भारतकोश
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वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

अध्याय १७५-१७६ ] ब्राह्मण-कुमारीकी मुक्ति ३१७


और शिवनदीके दक्षिणतटवर्ती एक नगरमें ब्राह्मणी-वृत्तिसे रहने लगा। वहाँ उसके पाँच पुत्र और एक तिलोत्तमा नामकी कन्या उत्पन्न हुई। कन्याका विवाह उसने किसी ब्राह्मणके साथ कर दिया। फिर वह ब्राह्मण सपत्नीक कालधर्मको प्राप्त हो गया। उस समय वह 'तिलोत्तमा' कन्या ही माता-पिताकी हड्डियाँ लेकर तीर्थयात्रियोंके साथ मथुरा आयी; क्योंकि उसने पुराणोंमें सुना था कि जिसकी हड्डी मथुराके 'अर्द्धचन्द्र'तीर्थमें गिरती है, वह सदा स्वर्गमें निवास करता है।' यह पुत्री उस ब्राह्मणकी सबसे छोटी संतान थी, जो विवाहके कुछ ही काल बाद विधवा हो गयी थी।

उन्हीं दिनों 'कान्यकुब्ज'के राजाने मथुराके गर्तैश्वर महादेवके लिये एक 'अन्न-सत्र' खोल रखा था, जहाँ निरन्तर भोजन-वितरण होता रहता था। उस नरेशके यहाँ नृत्य-गान भी होता था। यहाँ गणिकाओंके दुश्चक्रमें पड़कर वह कन्या भी उसी कर्ममें लग गयी और थोड़े ही दिनोंके बाद वह भी उस राजाकी परिजन बन गयी।

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे ! उस 'वसु' ब्राह्मणके कनिष्ठ पुत्रका नाम पाञ्चाल था, जो बड़ा रूपवान् था। वह कुछ व्यापारियोंके साथ अनेक देशों, राज्यों, पर्वतों और नदियोंको पारकर यात्रा करते हुए मथुरा पहुँचा तथा वहीं रहने लगा। एक दिन प्रातःकाल कुछ पुरुषोंके साथ स्नान करनेके लिये वहाँके उत्तम 'कालञ्जर' तीर्थमें गया और स्नानकर श्रेष्ठ वस्त्र एवं अलङ्कारोंसे अलङ्कृत होकर धनके गर्वमें एक यानपर बैठकर देवताका दर्शन करनेके लिये 'त्रिगर्तेश्वर' महादेवके स्थानपर पहुँचा। वहाँ उसकी दृष्टि 'तिलोत्तमा' पर पड़ी, जिसे देखकर वह सर्वथा मुग्ध हो गया। फिर उसने उस कन्याकी धाईके द्वारा उसे कपड़ोंकी गाँठ, सैकड़ों सुवर्णके आभूषण तथा रत्नोंके हार भेंट किये। अब वह आसक्तिके कारण प्रायः उसीके घर रहता और जब आधा पहर दिन चढ़ जाता तब अपनी छावनीपर जाता तथा समीपके 'कृष्णगङ्गोद्भव' तीर्थमें स्नान करता, इस प्रकार छः महीने बीत गये। एक बार जब वह सुमन्तुमुनिके आश्रमके पास स्नान कर रहा था तो मुनिकी दृष्टि उसपर पड़ गयी। उसके शरीरमें कीड़े पड़ गये थे, जो रोम-कूपोंसे निकलकर जलमें गिर रहे थे। पर स्नान कर लेनेके बाद वह सर्वथा नीरोग हो गया। जब मुनिने इस प्रकारका दृश्य देखा तो उससे पूछा—'सौम्य ! तुम कौन हो, तुम्हारे पिता कौन हैं? कहाँके रहनेवाले हो, तुम्हारी कौन-सी जाति है तथा तुम दिन-रात किस काममें व्यस्त रहते हो? यह सब तुम मुझे बताओ।'

पाञ्चालने कहा—'मैं एक ब्राह्मणका बालक हूँ और मेरा नाम 'पाञ्चाल' है। इस समय मैं व्यापार-कार्यसे दक्षिण भारतसे यहाँ आया हूँ और प्रातःकाल यहाँ स्नानकर 'त्रिगर्तेश्वर 'महादेवका दर्शन करता हूँ। फिर कालञ्जर-क्षेत्रमें आकर आपके चरणोंका दर्शन करता हूँ। तत्पश्चात् छावनीमें लौट जाता हूँ।'

मुनिने कहा—'ब्राह्मण ! तुम्हारे शरीरमें मैं प्रतिदिन एक महान् आश्चर्यकी बात देखता हूँ। तुम्हारा शरीर स्नानके पहले कृमिपूर्ण और स्नान कर लेनेपर स्वच्छ एवं प्रकाशमय बन जाता है। तुम किसी पाप-प्रपञ्चमें पड़े हो, जो इस तीर्थमें स्नान करनेके प्रभावसे दूर हो जाता है। अब तुम सोच-विचारकर उसका पता लगाकर मुझे बताओ।'

इसपर पाञ्चालने उस कन्याके घर जाकर उससे एकान्तमें आदरपूर्वक पूछा—'सुभगे ! तुम किसकी पुत्री हो और तुम्हारा कौन-सा देश है?

३१८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १७५-१७६

एवं यहाँ कैसे आयी तथा रहती हो ?

उस समय पाञ्चालके अनुरोधपूर्वक पूछनेपर भी उस कन्याने उसका कुछ उत्तर नहीं दिया। कुछ समय बाद पाञ्चालने कहा—‘देखो, अब तुम यदि सच्ची बात नहीं कहोगी तो मैं अपने प्राणोंका त्याग कर दूँगा।’ उसके इस निश्चयको देख उस कन्याने अपने माता-पिता, भाई, देश, जाति और कुल सबका यथावत् परिचय देते हुए बतलाया कि ‘मेरे पिताके पाँच पुत्र और मैं—ये छः संतानें हुई थीं, जिनमें सबसे छोटी संतान मैं ही हूँ। विवाहके बाद मेरे पतिदेवका शीघ्र ही देहान्त हो गया। पाँचों भाइयोंमें जो सबसे छोटा था, वह धनकी तृष्णासे बचपनमें ही व्यापारियोंके साथ विदेश चला गया। उसके चले जानेपर मेरे माता-पिता मर गये। अतएव कुछ सहायकोंका साथ पाकर मैं इस तीर्थमें उनके अस्थिप्रवाहके लिये चली आयी। यहाँ कुछ गणिकाओंके कुचक्रमें पड़कर मेरी यह दशा हुई। मैंने कुलटा स्त्रियोंका धर्म अपनाकर अपने कुलको नष्ट कर दिया। यही नहीं, मातृ-पितृ और पति—इन तीनों कुलोंके इक्कीस पीढ़ियोंको घोर नरकमें गिरा दिया।’

इस प्रसङ्गको सुनकर पाञ्चालको तो मूर्च्छा आ गयी और वह भूमिपर गिर पड़ा। वहाँ उपस्थित स्त्रियाँ दीनवदना उस ब्राह्मणकुमारीको समझा-बुझाकर पाञ्चालके चारों ओर खड़ी हो गयीं और फिर अनेक प्रकारके उपायोंका प्रयोग कर उन सबोंने उसकी मूर्च्छाको दूर किया। जब उसके शरीरमें चेतना आयी तो उन्होंने उससे बेहोशीका कारण पूछा। इसपर उस ब्राह्मणकुमारने अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया। फिर इस पापसे उसके मनमें घोर चिन्ता व्याप्त हो गयी और वह प्रायश्चित्तकी बात सोचने लगा। उसने कहा—

‘मुनियोंने विचार करके यह आदेश दिया है कि यदि कोई द्विजाति ब्राह्मणकी हत्या कर दे अथवा मदिरा पी ले तो उसका प्रायश्चित्त शरीरका परित्याग ही है। माता, गुरुकी पत्नी, बहन, पुत्री, और पुत्रवधूसे अवैध सम्बन्ध रखनेवालेको जलती अग्निमें प्रवेश कर जाना चाहिये। इसके अतिरिक्त उसकी शुद्धिके लिये दूसरा कोई उपाय नहीं है।’

जब पाञ्चालीने अपने बड़े भाईके मुखसे ही मुनिकथित यह प्रायश्चित्त सुना तो उसने भी अपने सौभाग्यके सम्पूर्ण आभूषण, रत्न-वस्त्र, धन और धान्य आदि जो कुछ भी वस्तुएँ संचित कर रखी थीं, वह सब-का-सब ब्राह्मणोंमें बाँट दिया। साथ ही बताया कि ‘इस द्रव्यसे कालञ्जरका शृङ्गार तथा एक उद्यानका निर्माण कराया जाय।’ फिर उसने सोचा—‘अपनी आत्म-शुद्धिके लिये ‘कृष्णगङ्गोद्भवतीर्थ’में चलकर विधिपूर्वक चितारोहण करूँ।’

उधर पाञ्चाल भी सुमन्तुमुनिके पास पहुँच कर उन्हें प्रणामकर मृत्युके उपयोगी कर्मोंका सम्पादन कर मथुराके निवासी ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें भलीभाँति दान देकर अपनी शेष सम्पूर्ण धनराशि सत्र खोलनेके लिये दे दी और विधिके अनुसार अपनी और्ध्वदैहिक संस्कारके लिये भी व्यवस्था कर ली। ‘कृष्णगङ्गा’में स्नानकर उसने इष्टदेवका दर्शनकर, उन्हें प्रणाम किया और सुमन्तुमुनिके चरणोंको पकड़कर प्रार्थना की—‘भगवन्! मैं अगम्या-गमनके दोषसे महान् पापी बन गया हूँ। मुझ कुलनाशकका स्वभगिनीके साथ ही दुर्योगसे अवैध सम्बन्ध हो गया। अब मैं अपने शरीरका त्याग करना चाहता हूँ। आप आज्ञा दें।’

इस प्रकार सुमन्तुमुनिको अपना पाप सुनाकर चितापर घृत छिड़क कर वह अग्निमें प्रवेश

१४७- काष्ठ-पाषाण प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि

अध्याय १७७ ] साम्बको शाप लगना और उनका सूर्याराधन-व्रत ३१९

करना ही चाहता था कि सहसा आकाशवाणी हुई—'ऐसा दुःसाहस मत करो; क्योंकि तुम दोनोंके पाप सर्वथा धुल गये हैं। जहाँ स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने सुखपूर्वक लीला की है तथा जो स्थान उनके चरणके चिह्नसे चिह्नित है, वह तो ब्रह्मलोकसे भी श्रेष्ठ है। दूसरी जगहके किये हुए पाप इस तीर्थमें आते ही नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य 'गङ्गा-सागर'में एक बार स्नान करनेसे ब्रह्महत्या-जैसे पापसे छूट जाता है। पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, उन सभी तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वैसा ही फल 'पञ्चतीर्थ'में स्नान करनेसे मिल जाता है—इसमें कोई संशय नहीं। शुक्ल और कृष्णपक्षकी एकादशियोंको विश्रान्ति-तीर्थमें, द्वादशीको 'सौकरव' तीर्थमें, त्रयोदशीको नैमिषारण्यमें, चतुर्दशीको प्रयागमें तथा कार्तिकी एकादशीको पुष्करमें स्नान करना चाहिये। इससे सारे पाप दूर हो जाते हैं।'

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! इस प्रकारकी आकाशवाणीको सुनकर पाञ्चालने सुमन्तुसे पूछा—'मुने! आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें कि मैं आगमें प्रवेश करूँ या 'त्रिरात्र', 'कृच्छ्र' या 'चान्द्रायण' व्रत करूँ?'

