श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ५७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| एवमाराध्य सम्प्राप्ता गाणपत्यं यथासुखम्।<br>तेनाहमतिदुःखार्तस्तपस्तप्तुमिहागतः ॥ १७ | और वे सुखपूर्वक वहाँ बैठकर गानयोगसे श्रीहरिकी आराधना करके गाणपत्यको प्राप्त हुए। इसी कारणसे मैं दुःखसे पीड़ित होकर तप करनेके लिये यहाँ आया हूँ॥ १३-१७॥ | | यद्दत्तं यद्धुतं चैव यथा वा श्रुतमेव च।<br>यदधीतं मया सर्वं कलां नार्हति षोडशीम् ॥ १८<br><br>विष्णोर्माहात्म्ययुक्तस्य गानयोगस्य वै ततः।<br>सञ्चिन्त्याहं तपो घोरं तदर्थं तप्तवान् द्विज ॥ १९<br><br>दिव्यवर्षसहस्रं वै ततो ह्यशृणुवं पुनः।<br>वाणीमाकाशसम्भूतां त्वामुद्दिश्य विहङ्गम ॥ २०<br><br>उलूकं गच्छ देवर्षे गानबन्धुं मतिर्यदि।<br>गाने चेद्वर्तते ब्रह्मन् तत्र त्वं वेत्स्यसे चिरात् ॥ २१<br><br>इत्यहं प्रेरितस्तेन त्वत्समीपमिहागतः।<br>किं करिष्यामि शिष्योऽहं तव मां पालयाव्यय ॥ २२ | मैंने जो कुछ दान किया है, यज्ञ किया है, कथा-श्रवण किया है और [सद्ग्रन्थोंका] अध्ययन किया है—वह सब भगवान् विष्णुके माहात्म्ययुक्त गानयोगकी सोलहवीं कलाके भी तुल्य नहीं है। हे द्विज! यह सोचकर मैंने उसके लिये एक हजार दिव्य वर्षोंतक कठोर तपस्या की। हे विहंगम! तत्पश्चात् आपको उद्देश्य करके उत्पन्न हुई एक आकाशवाणी मैंने सुनी—'हे देवर्षे! हे ब्रह्मन्! यदि गानमें तुम्हारा अनुराग है तो गानबन्धु उलूकके पास जाओ; वहाँ शीघ्र ही तुम इसका ज्ञान प्राप्त कर लोगे।' उसीसे प्रेरित होकर मैं आपके पास यहाँ आया हूँ। हे अव्यय! मैं क्या करूँ? मैं आपका शिष्य हूँ, अतः मेरी रक्षा कीजिये॥ १८-२२॥ | | गानबन्धुरुवाच<br>शृणु नारद यद्वृत्तं पुरा मम महामते।<br>अत्याश्चर्यसमायुक्तं सर्वपापहरं शुभम् ॥ २३ | गानबन्धु बोला—हे नारद! हे महामते! पूर्वकालमें मेरे साथ जो घटित हुआ है, उसे आप सुनें; यह अत्यन्त आश्चर्यसे भरा हुआ, सभी पापोंको दूर करनेवाला तथा मंगलकारी है॥ २३॥ | | भुवनेश इति ख्यातो राजाभूद्धार्मिकः पुरा।<br>अश्वमेधसहस्रैश्च वाजपेयायुतेन च ॥ २४<br><br>गवां कोट्यर्बुदे चैव सुवर्णस्य तथैव च।<br>वाससां रथहस्तीनां कन्याश्वानां तथैव च ॥ २५<br><br>दत्त्वा स राजा विप्रेभ्यो मेदिनीं प्रतिपालयन्।<br>निवारयन् स्वके राज्ये गेययोगेन केशवम् ॥ २६<br><br>अन्यं वा गेययोगेन गायन् यदि स मे भवेत्।<br>वध्यः सर्वात्मना तस्माद्वेदैरीड्यः परः पुमान् ॥ २७<br><br>गानयोगेन सर्वत्र स्त्रियो गायन्तु नित्यशः।<br>सूतमागधसङ्घाश्च गीतं ते कारयन्तु वै ॥ २८<br><br>इत्याज्ञाप्य महातेजा राज्यं वै पर्यपालयत्।<br>तस्य राज्ञः पुराभ्याशे हरिमित्र इति श्रुतः॥ २९ | प्राचीनकालमें भुवनेश—इस नामसे प्रसिद्ध एक धर्मपरायण राजा हुआ। हजार अश्वमेधयज्ञ तथा दस हजार वाजपेययज्ञके द्वारा ब्राह्मणोंको करोड़ों गायों, सुवर्ण, वस्त्र, रथों, हाथियों, कन्याओं तथा अश्वोंका दान देकर उस राजाने पृथ्वीका पालन करते हुए अपने राज्यमें गानयोगके द्वारा भगवान् श्रीहरिकी उपासना करनेसे लोगोंको रोक दिया था। 'यदि कोई गानयोगसे भगवान्की उपासना करेगा तो वह निश्चितरूपसे मेरा वध्य होगा, उस परम पुरुषकी स्तुति केवल वेदमन्त्रोंसे ही की जानी चाहिये। गानयोगके द्वारा केवल स्त्रियाँ ही सर्वत्र श्रीहरिका नित्य गान करें और जो सूत तथा मागध लोग हैं, वे गीत करायें'—ऐसी आज्ञा देकर महान् तेजस्वी राजा भुवनेश राज्य-शासन करने लगा॥ २४-२८ १/२॥ |
अध्याय ३ ] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति ५७७
| ब्राह्मणो विष्णुभक्तश्च सर्वद्वन्द्वविवर्जितः।<br>नदीपुलिनमासाद्य प्रतिमां च हरेः शुभाम्॥ ३०<br><br>अभ्यर्च्य च यथान्यायं घृतदध्युत्तरं बहु।<br>मिष्टान्नं पायसं दत्त्वा हरेरावेद्य पूपकम्॥ ३१<br><br>प्रणिपत्य यथान्यायं तत्र विन्यस्तमानसः।<br>अगायत हरिं तत्र तालवर्णलयान्वितम्॥ ३२<br><br>अतीव स्नेहसंयुक्तस्तद्गतेनान्तरात्मना।<br>ततो राज्ञः समादेशाच्चारास्तत्र समागताः॥ ३३ | उस राजाके पुरके निकट हरिमित्र—इस नामसे विख्यात एक ब्राह्मण रहता था; वह विष्णुभक्त तथा सभी प्रकारके [राग-द्वेष आदि] द्वन्द्वोंसे रहित था। नदीके तटपर आकर सम्यक् प्रकारसे श्रीहरिकी मनोहर प्रतिमाका अर्चन करके घृत, दधि, अनेकविध मिष्टान्न, खीर तथा पूआका नैवेद्य अर्पणकर उन्हें दण्डवत् प्रणामकर एकाग्रचित्त होकर वह ईश्वरमें आसक्त मनवाला होकर अत्यन्त प्रेमपूर्वक ताल-स्वर-लयसे युक्त हरि-गान किया करता था॥ २९—३२१/२॥ |
| तदर्चनादि सकलं निर्धूय च समन्ततः।<br>ब्राह्मणं तं गृहीत्वा ते राज्ञे सम्यङ्न्यवेदयन्॥ ३४ | तदनन्तर राजाके आदेशसे उसके अनुचर वहाँ आ गये। उसके पूजन आदिका समस्त सामान चारों ओर फेंककर उस ब्राह्मणको पकड़कर उन्होंने सम्यक् प्रकारसे उसे राजाको सौंप दिया॥ ३३-३४॥ |
| ततो राजा द्विजश्रेष्ठं परिभर्त्स्य सुदुर्मतिः।<br>राज्यान्निर्यांतयामास हृत्वा सर्वं धनादिकम्॥ ३५ | तदनन्तर अत्यन्त दुष्टबुद्धिवाले राजाने उस द्विजश्रेष्ठको डाँट-फटकारकर और उसका धन आदि सब कुछ छीनकर उसे राज्यसे बाहर निकाल दिया। |
| प्रतिमां च हरेश्चैव म्लेच्छा हृत्वा ययुः पुनः।<br>ततः कालेन महता कालधर्ममुपेयिवान्॥ ३६ | [ब्राह्मण हरिमित्रके द्वारा पूजित वहाँपर गिरी हुई] हरि-प्रतिमाका हरण करके उसे लेकर म्लेच्छलोग चले गये॥ ३५१/२॥ |
| स राजा सर्वलोकेषु पूज्यमानः समन्ततः।<br>क्षुधार्तश्च तथा खिन्नो यममाह सुदुःखितः॥ ३७<br><br>क्षुत्तृट् च वर्तते देव स्वर्गत्तस्यापि मे सदा।<br>मया पापं कृतं किं वा किं करिष्यामि वै यम॥ ३८ | तब सभी लोकोंमें पूजित होता हुआ वह राजा बहुत समय बाद मृत्युको प्राप्त हुआ। [यमलोक पहुँचकर] क्षुधासे पीड़ित तथा खिन्नमनस्क राजाने अत्यन्त दुःखी होकर यमराजसे कहा—'हे देव! मुझ स्वर्गप्राप्तको भी सदा भूख तथा प्यास सता रही है; मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है? हे यम! मैं क्या करूँ?'॥ ३६—३८॥ |
| यम उवाच<br>त्वया हि सुमहत्पापं कृतमज्ञानमोहतः।<br>हरिमित्रं प्रति तदा वासुदेवपरायणम्॥ ३९ | **यम बोले—**तुमने अज्ञानमोहित होनेके कारण वासुदेवमें अनुरक्त रहनेवाले हरिमित्रके प्रति पूर्वमें बहुत बड़ा पाप किया था। |
| हरिमित्रे कृतं पापं वासुदेवार्चनादिषु।<br>तेन पापेन सम्प्राप्तः क्षुद्रोगस्त्वां सदा नृप॥ ४० | हे राजन्! भगवान् वासुदेवकी अर्चना आदिके लिये हरिमित्रके प्रति तुमने जो पाप किया है, उसी पापके कारण तुम्हें निरन्तर भूखका रोग संतप्त कर रहा है। |
| दानयज्ञादिकं सर्वं प्रनष्टं ते नराधिप।<br>गीतवाद्यसमोपेतं गायमानं महामतिम्॥ ४१<br><br>हरिमित्रं समाहूय हृतवानसि तद्धनम्।<br>उपहारादिकं सर्वं वासुदेवस्य सन्निधौ॥ ४२ | तुम्हारा सारा दान, यज्ञ आदि विनष्ट हो गया है। हे नराधिप! गीत-वाद्यसे युक्त होकर हरि-गान करनेवाले महामति हरिमित्रको बुलाकर तुमने उसका धन छीन लिया, साथ ही तुम्हारे अनुचरोंने |
1985 Lingamahapuran_Section_20_1_Front
| ५७८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| मूल संस्कृत (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तव भृत्यैस्तदा लुप्तं पापं चक्रुस्त्वदाज्ञया।<br>हरेः कीर्तिं विना चान्यद्ब्राह्मणेन नृपोत्तम॥ ४३<br>न गेययोगे गातव्यं तस्मात्पापं कृतं त्वया।<br>नष्टस्ते सर्वलोकोऽद्य गच्छ पर्वतकोटरम्॥ ४४<br>पूर्वोत्सृष्टं स्वदेहं तं खादन्नित्यं निकृत्य वै।<br>तस्मिन् कोणे त्विमं देहं खादन्नित्यं क्षुधान्वितः॥ ४५<br>महानिरयसंस्थस्त्वं यावन्मन्वन्तरं भवेत्।<br>मन्वन्तरे ततोऽतीते भूम्यां त्वं च भविष्यसि॥ ४६<br>ततः कालेन सम्प्राप्य मानुष्यमवगच्छसि। | वासुदेव-प्रतिमाके पासमें विद्यमान समस्त उपहार आदिको नष्ट कर दिया; इस प्रकार तुम्हारी आज्ञासे ही उन्होंने पाप किया। हे नृपश्रेष्ठ! [तुमने आज्ञा दे रखी थी कि] ‘कोई भी ब्राह्मण श्रीहरिके कीर्तिगानके बिना ही उनकी उपासना करे और गानयोगके द्वारा उनका यशोगान न करे’—अतः तुमने पाप किया है। इससे तुम्हारा सम्पूर्ण लोक नष्ट हो गया है; अतः अब तुम पर्वतके कोटरमें जाओ और वहाँ पहलेसे पड़े हुए अपने शवको नोच-नोचकर नित्य खाते हुए निवास करो। क्षुधासे व्याकुल होकर उस पर्वत-कोटरमें नित्य अपने शवको खाते हुए तुम जबतक मन्वन्तर रहेगा, तबतक उसी घोर नरकमें पड़े रहो। तदनन्तर मन्वन्तर बीत जानेपर तुम पृथ्वीपर जन्म लोगे। [विभिन्न योनियोंमें जन्म लेते हुए पुनः] बहुत समयके बाद मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर तुम ज्ञान प्राप्त करोगे॥ ३९-४६ १/२॥ |
