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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६१

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ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६१


संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
योश्च प्रत्ययोर्वर्तमानघटप्रत्यय-<br>वन्न निर्विषयत्वं युक्तम्; अनाग-<br>तार्थिप्रवृत्तेश्च । न ह्यसत्यर्थितया<br>प्रवृत्तिर्लोके दृष्टा । योगिनां चाती-<br>तानागतज्ञानस्य सत्यत्वात् ।<br>असंश्चेद्भविष्यद्घट ईश्वरस्य भविष्य-<br>द्घटविषयं प्रत्यक्षज्ञानं मिथ्या<br>स्यात् न च प्रत्यक्षमुपचर्यते ।<br>घटसद्भावे ह्यनुमानमवोचाम ।<br>विप्रतिषेधाच्च । यदि घटो भवि-<br>ष्यतीति कुलालादिषु व्याप्रिय-<br>माणेषु घटार्थं प्रमाणेन निश्चितं<br>येन च कालेन घटस्य सम्बन्धो<br>भविष्यतीत्युच्यते,तस्मिन्नेव काले<br>घटोऽसन्निति विप्रतिषिद्धमभि-<br>धीयते । भविष्यन्घटोऽसन्निति,<br>न भविष्यतीत्यर्थः । अयं घटो न<br>वर्तत इति यद्वत् ।प्रत्ययोंका भी वर्तमान घटप्रत्ययके समान विषयशून्य होना उचित नहीं है, क्योंकि भविष्यद् घटकी इच्छावाले पुरुषकी प्रवृत्ति देखी जाती है । असत्पदार्थकी इच्छासे लोकमें किसीकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती । इसके सिवा योगियोंका भूत और भविष्यत्सम्बन्धी ज्ञान तो सत्य ही होता है । यदि भावी घट असत् माना जाय तो ईश्वरका भावी घटसम्बन्धी प्रत्यक्ष ज्ञान भी मिथ्या होगा; किंतु प्रत्यक्ष ज्ञान मिथ्या नहीं हो सकता ।<br><br>इसके सिवा घटकी सत्तामें हमने अनुमानप्रमाण भी दिया है । तथा उसकी सत्ता न माननेसे विरोध भी आता है । यदि घटके लिये प्रवृत्त हुए कुम्हार आदिको प्रमाणसे यह निश्चय हो गया है कि घट होगा तो जिस कालसे 'घटका सम्बन्ध होगा' ऐसा कहा जाता है उसी कालमें 'घट नहीं है' ऐसा कथन तो विपरीत ही है । 'भविष्यद् घट असत् है' इसका अर्थ तो यही है कि 'घट उत्पन्न नहीं होगा' जैसे कहा जाय कि 'यह घट विद्यमान नहीं है।'
अथ प्रागुत्पत्तेर्घटोऽसन्नित्यु-<br>च्येत, घटार्थं प्रवृत्तेषु कुलालादिषुऔर यदि यह कहा जाय कि उत्पत्तिसे पूर्व घट असत् है, और इस 'असत्' शब्दका यह अर्थ हो

| ६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |

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६२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| तत्र यथा व्यापाररूपेण वर्तमानास्तावत्कुलालादयः, तथा घटो न वर्तत इत्यसच्छब्दस्यार्थश्चेन्न विरुद्धयते। कस्मात् ? स्वेन हि भविष्यद्रूपेण घटो वर्तते। न हि पिण्डस्य वर्तमानता कपालस्य वा घटस्य भवति। न च तयोर्भविष्यत्ता घटस्य। तस्मात्कुलालादिव्यापारवर्तमानतायां प्रागुत्पत्तेर्घटोऽसन्निति न विरुध्यते। यदि घटस्य यत्स्वं भविष्यत्ताकार्यरूपं तत्प्रतिषिध्येत, तत्प्रतिषेधे विरोधः स्यात्। न तु तद्भावान्प्रतिषेधति। न च सर्वेषां क्रियावतां कारकाणामेकैव वर्तमानता भविष्यत्त्वं वा। | कि कुम्हार आदिके घटके लिये प्रवृत्त होनेपर जिस प्रकार उस अवस्थामें व्यापाररूपसे कुम्हार आदि विद्यमान हैं उस प्रकार घट नहीं है--तो इसमें कोई विरोध नहीं आता। क्यों नहीं आता ? क्योंकि अपने भावीरूपसे तो घट विद्यमान है ही। पिण्ड या कपालकी वर्तमानता घटकी नहीं हो सकती और घटकी भविष्यत्ता उन (पिण्ड और कपाल) की नहीं हो सकती। अतः कुम्हार आदिके व्यापारकी वर्तमानतामें 'उत्पत्तिसे पूर्व घट असत् है' ऐसा कहना भी विरुद्ध नहीं है। किंतु घटका जो भविष्यत्ता^१ कार्यरूप स्वरूप है उसका यदि प्रतिषेध किया जाय तो उसके निषेध करनेपर ही विरोध होगा। सो उसका तो आप निषेध करते नहीं हैं। तथा सम्पूर्ण क्रियावान् कारकोंकी एक ही वर्तमानता या भविष्यत्ता होती हो--ऐसी बात है नहीं। | | अपि च चतुर्विधानामभावानां घटस्येतरेतराभावो घटादन्यो दृष्टो यथा घटाभावः पटादिरेव न घटस्वरूपमेव। न च घटाभावः | इसके सिवा चार प्रकारके ^२अभावोंमें घटका जो अन्योन्याभाव है वह घटसे भिन्न ही देखा जाता है, जैसे घटाभाव पटादि ही है घटका स्वरूप नहीं है। तथा घटाभाव |


१. भविष्यमें प्रकट होनेका भाव ही भविष्यत्ता है।
२. प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभाव ये अभावके चार

