भारतकोश
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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
६४२श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उत्पन्न है तथा उत्पन्न होगा—वह सम्पूर्ण प्राणिसमुदायस्वरूप चौदह भुवन इन महारुद्रका ही स्वरूप है॥ २९-३०॥
हिरण्यबाहुर्भगवान् हिरण्यपतिरीश्वरः।<br>अम्बिकापतिरीशानो हेमेरेता वृषध्वजः॥ ३१<br><br>उमापतिर्विरूपाक्षो विश्वसृग्विश्‍ववाहनः।<br>ब्रह्माणं विदधे योऽसौ पुत्रमग्रे सनातनम्॥ ३२<br><br>प्रहिणोति स्म तस्यैव ज्ञानमात्मप्रकाशकम्।जो ये हिरण्यबाहु, भगवान्, हिरण्यपति, ईश्वर, अम्बिकापति, ईशान, हेमेरेता, वृषध्वज, उमापति, विरूपाक्ष, विश्वसृक् तथा विश्ववाहन संज्ञावाले शिव हैं, उन्होंने सबसे पहले सनातन ब्रह्माको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया और उन्हें आत्माको प्रकाशित करनेवाला ज्ञान प्रदान किया॥ ३१-३२¹/₂॥
तमेकं पुरुषं रुद्रं पुरुहूतं पुरुष्टुतम्॥ ३३<br><br>बालाग्रमात्रं हृदयस्य मध्ये<br>विश्वं देवं वह्निरूपं वरेण्यम्।<br>तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-<br>स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥ ३४जो धीर पुरुष उन अद्वितीय, पुरुष, बहुतोंके द्वारा आवाहन किये जानेवाले, बहुतोंके द्वारा स्तुत होनेवाले, हृदयके मध्यमें बालके अग्रभागके समान सूक्ष्मरूपसे विराजमान, विश्वेश्वर देव, अग्निरूप तथा सर्वश्रेष्ठ रुद्रको अपनेमें स्थित देखते हैं, उन्हींको शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, अन्य लोगोंको नहीं॥ ३३-३४॥
महतो यो महीयांश्च ह्यणोरप्यणुरव्ययः।<br>गुहायां निहितश्चात्मा जन्तोरस्य महेश्वरः॥ ३५<br><br>वेश्मभूतोऽस्य विश्वस्य कमलस्थो हृदि स्वयं।<br>गह्वरं गहनं तत्स्थं तस्यान्तश्चोर्ध्वतः स्थितः॥ ३६<br><br>तत्रापि दहं गगनमोङ्कारं परमेश्वरम्।<br>बालाग्रमात्रं तन्मध्ये ऋतं परमकारणम्॥ ३७<br><br>सत्यं ब्रह्म महादेवं पुरुषं कृष्णपिङ्गलम्।<br>ऊर्ध्वरेतसमीशानं विरूपाक्षमजोद्भवम्॥ ३८<br><br>अधितिष्ठति योनिं यो योनिं वाचैक ईश्वरः।<br>देहं पञ्चविधं येन तमीशानं पुरातनम्॥ ३९जो महान्‌से भी महान् हैं, अणुसे भी सूक्ष्म हैं तथा अव्यय हैं, वे महेश्वर प्राणियोंकी हृदयरूपी गुहामें आत्मरूपसे स्थित हैं। कमलपर स्थित रहनेवाले वे शिव इस विश्वके आलयभूत होते हुए भी प्राणियोंके हृदयमें स्वयं विद्यमान रहते हैं और उस हृदयकमलमें स्थित जो अयोगियोंके लिये दुर्ज्ञेय हृदयाकाश है, उसके भीतर तथा बाहर अग्निशिखाकी भाँति विराजमान हैं। उस अग्निशिखामें भी बालाग्रके समान सूक्ष्म जो दहरसंज्ञक आकाश है, उसके मध्यमें ऋत, परमकारणरूप, सत्य, ब्रह्मरूप, महादेव, पुरुष, अर्धनारीश्वर, ऊर्ध्वरेता, ईशान, त्रिनेत्र तथा अजोद्भव परमेश्वर ओंकाररूपमें स्थित हैं। एक अथवा अनेक रूपोंवाले वे ईश्वर भिन्न-भिन्न योनियोंमें प्रवेश करते हैं, जिसके फलस्वरूप वे अन्नमय आदि पंचविध देह ग्रहण करते हैं—उन पुरातन ईशानको जो धीर पुरुष देखते हैं, उन्हें शान्ति प्राप्त होती है॥ ३५-३९॥
प्राणेष्वन्तर्मनसो लिङ्गमाहु-<br>र्यस्मिन् क्रोधो या च तृष्णा क्षमा च।<br>तृष्णां छित्त्वा हेतुजालस्य मूलं<br>बुद्ध्याचिन्त्यं स्थापयित्वा च रुद्रे॥ ४०वे [शिव] प्राणोंके भीतर स्थित हैं। उन्हें मनका स्वरूप कहा गया है, जिसमें क्रोध, तृष्णा, क्षमा आदि विद्यमान रहते हैं। भवबन्धनके हेतुके मूल कारणभूत तृष्णाका छेदन करके उसे रुद्रमें स्थापित करके बुद्धिके द्वारा उनका चिन्तन करना चाहिये॥ ४०॥

अध्याय १८ ] देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति ६४३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एकं तमाहुर्वै रुद्रं शाश्वतं परमेश्वरम्।<br>परात्परतरं वापि परात्परतरं ध्रुवम्॥ ४१<br>ब्रह्मणो जनकं विष्णोर्वह्नेर्वायोः सदाशिवम्।<br>ध्यात्वाग्निना च शोध्याङ्गं विशोध्य च पृथक्पृथक्॥ ४२<br>पञ्चभूतानि संयम्य मात्राविधिगुणक्रमात्।<br>मात्राः पञ्च चतस्रश्च त्रिमात्राद्विस्ततः परम्॥ ४३<br>एकमात्रममात्रं हि द्वादशान्ते व्यवस्थितम्।<br>स्थित्वा स्थाप्यामृतो भूत्वा व्रतं पाशुपतं चरेत्॥ ४४उन्हीं एकमात्र रुद्रको शाश्वत, परमेश्वर, परात्परतरसे भी परात्परतर तथा ध्रुव कहा गया है। ब्रह्मा, विष्णु, अग्नि तथा वायुके जनक सदाशिवका ध्यान करके, अग्निबीज (रं)-से देहका शोधन करके पृथक्-पृथक् पंचभूतोंका विशोधन पुनः मात्राविधि-गुणके क्रमसे पाँच-चार-तीन-दो-एक—इन तन्मात्राओंका संयमन करके द्वादशारचक्रके अन्तमें विराजमान निर्गुण शिवको स्थापित करके तथा स्वयं वहाँ स्थित होकर अमृतरूप होकर पाशुपतव्रत करना चाहिये॥ ४१-४४॥
एतद्व्रतं पाशुपतं चरिष्यामि समासतः।<br>अग्निमाधाय विधिवदृग्यजुःसामसम्भवैः॥ ४५<br>उपोषितः शुचिः स्नातः शुक्लाम्बरधरः स्वयम्।<br>शुक्लयज्ञोपवीती च शुक्लमाल्यानुलेपनः॥ ४६<br>जुहुयाद्विरजो विद्वान् विरजाश्च भविष्यति।मैं इस पाशुपतव्रतको संक्षेपमें करूँगा—ऐसा संकल्प करके ऋक्, यजुः, सामके मन्त्रोंसे विधिपूर्वक अग्निस्थापन करके, उपवासपूर्वक स्नान करके शुद्ध होकर शुक्ल वस्त्र, शुक्ल यज्ञोपवीत, शुक्ल माला, शुक्ल चन्दन आदि धारण करके रजोगुणसे मुक्त होकर विद्वान् होम करे; इस प्रकार वह रजोगुणरहित हो जायगा॥ ४५-४६ १/२॥
वायवः पञ्च शुध्यन्तां वाङ्मनश्चरणायः॥ ४७<br>श्रोत्रं जिह्वा ततः प्राणस्ततो बुद्धिस्तथैव च।<br>शिरः पाणिस्तथा पार्श्वं पृष्ठोदरमनन्तरम्॥ ४८<br>जङ्घे शिश्नमुपस्थं च पायुर्मेढ्रं तथैव च।<br>त्वचा मांसं च रुधिरं मेदोऽस्थीनि तथैव च॥ ४९<br>शब्दः स्पर्शं च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च।<br>भूतानि चैव शुध्यन्तां देहे मेदादयस्तथा॥ ५०<br>अन्नं प्राणे मनो ज्ञानं शुध्यन्तां वै शिवेच्छया।<br>हुत्वाज्येन समिद्भिश्च चरुणा च यथाक्रमम्॥ ५१<br>उपसंहृत्य रुद्राग्निं गृहीत्वा भस्म यत्नतः।<br>अग्निरित्यादिना धीमान् विमृज्याङ्गानि संस्पृशेत्॥ ५२शिवकी इच्छासे [मेरे प्राण आदि] पाँचों वायु शुद्ध हों, वाणी, मन, पाद, कान, जिह्वा, प्राण, बुद्धि, सिर, हाथ, पार्श्वभाग, पृष्ठभाग, उदर, दोनों जाँघें, शिश्न, जननेन्द्रिय, गुदा, मेढ्र, त्वचा, मांस, रुधिर, मेद, अस्थियाँ, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, पृथ्वी आदि [पंच] महाभूत तथा देहमें स्थित मेद आदि शुद्ध हों; अन्न, प्राण, मन तथा ज्ञान शुद्ध हों—इस प्रकार यथाक्रम आज्य (घृत), समिधा तथा चरुसे विरजाहोम करके रुद्राग्निका उपसंहरणकर यत्नपूर्वक 'अग्निरिति' मन्त्रसे भस्म ग्रहणकर उसे मल करके बुद्धिमान्को अंगोंमें लगाना चाहिये॥ ४७-५२॥
एतत्पाशुपतं दिव्यं व्रतं पाशविमोचनम्।<br>ब्राह्मणानां हितं प्रोक्तं क्षत्रियाणां तथैव च॥ ५३<br>वैश्यानामपि योग्यानां यतीनां तु विशेषतः।<br>वानप्रस्थाश्रमस्थानां गृहस्थानां सतामपि॥ ५४<br>विमुक्तिर्विधिनानेन दृष्ट्वा वै ब्रह्मचारिणाम्।<br>अग्निरित्यादिना भस्म गृहीत्वा ह्यग्निहोत्रजम्॥ ५५<br>सोऽपि पाशुपतो विप्रो विमृज्याङ्गानि संस्पृशेत्।<br>भस्मच्छन्नो द्विजो विद्वान् महापातकसम्भवैः॥ ५६यह दिव्य पाशुपतव्रत बन्धनसे मुक्ति दिलानेवाला और ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, विशेषरूपसे योग्य (अदुष्ट तथा अपतित) यतियों, वानप्रस्थ-आश्रममें स्थित रहनेवालों, सत्पुरुष गृहस्थों तथा ब्रह्मचारियोंके लिये हितकर कहा गया है, इस प्रकार विरजादीक्षासहित भस्म धारण करनेसे मुक्ति होती है—ऐसा जानकर 'अग्निरिति' इत्यादि मन्त्रसे अग्निहोत्रके भस्मको ग्रहण करके उसे मलकर अंगोंमें धारण करना चाहिये; ऐसा करनेवाला
६४४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| पापैर्विमुच्यते सद्यो मुच्यते च न संशयः।<br>वीर्यमग्नेर्यतो भस्म वीर्यवान् भस्मसंयुतः ॥ ५७<br><br>भस्मस्नानरतो विप्रो भस्मशायी जितेन्द्रियः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ५८<br><br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भूत्यङ्गं पूजयेद्बुधः।<br>रेरेकारो न कर्तव्यस्तुन्तुन्कारस्तथैव च ॥ ५९<br><br>न तत्क्षमति देवेशो ब्रह्मा वा यदि केशवः।<br>मम पुत्रो भस्मधारी गणेशश्च वरानने ॥ ६० | विप्र भी पाशुपत हो जाता है। भस्मसे अनुलिप्त विद्वान् द्विज महापापोंसे होनेवाले दोषोंसे शीघ्र मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। चूँकि अग्निका भस्म वीर्य (तेजरूप) होता है, अतः भस्म धारण करनेवाला वीर्यवान् (तेजस्वी) होता है। भस्मस्नानपरायण, भस्मशायी तथा जितेन्द्रिय विप्र सभी पापोंसे मुक्त होकर शिवसायुज्य प्राप्त करता है; अतः बुद्धिमान्‌को चाहिये कि अंगोंमें विभूति (भस्म) धारण करनेवालेकी पूजा करे, उनके प्रति ‘रे’ अथवा ‘तुम’ शब्द नहीं बोलना चाहिये; हे वरानने! इसे देवेश शिव सहन नहीं करते हैं, ऐसा कहनेवाले चाहे ब्रह्मा, विष्णु अथवा भस्मधारी मेरे पुत्र गणेश ही क्यों न हों? ॥ ५३-६०॥ | | तेषां विरुद्धं यत्त्याज्यं स याति नरकार्णवम्।<br>गृहस्थो ब्रह्महीनोऽपि त्रिपुण्ड्रं यो न कारयेत् ॥ ६१<br><br>पूजा कर्म क्रिया तस्य दानं स्नानं तथैव च।<br>निष्फलं जायते सर्वं यथा भस्मनि वै हुतम् ॥ ६२<br><br>तस्माच्च सर्वकार्येषु त्रिपुण्ड्रं धारयेद्बुधः।<br>इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा स्तुत्वा देवैः समं प्रभुः ॥ ६३ | जो कुछ भी उन पाशुपतव्रत करनेवालोंके विरुद्ध हो, वह त्याज्य है; जो त्याग नहीं करता, वह नरकार्णवमें जाता है। तपस्या आदिसे रहित होते हुए भी जो गृहस्थ त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करता है, उसके द्वारा की गयी पूजा, सत्कर्म, क्रिया, दान, स्नान—सब कुछ उसी भाँति निष्फल होता है, जैसे भस्ममें डाली गयी आहुति। अतः बुद्धिमान्‌को सभी सत्कर्मोंमें त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ ६१-६२ १/२ ॥ | | भस्मच्छन्नैः स्वयं छन्नो विरराम विशाम्पते।<br>अथ तेषां प्रसादार्थं पशूनां पतिरीश्वरः ॥ ६४<br><br>सगणश्चाम्बया सार्धं सान्निध्यमकरोत्प्रभुः।<br>अथ सन्निहितं रुद्रं तुष्टुवुः सुरपुङ्गवम् ॥ ६५<br><br>रुद्राध्यायेन सर्वेशं देवदेवमुमापतिम्।<br>देवोऽपि देवानालोक्य घृणया वृषभध्वजः ॥ ६६<br><br>तुष्टोऽस्मीत्याह देवेभ्यो वरं दातुं सुरारिहा ॥ ६७ | हे विशाम्पते! इस प्रकार भस्ममाहात्म्य कहकर स्वयं भस्म धारण किये हुए प्रभु भगवान् ब्रह्मा भस्म धारण किये देवताओंके साथ शिवकी स्तुति करके [ध्यानानन्दमें मग्न होकर] शान्त हो गये। तदनन्तर उन देवताओंपर अनुग्रह करनेके लिये पशुपति प्रभु महेश्वर गणों तथा पार्वतीके साथ प्रकट हुए। इसके बाद वे देवता वहाँ उपस्थित सुरश्रेष्ठ, सर्वेश, देवदेव, उमापति रुद्रकी रुद्राध्यायसे स्तुति करने लगे। तब देवशत्रुओंका संहार करनेवाले भगवान् वृषभध्वजने कृपापूर्ण दृष्टिसे देवोंको देखकर ‘मैं देवताओंको वर प्रदान करनेके लिये सन्तुष्ट हूँ’—ऐसा कहा ॥ ६३-६७॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णन' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १८॥

