपर वह वनमें चला गया। वहाँ [ऋषि] विश्वामित्रको देखकर उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उसने कहा—हे

अध्याय ६२ ] उत्तानपादके पुत्र ध्रुवका आख्यान, ध्रुवकी तपस्या तथा ध्रुवलोकसंस्थानका वर्णन | २५७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पितुरङ्के समासीनं माता मां सुरुचिर्मुने।<br>व्यधूनयत्तस् तां राजा पिता नोवाच किञ्चन॥ १३<br><br>एतस्मात्कारणाद् ब्रह्मंस्त्रस्तोऽहं मातरं गतः।<br>सुनीतिराह मे माता मा कृथाः शोकमृत्तमम्॥ १४<br><br>स्वकर्मणा परं स्थानं प्राप्तुमर्हसि पुत्रक।<br>तस्या हि वचनं श्रुत्वा स्थानं तव महामुने॥ १५<br><br>प्राप्तो वनमिदं ब्रह्मन्नद्य त्वां दृष्टवान् प्रभो।<br>तव प्रसादात्प्राप्स्येऽहं स्थानमद्भुतमुत्तमम्॥ १६भगवन्! हे सत्तम! आप कृपा करके मुझे बतायें कि मैं किस उपायसे सबके ऊपर स्थान प्राप्त करूँगा? हे मुने! माता सुरुचिने पिताकी गोदमें बैठे हुए मुझको [गोदसे] उतार दिया और उन राजाने उन्हें कुछ नहीं कहा। हे ब्रह्मन्! इस कारणसे दुःखी होकर मैं माताके पास गया। तब मेरी माता सुनीतिने कहा—हे पुत्र! शोक मत करो, तुम अपने कर्मसे उत्तम तथा परम स्थान प्राप्त कर सकते हो। हे महामुने! उनका वचन सुनकर मैं इस वनमें आपके स्थानपर आया हूँ। हे ब्रह्मन्! आज मैंने आपका दर्शन किया, अतः हे प्रभो! आपकी कृपासे मैं अद्भुत तथा उत्तम स्थान [अवश्य] प्राप्त करूँगा॥ ११—१६॥
इत्युक्तः स मुनिः श्रीमान् प्रहसन्निदमब्रवीत्।<br>राजपुत्र शृणुष्वेदं स्थानमुत्तममाप्स्यसि॥ १७<br><br>आराध्य जगतामीशं केशवं क्लेशनाशनम्।<br>दक्षिणाङ्गभवं शम्भोर्महादेवस्य धीमतः॥ १८<br><br>जप नित्यं महाप्राज्ञ सर्वपापविनाशनम्।<br>इष्टदं परमं शुद्धं पवित्रममलं परम्॥ १९<br><br>ब्रूहि मन्त्रमिमं दिव्यं प्रणवेन समन्वितम्।<br>नमोऽस्तु वासुदेवाय इत्येवं नियतेन्द्रियः॥ २०<br><br>ध्यायन् सनातनं विष्णुं जपहोमपरायणः।<br>इत्युक्तः प्रणिपत्यैनं विश्वामित्रं महायशाः॥ २१[ध्रुवके द्वारा] इस प्रकार कहे गये श्रीमान् मुनिने हँसते हुए यह कहा—हे राजपुत्र! सुनो, तुम जगत्‌के स्वामी, कष्टोंका नाश करनेवाले तथा बुद्धिमान् महादेव शम्भुके दक्षिण* अंगसे उत्पन्न केशव (विष्णु)-की आराधना करके इस श्रेष्ठ स्थानको प्राप्त कर सकोगे। हे महाप्राज्ञ! तुम सभी पापोंका नाश करनेवाले, अभीष्ट प्रदान करनेवाले, परम शुद्ध, पवित्र, दोषरहित तथा श्रेष्ठ मन्त्रका नित्य जप करो। तुम इन्द्रियोंको वशमें करके प्रणवसहित नमोऽस्तु वासुदेवाय [अर्थात् ॐ नमोऽस्तु वासुदेवाय] इस दिव्य मन्त्रको जपो और सनातन विष्णुका ध्यान करते हुए जप-होममें संलग्न रहो॥ १७—२० १/२॥
प्राङ्मुखो नियतो भूत्वा जजाप प्रीतमानसः।<br>शाकमूलफलाहारः संवत्सरमतन्द्रितः॥ २२<br><br>जजाप मन्त्रमनिशमजस्रं स पुनः पुनः।<br>वेताला राक्षसा घोराः सिंहाद्याश्च महामृगाः॥ २३<br><br>तमभ्ययुर्महात्मानं बुद्धिमोहाय भीषणाः।<br>जपन् स वासुदेवेति न किञ्चित्प्रत्यपद्यत॥ २४उनके ऐसा कहनेपर महान् यशवाले ध्रुवने उन विश्वामित्रको प्रणाम करके पूर्वकी ओर मुख करके ध्यानमग्न होकर प्रसन्नचित्त हो जप आरम्भ किया। शाक, मूल तथा फलका आहार करते हुए उसने आलस्यरहित होकर दिन-रात निरन्तर एक वर्षतक मन्त्रका बार-बार जप किया। वेताल, भयंकर राक्षस तथा भयानक सिंह आदि बड़े जानवर बुद्धिको मोहित करनेके लिये उस महात्माके पास आये, किंतु वासुदेवका जप करता हुआ वह तनिक

* यहाँ मूलमें विष्णुको भगवान् शंकरके दक्षिणांग से उत्पन्न बताया गया है, किंतु इसी लिङ्गपुराणके ३८वें अध्यायमें भगवान् विष्णुने स्वयंको भगवान् शिवके वामांगसे और ब्रह्माजीको दक्षिणांगसे प्रादुर्भूत बताया है—'अहं वामाङ्गजो ब्रह्मन् शङ्करस्य महात्मनः। भवान् भवस्य देवस्य दक्षिणाङ्गभवः स्वयंम् ॥' अतः यहाँ दक्षिणांगसे 'वामांग' अर्थ लेना चाहिये।

