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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

परवाली शैलानी, ऐङ्गलर फिश

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पश्चिमकी पुस्तकें ।

मूसाकी पुस्तक — खून मत करो । तौरीतकी आज्ञा है कि, खून मत करो ।
समीक्षा — अब विचार करना चाहिये, जिसमें खून हो उसका खून न करना यदि ऐसी आज्ञा मिली तो इससे साबित हुआ कि खूनवालेके अतिरिक्त जिसमें कि, खून नहीं है उन्हें प्रयोगमें ला सकते हो जैसे साग, पात, फल फूल इत्यादि इससे उसके खानेकी आज्ञा साबित होती है रक्तवाले जितने जीवधारी हैं सब परस्परमें भाई हैं जो रक्तवाले नहीं हैं उनके बारेमें कोई ऐसा नहीं कहता कि, इनका खून मत करो क्योंकि, उनकी उत्पत्ति वीर्यसे नहीं, न उनमें लोहही है, उनकी उत्पत्ति मिट्टी और पानीसे है । इसीलिये वे सब मनुष्यके भक्ष्य हैं पर जो रक्तवाले हैं वे चाहे कहींसे हुए हों मनुष्यको न तो मारने चाहिये न खानेही चाहिये ।

मूसाके धर्मका नियम तो यही हुआ था कि, “खून मत करो” फिर कुर्बानीका प्रचारक उसे नहीं माना जा सकता ।

कुर्बानीके प्रचारक ।

सोखतनी कुर्बानी, खताकी कुर्बानी और इन्सानकी कुर्बानी करनेको किसने कहा । नूहने सोखतनी कुर्बानीकी पीछे दूसरोंने इब्राहीमको इन्सानकी कुर्बानी मनुष्यको बधकी आज्ञा हुई पर दया करके क्षमा कर दिया । इनका खुदा सर्वदास कुर्बानियोंका आदी है । पहिले कहता है कि खून मत करो, पीछे धोखा देकर कुर्बानी कराता है । इसके कपट जालसे हंस कबीरके सिवा दूसरा कोई नहीं बच सकता । प्रलयके पीछे नूह पृथिवीपर उतरा उसने पशुओंको जलाकर सोखतनी कुर्बानी की उसके सृष्टनेके वास्ते खुदा आसमानसे उतरा जलते हुये पशुओंकी सुगन्धी (दुर्गन्धि) को सृष्टकर खुश हुआ नूहको बरकत दी ।

समीक्षा — विचारवान् न्यायी लोग विचार करें कि, जब हाड, चाम, मांस, लोह जलता है तो सुगन्धी आती है अथवा दुर्गन्धी आती है । उसमें तो इतनी दुर्गन्धी आती है कि, उसको मनुष्य किसी प्रकार सहन नहीं कर सकता । ऐसी घृणित दुर्गन्धीको सुगन्धी जानकर सृष्टता एवं उससे प्रसन्न होता है, उस खुदासे ईश्वर रक्षा करे यह तो राक्षसोंके भी बाबा निकले । जिस धोखेमें इक्के दुक्के भारतवासी पड़े हैं उसी धोखेमें पश्चिम देशवाले भी पड़े हुए हैं । इसपर किसीने विचार किया है कि, हमारे धर्मकी जड़ अहिंसा है । हिंसा कभी भी धर्म नहीं हो सकता ।

खुदाने आदमको अपने रूपमें बनाया । तौरीतमें पेंदाइशकी किताबका

धोखेसे बचानेवाली

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पहिला बाब (२७-२८) आयत तक देखो फिर कुरान मजीदकी गवाही देख लो कि, जानना चाहिये कि, खुदा जागृत है इसलिये मनुष्यके लिये भी जागृत (विवेकी) होना चाहिये। जो जागृत नहीं वह मनुष्य ही नहीं, जागृतके लिये बनाया गया यदि स्वप्नका काम करे तो वह कैसे मनुष्य कहा जा सकता है। अविवेकतासे उसको वह प्रकाश कदापि नहीं मिल सकता, जिसके द्वारा उत्कण्ठ पद प्राप्त हो सकता है।

दूसरी पुस्तक जबूर।

दाऊदका जबूर सरदार मुगनीके लिये ४ बाबकी ६ आयतमें देखो। जबीहा और हदीयाको तू नहीं चाहता, तूने मेरी खोलें चढ़ा दी तू खतीबका तालिब नहीं।