१९- देवताओं तथा मुनियोंको सूर्यमण्डलमें उमासहित नीललोहित पंचमुख सदाशिवके विराट्स्वरूपका दर्शन होना और उनकी पूजा एवं स्तुति करना

अध्याय १९ ]देवताओं तथा मुनियोंको सूर्यमण्डलमें उमासहित पंचमुख सदाशिवका दर्शन६४५

उन्नीसवाँ अध्याय

देवताओं तथा मुनियोंको सूर्यमण्डलमें उमासहित नीललोहित पंचमुख सदाशिवके विराट्स्वरूपका दर्शन होना और उनकी पूजा एवं स्तुति करना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शैलादिरुवाच<br>तं प्रभुं प्रीतमनसं प्रणिपत्य वृषध्वजम्।<br>अपृच्छन्मुनयो देवाः प्रीतिकण्टकितत्वचः॥ १शैलादि बोले— [हे सनत्कुमार!] प्रसन्न मनवाले उन प्रभु वृषध्वज शिवको प्रणाम करके हर्षसे रोमांचित शरीरवाले मुनियों तथा देवताओंने उनसे पूछा— ॥ १॥
देवा ऊचुः<br>भगवन् केन मार्गेण पूजनीयो द्विजातिभिः।<br>कुत्र वा केन रूपेण वक्तुमर्हसि शङ्कर॥ २<br>कस्याधिकारः पूजायां ब्राह्मणस्य कथं प्रभो।<br>क्षत्रियाणां कथं देव वैश्यानां वृषभध्वज॥ ३<br>स्त्रीशूद्राणां कथं वापि कुण्डगोलादिनां तु वा।<br>हिताय जगतां सर्वमस्माकं वक्तुमर्हसि॥ ४देवता बोले— हे भगवन्! द्विजातिगण किस विधिसे, कहाँ और किस रूपसे आपका पूजन करें, हे शंकर! आप बतानेकी कृपा कीजिये। हे प्रभो! किस ब्राह्मणका [आपकी] पूजामें अधिकार है? हे देव! हे वृषध्वज! क्षत्रियों, वैश्यों, स्त्रियों, शूद्रों, कुण्ड-गोलक आदि वर्णसंकर लोगोंका आपकी पूजामें किस प्रकारसे अधिकार है? जगत्के कल्याणके लिये हमें यह सब बतानेका अनुग्रह करें॥ २–४॥
सूत उवाच<br>तेषां भावं समालोक्य मुनीनां नीललोहितः।<br>प्राह गम्भीरया वाचा मण्डलस्थः सदाशिवः॥ ५<br>मण्डले चाग्रतो पश्यन् देवदेवं सहोमया।<br>देवाश्च मुनयः सर्वे विद्युत्कोटिसमप्रभम्॥ ६<br>अष्टबाहुं चतुर्वक्त्रं द्वादशाक्षं महाभुजम्।<br>अर्धनारीश्वरं देवं जटामुकुटधारिणम्॥ ७<br>सर्वाभरणसंयुक्तं रक्तमाल्यानुलेपनम्।<br>रक्ताम्बरधरं सृष्टिस्थितिसंहारकारकम्॥ ८सूतजी बोले— उन देवताओं और मुनियोंकी भक्ति देखकर सूर्यमण्डलमें स्थित नीललोहित सदाशिव गम्भीर वाणीमें बोले। उस अवसरपर सभी देवताओं और मुनियोंने सामने देखा कि सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले देवदेव शिव सूर्यमण्डलमें उमाके साथ विराजमान हैं, करोड़ों विद्युत्के समान उनकी प्रभा है, वे आठ भुजाओं, चार मुखों तथा बारह नेत्रोंसे शोभा पा रहे हैं, वे बड़ी-बड़ी भुजाओंसे युक्त हैं, वे प्रभु अर्धनारीश्वररूपमें हैं, वे जटाजूटरूपी मुकुट धारण किये हुए हैं, वे सभी आभरणोंसे समन्वित हैं और रक्तवर्णकी माला, चन्दन तथा वस्त्र धारण किये हुए हैं॥ ५–८॥
तस्य पूर्वमुखं पीतं प्रसन्नं पुरुषात्मकम्।<br>अघोरं दक्षिणं वक्त्रं नीलाञ्जनचयोपमम्॥ ९<br>दंष्ट्राकरालमत्युग्रं ज्वालामालासमावृतम्।<br>रक्तश्मश्रुं जटायुक्तं चोत्तरे विद्रुमप्रभम्॥ १०<br>प्रसन्नं वामदेवाख्यं वरदं विश्वरूपिणम्।<br>पश्चिमं वदनं तस्य गोक्षीरधवलं शुभम्॥ ११<br>मुक्ताफलमयैर्हारैर्भूषितं तिलकोज्ज्वलम्।<br>सद्योजातमुखं दिव्यं भास्करस्य स्मरारिणः॥ १२उनका पूर्वमुख तत्पुरुषसंज्ञक था, जो पीतवर्ण तथा प्रसन्नतासे युक्त था, उनका अघोर नामक दक्षिणमुख नीले अंजनके तुल्य, विकराल दाढ़ोंसे युक्त, अत्यन्त उग्र, ज्वालासमूहसे समावृत, रक्तवर्णकी दाढ़ीसे युक्त और जटाओंसे सुशोभित था, उत्तर दिशामें उनका वामदेव नामक मुख था, जो प्रवालमणिके सदृश प्रभासे युक्त, प्रसन्न, वरदायक तथा विश्वरूप था और उन कामरिपु भास्कररूप शिवका पश्चिममुख सद्योजात नामवाला था, जो गौके दुग्धके समान धवल, सुन्दर, मुक्ताफलसे युक्त
६४६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हारोंसे सुशोभित, तिलकसे प्रकाशित तथा अत्यन्त दिव्य था॥ ९-१२॥
आदित्यमग्रतोऽपश्यन्पूर्ववच्चतुराननम् ।<br>भास्करं पुरतो देवं चतुर्वक्त्रं च पूर्ववत्॥ १३<br><br>भानुं दक्षिणतो देवं चतुर्वक्त्रं च पूर्ववत्।<br>रविमुत्तरतोऽपश्यन्पूर्ववच्चतुराननम् ॥ १४<br><br>विस्तारां मण्डले पूर्वे उत्तरां दक्षिणे स्थिताम्।<br>बोधनीं पश्चिमे भागे मण्डलस्य प्रजापतेः॥ १५<br><br>अध्यायनीं च कौबेर्यामेकवक्त्रां चतुर्भुजाम्।<br>सर्वाभरणसम्पन्नाः शक्तयः सर्वसम्मताः॥ १६उन्होंने आगेकी ओर शिवके ही सदृश चार मुखोंवाले आदित्यको, पूर्वकी ओर शिवसदृश चतुर्मुख भगवान् भास्करको, दक्षिणकी ओर शिवतुल्य चतुर्मुख प्रभु भानुको और उत्तरकी ओर शिवके ही समान चतुर्मुख रविको देखा। इसी प्रकार उन देवताओंने सूर्यमण्डलकी पूर्वदिशामें देवी विस्ताराको, दक्षिणमें उत्तराको, पश्चिमभागमें बोधनीको और उत्तरदिशामें एक मुख तथा चार भुजाओंवाली अध्यायनीको विराजमान देखा। सबकी पूज्य ये शक्तियाँ सभी आभरणोंसे सम्पन्न थीं॥ १३-१६॥
ब्रह्माणं दक्षिणे भागे विष्णुं वामे जनार्दनम्।<br>ऋग्यजुःसाममार्गेण मूर्तित्रयमयं शिवम्॥ १७<br><br>ईशानं वरदं देवमीशानं परमेश्वरम्।<br>ब्रह्मासनस्थं वरदं धर्मज्ञानासनोपरि॥ १८<br><br>वैराग्यैश्वर्यसंयुक्ते प्रभूते विमले तथा।<br>सारं सर्वेश्वरं देवमाराध्यं परमं सुखम्॥ १९<br><br>सितपङ्कजमध्यस्थं दीप्ताद्यैरभिसंवृतम्।<br>दीप्तां दीपशिखाकारां सूक्ष्मां विद्युत्प्रभां शुभाम्॥ २०<br><br>जयामग्निशिखाकारां प्रभां कनकसुप्रभाम्।<br>विभूतिं विद्रुमप्रख्यां विमलां पद्मसंनिभाम्॥ २१<br><br>अमोघां कर्णिकाकारां विद्युत्तं विश्ववर्णिनीम्।<br>चतुर्वक्त्रां चतुर्वर्णां देवीं वै सर्वतोमुखीम्॥ २२<br><br>सोममङ्गारकं देवं बुधं बुद्धिमतां वरम्।<br>बृहस्पतिं बृहद्बुद्धिं भार्गवं तेजसां निधिम्॥ २३<br><br>मन्दं मन्दगतिं चैव समन्तात्तस्य ते सदा।<br>सूर्यः शिवो जगन्नाथः सोमः साक्षादुमा स्वयं॥ २४<br><br>पञ्चभूतानि शेषाणि तन्मयं च चराचरम्।<br>दृष्ट्वैव मुनयः सर्वे देवदेवमुमापतिम्॥ २५देवताओं तथा मुनियोंने उनके दाहिनी ओर ब्रह्माको और बायीं ओर जनार्दन विष्णुको देखा। उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके क्रमसे [ब्रह्मा, रुद्र तथा विष्णुमय रूपमें] तीन विग्रहोंसे सुशोभित सबके स्वामी, वरद, ईशान, वरदायक, परमेश्वर शिवको धर्मज्ञानके आसनपर ब्रह्मासनमें स्थित देखा। उन्होंने वैराग्य तथा ऐश्वर्यसे सुशोभित विशाल तथा विमल आसनपर श्वेत कमलके मध्यमें विराजमान सबके स्वामी, देवताओंके आराध्य, सर्वोपरि तथा सुखदायक शिवको दीप्ता आदि [नौ] शक्तियोंसे आवृत देखा। उन देवताओं और मुनियोंने प्रज्वलित अग्निकी शिखाके समान दीप्ताको, विद्युत्प्रभाके समान शुभ सूक्ष्माको, अग्निशिखाके आकारवाली जयाको, सुवर्णके कान्तिसदृश प्रभाको, विद्रुम (मूँगा)-के समान वर्णवाली विभूतिको, कमलसदृश विमलाको, कमलकी कर्णिकाके रूपवाली अमोघाको, अनेक वर्णोंवाली देवी विद्युत्को, चार मुखों और चार वर्णोंवाली देवी सर्वतोमुखीको, चन्द्रमाको, मंगलको, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ देव बुधको, महान् बुद्धिवाले बृहस्पतिको, तेजोनिधि शुक्रको और मन्दगतिवाले शनैश्चरको सदा उन शिवके चारों ओर स्थित देखा। स्वयं जगत्स्वामी शिवरूप सूर्य, साक्षात् उमारूप चन्द्र और गगनादि पंचमहाभूतरूप भौम आदि पाँच ग्रह हैं, इन्हींसे चराचर जगत् व्याप्त है। इस प्रकार देवदेव उमापति सदाशिवको देखते ही सभी मुनियोंको पूजाविधिका ज्ञान

