भारतकोश
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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

नव्वाबने पूछा इसके बचनेका कोई उपाय है या नहीं ? काजी मुल्लाओंने कहा कि, यदि यह बालक मुसलमान हो जाये तो बच सकता है । नव्वाबने हकीक़त-रायको गोदमें बैठा लिया । कहा कि, अब तू मेरा बेटा है, यदि तू मुसलमान हो जायेगा तो तेरेको अपना राज्य दे दूंगा । हकीक़तरायने साफ़ २ उत्तर दिया कि, मैं सांसारिक धन दौलत नहीं चाहता, मैं अपना धर्म नहीं छोड़ूंगा । हकीक़त-रायके माता पिताने भी समझाया कि, बेटा ! तू मुसलमान होना स्वीकार कर ले, तेरी जान बच जावेगी । हकीक़तरायने अपने माता पिताको बहुत समझाया कहा कि यह देह और संसार सभी नाशमान हैं, एक दिन सब नष्ट हो जावेंगे, किस दिन और किस सुखके लिये अपना धर्म छोड़ूँ ? माता पिता पुत्रके ज्ञान विवेकको देखकर कुछ विशेष नहीं कह सके । नव्वाबसे कहा कि, उसके तुल्य सोना चाँदी मुझसे लेलो इसकी जान छोड़ दो पर दुष्ट काजियों और मुल्लाओंने न माना । नव्वाबने हुकुम दिया कि, पहले इस लड़केके कोड़े मारो, छुरा चुभाओ, तलवार दिखाओ । यदि भयसे मुसलमान हो जावे तो अच्छी बात है । बधिकने वैसाही किया । हकीक़तरायको बहुत कष्ट और दुःख हुआ । पर बाहरे बहादुर ! ! ! ज़रा भी कष्टकी परवाह नहीं की । शरीर और सब संसार तथा मृत्युको धर्मकी अपेक्षा तुच्छ जाना । अन्तमें जब बहुत कष्ट देनेपर भी हकीक़तरायने मुसलमान होना स्वीकार नहीं किया तो बधिकको बध करनेकी आज्ञा हुई । बधिक तलवार लेकर हकीक़तरायके निकट गया उनकी सुन्दरता और कांतिको देखकर आशक्त हो गया, चित्त मोहवश ऐसा निर्बल होगया कि, तलवार हाथसे गिर पड़ी, स्वयम् रोने लगा वरन् गिर पड़ा । हकी तरायने बधिकको खूब समझाया कि, तू मत रोओ उठ खड़े हो, मेरा शिर काट लो तू स्वर्गको जायगा और ये सब काजी मुल्ला नरकको जायेंगे । अब यहाँसे मुसलमानो राज्य नष्ट हो जावेगा, सिकखोंका राज्य होगा ; तू किसी बातकी चिंता मतकर, मोहको त्याग मेरा शिर काटले । उस समय हकीक़तरायका अन्तःकरण प्रकाशित हो गया था । भविष्य कहने लगे । क्यों न हो ? जो अपने धर्मपर दृढ़ विश्वास रखता है, संसारसे धर्मको अच्छा समझता है, दैवी गुणोंको आसुरी गुणोंको अपेक्षा प्रेमकी दृष्टिसे देखता है, ईश्वरपर सच्ची श्रद्धा रखता है, उसको क्या दुर्लभ है ? बधिकने तलवार मारी, हकीक़तरायका शिर धड़से अलग जा गिरा । जिस समय बधिकने तलवार चलाई, उस समय लाहौर में अंधेरा छा गया, भूकम्प आया, नगरभरमें शोक फैल गया, सबके सब बालकसे लेकर बृद्ध तक रोने और हाथ मारने लगे । हकीक़तरायकी मृतक देहको नदी

संसारियोंको उपदेश

किनारे ले जाकर उसकी अन्तिम क्रिया की गई, वहाँ उनकी समाधि बनी, साल साल मेला होने लग गया। अब भी मेला होता है, सहस्रों मनुष्य इकट्ठा होते हैं। हकीकतरायके गीत पंजाबमें गाये जाते हैं।

जिसका धर्म वर्त्तमान है उसका सब कुछ है, उसीके लिये सब सुख है, वही लोक परलोकका राजा है। धर्मसे बढ़कर लोक परलोकमें दूसरा कोई पदार्थ नहीं। जिसने अपने धर्मको बचाया, उसके लिये जीवनकी आशा त्याग दी, वही सफल काम हुआ।

अनन्तर हकीकतरायके माता पिता, उनके फूल लेकर, गंगा प्रवाह कराने हरिद्वार गये। वहाँसे लौटनेपर दिल्ली बादशाही दरबारमें पहुँचे। बादशाहसे अपने पुत्रके ऊपर अन्याय और उसके व्यर्थ बधका न्याय चाहा। बादशाहने रातको हकीकतरायको यह कहते हुये स्वप्नमें देखा कि, यदि मेरा न्याय न करोगे तो तुम्हारा गला घोंटकर मार डालूंगा। बादशाह स्वप्न देखकर बहुत भयभीत हुआ। सवेरा होतेही हकीकतरायके माता पिताको बुलाकर सब हाल पूछा। नब्बाब खान बहादुरसे कैंफ़ियत मोंगी, नब्बाबने स्पष्ट उत्तर दे दिया कि, मैं इस बातमें निरपराध हूँ, मेरा तनिक भी दोष नहीं। काज़ी और मुल्लाओंने बलपूर्वक यह काम करवाया है। काज़ी और मुल्ला बुलाये गये, खूब जाँच हो जानेपर, जिन जिन काज़ी और मुल्लाओंने बधकी सम्मति दी थी, उनको एक एक नौकापर चढ़ाकर जमुनामें डुबवा दिया।

जैसे हकीकत रायने बधिकसे कहा था कि, तू स्वर्गको जायगा, उसी प्रकार ईसाके साथ दो चोर सलीनपर चढ़े थे, एक तो हजरतको गाली देता था, दूसरा कहता था ऐ ईसा! तू मेरे ऊपर दया करना, उस समय ईसाने कहा, था कि, तू स्वर्गको जावेगा।

गुरु गोविन्दसिंह गुरु तेगबहादुरके साथ भी ऐसाही हुआ था। गुरु गोविन्दसिंहके दो पुत्र तो युद्धमें मारे गये थे, शेष जो छोटे दो थे उनको लेकर उनकी दादी भागी, एक ब्राह्मणके घरमें शरण ली, जो बहुत दिनोंसे गुरु गोविन्दसिंहकेही नाजसे पलता हुआ सुख भोग रहा था। उस निमकहराम बेइमान ब्राह्मणने दोनों बच्चोंको मुसलमानोंसे पकड़वा दिया। उस बेइमान नीच ब्राह्मणने लोभवश हो ऐसी कृतघ्नता और पाप किया कि, जिसके तुल्य दूसरा कोई पाप नहीं हो सकता। मुसलमानोंने दोनों लड़कोंको पाया, जिनमेंसे एक तो सात वर्षका था दूसरा पांच वर्षका था। कहा कि, तुम मुसलमान हो जाओ