आसिफका जबूर ५० बाब, १३-से १५ आयत तक देखो - खुदा कहता है कि, क्या मैं बैलोंका मांस खाता हूँ? या बकरीका लोहू पीता हूँ? तू धन्यवादका बलिदान कर उसीको परमात्माके आगे भेंट चढ़ा।

आशिफकी जम्बूरका ५० वां बाब २३ आयतमें लिखा है कि, जो कोई धन्यवादका बलिदान चढ़ता है, मेरा प्रकाश प्रकट करता है उसको जो अपनी बोल चाल दुरस्त रखता है उसे खुदाकी निजात दिखलाऊंगा।

दाऊदका जबूर सरदार मुगनीके लिये ५१ बाब-१५ से १६ आयत तक लिखा है कि, ऐ खुदाबन्द! तू मेरी लबोंको खोल दे तो मेरा मुंह धन्यवाद करेगा। कहेगा कि, तू जीवहत्याके बलिदानसे खुश नहीं। नहीं तो मैं तेरी खुशनुदी देता नहीं! खुदाका बलिदान टूटा हुआ मन है। टूटा हुआ मन; ऐ खुदा! तू तुच्छ न जानेगा।

दाऊद गीत १०४ - तेरे कामका फल जो है उससे पृथ्वी आसूदः यानी (भरी हुई है)। चारपायोंके लिये घास और मनुष्योंके लिये शीक है।

दाऊद गीत मजमूर (५१) ऐ खुदा! तू खूनसे मुझे बचा ले मेरी सलामतीके लिये मेरी जबान तेरे रहमकी धन्यवाद करेगी। कुर्बानीसे तू राजी नहीं, न तो वह चढ़ाऊँ। कुर्बानीसे मालिक जरा भी खुश नहीं है।

दाऊद गीत मजमूर-४० देख। जबह और कुर्बानीसे तू रजामन्द नहीं था, एक जिस्म (शरीर) पाकको तूहीने मेरे वास्ते रखवा था, जब बशरसे कुर्बानी नहीं चाही बिलकुल।

जो कुछ मैंने पिछले प्रमाणमें लिखा, वही बात मूसाकी शरीअत और तौरतकी हुई, पैमाइशके १ बाब २९ से ४० आयत तक खुदाने कहा कि, प्रत्येक

पशु पक्षीके रूपमें ऋषिगण पशु पक्षी आदिका भजन

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बीज और नवातात जो तमाम जमीनपर है हर एक दरख्तको जिसमें बीजदार फल है देता हूँ । यह तुम्हारे खानेके लिये होगा (६००) जमीनके सब चरनेवाले और आकाशके उड़नेवाले पक्षियोंको जो कि, पृथिवीपर रहते हैं जिनमें जिन्दगी का दम है, सबजी उनके खानेके लिये सब तरहकी देता हूँ और ऐसाही होगा ।

एसियाह नबीकी किताबका ६६ बाब १०५ आयत तक-खुदावन्द फरमाता है कि, आसमान मेरा तख्त है जमीन मेरे पांवकी चौकी है, वह घर कहाँ है जो मेरे वास्ते बनाते हो मेरा आरामगाह कहाँ हैं, ये सब चीजें तो मेरे हाथने बनाई यह सब मौजूद हैं ।

खुदावन्द कहता है लेकिन मैं उस मनुष्यपर निगाह कलूंगा जो गरीब और टूटा दिल है, जो मेरे वचनसे काँप जाता है । वह जो एक बैल जबह करता है, उसके समान है जिसने एक आदमीको मार डाला वह जो बकरा कुरबानी करता है, उसके समान है, जिसने एक कुत्तेका शिर काटा । जो बलिदान चढ़ाता है वह उसके समान है जिसने शूकरका लोह चढ़ाया हो । लोबानका जलानेवाला उसके समान है जिसने एक पत्थरकी मूर्तिको मुबारक कहा है । हां ! उन्होंने अपनी राहें पसन्द कीं ।