| गानबन्धुरुवाच<br>एवमुक्त्वा यमो विद्वांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ४७<br>हरिमित्रो विमानेन स्तूयमानो गणाधिपैः।<br>विष्णुलोकं गतः श्रीमान् सङ्गृह्य गणबान्धवान्॥ ४८ | गानबन्धु बोला—ऐसा कहकर विद्वान् यम वहीं अन्तर्धान हो गये और ऐश्वर्यशाली हरिमित्र अपने बान्धवगणोंको साथ लेकर गणाधिपोंसे स्तुत होता हुआ विमानसे विष्णुलोक चला गया॥ ४७-४८॥ |
| भुवनेशो नृपो ह्यस्मिन् कोटरे पर्वतस्य वै।<br>खादमानः शवं नित्यमास्ते क्षुत्तृट्समन्वितः॥ ४९ | राजा भुवनेश भूख-प्याससे युक्त होकर अपने शवको नित्य खाता हुआ इसी पर्वतके कोटरमें पड़ा रहता था॥ ४९॥ |
| अद्राक्षं तं नृपं तत्र सर्वमेतन्ममोक्तवान्।<br>समालोक्याहमाज्ञाय हरिमित्रं समेयिवान्॥ ५०<br>विमानेनार्कवर्णेन गच्छन्तममरैर्वृतम्।<br>इन्द्रद्युम्नप्रसादेन प्राप्तं मे ह्यायुरुत्तमम्॥ ५१ | मैंने उस राजाको वहाँ देखा और उसने ही मुझे यह सब बताया था। यह देखकर तथा सब कुछ जानकर मैं सूर्यके समान प्रभाववाले विमानसे जाते हुए तथा देवताओंसे घिरे हुए हरिमित्रके पास गया। इन्द्रद्युम्नके अनुग्रहसे मुझे उत्तम आयु प्राप्त हुई है। हे सुव्रत! उसीके प्रभावसे मैंने हरिमित्रका दर्शन किया है॥ ५०-५१ १/२॥ |
| तेनाहं हरिमित्रं वै दृष्टवानस्मि सुव्रत।<br>तदैश्वर्यप्रभावेन मनो मे समुपागतम्॥ ५२<br>गानविद्यां प्रति तदा किन्नरैः समुपाविशम्।<br>षष्टिं वर्षसहस्त्राणां गानयोगेन मे मुने॥ ५३<br>जिह्वा प्रसादिता स्पष्टा ततो गानमशिक्षयम्।<br>ततस्तु द्विगुणेनैव कालेनाभूदियं मम॥ ५४<br>गानयोगसमायुक्ता गता मन्वन्तरा दश।<br>गानाचार्योऽभवं तत्र गन्धर्वाद्याः समागताः॥ ५५ | उन्हींके ऐश्वर्यके प्रभावसे गानविद्याके प्रति मेरा मन आकृष्ट हुआ। हे मुने! साठ हजार वर्षोंतक मैं किन्नरोंके साथ गानका अभ्यास करता रहा, तब गानयोगसे मेरी जिह्वा पवित्र होकर स्पष्ट हो गयी, तत्पश्चात् मैं गानकी शिक्षा लेने लगा और उससे भी दुगुने समयमें मेरी यह जिह्वा गानयोगसे परिपूर्ण हो गयी। इस प्रकार [गानका अभ्यास करते हुए] दस मन्वन्तर बीत गये; अन्तमें मैं गानका |
अध्याय ३ ] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति ५७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एते किन्नरसङ्घा वै मामाचार्यमुपागताः।<br>तपसा नैव शक्या वै गानविद्या तपोधन ॥ ५६ | आचार्य हो गया। वहाँपर पहले गन्धर्व आदि और बादमें ये किन्नरोंके समुदाय मुझे आचार्य मानकर [मेरे पास] आने लगे॥ ५२–५५ १/२॥ |
| तस्माच्छ्रुतेन संयुक्तो मत्तस्त्वं गानमाप्नुहि।<br>एवमुक्तो मुनिस्तं वै प्रणिपत्य जगौ तदा ॥ ५७<br>तच्छृणुष्व मुनिश्रेष्ठ वासुदेवं नमस्य तु। | हे तपोधन! गानविद्या तपस्यासे कभी भी प्राप्त नहीं की जा सकती, अतः श्रवण-अभ्याससे युक्त होकर आप मुझसे गानविद्या प्राप्त करें। हे मुनिश्रेष्ठ! भगवान् वासुदेवको नमस्कार करके उस गानको सुनिये। तब ऐसा कहे गये वे मुनि नारद उसे प्रणाम करके गानाभ्यास करने लगे॥ ५६–५७ १/२॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>उलूकेनैवमुक्तस्तु नारदो मुनिसत्तमः ॥ ५८<br>शिक्षाक्रमेण संयुक्तस्तत्र गानमशिक्षयत्।<br>गानबन्धुस्तदाहेदं त्यक्तलज्जो भवाधुना ॥ ५९ | मार्कण्डेयजी बोले—उलूकके द्वारा ऐसा कहे गये मुनिश्रेष्ठ नारद शिक्षाक्रमसे युक्त होकर उससे गान सीखने लगे। उस समय गानबन्धु उलूकने [नारदजीसे] कहा—अब आप लज्जासे रहित हो जाइये॥ ५८–५९॥ |
| उलूक उवाच<br>स्त्रीसङ्गमे तथा गीते द्यूते व्याख्यानसङ्गमे।<br>व्यवहारे तथाहारे त्वर्थानां च समागमे ॥ ६०<br>आये व्यये तथा नित्यं त्यक्तलज्जस्तु वै भवेत्।<br>न कुञ्चितेन गूढेन नित्यं प्रावरणादिभिः ॥ ६१<br>हस्तविक्षेपभावेन व्यादितास्येन चैव हि।<br>निर्याताजिह्वायोगेन न गेयं हि कथञ्चन ॥ ६२<br>न गायेदूर्ध्वबाहुश्च नोर्ध्वदृष्टिः कथञ्चन।<br>स्वाङ्गं निरीक्षमाणेन परं सम्प्रेक्षता तथा ॥ ६३<br>सङ्घट्टे च तथोत्थाने कटिस्र्थानं न शस्यते।<br>हासो रोषस्तथा कम्पस्तथान्यत्र स्मृतिः पुनः ॥ ६४<br>नैतानि शस्तरूपाणि गानयोगे महामते।<br>नैकहस्तेन शक्यं स्यात्तालसङ्घट्टनं मुने ॥ ६५<br>क्षुधार्तेन भयार्तेन तृष्णार्तेन तथैव च।<br>गानयोगो न कर्तव्यो नान्धकारे कथञ्चन ॥ ६६<br>एवमादीनि चान्यानि न कर्तव्यानि गायता। | उलूक बोला—स्त्री-संसर्गमें, गीतमें, द्यूतमें, व्याख्यान देनेमें, व्यवहारमें, आहारमें, अर्थोपार्जनमें तथा आय-व्ययमें मनुष्यको सदा लज्जाका त्याग कर देना चाहिये। शरीरके अंगोंको सिकोड़कर, बहुत आवरण आदिसे शरीरको ढककर, हाथ हिला-हिलाकर, मुँहको विकृत रूपसे खोलकर और जिह्वाको निकालकर कभी नहीं गाना चाहिये। हाथ ऊपर उठाकर, ऊपरकी ओर दृष्टि करके, अपने अंगोंको देखते हुए तथा दूसरेका अवलोकन करते हुए कभी नहीं गाना चाहिये। ताल देनेके लिये और उठनेके लिये कटिका आश्रय प्रशस्य नहीं होता है। हे महामते! गानयोगमें हास, रोष, कम्प तथा अनवधानता—ये सभी रूप प्रशस्त नहीं माने जाते। हे मुने! एक हाथसे ताल दे पाना सम्भव नहीं हो सकता है। भूखसे पीड़ित, भयभीत तथा तृष्णासे व्याकुल मनुष्यको गानयोग नहीं करना चाहिये; अन्धकारमें कभी नहीं गाना चाहिये। गानेवालेको इसी प्रकारके अन्य कार्य भी नहीं करने चाहिये॥ ६०–६६ १/२॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>एवमुक्तः स भगवान् स्तेनोक्तैर्विधिलक्षणैः।<br>अशिक्षयत्तथा गीतं दिव्यं वर्षसहस्रकम् ॥ ६७<br>ततः समस्तसम्पन्नो गीतप्रस्तारकादिषु।<br>विपञ्च्यादिषु सम्पन्नः सर्वस्वरविभागवित् ॥ ६८ | मार्कण्डेयजी बोले—इस प्रकार उसके द्वारा कहे गये भगवान् नारदने बताये गये गान-लक्षणोंके द्वारा हजार दिव्य वर्षोंतक गीतकी शिक्षा प्राप्त की। इससे वे गीत-प्रस्तार आदिमें पूर्ण पारंगत हो गये और वीणावादन आदिमें ज्ञानसम्पन्न होकर सभी स्वरभेदोंके ज्ञाता बन |
| ५८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अयुतानि च षट्त्रिंशत्सहस्राणि शतानि च।<br>स्वराणां भेदयोगेन ज्ञातवान् मुनिसत्तमः॥ ६९<br><br>ततो गन्धर्वसङ्घाश्च किन्नराणां तथैव च।<br>मुनिना सह संयुक्ताः प्रीतियुक्ता भवन्ति ते॥ ७० | गये, मुनिश्रेष्ठ नारदने स्वरोंके छियालीस हजार एक सौ भेद-प्रभेदोंको जान लिया। तभीसे गन्धर्वों तथा किन्नरोंके समूह मुनि नारदसे मिलकर अत्यन्त प्रेमसे भर जाते थे॥ ६७-७०॥ |
| गानबन्धुं मुनिः प्राह प्राप्य गानमनुत्तमम्।<br>त्वां समासाद्य सम्पन्नस्त्वं हि गीतविशारदः॥ ७१<br><br>ध्वाङ्क्षशत्रो महाप्राज्ञ किमाचार्य करोमि ते। | मुनिने गानबन्धु उलूकसे कहा—आपके सान्निध्यमें आकर आपसे श्रेष्ठ गान प्राप्त करके मैं गानविद्यामें निष्णात हो गया हूँ; आप निश्चय ही गीतविशारद हैं। हे ध्वांक्षशत्रो! हे महाप्राज्ञ! हे आचार्य! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?॥ ७१¹/₂॥ |
| गानबन्धुरुवाच<br>ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन् मनवस्तु चतुर्दश॥ ७२<br><br>ततस्त्रैलोक्यसम्प्लावो भविष्यति महामुने।<br>तावन्मे त्वायुषो भावस्तावन्मे परमं शुभम्॥ ७३<br><br>मनसाध्याहितं मे स्याद्दक्षिणा मुनिसत्तम। | गानबन्धु बोला—हे ब्रह्मन्! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु व्यतीत होते हैं। तत्पश्चात् तीनों लोक जलाप्लावित हो जाते हैं। हे महामुने! ब्रह्माके दिनके समाप्तिपर्यन्त मेरी आयु हो तथा मेरा परम कल्याण हो; आपके द्वारा मनसे ऐसी कामना की जाय—हे मुनिश्रेष्ठ! यही मेरी दक्षिणा है॥ ७२-७३¹/₂॥ |
| नारद उवाच<br>अतीतकल्पसंयोगे गरुडस्त्वं भविष्यसि॥ ७४<br><br>स्वस्ति तेऽस्तु महाप्राज्ञ गमिष्यामि प्रसीद माम्। | नारदजी बोले—कल्पके व्यतीत होनेपर आप गरुड़ होंगे। हे महाप्राज्ञ! आपका कल्याण हो, आप मुझपर प्रसन्न हों; अब मैं प्रस्थान करूँगा॥ ७४¹/₂॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>एवमुक्त्वा जगामाथ नारदोऽपि जनार्दनम्॥ ७५ | मार्कण्डेयजी बोले—ऐसा कहकर नारदजी भी श्वेतद्वीपमें विराजमान जनार्दन वासुदेवके पास चले गये |
अध्याय ३] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति ५८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्वेतद्वीपे हृषीकेशं गापयामास गीतकान्।<br>तत्र श्रुत्वा तु भगवान्नारदं प्राह माधवः॥ ७६<br>तुम्बरोर्न विशिष्टोऽसि गीतैरद्यापि नारद।<br>यदा विशिष्टो भविता तं कालं प्रवदाम्यहम्॥ ७७<br>गानबन्धुं समासाद्य गानार्थज्ञो भवानसि। | और वहाँ गीत गाने लगे। उसे सुनकर लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णुने नारदसे कहा—हे नारद! आप आज भी गीतोंका गान करनेमें तुम्बुरुसे विशिष्ट नहीं हैं। आप जब उनसे विशिष्ट होंगे, उस समयको मैं बता रहा हूँ। आप गानबन्धुसे शिक्षा प्राप्त करके गानतत्त्वके ज्ञाता हो गये हैं॥ ७५—७७ १/२ ॥ |