दृष्टान्त

नहीं तो तुम्हारी गर्दन काटी जावेगी । उसने स्पष्ट उत्तर दिया कि, हम अपना धर्म छोड़के मुसलमान न होंगे । मुसलमानोंने बहुत भय, आशा तथा लोभ दिखाया पर दोनोंमेंसे किसीने भी स्वीकार नहीं किया । अपना वध होना स्वीकार किया पर किसी प्रकार अपना धर्म छोड़ना नहीं चाहा बरन् मुसलमान होनेसे महान् घृणा प्रगट की । जब किसी प्रकार उन बच्चोंने नहीं माना तो निर्दयी मुसलमानोंने बिचारे निष्पाप बालकोंको, सरहिन्दकी दीवारोंमें चुनकर मार डाला । यह समाचार सुनकर मालियर कोटलेके नब्बाबने बहुत शोक किया । नब्बाबके सिवा जिन २ लोगोंने शोक प्रगट किया, गुरु गोविन्दसिंहने उनको आशिर्वाद दिया कहा कि, तुम्हारी जड़ हरी रहेगी । यह सम्बत् १७६१ विक्रमीकी बात है ।

मुख्बा ।

हकीकत रायका सिर काट किस पर । न आये दर्द दिलमें ऐसी जिसपर ॥
किया जल्लादने भी रहम जिसपर । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
पड़े कोड़े छुरा उसको चुभाया । किया तूने जो तेरे दिलको भाया ॥
ज़रा उसने न दिल अपना डुलाया । कहो रोवे फ़लमा क्यों कर न उसपर ॥
तमा कितने दिखा मासूम बच्चे । न मुतहूरिक हुये ईमान सच्चे ॥
हुये हरगिज न लोभ और डरसे कच्चे । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
जब आया हिन्दमें महमूद ग़ज़नी । किया उसने जो था उसको न करनी ॥
दया और धर्मको दिलमें धरनी । कहो रावे लक क्यों कर न उसपर ॥
हुआ जब सरबुलन्द औरंग औरंग । हुआ आलममें तब कुछ औरही ढंग ॥
किया हिन्दूको तब उसने बहुत तंग । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
शहर दिल्लीमें नादिरशाह आया । तमासा अपना सो सादिर दिखाया ॥
सर अम्बार हिन्दूका लगाया । कहो रोवे लक क्योंकर न उसपर ॥
कहूँ क्योंकर गुनह शाहो गदाका । यही है धरम इस नई सम्प्रदाका ॥
न आजिज खौफ़ रहम उसमें खुदाका । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥

मुसलमानोंके अत्याचार और निर्दयताको पहलेसेही कबीर साहबने जान कर, मक्कामें प्रगट हो, मुहम्मदको मिथ्या धर्म द्वेष निरर्थक रक्तपातसे बहुत मना किया सत्य पुरुषका दर्शन कराया । मुहम्मद साहब तो, कबीर साहबका उपदेश मानकर, इस अन्यायसे रहित हुये पर उनके अनुयायियोंने नहीं छोड़ा ।

सच्चे हिन्दू और मुसलमान

मुसलमानो हदीस, तारिख मुहम्मदी तथा मौलवी अमाउद्दीन कृत तालीम मुहम्मदीमें लिखा है कि, मुसलमान लोग पहले मदिरा पीते और शूकर-का मांस खाते थे। मद्य पीकर निमाज पढ़ना विधि थी, पीछे हराम (निषेध) हो गया। इसी प्रकार बलपूर्वक मुसलमान करना भी हराम हो गया। मुसलमानोंने दो बातोंका तो हराम मान लिया पर तीसरी बात नहीं मानी। कबीर साहबने कहा है कि—

बाँधे भक्ति न होयरे भाई । बाँधे करे सो करम कसाई ।

जो लोग बलपूर्वक मुसलमान करते हैं वे स्वयम् मुसलमान नहीं हैं जो परवश मुसलमान हुये हैं वे भी मुसलमान नहीं। जो यथार्थमें मुसलमान हैं वे न तो बलपूर्वक मुसलमान करते हैं, न होते हैं।

जो गुण मने हिन्दुओंके ऊपर लिखा है, जिसमें वे गुण होंवे वे ही हिन्दू हैं। देखो हकीकतराय को मुसलमानोंने कितना दुःख दिया, प्राण तक हरण कर लिया पर वीर क्षत्रिय बालकने अपनी धर्म दृढ़ता न छोड़ी। ऐसेही पुरुष हिन्दुओंमें परिगणित होनेके योग्य हैं। जो लोग मुसलमान अथवा ईसाई होगये वे प्रथमही हिन्दू नहीं थे, न मुसलमान अथवा ईसाई, नाम धरानेपर मुसलमान अथवा ईसाई हुये। जैसे गदहेने व्याघ्रका चमड़ा ओढ़ लिया तो क्या? बैलका ओढ़ लिया तो क्या? असलमें वह गदहा ही है। वैसे ऐसे अव्यवस्थित चित्त और धर्मवाले लोगोंका कुछ भी धर्म नहीं होता। उनको धर्म बदलते, गंगादाससे यमुनादास, यमुनादाससे गोमती दास बनते कुछ भी विलम्ब नहीं है। कोई किसी धर्ममें क्यों न हो पर अपने सदाचार और पुण्यसे ही उसका कल्याण होगा क्योंकि ईश्वर एक और सम है, उसकी आज्ञा उलंघन करना पाप और नियमको न छोड़ना पुण्य है। यदि ईश्वरके नियमके विरुद्ध चलेगा तो पापी होकर दण्डका भागी होगा। सदाचरण (ईश्वरी नियम) को ही पूर्णता पर पहुँचाना सर्व धर्मोंका मूल है। जो लोग नीच घृणित मादक पदार्थ और मांस आदि हिंसा प्राप्त पदार्थोंको ग्रहण करते हैं वे भी हिन्दू नहीं हैं। केवल हिन्दुओं के ही लिये यह बात नहीं बरन् जो ईसाई अथवा मुसलमान हैं, इञ्जील तथा कुरानकी आज्ञाओं पर नहीं चलते वे ईसाई या मुसलमान नहीं हो सकते क्योंकि, मुखसे कहना और बात है, मानना और उसके ऊपर चलना और बात है। कोई क्यों न हो? जिनका जो धर्म है, वह धर्म ईश्वरी नियम (प्रकृति) के विरुद्ध न हो, उसको भली प्रकार बर्तनेसे कल्याण प्राप्त करेगा। प्रकाश और श्रेष्ठता सत्य-

पुरुषको प्रसन्न करनेका द्वार है, सदाचरणसे मिलता है सत्यपुरुषकी कृपासे मुक्ति होती है । परमात्माको सदाचार स्वीकार है दुराचारसे घृणा है ।

जिसने इस संसारमें आग लगाई उसीमें बुझाने की भी सामर्थ्य है । जिसने कालपुरुषको प्रगटकर उसको राज्य दे दिया वही इससे बचा भी सकता है । जिसने सब प्रपंच प्रगट किया वही इसको शांत भी कर सकता है, दूसरेकी क्या शक्ति है कि, कुछ भी कर सके । मनुष्यको चाहिये कि, उसीकी दया और कृपाका ध्यान रखे, उसीके कृपापात्र बननेका प्रयत्न करे, दूसरा कोई उपाय नहीं है, सब युक्तियाँ निरर्थक हैं । केवल उसीकी कृपादृष्टि प्राप्त करनी चाहिये, दूसरा कुछ भी प्राप्त करना नहीं है ।

हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और यहूदी लोगोंसे प्रार्थना ।

प्रथम हिन्दू महाशयोंसे यह विनय है कि, जिन जिन बातोंपर उनका विश्वास और भरोसा है, जिनमें उनकी स्थिति है, वे क्या हैं ? उसमें कुछ स्थिरता है अथवा नहीं ? निर्गुण और सगुण दोनों ही तुच्छ हैं । क्योंकि, निर्गुण (जिसमें कुछ गुण नहीं) कर्ता नहीं हो सकता सगुण नाशमान तथा निर्मूल है । जब ये दोनों निर्गुण और सगुण अव्यवस्थित नाशमान हैं तो इससे लाभ की क्या आशा हो सकती है ? फिर लोग कहते हैं । ब्रह्म, जीव और माया तीनों एक ही हैं, तीनोंका एक ही मूल है । वे केवल जीवकी अज्ञानतासे तीन भासते हैं नहीं तो यथार्थमें एक ही हैं । ज्ञानकी दशामें अवाच्य पद है कुछ कहा सुना नहीं जाता । जो कुछ मन बुद्धिका गोचर है सो सब भ्रम माया है ।

