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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

१६- विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव, ब्रह्माजीद्वारा ईशानकी स्तुति

अध्याय १६ ] विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव [ ६१


एवं कृत्वा कृतघ्नोऽपि ब्रह्महा भ्रूणहा तथा।<br>वीरहा गुरुघाती च मित्रविश्वासघातकः ॥ २७<br><br>स्तेयी सुवर्णस्तेयी च गुरुतल्पेरतः सदा।<br>मद्यपो वृषलीसक्तः परदारविधर्षकः ॥ २८<br><br>ब्रह्मस्वहा तथा गोघ्नो मातृहा पितृहा तथा।<br>देवप्रच्यावकश्चैव लिङ्गप्रध्वंसकस्तथा ॥ २९<br><br>तथ अन्यानि च पापानि मानसानि द्विजो यदि।<br>वाचिकानि तथान्यानि कायिकानि सहस्रशः ॥ ३०<br><br>कृत्वा विमुच्यते सद्यो जन्मान्तरशतैरपि।<br>एतद्रहस्यं कथितमघोरेशप्रसङ्गतः ॥ ३१<br><br>तस्माज्जपेद् द्विजो नित्यं सर्वपापविशुद्धये ॥ ३२आगे विधिपूर्वक ब्रह्मसम्बन्धी गायत्री मन्त्रका जप करना चाहिये ॥ २६ ॥<br><br>ऐसा करके कृतघ्न, ब्रह्महत्यारा, भ्रूणहत्या करनेवाला, वीरघाती, गुरुकी हत्या करनेवाला, मित्रके साथ विश्वासघात करनेवाला, चौर-वृत्तिवाला, स्वर्णचोर, गुरुकी पत्नीमें सदा आसक्ति रखनेवाला, मद्यपान करनेवाला, शूद्र-स्त्रीमें आसक्त, परायी स्त्रीके साथ व्यभिचार करनेवाला, ब्राह्मणका धन हरण करनेवाला, गोहत्यारा, माता-पिताकी हत्या करनेवाला, देवताओंकी मूर्ति खण्डित करनेवाला, शिवलिङ्ग ध्वस्त करनेवाला तथा हजारों प्रकारके अन्य मानसिक-वाचिक-शारीरिक पाप करनेवाला द्विज शीघ्र ही पापमुक्त हो जाता है। इतना ही नहीं, इस विधिके करनेसे सैकड़ों जन्म-जन्मान्तरके पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। मैंने अघोरेश्वर भगवान् शिवके प्रसंगसे इस रहस्यका वर्णन किया है। अतएव द्विज अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यको सभी पापोंसे मुक्तिहेतु इस अघोर मन्त्रका जप नित्य करना चाहिये ॥ २७—३२ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽघोरेशमाहात्म्यं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अघोरेशमाहात्म्य' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥


सोलहवाँ अध्याय

विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव, ब्रह्माजीद्वारा ईशानकी स्तुति

सूत उवाचसूतजी बोले—
अथान्यो ब्रह्मणः कल्पो वर्तते मुनिपुङ्गवाः।<br>विश्वरूप इति ख्यातो नामतः परमाद्भुतः ॥ १हे मुनिश्रेष्ठो! असित कल्पके अनन्तर 'विश्वरूप' नामसे विख्यात ब्रह्माजीका दूसरा अत्यन्त अद्भुत कल्प आरम्भ हुआ ॥ १ ॥
विनिवृत्ते तु संहारे पुनः सृष्टे चराचरे।<br>ब्रह्मणः पुत्रकामस्य ध्यायतः परमेष्ठिनः ॥ २<br><br>प्रादुर्भूता महानादा विश्वरूपा सरस्वती।<br>विश्वमाल्याम्बरधरा विश्वयज्ञोपवीतिनी ॥ ३<br><br>विश्वोष्णीषा विश्वगन्धा विश्वमाता महोष्ठिका।<br>तथाविधं स भगवानीशानं परमेश्वरम् ॥ ४समस्त जगत्के संहारके अनन्तर चराचर संसारकी पुनः सृष्टिके निमित्त पुत्र-कामनासे ध्यानरत परमेष्ठी ब्रह्माजीके समक्ष महान् नाद करती हुई विश्वरूपा सरस्वती गौ प्रकट हुई। वह विश्वरूप माला, वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा शिरोभूषण (पगड़ी) धारण की हुई थी। उन महोष्ठिका विश्वमाताके सभी अंग विश्वगन्धसे अनुलिप्त थे ॥ २-३ १/२ ॥
शुद्धस्फटिकसङ्काशं सर्वाभरणभूषितम्।<br>अथ तं मनसा ध्यात्वा युक्तात्मा वै पितामहः ॥ ५तदनन्तर वे युक्तात्मा भगवान् ब्रह्मा उसी प्रकारके विश्वरूपवाले, शुद्ध स्फटिकमणिके तुल्य आभायुक्त
७०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| ववन्दे देवमीशानं सर्वेशं सर्वगं प्रभुम्।<br>ओमीशान नमस्तेऽस्तु महादेव नमोऽस्तु ते॥ ६ | तथा सभी आभूषणोंसे शोभायमान, सर्वेश्वर, सर्वव्यापी, सर्वसमर्थ परमात्मा ईशानदेवका मनसे ध्यान करके उनकी वन्दना करने लगे॥ ४-५ १/२ ॥ | | नमोऽस्तु सर्वविद्यानामीशान परमेश्वर।<br>नमोऽस्तु सर्वभूतानामीशान वृषवाहन॥ ७<br><br>ब्रह्मणोऽधिपते तुभ्यं ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे।<br>नमो ब्रह्माधिपतये शिवं मेऽस्तु सदाशिव॥ ८ | हे ओम्स्वरूप ईशान! आपको नमस्कार है। हे महादेव! आपको नमस्कार है। हे समस्त विद्याओंके ईशान (स्वामी) परमेश्वर! आपको नमस्कार है। हे सभी प्राणियोंके अधिपति वृषवाहन! आपको नमस्कार है। हे ब्रह्माधिपते! आप ब्रह्मरूप तथा साक्षात् ब्रह्मको नमस्कार है। आप ब्रह्माधिपतिको नमस्कार है। हे सदाशिव! मेरा कल्याण हो॥ ६-८॥ | | ओङ्कारमूर्ते देवेश सद्योजात नमो नमः।<br>प्रपद्ये त्वां प्रपन्नोऽस्मि सद्योजाताय वै नमः॥ ९ | हे ओंकारमूर्ते! हे देवेश! हे सद्योजात! आपको बार-बार नमस्कार है। मैं कष्टसे पीड़ित होकर आपके शरणागत हूँ। सद्योजातको नमस्कार है। | | अभवे च भवे तुभ्यं तथा नातिभवे नमः।<br>भवोद्भव भवेशान मां भजस्व महाद्युते॥ १० | अजन्मा होनेपर भी आप लोकाभ्युदयार्थ ही जन्मादिको स्वीकार करनेवाले हैं, हे शिव! आपको नमस्कार है। हे विश्वोत्पादक! हे विश्वके ईशान (विश्वेश)! हे महाद्युते! मेरी रक्षा करो॥ ९-१०॥ | | वामदेव नमस्तुभ्यं ज्येष्ठाय वरदाय च।<br>नमो रुद्राय कालाय कलनाय नमो नमः॥ ११<br><br>नमो विकरणायैव कालवर्णाय वर्णिने।<br>बलाय बलिनां नित्यं सदा विकरणाय ते॥ १२ | हे वामदेव! आपको नमस्कार है। ज्येष्ठको नमस्कार है। वरदको नमस्कार है। रुद्रको, कालको तथा कलन (संख्यारूप)-को बार-बार नमस्कार है। वर्णी, कालवर्ण, विकरणको नित्य नमस्कार है। बलियोंके बली, विकरण (मनोरूप) आपको सर्वदा नमस्कार है॥ ११-१२॥ | | बलप्रमथनायैव बलिने ब्रह्मरूपिणे।<br>सर्वभूतेश्वरेशाय भूतानां दमनाय च॥ १३<br><br>मनोन्मनाय देवाय नमस्तुभ्यं महाद्युते।<br>वामदेवाय वामाय नमस्तुभ्यं महात्मने॥ १४<br><br>ज्येष्ठाय चैव श्रेष्ठाय रुद्राय वरदाय च।<br>कालहन्त्रे नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं महात्मने॥ १५ | बलशाली तथा ब्रह्मरूप बलप्रमथनको नमस्कार है। सभी प्राणियोंका दमन करनेवाले सर्वभूतेश्वरेशको नमस्कार है। मनोन्मनको नमस्कार है। देवको नमस्कार है। हे महाद्युते! आपको नमस्कार है। वामदेवको नमस्कार है, वामको नमस्कार है, आप महात्माको नमस्कार है। ज्येष्ठको नमस्कार है, श्रेष्ठको नमस्कार है, रुद्रको नमस्कार है, वरदको नमस्कार है, महात्मा कालहन्ताको नमस्कार है। आपको नमस्कार है। आपको नमस्कार है॥ १३-१५॥ | | इति स्तवेन देवेशं ननाम वृषभध्वजम्।<br>यः पठेत्सकृद्देवेह ब्रह्मलोकं गमिष्यति॥ १६ | इस स्तवनसे ब्रह्माजीने वृषभध्वज ईशानको नमस्कार किया। जो पुरुष एक बार श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त करता |