२५८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भी विचलित नहीं हुआ॥ २१—२४॥
सुनीतिरस्य या माता तस्या रूपेण संवृता।<br>पिशाची समनुप्राप्ता रुरोद भृशदुःखिता॥ २५<br><br>मम त्वमेकः पुत्रोऽसि किमर्थं क्लिश्यते भवान्।<br>मामनाथामपहाय तप आस्थितवानसि॥ २६<br><br>एवमादीनि वाक्यानि भाषमाणां महातपाः।<br>अनिरीक्ष्यैव हृष्टात्मा हरेर्नाम जजाप सः॥ २७इसकी माता जो सुनीति थी, उसका रूप धारण करके एक पिशाची उसके पास आयी और अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगी—तुम मेरे एकमात्र पुत्र हो, तुम कष्ट क्यों सह रहे हो, मुझे अनाथ छोड़कर तुम तपमें लग गये हो—इस प्रकारके वचन बोलती हुई उस स्त्रीकी ओर बिलकुल न देखकर वह महातपस्वी प्रसन्नचित्त होकर हरिका नाम जपता रहा॥ २५—२७॥
ततः प्रशेमुः सर्वत्र विघ्नरूपाणि तत्र वै।<br>ततो गरुडमारुह्य कालमेघसमद्युतिः॥ २८<br><br>सर्वदेवैः परिवृतः स्तूयमानो महर्षिभिः।<br>आययौ भगवान् विष्णुः ध्रुवान्तिकमरातिहा॥ २९तदनन्तर वहाँ सर्वत्र विघ्नोंके स्वरूप शान्त हो गये। तब गरुड़पर सवार होकर कालमेघके समान (श्याम) कान्तिवाले, समस्त देवताओंसे घिरे हुए तथा महर्षियोंके द्वारा स्तुति किये जाते हुए शत्रुसंहारक भगवान् विष्णु ध्रुवके पास आये॥ २८—२९॥
समागतं विलोक्याथ कोसावित्येव चिन्तयन्।<br>पिबन्निव हृषीकेशं नयनाभ्यां जगत्पतिम्॥ ३०<br><br>जपन् स वासुदेवेति ध्रुवस्तस्थौ महाद्युतिः।<br>शङ्खप्रान्तेन गोविन्दः पस्पर्शास्यं हि तस्य वै॥ ३१उनको आया हुआ देखकर यह कौन है—ऐसा सोचता हुआ तथा अपने नेत्रोंसे जगत्पति हृषीकेशका पान करता हुआ-सा वह महान् प्रभाववाला ध्रुव 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—इस मन्त्रका जप करता रहा। तब गोविन्दने [अपने] शंखके अग्रभागसे उसके मुखका स्पर्श किया॥ ३०—३१॥
ततः स परमं ज्ञानमवाप्य पुरुषोत्तमम्।<br>तुष्टाव प्राञ्जलिर्भूत्वा सर्वलोकेश्वरं हरिम्॥ ३२<br><br>प्रसीद देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधर।<br>लोकात्मन् वेदगुह्यात्मन् त्वां प्रपन्नोऽस्मि केशव॥ ३३<br><br>न विदुस्त्वां महात्मानं सनकाद्या महर्षयः।<br>तत्कथं त्वामहं विद्यां नमस्ते भुवनेश्वर॥ ३४उसके बाद वह [ध्रुव] परम ज्ञान प्राप्त करके हाथ जोड़कर सभी लोकोंके स्वामी पुरुषोत्तम हरिकी [इस प्रकार] स्तुति करने लगा—हे देवदेवेश! हे शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले! हे लोकात्मन्! हे वेदगुह्यात्मन् (वेदोंके द्वारा अज्ञातस्वरूपवाले)! प्रसन्न होइये। हे केशव! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। सनक आदि महर्षि भी आप महात्माको नहीं जान सके, तब मैं आपको कैसे जान सकता हूँ। हे भुवनेश्वर! आपको नमस्कार है॥ ३२—३४॥
तमाह प्रहसन् विष्णुरेहि वत्स ध्रुवो भवान्।<br>स्थानं ध्रुवं समासाद्य ज्योतिषामग्रभुग्भव॥ ३५<br><br>मात्रा त्वं सहितस्तत्र ज्योतिषां स्थानमाप्नुहि।<br>मत्स्थानमेतत्परमं ध्रुवं नित्यं सुशोभनम्॥ ३६<br><br>तपसाराध्य देवेशं पुरा लब्धं हि शङ्करात्।<br>वासुदेवेति यो नित्यं प्रणवेन समन्वितम्॥ ३७तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने उससे हँसते हुए कहा—हे वत्स! आओ, तुम ध्रुव हो, तुम ध्रुव (अटल) स्थान प्राप्त करके ज्योतिर्गणोंमें अग्रणी हो जाओ। तुम अपनी मातासहित वहाँ ग्रहोंमें स्थान प्राप्त करो, यह मेरा स्थान है, जो उत्कृष्ट, अचल, शाश्वत तथा अत्यन्त सुन्दर है। पूर्वकालमें मैंने तपस्याके द्वारा देवेशकी आराधना करके शंकरसे इसे (मन्त्रको) प्राप्त

६३- दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव, दक्षकन्याओंकी वंश-परम्परा तथा ऋषिवंश-वर्णन

अध्याय ६३] दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव…ऋषिवंशवर्णन २५९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नमस्कारसमायुक्तं भगवच्छब्दसंयुक्तम्।<br>जपेदेवं हि यो विद्वान् ध्रुवं स्थानं प्रपद्यते॥ ३८<br><br>ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।<br>मात्रा सह ध्रुवं सर्वे तस्मिन् स्थाने न्यवेशयन्॥ ३९<br><br>विष्णोराज्ञां पुरस्कृत्य ज्योतिषां स्थानमाप्तवान्।<br>एवं ध्रुवो महातेजा द्वादशाक्षरविद्यया॥ ४०<br><br>अवाप महतीं सिद्धिमेतत्ते कथितं मया॥ ४१किया था। प्रणव (ॐ) तथा नमःसे युक्त और भगवत्—इस शब्दसे संयुक्त वासुदेव मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)-को जो विद्वान् जपता है, वह ध्रुवस्थान प्राप्त करता है॥ ३५-३८॥<br>तदनन्तर सभी देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों तथा महर्षियोंने मातासहित ध्रुवको उस स्थानपर स्थापित किया। इस प्रकार महातेजस्वी ध्रुवने विष्णुकी आज्ञा स्वीकार करके द्वादशाक्षरमन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)-के द्वारा ज्योतिर्गणोंमें स्थान प्राप्त किया तथा महती सिद्धि प्राप्त की। मैंने यह [वृत्तान्त] आपलोगोंसे कह दिया॥ ३९-४१॥
सूत उवाच<br>तस्माद्यो वासुदेवाय प्रणामं कुरुते नरः।<br>स याति ध्रुवसालोक्यं ध्रुवत्वं तस्य तत्तथा॥ ४२**सूतजी बोले—**अतः जो मनुष्य वासुदेवको प्रणाम करता है, वह ध्रुवलोकको जाता है और उसे भी वह ध्रुवत्व प्राप्त हो जाता है॥ ४२॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशे ध्रुवसंस्थानवर्णनं नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः॥ ६२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशमें ध्रुवसंस्थानवर्णन' नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६२॥