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६३

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ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६३


| सन्पटोऽभावात्मकः, किं तर्हि ? भावरूप एव । एवं घटस्य प्राक्प्रध्वंसात्यन्ताभावानामपि घटादन्यत्वं स्यात् । घटेन व्यपदिश्यमानत्वाद् घटस्येतरेतराभाववत् । तथैव भावात्मकताभावानाम् । एवं च सति घटस्य प्राग्भाव इति न घटस्वरूपमेव प्रागुत्पत्तेर्नास्ति । | होनेसे ही पट अभावरूप नहीं हो जाता; तो फिर क्या होता है ? वह भावरूप ही रहता है । इसी प्रकार घटके प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव और अत्यन्ताभाव भी घटसे भिन्न ही हैं, क्योंकि घटके अन्योन्याभावके समान घटके द्वारा इनका उल्लेख किया जाता है । और उस [घटके अन्योन्याभाव पटकी भावरूपता] के ही समान इन अभावोंकी भी भावरूपता है । ऐसा होनेसे 'घटका प्रागभाव है' इस कथनसे यह सिद्ध नहीं होता कि उत्पत्तिसे पूर्व घटका स्वरूप ही नहीं है । | | अथ घटस्य प्रागभाव इति घटस्य यत्स्वरूपं तदेवोच्येत घटस्येतिव्यपदेशानुपपत्तिः। अथ कल्पयित्वा व्यपदिश्येत शिलापुत्रकस्य शरीरमिति यद्वत्, तथापि घटस्य प्रागभाव इति कल्पितस्यै- | और यदि 'घटका प्रागभाव' इस कथनमें घटका जो स्वरूप है वही कहा जाय तो 'घटका' यह कथन ही नहीं बन सकता । १ यदि 'शिलाके पुतलेका शरीर' इस कथनके अनुसार कल्पना करके ऐसा कहा जाय तो भी 'घटका प्रागभाव' इस कथनसे 'घट' शब्दद्वारा कल्पित |


भेद हैं । उत्पत्तिसे पूर्व जो वस्तुका अभाव होता है उसे प्रागभाव कहते हैं; जैसे घटकी उत्पत्तिसे पूर्व उसका अभाव । वस्तुके नाशके पश्चात् उसका प्रध्वंसाभाव होता है; जैसे घट फूट जानेपर उसका अभाव । दो वस्तुओंमेंसे प्रत्येकमें एक दूसरीका अभाव अन्योन्याभाव है; जैसे घटमें पटका और पटमें घटका । त्रिकालाबाधित अभाव अत्यन्ताभाव है; जैसे शशशृङ्गादिका ।

१. क्योंकि षष्ठीविभक्तिबोध्य सम्बन्ध भिन्न पदार्थोंमें ही होता है और तुम प्रागभावको घटका स्वरूप ही बतलाते हो ।

६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

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६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १


| वाभावस्य घटेन व्यपदेशो न घटस्वरूपस्यैव। अर्थान्तरं घटाद् घटस्याभाव इति, उक्तोत्तरमेतत्। <br><br> किञ्चान्यत्-प्रागुत्पत्तेः शशविषाणवदभावभूतस्य घटस्य स्वकारणसत्तासम्बन्धानुपपत्तिः, द्विनिष्ठत्वात्सम्बन्धस्य। अयुतसिद्धानामदोष इति चेन्न, भावाभावयोरयुतसिद्धत्वानुपपत्तेः। भावभूतयोर्हि युतसिद्धतायुतसिद्धता वा स्यान्न तु भावाभावयोर्भावयोर्वा। | घटका ही अभाव कहा जायगा, घटके स्वरूपका नहीं।^१ और यदि घटसे घटाभावको भिन्न पदार्थ माना जाय तो इसका उत्तर ऊपर दिया ही जा चुका है।^२ <br><br> एक बात और भी है, उत्पत्तिसे पूर्व शशशृङ्गके समान अभावरूप घटका अपने कारणकी सत्तासे सम्बन्ध होना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि सम्बन्ध तो दोमें ही रहा करता है। यदि कहो कि अयुतसिद्ध पदार्थोंमें ऐसा दोष नहीं आता^३ तो यह ठीक नहीं, क्योंकि भाव और अभावका अयुतसिद्ध होना सम्भव नहीं है। जो पदार्थ भावरूप होते हैं उन्हींकी युतसिद्धता या अयुतसिद्धता हो सकती है, भाव और अभाव अथवा |


१. अर्थात् यदि कहो कि जैसे शिलाका पुतला और उसका शरीर ये एक ही हैं तो भी 'राहुके शिर' के समान उनमें षष्ठीसम्बन्ध कहा जाता है, उसी प्रकार घट और प्रागभावका भी कल्पित अभेद हो सकता है—तो ऐसा कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि भावपदार्थोंमें तो ऐसे कल्पित सम्बन्धका व्यपदेश हो सकता है; किंतु अभाव सापेक्ष होता है, उसे अपने प्रतियोगीकी अपेक्षा होती है, इसलिये उसका उसके साथ अभेद नहीं हो सकता। अतः घटप्रागभाव घटका स्वरूप नहीं हो सकता।

२. 'इसी प्रकार घटके प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव और अत्यन्ताभाव भी घटसे भिन्न ही हैं' इस वाक्यसे इसका उत्तर दिया गया है।

३. परस्पर सम्बन्ध रखनेवाले जिन दो पदार्थोंकी अलग-अलग प्रतीति होती है वे युतसिद्ध कहलाते हैं, जैसे घड़ा और रस्सी; तथा जिनकी अलग-अलग प्रतीति नहीं होती अर्थात् जिनमेंसे किसी भी एकको छोड़कर दूसरेकी प्रतीति नहीं होती वे अयुतसिद्ध कहलाते हैं। कार्य और कारण अयुतसिद्ध होते हैं; जैसे घट और मृत्तिका

| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६५ |

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ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ६५

| तस्मात्सदेव कार्यं प्रागुत्पत्तेरिति सिद्धम् । | दो अभावोंकी नहीं । अतः यह सिद्ध हुआ कि उत्पत्तिसे पूर्व कार्य सत् ही है । | | किंलक्षणेन मृत्युनावृतमित्यत आह—अशनायया अशितुमिच्छा अशनाया सैव मृत्योर्लक्षणं तया लक्षितेन मृत्युनाशनायया । कथमशनाया मृत्युः ? इत्युच्यते— | यह सब किस लक्षणवाले मृत्युसे आवृत्त था ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—अशनायासे । अशन (भोजन) की इच्छाका नाम 'अशनाया' है, वही उस मृत्युका लक्षण है; उससे लक्षित जो मृत्यु है उस अशनायासे [यह सब आवृत था] । अशनाया मृत्यु किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है— | | अशनाया हि मृत्युः । हिशब्देन प्रसिद्धं हेतुमवद्योतयति । यो ह्यशितुमिच्छति सोऽशनायानन्तरमेव हन्ति जन्तून्, तेनासावशनायया लक्ष्यते मृत्युरित्यशनाया हीत्याह । | अशनाया ही मृत्यु है। यहाँ 'हि' शब्दसे श्रुति प्रसिद्ध हेतु प्रकट करती है, क्योंकि जो कोई भोजन करना चाहता है वह भोजनकी इच्छा होनेके पीछे ही जीवोंको मारता है। अतः 'अशनाया' शब्दसे यह मृत्यु लक्षित होती है, इसीसे 'अशनाया हि' ऐसा कहा गया है । | | बुद्ध्यात्मनोऽशनाया धर्म इति स एष बुद्ध्यवस्थो हिरण्यगर्भो मृत्युरित्युच्यते । तेन मृत्युनेदं कार्यमावृतमासीत् । यथा पिण्डावस्थया मृदा घटादय आवृताः स्युरिति तद्वत् । तन्मनोऽकुरुत । | अशनाया विज्ञानात्माका धर्म है, अतः बुद्धिमें स्थित हिरण्यगर्भ ही मृत्यु कहा गया है । उस मृत्युसे यह कार्यवर्ग आवृत था । जिस प्रकार पिण्डावस्थामें वर्तमान मृत्तिकासे घटादि आवृत रहते हैं उसी प्रकार [हिरण्यगर्भरूप मृत्युसे यह व्याकृत जगत् व्याप्त था] । 'तन्मनोऽकुरुत' |