अध्याय १६ ] विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव ७१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रावयेद्वा द्विजान् श्राद्धे स याति परमां गतिम्।<br>एवं ध्यानगतं तत्र प्रणमन्तं पितामहम्॥ १७है अथवा जो श्राद्धमें ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है॥ १६ १/२॥<br><br>इस प्रकार ध्यानमग्न होकर वन्दना करते हुए पितामह ब्रह्मासे भगवान् ईशान बोले—मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम क्या चाहते हो?॥ १७ १/२॥
उवाच भगवानीशः प्रीतोऽहं ते किमिच्छसि।<br>ततस्तु प्रणतो भूत्वा वाग्विशुद्धं महेश्वरम्॥ १८<br>उवाच भगवान् रुद्रं प्रीतं प्रीतेन चेतसा।<br>यदिदं विश्वरूपं ते विश्वगौः श्रेयसीश्वरी ॥ १९<br>एतद्वेदितुमिच्छामि यथेयं परमेश्वर।तत्पश्चात् ब्रह्माजीने अत्यन्त निवेदनपूर्वक विशुद्ध वाणीवाले तथा प्रसन्नताको प्राप्त महेश्वरसे प्रसन्न मनसे कहा—हे परमेश्वर! यह आपका जो विश्वरूप है तथा परम कल्याणी यह जो विश्वरूपा गौ है—इसके विषयमें मैं जानना चाहता हूँ॥ १८-१९ १/२॥
कैषा भगवती देवी चतुष्पादा चतुर्मुखी ॥ २०<br>चतुःशृङ्गी चतुर्वक्त्रा चतुर्दंष्ट्रा चतुःस्तनी।<br>चतुर्हस्ता चतुर्नेत्रा विश्वरूपा कथं स्मृता ॥ २१<br>किं नामगोत्रा कस्येयं किं वीर्या चापि कर्मतः।चार पैरोंवाली, चार मुखवाली, चार सींगोंवाली, चार वक्त्रवाली, चार दाढ़ोंवाली, चार स्तनोंवाली, चार हाथों तथा चार नेत्रोंवाली ये भगवती कौन हैं तथा इन देवीको विश्वरूपा क्यों कहा गया है? इनका नाम तथा गोत्र क्या है? ये किसकी भार्या हैं तथा इनके कर्मका प्रभाव एवं सामर्थ्य क्या है?॥ २०-२१ १/२॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा देवदेवो वृषध्वजः ॥ २२<br>प्राह देववृषं ब्रह्मा ब्रह्माणं चात्मसम्भवम्।उन ब्रह्माका वह वचन सुनकर ब्रह्मरूप देवदेव वृषध्वज शिवने देवताओंमें श्रेष्ठ अपने पुत्र ब्रह्मासे कहा—॥ २२ १/२॥
रहस्यं सर्वमन्त्राणां पावनं पुष्टिवर्धनम् ॥ २३<br>शृणुष्वैतत्परं गुह्यमादिसर्गे यथा तथा।<br>एवं यो वर्तते कल्पो विश्वरूपस्त्वसौ मतः ॥ २४<br>ब्रह्मस्थानमिदं चापि यत्र प्राप्तं त्वया प्रभो।<br>त्वत्तः परतरं देव विष्णुना तत्पदं शुभम् ॥ २५<br>वैकुण्ठेन विशुद्धेन मम वामाङ्गेन वै।अब आदिसर्गमें जैसा था, वही पुष्टिकी वृद्धि करनेवाला, पवित्र तथा सभी मन्त्रोंका परम गुह्य रहस्य सुनो। हे प्रभो! यह जो वर्तमान कल्प है, वह विश्वरूप कल्प नामवाला कहा गया है। जिसमें आपने यह ब्रह्मपद प्राप्त किया है और मेरे वाम अंगसे उत्पन्न विष्णुके द्वारा विशुद्ध वैकुण्ठलोक प्राप्त किया गया। हे देव! विष्णुद्वारा प्राप्त वह शुभ पद तुम्हारे ब्रह्मपदसे भी श्रेष्ठ है॥ २३—२५ १/२॥
तदा प्रभृति कल्पश्च त्रयस्त्रिंशत्तमो ह्ययम् ॥ २६<br>शतं शतसहस्राणामतीता ये स्वयम्भुवः।<br>पुरस्तात्तव देवेश तच्छृणुष्व महामते ॥ २७हे देवेश! हे महामते! उस समयसे अब यह तैंतीसवाँ कल्प है और इससे पूर्व लाखों कल्प बीत चुके हैं तथा आपसे पहले लाखों ब्रह्मा भी हो चुके हैं, उनके विषयमें सुनो॥ २६-२७॥
आनन्दस्तु स विज्ञेय आनन्दत्वे व्यवस्थितः।<br>माण्डव्यगोत्रस्तपसा मम पुत्रत्वमागतः॥ २८आपका माण्डव्य गोत्र है और तपस्यासे मुझे पुत्र-रूपमें प्राप्त हुए हैं, अतएव आपको आनन्दरूप तत्त्वमें व्यवस्थित वह ब्रह्मरूप आनन्द जानना चाहिये॥ २८॥
७२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
त्वयि योगं च सांख्यं च तपो विद्याविधिक्रियाः।<br>ऋतं सत्यं दया ब्रह्म अहिंसा सन्मतिः क्षमा॥ २९<br><br>ध्यानं ध्येयं दमः शान्तिर्विद्याविद्या मतिर्धृतिः।<br>कान्तिर्नीतिः प्रथा मेधा लज्जा दृष्टिः सरस्वती॥ ३०<br><br>तुष्टिः पुष्टिः क्रिया चैव प्रसादश्च प्रतिष्ठिताः।<br>द्वात्रिंशत्सुगुणा ह्येषा द्वात्रिंशाक्षरसंज्ञया॥ ३१<br><br>प्रकृतिर्विहिता ब्रह्मंस्त्वत्प्रसूतिर्महेश्वरी।<br>विष्णोर्भगवतश्चापि तथान्येषामपि प्रभो॥ ३२<br><br>सैषा भगवती देवी मत्प्रसूतिः प्रतिष्ठिता।<br>चतुर्मुखी जगद्योनिः प्रकृतिर्गौः प्रतिष्ठिता॥ ३३<br><br>गौरी माया च विद्या च कृष्णा हैमवतीति च।<br>प्रधानं प्रकृतिश्चैव यामाहुस्तत्त्वचिन्तकाः॥ ३४आपमें योग, सांख्य (तत्त्वज्ञान), तप, विद्या, विधि, क्रिया, ऋत (प्रियभाषण), सत्य, दया, वेद, अहिंसा, सन्मति, क्षमा, ध्यान, ध्येय (ईश्वर-सन्निधान), इन्द्रियनिग्रह, शान्ति, ज्ञान, अविद्या (माया), बुद्धि, धृति, कान्ति, नीति, प्रथा (ख्याति), मेधा (धारणवती बुद्धि), लज्जा, दृष्टि (दिव्य ज्ञान), सरस्वती (सर्वलक्षणयुक्त वाणी), तुष्टि, पुष्टि, क्रिया (वेदविहित कर्म) तथा प्रसाद—ये बत्तीस गुण प्रतिष्ठित हैं। ककार आदि बत्तीस अक्षरस्वरूपा तथा बत्तीस गुणोंसे युक्त यह विश्वरूपा गाय तुम्हें उत्पन्न करनेवाली है; इसीलिये तुम उन बत्तीस गुणोंसे सम्पन्न हो। हे ब्रह्मन्! प्रकृतिक रचना मैंने की है और हे प्रभो! आप, भगवान् विष्णु तथा इन्द्र आदि देवता इस महेश्वरीसे प्रसूत हैं। जगत्को उत्पन्न करनेवाली साक्षात् देवी भगवतीस्वरूपा यह चतुर्मुखी प्रकृति गौ मुझसे उत्पन्न होकर प्रतिष्ठाको प्राप्त हुई है, जिसे तत्त्वचिन्तक गौरी, माया, विद्या, कृष्णा, हैमवती, प्रधान तथा प्रकृति—ऐसा कहते हैं॥ २९-३४॥
अजामेकां लोहितां शुक्लकृष्णां<br>विश्वप्रजां सृजमानां सरूपाम्।<br>अजोऽहं मां विद्धि तां विश्वरूपं<br>गायत्रीं गां विश्वरूपां हि बुद्ध्या॥ ३५विश्वकी प्रजाओंकी सृष्टि करनेवाली, रक्त-श्वेत-कृष्ण-वर्णवाली, रूपसम्पन्न, अजन्मा तथा अद्वितीय इस विश्वरूपा गायको अपने बुद्धि-विचारसे साक्षात् गायत्री जानो और मैं भी अजन्मा हूँ, मुझे भी विश्वरूप जानो॥ ३५॥
एवमुक्त्वा महादेवः ससर्ज परमेश्वरः।<br>ततश्च पार्श्वगा देव्याः सर्वरूपकुमारकाः॥ ३६<br><br>जटी मुण्डी शिखण्डी च अर्धमुण्डश्च जज्ञिरे।<br>ततस्तेन यथोक्तेन योगेन सुमहौजसः॥ ३७<br><br>दिव्यवर्षसहस्रान्ते उपासित्वा महेश्वरम्।<br>धर्मोपदेशमखिलं कृत्वा योगमयं दृढम्॥ ३८<br><br>शिष्टाश्च नियतात्मानः प्रविष्टा रुद्रमीश्वरम्॥ ३९तदनन्तर ब्रह्माजीसे ऐसा कहकर परमेश्वर महादेवने कई कुमार सृजित किये और इस प्रकार देवीके समीपसे अनेक रूपोंवाले कुमार प्रकट हुए, जिनमें कोई जटाधारी था, कोई मुण्डितसिर था, कोई सिरपर शिखा धारण किये था तथा कोई अर्धमुण्डित सिरवाला था। तदनन्तर सदाचारी, नियत आत्मावाले तथा महान् ओजसे सम्पन्न वे कुमार यथोक्त योगाभ्यास करते हुए देवताओंके एक हजार वर्षतक महेश्वरकी आराधना करके दृढ़ योगयुक्त सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश अपने शिष्यों-प्रशिष्योंको देकर अन्तमें परमेश्वर रुद्रमें प्रवेश कर गये॥ ३६-३९॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ईशानमाहात्म्यकथनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ईशानमाहात्म्यकथन' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १६॥

१७- ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य, ब्रह्मा और विष्णुद्वारा हंस एवं वाराहरूप धारणकर लिङ्गके मूलस्थानका अन्वेषण, लिङ्गमध्यसे शब्दमय उमामहेश्वरका प्रादुर्भाव और ईशानादि पाँच शिवरूपोंकी उत्पत्ति

अध्याय १७ ] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य... शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७३


सत्रहवाँ अध्याय

ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य, ब्रह्मा और विष्णुद्वारा हंस एवं वाराहरूप धारणकर लिङ्गके मूलस्थानका अन्वेषण, लिङ्गमध्यसे शब्दमय उमा-महेश्वरका प्रादुर्भाव और ईशानादि पाँच शिवरूपोंकी उत्पत्ति

| सूत उवाच<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तः सद्यादीनां समुद्भवः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्॥ १<br>स याति ब्रह्मसायुज्यं प्रसादात्परमेष्ठिनः। | **सूतजी बोले—**हे मुनियो! इस प्रकार मैंने शिवजीके सद्योजात आदि अवतारोंका वर्णन संक्षेपमें कर दिया। जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य)-को सुनाता है, वह शिवजीके अनुग्रहसे ब्रह्मसायुज्यको प्राप्त होता है॥ १ १/२॥ | | ऋषय ऊचुः<br>कथं लिङ्गमभूल्लिङ्गे समभ्यर्च्यः स शङ्करः॥ २<br>किं लिङ्गं कस्तथा लिङ्गी सूत वक्तुमिहार्हसि। | **ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! लिङ्गकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई तथा उस लिङ्गमें शंकरजीकी उपासना कैसे की जानी चाहिये? लिङ्ग क्या है तथा लिङ्गी कौन है? यह आप हमें बताइये॥ २ १/२॥ | | रोमहर्षण उवाच<br>एवं देवाश्च ऋषयः प्रणिपत्य पितामहम्॥ ३<br>अपृच्छन् भगवँल्लिङ्गं कथमासीदिति स्वयं।<br>लिङ्गे महेश्वरो रुद्रः समभ्यर्च्यः कथं त्विति॥ ४<br>किं लिङ्गं कस्तथा लिङ्गी सोऽप्याह च पितामहः। | **रोमहर्षण [ सूतजी ] बोले—**हे ऋषियो! इसी प्रकार अत्यन्त निवेदनपूर्वक देवताओंने भी पितामह ब्रह्मासे पूछा था कि हे भगवन्! यह लिङ्ग कैसे उत्पन्न हुआ तथा लिङ्गमें महेश्वर रुद्रका किस प्रकार पूजन होना चाहिये? लिङ्ग क्या है तथा लिङ्गी कौन है? इसपर वे ब्रह्मा बोले॥ ३-४ १/२॥ | | पितामह उवाच<br>प्रधानं लिङ्गमाख्यातं लिङ्गी च परमेश्वरः॥ ५<br>रक्षार्थमम्बुधौ महां विष्णोस्तवासीत्सुरोत्तमाः। | **पितामह [ ब्रह्माजी ]-ने कहा—**प्रधानको लिङ्ग तथा परमेश्वरको लिङ्गी कहा गया है। हे उत्तम देवताओ! यह मेरी तथा विष्णुकी रक्षाके लिये समुद्रमें प्रकट हुआ था॥ ५ १/२॥ | | वैमानिके गते सर्गे जनलोकं सहर्षिभिः॥ ६<br>स्थितिकाले तदा पूर्णे ततः प्रत्याहृते तथा।<br>चतुर्युगसहस्रान्ते सत्यलोकं गते सुराः॥ ७ | जब देवताओंकी सृष्टि समाप्त हो गयी, तब वे देवता ऋषियोंके साथ जनलोक चले गये और पुनः स्थिति-कालके पूर्ण होनेपर और इसके बाद हजार चतुर्युगीके अन्तमें पुनः प्रलयके उपस्थित होनेपर वे सत्यलोक चले गये॥ ६-७॥ | | विनाधिपत्यं समतां गतेऽन्ते ब्रह्मणो मम।<br>शुष्के च स्थावरे सर्वे त्वनावृष्ट्या च सर्वशः॥ ८<br>पशवो मानुषा वृक्षाः पिशाचाः पिशिताशनाः।<br>गन्धर्वाद्याः क्रमेणैव निर्दग्धा भानुभानुभिः॥ ९ | उस समय मैं ब्रह्मा बिना किसी आधिपत्यके साम्य-अवस्थाको प्राप्त था। इस प्रकार अन्तमें अनावृष्टिके कारण सभी स्थावर पदार्थोंके सूख जानेपर सभी ओर समस्त पशु, मनुष्य, वृक्ष, पिशाच, राक्षस, गन्धर्व आदि क्रमसे सूर्यकी किरणोंसे दग्ध हो गये॥ ८-९॥ | | एकार्णवे महाघोरे तमोभूते समन्ततः।<br>सुष्वापाम्भसि योगात्मा निर्मलो निरुपप्लवः॥ १० | तत्पश्चात् चारों ओर समुद्र-ही-समुद्रके व्याप्त हो |