अमूस नबीका ६ बाब ३ आयतमें लिखा है । अफसोस है उन लोगोंपर अपनेसे जो बुरा दिन दूर किया चाहते हैं, अपने पास जुल्मकी चौकीको खींचते हैं । वे जो हाथीदांतके पलंगपर लेटते हैं, अपनी अपनी चारपाइयोंपर फँल २ के सोते हैं गल्लेके थानमेंसे बछरों और बकरोंको निकाल निकाल कर खाते हैं रब्बाब आवाजके साथ गाते हैं, दाऊदकी तरह अपने अपने बजानेके लिये नये नये बाजे ईजाद करते हैं, प्यालोंमेंसे शराब पीते हैं, अपने बदनपर खालिस अतर मलते हैं, लेकिन युसफके शिकस्ता हालीके लिये शोक नहीं करते ।

इंजीलका कथन-मतीकी इञ्जीलका २२ बाब ७ आयतमें लिखा है कि मैं कुरबानी नहीं चाहता, बल्कि रहम चाहता हूँ ।

पोलूसके पहले खत, रोमियोंके १४ बाब २१ आयतमें लिखा है, कि, खानेके सबबसे खुदाके कामको मत बिगाड़ । सब कुछ तो पाक है, पर उस आदमीके लिये जो ठोकरके साथ खाता है बुरा है । गोस्त न खाना और न शराब पीना, ऐसा कुछ न करना जिससे तेरा भाई धक्का खाय, यही तेरे लिये बेहतर है

कुरान और हदीस - कुरान सिपारे पहला सूर फातेहा - (बिसमिल्लाहीं-रंहामानिरंहीम) ।

यही सारे ईमान मोहमदीकी जड़ है । इसका अर्थ है कि-मैं शुरू करता हूँ अल्लाहके नामसे वह अल्लाह कैसा है कि, दयालू है (रहीम) और रहमान है ।

चीटियोंका भजन, मूसा और पक्षी बकरी, तोता, भेड़, बैल, चील्ह कलगीदार छोटी चिड़िया

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समीक्षा — कृपालू जो खुदा रहीम है रहमान है, उस खुदाका हुकम जबह एवं कत्ल करनेका हरगिज नहीं हो सकता, नहीं तो रहीम और रहमान नह हो सकता. यह किसीको खबर नहीं कि, रहीम और रहमानके कौनसे गुण होते हैं वह खुदा कौन है। कत्ल (रक्तपात) करानेवाला खुदा कौन है। किसी जीवधारीके गलेपर छूरी चलाना ईमान और बुद्धिके विरुद्ध है। यह मानुषिक बुद्धिसे तो एक-दमही उलटा है। छूरी चलानेके समय, विसमिल्लाह जब्बारुल जब्बारही कहारुल कहार, कहना उचित है। क्योंकि, विसमिल्लाह हिरहेमानिरहीमकी यह जगह नहीं है। जिस समय हाथमें छूरी ली उसी समय रहीमुरहीमोंकी सिफत जाती रही। जिसके ऊपर विसमिल्लाह रहीमुरहीमोंके साथ कल्मा न पढ़ा जायगा तो वह बिलकुल हराम हो जायगा। जो कोई रहीमका नाम लेकर छूरी चलावेगा उसपर अलबत्त ईश्वरका कोप होगा, वह ईश्वरकी कृपाका पात्र कभी न होगा। जो कोई इस विसमिल्लाहके अर्थके ऊपर विचार न करेगा, चाहे कुरान हबीस फिकका आदि सब कुछ पढ़े पर सब निरर्थक है, अगर रहीमके नामसे जबह हुई तो भी हराम हुई। रहीमको छोड़कर दूसरा कुछ कहा तो भी हराम हुई, बस इससे साबित हुआ कि, जिसने मांस खाया हराम खाया वो मुसलमान नहीं है।

कत्ल पर गैरके यह विसमिल्लाह। होवे हरगिज न तुझपर रहम अल्लाह।
बाशरअ और तिहारतो तकवा। सब अबस होवे अन्दरू स्याह ॥

११४ सूरते कुरानमें हैं सब सूरतोंके माथेपर यही है दूसरा कुछ नहीं। जिस सूरतमें जबह और कत्लका हुकम उत्तरा वह हुकम रहीम और रहमान अल्लाह के तरफसे कभी नहीं माना जा सकता. क्योंकि, रहीम यानी दयालू हत्यापर कभी भी प्रसन्न नहीं हो सकता, इससे यह सिद्ध हुआ कि, रहीम और रहमान अल्लाह दूसरा है जब्बार (अत्याचारी) खुदा दूसरा है, जिसके तरफसे अत्याचार है प्रत्येक सूरतके माथेके ऊपर यही है। ऊपर रहीम रहमान रखकर नीचे अत्याचार की आज्ञा देना धोखा नहीं तो और क्या हो सकता है।