बृ० उ० ५—

६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १]

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६६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १]

| तदिति मनसो निर्देशः । स प्रकृतो मृत्युर्वक्ष्यमाणकार्यसिसृक्षया तत्कार्यालोचनक्षमं मनः-शब्दवाच्यं संकल्पादिलक्षणमन्तःकरणमकुरुत कृतवान् । | इसमें ‘तत्’ यह शब्द मनका निर्देश करनेवाला है । अर्थात् उस प्रकृत मृत्युने आगे कहे जानेवाले कार्यको रचनेकी इच्छासे उस कार्यकी आलोचना करनेमें समर्थ मनःशब्दवाच्य संकल्पादि लक्षणोंवाला अन्तःकरण किया । | | केनाभिप्रायेण मनोऽकरोत् ? इत्युच्यते—आत्मन्वी आत्मवान् स्यां भवेयम् । अहमनेनात्मना मनसा मनस्वी स्यामित्यभिप्रायः । स प्रजापतिरभिव्यक्तेन मनसा समनस्कः सन्नर्चन्नर्चयन्पूजयन् आत्मानमेव कृतार्थोऽस्मीत्यचरच्चरणमकरोत् । तस्य प्रजापतेरर्चतः पूजयत आपो रसात्मिकाः पूजाङ्गभूता अजायन्तोत्पन्नाः । | किस अभिप्रायसे मन किया ? सो बतलाया जाता है—मैं आत्मन्वी अर्थात् आत्मवान् होऊँ । तात्पर्य यह है कि मैं इस आत्मा यानी मनसे मनस्वी होऊँ । उस प्रजापतिने अभिव्यक्त हुए मनसे मनोयुक्त हो अर्चन-पूजन करते हुए अपने प्रति ही ‘मैं कृतार्थ हूँ’ इस प्रकार आचरण किया । उस प्रजापतिके अर्चन-पूजन करते समय पूजाके अङ्गभूत रसात्मक आप (जल) उत्पन्न हुए । | | अत्राकाशप्रभृतीनां त्रयाणामुत्पत्त्यनन्तरमिति वक्तव्यम्, श्रुत्यन्तरसामर्थ्याद्विकल्पासम्भवाच्च सृष्टिक्रमस्य । अर्चते पूजां कुर्वते वै मे मह्यं कमुदकमभूदित्येवममन्यत यस्मान्मृत्युः, तदेव तस्मादेव हेतोरर्कस्य अग्नेरश्व- | यहाँ जलकी उत्पत्ति आकाशादि (आकाश, वायु और अग्नि) तीन भूतोंकी उत्पत्तिके पीछे हुई ऐसा कहना चाहिये था, क्योंकि अन्य श्रुतिके सामर्थ्यसे यही सिद्ध होता है और सृष्टिक्रमका विकल्प होना भी सम्भव नहीं है; क्योंकि मृत्युने ऐसा माना था कि अर्चन यानी पूजा करते हुए मेरे लिये क—जल हुआ है, इसीसे अर्थात् इसी |

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ [६७

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ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ [६७


मेधक्रतवौपयिकस्यार्कत्वम्कारणसे अर्क यानी अश्वमेधयज्ञमें उपयोगी अग्निका अर्कत्व है, अर्थात् यही उसके अर्कत्वमें हेतु है। यह अग्निके अर्क नामकी व्युत्पत्ति है। तात्पर्य यह है कि अर्चनसे यानी सुखकी हेतुभूता पूजा करनेसे तथा जलका सम्बन्ध होनेसे अग्निका (अर्क) यह गौण (गुणकृत) नाम है।
अर्कत्वे हेतुरित्यर्थः। अग्नेरर्क-
नामनिर्वचनमेतत्। अर्चनात्सु-
खहेतुपूजाकरणाद् अप्सम्बन्धाच्च
अग्नेरेतद्गौणं नामार्क इति।
य एवं यथोक्तमर्कस्यार्कत्वं-जो कोई इस प्रकार उपर्युक्त अर्कका अर्कत्व जानता है उसे क—जल या सुख होता है, क्योंकि 'क' यह जल और सुखका समान नाम है। 'ह' और 'वै' ये निश्चयार्थक निपात हैं। अर्थात् उसके लिये जल या सुख होता ही है। इसे—इस प्रकार जाननेवालेको अर्थात् इस प्रकार जाननेवालेके लिये [जल या सुख] होता है ॥१॥
वेद जानाति। कम्पुदकं सुखं वा
नामसामान्यात्। ह वा इत्यव-
धारणार्थौ। भवत्येवेति। अस्मै
एवंविदे एवंविदर्थं भवति ॥१॥

जलसे विराड्रूप अग्निकी उत्पत्ति

कः पुनरसावर्कः ? इत्युच्यते—यह अर्क कौन है ? सो बतलाया जाता है—

आपो वा अर्कस्तद्यदपाᳵ शर आसीत्तत्स-
महन्यत। सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत्तस्य श्रान्तस्य
तप्तस्य तेजोरसो निरवर्तताग्निः ॥ २ ॥

आप (जल) ही अर्क हैं। उस जलका जो शर (स्थूलभाग) था वह एकत्रित हो गया। वह पृथिवी हो गयी। उसके उत्पन्न होनेपर वह

६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

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६८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