७४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सहस्रशीर्षा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्।<br>सहस्रबाहुः सर्वज्ञः सर्वदेवभवोद्भवः॥ ११<br><br>हिरण्यगर्भो रजसा तमसा शङ्करः स्वयम्।<br>सत्त्वेन सर्वगो विष्णुः सर्वात्मत्वे महेश्वरः॥ १२<br><br>कालात्मा कालनाभास्तु शुक्लः कृष्णस्तु निर्गुणः।<br>नारायणो महाबाहुः सर्वात्मा सदसन्मयः॥ १३जाने तथा घोर अन्धकार छा जानेपर योगात्मा, निर्मल, उपद्रवरहित, हजार सिरोंवाले, हजार नेत्रोंवाले, हजार पैरोंवाले, हजार भुजाओंवाले, विश्वात्मा, सब कुछ जाननेवाले, सभी देवताओं तथा संसारकी उत्पत्ति करनेवाले, रजोगुणसे युक्त होनेके कारण ब्रह्मा, तमोगुणसे युक्त होनेके कारण स्वयं शंकर, सत्त्वगुणसे युक्त होनेके कारण सर्वव्यापी विष्णु, सबकी आत्मा होनेके कारण महेश्वर, कालात्मा, कालरूप नाभिवाले, शुक्ल, कृष्ण, गुणोंसे रहित, नारायण, महान् बाहुवाले तथा सत्-असत्से युक्त सर्वात्मा जलके मध्यमें शयन करने लगे॥ १०-१३॥
तथाभूतमहं दृष्ट्वा शयानं पङ्कजेक्षणम्।<br>मायया मोहितस्तस्य तमवोचममर्षितः॥ १४उन्हें इस प्रकार जल-स्थित कमलपर सोते हुए देखकर मैं उस क्षण उनकी मायासे मोहित हो गया और उन सनातनको हाथसे पकड़कर उठाते हुए क्रोधपूर्वक मैंने उनसे कहा—तुम कौन हो, यह मुझे बताओ? ॥ १४ १/२ ॥
कस्त्वं वदेति हस्तेन समुत्थाप्य सनातनम्।<br>तदा हस्तप्रहारेण तीव्रेण स दृढेन तु॥ १५तत्पश्चात् मेरे तेज तथा दृढ़ हस्त-प्रहारसे शेषनाग-रूपी शय्यासे उठकर इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले वे प्रभु उस क्षण बैठ गये॥ १५ १/२ ॥
प्रबुद्धोऽहीशयनात्समासीनः क्षणं वशी।<br>ददर्श निद्राविक्किन्ननीरजामललोचनः॥ १६<br><br>मामग्रे संस्थितं भासाध्यासितो भगवान् हरिः।<br>आह चोत्थाय भगवान् हसन्मां मधुरं सकृत्॥ १७इसके बाद निद्रासे विक्किन्न स्वच्छ कमलसदृश नेत्रोंवाले प्रभावयुक्त भगवान् हरिने अपने सम्मुख विराजमान मुझ ब्रह्माको देखा और उन भगवान्ने शय्यासे उठकर थोड़ा हँसते हुए मुझसे मधुर-मधुर वाणीमें कहा—हे महाद्युते! हे वत्स! हे पितामह! तुम्हारा स्वागत है, स्वागत है॥ १६-१७ १/२ ॥
स्वागतं स्वागतं वत्स पितामह महाद्युते।<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स्मितपूर्वं सुरर्षभाः॥ १८हे श्रेष्ठ देवताओ! उनका वह वचन सुनकर रजोगुणसे युक्त होनेके कारण शत्रुतापूर्ण भावसे मैंने मुसकराकर उन जनार्दनसे कहा—॥ १८ १/२ ॥
रजसा बद्धवैरश्च तमवोचं जनार्दनम्।<br>भाषसे वत्स वत्सेति सर्गसंहारकारणम्॥ १९हे अनघ! सृजन तथा संहार करनेवाले मुझ ब्रह्माको तुम 'वत्स! वत्स!' इस प्रकार सम्बोधित करते हुए जैसे गुरु शिष्यसे कहता है, उस प्रकारसे मुसकराकर क्यों बोल रहे हो? ॥ १९ १/२ ॥
मामिहान्तः स्मितं कृत्वा गुरुः शिष्यमिवानघ।<br>कर्तारं जगतां साक्षात्प्रकृतेश्च प्रवर्तकम्॥ २०<br><br>सनातनमजं विष्णुं विरिञ्चिं विश्वसम्भवम्।<br>विश्वात्मानं विधातारं धातारं पङ्कजेक्षणम्॥ २१<br><br>किमर्थं भाषसे मोहाद्वक्तुमर्हसि सत्वरम्।<br>सोऽपि मामाह जगतां कर्ताहमिति लोकप॥ २२जगत्के साक्षात् रचयिता, प्रकृतिके प्रवर्तक, सनातन, अजन्मा, पालनकर्ता, विश्वके उत्पत्तिकारक ब्रह्मा, विश्वात्मा, विधाता तथा धारणकर्ता मुझ कमलनयन पितामहसे मोहयुक्त होकर इस प्रकार क्यों बोल रहे हो? इसका

अध्याय १७] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य···शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कारण शीघ्र बताओ॥ २०-२१<sup></sup>/<sub></sub>
भर्ता हर्ता भवानङ्गादवतीर्णो ममाव्ययात्।<br>विस्मृतोऽसि जगन्नाथं नारायणमनामयम्॥ २३<br><br>पुरुषं परमात्मानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम्।<br>विष्णुमच्युतमीशानं विश्वस्य प्रभवोद्भवम्॥ २४इसपर उन्होंने भी मुझसे कहा—सम्पूर्ण जगत्का सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता तथा संहारकर्ता मैं (विष्णु) ही हूँ, ऐसा जानो और तुमने भी मुझ शाश्वत परमेश्वरके अंगसे ही अवतार ग्रहण किया है। फिर भी तुम मुझ जगत्पति, नारायण, रोग-विकाररहित, परम पुरुष, परमात्मा, सभीसे आवाहित होनेवाले, पुरुष्टुत, अच्युत, ऐश्वर्यसम्पन्न तथा विश्वकी उत्पत्तिके कारणस्वरूप मुझ विष्णुको भूल गये हो, किंतु इसमें तुम्हारा कोई अपराध नहीं है। यह सब तो मेरी मायाद्वारा रचा गया है॥ २२—२४<sup></sup>/<sub></sub>
तवापराधो नास्त्यत्र मम मायाकृतं त्विदम्।<br>शृणु सत्यं चतुर्वक्त्र सर्वदेवेश्वरो ह्यहम्॥ २५हे चार मुखवाले ब्रह्मन्! तुम यह सत्य जानो कि सृष्टिका कर्ता, पालक, संहारक तथा सभी देवताओंका स्वामी मैं ही हूँ। मेरे सदृश ऐश्वर्यवाला और कोई नहीं है॥ २५<sup></sup>/<sub></sub>
कर्ता नेता च हर्ता च न मयास्ति समो विभुः।<br>अहमेव परं ब्रह्म परं तत्त्वं पितामह॥ २६हे पितामह! मैं ही परम ब्रह्म हूँ, मैं ही परम तत्त्व हूँ, मैं ही परम ज्योति हूँ तथा मैं ही परम समर्थ परमात्मा हूँ॥ २६<sup></sup>/<sub></sub>
अहमेव परं ज्योतिः परमात्मा त्वहं विभुः।<br>यद्यद्दृष्टं श्रुतं सर्वं जगत्यस्मिंश्चराचरम्॥ २७हे चतुर्मुख! इस जगत्में जो भी समस्त स्थावर-जंगम वस्तुएँ दिखायी पड़ रही हैं अथवा जिनके बारेमें सुना जाता है; उन सबको मुझसे व्याप्त किया हुआ जानो॥ २७<sup></sup>/<sub></sub>
तत्तद्विद्धि चतुर्वक्त्र सर्वं मन्मयमृत्यथ।<br>मया सृष्टं पुरा व्यक्तं चतुर्विंशतिकं स्वयम्॥ २८<br><br>नित्यान्ता ह्यणवो बद्धाः सृष्टाः क्रोधोद्भवादयः।<br>प्रसादाद्धि भवानण्डान्यनेकानीह लीलया॥ २९प्राचीन कालमें मैंने ही स्वयं चौबीस तत्त्वमय व्यक्त सृष्टि रची है। नित्य अन्तको प्राप्त होनेवाले सूक्ष्मातिसूक्ष्म बद्धजीव, क्रोधसे उत्पन्न अन्यान्य तामसी सृष्टि तथा आप (ब्रह्मा)-सहित अनेक ब्रह्माण्ड मेरी मायाके प्रभावसे ही विरचित हैं॥ २८-२९॥
सृष्टा बुद्धिमया तस्यामहङ्कारस्त्रिधा ततः।<br>तन्मात्रापञ्चकं तस्मान्मनः षष्ठेन्द्रियाणि च॥ ३०<br><br>आकाशादीनि भूतानि भौतिकानि च लीलया।<br>इत्युक्तवति तस्मिंश्च मयि चापि वचस्तथा॥ ३१मैंने बुद्धिकी रचना की है तथा उसमें तीन प्रकारके अहंकारों (सात्त्विक, राजस, तामस)-का निर्माण किया है। इसी प्रकार अपनी मायासे पाँच तन्मात्राएँ एवं मन, इन्द्रियाँ, आकाश आदि पाँच महाभूतोंकी सृष्टि मैंने ही की है॥ ३०<sup></sup>/<sub></sub>
आवयोश्चाभवद्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम्।<br>प्रलयार्णवमध्ये तु रजसा बद्धवैरयोः॥ ३२यह वचन कहनेके अनन्तर रजोगुणकी वृद्धिसे परस्पर शत्रुता-भावको प्राप्त हम दोनोंमें उस प्रलय-सागरके मध्य भीषण रोमांचकारी संग्राम होने लगा॥ ३१-३२॥
एतस्मिन्नन्तरे लिङ्गमभवच्चावयोः पुरः।<br>विवादशमनार्थं हि प्रबोधार्थं च भास्वरम्॥ ३३इसी बीच हम दोनोंके कलहको दूर करने तथा
७६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृतहिन्दी
ज्वालामालासहस्राढ्यं कालानलशतोपमम्।<br>क्षयवृद्धिविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तवर्जितम् ॥ ३४<br><br>(चित्र)<br><br>अनौपम्यमनिर्देश्यमव्यक्तं विश्वसम्भवम्।ज्ञान प्रदान करनेके निमित्त एक दीप्तिमान् लिङ्ग हमलोगोंके समक्ष प्रकट हुआ। वह लिङ्ग हजारों अग्नि-ज्वालाओंसे व्याप्त, सैकड़ों कालानिके सदृश, क्षय तथा वृद्धिसे रहित, आदि-मध्य-अन्तसे हीन, अतुलनीय, अवर्णनीय, अव्यक्त तथा विश्वका उत्पत्तिकर्तरूप था॥ ३३-३४१/२॥
तस्य ज्वालासहस्रेण मोहितो भगवान् हरिः ॥ ३५<br>मोहितं प्राह मामत्र परीक्षावोऽग्निसम्भवम्।<br>अधोगमिष्याम्यनलस्तम्भस्यानुपमस्य च॥ ३६<br>भवानूर्ध्वं प्रयत्नेन गन्तुमर्हसि सत्वरम्।उस लिङ्गकी हजारों ज्वालाओंसे भगवान् विष्णु तथा मैं—दोनों लोग मोहित हो गये। फिर विष्णुने मुझसे कहा कि हमें अग्नि-उद्भूत इस लिङ्गका पता लगाना चाहिये। एतदर्थ मैं इस अनुपम अग्नि-स्तम्भके नीचे जाता हूँ और आप प्रयत्नपूर्वक शीघ्र इसके ऊपर जाइये॥ ३५-३६ १/२॥
एवं व्याहृत्य विश्वात्मा स्वरूपमकरोत्तदा॥ ३७<br>वाराहमहमप्याशु हंसत्वं प्राप्तवान् सुराः।<br>तदा प्रभृति मामाहुर्हसं हंसो विराडिति॥ ३८<br>हंस हंसेति यो ब्रूयान्मां हंसः स भविष्यति।हे देवताओ! ऐसा कहकर विश्वात्मा भगवान् विष्णुने वराहका रूप धारण कर लिया और मैं भी शीघ्र हंसके रूपको प्राप्त हो गया। उसी समयसे मुझ ब्रह्माको विराट् रूपवाले भगवान् विष्णु 'हंस' कहने लगे। जो प्राणी 'हंस-हंस' नामसे मेरा कीर्तन करता है, वह हंसत्वको प्राप्त हो जाता है॥ ३७-३८ १/२॥
सुश्वेतो ह्यनलाक्षश्च विश्वतः पक्षसंयुतः॥ ३९<br>मनोऽनिलजवो भूत्वा गतोऽहं चोर्ध्वतः सुराः।हे देवताओ! उस समय मैं अत्यन्त श्वेत वर्णका था, मेरे नेत्र अग्निके समान थे और मैं सभी ओरसे पंखोंसे युक्त था—इस प्रकार हंसरूपमें मैं मनरूपी वायुके वेगसे उड़कर ऊपरकी ओर गया॥ ३९ १/२॥
नारायणोऽपि विश्वात्मा नीलाञ्जनचयोपमम्॥ ४०<br>दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम्।<br>मेरुपर्वतवर्ष्माणं गौरतीक्ष्णाग्रदंष्ट्रिणम्॥ ४१<br>कालादित्यसभाभासं दीर्घघोणं महास्वनम्।<br>ह्रस्वपादं विचित्राङ्गं जैत्रं दृढमनौपमम्॥ ४२<br>वाराहमसितं रूपमास्थाय गतवानधः।उधर विश्वात्मा नारायण विष्णु भी दस योजन चौड़े तथा शत योजन लम्बे और नीले अंजनके समूहसदृश, मेरुपर्वत-तुल्य शरीरवाले, श्वेत तथा तीक्ष्ण दंष्ट्रांकुर एवं विशाल थूथनवाले, छोटे-छोटे पैरोंवाले, विचित्र अंगोंवाले, प्रलयकालीन सूर्यके समान प्रकाशमान, दृढ़, अनुपमेय, भीषण शब्दवाले तथा सर्वथा अपराजेय कृष्णवाराहका रूप धारण करके उस अग्नि-स्तम्भ (लिङ्ग)-के नीचेकी ओर गये॥ ४०-४२ १/२॥
एवं वर्षसहस्रं तु त्वरन् विष्णुरधोगतः॥ ४३<br>नापश्यदल्पमप्यस्य मूलं लिङ्गस्य सूकरः।इस प्रकार विष्णुभगवान् एक हजार वर्षतक वेगपूर्वक नीचेकी ओर जाते रहे, किंतु वाराहरूप विष्णु इस लिङ्गके मूलका अल्पांश भी नहीं देख सके॥ ४३ १/२॥
तावत्कालं गतो ह्यूर्ध्वमहमप्यरिसूदनः॥ ४४<br>सत्वरं सर्वयत्नेन तस्यान्तं ज्ञातुमिच्छया।<br>श्रान्तो ह्यदृष्ट्वा तस्यान्तमहङ्कारादधोगतः॥ ४५शत्रुओंका दमन करनेवाला मैं ब्रह्मा भी उस लिङ्गका अन्त जाननेकी इच्छासे पूरे प्रयासके साथ शीघ्रतापूर्वक ऊपरकी ओर जाता रहा॥ ४४ १/२॥