कुरान सूरे हज-३७ सिपारा ४ स्कूअ ३७ आयतमें लिखा है अल्लाहको नहीं पहुँचेगा, उसका गोस्त या लौह, लेकिन उसको पहुँचता है तुम्हारे दिलको अधीनता, इसी तरह उनको दिया मैं तुम्हें कि अल्लाहकी बड़ाई पढ़ो, इस पर कि, तुमको राह समझावे और खुशी सुनानेवालेको।

कुरान सूरेबकर २१ सिपारा स्कूअ ६९ आयत लोगो खाओ जमीनकी चीजों में से जो हलाल और सुथरी है न चलो कदमों शैतानके कि, वह तुम्हारा पक्का शत्रु है।

भजनानन्दी बछड़ा, समय

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जमीनकी चीजोंमेंसे यहाँ आशय है साग, पात, अनाज, फल, फूल आदि। क्योंकि, पृथिवीमेंसे यही उगते हैं, जीवधारी नहीं उगते, पृथिवीको ही सुथरी और हलाल चीजें हैं दूसरी कोई नहीं है, यही मनुष्यका यथार्थ भी क्षण है ।

गुलजार आदममें लिखा है कि, हजरत आदमने खुदाके हुक्मको न माना, अपने आपको नंगा देख लज्जावान् हुये । वृक्षोंसे पत्ता मांगने लगे कि, मैं अपना परदा करूँ, स्वयं किसी वृक्षका पत्ता तोड़ा। जब स्वयं इंजीरके वृक्षके अपनी खुशीसे पत्ता दिया, तो उसके पत्तासे अपना परदा ढका । यह वही बात है कि, मुहम्मद साहबको वृक्ष दीवार और पत्थर आदि सब सलाम करते थे, उसको मुहम्मद साहबके सिवा दूसरा कोई भी मालूम न कर सका । जो कोई जैसा भला तथा किसी को दुख देनेकी इच्छा न रखता होगा, वही वृक्षोंकी बातचीत और आशयको समझ लेगा । दयालु ऐसे आदमकी सन्तान मुसलमान ऐसे अत्याचारी हो कि, जीवित जीवधारियोंको बलसे पकड़कर काटते हुए कहें कि, हजरत आदम मुसलमान थे तो क्या ? वे भी ऐसेही थे जैसे कि, अब हैं । वास्तविक बात तो यह है कि, ये लोग मुसलमानके अर्थ न समझते होंगे जिससे झूठा दावा करते होंगे ।

सिंहाका न्याय — हदीसोंसे प्रगट है कि, कयामतके दिन खुदा सबका न्याय करेगा, मनुष्यके अतिरिक्त दूसरे जीवधारियोंका भी हिसाब होगा, जो हिंसक पशु सींग और नखोंसे दूसरोंको कष्ट पहुँचाते हैं, उनको दण्ड मिलेगा, वे भी अपने २ पापके फलोंको भोगेंगे । सब अत्याचारी जीवधारी नरकमें डाले जावेंगे, शुभकर्मों पापरहित जीव स्वर्गको जावेंगे । जड़ जीवोंका भी हिसाब होगा, जैसे फलदार वृक्ष भले और काँटेवाले दुख पहुँचानेवाले वृक्ष क्रमशः स्वर्ग और नर्कको जावेंगे । जो हिंसक जीवधारी पशु कहलाते हैं तथा स्वप्नकी दशामें हैं। वे भी रक्तपातके कारण दोजखमें जावेंगे तो फिर जाग्रत और विवेकके लिये ही बनाया गया, मनुष्य जो कि, अपने कर्मोंका हिसाब देनेवाला है, वह पाप और अत्याचार से किस प्रकार छूट सकता है । उसे अपने कर्म अवश्य ही भोगने पड़ेंगे ।

गोहत्याका निषेध — महम्मद साहबने कहा है कि, चारकी सद्गति कभी न होगी । १—जाबिहुल बकर यानी गोहत्या करनेवाला, २—दायमुल खुमर यानी शराबका पीनेवाला, ३—बायेउल बशर यानी मनुष्य बेचनेवाला, ४—कातिउल शिजर यानी वृक्षका काटनेवाला गाय मारनेवाले क्रस्साई वगैरः नशा खानेवाले आदमी बेचनेवाले और वृक्षके काटनेवाले ये सब दोजकके जीव हैं ।