तिरसठवाँ अध्याय

दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव, दक्षकन्याओंकी वंश-परम्परा तथा ऋषिवंशवर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्।<br>उत्पत्तिं ब्रूहि सूताद्य यथाक्रममनुत्तमम्॥ १**ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! अब आप देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, उरगों और राक्षसोंकी उत्पत्तिका उत्तम विधिसे यथाक्रम वर्णन कीजिये॥ १॥
सूत उवाच<br>सङ्कल्पाद्दर्शनात्स्पर्शात्पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते।<br>दक्षात्प्राचेतसादूर्ध्वं सृष्टिर्मैथुनसम्भवा॥ २<br>यदा तु सृजतस्तस्य देवर्षिगणपन्नगान्।<br>न वृद्धिमगमल्लोकस्तदा मैथुनयोगतः॥ ३<br>दक्षः पुत्रसहस्राणि पञ्च सूत्यामजीजनत्।<br>तांस्तु दृष्ट्वा महाभागान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः॥ ४**सूतजी बोले—**पूर्व पुरुषोंकी सृष्टि संकल्पसे, दर्शनसे तथा स्पर्शसे कही जाती है। प्रचेतसके पुत्र दक्षके बाद [स्त्री-पुरुषके] संयोगसे सृष्टि प्रारम्भ हुई। जब देवताओं, ऋषियों और पन्नगोंका सृजन करते हुए उन प्रजापतिसे लोक वृद्धिको प्राप्त नहीं हुआ, तब दक्षने मैथुनयोगसे [अपनी भार्या] सूतिसे पाँच हजार पुत्र उत्पन्न किये। तत्पश्चात् उन महाभाग्यवालोंको देखकर वे अनेक प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टिके इच्छुक हो गये॥ २-४॥
नारदः प्राह हर्यश्वान् दक्षपुत्रान् समागतान्।<br>भुवः प्रमाणं सर्वं तु ज्ञात्वोर्ध्वमध एव च॥ ५तब नारदजीने उत्पन्न हुए [उन] हर्यश्व नामवाले दक्ष-पुत्रोंसे कहा—ऊपर तथा नीचे पृथ्वीका प्रमाण
२६०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः सृष्टिं विशेषेण कुरुध्वं मुनिसत्तमाः।<br>ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतोदिशम्॥ ६जानकर आपलोग विशेष रूपसे सृष्टि कीजिये। हे मुनिश्रेष्ठो! उनका वचन सुनकर वे सभी दिशाओंमें चले गये। वे आजतक नहीं लौटे, जैसे नदियाँ [समुद्रमें मिलकर] समुद्रसे वापस नहीं लौटतीं॥ ५-६^{१}/_{२}॥
अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रादिव सिन्धवः।<br>हर्यश्वेषु च नष्टेषु पुनर्दक्षः प्रजापतिः॥ ७<br>सूत्यामेव च पुत्राणां सहस्रमसृजत्प्रभुः।<br>शबला नाम ते विप्राः समेताः सृष्टिहेतवः॥ ८<br>नारदोऽनुगतान् प्राह पुनस्तान् सूर्यवर्चसः।<br>भुवः प्रमाणं सर्वं तु ज्ञात्वा भ्रातॄन् पुनः पुनः॥ ९<br>आगत्य वाथ सृष्टिं वै करिष्यथ विशेषतः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण जग्मुर्भ्रातृगतिं तथा॥ १०हर्यश्वसंज्ञक पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर प्रजापति प्रभु दक्षने सूतिसे पुनः एक हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया। हे विप्रो! जब शबल नामवाले वे पुत्र सृष्टि करनेके लिये एकत्रित हुए, तब नारदने सूर्यके समान तेजवाले उन आये हुए पुत्रोंसे पुनः कहा—'पृथ्वीका सम्पूर्ण विस्तार जानकर तथा अपने भाइयोंका बार-बार पता लगाकर यहाँ आकरके आपलोग विशेषरूपसे सृष्टि कीजिये।' वे भी उसी मार्गसे [अपने] भाइयोंकी गतिको प्राप्त हुए॥ ७-१०॥
ततस्तेष्वपि नष्टेषु षष्टिकन्याः प्रजापतिः।<br>वैरिण्यां जनयामास दक्षः प्राचेतसस्तदा॥ ११<br>प्रादात्स दशकं धर्मे कश्यपाय त्रयोदश।<br>विंशत्सप्त च सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमये॥ १२<br>द्वे चैव भृगुपुत्राय द्वे कृशाश्वाय धीमते।<br>द्वे चैवाङ्गिरसे तद्गत्तासां नामानि विस्तरात्॥ १३<br>शृणुध्वं देवमातॄणां प्रजाविस्तारमादितः।तदनन्तर उनके भी नष्ट हो जानेपर प्रचेतसके पुत्र प्रजापति दक्षने वैरिणी [नामक भार्या]-से साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उन्होंने दस [कन्याएँ] धर्मको, तेरह [कन्याएँ] कश्यपको, सत्ताईस [कन्याएँ] चन्द्रमाको, चार [कन्याएँ] अरिष्टनेमिको, दो [कन्याएँ] भृगु-पुत्रको, दो [कन्याएँ] बुद्धिमान् कृशाश्वको और दो [कन्याएँ] आंगिरसको प्रदान कीं। [हे विप्रो!] अब उन देवमाताओंके नाम तथा उनकी सन्तानोंके विस्तारको आरम्भसे सुनिये॥ ११-१३^{१}/_{२}॥
मरुत्वती वसूय्यामिर्लम्बा भानुरुरुन्धती॥ १४<br>सङ्कल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनी।<br>धर्मपत्न्यः समाख्यातास्तासां पुत्रान् वदामि वः॥ १५<br>विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यान्अजीजनत्।<br>मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवस्तथा॥ १६<br>भानोस्तु भानवः प्रोक्ता मुहूर्ताया मुहूर्तकाः।<br>लम्बाया घोषणानामानो नागवीथीस्तु यामिजः॥ १७<br>सङ्कल्पायास्तु सङ्कल्पो वसुसर्गं वदामि वः।मरुत्वती, वसु, यामि, लम्बा, भानु, अरुन्धती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या और परम सुन्दरी विश्वा धर्मकी पत्नियाँ कही गयी हैं। [हे ऋषियो!] अब मैं उनके पुत्रोंको बताता हूँ—विश्वासे विश्वेदेव हुए। साध्याने साध्योंको जन्म दिया। मरुत्वतीसे मरुत्वान् हुए और वसुसे सभी वसु उत्पन्न हुए। भानुसे भानुगण तथा मुहूर्तासे मुहूर्तगण [उत्पन्न] बताये गये हैं। लम्बासे घोषनामवाले पुत्र हुए। यामिसे नागवीथि उत्पन्न हुआ। संकल्पासे संकल्प [नामक पुत्र] हुआ। अब मैं आपलोगोंको वसुओंकी सृष्टि बताता हूँ॥ १४-१७^{१}/_{२}॥
ज्योतिष्मन्तस्तु ये देवा व्यापकाः सर्वतोदिशम्॥ १८जो देवता ज्योतिष्मान् तथा सभी दिशाओंमें

अध्याय ६३ ] दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव...ऋषिवंशवर्णन २६१


