कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
राजा लवण
मंत्र जप करनेकी विशेष रीतिको मुद्रा कहते हैं। मीन मछली खाना, मांस, सबप्रकारका मांस खाना, सबप्रकारकी सराबपीकर मस्त होना, विवाहिता अविवाहिता सब प्रकारकी स्त्रियोंके साथ भोग करना। यदि सहृदय भग एक समय पूजन करनेको मिल जावे तो ये लोग साक्षात् मोक्ष मानते हैं। इस धर्मके बारह भेद हैं। सब एकसे एक बड़े चढ़े हैं। इसके लोग बड़े आनन्द और उत्साह पूर्वक अपने घृणित और नीच कर्मोंको करते हुये मोक्ष मानते हैं। इस धर्ममें जाति पौत्रिका बिलकुल विचार नहीं है। ब्राह्मण, क्षत्री, भंगी, चमार, मोची आदि नीच ऊँच जाति सब एक साथही खाते हैं। अनन्त जीवधारियोंकी हत्या करते हैं।
दैवी और आसुरी सम्प्रदाय।
इस संसारमें दो देवताओंके धर्म प्रचलित हैं। संसारके सब धर्म इन्हींके अन्तर्गत हैं। एकका नाम दैवी धर्म है। इसके अधिष्ठाता विष्णु देव हैं। दूसरी सम्प्रदाय है जिसके प्रवर्तक शिव हैं। दैवी सम्प्रदायकोही श्रीसम्प्रदाय अथवा विष्णु सम्प्रदाय कहते हैं। आसुरी सम्प्रदायको शैवी वा शांकरी सम्प्रदाय बोलते हैं।
विष्णु सम्प्रदाय सत्गुणी धर्म और मुक्तिका मार्ग है। शिव सम्प्रदाय तमोगुणी धर्म और नरकका कारण है। येही दो देवते और इनके दोनों मार्ग, जीवोंके मुक्ति और बन्धनके कारण और द्वार हैं। विष्णुभक्त मुक्ति और स्वर्गके अधिकारी होते हैं; जैसे कि, ढरुव और प्रह्लाद अपने परिवार सहित स्वर्गको गये। विष्णु सम्प्रदायमें एकसे कितनोंका भला होता है, पर शिव सम्प्रदायसे सिवाय अशुभ और दुःखके दूसरा कुछ नहीं।
मुहम्मदी कहते हैं कि, मुहम्मद साबहके कलमा पढ़नेसे मुक्ति मिलती है, जो मुहम्मदी कलमा नहीं पढ़ता उसकी मुक्ति नहीं होती। जैसा कि, मुहम्मद साहबके माता पिता नरकको गये। क्योंकि, कलमा नहीं पढ़ते थे। जो कोई कलमा पढ़े तो उसपर किसीका अहसान ही क्या हो सकता है? क्योंकि, जब कलमा स्वयम् मुक्तिदायक है, जिससे कि, कलमा उत्पन्न हुआ स्वयम् उसके माता पिताको कलमाकी क्या आवश्यकता है? इससे प्रमाणित है कि, जब मुम्मद साहब अपने माता पिताको मुक्ति नहीं दे सके, तो दूसरोंको किस तरह दे सकेंगे।
कलियुगमें शंकर और मुहम्मद दोनों शिवके औतार हैं। एकने भारत-वर्षमें संन्यास धर्म चलाया, दूसरेने पश्चिमी देशोंमें इस्लाम धर्म प्रकट किया।
महादेव आसुरी सम्प्रदायके आचार्य हैं, उनके द्वारा मुक्ति नहीं मिल सकती। हाँ यदि कोई शंख भी पाप कर्मोंसे रहित हो, पुण्यमें प्रवेश कर, दैवी सम्प्रदायको धारण करे तो समय पाकर अवश्य मुक्तिका अधिकारी हो सकता है। नहीं तो, जबतक शिवका आसरा करेगा आवागमनमें रहेगा, प्रकाशका मार्ग नहीं प्राप्त कर सकेगा।
सिंहावलोकन।
संसारमें जितने धर्म (मजहब) हैं सबके प्रवर्तक शिव और विष्णु हैं। ये दोनों देवते निरञ्जनकी ओरसे संसारमें वेद और किताबको प्रचलित करने के लिये नियत किये गये हैं। येही दोनों ब्रह्माण्डोंका प्रबन्ध करते हैं, इनके साथ सहायतामें ब्रह्मा भी रहते हैं, पर ब्रह्माकी पूजा कहीं नहीं होती। क्योंकि, इनको आद्याका शाप हो चुका है। इन देवोंमें विष्णु महाराज श्रेष्ठ हैं, येही सब संसारके कर्ताके नामसे पूजे जाते हैं। यह बात मैं प्रथम सिद्धकर आया हूँ कि, भारतवासी प्रगटहो विष्णुको पूजते हैं। अन्य योरप आदि देशवालेभी जिसका पूजन करते हैं जिसको ईश्वर मानते हैं वह भी विष्णुकाही रूपान्तर है। अरबके लोगोंके आँखोंपर पक्षपातका पर्दा पड़ा है पर मैंने पर्दा उघाड़कर कह दिया है जिसको मानना हो माने, न मानना हो तो उसकी इच्छा। इन्हीं विष्णु भगवान्की संसारमें पूजा हो रही है, दूसरा कोई नहीं है।
जो आदमका खुदा था वही इब्राहीम और मूसा आदिकका खुदा था। इब्राहीमकी संतानमें चालीस सहस्र पँगम्बर हुए,। सब उसी एक खुदाकी भक्ति करते आये। मुहम्मदतक जो अन्तिम पँगम्बर हुये सब उसीकी साक्षी भरते आये।
कुरान्सूरे उमरान ८३ आ० ३ सि० ९ रु.
قُلْ آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ عَلَيْهِ وَأَنزَلَ عَلَيَّ الْكِتَابَ
इसका अर्थ—तू कह—हम ईमान लाये अल्लाहपर जो कुछ उत्तरा हम पर इब्राहीम इस्माईल, इसहाक, याकूब, तथा उसकी सन्तान पर जो कुछ मिला मूसा, ईसा और सब नबियोंको खुदाकी ओरसे, हम भिन्न नहीं करते उनमेंसे किसीको हम भी उसीकी आज्ञामें हैं।
इसी प्रकारसे सब मनुष्य उसी खुदाकी भक्ति करते हैं। कोई किसी प्रकारकी बुद्धि विद्या और युक्ति क्यों न खर्च करे पर इन तीनों देवतोंकी
अधीनतासे नहीं निकल सकता । इसमें कुछ भी संदेह नहीं कि, सारे संसारके लिये एकही ईश्वर है । ईश्वर और शास्त्र होनेपर भी भिन्न भिन्न मजहब व रीति क्यों हुई ? इसका कारण यही है कि, मनुष्य अपने यथार्थ मनुष्यत्वसे रहित हो रहे हैं, देखनेकोही मनुष्य हैं पर यथार्थमें मनुष्य नहीं हैं । यदि इनको अपने धर्मकी सुधि होती तो एक धर्मको छोड़ दूसरे धर्मको ग्रहण न करते । जब कि, सब धर्मोंका प्रवर्त्तक एकही आचार्य है तो दूसरे धर्मको धारण करने एवं एकको छोड़नेसे क्या लाभ ? लोगोंकी बुद्धिपर अन्धकार छा रहा है, जिससे अपने धर्मके आशयको न समझकर, एक दूसरेके साथ, लड़ते झगड़ते, वाद-विवाद करते और भला बुरा कहते हुए मरते मारते हैं ।
विशेषतः वे हिन्दू लोग जो किसी कारणसे मुसलमान हो जाते हैं, यदि उनसे पूछो कि, तुम मुसलमान क्यों हुये ? तो प्रगटमें तो वे बहुत बातें बताते और अपने अवगुणोंको छिपानेका यत्न करते हैं पर भीतर ही भीतर हृदयमें पछताते हैं । कोई कोई स्पष्टही कह देते हैं कि, अपने धर्मकी अनभिज्ञता के कारण हमने अपना धर्म छोड़ दिया, अब हिन्दू लोग मुझे अपने धर्ममें नहीं लेते ।
