बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
| ११०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
| ११०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ | | :--- | :--- |
| कुतः पुनस्ते आत्मलोकार्थिनः प्रव्रजन्त्येवेत्युच्यते; तत्र अर्थवादवाक्यरूपेण हेतुं दर्शयति—एतद्ध स्म वै तत्। तदेतत् पारिव्राज्ये कारणमुच्यते—ह स्म वै किल पूर्वे अतिक्रान्तकालीना विद्वांसः—आत्मज्ञाः, प्रजां कर्म अपरब्रह्मविद्यां च; प्रजोपलक्षितं हि त्रयमेतद् बाह्यलोकत्रयसाधनं निर्दिश्यते 'प्रजाम्' इति। प्रजां किम् ? न कामयन्ते, पुत्रादिलोकत्रयसाधनं न अनुतिष्ठन्तीत्यर्थः। | किंतु वे आत्मलोकके इच्छुक पुरुष संन्यास करते ही हैं ऐसा क्यों कहा जाता है ? इसमें श्रुति अर्थवादवाक्यरूपसे हेतु दिखलाती है—"एतद्ध स्म वै तत्"—उस पारिव्राज्यमें यह कारण बतलाया जाता है—प्रसिद्ध है कि पूर्व अर्थात् भूतकालीन विद्वान् आत्मज्ञ प्रजा, कर्म और अपरब्रह्मविद्याकी [ कामना नहीं करते ]—'प्रजाम्' इस पदसे यहाँ इहलोक, पितृलोक और देवलोक—इन तीनों लोकोंके तीनों साधनोंका, जिनको 'प्रजा' शब्दसे उपलक्षित किया है, निर्देश किया जाता है। प्रजाका क्या करते हैं ? उसकी कामना नहीं करते। अर्थात् बाह्य लोकत्रयके पुत्रादि साधनोंका अनुष्ठान नहीं करते। | | ननु अपरब्रह्मदर्शनमनुतिष्ठन्त्येव, तद्बलाद्धि व्युत्थानम्। | शङ्का—किंतु अपरब्रह्मोपासनाका अनुष्ठान तो करते ही हैं, क्योंकि उसीके बलसे व्युत्थान होता है। | | न, अपवादात्; "ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद" (२।४।६) "सर्वं तं परादात्—" (२।४।६) इति अपरब्रह्मदर्शनमप्यपवदत्येव, अपर- | समाधान—नहीं, क्योंकि उसका तो अपवाद किया गया है। "जो आत्मासे ब्रह्मको पृथक् जानता है, ब्रह्म उसको परास्त कर देता है" "[ जो सर्वको आत्मासे पृथक् जानता है ] सर्व उसको परास्त कर देता है" इस प्रकार श्रुति अपरब्रह्मदर्शनका भी अपवाद ही करती है; क्योंकि |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११०७ |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११०७ |
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| ब्रह्मणोऽपि सर्वमध्यान्तर्भावात्; "यत्र नान्यत्पश्यति" (छा० उ० ७ । २४) इति च; पूर्वापरबाह्यान्तरदर्शनप्रतिषेधाच्च "अपूूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्" (बृ० उ० २ । ५ । १९) इति; "तत्केन कं पश्येत्... विजानीयात्" (बृ० उ० २ । ४ । १४) इति च; तस्मान्न आत्मदर्शनव्यतिरेकेण अन्यद् व्युत्थानकारणमपेक्षते । | अपरब्रह्मका भी सर्वके भीतर ही अन्तर्भाव है। "जहाँ अन्यको नहीं देखता" ऐसा भी कहा ही है। तथा "ब्रह्म अपूर्व, अनपर, अनन्तर और अबाह्य है" इस प्रकार ब्रह्ममें पूर्व, अपर, बाह्य एवं अन्तर दृष्टियोंका भी प्रतिषेध किया ही है और "उस समय किसके द्वारा किसे जाने?" ऐसा भी कहा ही है। अतः आत्मदर्शनके सिवा व्युत्थानके किसी अन्य कारणकी अपेक्षा नहीं है। | | कः पुनस्तेषामभिप्रायः ? | तो फिर [ व्युत्थान करनेमें ] उनका क्या अभिप्राय होता है? | | **इत्युच्यते—**किं प्रयोजनं फलं साध्यं करिष्यामः प्रजया साधनेन; प्रजा हि बाह्यलोकसाधनं निर्ज्ञाता; स च बाह्यलोको नास्त्यस्माकमात्मव्यतिरिक्तः; सर्वं हि अस्माकमात्मभूतमेव, सर्वस्य च वयमात्मभूताः । आत्मा च नः आत्मत्वादेव न केनचित् साधनेनोत्पाद्य आप्यो विकार्यः संस्कार्यो वा । | सो बतलाया जाता है। हम प्रजारूप साधनसे किस प्रयोजन—फल अर्थात् साध्यका सम्पादन करेंगे? प्रजा तो बाह्यलोकका साधन समझी गयी है और वह बाह्यलोक हमारे लिये आत्मासे भिन्न नहीं है; हमारे लिये तो सब आत्मस्वरूप ही है और हम भी सबके आत्मस्वरूप ही हैं तथा हमारा आत्मा भी आत्मा होनेके कारण ही किसी साधनसे उत्पाद्य, आप्य, विकार्य अथवा संस्कार्य नहीं है। |
| ११०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
| ११०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| यदप्यात्मयाजिनः संस्कारार्थं कर्मेति, तदपि कार्यकारणात्मदर्शनविषयमेव, इदं मे अनेन अङ्गं संस्क्रियते—इत्यङ्गाङ्गित्वादिश्रवणात्; न हि विज्ञानघनैकरसनैरन्तर्यदर्शिनोऽङ्गाङ्गिसंस्कारोपधानदर्शनं संभवति । तस्मान्न किञ्चित् प्रजादिसाधनैः करिष्यामः; अविदुषां हि तत् प्रजादिसाधनैः कर्तव्यं फलम्; न हि मृगतृष्णिकायामुदकपानाय तदुदकदर्शी प्रवृत्त इति तत्र ऊषरमात्रमुदकाभावं पश्यतोऽपि प्रवृत्तिर्युक्ता; एवमस्माकमपि परमार्थात्मलोकदर्शिनां प्रजादिसाधनसाध्ये मृगतृष्णिकादिसमेऽविद्वद्दर्शनविषये न प्रवृत्तिर्युक्तेत्यभिप्रायः । | और ऐसा जो कहा है कि कर्म आत्मयाजीके संस्कारके लिये है, वह भी देह और इन्द्रियोंमें आत्मबुद्धि करनेको लक्ष्य करके ही है; क्योंकि इसके द्वारा मेरे इस अङ्गका संस्कार होता है—इस प्रकार श्रुतिसे उसमें अङ्गाङ्गित्व-भाव ज्ञात होता है । जो निरन्तर एक विज्ञानघनरसस्वरूपको ही देखता है, उसके लिये अङ्गाङ्गिसंस्कारोंका अवलम्ब देखना सम्भव नहीं है, इसलिये प्रजादि साधनोंसे हम कोई भी प्रयोजन नहीं सिद्ध करेंगे । जो अविद्वान् हैं, उन्हें ही उन प्रजादि साधनोंसे फल प्राप्त करना है । मृगतृष्णामें जल देखनेवाला जलपानके लिये उसकी ओर जाता है, इसलिये उसे ऊसरमात्र और उसमें जलका अभाव देखनेवालेकी भी प्रवृत्ति होनी ही चाहिये—ऐसी बात नहीं है । इसलिये जो अज्ञानियोंकी दृष्टिका विषय और मृगतृष्णादिके समान है, उस प्रजादिसाधनसे साध्य फलमें हम परमार्थ आत्मलोकदर्शियोंकी भी प्रवृत्ति होनी उचित नहीं है—ऐसा इसका अभिप्राय है । |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ११०९
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ११०९
| तदेतदुच्यते—येषामस्माकं परमार्थदर्शिनां नः, अयमात्मा अशनायादिविनिर्मुक्तः साध्वसाधुभ्यामविकार्योऽयं लोकः फलमभिप्रेतम्; न चास्यात्मनः साध्यसाधनादिसर्वसंसारधर्मविनिर्मुक्तस्य साधनं किञ्चिद्देषितव्यम्; साध्यस्य हि साधनान्वेषणा क्रियते; असाध्यस्य साधनान्वेषणायां हि, जलबुद्ध्या स्थल इव तरणं कृतं स्यात्, खे वा शाकुनपदान्वेषणम् । तस्मादेतमात्मानं विदित्वा प्रव्रजेयुरेव ब्राह्मणाः, न कर्म आरभेरन्नित्यर्थः; यस्मात् पूर्वे ब्राह्मणा एवं विद्वांसः प्रजामकामयमानाः । <br><br> त एवं साध्यसाधनसंव्यवहारं निन्दन्तः 'अविद्वद्विषयोऽयम्' इति कृत्वा, किं कृतवन्तः ? इत्युच्यते—'ते ह स्म किल पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति' इत्यादि व्याख्यातम् । | वही बात यहां बतलायी जाती है—जिन हम परमार्थदर्शियोंको यह क्षुधादिधर्मसे रहित तथा शुभाशुभ कर्मसे अविकार्य आत्मलोक-रूप फल अभिप्रेत है; साध्यसाधनादि सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित इस आत्माको किसी भी साधनकी अपेक्षा नहीं है; जो साध्य होता है, उसीके साधनकी खोज की जाती है, असाध्यके साधनकी खोज करनेमें तो मानो जलबुद्धिसे स्थलमें तैरना है अथवा आकाशमें पक्षीके पदोंकी खोज करना है । अतः इस आत्माको जानकर ब्राह्मणलोग सब कुछ त्याग कर चले जायँ ( संन्यासी हो जायँ ), किसी कर्मका आरम्भ न करें—ऐसा इसका तात्पर्य है; क्योंकि इस प्रकार जाननेवाले पूर्ववर्ती ब्राह्मण भी प्रजाकी इच्छा करनेवाले नहीं थे । <br><br> वे इस प्रकार साध्यसाधनरूप व्यवहारकी निन्दा करते हुए 'यह सब अज्ञानियोंका विषय है' ऐसा सोचकर, क्या करते थे ? सो बतलाया जाता है—'वे निश्चय ही पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणासे पृथक् होकर भिक्षाचर्या करते थे, इस प्रकार इसकी व्याख्या ऊपर की जा चुकी है । |
१११० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| १११० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| तस्मादात्मानं लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति प्रव्रजेयुः—इत्येष विधिरर्थवादेन संगच्छते; न हि सार्थवादस्य अस्य लोकस्तुत्याभिमुख्यमुपपद्यते; प्रव्रजन्तीत्यस्यार्थवादरूपो हि 'एतद्ध स्म' इत्यादिरुत्तरो ग्रन्थः। अर्थवादश्चेत्, नार्थवादान्तरमपेक्षेत; अपेक्षते तु 'एतद्ध स्म' इत्याद्यर्थवादं 'प्रव्रजन्ति' इत्येतत्। | इसलिये आत्मलोककी इच्छा करनेवाले प्रव्रजन करें—संन्यासी हो जायें—इस प्रकार यह विधि अर्थवादसे संगत होती है। इस अर्थवादसहित विधिवचनका आत्मलोककी स्तुतिके लिये होना सम्भव नहीं है; 'प्रव्रजन्ति' इस विधि-वचनका अर्थवादरूप 'एतद्ध स्म' इत्यादि आगेका ग्रन्थ है। यदि 'प्रव्रजन्ति' यह वचन भी अर्थवाद ही होता तो इसे दूसरे अर्थवादकी अपेक्षा नहीं हो सकती थी। किंतु 'प्रव्रजन्ति' इस ग्रन्थको 'एतद्ध स्म' इत्यादि अर्थवादकी अपेक्षा है ही। |
| यस्मात् पूर्वे विद्वांसः प्रजादिकर्मभ्यो निवृत्ताः प्रव्रजितवन्त एव, तस्मादधुनातना अपि प्रव्रजन्ति प्रव्रजेयुः—इत्येवं संबध्यमानं न लोकस्तुत्यभिमुखं भवितुमर्हति; विज्ञानसमानकर्तृकत्वोपदेशादित्यादिना अवोचाम। | क्योंकि प्रजादि कर्मोंसे निवृत्त हुए पूर्ववर्ती विद्वान् प्रव्रजित हुए ही थे, इसलिये आधुनिक ब्रह्मवेत्ता भी प्रव्रजन्ति अर्थात् प्रव्रजन (संन्यास) करें, इस प्रकार सम्बन्ध रखनेवाला वाक्य आत्मलोककी स्तुतिके लिये होना सम्भव नहीं है, क्योंकि विज्ञान और व्युत्थानका एक ही कर्ता है—ऐसा श्रुतिका उपदेश है—इत्यादि कथनसे हम यह बात पहले कह चुके हैं। |
| वेदानुवचनादिसहपाठाच्च, यथात्मवेदनसाधनत्वेन विहितानां वेदानुवचनादीनां यथार्थत्वमेव, नार्थवादत्वम्, तथा तैरेव | वेदानुवचनादिके साथ इसका पाठ होनेसे भी यह स्तुत्यर्थक नहीं हो सकता; जिस प्रकार आत्मज्ञानके साधनरूपसे विहित वेदानुवचनादि यथार्थ हैं—अर्थवाद नहीं हैं, उसी |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [११११
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [११११