अध्याय १९] देवताओं तथा मुनियोंको सूर्यमण्डलमें उमासहित पंचमुख सदाशिवका दर्शन ६४७


संस्कृतहिन्दी
कृताञ्जलिपुटाः सर्वे मुनयो देवतास्तथा।<br>अस्तुवन् वाग्भिरिष्टाभिर्वरदं नीललोहितम्॥ २६हो गया और उन सभी मुनियों तथा देवताओंने हाथ जोड़कर अभिलषित वाणीद्वारा वर प्रदान करनेवाले नीललोहित भगवान् शिवकी स्तुति की॥ १७—२६॥
ऋषय ऊचुः<br>नमः शिवाय रुद्राय कद्रुद्राय प्रचेतसे।<br>मीढुष्टमाय शर्वाय शिपिविष्टाय रंहसे॥ २७<br>प्रभूते विमले सारे ह्याधारे परमे सुखे।<br>नवशक्त्यावृतं देवं पद्मस्थं भास्करं प्रभुम्॥ २८<br>आदित्यं भास्करं भानुं रविं देवं दिवाकरम्।<br>उमां प्रभां तथा प्रज्ञां सन्ध्यां सावित्रिकामपि॥ २९<br>विस्तारामुत्तरां देवीं बोधनीं प्रणमाम्यहम्।<br>आप्यायनीं च वरदां ब्रह्माणं केशवं हरम्॥ ३०ऋषिगण बोले— शिव, रुद्र, कद्रुद्र, प्रचेता, मीढुष्टम, शर्व, शिपिविष्ट तथा रंहको नमस्कार है। विशाल, विमल, श्रेष्ठ तथा परम सुखदायक आसनपर विराजमान, नौ शक्तियोंसे आवृत तथा कमलके मध्यमें स्थित भगवान् भास्करको, आदित्य-भास्कर-भानु, रवि, देव तथा दिवाकरको उमा, प्रभा, प्रज्ञा, सन्ध्या, सावित्रिका, विस्तारा, उत्तरा, देवी बोधनी, वर प्रदान करनेवाली आप्यायनी, ब्रह्मा, केशव तथा हरको मैं प्रणाम करता हूँ॥ २७—३०॥
सोमादिवृन्दं च यथाक्रमेण<br>सम्पूज्य मन्त्रैर्विहितक्रमेण।<br>स्मरामि देवं रविमण्डलस्थं<br>सदाशिवं शङ्करमादिदेवम्॥ ३१विहित विधिसे मन्त्रोंके द्वारा यथाक्रम सोम आदिका सम्यक् पूजन करके मैं सूर्यमण्डलमें विराजमान सदाशिव आदिदेव भगवान् शंकरका स्मरण करता हूँ॥ ३१॥
इन्द्रादिदेवांश्च तथेश्वरांश्च<br>नारायणं पद्मजमादिदेवम्।<br>प्रागाद्यधोध्वं च यथाक्रमेण<br>वज्रादिपद्मं च तथा स्मरामि॥ ३२इन्द्र आदि आठ दिक्पालोंका, उनके अधिदेवताओंका, नारायणका, आदिदेव ब्रह्माका, यथाक्रम पूर्व आदि आठ दिशाओंका, ऊर्ध्व तथा अधः दिशाओंका और वज्र, पद्म आदिका स्मरण करता हूँ॥ ३२॥
सिन्दूरवर्णाय समण्डलाय<br>सुवर्णवज्राभरणाय तुभ्यम्।<br>पद्माभनेत्राय सपङ्कजाय<br>ब्रह्मेन्द्रनारायणकारणाय ॥ ३३सिन्दूरके समान वर्णवाले, मण्डलयुक्त, सुवर्ण तथा हीरेके आभरणोंसे सुशोभित, कमलसदृश नेत्रोंवाले, कमल धारण करनेवाले तथा ब्रह्मा-इन्द्र-नारायणके भी कारणरूप सदाशिवको नमस्कार है॥ ३३॥
रथं च सप्ताश्वमनूरुवीरं<br>गणं तथा सप्तविधं क्रमेण।<br>ऋतुप्रवाहेण च वालखिल्यान्<br>स्मरामि मन्देहगणक्षयं च॥ ३४मैं सूर्यके रथको, सात घोड़ोंको, पराक्रमी अरुणको, वसन्तादि ऋतुक्रमसे व्यवस्थित सप्तविध गणोंको, वालखिल्य आदि ऋषियोंको तथा मन्देह नामक असुरोंके विनाशको स्मृति-पथपर लाता हूँ॥ ३४॥
हुत्वा तिलाद्यैर्विविधैस्तथाग्नौ<br>पुनः समाप्यैव तथैव सर्वम्।<br>उद्वास्य हृत्पङ्कजमध्यसंस्थं<br>स्मरामि बिम्बं तव देवदेव॥ ३५हे देवदेव! तिल आदि विविध पदार्थोंसे अग्निमें हवन करके पुनः सम्पूर्ण कृत्यका समापन करके हृदयकमलके मध्य संस्थित आपके बिम्बको मण्डलसे निकालकर मैं स्मरण करता हूँ॥ ३५॥
स्मरामि बिम्बानि यथाक्रमेण<br>रक्तानि पद्मामललोचनानि।मैं क्रमशः आपके रक्तबिम्बोंका, पद्मके समान निर्मल नेत्रोंका, दाहिने हाथमें स्थित पद्म, बायें हाथमें स्थित वरद मुद्राका तथा शोभासम्पन्न आभूषणोंका स्मरण करता हूँ॥ ३६॥

२०- पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा

६४८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
पद्मं च सव्ये वरदं च वामे<br>करे तथा भूषितभूषणानि ॥ ३६<br>दंष्ट्राकरालं तव दिव्यवक्त्रं<br>विद्युतप्रभं दैत्यभयङ्करं च।<br>स्मरामि रक्षाभिरतं द्विजानां<br>मन्देहरक्षोगणभर्त्सनं च ॥ ३७मैं विकराल दाढ़ोंवाले, विद्युत्की कान्तिवाले, दैत्योंके लिये भयकारक, ब्राह्मणोंकी रक्षामें संलग्न तथा मन्देह नामक राक्षससमुदायकी भर्त्सना करनेवाले आपके दिव्य मुखका स्मरण करता हूँ ॥ ३७॥
सोमं सितं भूमिजमग्निवर्णं<br>चामीकराभं बुधमिन्दुसूनुम् ।<br>बृहस्पतिं काञ्चनसन्निकाशं<br>शुक्रं सितं कृष्णतरं च मन्दम् ॥ ३८<br>स्मरामि सव्यमभयं वाममूरुगतं वरम् ।<br>सर्वेषां मन्दपर्यन्तं महादेवं च भास्करम् ॥ ३९श्वेतवर्णवाले चन्द्रमा, अग्निवर्णके तुल्य मंगल, धत्तूर-वृक्षके समान आभावाले चन्द्रपुत्र बुध, सुवर्णकी आभावाले बृहस्पति, श्वेत वर्णवाले शुक्र, अत्यन्त कृष्ण-वर्णवाले शनि—इस प्रकार शनिपर्यन्त सप्तग्रहरूपामक सभी ग्रहोंके परम कारण तथा दाहिने हाथमें अभय मुद्रा और बायें हाथको अपने उरुदेशमें स्थित करके वरद मुद्रा धारण करनेवाले भास्कररूप महादेवका स्मरण करता हूँ ॥ ३८-३९॥
पूर्णेन्दुवर्णेन च पुष्पगन्ध-<br>प्रस्थेन तोयेन शुभेन पूर्णम् ।<br>पात्रं दृढं ताम्रमयं प्रकल्प्य<br>दास्ये तवार्घ्यं भगवन् प्रसीद ॥ ४०<br>नमः शिवाय देवाय ईश्वराय कपर्दिने ।<br>रुद्राय विष्णवे तुभ्यं ब्रह्मणे सूर्यमूर्तये ॥ ४१पूर्ण चन्द्रमाके समान वर्णवाले तथा पुष्पगन्ध फैलानेवाले पवित्र जलसे पूरित दृढ़ ताम्रपात्रको प्रकल्पित करके मैं आपको अर्घ्य प्रदान करता हूँ। हे भगवन्! प्रसन्न होइये। ईश्वर, कपर्दी, रुद्र, विष्णुरूप, ब्रह्मस्वरूप, सूर्यमूर्ति आप भगवान् शिवको नमस्कार है ॥ ४०-४१॥
सूत उवाच<br>यः शिवं मण्डले देवं सम्पूज्यैवं समाहितः ।<br>प्रातर्मध्याह्नसायाह्ने पठेत्स्तवमनुत्तमम् ॥ ४२<br>इत्थं शिवेन सायुज्यं लभते नात्र संशयः ॥ ४३सूतजी बोले—[हे ऋषिगण!] इस प्रकार जो मनुष्य एकनिष्ठ होकर सूर्यमण्डलमें भगवान् शिवका विधिपूर्वक पूजन करके प्रातः, मध्याह्न तथा सायंवेलामें इस उत्तम स्तोत्रका पाठ करता है, वह शिवके साथ सायुज्य प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४२-४३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवपूजनवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवपूजनवर्णन' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥


बीसवाँ अध्याय

पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा

सूत उवाचसूतजी बोले—
अथ रुद्रो महादेवो मण्डलस्थः पितामहः ।<br>पूज्यो वै ब्राह्मणानां च क्षत्रियाणां विशेषतः ॥ १<br>वैश्यानां नैव शूद्राणां शुश्रूषां पूजकस्य च ।<br>स्त्रीणां नैवाधिकारोऽस्ति पूजादिषु न संशयः ॥ २<br>स्त्रीशूद्राणां द्विजेन्द्रैश्च पूजया तत्फलं भवेत् ।<br>नृपाणामुपकारार्थं ब्राह्मणाद्यैर्विशेषतः ॥ ३<br>एवं सम्पूजयेयुर्वै ब्राह्मणाद्याः सदाशिवम् ।<br>इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रस्तत्रैवान्तरधात्स्वयम् ॥ ४[हे ऋषिगण!] सूर्यमण्डलमें स्थित पितामह महादेव रुद्र ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्योंके विशेषरूपसे पूज्य हैं, वे शूद्रोंके पूज्य नहीं हैं, उन्हें तो शिवपूजककी सेवा करनी चाहिये, स्त्रियोंको भी पूजा आदिमें अधिकार नहीं है, इसमें संशय नहीं है। द्विजेन्द्रोंके द्वारा की गयी पूजासे ही स्त्रियों तथा शूद्रोंको मण्डलपूजाका फल प्राप्त हो जाता है। राजाओंके उपकारके लिये श्रेष्ठ ब्राह्मणके द्वारा विशेषरूपसे पूजा की जानी चाहिये। इस प्रकार ब्राह्मण आदिको विधिवत्