भवतारण ग्रन्थमें लिखा है कि, कबीर साहबका वचन है कि, पूर्व जन्मके बड़े पुण्य और शुभ कर्मोंके प्रतापसे उच्चकुलमें जन्म होता है सांसारिक वैभव सम्पन्न होता है । पूर्वजन्मके ही पुण्य प्रतापसे रूप यौवन और उत्तम कुल मिलते हैं, जितने धनी और राजा महाराजा अथवा उच्चपद पर स्थित हैं, सब उत्तम और श्रेष्ठ कुलकेही होते हैं । अतः ब्राह्मण, क्षत्रियादि जो उत्तम श्रेष्ठ जातिके हैं वे कैसे प्रतिष्ठाके पात्र हैं ? यहाँतक कि, यदि इन जातियोंमें कोई विशेष गुण भी न हो तो भी अपनी उत्तम जातिके कारण प्रतिष्ठाको प्राप्त कर लेते हैं । यह उत्तम कुलकी विशेषता और गुण हैं । इसी प्रकार मुसलमानोंमें भी कुलवान् सैयदोंकी सब सेवा और भक्ति करते हैं वरन् ईश्वर भी श्रेष्ठ कुलवानोंपर विशेष दया करता है । देखो तौरेतमें—इब्रानी उत्तम कुलके थे उनपर ईश्वरकी विशेष दया थी । जो हिन्दू मुसलमान हो जाते हैं, अथवा ईसाई धर्मको स्वीकार कर लेते हैं वे क्या प्राप्त करते हैं ? उच्चकुल और श्रेष्ठ स्थानसे भ्रष्ट हो नीचकुल और अधम स्थानको ग्रहण करते हैं, अन्तमें जब वे समझते हैं तब शोककर पश्चात्ताप करते हैं । जैसे कि, बादशाह दरिद्र हो जानेपर करता है वैसेही हिन्दू अपने धर्मको छोड़कर दूसरे धर्मरूपी दरिद्रताको स्वीकार करते हैं । कोई हिन्दू उच्च और श्रेष्ठ कुलका ईसाई अथवा मुसलमान नहीं होता वरन् आठ कारणोंसे कोई कोई अपने धर्मको छोड़ता है ।
मुहम्मद साहिबके मआराज
हिन्दुओंके मुसलमान होनेका कारण ।
१-अपने धर्मको न जानना । २-दरिद्रता अथवा लोभ । ३-विषयसे वासना की प्रबल कामना—उसमें खूब खुल खेलनेकी प्रबल इच्छा । ४-किसी स्त्रीकी आशक्ति । ५-उच्च पद अथवा मान बड़ाईकी इच्छा अथवा खुशामद । ६-विधर्मियोंकी विशेष संगति और उनका सहवास । ७-किसीके बहकाने और धोखा देनेसे जैसा कि, प्रायः ईसाई मिशनरी करते हैं । ८-संयोगन किसी हिन्दूका भूलसे ईसाई अथवा मुसलमानका पानी पी लेना हिन्दुओंका फिर अपनी जातिमें न मिलाना ।
यही आठ कारण हैं कि, हिन्दू अपने धर्मको छोड़कर ईसाई अथवा मुसलमान हो जाते हैं नहीं तो हिन्दू भी कभी अपने धर्मको नहीं छोड़ते ।
धर्म रक्षक ।
कबीर साहबने धर्मकी रक्षाके लिये तीन रक्षक नियत किये हैं । १ गुरु २ सन्त और ३ ग्रन्थ । जहां ये तीनों रक्षक वर्त्तमान होते हैं, वहां किसी प्रकारकी त्रुटि नहीं होती । जो इन तीनों रक्षकोंको छोड़ देगा, उनकी शरण न रहेगा, वह अवश्य धर्मसे पतित हो नीचगतिको प्राप्त होगा । उसको धर्म लाभ न होगा । इस कारण इन गुरु, सन्त और ग्रन्थ तीनोंकी प्रतिष्ठा करनी उचित है ।
प्रथम गुरुकी सेवा पूजासे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है दूसरे सन्त भी गुरुकीही मूर्ति हैं । तीसरे सबका मूल ग्रन्थ भ्रमकी टट्टी तोड़ने और सत्यपथको बतलानेवाला है । तीनों (गुरु, सन्त, ग्रन्थ) को एकरूप जानकर, तीनोंकी समभावसे सेवा और पूजा करना उचित है । क्योंकि, गुरु और संत बिना ग्रन्थका आशय मिलना कठिन है । ग्रन्थ बिना संत और गुरुका उपदेश करनेका दूसरा द्वारही नहीं है । ग्रंथोंकेही अर्थको विचारकर संत गुरुके पदको पहुँचते हैं, फिर उन्हीं ग्रन्थोंका उपदेश दूसरोंको सुनाते हैं । जो इन तीनोंमेंसे किसी एककाभी अनादर करेगा वह धर्मसे पतित हो नरकका अधिकारी होगा । इस समय भारतवासी इन तीनों धर्म रक्षकोंसे श्रद्धाहीन हो रहे हैं, नहीं तो अन्य धर्मियोंके आखेट क्यों बनें ? हिन्दू लोग धर्म ग्रंथों और धर्मपुस्तकों तथा संत और गुरुजनोंको छोड़ अन्य धर्मियोंके धर्म ग्रंथ तथा अन्य भाषाको बड़ी श्रद्धा और भक्तिसे पढ़ते हैं उन्हींके धर्म गुरुओंसे उपदेश लेते हैं तो हिन्दू धर्म क्यों न अवनति हो ईश्वर और मृत्यु दोनोंके भयको मुलाकर लोग अधर्ममें फँस गये धर्म छो बैठे ।
संसारसे भय और घृणा
हिन्दू धर्मकी दुर्दशा ।
संसारी अर्थात् गृहस्थाश्रमी फलदार वृक्षके समान हैं; जैसे फलदार वृक्षमें जब फूल फल लगते हैं उस समय नाना प्रकारके पक्षी आकर उस पर बासा लेते हुए कलोलें करते हैं; नाना प्रकारके मनोहर शब्द सुनाते हैं, जिसके सुननेसे बड़ा आनन्द प्राप्त होता है । जब वृक्ष फलदार नहीं होता, उसमें फूल फल नहीं लगते तो, उसपर काक, उलूक आदि आकर बासा लेते हैं । वेही अपनी कान फाड़नेवाली वाणी बोलते हैं, जिससे सुननेवालोंको बहुत बुरा लगता है । उससे घृणा उत्पन्न होती है । फिर वह वृक्ष काटने और जलानेहीके योग्य हो जाता है । ऐसेही गृहस्थाश्रमी जब संत और गुरुकी सेवा करते हैं तबतक भक्ति मुक्तिकी आशा होती है, नाना प्रकारके गुण उदारता सत्सङ्ग, दया, क्षमा आदि सब उनमें आकर स्थित होते हैं पर जब कृपणता और संसारी विषय भोगमें पड़कर अपना धर्म छोड़ बैठते हैं साधु गुरुकी सेवा छोड़कर सच्चे संतों और विद्वानोंकी अप्रतिष्ठा करने लगते हैं, उस समय पाश्र्वताको प्राप्त हो, नाना प्रकारके पाखण्डोंको धारणकर, नर्कके अधिकारी होते हैं ।
मुसलमानोंने बहुत अत्याचार और अन्यायसे हिंदुओंको मुसलमान बना लिया । जिन्होंने मुसलमान होना अस्वीकार किया, वे मार डाले गये, जो अपने मृत्युसे डरा वह मुसलमान हो गया पर तो भी हृदयसे अपने धर्मकाही प्रेमी रहा । क्योंकि जो, लोग मुसलमान हो गये उनकी सन्तान अद्यापि इस बातका स्मरण रखती है कि, हमारे पूर्वज क्षत्रिय, ब्राह्मण अथवा अमुक हिन्दू जातिके थे; जैसे किसी राजा और बादशाही सन्तान याद रखती है कि, हमारे पूर्वज राजा अथवा बादशाह थे ।
समस्त पृथ्वीभरमें हिन्दू जाति सबसे श्रेष्ठ और प्रतिष्ठित जाति है । भारतवर्ष सब देशोंका शिरोमणि है । भारतवर्ष और हिन्दुओंसेही समस्त, संसारमें धर्मका नियम फैलता है । बड़े बड़े सिद्ध महात्मा, ऋषि मुनि, औरतार तत्वज्ञ आदिका प्रागट्ठ यहाँही होता है । यहाँकेही ऋषि, मुनि, विद्वान् सब संसारके लोगोंको शिक्षा देते, लौकिक पारलौकिक मार्ग बतलाते हैं । इस देशका नाम हिन्दुस्थान है, अन्य देशोंको म्लेच्छ स्थान कहते हैं, क्योंकि, वर्णाश्रम, जाति आदिका सर्वोच्च विचार और विभाग इसी देशमें है, दूसरे देशमें नहीं है । वर्णाश्रमका विवेक और विभाग ऐसा उच्च और सर्वोत्कृष्ट सिद्धान्त है कि, जिसके द्वारा अपने वर्ण आश्रमका कर्तव्य शास्त्रानुसार करता हुआ मनुष्य शीघ्रही मुक्तिपथको पा लेता है । भारतवासी अपने धर्मके ऐसे प्रेमी हैं कि,