तत्वमसिके तीनों पद भ्रम और धोखा हैं । भ्रम और धोखा ही इन्द्रिय गोचर होता है । भ्रमको ग्रहण करनेसे भ्रम ही मिलता है, सत्यको धारण करनेसे सत्यपदकी प्राप्ति होती है । जो सत्यकी ओर झुकेगा वह अवश्य सत्यमें ही प्राप्त होगा ।

मुसलमान महाशयोंसे कहना है कि, आप लोग कहते हैं कि, “जो मुहम्मदी कलमा पढ़नेसे मुक्ति हो जायेगी, वह विहिश्रतको जावेगा, शेष सब नकको ।” मुसलमान अपने भिन्न सब धर्मवालोंको काफ़िर कहते हैं । यदि मुसलमान होकर अपनेसे कुफ़पर ध्यान देते तो कभी किसीको किसी प्रकार दुःख नहीं देते, अत्याचार और अन्यान्यको निकट न फटकने देते, पर पक्षपात, धर्म, द्वेष, ऐसी मूर्खता है कि, जिससे मनुष्य क्या २ पाप ओर बुराई नहीं कर सकता ? जिस कलमापर उनका विश्वास है, जिसको अपने धर्म और ईमानका मूल समझते हैं वह क्या है ? केवल भ्रम और धोखा है । मूर्खोंके ठगनेकी एक युक्ति है ।

पुरुषसूक्तका सिद्धान्त

इसमें शुद्ध करने और मुक्ति देनेकी शक्ति तो क्या होनी थी, इससे एक अद्वैत परमात्माकी स्थितिही प्रकट नहीं होती बरन् अनेक अर्थात् माया ही का विवरण प्रगट होता है।

(हल्लाह लाइला) नहीं अल्लाह मगर अल्लाह इससे स्पष्ट प्रगट होता है कि, यह कलमों किसी विशेष ईश्वरको वर्णन करता है, जैसा मैं प्रथम ही लिख आया हूँ कि, मूसा और इब्राहीम आदिका एक ही खुदा था। वही अब भी है और मूसाके खुदाकी अनेकता मैं भलीप्रकारसे प्रथमही सिद्ध कर आया, जैसा यह कलमा भ्रमिक और कल्पित है वैसे ही इसका परिणाम भी होगा क्योंकि जैसा मूल होता है वैसे ही डाल, पात, फूल, फल होते हैं। विहिस्त वगैरह की, जो आशा कुरान आदि दिलाते हैं वे मिथ्या कल्पित रोचक और भयानक वाक्योंमें वर्णित हैं। जो स्वयम् मिथ्या हो उसमें कोई कैसे जाकर रह सकता है।

जैसे हिन्दुओंका निर्गुण है वैसे ही मुसलमानोंका कलमा है। कलमा कहता है नहीं खुदा मगर है खुदा। प्रथम अस्वीकार फिर स्वीकार। विचार करनेकी बात है कि, ऐसा कलमा जिसका कि, कुछ ठिकाना ही नहीं किस प्रकार मुक्तिदाता बन सकता है? ऐसे भ्रमके कलमें पर विश्वास करके सब मुसलमान लोग धोखेमें बहे जाते हैं। ये जो कुछ रोजा निमाज तकबा तिहारत जप तप करते हैं सब उसी विहिस्तके लिये करते हैं जिसका कुछ ठिकाना ही नहीं। यदि मान भी लिया जावे तो भी उनके विहिस्तसे घृणा उत्पन्न होती है क्योंकि ऐसा बुद्धिहीन कौन है? जो प्रथम तो विषय वासना त्यागनेके लिये कठिनसे कठिन तपस्या करके मनको मारे, फिर परिणाममें उसी नीच और घृणित काममें फँसे।

तीसरे ईसाई महाशयोंसे कहना है कि, वे जो तसलीसको सत्यधर्मका मूल मानते हैं वो उनके भ्रम और कल्पनाके अतिरिक्त और क्या है? ईश्वर अविभाज्य है, उसमें विभाग कैसे हो सकता है? अखण्डको कौन खण्ड २ कर सकता है? जिसका खण्ड हो जाता है वह परमात्मा नहीं है, उसमें सब शक्ति नहीं। बाप, बेटा और पवित्रात्मा ये तीन हुये थे, ये कदापि सब शक्तिमान् नहीं हो सकते। जो सर्वशक्तिमान् है वह, अनन्त बापबेटा और पवित्रात्माओंको प्रगट कर सकता है। सर्व शक्तिमान सबसे निलैप है। ईसाईयोंकी तसलीस और हिन्दुओंकी तसलीस दोनों एकही बात हैं। हिन्दू ब्रह्म, जीव और माया कहते हैं। ईसाई बेटा, बाप और पवित्रात्मा मानते हैं। जब तक कोई अद्वैतको प्राप्त न करेगा तब तक मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता।

जैन धर्मका सिद्धान्त

चौथे मूसाई ( यहूदी ) महाशयोंसे विनती है कि, वे जिन दश आज्ञाओं पर विश्वास करते हैं उसीसे अपनी मुक्ति समझते हैं वे क्या है ? किसने दी ? कहाँ से आई ? किसको मिली ? विचार करेंगे तो मालूम होगा कि, दश आज्ञा देनेवाला और लेनेवाला दोनों बन्धनमें हैं, मुक्त कोई नहीं, वरन् मुक्तिकी सुधि भी नहीं जानते । बन्धने दिया बन्धनेही लिया । इन दश आज्ञाओंका वर्णन इसी पुस्तकमें प्रथम लिख आया हूँ उसको देखें उसपर विचार करें कि, इनका यथार्थ आशय क्या है ? जब उपदेशक उपदेशा दोनों बन्धनमें हों तो मुक्ति कैसे हो सकती है ? जो स्वयं मुक्त नहीं, वह दूसरोंकी क्या मुक्ति देगा ? परम त्माने जिनके अन्तःकरणमें प्रकाश दिया है, जिन्हें कुछ ज्ञान है, वे सोचें समझें कि, कौंदीको कौंदी, कौंदसे कैसे मुक्त कर सकता है ? कदापि नहीं ।

जिस प्रकार मैंने उपरोक्त धर्मोंका वर्णन लिखा है, उसी तरह सब धर्मोंका जानना चाहिये । पक्षपात और अँधाधुन्ध धर्मद्वेष तथा आग्रहमें विवेक और विचार कहाँ है ? जिससे कि, भ्रम और असत्यका त्याग और सत्यकी प्राप्ति, हो । समस्त संसारकी धर्मपुस्तक अन्धोंकी लकड़ीके समान हैं, जिनके विवेक विचार और निरपेक्षता रूप नेत्र नहीं हैं, वे ही उसके सहारा ढूँढ़ते फिरते हैं । वे शास्त्रके आशयको समझ नहीं सकते क्योंकि, उनके भीतर अन्धकार भरा है । यदि प्रकाश होता तो शास्त्रोंके सच्चे आशयको समझकर सीधे मार्गपर चलते उलटा मार्ग स्वीकार न करते ।