मुनिने आकाशवाणीकी बातोंपर विश्वासकर उसे शुद्ध धर्माचरणका आदेश दिया। देवि! जो मनुष्य श्रद्धासे इस माहात्म्यका श्रवण एवं पठन करेगा, वह कभी भी पापसे लिप्त नहीं हो सकता, साथ ही उसके सात जन्म पहलेके भी किये हुए पाप दूर भाग जाते हैं और वह जरा-मरणसे मुक्त होकर स्वर्गलोकको चला जाता है।

[ अध्याय १७५-१७६ ]

साम्बको शाप लगना और उनका सूर्याराधन-व्रत

भगवान् वराह कहते हैं—शुभाङ्गि! अब मैं श्रीकृष्णकी कथाका वह अद्भुत प्रसङ्ग कहता हूँ, जो द्वारकापुरीमें घटित हुआ था। साथ ही साम्बके शापकी बात भी सुनो। एक बार जब भगवान् सानन्द द्वारकामें विराजमान थे तो नारदमुनि वहाँ पधारे। श्रीभगवान्ने उन्हें आसन, अर्घ्य, पाद्य मधुपर्क एवं गौ समर्पण किये। तदनन्तर मुनिने उन्हें यह सूचना दी—कि 'मैं आपसे एकान्तमें कुछ कहना चाहता हूँ और एकान्तमें उन्होंने कहा—'प्रभो! आपका नवयुवक पुत्र साम्ब बड़ा वाग्मी, रूपवान्, परम सुन्दर तथा देवताओंमें भी आदर पानेवाला है। देवेश्वर! आपकी देवतुल्य हजारों स्त्रियाँ भी उसको देखकर क्षुब्ध हो जाती हैं। आप साम्बको और उन देवियोंको यहाँ बुलाकर परीक्षा करें कि वस्तुतः क्षोभ है या नहीं।'

इसके पश्चात् सभी स्त्रियाँ तथा साम्ब श्रीकृष्णके सामने आये और हाथ जोड़कर बैठ गये। क्षणभरके बाद साम्बने पूछा—'प्रभो! आपकी क्या आज्ञा है?' वस्तुतः साम्बकी सुन्दरताको देखकर श्रीकृष्णके सामने ही उन स्त्रियोंके मनमें क्षोभ उत्पन्न हो गया था।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'देवियो! अब तुम सभी उठो और अपने स्थानको जाओ।' श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर वे देवियाँ अपने-अपने स्थानको चली गयीं। पर साम्ब वहीं बैठे रहे। उनके शरीरमें कँपकँपी बँध रही थी। श्रीकृष्णने कहा—'नारदजी! स्त्रियोंका स्वभाव बड़ा ही विलक्षण है।'

नारदजीने कहा—'प्रभो! इनकी इस प्रवृत्तिसे सत्यलोकमें भी आपकी निन्दा हो रही है, अतः

३२०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १७७

अब साम्बका परित्याग करना ही उचित है। भगवन्! संसारमें आपकी तुलना करनेवाला दूसरा कौन पुरुष है? आप ही इसे कर सकते हैं।'

वसुंधरे! नारदके इस कथनपर श्रीकृष्णने साम्बको रूपहीन होनेका शाप दे दिया, जिससे साम्बके शरीरमें कुष्ठ-रोग हो गया और उनके शरीरसे दुर्गन्धयुक्त रक्त गिरने लगा। अब उनका शरीर ऐसा दिखायी पड़ने लगा, मानो कोई छिन्न-भिन्न अङ्गवाला पशु हो। फिर नारदजीने ही साम्बको शापसे छूटनेके लिये सूर्यकी आराधनाका उपदेश दिया और साथ ही कहा—'जाम्बवतीनन्दन! तुम्हें वेद और उपनिषदोंमें कहे हुए मन्त्रोंका उच्चारण करके विधिके अनुसार सूर्य-नमस्कार करना चाहिये। इससे वे संतुष्ट हो जायेंगे।' फिर सूर्यसे तुम्हारा समुचित संवाद होगा, जिस प्रसङ्गको लेकर 'भविष्यपुराण' निर्मित होगा। उसे मैं ब्रह्माजीके लोकमें जाकर उनके सामने सदा पाठ करूँगा। फिर सुमन्तुमुनि मर्त्यलोकमें मनुके सामने उसका कथन करेंगे। इस प्रकार उसका सभी लोकोंमें प्रचार-प्रसार होगा।'

साम्बने कहा—'प्रभो! मेरी स्थिति तो ऐसी है, मानो मांसका एक पिण्ड हो। फिर उदयाचलपर मैं जा ही कैसे सकता हूँ। यह आपकी ही कृपा है कि मुझे यह दुःख भोगना पड़ रहा है, नहीं तो तत्त्वतः मैं बिल्कुल दोषरहित था।'

नारदजी बोले—'साम्ब! उदयाचलपर जाकर सूर्यकी आराधना करनेसे जैसा फल मिलता है, वैसा ही फल मथुराके 'षट्सूर्य-तीर्थ'पर सुलभ हो जाता है। यहाँ भगवान् सूर्यकी प्रतिमाओंका प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालमें जो पूजा करता है, वह तुरंत ही साम्राज्य-जैसा फल प्राप्त कर सकता है। प्रातः, मध्याह्न और सायं—इन तीनों पवित्र समयोंमें सूर्यमन्त्रका जप तथा उच्चस्वरसे उनके स्तोत्रपाठसे सारे पाप धुलकर कुष्ठ आदि रोगोंसे भी मुक्ति मिल जाती है।'

**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! मुनिवर नारदके ऐसा कहनेपर महाबाहु साम्बने श्रीकृष्णसे आज्ञा प्राप्त करके भुक्तिमुक्ति फल देनेवाली मथुरामें आकर देवर्षि नारदकी बतायी विधिके अनुसार प्रातः, मध्याह्न और सायंकालमें उन षट्सूर्योंकी पूजा एवं दिव्य स्तोत्रद्वारा उपासना आरम्भ कर दी। भगवान् सूर्यने भी योगबलकी सहायतासे एक सुन्दर रूप धारण कर साम्बके सामने आकर कहा—'साम्ब! तुम्हारा कल्याण हो! तुम मुझसे कोई वर माँग लो। मेरे कल्याणकारी व्रत एवं उपासनापद्धतिके प्रचारके लिये भी इसे करना परम आवश्यक है। मुनिवर नारदने तुम्हें जो स्तोत्र बताया है और जिसे तुमने मेरे सामने व्यक्त किया है, उस तुम्हारी 'साम्बपञ्चाशिका'-स्तुतिमें वैदिक अक्षरों एवं पदोंसे सम्बद्ध पचास श्लोक हैं। वीर! नारदजीद्वारा निर्दिष्ट इन श्लोकोंद्वारा तुमने जो मेरी स्तुति की है, इससे मैं तुमपर पूर्ण संतुष्ट हो गया हूँ।'

वसुधे! यह कहकर भगवान् सूर्यने साम्बके सम्पूर्ण शरीरका स्पर्श किया। उनके छूते ही साम्बके सारे अङ्ग सहसा रोगमुक्त होकर चमक उठे। फिर तो वे ऐसे विद्योतित होने लगे, मानो दूसरे सूर्य ही हों। उसी समय याज्ञवल्क्यमुनि माध्यन्दिन-यज्ञ करना चाहते थे। भगवान् सूर्य साम्बको लेकर उनके यज्ञमें पधारे और वहाँ साम्बको 'माध्यन्दिन-संहिता'का अध्ययन कराया। तबसे साम्बका भी एक नाम 'माध्यन्दिन' पड़ गया। 'वैकुण्ठक्षेत्र'के पश्चिमभागमें यह यज्ञ सम्पन्न हुआ था। अतएव इस स्थानको 'माध्यन्दिनीय' तीर्थ कहते हैं। वहाँ स्नान एवं दर्शन करनेके प्रभावसे मानव समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता

अध्याय १७८-१७९ ] शत्रुघ्नका चरित्र, सेवापराध एवं मथुरामाहात्म्य [ ३२१

है। साम्बके प्रश्न करनेपर सूर्यने जो प्रवचन किया, वही प्रसङ्ग 'भविष्यपुराण'के नामसे प्रख्यात पुराण बन गया। यहाँ साम्बने 'कृष्णगङ्गा'के दक्षिण तटपर मध्याह्नके सूर्यकी प्रतिमाकी प्रतिष्ठा की। जो मनुष्य प्रातः, मध्याह्न और अस्त होते समय इन सूर्यदेवका यहाँ दर्शन करता है, वह परम पवित्र होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।

इसके अतिरिक्त सूर्यकी एक दूसरी उत्तम प्रातःकालीन विख्यात प्रतिमा भगवान् 'कालप्रिय' नामसे प्रतिष्ठित हुई। तदनन्तर पश्चिमभागमें 'मूलस्थान'में अस्ताचलके पास 'मूलस्थान'नामक प्रतिमाकी प्रतिष्ठा हुई। इस प्रकार साम्बने सूर्यकी तीन प्रतिमाएँ स्थापित कर उनकी प्रातः, मध्याह्न एवं संध्या—तीनों कालोंमें उपासनाकी भी व्यवस्था की*। देवि! साम्बने 'भविष्यपुराण'में निर्दिष्ट विधिके अनुसार भी अपने नामसे प्रसिद्ध एक मूर्तिकी यहाँ स्थापना करायी। मथुराका वह श्रेष्ठ स्थान 'साम्बपुर'के नामसे प्रसिद्ध है। सूर्यकी आज्ञाके अनुसार वहाँ रथ-यात्राका प्रबन्ध हुआ। माघ मासकी सप्तमी तिथिके दिन जो सम्पूर्ण राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे मुक्त मानव उस दिव्य स्थानमें रथ-यात्राकी व्यवस्था करते हैं, वे सूर्यमण्डलका भेदन कर परमपद प्राप्त करते हैं। देवि! साम्बके शापका यह प्रसङ्ग मैंने तुम्हें बतलाया। इसके श्रवणसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

[ अध्याय १७७]


शत्रुघ्नका चरित्र, सेवापराध एवं मथुरामाहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! प्राचीन समयकी बात है—मथुरामें लवण नामक एक राक्षस था। ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये महात्मा शत्रुघ्नने उसका वध किया था। उस स्थानकी बड़ी महिमा है। मार्गशीर्षकी द्वादशी तिथिके अवसरपर वहाँ संयमपूर्वक पवित्र रहकर स्नान करना और शत्रुघ्नके चरित्रका वर्णन करना चाहिये। लवणासुरके वध करनेसे शत्रुघ्नको अपने शरीरमें पापकी आशङ्का हो गयी थी। उसे दूर करनेके लिये उन्होंने सुस्वादु अन्नोंसे ब्राह्मणोंको तृप्त किया था। इस समाचारसे भगवान् श्रीरामको अत्यन्त आनन्द मिला था। अतः अपनी सेनाके साथ अयोध्यासे यहाँ आकर उन्होंने इसके उपलक्ष्यमें महान् उत्सव किया। अगहन मासके शुक्ल पक्षकी दशमी तिथिके दिन भगवान् राम मथुरा पहुँचे थे और वहाँ एकादशी तिथिके पुण्य-अवसरपर उपवास करके 'विश्रान्ति-तीर्थ'में सपरिवार स्नान कर महान् उत्सव मनाया। फिर ब्राह्मणोंको तृप्त करके स्वयं भोजन किया। उस दिन जो वहाँ उत्सव मनाता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पितरोंके साथ दीर्घ कालतक अर्थात् प्रलयपर्यन्त स्वर्गलोकमें निवास करता है।


* 'वराहपुराण'का यह साम्बोपाख्यान या 'सूर्योपासनाध्याय' बड़े महत्त्वका है। इसमें सूर्यभगवान्‌के अत्यन्त दिव्य स्तोत्र 'साम्बपञ्चाशिका'-स्तुति तथा कोणार्क, उज्जयिनी एवं मुल्तानके प्राचीन भव्य सूर्य-मन्दिरोंका भी संकेत है, जिनकी प्रतिनिधिभूत अर्चाएँ मथुरामें प्रतिष्ठित थीं। इस विषयमें अल्बरूनीके 'Indica' p. 298 का—'Multān was originally called Kāśyapapura, then Hamsapur, then Bagpur, then Sambapur and then Mulsthān' यह कथन बड़े महत्त्वका है, जिसमें मुल्तान नगरके पूर्वनाम 'काश्यपपुर' या सूर्यपुर, फिर साम्बपुर तथा मूलस्थान आदि निर्दिष्ट हैं। इसीके खण्ड १ पृष्ठ ११६-७ पर अल्बरूनीने इसके मन्दिर तथा प्रतिमाध्वंसकी कथाका—'Jalam Iben shaiban, the userper, broke the idol into pieces and killed its priests.' आदि शब्दोंमें विस्तृत वर्णन किया है।