[ मृत्यु ] थक गया। उस थके और तपे हुए प्रजापतिके शरीरसे उसका सारभूत तेज अग्नि प्रकट हुआ ॥ २ ॥

| आपो वै या अर्चनाङ्गभूतास्ता एवाकोऽग्नेरर्कस्य हेतुत्वात् । अप्सु चाग्निः प्रतिष्ठित इति । न पुनः साक्षादेवार्कस्ताः, तासामप्रकरणात्; अग्नेश्च प्रकरणम् । वक्ष्यति च 'अयमनिरर्कः' (बृह०उ० १ । २ । ७) इति । | निश्चय ही जल जो अर्चनका अङ्गभूत है वही अर्क है, क्योंकि वह अर्कसंज्ञक अग्निका हेतु है। कारण, जलमें ही अग्नि प्रतिष्ठित है। किंतु वह साक्षात् अर्क नहीं है, क्योंकि यहाँ उसका प्रकरण नहीं है; यह तो अग्निका ही प्रकरण है। 'यह अग्नि अर्क है' ऐसा श्रुति कहेगी भी। | | तत्तत्र यदपां शर इव शरो दध्न इव मण्डभूतमासीत्तत्समहन्यत सङ्घातमापद्यत तेजसा बाह्यान्तःपच्यमानम्। लिङ्गव्यत्ययेन वा योऽपां शरः स समहन्यतेति। सा पृथिव्यभवत्स संघातो येयं पृथिवी साभवत् । ताभ्योऽद्भ्यो अण्डमभिनिर्वृत्तमित्यर्थः। | वहाँ उस जलका जो शरके समान शर अर्थात् दहीके मण्ड (घृतपिण्ड) के समान स्थूल भाग था वह संहत हो गया। अर्थात् बाहर और भीतरसे तेजके द्वारा परिपक्व होता हुआ वह इकट्ठा हो गया। अथवा 'यत्'का लिङ्गव्यत्यय कर 'यः अपां शरः' जो जलका शर (स्थूलभाग) था वह एकत्रित हो गया—ऐसा अर्थ करना चाहिये। वह पृथिवी हो गयी, अर्थात् वह संघात, यह जो पृथिवी है वही हो गयी। तात्पर्य यह है कि उस जलसे यह ब्रह्माण्ड निष्पन्न हो गया। | | तस्यां पृथिव्यामुत्पादितायां स मृत्युः प्रजापतिरश्राम्यच्छ्रमयुक्तो बभूव । सर्वो हि लोकः | उस पृथिवीके उत्पन्न होनेपर वह मृत्यु यानी प्रजापति श्रान्त—श्रमयुक्त हो गया, क्योंकि कार्य करके |

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९

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ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९


| कार्यं कृत्वा श्राम्यति । प्रजापतेश्च तन्महत्कार्यं यत्पृथिवीसर्गः ।<br><br>किं तस्य श्रान्तस्य ? इत्युच्यते तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य खिन्नस्य तेजोरसस्तेज एव रसस्तेजोरसो रसः सारो निरवर्तत प्रजापतिशरीरान्निष्क्रान्त इत्यर्थः । कोऽसौ निष्क्रान्तः ? अग्निः । सोऽण्डस्यान्तर्विराट् प्रजापतिः प्रथमजः कार्यकारणसंघातवान् जातः । "स वै शरीरी प्रथमः" इति स्मरणात् ॥ २ ॥ | सभी लोग श्रान्त हो जाते हैं और पृथिवीकी रचना करना—यह प्रजापतिका बड़ा भारी कार्य था।<br><br>उस थके हुए प्रजापतिका क्या हुआ ? सो बतलाया जाता है—उस श्रान्त—तपे हुए अर्थात् खेदको प्राप्त हुए प्रजापतिका जो तेजोरस था, तेज ही जो रस है उसका नाम 'तेजोरस' है, रस सारको कहते हैं, वह निर्वर्तित हुआ अर्थात् प्रजापतिके शरीरसे बाहर निकल आया। यह कौन निकला ? अग्नि। वह इस अण्डेके भीतर प्रथम उत्पन्न हुआ कार्यकारणसंघातवान् विराट् प्रजापति हुआ, क्योंकि इस विषयमें "वही प्रथम शरीरी है" यह स्मृति प्रमाण है ॥ २ ॥ |

विराड्रूप अग्निके अवयवोंमें प्राचीदिगादि-दृष्टि

स त्रेधात्मानं व्यकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं तृतीयं स एष प्राणस्त्रेधा विहितः । तस्य प्राची दिक्शिरोऽसौ चासौ चेमौ । अथास्य प्रतीची दिक्पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ । दक्षिणा चोदीची च पार्श्वे द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरः । स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितो यत्र क्व चैति तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान् ॥ ३ ॥

उसने अपनेको तीन प्रकारसे विभक्त किया। उसने आदित्यको

७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

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७०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

तीसरा भाग किया और वायुको तीसरा। इस प्रकार यह प्राण तीन भागोंमें हो गया। उसका पूर्व दिशा शिर है तथा इधर-उधरकी (ईशानी और आग्नेयी) विदिशाएँ बाहु हैं। इसी प्रकार पश्चिम दिशा इसका पुच्छ है तथा इधर-उधरकी (वायव्य और नैर्ऋत्य) विदिशाएँ जङ्घाएँ हैं। दक्षिण और उत्तर दिशाएँ उसके पार्श्व हैं, द्युलोक पृष्ठभाग है, अन्तरिक्ष उदर है, यह (पृथिवी) हृदय है। यह (अग्निरूप विराट्र प्रजापति) जलमें स्थित है। इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष जहाँ-कहीं जाता है वहीं प्रतिष्ठित होता है॥३॥

| स च जातः प्रजापतिस्त्रेधा त्रिप्रकारमात्मानं स्वयमेव कार्यकारणसंघातं व्यकुरुत व्यभजदित्येतत्। कथं त्रेधा? इत्याह— | उत्पन्न हुए उस प्रजापतिने भूत और इन्द्रियसंघातरूप अपनेको स्वयं ही त्रिधा-तीन प्रकारसे विकृत यानी विभक्त किया। किस प्रकार त्रिधा विभक्त किया? सो बतलाते हैं— | | आदित्यं तृतीयमग्निवाय्वपेक्षया त्रयाणां पूरणम् अकुरुतेत्यनुवर्तते। तथाग्न्यादित्यापेक्षया वायुं तृतीयम्। तथा वाय्वादित्यापेक्षयाग्निं तृतीयमिति द्रष्टव्यम्। सामर्थ्यस्य तुल्यत्वात्त्रयाणां संख्यापूरणत्वे। | उसने अग्नि और वायुकी अपेक्षा आदित्यको तीसरा बनाया; अर्थात् तीन संख्याओंका पूरक बनाया। इस वाक्यकी अनुवृत्ति होती है। इसी प्रकार अग्नि और आदित्यकी अपेक्षा वायुको तृतीय बनाया तथा वायु और आदित्यकी अपेक्षा अग्निको तृतीय बनाया—ऐसा समझना चाहिये, क्योंकि तीनकी संख्याको पूर्ण करनेमें इन तीनोंहीकी शक्ति समान है। | | स एष प्राणः सर्वभूतानामात्मापि अग्निवाय्वादित्यरूपेण विशेषतः स्वेनैव मृत्य्वात्मना | सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा होनेपर भी यह प्राण विशेषतः अपने मृत्युरूपसे ही, न कि अपने विराट्र स्वरूपका लय करके, अग्नि, वायु |

| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७१ |

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ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ७१