| सह पठितस्य पारिव्राज्यस्य आत्मलोकप्राप्तिसाधनत्वेनार्थवादत्वमयुक्तम् । | प्रकार उनके साथ ही पढ़े गये पारिव्राज्य (संन्यास) का भी आत्मलोककी प्राप्तिका साधन होनेके कारण अर्थवाद होना उचित नहीं है। |
|---|---|
| फलविभागोपदेशाच्च; 'एतमेवात्मानं लोकं विदित्वा' इति अन्यस्माद् बाह्याद् लोकादात्मानं फलान्तरत्वेन प्रविभजति, यथा "पुत्रेणैवायं लोको जय्यो नान्येन कर्मणा, कर्मणा पितृलोकः" ( १ । ५ । १६ ) इति । | फलविभागका उपदेश दिये जानेके कारण भी यह स्तुत्यर्थक नहीं है। 'इस आत्मलोकको ही जानकर' इस वाक्यसे श्रुति अन्य लोकोंसे आत्माका फलान्तररूपसे विभाग करती है, जिस प्रकार कि "यह लोक पुत्रसे ही प्राप्तव्य है, किसी अन्य कर्मसे नहीं तथा कर्मसे पितृलोक प्राप्तव्य है" इस वाक्यद्वारा पुत्रादि साधनोंका फलविभाग किया गया है। |
| न च प्रव्रजन्तीत्येतत् प्राप्तवल्लोकस्तुतिपरम्, प्रधानवच्चार्थ- | इसके सिवा प्रमाणान्तरसे प्राप्त [वायु आदि] के समान भी 'प्रव्रजन्ति' यह वाक्य स्तुतिपरक (अर्थवाद ¹) नहीं हो सकता। तथा अन्य प्रधान कर्मोंके समान इसे |
१. अर्थवाद तीन तरहके होते हैं—गुणवाद, अनुवाद और भूतार्थवाद। जहाँ अन्य प्रमाणोंसे विरोध हो वह गुणवाद कहलाता है। जैसे 'आदित्यो यूपः' इत्यादि वाक्य यहाँ यूप (पशु बाँधनेके लिये स्थापित काष्ठ) को सूर्य कहा है, जो प्रत्यक्ष अनुभवके विरुद्ध है। इसी प्रकार जो अन्य प्रमाणोंद्वारा ज्ञात अर्थका बोध करानेवाला है, उसे अनुवाद कहते हैं। जैसे 'अग्निर्हिमस्य भेषजम्' (अग्नि शीतकी दवा है) इत्यादि। अग्निसे शीतका कष्ट दूर होना प्रत्यक्ष है। इसके सिवा जो अन्य प्रमाणोंसे न तो ज्ञात हो और न विरुद्ध ही हो, उस अर्थका बोधक वाक्य भूतार्थवाद कहलाता है। जैसे 'इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत्' (इन्द्रने वृत्रासुरको मारनेके लिये वज्र उठाया) इत्यादि।
१११२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १११२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| वादापेक्षम्, सकृच्छ्रुतं स्यात्; <br><br> तस्माद् भ्रान्तिरेवैषा—लोकस्तुतिपरमिति । <br><br> न च अनुष्ठेयेन पारिव्राज्येन स्तुतिरुपपद्यते । यदि पारिव्राज्यमनुष्ठेयमपि सदन्यस्तुत्यर्थं स्यात्, दर्शपूर्णमासादीनामप्यनुष्ठेयानां स्तुत्यर्थता स्यात् । न चान्यत्र कर्तव्यतैतस्माद् विषयान्निर्ज्ञाता, यत इह स्तुत्यर्थो भवेत् । यदि पुनः क्वचिद् विधिः | अर्थवादकी अपेक्षा भी है।¹ यदि इसका श्रुतिमें एक ही बार श्रवण होता तो यह अविवक्षित एवं स्तुतिपरक माना जाता, पर इसका तो अनेकों बार श्रवण हुआ है। अतः यह आत्मलोककी स्तुतिके लिये है—ऐसा विचार भ्रान्ति ही है। <br><br> अनुष्ठान करने योग्य पारिव्राज्यसे किसीकी स्तुति नहीं हो सकती। यदि अनुष्ठानके योग्य होकर भी पारिव्राज्य दूसरेकी स्तुतिके लिये हो सकता है, तो दर्श-पूर्णमासादि अनुष्ठेय कर्म भी स्तुतिके लिये ही सिद्ध होंगे। इस आत्मज्ञानरूप विषयको छोड़कर और कहीं इसकी कर्तव्यता नहीं ज्ञात हुई, जिससे कि यहाँ यह स्तुत्यर्थक हो। यदि कहीं पारिव्राज्य |
'प्रव्रजन्ति' में किसी भी प्रकारके अर्थवादकी सम्भावना नहीं है। इसीका यहाँ बार-बार समर्थन किया गया है। 'प्रमाणान्तरसे प्राप्तके समान' ऐसा कहकर यहाँ अनुवादरूप अर्थवादका खण्डन किया गया है। जैसे 'वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता' (वायु शीघ्र चलनेवाला देवता है) यह एक वाक्य है। वायुका शीघ्रगामी होना प्रत्यक्ष प्रमाणसे सिद्ध है। अतः यह अनुवादमात्र होनेके कारण अर्थवाद है। परंतु उसके समान 'प्रव्रजन्ति' (संन्यास लेते हैं) यह वचन किसीकी स्तुति करने-वाला नहीं है; क्योंकि यह अन्य प्रमाणोंसे ज्ञात नहीं है।
१. इसके सिवा जो प्रधान कर्म होते हैं, उन्हींकी फलादिके द्वारा स्तुति की जाती है, वे स्वयं किसीकी स्तुति नहीं होते; जैसे दर्श-पूर्णमासादि प्रधान कर्मोंकी उनके फल स्वर्गप्राप्ति आदिसे स्तुति की जाती है, उसी प्रकार पारिव्राज्यकी भी आत्मलोकप्राप्तिद्वारा स्तुति की गयी है और यह स्वयं किसीकी स्तुति नहीं करता। इससे भी इसका अर्थवाद होना सम्भव नहीं है।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११३
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११३
| परिकल्प्येत पारिव्राज्यस्य, स इहैव मुख्यो नान्यत्र संभवति । यदप्यनधिकृतविषये पारिव्राज्यं परिकल्प्यते, तत्र वृक्षाद्यारोहणाद्यपि पारिव्राज्यवत् कल्प्येत, कर्तव्यत्वेनानिर्ज्ञातत्वाविशेषात् । तस्मात् स्तुतित्वगन्धोऽप्यत्र न शक्यः कल्पयितुम् । | (संन्यास) की विधिकी कल्पना की जाय, तो यहीं मुख्य विधि होगी । उसका अन्यत्र होना सम्भव नहीं है । यदि [ कर्मके ] अनधिकारीके विषयमें पारिव्राज्यकी कल्पना की जाय, तो उसके लिये तो पारिव्राज्यके समान वृक्ष आदिपर चढ़ने आदिकी भी कल्पना की जा सकती है; क्योंकि कर्तव्यरूपसे ज्ञात न होनेमें दोनों समान हैं ।^१ अतः इस वाक्यके स्तुतिरूप होनेकी लेशमात्र भी कल्पना नहीं की जा सकती । |