१४८- मृन्मयी एवं ताम्र-प्रतिमाओंकी प्रतिष्ठा-विधि

३२२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १७८-१७१

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! मन, वाणी अथवा कर्म किसी प्रकारसे भी पाप-कर्ममें रुचि रखना अपराध है। दन्तधावन न करने, राजान्न खाने, शवस्पर्श करने, सूतकवाले व्यक्तिका जल ग्रहण करने एवं उसका स्पर्श तथा मल, मूत्र, आदि क्रियाओंसे भी अपराध बन जाते हैं। अवाच्यवाणी बोलना, अभक्ष्य-भक्षण करना, पिण्याक (हींग)-को भोजनमें सम्मिलित करना, दूसरेके मलिन वस्त्र, नीले रंगवाला वस्त्र धारण करना, गुरुसे असत्य भाषण, पतित व्यक्तिका अन्न खाना तथा भोजन न देनेका भय उत्पन्न करना—ये सब सेवापराध हैं। उत्तम अन्न स्वयं खा लेना, बत्तक आदिका मांस खाना और देव-मन्दिरमें जूता पहनकर जाना भी अपराध है। देवताकी आराधनामें जिस फूलको शास्त्रमें निषिद्ध माना गया है, उसे काममें लेना, निर्माल्यको विग्रह (मूर्ति)-परसे हटाये बिना ही अस्त-व्यस्त होकर अँधेरेमें भगवान्‌की पूजा करना भी अपराध है। मदिरा पीना, अन्धकारमें इष्टदेवताको जगाना, भगवान्‌की पूजा एवं प्रणाम न करके सांसारिक काममें प्रवृत्त हो जाना—ये सभी अपराध हैं। वसुधे! इस प्रकारके तैंतीस अपराधोंको मैंने स्पष्ट कर दिया। इन अपराधोंसे युक्त पुरुष परम प्रभु श्रीहरिका दर्शन नहीं पा सकता। यदि वह दूर रहकर भी पूजा एवं नमस्कार करे तो उसका वह कर्म राक्षसी माना जाता है।

क्रमशः इनकी शुद्धिका प्रकार यह है—मैले वस्त्रसे दूषित व्यक्ति एक रात, दो रात अथवा तीन रातोंतक वस्त्र पहने ही स्नान करे और पञ्चगव्य पिये तो उसकी शुद्धि हो जाती है। नीला वस्त्र पहननेके पापसे बचनेके लिये मानव गोमयद्वारा अपने शरीरको भलीभाँति मले और 'प्राजापत्य' व्रत करे तो वह पवित्र हो जाता है। गुरुके प्रति बने हुए पापसे मुक्तिके लिये दो 'चान्द्रायण' व्रत करनेका विधान है। लोग पतितका अन्न खा लेनेपर 'चान्द्रायण'* और 'पराक' व्रत† करनेसे शुद्ध होते हैं। जूता पहनकर मन्दिरमें जानेवाला मानव 'कृच्छ्रपाद' व्रत और दो दिन उपवास करे। फूल तथा नैवेद्यके अभावमें भी पञ्चामृतसे भगवान्‌का स्नान एवं स्पर्श करके नमस्कार करनेकी विधि है। मदिरा-पानके पापसे शुद्ध होनेके लिये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको चाहिये कि चार 'चान्द्रायण' व्रत तथा बारह वर्षोंतक तीन 'प्राजापत्य' व्रत करे।

अथवा 'सौकरवक्षेत्र'में जाकर उपवास एवं गङ्गामें स्नान करे। उसके प्रभावसे प्राणी शुद्ध हो सकता है। ऐसे ही मथुरामें भी स्नान-उपवास करनेसे शुद्धि सम्भव है। जो मनुष्य इन दोनों तीर्थोंका उक्त प्रकारसे एक बार भी सेवन करता है, वह अनेक जन्मोंके किये हुए पापोंसे मुक्त हो जाता है। इन तीर्थोंमें स्नान, जलपान तथा भगवान्‌के ध्यान-धारणा, कीर्तन, मनन-श्रवण एवं दर्शन करनेसे भी पातक पलायन कर जाते हैं।

**पृथ्वीने पूछा—**सुरेश्वर! मथुरा और सूकर—ये दोनों ही तीर्थ आपको अधिक प्रिय हैं। पर यदि इनसे भी बढ़कर कोई अन्य तीर्थ हो तो अब उसे बतानेकी कृपा कीजिये।

**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुधे! छोटी-


* चान्द्रायण-व्रतके अनेक भेद हैं, जैसे 'पिपीलिका', 'यवमध्य', 'शिशुचान्द्रायण' आदि। शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे ग्रासवृद्धिपूर्वक अमावास्याको सर्वथा उपवास रहना 'यवमध्य' सर्वोत्तम चान्द्रायण है।
† १२ दिनोंका सर्वथा उपवास 'पराकव्रत' है। यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम्। पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापापनोदनः॥ (मनु० ११। २१५)

अध्याय १८० ] श्राद्धसे अगस्तिका उद्धार, श्राद्ध-विधि ३२३

छोटी नदियोंसे लेकर समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, उन सबमें 'कुब्जाम्रक' तीर्थ श्रेष्ठ माना जाता है। मेरी श्रद्धासे सम्पन्न सत्पुरुष सदा उनकी प्रशंसा करते हैं। कुब्जाम्रकसे भी कोटिगुना अधिक परम गुह्य 'सौकरव' तीर्थ है। एक समयकी बात है—मार्गशीर्षके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको मैं 'सितवैष्णव' तीर्थमें गया। वहाँ पुराणोंमें श्रेष्ठ एक 'गङ्गासागरिक' नामका पुराण देखा है। इसमें मेरे मथुरामण्डलके तीर्थोंकी अत्यन्त गुह्य महिमा वर्णित है। 'सिततीर्थसे' परार्द्धगुना फल यहाँ सुलभ होता है—इसमें कोई संशय नहीं है। 'कुब्जाम्रक' प्रभृति समस्त तीर्थोंमें भ्रमण करनेके पश्चात् मैं मथुरामें आया और एक स्थानपर बैठ गया। मेरे उस स्थानका नाम 'विश्रान्तितीर्थ' पड़ गया। वह स्थान गोपनीयोंमें भी परम गोपनीय है। वहाँ स्नान करनेसे परम उत्तम फल मिलता है। गतिका अन्वेषण करनेवाले व्यक्तियोंके लिये मथुरा परम गति है। मथुरामें विशेष करके 'कुब्जाम्रक' और 'सौकर' क्षेत्रकी महिमा है। सांख्ययोग और कर्मयोगके अनुष्ठानके बिना भी इन तीर्थोंकी कृपासे मानव मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। योगसे सम्पन्न विद्वान् ब्राह्मणके लिये जो गति निश्चित है, वही गति मथुरामें प्राण-त्याग करनेसे साधारण व्यक्तिको भी प्राप्त हो जाती है। सुव्रते! वस्तुतः मथुरासे उत्तम न कोई दूसरा तीर्थ है और न भगवान् केशवसे श्रेष्ठ कोई देवता है।

[ अध्याय १७८-१७९]


श्राद्धसे अगस्तिका उद्धार, श्राद्ध-विधि तथा 'ध्रुवतीर्थ' की महिमा

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब पितरोंसे सम्बद्ध एक दूसरा प्रसङ्ग कहता हूँ, उसे सुनो। मथुरापुरीमें पहले एक धार्मिक एवं शूर-वीर राजा थे, जिनका नाम चन्द्रसेन था। उनकी दो सौ रानियाँ थीं, जिनमें 'चन्द्रप्रभा' सबसे गुणवती थी, उसके सौ दासियाँ थीं, जिनमें एकका नाम 'प्रभावती' था। उस दासीके परिवारके पुरुष सदाचार विहीन थे। सभी मरकर दोषके कारण नरकयातनामें पड़ गये; क्योंकि उनके कुलमें एक वर्णसंकर उत्पन्न हो गया था।

देवि! एक समय वे पितर 'ध्रुवतीर्थ' में आये, जिनपर एक त्रिकालदर्शी ऋषिकी दृष्टि पड़ गयी। इनमें कुछ दिव्य रूपवाले पितर आकाश-गमनकी शक्तिसे युक्त श्रेष्ठ वाहनोंपर चढ़कर आये और अपने वंशजोंको आशीर्वाद देकर चले गये। कुछ दूसरे पितृगण जो 'ध्रुवतीर्थ' में आये, उनके श्राद्ध न होनेसे पेटमें झुर्रियाँ पड़ गयी थीं। अतः वे पुत्रोंको शाप देकर चले गये। त्रिकालज्ञ मुनि यह सब दृश्य देख रहे थे। जब पितृगण चले गये और वे मुनि अकेले आश्रममें रह गये तो एक सूक्ष्म शरीरधारी पितरने उनसे कहा—'मुने! वर्णसंकरसम्बन्धी दोषके कारण मुझे नरकमें स्थान मिला है। मैं सौ वर्षोंसे आशारूपी रस्सियोंसे बँधा प्रतीक्षा करता रहा; पर अब निराश होकर आपके पास आया हूँ। तीनों तापोंसे अत्यन्त घबराकर और विवश होकर मैं आपकी शरण आया हूँ। जिनके पुत्रोंने पिण्डदान एवं तर्पण किया है, वे पितर हृष्ट-पुष्ट होकर आकाशगमनकी शक्तिसे स्वर्गमें चले गये हैं। किंतु मैं बलहीन व्यक्ति कहीं भी नहीं जा सकता हूँ। जिनकी संतान अपने बाल-बच्चोंके साथ सदा सम्पन्न है, वे उनके द्वारा स्वधासे सुपूजित होकर परम गतिके अधिकारी होते हैं। त्रिकालज्ञ मुनिवर! आपको दिव्य दृष्टि सुलभ है। उसके प्रभावसे

३२४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १८०

आपने जिन पितरोंको स्वर्गमें जाते हुए देखा है, वे सभी आज राजा चन्द्रसेनके द्वारा सत्कृत हुए हैं।'

पितरने कहा—'जो पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, उसका उत्तम फल निश्चित है, किंतु न करनेसे विपरीत फल सामने आता है और पितर नरकके भागी हो जाते हैं; इसमें कुछ कारण है, वह भी मैं आपको बताता हूँ; सुनें। श्राद्धसम्बन्धी जो द्रव्य उचित देश, काल और पात्रको नहीं दिया गया, विधिकी रक्षा न हुई, साथमें दक्षिणा न दी गयी तो वह प्रत्यवायका कारण हो जाता है। जो श्राद्ध श्रद्धाके साथ सम्पन्न नहीं हुआ, जिसपर दुष्ट प्राणीकी दृष्टि पड़ गयी, जिसमें तिल और कुशाका अभाव रहा एवं मन्त्र भी नहीं पढ़े गये, उस श्राद्धको असुर ग्रहण कर लेते हैं। प्राचीन समयसे ही भगवान् वामनने ऐसे श्राद्धका अधिकारी बलिको बना रखा है। ऐसे ही दशरथनन्दन भगवान् रामके द्वारा अपने गणोंके साथ क्रूर रावण जब दिवंगत हो गया तो उन त्रिभुवनभर्ता श्रीरामने कुछ ऐसे श्राद्धोंका फल त्रिजटाको भी दे दिया था। भगवान् राम जब भगवती सीताके साथ बैठे थे, सीताने उनसे कहा—'त्रिजटा आपमें भक्ति रखती थी। सीताजीकी बात सुनकर श्रीराम प्रसन्न हो गये।' अतः उन परम प्रभुने उस राक्षसीको यह वर दिया—'त्रिजटे! जिस श्राद्ध करनेवाले व्यक्तिके घर श्राद्धकी उत्तम हविष् पदार्थ आदि सामग्रियाँ न हों, विधि और पात्र उचित रहनेपर भी यदि श्राद्ध करते समय क्रोध आ गया हो तथा पाक्षिक, मासिक श्राद्ध उचित समयपर सम्पन्न न हों एवं दक्षिणा भी न दी जाय तो उसका फल मैं तुम्हें देता हूँ।'