समीक्षा — मुसलमान कहते हैं कि, हमको कुरबानीका हुक्म है, यह उनको

सांप, शिवका, जपी, चिनगीबटेर बोलियोकै अर्थ स्यावर और जंगमोंकी एकता

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किस प्रकारसे साबित हुआ कि, खुदा कुरबानीसे राजी है। कुरबानीके लिये कोई आयत उत्तरी ? आकाशवाणी हुई ? अथवा कोई फिरिश्ता प्रगट हुआ ? या स्वप्न देखा ? कि, यह उसी खुदाकी तरफसे है। या और ही कोई है कुरान ५० सूरात रकूअमें लिखा है कि, हम बहुत नजदीक हैं तरफ उसके (इनसानके शहरगसे)।

जो खुदा व्यापक और शहरगसे नजदीक हो फिर उसखुदाका बचन भी शहरगसे निकट होना चाहिये, न कि, खुदा तो मेरे पास हो उसका कलाम फिरिश्तों के द्वारा आकाशसे आवे। इन सब बातोंसे साबित होता है कि, खुदाको न पहचान करकेही नबियोंने जबह और क़त्लकी आज्ञा दी है। ऐसी आज्ञाएं उसकी ओरसे नहीं हैं।

हजका यम - महम्मदी लोग हजको जाते हैं मक्काके निकट पहुंचते हैं, किसी वृक्षका पत्ता नहीं तोड़ते, घास नहीं उखाड़ते किसी जीवधारीको किसी प्रकारका भी दुःख नहीं देते, वरन् जूँ भी नहीं मारते। जो कोई इसके विरुद्ध कुछ करता है तो उसका हज पूरा हुआ नहीं समझते। इन बातोंसे जाना जाता है कि, मुसलमानोंका खुदा व्यापक और सर्व दृष्टा नहीं है, इसीलिये केवल मक्कामेंही उसके नियमोंका पालन होता है। यदि व्यापक है तो वही नियम सब जगह होने चाहिये, यदि खुदा केवल मक्कामें ही है तो सब जगह निमाज पढ़ना और रोजा रखना व्यर्थ है। इस कारण यह स्वीकार करना पड़ेगा कि, हजके नियमोंका सर्वत्र पालन होना चाहिये।

अनुचितका विधाता - इब्राहीम और मूसा आदिकका खुदा प्रगटही खाता पीता था, पर मुहम्मदका खुदा जो बेचून और बेचारा है, छिपाकर खाता था परदेसे बातचीत भी करता था। यह सर्वदासे सभी नबियोंको भिन्न २ कानून और बातें बतलाकर छल कपटसे लड़ाता आता है। किसीको शराब पीना सिखलाया, तो किसीको मांस खाना बतलाया, किसीको जना (व्यभिचार) करनेकी आज्ञा दी, किसीको उत्तम खानेको भी मना कर दिया। किसीको जीवहत्या करने की आज्ञा देता है। खरकईल नबीको विष्ठाकी पकी रोटी खिलाता है। यह बात खरकईल नबीकी किताबका बाब - १२ आयत-ईसाके शिष्य पितरसको डोंगर ढोर. कीड़े, मकोड़े आदि खानेकी आज्ञा दी। देखो रसूलोंका अमाल- ११ बाब ५१३ आयत-इसियाह नबीको जनाकार (व्यभिचारिणी) औरतसे मित्रता रखनेकी और व्यभिचारकी लड़कीसे विवाह करनेका आदेश दिया।

समीक्षा - इन नबियोंमेंसे किसीसे दरियापत किया जावे कि, आप कभी

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कुछ कभी कुछ कानून प्रचलित करते हो, इसका क्या कारण है ? यथार्थमें इन नब्रियोंमेंसे किसीने भी खुदाको न जाना क्या ? भला जो खुदाको पहचाने वो ढोंगर, ढोर, कीड़े, मकोड़े इत्यादि तथा गृहकी पकी रोटी खावे ? पृश्चली स्त्रीसे मित्रता रखे ? उनकी पुत्रीसे विवाह करे ? किसीको जबह करने और कत्ल करनेकी आज्ञा दे ? कदापि नहीं । ईश्वर शुद्ध है उसका जाननेवाला भी शुद्ध होता है उसके कर्म भी शुद्ध और उज्ज्वल होते हैं ।