उदारता और वीरता ।

मैंने जो हकीकतरायका हाल लिखा इसके धर्मज्ञ होनेका कारण यह था कि, बालकपनसेही उदार था । यह नियम की बात है, जो उदार होता है वह शूरवीर भी होता है, जो शूरवीर होता है वही अपना धर्म रख सकता है । जितने प्रतिष्ठित नामी महात्मागण हुये सब उदार और वीर हुये । उदारता और दृढ़ताके बिना कोई भी धार्मिक नहीं हो सकता । कृपण और हतोत्साहको कभी भी श्रेष्ठता नहीं मिल सकती वह सदा अभागही रहता है ।

एक दिन एक यहूदी स्त्री मूसाकी प्रशंसा ( मुहम्मद साहबके समक्ष ) बड़े उत्साहसे करने लगी कि, मूसा बड़ा उदार पुरुष था । उसके तुल्य कोई नहीं हुआ । यह बात सुनकर मुहम्मद साहेबने कहा कि, मुझसे मांग तू क्या माँगना चाहती है ? उसने कहा कि, आप अपना जामा उतारकर मुझे दे दीजिये । मुहम्मद साहबने अपना जामा उतार कर दे दिया स्वयं नङ्गे हो गये गुफाके अन्दर

योगी और संन्यासियोंका सिद्धान्त कबीर पन्थियोंका सिद्धान्त

जा बैठे। अब बाहर निकलना कठिन हो गया क्योंकि, मुहम्मद साहबके पास एकही जामा था जो यहूदिनको दिया था।

उसी समयसे आकाशसे वही (आकाशवाणी) हुई कि, आवश्यक पदार्थ किसीको मत दिया करो मुहम्मद साहब ऐसे उदार थे कि, कभी २ स्वयं भूखे रहते थे, कभी बिना नमकके शाक खाकर रह जाते थे, कभी भूखसे व्याकुल हो जानेपर पेटपर पत्थर बांधकर पड़े रहते थे नमाज और अपना नित्य नियम भी किया करते थे कबीर साहबने भी मुहम्मद साहबके संतोष और उदारताकी प्रशंसा की है। ईसाभी वैसेही उदार और संतोषी थे। इन्जीलमें दान आदि करनेकी आज्ञा है पर उसपर कौन चलता है? अपने २ आचार्य और गुरुकी आज्ञा उल्लंघन करनेके कारण सब धर्मवाले अधर्मी हो गये हैं, उनका अन्तः-करण अन्धकारमय हो गया है, ये प्रकाशको देख भी नहीं सकते। जो कोई सच्चे संत और सद्गुरुकी संगति सेवा भक्ति छोड़ेगा उसकी यही गति होगी क्योंकि सच्चे विद्वानों सदाचारियों संतों और सत्यगुरुओंकीही कृपासे ज्ञान प्राप्त होकर उभयलोकका आनन्द प्राप्त होता है, जहाँ सत्संग और विवेक विचार एवं संत और गुरुकी सेवा न होगी वहाँ अज्ञानता और भ्रम होगा।

साधुओंकी स्थिति।

यदि कोई गृहस्थ अथवा प्राकृतिक मनुष्य साधुओंका ज्ञान और शुभ्रूषा न करे, उन्हें कुछ न दे तो भी साधुओंको अपना भजन नहीं छोड़ना चाहिये पेटके लिये अपने अमूल्य समयको नष्ट कर आत्मविचारसे रहित रहना महान् पापका काम है। पेटके लिये अपनी प्यारी आयुको नष्टकर ईश्वरसे विश्वास खो, गुरु विमुख न होना चाहिये।

प्रभु ऐसा विश्वम्भर है कि, सीमूर्ग जैसे पक्षीको भी बैठेही बैठे भोजन देता है। यह पक्षी काफ पर्वतपर हुआ करता है। उसका शरीर बहुत बड़ा होता है। वह इतना बड़ा होता है कि, यदि कभी अपने परोंको फड़ फड़ावे तो तूफान आजावे। इसी कारण सदा एकही स्थानपर पड़ा रहता है। परमात्मा उसके जीवन निर्वाहका प्रबन्ध इस प्रकार करता है कि, उसके चारों तरफ चार २ कोशतक घास तैयार रखता है जब सीमूर्ग भूखा होता है तो अपने चारों ओरकी चार कोशतककी घास चर जाता है सबेरे दूसरे दिन फिर ज्योंका त्यों घास पहिलीसीही तैयार हो जाती है। इस तरह परमात्मा उसकी रक्षा करता है। इसी तरह संसारमें कोई जीवधारी नहीं जिसको कि, विश्वम्भर भूखा रखता हो। प्रभु नित्य सबको समयपर भोजन पहुँचाता है। इसी कारण साधुओंका भी उसी

विश्वम्भरका विश्वास रखकर अपने धर्मपर स्थिर रहना चाहिये । कोई क्यों न हो जबतक अपने कर्तव्यपर दृढ़ और स्थिर रहेगा, सुखसे रहेगा, जब अपना धर्म (कर्तव्य) छोड़कर पराये, धर्ममें प्रवृत्त होगा अवश्य दुःख और कष्ट भोगेगा ।

तीसा यन्त्रकी साखी ।

अपने २ धर्ममें सबको सुख उपजे सब काल ।
जिन निज धर्म दृढ़कै गह्यो तेई भये निहाल ॥

अध्याय २३

गजलोंसे उपदेश

गजल ।

न पावे राह कोई साधु गुरु बिन । दिखावै चाह सूली साधु गुरु बिन ॥
बजारी जोर घर हरगिज न पावै । हो नालः आह सदहा साधु गुरु बिन ॥
करे तदबीर सदहा गर शबो रोज । गदा और शाह नहिं कोई साधु गुरु बिन ॥
कवाकिब ओर सवाबित सब खड़े हैं । मेहर और माहनहिं कोई साधु गुरु बि०
बहर जानिव तमाशा साधु गुरुका । न क़िबला गाह पावै साधु गुरु बिन ॥
जिधर जावे उधर हैरांही आजिज । न हो आगह आदम साधु गुरु बिन ॥
गजल— चल उतर पार साधु सेवासे । पावै खुद यार साधु सेवासे ॥
होवे हरदो जहामें बख्तावर । गुल होवे खार साधु सेवासे ॥
जहां न पहुँचे कोई तू जाय वहां । पेश सरकार साधु सेवासे ॥
अक्ले इन्सानकी है रसा न जहां । पहुँचे दरबार साधु सेवासे ॥
पावै बहु न्यामत न जाने कोई । अस्ल इसरार साधु सेवासे ॥
बस्ल बेशक हो अस्ल अपनेसे । कुलके करतार साधु सेवासे ॥
आवे हरगिज न कालके पञ्जे । हो छुटकार साधु सेवासे ॥
पागलोंका जो घर है भवसागर । छोड़ संसार साधु सेवासे ॥
आगके घरमें आपड़ा आजिज । होवे गुलज़ार साधु सेवासे ॥

अटका जो काली धार हो, सत्गुरु न जिसका यार हो ।
हरगिज न बेड़ा पार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
सल्लाह नहिं मल्लाहसे, मुहूरिभ नहीं उस राहसे ।
इस बहर में न करार हो, खिदमत बिना गुरु साधु की ॥
गुरु साधुको जो सेवता, पावे सो पूर्ण देवता ।
रहबर न सो सत्तार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥

हजरत मूसाका सिद्धान्त हजरत ईसाका सिद्धान्त, मुहम्मद शाहका सिद्धान्त शरणागत तथा ईश्वर विश्वास