संस्कृत (मूल श्लोक)हिन्दी अनुवाद
वसवस्ते समाख्याताः सर्वभूतहितैषिणः।<br>आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनलः॥ १९<br>प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः।<br>अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षः सभैरवः॥ २०<br>हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः।<br>सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः॥ २१<br>एते रुद्राः समाख्याता एकादश गणेश्वराः।व्यापक हैं, वे वसु कहे गये हैं; वे सभी प्राणियोंके हितैषी हैं। आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं। अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, भैरव, हर, बहुरूप, सुरेश्वर त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी तथा अपराजित—ये गणेश्वर ग्यारह रुद्र कहे गये हैं॥ १८–२१ १/२॥
कश्यपस्य प्रवक्ष्यामि पत्नीभ्यः पुत्रपौत्रकम्॥ २२<br>अदितिश्च दितिश्चैव अरिष्टा सुरसा मुनिः।<br>सुरभिर्विनता ताम्रा तद्वत् क्रोधवशा इला॥ २३<br>कद्रूस्त्विषा दनुस्तद्वत्तासां पुत्रान् वदामि वः।<br>तुषिता नाम ये देवाश्चाक्षुषस्यान्तरे मनोः॥ २४<br>वैवस्वतान्तरे ते वै आदित्या द्वादश स्मृताः।<br>इन्द्रो धाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथ वरुणोऽर्यमा॥ २५<br>विवस्वान् सविता पूषा अंशुमान् विष्णुरेव च।<br>एते सहस्रकिरणा आदित्या द्वादश स्मृताः॥ २६[हे ऋषियो!] अब मैं कश्यपकी पत्नियोंसे उत्पन्न पुत्रों तथा पौत्रोंको बताऊँगा। अदिति, दिति, अरिष्टा, सुरसा, मुनि, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इला, कद्रू, त्विषा एवं दनु—ये कश्यपकी पत्नियाँ थीं। अब मैं आपलोगोंको उनके पुत्रोंको बताता हूँ। चाक्षुष मन्वन्तरमें जो तुषित नामवाले देवता थे, वे वैवस्वत मन्वन्तरमें बारह आदित्य कहे गये हैं। इन्द्र, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् तथा विष्णु—ये हजार किरणोंवाले बारह आदित्य कहे गये हैं॥ २२–२६॥
दितिः पुत्रद्वयं लेभे कश्यपादिति नः श्रुतम्।<br>हिरण्यकशिपुं चैव हिरण्याक्षं तथैव च॥ २७<br>दनुः पुत्रशतं लेभे कश्यपाद् बलदर्पितम्।<br>विप्रचित्तिः प्रधानोऽभूत्तेषां मध्ये द्विजोत्तमाः॥ २८<br>ताम्रा च जनयामास षट् कन्या द्विजपुङ्गवाः।<br>शुकीं श्येनीं च भासीं च सुग्रीवीं गृध्रिकां शुचिम्॥ २९<br>शुकी शुकानुलूकांश्च जनयामास धर्मतः।<br>श्येनी श्येनांस्तथा भासी कुरङ्गांश्च व्यजीजनत्॥ ३०<br>गृध्री गृध्रान् कपोतांश्च पारावतविहङ्गमान्।<br>हंससारसकारण्डप्लवांश्छुचिरजीजनत् ॥ ३१<br>अजाश्वमेषोष्ट्रखरान् सुग्रीवी चाप्यजीजनत्।दितिने कश्यपसे हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष—इन दो पुत्रोंको प्राप्त किया था, ऐसा हमने सुना है। दनुने कश्यपसे बलके अभिमानवाले सौ पुत्र प्राप्त किये। हे श्रेष्ठ द्विजो! उनमें विप्रचित्ति प्रधान था। हे श्रेष्ठ द्विजो! ताम्राने शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, गृध्रिका तथा शुचि—इन छः कन्याओंको जन्म दिया। शुकीने धर्मसे शुकों तथा उलूकोंको उत्पन्न किया। श्येनीने श्येनों (बाज) तथा भासीने कुरंगोंको जन्म दिया। गृध्रीने गीधोंको, कपोतों तथा पारावत पक्षियोंको जन्म दिया। शुचिने हंस, सारस तथा कारण्ड पक्षियोंको जन्म दिया। सुग्रीवीने अजों, अश्वों, मेषों, ऊँटों तथा गर्दभोंको जन्म दिया॥ २७–३१ १/२॥
विनता जनयामास गरुडं चारुणं शुभा॥ ३२<br>सौदामिनीं तथा कन्यां सर्वलोकभयङ्करीम्।<br>सुरसायाः सहस्रं तु सर्पाणामभवत्पुरा॥ ३३<br>कद्रूः सहस्रशिरसां सहस्रं प्राप सुव्रता।<br>प्रधानास्तेषु विख्याताः षड्विंशतिरुत्तमाः॥ ३४<br>शेषवासुकिकर्कोटशङ्खैरावतकम्बलाः। ।<br>धनञ्जयमहानीलपद्माश्वतरतक्षकाः ॥ ३५<br>एलापत्रमहापद्मधृतराष्ट्रबलाहकाः। ।<br>शङ्खपालमहाशङ्खपुष्पदंष्ट्रशुभाननाः ॥ ३६शुभ विनताने गरुड़ तथा अरुणको और सभी लोकोंको भय प्रदान करनेवाली सौदामिनी [नामक] कन्याको उत्पन्न किया। सुरसासे हजारों सर्प उत्पन्न हुए। उत्तम व्रतवाली कद्रूने हजार सिरवाले एक हजार सर्प उत्पन्न किये। उनमें छब्बीस [सर्प] उत्तम तथा प्रधान कहे गये हैं; वे शेष, वासुकि, कर्कोट, शंख, ऐरावत, कम्बल, धनंजय, महानील, पद्म, अश्वतर, तक्षक, एलापत्र, महापद्म, धृतराष्ट्र, बलाहक, शंखपाल,
२६२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
शङ्खलोमा च नहुषो वामनः फणितस्तथा।<br>कपिलो दुर्मुखश्चापि पतञ्जलिरिति स्मृतः॥ ३७महाशंख, पुष्पदंष्ट्र, शुभानन, शंखलोमा, नहुष, वामन, फणित, कपिल, दुर्मुख तथा पतंजलि [नामवाले] कहे गये हैं॥ ३२-३७॥
रक्षोगणं क्रोधवशा महामायं व्यजीजनत्।<br>रुद्राणां च गणं तद्वद् गोमहिष्यौ वराङ्गना॥ ३८<br>सुरभिर्जनयामास कश्यपादिति नः श्रुतम्।<br>मुनिर्मुनीनां च गणं गणमप्सरसां तथा॥ ३९<br>तथा किन्नरगन्धर्वानरिष्टाजनयद् बहून्।<br>तृणवृक्षलतागुल्ममिला सर्वमजीजनत्॥ ४०<br>त्विषा तु यक्षरक्षांसि जनयामास कोटिशः।<br>एते तु काश्यपेयाश्च सङ्क्षेपात्परिकीर्तिताः॥ ४१क्रोधवशाने महामायावी राक्षसों तथा रुद्रगणोंको जन्म दिया और सुन्दर स्त्री सुरभिने कश्यपसे गायों तथा भैंसोंको जन्म दिया; ऐसा हमने सुना है। मुनि [नामक कश्यपभार्या]-ने मुनियों एवं अप्सराओंको और अरिष्टाने बहुत-से किन्नरों तथा गन्धर्वोंको जन्म दिया। इलाने समस्त तृणों, वृक्षों, लताओं तथा गुल्मोंको जन्म दिया। त्विषाने करोड़ों यक्षों और राक्षसोंको पैदा किया। मैंने कश्यपकी इन सन्तानोंका संक्षेपमें वर्णन कर दिया। इन सबके बहुत-से पुत्र-पौत्र आदि वंश कहे गये हैं॥ ३८-४१ १/२॥
एतेषां पुत्रपौत्रादिवंशाश्च बहवः स्मृताः।<br>एवं प्रजासु सृष्टासु कश्यपेन महात्मना॥ ४२<br>प्रतिष्ठितासु सर्वासु चरासु स्थावरासु च।<br>अभिषिच्याधिपत्येषु तेषां मुख्यान् प्रजापतिः॥ ४३<br>ततो मनुष्याधिपतिं चक्रे वैवस्वतं मनुम्।<br>स्वायम्भुवेऽन्तरे पूर्वं ब्रह्मणा येऽभिषेचिताः॥ ४४<br>तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता।<br>यथोपदेशमद्यापि धर्मेण प्रतिपाल्यते॥ ४५<br>स्वायम्भुवेऽन्तरे पूर्वे ब्रह्मणा येऽभिषेचिताः।<br>ते होते चाभिषिच्यन्ते मनवश्च भवन्ति ते॥ ४६<br>मन्वन्तरेष्वतीतेषु गता होतेषु पार्थिवाः।<br>एवमन्येऽभिषिच्यन्ते प्राप्ते मन्वन्तर ततः॥ ४७<br>अतीतानागताः सर्वे नृपा मन्वन्तरे स्मृताः।इस प्रकार महात्मा कश्यपके द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि कर लिये जानेपर तथा उन सभी चर-अचर प्रजाओंके प्रतिष्ठित हो जानेपर प्रजापतिने उनमेंसे मुख्योंको अधिपतिके पदपर अभिषिक्त करके वैवस्वत मनुको मनुष्योंका अधिपति बनाया। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें पहले ब्रह्माने जिन्हें अभिषिक्त किया था, उन्हींके द्वारा पर्वतोंसहित सात द्वीपोंवाली सम्पूर्ण पृथ्वी आज भी आदेशके अनुसार धर्मपूर्वक पालित की जा रही है। ब्रह्माने पूर्व स्वायम्भुव मन्वन्तरमें जिनका अभिषेक किया था, वे ही यहाँ अभिषिक्त किये जाते हैं और मनु होते हैं। इन मन्वन्तरोंके बीत जानेपर राजा भी चले जाते हैं; इस प्रकार इनके बाद मन्वन्तर आनेपर अन्य [राजा] अभिषिक्त किये जाते हैं। अतीत तथा अनागत सभी राजा मन्वन्तरमें कहे गये हैं॥ ४२-४७ १/२॥
एतानुत्पाद्य पुत्रांस्तु प्रजासन्तानकारणात्॥ ४८<br>कश्यपो गोत्रकामस्तु चचार स पुनस्तपः।<br>पुत्रो गोत्रकरो मह्यं भवतादिति चिन्तयन्॥ ४९<br>तस्यैवं ध्यायमानस्य कश्यपस्य महात्मनः।<br>ब्रह्मयोगात्सुतौ पश्चात्प्रादुर्भूतौ महौजसौ॥ ५०<br>वत्सरश्चासितश्चैव तावुभौ ब्रह्मवादिनौ।<br>वत्सरान्नैध्रुवो जज्ञे रैभ्यश्च सुमहायशाः॥ ५१प्रजा-संतानके कारण इन पुत्रोंको उत्पन्न करके अपने वंशकी कामना रखनेवाले उन कश्यपने 'वंशको बढ़ानेवाला पुत्र मुझे उत्पन्न हो'—ऐसा सोचते हुए पुनः तप करना आरम्भ किया। इस प्रकार ध्यान करते हुए उन महात्मा कश्यपके ब्रह्मयोगसे पुनः महान् ओजस्वी दो पुत्र उत्पन्न हुए। वत्सर तथा असित [नामवाले] वे दोनों ब्रह्मवादी थे। वत्सरसे महान् यशवाले नैध्रुव तथा रैभ्य उत्पन्न हुए। रैभ्यके पुत्रोंको