समता - मनुष्य और पशुओंका मांस एक समान है, जिसने एकका खाया उसने सबका खा लिया, देखो तौरीतमें इस तसनाका १२-बाब २०-से-२३ आयत तक लिखा है कि, खानेमें पाक और नापाक जानवर बराबर हैं यही बात इज्जीलमें रसूलोंके आमालमें इसी बाबमें लिखी है कि, जो कोई खाता है उसके लिये सब जीवधारी मनुष्यके मांसके समान है ।

कबीर साहब - जस मांस नर की, तस मांस पशुकी, मांस मांस एक सारा हो ।

सात्विक भोजन - जो ऋषीश्वर लोग जङ्गलमें रहते हैं वे साग, पात, कन्द, मूल, फल आदिक खाकर जीते हैं। उन्हींका अन्तःकरण शुद्ध तथा हृदय प्रकाशमय और कान्ति तेज युक्त होती है । उन्हींको सब प्रकारकी सामर्थ्य मिलती है, तपस्या, भजन और संयम सब प्रकारकी शक्तिको प्रदान करता है । दानियल नबीकी किताब २ बाब-८२१ आयत तक देखो-दानियल नबी केवल फलियां खाकर दिन बिताता था, उसने कभी भी बादशाही भोजन स्वीकार नहीं किया, तिसपर भी उसका चेहरा बादशाही खाना खानेवालोंसे अधिक प्रकाशमान रहता था । नियुकद नजर बादशाहके सन्मुख परीक्षाके समय उसीको अधिक प्रतिष्ठा मिली । नबीसे बहुतसे आश्चर्यमय कौनक प्रगट हुये ।

धारणा - मांसाहारियोंके मनमें यह बात समाई हुई है कि, मांस खानेसे बल कान्ती बढ़ती है दानियल नबीकी उपरोक्त बातोंका विचार करें जाने कि, उनका कहना सब झूठ है ।

श्रेणियाँ और भोजन -- प्रथम श्रेणीमें पुण्य स्वरूप देवते हैं, उनको परमात्माने अमृत और कल्पवृक्ष प्रदान किया है । दूसरी श्रेणीमें मनुष्य हैं जिनको ईश्वरने अनाज फल शाक पात आदिक प्रदान किया है । तीसरी श्रेणी राक्षसोंकी है, जो कि, मांस शराबको ग्रहण करते हैं बुरे कर्मोंकोही अपना कर्तव्य समझते हैं इनमेंसे पहले श्रेणीवालोंको स्वर्ग मिलता है दूसरे मध्यमें रहते हैं एवं तीसरी श्रेणीवाले नरकमें पड़ते हैं ।

सप्राण स्यावरादि तारा और पालपी, विद्वानोंका मत

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स्वसंवेदमें—सृष्टिके स्थितिकी सात शाखायें लिखी हैं— १ अनाज, २ घास, ३ पानी, ४ मिट्टी, ५ पत्तियाँ, ६ फल, ७ फूल इन्हीं सातों प्रकारके भोजनोंसे सर्व जीवधारियोंका जीवन है, अनाजसे मनुष्य, घाससे पशु, पानीसे जलचर पलते हैं कितने ऐसे भी जीवधारी हैं जो मिट्टी खाकर ही रहते हैं, कितनेही कीड़े पत्तियोंसेही जीवन व्यतीत करते हैं. बन्दर आदि पशु फल खाकर रहते हैं कितने अपने जीवनकी रक्षा फूलहीसे करते हैं।

मांसकी पेसाबसे तुलना—दो प्रकारकी सृष्टि है। एक जलसे दूसरी वीर्यसे होती है जलकी वह सृष्टि है जो जलसे उत्पन्न होती है। वीर्यकी सृष्टि वीर्य और लोहसे उत्पन्न होती है। जलसे उत्पन्न होनेवाली सृष्टिको लोग अशुद्ध नहीं समझते। वीर्यसे उत्पन्न होनेवालीको अशुद्ध जानते हैं अनाज फल आदि सब जलकी सृष्टि है। पशु पक्षरू आदिकी उत्पत्ति वीर्यसे है। प्रायः मुसलमानोंको देखा जाता है कि, पिशाब करनेके समय एक मिट्टीका डला हाथमें ले जाते हैं, जिससे पिशाब करके उपस्थ इन्द्रियको पोंछते रहते हैं, जिसमें पिशाबकी बूँद कपड़ेमें लगकर उसे अशुद्ध न कर दे आश्चर्यकी बात है कि, जिस पिशाबकी एक बूँदसे भजनमें हानि होनेके भयसे डला लेकर घण्टों खड़े रहते हैं उसी पिशाबसे उत्पन्न हुआ महा निकृष्ट पदार्थ मांससे आध सेर पेटमें रखकर निमाजके लिये खड़े होते हैं ऐसी बुद्धि और समझको धिक्कार है।