| यद्ययमात्मा लोक इष्यते, किमर्थं तत्प्राप्तिसाधनत्वेन कर्माण्येव नारभेरन्, किं पारिव्राज्येनेति ? | **शङ्का—**यदि आत्मरूप लोककी इच्छा की जाती है, तो उसकी प्राप्तिके साधनरूपसे कर्मोंका ही आरम्भ क्यों नहीं करते, पारिव्राज्यसे क्या प्रयोजन है ? |
| **अत्रोच्यते—**अस्य आत्मलोकस्य कर्मभिरसंबन्धात् । यमात्मानमिच्छन्तः प्रव्रजेयुः, स आत्मा साधनत्वेन फलत्वेन च उत्पाद्यत्वादिप्रकाराणामन्यतमत्वेनापि कर्मभिर्न संबध्यते; | **समाधान—**इसपर हमारा यह कथन है कि इस आत्मलोकका कर्मोंसे कोई सम्बन्ध न होनेके कारण इसके लिये कर्मोंका आरम्भ नहीं किया जाता है। लोग जिस आत्माकी इच्छा करते हुए संन्यास करें, उस आत्माका साधनरूपसे, फलरूपसे अथवा उत्पाद्य, आप्य, संस्कार्य, विकार्य—इन चार प्रकारोंमेंसे किसी भी एक रूपसे कर्मोंके साथ सम्बन्ध |
१. अर्थात् अनधिकारीके लिये न तो संन्यास ही कर्तव्य बताया गया है और न वृक्ष आदिपर चढ़ना आदि हो ।
१११४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १११४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| तस्मात् 'स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते'—इत्यादि-लक्षणः। | नहीं होता। अतः 'वह नेति-नेति इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है, उसका ग्रहण नहीं किया जाता'—इत्यादि वचनोंसे बताये हुए लक्षणवाला है। |
| यस्मादेवंलक्षण आत्मा कर्मफलसाधनासम्बन्धीसर्वसंसारधर्मविलक्षणः, अशनायाद्यतीतः, अस्थूलादिधर्मवान्, अजोऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयः सैन्धवघनवद्विज्ञानैकरसस्वभावः स्वयंज्योतिरेक एवाद्वयः, अपूर्वोऽनपरोऽनन्तरोऽबाह्यः—इत्येतदागमतस्तर्कतश्च स्थापितम्, विशेषतश्चेह जनकयाज्ञवल्क्यसंवादेऽस्मिन्; तस्मादेवंलक्षणे आत्मनि विदिते आत्मत्वेन नैव कर्मारम्भ उपपद्यते। तस्मादात्मा निर्विशेषः। | क्योंकि ऐसे लक्षणवाला आत्मा कर्मके फल या साधनसे असम्बद्ध सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे विलक्षण क्षुधादि धर्मोंसे अतीत, अस्थूलत्व आदि धर्मोंसे युक्त, अजन्मा, अजर, अमर, अमृत, अभय, लवणखण्डके समान एकमात्र विज्ञानरसस्वरूप, स्वयंज्योति, एकमात्र, अद्वितीय, अपूर्व, अनपर, (जिससे बढ़कर दूसरा कोई उत्कृष्ट तत्त्व नहीं हो) अनन्तर और अबाह्य है—ऐसा आगम और तर्कद्वारा निश्चय किया गया है और विशेषतः यहाँ इस जनक-याज्ञवल्क्यसंवादमें इसका निरूपण किया गया है; अतः ऐसे लक्षणोंवाले आत्माको आत्मस्वरूपसे जान लेनेपर कर्मका आरम्भ होना सम्भव नहीं है। इसलिये आत्मा निर्विशेष है। |
| न हि चक्षुष्मान् पथि प्रवृत्तोऽहनि कूपे कण्टके वा पतति; कृत्स्नस्य च कर्मफलस्य विद्याफलेऽन्तर्भावात्; न चायत्नप्राप्ये | कोई भी नेत्रवाला दिनके समय मार्गमें चलता हुआ कूएँ या काँटोंमें नहीं गिरता; और कर्मके भी सारे फलका ज्ञानके फलमें ही अन्तर्भाव हो जाता है; तथा जो वस्तु बिना प्रयत्नके ही प्राप्त हो सकती है, उसके |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १११५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १११५
| संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
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| वस्तुनि विद्वान् यत्नमातिष्ठति ।<br><br>‘अङ्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत् । इष्टस्यार्थस्य संप्राप्तौ को विद्वान् यत्नमाचरेत्॥’ “सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते” (४। ३३) इति गीतासु । इहापि चैतस्यैव परमानन्दस्य ब्रह्मवित्प्राप्यस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्तीत्युक्तम् । अतो ब्रह्मविदां न कर्मारम्भः ।<br><br>यस्मात् सर्वैषणाविनिवृत्तः स एष नेति नेत्यात्मानमात्मत्वेनोपगम्य तद्रूपेणैव वर्तते, तस्माद् एतमेवंविदं नेति नेत्यात्मभूतम्, उ ह एव एते वक्ष्यमाणे न तरतो न प्राप्नुतः—इति युक्तमेवेति वाक्यशेषः । के ते ? इत्युच्यते—‘अतोऽस्मान्निमित्तात् शरीरधारणादिहेतोः पापम् | लिये समझदार व्यक्ति प्रयत्न भी नहीं करता। जैसा कि कहा है—<br>“यदि अपने पास ही शहद मिल जाय तो फिर पर्वतपर किसलिये जाय ? अपने अभीष्ट पदार्थके मिल जानेपर कौन समझदार उसके लिये प्रयास कर सकता है ?” तथा गीतामें कहा है—“हे पार्थ ! सारा-का सारा कर्म ज्ञानमें पूर्णतया समाप्त हो जाता है।” यहाँ भी यही कहा है कि ब्रह्मवेताके प्राप्त करने योग्य इसी परमानन्दके अंशके ही सहारे दूसरे समस्त भूत जीवित रहते हैं। अतः ब्रह्मवेत्ताओंके लिये कर्मके आरम्भकी आवश्यकता नहीं है।<br><br>क्योंकि सम्पूर्ण इच्छाओंसे निवृत्त होकर ‘वह यह आत्मा ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है’ इस प्रकारके आत्माको आत्मरूपसे जानकर तद्रूपसे ही विद्यमान रहता है, अतः इस प्रकार जाननेवाले इस ‘नेति-नेति’ आत्मस्वरूप हुए पुरुषको ये आगे बतलाये जानेवाले दोनों प्राप्त नहीं होते, सो उचित ही है—इस प्रकार ‘इति’ शब्दके आगे ‘युक्तमेव’ यह वाक्यशेष है। वे [प्राप्त न होनेवाले] दो क्या हैं, सो बतलाया जाता है—[पहली बात यह है कि] ‘अतः अर्थात् इस निमित्तसे यानी शरीरधारणादिके |