| मनोर्वैवस्वतस्याहमष्टाविंशतिमे युगे॥ ७८<br>द्वापरान्ते भविष्यामि यदुवंशकुलोद्भवः।<br>देवक्यां वसुदेवस्य कृष्णो नाम्ना महामते॥ ७९<br>तदानीं मां समासाद्य स्मारयेथा यथातथम्।<br>तत्र त्वां गीतसम्पन्नं करिष्यामि महाव्रतम्॥ ८०<br>तुम्बरोश्च समं चैव तथातिशयसंयुक्तम्।<br>तावत्कालं यथायोगं देवगन्धर्वयोनिषु॥ ८१<br>शिक्षयस्व यथान्यायमित्युक्त्वान्तरधीयत। | हे महामते! मैं वैवस्वत मनुके अट्ठाईसवें द्वापरयुगके अन्तमें देवकीके गर्भसे वसुदेवके पुत्रके रूपमें कृष्ण नामसे यदुवंशमें अवतीर्ण होऊँगा। उस समय मेरे पास आकर आप ठीक-ठीक स्मरण कराइयेगा; तब मैं आपको तुम्बुरुके समान ही अतिशय गानसे सम्पन्न तथा महाव्रतसे युक्त कर दूँगा। तबतक आप यथानुकूल देव-गन्धर्वयोनियोंमें समुचित रूपसे शिक्षा प्रदान कीजिये—ऐसा कहकर वे [भगवान् विष्णु] अन्तर्धान हो गये॥ ७८—८१ १/२॥ |
| ततो मुनिः प्रणम्यैनं वीणावादनतत्परः॥ ८२<br>देवर्षिर्देवसङ्काशः सर्वाभरणभूषितः।<br>तपसां निधिरत्यन्तं वासुदेवपरायणः॥ ८३<br>स्कन्धे विपञ्चीमासाद्य सर्वलोकांश्चचार सः।<br>वारुणं याम्यमाग्नेयमैन्द्रं कौबेरमेव च॥ ८४<br>वायव्यं च तथेशानं संसदं प्राप्य धर्मवित्।<br>गायमानो हरिं सम्यग्विणावादविचक्षणः॥ ८५ | तदनन्तर वीणावादनमें संलग्न रहनेवाले, देवतुल्य, तपस्याकी निधि तथा वासुदेवमें पूर्णरूपसे आसक्त वे देवर्षि नारद सभी आभरणोंसे विभूषित होकर अपने कन्धेपर वीणा धारण करके सभी लोकोंमें विचरने लगे। वरुण, यम, अग्नि, इन्द्र, कुबेर, वायु तथा ईशान—इन देवताओंकी सभामें पहुँचकर धर्मनिष्ठ तथा वीणावादनमें कुशल वे नारद भगवान् श्रीहरिका गान करते थे॥ ८२—८५॥ |
| गन्धर्वाप्सरसां सङ्घैः पूज्यमानस्ततस्ततः।<br>ब्रह्मलोकं समासाद्य कस्मिंश्चित्कालपर्यये॥ ८६<br>हाहाहूहूश्च गन्धर्वौ गीतवाद्यविशारदौ।<br>ब्रह्मणो गायकौ दिव्यौ नित्यौ गन्धर्वसत्तमौ॥ ८७<br>तत्र ताभ्यां समासाद्य गायमानो हरिं प्रभुम्।<br>ब्रह्मणा च महातेजाः पूजितो मुनिसत्तमः॥ ८८ | तदनन्तर गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे पूजित होते हुए वे किसी समय ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए। वहाँ गायन-वादनमें विशारद हाहा-हूहू नामक दो दिव्य श्रेष्ठ गन्धर्व ब्रह्माके गायकके रूपमें सदा विद्यमान रहते थे। वहाँ उन दोनोंके साथमें बैठकर भगवान् श्रीहरिका गान करते हुए महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ नारद ब्रह्माजीके द्वारा पूजित हुए॥ ८६—८८॥ |
| तं प्रणम्य महात्मानं सर्वलोकपितामहम्।<br>चचार च यथाकामं सर्वलोकेषु नारदः॥ ८९ | समस्त लोकोंके पितामह उन ब्रह्माको प्रणाम करके नारदजी सभी लोकोंमें इच्छानुसार विचरण करने लगे॥ ८९॥ |
| ततः कालेन महता गृहं प्राप्य च तुम्बरोः।<br>वीणामादाय तत्रस्थो ह्यगायत महामुनिः॥ ९० | तदनन्तर बहुत समयके बाद वे महामुनि नारद |
| ५८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्वरकल्पास्तु तत्रस्थाः षड्जाद्याः सप्त वै मताः।<br>क्रीडतो भगवान् दृष्ट्वा निर्गतश्च सुसत्वरम्॥ ९१ | गन्धर्व तुम्बुरुके घर पहुँचकर वीणा लेकरके वहीं स्थित होकर गाने लगे। षड्ज आदि जो सात प्रथम स्वर माने गये हैं, वे वहाँ साक्षात् विद्यमान थे; उन्हें [तुम्बुरुके घरमें] क्रीड़ा करते देखकर भगवान् नारद बड़ी शीघ्रतासे वहाँसे निकल गये॥ ९०-९१॥ |
| शिक्षयामास बहुशस्तत्र तत्र महामतिः।<br>श्रमयोगेन संयुक्तो नारदोऽपि महामुनिः॥ ९२ | तत्पश्चात् महान् बुद्धिसे सम्पन्न महामुनि नारद परिश्रमके साथ बहुत समयतक गान सीखते रहे। |
| सप्तस्वराङ्गनाः पश्यन् गानविद्याविशारदः।<br>आसीद्वीणासमायोगे न तास्तन्त्र्यः प्रपेदिरे॥ ९३ | गानविद्यामें पारंगत वे नारद सातों स्वरोंकी अंगनाओंका अवलोकन करते हुए सदा वीणा धारण किये गान-साधनामें रत रहते थे; किंतु उनकी वीणाकी तन्त्रियाँ उन स्वरांगनाओंको प्राप्त न कर सकीं॥ ९२-९३॥ |
| ततो रैवतके कृष्णं प्रणिपत्य महामुनिः।<br>विज्ञापयदशेषं तु श्वेतद्वीपे तु यत् पुरा॥ ९४ | तदनन्तर रैवतकपर्वतपर आकर श्रीकृष्णको प्रणाम करके महामुनि नारदने उन्हें वह सब बताया, जो श्वेतद्वीपमें पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने श्रेष्ठ गानयोगके विषयमें उनसे कहा था॥ ९४॥ |
| नारायणेन कथितं गानयोगमनुत्तमम्।<br>तच्छ्रुत्वा प्रहसन् कृष्णः प्राह जाम्बवतीं मुदा॥ ९५ | उसे सुनकर श्रीकृष्णने जाम्बवतीसे हँसते हुए कहा—हे भद्रे! इन मुनिवर [नारद]-को वीणा-गानकी विधिपूर्वक शिक्षा प्रदान करो। तब ‘ठीक है’ श्रीकृष्णसे हँसते हुए ऐसा कहकर वे मुनिको सम्यक् प्रकारसे शिक्षा देने लगीं॥ ९५-९६ १/२॥ |
| एतं मुनिवरं भद्रे शिक्षयस्व यथाविधि।<br>वीणागानसमायोगे तथेत्युक्त्वा च सा हरिम्॥ ९६ | |
| प्रहसन्ती यथायोगं शिक्षयामास तं मुनिम्।<br>ततः संवत्सरे पूर्णे पुनरागम्य माधवम्॥ ९७ | तत्पश्चात् एक वर्ष पूर्ण हो जानेपर वे माधवके पास आकर उन्हें प्रणाम करके उनके सामने खड़े हो गये। तब केशवने फिर कहा—अब आप सत्यभामाके पास आइये और इनसे विधिपूर्वक शिक्षा प्राप्त कीजिये। तब ‘ठीक है’—ऐसा कहकर वे मुनि सत्यभामाको प्रणाम करके गान करने लगे। उन सत्यभामाने भी उन्हें गानशिक्षा प्रदान की। तब एक वर्ष पूर्ण हो जानेपर [रुक्मिणीसे शिक्षा लेनेके लिये] पुनः वासुदेवके द्वारा नियुक्त किये गये वे विद्वान् नारद रुक्मिणीके भवनमें गये॥ ९७-९९ १/२॥ |
| प्रणिपत्याग्रतस्तस्थौ पुनराह स केशवः।<br>सत्यां समीपमागच्छ शिक्षयस्व यथाविधि॥ ९८ | |
| तथेत्युक्त्वा सत्यभामां प्रणिपत्य जगौ मुनिः।<br>तया स शिक्षितो विद्वान् पूर्णे संवत्सरे पुनः॥ ९९ | |
| वासुदेवनियुक्तोऽसौ रुक्मिणीसदनं गतः।<br>अङ्गनाभिस्ततस्ताभिर्दासीभिर्मुनिसत्तमः ॥ १०० | तब वहाँकी अंगनाओं और दासियोंने उन मुनिश्रेष्ठसे कहा—हे मुने! इतने समयतक गाते हुए भी आप स्वरका ज्ञान नहीं कर सके। तत्पश्चात् नारदमुनिने उन देवी रुक्मिणीसे भी पूरे तीन वर्षोंतक महान् परिश्रमके साथ शिक्षा प्राप्त की और वे [उत्तम] गान करने लगे; |
| उक्तोऽसौ गायमानोऽपि न स्वरं वेत्सि वै मुने।<br>ततः श्रमेण महता वत्सरत्रयसंयुक्तम्॥ १०१ | |
| शिक्षितोऽसौ तदा देव्या रुक्मिण्यापि जगौ मुनिः।<br>ततः स्वराङ्गनाः प्राप्य तन्त्रीयोगं महामुनेः॥ १०२ |
अध्याय ३ ] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति ५८३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तब स्वरांगनाएँ महामुनि नारदकी वीणाके तारोंमें आकर स्थित हो गयीं॥ १००-१०२॥ | |
| आहूय कृष्णो भगवान् स्वयमेव महामुनिम्।<br>अशिक्षयदमेयात्मा गानयोगमनुत्तमम्॥ १०३<br><br>ततोऽतिशयमापन्नस्तुम्बरोर्मुुलिसत्तमः ।<br>ततो ननर्त देवर्षिः प्रणिपत्य जनार्दनम्॥ १०४ | तदनन्तर अपरिमेय आत्माको धारण करनेवाले स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने महामुनिको बुलाकर उन्हें सर्वश्रेष्ठ गानविद्याकी शिक्षा प्रदान की। तब मुनिश्रेष्ठ नारद तुम्बुरुसे भी अधिक ज्ञानसम्पन्न हो गये। वे देवर्षि जनार्दन श्रीकृष्णको प्रणाम करके [आनन्दमग्न होकर] नृत्य करने लगे॥ १०३-१०४॥ |
| उवाच च हृषीकेशः सर्वज्ञस्त्वं महामुने।<br>प्रहस्य ज्ञानयोगेन गायस्व मम सन्निधौ॥ १०५<br><br>एतत्ते प्रार्थितं प्राप्तं मम लोके तथैव च।<br>नित्यं तुम्बरुणा सार्धं गायस्व च यथातथम्॥ १०६ | तदनन्तर भगवान् हृषीकेशने हँसकर कहा—हे महामुने! अब आप गानविद्यामें सबकुछ जान गये हैं; अब आप मेरे सान्निध्यमें रहकर गान किया कीजिये। आपने यह अपना अभिलषित प्राप्त कर लिया है। अब आप भी तुम्बुरुके साथ मेरे लोकमें सम्यक् प्रकारसे नित्य गान कीजिये॥ १०५-१०६॥ |
| एवमुक्तो मुनिस्तत्र यथायोगं चचार सः।<br>यदा सम्पूजयन् कृष्णो रुद्रं भुवननायकम्॥ १०७<br><br>तदा जगौ हरेस्तस्य नियोगाच्छङ्कराय वै।<br>रुक्मिण्या सह सत्या च जाम्बवत्या महामुनिः॥ १०८ | तब [श्रीकृष्णके द्वारा] ऐसा कहे गये वे मुनि यथेच्छ विचरण करने लगे। हे नृपश्रेष्ठ! जब श्रीकृष्ण भुवननायक शिवकी पूजा करने लगते थे, उस समय [श्रीकृष्णरूप] उन श्रीहरिके आदेशसे स्वरोंके महाज्ञानी महामुनि नारद रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती और श्रीकृष्णके साथ शंकरजीका स्तुति-गान करते थे॥ १०७-१०८ १/२॥ |