इसी प्रकार एक बार भगवान् शंकरने नागराज वासुकिकी भक्तिसे प्रसन्न होकर उसे वर देते हुए कहा था—'नागराज! जिस मनुष्यने वार्षिक श्राद्ध करनेके पूर्व भगवान् श्रीहरिसे आज्ञा प्राप्त नहीं की और श्राद्ध-क्रिया सम्पन्न कर ली, यज्ञके अवसरपर उचित दक्षिणा न दी, देवता एवं ब्राह्मणके सामने देनेकी प्रतिज्ञा करके उसे पूरा नहीं किया, श्राद्धमें बिना मन्त्र पढ़े ही क्रियाएँ कर दीं—ऐसे यज्ञों एवं श्राद्धोंका सम्पूर्ण फल मैं तुम्हें अर्पित करता हूँ।' मुने! ये सभी बातें पुराणों एवं इतिहासोंमें वर्णित हैं।

'मुने! जिन्हें आपने दयनीय दशामें देखा था, उनके श्राद्ध, अवैध रूपमें ही अनुष्ठित हुए हैं। अतः उसका उत्तम फल इन पितरोंको प्राप्त नहीं हो सका है। यही कारण है कि ये नंग-धड़ंग कालक्षेप कर रहे हैं। इनके पुत्रोंने जो श्राद्ध-क्रिया की थी, उसमें त्रुटि रह गयी थी। इसी लिये पितृगण गाथा गाते हैं कि 'क्या हमारे कुलमें ऐसा कोई व्यक्ति जन्म लेगा, जो प्रभूत जलवाली नदियोंमें 'तृप्यध्वं०, उदीरतां०, आयन्तु०' इत्यादि मन्त्रोंसे हमारा तर्पण एवं उनके तटपर श्राद्ध करेगा। महाप्राज्ञ! आपने मुझसे जो पूछा था, संक्षेपमें उसका यही उत्तर है।'

वसुंधरे! यह सब सुनकर वे ऋषि राजा चन्द्रसेनके पास पहुँचे। उन ऋषिको देखकर राजा सिंहासनसे उठकर पृथ्वीपर खड़े होकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर कहा—'मुनिवर! आप मेरे घरपर पधारे, इससे मैं धन्य एवं कृतार्थ हो गया। आपके यहाँ आ जानेसे मेरा जन्म सफल हो गया। मुने! पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क और गौ—ये सभी वस्तुएँ आपकी सेवामें समर्पित हैं। इन्हें आप स्वीकार करें, जिससे मुझे पूर्ण संतोष हो जाय।'

देवि! उस समय राजा चन्द्रसेनके दिये हुए अर्घ्य आदिको स्वीकार करके त्रिकालज्ञ मुनिने

१४९- कांस्य-प्रतिमा-स्थापनकी विधि

अध्याय १८० ] श्राद्धसे अगस्तिका उद्धार, श्राद्ध-विधि [ ३२५

तुरंत उन नरेशसे कहा—‘राजन्! मेरे आनेका एक विशेष कारण भी है, आप उसे सुनें।' इसपर राजर्षि चन्द्रसेनने उन तपोधन ऋषिसे पूछा—'तपोधन! वह कौन-सा कार्य है? आप बतानेकी कृपा कीजिये। मैं वह समुचित कार्य करनेके लिये उद्यत हूँ, जिससे आपका मनोरथ सिद्ध हो सके।'

मुनिने कहा—‘राजन्! आप अपनी पटरानी तथा उनकी दासीको जिसे लोग प्रभावती कहते हैं, यहाँ बुलायें।' इसपर राजाने अपनी रानी तथा दासीको वहाँ बुलवाया। रानी परम साध्वी थीं। वे आकर जमीनपर बैठ गयीं। पर उस समय उनका शरीर भय एवं आशङ्काओंसे काँप रहा था। उन्होंने आते ही विनयपूर्वक ऋषिको प्रणाम किया।

उनके बैठ जानेपर मुनिने कहा—‘'मैंने 'ध्रुवतीर्थ'में जो आश्चर्यकी एक बात देखी है, उसे आप सभीके सामने व्यक्त करना चाहता हूँ। वह बात यह है कि आज प्राणियोंके पितृगण 'ध्रुवतीर्थ'में उपस्थित हुए थे। श्राद्ध करनेमें कुशल पुत्रोंने जिनका विधिवत् श्राद्ध किया है, वे तो तृप्त होकर स्वर्गको गये; किंतु वहीं मुझे एक अत्यन्त दुःखी पितर मिले हैं। उनका शरीर भूख-प्याससे सूख गया है। उनका मुख शुष्क और आँखें बड़ी छोटी हैं। स्वर्गमें जानेकी आशा तो दूर, वे पुनः अपवित्र नरकमें ही जानेके लिये विवश हैं। उन्हें देखकर मेरे हृदयमें बड़ी दया आयी, अतः मैंने उनसे पूछा—‘भाई! तुम कौन हो और क्या चाहते हो? मुझे बतानेकी कृपा करो।' तब उन्होंने अपनी सारी स्थिति बतायी। उस समय उनकी बात सुनते ही करुणासे मैं विवश हो गया हूँ। महारानीजी! बात ऐसी है—आपकी जो यह दासी है, इसकी एक पुत्री है, जो 'विरूपकनिधि' नामसे प्रसिद्ध है। आप उसे भी इस समय यहाँ बुलानेकी कृपा करें।'

वसुंधरे! इस प्रकार मुनिवर त्रिकालज्ञकी बात सुनकर महाराजा चन्द्रसेनकी रानीने उसी क्षण उस दासी-पुत्रीको बुलानेकी आज्ञा दी। उस समय वह मद्यपान कर उन्मत्त हो रही थी। किसी प्रकार राजसेवकोंने उसे सँभालकर हाथसे पकड़े हुए वहाँ लाकर उन मुनिके पास उपस्थित किया। मुनि धर्मके पूर्ण ज्ञाता थे। मदके प्रभावसे विक्षिप्त चित्तवाली उस दासीको देखकर उन्होंने उससे पूछा—‘अरे! तुमने पितरोंके लिये पिण्डदान तथा जलसे 'स्वधा' कहकर 'तर्पण' किया है अथवा नहीं? ऐसा जान पड़ता है कि तुमने पितरोंको मुक्त करनेवाली पिण्ड एवं तर्पणकी विधियाँ सम्पन्न नहीं की है।' वसुधे! इसपर उस दासीने उन मुनिसे कहा—'मैंने ऐसी कोई भी विधि सम्पन्न नहीं की है। मैं तो यह भी नहीं जानती कि कौन मेरे पितर हैं और उनके लिये कौन-सी क्रिया करनी चाहिये।'

पृथ्वि! फिर तो ऐसी बात कहनेवाली उस दासीसे उन त्रिकालज्ञ मुनिने कहा—'आज इस नगरके महाराज, महारानी और यहाँके निवासी—सभी सज्जन पुरुष 'ध्रुवतीर्थ'में पधारें। वहाँ पितरोंके लिये पुत्रोंद्वारा किये गये श्राद्धकी महिमाका फल आपलोगोंके सामने सुस्पष्ट हो जायगा। यह सुनकर सभी नगरनिवासी तथा जिनकी श्राद्ध करनेमें कौतुकवश भी प्रवृत्ति न थी, वे सभी अधिकारी ब्राह्मण भी 'ध्रुवतीर्थ'में गये। वहाँ जानेपर सबकी दृष्टि उस संतानद्वारा असत्कृत एवं अस्त-व्यस्त प्राणीपर पड़ी। बेचारेको क्षुद्र मच्छड़-जैसे जीव चारों ओरसे घेरे हुए थे। साथ ही वह भूखसे भी अत्यन्त व्यथित था। उस समय त्रिकालज्ञने कहा—'देखो, ये स्त्रियाँ तुम्हारी

३२६ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८०

संतानोंसे उत्पन्न हैं। तुम परिपुष्ट हो जाओ, एतदर्थ राजाकी कृपासे इनका यहाँ आगमन हुआ है।'

तब वह पितर बोला—'यह दासी इस 'ध्रुवतीर्थ'में पहले स्नान करे, फिर वेदमें निर्दिष्ट क्रमसे तर्पण करे। तदनन्तर प्राचीन ऋषियोंने जो विधि बतायी है, उसके अनुसार यह पिण्ड-दानादि श्राद्धकर्म करे। सभी कर्मपात्र चाँदीके हों। साथमें वस्त्र और चन्दन रहना आवश्यक है। फिर भक्तिपूर्वक पिण्डार्चन करके पितरोंकी पूजा करे। आप सभी सज्जन यहीं रहें और इसका परिणाम तत्काल देख लें—मैं परम सुखसे सम्पन्न हो जाऊँगा। इस विधानसे इस संतानके द्वारा मेरा श्राद्ध कराना आप सभीकी कृपापर निर्भर है।'

वसुंधरे! रानी चन्द्रप्रभा अगस्तिकी बात सुनकर दासीके द्वारा उस प्राणीका श्राद्ध करानेमें तत्पर हो गयीं। उस श्राद्धमें बहुत-सी दक्षिणाएँ दी गयीं। रेशमी वस्त्र, धूप, कर्पूर, अगुरु, चन्दन, तिल और अन्न आदि विविध वस्तुएँ पिण्डदानके अवसरपर काममें लायी गयीं। फलस्वरूप श्राद्ध एवं पिण्डदानका क्रम समाप्त होते ही वह विकृत दशावाला अगस्ति ऐसा बन गया, मानो कोई देवता हो। उसका शरीर परम तेजोमय हो गया। पार्श्ववर्ती जो मशक थे, उनकी आकृतिमें भी वैसा ही परिवर्तन हो गया। अब उनसे घिरा हुआ वह प्राणी ऐसी असीम शोभा पाने लगा, मानो यज्ञमें दीक्षित कोई पुरुष अन्तमें अवभृथ-स्नानसे सम्पन्न हुआ हो। उस समय स्वर्गसे इतने दिव्य विमान आये कि आकाश ढक गया।

अब अगस्ति आदि सभी बोले—'महानुभावो! हम लोग भलीभाँति तृप्त हो गये हैं। अतः अब परमधाममें जाते हैं। ध्रुवतीर्थकी यह महिमा मैंने आपके सामने प्रकट कर दी। महामुने! मेरे कहनेकी बात ही क्या है। आप सबने स्वयं भी इसकी महिमा देख ली। हमारा उद्धार होना नितान्त असम्भव था; किंतु आपकी कृपासे हमने इस दुस्तर पापपुञ्जको पार कर लिया।'

पृथ्वि! अब वह अगस्ति नामका प्राणी, मुनिवर त्रिकालज्ञ, राजा चन्द्रसेन, रानी चन्द्रप्रभा, उपस्थित जनता, दासी प्रभावती तथा उसकी पुत्रीको इस प्रकारकी बातें सुनाकर तथा 'आप सभी लोगोंका कल्याण हो'—इस प्रकार कहता हुआ अपने सहचरोंके साथ उत्तम विमानपर चढ़कर स्वर्गके लिये प्रस्थान कर गया।

भगवान् वराह कहते हैं—भद्रे! इसके पश्चात् महाराज चन्द्रसेन उस तीर्थकी महिमा देखकर महर्षि त्रिकालज्ञको प्रणामकर अपने परिजन, पुरजनसहित नगरको लौट गये।