अध्याय १७] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य···शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तथैव भगवान् विष्णुः श्रान्तः सन्त्रस्तलोचनः।<br>सर्वदेवभवस्तूर्णमुत्थितः स महावपुः॥ ४६तत्पश्चात् अहंकारपूर्वक ऊपर गया हुआ मैं उस लिङ्गका अन्त न देखकर अत्यन्त थका हुआ नीचे लौट आया और उसी प्रकार सभी देवताओंके उद्भवकर्ता तथा महान् शरीरवाले वे भगवान् विष्णु भी थकान एवं सन्त्रासभरे नेत्रोंके साथ लिङ्गका मूल न पाकर नीचेसे ऊपर आ गये॥ ४५-४६॥
समागतो मया सार्धं प्रणिपत्य महामनाः।<br>मायया मोहितः शम्भोस्तस्थौ संविग्नमानसः॥ ४७शंकरकी मायासे मोहको प्राप्त वे महामना विष्णु मेरे साथ आकर परमेश्वरको प्रणाम करके व्याकुल मनसे खड़े हो गये।
पृष्ठतः पार्श्वतश्चैव चाग्रतः परमेश्वरम्।<br>प्रणिपत्य मया सार्धं सस्मार किमिदं त्विति॥ ४८इसके बाद मेरे साथ पुनः परमेश्वरको पीछेसे, बगलसे तथा आगेसे प्रणाम करके वे विचार करने लगे कि [आदि-अन्तहीन] यह क्या है?॥ ४७-४८॥
तदा समभवत्तत्र नादो वै शब्दलक्षणः।<br>ओमोमिति सुरश्रेष्ठाः सुव्यक्तः प्लुतलक्षणः॥ ४९हे श्रेष्ठ देवताओ! उसी समय वहाँ प्लुत स्वरसे युक्त ‘ओम्-ओम्’ ऐसा अत्यन्त स्पष्ट शब्दरूप नाद सुनायी पड़ा॥ ४९॥
किमिदं त्विति सञ्चिन्त्य मया तिष्ठन् महास्वनम्।<br>लिङ्गस्य दक्षिणे भागे तदापश्यत्सनातनम्॥ ५०यह तीव्र शब्द क्या है— ऐसा मेरे साथ विचार करते हुए वे विष्णु खड़े रहे। तभी उन्होंने उस ‘ओम्’ नादके अन्तमें लिङ्गके दक्षिण भागमें सनातन आदि वर्ण
आद्यवर्णमकारं तु उकारं चोत्तरे ततः।<br>मकारं मध्यतश्चैव नादान्तं तस्य चोमिति॥ ५१अकार, उसके उत्तर भागमें उकार तथा उसके मध्यमें मकार देखा॥ ५०-५१॥
सूर्यमण्डलवद् दृष्ट्वा वर्णमाद्यं तु दक्षिणे।<br>उत्तरे पावकप्रख्यमुकारं पुरुषर्षभः॥ ५२इस प्रकार सूर्यमण्डलके समान आदि वर्ण अकारको लिङ्गके दक्षिणमें, अग्निके सदृश प्रतीत होनेवाले उकारको उत्तरमें
शीतांशुमण्डलप्रख्यं मकारं मध्यमं तथा।<br>तस्योपरि तदापश्यच्छुद्धस्फटिकवत्प्रभुम्॥ ५३तथा चन्द्रमण्डलके तुल्य मकारको मध्यमें देखनेके बाद उन पुरुषश्रेष्ठ विष्णुने उसके ऊपर
तुरीयातीतममृतं निष्कलं निरुपप्लवम्।<br>निर्द्वन्द्वं केवलं शून्यं बाह्याभ्यन्तरवर्जितम्॥ ५४तुरीयातीत, अमृतरूप, कलारहित, विकारशून्य, निर्द्वन्द्व, अद्वितीय, शून्यस्वरूप, बाह्य तथा आभ्यन्तरसे रहित,
सबाह्याभ्यन्तरं चैव सबाह्याभ्यन्तरस्थितम्।<br>आदिमध्यान्तरहितमानन्दस्यापि कारणम्॥ ५५बाह्य तथा आभ्यन्तरसे युक्त, बाह्य तथा आभ्यन्तर दोनों रूपोंमें स्थित, आदि-मध्य-अन्तसे रहित तथा आनन्दके भी कारणस्वरूप शुद्ध स्फटिकके सदृश प्रकाशमान प्रभुको देखा॥ ५२—५५॥
मात्रास्तिस्रस्त्वर्धमात्रं नादाख्यं ब्रह्मसंज्ञितम्।<br>ऋग्यजुःसामवेदा वै मात्रारूपेण माधवः॥ ५६अकार, उकार और मकाररूप तीन मात्राएँ तथा बिन्दुरूप अर्धमात्रास्वरूपवाला प्रणव ही नाद कहलाता है और वही ब्रह्मसंज्ञावाला है। ऋक्-यजुः तथा सामवेद उन तीनों मात्राओंके रूपमें विष्णु ही हैं॥ ५६॥
वेदशब्दैभ्य एवेशं विश्वात्मानमचिन्तयत्।<br>तदाभवदृषिर्वेद ऋषेः सारतमं शुभम्॥ ५७उसी वेदरूप शब्दके द्वारा विष्णुने विश्वात्मा

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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तेनैव ऋषिणा विष्णुर्ज्ञातवान् परमेश्वरम्।ईश्वर शिवका चिन्तन किया। उसी समयसे अतीन्द्रिय-दर्शक, परम-तत्त्वरूप कल्याणकारी वेद हुआ और उसी ऋषि (वेद)-से विष्णुने परमेश्वर शिवको जाना॥ ५७^{१/२} ॥
देव उवाच<br>चिन्तया रहितो रुद्रो वाचो यन्मनसा सह ॥ ५८<br>अप्राप्य तं निवर्तन्ते वाच्यस्त्वेकाक्षरेण सः।<br>एकाक्षरेण तद्वाच्यमृतं परमकारणम्॥ ५९<br>सत्यमानन्दममृतं परं ब्रह्म परात्परम्।<br>एकाक्षरादकाराख्यो भगवान् कनकाण्डजः॥ ६०देव (ब्रह्मा) बोले—वाणी भी मनके साथ जिन्हें प्राप्त न करके लौट आती है, उन चिन्तारहित भगवान् रुद्रका वाचक एकाक्षर प्रणव ही है और यही एकाक्षर प्रणव उस सृष्टिके परम कारणरूप, सत्य-आनन्द तथा अमृतरूप परात्पर परम ब्रह्मका भी वाचक है*॥ ५८-५९^{१/२}॥
एकाक्षरादुकाराख्यो हरिः परमकारणम्।<br>एकाक्षरान्मकाराख्यो भगवान्नीललोहितः॥ ६१उसी एकाक्षर प्रणवसे अकारसंज्ञक भगवान् ब्रह्मा, उकारसंज्ञक परमकारणस्वरूप विष्णु तथा मकारसंज्ञक परमेश्वर नीललोहितका प्रादुर्भाव हुआ है॥ ६०-६१॥
सर्गकर्ता त्वकाराख्यो ह्युकाराख्यस्तु मोहकः।<br>मकाराख्यस्तयोर्नित्यमनुग्रहकरोऽभवत् ॥ ६२अकारसंज्ञक ब्रह्मा सृष्टिके निर्माता, उकारसंज्ञक विष्णु मोह करनेवाले तथा मकारसंज्ञक शिव उन दोनों ब्रह्मा तथा विष्णुपर सदा अनुग्रह करनेवाले हैं॥ ६२॥
मकाराख्यो विभुर्बीजी ह्यकारो बीजमुच्यते।<br>उकाराख्यो हरियोंनिः प्रधानपुरुषेश्वरः॥ ६३मकाररूप भगवान् शिव बीजवान्, अकाररूप ब्रह्मा बीज तथा उकाररूप प्रधानपुरुषेश्वर विष्णु योनि कहे जाते हैं॥ ६३॥
बीजी च बीजं तद्योनिर्नादाख्यश्च महेश्वरः।<br>बीजी विभज्य चात्मानं स्वेच्छया तु व्यवस्थितः॥ ६४नादरूप महेश्वर शिव ही स्वयं बीजी, बीज तथा योनि—तीनों हैं। वे बीजीरूप महेश्वर स्वेच्छासे अपनेको विभाजित करके प्रतिष्ठित हैं॥ ६४॥
अस्य लिङ्गादभूद्बीजमकारो बीजिनः प्रभोः।<br>उकारयोनौ निक्षिप्तमवर्धत समन्ततः॥ ६५<br>सौवर्णमभवच्चाण्डमावेष्ट्याद्यं तदक्षरम्।<br>अनेकाब्दं तथा चाप्सु दिव्यमण्डं व्यवस्थितम्॥ ६६इन बीजीरूप परमेश्वर शिवके लिङ्गसे अकाररूप बीज (ब्रह्मा), उकाररूप योनि (विष्णु)-में गिरकर चारों ओर वृद्धिको प्राप्त होने लगा और वह फिर स्वर्णका अण्ड हो गया। इसके बाद एकाक्षर प्रणवको आदि-अन्तसे आवेष्टित करके वह दिव्य अण्ड बहुत वर्षोंतक जलमें स्थित रहा॥ ६५-६६॥
ततो वर्षसहस्रान्ते द्विधा कृतमजोद्भवम्।<br>अण्डमप्सु स्थितं साक्षादाद्याख्येनेश्वरेण तु॥ ६७तदनन्तर हजार वर्षोंके बाद साक्षात् आदिरूप परमेश्वरने जलमें स्थित उस अजोद्भूत अण्डको दो भागोंमें कर दिया॥ ६७॥
तस्याण्डस्य शुभं हैमं कपालं चोर्ध्वसंस्थितम्।<br>जज्ञे यद् द्यौस्तदपरं पृथिवी पञ्चलक्षणा॥ ६८उस अण्डके ऊर्ध्वस्थित हेममय पवित्र कपालसे आकाश तथा नीचेके भागसे पाँच लक्षणोंसे सम्पन्न पृथ्विकी उत्पत्ति हुई॥ ६८॥

* यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। (तैत्ति० २।४।१)

अध्याय १७] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य···शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७९


श्लोकअर्थ
तस्मादण्डोद्भवो जज्ञे त्वकाराख्यश्चतुर्मुखः।<br>स स्रष्टा सर्वलोकानां स एव त्रिविधः प्रभुः॥ ६९॥उसी अण्डसे अकारसंज्ञक चतुर्मुख ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। अतएव वही लिङ्गरूप प्रणव सभी लोकोंकी सृष्टि करनेवाला है तथा वही प्रणव अकार-उकार-मकाररूप तीन प्रकारका ईश्वर है॥ ६९॥
एवमोमोमिति प्रोक्तमित्याहुर्यजुषां वराः।<br>यजुषां वचनं श्रुत्वा ऋचः सामानि सादरम्॥ ७०<br><br>एवमेव हरे ब्रह्मन्नित्याहुः श्रुतयस्तदा।<br>ततो विज्ञाय देवेशं यथावच्छ्रुतिसम्भवैः॥ ७१इस प्रकार वह प्रणव ओम्-ओमरूप ब्रह्म कहा गया है—ऐसा यजुर्वेदके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ मनीषियोंने कहा है और उन यजुर्वेद-ज्ञाताओंके वचन सुनकर उसे ऋग्वेदकी ऋचाओं तथा साममन्त्रोंने भी आदरपूर्वक स्वीकार किया है और इसी तरह सभी श्रुतियोंने उसी 'ओम्' को सदा हे हरे! हे ब्रह्मन्! के रूपमें सम्बोधित किया है॥ ७०½॥<br><br>इस वेद-वाक्य आदिसे शिवको यथावत् जानकर हम दोनों वैदिक मन्त्रोंसे महोदय देवेश्वर महादेवकी स्तुति करने लगे॥ ७१½॥
मन्त्रैर्महेश्वरं देवं तुष्टाव सुमहोदयम्।<br>आवयोः स्तुतिसन्तुष्टो लिङ्गे तस्मिनिरञ्जनः॥ ७२हम दोनोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर मायाके आवरणसे रहित महेश्वर दिव्य शब्दमय रूप धारणकर हँसते हुए उस लिङ्गमें प्रकट हुए॥ ७२½॥
दिव्यं शब्दमयं रूपमास्थाय प्रहसन् स्थितः।<br>अकारस्तस्य मूर्द्धा तु ललाटं दीर्घमुच्यते॥ ७३<br><br>इकारो दक्षिणं नेत्रमीकारो वामलोचनम्।<br>उकारो दक्षिणं श्रोत्रमूकारो वाममुच्यते॥ ७४<br><br>ऋकारो दक्षिणं तस्य कपोलं परमेष्ठिनः।<br>वामं कपोलमॄकारो लॢलॄ नासापुटे उभे॥ ७५<br><br>एकारमोष्ठमूर्ध्वञ्च ऐकारस्त्वधरो विभोः।<br>ओकारश्च तथौकारो दन्तपङ्क्तिद्वयं क्रमात्॥ ७६<br><br>अमस्तु तालुनी तस्य देवदेवस्य धीमतः।<br>कादिपञ्चाक्षराण्‍यस्य पञ्च हस्तानि दक्षिणे॥ ७७<br><br>चादिपञ्चाक्षराण्‍येवं पञ्च हस्तानि वामतः।<br>टादिपञ्चाक्षरं पादस्तादिपञ्चाक्षरं तथा॥ ७८<br><br>पकारमुदरं तस्य फकारः पार्श्वमुच्यते।<br>बकारो वामपार्श्वं वै भकारं स्कन्धमस्य तत्॥ ७९<br><br>मकारं हृदयं शम्भोर्महादेवस्य योगिनः।<br>यकारादिसकारान्ता विभोर्वै सप्तधातवः॥ ८०<br><br>हकार आत्मरूपं वै क्षकारः क्रोध उच्यते।<br>तं दृष्ट्वा उमया सार्द्धं भगवन्तं महेश्वरम्॥ ८१अकार उनका मस्तक तथा दीर्घ (आकार) उनका ललाट कहा जाता है। इकार दाहिना नेत्र, ईकार बायाँ नेत्र, उकार दाहिना कान, ऊकार बायाँ कान, ऋकार उन परमेष्ठी महेश्वरका दायाँ कपोल, ॠकार उनका बायाँ कपोल, लृ तथा लॄ क्रमशः उनके दाहिने तथा बायें—दोनों नासापुट, एकार ऊपरी ओष्ठ, ऐकार उन प्रभुका नीचेका ओष्ठ, ओकार तथा औकार क्रमशः ऊपर तथा नीचेकी दन्त-पंक्तियाँ, अं तथा अः उन धीमान् देवदेवके क्रमशः ऊपर तथा नीचेके तालु, ककार आदि पाँच अक्षर (क, ख, ग, घ, ङ) उनके दाहिनी ओरके पाँच हाथ, इसी प्रकार चकार आदि पाँच अक्षर बायीं ओरके पाँच हाथ, टकार आदि पाँच अक्षर दायाँ पैर, तकार आदि पाँच अक्षर बायाँ पैर, पकार उन परमेश्वरका उदर, फकार दाहिना पार्श्व, बकार बायाँ पार्श्व, भकार उनका स्कन्ध, मकार परम योगी महादेव शंकरका हृदय, यकारसे लेकर सकारपर्यन्त सात वर्ण (य, र, ल, व, श, ष, स) उन प्रभुके सातों धातु*, हकार उनकी आत्मा तथा क्षकार उनका क्रोध कहा गया है॥ ७३–८०½॥

* रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र—ये सात शरीरस्थ धातुएँ हैं।

८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग


| प्रणम्य भगवान् विष्णुः पुनश्चापश्यदूर्ध्वतः।<br>ॐकारप्रभवं मन्त्रं कलापञ्चकसंयुतम्॥ ८२<br><br>शुद्धस्फटिकसङ्काशं शुभाष्टत्रिंशदक्षरम्।<br>मेधाकरमभूद्भूयः सर्वधर्मार्थसाधकम्॥ ८३<br><br>गायत्रीप्रभवं मन्त्रं हरितं वश्यकारकम्।<br>चतुर्विंशति वर्णाढ्यं चतुष्कलमनुत्तमम्॥ ८४<br><br>अथर्वमसितं मन्त्रं कलाष्टकसमायुतम्।<br>अभिचारिकमत्यर्थं त्रयस्त्रिंशच्छुभाक्षरम्॥ ८५<br><br>यजुर्वेदसमायुक्तं पञ्चत्रिंशच्छुभाक्षरम्।<br>कलाष्टकसमायुक्तं सुश्वेतं शान्तिकं तथा॥ ८६<br><br>त्रयोदशकलायुक्तं बालाद्यैः सह लोहितम्।<br>सामोद्भवं जगत्याद्यं वृद्धिसंहारकारणम्॥ ८७<br><br>वर्णाः षडधिकाः षष्टिरस्य मन्त्रवरस्य तु।<br>पञ्चमन्त्रांस्तथा लब्ध्वा जजाप भगवान् हरिः॥ ८८ | उमाके साथ उन भगवान् महेश्वरको देखकर पुनः उन्हें प्रणाम करके जब भगवान् विष्णुने ऊपरकी ओर देखा तब उन्हें ॐकारसे उत्पन्न, पाँच कलाओंसे युक्त, बुद्धिविवर्धक तथा सभी धर्म-अर्थको सिद्ध करनेवाला शुद्ध स्फटिक-तुल्य अत्यन्त शुभ्र तथा अड़तीस शुभ अक्षरोंवाला पवित्र मन्त्र (ईशानः सर्वविद्यानाम् ०)¹ दृष्टिगोचर हुआ। साथ ही गायत्रीसे उत्पन्न, चार कलाओंवाला, चौबीस अक्षरोंसे युक्त तथा वश्यकारक हरित वर्ण अत्युत्तम मन्त्र (तत्पुरुषाय विद्महे ०)²; अथर्ववेदसे उत्पन्न आठ कलाओंसे युक्त तैंतीस शुभ अक्षरोंवाला कृष्णवर्ण तथा अत्यन्त अभिचारिक अघोर-मन्त्र (अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्य ०)³; यजुर्वेदसे प्रादुर्भूत, आठ कलाओंवाला, श्वेतवर्णवाला, शान्तिकारक पैंतीस अक्षरोंसे युक्त पवित्र सद्योजात मन्त्र (सद्योजातं प्रपद्यामि ०)⁴ एवं सामवेदसे उत्पन्न, रक्तवर्ण, बाल आदि तेरह कलाओंसे युक्त, जगत्का आदि स्वरूप तथा वृद्धि-संहारका कारणरूप छाछठ अक्षरोंवाला उत्तम मन्त्र (वामदेवाय नमो ०)⁵ दृष्टिगत हुए। इन पाँचों मन्त्रोंको प्राप्तकर भगवान् विष्णुने इनका जप करना आरम्भ कर दिया॥ ८१—८८॥ | | अथ दृष्ट्वा कलावर्णमृग्यजुःसामरूपिणम्।<br>ईशानमीशमुकुटं पुरुषास्यं पुरातनम्॥ ८९<br><br>अघोरहृदयं हृद्यं वामगुह्यं सदाशिवम्।<br>सद्यः पादं महादेवं महाभोगीन्द्रभूषणम्॥ ९०<br><br>विश्वतः पादवदनं विश्वतोऽक्षिकरं शिवम्।<br>ब्रह्मणोऽधिपतिं सर्गस्थितिसंहारकारणम्॥ ९१<br><br>तुष्टाव पुनरिष्टाभिर्वाग्भिर्वरदमीश्वरम्॥ ९२ | तत्पश्चात् समस्त कलाओंकी कान्तिसे युक्त, ऋक्-यजुः-सामस्वरूप, ईशान मन्त्ररूप मुकुटवाले, तत्पुरुष मन्त्ररूप मुखवाले, अघोर मन्त्ररूप करुणामय हृदयवाले, वामदेव मन्त्र-रूप सदा कल्याणकर गुह्यस्थान-वाले तथा सद्योजात मन्त्ररूप चरणोंवाले, विशाल सर्पोंका आभूषण धारण करनेवाले, चारों ओर पैर-मुख-आँख धारण किये हुए, सृष्टि-पालन-संहारके कारणस्वरूप, पुरातन पुरुष महादेव ब्रह्माधिपति शिवको देखकर भगवान् विष्णु अभीष्ट स्तुतियोंसे उन वरदाता परमेश्वर ईशानका पुनः स्तवन करने लगे॥ ८९—९२॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे लिङ्गोद्भवो नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'लिङ्गोद्भव' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १७॥


१. ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम्॥ (नारायणोपनिषद्)
२. तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ (नारायणोपनिषद्)
३. अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥ (नारायणोपनिषद्)
४. सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमोनमः। भवे भवे नाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः॥ (नारायणोपनिषद्)
५. वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः॥ (नारायणोपनिषद्)

१८- विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति तथा उसका माहात्म्य

अध्याय १८ ] विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति तथा उसका माहात्म्य [ ८१