| कृष्णेन च नृपश्रेष्ठ श्रुतिजातिविशारदः।<br>एष वो मुनिशार्दूलाः प्रोक्तो गीतक्रमो मुने॥ १०९<br><br>ब्राह्मणो वासुदेवाख्यां गायमानो भृशं नृप।<br>हरेः सालोक्यमाप्नोति रुद्रगानोऽधिको भवेत्॥ ११०<br><br>अन्यथा नरकं गच्छेदगायमानोऽन्यदेव हि।<br>कर्मणा मनसा वाचा वासुदेवपरायणः॥ १११<br><br>गायन् शृण्वंस्तमाप्नोति तस्माद्गेयं परं विदुः॥ ११२ | [सूतजी बोले—] हे श्रेष्ठ मुनिगण! मैंने आपलोगोंको मुनि नारदकी गानविद्या-प्राप्तिका यह क्रम बतला दिया। [मार्कण्डेयजीने कहा—] हे राजन्! वासुदेवकी स्तुतिका अत्यधिक गान करनेवाला ब्राह्मण श्रीहरिका सालोक्य प्राप्त कर लेता है; किंतु रुद्रका स्तुतिगान करनेवाला उससे भी अधिक श्रेष्ठ भगवत्सारूप्य प्राप्त कर लेता है। इसके विपरीत किसी अन्यका गान करनेवाला नरकमें जाता है। मन, वाणी तथा कर्मसे वासुदेवमें ही अनुरक्त होकर उनकी स्तुतिका गान करनेवाला तथा उसे सुननेवाला उन्हींको प्राप्त होता है, अतः गानविद्याको सर्वश्रेष्ठ कहा गया है॥ १०९-११२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे वैष्णवगीतकथनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'वैष्णवगीतकथन' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३॥
४- वासुदेवपरायण विष्णुभक्तोंके लक्षण तथा उनकी महिमा
| ५८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
चौथा अध्याय
वासुदेवपरायण विष्णुभक्तोंके लक्षण तथा उनकी महिमा
| ऋषय ऊचुः<br>वैष्णवा इति ये प्रोक्ता वासुदेवपरायणाः।<br>कानि चिह्नानि तेषां वै तन्नो ब्रूहि महामते॥ १<br>तेषां वा किं करोत्येष भगवान् भूतभावनः।<br>एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सूत सर्वार्थवित्तम॥ २ | **ऋषिगण बोले—**हे महामते! जो वासुदेवपरायण वैष्णव कहे गये हैं, उनके क्या लक्षण हैं; उसे हमें बताइये। हे सूत! हे सर्वतत्त्वज्ञ! भगवान् भूतभावन उन्हें कौन-सी गति प्रदान करते हैं; यह सब हमसे कहिये॥ १-२॥ |
| सूत उवाच<br>अम्बरीषेण वै पृष्टो मार्कण्डेयः पुरा मुनिः।<br>युष्माभिरद्य यत् प्रोक्तं तद्ददामि यथातथम्॥ ३ | **सूतजी बोले—**आपलोगोंने आज मुझसे जो पूछा है, वही बात पूर्वकालमें अम्बरीषने मार्कण्डेयमुनिसे पूछी थी; [उस समय उन्होंने जो कहा था] उसे मैं यथार्थ रूपसे आपलोगोंको बता रहा हूँ॥ ३॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् यथान्यायं यन्मां त्वं परिपृच्छसि।<br>यत्रास्ते विष्णुभक्तस्तु तत्र नारायणः स्थितः॥ ४<br>विष्णुरेव हि सर्वत्र येषां वै देवता स्मृता।<br>कीर्त्यमाने हरौ नित्यं रोमाञ्चो यस्य वर्तते॥ ५<br>कम्पः स्वेदस्तथाक्षेषु दृश्यन्ते जलबिन्दवः।<br>विष्णुभक्तिसमायुक्तान् श्रौतस्मार्तप्रवर्तकान्॥ ६<br>प्रीतो भवति यो दृष्ट्वा वैष्णवोऽसौ प्रकीर्तितः।<br>नान्यदाच्छादयेद्वस्त्रं वैष्णवो जगतोऽरणे॥ ७ | **मार्कण्डेयजी बोले—**हे राजन्! आप मुझसे जो पूछ रहे हैं, उसे ध्यानपूर्वक सुनिये। जहाँ विष्णुभक्त रहता है, वहींपर नारायण विराजमान रहते हैं। जिनके लिये सर्वत्र विष्णु ही देवता कहे गये हैं, भगवान् श्रीहरिका कीर्तन होते समय जिसके शरीरमें सदा रोमांच होने लगता है, कम्पन उत्पन्न हो जाता है, पसीना आने लगता है और नेत्रोंमें अश्रु दिखायी पड़ने लगते हैं; विष्णुकी भक्तिसे युक्त श्रौत-स्मार्त कर्मप्रवर्तक विद्वानोंको देखकर जो आनन्दित हो उठता है, उसे वैष्णव कहा गया है। जगत्के दर्शनमें [अपनी रक्षाके निमित्त] वैष्णवको आवश्यक परिधानके अतिरिक्त वस्त्र आदिसे शरीरका आवरण नहीं करना चाहिये॥ ४-७॥ |
| विष्णुभक्तमथायान्तं यो दृष्ट्वा सम्मुखस्थितः।<br>प्रणामादि करोत्येवं वासुदेवे यथा तथा॥ ८<br>स वै भक्त इति ज्ञेयः स जयी स्याज्जगत्त्रये।<br>रूक्षाक्षराणि शृण्वन् वै तथा भागवतेरितः॥ ९<br>प्रणामपूर्वं क्षान्त्या वै यो वदेद्वैष्णवो हि सः। | विष्णुभक्तको आता हुआ देखकर जो सामने खड़े होकर उसे वासुदेवतुल्य समझकर प्रणाम आदि करता है, उसे वैष्णव भक्त जानना चाहिये; वह तीनों लोकोंमें विजयी होता है। कठोर वचन सुनता हुआ भी जो भगवद्भावसे युक्त होकर प्रणामपूर्वक धैर्यके साथ बोलता है, वही वैष्णव है॥ ८-९ १/२ ॥ |
| गन्धपुष्पादिकं सर्वं शिरसा यो हि धारयेत्॥ १०<br>हरेः सर्वमितीत्येवं मत्त्वासौ वैष्णवः स्मृतः।<br>विष्णुक्षेत्रे शुभान्येव करोति स्नेहसंयुतः॥ ११<br>प्रतिमां च हरेर्नित्यं पूजयेत्प्रयतात्मवान्।<br>विष्णुभक्तः स विज्ञेयः कर्मणा मनसा गिरा॥ १२<br>नारायणपरो नित्यं महाभागवतो हि सः।<br>भोजनाराधनं सर्वं यथाशक्त्या करोति यः॥ १३ | सब कुछ श्रीहरिका है—ऐसा मानकर जो गन्ध, पुष्प आदिको सिरसे लगाता है, वह वैष्णव कहा गया है। जो विष्णुक्षेत्रमें प्रेमयुक्त होकर शुभ कर्म ही करता है और एकाग्रचित्त होकर श्रीहरिकी प्रतिमाका नित्य पूजन करता है, उसे मन-वाणी-कर्मसे विष्णुभक्त समझना चाहिये। जो सदा नारायणमें अनुरक्त है, वह परमभागवत है॥ १०-१२ १/२ ॥ |
५- विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान, विष्णुमायाद्वारा नारद एवं पर्वत मुनिका वानरमुख होना तथा इसीका रामावतारमें हेतु बनना
अध्याय ५ ] विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान ५८५
| विष्णुभक्तस्य च सदा यथान्यायं हि कथ्यते।<br>नारायणपरो विद्वान् यस्यान्नं प्रीतमानसः॥ १४<br><br>अश्नाति तद्धरेरास्यं गतमन्नं न संशयः।<br>स्वार्चनादपि विश्वात्मा प्रीतो भवति माधवः॥ १५ | विष्णुभक्तोंके भोजन एवं आराधनकी यथाशक्ति व्यवस्था करनेवाला वास्तविक फलका भागी कहा गया है। नारायणमें भक्ति रखनेवाला विद्वान् प्रसन्नचित्त होकर जिसका भी अन्न खाता है, वह अन्न मानो साक्षात् श्रीहरिके मुखमें चला गया; इसमें संदेह नहीं है॥ १३-१४<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| महाभागवते तच्च दृष्ट्वासौ भक्तवत्सलः।<br>वासुदेवपरं दृष्ट्वा वैष्णवं दग्धकिल्बिषम्॥ १६<br><br>देवापि भीतास्तं यान्ति प्रणिपत्य यथागतम्।<br>श्रूयतां हि पुरा वृत्तं विष्णुभक्तस्य वैभवम्॥ १७ | भक्तवत्सल लक्ष्मीपति विश्वात्मा विष्णु अपने पूजनकी अपेक्षा अपने महाभागवत भक्तका पूजन देखकर अधिक प्रसन्न होते हैं। वासुदेवमें भक्ति रखनेवाले पापरहित वैष्णवको देखकर देवता भी भयभीत होकर उसे प्रणाम करके जैसे आते हैं, वैसे ही लौट जाते हैं॥ १५-१६<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| दृष्ट्वा यमोऽपि वै भक्तं वैष्णवं दग्धकिल्बिषम्।<br>उत्थाय प्राञ्जलिर्भूत्वा ननाम भृगुनन्दनम्॥ १८<br><br>तस्मात्सम्पूजयेद्भक्त्या वैष्णवान् विष्णुवन्नरः।<br>स याति विष्णुसामीप्यं नात्र कार्या विचारणा॥ १९ | विष्णुभक्तके वैभवसे सम्बन्धित एक प्राचीनकालका वृत्तान्त सुनिये। दग्ध पापोंवाले वैष्णव भक्त भृगुपुत्र च्यवनको देखकर यमराजने भी उठ करके दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया था। अतः मनुष्यको चाहिये कि भगवान् विष्णुकी ही भाँति भक्तिपूर्वक वैष्णवोंकी पूजा करे; [जो ऐसा करता है] वह विष्णुका सामीप्य प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १७-१९॥ |
| अन्यभक्तसहस्रेभ्यो विष्णुभक्तो विशिष्यते।<br>विष्णुभक्तसहस्रेभ्यो रुद्रभक्तो विशिष्यते।<br>रुद्रभक्तात्परतरो नास्ति लोके न संशयः॥ २०<br><br>तस्मात्तु वैष्णवं चापि रुद्रभक्तमथापि वा।<br>पूजयेत्सर्वयत्नेन धर्मकामार्थमुक्तये॥ २१ | विष्णुभक्त अन्य देवताओंके भक्तोंसे हजार गुना श्रेष्ठ होता है और विष्णुभक्तोंसे हजार गुना श्रेष्ठ शिवभक्त होता है; रुद्रभक्तसे श्रेष्ठ कोई भी लोकमें नहीं है, इसमें संशय नहीं है। अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके लिये सम्पूर्ण प्रयत्नके साथ विष्णुभक्त अथवा रुद्रभक्तकी पूजा करनी चाहिये॥ २०-२१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे विष्णुभक्तकथनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'विष्णुभक्तकथन' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥
पाँचवाँ अध्याय
विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान, विष्णुमायाद्वारा नारद एवं पर्वत
मुनिका वानरमुख होना तथा इसीका रामावतारमें हेतु बनना
| ऋषय ऊचुः<br>ऐक्ष्वाकुरम्बरीषो वै वासुदेवपरायणः।<br>पालयामास पृथिवीं विष्णोराज्ञापुरःसरः॥ १॥<br><br>श्रुतमेतन्महाबुद्धे तत्सर्वं वक्तुमर्हसि।<br>नित्यं तस्य हरेश्चक्रं शत्रुरोगभयादिकम् ॥ २। | ऋषिगण बोले—इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न विष्णुभक्त [राजा] अम्बरीष भगवान् विष्णुकी आज्ञाके अनुसार पृथ्वीका पालन करते थे—यह हमने सुना है; हे महाबुद्धे! उनके विषयमें आप सब कुछ बताइये। लोकमें ऐसा सुना जाता है कि भगवान् श्रीहरिका |