भर जाना तो इन्हें स्वीकार है पर अपना धर्म छोड़ना स्वीकार नहीं। इसका प्रमाण मुसलमानी राज्यके इतिहासोंसे मिल सकता है। क्या हुआ? यदि कुछ डरपोक, भीरु अथवा लोभी और कामियोंने हिन्दूधर्मको छोड़ दूसरा धर्म स्वीकार कर लिया। जो हिन्दू धर्मको छोड़, सर्वोत्कृष्ट हिन्दू धर्मके नियमोंको त्याग कर देता है वह उच्च अथवा श्रेष्ठ नहीं वरन् नीच और अज्ञानी समझने योग्य है।
हिन्दू धर्मकी श्रेष्ठता।
सालहानः सिफात हिन्दू हैं। नेकि'यो'की बरात हिन्दू हैं॥
जितने अक्'वाम हैं जमी'के ऊपर। सबमें यह खूब जात हिन्दू हैं॥
सम'र साब'का अमल' अपने। अस'लकी नक़लिया'त हिन्दू हैं॥
जब लताफ़त'से यह क'सीफ़ हुआ। आदिका शब्दोयात हिन्दू हैं॥
जितनी हैं धातु' इस जमी'के ऊपर। उमदासे उम्दः धातु हिन्दू हैं॥
याद हों हस'नः फेल दर'स जिस'को। कर सकू'न जिन समात हिन्दू हैं॥
यह जमीनपर दया धरम मूरत। जुहू'द व तक्'वा कना'त हिन्दू हैं॥
है हयात—अब'दी सम'र जिसका। उस शिबि'र डाल पात हिन्दू हैं॥
जाके जिस घरमें फिर नही खौ'। उसकेही मनजिला'त हिन्दू हैं॥
यही गुरु पीर सारे दु'नियाकं। सोई बाप और मातु हिन्दू हैं॥
बन्द'गी और तिहा'रत व तक्वा। मुकिअतके मौजिबा'त हिन्दू हैं॥
हिन्द'का कह कबीर मक्ति मुका'म। शिक'न मुशकि'लात हिन्दू हैं॥
नुकतः वा'रीक अ'कल जिनकी रसा'। मा'दिने म'दरकात हिन्दू हैं॥
जिसके साबि'त हैं धर्म और ईमान। काज़ी दीन मआमलात हिन्दू हैं॥
धरके तन जिसनेकी अमल अच्छे। वख्तखु'श रब्बदा'त हिन्दू हैं॥
है न वह व'स्फ़ और अबिन आद'म। हा'दी रा'हन जाता हिन्दू हैं॥
हा'ल मा'जी ज़माना मुस्तक'ब'ल। ना'ज़रीन कु'ल नु'कात हिन्दू हैं॥
हिन्दू होकर न ऐव'के रुख'कर। मुसतहक़ हक'र सिला'त हिन्दू हैं।
१ सदाचारी, २ पुण्य, ३ जातियाँ, ४ फल, परिणाम, ५ पूर्वजन्मका, ६ कर्म, ७ जैसैका तँसा, ८ छाया, ९ सूक्ष्मता, १० स्थूल, ११ रत्न, १२ शुभकर्म सदाचार, १३ शिक्षा, १४ जिसका, १५ स्थिति, १६ तप, १७ संयम, १८ संतोष, १९ सदाकी जिन्दगी, अमरता, २० फल। २१ वृक्ष २२ भय, २३ विश्राम, २४ संसार, २५ भक्ति, २६ शौच, शुद्धि, २७ कारण २८ भारतवर्ष, २९ स्थान, ३० नष्ट करनेवाला, ३१ कठिनता, विपत्ति, ३२ सारभेद, ३३ बुद्धि, ३४ पहुँची हुई, ३५ खानि, ३६ भेदसार, ३७ स्थित, ३८ भाग्यमान, ३९ ईश्वरकी दैन, ४० गुण, ४१ मनुष्य, ४२ पथदर्शक, ४३ मुक्ति मार्ग, ४४ वर्तमानकाल, ४५ भूतकाल, ४६ भविष्यत्काल, ४७ देखने वाले, ४८ सर्व, ४९ भेद, ५० दोष, ५१ सन्मुख, ५२ अधिकारी, ५३ स्वत्व,
बे ख'ब सारेको खब'र देते । कुत्र अ'कशफुल्लोगात हिन्दू हैं ॥
जाने न और अपने अ'स्ल से वस्ल । पाते सो दाव घात हिन्दू हैं ॥
औरकी अकल है न ऐसी र'सा । दीन दुनी मवत्रिसात हिन्दू हैं ॥
बे ख'बर सारे इसम'आजमसे । नाम मुअल्लिममें क'रात हिन्दू हैं ॥
नफसको मारकर मिलावें जो गर्द । बरी' अज तोह'मात हिन्दू हैं ॥
जन्म साबिकमेंकी जो ऐसी अमल । ह'सनःके हासि'लात हिन्दू हैं ॥
साध गुरु सेवकर भजन सुमिरन । देते खुम'स और जु'कात हिन्दू हैं ॥
वे ख'बर कौम सब जमींके ऊपर । वाकिफ़ अज वार'दात हिन्दू हैं ॥
होता हिन्दू है खुश'नसीब आजिज । धरते यम सर पैलात हिन्दू हैं ॥
प्राचीन समयमें भारतवर्ष, बड़ा प्रतापी और सर्व सम्पत्ति सम्पन्न देश था । इसके क्षत्रिय शूर बीरोंसे संसार भरके यीद्धा भय खाते हुए इनका लोहा मानते थे । किसीकी समर्थ नहीं थी कि, भारतपर आक्रमण कर सके । श्री महाराजा रामचन्द्रजीके समयमे बरबर देशके म्लेच्छोंने एका एक करके भारत पर आक्रमण किया था पर महाराजाने मार भगाया । इसीप्रकार अनेकबार विदेशियोंने इस पवित्र भूमिपर आक्रमण किया पर कभी सफलताका मुंह नहीं देखा ।
मुसलमानोंके अत्याचार ।
अढाई सहस्र वर्षसे देशके भाग्यने पलटा खाया, सिकन्दरसे लेकर महमूद गजनबी तक अनेक म्लेच्छ राजाओंने आक्रमण किया, क्रमशः मुसलमानोंका राज्य हो गया, मुसलमान बादशाहोंने भारतवासियोंपर बहुत अत्याचार किया, आलमगीर, औरंगजेब ( आदिकोने लाखों हिन्दुओंका वध किया । इनके धर्म-धर्मपुस्तकों धर्मस्थानों तथा मन्दिरोंपर ऐसा अत्याचार किया, जिसके वर्णनसे मनुष्यके रोम खड़े होते हैं । इसके अत्याचारसे लाखों हिन्दुओंने आत्महत्या की पर धर्म न छोड़ा ।
हिन्दुओंकी दृढता—विचारनेकी बात है कि, इन लोगोंने हिंदुओंको इमानदार बनाया कि, वे इमान ? वे स्वयम् कैसे थे ? जो लोग हिन्दुओंको पुण्यात्मा और इमानदार बनाना चाहते थे अथवा चाहते हैं वे स्वयम् अपनी ओर
१ अचेत, २ चेत, ३ भेदोंका कोश अर्थात् सारभेद जाननेवाला, ४ असल जाननेवाला, ५ असल, ६ पहुँचा हुआ, ७ सार नाम, ८ ईश्वरी भेदके शिक्षक । ९ विषयासक्त मन, १० रहित, ११ दोष, अवगुण, १२ उत्तम प्रशंसनीय, १३ प्राप्त करनेवाले, १४ ईश्वरार्पण दान पुण्य, १५ अपने उपाजित धनमेंसे ईश्वरार्थ गुरु आदिको देना, सार भेद, १६ भाग्यवान ।
दृष्टि करके देखें कि, क्या कमाई कर गये तथा करते हैं। म्लेच्छ भला हिन्दुओंको क्या मुक्तिमार्ग बतलावेंगे? स्वयम् तो अन्धकारमें फँसे रहकर सांसारिक तापोंसे तप रहे हैं; दूसरोंको क्या मार्ग बतावेंगे? इन म्लेच्छोंकी क्या सामर्थ्य कि, हिन्दुओंको अपने धर्मसे विचलित कर सके (नीच जातियों, नीच बुद्धिओंकी बात नहीं है।)
हकीक़ तराय।