संस्कृतहिन्दी
त्रेधा विहितो विभक्तो न विराट्-स्वरूपोपमर्दनेन। तस्यास्य प्रथमजस्याग्नेरश्वमेधोपयोगिकस्यार्कस्य विराजश्चित्यात्मकस्य अश्वस्येव दर्शनमुच्यते। सर्वा हि पूर्वोक्तोत्पत्तिरस्य स्तुत्यर्थेत्यवोचाम-इत्थमसौ शुद्धजन्मेति।और आदित्यरूपमें तीन प्रकारका हो गया; अर्थात् तीन रूपोंमें विभक्त हो गया। उस प्रथम उत्पन्न हुए इस अग्निकी-अश्वमेधकर्ममें उपयोगी अर्ककी अर्थात् चितिस्वरूप विराट्-की यह अश्वके समान दृष्टि कही जाती है। हमने पूर्वमें इसकी जो उत्पत्ति बतलायी है, वह सब स्तुतिके ही लिये है यह बात कह चुके हैं। अर्थात् इस प्रकार यह शुद्धजन्मा है—ऐसा बतलानेके लिये है।
तस्य प्राची दिकशिरो विशिष्टत्वसामान्यात्। असौ चासौ चैशान्याग्नेय्यौ ईर्मौ बाहू। ईरयतेर्गतिकर्मणः। अथास्याग्नेः प्रतीची दिक्पुच्छं जघन्यो भागः, प्राङ्मुखस्य प्रत्यग्दिक्सम्बन्धात्। असौ चासौ च वायव्यनैर्ऋत्यौ सक्थ्यौ-सक्थिनी पृष्ठकोणत्वसामान्यात्। दक्षिणा चोदीची चविशिष्टतामें समान होनेके कारण पूर्व दिशा उसका शिर है। यह और यह अर्थात् ईशानी और आग्नेयी विदिशाएँ ईर्म-भुजाएँ हैं। गत्यर्थक 'ईर्'धातुसे 'ईर्म' शब्द सिद्ध होता है। तथा इस अग्निकी पश्चिम दिशा पुच्छ यानी निम्नभाग है, क्योंकि पूर्वकी ओर मुखवाला होनेसे पश्चिम दिशासे पुच्छका सम्बन्ध है। यह और यह अर्थात् वायव्य और नैर्ऋत्य कोण सक्थियाँ (जङ्घाएँ) हैं, क्योंकि पृष्ठभागके कोण होनेमें उनके साथ उनकी समानता है। दक्षिण और उत्तर दिशाएँ उसके पार्श्वभाग हैं, क्योंकि इन दोनों दिशाओंसे सम्बन्ध

७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| पार्श्वे उभयदिक्सम्बन्धसामान्यात् । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमिति पूर्ववत् । इयमुुरः अधोभागसामान्यात् ।<br><br>स एषोऽग्निः प्रजापतिरूपो लोकाद्यात्मकोऽग्निरप्सु प्रतिष्ठितः "एवमिमे लोका अप्स्वन्तः" इति श्रुतेः । यत्र क्व च यस्मिन्कस्मिंश्चिदेति गच्छति तदेव तत्रैव प्रतितिष्ठति स्थितिं लभते । कोऽसौ ? एवं यथोक्तमप्सु प्रतिष्ठितत्वमग्नेर्विद्वान्विजानन् गुणफलमेतत्॥३॥ | होनेमें पार्श्वोंकी समानता है । तथा द्युलोक पीठ और अन्तरिक्ष उदर है—ऐसा पूर्ववत् समझना चाहिये और अधोभागमें समानता होनेके कारण यह (पृथिवी) हृदय है ।<br><br>"इस प्रकार ये लोक जलके भीतर हैं" इस श्रुतिके अनुसार वह यह लोकादि स्वरूप प्रजापतिरूप अग्नि जलमें स्थित है । [ इस उपासनाका फल—] वह जहाँ कहीं—जिस किसी देशमें जाता है तदेव—वहाँ ही [ अर्थात् उसी स्थानपर ] प्रतिष्ठित होता–स्थिति प्राप्त करता है । ऐसा कौन है ? इस प्रकार उपर्युक्त रीतिसे अग्निका जलमें स्थित होना जाननेवाला । यह इस उपासनाका गौण फल है ॥ ३ ॥ |


संवत्सर और वाक्‌की उत्पत्ति

योऽसौ मृत्युः सोऽब्बादिक्रमेणात्मनात्मानम् अण्डस्यान्तः कार्यकरणसंघातवन्तं विराजमग्निमसृजत, त्रेधा चात्मानमकुरुतेत्युक्तम् । स किंवापारः सन्नसृजत ? इत्युच्यते—यह जो मृत्यु था उसने स्वयं ही अपनेको ब्रह्माण्डके अंदर जलादिके क्रमसे कार्यकरणसंघातवान् विराद् अग्निके रूपमें रचा और अपनेको तीन भागोंमें विभक्त किया—यह पहले कहा जा चुका है । उसने क्या व्यापार करते हुए यह रचना की ? सो बतलाया जाता है—

सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति स मनसा वाचं मिथुनँ समभवदशनाया मृत्युस्तद्यद्रेत

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३

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ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३

आसीत्स संवत्सरोऽभवत् । न ह पुरा ततः संवत्सर आस तमेतावन्तं कालमबिभः । यावान्संवत्सरस्तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत । तं जातमभिव्याददात्स भाणकरोत्सैव वागभवत् ॥ ४ ॥