अध्याय ६३ ]दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव...ऋषिवंशवर्णन२६३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रैभ्यस्य रैभ्या विज्ञेया नैध्रुवस्य वदामि वः।<br>च्यवनस्य तु कन्यायां सुमेधाः समजायत ॥ ५२<br>नैध्रुवस्य तु सा पत्नी माता वै कुण्डपायिनाम्।<br>असितस्यैकपर्णायां ब्रह्मिष्ठः समजायत ॥ ५३<br>शाण्डिल्यानां वरः श्रीमान् देवलः सुमहातपाः।<br>शाण्डिल्या नैध्रुवा रैभ्यास्त्रयः पक्षास्तु काश्यपाः ॥ ५४भी रैभ्य [नामवाला] जानना चाहिये। [हे ऋषियो!] अब मैं नैध्रुवके पुत्रोंके विषयमें बताता हूँ। च्यवनकी कन्यासे सुमेधा उत्पन्न हुई। वह नैध्रुवकी पत्नी तथा कुण्डपायियोंकी माता थी। असितकी एकपर्णासे शाण्डिल्योंमें श्रेष्ठ, ब्रह्मिष्ठ, श्रीमान् तथा महातपस्वी देवल उत्पन्न हुए। इस प्रकार शाण्डिल्य, नैध्रुव तथा रैभ्य—ये तीनों पक्ष काश्यप (कश्यपसे होनेवाले) हुए॥ ४८–५४॥
नवप्रकृतयोऽदेवाः पुलस्त्यस्य वदामि वः।<br>चतुर्युगे ह्यतिक्रान्ते मनोरेकादशे प्रभोः ॥ ५५<br>अर्धावशिष्टे तस्मिंस्तु द्वापरे सम्प्रवर्तिते।<br>मानवस्य नरिष्यन्तः पुत्र आसीद्दमः किल ॥ ५६<br>दमस्य तस्य दायादस्तृणबिन्दुरिति स्मृतः।<br>त्रेतायुगमुखे राजा तृतीये सम्बभूव ह ॥ ५७<br>तस्य कन्या त्विलविला रूपेणाप्रतिमाभवत्।<br>पुलस्त्याय स राजर्षिस्तां कन्यां प्रत्यपादयत् ॥ ५८<br>ऋषीरैरविलो यस्यां विश्रवाः समजायत।<br>तस्य पत्न्यश्चतस्रस्तु पौलस्त्यकुलवर्धनाः ॥ ५९<br>बृहस्पतेः शुभा कन्या नाम्ना वै देववर्णिनी।<br>पुष्पोत्कटा बलाका च सुते माल्यवतः स्मृते ॥ ६०अब मैं पुलस्त्यके नौ राक्षसवंशजोंका वर्णन करता हूँ—प्रभु मनुके ग्यारहवें चतुर्युगके अतिक्रान्त होनेपर उसका आधा अवशिष्ट रह जानेपर जब द्वापरका आरम्भ हुआ, तब मनुकी पीढ़ीमें नरिष्यन्तका दम नामक पुत्र हुआ। उस दमका उत्तराधिकारी तृणबिन्दु कहा गया है; वह त्रेतायुगके तीन-चौथाई भागमें राजा हुआ। उसकी कन्या इलविला रूपमें अप्रतिम थी। उस राजर्षिने वह कन्या पुलस्त्यको दे दी। उस इलविलासे ऋषि विश्रवा उत्पन्न हुए। पौलस्त्यकुलकी वृद्धि करनेवाली उनकी चार पत्नियाँ थीं। पहली देववर्णिनी नामवाली थी, जो बृहस्पतिकी सुन्दर कन्या थी। [अन्य दो] पुष्पोत्कटा तथा बलाका माल्यवान्की पुत्रियाँ कही गयी हैं। कैकसी मालीकी कन्या थी। [हे ऋषियो!] अब उनकी सन्तानोंके विषयमें सुनिये॥ ५५–६० १/२ ॥
कैकसी मालिनः कन्या तासां वै शृणुत प्रजाः।<br>ज्येष्ठं वैश्रवणं तस्मात्सुषुवे देववर्णिनी ॥ ६१<br>कैकसी चाप्यजनयद्रावणं राक्षसाधिपम्।<br>कुम्भकर्णं शूर्पणखां धीमन्तं च विभीषणम् ॥ ६२<br>पुष्पोत्कटा ह्यजनयत्पुत्रांस्तस्माद् द्विजोत्तमाः।<br>महोदरं प्रहस्तं च महापाश्र्वं खरं तथा ॥ ६३<br>कुम्भीनसीं तथा कन्यां बलायाः शृणुत प्रजाः।<br>त्रिशिरा दूषणश्चैव विद्युज्जिह्वश्च राक्षसः ॥ ६४<br>कन्या वै मालिका चापि बलायाः प्रसवः स्मृतः।<br>इत्येते क्रूरकर्माणः पौलस्त्या राक्षसा नव ॥ ६५<br>विभीषणोऽतिशुद्धात्मा धर्मज्ञः परिकीर्तितः।<br>पुलस्त्यस्य मृगाः पुत्राः सर्वे व्याघ्राश्च दंष्ट्रिणः ॥ ६६देववर्णिनीने उन [विश्रवा]-से ज्येष्ठ [पुत्र] वैश्रवणको उत्पन्न किया। कैकसीने राक्षसोंके राजा रावण, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा बुद्धिमान् विभीषणको जन्म दिया। हे द्विजश्रेष्ठो! पुष्पोत्कटाने उन [विश्रवा]-से महोदर, प्रहस्त, महापाश्र्व तथा खर [नामक] पुत्रोंको तथा कुम्भीनसी [नामक] कन्याको जन्म दिया। अब बलाकी सन्तानोंको सुनिये। त्रिशिरा, दूषण तथा विद्युज्जिह्व राक्षस और मालिका [नामक] कन्या—ये सब बलासे उत्पन्न कहे गये हैं। पुलस्त्यके ये नौ पौत्र क्रूर कर्मवाले राक्षस थे। विभीषण अत्यन्त शुद्ध आत्मावाले तथा धर्मज्ञ कहे गये हैं। मृग, व्याघ्र आदि दाढ़ोंवाले सभी पशु, भूत, पिशाच, सर्प, सूकर, हाथी,
२६४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भूताः पिशाचाः सर्पांश्च सूकरा हस्तिनस्तथा।<br>वानराः किन्नराश्चैव ये च किम्पुरुषास्तथा॥ ६७वानर, किन्नर तथा किम्पुरुष—ये सब पुलस्त्यके पुत्र हुए॥ ६१–६७॥
अनपत्यः क्रतुस्तस्मिन् स्मृतो वैवस्वतेऽन्तरे।<br>अत्रेः पत्न्यो दशैवासन् सुन्दर्यश्च पतिव्रताः॥ ६८<br>भद्राश्वस्य घृताच्यां वै दशाप्सरसि सूनवः।<br>भद्राभद्रा च जलदा मन्दा नन्दा तथैव च॥ ६९<br>बलाबला च विप्रेन्द्रा या च गोपाबला स्मृता।<br>तथा तामरसा चैव वरक्रीडा च वै दश॥ ७०<br>आत्रेयवंशप्रभवास्तासां भर्ता प्रभाकरः।<br>स्वर्भानुपिहिते सूर्ये पतितेऽस्मिन् दिवो महीम्॥ ७१<br>तमोऽभिभूते लोकेऽस्मिन् प्रभा येन प्रवर्तिता।<br>स्वस्त्यस्तु हि तवेत्युक्ते पतन्निह दिवाकरः॥ ७२<br>ब्रह्मर्षेर्वचनात्तस्य पपात न विभुर्दिवः।<br>ततः प्रभाकरेत्युक्तः प्रभुरत्रिर्महर्षिभिः॥ ७३उस वैवस्वत मन्वन्तरमें क्रतु निःसन्तान कहा गया है। अत्रीकी दस सुन्दर तथा पतिव्रता भार्याएँ थीं। घृताची अप्सरासे भद्राश्वकी दस पुत्रियाँ हुईं। हे विप्रेन्द्रो! वे भद्रा, अभद्रा, जलदा, मन्दा, नन्दा, बला, अबला, गोपाबला, तामरसा तथा वरक्रीड़ा—ये दस कही गयी हैं। ये सब आत्रेयवंशमें उत्पन्न हुईं; इनके पति प्रभाकर थे। जब राहुने सूर्यको ढक लिया और यह सूर्य स्वर्गसे पृथ्वीपर गिरने लगा; तब इस लोकके अन्धकारसे व्याप्त हो जानेपर अत्रि ऋषिने प्रभा फैलायी थी। 'तुम्हारा कल्याण हो' उनके ऐसा कहनेपर महर्षिके वचनसे उस समय गिरता हुआ विभु सूर्य स्वर्गलोकसे [पृथ्वीपर] नहीं गिरा। तब महर्षियोंने प्रभु अत्रिको 'प्रभाकर'—ऐसा कहा॥ ६८–७३॥
भद्रायां जनयामास सोमं पुत्रं यशस्विनम्।<br>स तासु जनयामास पुनः पुत्रांस्तपोधनः॥ ७४<br>स्वस्त्यात्रेया इति ख्याता ऋषयो वेदपारगाः।<br>तेषां द्वौ ख्यातयशसौ ब्रह्मिष्ठौ च महौजसौ॥ ७५<br>दत्तो ह्यत्रिवरो ज्येष्ठो दुर्वासास्तस्य चानुजः।<br>यवीयसी स्वसा तेषाममला ब्रह्मवादिनी॥ ७६<br>तस्य गोत्रद्वये जाताश्चत्वारः प्रथिता भुवि।<br>श्यावश्च प्रत्वसश्चैव ववल्गुश्चाथ गह्नरः॥ ७७<br>आत्रेयाणां च चत्वारः स्मृताः पक्षा महात्मनाम्।<br>काश्यपो नारदश्चैव पर्वतोऽनुद्धतस्तथा॥ ७८<br>जज्ञिरे मानसा होते अरुन्धत्या निबोधत।उन्होंने भद्रासे यशस्वी पुत्र 'सोम' को उत्पन्न किया। उन तपोधन [ऋषि]-ने उन पत्नियोंसे पुनः अन्य पुत्र भी उत्पन्न किये। वे सब स्वस्त्यात्रेय कहलाये और वेदोंके पारंगत ऋषि हुए। उनमें दो प्रसिद्ध यशवाले, ब्रह्मिष्ठ तथा महान् ओजस्वी हुए; दत्त अत्रिके ज्येष्ठ पुत्र थे और दुर्वासा उनके छोटे भाई थे। उनकी छोटी बहन अमला थी; वह ब्रह्मवादिनी थी। उनके दो गोत्रोंमें श्याव, प्रत्वस, ववल्गु तथा गह्नर—ये चार उत्पन्न हुए, जो भूलोकमें प्रसिद्ध हैं। महान् आत्मावाले आत्रेयोंके चार पक्ष कहे गये हैं—काश्यप, नारद, पर्वत और अनुद्धत। ये मानस पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए हैं। अब अरुन्धतीकी सन्तानोंके विषयमें सुनिये॥ ७४–७८ १/२॥
नारदस्तु वसिष्ठायारुन्धतीं प्रत्यपादयत्॥ ७९<br>ऊर्ध्वरेता महातेजा दक्षशापात्तु नारदः।<br>पुरा देवासुरे युद्धे घोरे वै तारकामये॥ ८०<br>अनावृष्ट्या हते लोके ह्युग्रे लोकेश्वरैः सह।<br>वसिष्ठस्तपसा धीमान् धारयामास वै प्रजाः॥ ८१नारदजीने वसिष्ठके लिये अरुन्धतीको प्रदान किया। महातेजस्वी नारद दक्षके शापसे ब्रह्मचारी हो गये। पूर्वकालमें तारकासुरके कारण भयानक देवासुर-संग्राममें अनावृष्टिसे हत लोकके उग्र हो जानेपर बुद्धिमान् वसिष्ठजीने [अपनी] तपस्यासे अन्न, जल, मूल, फल तथा औषधियाँ उत्पन्न करते हुए लोकेश्वरोंके साथ प्राणियोंकी रक्षा की थी और दयापूर्वक उन्होंने औषधिसे उन सबको जीवित किया था।