अच्छे और सच्चे हिन्दुओंने जान तो दे दी पर कभी म्लेच्छोंके धर्मको शब्दोंसे भी स्वीकार नहीं किया। इस पर यह दृष्टांत हकीक़तराय नामक क्षत्रिय बालकका लिखता हूँ। जिससे पाठकगणोंको हिन्दुओंकी धर्म श्रद्धा और दृढ़ता प्रगट हो जाय। हकीक़तराय जातिके क्षत्रिय थे, इनका जन्म १७९१ सम्बत् वि० में आगरा शहरमें हुआ था। इनके पिता धनवान् और साहसी पुरुष थे। किसी कारण इनके पिता इनको साथ लिये हुये पंजाब देशके स्थाल कोट नगर जा रहे। हकीक़तरायकी ७ वर्षकी अवस्था हुई तो इनके पिताने एक मकतबमें विद्या अभ्यासके लिये बैठा दिया। हकीक़तराय दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करते हुये अपनी आयुके बारहवें वर्षमें पहुँचे। नित्य मुसलमान तालिब इल्मों (विद्यार्थियोंके) साथ वाद विवाद हुआ करता था, कभी कभी धार्मिकविषय भी छिड़ जाते थे। एक दिन वाद विवादके बीचमें ही एक मुसलमान लड़केने ज्वालामाईको गाली दी। हकीक़ तरायसे अपनी पूज्य देवीकी निन्दा सुनकर सहन नहीं होसका, उसने भी बीबी फ़ात्माको गाली दी। उस मकतबका शिक्षक मुसलमान था। मुसलमान विद्यार्थियोंने जाकर उससे कहा कि, हकीक़तराय बीबी फ़ात्माको गाली दी है। वह विद्यार्थियोंको लेकर काज़ीके निकट गया। हकीक़तरायकी बहुत शिकायत करके बीबी फ़ात्माको गाली देनेका समाचार कहा। काज़ीने बहुतसे मुल्लोंके साथ मिलकर यह निर्णय किया कि, हकीक़ तरायने पैगम्बर साहबकी पैंटी, बीबी फ़ात्माको गाली दी है, इस कारण यह प्राण दण्डके योग्य है। फिर यह मुकदमा नब्बाब खान बहादुर नामक लाहौरके शासकके पास पहुँचा। नब्बाबके सन्मुख हकीक़तरायने स्पष्ट कहा कि, पहले मुसलमान विद्यार्थियोंने ज्वालामाईको गाली दी तब मैंने पीछे कहा। नब्बाबने चाहा कि, बालक हकीक़तराय न मारा जाय, किसी प्रकार बच जावे पर दुष्ट काज़ी और मुल्लाओंने अपनी बड़ी भारी भीड़ एकट्ठी की, सबने मिलकर नब्बाबसे कहा कि, यदि तुम इस बालकका पक्ष करोगे तो हमलोग बादशाहसे नालिश करेंगे। काज़ियोंकी दुष्टता देख नब्बाब बहुत विवश और दुःखी हुआ।
नव्वाबने पूछा इसके बचनेका कोई उपाय है या नहीं ? काजी मुल्लाओंने कहा कि, यदि यह बालक मुसलमान हो जाये तो बच सकता है । नव्वाबने हकीक़त-रायको गोदमें बैठा लिया । कहा कि, अब तू मेरा बेटा है, यदि तू मुसलमान हो जायेगा तो तेरेको अपना राज्य दे दूंगा । हकीक़तरायने साफ़ २ उत्तर दिया कि, मैं सांसारिक धन दौलत नहीं चाहता, मैं अपना धर्म नहीं छोड़ूंगा । हकीक़त-रायके माता पिताने भी समझाया कि, बेटा ! तू मुसलमान होना स्वीकार कर ले, तेरी जान बच जावेगी । हकीक़तरायने अपने माता पिताको बहुत समझाया कहा कि यह देह और संसार सभी नाशमान हैं, एक दिन सब नष्ट हो जावेंगे, किस दिन और किस सुखके लिये अपना धर्म छोड़ूँ ? माता पिता पुत्रके ज्ञान विवेकको देखकर कुछ विशेष नहीं कह सके । नव्वाबसे कहा कि, उसके तुल्य सोना चाँदी मुझसे लेलो इसकी जान छोड़ दो पर दुष्ट काजियों और मुल्लाओंने न माना । नव्वाबने हुकुम दिया कि, पहले इस लड़केके कोड़े मारो, छुरा चुभाओ, तलवार दिखाओ । यदि भयसे मुसलमान हो जावे तो अच्छी बात है । बधिकने वैसाही किया । हकीक़तरायको बहुत कष्ट और दुःख हुआ । पर बाहरे बहादुर ! ! ! ज़रा भी कष्टकी परवाह नहीं की । शरीर और सब संसार तथा मृत्युको धर्मकी अपेक्षा तुच्छ जाना । अन्तमें जब बहुत कष्ट देनेपर भी हकीक़तरायने मुसलमान होना स्वीकार नहीं किया तो बधिकको बध करनेकी आज्ञा हुई । बधिक तलवार लेकर हकीक़तरायके निकट गया उनकी सुन्दरता और कांतिको देखकर आशक्त हो गया, चित्त मोहवश ऐसा निर्बल होगया कि, तलवार हाथसे गिर पड़ी, स्वयम् रोने लगा वरन् गिर पड़ा । हकी तरायने बधिकको खूब समझाया कि, तू मत रोओ उठ खड़े हो, मेरा शिर काट लो तू स्वर्गको जायगा और ये सब काजी मुल्ला नरकको जायेंगे । अब यहाँसे मुसलमानो राज्य नष्ट हो जावेगा, सिकखोंका राज्य होगा ; तू किसी बातकी चिंता मतकर, मोहको त्याग मेरा शिर काटले । उस समय हकीक़तरायका अन्तःकरण प्रकाशित हो गया था । भविष्य कहने लगे । क्यों न हो ? जो अपने धर्मपर दृढ़ विश्वास रखता है, संसारसे धर्मको अच्छा समझता है, दैवी गुणोंको आसुरी गुणोंको अपेक्षा प्रेमकी दृष्टिसे देखता है, ईश्वरपर सच्ची श्रद्धा रखता है, उसको क्या दुर्लभ है ? बधिकने तलवार मारी, हकीक़तरायका शिर धड़से अलग जा गिरा । जिस समय बधिकने तलवार चलाई, उस समय लाहौर में अंधेरा छा गया, भूकम्प आया, नगरभरमें शोक फैल गया, सबके सब बालकसे लेकर बृद्ध तक रोने और हाथ मारने लगे । हकीक़तरायकी मृतक देहको नदी
संसारियोंको उपदेश
किनारे ले जाकर उसकी अन्तिम क्रिया की गई, वहाँ उनकी समाधि बनी, साल साल मेला होने लग गया। अब भी मेला होता है, सहस्रों मनुष्य इकट्ठा होते हैं। हकीकतरायके गीत पंजाबमें गाये जाते हैं।
जिसका धर्म वर्त्तमान है उसका सब कुछ है, उसीके लिये सब सुख है, वही लोक परलोकका राजा है। धर्मसे बढ़कर लोक परलोकमें दूसरा कोई पदार्थ नहीं। जिसने अपने धर्मको बचाया, उसके लिये जीवनकी आशा त्याग दी, वही सफल काम हुआ।
अनन्तर हकीकतरायके माता पिता, उनके फूल लेकर, गंगा प्रवाह कराने हरिद्वार गये। वहाँसे लौटनेपर दिल्ली बादशाही दरबारमें पहुँचे। बादशाहसे अपने पुत्रके ऊपर अन्याय और उसके व्यर्थ बधका न्याय चाहा। बादशाहने रातको हकीकतरायको यह कहते हुये स्वप्नमें देखा कि, यदि मेरा न्याय न करोगे तो तुम्हारा गला घोंटकर मार डालूंगा। बादशाह स्वप्न देखकर बहुत भयभीत हुआ। सवेरा होतेही हकीकतरायके माता पिताको बुलाकर सब हाल पूछा। नब्बाब खान बहादुरसे कैंफ़ियत मोंगी, नब्बाबने स्पष्ट उत्तर दे दिया कि, मैं इस बातमें निरपराध हूँ, मेरा तनिक भी दोष नहीं। काज़ी और मुल्लाओंने बलपूर्वक यह काम करवाया है। काज़ी और मुल्ला बुलाये गये, खूब जाँच हो जानेपर, जिन जिन काज़ी और मुल्लाओंने बधकी सम्मति दी थी, उनको एक एक नौकापर चढ़ाकर जमुनामें डुबवा दिया।