| ५८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| हन्तीति श्रूयते लोके धार्मिकस्य महात्मनः।<br>अम्बरीषस्य चरितं तत्सर्वं ब्रूहि सत्तम॥ ३<br>माहात्म्यमनुभावं च भक्तियोगमनुत्तमम्।<br>यथावच्छ्रोतुमिच्छामः सूत वक्तुं त्वमर्हसि॥ ४ | सुदर्शन चक्र उनके शत्रु, रोग, भय आदिका सदा नाश किया करता था। अतः हे श्रेष्ठ! आप उन धार्मिक तथा महात्मा अम्बरीषके उस सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन कीजिये। हे सूत! हम उनके माहात्म्य, अनुभाव तथा श्रेष्ठ भक्तियोगको यथार्थतः सुनना चाहते हैं, आप हमें बतायें॥ १-४॥ |
| सूत उवाच<br>श्रूयतां मुनिशार्दूलाश्चरितं तस्य धीमतः।<br>अम्बरीषस्य माहात्म्यं सर्वपापहरं परम्॥ ५ | **सूतजी बोले—**हे मुनीन्द्रो! उन बुद्धिमान् अम्बरीषके श्रेष्ठ चरित्र तथा माहात्म्यको आपलोग सुनें, जो सम्पूर्ण पापोंका नाश कर देनेवाला है॥ ५॥ |
| त्रिशङ्कोर्दयिता भार्या सर्वलक्षणशोभिता।<br>अम्बरीषस्य जननी नित्यं शौचसमन्विता॥ ६<br>योगनिद्रासमारूढं शेषपर्यङ्कशायिनम्।<br>नारायणं महात्मानं ब्रह्माण्डकमलोद्भवम्॥ ७<br>तमसा कालरुद्राख्यं रजसा कनकाण्डजम्।<br>सत्त्वेन सर्वगं विष्णुं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ८<br>अर्चयामास सततं वाङ्मनःकायकर्मभिः।<br>माल्यादानादिकं सर्वं स्वयमेवमचीकरत्॥ ९<br>गन्धादिपेषणं चैव धूपद्रव्यादिकं तथा।<br>भूमेरालेपनादीनि हविषां पचनं तथा॥ १०<br>तत्कौतुकसमाविष्टा स्वयमेव चकार सा।<br>शुभा पद्मावती नित्यं वाचा नारायणेति वै॥ ११<br>अनन्तेत्येव सा नित्यं भाषमाणा पतिव्रता।<br>दशवर्षसहस्राणि तत्परेणान्तरात्मना॥ १२<br>अर्चयामास गोविन्दं गन्धपुष्पादिभिः शुचिः।<br>विष्णुभक्तान् महाभागान् सर्वपापविवर्जितान्॥ १३ | त्रिशंकुकी प्रिय भार्या तथा अम्बरीषकी माता, जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थीं, नित्य [स्नान आदिसे] शुद्ध होकर योगनिद्रामें लीन रहनेवाले, शेषशय्यापर शयन करनेवाले, ब्रह्माण्डरूपी कमलका प्रादुर्भाव करनेवाले, तमोगुणसे युक्त होनेपर कालरूद्ररूप, रजोगुणसे युक्त होनेपर हिरण्यगर्भ ब्रह्मारूप और सत्त्वगुणसे युक्त होनेपर सर्वव्यापी तथा सभी देवोंसे नमस्कृत साक्षात् महात्मा नारायण विष्णुकी निरन्तर मन-वाणी-कर्मसे अर्चना करती थीं। माल्य, दान आदि सब कुछ वे स्वयं करती थीं। चन्दन आदि द्रव्योंका घिसना, धूप-दीप आदि, भूमिका लेपन आदि, हवि-द्रव्यको पकाना—ये सब कार्य वे स्वयं सम्पन्न करती थीं। वे कल्याणमयी तथा पतिव्रता रानी पद्मावती प्रतिदिन वाणीसे 'नारायण' और 'अनन्त'—ऐसा निरन्तर उच्चारण करती हुई उन्हीं परमात्मामें संलग्न मनसे दस हजार वर्षोंतक शुद्धतापूर्वक गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंसे गोविन्दका पूजन किया करती थीं। वे सब प्रकारके पापोंसे रहित महाभाग विष्णुभक्तोंको दान, मान, पूजन तथा धनोंसे नित्य सन्तुष्ट रखती थीं॥ ६-१३ १/२॥ |
| दानमानार्चनैर्नित्यं धनरत्नैस्तोषयत्।<br>ततः कदाचित्सा देवी द्वादशीं समुपोष्य वै॥ १४<br>हरेरग्रे महाभागा सुष्वाप पतिना सह।<br>तत्र नारायणो देवस्तामाह पुरुषोत्तमः॥ १५ | तदनन्तर किसी समय वे महाभागा देवी द्वादशीका व्रत करके पतिके साथ भगवान् श्रीहरिके [विग्रहके] सम्मुख सो गयीं। वहाँपर [स्वप्नमें] पुरुषोत्तम नारायणने उनसे कहा—हे भद्रे! क्या चाहती हो? हे भामिनि! तुम मुझसे वर माँग लो॥ १४-१५ १/२॥ |
| किमिच्छसि वरं भद्रे मत्तस्त्वं ब्रूहि भामिनि।<br>सा दृष्ट्वा तु वरं वव्रे पुत्रो मे वैष्णवो भवेत्॥ १६<br>सार्वभौमो महातेजाः स्वकर्मनिरतः शुचिः।<br>तथेत्युक्त्वा ददौ तस्यै फलमेकं जनार्दनः॥ १७ | तब भगवान्को देखकर उन्होंने यह वर माँगा—मुझे विष्णुभक्त, चक्रवर्ती सम्राट्, महातेजस्वी, अपने |
अध्याय ५] विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान ५८७
| श्लोक (संस्कृत) | अर्थ (हिन्दी) |
|---|---|
| कार्यमें तत्पर रहनेवाला और पवित्र मनवाला पुत्र उत्पन्न हो। तब 'वैसा ही होगा'—यह कहकर जनार्दनने उन्हें एक फल प्रदान किया॥ १६-१७॥ | |
| सा प्रबुद्धा फलं दृष्ट्वा भर्त्रे सर्वं न्यवेदयत्।<br>भक्षयामास संहृष्टा फलं तद्गतमानसा ॥ १८ | तदनन्तर वे जग गयीं और उस फलको देखकर उन्होंने सारी बात अपने पतिसे कही। इसके बाद उन्हीं प्रभुमें संलग्न चित्तवाली उन्होंने प्रसन्न होकर वह फल खा लिया॥ १८॥ |
| ततः कालेन सा देवी पुत्रं कुलविवर्धनम्।<br>असूत सा सदाचारं वासुदेवपरायणम् ॥ १९<br><br>शुभलक्षणसम्पन्नं चक्राङ्किततनूरुहम्।<br>जातं दृष्ट्वा पिता पुत्रं क्रियाः सर्वाश्चकार वै ॥ २० | तत्पश्चात् समय आनेपर उन देवीने कुलकी वृद्धि करनेवाले, सदाचारी, वासुदेवपरायण, शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा चक्रांकित केशोंवाले पुत्रको जन्म दिया। पुत्र उत्पन्न हुआ देखकर पिता [त्रिशंकु]-ने उसके सभी [जातकर्म आदि] संस्कार किये॥ १९-२०॥ |
| अम्बरीष इति ख्यातो लोके सम्भवत्प्रभुः।<br>पितर्युपरते श्रीमानभिषिक्तो महामुनिः ॥ २१<br><br>मन्त्रिष्वाधाय राज्यं च तप उग्रं चकार सः।<br>संवत्सरसहस्रं वै जपन्नारायणं प्रभुम् ॥ २२<br><br>हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं सूर्यमण्डलमध्यतः।<br>शङ्खचक्रगदापद्म धारयन्तं चतुर्भुजम् ॥ २३<br><br>शुद्धजाम्बूनदनिभं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम्।<br>सर्वाभरणसंयुक्तं पीताम्बरधरं प्रभुम् ॥ २४<br><br>श्रीवत्सवक्षसं देवं पुरुषं पुरुषोत्तमम्। | वह ऐश्वर्यशाली बालक अम्बरीष—इस नामसे लोकमें विख्यात हुआ। पिताकी मृत्यु हो जानेपर उस शोभासम्पन्न महात्मा अम्बरीषका अभिषेक किया गया। तत्पश्चात् मन्त्रियोंको राज्य सौंपकर उन्होंने हृदयकमलके मध्यमें विराजमान, सूर्यमण्डलके मध्यमें स्थित, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करनेवाले, चतुर्भुज, विशुद्ध सुवर्णके सदृश कान्तिवाले, ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूप, समस्त आभरणोंसे सुशोभित, पीताम्बर धारण करनेवाले, वक्षःस्थलपर श्रीवत्स चिह्न धारण करनेवाले, परम पुरुष तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ भगवान् नारायणका जप करते हुए पूरे एक हजार वर्षतक कठोर तप किया॥ २१—२४¹/२॥ |
| ततो गरुडमारुह्य सर्वदेवैरभिष्टुतः ॥ २५<br><br>आजगाम स विश्वात्मा सर्वलोकनमसस्कृतः।<br>ऐरावतमिवाचिन्त्यं कृत्वा वै गरुडं हरिः ॥ २६<br><br>स्वयं शक्र इवासीनस्तमाह नृपसत्तमम्।<br>इन्द्रोऽहमस्मि भद्रं ते किं ददामि वरं च ते ॥ २७<br><br>सर्वलोकेश्वरोऽहं त्वां रक्षितुं समुपागतः। | तब सभी देवताओंसे स्तुत तथा सभी लोकोंसे नमस्कृत होनेवाले वे विश्वात्मा गरुड़पर आरूढ़ होकर वहाँ आ गये। उन श्रीहरिने गरुड़को अद्भुत ऐरावतके रूपमें करके स्वयं इन्द्रका रूप धारणकर उसपर आसीन हो उन नृपश्रेष्ठसे कहा—'मैं इन्द्र हूँ, आपका कल्याण हो; मैं आपको कौन-सा वर प्रदान करूँ? सभी लोकोंका ईश्वर मैं आपकी रक्षा करनेके लिये आपके पास आया हूँ'॥ २५—२७¹/२॥ |
| अम्बरीष उवाच<br>नाहं त्वामभिसन्धाय तप आस्थितवानिह ॥ २८<br><br>त्वया दत्तं च नेष्यामि गच्छ शक्र यथासुखम्।<br>मम नारायणो नाथस्तन्नमामि जगत्पतिम् ॥ २९ | अम्बरीषजी बोले—आपको उद्देश्य करके मैंने यह तप नहीं किया है। हे शक्र! आपके द्वारा प्रदत्त वर मैं नहीं चाहता; अतः आप सुखपूर्वक लौट जाइये। मेरे स्वामी तो नारायण हैं; मैं उन्हीं जगत्पतिको नमस्कार करता हूँ। |