सदहा करे तदवीर जो, हरगिज न पहुँचे तीरसो ।
गरदावमें लाचार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
खेवट नहीं गुरु साधु जहां, किशती न होवे पार वहां ।
वेशक अज्ञाबुननार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
यह कौल सत्य कवीरका, हर दो जहाँ गुरु पीरका ।
नहिं पुरुषका दादार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
सदहा जो गोता खायेगा, आजिज बड़ा पछतायगा ।
पावे नहीं गङ्कारको, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥

बिन साधु गुरुसारेही मुरदार हुये । इनकेही मेहरसे सुर मुनि सरदार हुये ॥
खाक पा सुरमैं जिनसेहै मनौवर मह व मेहर । गुरुसन्तकदम चूमते भवपार हुये ॥
सतसङ्गको पाये सोई सतपदको मिले । बिन साधुगुरु कोई न गमख्वार हुये ॥
सतसङ्गही हर सित्म व हर कूचा गली । बदबख्त न देखते हैं लाचार हुये ॥
सत्सङ्गकी तारी जहांमें आजिज । बिन सन्त गुरु दालिख दर नार हुये ॥

पावे आराम साधु गुरु सेवा । लाभ सत नाम साधु गुरु सेवा ॥
काल जञ्जाल दूर हो लारेव । टूट जा दाम साधु गुरु सेवा ॥
जब मेहर इनकेसे हुआ पुरख्त । फिर न हो खाम साधु गुरु सेवा ॥
दर्द हासिल हो तुझको रोजो शव । सुबह और शाम साधु गुरु सेवा ॥
लात घर जा ऊपर मुअल्लें अर्श । पहुँचे बदबाम साधु गुरु सेवा ॥
आजिजे अबदी हयातको पावै । जिन्दगी तआम साधु गुरु सेवा ॥

मुरब्बा ।

वहां जाऊँ मेरा दिलबर जहां है । दिखा इसको जो दर परदा निहां है ॥
किधर ढूंढूं वह मुरशिद मिहरबाँ है । हुये सन्मुख हैं सब गुरु मुख कहाँ है ॥
कोई गुरुमुख होवै सो राह पावै । जो मन्मुख शौर दरियामें बहावै ॥
यह आलम भूल सदहा गोता खा े । हुये मन्मुख हैं सब गुरुमुख कहाँ है ॥
कोई गुरुमुख मुझे वह गुरु मिला दो । बला सद जन्मकी पलमें टला दो ॥
इस आजिज नातवां वह रह चला दो । हुये हैं मन्मुख सब गुरुमुख कहाँ है ॥

तन व मन धनसे हो गये गन्दे । जिससे तू पडगया है यम फन्दे ॥
है तू मेहमांसरामें दिन चन्दे । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥

नहीं तन है नहीं धन तेरा । हुआ गाफिल है कालके घेरा ॥
जोनि सदहामें हो तेरा फेरा । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥
रात दिन मौत हर घड़ी कर याद । कर दिया उम्र अपनी तू बरबाद ॥
पापका बोझ सर पै लीहै लाद । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥
दोस्त अपनेसे तूने पीठ दिया । दुश्मनाने रख प्यार डीठ दिया ॥
ज्ञान और ध्यान गहरा गीठ दिया । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥
दोस्त दुनियाके तुझको मारेंगे । आग दोजखमें खींच डारेंगे ॥
कौन आजिज तुझे उवारेंगे । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥

श्रृङ्गल ।

सङ्ग सोजांसै है न डर जिनको । रह बदोजखके रख है दर जिनको ॥
सालहों की सलाह इनसे कहाँ । साजे सुबहों सजें घर जिनको ॥
जानै सो हेच खाकसारोंको । हक करे जेर और जबर जिनको ॥
डूब कर सारे मर गये भोंदू । अकल आला मदद न सर जिनको ॥
दीदना दीद इनकी है आजिज । आता है बहुत करों फर जिनको ॥
यथा—बदोदारैन सुर्खरू गुरुमुख । होवे तहसीन चारसू गुरुमुख ॥
उनसे कोई न जगमें बख्तावर । खल्क खुश और नेकखू गुरुमुख ॥
दोस्त इनका है सब जमीनो ज़मा । कोई बाकी नहीं अदो गुरुमुख ॥
सारे कामोंसे हो गये फ़ारिग । रही कोई न जुस्तुजू गुरुमुख ॥
तर गये सो जहाज गुरु पर बैठ । देख हरगिज न कालको गुरुमुख ॥
अम्बरो ऊद इत्रियात बराह । पुर बहर सिम्त मुश्को बू गुरुमुख ॥
दस्तगीरी हैं जिनको सत गुरुकी । बेकार होवै एक मू गुरुमुख ॥
तन मन व धनजो अपना बार आजिज । इससे बढ़कर न गुफ्तुगू गुरुमुख ॥

श्रृङ्गल ।

प्रह्लाद पिता साधुकी तौहीन किया । रावनभी गया साधु की तौहीन किया ॥
निवंश हुआ कंस जो था उसका चिरागादी । उसको बुझा साधुकी तौहीन किया ॥
दुर्योधन मगरूर हुआ शौकतों शान । बाकी न रहा साधुकी तौहीन किया ॥
राजा सगर पूत जो थे साठ हजार । सब गर्द मिला साधुकी तौहीन किया ॥
कृष्ण औलाद ज़बरदस्तो मगरूर हुये । गारतसो किया साधुकी तौहीन किया ॥
शह्राद जो तामीर किया बागे बिहिश्त । पत्ताल चला साधुकी तौहीन किया ॥
नमरुदहो मरदूद भरा कुब्र जो मराज । मच्छरसे खिला साधुकी तौहीन किया ॥

मनन

फरऊन हुआ ढूंन बर्मै सदर नशीं । दरियामें डूबा साधुकी तौहीन किया ॥
वेद और कुतुब ख्वानी मगरूर डूबे । जो सब उलमा साधुकी तौहीन किया ॥
गुरुपीर बतदवीर पनः उनकी जो छोड़ा। धर्मराज धरा साधुकी तौहीन किया ॥
बद फेली खजना हुये पर कुफ हो दिल । तारिक मरा साधुकी तौहीन किया ॥
सबयमकी खोराक ऐसे आदम आजिज । न कोई बचा साधुकी तौहीन किया ॥

ग्रन्थल

सर बसर सूली तर बदारे हमल । मअसियतके लिये करारे हमल ॥
वे गुणाहोंको कैंद कौन करे । आसियोंको हुआ मदारे हमल ॥
हमल दोजखमें जो हुआ महबूस । गन्धको गन्धकी नआर हमल ॥
केते हैं गन्दिगीके जो कीड़े । उनको ही बूदो काश प्यारे हमल ॥
होवे क्योकर पसन्द आदमको । यह जहन्मकी आमो गार हमल ॥
मुजरिमोंके लिये बना यह मकौ । बन्द हैं दर अजाबो नार हमल ॥
जब पड़ा कैंदमें पुकारे तू । दर्द दुख इन्द्र बेशुमारे हमल ॥
तोबः २ कर बसत मिन्नत । कीजिये गुफा र रुस्तगारे हमल ॥
अब न हरगिज भुलाऊं तेरा नाम । रख पनाह मुझको अज शरारे हमल ॥
सब गुनहगार बे गुनह न कोई । जिसका हैं सीत रोजगारे हमल ॥
वे गनाहान हैं सूरत अस्ल बसूल । गुनह आलूद हैं शिकारे हमल ॥
जहां जावे वहां मुक़दर हो । पुर है सब गर्द और गुबारे हमल ॥
एकसे छूट दूसरे हो बन्द । नहिं पायान हैं शब निहारे हमल ॥
जब मिहरबां हुये करीमे रहीम । कर दिया दूर भारी प्यारे हमल ॥
आया बाहर सो कौलको भूला । याद आवे न अपना यारे हमल ॥
फस मया पनियवी मोहब्बतमें । कौन पूछे वह गमगुसारे हमल ॥
जन्म साबिकका यह कसूर आजिज । पा उत्तर सर तल न चारे हमल ॥