जैसे हकीकत रायने बधिकसे कहा था कि, तू स्वर्गको जायगा, उसी प्रकार ईसाके साथ दो चोर सलीनपर चढ़े थे, एक तो हजरतको गाली देता था, दूसरा कहता था ऐ ईसा! तू मेरे ऊपर दया करना, उस समय ईसाने कहा, था कि, तू स्वर्गको जावेगा।
गुरु गोविन्दसिंह गुरु तेगबहादुरके साथ भी ऐसाही हुआ था। गुरु गोविन्दसिंहके दो पुत्र तो युद्धमें मारे गये थे, शेष जो छोटे दो थे उनको लेकर उनकी दादी भागी, एक ब्राह्मणके घरमें शरण ली, जो बहुत दिनोंसे गुरु गोविन्दसिंहकेही नाजसे पलता हुआ सुख भोग रहा था। उस निमकहराम बेइमान ब्राह्मणने दोनों बच्चोंको मुसलमानोंसे पकड़वा दिया। उस बेइमान नीच ब्राह्मणने लोभवश हो ऐसी कृतघ्नता और पाप किया कि, जिसके तुल्य दूसरा कोई पाप नहीं हो सकता। मुसलमानोंने दोनों लड़कोंको पाया, जिनमेंसे एक तो सात वर्षका था दूसरा पांच वर्षका था। कहा कि, तुम मुसलमान हो जाओ
दृष्टान्त
नहीं तो तुम्हारी गर्दन काटी जावेगी । उसने स्पष्ट उत्तर दिया कि, हम अपना धर्म छोड़के मुसलमान न होंगे । मुसलमानोंने बहुत भय, आशा तथा लोभ दिखाया पर दोनोंमेंसे किसीने भी स्वीकार नहीं किया । अपना वध होना स्वीकार किया पर किसी प्रकार अपना धर्म छोड़ना नहीं चाहा बरन् मुसलमान होनेसे महान् घृणा प्रगट की । जब किसी प्रकार उन बच्चोंने नहीं माना तो निर्दयी मुसलमानोंने बिचारे निष्पाप बालकोंको, सरहिन्दकी दीवारोंमें चुनकर मार डाला । यह समाचार सुनकर मालियर कोटलेके नब्बाबने बहुत शोक किया । नब्बाबके सिवा जिन २ लोगोंने शोक प्रगट किया, गुरु गोविन्दसिंहने उनको आशिर्वाद दिया कहा कि, तुम्हारी जड़ हरी रहेगी । यह सम्बत् १७६१ विक्रमीकी बात है ।
मुख्बा ।
हकीकत रायका सिर काट किस पर । न आये दर्द दिलमें ऐसी जिसपर ॥
किया जल्लादने भी रहम जिसपर । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
पड़े कोड़े छुरा उसको चुभाया । किया तूने जो तेरे दिलको भाया ॥
ज़रा उसने न दिल अपना डुलाया । कहो रोवे फ़लमा क्यों कर न उसपर ॥
तमा कितने दिखा मासूम बच्चे । न मुतहूरिक हुये ईमान सच्चे ॥
हुये हरगिज न लोभ और डरसे कच्चे । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
जब आया हिन्दमें महमूद ग़ज़नी । किया उसने जो था उसको न करनी ॥
दया और धर्मको दिलमें धरनी । कहो रावे लक क्यों कर न उसपर ॥
हुआ जब सरबुलन्द औरंग औरंग । हुआ आलममें तब कुछ औरही ढंग ॥
किया हिन्दूको तब उसने बहुत तंग । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
शहर दिल्लीमें नादिरशाह आया । तमासा अपना सो सादिर दिखाया ॥
सर अम्बार हिन्दूका लगाया । कहो रोवे लक क्योंकर न उसपर ॥
कहूँ क्योंकर गुनह शाहो गदाका । यही है धरम इस नई सम्प्रदाका ॥
न आजिज खौफ़ रहम उसमें खुदाका । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
मुसलमानोंके अत्याचार और निर्दयताको पहलेसेही कबीर साहबने जान कर, मक्कामें प्रगट हो, मुहम्मदको मिथ्या धर्म द्वेष निरर्थक रक्तपातसे बहुत मना किया सत्य पुरुषका दर्शन कराया । मुहम्मद साहब तो, कबीर साहबका उपदेश मानकर, इस अन्यायसे रहित हुये पर उनके अनुयायियोंने नहीं छोड़ा ।
सच्चे हिन्दू और मुसलमान
मुसलमानो हदीस, तारिख मुहम्मदी तथा मौलवी अमाउद्दीन कृत तालीम मुहम्मदीमें लिखा है कि, मुसलमान लोग पहले मदिरा पीते और शूकर-का मांस खाते थे। मद्य पीकर निमाज पढ़ना विधि थी, पीछे हराम (निषेध) हो गया। इसी प्रकार बलपूर्वक मुसलमान करना भी हराम हो गया। मुसलमानोंने दो बातोंका तो हराम मान लिया पर तीसरी बात नहीं मानी। कबीर साहबने कहा है कि—
बाँधे भक्ति न होयरे भाई । बाँधे करे सो करम कसाई ।
जो लोग बलपूर्वक मुसलमान करते हैं वे स्वयम् मुसलमान नहीं हैं जो परवश मुसलमान हुये हैं वे भी मुसलमान नहीं। जो यथार्थमें मुसलमान हैं वे न तो बलपूर्वक मुसलमान करते हैं, न होते हैं।
जो गुण मने हिन्दुओंके ऊपर लिखा है, जिसमें वे गुण होंवे वे ही हिन्दू हैं। देखो हकीकतराय को मुसलमानोंने कितना दुःख दिया, प्राण तक हरण कर लिया पर वीर क्षत्रिय बालकने अपनी धर्म दृढ़ता न छोड़ी। ऐसेही पुरुष हिन्दुओंमें परिगणित होनेके योग्य हैं। जो लोग मुसलमान अथवा ईसाई होगये वे प्रथमही हिन्दू नहीं थे, न मुसलमान अथवा ईसाई, नाम धरानेपर मुसलमान अथवा ईसाई हुये। जैसे गदहेने व्याघ्रका चमड़ा ओढ़ लिया तो क्या? बैलका ओढ़ लिया तो क्या? असलमें वह गदहा ही है। वैसे ऐसे अव्यवस्थित चित्त और धर्मवाले लोगोंका कुछ भी धर्म नहीं होता। उनको धर्म बदलते, गंगादाससे यमुनादास, यमुनादाससे गोमती दास बनते कुछ भी विलम्ब नहीं है। कोई किसी धर्ममें क्यों न हो पर अपने सदाचार और पुण्यसे ही उसका कल्याण होगा क्योंकि ईश्वर एक और सम है, उसकी आज्ञा उलंघन करना पाप और नियमको न छोड़ना पुण्य है। यदि ईश्वरके नियमके विरुद्ध चलेगा तो पापी होकर दण्डका भागी होगा। सदाचरण (ईश्वरी नियम) को ही पूर्णता पर पहुँचाना सर्व धर्मोंका मूल है। जो लोग नीच घृणित मादक पदार्थ और मांस आदि हिंसा प्राप्त पदार्थोंको ग्रहण करते हैं वे भी हिन्दू नहीं हैं। केवल हिन्दुओं के ही लिये यह बात नहीं बरन् जो ईसाई अथवा मुसलमान हैं, इञ्जील तथा कुरानकी आज्ञाओं पर नहीं चलते वे ईसाई या मुसलमान नहीं हो सकते क्योंकि, मुखसे कहना और बात है, मानना और उसके ऊपर चलना और बात है। कोई क्यों न हो? जिनका जो धर्म है, वह धर्म ईश्वरी नियम (प्रकृति) के विरुद्ध न हो, उसको भली प्रकार बर्तनेसे कल्याण प्राप्त करेगा। प्रकाश और श्रेष्ठता सत्य-
पुरुषको प्रसन्न करनेका द्वार है, सदाचरणसे मिलता है सत्यपुरुषकी कृपासे मुक्ति होती है । परमात्माको सदाचार स्वीकार है दुराचारसे घृणा है ।