अठारहवाँ अध्याय

विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति तथा उसका माहात्म्य

विष्णुरुवाच
एकाक्षराय रुद्राय अकारायात्मरूपिणे।<br>उकारायादिदेवाय विद्यादेहाय वै नमः॥ १भगवान् विष्णु बोले—अद्वितीय तथा नाशरहित प्रणवरूप रुद्रको नमस्कार है। अकाररूप परमात्मा तथा उकाररूप आदिदेव विद्यादेहको नमस्कार है॥ १॥
तृतीयाय मकाराय शिवाय परमात्मने।<br>सूर्याग्निसोमवर्णाय यजमानाय वै नमः॥ २तीसरे मकाररूप परमात्मा शिव और सूर्य-अग्नि-चन्द्रवर्णवाले रुद्र तथा यजमानरूपवाले महादेवको नमस्कार है॥ २॥
अग्नये रुद्ररूपाय रुद्राणां पतये नमः।<br>शिवाय शिवमन्त्राय सद्योजाताय वेधसे॥ ३रुद्ररूप अग्निको तथा रुद्रोंके पतिको नमस्कार है। शिवको, शिवमन्त्रको, सद्योजात-रूप वेधाको नमस्कार है॥ ३॥
वामाय वामदेवाय वरदायामृताय ते।<br>अघोराय्यातिघोराय सद्योजाताय रंहसे॥ ४सुन्दर वामदेवको, वरदाताको तथा अमृतरूप आप शिवको नमस्कार है। अघोरको, अतिघोरको तथा वेगरूप सद्योजातको नमस्कार है॥ ४॥
ईशानाय श्मशानाय अतिवेगाय वेगिने।<br>नमोऽस्तु श्रुतिपादाय ऊर्ध्वलिङ्गाय लिङ्गिने॥ ५ईशानको, श्मशान (काशीक्षेत्र)-को, अतिवेगशालीको, वेगवान्‌को, श्रुतिपाद (वेदोंसे ज्ञेय)-को, ऊर्ध्व लिङ्गको तथा लिङ्गीको नमस्कार है॥ ५॥
हेमलिङ्गाय हेमाय वारिलिङ्गाय चाम्भसे।<br>शिवाय शिवलिङ्गाय व्यापिने व्योमव्यापिने॥ ६हेमलिङ्गको, हेमको, जललिङ्गको, जलको, शिवको, शिवलिङ्गको, व्यापीको तथा व्योममें व्याप्त रहनेवाले रुद्रको नमस्कार है॥ ६॥
वायवे वायुवेगाय नमस्ते वायुव्यापिने।<br>तेजसे तेजसां भर्त्रे नमस्तेजोऽधिव्यापिने॥ ७वायुको, वायुवेगको तथा वायुव्यापीको नमस्कार है। तेजोंके भी तेज तथा तेजको पूर्णतः व्याप्त करनेवाले भरणकर्ता आप रुद्रको नमस्कार है॥ ७॥
जलाय जलभूताय नमस्ते जलव्यापिने।<br>पृथिव्यै चान्तरिक्षाय पृथिवीव्यापिने नमः॥ ८जलको, जलभूत तथा जलमें व्याप्त रहनेवाले आप शिवको नमस्कार है। पृथिवीको, अन्तरिक्षको तथा पृथ्वीमें व्याप्त रहनेवाले महेश्वरको नमस्कार है॥ ८॥
शब्दस्पर्शस्वरूपाय रसगन्धाय गन्धिने।<br>गणाधिपतये तुभ्यं गुह्याद् गुह्यतमाय ते॥ ९शब्द तथा स्पर्शस्वरूपको, रस तथा गन्धस्वरूपको, गन्धीको, गणोंके अधिपति‌को तथा गुह्यसे भी गुह्यतम आप रुद्रको नमस्कार है॥ ९॥
अनन्ताय विरूपाय अनन्तानामयाय च।<br>शाश्वताय वरिष्ठाय वारिगर्भाय योगिने॥ १०शेषरूप अनन्तको, गरुडरूप विरूपको, रोग-विकारशून्य अनन्त शिवको, शाश्वत, वरिष्ठ, वारिगर्भको तथा महायोगी महेश्वरको नमस्कार है॥ १०॥
संस्थितायाम्भसां मध्ये आवयोर्मध्यवर्चसे।<br>गोप्त्रे हर्त्रे सदा कर्त्रे निधनायेश्वराय च॥ ११जलके मध्य स्थित रहनेवाले, हम दोनों (विष्णु तथा ब्रह्मा)-के मध्य प्रकाशमान, सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता,

८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग

श्लोकअर्थ
संहारकर्ता तथा मृत्युस्वरूप ईश्वरको नमस्कार है॥ ११॥
अचेतनाय चिन्त्याय चेतनायासहारिणे।<br>अरूपाय सुरूपाय अनङ्गायाङ्गहारिणे॥ १२चित्तजन्य ज्ञानसे रहित, चिन्तनके योग्य, जीवोंके जन्म-मरणरूप कष्टोंका हरण करनेवाले, रूपरहित तथा सुन्दर रूपवाले, अंगोंसे रहित कामदेवरूप तथा अंगोंका नाश करनेवाले रुद्रको नमस्कार है॥ १२॥
भस्मदिग्धशरीराय भानुसोमाग्निहेतवे।<br>श्वेताय श्वेतवर्णाय तुहिनाद्रिचराय च॥ १३<br><br>सुश्वेताय सुवक्त्राय नमः श्वेतशिखाय च।<br>श्वेतास्याय महास्याय नमस्ते श्वेतलोहित॥ १४भस्मसे भूषित शरीरवाले, सूर्य-चन्द्र-अग्निके कारणरूप, श्वेतरूप, श्वेत वर्णवाले, हिमाद्रिपर विचरण करनेवाले, अति श्वेतरूपसम्पन्न, सुन्दर वक्त्रवाले तथा श्वेत शिखाधारी, श्वेत मुखवाले, महान् मुखवाले हे श्वेतलोहित! आपको नमस्कार है॥ १३-१४॥
सुताराय विशिष्टाय नमो दुन्दुभिने हर।<br>शतरूपविरूपाय नमः केतुमते सदा॥ १५सुन्दर कान्तिवाले, विशिष्टतासम्पन्न तथा दुन्दुभि धारण करनेवाले, सैकड़ों रूपोंवाले, विशिष्ट रूपवाले तथा केतुमान् हे हर! आपको सर्वदा नमस्कार है॥ १५॥
ऋद्धिशोकविशोकाय पिनाकाय कपर्दिने।<br>विपाशाय सुपाशाय नमस्ते पाशनाशिने॥ १६ऋद्धि-शोक-विशोकस्वरूप, पिनाक धारण करनेवाले, जटाजूट धारण करनेवाले, बन्धनमुक्त, सुन्दर पाश धारण करनेवाले तथा पाशहर आप रुद्रको नमस्कार है॥ १६॥
सुहोत्राय हविष्याय सुब्रह्मण्याय सूरिणे।<br>सुमुखाय सुवक्त्राय दुर्दम्याय दमाय च॥ १७<br>कङ्काय कङ्करूपाय कङ्कणीकृतपन्नग।<br>सनकाय नमस्तुभ्यं सनातन सनन्दन॥ १८<br>सनत्कुमार सारङ्गमारणाय महात्मने।<br>लोकाक्षिणे त्रिधामाय नमो विरजसे सदा॥ १९हे भुजंगरूप कंकण (कंगन) धारण करनेवाले! आप श्रेष्ठ यजनकर्ता, हविष्यरूप, सुब्रह्मण्य, महाविद्या-सम्पन्न, सुन्दर मुखवाले, शुभ वक्त्रवाले, दुर्दमनीय, दमन करनेवाले, कंक (कपटद्विजरूप), कंकरूप (यम-स्वरूप)-को नमस्कार है। आप सनकको नमस्कार है। हे सनातनरूप! हे सनन्दनरूप! हे सनत्कुमाररूप! पशु-पक्षियोंको मारनेके लिये किरातरूप! महात्मा, संसारके नेत्ररूप, तीन धामोंवाले तथा आप विरजको सदा नमस्कार है॥ १७-१९॥
शङ्खपालाय शङ्खाय रजसे तमसे नमः।<br>सारस्वताय मेघाय मेघवाहन ते नमः॥ २०शंखपाल, शंखरूप, रज तथा तम गुणोंसे युक्त शिवको नमस्कार है। हे मेघवाहन! आप मेघरूप तथा सारस्वतको नमस्कार है॥ २०॥
सुवाहाय विवाहाय विवादवरदाय च।<br>नमः शिवाय रुद्राय प्रधानाय नमो नमः॥ २१भलीभाँति सबको वहन करनेवाले, विशिष्ट वाहनवाले, वाद (तर्क-वितर्क)-से रहित भक्तोंको वर देनेवाले, प्रधानरूप, कल्याणप्रद रुद्रको नमस्कार है, नमस्कार है॥ २१॥
त्रिगुणाय नमस्तुभ्यं चतुर्व्यूहात्मने नमः।<br>संसाराय नमस्तुभ्यं नमः संसारहेतवे॥ २२तीन गुणोंवाले आपको नमस्कार है। चतुर्व्यूहरूप आपको नमस्कार है। संसारस्वरूप तथा संसारके कारण-रूप आपको बार-बार नमस्कार है॥ २२॥

अध्याय १८] विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति तथा उसका माहात्म्य ८३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मोक्षाय मोक्षरूपाय मोक्षकर्त्रे नमो नमः।<br>आत्मने ऋषये तुभ्यं स्वामिने विष्णवे नमः॥ २३मोक्ष, मोक्षरूप तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आत्मास्वरूप, ऋषि, स्वामी तथा व्यापक शिवको नमस्कार है॥ २३॥
नमो भगवते तुभ्यं नागानां पतये नमः।<br>ओङ्काराय नमस्तुभ्यं सर्वज्ञाय नमो नमः॥ २४आप भगवान्‌को नमस्कार है। आप सर्पोंके पतिको नमस्कार है। आप ओंकारको नमस्कार है। सर्वज्ञको बार-बार नमस्कार है॥ २४॥
सर्वाय च नमस्तुभ्यं नमो नारायणाय च।<br>नमो हिरण्यगर्भाय आदिदेवाय ते नमः॥ २५आप सर्व (पूर्णस्वरूप)-को नमस्कार है और नारायणको नमस्कार है। हिरण्यगर्भको नमस्कार है। आप आदिदेवको नमस्कार है॥ २५॥
नमोस्त्वजाय पतये प्रजानां व्यूहहेतवे।<br>महादेवाय देवानामीश्वराय नमो नमः॥ २६अज, प्रजापति, व्यूहहेतु, महादेव तथा देवताओंके ईश्वरको नमस्कार है, नमस्कार है॥ २६॥
शर्वाय च नमस्तुभ्यं सत्याय शमनाय च।<br>ब्रह्मणे चैव भूतानां सर्वज्ञाय नमो नमः॥ २७आप शर्वको नमस्कार है। सत्यरूप, शान्तिरूप, ब्रह्मस्वरूप तथा सर्वज्ञाताको नमस्कार है, नमस्कार है॥ २७॥
महात्मने नमस्तुभ्यं प्रज्ञारूपाय वै नमः।<br>चितये चितिरूपाय स्मृतिरूपाय वै नमः॥ २८आप महात्माको नमस्कार है। आप प्रज्ञारूपको नमस्कार है। चिति, चितिरूप तथा स्मृतिरूप आपको नमस्कार है॥ २८॥
ज्ञानाय ज्ञानगम्याय नमस्ते संविदे सदा।<br>शिखराय नमस्तुभ्यं नीलकण्ठाय वै नमः॥ २९आप ज्ञानरूप, ज्ञानगम्य तथा चैतन्यरूपको सर्वदा नमस्कार है। आप शिखरको नमस्कार है तथा नीलकण्ठको नमस्कार है॥ २९॥
अर्धनारीशरीराय अव्यक्ताय नमो नमः।<br>एकादशविभेदाय स्थाणवे ते नमः सदा॥ ३०अर्धनारीका शरीर धारण करनेवाले तथा अव्यक्तको बार-बार नमस्कार है। ग्यारह रूपोंमें परिवर्तित होनेवाले आप स्थाणुको सदा नमस्कार है॥ ३०॥
नमः सोमाय सूर्याय भवाय भवहारिणे।<br>यशस्कराय देवाय शङ्करायेश्वराय च॥ ३१सोम, सूर्य, भव, भवहारी, यशस्कर, देव, शंकर तथा ईश्वरको नमस्कार है॥ ३१॥
नमोऽम्बिकाधिपतये उमायाः पतये नमः।<br>हिरण्यबाहवे तुभ्यं नमस्ते हेमरेतसे॥ ३२पार्वतीपतिको नमस्कार है। उमापतिको नमस्कार है। आप हिरण्यबाहु तथा सुवर्णवीर्यको नमस्कार है॥ ३२॥
नीलकेशाय वित्ताय शितिकण्ठाय वै नमः।<br>कपर्दिने नमस्तुभ्यं नागाङ्गाभरणाय च॥ ३३नीलकेश, वित्त तथा शितिकण्ठको नमस्कार है। कपर्दी (जटाजूट धारण करनेवाले) तथा अंगोंके आभूषण-रूपमें सर्पोंको धारण करनेवाले आपको नमस्कार है॥ ३३॥
वृषारूढाय सर्वस्य हर्त्रे कर्त्रे नमो नमः।<br>वीररामातिरामाय रामनाथाय ते विभो॥ ३४वृषारूढ़ (बैलपर सवार होनेवाले) तथा सभीके कर्ता और हर्ताको बार-बार नमस्कार है। हे विभो! आप वीरराम, अतिराम तथा रामनाथको नमस्कार है॥ ३४॥
नमो राजाधिराजाय राज्ञामधिगताय ते।<br>नमः पालाधिपतये पालाशाकृन्तते नमः॥ ३५राजाओंके भी अधिराज तथा राजाओंके द्वारा प्राप्त