अध्याय २० ] पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा | ६४९


Sanskrit ShlokaHindi Translation
ते देवा मुनयः सर्वे शिवमुद्दिश्य शङ्करम्।<br>प्रणेमुश्च महात्मानो रुद्रध्यानेन विह्वलाः ॥ ५<br>जग्मुर्यथागतं देवा मुनयश्च तपोधनाः।<br>तस्मादभ्यर्चयेन्नित्यमादित्यं शिवरूपिणम् ॥ ६<br>धर्मकामार्थमुक्त्यर्थं मनसा कर्मणा गिरा।सदाशिवकी पूजा करनी चाहिये—ऐसा कहकर भगवान् रुद्र वहींपर अन्तर्धान हो गये ॥ १—४ ॥<br><br>इसके बाद वे समस्त देवता तथा महान् आत्मावाले मुनिगण कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरको उद्देश्य करके प्रणाम करने लगे। तदनन्तर देवता तथा तपोधन मुनलोग प्रसन्न होकर रुद्रका ध्यान करते हुए जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। अतएव धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके लिये मन-वचन-कर्मसे शिवरूप आदित्यकी नित्य पूजा करनी चाहिये ॥ ५-६ १/२ ॥
ऋषय ऊचुः<br>रोमहर्षण सर्वज्ञ सर्वशास्त्रभृतां वर ॥ ७<br>व्यासशिष्य महाभाग वाह्येयं वद साम्प्रतम्।<br>शिवेन देवदेवेन भक्तानां हितकाम्यया ॥ ८<br>वेदात् षडङ्गादुद्धृत्य सांख्ययोगाच्च सर्वतः।<br>तपश्च विपुलं तप्त्वा देवदानवदुश्चरम् ॥ ९<br>अर्थदेशादिसंयुक्तं गूढमज्ञाननिन्दितम्।<br>वर्णाश्रमकृतैर्धर्मैर्विपरीतं क्वचित्समम् ॥ १०<br>शिवेन कथितं शास्त्रं धर्मकामार्थमुक्तये।<br>शतकोटिप्रमाणेन तत्र पूजा कथं विभोः ॥ ११<br>स्नानयोगादयो वापि श्रोतुं कौतूहलं हि नः।ऋषिगण बोले—हे रोमहर्षण ! हे सर्वज्ञ ! सभी शास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाले हे व्यासशिष्य ! हे महाभाग ! अब आप हमें वाह्येय (अग्निपुराणोक्त) शिवपूजाकी विधि बताइये। भक्तोंके कल्याणके लिये देवाधिदेव शिवने देवताओं तथा दानवोंके लिये दुश्चर कठोर तप करके षडंग वेदसे तथा सांख्ययोगसे भलीभाँति ग्रहण करके अर्थ-देश आदिसे युक्त, गूढ़, अविवेकियोंके द्वारा निन्दित, वर्णाश्रमकृत धर्मोंसे कहीं-कहीं विपरीत तथा कहीं-कहीं अनुकूल जिस शतकोटि प्रमाणवाले शास्त्रको धर्म-अर्थ-काम-मोक्षहेतु कहा है, उसमें उन सर्वव्यापी शिवकी पूजा, स्नान, योग आदिका क्या विधान है? उसे सुननेकी हमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ७–११ १/२ ॥
सूत उवाच<br>पुरा सनत्कुमारेण मेरुष्पृष्ठे सुशोभने ॥ १२<br>पृष्टो नन्दीश्वरो देवः शैलादिः शिवसम्मतः।<br>पृष्टोऽयं प्रणिपत्यैवं मुनिमुख्यैश्च सर्वतः ॥ १३<br>तस्मै सनत्कुमाराय नन्दिना कुलन्दिना।<br>कथितं यच्छिवज्ञानं शृण्वन्तु मुनिपुङ्गवाः ॥ १४<br>शैव संङ्क्षिप्य वेदोक्तं शिवेन परिभाषितम्।<br>स्तुतिनिन्दादिरहितं सद्यः प्रत्ययकारकम् ॥ १५<br>गुरुप्रसादजं दिव्यमनायासेन मुक्तिदम्।सूतजी बोले—पूर्वकालमें सनत्कुमारने अत्यन्त सुन्दर मेरुशिखरपर शिवजीके प्रिय शैलादि भगवान् नन्दीश्वरसे यही बात पूछी थी। प्रणाम करके श्रेष्ठ मुनियोंने भी इनसे ऐसा ही पूछा था। हे मुनीश्वरो ! तब अपने कुलको आनन्दित करनेवाले नन्दीने उन सनत्कुमारको जिस शिवज्ञानका उपदेश किया था, उसे आपलोग सुनें। स्वयं शिवके द्वारा संक्षिप्त करके परिभाषित किया गया वह शिवज्ञान वेदप्रतिपादित, निन्दा आदिसे रहित, शीघ्र ही श्रद्धा उत्पन्न करनेवाला, गुरुकृपासे प्राप्त होनेवाला, दिव्य तथा अनायास ही मुक्ति देनेवाला है ॥ १२–१५ १/२ ॥
सनत्कुमार उवाच<br>भगवन् सर्वभूतेश नन्दीश्वर महेश्वर ॥ १६सनत्कुमार बोले—हे भगवन् ! हे सर्वभूतेश ! हे नन्दीश्वर ! हे महेश्वर ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके
६५०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कथं पूजादयः शम्भोर्धर्मकामार्थमुक्तये ।<br>वक्तुमर्हसि शैलादे विनयेनागताय मे ॥ १७ ॥लिये शिवकी पूजा आदिका क्या विधान है? हे शैलादे ! विनयपूर्वक मुझ आये हुएको यह बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १६-१७ ॥
सूत उवाच<br>सम्प्रेक्ष्य भगवान्नन्दी निशम्य वचनं पुनः ।<br>कालवेलाधिकाराद्यामवदद्वदतां वरः ॥ १८ ॥सूतजी बोले—[ हे मुनीश्वरो !] उनकी ओर देखकर तथा पुनः उनका वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् नन्दी समुचित समय उपस्थित जानकर उनसे कहने लगे ॥ १८ ॥
शैलादिरुवाच<br>गुरुतः शास्त्रतश्चैवमधिकारं ब्रवीम्यहम् ।<br>गौरवादेव संज्ञाैषा शिवाचार्यस्य नान्यथा ॥ १९ ॥<br>स्वयमाचरते यस्तु आचारे स्थापयत्यपि ।<br>आचिनोति च शास्त्रार्थानाचार्यस्तेन चोच्यते ॥ २० ॥**शैलादि बोले—**गुरु तथा शास्त्रसे प्राप्त ज्ञानके आधारपर मैं अधिकार (पात्रता)-के विषयमें बता रहा हूँ। गौरवके कारण ही शिवशास्त्रके आचार्यकी 'गुरु'—यह संज्ञा होती है, इसके विपरीत नहीं। जो स्वयं आचरण करता है, [दूसरोंको भी] आचारमें स्थापित करता है तथा शास्त्रके अर्थज्ञानका संग्रह करता है, वह आचार्य कहा जाता है ॥ १९-२० ॥
तस्माद्वेदार्थतत्त्वज्ञमाचार्यं भस्मशायिनम् ।<br>गुरुमन्वेषयेद्भक्तः सुभगं प्रियदर्शनम् ॥ २१ ॥<br>प्रतिपन्नं जनान्दं श्रुतिस्मृतिपथानुगम् ।<br>विद्याभयदातारं लौल्यचापल्यवर्जितम् ॥ २२ ॥<br>आचारपालकं धीरं समयेषु कृतास्पदम् ।<br>तं दृष्ट्वा सर्वभावेन पूजयेच्छिववद्गुरुम् ॥ २३ ॥<br><br>आत्मना च धनेनैव श्रद्धावित्तानुसारतः ।<br>तावदाराधयेच्छिष्यः प्रसन्नोऽसौ यथा भवेत् ॥ २४ ॥<br>सुप्रसन्ने महाभागे सद्यः पाशक्षयो भवेत् ।<br>गुरुर्मान्यो गुरुः पूज्यो गुरुरेव सदाशिवः ॥ २५ ॥अतः भक्तको चाहिये कि वह वेदार्थतत्त्वज्ञ, भस्म धारण करनेवाले, सुशील, प्रिय दर्शनवाले, सम्मानित लोगोंको आनन्दित करनेवाले, श्रुति तथा स्मृतिमें प्रतिपादित मार्गका अनुसरण करनेवाले, विद्यासे अभय प्रदान करनेवाले, लालच तथा चपलतासे रहित, आचारका पालन करनेवाले, धैर्यशाली तथा सन्ध्या आदिकालोंमें समुचित स्थानपर स्थित रहनेवाले आचार्य गुरुका अन्वेषण करे। उस गुरुको प्राप्त करके अनन्य भावसे शिवकी ही भाँति उनका पूजन करना चाहिये। शिष्यको चाहिये कि वह शरीरसे, धनसे तथा श्रद्धा-विश्वासके अनुसार गुरुकी वैसी सेवा करे, जिससे वे प्रसन्न हो जायें। महाभाग गुरुके प्रसन्न हो जानेपर शीघ्र पाश (बन्धन)-का क्षय हो जाता है। गुरु मान्य हैं, गुरु पूज्य हैं, गुरु साक्षात् सदाशिव ही हैं ॥ २१-२५ ॥
संवत्सरत्रयं वाथ शिष्यान् विप्रान् परीक्षयेत् ।<br>प्राणद्रव्यप्रदानेन आदेशैश्च इतस्ततः ॥ २६ ॥<br>उत्तमश्चाधमे योज्यो नीच उत्तमवस्तुषु ।<br>आकृष्टस्ताडिता वापि ये विषादं न यान्ति वै ॥ २७ ॥<br>ते योग्याः शिवधर्मिष्ठाः शिवधर्मपरायणाः ।<br>संयता धर्मसम्पन्नाः श्रुतिस्मृतिपथानुगाः ॥ २८ ॥गुरुको भी चाहिये कि प्रिय वस्तुके प्रदानसे तथा इधर-उधर अनेक कार्योंके लिये आदेशोंद्वारा तीन वर्षोंतक ब्राह्मण-शिष्योंकी परीक्षा करे। उत्तम [शिष्य]-को अधम कार्यमें तथा अधमको उत्तम कार्योंमें नियुक्त करना चाहिये। गुरुके द्वारा आकृष्ट तथा ताड़ित होनेपर भी जो शिष्य विषादको प्राप्त नहीं होते, वे ही शिवधर्मके अधिकारी हैं। शिवधर्मिष्ठ, शिवधर्मपरायण, जितेन्द्रिय, धर्मसम्पन्न, श्रुति-स्मृतिके मार्गका अनुसरण करनेवाले,

अध्याय २० ] पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा ६५१


श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वद्वन्द्वसहा धीरा नित्यमुद्युक्तचेतसः ।<br>परोपकारनिरता गुरुशुश्रूषणे रताः ॥ २९<br><br>आर्जवा मार्दवाः स्वस्था अनुकूलाः प्रियंवदाः ।<br>अमानिनो बुद्धिमन्तस्त्यक्तस्पर्धा गतस्पृहाः ॥ ३०<br><br>शौचाचारगुणोपेता दम्भमात्सर्यवर्जिताः ।<br>योग्या एवं द्विजाः सर्वे शिवभक्तिपरायणाः ॥ ३१<br><br>एवंवृत्तसमोपेता वाङ्मनःकायकर्मभिः ।<br>शोध्या एवंविधाश्चैव तत्त्वानां च विशुद्धये ॥ ३२<br><br>शुद्धो विनयसम्पन्नो मिथ्याकटुकवर्जितः ।<br>गुर्वाज्ञापालकश्चैव शिष्योऽनुग्रहमर्हति ॥ ३३[सुख-दुःख आदि] सभी द्वन्द्वोंको सहनेवाले, धैर्यशाली, सदा उद्योगशील चित्तवाले, परोपकारमें लगे रहनेवाले, गुरुसेवामें निरत, सरल तथा मृदु स्वभाववाले, स्वस्थचित्त, गुरुके अनुकूल, प्रिय बोलनेवाले, मानरहित, बुद्धिसम्पन्न, स्पर्धाविहीन, कामनाशून्य, शौच-आचार आदि गुणोंसे युक्त, दम्भ तथा मात्सर्यसे विहीन—इस प्रकारके शिवभक्तिपरायण सभी द्विज शिष्य होनेके अधिकारी हैं। [इन्द्रिय आदि चौबीस] तत्त्वोंकी शुद्धिके लिये मन-वाणी-कर्मसे इन आचरणोंसे सम्पन्न इस प्रकारके शिष्योंका शोधन करना चाहिये। शुद्ध हृदयवाले, विनयसे सम्पन्न, मिथ्या तथा कटुभाषणसे रहित और गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला शिष्य ही गुरुकृपाके योग्य होता है ॥ २६–३३ ॥
गुरुश्च शास्त्रवित्प्राज्ञस्तपस्वी जनवत्सलः ।<br>लोकाचाररतो ह्येवं तत्त्वविन्मोक्षदः स्मृतः ॥ ३४शास्त्रज्ञ, बुद्धिमान्, तपस्वी, लोकप्रिय, लोकाचारमें रत तथा तत्त्वज्ञानी गुरु मोक्ष देनेमें समर्थ बताया गया है।
सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वशास्त्रविशारदः ।<br>सर्वोपायविधानज्ञस्तत्त्वहीनस्य निष्फलम् ॥ ३५गुरु सभी लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त शास्त्रोंमें निष्णात तथा सभी उपायोंके विधानको जाननेवाला भी हो, किंतु यदि वह आत्मज्ञानसे रहित हो, तो सब कुछ निष्फल है।
स्वसंवेद्ये परे तत्त्वे निश्चयो यस्य नात्मनि ।<br>आत्मनोऽनुग्रहो नास्ति परस्यानुग्रहः कथम् ॥ ३६स्वयं अनुभूत किये जानेवाले परात्मतत्त्वमें जिसकी निश्चित धारणा न हो, उसका अपना ही कल्याण नहीं है, तो उसके द्वारा दूसरेका कल्याण कैसे सम्भव है ?
प्रबुद्धस्तु द्विजो यस्तु स शुद्धः साधयत्यपि ।<br>तत्त्वहीने कुतो बोधः कुतो ह्यात्मपरिग्रहः ॥ ३७जो आत्मज्ञानी द्विज है, वह स्वयं शुद्ध है और दूसरोंको भी शुद्ध कर देता है। तत्त्वहीन गुरुमें बोध कहाँसे होगा और उसका आत्मोद्धार कैसे होगा!
परिग्रहविनिर्मुक्तास्ते सर्वे पशवोदिताः ।<br>पशुभिः प्रेरिता ये तु सर्वे ते पशवः स्मृताः ॥ ३८जो आत्मज्ञानसे रहित हैं, वे सब पशु कहे गये हैं। पशुतुल्य द्विजके द्वारा जो शिष्य ज्ञानप्रेरित किये जाते हैं, वे सब भी पशु ही कहे गये हैं।
तस्मात्तत्त्वविदो ये तु ते मुक्ता मोचयन्त्यपि ।<br>संवित्तिजननं तत्त्वं परानन्दसमुद्भवम् ॥ ३९अतः जो लोग तत्त्ववेत्ता हैं, वे ही मुक्त हैं और दूसरोंको भी मुक्त कर सकते हैं। आत्मबोध उत्पन्न करनेवाला तत्त्व परानन्दको उत्पन्न करता है।
तत्त्वं तु विदितं येन स एवानन्ददर्शकः ।<br>न पुनर्नाममात्रेण संवित्तिरहितस्तु यः ॥ ४०उस तत्त्वको जिसने जान लिया, वही परमानन्दका दर्शन करानेमें समर्थ है, नाममात्रका गुरु ऐसा नहीं कर सकता।
अन्योन्यं तारयेन्नैव किं शिला तारयेच्छिलाम् ।<br>येषां तन्नाममात्रेण मुक्तिर्वै नाममात्रिका ॥ ४१जो आत्मज्ञानविहीन है, वह दूसरेको कभी नहीं तार सकता, क्या [कोई] शिला दूसरी
६५२श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| योगिनां दर्शनाद्वापि स्पर्शनाद्भाषणादपि।<br>सद्यः सञ्जायते चाज्ञा पाशोपक्षयकारिणी॥ ४२<br><br>अथवा योगमार्गेण शिष्यदेहं प्रविश्य च।<br>बोधयेदेव योगेन सर्वतत्त्वानि शोध्य च॥ ४३<br><br>षडर्धशुद्धिर्विहिता ज्ञानयोगेन योगिनाम्।<br>शिष्यं परीक्ष्य धर्मज्ञं धार्मिकं वेदपारगम्॥ ४४<br><br>ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं बहुदोषविवर्जितम्।<br>ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य कर्णात्कर्णागतेन तु॥ ४५<br><br>दीपाद्दीपो यथा चान्यः सञ्चरेद्विधिवद्गुरुः।<br>भौवनं च पदं चैव वर्णाख्यं मात्रमुत्तमम्॥ ४६<br><br>कालाध्वरं महाभाग तत्त्वाख्यं सर्वसम्मतम्।<br>भिद्यते यस्य सामर्थ्यादाज्ञामात्रेण सर्वतः॥ ४७<br><br>तस्य सिद्धिश्च मुक्तिश्च गुरुकारुण्यसम्भवा।<br>पृथिव्यादीनि भूतानि आविशन्ति च भौवने॥ ४८<br><br>शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च भावतः।<br>पदं वर्णाख्यकं विप्र बुद्धीन्द्रियविकल्पनम्॥ ४९<br><br>कर्मेन्द्रियाणि मात्रं हि मनो बुद्धिरतः परम्।<br>अहङ्कारमथाव्यक्तं कालाध्वरमिति स्मृतम्॥ ५०<br><br>पुरुषादिविरिञ्च्यन्तमुन्मनत्वं परात्परम्।<br>तथेशत्वमिति प्रोक्तं सर्वतत्त्वार्थबोधकम्॥ ५१<br><br>अयोगी नैव जानाति तत्त्वशुद्धिं शिवात्मिकाम्॥ ५२ | शिलाको [नदी आदिसे] पार करा सकती है। जिनका नाममात्रका ज्ञान है, उनकी मुक्ति भी नाममात्रकी होती है॥ ३४-४१॥<br><br>योगियोंके दर्शन, स्पर्श तथा भाषणमात्रसे ही बन्धनका नाश करनेवाला अनुग्रह शीघ्र ही होता है। अथवा गुरुको योगमार्गसे शिष्यके देहमें प्रवेश करके योगके द्वारा सभी तत्त्वोंका शोधन करके शिष्यको ज्ञान प्रदान करना चाहिये। योगियोंके लिये ज्ञानयोगसे तीन गुणोंकी शुद्धि विहित है। गुरुको चाहिये कि धर्मको जाननेवाले, धर्मपरायण, वेदमें पारंगत तथा समस्त दोषोंसे रहित ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य शिष्यकी सम्यक् परीक्षा करके ज्ञानसे ज्ञेयको देखकर गुरुपरम्परासे प्राप्त मार्गके द्वारा एक दीपकसे दूसरे दीपककी भाँति विधिपूर्वक उसे बोधमय करे॥ ४२-४५ १/२॥<br><br>भौवन, पद, वर्ण, मात्रा एवं कालाध्वरसंज्ञक—ये तत्त्व सर्वसम्मत एवं उत्तम हैं। हे महाभाग सनत्कुमार! गुरुके आज्ञामात्रके प्रभावसे जिस शिष्यकी इन तत्त्वोंकी संसारोन्मुखता नष्ट हो जाती है, उसी शिष्यको गुरुकारुण्यसमुत्पन्न सिद्धि और मुक्ति मिल जाती है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश—ये पंचमहाभूत भौवन पदवाच्य हैं अथवा इनका समावेश भौवनमें होता है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—ये अपने स्वभावसे पद कहलाते हैं। हे विप्र! श्रोत्र, त्वक्, नेत्र, जिह्वा, घ्राण—ये पंचज्ञानेन्द्रियाँ वर्णसंज्ञक हैं। वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ—ये पाँचों कर्मेन्द्रियाँ मात्रसंज्ञक हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार—इस अन्तःकरण-चतुष्टयको कालाध्वर कहा गया है। मानवीय आनन्दसे लेकर ब्रह्मानन्दपर्यन्त [ब्रह्मापदपर्यन्त] उन्मनी अवस्था [अमनस्कत्व] श्रेष्ठसे श्रेष्ठतर है तथा सर्वतत्त्व-प्रकाशक ईशत्व इनसे भी श्रेष्ठ कहा गया है। इस कल्याणस्वरूपा तत्त्वशुद्धिको योगज्ञानशून्य प्राणी नहीं जानता है॥ ४६-५२॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवपूजनोपायवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ‘शिवपूजनोपायवर्णन’ नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २०॥