जिसने इस संसारमें आग लगाई उसीमें बुझाने की भी सामर्थ्य है । जिसने कालपुरुषको प्रगटकर उसको राज्य दे दिया वही इससे बचा भी सकता है । जिसने सब प्रपंच प्रगट किया वही इसको शांत भी कर सकता है, दूसरेकी क्या शक्ति है कि, कुछ भी कर सके । मनुष्यको चाहिये कि, उसीकी दया और कृपाका ध्यान रखे, उसीके कृपापात्र बननेका प्रयत्न करे, दूसरा कोई उपाय नहीं है, सब युक्तियाँ निरर्थक हैं । केवल उसीकी कृपादृष्टि प्राप्त करनी चाहिये, दूसरा कुछ भी प्राप्त करना नहीं है ।
हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और यहूदी लोगोंसे प्रार्थना ।
प्रथम हिन्दू महाशयोंसे यह विनय है कि, जिन जिन बातोंपर उनका विश्वास और भरोसा है, जिनमें उनकी स्थिति है, वे क्या हैं ? उसमें कुछ स्थिरता है अथवा नहीं ? निर्गुण और सगुण दोनों ही तुच्छ हैं । क्योंकि, निर्गुण (जिसमें कुछ गुण नहीं) कर्ता नहीं हो सकता सगुण नाशमान तथा निर्मूल है । जब ये दोनों निर्गुण और सगुण अव्यवस्थित नाशमान हैं तो इससे लाभ की क्या आशा हो सकती है ? फिर लोग कहते हैं । ब्रह्म, जीव और माया तीनों एक ही हैं, तीनोंका एक ही मूल है । वे केवल जीवकी अज्ञानतासे तीन भासते हैं नहीं तो यथार्थमें एक ही हैं । ज्ञानकी दशामें अवाच्य पद है कुछ कहा सुना नहीं जाता । जो कुछ मन बुद्धिका गोचर है सो सब भ्रम माया है ।
तत्वमसिके तीनों पद भ्रम और धोखा हैं । भ्रम और धोखा ही इन्द्रिय गोचर होता है । भ्रमको ग्रहण करनेसे भ्रम ही मिलता है, सत्यको धारण करनेसे सत्यपदकी प्राप्ति होती है । जो सत्यकी ओर झुकेगा वह अवश्य सत्यमें ही प्राप्त होगा ।
मुसलमान महाशयोंसे कहना है कि, आप लोग कहते हैं कि, “जो मुहम्मदी कलमा पढ़नेसे मुक्ति हो जायेगी, वह विहिश्रतको जावेगा, शेष सब नकको ।” मुसलमान अपने भिन्न सब धर्मवालोंको काफ़िर कहते हैं । यदि मुसलमान होकर अपनेसे कुफ़पर ध्यान देते तो कभी किसीको किसी प्रकार दुःख नहीं देते, अत्याचार और अन्यान्यको निकट न फटकने देते, पर पक्षपात, धर्म, द्वेष, ऐसी मूर्खता है कि, जिससे मनुष्य क्या २ पाप ओर बुराई नहीं कर सकता ? जिस कलमापर उनका विश्वास है, जिसको अपने धर्म और ईमानका मूल समझते हैं वह क्या है ? केवल भ्रम और धोखा है । मूर्खोंके ठगनेकी एक युक्ति है ।
पुरुषसूक्तका सिद्धान्त
इसमें शुद्ध करने और मुक्ति देनेकी शक्ति तो क्या होनी थी, इससे एक अद्वैत परमात्माकी स्थितिही प्रकट नहीं होती बरन् अनेक अर्थात् माया ही का विवरण प्रगट होता है।
(हल्लाह लाइला) नहीं अल्लाह मगर अल्लाह इससे स्पष्ट प्रगट होता है कि, यह कलमों किसी विशेष ईश्वरको वर्णन करता है, जैसा मैं प्रथम ही लिख आया हूँ कि, मूसा और इब्राहीम आदिका एक ही खुदा था। वही अब भी है और मूसाके खुदाकी अनेकता मैं भलीप्रकारसे प्रथमही सिद्ध कर आया, जैसा यह कलमा भ्रमिक और कल्पित है वैसे ही इसका परिणाम भी होगा क्योंकि जैसा मूल होता है वैसे ही डाल, पात, फूल, फल होते हैं। विहिस्त वगैरह की, जो आशा कुरान आदि दिलाते हैं वे मिथ्या कल्पित रोचक और भयानक वाक्योंमें वर्णित हैं। जो स्वयम् मिथ्या हो उसमें कोई कैसे जाकर रह सकता है।
जैसे हिन्दुओंका निर्गुण है वैसे ही मुसलमानोंका कलमा है। कलमा कहता है नहीं खुदा मगर है खुदा। प्रथम अस्वीकार फिर स्वीकार। विचार करनेकी बात है कि, ऐसा कलमा जिसका कि, कुछ ठिकाना ही नहीं किस प्रकार मुक्तिदाता बन सकता है? ऐसे भ्रमके कलमें पर विश्वास करके सब मुसलमान लोग धोखेमें बहे जाते हैं। ये जो कुछ रोजा निमाज तकबा तिहारत जप तप करते हैं सब उसी विहिस्तके लिये करते हैं जिसका कुछ ठिकाना ही नहीं। यदि मान भी लिया जावे तो भी उनके विहिस्तसे घृणा उत्पन्न होती है क्योंकि ऐसा बुद्धिहीन कौन है? जो प्रथम तो विषय वासना त्यागनेके लिये कठिनसे कठिन तपस्या करके मनको मारे, फिर परिणाममें उसी नीच और घृणित काममें फँसे।
तीसरे ईसाई महाशयोंसे कहना है कि, वे जो तसलीसको सत्यधर्मका मूल मानते हैं वो उनके भ्रम और कल्पनाके अतिरिक्त और क्या है? ईश्वर अविभाज्य है, उसमें विभाग कैसे हो सकता है? अखण्डको कौन खण्ड २ कर सकता है? जिसका खण्ड हो जाता है वह परमात्मा नहीं है, उसमें सब शक्ति नहीं। बाप, बेटा और पवित्रात्मा ये तीन हुये थे, ये कदापि सब शक्तिमान् नहीं हो सकते। जो सर्वशक्तिमान् है वह, अनन्त बापबेटा और पवित्रात्माओंको प्रगट कर सकता है। सर्व शक्तिमान सबसे निलैप है। ईसाईयोंकी तसलीस और हिन्दुओंकी तसलीस दोनों एकही बात हैं। हिन्दू ब्रह्म, जीव और माया कहते हैं। ईसाई बेटा, बाप और पवित्रात्मा मानते हैं। जब तक कोई अद्वैतको प्राप्त न करेगा तब तक मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता।
जैन धर्मका सिद्धान्त
चौथे मूसाई ( यहूदी ) महाशयोंसे विनती है कि, वे जिन दश आज्ञाओं पर विश्वास करते हैं उसीसे अपनी मुक्ति समझते हैं वे क्या है ? किसने दी ? कहाँ से आई ? किसको मिली ? विचार करेंगे तो मालूम होगा कि, दश आज्ञा देनेवाला और लेनेवाला दोनों बन्धनमें हैं, मुक्त कोई नहीं, वरन् मुक्तिकी सुधि भी नहीं जानते । बन्धने दिया बन्धनेही लिया । इन दश आज्ञाओंका वर्णन इसी पुस्तकमें प्रथम लिख आया हूँ उसको देखें उसपर विचार करें कि, इनका यथार्थ आशय क्या है ? जब उपदेशक उपदेशा दोनों बन्धनमें हों तो मुक्ति कैसे हो सकती है ? जो स्वयं मुक्त नहीं, वह दूसरोंकी क्या मुक्ति देगा ? परम त्माने जिनके अन्तःकरणमें प्रकाश दिया है, जिन्हें कुछ ज्ञान है, वे सोचें समझें कि, कौंदीको कौंदी, कौंदसे कैसे मुक्त कर सकता है ? कदापि नहीं ।
जिस प्रकार मैंने उपरोक्त धर्मोंका वर्णन लिखा है, उसी तरह सब धर्मोंका जानना चाहिये । पक्षपात और अँधाधुन्ध धर्मद्वेष तथा आग्रहमें विवेक और विचार कहाँ है ? जिससे कि, भ्रम और असत्यका त्याग और सत्यकी प्राप्ति, हो । समस्त संसारकी धर्मपुस्तक अन्धोंकी लकड़ीके समान हैं, जिनके विवेक विचार और निरपेक्षता रूप नेत्र नहीं हैं, वे ही उसके सहारा ढूँढ़ते फिरते हैं । वे शास्त्रके आशयको समझ नहीं सकते क्योंकि, उनके भीतर अन्धकार भरा है । यदि प्रकाश होता तो शास्त्रोंके सच्चे आशयको समझकर सीधे मार्गपर चलते उलटा मार्ग स्वीकार न करते ।