ग़ज़ल—बैठे खुद जाय मैं जाकर दिल दीवाना मेरा ।

हुब्ब महबूब लगा कर दिल दिवाना मेरा ॥

काल चक्करसे बचैगा भी तदबीर है एक ।

मुरशिद पनः आकर दिल दीवाना मेरा ॥

सतगुरु कदमें खाक कोहल नूरसे देख ।

आँखोंमें सजा कर दिल दीवाना मेरा ॥

होवेगा अमर फेर मरेगा न कभी ।

उसकीही उलशको खाकर दिल दीवाना मेरा ॥

जान बखश तेरा पानी पाशोबः पीर ।
पाक हो इससे नहाकर दिल दीवाना मेरा ॥
सुखरूहो बदो कौनैन कदम उसकी पकड़ ।
फ़रमान उसकाही बाज कर दिल दीवाना मेरा ॥
यही तदबीर नहीं और छूटे तब आजिज ।
इसकीही गीतको गाकर दिल दिवाना मेरा ॥

ग़ज़ल—साहब जो कुल जहान, है साधुओंके बीचमें ।
वह आप बे गुमान, है साधुओंके बीचमें ॥
जावै जिधरको संत, सो जाहिर वहांही है ।
इस घरकी निरदबान, है साधुओंके बीचमें ॥
कहने व सुननेमें कभी, जो आता ही नहीं ।
उस लाबयां बयान, है साधुओंके बीचमें ॥
हर तरफ़ जाके देख, जहां साधु मण्डली ।
इस लामकां मकान, है साधुओंके बीचमें ॥
आजिज न जान फर्क, साहब व सन्तमें ।
जो कुल पै मिहरबान, है साधुओंके बीचमें ॥

ग़ज़ल—कलियुगका ऐसा जोर है, वेद और कुतुब ख्वां शोर है ।
हर दिलमें पैटा चोर है, साधुकी पूजा उठ गई ॥
हुक्काम और शाहे जमां, पूछे नहीं आंबिद कहां ।
अन्धेर फैलै दर जहां, साधूकी पूजा उठ गई ॥
कोई कहता हम आलिम बड़े, मेरे हाथमें सब हत्यकड़े ।
सब दूर हकसे यों पड़े, साधूकी पूजा उठ गई ॥
दुनियामें सब अन्धेर है, यमराज सबको घेर है ।
फिर मौतमें क्या देर है, साधूकी पूजा उठ गई ॥
कोई दस किताबें पढ़ गया, अर्शबरी पर चढ़ गया ।
वह ज्ञान अपना गढ़ गया, साधूकी पूजा उठ गई ।
अरबी व तुर्की फ़ारसी, अंग्रेजी सो सब खारसी ॥
देखै कोई न आरसी, साधूकी पूजा उठ गई ।
जब हकसे अपने ऐठना, किया फिक्र हुजरे बैठना ॥
राजे निहां न पैठना, साधूकी पूजा उठ गई ॥

सब खाम कोई न पका, कोई न मस्तपर चढ़ सका ।
आजिज भी सबसे कहि थका, साधूकी पूजा उठ गई ॥

गजल ।

दोनों हैं बला बिहिश्त दोज व । उनको है सिला बिहिश्तव दोजख ॥
जिनको न खबर है अपने घरकी । आदम न चला बिहिश्तव दोजख ॥
जो दिल है तमीजो फिक खाली । है सूये बला बिहिश्तव दोजख ॥
मखसूस न यह बइत्र आदम । हैवांको भला बिहिश्तव दोजख ॥
इन्साको पसन्द वह न हरगिज । पुरखौफ़ गला बिहिश्तव दोजख ॥
एरा में आन कर अमल कर । फिर दोनों कला बिहिश्तव दोजख ॥
आवेगी जब यक हवा खिज़ानी । तब आग जला बिहिश्तव दोजख ॥
आदम हुआ बाहर अज अदन बाग । जब रोज़ ढ़ला बिहिश्तव दोजख ॥
खाली हैं ज़मान ज़मीने आजिज । खाक और ड़ला बिहिश्तव दोजख ॥

गजल ।

सोचकर दिलमें बे खबर आदम । छोड़ दे ख़्वाब और खुमर आदम ॥
कौन मजहब तेरा है कौन खुदा । पूजता किसको बे बसर आदम ॥
देख और सोचकर बफ़िक़ो तमीज । यह न मशरब है यह तो शर आदम ॥
जिसको तू पूजता खुदा करके । सो खुदा है न अजदर आदम ॥
भेडिया या भेडका बचो पानी । तुझको है खौफ़ और खतर आदम ॥
जिससे आरामकी उम्मीद तुझे । बेशक उससेही हो जरर आदम ॥
जिस प्यालेकी शौक़से पीता । आब हैवां न वह जहर आदम ॥
जो कि मुहसिन यकीन बाबरकी । करे वह जेर और अबर आदम ॥
जिसको जाना है ख़्वान मकां अपना । वह न हरगिज है तेरा घर आदम ॥
कर इबाबत तिहारतो तकवा । बेंतफ़क्कुर है बे समर आदम ॥
लाख चौरासीमें फ़िरा मारा । अब असल अपना ध्यान धर आदम ॥
देह यह और वक्त यह तेरा । अब जरा दिलमें होश कर आदम ॥
आदमी है तो होश कर आजिज । गर बहायम से हैं तो मर आदम ॥

गजल ।

वक्त गुज़रे पै अपने ग़म कीजे । याद खुद सानये सनम कीजे ॥
जाकर होश पास देख उसे । मुरदः दिल अपना फेर दम कीजे ॥
जिसको तू चाहता वह दूर नहीं । हुम्ब महबूब चश्म नम कीजे ॥
छोड़ दे सब जहानो बुतां पामाल । अपने मह आगे पुश्त खम कीजे ॥

नफ़स अम्मार दुश्मनों कर गिर्द । सोई सामान अब वहम कीजे ॥
होके आदम न होवे चौपाया । रूह अपनेपै मतसम कीजे ॥
तू अगर वस्ले यारखाह आजिज । दूर शहबात बिलकलम कीजे ॥

शब्द ।

कहां आदम कहाँ है यह बहायम । हैं सुबहत जिनकी तू मसहूर दायम ॥
न पावैं अक्ले इन्सानी सतूरां । तू कर दे जल्द तर्क यह लूम लायम ॥
गुरु चेले पड़े दर बहर काली । हैं खाते गोता सदहा दायम दायम ॥
जो दिल घोड़ा जगह अपनेको छोड़ा । करें फिर कौन वह बर जाय कायम ॥
करे तदबीर सदहा क्यों न आजिज । यह दिल गरिन्द क्योंकर हो मुलायम ॥