४० दिनके बाद काफिर—हदीसमें आया है कि, जो कोई चालीस दिनतक बराबर मांस खाता रहे दिन भी दिन न छूटने दें तो वह अवश्यही काफिर हो जायगा। मैं कहता हूँ कि, जो कोई एक बार मांस खानेकी इच्छा करेगा अथवा खायगा तो वह काफिरोंमें भी काफिर हो जायगा। आदमने एकही बार खाया था जिसके कारण बिहिश्तसे निकाले गये थे।

जीवके देखते जीवहत्याका निषेध—मुसलमान कहते हैं कि, रसूलिल्लाहने फरमाया है कि, तुम किसी जानदारको दूसरे जीवधारीके सामने जबह मत करो “ऐसा करनेसे उसके दिलमें भय उत्पन्न होगा कि, आज यह उसको कत्तल करता है कल मेरे साथ भी ऐसा व्यवहार करेगा” अफसोस है मुसलमानोंकी बुद्धि और समझ पर कि, पशुओंके डरनेसे तो डरना खुदा जो व्यापक सर्व द्रष्टा (हाजिर-नाजिर) खुदा है उससे तनिक भी भय न करना।

न मिलनेका कारण—इसहाकका बेटा ईशू बड़ा शिकारी था, इसी कारण अपना ज्येष्ठांश खो बैठे पितासे उसको बरकत नहीं मिली जो याकूब चरवाहा था उसे मिली। शिकारी कठोर हृदय—मांसाहारी कभी कल्याण न पायेंगे।

एनी मोन

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युक्ति प्रमाण ।

भारत वर्षके इतिहाससे प्रगट होता है कि देवता और दैत्य सर्वदासे लड़ते आये हैं देवता सर्वदा जय पाते थे, जब संयोगन देवतोंकी हार होती थी तो उनको अन्तरिक्षसे सहायता मिलती थी, भलोंका सहायक परमेश्वर है। वह बुरोंको कभी भी सहायता नहीं देता ।

लोहूके निषेधका तात्पर्य—हजरत नूह मूसा आदिकको खुदाने हुकम दिया था कि, तुमको अनाज, फल, मांस आदिक खानेको दिया मांस खाना और लोहू फेंक देना क्योंकि, लोहूका बदला लिया जावेगा। लोहू पशुका जीवन है। न्यायका स्थान है, जब कि, किसी जीवधारीको मारा तो उसका लोहू खाओ चाहे फेंक दो, उसकी जान तो गई। क्या प्राणसे लोहू अधिक है कि, फेंक देनेसे उसका बदला न लिया जायगा कौसी अन्यायकी बात है, प्राणके साथही तो उसका सब शरीर है, हाड, चाम, मांस, लोहू, रग, आंत इत्यादि, जो चाहो सो खाओ अथवा फेंक दो। हत्या तो उसके मारतेही गरदनपर सवार हो गई, ऐसे कपटी और छली खुदाके छल कपटको हंस कबीरके बिना दूसरा कोई नहीं जान सकता, इस खुदाके भेष धारण करनेवाले अखुदाने सबकी बुद्धिपर परदा डाल दिया है ख्यमु बात तो यह है कि, रहीम हत्यारा नहीं हो सकता ।

याकूबको गऊका शाप—दीन इसलामसे प्रगट है कि, एक दिन हजरत याकूबने एक गायके बछड़ेको मारकर खा लिया ये जिस समय बछड़ेको मार रहे थे वहाँही उसकी माँ खड़ी देख रही थी, गायने याकूबको शाप दिया, जिसका यह फल हुआ कि, याकूबका बेटा ईसुफ मार कूटकर कूवामें डाला गया उसके शोकसे याकूब रोते रोते अन्धा हो गया। विचारनेकी बात है कि, जब एक बछड़ेके मारनेसे याकूबकी यह दशा होगई तो जो लोग हजारों जीवोंकी हिंसा करते हैं उनकी दशा क्या होगी ?