उदारता और वीरता ।
मैंने जो हकीकतरायका हाल लिखा इसके धर्मज्ञ होनेका कारण यह था कि, बालकपनसेही उदार था । यह नियम की बात है, जो उदार होता है वह शूरवीर भी होता है, जो शूरवीर होता है वही अपना धर्म रख सकता है । जितने प्रतिष्ठित नामी महात्मागण हुये सब उदार और वीर हुये । उदारता और दृढ़ताके बिना कोई भी धार्मिक नहीं हो सकता । कृपण और हतोत्साहको कभी भी श्रेष्ठता नहीं मिल सकती वह सदा अभागही रहता है ।
एक दिन एक यहूदी स्त्री मूसाकी प्रशंसा ( मुहम्मद साहबके समक्ष ) बड़े उत्साहसे करने लगी कि, मूसा बड़ा उदार पुरुष था । उसके तुल्य कोई नहीं हुआ । यह बात सुनकर मुहम्मद साहेबने कहा कि, मुझसे मांग तू क्या माँगना चाहती है ? उसने कहा कि, आप अपना जामा उतारकर मुझे दे दीजिये । मुहम्मद साहबने अपना जामा उतार कर दे दिया स्वयं नङ्गे हो गये गुफाके अन्दर
योगी और संन्यासियोंका सिद्धान्त कबीर पन्थियोंका सिद्धान्त
जा बैठे। अब बाहर निकलना कठिन हो गया क्योंकि, मुहम्मद साहबके पास एकही जामा था जो यहूदिनको दिया था।
उसी समयसे आकाशसे वही (आकाशवाणी) हुई कि, आवश्यक पदार्थ किसीको मत दिया करो मुहम्मद साहब ऐसे उदार थे कि, कभी २ स्वयं भूखे रहते थे, कभी बिना नमकके शाक खाकर रह जाते थे, कभी भूखसे व्याकुल हो जानेपर पेटपर पत्थर बांधकर पड़े रहते थे नमाज और अपना नित्य नियम भी किया करते थे कबीर साहबने भी मुहम्मद साहबके संतोष और उदारताकी प्रशंसा की है। ईसाभी वैसेही उदार और संतोषी थे। इन्जीलमें दान आदि करनेकी आज्ञा है पर उसपर कौन चलता है? अपने २ आचार्य और गुरुकी आज्ञा उल्लंघन करनेके कारण सब धर्मवाले अधर्मी हो गये हैं, उनका अन्तः-करण अन्धकारमय हो गया है, ये प्रकाशको देख भी नहीं सकते। जो कोई सच्चे संत और सद्गुरुकी संगति सेवा भक्ति छोड़ेगा उसकी यही गति होगी क्योंकि सच्चे विद्वानों सदाचारियों संतों और सत्यगुरुओंकीही कृपासे ज्ञान प्राप्त होकर उभयलोकका आनन्द प्राप्त होता है, जहाँ सत्संग और विवेक विचार एवं संत और गुरुकी सेवा न होगी वहाँ अज्ञानता और भ्रम होगा।
साधुओंकी स्थिति।
यदि कोई गृहस्थ अथवा प्राकृतिक मनुष्य साधुओंका ज्ञान और शुभ्रूषा न करे, उन्हें कुछ न दे तो भी साधुओंको अपना भजन नहीं छोड़ना चाहिये पेटके लिये अपने अमूल्य समयको नष्ट कर आत्मविचारसे रहित रहना महान् पापका काम है। पेटके लिये अपनी प्यारी आयुको नष्टकर ईश्वरसे विश्वास खो, गुरु विमुख न होना चाहिये।
प्रभु ऐसा विश्वम्भर है कि, सीमूर्ग जैसे पक्षीको भी बैठेही बैठे भोजन देता है। यह पक्षी काफ पर्वतपर हुआ करता है। उसका शरीर बहुत बड़ा होता है। वह इतना बड़ा होता है कि, यदि कभी अपने परोंको फड़ फड़ावे तो तूफान आजावे। इसी कारण सदा एकही स्थानपर पड़ा रहता है। परमात्मा उसके जीवन निर्वाहका प्रबन्ध इस प्रकार करता है कि, उसके चारों तरफ चार २ कोशतक घास तैयार रखता है जब सीमूर्ग भूखा होता है तो अपने चारों ओरकी चार कोशतककी घास चर जाता है सबेरे दूसरे दिन फिर ज्योंका त्यों घास पहिलीसीही तैयार हो जाती है। इस तरह परमात्मा उसकी रक्षा करता है। इसी तरह संसारमें कोई जीवधारी नहीं जिसको कि, विश्वम्भर भूखा रखता हो। प्रभु नित्य सबको समयपर भोजन पहुँचाता है। इसी कारण साधुओंका भी उसी
विश्वम्भरका विश्वास रखकर अपने धर्मपर स्थिर रहना चाहिये । कोई क्यों न हो जबतक अपने कर्तव्यपर दृढ़ और स्थिर रहेगा, सुखसे रहेगा, जब अपना धर्म (कर्तव्य) छोड़कर पराये, धर्ममें प्रवृत्त होगा अवश्य दुःख और कष्ट भोगेगा ।
तीसा यन्त्रकी साखी ।
अपने २ धर्ममें सबको सुख उपजे सब काल ।
जिन निज धर्म दृढ़कै गह्यो तेई भये निहाल ॥
अध्याय २३
गजलोंसे उपदेश
गजल ।
न पावे राह कोई साधु गुरु बिन । दिखावै चाह सूली साधु गुरु बिन ॥
बजारी जोर घर हरगिज न पावै । हो नालः आह सदहा साधु गुरु बिन ॥
करे तदबीर सदहा गर शबो रोज । गदा और शाह नहिं कोई साधु गुरु बिन ॥
कवाकिब ओर सवाबित सब खड़े हैं । मेहर और माहनहिं कोई साधु गुरु बि०
बहर जानिव तमाशा साधु गुरुका । न क़िबला गाह पावै साधु गुरु बिन ॥
जिधर जावे उधर हैरांही आजिज । न हो आगह आदम साधु गुरु बिन ॥
गजल— चल उतर पार साधु सेवासे । पावै खुद यार साधु सेवासे ॥
होवे हरदो जहामें बख्तावर । गुल होवे खार साधु सेवासे ॥
जहां न पहुँचे कोई तू जाय वहां । पेश सरकार साधु सेवासे ॥
अक्ले इन्सानकी है रसा न जहां । पहुँचे दरबार साधु सेवासे ॥
पावै बहु न्यामत न जाने कोई । अस्ल इसरार साधु सेवासे ॥
बस्ल बेशक हो अस्ल अपनेसे । कुलके करतार साधु सेवासे ॥
आवे हरगिज न कालके पञ्जे । हो छुटकार साधु सेवासे ॥
पागलोंका जो घर है भवसागर । छोड़ संसार साधु सेवासे ॥
आगके घरमें आपड़ा आजिज । होवे गुलज़ार साधु सेवासे ॥
अटका जो काली धार हो, सत्गुरु न जिसका यार हो ।
हरगिज न बेड़ा पार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
सल्लाह नहिं मल्लाहसे, मुहूरिभ नहीं उस राहसे ।
इस बहर में न करार हो, खिदमत बिना गुरु साधु की ॥
गुरु साधुको जो सेवता, पावे सो पूर्ण देवता ।
रहबर न सो सत्तार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
हजरत मूसाका सिद्धान्त हजरत ईसाका सिद्धान्त, मुहम्मद शाहका सिद्धान्त शरणागत तथा ईश्वर विश्वास
सदहा करे तदवीर जो, हरगिज न पहुँचे तीरसो ।
गरदावमें लाचार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
खेवट नहीं गुरु साधु जहां, किशती न होवे पार वहां ।
वेशक अज्ञाबुननार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
यह कौल सत्य कवीरका, हर दो जहाँ गुरु पीरका ।