उसने कामना की कि मेरा दूसरा शरीर उत्पन्न हो; अतः उस अशनायारूप मृत्युने मनसे वेदरूप मिथुनकी भावना की । उससे जो रेत ( बीज ) हुआ, वह संवत्सर हुआ । इससे पूर्व संवत्सर नहीं था । उस संवत्सरको, जितना संवत्सरका काल होता है, उतने समयतक वह ( मृत्युरूप प्रजापति ) गर्भमें धारण किये रहा । इतने समयके पीछे उसने उसको उत्पन्न किया । उस उत्पन्न हुए कुमारके प्रति मुख फाड़ा । इससे उसने 'भाण्' ऐसा शब्द किया । वही वाक् हुआ ॥ ४ ॥

| स मृत्युरकामयत कामितवान् । किम् ? द्वितीयो मे ममात्मा शरीरं येनाहं शरीरी स्यां स जायेतोत्पद्येत इत्येवमेतदकामयत । स एवं कामयित्वा मनसा पूर्वोत्पन्नेन वाचं त्रयीलक्षणां मिथुनं द्वन्द्वभावं समभवत्सम्भवं कृतवान्मनसा त्रयीमालोचितवान्। त्रयीविहितं सृष्टिक्रमं मनसान्वालोचयदित्यर्थः । कोऽसौ ? अशनायया लक्षितो मृत्युः । अशनाया मृत्यु- | उस मृत्युने कामना की । क्या कामना की ? मेरा दूसरा आत्मा यानी शरीर, जिससे मैं शरीरधारी होऊँ, उत्पन्न हो—इस प्रकार उसने कामना की । इस प्रकार कामना-पर उसने पहले उत्पन्न हुए मनसे वेदत्रयीरूपा वाणीकी मिथुन—द्वन्द्वभावसे भावना की । अर्थात् मनके द्वारा वेदत्रयीकी आलोचना की । वेदत्रयीविहित सृष्टिक्रमका मनसे विचार किया-ऐसा इसका तात्पर्य है। यह कौन था ? अशनाया (क्षुधा) से लक्षित मृत्यु । ‘अशनाया मृत्यु है’ |

७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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७४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| रित्युक्तम्। तमेव परामृशत्यन्यत्र प्रसङ्गो मा भूदिति । | ऐसा कहा जा चुका है। श्रुति उसीका यहाँ परामर्श ( उल्लेख ) करती है, जिससे किसी अन्यका प्रसंग न हो जाय । | | तद्यद्रेत आसीत्-तत्तत्र मिथुने यद्रेत आसीत्, प्रथमशरीरिणः प्रजापतेरुत्पत्तौ कारणं रेतो बीजं ज्ञानकर्मरूपम्, त्रय्यालोचनायां यदृष्टवानासीज्जन्मान्तरकृतम्; तद्भावभावितोऽपः सृष्ट्वा तेन रेतसा बीजेनाप्स्वनुप्रविश्य अण्डरूपेण गर्भीभूतः स संवत्सरोऽभवत्, संवत्सरकालनिर्माता संवत्सरः प्रजापतिरभवत् । न ह, पुरा पूर्वम्, ततस्तस्मात्संवत्सरकालनिर्मातुः प्रजापतेः, संवत्सरः कालो नाम नास न बभूव ह । | उससे जो रेत हुआ-उस मिथुन-से जो रेत हुआ, प्रथमशरीरी प्रजापतिसे उत्पत्तिमें हेतुभूत जो रेत यानी बीज हुआ, अर्थात् वेदकी आलोचना करनेपर उसने जो जन्मान्तरकृत ज्ञानकर्मरूप बीज देखा उस बीजभावसे भावित होकर जलकी रचना कर उस रेतरूप बीजके द्वारा जलमें प्रवेश कर अण्डरूपसे गर्भस्थ रह वह संवत्सर हुआ। अर्थात् वह संवत्सररूप कालका निर्माता संवत्सर प्रजापति हुआ। उस संवत्सरकालनिर्माता प्रजापतिसे पूर्व संवत्सरनामक काल नहीं था। | | तं संवत्सरकालनिर्मातारमन्तर्गर्भं प्रजापतिम्, यावानिह प्रसिद्धः काल एतावन्तमेतावत्संवत्सरपरिमाणं कालमबिभः भृतवान्मृत्युः। यावान्संवत्सर इह प्रसिद्धः, ततःपरस्तात्किं कृतवान् ? तमेतावतः कालस्य संवत्सरमात्रस्य परस्ताद् ऊर्ध्वमसृजत सृष्टवान्, अण्डमभिनदित्यर्थः तमेवं कुमारं जातमग्निं | उस संवत्सरकालनिर्माता गर्भस्थ प्रजापतिको, जितना कि यह प्रसिद्ध काल है उतने समयतक अर्थात् एक संवत्सरव्यापी कालतक मृत्युने धारण किया; जितना इस लोकमें संवत्सर प्रसिद्ध है [उतने समयतक गर्भमें रखा]। इसके पीछे उसने क्या किया ? इतने यानी संवत्सरमात्र कालके पश्चात् उसने उसकी रचना की अर्थात् उस अण्डेको फोड़ दिया। क्षुधायुक्त होनेके कारण मृत्युने |

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ [७५

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ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ [७५


| प्रथमशरीरिणम्, अशनायावत्त्वा-<br>न्मृत्युराभिव्याददान्मुखविदारणं<br>कृतवानत्तुम्; स च कुमारो भीतः<br>स्वाभाविकाविद्यया युक्तो भाणि-<br>त्येवं शब्दमकरोत् । सैव वाग-<br>भवत्, वाक्-शब्दोऽभवत् ॥४॥ | इस प्रकार उत्पन्न हुए उस प्रथम-<br>शरीरी कुमार अग्निके प्रति, उसे<br>खानेके लिये, मुँह फाड़ा । उस<br>कुमारने स्वाभाविकी अविद्यासे युक्त<br>होनेके कारण डरकर 'भाण्' ऐसा<br>शब्द किया। वही वाक् हुआ, वाक्<br>यानी शब्द हुआ ॥ ४ ॥ |


ऋगादिकी उत्पत्ति और मृत्युके अत्तृत्वका उपन्यास

स ऐक्षत यदि वा इममभिमꣳस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति स तया वाचा तेनात्मनेदꣳसर्वमसृजत यदिदंकिञ्चर्चो यजूंꣳषि सामानि छन्दांꣳसि यज्ञान्प्रजाः पशून् । स यद्यदेवास्सृजत तत्तदत्तु मध्रियत सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वम् । सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद॥५॥