१११६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
१११६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| अपुण्यं कर्म अकरवं कृतवानस्मि, कष्टं खलु मम वृत्तम्, अनेन पापेन कर्मणा अहं नरकं प्रतिपत्स्ये'—इति योऽयं पश्चात् पापं कर्म कृतवतः—परितापः स एनं नेति नेत्यात्मभूतं न तरति । | कारण मैंने पाप—अपुण्य कर्म किया, यह मेरे लिये बड़े ही क्लेशका कारण हुआ, इस पापकर्मके कारण मैं नरकको प्राप्त होऊँगा'—इस प्रकार जिसने पापकर्म किया है, उस पुरुषका जो यह पश्चात्ताप है, वह इस 'नेति-नेति' इस श्रुतिसे वर्णित आत्मस्वरूपको प्राप्त हुए पुरुषको नहीं प्राप्त होता । | | तथा—'अतः कल्याणं फलविषयकामानिमित्ताद् यज्ञदानादिलक्षणं पुण्यं शोभनं कर्म कृतवानस्मि, अतोऽहमस्य फलं सुखमुपभोक्ष्ये देहान्तरे' इत्येषोऽपि हर्षस्तं न तरति । उभे उ ह एव एष ब्रह्मविदेते कर्मणी तरति पुण्यपापलक्षणे । एवं ब्रह्मविदः संन्यासिन उभे अपि कर्मणी क्षीयेते—पूर्वजन्मनि कृते ये ते, इह जन्मनि कृते ये ते च; अपूर्वे च नारभ्येते । | इसी प्रकार [ दूसरी बात यह है— ] 'अतः—इस फलविषयक कामनारूप निमित्तसे मैंने कल्याण-यज्ञ-दानादिरूप पुण्य अर्थात् शुभ कर्म किया है, इसलिये मैं दूसरे शरीरमें इसका फलरूप सुख भोगूँगा'—इस प्रकारका हर्ष भी उसे नहीं प्राप्त होता। यह ब्रह्मवेत्ता इन पाप-पुण्यरूप दोनों ही प्रकारके कर्मोंसे पार हो जाता है। इस प्रकार ब्रह्मवेत्ता संन्यासीके जो पूर्वजन्ममें किये होते हैं, वे और जो इस जन्ममें किये होते हैं वे—दोनों ही प्रकारके कर्म क्षीण हो जाते हैं तथा नये कर्मोंका भी आरम्भ नहीं होता । | | किं च नैनं कृताकृते—कृतं नित्यानुष्ठानम्, अकृतं तस्यैव अक्रिया, ते अपि कृताकृते एनं | इसी प्रकार इसे कृत और अकृत-कृत नित्यानुष्ठानको कहते हैं और अकृत उसे न करनेको—वे कृत |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १११७
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १११७
| न तपतः; अनात्मज्ञं हि कृतं फलदानेन, अकृतं प्रत्यवायोत्पादनेन तपतः । अयं तु ब्रह्मविद् आत्मविद्याग्निना सर्वाणि कर्माणि भस्मीकरोति, "यथैधांसि समिद्धोऽग्निः" ( गीता ४ । ३७) इत्यादिस्मृतेः; शरीरारम्भकयोस्तु उपभोगेनैव क्षयः । अतो ब्रह्मविदकर्मसम्बन्धी ।२२। | और अकृत भी इसे ताप नहीं पहुँचाते। जो अनात्मज्ञ है, उसे ही कृत तो फलप्रदानके द्वारा और अकृत प्रत्यवाय उत्पन्न करके ताप पहुँचाते हैं। यह ब्रह्मवेत्ता तो आत्मज्ञानरूप अग्निसे सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म कर देता है, जैसा कि "जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि ईंधनको भस्म कर देता है" इस स्मृतिसे सिद्ध होता है। जो [प्रारब्धरूपसे] नूतन शरीरकी उत्पत्ति करानेवाले पाप-पुण्य कर्म होते हैं, उनका तो उपभोगसे ही क्षय होता है, इसलिये ब्रह्मवेत्ताका कर्मसे सम्बन्ध नहीं है ॥ २२ ॥ |
ब्रह्मवेत्ताकी स्थिति और याज्ञवल्क्यके प्रति जनकका आत्मसमर्पण
तदेतदृचाभ्युक्तम् । एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्धते कर्मणा नो कनीयान् । तस्यैव स्यात् पदवित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेनेति । तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वमात्मानं पश्यति नैनं पाप्मा तरति सर्वं पाप्मानं तरति नैनं पाप्मा तपति सर्वं पाप्मानं तपति विपापो विरजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडेनं प्रापितोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते विदेहान् ददामि मां चापि सह दास्यायेति ॥ २३ ॥
१११८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १११८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
यही बात ऋचाद्वारा कही गयी है—यह ब्रह्मवेत्ताकी नित्य महिमा है, जो कर्मसे न तो बढ़ती है और न घटती ही है। उस महिमाके ही स्वरूपको जाननेवाला होना चाहिये, उसे जानकर पापकर्मसे लिप्त नहीं होता। अतः इस प्रकार जाननेवाला शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और समाहित होकर आत्मामें ही आत्माको देखता है, सभीको आत्मा देखता है। उसे [पुण्य-पापरूप] पापकी प्राप्ति नहीं होती, यह सम्पूर्ण पापोंको पार कर जाता है। इसे पाप ताप नहीं पहुँचाता, यह सारे पापोंको संतप्त करता है। यह पापरहित, निष्काम, निःसंशय ब्राह्मण हो जाता है। हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है, तुम इसे पहुँचा दिये गये हो—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। [तब जनकने कहा—] 'वह मैं श्रीमान्को विदेह देश देता हूँ, साथ ही आपकी दासता (सेवा) करनेके लिये अपने-आपको भी समर्पण करता हूँ' ॥ २३ ॥