अध्याय ६३ ] दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव...ऋषिवंशवर्णन [ २६५


अन्नोदकं मूलफलं ओषधीश्च प्रवर्तयन् ।<br>तानेताञ्जीवयामास कारुण्यादौषधेन च ॥ ८२<br>अरुन्धत्यां वसिष्ठस्तु सुतानुत्पादयाच्छतम् ।<br>ज्यायसोऽजनयच्छक्तेरदृश्यन्ती पराशरम् ॥ ८३वसिष्ठने अरून्धतीसे सौ पुत्र उत्पन्न किये। उनमें ज्येष्ठ पुत्र शक्तिसे अदृश्यन्तीने पराशरको जन्म दिया था॥ ७९-८३॥
रक्षसा भक्षिते शक्तौ रुधिरेण तु वै तदा ।<br>काली पराशराज्जज्ञे कृष्णद्वैपायनं प्रभुम् ॥ ८४<br>द्वैपायनो ह्यरण्यां वै शुकमुत्पादयत्सुतम् ।<br>उपमन्युं च पीवर्यां विद्धीमे शुकसूनवः ॥ ८५<br>भूरिश्रवाः प्रभुः शम्भुः कृष्णो गौरस्तु पञ्चमः ।<br>कन्या कीर्तिमती चैव योगमाता धृतव्रता ॥ ८६<br>जननी ब्रह्मदत्तस्य पत्नी सा त्वनुहस्य च ।<br>श्वेतः कृष्णश्च गौरश्च श्यामो धूम्रस्तथारुणः ॥ ८७<br>नीलो बादरिकश्चैव सर्वे चैते पराशराः ।<br>पराशराणामष्टौ ते पक्षाः प्रोक्ता महात्मनाम् ॥ ८८राक्षस रुधिरके द्वारा शक्तिका भक्षण कर लिये जानेपर कालीने पराशरसे प्रभु कृष्णद्वैपायन (व्यासजी)-को जन्म दिया। तदनन्तर कृष्णद्वैपायनने अरणीसे शुक और उपमन्युको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया और पीवरीसे उत्पन्न शुकदेवके इन पुत्रोंको जानिये— भूरिश्रवा, प्रभु, शम्भु, कृष्ण तथा पाँचवाँ गौर। उनकी कीर्तिमती [नामक] कन्या भी हुई, जो योगमाता तथा व्रत धारण करनेवाली थी। वह ब्रह्मदत्तकी माता एवं अनुहकी पत्नी थी। श्वेत, कृष्ण, गौर, श्याम, धूम्र, अरुण, नील तथा बादरिक—ये सब पराशरके वंशज थे। इस प्रकार महात्मा पराशरवंशजोंके वे आठ पक्ष कहे गये हैं॥ ८४-८८॥
अत ऊर्ध्वं निबोधध्वमिन्द्रप्रमितिसम्भवम् ।<br>वसिष्ठस्य कपिञ्जल्यां घृताच्यामुदपद्यत ॥ ८९<br>त्रिमूर्तिर्यः समाख्यातः इन्द्रप्रमितिरुच्यते ।<br>पृथोः सुतायां सम्भूतो भद्रस्तस्याभवद्वसुः ॥ ९०<br>उपमन्युः सुतस्तस्य बहवो ह्यौपमन्यवः ।<br>मित्रावरुणयोश्चैव कौण्डिन्या ये परिश्रुताः ॥ ९१<br>एकार्षेयास्तथा चान्ये वासिष्ठा नाम विश्रुताः ।<br>एते पक्षा वसिष्ठानां स्मृता दश महात्मनाम् ॥ ९२[हे ऋषियो!] अब इसके आगे इन्द्रप्रमितिकी उत्पत्तिके विषयमें जानिये। वसिष्ठका पुत्र कपिंजल्य घृताचीसे उत्पन्न हुआ था, जो त्रिमूर्ति नामसे भी विख्यात हुआ; उसे इन्द्रप्रमिति कहा जाता है। पृथुकी पुत्रीसे भद्र उत्पन्न हुआ और उस [भद्र]-का पुत्र वसु हुआ। उसका पुत्र उपमन्यु और उपमन्युके बहुत पुत्र हुए। कौण्डिन्य नामसे जो प्रसिद्ध हैं, वे मित्र तथा वरुणकी सन्तानें हैं और जो अन्य एकार्षेय हैं, वे वासिष्ठ नामसे प्रसिद्ध हैं। महात्मा वसिष्ठवंशजोंके ये दस पक्ष कहे गये हैं॥ ८९-९२॥
इत्येते ब्रह्मणः पुत्रा मानसा विश्रुता भुवि ।<br>भर्तारश्च महाभागा एषां वंशाः प्रकीर्तिताः ॥ ९३<br>त्रिलोकधारणे शक्ता देवर्षिकुलसम्भवाः ।<br>तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ९४<br>यैस्तु व्याप्तास्त्रयो लोकाः सूर्यस्येव गभस्तिभिः ॥ ९५ये सब ब्रह्माके मानस पुत्रके रूपमें पृथ्वीपर विख्यात हैं। ये महाभाग [सबका] भरण करनेवाले हैं। [हे विप्रो!] मैंने इनके वंशोंका वर्णन कर दिया। देवर्षिकुलमें उत्पन्न होनेवाले ये सब तीनों लोकोंको धारण करनेमें समर्थ हैं। उनके पुत्र-पौत्र सैकड़ों तथा हजारों हैं, जिनके द्वारा सूर्यकी किरणोंकी भाँति तीनों लोक व्याप्त हैं॥ ९३-९५॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवादिसृष्टिकथनं नाम त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'देवादिसृष्टिकथन' नामक तिरसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६३॥