| ५८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| गच्छेन्द्र मा कृथास्त्वत्र मम बुद्धिविलोपनम्।<br>ततः प्रहस्य भगवान् स्वरूपमकरोद्धरिः॥ ३०<br><br>शार्ङ्गचक्रगदापाणिः खड्गहस्तो जनार्दनः।<br>गरुडोपरि सर्वात्मा नीलाचल इवापरः॥ ३१<br><br>देवगन्धर्वसङ्घैश्च स्तूयमानः समन्ततः।<br>प्रणम्य स च सन्तुष्टस्तुष्टाव गरुडध्वजम्॥ ३२<br><br>प्रसीद लोकनाथेश मम नाथ जनार्दन।<br>कृष्ण विष्णो जगन्नाथ सर्वलोकननमस्कृत॥ ३३<br><br>त्वमादिस्त्वमनादिस्त्वमनन्तः पुरुषः प्रभुः।<br>अप्रमेयो विभुर्विष्णुर्गोविन्दः कमलेक्षणः॥ ३४<br><br>महेश्वराङ्गजो मध्ये पुष्करः खगमः खगः।<br>कव्यवाहः कपाली त्वं हव्यवाहः प्रभञ्जनः॥ ३५<br><br>आदिदेवः क्रियानन्दः परमात्मात्मनि स्थितः।<br>त्वां प्रपन्नोऽस्मि गोविन्द जय देवकिनन्दन।<br>जय देव जगन्नाथ पाहि मां पुष्करेक्षण॥ ३६<br><br>नान्या गतिस्त्वदन्या मे त्वमेव शरणं मम। | हे इन्द्र! आप चले जाइये, मेरी बुद्धिको भ्रमित मत कीजिये॥ २८-२९ १/२॥<br><br>तब [इन्द्ररूपधारी] भगवान् विष्णुने हँसकर अपना रूप प्रकट कर दिया। वे सर्वात्मा जनार्दन हाथमें शार्ङ्ग नामक धनुष-चक्र-गदा-खड्ग लिये हुए थे, गरुड़पर आरूढ़ थे और दूसरे नीलपर्वतकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। देवताओं तथा गन्धर्वोंके समूह सभी ओरसे उनकी स्तुति कर रहे थे॥ ३०-३१ १/२॥<br><br>तब प्रसन्नताको प्राप्त वे [अम्बरीष] उन गरुड़ध्वजको प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे— हे लोकनाथ! हे ईश! हे मेरे नाथ! हे जनार्दन! हे कृष्ण! हे विष्णो! हे जगन्नाथ! हे सर्वलोकननमस्कृत! [मुझपर] प्रसन्न होइये। आप आदि हैं और आदिरहित भी हैं। आप अनन्त, परम पुरुष, प्रभुतासम्पन्न, अपरिमित, सर्वोपरि, विष्णु, गोविन्द, कमलके समान नेत्रोंवाले, महेश्वरके अंगसे आविर्भूत, नाभिसे कमलकी उत्पत्ति करनेवाले, हृदयाकाशमें योगियोंके द्वारा प्राप्त होनेवाले, खगरूप, कव्यवाह तथा भैरवरूप हैं। आप हव्यवाह, प्रभंजन, आदिदेव, क्रियानन्द, परमात्मा तथा स्वयंमें स्थित हैं। हे गोविन्द! मैं आपके शरणागत हूँ। हे देवकीनन्दन! आपकी जय हो। हे देव! हे जगन्नाथ! आपकी जय हो। हे कमलनयन! मेरी रक्षा कीजिये; आपके अतिरिक्त मेरी दूसरी गति नहीं है; आप ही मेरे शरणदाता हैं॥ ३२-३६ १/२॥ | | सूत उवाच<br>तमाह भगवान् विष्णुः किं ते हृदि चिकीर्षितम्॥ ३७<br><br>तत्सर्वं ते प्रदास्यामि भक्तोऽसि मम सुव्रत।<br>भक्तिप्रियोऽहं सततं तस्माद्दातुमिहागतः॥ ३८ | सूतजी बोले— भगवान् विष्णुने उनसे कहा— आपके मनमें कौन-सी अभिलाषा है; वह सब मैं आपको दूँगा। हे सुव्रत! आप मेरे भक्त हैं, मुझे भक्ति प्रिय है, अतः आपको वर प्रदान करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ॥ ३७-३८॥ | | अम्बरीष उवाच<br>लोकनाथ परानन्द नित्यं मे वर्तते मतिः।<br>वासुदेवपरो नित्यं वाङ्मनःकायकर्मभिः॥ ३९<br><br>यथा त्वं देवदेवस्य भवस्य परमात्मनः।<br>तथा भवाम्यहं विष्णो तव देव जनार्दन॥ ४०<br><br>पालयिष्यामि पृथिवीं कृत्वा वै वैष्णवं जगत्।<br>यज्ञहोमार्चनैश्चैव तर्पयामि सुरोत्तमान्॥ ४१ | अम्बरीषजी बोले— हे लोकनाथ! हे परानन्द! मेरी सदा यही अभिलाषा रहती है कि मैं मन, वाणी तथा कर्मसे नित्य वासुदेवमें लीन रहूँ। हे विष्णो! हे देव! हे जनार्दन! जैसे आप देवाधिदेव परमात्मा शिवके [भक्त] हैं, वैसे ही मैं आपका [भक्त] हो जाऊँ। मैं [सम्पूर्ण] जगत्को विष्णुभक्त बनाकर पृथ्वीका पालन करूँगा, यज्ञ-हवन- |
| अध्याय ५ ] | विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान | ५८९ | | :--- | :--- |
| वैष्णवान् पालयिष्यामि निहनिष्यामि शात्रवान्।<br>लोकतापभये भीत इति मे धीयते मतिः॥ ४२<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>एवमस्तु यथेच्छं वै चक्रमेतत्सुदर्शनम्।<br>पुरा रुद्रप्रसादेन लब्धं वै दुर्लभं मया॥ ४३<br><br>ऋषिाशापादिकं दुःखं शत्रुरोगादिकं तथा।<br>निहनिष्यति ते नित्यमित्युक्त्वान्तरधीयत॥ ४४<br><br>सूत उवाच<br>ततः प्रणम्य मुदितो राजा नारायणं प्रभुम्।<br>प्रविश्य नगरीं रम्यामयोध्यां पर्यपालयत्॥ ४५<br><br>ब्राह्मणादींश्च वर्णांश्च स्वस्वकर्मण्ययोजयत्।<br>नारायणपरो नित्यं विष्णुभक्तानकल्मषान्॥ ४६<br><br>पालयामास हृष्टात्मा विशेषेण जनाधिपः।<br>अश्वमेधशतैरिष्ट्वा वाजपेयशतेन च॥ ४७<br><br>पालयामास पृथिवीं सागरावरणामिमाम्।<br>गृहे गृहे हरिस्तस्थौ वेदघोषो गृहे गृहे॥ ४८<br><br>नामघोषो हरेश्चैव यज्ञघोषस्तथैव च।<br>अभवन्नृपशार्दूले तस्मिन् राज्यं प्रशासति॥ ४९<br><br>नासस्या नातृणा भूमिर्न दुर्भिक्षादिभिर्युता।<br>रोगहीनाः प्रजा नित्यं सर्वोपद्रववर्जिताः॥ ५०<br><br>अम्बरीषो महातेजाः पालयामास मेदिनीम्।<br>तस्यैवं वर्तमानस्य कन्या कमललोचना॥ ५१<br><br>श्रीमती नाम विख्याता सर्वलक्षणसंयुता।<br>प्रदानसमयं प्राप्ता देवमायेव शोभना॥ ५२<br><br>तस्मिन् काले मुनिः श्रीमान्नारदोऽभ्यागतश्च वै।<br>अम्बरीषस्य राज्ञो वै पर्वतश्च महामतिः॥ ५३<br><br>तावुभावागतौ दृष्ट्वा प्रणिपत्य यथाविधि।<br>अम्बरीषो महातेजाः पूजयामास तावृषी॥ ५४ | अर्चन आदिके द्वारा श्रेष्ठ देवताओंको तृप्त करूँगा, वैष्णवजनोंका पालन-पोषण करूँगा और शत्रुओंका संहार करूँगा, प्राणियोंको संताप देनेसे मैं भयभीत रहूँ—मेरी मति ऐसी भावनाको धारण करे॥ ३९—४२॥<br><br>श्रीभगवान् बोले— 'जैसी आपकी इच्छा है, वैसा ही होगा। प्राचीनकालमें मैंने भगवान् रुद्रकी कृपासे यह दुर्लभ सुदर्शन चक्र प्राप्त किया है। यह आपके ऋषिशाप, दुःख, शत्रु, रोग आदिका सदा नाश करेगा'—ऐसा कहकर वे अन्तर्धान हो गये॥ ४३-४४॥<br><br>सूतजी बोले— तदनन्तर भगवान् नारायणको प्रणाम करके आनन्दसे युक्त राजा [अम्बरीष] रम्य अयोध्या नगरीमें प्रवेश करके प्रजापालन करने लगे। नारायणमें तत्पर रहनेवाले उन राजाने ब्राह्मण आदि वर्णोंको अपने-अपने कर्ममें लगाया। वे राजा अम्बरीष प्रसन्नचित्त होकर विशेष रूपसे निष्पाप विष्णुभक्तोंका पालन करने लगे। एक सौ अश्वमेधयज्ञ तथा एक सौ वाजपेययज्ञ करके वे सागरपर्यन्त इस पृथ्वीका पालन करनेमें तत्पर हो गये॥ ४५—४७ १/२॥<br><br>उन नृपश्रेष्ठके राज्य-शासन करते रहनेपर घर-घरमें विष्णुका विग्रह स्थापित किया गया; घर-घरमें वेद-ध्वनि, विष्णुके नामका घोष और यज्ञघोष होने लगा। भूमि फसलरहित, तृणविहीन और दुर्भिक्ष आदिसे युक्त नहीं रह गयी। सम्पूर्ण प्रजाएँ नित्य रोग तथा सभी प्रकारके विघ्नोंसे रहित हो गयीं। इस प्रकार महातेजस्वी अम्बरीष पृथ्वीका पालन करते थे॥ ४८—५० १/२॥<br><br>इस प्रकार राज्य करते हुए उन राजाके यहाँ कमलके समान नेत्रोंवाली तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न एक कन्या उत्पन्न हुई, जो श्रीमती नामसे विख्यात हुई। देवकन्याके समान सुन्दर वह श्रीमती [कुछ दिनोंमें] कन्यादानके योग्य हो गयी। उस समय राजा अम्बरीषके यहाँ श्रीमान् नारदमुनि तथा महामति पर्वत—ये दोनों आये॥ ५१—५३॥<br><br>उन दोनों ऋषियोंको आया हुआ देखकर उन्हें प्रणाम करके महातेजस्वी अम्बरीषने विधिपूर्वक उनका पूजन-सत्कार किया॥ ५४॥ |
| ५९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कन्यां तां रममाणां वै मेघमध्ये शतह्रदाम्।<br>प्राह तां प्रेक्ष्य भगवान्नारदः सस्मितस्तदा॥ ५५<br><br>केयं राजन् महाभागा कन्या सुरसुतोपमा।<br>ब्रूहि धर्मभृतां श्रेष्ठ सर्वलक्षणशोभिता॥ ५६ | मेघमें विद्युत्के समान प्रतीत होनेवाली उस कन्याको क्रीड़ा करती हुई देखकर भगवान् नारदने मुसकराकर राजासे कहा— हे राजन्! महाभाग्यशालिनी, देवकन्याके सदृश तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न यह बाला कौन है? हे धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ! यह बताइये॥ ५५-५६॥ |
| राजोवाच<br>दुहितेयं मम विभो श्रीमती नाम नामतः।<br>प्रदानसमयं प्राप्ता वरमन्वेषते शुभा॥ ५७ | राजा बोले— हे विभो! यह मेरी पुत्री है, जो श्रीमती नामसे प्रसिद्ध है। यह विवाह-कालको प्राप्त हो चुकी है, अतः यह सौभाग्यशालिनी वरका अन्वेषण कर रही है॥ ५७॥ |
| इत्युक्तो मुनिशार्दूलस्तामैच्छन्नारदो द्विजाः।<br>पर्वतोऽपि मुनिस्तां वै चकमे मुनिसत्तमाः॥ ५८ | हे ऋषियो! राजाके ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ नारद उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करने लगे और हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी तरह पर्वतमुनि भी उसे पानेकी प्रबल कामना करने लगे॥ ५८॥ |
| अनुज्ञाप्य च राजानं नारदो वाक्यमब्रवीत्।<br>रहस्याहूय धर्मात्मा मम देहि सुतामिमाम्॥ ५९<br><br>पर्वतो हि तथा प्राह राजानं रहसि प्रभुः।<br>तावुभौ सह धर्मात्मा प्रणिपत्य भयार्दितः॥ ६० | राजाकी अनुमति प्राप्तकर धर्मात्मा नारदने उन्हें एकान्तमें बुलाकर यह बात कही—'अपनी इस पुत्रीको मुझे दे दीजिये।' पर्वतमुनिने भी राजासे एकान्तमें वैसा ही कहा॥ ५९ १/२॥<br><br>तब भयसे व्याकुल राजाने उन दोनोंको एक साथ प्रणाम करके कहा—आप दोनों ही मेरी कन्याकी |
| उभौ भवन्तौ कन्यां मे प्रार्थयानौ कथं त्वहम्।<br>करिष्यामि महाप्राज्ञ शृणु नारद मे वचः॥ ६१ |