२१- शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य

अध्याय २१] शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य ६५३

इक्कीसवाँ अध्याय

शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य

सूत उवाचसूतजी बोले—
परीक्ष्य भूमिं विधिवद्गन्धवर्णरसादिभिः।<br>अलङ्कृत्य वितानाद्यैरीश्वरावाहनक्षमाम्॥ १<br>एकहस्तप्रमाणेन् मण्डलं परिकल्पयेत्।<br>आलिखेत्कमलं मध्ये पञ्चरत्नसमन्वितम्॥ २<br>चूर्णैरष्टदलं वृत्तं सितं वा रक्तमेव च।<br>परिवारेण संयुक्तं बहुशोभासमन्वितम्॥ ३<br>आवाह्य कर्णिकायां तु शिवं परमकारणम्।<br>अर्चयेत्सर्वयत्नेन यथाविभवविस्तरम्॥ ४गन्ध, वर्ण, रस आदिसे भलीभाँति भूमिकी परीक्षा करके ईश्वरके आवाहनयोग्य उस स्थानको वितान (चाँदनी) आदिसे अलंकृत करके वहाँ एक हाथ मापका मण्डल बनाना चाहिये। उसके मध्यमें चूर्णोंके द्वारा पंचरत्नसमन्वित श्वेत या रक्तवर्ण गोल अष्टदल कमलकी रचना करनी चाहिये। तत्पश्चात् [उस कमलकी] कर्णिकामें परिवारसे युक्त, अति शोभामय परम कारण शिवका आवाहन करके अपने सामर्थ्यके अनुसार पूर्ण प्रयत्नसे उनका पूजन करना चाहिये॥ १–४॥
दलेषु सिद्धयः प्रोक्ताः कर्णिकायां महामुने।<br>वैराग्यज्ञाननालं च धर्मकन्दं मनोरमम्॥ ५<br>वामा ज्येष्ठा च रौद्री च काली विकरणी तथा।<br>बलविकरणी चैव बलप्रमथिनी क्रमात्॥ ६<br>सर्वभूतस्य दमनी केसरेषु च शक्तयः।<br>मनोन्मनी महामाया कर्णिकायां शिवासने॥ ७<br>वामदेवादिभिः सार्धं द्वन्द्वन्यायेन विन्यसेत्।<br>मनोन्मनं महादेवं मनोन्मन्याथ मध्यतः॥ ८हे महामुने! कर्णिकाके कमलदलोंमें [अणिमा आदि आठ] सिद्धियाँ स्थित बतायी गयी हैं। वैराग्य-ज्ञानरूप उसका नाल है तथा धर्मरूप उसका मनोरम कन्द (मूल) है। वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, विकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथिनी और सर्वभूतदमनी—क्रमशः ये आठ शक्तियाँ केसरोमें स्थित हैं तथा महामायारूपा मनोन्मनी शिवासनरूप कर्णिकामें विराजमान हैं; उन-उन स्थानोंमें उनका ध्यान करना चाहिये। वामदेव आदिके साथ इन वामा आदि आठ शक्तियोंका तथा मध्यमें देवी मनोन्मनीके साथ मनोन्मन महादेवकी दाम्पत्यरूपसे प्रतिष्ठा करनी चाहिये॥ ५–८॥
सूर्यसोमाग्निसम्बन्धात्प्रणवाख्यं शिवात्मकम्।<br>पुरुषं विन्यसेद्वक्त्रं पूर्वे पत्रे रविप्रभम्॥ ९<br>अघोरं दक्षिणे पत्रे नीलाञ्जनचयोपमम्।<br>उत्तरे वामदेवाख्यं जपाकुसुमसन्निभम्॥ १०<br>सद्यं पश्चिमपत्रे तु गोक्षीरधवलं न्यसेत्।<br>ईशानं कर्णिकायां तु शुद्धस्फटिकसन्निभम्॥ ११सूर्य-चन्द्र-अग्निके सम्बन्धसे प्रणव नामक सूर्यतुल्य प्रभाववाले शिवरूप तत्पुरुषका [कमलके] पूर्व पत्रमें न्यास करना चाहिये। नीलांजनसदृश अघोरका दक्षिण पत्रमें, जपाकुसुमके समान वर्णवाले वामदेव नामक शिवका उत्तर पत्रमें, गोदुग्धके समान धवल सद्योजातका पश्चिम पत्रमें और शुद्ध स्फटिकके समान कान्तिवाले ईशानका कमलकी कर्णिकामें न्यास करना चाहिये॥ ९–११॥
चन्द्रमण्डलसङ्काशं हृदयायेति मन्त्रतः।<br>वाह्नये रुद्रदिग्भागे शिरसे धूम्रवर्चसे॥ १२<br>शिखायै च नमश्चेति रक्ताभे नैर्ऋते दले।<br>कवचायाञ्जनाभाय इति वायुदले न्यसेत्॥ १३चन्द्रमण्डलसङ्काशाय हृदयाय नमः—इस मन्त्रसे अग्निकोणके दलमें, धूम्रवर्चसे शिरसे नमः—इस मन्त्रसे ईशानकोणके दलमें, रक्ताभाय शिखायै नमः—इस मन्त्रसे नैर्ऋत्यकोणके दलमें और अञ्जनाभाय

६५४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अस्त्रायाग्निशिखाभाय इति दिक्षु प्रविन्‍्यसेत्।<br>नेत्रेभ्यश्चेति चैशान्यां पिङ्गलेभ्यः प्रविन्‍्यसेत्॥ १४<br>शिवं सदाशिवं देवं महेश्वरमतः परम्।<br>रुद्रं विष्णुं विरिञ्चिं च सृष्टिन्यायेन भावयेत्॥ १५कवचाय नमः—इस मन्त्रसे वायव्यकोणके दलमें न्यास करना चाहिये। अग्निशिखाभाय अस्त्राय नमः—इस मन्त्रसे [ऊर्ध्व आदि] दिशाओंमें न्यास करना चाहिये और पिङ्गलेभ्यो नेत्रेभ्यो नमः—इस मन्त्रसे ईशान दिशामें न्यास करना चाहिये। तदनन्तर शिव सदाशिव देव महेश्वर रुद्र, विष्णु और विरिंचि (ब्रह्मा)-की सृष्टिके सृजन, पालन और संहारके क्रमसे भावना करनी चाहिये॥ १२–१५॥
शिवाय रुद्ररूपाय शान्त्यतीताय शम्भवे।<br>शान्ताय शान्तदैत्याय नमश्चन्द्रमसे तथा॥ १६<br>वेद्याय विद्याधाराय वह्नये वह्निवर्ससे।<br>कालायै च प्रतिष्ठायै तारकायान्तकाय च॥ १७<br>निवृत्त्यै धनदेवाय धारायै धारणाय च।<br>मन्त्रैरेतैर्महाभूतविग्रहं च सदाशिवम्॥ १८<br>ईशानमुकुटं देवं पुरुषास्यं पुरातनम्।<br>अघोरहृदयं हृष्टं वामगुह्यं महेश्वरम्॥ १९<br>सद्यमूर्तिं स्मरेद्देवं सदसद्व्यक्तिकारणम्।<br>पञ्चवक्त्रं दशभुजमष्टत्रिंशत्कलामयम्॥ २०शिवाय रुद्ररूपाय शान्त्यतीताय शम्भवे। शान्ताय शान्तदैत्याय नमश्चन्द्रमसे तथा॥ वेद्याय विद्याधाराय वह्नये वह्निवर्ससे। कालायै च प्रतिष्ठायै तारकायान्तकाय च॥ निवृत्त्यै धनदेवाय धारायै धारणाय च—इन [पाँच] मन्त्रोंसे ईशानरूप मुकुट, तत्पुरुषरूप मुख, अघोररूप हृदय, वामदेवरूप गुह्यदेश तथा सद्योजात switch/रूप सम्पूर्ण विग्रहवाले, सत्-असत्‌की अभिव्यक्तिके कारणभूत, पुरातन, प्रसन्न तथा आकाश आदि पंचमहाभूतके विग्रहवाले महेश्वर सदाशिवका स्मरण करना चाहिये, जो पाँच मुख तथा दस भुजाओंसे सुशोभित और अड़तीस कलाओंवाले हैं।
सद्यमष्टप्रकारेण प्रभिद्य च कलामयम्।<br>वामं त्रयोदशविधैर्विभिद्य विततं प्रभुम्॥ २१<br>अघोरमष्टधा कृत्वा कलारूपेण संस्थितम्।<br>पुरुषं च चतुर्धा वै विभज्य च कलामयम्॥ २२<br>ईशानं पञ्चधा कृत्वा पञ्चमूर्त्या व्यवस्थितम्।<br>हंसंसेति मन्त्रेण शिवभक्त्या समन्वितम्॥ २३कलामय सद्योजातका आठ प्रकारसे विभाग करके, महाप्रभु वामदेवका तेरह भेदोंसे विभाग करके, कलारूपमें स्थित अघोरका आठ प्रकारसे विभाग करके, कलामय तत्पुरुषका चार प्रकारसे विभाग करके और पाँच मूर्तियोंमें व्यवस्थित ईशानका पाँच प्रकारसे विभाग करके उनका ध्यान करना चाहिये।
ओङ्कारमात्रमोङ्कारमकारं समरूपिणम्।<br>आ ई ऊ ए तथा अम्बानुक्रमेणात्मरूपिणम्॥ २४<br>प्रधानसहितं देवं प्रलयोत्पत्तिवर्जितम्।<br>अणोरणीयां समजं महतोऽपि महत्तम्॥ २५<br>उर्ध्वरेतसमीशानं विरूपाक्षमुमापतिम्।<br>सहस्रशिरसं देवं सहस्राक्षं सनातनम्॥ २६<br>सहस्रहस्तचरणं नादान्तं नादविग्रहम्।<br>खद्योतसदृशाकारं चन्द्ररेखाकृतिं प्रभुम्॥ २७<br>द्वादशान्ते ध्रुवोर्मध्ये तालुमध्ये गले क्रमात्।<br>हृद्देशेऽवस्थितं देवं स्वानन्दममृतं शिवम्॥ २८हंसहंसाय विद्महे परमहंसाय धीमहि। तन्नो हंसः प्रचोदयात्—इस हंसगायत्रीमन्त्रसे शिवभक्तिसे युक्त, ब्रह्मरूप, प्रणवरूप, अकाररूप, ब्रह्मतुल्यरूपवाले, आ-ई-ऊ-ए अर्थात् क्रमसे देवी-गणेश-सूर्य-विष्णुस्वरूप, प्रकृतियुक्त, उत्पत्ति-प्रलयसे रहित, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अजन्मा, महान्‌से भी महान्, ऊर्ध्वरेता, विरूपाक्ष, उमापति, हजार सिरोंवाले, हजार नेत्रोंवाले, हजार हाथ तथा चरणोंवाले, सनातन, नादान्त (प्रणवरूप), नादप्रतिपाद्य विग्रहवाले, सूर्यके समान आकारवाले, चन्द्ररेखासे युक्त विग्रहवाले, मूर्धा-भ्रूमध्य-तालुमध्य-कण्ठ तथा हृदयमें क्रमसे विराजमान, अपने आनन्दमें मग्न, अमृतस्वरूप,