उसने विचार किया, 'यदि मैं इसे मार डालूँगा तो यह थोड़ा-सा ही अन्न [ भोजन ] करूँगा।' अतः उसने उस वाणी और उन मनके द्वारा इन सबको रचा, जो कुछ भी ये ऋक्, यजुः, साम, छन्द, यज्ञ, प्रजा और पशु हैं। उसने जिस-जिसकी रचना की उसी-उसीको खानेका विचार किया। वह सबको खाता है, यही उस अदितिका अदितित्व है। जो इस प्रकार इस अदितिके अदितित्वको जानता है वह इस सबका अत्ता ( भोक्ता ) होता है और यह सब उसका अन्न होता है ॥ ५ ॥

| स ऐक्षत—स एवं भीतं कृतरवं<br>कुमारं दृष्ट्वा मृत्युरैक्षतेक्षितवान्<br>अशनायावानपि—यदि कदा-<br>चिद्वा इमं कुमारमभिमंस्ये— | उसने विचार किया—इस प्रकार<br>डरकर शब्द करनेवाले उस कुमार-<br>को देखकर मृत्युने क्षुधायुक्त होनेपर<br>भी विचार किया—यदि कदाचित् मैं<br>इस कुमारको मार डालूँगा—'अभि- |

७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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७६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| अभिपूर्वो मन्यतिर्हिंसार्थः—हिंसिष्य इत्यर्थः; कनीयोऽन्नं करिष्ये कनीयोऽल्पमन्नं करिष्य इति । | पूर्वक 'मन' धातुका अर्थ हिंसा होता है—अतः 'अभिमंस्ये' का अर्थ 'मार डालूँगा' ऐसा होगा, तो मैं कनीय अन्न करूँगा; कनीय यानी बहुत ही थोड़ा अन्न भोजन करूँगा। | | एवमीक्षित्वा तद्भक्षणादुपरराम बहु ह्यन्नं कर्तव्यं दीर्घकालभक्षणाय न कनीयः। तद्भक्षणे हि कनीयोऽन्नं स्याद्वीजभक्षण इव सस्याभावः। स एवम्प्रयोजनमन्नबाहुल्यमालोच्य तयैव त्रय्या वाचा पूर्वोक्तया तेनैव चात्मना मनसा मिथुनीभावमालोचनमुपगम्योपगम्येदं सर्वं स्थावरं जङ्गमं चासृजत यदिदं किञ्च यत्किञ्चेदम् । किं तत् ? ऋचो यजूंषि सामानि छन्दांसि च सप्त गायत्र्यादीनि स्तोत्रशस्त्रादिकर्माङ्गभूतांस्त्रिविधान् मन्त्रान्गायत्र्यादिच्छन्दोविशिष्टान् यज्ञांश्च तत्साध्यान्प्रजास्तत्कर्त्रीः पशूंश्च ग्राम्यानारण्यान्कर्मसाधनभूतान् । | ऐसा सोचकर वह उसे भक्षण करनेसे रुक गया, [और सोचने लगा कि] बहुत समयतक खानेके लिये मुझे बहुत-सा अन्न [संग्रह] करना चाहिये, थोड़ा-सा नहीं। जिस प्रकार बीजको खा लेनेपर अनाज नहीं होता उसी प्रकार इसे खानेसे तो मेरे लिये थोड़ा-सा ही अन्न होगा। ऐसे उद्देश्यसे अन्नकी बहुलताके लिये विचारकर उसने उस पूर्वोक्त त्रयीरूपा वाणीसे तथा उसी आत्मा यानी मनसे मिथुनीभाव अर्थात् आलोचनाको प्राप्त हो-होकर यह जो कुछ है उस इस सारे स्थावर और जङ्गम जगत्की रचना की। वह क्या है ? ऋक्, यजुः, साम, गायत्री आदि सात छन्द यानी गायत्री आदि छन्दोंसे युक्त स्तोत्र-शस्त्रादि कर्मोंके अङ्गभूत तीन प्रकारके मन्त्र, उनसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञ, उन्हें करनेवाली प्रजा तथा कर्मके साधनभूत ग्राम्य और वन्य पशु [ इन सबको रचा ]। | | ननु त्रय्या मिथुनीभूतया- | शंका—किंतु पहले तो कहा |

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७७

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ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
सृजतेत्युक्तम्, ऋगादीनीह कथमसृजतेति ?गया था कि मिथुनीभूत त्रयीरूपा वाणीसे उसने रचना की, फिर उसके द्वारा उसने ऋगादिको कैसे रचा ?
नैष दोषः, मनसस्त्वव्यक्तोऽयं मिथुनीभावस्त्रय्या, बाह्यस्तु ऋगादीनां विद्यमानानामेव कर्मसु विनियोगभावेन व्यक्तीभावः सर्ग इति ।समाधान—यह कोई दोष नहीं है। मनका जो त्रयीके साथ मिथुनीभाव है वह तो अव्यक्त है। उन [अव्यक्तरूपसे] विद्यमान ऋगादिका ही कर्ममें विनियोगरूपसे जो बाह्य व्यक्तीभाव है वही उनकी रचना है।
स प्रजापतिरेवमन्नवृद्धिं बुद्ध्वा यद्यदेव क्रियां क्रियासाधनं फलं वा किञ्चिदसृजत तत्तदत्तुं भक्षयितुमप्रियत धृतवान्मनः। सर्वं कृत्स्नं वै यस्मादत्तीति तत्तस्माददितेरदितिनाम्नो मृत्योरदितित्वं प्रसिद्धम् । तथा च मन्त्रः—‘‘अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता’’ (यजुः० सं० २५। २३) इत्यादिः ।उस प्रजापतिने इस प्रकार अन्नकी वृद्धि होती जानकर जिस-जिस भी क्रिया या क्रियाके साधनभूत फलकी रचना की उसी—उसीको भक्षण करनेके लिये मनमें विचार किया। इस प्रकार क्योंकि वह सभीको भक्षण करता है, इसलिये उस अदिति अर्थात् अदिति नामक मृत्युका अदितित्व प्रसिद्ध है। इस विषयमें यह मन्त्र प्रमाण है—‘‘अदिति द्युलोक है, अदिति अन्तरिक्ष है, अदिति माता है और वही पिता है’’ इत्यादि।
सर्वस्यैतस्य जगतोऽन्नभूतस्यात्ता सर्वात्मनैव भवत्यन्यथा विरोधात् । न हि कश्चित्सर्वस्यैकोऽत्ता दृश्यते तस्मात्सर्वात्मा भवतीत्यर्थः।इस अन्नभूत सम्पूर्ण जगत्का वह सर्वात्मभावसे ही अत्ता (भक्षण करनेवाला) है, क्योंकि बिना सर्वात्मभावके सबका अत्ता होनेमें विरोध आता है। कोई भी एक सबका अत्ता हो, ऐसा देखा नहीं जाता; इसलिये तात्पर्य यह है कि

७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १]