तरजीय बन्द ।

गुरु क्या चीज हम उसको न जाना । नहीं कोई साधु हम उसको न माना ॥
गुरु न आदमीका आदमी है । खुदा मुरशिद हम उसकोही पहिचाना ॥
हैं सब जुहला खबरक्या है खुदाकी । हैं आकिल हमवहम सबतें सयाना ॥
हुआ हैन हिन्दसामें कोई मारूफ । कोई कहलाव फिलसिफे जमाना ॥
कोई है डाक्टर आफ बार नामी । कोई है मास्टर आफ अस्टं दाना ॥
बहुत दुनियामें लकब मौसूफ । बसफ़े और कितने हैं निशाना ॥
हमारा ज्ञान सबके सर चढ़ा है । कि हमने इल्म अंगरेजी पढ़ा है ॥
मुअज्जिज उदहोंपर जब होके आवे । हुकम खुद खादियोंपर यों लगावे ॥
नहीं कोय मुसतन्द हो भड़कते । मेरे नज़दीक आने कोई न पावैं ॥
हुआ जब मगज पुर किब्रो मनीसे । न सूझे हक नज़र क्या इसको आ ॥
नहीं रब्बो रसूलो साधु गुरु क्या । नहीं कुछ देख नबीना बनावे ॥
हुआ दोज़हर जब यकजाय दिलमें । कुलुब खवानी व दौलत जो कहावे ॥
तो फिर क्योंकर न मुरदः होवे मर्दुम । निगह तब साधुगुरु हरगिज न आवैं ॥
हमारा ज्ञान सबके सिर चढ़ा है । कि हमने इल्म अंगरेजी पढ़ा है ॥
कोई है नेचरी कोई दिहरीया । कोई मन मौज अपनेमें लहरीया ॥
हमारी रह न आवे कोई रहज़न । कि हम हैं अपने चोरोंके फेरीया ॥
कि हम हुसियार और खुद फेल मुख्तार । डुबावें अपने दुश्मनको बदरिया ॥
मेरा दिल इल्म अंगरेजीसे रोशन । हमारी बहसमें न कोई ठहरिया ॥
कोई कूचा बकूचा लेकचरी है । कोई औरों नसायह पन्द करिया ॥
जबांदानी वमन्तिक सीख आजिज । हुआ हङ्कार कंसिरमें जोभरिया ॥
हमारा ज्ञान सबके सिर चढ़ा है । कि हमने इल्म अंगरेजी पढ़ा है ॥

२२ अ० मतोंकाविशेषविचार

पढ़ लिया हिन्दू इल्म अंगरेजी । भर गया जबकि इल्म अंगरेजी ॥
औबल अल्लाह नामको भूला । आ बसा जब कि इल्म अंगरेजी ॥
जब न अदलाह रहा कहाँ गुरु पीर । आ समा जब कि इल्म अंगरेजी ॥
नहीं गुरु पीर पेशवा नहीं रब्ब । घर किया जह्य कि इल्म अंगरेजी ॥
जब न रब्ब है तो साधु कहाँ आजिज । हक भला जबकि इल्म अंगरेजी ॥

अंग्रेजी कुतुब कित्सा जो मेरे नज़र आया ।
आगाज़ अल्लाह नामसे भी सो सब हज़र आया ॥
कोई न कहै राम नहीं गाड़ न यहबाह ।
बेसमझीहीमें सारी उमरका गुज़र आया ॥
अल्लाह जो किया तर्क तो दिल साफ़ कहाँहो ।
तनपरवरीको फेर तनासुखका घर आया ॥
इन्सानी व हैवानी हालतसे गुज़र कर ।
फिर जामः नबातात जमादात दर आवा ॥
गरदाब चौरासी यही दरियामें है आजिज ।
खागोता सद आदम तन यह फिर आया ॥

बैठ जा साधु सङ्ग़तमें । सरझुका जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥
तनो मन धनको अपने कर कुरबान । धर बना जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥
साधु रहबर हैं दीन दुनिया के । बखश ला जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥
जाके तू अपने अस्ल रूपको देख । इल्म पा जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥
जगमें ऐसा न दोस्त कोई आजिज । दरदरा जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥

कर दिया खार तूने ऐ कलियुग । दूरकी यार तूने ऐ कलियुग ॥
न बफ़ाही नहीं है खुश बुलकी । घर दिया नार तूने ऐ कलियुग ॥
नेकहै कोई और सबको क्या । बद बिकिरदार तूने ऐ कलियुग ॥
नहीं गुल है कहीं नहीं बुलबुल । की है पतझाड़ तूने ऐ कलियुग ॥
अब कहाँ मौसिमे बहारी है । भर दिया खार तूने ऐ कलियुग ॥
गुल नहीं है तू उड़ गई बुलबुल । बूम बैठा ऐ ऋतूने ऐ कलियुग ॥
दी भर सारे जगमें जागो ज़मन । सिम्तहर चार लूले ऐ कलियुग ॥
इक ज़हरदार जो हवा लाया । नाग फुंकार तूने ऐ कलियुग ॥
मुरदः सारे हुये कोई ज़िन्दा । दाब दर गार तूने ऐ कलियुग ॥
है रम्क जान बाकी आजिजके । कर दिये मुरदार तूने ऐ कलियुग ॥

यथा ।

यह धन विद्या पसारा केते दिन को । यह नौबत और नकारा केते दिनको ॥
यह दौलत जाहो-शौकत शानो हशमत । हुआ तेरा अजारा केते दिनको ॥
सिकन्दर हाथ खाली हो सुधारा । वह कैंसर और वारिद केते दिनको ॥
किधर वे जो किये दावै खुदाई । यह मोम और सङ्ग खारा केते दिनको ॥
बकैद तोहमात इन्प्रा बंधा । यह दुनिया दोस्त प्यारा केते दिनको ॥
गुजर जावेगी आजिज दीदनी सब । खयालो खाब सारा केते दिनको ॥

यथा- क्यों जिल्लन निकालता है नादों । दुनियामें बात है शादों ॥
ग्राफिल न हो अस्ल अपनी याद । हर शामो सिंहूर व बइमदादों ॥
खाब और ख्याल कुल आलम । हैवानो नाबत और जमादों ॥
आनन्द तो होवे सङ्ग सुलहा । कर तरक तू मेल बदनिहादों ॥
उम्मीद उससे रख तू आजिज । यकता है जो बखश दिल मुरादों ॥

यथा- आया यहां अज्ञान है, दुनियामें रोना पीटना ।

नहीं अस्ल अपना ध्यान है दुनियामें रोना पीटना ॥
गम और अलमका बहार है, कोई न बरखुरदार है ।
हसता तू क्या नादान है, दुनियामें रोना पीटना ॥
नाच और न कीबकी बोल क्या, नौबत नकारा ढोल क्या ।
आफ़ातकी घमसान है, दुनियामें रोना पीटना ॥
सर पर जो काल कलोलता, मगरूर हो क्या बोलता ॥
जाको अपने व आमान है, दुनियामें रोना पीटना ॥
महरिम नहीं बन बी के, गुरी है दिलमें शेखके ।
पूर दरद चारो खान है, दुनियामें रोना पीटना ॥
काजी मशाय बोलते, इसरार अल्लाह ोलते ।
अन्धा यह बे पहिचान है, दुनियामें रोना पीटना ॥
बेचूँ अलख अल्लाह है, जो कुलका क़िबले गाह है ।
इसको नहीं कोई जान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
दायम गुनह आलूद है, आना यहां क्या सूद है ।
हर सिम्त खींचोतान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
होली तमाशा राग है, सो हंस नहीं कोई काग है ।
आदमके नहीं शायान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
शबरोज मरता बैल है, मेहनत मशक्कत मैल है ॥

खाना तुझे एक नान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
साधुओंकी मुहब्बत नहिं किया, गादम न सो हैवाँ जिया ।
गुरु बात रख नहिं कान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
हक्का कबीरा यार हो, सब मञ्जिलोंके पार हो ।
तब पाओ अपना मकान है दुनियाँमें रोना पीटना ॥
जब तक यहाँ लोवास है, तबतक नहीं वह पास है ।
कर तर्क मल वह आन है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
सच्चेसे मिलने जाइये, तब आप सच हो जाइये ॥
दिनदोका तू मिहमान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥
मुरशिद हकीकी रहबरी, इसकी उम्मीद आजिज करी ।
सब साहबे सुलतान है, दुनियाँमें रोना पीटना ॥