नहिं पुरुषका दादार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
सदहा जो गोता खायेगा, आजिज बड़ा पछतायगा ।
पावे नहीं गङ्कारको, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
बिन साधु गुरुसारेही मुरदार हुये । इनकेही मेहरसे सुर मुनि सरदार हुये ॥
खाक पा सुरमैं जिनसेहै मनौवर मह व मेहर । गुरुसन्तकदम चूमते भवपार हुये ॥
सतसङ्गको पाये सोई सतपदको मिले । बिन साधुगुरु कोई न गमख्वार हुये ॥
सतसङ्गही हर सित्म व हर कूचा गली । बदबख्त न देखते हैं लाचार हुये ॥
सत्सङ्गकी तारी जहांमें आजिज । बिन सन्त गुरु दालिख दर नार हुये ॥
पावे आराम साधु गुरु सेवा । लाभ सत नाम साधु गुरु सेवा ॥
काल जञ्जाल दूर हो लारेव । टूट जा दाम साधु गुरु सेवा ॥
जब मेहर इनकेसे हुआ पुरख्त । फिर न हो खाम साधु गुरु सेवा ॥
दर्द हासिल हो तुझको रोजो शव । सुबह और शाम साधु गुरु सेवा ॥
लात घर जा ऊपर मुअल्लें अर्श । पहुँचे बदबाम साधु गुरु सेवा ॥
आजिजे अबदी हयातको पावै । जिन्दगी तआम साधु गुरु सेवा ॥
मुरब्बा ।
वहां जाऊँ मेरा दिलबर जहां है । दिखा इसको जो दर परदा निहां है ॥
किधर ढूंढूं वह मुरशिद मिहरबाँ है । हुये सन्मुख हैं सब गुरु मुख कहाँ है ॥
कोई गुरुमुख होवै सो राह पावै । जो मन्मुख शौर दरियामें बहावै ॥
यह आलम भूल सदहा गोता खा े । हुये मन्मुख हैं सब गुरुमुख कहाँ है ॥
कोई गुरुमुख मुझे वह गुरु मिला दो । बला सद जन्मकी पलमें टला दो ॥
इस आजिज नातवां वह रह चला दो । हुये हैं मन्मुख सब गुरुमुख कहाँ है ॥
तन व मन धनसे हो गये गन्दे । जिससे तू पडगया है यम फन्दे ॥
है तू मेहमांसरामें दिन चन्दे । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥
नहीं तन है नहीं धन तेरा । हुआ गाफिल है कालके घेरा ॥
जोनि सदहामें हो तेरा फेरा । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥
रात दिन मौत हर घड़ी कर याद । कर दिया उम्र अपनी तू बरबाद ॥
पापका बोझ सर पै लीहै लाद । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥
दोस्त अपनेसे तूने पीठ दिया । दुश्मनाने रख प्यार डीठ दिया ॥
ज्ञान और ध्यान गहरा गीठ दिया । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥
दोस्त दुनियाके तुझको मारेंगे । आग दोजखमें खींच डारेंगे ॥
कौन आजिज तुझे उवारेंगे । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥
श्रृङ्गल ।
सङ्ग सोजांसै है न डर जिनको । रह बदोजखके रख है दर जिनको ॥
सालहों की सलाह इनसे कहाँ । साजे सुबहों सजें घर जिनको ॥
जानै सो हेच खाकसारोंको । हक करे जेर और जबर जिनको ॥
डूब कर सारे मर गये भोंदू । अकल आला मदद न सर जिनको ॥
दीदना दीद इनकी है आजिज । आता है बहुत करों फर जिनको ॥
यथा—बदोदारैन सुर्खरू गुरुमुख । होवे तहसीन चारसू गुरुमुख ॥
उनसे कोई न जगमें बख्तावर । खल्क खुश और नेकखू गुरुमुख ॥
दोस्त इनका है सब जमीनो ज़मा । कोई बाकी नहीं अदो गुरुमुख ॥
सारे कामोंसे हो गये फ़ारिग । रही कोई न जुस्तुजू गुरुमुख ॥
तर गये सो जहाज गुरु पर बैठ । देख हरगिज न कालको गुरुमुख ॥
अम्बरो ऊद इत्रियात बराह । पुर बहर सिम्त मुश्को बू गुरुमुख ॥
दस्तगीरी हैं जिनको सत गुरुकी । बेकार होवै एक मू गुरुमुख ॥
तन मन व धनजो अपना बार आजिज । इससे बढ़कर न गुफ्तुगू गुरुमुख ॥
श्रृङ्गल ।
प्रह्लाद पिता साधुकी तौहीन किया । रावनभी गया साधु की तौहीन किया ॥
निवंश हुआ कंस जो था उसका चिरागादी । उसको बुझा साधुकी तौहीन किया ॥
दुर्योधन मगरूर हुआ शौकतों शान । बाकी न रहा साधुकी तौहीन किया ॥
राजा सगर पूत जो थे साठ हजार । सब गर्द मिला साधुकी तौहीन किया ॥
कृष्ण औलाद ज़बरदस्तो मगरूर हुये । गारतसो किया साधुकी तौहीन किया ॥
शह्राद जो तामीर किया बागे बिहिश्त । पत्ताल चला साधुकी तौहीन किया ॥
नमरुदहो मरदूद भरा कुब्र जो मराज । मच्छरसे खिला साधुकी तौहीन किया ॥
मनन
फरऊन हुआ ढूंन बर्मै सदर नशीं । दरियामें डूबा साधुकी तौहीन किया ॥
वेद और कुतुब ख्वानी मगरूर डूबे । जो सब उलमा साधुकी तौहीन किया ॥
गुरुपीर बतदवीर पनः उनकी जो छोड़ा। धर्मराज धरा साधुकी तौहीन किया ॥
बद फेली खजना हुये पर कुफ हो दिल । तारिक मरा साधुकी तौहीन किया ॥
सबयमकी खोराक ऐसे आदम आजिज । न कोई बचा साधुकी तौहीन किया ॥
ग्रन्थल
सर बसर सूली तर बदारे हमल । मअसियतके लिये करारे हमल ॥
वे गुणाहोंको कैंद कौन करे । आसियोंको हुआ मदारे हमल ॥
हमल दोजखमें जो हुआ महबूस । गन्धको गन्धकी नआर हमल ॥
केते हैं गन्दिगीके जो कीड़े । उनको ही बूदो काश प्यारे हमल ॥
होवे क्योकर पसन्द आदमको । यह जहन्मकी आमो गार हमल ॥
मुजरिमोंके लिये बना यह मकौ । बन्द हैं दर अजाबो नार हमल ॥
जब पड़ा कैंदमें पुकारे तू । दर्द दुख इन्द्र बेशुमारे हमल ॥
तोबः २ कर बसत मिन्नत । कीजिये गुफा र रुस्तगारे हमल ॥
अब न हरगिज भुलाऊं तेरा नाम । रख पनाह मुझको अज शरारे हमल ॥
सब गुनहगार बे गुनह न कोई । जिसका हैं सीत रोजगारे हमल ॥
वे गनाहान हैं सूरत अस्ल बसूल । गुनह आलूद हैं शिकारे हमल ॥
जहां जावे वहां मुक़दर हो । पुर है सब गर्द और गुबारे हमल ॥
एकसे छूट दूसरे हो बन्द । नहिं पायान हैं शब निहारे हमल ॥
जब मिहरबां हुये करीमे रहीम । कर दिया दूर भारी प्यारे हमल ॥
आया बाहर सो कौलको भूला । याद आवे न अपना यारे हमल ॥
फस मया पनियवी मोहब्बतमें । कौन पूछे वह गमगुसारे हमल ॥
जन्म साबिकका यह कसूर आजिज । पा उत्तर सर तल न चारे हमल ॥
ग़ज़ल—बैठे खुद जाय मैं जाकर दिल दीवाना मेरा ।
हुब्ब महबूब लगा कर दिल दिवाना मेरा ॥
काल चक्करसे बचैगा भी तदबीर है एक ।
मुरशिद पनः आकर दिल दीवाना मेरा ॥
सतगुरु कदमें खाक कोहल नूरसे देख ।
आँखोंमें सजा कर दिल दीवाना मेरा ॥
होवेगा अमर फेर मरेगा न कभी ।
उसकीही उलशको खाकर दिल दीवाना मेरा ॥