१९- महादेवजीद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुको वर प्रदान करना तथा उमामहेश्वर-पूजनके रूपमें लिङ्गपूजनकी परम्पराका प्रारम्भ

८४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

नमः केयूरभूषाय गोपते ते नमो नमः।<br>नमः श्रीकण्ठनाथाय नमो लिकुचपाणये॥ ३६किये जानेयोग्य आपको नमस्कार है। पालाशाकृन्त एवं पालाधिपतिको नमस्कार है॥ ३५॥<br>आभूषणके रूपमें सर्पका बाजूबन्द धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है। हे गोपते! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। श्रीकंठनाथको नमस्कार है। श्रीदण्डपाणिको नमस्कार है॥ ३६॥
भुवनेशाय देवाय वेदशास्त्र नमोऽस्तु ते।<br>सारङ्गाय नमस्तुभ्यं राजहंसाय ते नमः॥ ३७हे वेदशास्त्रस्वरूप! आप भुवनेशदेवको नमस्कार है। आप सारंग तथा राजहंसको नमस्कार है॥ ३७॥
कनकाङ्गदहाराय नमः सर्पोपवीतिने।<br>सर्पकुण्डलमालाय कटिसूत्रीकृताहिने॥ ३८धतूरेका बाजूबन्द तथा हार धारण करनेवाले एवं सर्पका जनेऊ धारण करनेवाले, सर्पोंका कुण्डल तथा माला पहननेवाले, सर्पका कटिसूत्र (करधनी) धारण करनेवाले, वेदगर्भ, गर्भरूप तथा विश्वगर्भ हे शिव! आपको नमस्कार है॥ ३८^{१}/_२॥
वेदगर्भाय गर्भाय विश्वगर्भाय ते शिव।
ब्रह्मोवाच<br>विरामेति संस्तुत्वा ब्रह्मणा सहितो हरिः॥ ३९ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार [मुझ] ब्रह्माके साथ विष्णुभगवान् स्तुति करके शान्त हो गये। पुण्य प्रदान करनेवाले तथा सभी पापोंका नाश करनेवाले इस उत्तम स्तोत्रका जो प्राणी पाठ करता है अथवा इसे वेदके पारगामी ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह पापकर्ममें लिप्त रहनेपर भी ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। अतएव सभी पापोंकी शुद्धिहेतु मनुष्यको विष्णुद्वारा कहे गये इस स्तोत्रका नित्य जप करना चाहिये, पाठ करना चाहिये तथा इसे धर्मनिष्ठ ब्राह्मणोंको सुनाना चाहिये॥ ३९—४२॥
एतत्स्तोत्रवरं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>यः पठेच्छ्रावयेद्वापि ब्राह्मणान् वेदपारगान्॥ ४०
स याति ब्रह्मणो लोके पापकर्मरतोऽपि वै।<br>तस्माज्जपेतद्वेनित्यं श्रावयेद् ब्राह्मणाञ्छुभान्॥ ४१
सर्वपापविशुद्ध्यर्थं विष्णुना परिभाषितम्॥ ४२

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विष्णुस्तवो नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विष्णुस्तव' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १८॥


उन्नीसवाँ अध्याय

महादेवजीद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुको वर प्रदान करना तथा उमामहेश्वर-पूजनके रूपमें लिङ्गपूजनकी परम्पराका प्रारम्भ

सूत उवाच<br>अथोवाच महादेवः प्रीतोऽहं सुरसत्तमौ।<br>पश्यतां मां महादेवं भयं सर्वं विमुच्यताम्॥ १सूतजी बोले—तदनन्तर महादेवजीने कहा—हे श्रेष्ठ देवद्वय (ब्रह्मा, विष्णु)! मैं आप दोनोंपर प्रसन्न हूँ। मुझ महादेवका दर्शन करो और सभी प्रकारके भयका त्याग कर दो॥ १॥
युवां प्रसूतौ गात्राभ्यां मम पूर्वं महाबलौ।<br>अयं मे दक्षिणे पार्श्वे ब्रह्मा लोकपितामहः॥ २आप दोनों महाबली देवता पूर्वकालमें मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए थे। सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ये ब्रह्मा मेरे दक्षिण (दायें) अंगसे तथा विश्वात्मा और हृदयोद्भव

अध्याय १९] महादेवजीद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुको वरप्रदान तथा लिङ्गपूजनकी परम्पराका प्रारम्भ ८५


| वामे पार्श्वे च मे विष्णुर्विश्वात्मा हृदयोद्भवः।<br>प्रीतोऽहं युवयोः सम्यग्वरं दद्मि यथेप्सितम्॥ ३ | ये विष्णु मेरे बायें अंगसे उत्पन्न हुए हैं। मैं आप दोनोंपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। अतएव यथेच्छ वर माँगो; मैं उसे अभी दूँगा॥ २-३॥ | | एवमुक्त्वा तु तं विष्णुं कराभ्यां परमेश्वरः।<br>पस्पर्श सुभागाभ्यां तु कृपया तु कृपानिधिः॥ ४ | इतना कहकर कृपानिधि परमेश्वर महादेवने अपने दोनों सुन्दर हाथोंसे प्रीतिपूर्वक उन विष्णुका स्पर्श किया॥ ४॥ | | ततः प्रहृष्टमनसा प्रणिपत्य महेश्वरम्।<br>प्राह नारायणो नाथं लिङ्गस्थं लिङ्गवर्जितम्॥ ५ | तब लिङ्गमें विराजित तथा लिङ्गदेहशून्य स्वेच्छासे विग्रह धारण करनेवाले महेश्वरको प्रणाम करके प्रसन्न मनसे नारायण विष्णुने कहा॥ ५॥ | | यदि प्रीतिः समुत्पन्ना यदि देयो वरश्च नौ।<br>भक्तिर्भवतु नौ नित्यं त्वयि चाव्यभिचारिणी॥ ६ | यदि आपके हृदयमें हमारे प्रति प्रीति-भाव उत्पन्न हुआ है और यदि हमें वरदान देना चाहते हैं, तो यही वर दीजिये कि आपके प्रति हम दोनोंकी सदा दृढ़ भक्ति बनी रहे॥ ६॥ | | देवः प्रदत्तवान् देवाः स्वात्मन्यव्यभिचारिणीम्।<br>ब्रह्मणे विष्णवे चैव श्रद्धां शीतांशुभूषणः॥ ७ | हे देवताओ! चन्द्रमाको आभूषणस्वरूप धारण करनेवाले महादेवने ब्रह्मा तथा विष्णुको अपनी अचल श्रद्धा-भक्ति प्रदान की॥ ७॥ | | जानुभ्यामवनीं गत्वा पुनर्नारायणः स्वयम्।<br>प्रणिपत्य च विश्वेशं प्राह मन्दतरं वशी॥ ८ | पुनः जमीनपर घुटना टेककर प्रणाम करते हुए इन्द्रियजित् नारायण विष्णुने साक्षात् विश्वेश्वर महादेवसे अत्यन्त मधुरतासे कहा॥ ८॥ | | आवयोर्देवदेवेश विवादमतिशोभनम्।<br>इहागतो भवान् यस्माद्विवादशमनाय नौ॥ ९ | हे देवदेवेश! हम दोनोंका यह विवाद तो अत्यन्त मङ्गलकारी सिद्ध हुआ; क्योंकि हम दोनोंके इसी विवादको समाप्त करनेके निमित्त आप यहाँ प्रकट हुए हैं॥ ९॥ | | तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पुनः प्राह हरो हरिम्।<br>प्रणिपत्य स्थितं मूर्ध्ना कृताञ्जलिपुटं स्मयन्॥ १० | उनका यह वचन सुनकर भगवान् शम्भुने दोनों हाथ जोड़े तथा सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए वहाँ स्थित विष्णुसे मुसकराकर पुनः कहा॥ १०॥ | | श्रीमहादेव उवाच<br>प्रलयस्थितिसर्गाणां कर्ता त्वं धरणीपते।<br>वत्स वत्स हरे विष्णो पालयैतच्चराचरम्॥ ११ | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पृथ्वीपते! उत्पत्ति, स्थिति तथा संहारके कर्ता आप हैं। हे वत्स! हे वत्स! हे हरे! हे विष्णो! आप इस चराचर जगत्‌का पालन कीजिये॥ ११॥ | | त्रिधा भिन्नो ह्यहं विष्णो ब्रह्मविष्णुभवाख्यया।<br>सर्गर्क्षालयगुणैर्निष्कलः परमेश्वरः॥ १२ | हे विष्णो! मैं निष्कल परमेश्वर ही ब्रह्मा, विष्णु तथा भव (रुद्र) नामोंसे अलग-अलग तीन प्रकारके रूपोंमें सृजन, पालन तथा संहारके गुणोंसे युक्त हूँ॥ १२॥ | | सम्मोहं त्यज भो विष्णो पालयैनं पितामहम्।<br>पाद्मे भविष्यति सुतः कल्पे तव पितामहः॥ १३ | हे विष्णो! आप मोहका त्याग करें और इन पितामहका पालन करें। ये पितामह पाद्म कल्पमें आपके पुत्र होंगे। | | तदा द्रक्ष्यसि मां चैवं सोऽपि द्रक्ष्यति पद्मजः।<br>एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ १४ | उस समय आप तथा आपके पुत्ररूप वे कमलोद्भव ब्रह्मा—दोनों लोग मेरा दर्शन प्राप्त करेंगे। |

२०- शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव, भगवान् शिवकी मायासे दोनोंका विमोहित होना, विष्णुद्वारा ब्रह्माके प्रति शिव-माहात्म्यका कथन

८६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| तदाप्रभृति लोकेषु लिङ्गार्चा सुप्रतिष्ठिता।<br>लिङ्गवेदी महादेवी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः ॥ १५<br><br>लयनाल्लिङ्गमित्युक्तं तत्रैव निखिलं सुराः।<br>यस्तु लैङ्गं पठेन्नित्यमाख्यानं लिङ्गसन्निधौ ॥ १६<br><br>स याति शिवतां विप्रो नात्र कार्या विचारणा ॥ १७ | ऐसा कहकर वे भगवान् महादेव वहीं अन्तर्धान हो गये॥ १३-१४॥<br><br>उसी समयसे लोकोंमें शिवलिङ्गके पूजनकी प्रसिद्धि व्याप्त हो गयी। लिङ्गवेदीके रूपमें महादेवी पार्वती तथा लिङ्गरूपमें साक्षात् महेश्वर प्रतिष्ठित रहते हैं॥ १५॥<br><br>हे देवताओ! समग्र जगत्‌को अपनेमें लय करनेके कारण यह लिङ्ग कहा गया है। जो विप्र शिवलिङ्गके समक्ष लिङ्ग-आख्यानका प्रतिदिन पाठ करता है, वह शिवत्वको प्राप्त हो जाता है, इसमें किसी भी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १६-१७॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विष्णुप्रबोधो नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विष्णुप्रबोध' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥


बीसवाँ अध्याय

शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव, भगवान् शिवकी मायासे दोनोंका विमोहित होना, विष्णुद्वारा ब्रह्माके प्रति शिवमाहात्म्यका कथन

| ऋषय ऊचुः<br>कथं पाद्मे पुरा कल्पे ब्रह्मा पद्मोद्भवोऽभवत्।<br>भवं च दृष्टवांस्तेन ब्रह्मणा पुरुषोत्तमः ॥ १<br>एतत्सर्वं विशेषेण साम्प्रतं वक्तुमर्हसि।<br><br>सूत उवाच<br>आसीदेकार्णवं घोरमविभागं तमोमयम् ॥ २<br>मध्ये चैकार्णवे तस्मिन् शङ्खचक्रगदाधरः।<br>जीमूताम्भोऽम्बुजाक्षश्च किरीटी श्रीपतिर्हरिः ॥ ३<br>नारायणमुखोद्गीर्णसर्वात्मा पुरुषोत्तमः।<br>अष्टबाहुर्महावक्षा लोकानां योनिरुच्यते ॥ ४<br>किमप्यचिन्त्यं योगात्मा योगमास्थाय योगवित्।<br>फणासहस्रकलितं तमप्रतिमवर्चसम् ॥ ५<br>महाभोगपतेर्भोगं साध्वास्तीर्य महोच्छ्रयम्।<br>तस्मिन् महति पर्यङ्के शेते चैकार्णवे प्रभुः ॥ ६ | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] प्राचीनकालमें पाद्म कल्पमें ब्रह्माजी कमलसे किस प्रकार जायमान हुए और पुरुषोत्तम विष्णुने उन ब्रह्माके साथ शिवका दर्शन कैसे किया? कृपया अब इन सब वृत्तान्तोंका आप विस्तारपूर्वक वर्णन करें॥ १ १/२॥<br><br>सूतजी बोले— प्रलयके समय चारों ओर जल-ही-जल तथा घोर, घनीभूत अन्धकार व्याप्त था। उस प्रलयसागरके मध्य शंख-चक्र-गदा धारण किये, नील मेघके सदृश वर्णवाले, कमलके समान नेत्रवाले, मुकुट धारण किये, आठ भुजाओंवाले, विशाल वक्षःस्थलवाले, लोकोंकी योनि कहे जानेवाले, सभी जीवात्माएँ जिनके मुखसे निकली हैं—ऐसे योगात्मा तथा योगवित् सर्वात्मा नारायण पुरुषोत्तम लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु किसी अनिर्वचनीय योगमें स्थित होकर, हजार फणोंसे सुशोभित शेषनागके अप्रतिम ओजसम्पन्न, अति उन्नत तथा छायायुक्त फणरूप शय्याको भलीभाँति बिछाकर प्रलय-सागर-स्थित उस महान् पर्यंक (शेषशय्या)-पर शयन कर रहे थे॥ २–६॥ |

अध्याय २० ] शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव [ ८७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं तत्र शयानेन विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>आत्मारामेण क्रीडार्थं लीलयाक्लिष्टकर्मणा॥ ७<br>शतयोजनविस्तीर्णं तरुणादित्यसन्निभम्।<br>वज्रदण्डं महोत्सेधं नाभ्यां सृष्टं तु पुष्करम्॥ ८इस प्रकार वहाँ शयन कर रहे गूढ़ रहस्योंवाले सर्वव्यापी आत्माराम विष्णुने अपनी क्रीड़ाके निमित्त अत्यन्त ऊँचे वज्रदण्डसे युक्त एक कमल, जो शतयोजन विस्तीर्ण तथा प्रखर सूर्यके समान था, अपनी नाभिसे लीलापूर्वक उत्पन्न किया॥ ७-८॥
तस्यैव क्रीडमानस्य समीपं देवमीढुषः।<br>हेमगर्भाण्डजो ब्रह्मा रुक्मवर्णो ह्यतीन्द्रियः॥ ९<br>चतुर्वक्त्रो विशालाक्षः समागम्य यदृच्छया।<br>श्रिया युक्तेन दिव्येन सुशुभेन सुगन्धिना॥ १०<br>क्रीडमानं च पद्मेन दृष्ट्वा ब्रह्मा शुभेक्षणम्।<br>सविस्मयमथागम्य सौम्यसम्पन्नया गिरा॥ ११<br>प्रोवाच को भवाञ्छेते ह्याश्रितो मध्यमम्भसाम्।कमलके साथ क्रीड़ारत उन देवश्रेष्ठ विष्णुके पास आकर हिरण्यगर्भ, अण्डज, सोनेके वर्णवाले, अतीन्द्रिय, चार मुखवाले तथा विशाल नेत्रोंवाले ब्रह्माने शोभासम्पन्न, दिव्य, सुन्दर तथा सुगन्धित कमलके साथ सुन्दर नयनोंवाले विष्णुको खेलते हुए देखा। तत्पश्चात् उनके सन्निकट पहुँचकर ब्रह्माजीने विस्मयपूर्ण भावसे विनम्रतायुक्त वाणीमें उनसे पूछा—आप कौन हैं और इस समुद्रके मध्य आश्रय लेकर क्यों सो रहे हैं?॥ ९—११ १/२॥
अथ तस्याच्युतः श्रुत्वा ब्रह्मणस्तु शुभं वचः॥ १२<br>उदतिष्ठत पर्यङ्काद्विस्मयोत्फुल्ललोचनः।<br>प्रत्युवाचोत्तरं चैव कल्पे कल्पे प्रतिश्रयः॥ १३उन ब्रह्माका यह सुखद वचन सुनकर विष्णुजी पर्यंकसे उठकर बैठ गये और नेत्रोंमें प्रसन्नता भरकर उनके उत्तरमें कहने लगे कि मैं प्रत्येक कल्पमें इसी स्थानका आश्रय लेकर शयन करता हूँ॥ १२-१३॥
कर्तव्यं च कृतं चैव क्रियते यच्च किञ्चन।<br>द्यौरन्तरिक्षं भूश्चैव परं पदमहं भुवः॥ १४जो कुछ भी किया जाना है, किया गया है और किया जा रहा है तथा स्वर्गलोक, आकाश, पृथ्वी एवं भुवर्लोक—इन सबका परम पद मैं ही हूँ॥ १४॥
तमेवमुक्त्वा भगवान् विष्णुः पुनरथाब्रवीत्।<br>कस्त्वं खलु समायातः समीपं भगवान् कुतः॥ १५<br>क्व वा भूयश्च गन्तव्यं कश्च वा ते प्रतिश्रयः।<br>को भवान् विश्वमूर्तिर्वै कर्तव्यं किं च ते मया॥ १६उनसे इस प्रकार कहकर भगवान् विष्णुने पुनः उनसे पूछा—ऐश्वर्यसम्पन्न आप कौन हैं तथा मेरे पास कहाँसे आये हैं? आप पुनः कहाँ जायँगे तथा आपका निवासस्थान कहाँ है? विश्वमूर्तिस्वरूप आप कौन हैं तथा मैं आपके लिये क्या करूँ?॥ १५-१६॥
एवं ब्रुवन्तं वैकुण्ठं प्रत्युवाच पितामहः।<br>मायया मोहितः शम्भोरविज्ञाय जनार्दनम्॥ १७<br>मायया मोहितं देवमविज्ञातं महात्मनः।<br>यथा भवांस्तथैवाहमादिकर्ता प्रजापतिः॥ १८विष्णुके ऐसा कहनेपर महात्मा शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण भगवान् जनार्दनको पहचाने बिना पितामह ब्रह्मा उन्हीं शिवकी मायासे मोहको प्राप्त अविज्ञात विष्णुदेवसे कहने लगे, जिस प्रकार आप इस जगत्के आदिकर्ता तथा प्रजापति हैं, वैसे ही मैं भी हूँ॥ १७-१८॥
सविस्मयं वचः श्रुत्वा ब्रह्मणो लोकतन्त्रिणः।<br>अनुज्ञातश्च ते नाथ वैकुण्ठो विश्वसम्भवः॥ १९<br>कौतूहलान्महायोगी प्रविष्टो ब्रह्मणो मुखम्।जगत्के रचयिता ब्रह्माजीका यह विस्मयकारी वचन सुनकर और उनकी आज्ञा लेकर विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले योगी महायोगी विष्णुभगवान् कौतूहलवश ब्रह्माके मुखमें प्रविष्ट हो गये॥ १९ १/२॥
इमानष्टादश द्वीपान् ससमुद्रान् सपर्वतान्॥ २०<br>प्रविश्य सुमहातेजाश्चातुर्वर्ण्यसमाकुलान्।<br>ब्रह्माण्डस्तम्बपर्यन्तं सप्तलोकान् सनातनान्॥ २१ब्रह्माजीके उदरमें प्रवेश करके वहाँपर अठारह द्वीपों, सभी समुद्रों, समस्त पर्वतों, ब्राह्मण आदि चार वर्णोंके जनसमूहों, सनातन सात लोकों तथा ब्रह्मासे
८८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्रह्मणस्तूदरे दृष्ट्वा सर्वान् विष्णुर्महाभुजः।<br>अहोऽस्य तपसो वीर्यमित्युक्त्वा च पुनः पुनः॥ २२<br>अटित्वा विविधाँल्लोकान् विष्णुर्नानाविधाश्रयान्।<br>ततो वर्षसहस्रान्ते नान्तं हि ददृशे यदा॥ २३<br>तदास्य वक्त्रान्निष्क्रम्य पन्नगेन्द्रनिकेतनः।<br>नारायणो जगद्धाता पितामहमथाब्रवीत्॥ २४लेकर तृणपर्यन्त सभी स्थावर-जंगम पदार्थ देखकर महाभुज महातेजस्वी विष्णुभगवान् अत्यन्त विस्मित हुए। 'अहो! इनकी तपस्याका ऐसा प्रभाव'—ऐसा बार-बार कहते हुए विष्णुभगवान् उदरके अन्दर विविध लोकों तथा अनेक स्थानोंपर हजार वर्षोंतक भ्रमण करते रहे, किंतु जब उसका अन्त नहीं पा सके, तब वे शेषशायी जगदाधार नारायण उन ब्रह्माके मुखमार्गसे बाहर निकलकर उनसे कहने लगे॥ २०—२४॥
भगवानादिरन्तश्च मध्यं कालो दिशो नभः।<br>नाहमन्तं प्रपश्यामि उदरस्य तवानघ॥ २५हे अनघ! आप भगवान् हैं। आप आदि, अन्त, मध्य, काल, दिशा, आकाश आदिसे युक्त हैं। मैं आपके उदरका अन्त नहीं देख पाया॥ २५॥
एवमुक्त्वाब्रवीद्भूयः पितामहमिदं हरिः।<br>भगवानेवमेवाहं शाश्वतं हि ममोदरम्॥ २६<br>प्रविश्य लोकान् पश्यैताननौपम्यान् सुरोत्तम।ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने ब्रह्मासे पुनः यह कहा—हे सुरश्रेष्ठ! मैं भी इसी तरह भगवान् हूँ। अब आप भी मेरे शाश्वत उदरमें प्रवेश करके इन्हीं अनुपम लोकोंका दर्शन करें॥ २६ १/२॥
ततः प्रह्लादिनीं वाणीं श्रुत्वा तस्याभिनन्द्य च॥ २७<br>श्रीपतेरुदरं भूयः प्रविवेश पितामहः।लक्ष्मीकान्त विष्णुकी यह आह्लादकारिणी वाणी सुनकर उन्हें प्रसन्न करते हुए ब्रह्माजी उनके उदरमें प्रविष्ट हुए॥ २७ १/२॥
तानेव लोकान् गर्भस्थानपश्यत्सत्यविक्रमः।<br>पर्यटित्वा तु देवस्य ददृशेऽन्तं न वै हरेः॥ २८सत्य पराक्रमवाले ब्रह्माजीने विष्णुके उदरमें स्थित उन्हीं सब लोकोंको देखा और उसमें बहुत भ्रमण करनेके उपरान्त भी विष्णुदेवके उदरका अन्त नहीं पा सके॥ २८॥
ज्ञात्वा गतिं तस्य पितामहस्य<br>द्वाराणि सर्वाणि विधाय विष्णुः।<br>विभुर्मनः कर्तुमियेष चाशु<br>सुखं प्रसुप्तोऽहमिति प्रचिन्त्य॥ २९सभी इन्द्रियद्वारोंको निरुद्ध करके मैं सुखपूर्वक सो लिया—ऐसा सोचकर और ब्रह्माजीकी गतिको जानकर सर्वव्यापक विष्णुजीने शीघ्र ही उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेकी इच्छा की॥ २९॥
ततो द्वाराणि सर्वाणि पिहितानि समीक्ष्य वै।<br>सूक्ष्मं कृत्वात्मनो रूपं नाभ्यां द्वारमविन्दत॥ ३०<br>पद्मसूत्रानुसारेण चान्वपश्यत्पितामहः।<br>उज्जहारात्मनो रूपं पुष्कराच्चतुराननः॥ ३१<br><br>विरराजारविन्दस्थः पद्मगर्भसमद्युतिः।<br>ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवाञ्जगद्योनिः पितामहः॥ ३२तत्पश्चात् सभी द्वारोंको बन्द देखकर पितामहने अत्यन्त सूक्ष्म रूप धारण करके नाभिमें मार्ग पाया तथा पद्मसूत्र (कमलनाल)-के सहारे पुष्कर (कमल)-से स्वयंको बाहर निकाला, तदनन्तर पद्मगर्भके समान कान्तिवाले जगद्योनि स्वयम्भू पितामह भगवान् ब्रह्मा कमलके ऊपर शोभित हुए॥ ३०—३२॥