| तदेतद् वस्तु ब्राह्मणेनोक्तमृचा मन्त्रेण अभ्युक्तं प्रकाशितम्। एष नेति नेत्यादिलक्षणो नित्यो महिमा, अन्ये तु महिमानः कर्मकृता इत्यनित्याः; अयं तु तद्विलक्षणो महिमा स्वाभाविकत्वान्नित्यो ब्रह्मविदो ब्राह्मणस्य त्यक्तसर्वैषणस्य। <br><br> कुतोऽस्य नित्यत्वमिति हेतुमाह—कर्मणा न वर्धते शुभलक्षणेन कृतेन वृद्धिलक्षणां विक्रियां न प्राप्नोति; अशुभेन कर्मणा नो | ब्राह्मणके द्वारा कही गयी यह बात ऋचा अर्थात् मन्त्रद्वारा भी कही—प्रकाशित की गयी है। यह 'नेति-नेति' इत्यादि श्रुतिके द्वारा लक्षित आत्मा नित्य महिमा है; दूसरी जो महिमाएँ हैं वे तो कर्मद्वारा सम्पन्न हुई हैं इसलिये अनित्य हैं; किंतु ब्राह्मण अर्थात् सम्पूर्ण एषणाओंका त्याग करनेवाले ब्रह्मवेत्ताकी यह उनसे विलक्षण महिमा स्वाभाविक होनेके कारण नित्य है। <br><br> इसकी नित्यता क्यों है—इसमें श्रुति हेतु बतलाती है—यह कर्मसे नहीं बढ़ती अर्थात् किये हुए शुभरूप कर्मसे यह वृद्धिरूप विकारको प्राप्त नहीं होती। तथा अशुभ कर्मसे |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १११९
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १११९
| संस्कृत शाङ्करभाष्य | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| कनीयान् नाप्यपचयलक्षणां विक्रियां प्राप्नोति। उपचयापचयहेतुभूता एव हि सर्वा विक्रिया इति एताभ्यां प्रतिषिध्यन्ते। अतोऽविक्रियात्वान्नित्य एष महिमा। तस्मात् तस्यैव महिम्नः स्याद् भवेत्, पदवित्—पदस्य वेत्ता, पद्यते गम्यते ज्ञायत इति महिम्नः स्वरूपमेव पदम्, तस्य पदस्य वेदिता। | कनीयान्—क्षयरूप विकारको प्राप्त नहीं होती। समस्त विकार वृद्धि या क्षयके ही हेतुभूत हैं, अतः इन दो विकारोंके प्रतिषेधद्वारा उन सभीका प्रतिषेध कर दिया जाता है। इसलिये अविक्रिय होनेके कारण यह नित्य महिमा है। अतः उस महिमाका ही पदवित्--स्वरूपको जाननेवाला होना चाहिये। ['पद्यते इति पदम्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार] जिसकी प्रतिपत्ति—अवगम अर्थात् ज्ञान होता है, वह पद है; अतः यहाँ स्वरूप ही पद है, उस पदका वेत्ता (जाननेवाला) 'पदवित्' कहलाता है। |
| किं तत्पदवेदनेन स्यादित्युच्यते—तं विदित्वा महिमानम्, न लिप्यते न सम्बध्यते कर्मणा पापकेन धर्माधर्मलक्षणेन, उभयमपि पापकमेव विदुषः। | उस पदको जाननेसे क्या होगा, सो बतलाया जाता हे—उस महिमाको जानकर पुरुष पाप—धर्माधर्मरूप कर्मसे लिप्त—सम्बद्ध नहीं होता। ज्ञानीके लिये तो [पाप-पुण्य] दोनों पापके तुल्य ही हैं। |
| यस्मादेवमकर्मसम्बन्धी एष ब्राह्मणस्य महिमा नेति नेत्यादिलक्षणः, तस्माद् एवंवित् शान्तः—बाह्येन्द्रियव्यापारत उपशान्तः, तथा दान्तः—अन्तःकरणतृष्णातो निवृत्तः, उपरतः सर्वैषणाविनि- | क्योंकि इस प्रकार यह 'नेति नेति' इत्यादि लक्षणवाली ब्राह्मणकी महिमा कर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली नहीं है, इसलिये इस प्रकार जाननेवाला शान्त—बाह्य-इन्द्रिय-व्यापारसे उपशान्त, दान्त—अन्तःकरणकी तृष्णासे निवृत्त, उपरत—सम्पूर्ण |
११२० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
११२० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
| मुक्तः संन्यासी, तितिक्षुर्द्वन्द्वसहिष्णुः, समाहितः—इन्द्रियान्तःकरणचलनरूपाद् व्यावृत्य ऐकाग्र्यरूपेण समाहितो भूत्वा; तदेतदुक्तं पुरस्तात्—"बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्य" इति; आत्मन्येव स्वे कार्यकारणसंघाते आत्मानं प्रत्यक्चेतयितारं पश्यति । | एषणाओंसे सर्वथा निवृत्त संन्यासी, तितिक्षु-द्वन्द्व ( सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी आदि ) सहन करनेवाला और समाहित—इन्द्रिय और अन्तःकरणके चलन्यरूपसे व्यावृत होकर ऐकाग्र्यरूपसे समाहित हो—यही बात पहले "बाल्य और पाण्डित्यको पूर्णतया जानकर" इस वाक्यद्वारा कही गयी है – आत्मामें अर्थात् देहेन्द्रियसंघातरूप अपनेमें अन्तर्वर्ती चेतन आत्माको देखता है । |
| तत्र किं तावन्मात्रं परिच्छिन्नम् ? नेत्युच्यते—सर्वं समस्तमात्मानमेव पश्यति, नान्यद् आत्मव्यतिरिक्तं वालाग्रमात्रमप्यस्तीत्येवं पश्यति; मननान्मुनिर्भवति जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ताख्यं स्थानत्रयं हित्वा । | तो क्या उस शरीरमें वह उतने ही परिमाणवाले परिच्छिन्न आत्माको देखता है ? इसपर कहा जाता है 'नहीं,' वह सबको आत्मा ही देखता है । आत्माके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु बालके अग्रभागके बराबर भी नहीं है—इस प्रकार वह देखता है । वह जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति संज्ञक तीनों अवस्थाओंको छोड़कर मनन करनेके कारण मुनि हो जाता है । |