पृथ्वि! मथुरा-मण्डलके अन्तर्गत तीर्थोंका माहात्म्य मैंने तुम्हें सुनाया। यह तीर्थ ऐसा शक्ति-सम्पन्न है कि जिसका स्मरण करनेसे भी मनुष्यके पूर्व-जन्मके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो पुरुष ब्राह्मणोंकी संनिधिमें बैठकर इस प्रसङ्गको पढ़ता है, उसने मानो गयशिरपर (गयाक्षेत्रमें) जाकर अपने पितरोंको तृप्त कर दिया। महाभागे! जिसकी व्रतमें आस्था न हो, इस प्रसङ्गको सुननेमें उदासीन हो तथा भगवान् श्रीहरिकी अर्चासे विमुख हो, उसके सामने इसका वर्णन नहीं करना चाहिये। यह प्रसङ्ग तीर्थोंमें परम तीर्थ, धर्मोंमें श्रेष्ठ धर्म, ज्ञानोंमें सर्वोत्कृष्ट ज्ञान एवं लाभोंमें उत्तम लाभ है। महाभागे! जिनकी भगवान् श्रीहरिमें सदा श्रद्धा रहती है तथा जो पुण्यात्मा पुरुष हैं, उनके सामने ही इसका प्रवचन

१५१- सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन

अध्याय १८१-१८२ ] काष्ठ-पाषाण-प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि [ ३२७

करना उचित है।

सूतजी कहते हैं—ऋषियो! भगवान् वराहकी यह वाणी सुनकर देवी धरणीका मन अत्यन्त आश्चर्यसे भर गया। अब उन देवीने प्रसन्नतापूर्वक प्रतिमाकी स्थापनाके विषयमें प्रभुसे पुनः प्रश्न करना आरम्भ किया। [अध्याय १८०]


काष्ठ-पाषाण-प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि

सूतजी कहते हैं—ऋषियो! भगवती वसुन्धराने जब तीर्थोंका महत्त्व सुना तो वे आश्चर्य एवं प्रसन्नतासे भर गयीं और भगवान् वराहसे पुनः बोलीं।

धरणीने पूछा—भगवन्! आपने मथुरा-क्षेत्रकी महत्ताका जो वर्णन किया, उसे सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई; परंतु मेरे हृदयमें एक जिज्ञासा है। विष्णो! उसे सविस्तार बतानेकी कृपा कीजिये। मैं यह जानना चाहती हूँ कि काष्ठ, पाषाण एवं मृत्तिकाके विग्रहमें आप किस प्रकार विराजते हैं? अथवा ताँबा, काँसा, चाँदी और सुवर्ण आदिकी प्रतिमामें आपको कैसे प्रतिष्ठित करना चाहिये, जिससे वे अर्चाएँ आपका स्वरूप बन सकें। माधव! लोग अपने दक्षिण-भागमें दीवालपर अथवा भूमिपर भी आपके श्रीविग्रहकी रचना करते हैं, मैं उसकी विधि भी जानना चाहती हूँ।

भगवान् वराह बोले—वसुंधरे! जिस वस्तु या द्रव्यादिसे प्रतिमा बनवानी हो, पहले उसका शोधन करके उसे लक्षणोंके अनुसार चिह्नित करना चाहिये। फिर उसकी शुद्धि कर सविधि प्रतिष्ठा करानी चाहिये। देवि! इसके पश्चात् जन्म-मरणरूपी भयसे मुक्त होनेके लिये उसकी पूजा करनी चाहिये। वसुंधरे! यदि काष्ठमयी प्रतिमा बनवानी हो तो महुएकी लकड़ी सर्वोत्तम है। प्रतिमा बन जानेपर उसकी सविधि प्रतिष्ठा-पूजा करे। प्रतिष्ठाके समय अर्चनाकी जिन वस्तुओंका मैंने वर्णन किया है, उन गन्ध आदि पदार्थोंको विग्रहपर अर्पित करना चाहिये। कपूर, कुंकुम, दालचीनी, अगुरु, रस, इत्र, चन्दन, सिल्हक तथा उशीर आदि सामानोंसे विवेकशील पुरुष उस प्रतिमाका अनुलेपन एवं पूजन करे। स्वस्तिक वृद्धिका सूचक है। अतः प्रतिमापर उसका, श्रीवत्सका तथा कौस्तुभ मणिका चिह्न रहना आवश्यक है। फिर विधिपूर्वक उसका पूजन कर अर्चाको दूधसे सिद्ध हुए खीरका भोग लगाना चाहिये। यह अत्यन्त मङ्गलप्रद है। तिलके तेल या घीका दीपक पूजाके लिये उत्तम है—इसमें कोई संदेह नहीं।

प्राणायाम करके इस मन्त्रको पढ़ना चाहिये—मन्त्रका भाव इस प्रकार है—'भगवन्! यह सम्पूर्ण विश्व आपका ही स्वरूप है, तथापि आपकी स्पष्ट प्रतीति नहीं होती। प्रभो! अब आप सुस्पष्ट रूपसे भूमण्डलपर पधारकर इस काष्ठमयी प्रतिमामें प्रतिष्ठित होइये। काठकी बनी हुई प्रतिमाओंमें भगवान्की स्थापनाकी यह विधि है। स्थापनाके बाद भगवत्प्रेमी पुरुषोंके साथ प्रदक्षिणा करनी चाहिये। पूजाके बाद भी दीपक प्रज्वलित रहना चाहिये। मन-ही-मन 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रका उच्चारण करे। प्रतिष्ठित मूर्तिकी पूजा नित्य होनी चाहिये। साथ ही इस प्रकार प्रार्थना करे—'भगवन्! आप मेरे एकमात्र आश्रय हैं। वासुदेव! मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप इस स्थानका कभी परित्याग न करें।'

वसुंधरे! फिर उस समय वहाँ अन्य जितने

३२८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १८१-१८२

भी भगवत्प्रेमी लोग उपस्थित हों, वे सभी इसी विधिसे अर्चाविग्रहकी पूजा करें। फिर सबको चन्दन, पुष्प, अनुलेपन एवं नैवेद्यद्वारा सविधि पूजन करना चाहिये। सुन्दरि! महुएकी लकड़ीसे प्रतिमा बनाने और प्रतिष्ठा करनेका यही विधान है। जो मानव काष्ठकी प्रतिमा स्थापित कर इस विधिके साथ पूजा करता है, वह संसारमें न जाकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब मैं जिस प्रकार पाषाणकी बनी हुई प्रतिमाओंमें निवास करता हूँ, वह बतलाता हूँ। पाषाणकी अच्छी प्रतिमा बनानेके लिये देखनेमें सुन्दर, शल्यरहित एवं भलीभाँति शुद्ध किसी पत्थरको देखकर उसमें दक्ष कलाकारको नियुक्त करे। सर्वप्रथम उस पत्थरपर एक उजली बातीसे प्रतिमा चिह्नित करके उसकी अक्षत आदिसे पूजा कर, दीपक दिखाये और दही एवं चावलसे बलि देकर प्रदक्षिणा करे। इसके पश्चात्—'ॐ नमो नारायणाय' यह मन्त्र पढ़कर कहे—'भगवन्! आप सम्पूर्ण प्राणियोंमें श्रेष्ठ एवं परम प्रसिद्ध हैं; सूर्य-चन्द्रमा एवं अग्नि आपके ही रूप हैं। आपसे अधिक विज्ञ चराचर विश्वमें अन्य कोई है ही नहीं। भगवान् वासुदेव! इस मन्त्रके प्रभावसे प्रभावित होकर आप इस प्रतिमामें शनैः-शनैः प्रतिष्ठित होकर मेरी कीर्तिको बढ़ायें तथा स्वयं भी वृद्धिको प्राप्त हों। अच्युत वराह! आपकी जय हो, जय हो। आप अपनी अभीष्ट प्रतिमा स्वयं निर्मित करायें।'* फिर ऐसी धारणा करे कि सारा विश्व एक परम प्रभु भगवान् नारायणका ही स्वरूप है। जब मूर्ति बन जाये तो उसे पूर्वाभिमुख रखे। फिर उज्ज्वल वस्त्र धारणकर रातमें उपवास करे। पुनः प्रातः दन्तधावन कर और सफेद यज्ञोपवीत पहनकर हाथमें गन्धादि लेकर कहे—'भगवन्! जिन्हें सर्वरूप एवं 'मायाशबल' कहा जाता है, वही आप अखिल जगत्के रूपमें विराजते हैं। प्रभो! इस प्रतिमामें भी आपका वास है। जगत्के कारण, जगत्के आकार तथा अर्चावतार धारण करके शोभा पानेवाले लोकनाथ! इस प्रकार मैंने आपकी आराधना की है। यह विग्रह भी आपसे रिक्त नहीं है। आदि और अन्तसे रहित प्रभो! इस जगत्की सत्ता स्थिर रहनेमें आप ही निमित्त हैं। आप अपराजेय हैं!' इस प्रकार भगवद्विग्रहकी पूजा कर—'ॐ नमो वासुदेवाय' मन्त्र पढ़कर प्रतिमाके ऊपर जल छिड़कना चाहिये।

सुन्दरि! इस प्रकार पाषाणमयी प्रतिमामें मेरी प्राण-प्रतिष्ठाकर पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रमें अन्नादिमें अधिवासन करना चाहिये। मेरी उपासनामें उद्यत रहनेवाला जो व्यक्ति मेरी प्रतिमाकी स्थापना करता है, वह मुझ भगवान् श्रीहरिके लोकमें जाता है—यह निश्चित है। स्थापनाके दिनोंमें साधक यव अथवा दूधसे बने आहारपर दिन-रात व्यतीत करे। इष्टदेवकी प्रतिमा प्रतिष्ठित हो जानेपर सायंकालकी संध्याके समय चार दीपक प्रज्वलित करे। भगवान्के आसनके नीचे पञ्चगव्य, चन्दन और जलसे परिपूर्ण चार कलश स्थापित करना चाहिये। इस समय सामवेदके गान करनेवाले ब्राह्मण वेदध्वनि करें। देवि! जो ब्राह्मण वेदके हजारों मन्त्रोंको पढ़ते हैं, उनके मुखसे निकलते हुए इस शुभप्रद सामके


* यहाँ प्रतिमानिर्माणकी विधि अत्यन्त संक्षिप्त है। इसे विस्तारसे जाननेके लिये 'श्रीविष्णुधर्मोत्तरमहापुराण' खण्ड ३, अध्याय ४५ से १२०, 'काश्यपशिल्पम्' पृष्ठ ४९ से ८० तक तथा 'Elements of Hindu Ichonography'-(T.N. Gopinath Rao.) आदि पुस्तकें देखनी चाहिये।

अध्याय १८१-१८२ ] काष्ठ-पाषाण-प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि ३२९

स्वरको सुनकर मैं वहाँ आ जाता हूँ। क्योंकि वेद-मन्त्रका पाठ मुझे परम प्रिय है। किंतु वहाँ अनर्गल प्रलाप नहीं होना चाहिये।

पुण्यव्रती व्यक्ति पूजाके समय इस अर्थवाले मन्त्रको पढ़कर आवाहन करे—‘भगवन्! छः प्रकारके कर्मोंमें आपकी प्रधानता है। आप पाँचों इन्द्रियोंसे सम्पन्न होकर यहाँ पधारनेकी कृपा कीजिये। जगत्प्रभो! आपमें सभी वेदमन्त्र स्थान पाये हुए हैं। समस्त प्राणियोंकी स्थिति भी आपहीमें है। यह अर्चा आपके रहनेका सुरक्षित स्थान है।’ इसी अर्थके मन्त्रका उच्चारण करते हुए तिल, घृत, समिधा और मधुसे एक सौ आठ आहुतियाँ भी देनी चाहिये। देवि! मैं इस विधिके द्वारा प्रतिमामें प्रतिष्ठित हो जाता हूँ*। फिर प्रातःकाल स्वच्छ जलमें स्नान करे और मन्त्र पढ़कर पञ्चगव्यका पान करे। अनेक प्रकारके गन्ध, पुष्प और लाजा आदिका प्रयोग कर फिर माङ्गलिक गीत-वाद्यके साथ प्रतिमाको मध्यभागमें एक ऊँचे स्थानपर स्थापित करे। सब प्रकारके सुगन्धोंको लेकर फिर प्रार्थना करे—‘भगवन्! जिन्हें लक्षणोंसे लक्षित, देवी लक्ष्मीसे सुशोभित तथा सनातन श्रीहरि कहते हैं, वे आप ही तो हैं। प्रभो! हमारी प्रार्थना है कि परम प्रकाशसे सुशोभित होकर आप यहाँ विराजिये। आपको मेरा बारम्बार नमस्कार है।’