६४- वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा

२६६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

चौंसठवाँ अध्याय

वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>कथं हि राक्षसा शक्तिर्भक्षितः सोऽनुजैः सह।<br>वासिष्ठो वदतां श्रेष्ठ सूत वक्तुमिहार्हसि॥ १**ऋषिगण बोले—**हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी! राक्षस [रुधिर]-ने अनुजोंसहित वसिष्ठपुत्र शक्तिका भक्षण कैसे कर लिया; इसे आप कृपा करके बताइये॥ १॥
सूत उवाच<br>राक्षसो रुधिरो नाम वसिष्ठस्य सुतं पुरा।<br>शक्तिं स भक्षयामास शक्तेः शापात् सहानुजैः॥ २<br>वसिष्ठयाज्यं विप्रेन्द्रास्तदादिश्यैव भूपतिम्।<br>कल्माषपादं रुधिरो विश्वामित्रेण चोदितः॥ ३**सूतजी बोले—**रुधिर नामक राक्षस पूर्वकालमें [विश्वामित्रद्वारा दिये गये] शापके कारण वसिष्ठके पुत्र शक्तिको उनके छोटे भाइयोंसहित खा गया था। हे विप्रो! उस रुधिरने विश्वामित्रसे प्रेरित होकर वसिष्ठके यजमान राजा कल्माषपादके शरीरमें प्रवेश करके उसका भक्षण किया था॥ २-३॥
भक्षितः स इति श्रुत्वा वसिष्ठस्तेन रक्षसा।<br>शक्तिः शक्तिमतां श्रेष्ठो भ्रातृभिः सह धर्मवित्॥ ४<br>हा पुत्र पुत्र पुत्रेति क्रन्दमानो मुहुर्मुहुः।<br>अरुन्धत्या सह मुनिः पपात भुवि दुःखितः॥ ५<br>नष्टं कुलमिति श्रुत्वा मर्तुं चक्रे मतिं तदा।<br>स्मरन् पुत्रशतं चैव शक्तिज्येष्ठं च शक्तिमान्॥ ६<br>न तं विनाहं जीविष्ये इति निश्चित्य दुःखितः॥ ७राक्षसने भाइयोंसहित शक्तिशालीयोंमें श्रेष्ठ शक्तिका भक्षण कर लिया—ऐसा सुनकर वसिष्ठजी अरुन्धतीके साथ दुःखित होकर 'हा पुत्र! पुत्र!'-बार-बार कहकर विलाप करते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े। [मेरा] कुल नष्ट हो गया—यह सुनकर अपने सौ पुत्रों तथा ज्येष्ठ पुत्र शक्तिका स्मरण करते हुए उन शक्तिमान् वसिष्ठने 'अब मैं उसके बिना जीवित नहीं रहूँगा'—ऐसा निश्चय करके दुःखित होकर मरनेका विचार किया॥ ४-७॥
आरुह्य मूर्धानमजात्मजोऽसौ<br>तयात्मवान् सर्वविदात्मविच्च।<br>धराधरस्यैव तदा धरायां<br>पपात पत्या सहसाश्रुदृष्टिः॥ ८नेत्रोंमें आँसू भरे हुए वे आत्मवान्, सर्वज्ञ तथा आत्मवेत्ता ब्रह्मापुत्र वसिष्ठजी पत्नी [अरुन्धती]-के साथ पर्वतके शिखरपर चढ़कर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ८॥
धराधरात्तं पतितं धरा तदा<br>दधार तत्रापि विचित्रकण्ठी।<br>कराम्बुजाभ्यां करिखेलगामिनी<br>रुदन्तमादाय रुरोद सा च॥ ९तब विचित्र हार पहने हुए तथा हाथीके समान क्रीड़ायुक्त चालवाली पृथ्वीने पर्वतसे गिरे हुए उन वसिष्ठको धारण कर लिया और वह कमलके समान [अपने] हाथोंसे उन रोते हुए वसिष्ठको पकड़कर [स्वयं] रुदन करने लगी॥ ९॥
तदा तस्य स्नुषा प्राह पत्नी शक्तेर्महामुनिम्।<br>वसिष्ठं वदतां श्रेष्ठं रुदन्ती भयविह्वला॥ १०तदनन्तर उनकी पुत्रवधू तथा शक्तिकी पत्नी भयसे व्याकुल होकर रोती हुई वक्ताओंमें श्रेष्ठ महामुनि वसिष्ठसे कहने लगी—
भगवन् ब्राह्मणश्रेष्ठ तव देहमिदं शुभम्।<br>पालयस्व विभो द्रष्टुं तव पौत्रं ममात्मजम्॥ ११<br>न त्याज्यं तव विप्रेन्द्र देहमेतत्सुशोभनम्।<br>गर्भस्थो मम सर्वार्थसाधकः शक्तिजो यतः॥ १२'हे भगवन्! हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! हे विभो! अपने पौत्र तथा मेरे पुत्रकी देखभाल करनेके लिये आप अपने इस पवित्र देहकी रक्षा कीजिये। हे विप्रेन्द्र! आपको अपने इस परम सुन्दर शरीरका त्याग