| एवं पश्यन्तं ब्राह्मणं नैनं पाप्मा पुण्यपापलक्षणस्तरति, न प्राप्नोति; अयं तु ब्रह्मवित् सर्वं पाप्मानं तरति—आत्मभावेनैव व्याप्नोति, अतिक्रामति । नैनं पाप्मा कृताकृतलक्षणस्तपति । | इस प्रकार देखनेवाले इस ब्राह्मणको पुण्य-पापरूपी दोष नहीं तरता--नहीं प्राप्त होता । किंतु यह ब्रह्मवेत्ता तो सम्पूर्ण पापको तर जाता है--उसे आत्मभावसे ही व्याप्त--आक्रान्त कर लेता है। इसे कृताकृतरूप पाप |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| इष्टफलप्रत्यवायोत्पादनाभ्याम्; सर्वं पाप्मानमयं तपति ब्रह्मवित् सर्वात्मदर्शनवह्निना भस्मीकरोति । | इष्टफलप्रदान और प्रत्यवायोत्पादनके द्वारा ताप नहीं पहुँचाता और यह ब्रह्मवित् सम्पूर्ण पापको तप्त करता यानी सर्वात्मदर्शनरूप अग्निसे भस्म कर देता है । |
| स एष एवंविद् विपापो विगतधर्माधर्मः, विरजो विगतरजः, रजः कामः, विगतकामः, अविचिकित्सः—छिन्नसंशयः, अहमस्मि सर्वात्मा परं ब्रह्मेति निश्चितमतिः, ब्राह्मणो भवति । | वह यह इस प्रकार जाननेवाला विपाप—धर्माधर्महीन, विरज—विगतरज, 'रज' कामको कहते हैं, अतः निष्काम, अविचिकित्स—संशयहीन और 'मैं सर्वात्मा परब्रह्म हूँ' इस प्रकार जिसका निश्चय है वह ब्राह्मण हो जाता है । |
| अयं त्वेवंभूत एतस्यामवस्थायां मुख्यो ब्राह्मणः, प्रागेतस्माद् ब्रह्मस्वरूपावस्थानाद् गौणमस्य ब्राह्मण्यम् । एष ब्रह्मलोकः—ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोको मुख्यो निरुपचरितः सर्वात्मभावलक्षणः, हे सम्राट् ! एनं ब्रह्मलोकं परिप्रापितोऽसि अभयं नेति नेत्यादिलक्षणम्—इति होवाच याज्ञवल्क्यः । | इस अवस्था में ऐसी स्थितिको प्राप्त हुआ यह ब्रह्मवेत्ता ही मुख्य ब्राह्मण है। इस ब्रह्मस्वरूपमें स्थिति होनेसे पूर्व तो इसका ब्राह्मणत्व गौण ही है [मुख्य नहीं]। यह ब्रह्मलोक है—ब्रह्म ही लोक है अर्थात् मुख्य (प्रधान) एवं उपचाररहित सर्वात्मभावरूप ब्रह्मलोक यही है। हे सम्राट् ! इस 'नेति नेति' इत्यादिरूपसे लक्षित अभय ब्रह्मलोकको तुम्हें पहुँचा दिया—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । |
| एवं ब्रह्मभूतो जनको याज्ञवल्क्येन ब्रह्मभावमापादितः प्रत्याह—सोऽहं त्वया ब्रह्मभाव- | इस प्रकार याज्ञवल्क्यद्वारा ब्रह्मभावको प्राप्त कराये हुए ब्रह्मभूत जनकने उत्तर दिया, आपके द्वारा |
बृ० उ० ७१—
११२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
११२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
| मापादितः सन् भगवते तुभ्यं विदेहान् देशान् मम राज्यं समस्तं ददामि, मां च सह विदेहँर्दास्याय दासकर्मणे—ददामीति चशब्दात् सम्बध्यते ।<br><br>परिसमापिता ब्रह्मविद्या सह संन्यासेन साङ्गा सेतिकर्त्तव्यताका; परिसमाप्तः परमपुरुषार्थः, एतावत् पुरुषेण कर्त्तव्यम्, एषा निष्ठा, एषा परा गतिः, एतन्निःश्रेयसम्, एतत् प्राप्य कृतकृत्यो ब्राह्मणो भवति, एतत् सर्व्वेदानुशासनमिति ॥ २३ ॥ | ब्रह्मभावको प्राप्त कराया हुआ मैं आप श्रीमान्को विदेहदेश अर्थात् अपना सारा राज्य देता हूँ तथा विदेहदेशके साथ अपने-आपको भी दास्य—दासकर्मके लिये देता हूँ—इस प्रकार 'च' शब्दसे 'ददामि' (देता हूँ) इस क्रियाका सम्बन्ध लगाया जाता है ।<br><br>संन्यास, अङ्ग और इतिकर्त्तव्यताके सहित ब्रह्मविद्याकी सर्वथा समाप्ति हो गयी। परम पुरुषार्थका पर्यवसान हो गया। पुरुषको इतना ही कर्त्तव्य है, यही निष्ठा है, यही परा गति है और यही निःश्रेयस है। इसे पाकर ब्राह्मण कृतकृत्य हो जाता है और यही सम्पूर्ण वेदका अनुशासन है ॥ २३ ॥ |
आत्मा अन्नाद और वसुदान है—इस प्रकारकी उपासनाका फल
| योऽयं जनकयाज्ञवल्क्याख्यायिकायां व्याख्यात आत्मा— | इस जनक-याज्ञवल्क्य-आख्यायिकामें जिस आत्माकी व्याख्या की गयी है— |
स वा एष महानज आत्मान्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद ॥ २४ ॥
वह यह महान् अजन्मा आत्मा अन्न भक्षण करनेवाला और कर्मफल देनेवाला है। जो ऐसा जानता है, उसे सम्पूर्ण कर्मोंका फल प्राप्त होता है ॥ २४ ॥
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२३
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२३
| स वै एष महान् अज आत्मा अन्नादः सर्वभूतस्थः सर्वान्नानामत्ता, वसुदानः—वसु धनं सर्वप्राणिकर्मफलम्, तस्य दाता, प्राणिनां यथाकर्म फलेन योजयितेत्यर्थः; तमेतमजमन्नादं वसुदानमात्मानमन्नादवसुदानगुणाभ्यां युक्तं यो वेद, स सर्वभूतेष्वात्मभूतः—अन्नमत्ति, विन्दते च वसु सर्वं कर्मफलजातं लभते सर्वात्मत्वादेव, य एवं यथोक्तं वेद । | वह यह महान् अजन्मा आत्मा अन्नाद—सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित रहकर समस्त अन्नोंका भोक्ता, वसुदान—वसु—धन अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियोंका कर्मफल उसे देनेवाला है; अर्थात् प्राणियोंको उनके कर्मानुसार फलसे संयुक्त करनेवाला है। उस इस अजन्मा, अन्नाद और वसुदान आत्माको जो अन्नाद और वसुदान गुणोंसे युक्त जानता है, वह समस्त भूतोंमें आत्मभूत हुआ अन्न भक्षण करता है; तथा जो ऐसा अर्थात् उपर्युक्त विषयको जानता है, वह सर्वात्मा होनेके कारण ही वसु यानी सम्पूर्ण कर्मोंका फल प्राप्त करता है। |