| अध्याय ५ ] | विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान | ५११ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्वं च पर्वत मे वाक्यं शृणु वक्ष्यामि यत्प्रभो।<br>कन्येयं युवयोरेकं वरयिष्यति चेच्छुभा॥ ६२<br><br>तस्मै कन्यां प्रयच्छामि नान्यथा शक्तिरस्ति मे।<br>तथेत्युक्त्वा ततो भूयः श्वो यास्याव इति स्म ह॥ ६३<br><br>इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलौ जग्मतुः प्रीतिमानसौ।<br>वासुदेवपरौ नित्यमुभौ ज्ञानविदां वरौ॥ ६४ | याचना कर रहे हैं; [ऐसी स्थितिमें] मैं क्या करूँ? हे महाप्राज्ञ! हे नारद! आप मेरी बात सुनें और हे पर्वत! हे प्रभो! आप भी मेरा वचन सुनें, जिसे मैं कह रहा हूँ—'मेरी यह सौभाग्यवती पुत्री आप दोनोंमेंसे जिस एकका वरण कर लेगी, उसे मैं अपनी कन्या दे दूँगा; इसके अतिरिक्त मेरा सामर्थ्य नहीं है'॥ ६०–६२ १/२॥<br><br>'वैसा ही हो'—यह कहनेके बाद 'हम दोनों कल पुनः आयेंगे'—यह कहकर निरन्तर भगवान् विष्णुमें अनुरक्त रहनेवाले तथा ज्ञानियोंमें अग्रणी वे दोनों मुनिश्रेष्ठ प्रसन्नचित्त होकर वहाँसे चले गये॥ ६३–६४॥ |
| विष्णुलोकं ततो गत्वा नारदो मुनिसत्तमः।<br>प्रणिपत्य हृषीकेशं वाक्यमेतदुवाच ह॥ ६५<br><br>श्रोतव्यमस्ति भगवन्नाथ नारायण प्रभो।<br>रहसि त्वां प्रवक्ष्यामि नमस्ते भुवनेश्वर॥ ६६ | तत्पश्चात् मुनिश्रेष्ठ नारदने विष्णुलोक पहुँचकर भगवान् हृषीकेशको प्रणाम करके यह वचन कहा—हे भगवन्! हे नाथ! हे नारायण! हे प्रभो! आपको कुछ सुनना है; इसे मैं आपको एकान्तमें बताऊँगा। हे भुवनेश्वर! आपको नमस्कार है॥ ६५–६६॥ |
| ततः प्रहस्य गोविन्दः सर्वानुत्सार्य तं मुनिम्।<br>ब्रूहीत्याह च विश्वात्मा मुनिराह च केशवम्॥ ६७<br><br>त्वदीयो नृपतिः श्रीमानम्बरीषो महीपतिः।<br>तस्य कन्या विशालाक्षी श्रीमती नाम नामतः॥ ६८<br><br>परिणेतुमनास्तत्र गतोऽस्मि वचनं शृणु।<br>पर्वतोऽयं मुनिः श्रीमांस्तव भृत्यस्तपोनिधिः॥ ६९<br><br>तामैच्छत्सोऽपि भगवन्नावामाह जनाधिपः।<br>अम्बरीषो महातेजाः कन्येयं युवयोर्वरम्॥ ७०<br><br>लावण्ययुक्तं वृणुयाद्यदि तस्मै ददाम्यहम्।<br>इत्याहावां नृपस्तत्र तथेत्युक्त्वाह्मागतः॥ ७१<br><br>आगमिष्यामि ते राजन् श्वः प्रभाते गृहं त्विति।<br>आगतोऽहं जगन्नाथ कर्तुमर्हसि मे प्रियम्॥ ७२<br><br>वानराननवद्भाति पर्वतस्य मुखं यथा।<br>तथा कुरु जगन्नाथ मम चेदिच्छसि प्रियम्॥ ७३ | तदनन्तर परमात्मा गोविन्द सभी लोगोंको वहाँसे हटाकर हँस करके उन मुनिसे बोले—'कहिये।' तब मुनिने केशवसे कहा—'मेरी बात सुनिये; श्रीमान् राजा अम्बरीष आपके भक्त हैं। श्रीमती नामसे विख्यात उनकी विशाल नेत्रोंवाली पुत्री है। मैं उससे विवाह करनेका इच्छुक हूँ। मैं वहाँ गया था। मेरा वचन सुनिये। आपके भक्त तपोनिधि श्रीमान् ये जो पर्वतमुनि हैं, वे भी उसे चाहते हैं। हे भगवन्! महातेजस्वी राजा अम्बरीषने हम दोनोंसे कहा कि यह कन्या आप दोनोंमेंसे जिस सौन्दर्यसम्पन्नका पतिरूपमें वरण करेगी, उसे मैं कन्या अर्पण कर दूँगा।' जब राजाने हम दोनोंसे ऐसा कहा, तब 'ठीक है; हे राजन्! मैं आपके घर कल प्रातःकाल आऊँगा'—ऐसा कहकर मैं यहाँ आ गया। 'हे जगन्नाथ! अब मैं आपके पास आ गया हूँ; आप मेरा प्रिय कार्य कर दें। हे जगन्नाथ! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो जिस भी प्रकारसे पर्वतका मुख वानरके मुखके समान हो जाय, वैसा आप कर दें'॥ ६७–७३॥ |
| तथेत्युक्त्वा स गोविन्दः प्रहस्य मधुसूदनः।<br>त्वयोक्तं च करिष्यामि गच्छ सौम्य यथागतम्॥ ७४ | तब मुसकराकर भगवान् मधुसूदनने 'ठीक है'—ऐसा कहकर [मुनि नारदसे] कहा—हे सौम्य! आपने |
५९२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग
एवमुक्त्वा मुनिर्हृष्टः प्रणिपत्य जनार्दनम्।
मन्यमानः कृतात्मानं तथायोध्यां जगाम सः॥ ७५
गते मुनिवरे तस्मिन् पर्वतोऽपि महामुनिः।
प्रणम्य माधवं हृष्टो रहस्येनमुवाच ह॥ ७६
वृत्तं तस्य निवेद्याग्रे नारदस्य जगत्पतेः।
गोलाङ्गूलमुखं यद्वन्मुखं भाति तथा कुरु॥ ७७
तच्छ्रुत्वा भगवान् विष्णुस्त्वयोक्तं च करोमि वै।
गच्छ शीघ्रमयोध्यां वै मा वेदीर्नारदस्य वै॥ ७८
त्वया मे संविदं तत्र तथेत्युक्त्वा जगाम सः।
ततो राजा समाज्ञाय प्राप्तौ मुनिवरौ तदा॥ ७९
माङ्गल्यैर्विविधैः सर्वामयोध्यां ध्वजमालिनीम्।
मण्डयामास पुष्पैश्च लाजैश्चैव समन्ततः॥ ८०
अम्बुसिक्तगृहद्वारां सिक्तापपणमहापथाम्।
दिव्यगन्धरसोपेतां धूपितां दिव्यधूपकैः॥ ८१
कृत्वा च नगरीं राजा मण्डयामास तां सभाम्।
दिव्यैर्गन्धैस्तथा धूपै रत्नैश्र्च विविधैस्तथा॥ ८२
अलङ्कृतां मणिस्तम्भैर्नानामाल्यापशोभिताम्।
पराध्र्यास्तरणोपेतैर्दिव्यैर्भद्रासनैर्वृताम् ॥ ८३
कृत्वा नृपेन्द्रस्तां कन्यां ह्यादाय प्रविवेश ह।
सर्वाभरणसम्पन्नां श्रीरिवायतलोचनाम्॥ ८४
करसम्मितमध्याङ्गीं पञ्चस्निग्धां शुभाननाम्।
स्त्रीभिः परिवृतां दिव्यां श्रीमतीं संश्रितां तदा॥ ८५
जो कहा है, उसे मैं करूँगा; अब आप जैसे आये थे, वैसे ही चले जाइये॥ ७४॥
[भगवान्के] ऐसा कहनेपर वे मुनि प्रसन्नतापूर्वक जनार्दनको प्रणाम करके अपनेको धन्य मानते हुए वहाँसे अयोध्या चले गये॥ ७५॥
तत्पश्चात् उन मुनिश्रेष्ठके चले जानेपर महामुनि पर्वतने भी [वहाँ पहुँचकर] भगवान् माधवको प्रणाम करके उन [राजा अम्बरीष]-का सारा वृत्तान्त उनके सम्मुख एकान्तमें कहकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक कहा— हे जगत्पते! नारदका मुख लंगूरके मुखकी भाँति लगने लगे, वैसा आप कर दें॥ ७६-७७॥
यह सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—'आपके द्वारा कही गयी बात मैं अवश्य करूँगा, अब आप शीघ्र ही अयोध्या जाइये; किंतु आपके साथ मेरे इस वार्तालापके विषयमें नारदसे वहाँ मत कहियेगा। तब 'ठीक है'— ऐसा कहकर वे [पर्वतमुनि] चले गये॥ ७८ १/२॥
तदनन्तर राजाने उन दोनों मुनिवरोंको आया हुआ जानकर अनेक प्रकारके मांगलिक पदार्थों, पुष्पों तथा लाजा (लावा) आदिके द्वारा एवं ध्वजा-तोरण आदि लगवाकर चारों ओरसे सम्पूर्ण अयोध्याको सजाया। भवनोंके द्वारोंको जलसे सिक्त करके, बाजारों तथा मार्गोंपर जलका छिड़काव कराकर, नगरीको दिव्य गन्ध, रस आदिसे युक्त तथा सुगन्धित धूपोंसे धूपित करके राजाने सम्पूर्ण अयोध्याको मण्डित किया। तदनन्तर राजाने उस स्वयंवर-सभाको विविध प्रकारके दिव्य गन्धों, धूपों तथा रत्नोंसे अलंकृत; मणिनिर्मित स्तम्भों तथा अनेकविध मालाओंसे सुशोभित एवं बहुमूल्य आस्तरणोंसे युक्त दिव्य सिंहासनोंसे आवृत करनेके पश्चात् सभी प्रकारके आभरणोंसे सुसज्जित, लक्ष्मीके समान विशाल नेत्रोंवाली, कृशोदरी, हाथ आदि पाँच अंगोंमें कोमलता धारण करनेवाली, मनोहर मुखमण्डलवाली और अनेक स्त्रियोंसे घिरी तथा संश्रित (सहारा देकर ले जायी जाती हुई) कन्या श्रीमतीको साथमें लेकर उस सभामें प्रवेश किया॥ ७९-८५॥
| अध्याय ५ ] | विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान | ५९३ | | :--- | :--- |
| सभा च सा भूपपतेः समृद्धा<br>मणिप्रवेकोत्तररत्नचित्रा ।<br>न्यस्तासना माल्यवती सुबद्धा<br>तामाययुस्ते नरराजवर्गाः ॥ ८६ | राजा अम्बरीषकी वह सभा वैभवमयी, अनेकविध श्रेष्ठ मणियों तथा रत्नोंसे चित्रित, उत्तम आसनोंसे सुशोभित, पुष्पमालाओंसे मण्डित और सुव्यवस्थित थी, उस सभामें वे राजागण आये ॥ ८६ ॥ | | अथापरो ब्रह्मवरात्मजो हि<br>त्रैविद्यविद्यो भगवान् महात्मा।<br>सपर्वतो ब्रह्मविदां वरिष्ठो<br>महामुनिर्नारद आजगाम ॥ ८७ | तत्पश्चात् ब्रह्माके ज्येष्ठ पुत्र, वेदत्रयी विद्याके ज्ञाता, ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, ऐश्वर्यसम्पन्न तथा महान् आत्मावाले महामुनि नारद पर्वतमुनिसहित वहाँ आ गये ॥ ८७ ॥ | | तावागतौ समीक्ष्याथ राजा सम्भ्रान्तमानसः।<br>दिव्यमासनमादाय पूजयामास तावुभौ ॥ ८८<br>उभौ देवर्षिसिद्धौ तावुभौ ज्ञानविदां वरौ।<br>समासीनौ महात्मानौ कन्यार्थं मुनिसत्तमौ ॥ ८९ | उन दोनोंको आया हुआ देखकर व्याकुल-चित्तवाले राजाने दिव्य आसन प्रदानकर उनकी पूजा की। देवर्षियोंमें विख्यात, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ तथा महान् आत्मावाले वे दोनों मुनिवर कन्याप्राप्तिके लिये सम्यक् रूपसे आसनपर विराजमान हो गये ॥ ८८-८९ ॥ | | तावुभौ प्रणिपत्याग्रे कन्यां तां श्रीमतीं शुभाम्।<br>सुतां कमलपत्राक्षीं प्राह राजा यशस्विनीम् ॥ ९०<br>अनयोर्यं वरं भद्रे मनसा त्वमिहेच्छसि।<br>तस्मै मालामिमां देहि प्रणिपत्य यथाविधि ॥ ९१ | उन दोनोंके सम्मुख दण्डवत् प्रणाम करके राजाने मनोहर, कमलके समान नेत्रोंवाली तथा यशस्विनी उस पुत्री श्रीमतीसे कहा—हे भद्रे ! इन दोनोंमेंसे जिस वरको तुम मनसे चाहती हो, उसे प्रणाम करके यह माला विधिपूर्वक उसे पहना दो ॥ ९०-९१ ॥ | | एवमुक्ता तु सा कन्यास्त्रीभिः परिवृता तदा।