मुखम्मस तर्जियाबन्द ।

है नहीं बिन्द और नहीं है नाद । सारे जिन्नो परी व आदमज़ाद ॥
आगये काबू कैल जो बेदाद । बोझने की बदी लिया शिर लाद ॥

ऐ फ़िरोतन तुम्हैं मुबारकबाद ।

नहीं कैसे सिकन्दरो बहराम । नहीं दारा रहा नहीं जिस्मजाम ॥
सब शहनशाह मर गये नाकाम । एगरीबे आजिज और दिलनाशाद ॥ऐ०
कहाँ भैरव गया कहाँ हनूमान् । कहाँ अरजुन व भीमसे बलवान् ॥
कहाँ हुकमा व दानये दौरान् । दिल शिकस्तः जिन्हैं खुदा दरयाद ॥ऐ०
कहाँ वे हैं जो परबतां तौलें । और फसाहतसे बोलियां बोलें ॥
कहाँ वे हैं जो रम्जको खोलें । कहा गढ़ लच्छू बाग है शद्वाद ॥ऐ०
नहीं जालिम रहा नहीं मजलूम । नहीं खुशबख्त और नहीं बदशूम ॥
नहीं बुलबुल रहा न ज़ाग और बूम । कहाँ हरनाकश और कहा पहलाद ॥
ऐ मेरे हिज्ज आ खबर लीजे । करम और फ़ज़ल अपना अब कीजे ॥
बखश मेरे गुनाहोंको दीजे । सुने आजिजका मेहरकर फरियाद ॥

ऐ फ़िरोतन तुम्हैं मुबारकबाद ।

मुखम्मस तर्जियाबन्द ।

आ गया यह, अजब ज़माना है । दुनियवी कुल कारखाना है ॥
अल्हे दुनिया वाहिदाना है । एक सा सबको कर दिया तूने ॥

मनुष्य मात्र के धर्म भारतीय मत

हाय कलियुग यह क्या किया तूने ॥

बापको मानता न बेटा है । माल मिलक न मुलक समेटा है ॥
सो न इन्सान् ोक घेटा है । दूरकी शरम और हया तूने ॥ हाय० ॥
गुरुको माने नहीं जो चेला है । साधु बिन फिरे अकेला है ॥
मतलब अपनेहीका ो भेला है । अपनी सूरतबना लियातूने ॥ हाय० ॥
कीचसे कीचको जो धोवैगा । साफ़ कपड़ा कभी न होवैगा ॥
करके मिहनत भी काम खोवैगा । दूरकर गुरु दिया मिया तूने ॥ हाय० ॥
गोशत खाते शराब पीते हैं । रोज़ो शब एशहीमें बीते हैं ॥
एक लमहा न हक़को चेतें हैं । भरे आबिदमें भी रेया तूने ॥ हाय० ॥
साधु गुरु सेवैगा तो पावे राह । नहीं तो जाने ऐन है चाह ॥
देख आजिज तबही तू क़िबले गाह । बदीके बीजको बोया तूने ॥

गज़ल—कुल सलातीन बन्दा इरमाँका । सब सअदात है हक़के फरमाँका ।
दिन बदिन भर गया इसीसे मगज़ । खायाकिरमानहशाहकिर माँका ॥
दायमुल्मर्ज लाहक़ आलम है । क्या खबर अपने अस्लदरमाँका ॥
जाने जिसको खुदा शफ़ी अपना । उसके पीछे खबर जोहरमाँका ॥
कौन आजिज तेरा खुदा व रसूल । किसको है भेद अस्ल उरफ़ाँका ॥

मुखम्मस तर्जियाबन्द ।

अहले दुनियाके, साधु घरजाये । भाव भक्तिकी बू नहीं पाये ॥
अकलो ईमान कालने खाये । देख यक दो ज़बान कर आये ॥

धर्म मरदा मू कान कर आये ॥

साधु जब दुनियवीके घरपर जा । उसको लाजिम है कहता बैठो आ ॥
जब नहीं खान पान खातिर पा । आक़बत उस गुमानकर आये ॥ धर्म० ॥
जब कि, साधूको देखै संसारी । उनसे नहि बोल बोलते प्यारी ॥
नहि तवाजा न इज़्ज़से यारी । गुनह इन सर अज़ान कर आये ॥ धर्म० ॥
धर्मकी बू जहाँ नहीं पाना । हरशिज इस दुनियबी न घर जाना ।
अन्न पानी न उनका फिर खाना । अमल ईमान चलान कर आये ॥ धर्म० ॥
यह हमेशा: से रस्म आया है । साधु सेवा सदा बताया है ॥
आजिज वह दङ्ग जहाँ न पाया है । देख वह दर ग़्लान कर आये ॥

धर्म मुरदा मू कान कर आये ।

झूलनासे निर्णय,

गजल ।

हुआ मगूरूर क्योंकर आन दिन चार । रहेगा तेरा शौकते शान दिन चार ॥
हुआ अन्धा ब मस्ती ऐश बइशरत । कमालो फ़ज़ल और बूहरहान दिनचार ॥
अकेला आया है जावै अकेला । मेरा और तेरा है घमसान दिनचार ॥
नहीं कोई रह फ़ना होवे गे लारेब । किसीका तो पकड़ दामान दिनचार ॥
पकड़ दामन तू साचे सद्गुरु आजिज । यह बे बीना न दस्तरखवान दिनचार ॥

गजल—जो कुछ कि, नजर आता है तेरे कुछ न रहेगा ।

महासूस ब मरगूब सगर धार बहैगा ॥

ताजो तख्त ब बख्त सो सब काल चक्करमें ।

फानी है ब मुरदार सभी कुछ चुछैगा ॥

भक्ति ब गरीबी है यही न्यामते दुनिया ।

सद्गुरुकी पनह आ नहिं तो काल आग डहैगा ॥

चौरासीकी योनिमें पडा बैठ ऊपर हो ।

यम जालिमकी इसमें बड़ी मार सहैगा ॥

आजिज होवें जो आजिज इस बहरके गरदाब ॥

बिन सद्गुरुके कौन तेरी बाँह गहैगा ॥

गजल ।

न सद्गुरु भक्ति जाना तूने अ सोस । न उसकी बात माना तूने अफ़सोस ॥

बहर जानिब वह कहता है ब आवाज़ । न अपना कान तानातूने अफ़सोस ॥

वह हर जानिब वह हर रूखसे पुकारें । न जाना मिहर बानातूने अ सोस ॥

भटक रह रास्तेसे फिरता किधरको । अमल बद मार खाना तूने अ सोस ॥

चला तू चाल है सद्गुरुके बर अक्स । किया सब कारखाना तूने अफ़सोस ॥

जो कहते २ ही आजिज थका वह । किया इस घर न थाना तूने अफ़सोस ॥

मुखम्मस तर्जिया बन्द ।

गुरुको भूलै खुदा तूझे भूले । जाके यमराज दर ऊपर झूलै ॥

गो कहूर बान तू कहूरबान वह । हा हो गये जाके आगमें पोखे ॥

गुरु मिहरबान तो मिहरबान वह । पाते न्यामत हैं लंगडे और लूले ॥

गुरुके वे मेहर दौलते ईमों गुरु । कत्ल करेको हाथियोँ होले ॥

गुरुकी पूजा बिना धर्म ईमान ॥

हो गया मुरदा इसमें शक मत जान ॥