अध्याय ६४ ] वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा [ २६७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नहीं करना चाहिये; क्योंकि सभी अर्थोंको सिद्ध करनेवाला शक्तिपुत्र मेरे गर्भमें स्थित है'॥ १०-१२॥
एवमुक्त्वाथ धर्मज्ञा कराभ्यां कमलेक्षणा।<br>उत्थाप्य श्वशुरं नत्वा नेत्रे सम्मृज्य वारिणा॥ १३<br>दुःखितापि परित्रातुं श्वशुरं दुःखितं तदा।<br>अरुन्धतीं च कल्याणीं प्रार्थयामास दुःखिताम्॥ १४ऐसा कहकर कमलके समान नेत्रोंवाली उस धर्मज्ञाने अपने हाथोंसे श्वशुरको उठाकर [उन्हें] प्रणाम करके जलसे [उनके] नेत्रोंको धोकर स्वयं दुःखित होनेपर भी दुःखी श्वशुरकी रक्षा करनेके लिये दुःखसे युक्त कल्याणी अरुन्धतीसे प्रार्थना की॥ १३-१४॥
स्नुषावाक्यं ततः श्रुत्वा वसिष्ठोत्थाय भूतलात्।<br>संज्ञामवाप्य चालिङ्ग्य सा पपात सुदुःखिता॥ १५<br>अरुन्धती कराभ्यां तां संस्पृश्यास्त्राकुलेक्षणाम्।<br>रुरोद मुनिशार्दूलो भार्यया सुतवत्सलः॥ १६तदनन्तर पुत्रवधूका वचन सुनकर चैतन्य प्राप्तकर पुत्रवत्सल मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ भूमिसे उठकर अरुन्धतीका आश्रय ले अश्रुपूरित नेत्रोंवाली उस अदृश्यन्तीका हाथोंसे स्पर्श करके भार्यासहित रो पड़े। वह अदृश्यन्ती भी अत्यन्त दुःखित होकर भूमिपर गिर पड़ी॥ १५-१६॥
अथ नाभ्यम्बुजे विष्णोर्यथा तस्याश्चतुर्मुखः।<br>आसीनो गर्भशय्यायां कुमार ऋचमाह सः॥ १७तदनन्तर विष्णुके नाभिकमलमें विराजमान ब्रह्माकी भाँति उसकी गर्भशय्यामें आसीन उस शिशुने एक ऋचाका उच्चारण किया॥ १७॥
ततो निशम्य भगवान् वसिष्ठ ऋचमादरात्।<br>केनोक्तमिति सञ्चिन्त्य तदातिष्ठत्समाहितः॥ १८तब उस ऋचाको आदरपूर्वक सुनकर 'किसने इसका उच्चारण किया'—ऐसा सोचकर भगवान् वसिष्ठ एकाग्रचित्त होकर बैठ गये॥ १८॥
व्योमाङ्गणस्थोऽथ हरिः पुण्डरीकनिभेक्षणः।<br>वसिष्ठमाह विश्वात्मा घृणया स घृणानिधिः॥ १९<br>भो वत्स वत्स विप्रेन्द्र वसिष्ठ सुतवत्सल।<br>तव पौत्रमुखाम्भोजादुद्गेषाद्य विनिःसृता॥ २०<br>मत्समस्तव पौत्रोऽसौ शक्तिजः शक्तिमान् मुने।<br>तस्मादुत्तिष्ठ सन्त्यज्य शोकं ब्रह्मसुतोत्तम॥ २१<br>रुद्रभक्तश्च गर्भस्थो रुद्रपूजापरायणः।<br>रुद्रदेवप्रभावेण कुलं ते सन्तरिष्यति॥ २२<br>एवमुक्त्वा घृणी विप्रं भगवान् पुरुषोत्तमः।<br>वसिष्ठं मुनिशार्दूलं तत्रैवान्तरधीयत॥ २३उसके बाद कमलके समान नेत्रवाले, विश्वात्मा तथा कृपानिधि विष्णुने आकाशमें स्थित होकर कृपापूर्वक वसिष्ठसे कहा—'हे वत्स! हे वत्स! हे विप्रेन्द्र! हे वसिष्ठ! हे पुत्रवत्सल! आपके पौत्रके मुखकमलसे यह ऋचा निकली है। हे मुने! शक्तिका यह पुत्र तथा आपका पौत्र मेरे समान शक्तिशाली होगा, अतः हे ब्रह्मपुत्रोंमें श्रेष्ठ! शोकका त्याग करके उठिये। यह गर्भस्थ शिशु रुद्रका भक्त होगा और रुद्रकी पूजामें संलग्न रहेगा; यह रुद्रदेवकी कृपासे आपके कुलका उद्धार करेगा'। मुनिश्रेष्ठ विप्र वसिष्ठसे ऐसा कहकर दयालु भगवान् विष्णु वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ १९-२३॥
ततः प्रणम्य शिरसा वसिष्ठो वारिजेक्षणम्।<br>अदृश्यन्त्या महातेजाः पस्पर्शोदरमादरात्॥ २४<br>हा पुत्र पुत्र पुत्रेति पपात च सुदुःखितः।<br>ललापारुन्धतीं प्रेक्ष्य तदासौ रुदतीं द्विजाः॥ २५तत्पश्चात् कमलके समान नेत्रवाले विष्णुको सिर झुकाकर प्रणाम करके महातेजस्वी वसिष्ठने आदरपूर्वक अदृश्यन्तीके उदरका स्पर्श किया; और हा पुत्र! पुत्र! पुत्र!—ऐसा कहकर अत्यन्त दुःखित होकर वे गिर
२६८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| स्वपुत्रं च स्मरन् दुःखात्पुनरेहोहि पुत्रक।<br>तव पुत्रमिमं दृष्ट्वा भो शक्ते कुलधारणम्॥ २६<br>तवान्तिकं गमिष्यामि तव मात्रा न संशयः। | पड़े। हे द्विजो! उस समय वे रोती हुई अरुन्धतीकी ओर देखकर विलाप करने लगे और अपने पुत्रका स्मरण करते हुए दुःखपूर्वक बोले—‘हे पुत्र! पुनः आ जाओ, आ जाओ। हे शक्ते! कुलको धारण करनेवाले तुम्हारे इस पुत्रको देखकर मैं तुम्हारी माताके साथ तुम्हारे पास आऊँगा; इसमें सन्देह नहीं है’॥ २४—२६ ½ ॥ | | सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा रुदन् विप्र आलिङ्ग्यारुन्धतीं तदा॥ २७<br>पपात ताडयन्तीव स्वस्य कुक्षी करेण वै।<br>अदृश्यन्ती जघानाथ शक्तिजस्यालयं शुभा॥ २८<br>स्वोदरं दुःखिता भूमौ ललाप च पपात च।<br>अरुन्धती तदा भीता वसिष्ठश्च महामतिः॥ २९<br>समुत्थाप्य स्नुषां बालामूचतुर्भयविह्वलौ॥ ३० | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] ऐसा कहकर रोते हुए वे विप्र [वसिष्ठ] अरुन्धतीका आलिङ्गन करके गिर पड़े। शुभ अदृश्यन्ती भी [गर्भस्थ] शक्तिपुत्रके आश्रयरूप अपने उदरको पीटने लगी और दुःखित होकर विलाप करने लगी तथा [पृथ्वीपर] गिर पड़ी। तब डरी हुई अरुन्धती एवं महामति वसिष्ठ बाला पुत्रवधूको उठाकर भयसे विह्वल होकर [उससे] कहने लगे॥ २७–३०॥ | | विचारमुग्धे तव गर्भमण्डलं<br>कराम्बुजाभ्यां विनिहत्य दुर्लभम्।<br>कुलं वसिष्ठस्य समस्तमप्यहो<br>निहन्तुमार्ये कथमुद्यता वद॥ ३१<br>तवात्मजं शक्तिसुतं च दृष्ट्वा<br>चास्वाद्य वक्रामृतमार्यसूनोः।<br>त्रातुं यतो देहमिमं मुनीन्द्रः<br>सुनिश्चितः पाहि ततः शरीरम्॥ ३२ | हे विचारमुग्धे! हे आर्ये! कमलके समान हाथोंसे अपने दुर्लभ गर्भमण्डलको पीटकर तुम वसिष्ठके समस्त वंशको नष्ट करनेके लिये क्यों उद्यत हो? इसे बताओ। तुम्हारे पुत्र तथा शक्तिपुत्रको देखकर और उस आर्यपुत्रके मुखामृतका आस्वादन करके मुझ मुनीन्द्रने इस अपने शरीरको बचानेका निश्चय किया है, अतः तुम [अपने] शरीरकी रक्षा करो॥ ३१–३२॥ | | सूत उवाच<br>एवं स्नुषामुपालभ्य मुनिं चारुन्धती स्थिता।<br>अरुन्धती वसिष्ठस्य प्राह चार्तेति विह्वला॥ ३३<br>त्वय्येव जीवितं चास्य मुनेर्यत्सुव्रते मम।<br>जीवितं रक्ष देहस्य धात्री च कुरु यद्धितम्॥ ३४ | **सूतजी बोले—**इस प्रकार पुत्रवधू तथा मुनि वसिष्ठसे कहकर अरुन्धती स्थित हो गयी। पुनः दुःखी एवं व्याकुल अरुन्धतीने कहा—हे सुव्रते! अब इन मुनि वसिष्ठका तथा मेरा जीवन तुम्हारे ऊपर निर्भर है, अतः तुम धात्रीकी भाँति अपने देहकी रक्षा करो और जो हितकर हो, उसे करो॥ ३३–३४॥ | | अदृश्यन्ती उवाच<br>मया यदि मुनिश्रेष्ठो त्रातुं वै निश्चितं स्वकम्।<br>ममाशुभं शुभं देहं कथञ्चित् पालयाम्यहम्॥ ३५<br>प्रियदुःखमहं प्राप्ता ह्यसती नात्र संशयः।<br>मुने दुःखदहं दग्धा यतः पुत्री मुने तव॥ ३६<br>अहोऽद्भुतं मया दृष्टं दुःखपात्री ह्यहं विभो।<br>दुःखत्राता भव ब्रह्मन् ब्रह्मसूनो जगद्गुरो॥ ३७ | **अदृश्यन्ती बोली—**यदि मुनिश्रेष्ठने अपने जीवनकी रक्षा करनेका निश्चय किया है, तो मैं भी किसी रूपमें अपने शुभ या अशुभ देहकी रक्षा करूँगी। मुझ असतीको [अपने] पतिके वियोगका दुःख प्राप्त हुआ है; इसमें सन्देह नहीं है। हे मुने! मैं दुःखसे दग्ध हूँ। हे मुने! मैं आपकी पुत्री हूँ; मैंने अद्भुत बात देखी है। हे विभो! मैं दुःखकी पात्र हूँ। अतः हे ब्रह्मन्! हे |