अध्याय २१] शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य ६५५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विद्युद्वलयसङ्काशं विद्युत्कोटिसमप्रभम्।<br>श्यामं रक्तं कलाकारं शक्तित्रयकृतासनम्॥ २९<br><br>सदाशिवं स्मरेद्देवं तत्त्वत्रयसमन्वितम्।<br>विद्यामूर्तिमयं देवं पूजयेच्च यथाक्रमात्॥ ३०कल्याणकारी, विद्युद्वलयसदृश, करोड़ों विद्युत्के समान प्रभाववाले, श्यामरक्त वर्णवाले, गम्भीर आकारवाले, शक्तित्रय (तीनों शक्तियों)-पर विराजमान तीन तत्त्वोंसे युक्त तथा विद्यामूर्ति-स्वरूप भगवान् सदाशिव ईशानका इस प्रकार स्मरण करना चाहिये और यथाक्रमसे उनका पूजन करना चाहिये॥ १६-३०॥
लोकपालांस्तथास्त्रेण पूर्वाद्यान् पूजयेत्पृथक्।<br>चरुं च विधिनासाद्य शिवाय विनिवेदयेत्॥ ३१<br><br>अर्धं शिवाय दत्त्वैव शेषार्धेन तु होमयेत्।<br>अघोरेणाथ शिष्याय दापयेद्भुक्तमुक्तमम्॥ ३२तत्पश्चात् पूर्व आदि दिशाओंसे सम्बन्धित [इन्द्र आदि] लोकपालोंका अस्त्रमन्त्रसे अलग-अलग पूजन करना चाहिये। इसके बाद विधिपूर्वक चरु बनाकर उसका आधा भाग शिवको अर्पित करना चाहिये। शिवको निवेदित करनेके बाद शेष चरुके आधे भागसे हवन कर देना चाहिये। तदनन्तर बचे हुए उत्तम चरुको अघोर मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके भक्षण करनेके लिये शिष्यको दिलाना चाहिये॥ ३१-३२॥
उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा पुरुषं विधिना यजेत्।<br>पञ्चगव्यं ततः प्राश्य ईशानेनाभिमन्त्रितम्॥ ३३<br><br>वामदेवेन भस्माङ्गे भस्मनोद्धूलयेत्क्रमात्।<br>कर्णयोश्च जपेद्देवीं गायत्रीं रुद्रदेवताम्॥ ३४<br><br>ससूत्रं सपिधानं च वस्त्रयुग्मेन वेष्टितम्।<br>तत्पूर्वं हेमरत्नाद्यैर्वासितं वै हिरण्मयम्॥ ३५<br><br>कलशान् विन्यसेत्पञ्च पञ्चभिर्ब्रह्मभिस्ततः।<br>होमं च चरुणा कुर्याद्यथाविभवविस्तरम्॥ ३६चरुका भक्षण करनेके अनन्तर आचमन करके शुद्ध होकर शिष्यको विधिपूर्वक तत्पुरुषका यजन करना चाहिये। तत्पश्चात् ईशान मन्त्रसे अभिमन्त्रित किये गये पंचगव्यका प्राशन करके वामदेवमन्त्रसे सर्वांगमें भस्म धारण करना चाहिये, गुरुको शिष्यके दोनों कानोंमें रुद्रदैवत्य गायत्री (रुद्रगायत्री)-का जप करना चाहिये। होमके पूर्व सूत्रयुक्त, आच्छादनयुक्त, दो वस्त्रोंसे घिरा हुआ तथा हेमरत्नोंसे अधिवासित जो सुवर्णमय अधिवासनमण्डल है, उसमें पाँच ब्रह्ममन्त्रोंसे पाँच कलशोंका स्थापन करना चाहिये। तत्पश्चात् अपने सामर्थ्यके अनुसार चरुसे होम करना चाहिये॥ ३३-३६॥
शिष्यं च वासयेद्भक्तं दक्षिणे मण्डलस्य तु।<br>दर्भशय्यांसमारूढं शिवध्यानपरायणम्॥ ३७<br><br>अघोरेण यथान्याय्राष्टोत्तरशतं पुनः।<br>घृतेन हुत्वा दुःस्वप्नं प्रभाते शोधयेन्मलम्॥ ३८<br><br>एवं चोपोषितं शिष्यं स्नातं भूषितविग्रहम्।<br>नववस्त्रोत्तरीयं च सोष्णीषं कृतमङ्गलम्॥ ३९<br><br>दुकूलाद्येन वस्त्रेण नेत्रं बद्ध्वा प्रवेशयेत्।<br>सुवर्णपुष्पसम्मिश्रं यथाविभवविस्तरम्॥ ४०<br><br>ईशानेन च मन्त्रेण कुर्यात्पुष्पाञ्जलिं प्रभोः।<br>प्रदक्षिणात्रयं कृत्वा रुद्राध्यायेन वा पुनः॥ ४१इसके बाद शिवध्यानपरायण भक्त शिष्यको मण्डलके दक्षिण भागमें कुशकी शैय्यापर शयन कराना चाहिये। पुनः प्रातःकाल होनेपर अघोरमन्त्रसे विधिपूर्वक घृतकी एक सौ आठ आहुति देकर दुःस्वप्नरूप मलका शोधन करे। इस प्रकार व्रती शिष्यको स्नान कराकर उसके शरीरको भूषित करके, उसे नवीन वस्त्र, उत्तरीय तथा पगड़ी धारण कराकर और उससे समस्त मंगलकृत्य सम्पन्न कराकर दुपट्टा आदिसे उसके नेत्रको बाँधकर उसे मण्डलमें प्रवेश कराये। शिष्य अपने धनसामर्थ्यके अनुसार सुवर्णयुक्त पुष्प अंजलिमें लेकर ईशानमन्त्रसे
६५६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
केवलं प्रणवेनाथ शिवध्यानपरायणः।<br>ध्यात्वा तु देवदेवेशमीशाने सङ्क्षिपेत्स्वयम्॥ ४२<br><br>यस्मिन् मन्त्रे पतेत्पुष्पं तन्मन्त्रस्तस्य सिध्यति।<br>शिवाम्भसा तु संस्पृश्य अघोरेण च भस्मना॥ ४३प्रभुको पुष्पांजलि अर्पित करे और पुनः रुद्राध्याय अथवा केवल प्रणवका उच्चारण करता हुआ शिवके ध्यानमें लीन होकर मण्डलकी तीन प्रदक्षिणा करके देवदेवेशका ध्यान करके पुष्पको ईशान दिशामें स्वयं प्रक्षिप्त कर दे। पुष्प जिस मन्त्रपर गिरे, वही मन्त्र उसके लिये सिद्ध हो जाता है। तदनन्तर मंगल जल तथा अघोरमन्त्रसे अभिमन्त्रित भस्मसे शिष्यका स्पर्श करके शिष्यके सिरपर अपना हाथ रखकर गुरुको गन्ध आदि उपचारोंसे शिष्यका पूजन करना चाहिये॥ ३७-४३ १/२ ॥
शिष्यमूर्धनि विन्यस्य गन्धाद्यैः शिष्यमर्चयेत्।<br>वारुणं परमं श्रेष्ठं द्वारं वै सर्ववर्णिनाम्॥ ४४<br><br>क्षत्रियाणां विशेषेण द्वारं वै पश्चिमं स्मृतम्।<br>नेत्रावरणमुन्मुच्य मण्डलं दर्शयेत्ततः॥ ४५<br><br>कुशासने तु संस्थाप्य दक्षिणामूर्तिमास्थितः।<br>तत्त्वशुद्धिं ततः कुर्यात्पञ्चतत्त्वप्रकारतः॥ ४६<br><br>निवृत्त्या रुद्रपर्यन्तमण्डमण्डोद्भव आत्मज।<br>प्रतिष्ठया तदूर्ध्वं च यावदव्यक्तगोचरम्॥ ४७<br><br>विश्वेश्वरान्तं वै विद्या कलामात्रेण सुव्रत।<br>तदूर्ध्वमार्गं संशोध्य शिवभक्त्या शिवं नयेत्॥ ४८<br><br>समर्च नाय तत्त्वस्य तस्य भोगेश्वरस्य वै।<br>तत्त्वत्रयप्रभेदेन चतुर्भिरुत वा तथा॥ ४९<br><br>होमयेद्ब्रह्ममन्त्रेण शान्त्यतीतं सदाशिवम्।<br>सद्यादिभिस्तु शान्त्यन्तं चतुर्भिः कलया पृथक्॥ ५०<br><br>शान्त्यतीतं मुनिश्रेष्ठ ईशानेनाथवा पुनः।<br>प्रत्येकमष्टोत्तरशतं दिशाहोमं तु कारयेत्॥ ५१वरुणसम्बन्धी पश्चिम द्वार प्रवेशके लिये सभी वर्णोंके लिये श्रेष्ठ है और यह विशेष रूपसे क्षत्रियोंके लिये अत्युत्तम कहा गया है। प्रवेशके अनन्तर शिष्यके नेत्रका वस्त्रावरण हटाकर उसे मण्डल दिखाना चाहिये। इसके बाद शिष्यको कुशासनपर बैठाकर दक्षिणामूर्ति शिवका आश्रय लेकर पंचतत्त्वप्रकारसे तत्त्वशुद्धि करनी चाहिये। हे सनत्कुमार! हे सुव्रत! क्रमसे पृथ्वी आदि पंचमहाभूतोंसे लेकर अहंकारपर्यन्त अण्डकी निवृत्तिसे, उस अहंकारसे भी ऊपर अव्यक्तगोचर प्रकृतिपर्यन्त स्थितिके द्वारा तथा ज्ञानकलासे पुरुषतकका ज्ञान करके उससे भी ऊपर परम शिवकी प्राप्तिके मार्गको शिवभक्तिके द्वारा आवरणरहित करके शिष्यको तुरीय शिवतक पहुँचा दे। तत्पश्चात् उन योगेश्वर तत्त्वरूप शिवके समर्चनके लिये प्रकृति, पुरुष, ईश्वर—इन तत्त्वत्रय अथवा अहंकार आदि चार तत्त्वोंके क्रमसे शान्त्यतीत कलामें स्थित सदाशिवके निमित्त ईशानमन्त्रसे होम कर दे, साथ ही पृथक् गणनासे सद्योजात आदि चार मन्त्रोंके द्वारा शान्त्यन्त शिवके लिये होम कर दे; हे मुनिश्रेष्ठ! इसके बाद ईशानमन्त्रसे परम शिवको एक सौ आठ आहुति देकर ऋत्विजोंके द्वारा एक सौ आठ आहुतिसे दिग्देवताहोम कराना चाहिये॥ ४४-५१॥
ईशान्यां पञ्चमेनाथ प्रधानं परिगीयते।<br>समिदाज्यचरूल्लाँजान् सर्षपांश्च यवांस्तिलान्॥ ५२<br><br>द्रव्याणि सप्त होतव्यं स्वाहान्तं प्रणवादिकम्।<br>तेषां पूर्णाहुतिर्विप्र ईशानेन विधीयते॥ ५३<br><br>सहंसेन यथान्यायं प्रणवाद्येन सुव्रत।<br>अघोरेण च मन्त्रेण प्रायश्चित्तं विधीयते॥ ५४ईशान दिशामें पाँचवें ईशानमन्त्रसे किया गया याग प्रधान याग कहा जाता है। मन्त्रके आदिमें प्रणव तथा अन्तमें स्वाहा लगाकर समिधा, घृत, चरु, लाजा (लावा), सरसों, यव, तिल—इन सात द्रव्योंका हवन करना चाहिये। हे विप्र! उनकी पूर्णाहुति ईशानमन्त्रसे की जाती है। हे सुव्रत! प्रणवयुक्त हंसगायत्रीमन्त्रसहित
अध्याय २१ ]शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य६५७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जयादिस्विष्टपर्यन्तमग्निकार्यं क्रमेण तु।<br>गुणसंख्याप्रकारेण प्रधानेन च योजयेत्॥ ५५<br><br>भूतानि ब्रह्मभिर्वापि मौनी बीजादिभिस्तथा।<br>अथ प्रधानमात्रेण प्राणापानौ नियम्य च॥ ५६<br><br>षष्ठेन भेदयेदात्मप्रणवान्तं कुलाकुलम्।<br>अन्योऽन्यमुपसंहृत्य ब्रह्माणं केशवं हरम्॥ ५७<br><br>रुद्रे रुद्रं तमिशाने शिवे देवं महेश्वरम्।<br>तस्मात्सृष्टिप्रकारेण भावयेद्भवनाशनम्॥ ५८<br><br>स्थाप्यात्मानममुं जीवं ताडनं द्वारदर्शनम्।<br>दीपनं ग्रहणं चैव बन्धनं पूजया सह॥ ५९<br><br>अमृतीकरणं चैव कारयेद्विधिपूर्वकम्।<br>षष्ठान्तं सद्यसंयुक्तं तृतीयेन समन्वितम्॥ ६०<br><br>फडन्तं संहृतिः प्रोक्ता पञ्चभूतप्रकारतः।<br>सद्याद्यषष्ठसहितं शिखान्तं सफडन्तकम्॥ ६१<br><br>ताडनं कथितं द्वारं तत्त्वानामपि योगिनः।<br>प्रधानं सम्पुटीकृत्य तृतीयेन च दीपनम्॥ ६२<br><br>आद्येन सम्पुटीकृत्य प्रधानं ग्रहणं स्मृतम्।<br>प्रधानं प्रथमेनैव सम्पुटीकृत्य पूर्ववत्॥ ६३<br><br>बन्धनं परिपूर्णेन प्लावनं चामृतेन च।<br>शान्त्यतीता ततः शान्तिर्विद्या नाम कलामला॥ ६४<br><br>प्रतिष्ठा च निवृत्तिश्च कलासङ्क्रमणं स्मृता।<br>तत्त्ववर्णकलायुक्तं भुवनेन यथाक्रमम्॥ ६५<br><br>मन्त्रैः पादैः स्तवं कुर्याद्विशोध्य च यथाविधि।<br>आद्येन योनिबीजेन कल्पयित्वा च पूर्ववत्॥ ६६अघोरमन्त्रसे विधिपूर्वक प्रायश्चित्त किया जाता है। जया, अभ्यातान आदिसे लेकर स्विष्टकृत्-होमपर्यन्त अग्निकार्यको तीन प्रकारसे पूर्वोक्त प्रधान होमके साथ युक्त कर देना चाहिये॥ ५२—५५॥<br><br>तत्पश्चात् गुरुको चाहिये कि मौन होकर बीजस्वरूप [सद्योजात आदि] वेदमन्त्रोंसे पृथ्वी आदि पंचमहाभूतोंका तथा केवल ईशानमन्त्रसे प्राण-अपान वायुका निरोध करके छठे 'नमो हिरण्यबाहवे०' इस मन्त्रसे आत्मवाचक प्रणवके अन्तरूप नादसमुदायसे व्याप्त ब्रह्मरन्ध्रका भेदन करे। तत्पश्चात् ब्रह्मा, केशव तथा रुद्रको अन्योन्य रूपसे उपसंहृत करके अर्थात् ब्रह्माको केशवमें, केशवको हरमें विलीन करके संहारमूर्ति हरको रुद्रमें, उन रुद्रको ईशानमें और उन महेश्वर ईशानको शिवमें उपसंहृत करके पुनः सृष्टिक्रमसे भवनाशक रुद्रका चिन्तन करे॥ ५६—५८॥<br><br>इसके बाद शिष्यके जीवको रुद्रमें स्थापित करके ताड़न, द्वारदर्शन, दीपन, ग्रहण, पूजासहित बन्धन और अमृतीकरण विधिपूर्वक कराना चाहिये। अघोरमन्त्रके आदिमें सद्योजातमन्त्र और अन्तमें षष्ठ मन्त्र—'नमो हिरण्यबाहवे०' तथा सबके अन्तमें 'फट्' शब्द प्रयुक्त करके पृथ्‍वी आदि पंचभूतोंके प्रकारसे संहृति कही गयी है। सद्योजात आदिमें, इसके बाद 'नमो हिरण्यबाहवे०' और पुनः अन्तमें 'शिखा' तथा 'फट्' लगा हुआ मन्त्र दीक्षायोगीके लिये ताड़न तथा तत्त्वोंका द्वारदर्शन कहा गया है; अघोरमन्त्रसे सम्पुटित करके प्रधान ईशानमन्त्रको 'दीपन' कहा गया है। सद्योजातमन्त्रसे सम्पुटित करके ईशानमन्त्रको ग्रहण तथा उसी ग्रहणकी ही तरह सद्योजात मन्त्रसे सम्पुटित करके ईशानमन्त्रको बन्धन भी कहा गया है और समग्र त्रियम्बकमन्त्रसे प्लावन अर्थात् अमृतीकरण बताया गया है॥ ५९—६३ १/२॥<br><br>शान्त्यतीता, प्रतिष्ठा, अमला, विद्या, शान्ति तथा निवृत्ति—ये कलाएँ कही गयी हैं। इनका यथाक्रम परस्पर संक्रमण करके तत्त्व, वर्ण, कला, भुवन, मन्त्र और पद—इन षडध्वोंका शोधन करके और पुनः प्रणव तथा योनिबीज (ह्रीँ)-से सम्पुटित करके शिवप्रतिपादक
६५८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पूजासम्प्रोक्षणं विद्धि ताडनं हरणं तथा।<br>संहतस्य च संयोगं विक्षेपं च यथाक्रमम्॥ ६७<br><br>अर्चना च तथा गर्भधारणं जननं पुनः।<br>अधिकारो भवेद्भानोर्लयश्चैव विशेषतः॥ ६८मन्त्रोंके द्वारा यथाविधि अर्थका विचार करके स्तवन करना चाहिये॥ ६४–६६॥<br>पूजासम्प्रोक्षण, ताड़न, हरण, अत्यन्त शुद्ध मनका संयोग, यथाक्रम विक्षेप, अर्चना, गर्भधारण (वागीशीके गर्भमें स्थापन), पुनर्जन्मन, भानुका अधिकार अर्थात् तत्सदृश ज्ञानका निवारक रूप और विशेषरूपसे अविद्याका नाश होता है—ऐसा जानिये॥ ६७–६८॥
उत्तमाद्यं तथान्त्येन योनिबीजेन सुव्रत।<br>उद्धारे प्रोक्षणे चैव ताडने च महामुने॥ ६९<br><br>अघोरेण फडन्तेन संसृतिश्च न संशयः।<br>प्रतितत्त्वं क्रमो ह्येष योगमार्गेण सुव्रत॥ ७०हे सुव्रत! हे महामुने! उद्धार, प्रोक्षण तथा ताड़नमें प्रारम्भमें उत्तम ईशानमन्त्र और इसके अन्तमें योनिबीजके साथ मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये और अन्तमें 'फट्'–से युक्त अघोरमन्त्रके द्वारा संसृति होती है; इसमें सन्देह नहीं है। हे सुव्रत! प्रत्येक तत्त्वके लिये योगमार्गके द्वारा यही क्रम निर्धारित है॥ ६९–७०॥
मुष्टिना चैव यावच्च तावत्कालं नयेत्क्रमात्।<br>विषुवेण तु योगेन निवृत्त्यादि शिवान्तिकम्॥ ७१<br><br>एकत्र समतां याति नान्यथा तु पृथक् पृथक्।<br>नासाग्रे द्वादशान्तेन पृष्ठेन सह योगिनाम्॥ ७२<br><br>क्षन्तव्यमिति विप्रेन्द्र देवदेवस्य शासनम्।जबतक मुष्टिसदृश प्राणायाममें स्थित रहे, उतने कालको विषुवयोगके द्वारा क्रमसे निवृत्तिकलासे लेकर शिवाकलापर्यन्त व्यतीत करे। साधक नासिकाके अग्रभागपर दृष्टिको स्थिर करके योगियोंके चरमावयवभूत मन्त्रसे द्वादशान्त (परम तत्त्व शिव)–के साथ समताको प्राप्त होता है; पृथक्-पृथक् स्थानोंपर दृष्टि रखनेसे नहीं। हे विप्रेन्द्र! दीक्षितको सुख-दुःख आदि द्वन्द्वसमूहोंको सहना चाहिये—ऐसा देवदेव शिवका आदेश है॥ ७१–७२ १/२॥
हेमराजतताम्राद्यैर्विधिना कल्पितेन च॥ ७३<br><br>सकूर्चेन सवस्त्रेण तन्तुना वेष्टितेन च।<br>तीर्थाम्बुपूरितेनैव रत्नगर्भेण सुव्रत॥ ७४<br><br>संहितामन्त्रितेनैव रुद्राध्यायस्तुतेन च।<br>सेचयेच्च ततः शिष्यं शिवभक्तं च धार्मिकम्॥ ७५हे सुव्रत! सुवर्ण, चाँदी अथवा ताँबे आदि धातुओंसे निर्मित, कूर्चयुक्त, वस्त्र तथा तन्तुसे वेष्टित, तीर्थजलसे परिपूर्ण, रत्नप्रक्षिप्त, संहिता मन्त्रसे अभिमन्त्रित, रुद्राध्यायसे स्तुत कलशके जलसे पवमान आदि मन्त्रोंके द्वारा धार्मिक शिवभक्त शिष्यका अभिषेक करना चाहिये॥ ७३–७५॥
सोऽपि शिष्यः शिवस्याग्रे गुरोरग्रे च सादरम्।<br>वह्नेश्च दीक्षां कुर्वीत दीक्षितश्च तथाचरेत्॥ ७६<br><br>वरं प्राणपरित्यागश्छेदनं शिरसोऽपि वा।<br>न त्वनभ्यर्च्य भुञ्जीयाद्भगवन्तं सदाशिवम्॥ ७७वह [अभिषिक्त] शिष्य भी शिव, गुरु तथा अग्निके समक्ष आदरपूर्वक दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षित होकर बताये जानेवाले नियमोंका पालन करे। चाहे प्राण चला जाय अथवा सिर कट जाय, किंतु भगवान् सदाशिवका पूजन किये बिना भोजन नहीं ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार दीक्षा प्राप्त करनी चाहिये और यथाविधि शिवपूजन करना चाहिये। तीनों कालोंमें