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७८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १]

| सर्वमस्यान्नं भवति; अत एव सर्वात्मनो ह्यत्तुः सर्वमन्नं भवतीत्युपपद्यते । य एवमेतद्यथोक्तमदितेर्मृत्योः प्रजापतेः सर्वस्यअदनाददितित्वं वेद तस्यैतत् फलम् ॥ ५ ॥ | [ इस प्रकार उपासना करनेवाला ] वह सर्वात्मा हो जाता है। सब कुछ उसका अन्न हो जाता है, अतः जो सर्वात्मभावसे अत्ता है उसीका सब कुछ अन्न होना सम्भव है। यह फल उसे मिलता है जो इस प्रकार इस उपर्युक्त अदितिसंज्ञक मृत्यु प्रजापतिका सबका अदन (भक्षण) करनेसे अदितित्व जानता है ॥ ५ ॥ |

प्रजापतिकी यज्ञकामना और उसके प्राण एवं वीर्यका निष्क्रमण

सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति । सोऽश्राम्यत्स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् । प्राणा वै यशो वीर्यं तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरँ श्वयितुमध्रियत तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥ ६ ॥

उसने यह कामना की कि मैं पुनः बड़े भारी यज्ञसे यजन करूँ । इससे वह श्रमित हो गया । उसने तप किया । उस श्रमित और तपे हुए मृत्युका यश और वीर्य निकल गया । प्राण ही यश और वीर्य हैं । तब प्राणोंके निकल जानेपर शरीरने फूलना आरम्भ किया । किंतु उसका मन शरीरमें ही रहा ॥ ६ ॥

| सोऽकामयतेत्यश्वाश्वमेधयोर्निर्वचनार्थमिदमाह—भूयसा महता यज्ञेन भूयः पुनरपि यजेयेति । जन्मान्तरकरणापेक्षया भूयः- | 'सोऽकामयत' इत्यादि वाक्यसे श्रुति अश्व और अश्वमेधका निर्वचन करनेके लिये यह कहती है—मैं पुनः महान् यज्ञसे यजन करूँ। यहाँ जन्मान्तरमें यज्ञानुष्ठान करनेकी अपेक्षासे 'भूयस्' (महान्) शब्द |

| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७९ |

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ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ७९
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
शब्दः । स प्रजापतिः जन्मान्तरेऽश्वमेधेनायजत । स तद्भावभावित एव कल्पादौ व्यावर्तत । सोऽश्वमेधक्रियाकारकफलात्मत्वेन निर्वृत्तः सन्नकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति । एवं महत्कार्यं कामयित्वा लोकवदश्राम्यत् ।दिया है। उस प्रजापतिने जन्मान्तरमें अश्वमेध यज्ञद्वारा यजन किया था। इसलिये उसकी भावनासे युक्त हुआ ही वह कल्पके आरम्भमें प्रजापति हुआ। अश्वमेधके क्रिया, कारक और फलरूपसे सम्पन्न होकर उसने कामना की कि मैं पुनः महान् यज्ञद्वारा यजन करूँ। इस प्रकार महान् कार्यके लिये कामना करके वह अन्य लोगोंके समान श्रमित हो गया।
स तपोऽतप्यत । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्येति पूर्ववत्, यशो वीर्यमुदक्रामदिति । स्वयमेव पदार्थमाह—प्राणाश्चक्षुरादयो वै यशो यशोहेतुत्वात् तेषु हि सत्सु ख्यातिर्भवति, तथा वीर्यं बलमस्मिञ्शरीरे । न ह्युत्क्रान्तप्राणो यशस्वी बलवान्वा भवति । तस्मात्प्राणा एव यशो वीर्यं चास्मिञ्शरीरे । तदेवं प्राणलक्षणं यशो वीर्यमुदक्रामदुत्क्रान्तवत् ।उसने तप किया। उस श्रान्त और तपे हुएका—ऐसा पूर्ववत् समझना चाहिये-यश और वीर्य निकल गया। अब श्रुति स्वयं ही [यश और वीर्य] पदोंका अर्थ बतलाती है। चक्षु आदि जो प्राण हैं वे ही यशके हेतु होनेके कारण यश हैं क्योंकि उनके रहनेपर ही ख्याति होती है। तथा वे ही इस शरीरमें वीर्य यानी बल हैं। जिसके प्राण निकल गये हैं वह पुरुष यशस्वी या बलवान् नहीं होता। अतः इस शरीरमें प्राण ही यश और वीर्य हैं। वे इस प्रकारके प्राणरूप यश और वीर्य निकल गये।
तदेवं यशोवीर्यभूतेषु प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरान्निष्क्रान्तेषु त-तब इस प्रकार यश और वीर्यभूत प्राणोंके उत्क्रमण करनेपर अर्थात् शरीरसे निकल जानेपर

८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १

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८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १


| च्छरीरं प्रजापतेः श्वयितुमुच्छून-<br><br>भावं गन्तुमभ्रियतामेध्यं चाभवत्<br><br>तस्य प्रजापतेःशरीरान्निर्गतस्यापि<br><br>तस्मिन्नेव शरीरे मन आसीद्यथा<br><br>कस्यचित्प्रिये विषये दूरं गत-<br><br>स्यापि मनो भवति तद्वत् ॥६॥ | प्रजापतिके उस शरीरने श्वयन—<br>उच्छूनता (फूलनारूप विकार)<br>को प्राप्त होना आरम्भ किया;<br>अर्थात् वह अमेध्य (अपवित्र) हो<br>गया। किंतु जिस प्रकार किसी<br>प्रिय वस्तुके दूर हो जानेपर भी<br>उसीमें मन रहता है वैसे ही शरीरसे<br>निकल जानेपर भी उस प्रजापतिका<br>मन उस शरीरमें ही रहा ॥ ६ ॥ |


अश्वमेधोपासना और उसका फल

| स तस्मिन्नेव शरीरे गतमनाः सन्किमकरोत् ? इत्युच्यते— | उस शरीरमें ही जिसका मन लगा हुआ है ऐसे उस प्रजापतिने क्या किया ? सो बतलाया जाता है— |

सोऽकामयत मेध्यं म इदँ स्यादात्मन्व्यनेन स्यामिति। ततोऽश्वः समभवद्यदश्वत्तन्मेध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वम्। एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद। तमनवरुध्यैवामन्यत। तँ संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत। पशून्देवताभ्यः प्रत्यौहत्। तस्मात् सर्वदेवत्यं प्रोक्षितं प्राजापत्यमालभन्ते। एष ह वा अश्वमेधो य एष तपति तस्य संवत्सर आत्मायमग्निरर्कस्तस्येमे लोका आत्मानस्तावेतावार्काश्वमेधौ। सो पुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेवाप पुनर्मृत्युं जयति नैनं मृत्युरानोति