इस प्रकार भगवान्‌की शैलार्चाकी स्थापना कर उसका अनुलेपन (उबटन) करना चाहिये। चन्दन-कुंकुमादिसे मिला हुआ ‘यक्षकर्दम’ का उद्वर्तन (उबटन) श्रेष्ठ है। इस प्रकार उद्वर्तन अर्पण करके इस अर्थका मन्त्र पढ़ना चाहिये—‘प्रभो! आप सम्पूर्ण संसारमें प्रधान हैं तथा ब्रह्मा और बृहस्पतिने आपकी भलीभाँति पूजा की है। आप अखिल लोकके कारण एवं मन्त्रयुक्त हैं। भगवन्! मैं आपका इस मन्त्रके द्वारा स्वागत करता हूँ। आप यहाँ विराजनेकी कृपा कीजिये।’ इस विधिसे भलीभाँति स्थापना करके गन्ध एवं फूलोंसे पूजा करनी चाहिये। मेरे विग्रहपर पहले श्वेत वस्त्र चढ़ाना चाहिये। वस्त्र अर्पण करते समय इस अर्थका मन्त्र पढ़े—‘देवेश! भक्तिपूर्वक वस्त्र आपके लिये अर्पित करता हूँ। विश्वमूर्ते! इन वस्त्रोंको आप ग्रहण करके मुझपर प्रसन्न होइये। आपको मेरा बारम्बार नमस्कार है।’

तत्पश्चात् कुंकुम और अगुरुसे मिला हुआ धूप देना चाहिये। धूप देते समय इस अर्थका मन्त्र पढ़ना चाहिये—‘देवेश! जो आदिरहित, पुराणपुरुष तथा सम्पूर्ण संसारमें सर्वोपरि शोभा पाते हैं, वे भगवान् नारायण! आप चन्दन, मालाएँ, धूप और दीप स्वीकार करनेकी कृपा कीजिये। आपको मेरा निरन्तर नमस्कार है।’

इस प्रकार पूजा करनेके पश्चात् भगवत्प्रतिमाके सामने नैवेद्य अर्पण करना चाहिये। प्रापण-अर्पण करनेका मन्त्र पूर्वमें बतला दिया गया है, उसीका उच्चारण करके विज्ञ पुरुष उसे अर्पित करे। शरीरकी शुद्धिके लिये नैवेद्यके बाद आचमन देना आवश्यक है। शान्ति-पाठ करे। क्योंकि शान्तिका पाठ करनेसे सम्पूर्ण कार्योंमें सिद्धि सुलभ हो जाती है। मन्त्रका भाव यह है—‘जगत्प्रभो! ओंकार आपका स्वरूप है। आप ऐसी कृपा करें


* यह प्रतिमा-प्रतिष्ठाकी अत्यन्त संक्षिप्त विधि है। विशेष जानकारीके लिये—‘शारदातिलक’, ‘प्रतिष्ठामयूख’ (भगवन्तभास्कर), ‘प्रतिष्ठा-महोदधि’, ‘कल्याण’-अग्निपुराणाङ्क, अध्याय ९२ से १०३ तक देखना चाहिये। प्रतिमा-निर्माणके बाद कर्मकुटी, जलानाधिवासन, ग्रामादिप्रदक्षिणा, हवन-प्रतिष्ठा, न्यासादि कर्म भी करने आवश्यक होते हैं।

३३०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १८३-१८४

कि राजा, राष्ट्र, ब्राह्मण, बालक, वृद्ध, गौएँ, कन्याएँ तथा पतिव्रताओंमें भलीभाँति शान्ति रहे। रोग नष्ट हो जायँ, किसानोंके यहाँ सदा अच्छी फसल उत्पन्न हो। दुर्भिक्ष न रहे। समयपर अच्छी वृष्टि हो और विश्वमें शान्ति बनी रहे।*

वसुंधरे! व्रती पुरुष इस प्रकारकी विधिका पालन करते हुए शास्त्रमें निर्दिष्ट विधिके द्वारा देवेश्वर भगवान्‌की भली प्रकारसे आराधना करे। इसके पश्चात् ब्राह्मणोंको निरहंकार-भावसे भोजन कराये। यदि अपनेमें शक्ति हो तो गरीबों एवं अनाथोंको भी तृप्त करनेका प्रयत्न करे। इस विधिसे मेरी अर्चाकी स्थापना करनी चाहिये। इसके परिणामस्वरूप पुरुष मेरे लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। फिर तो मेरे अङ्गोंपर जलकी जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह विष्णुलोकमें रहनेका अधिकारी होता है। भूमे! अहंकारसे रहित जो व्यक्ति मेरी स्थापना करता है, वह मानो अपने उनचास पीढ़ीके पुरुषोंका उद्धार कर देता है।
[अध्याय १८१-१८२]


मृण्मयी एवं ताम्रप्रतिमाओंकी प्रतिष्ठाविधि

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब मृत्तिकासे बनी अपनी प्रतिमाका स्थापन-विधान कहता हूँ, सुनो। मृण्मयी मूर्ति सुन्दर, स्पष्ट और अखण्डित होनी चाहिये। यदि काष्ठ न मिल सके तो मिट्टीका अथवा पाषाणका विग्रह बनानेका विधान है। कल्याणकी कामनावाले विद्वान् पुरुष ताँबा, काँसा, चाँदी, सोना अथवा शीशा—इन वस्तुओंसे भी मेरी सुन्दर प्रतिमाका निर्माण कराते हैं। यदि कर्मकाण्डके संकोचकी इच्छा हो तो वेदीपर ही मेरी पूजा की जा सकती है। कुछ लोग जगत्‌में यश फैलनेकी कामनासे भी मेरी प्रतिमाओंकी स्थापना करते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपना अभीष्ट पूरा होनेके लिये प्रतिमाएँ स्थापित करते हैं, कुछ लोग उत्तम तीर्थको देखकर वहीं मेरा पूजन कर लेते हैं अथवा मेरे तेजसे प्रकट हुए सूर्यमण्डलमें ही मेरी आराधना करते हैं।

देवि! तुम्हें ऐसा समझना चाहिये कि मैं विभिन्न व्यक्तियोंकी भावनाके अनुसार वहीं उपस्थित हो जाता हूँ और पूजा प्राप्त कर मैं उपासकको सम्पूर्ण सम्पत्तियोंसे पूर्ण कर देता हूँ, इसमें कोई संशय नहीं। मनुष्य जिस-जिस फलका उद्देश्य रखकर मन्त्रोंका उच्चारण अथवा विधिपूर्वक कर्मोंके सम्पादनद्वारा मेरी आराधनामें लगा रहता है, उसे वह अभिलषित फल प्राप्त हो जाता है। यही नहीं, मेरी कृपासे उसे सर्वोत्तम गति भी प्राप्त हो जाती है। मेरा भक्त प्रतिदिनके नियमित कार्योंमें सदा व्यस्त रहते हुए मनसे भी मेरी आराधना कर सकता है। मेरे लिये यदि किसीने श्रद्धापूर्वक एक अञ्जलि जल भी अर्पण कर दिया तो मैं उसकी उस भक्तिसे संतुष्ट हो जाता हूँ। उसके लिये बहुतसे फूलों, जपों एवं नियमकी क्या आवश्यकता है। जो अपने अन्तःकरणको स्वच्छ रखकर नित्य मेरा चिन्तन करता है, मैं उसकी भी सम्पूर्ण कामनाएँ पूरी कर देता हूँ और उसे दिव्य एवं मनोरम भोग तथा ज्ञान एवं मोक्ष भी


* तुलनीय यजुर्वेद—'आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्यो…………योगक्षेमो नः कल्पताम्॥' (शु० यजुर्वेदसं० २२।२२)

अध्याय १८३-१८४] मृण्मयी एवं ताम्रप्रतिमाओंकी प्रतिष्ठाविधि ३३१

सुलभ हो जाते हैं।

वसुंधरे! ये सभी बातें अत्यन्त गोपनीय हैं, मेरे कर्मोंमें श्रद्धा रखनेवाला व्यक्ति मृण्मयी प्रतिमाका निर्माण कर श्रवण नक्षत्रमें उसके स्थापन एवं प्रतिष्ठाकी तैयारी करे। इसमें भी पूर्वोक्त मन्त्रोंका उच्चारणकर उसी विधिसे स्थापना करनी चाहिये। जलके साथ पञ्चगव्य और चन्दनको मिलाकर उससे मेरी प्रतिमाको स्नान कराये। उस समय कहे—'अच्युत! जो विश्वकी रचना करते हैं तथा जिनकी कृपासे जगत्‌की सत्ता सुरक्षित है, वे आप ही हैं। भगवन्! मुझपर कृपा करके आप इस मृण्मयी प्रतिमामें प्रतिष्ठित होइये। प्रभो! आप कारणके भी कारण, प्रचण्ड तेजस्वी, परम प्रकाशमान तथा महापुरुष हैं। आपको मेरा निरन्तर नमस्कार है।' ऐसा कहकर उस प्रतिमाकी मन्दिरमें स्थापना करे। यहाँ भी पहलेकी ही तरह चार कलशोंका स्थापन करना चाहिये। उन चारों कलशोंको लेकर इस भावका मन्त्र पढ़ना चाहिये—'भगवन्! आप ओंकारस्वरूप हैं। समुद्र आपका ही रूप है, जो वरुणकी कृपा प्राप्त करके सम्यक् प्रकारसे पूजा पाता है तथा उसके हृदयमें जलराशि एवं प्रसन्नता भरी रहती है। इस विचारको सामने करके मैं आपको उत्तम अभिषेक अर्पित करता हूँ। जिसकी विशाल भुजाएँ हैं; अग्नि, पृथ्वी एवं रस—ये सभी जिनसे सत्तावान् बने हैं, ऐसे आपको मैं प्रणाम करता हूँ।'

अर्चाविग्रहका इस प्रकार स्नान कराकर पूर्वकथित नियमोंके अनुसार चन्दन, पुष्प, माला, अगरु, धूप, कपूर एवं कुंकुमयुक्त धूपसे—'ॐ नमो नारायणाय'—इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए पूजनकर न्यायके अनुसार पितृ-तर्पण करे। फिर वस्त्र अर्पण करते समय भी 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर मन्त्र पढ़े। तत्पश्चात् नैवेद्य अर्पित करे और पूर्वोक्त मन्त्रसे पुनः आचमन देकर शान्तिपाठ करे। मन्त्रका भाव यह है—'देवताओं, ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्योंको शान्ति सुलभ हो। वृद्ध और बालवृन्द उत्तम शान्ति प्राप्त करें। भगवान् पर्जन्य जलकी वृष्टि करें और पृथ्वी धान्योंसे परिपूर्ण हो जाय।' इस अर्थवाले मन्त्रसे विधिपूर्वक शान्तिपाठ करना चाहिये। तत्पश्चात् श्रीहरिमें श्रद्धा रखनेवाले ब्राह्मणोंका पूजन कर उनकी वन्दना करे और पूजाकी त्रुटियोंके लिये क्षमा-प्रार्थना कर विसर्जन करे। विसर्जनके बाद वहाँ जितने लोग हों, उनका उचित सत्कार करना चाहिये। यदि किसीको मेरा सायुज्य प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो वह गुरुकी भी विधिपूर्वक पूजा करे। जो व्यक्ति शास्त्र-विहित कर्मको सम्पन्न कर भक्तिके साथ गुरुकी पूजा करता है, वह मानो निरन्तर मेरी ही पूजा करता है। यदि कोई राजा किसीपर प्रसन्न होता है तो बड़ी कठिनतासे उसे कहीं एक गाँव दे पाता है, किंतु गुरु यदि किसी प्रकार प्रसन्न हो गये तो उनकी कृपासे ब्रह्माण्डपर्यन्त पृथ्वी सुलभ हो जाती है। शुभे! मैंने जो बात कही है, यह सभी शास्त्रोंका निच्योत है। कल्याणि! सम्पूर्ण शास्त्रोंमें गुरुदेवके पूजनकी समुचित व्यवस्था दी गयी है। जो मनुष्य इस विधिसे मेरी प्रतिष्ठा करता है, उसके इस प्रयाससे दोनों कुलोंकी इक्कीस पीढ़ियाँ तर जाती हैं। पूजा करते समय मेरे विग्रहपर जितनी जलबिन्दुएँ गिरती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह व्यक्ति मेरे लोकोंमें आनन्द भोगता है। भूमे! मैं तुमसे मृत्तिकासे बनी हुई मूर्तिकी प्रतिष्ठाका वर्णन कर चुका। अब जो सम्पूर्ण भागवत पुरुषोंके लिये प्रिय है, वह दूसरा प्रसङ्ग तुम्हें सुनाऊँगा।