| अथवा दृष्टफलार्थिभिरप्येवंगुण उपास्यः; तेन अन्नादो वसोश्च लब्धा, दृष्टेनैव फलेन अन्नात्तृत्वेन गोऽश्वादिना चास्य योगो भवतीत्यर्थः ॥ २४ ॥ | अथवा जिन्हें [अन्न और धनरूप] दृष्टफलकी इच्छा है, उनको भी ऐसे गुणोंवाले ब्रह्मकी उपासना करनी चाहिये। इससे वह अन्नाद और धन प्राप्त करनेवाला होता है, अर्थात् प्रत्यक्ष प्राप्त होनेवाले ही अन्नादत्व और गौ, घोड़े आदि फलसे उसका योग होता है ॥ २४ ॥ |
ब्रह्मके स्वरूप और ब्रह्मज्ञकी स्थितिका वर्णन
| इदानीं समस्तस्यैवारण्यकस्य योऽर्थ उक्तः, स समुच्चित्य अस्यां कण्डिकायां निर्दिश्यते, एतावान् समस्तारण्यकार्थ इति— | अब इस सारे ही आरण्यकमें जो बात कही गयी है, वह संगृहीत करके इस कण्डिकामें बतलायी जाती है कि सारे आरण्यकका इतना ही तात्पर्य है— |
११२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ११२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयँ हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद ॥ २५ ॥
वही यह महान् अजन्मा आत्मा अजर, अमर, अमृत एवं अभय ब्रह्म है। अभय ही ब्रह्म है, जो ऐसा जानता है वह अभय ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २५ ॥
| स वा एष महानज आत्मा अजरो न जीर्यत इति, न विपरिणमत इत्यर्थः, अमरः—यस्माच्च अजरः, तस्माद् अमरः, न म्रियत इत्यमरः; यो हि जायते जीर्यते च, स विनश्यति म्रियते वा; अयं तु अजत्वाद् अजरत्वाच्च अविनाशी यतः, अत एव अमृतः। यस्माद् जनिप्रभृतिभिस्त्रिभिर्भावविकारैर्वर्जितः तस्माद् इतरैरपि भावविकारैस्त्रिभिस्तत्कृतैश्च कामकर्ममोहादिभिर्मृत्युरूपैर्वर्जित इत्येतत् । <br><br> अभयोऽत एव; यस्माच्चैवं पूर्वोक्तविशेषणः, तस्माद् भयवर्जितः, भयं च हि नाम अविद्याकार्यम्, तत्कार्यप्रतिषेधेन भावविकारप्रतिषेधेन चाविद्यायाः प्रतिषेधः सिद्धो वेदितव्यः। अभय आत्मा | वही यह महान् अजन्मा आत्मा जीर्ण नहीं होता, इसलिये अजर है अर्थात् इसका विपरिणाम नहीं होता। 'अमरः'—क्योंकि अजर है, इसलिये अमर है, जो नहीं मरता उसे अमर कहते हैं। जो उत्पन्न होता अथवा जीर्ण होता है, वही विनष्ट होता अथवा मरता है। चूँकि यह अज और अजर होनेके कारण अविनाशी है, इसीलिये अमृत है। क्योंकि यह जन्मादि तीन भावविकारोंसे रहित है, इसलिये अन्य तीन भावविकारोंसे तथा उनसे होनेवाले मृत्युरूप काम, कर्म और मोहादिसे भी रहित है—ऐसा इसका तात्पर्य है। <br><br> इसीसे यह अभय भी है। इस प्रकार चूँकि यह पूर्वोक्त विशेषणोंवाला है, इसलिये भयशून्य है; भय तो अविद्याका ही कार्य है, अविद्याके कार्य और भावविकारोंके प्रतिषेधसे अविद्याका प्रतिषेध भी सिद्ध हुआ समझना चाहिये। इस |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११२५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११२५
| एवंगुणविशिष्टः किमसो ? ब्रह्म परिवृढं निरतिशयं महदित्यर्थः । अभयं वै ब्रह्म, प्रसिद्धमेतद् लोके—अभयं ब्रह्मेति । तस्माद्युक्तमेवंगुणविशिष्ट आत्मा ब्रह्मेति । | प्रकारके गुणोंसे युक्त यह अभय आत्मा क्या है ? ब्रह्म—सब ओरसे बढ़ा हुआ अर्थात् निरतिशय महान् । ब्रह्म अभय ही है; लोकमें यह बात प्रसिद्ध है कि ब्रह्म अभय है, इसलिये ऐसे गुणोंवाला आत्मा ब्रह्म है—यह कहना उचित ही है । | | य एवं यथोक्तमात्मानमभयं ब्रह्म वेद, सोऽभयं हि वै ब्रह्म भवति । एष सर्वस्या उपनिषदः संक्षिप्तोऽर्थ उक्तः । एतस्यैवार्थस्य सम्यक् प्रबोधाय उत्पत्तिस्थितिप्रलयादिकल्पना क्रियाकारकफलाध्यारोपणा चात्मनि कृता, तदपोहेन च नेति नेतीत्यध्यारोपितविशेषापनयद्वारेण पुनस्तत्त्वमावेदितम् । | जो इस प्रकार उपर्युक्त आत्मारूप अभय ब्रह्मको जानता है, वह निश्चय अभय ब्रह्म ही हो जाता है । यह समस्त उपनिषद्का संक्षिप्त अर्थ कहा गया । इसी अर्थका अच्छी तरह ज्ञान करानेके लिये आत्मामें उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयादिकी कल्पना तथा क्रिया, कारक और फलका अध्यारोप किये गये हैं । तथा उसके अपोहनके द्वारा अर्थात् 'नेति-नेति' इत्यादि रूपसे अध्यारोपित विशेषकी निवृत्तिद्वारा पुनः तत्त्वका ज्ञान कराया गया है । | | यथैकप्रभृत्यापरार्धसंख्यास्वरूपपरिज्ञानाय रेखाध्यारोपणं कृत्वा एकेयं रेखा, दशेयम्, शतेयम्, सहस्रेयम्—इति ग्राह- | जिस प्रकार एकसे लेकर परार्धतककी संख्याके स्वरूपका परिज्ञान करानेके लिये रेखाओंका अध्यारोप करके [ अर्थात् अनेकों रेखाएँ खींचकर ] यह ( पहली ) रेखा एक है, यह ( दूसरी ) रेखा दश है, यह ( तीसरी ) सौ है, यह ( चौथी ) सहस्र है—इस प्रकार ग्रहण कराते हैं |