<br>मालां हिरण्मयीं दिव्यमादाय शुभलोचना ॥ ९२<br>यत्रासीनौ महात्मानौ तत्रागम्य स्थिता तदा।<br>वीक्ष्यमाणा मुनिश्रेष्ठौ नारदं पर्वतं तथा ॥ ९३ | राजाके ऐसा कहनेपर स्त्रियोंसे घिरी हुई सुन्दर नेत्रोंवाली वह कन्या सुवर्णमयी दिव्य माला लेकर, जहाँ वे दोनों महात्मा बैठे थे, वहीं आकर उन मुनिश्रेष्ठों नारद तथा पर्वतको देखती हुई वहीं स्थित हो गयी ॥ ९२-९३ ॥ | | शाखामृगाननं दृष्ट्वा नारदं पर्वतं तथा।<br>गोलाङ्गूलमुखं कन्या किञ्चित् त्राससमन्विता ॥ ९४<br>सम्भ्रान्तमानसा तत्र प्रवातकदली यथा।<br>तस्थौ तामाह राजासौ वत्से किं त्वं करिष्यसि ॥ ९५<br>अनयोरेकमुद्दिश्य देहि मालामिमां शुभे।<br>सा प्राह पितरं त्रस्ता इमौ तौ नरवानरौ ॥ ९६ | नारदको लंगूरके समान मुखवाला तथा पर्वतको वानरके समान मुखवाला देखकर वह कन्या कुछ डर-सी गयी। व्याकुल चित्तवाली वह कन्या वायु-प्रकम्पित कदलीकी भाँति [काँपती हुई] वहाँ स्थित रही। तब उस राजाने उससे कहा—हे वत्से ! तुम अब क्या करोगी ? हे शुभे ! इन दोनोंमेंसे किसी एकको चुनकर उसे माला पहना दो ॥ ९४-९५ १/२ ॥ | | मुनिश्रेष्ठं न पश्यामि नारदं पर्वतं तथा।<br>अनयोर्मध्यतस्त्वेकमुनषोडशवार्षिकम् ॥ ९७<br>सर्वाभरणसम्पन्नमतसीपुष्पसन्निभम् ।<br>दीर्घबाहुं विशालाक्षं तुङ्गोरस्थलमुत्तमम् ॥ ९८ | डरी हुई उस कन्याने पितासे कहा—ये दोनों तो नरवानरकी आकृतिवाले हैं; मुनिश्रेष्ठ नारद तथा पर्वत तो मुझे दिखायी ही नहीं पड़ रहे हैं। [अपितु] इन दोनोंके मध्यमें सोलह वर्षसे थोड़ी कम आयुवाले, समस्त आभरणोंसे सम्पन्न, अतसी-पुष्पके समान [नील] |
| ५९४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| रेखाङ्कितकटिग्रीवं रक्तान्तायतलोचनम्।<br>नम्रचापानुकरणपटुभ्रूयुगशोभितम् ॥ ९९<br><br>विभक्तत्रिवलीव्यक्तं नाभिव्यक्तशुभोदरम्।<br>हिरण्याम्बरसंवीतं तुङ्गरत्ननखं शुभम्।<br>पद्माकारकरं त्वेनं पद्मास्यं पद्मलोचनम्॥ १००<br><br>सुनासं पद्महृदयं पद्मनाभं श्रिया वृतम्।<br>दन्तपङ्क्तिभिरत्यर्थं कुन्दकुड्मलसन्निभैः॥ १०१<br><br>हसन्तं मां समालोक्य दक्षिणं च प्रसार्य वै।<br>पाणिं स्थितममुं तत्र पश्यामि शुभमूर्धजम् ॥ १०२ | कान्तिवाले, लम्बी भुजाओंवाले, विशाल नेत्रोंवाले, उन्नत तथा उत्तम वक्षःस्थलवाले, रेखायुक्त कटिप्रदेश तथा ग्रीवावाले, रक्त प्रान्तभागसे युक्त विशाल नेत्रोंवाले, झुके हुए धनुषके सदृश टेढ़ी भौंहोंसे सुशोभित, [उदरदेशमें] पृथक्-पृथक् तीन वलियोंसे समन्वित, स्पष्ट नाभिसे युक्त सुन्दर उदरवाले, पीताम्बर धारण किये हुए, उन्नत तथा रत्नकी आभासे युक्त नखवाले, मनोहर कमलके आकारसदृश हाथोंवाले, कमलके समान मुख तथा नेत्रोंवाले, सुन्दर नासिकावाले, पद्मसद्श हृदयदेशवाले, पद्मके समान नाभिवाले, कान्तिमान्, कुन्द-कलीके समान दन्त-पंक्तियोंसे सुशोभित, सुन्दर केशोंवाले और मुझको देखकर मेरी ओर दाहिना हाथ फैलाकर हँसते हुए वहाँपर विराजमान इस [अन्य व्यक्ति]-को देख रही हूँ॥ ९६—१०२॥ | | सम्भ्रान्तमानसां तत्र वेपतीं कदलीमिव।<br>स्थितां तामाह राजासौ वत्से किं त्वं करिष्यसि॥ १०३ | तब कदलीकी भाँति काँपते हुए वहाँपर खड़ी उस व्याकुल मनवाली कन्यासे राजाने कहा—हे वत्से! अब तुम क्या करोगी?॥ १०३॥ | | एवमुक्ते मुनिः प्राह नारदः संशयं गतः।<br>कियन्तो बाहवस्तस्य कन्ये ब्रूहि यथातथम् ॥ १०४<br><br>बाहुद्वयं च पश्यामीत्याह कन्या शुचिस्मिता।<br>प्राह तां पर्वतस्तत्र तस्य वक्षःस्थले शुभे॥ १०५<br><br>किं पश्यसि च मे ब्रूहि करे किं वास्य पश्यसि।<br>कन्या तमाह मालां वै पञ्चरूपामनुत्तमाम्॥ १०६<br><br>वक्षःस्थलेऽस्य पश्यामि करे कार्मुकसायकान्। | उसके ऐसा कहनेपर सन्देहमें पड़े नारदमुनिने कहा—हे कन्ये! उसकी कितनी भुजाएँ हैं; सही-सही बताओ। तब पवित्र मुसकानवाली उस कन्याने कहा—मैं [उसके] दो हाथ देख रही हूँ। इसके बाद पर्वतने उससे कहा—हे शुभे! तुम उसके वक्षःस्थलपर क्या देख रही हो और उसके [बायें] हाथमें क्या देख रही हो; मुझे बताओ। इसपर कन्या उनसे बोली—मैं उसके वक्षःस्थलपर सर्वश्रेष्ठ पंचरूप माला तथा हाथमें धनुष-बाण देख रही हूँ॥ १०४—१०६ १/२॥ | | एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ परस्परमनुत्तमौ ॥ १०७<br><br>मनसा चिन्तयन्तौ तौ मायेयं कस्यचिद्भवेत्।<br>मायावी तस्करो नूनं स्वयमेव जनार्दनः॥ १०८<br><br>आगतो न यथा कुर्यात्कथमस्मन्मुखं त्विदम्।<br>गोलाङ्गूलत्वमित्येवं चिन्तयामास नारदः॥ १०९<br><br>पर्वतोऽपि यथान्यायं वानरत्वं कथं मम।<br>प्राप्तमित्येव मनसा चिन्तामापेदिवांस्तथा॥ ११० | उसके द्वारा इस प्रकार कहे गये वे दोनों उत्तम मुनिश्रेष्ठ मनमें सोचते हुए परस्पर कहने लगे कि यह किसीकी माया हो सकती है। लगता है मायावी तथा तस्कर स्वयं जनार्दन ही [कन्या प्राप्त करनेके लिये] निश्चितरूपसे यहाँ आया हुआ है; यदि ऐसा न होता, तो मेरा यह मुख लंगूरके मुखके समान वह क्यों करता?—ऐसा नारदजी सोचने लगे। इसी प्रकार पर्वतमुनि भी मनमें चिन्ता करने लगे कि मुझे यह वानरत्व कैसे प्राप्त हो गया?॥ १०७—११०॥ |
| अध्याय ५ ] | विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान | ५१५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततो राजा प्रणम्यासौ नारदं पर्वतं तथा।<br>भवद्भ्यां किमिदं तत्र कृतं बुद्धिविमोहजम्॥ १११<br>स्वस्थौ भवन्तौ तिष्ठेतां यथा कन्यार्थमुद्यतौ।<br>एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ नृपमूचतुरुल्बणौ॥ ११२ | तदनन्तर राजाने नारद तथा पर्वतको प्रणाम करके कहा—आप दोनोंने बुद्धि-विमोह उत्पन्न करनेवाला यह क्या कर दिया ? कन्याको प्राप्त करनेके लिये तत्पर आप दोनों अब शान्तचित्त होकर बैठिये॥ १११ १/२॥ |
| त्वमेव मोहं कुरुषे नावामिह कथञ्चन।<br>आवयोरेकमेषा ते वरयत्वेव मा चिरम्॥ ११३ | राजाके ऐसा कहनेपर वे दोनों मुनिश्रेष्ठ कुपित होकर बोले—आप ही मोह कर रहे हैं; हम दोनों बिलकुल नहीं। आपकी यह पुत्री अब हम दोनोंमेंसे किसी एकका अविलम्ब वरण कर ले॥ ११२-११३॥ |
| ततः सा कन्यका भूयः प्रणिपत्येष्टदेवताम्।<br>मायामादाय तिष्ठन्तं तयोर्मध्ये समाहितम्॥ ११४<br>सर्वाभरणसंयुक्तमतसीपुष्पसन्निभम् ।<br>दीर्घबाहुं सुपुष्टाङ्गं कर्णान्तायतलोचनम्॥ ११५<br>पूर्ववत्पुरुषं दृष्ट्वा मालां तस्मै ददौ हि सा।<br>अनन्तरं हि सा कन्या न दृष्टा मनुजैः पुनः॥ ११६ | तत्पश्चात् अपने इष्ट देवताको प्रणाम करके माला लेकर वह उठी और उसने उन दोनोंके बीचमें समाहितचित्त होकर बैठे हुए, समस्त आभरणोंसे सुशोभित, अतसीपुष्पके समान श्याम वर्णवाले, लम्बी भुजाओंवाले, पुष्ट अंगोंवाले तथा कर्णपर्यन्त विशाल नेत्रोंवाले पूर्वसदृश पुरुषको देखकर उसे माला पहना दी। इसके बाद पुनः [वहाँ उपस्थित] मनुष्योंने उस कन्याको नहीं देखा॥ ११४-११६॥ |
| ततो नादः समभवत् किमेतदिति विस्मितौ।<br>तामादाय गतो विष्णुः स्वस्थानं पुरुषोत्तमः॥ ११७<br>पुरा तदर्थमनिशं तपस्तप्त्वा वराङ्गना।<br>श्रीमती सा समुत्पन्ना सा गता च तथा हरिम्॥ ११८ | तब वे दोनों मुनि आश्चर्यचकित हो गये कि यह क्या हुआ ? इसके बाद वहाँ [लोगोंके बीच] यह ध्वनि होने लगी कि उसे लेकर पुरुषोत्तम श्रीविष्णु अपने लोकको चले गये। पूर्वजन्ममें उस सुन्दर युवतीने उन भगवान्के लिये निरन्तर तप करके [इस जन्ममें] 'श्रीमती' नामवाली कन्याके रूपमें जन्म लिया और फिर वह श्रीविष्णुको प्राप्त हुई॥ ११७-११८॥ |
| तावुभौ मुनिशार्दूलौ धिक्कृतावतिदुःखितौ।<br>वासुदेवं प्रति तदा जग्मतुर्भवनं हरेः॥ ११९ | तत्पश्चात् [उस श्रीमतीके द्वारा] तिरस्कृत किये गये वे दोनों मुनिश्रेष्ठ वासुदेव श्रीविष्णुके प्रति अत्यन्त दुःखित होकर उन श्रीहरिके भवन पहुँचे॥ ११९॥ |
| तावागतौ समीक्ष्याह श्रीमतीं भगवान् हरिः।<br>मुनिश्रेष्ठौ समायातौ गूहस्वात्मानमत्र वै॥ १२० | उन दोनोंको आया हुआ देखकर भगवान् श्रीहरिने श्रीमतीसे कहा कि मुनिश्रेष्ठ [नारद तथा पर्वत] आये हैं, अतः तुम अपनेको यहाँ छिपा लो॥ १२०॥ |
| तथेत्युक्त्वा च सा देवी प्रहसन्ती चकार ह।<br>नारदः प्रणिपत्याग्रे प्राह दामोदरं हरिम्॥ १२१ | इस पर 'ठीक है'—ऐसा कहकर उस देवीने हँसते हुए वैसा कर दिया। तब सम्मुख दण्डवत् प्रणाम करके नारदने दामोदर श्रीहरिसे कहा—आपने मेरा तथा पर्वतका प्रिय कार्य तो आज कर दिया; हे गोविन्द! हे |
| प्रियं हि कृतवानद्य मम त्वं पर्वतस्य हि।<br>त्वमेव नूनं गोविन्द कन्यां तां हृतवानसि॥ १२२ | सुरश्रेष्ठ! अपनी बुद्धिसे हम दोनोंको धोखा देकर तथा विमोहित करके स्वयं आपने ही उस कन्याका हरण |