१५२- अशौच, पिण्डकल्प और श्राद्धकी उत्पत्तिका प्रकरण

३३२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १८३-१८४

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! मेरी ताम्रकी सुन्दर एवं चमकीली अर्चाका निर्माण कराकर समुचित उपचारपूर्वक मन्दिरमें ले आये और उत्तराभिमुख रखे। फिर चित्रा नक्षत्रमें उसका अन्नाधिवासनकर अनेक प्रकारके गन्धों एवं पञ्चगव्यसे मिश्रित जलसे मेरी प्रतिमाको स्नान कराये। स्नान करानेके मन्त्रका भाव यह है—‘भगवन्! जो जगत्के एकमात्र तत्त्व तथा उसके आश्रय हैं, वे आप ही हैं। आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करके यहाँ पधारिये और पाँच भूतोंके साथ इस तामे (ताम्र)-की प्रतिमामें प्रतिष्ठित होकर मुझे दर्शन दीजिये।’ यशस्विनि! इस प्रकार प्रार्थनापूर्वक प्रतिमा स्थापित कर पूर्वोक्त विधिके क्रमसे अधिवासनसमापक पूजा सम्पन्न करे। दूसरे दिन सूर्योदय होनेपर वेदकी ऋचासे शुद्धि करके मन्त्रपूर्वक मूर्तिको स्नान कराये। उपस्थित ब्राह्मणमण्डली वेदध्वनि करे और माङ्गलिक वस्तुएँ मण्डपमें रखी जायँ। पूजा करनेवाला व्यक्ति सुगन्धित द्रव्यसे युक्त जल लेकर इस भावके मन्त्रको पढ़ता हुआ मेरी प्रतिमाको स्नान कराये। भाव यह है—‘ॐकारस्वरूप प्रभो! जो सर्वोपरि विराजमान हैं, सर्वसमर्थ हैं, जिनकी शक्ति पाकर माया बलवती हुई है तथा जो यौगिक शक्तिके शिरोमणि हैं, वे पुरुष आप ही तो हैं। प्रभो! मेरे कल्याणके लिये यथाशीघ्र यहाँ पधारिये और इस ताम्रमयी प्रतिमामें विराजनेकी कृपा कीजिये। ॐकारस्वरूप भगवन्! आप परम पुरुष हैं। सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, श्वास एवं प्रश्वास—ये सब स्वयं आप ही तो हैं।’ इसी प्रकार गन्ध, पुष्प एवं दीपकसे अर्चना करनी चाहिये। स्थापनाके मन्त्रका भाव यह है— तीनों लोकोंके प्रतिपालक पुरुषोत्तम! ‘आप प्रकाशके भी प्रकाशक, विज्ञानमय, आनन्दमय एवं संसारके प्रकाशक हैं। भगवन्! यहाँ आइये और इस प्रतिमामें सदाके लिये विराजिये और कृपाकर मेरी रक्षा कीजिये।’ वैष्णव शास्त्रोंमें जो नियम बतलाये गये हैं, उसके अनुसार इस मन्त्रको पढ़कर स्थापना करनी चाहिये। फिर हाथमें निर्मल श्वेत वस्त्र लेकर कहे—‘सम्पूर्ण विश्वपर शासन करनेवाले प्रभो! आप ॐकारस्वरूप परम पुरुष परमात्मा जगत्में एकमात्र तत्त्व एवं शुद्धस्वरूप हैं। ऐसे आप पुरुषोत्तमको मेरा नमस्कार है। मैं आपको ये सुन्दर वस्त्र अर्पित करता हूँ, आप इन्हें स्वीकार करनेकी कृपा कीजिये।

पृथ्वि! मेरे कर्ममें परायण रहनेवाला मानव प्रतिमाको वस्त्रोंसे आच्छादितकर फिर विधिपूर्वक मेरी अर्चा करे। गन्ध एवं धूप आदिसे पूजा करनेके उपरान्त नैवेद्य अर्पण करे। तत्पश्चात् शान्ति-पाठ कराया जाय। शान्ति-मन्त्रका भाव है—‘देवताओं और ब्राह्मणोंके लिये उत्तम शान्ति सुलभ हो। राजा, राष्ट्र, वैश्य, बालक, धान्य, व्यापार एवं गर्भिणी स्त्रियाँ—सबमें सदा शान्ति बनी रहे। देवेश! आपकी कृपासे मैं कभी अशान्त न होऊँ।’

शान्ति-पाठके पश्चात् ब्राह्मणोंकी पूजाकर भोजन, वस्त्र एवं अलंकारोंके द्वारा गुरुकी पूजा करनी चाहिये। जिसने गुरुकी पूजा की, उसने मेरी ही पूजा की। जिसके व्यवहारसे गुरु संतुष्ट न हुए, उससे मैं भी बहुत दूर रहता हूँ। जो मनुष्य इस विधानसे मेरी स्थापना करता है, उसके इस कार्यसे छत्तीस पीढ़ी तर जाती है। भद्रे! ताँबेकी प्रतिमामें मेरे स्थापनकी यह विधि है, जिसे तुम्हें बतला दिया। इसी भाँति सभी प्रतिमाओंकी पूजाका प्रकार मैं तुम्हें बता दूँगा। पृथ्वि! मुझे

अध्याय १८५ ] कांस्य-प्रतिमा-स्थापनकी विधि ३३३

स्नान कराते समय जलकी जितनी बूँदें मूर्तिके ऊपर गिरती हैं, प्रतिष्ठा करनेवाला व्यक्ति उतने वर्षोंतक मेरे लोकमें निवास पाता है।
[ अध्याय १८३-१८४ ]


कांस्य-प्रतिमा-स्थापनकी विधि

भगवान् वराह कहते हैं—'सुन्दरि! कांस्य-धातुसे स्वच्छ सुन्दर सभी अङ्ग-सम्पन्न प्रतिमा बनवाकर ज्येष्ठा नक्षत्रमें मूर्तिको घरपर लाकर माङ्गलिक ध्वनिके साथ उसकी भी प्रतिष्ठा करनी चाहिये। मेरी प्रतिमाके प्रवेशकालमें विधिके अनुकूल अर्घ्य लेकर मन्त्र पढ़ना चाहिये। उसका भाव यह है—'जगत्प्रभो! जो सम्पूर्ण यज्ञोंमें पूजा प्राप्त करते हैं, योगिजन जिनका ध्यान करते हैं, जो सदा सबकी रक्षा करते हैं, जिनकी इच्छापर विश्वकी सृष्टि, पालन आदि निर्भर है तथा जो महान् आत्मा एवं सदा प्रसन्न रहते हैं, वे आप ही हैं। भगवन्! आप भली प्रकारसे मेरी यह पूजा स्वीकार कर प्रसन्नतापूर्वक इस विग्रहमें विराजिये। फिर अर्घ्य देकर शास्त्रीय विधिका पालन करते हुए मूर्तिके मुखको उत्तरकी ओर करके रखे। प्रतिष्ठाके समय पञ्चगव्य, सभी प्रकारके चन्दन, लाजा एवं मधुसे सम्पन्न चार कलशोंको स्थापित करनेकी विधि है। पवित्रात्मा पुरुषको चाहिये कि सूर्यास्त हो जानेपर मेरी वह प्रतिमा पूजा करनेके विचारसे वहीं रख दे। साथ ही भगवन्निमित्त उन शुद्ध कलशोंको उठाकर विग्रहके पास—'ॐ नमो नारायणाय' कहकर रखना चाहिये। तत्पश्चात् आगेका मन्त्र पढ़ना चाहिये। मन्त्रका भाव यह है—'भगवन्! ब्रह्माण्ड एवं युगका आदि और अन्त आपके ही रूप हैं। आपके अतिरिक्त विश्वमें कहीं कुछ भी नहीं है। लोकनाथ! अब आप यहाँ आ गये हैं, अतः सदाके लिये विराजिये। प्रभो! आप संसाररूपसे विकार, परमात्मरूपसे निराकार, निर्गुण होनेसे आकारशून्य तथा मूर्तिमान् होनेसे साकार भी हैं। आपको मेरा प्रणाम है।'

पृथ्वि! दूसरे दिन प्रातः सूर्य-उदय होनेपर अश्विनी, मूल अथवा तीनों उत्तरा नक्षत्रसे युक्त मुहूर्तमें पूर्वोक्त विधानके अनुसार मुझे मन्दिरके द्वारदेशपर स्थापित करे। सब प्रकारसे शान्ति करनेके लिये जल, गन्ध और फलके साथ—'ॐ नमो नारायणाय' इसका उच्चारण कर प्रतिमाको भीतर ले जाय। कलशोंमें चन्दनयुक्त जल भरकर उसे अभिमन्त्रित करे। फिर उसी जलसे स्नान कराये। सम्पूर्ण अङ्गोंको शुद्ध करनेके लिये मन्त्रपूर्वक जलका आवाहन करे। मन्त्रका भाव यह है—'पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। भगवन्! ऐसी कृपा करें कि समस्त सागर, सरिताएँ, सरोवर तथा पुष्कर आदि जितने तीर्थ हैं, वे सभी यहाँ आयें, जिनसे मेरे अङ्ग शुद्ध हो जायें।'

तत्पश्चात् उपासक भक्तिपूर्वक प्रतिमाको स्नान कराकर सविधि अर्चन कर, गन्ध-धूप-दीप आदिसे पूजा कर वस्त्र अर्पित करे। साथ ही यह मन्त्र पढ़े—'ॐकारस्वरूप देवेश! ये सूक्ष्म, सुन्दर एवं सुखदायी वस्त्र आपकी सेवामें उपस्थित हैं। आप इन्हें स्वीकार करें। आपको मेरा नमस्कार है। वेद, उपवेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये सभी आपके रूप हैं और सभी आपकी आराधना करते हैं।' पृथ्वि! मन्त्रके विशेषज्ञ व्यक्ति विधिके साथ पूजा करके मुझे अलंकृत करनेके बाद नैवेद्य अर्पित कर आचमन करायें। फिर शान्तिपाठ करें। शान्तिपाठके मन्त्रका भाव यह है—'विद्या,

३३४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८६

वेद, ब्राह्मण, सम्पूर्ण ग्रह, नदियाँ, समुद्र, इन्द्र, अग्नि, वरुण, आठों लोकपाल आदि देवता—ये सभी विश्वमें शान्ति प्रदान करें। भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले भगवन्! आप सर्वत्र व्याप्त, मनोहर और यम अर्थात् अहिंसा, सत्य वचन एवं ब्रह्मचर्यस्वरूप हैं। ऐसे ॐकारमय आप परम पुरुषके लिये मेरा नमस्कार है।' फिर मेरी प्रदक्षिणा, स्तुति तथा अभिवादन करे। इसके पश्चात् भगवान् श्रीहरिमें श्रद्धा रखनेवाले ब्राह्मणोंकी पूजाकर उन्हें भी तृप्त करे। कमलनयने! विप्रवर्ग शान्ति-कलशका जल लेकर प्रतिमापर सिंचन करें। साधकको ब्राह्मणों, मेरे भक्तों एवं गुरुजनोंकी निन्दा नहीं करनी चाहिये। प्रतिष्ठाके समय मेरे अङ्गोंपर जलकी जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह व्यक्ति विष्णुलोकमें रहनेका अधिकारी हो जाता है। जो मनुष्य इस विधिसे मेरी स्थापना करेगा, उसने मानो अपने मातृपक्ष एवं पितृपक्ष—दोनों कुलके पितरोंका उद्धार कर दिया। भद्रे! कांस्यधातुसे निर्मित मेरी प्रतिमाकी जैसे प्रतिष्ठा करनी चाहिये, वह बात मैं तुम्हें बता चुका। अब ऐसे ही चाँदीसे बनी मूर्तिकी भी स्थापना होती है, वह आगे बताऊँगा। [अध्याय १८५]

रजत-स्वर्णप्रतिमाके स्थापन तथा शालग्राम और शिवलिङ्गकी पूजाका विधान

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! इसी प्रकार मेरी चाँदी तथा स्वर्णसे भी प्रतिमा बनाने एवं उसकी प्रतिष्ठा करनेका विधान है। मूर्ति-निर्माण एवं प्रतिष्ठा उसी प्रकार की जानी चाहिये, जैसी ताम्र या काँसेकी विधि है। वसुंधरे! इसमें भी पूजा-अर्चा, कलश-स्थापन एवं शान्तिपाठका भी पूर्वोक्त विधान ही अनुष्ठित होना चाहिये।

पृथ्वी बोली—माधव! आपने सुवर्ण आदिसे बनी हुई जिन प्रतिमाओंकी बात बतायी है, प्रायः उन सभीमें आपका निवास है। पर शालग्रामशिलामें आप स्वभावतया सदा निवास करते हैं। प्रभो! मैं यह जानना चाहती हूँ कि गृह आदिमें साधारण रूपसे किनकी पूजा करनी चाहिये अथवा विशेष-रूपसे कौन देवता पूज्य हैं? आप मुझे इसका रहस्य बतानेकी कृपा करें। साथ ही मुझे यह भी स्पष्ट करा दीजिये कि शिवपरिवारके पूजनमें कितनी संख्याएँ होनी आवश्यक हैं?