२२- शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन

अध्याय २२ ] शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन ६५९


एवं दीक्षा प्रकर्तव्या पूजा चैव यथाक्रमम्।<br>त्रिकालमेककालं वा पूजयेत्परमेश्वरम्॥ ७८(प्रातः, मध्याह्न, सायं) अथवा एक ही समय परमेश्वर शिवकी पूजा करनी चाहिये॥ ७६—७८॥
अग्निहोत्रं च वेदाश्च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः।<br>शिवलिङ्गार्चनस्यैते कलांशेनापि नो समाः॥ ७९<br><br>सदा यजति यज्ञेन सदा दानं प्रयच्छति।<br>सदा च वायुभक्षश्च सकृद्योऽभ्यर्चयेच्छिवम्॥ ८०<br><br>एककालं द्विकालं वा त्रिकालं नित्यमेव वा।<br>येऽर्चयन्ति महादेवं ते रुद्रा नात्र संशयः॥ ८१<br><br>नारुद्रस्तु स्पृशेद्रुद्रं नारुद्रो रुद्रमर्चयेत्।<br>नारुद्रः कीर्तयेद्रुद्रं नारुद्रो रुद्रमाप्नुयात्॥ ८२<br><br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तो ह्यधिकारिविधिक्रमः।<br>शिवार्चनार्थं धर्मार्थकाममोक्षफलप्रदः॥ ८३अग्निहोत्र, समस्त वेद तथा बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञ—ये सब शिवलिङ्गके अर्चनकी कलाके अंशके भी तुल्य नहीं हैं। जो एक बार शिवका अर्चन कर लेता है, वह मानो सदा यज्ञ करता है, सदा दान देता है और सदा वायुभक्षणरूप तपस्या करता है। जो लोग प्रतिदिन एक काल, दोनों कालों अथवा तीनों कालोंमें महादेवका पूजन करते हैं, वे रुद्ररूप ही हैं, इसमें सन्देह नहीं है। जो रुद्ररूप नहीं है; उसे रुद्रका स्पर्श नहीं करना चाहिये; जो रुद्ररूप नहीं है, उसे रुद्रकी पूजा नहीं करनी चाहिये और जो रुद्ररूप नहीं है, उसे रुद्रका नामकीर्तन नहीं करना चाहिये। जो रुद्ररूप नहीं है, वह रुद्रको नहीं प्राप्त कर सकता। [हे सनत्कुमार!] इस प्रकार मैंने [आपसे] संक्षेपमें शिवकी पूजाके लिये अधिकारी होने तथा उसकी विधिका क्रम कह दिया, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको प्रदान करनेवाला है॥ ७९—८३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे दीक्षाविधिर्नामैकविंशतितमोऽध्यायः॥ २१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'दीक्षाविधि' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २१॥