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! गृहस्थके घरमें दो शिवलिङ्ग, तीन शालग्रामकी मूर्तियाँ, दो गोमती-चक्र, दो सूर्यकी प्रतिमाएँ, तीन गणेश तथा तीन दुर्गाकी प्रतिमाओंका पूजन करना निषिद्ध है। विषम संख्यायुक्त शालग्रामकी पूजा नहीं करनी चाहिये। युग्ममें भी दोकी संख्या नहीं होनी चाहिये। विषमसंख्यक शालग्रामकी पूजा निषिद्ध है, पर विषममें भी एक शालग्रामका पूजन विहित है। इसमें विषमताका दोष नहीं है*। अग्निसे जली हुई तथा टूटी-फूटी प्रतिमाकी पूजा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि घरमें ऐसी मूर्तियोंकी पूजा करनेसे गृह-स्वामीके मनमें उद्वेग या अनिष्ट होता है। शालग्रामकी मूर्ति यदि चक्रके चिह्नसे युक्त हो तो खण्डित होनेपर भी उसकी पूजा करनी चाहिये,


* गृहे लिङ्गद्वयं नार्च्यं शालग्रामत्रयं तथा। द्वे चक्रे द्वारकायास्तु नार्च्यं सूर्यद्वयं तथा॥
गणेशत्रितयं नार्च्यं शक्तित्रितयमेव च। शालग्रामसमाः पूज्याः समेषु द्वितयं नहि॥
विषमा नैव पूज्याः स्युर्विषमे त्वेक एव हि।
(१८६। ४०–४२)

अध्याय १८७ ] सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन [ ३३५

क्योंकि वह टूटा-फूटा दीखनेपर भी शुभप्रद माना जाता है। देवि! जिसने शालग्रामकी बारह मूर्तिका विधिवत् पूजन कर लिया, अब मैं तुम्हें उसका पुण्य बताता हूँ। यदि बारह करोड़ शिवके लिङ्गोंका सोनेके कमलपुष्प चढ़ाकर बारह कल्पोंतक पूजन किया जाय, उससे जितना पुण्य प्राप्त होता है, उतना पुण्य केवल एक दिन बारह शालग्रामकी पूजासे होता है। श्रद्धाके साथ सौ शालग्रामका अर्चन करनेवाला जो फल पाता है, उसका वर्णन मेरे लिये सौ वर्षोंमें भी सम्भव नहीं है। अन्य देवताओंकी तथा मणि आदिसे बने हुए शिवलिङ्गोंकी पूजा सर्वसाधारण व्यक्ति कर सकते हैं, पर शालग्रामकी पूजा स्त्री एवं हीन अपवित्र व्यक्तियोंको नहीं करनी चाहिये। शालग्रामके चरणामृत लेनेसे सम्पूर्ण पाप भस्म हो जाते हैं। शिवजीपर चढ़े हुए फल, फूल, नैवेद्य, पत्र एवं जल ग्रहण करना निषिद्ध है। हाँ, यदि शालग्रामकी शिलासे उसका स्पर्श हो जाय तो वह सदा पवित्र माना जा सकता है। देवि! जो व्यक्ति स्वर्णके साथ किसी भगवद्भक्त पुरुषको शालग्रामकी मूर्तिका दान करता है, उसका पुण्य कहता हूँ, सुनो। वसुंधरे! उसे वन एवं पर्वतसहित समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी सत्पात्र ब्राह्मणको देनेका पुण्य प्राप्त होता है। यदि शालग्रामकी मूर्तिके मूल्यका निश्चय करके कभी कोई उसे बेचता और खरीदता है तो वे दोनों निश्चय ही नरकमें जाते हैं। वस्तुतः शालग्रामके पूजनके फलका वर्णन तो कोई सौ वर्षमें भी नहीं कर सकता। [अध्याय १८६]

सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन

पृथ्वी बोली— भगवन्! मैं आपके वराह तथा मथुराक्षेत्रकी महिमा सुन चुकी। प्रभो! मैं अब पितृयज्ञके सम्बन्धमें जानना चाहती हूँ कि यह क्या है और इसे किस प्रकार आरम्भ करना चाहिये? सर्वप्रथम किसने इस यज्ञका शुभारम्भ किया तथा इसका प्रयोजन एवं स्वरूप क्या है?

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! सर्वप्रथम मैंने स्वर्गलोककी रचना की, जो देवताओंका पहले आवास बना। जगत् प्रकाशशून्य था और सर्वत्र अन्धकार व्याप्त था। उस समय मेरे मनमें ऐसा विचार उत्पन्न हुआ कि चर और अचर प्राणियोंसे सम्पन्न तीनों लोकोंका सृजन करूँ। उस समय मैं संसारकी सृष्टिसे विमुख शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहा था। ऐसा मेरा अनन्त शयन हुआ करता है। माया-स्वरूपिणी निद्रा मेरी सहचरी है। इसका सृजन मेरी इच्छापर निर्भर है। इसीसे मैं सोता और जागता हूँ। सृष्टिके प्रारम्भमें सर्वत्र जल-ही-जल था। कहीं कुछ भी पता नहीं चलता था। उस जलमें एक वट-वृक्षके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं था। वह वट भी बीजजनित नहीं था, बल्कि मुझ विष्णुद्वारा ही उत्पन्न था*। मायाका आश्रय लेकर एक बालकके रूपमें मैं उसपर निवास करता था। मेरी आज्ञा पाकर मायाने चर और अचरसे परिपूर्ण तीनों लोकोंको सजाया है। ये सभी मेरी आँखोंके सामने हैं। शुभे! मैं ही इस विविध वैचित्र्योपेत चराचर


* प्रायः लोग प्रश्न करते हैं कि बीज पहले या वट पहले। यह उसीका उत्तर है, जिसमें विष्णुको ही वटका तथा विश्ववृक्षका बीज बतलाया गया है।

३३६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १८७

विश्वका आधार हूँ। समयानुसार मैं ही बडवामुख नामक अग्नि बन जाता हूँ। माया मेरा ही आश्रय पाकर काम करती है, जिससे सभी जल बडवानलसे निकलकर मुझमें लीन हो जाते हैं। प्रलयकी अवधि पूरी हो जानेपर लोकपितामह ब्रह्माने मुझसे पूछा कि मैं क्या करूँ? तब मैंने उनसे यह वचन कहा—'ब्रह्मन्! तुम यथाशीघ्र सुर-असुर एवं मानवोंकी सृष्टि करो।'

देवि! इस प्रकार मेरे कहनेपर ब्रह्माने हाथसे कमण्डलु उठाया और उसके जलसे आचमनकर देवताओंकी सृष्टिका कार्य आरम्भ कर दिया। पितामहने बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, दो अश्विनीकुमार, उनचास मरुद्गण एवं सबका उद्धार करनेके लिये ब्राह्मण तथा सुरसमुदायकी सृष्टि की। उनकी भुजाओंसे क्षत्रियोंकी, ऊरुओंसे वैश्योंकी तथा चरणोंसे शूद्रोंकी उत्पत्ति हुई। देवि! उन्हींसे देवता और असुर सब-के-सब धराधामपर विराजने लगे। देवता और दानवोंमें तप तथा बलकी अधिकता हुई। अदिति देवीसे आदित्य वसुगण, रुद्रगण, मरुद्गण, अश्विनीकुमार आदि तैंतीस करोड़ देवता उत्पन्न हुए। दिति देवीसे देवताओंके विरोधी दानवोंकी उत्पत्ति हुई। उसी समय प्रजापतिने तपोधन ऋषियोंको उत्पन्न किया। वे सभी तीव्र तेजके कारण सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें सभी शास्त्रोंका पूर्ण ज्ञान था। अब उनके पुत्रों तथा पौत्रोंकी संख्या सीमित न रही। उन्हींमें एक निमि हुए*। उन निमिको भी एक पुत्र हुआ, जो आत्रेय नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह जन्मसे ही सुन्दर, संयतचित्त एवं उदार स्वभावका था। वह मनको एकाग्रकर अविचल भावसे सावधान होकर तपस्या करता। वसुंधरे! पञ्चाग्नि तापना, वायु पीकर रहना, भुजा ऊपर उठाकर एक पैरसे खड़े रहना, सूखे पत्ते एवं जल ग्रहण करना, शीतकालमें जलशयन करना, फलोंके आहारपर रहना तथा चान्द्रायणव्रतका पालन करना—ये उसकी तपस्याके अङ्ग थे। इन सभी नियमोंका पालन करते हुए वह दस हजार वर्षोंतक तपस्यामें लीन रहा। इतनेमें कालवश उसका देहान्त हो गया। ऐसे सुयोग्य पुत्रकी मृत्युसे निमिका हृदय शोकपूर्ण हो गया। इस प्रकार पुत्रशोकके कारण ये निमि दिन-रात चिन्तित रहने लगे।

माधवि! उस समय निमिने तीन राततक शोक मनाया। उनकी बुद्धि बहुत विस्तृत थी। अतः इस शोकसे मुक्त होनेका विचार किया कि माघमासकी द्वादशीका दिन उपयुक्त है और फिर उस दिन पुत्रके लिये श्राद्धकी व्यवस्था की। उस बालक (आत्रेय)-को खाने एवं पीनेके लिये जितने भोजनके पदार्थ अन्न, फल, मूल तथा रस थे, उन्हें एकत्रकर फिर स्वयं पवित्र होकर सावधानीके साथ ब्राह्मणको आमन्त्रित किया और अपसव्य-विधानसे सभी श्राद्ध-कार्य सम्पन्न किये। सुन्दरि! इसके बाद सात दिनोंका कृत्य एक साथ सम्पन्न किया। शाक, फल और मूल—इन वस्तुओंसे पिण्डदान किया। सात ब्राह्मणोंकी विधिवत् पूजा की। कुशोंको दक्षिणकी ओर अग्रभाग करके रखकर नाम और गोत्रका उच्चारण करके मुनिवर निमिने धार्मिक भावनासे अपने पुत्रके नाम पिण्ड अर्पण किया। भद्रे! इस प्रकार विधान पूरा करते रहे, दिन समाप्त हो गया और भगवान् सूर्य अस्ताचलको चले गये। यह परम


* ये 'निमि' मिथिला-नरेश—'मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥' (रामचरित० १।२२९।२)—से भिन्न कोई ब्राह्मण हैं।