बाईसवाँ अध्याय

शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन

शैलादिरुवाच<br>स्नानयागादिकर्माणि कृत्वा वै भास्करस्य च।<br>शिवस्नानं ततः कुर्याद्भस्मस्नानं शिवार्चनम्॥ १शैलादि बोले—[हे सनत्कुमार!] सूर्यस्नान-याग आदि कर्म करके ही शिवस्नान तदनन्तर भस्मस्नान और शिवार्चन करना चाहिये॥ १॥
षष्ठेन मृदमादाय भक्त्या भूमौ न्यसेन्मृदम्।<br>द्वितीयेन तथाभ्युक्ष्य तृतीयेन च शोधयेत्॥ २<br><br>चतुर्थेनैव विभजेन्मलमेकेन शोधयेत्।<br>स्नात्वा षष्ठेन तच्छेषां मृदं हस्तगतां पुनः॥ ३<br><br>त्रिधा विभज्य सर्वं च चतुर्भिर्मध्यमं पुनः।<br>षष्ठेन सप्तवाराणि वामं मूलेन चालभेत्।<br>दशवारं च षष्ठेन दिशो बन्धः प्रकीर्तितः॥ ४छठे मन्त्र (ॐ तपः)—से मृत्तिका लेकर भक्तिपूर्वक भूमिपर स्थापित करे, दूसरे मन्त्र (ॐ भुवः)—से जलसे अभ्युक्षण करके तीसरे मन्त्र (ॐ स्वः)—से उसका शोधन करे। तत्पश्चात् चौथे मन्त्र (ॐ महः)—से मृत्तिकाका भाग करे और प्रथम मन्त्र (ॐ भूः)—से शरीरके मलका शोधन करे। तब छठे मन्त्र (ॐ तपः)—से स्नान करके पुनः शेष मृत्तिकाको हाथमें लेकर (ॐ भूः) आदि चारों मन्त्रोंसे उसके तीन भाग करके पुनः मध्य भागको छठें मन्त्रसे सात बार
६६०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| | अभिमन्त्रित करके मूल मन्त्रसे बायें हाथका स्पर्श करे। दस बार छठे मन्त्रके उच्चारणसे दिग्बन्ध करना बताया गया है॥ २–४॥ | | वामेन तीर्थं सव्येन शरीरमनुलिप्य च।<br>स्नात्वा सर्वैः स्मरन् भानुमभिषेकं समाचरेत्॥ ५<br><br>शृङ्गेण पर्णपुटकैः पालाशेन दलेन वा।<br>सौरैरेभिश्च विविधैः सर्वसिद्धिकरैः शुभैः॥ ६<br><br>सौराणि च प्रवक्ष्यामि बाष्कलाद्यानि सुव्रत।<br>अङ्गानि सर्वदेवेषु सारभूतानि सर्वतः॥ ७ | बायें हाथसे तीर्थ (जल)-का स्पर्श करके दायें हाथसे शरीरका अनुलेप करके सभी मन्त्रोंसे पुनः स्नान करनेके बाद सूर्यका स्मरण करते हुए शृंगसे, पत्तोंकी दोनियोंसे अथवा पलाशके पत्तेसे समस्त सिद्धियाँ प्रदान करनेवाले तथा मंगलकारी विविध सौरमन्त्रोंसे अभिषेक करना चाहिये। हे सुव्रत! अब मैं सभी देवमन्त्रोंमें सारस्वरूप सूर्यसम्बन्धी बाष्कल आदि तथा अंगमन्त्रोंको सम्यक् प्रकारसे बताऊँगा॥ ५–७॥ | | ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ ऋतम् ॐ ब्रह्म नवाक्षरमयं मन्त्रं बाष्कलं परिकीर्तितम्।<br>न क्षरतीति लोकानि ऋतमक्षरमुच्यते।<br>सत्यमक्षरमित्युक्तं प्रणवादिन्नमोऽन्तकम्॥ ८ | ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ ऋतम् ॐ ब्रह्म—यह नवाक्षरमय मन्त्र बाष्कल मन्त्र कहा गया है। भूः आदि सातों लोक प्रलयपर्यन्त नष्ट नहीं होते, अतः उन्हें ऋत [अक्षर] कहा जाता है। सत्य (ब्रह्म) अक्षर (नाशशून्य) है, इस प्रकार प्रणवादि नमःपर्यन्त बाष्कल मन्त्र है॥ ८॥ | | ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।<br>धियो यो नः प्रचोदयात्।<br>ॐ नमः सूर्याय खखोल्काय नमः॥ ९<br><br>मूलमन्त्रमिदं प्रोक्तं भास्करस्य महात्मनः।<br>नवाक्षरेण दीप्तास्यं मूलमन्त्रेण भास्करम्॥ १०<br><br>पूजयेदङ्गमन्त्राणि कथयामि यथाक्रमम्।<br>वेदादिभिः प्रभूताद्यं प्रणवेन च मध्यमम्॥ ११<br><br>ॐ भूः ब्रह्महृदयाय ॐ भुवः विष्णुशिरसे ॐ स्वः रुद्रशिखायै ॐ भूर्भुवः स्वःज्वालामालिनीशिखायै ॐ महः महेश्वराय कवचाय ॐ जनः शिवाय नेत्रेभ्यः ॐ तपः तापकाय अस्त्राय फट्।<br><br>मन्त्राणि कथितान्येवं सौराणि विविधानि च।<br>एतैः शृङ्गादिभिः पात्रैः स्वात्मानमभिषेचयेत्॥ १२<br><br>ताम्रकुम्भेन वा विप्रः क्षत्रियो वैश्य एव च।<br>सकुशेन सपुष्पेण मन्त्रैः सर्वैः समाहितः॥ १३ | ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि॥ धियो यो नः प्रचोदयात्॥ ॐ नमः सूर्याय खखोल्काय नमः—यह मन्त्र परमात्मा सूर्यका मूल मन्त्र कहा गया है। नवाक्षर मन्त्रसे तथा मूल मन्त्रसे तेजोमुख सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। अब मैं क्रमसे अंगमन्त्र बता रहा हूँ। अंगमन्त्र आदिमें प्रणव तथा मध्यमें व्याहृतियोंसे युक्त है। ॐ भूः ब्रह्महृदयाय, ॐ भुवः विष्णुशिरसे, ॐ स्वः रुद्रशिखायै, ॐ भूर्भुवः स्वः ज्वालामालिनीशिखायै, ॐ महः महेश्वराय कवचाय, ॐ जनः शिवाय नेत्रेभ्यः, ॐ तपः तापकाय अस्त्राय फट्—ये विविध सौरमन्त्र कहे गये हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्यको समाहित होकर शृंग आदि पात्रोंसे अथवा कुश तथा पुष्पयुक्त ताम्रकुम्भसे इन सभी मन्त्रोंके द्वारा अपना अभिषेक करना चाहिये॥ ९–१३॥ | | रक्तवस्त्रपरीधानः स्वाचामेद्विधिपूर्वकम्।<br>सूर्यश्चेति दिवारात्रौ चाग्निश्चेति द्विजोत्तमः॥ १४ | इसके बाद श्रेष्ठ द्विजको चाहिये कि रक्तवर्णका |

अध्याय २२] शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन ६६१


| आपः पुनन्तु मध्याह्ने मन्त्राचमनमुच्यते।<br>षष्ठेन शुद्धिं कृत्वैव जपेदाद्यमनुत्तमम्॥ १५<br>वौषडन्तं तथा मूलं नवाक्षरमनुत्तमम्।<br>करशाखां तथाङ्गुष्ठमध्यमानामिकां न्यसेत्॥ १६<br>तले च तर्जन्यङ्गुष्ठं मुष्टिभागानि विन्यसेत्।<br>नवाक्षरमयं देहं कृत्वाङ्गैरपि पावितम्॥ १७<br>सूर्योऽहमिति सञ्चिन्त्य मन्त्रैरेतैर्यथाक्रमम्।<br>वामहस्तगतैरद्भिर्गन्धसिद्धार्थकान्वितैः ॥ १८<br>कुशपुञ्जेन चाभ्युक्ष्य मूलाग्रैरष्टधा स्थितैः।<br>आपो हिष्ठादिभिश्चैव शेषमाघ्राय वै जलम्॥ १९<br>वामनासापुटेनैव देहे सम्भावयेच्छिवम्।<br>अर्घ्यमादाय देहस्थं सव्यनासापुटेन च॥ २०<br>कृष्णवर्णेन बाह्यस्थं भावयेच्च शिलागतम्।<br>तर्पयेत्सर्वदेवेभ्य ऋषिभ्यश्च विशेषतः॥ २१<br>भूतेभ्यश्च पितृभ्यश्च विधिनार्घ्यं च दापयेत्।<br>व्यापिनीं च परां ज्योत्स्नां सन्ध्यां सम्यगुपासयेत्॥ २२<br>प्रातर्मध्याह्नसायाह्ने अर्घ्यं चैव निवेदयेत्।<br>रक्तचन्दनतोयेन हस्तमात्रेण मण्डलम्॥ २३<br>सुवृत्तं कल्पयेद्भूतौ प्रार्थयेत द्विजोत्तमाः।<br>प्राङ्मुखस्ताम्रपात्रं च सगन्धं प्रस्थपूरितम्॥ २४<br>पूरयेद्गन्धतोयेन रक्तचन्दनेन च।<br>रक्तपुष्पैस्तिलैश्चैव कुशाक्षतसमन्वितैः॥ २५<br>दूर्वापामार्गगव्येन केवलेन घृतेन च।<br>आपूर्य मूलमन्त्रेण नवाक्षरमयेन च।<br>जानुभ्यां धरणीं गत्वा देवदेवं नमस्य च॥ २६ | वस्त्र धारणकर प्रातःकाल ‘सूर्यश्च०’^१ इस मन्त्रसे, सायंकाल ‘अग्निश्च०’^२—इस मन्त्रसे और मध्याह्नमें ‘आपः पुनन्तु०’^३—इस मन्त्रसे विधिपूर्वक आचमन करे, यह आचमनका मन्त्र कहा जाता है। छठे मन्त्र (ॐ तपः) इस मन्त्रसे शुद्धि करके ही अतिश्रेष्ठ आद्य वौषडन्त मूलमन्त्रका तथा अनुत्तम नवाक्षर मन्त्रका जप करना चाहिये॥ १४-१५ १/२ ॥<br><br>अंगुष्ठ, मध्यमा, अनामिका तथा कनिष्ठिकाका न्यास करे और तर्जनीमें अंगुष्ठका न्यास करे एवं करतल तथा करपृष्ठमें न्यास करे। इस प्रकार पवित्र देहको अंगमन्त्रोंके द्वारा नवाक्षरमय करके ‘मैं सूर्य हूँ’—ऐसी भावनाकर यथाक्रम इन मन्त्रोंसे तथा ‘आपो हि ष्ठा०’ आदि मन्त्रोंके द्वारा बायें हाथपर स्थित गन्ध-श्वेतसर्षपयुक्त जलसे मूल तथा अग्रभागसहित आठ कुशाके कूर्चसे अपनी देहपर मार्जन करके शेष जल बायें नासापुटसे सूँघकर अपने शरीरमें शिवकी भावना करनी चाहिये। आघ्राण जल (सूँघनेवाले जल)-को अन्तस्थ काले रंगके पापपुरुषके साथ बायें नासिकाछिद्रसे बाहर निकालकर शिलातलपर गिरा हुआ अनुभव करे। तदनन्तर सभी देवताओं, ऋषियों, भूतगणों तथा पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करे। इसके बाद प्रातः, मध्याह्न तथा सायंकालव्यापिनी परा, ज्योत्स्ना, सन्ध्याकी उपासना करे और भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। हे श्रेष्ठ द्विजो! रक्तचन्दनके जलसे भूमिपर एक हाथ मापका सुन्दर तथा वृत्ताकार मण्डल बनाना चाहिये और प्रार्थना करनी चाहिये। पूर्वाभिमुख होकर प्रस्थ (सेरभर) परिमाणवाले गन्धयुक्त जलसे पूर्ण होनेवाले ताम्रपात्रको नवाक्षरमय मूलमन्त्रसे गन्धयुक्त जलसे पूर्ण करे और उसे रक्तचन्दन, रक्तपुष्प, तिल, कुश, अक्षत, दूर्वा, अपामार्ग, पंचगव्य अथवा केवल गोघृतसे भरकर दोनों |


१. ॐ सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यद्रात्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु। यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा। (तै०आ० प्र० १०, अ० २५)
२. ॐ अग्निश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यदह्ना पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना अहस्तदवलुम्पतु। यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा। (तै०आ० प्र० १०, अ० २४)
३. ॐ आपः पुनन्तु पृथिवीं पृथ्वी पूता पुनातु माम्। पुनन्तु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मपूता पुनातु माम्। यदुच्छिष्टमभोज्यं यद्वा दुश्चरितं मम। सर्वं पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रहꣲ स्वाहा। (तै०आ० प्र० १०, अ० २३)