शिकारीकी हिंसक पशुओंसे तुल्यता—जितने हिंसक और शिकारी पशु हैं सब अशुद्ध हैं। मूसा और मुहम्मदकी शरियतसे भी प्रगट होता है कि, मांसाहारी सब पशु नापाक हैं, यह बात प्रगट भी है कि, शेर भेड़िया, कुत्ता, बिल्ली, बाघ और शाहीन आदिक मांसाहारी शिकारी और हिंसक पशु अशुद्ध ठहरे, तो मांस खानेवाला, शिकार करनेवाला और हिंसा करनेवाला, कैसे शुद्ध हो सकता है ? जिसको कि, अपने भले बुरे कर्मका ईश्वरके सम्मुख हिसाब देना है ।

कब—जब मुहम्मद साहब जहाद और लड़ाईको जाया करते थे वहाँ अनाज नहीं मिलता था तो जानवरोंको जबह करके खानेकी आज्ञा दिया करते

प्राणधारी फूल, एनथो जुआ

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थे उनके सैनिकोंको मांसको खानेसे, कामका वेग हुआ तो उन्होंने हुकुम दिया कि, जब आदमीको तीन रोज भूखे मरते बीत जाय खानेको कुछ न मिले, भूँखसे प्राणान्तकी दशा हो, तब चौथे दिन जो कुछ मिले खा लो, तो हलाल है मांस खाना ऐसेही समयके लिये हलाल हो सकता है ? दूसरे समयके लिये नहीं हो सकता । इसी प्रकार कितनी रीति रसम है जो किसी समय विशेषके लिये हैं दूसरे समयके लिये अनुचित हैं ।

पाक नापाककी समता—तौरीत और इञ्जीलसे प्रगट है कि, खाने में पाक और नापाक सब जीवधारी एक समान हैं । तौरीतमें तो कुछ विवरण भी है, पर इञ्जीलमें किसी प्रकारका बिलग विवरण नहीं है तो भी ईसाई लोग अपनी बुद्धिसे अपने भीतरी ईमानसे कुत्ता, बिल्ली, गदहा आदिक खाना नापसन्द करते हैं ।

निष्कर्ष—शिकारी पशु अर्थात् हिंसक जानवर और कञ्जरियाँ (वेश्यायें), जिनका कि गोशत खाना और वेश्यापन करनाही काम है, इनका अपराध तो शायद क्षमा हो भी, पर हिंसक और दुराचारी मनुष्य कभी क्षमा न किये जायेंगे । उनको ईश्वर अवश्य महान् दण्ड देगा । हाँ इतना तो है कि, जिस स्थानपर, अनाज घास, पात, फल, फूल, न होगा । प्रयत्नसे मिलना भी दुस्तर होगा वहाँके मनुष्य क्षमाके योग्य समझे जा सकते हैं ।

दोष—मांस अहारी अशुद्ध अन्तःकरण वाले होते हैं । प्रथम तो उनका मनही भक्तिमें नहीं लगता, उनमें सांसारिक छल, कपट और विषयवासनाकी प्रबल इच्छा होती है । यदि वे भक्तिकी ओर भी लगते हैं तो वाममार्गमें सम्मिलित होते हैं । मांस मदिरामेंही निमग्न रहकर तमोगुणी बने रहते हैं, उनको सत्तोगुणी भक्ति नहीं मिलती इसी कारण लोक परलोकसे सुख और मोक्ष यह भी प्राप्ति कभी नहीं होती ।

नानक०—जो पीते प्याले और खाते कबाब, सोदे खोरे लोगो वह होते खराब सो तोबा पुकारे कि, पावे निमाज, जो लेखा मँगीज क्या कीजे जबाब ॥

संस्कृतमें तम अज्ञानको कहते हैं इसीसे सारा संसार हुआ है । तमके न होतेही संसारका परदा नष्ट हो जाता है । फिर ज्ञान होकर मोक्ष मिल जाता है यह निश्चित बात है कि, मांस आदि तमोगुणी भोजनोंसे कभी भी मुक्ति नहीं हो सकती ।

मनुष्यसे भेड़िया—मांस खानेकी इच्छा रखनेवाले हिंसक पशुओंकी योनिमें जाते हैं । नानक साहबकी जन्म साखीमें लिखा है किः— एक

एन्टेनिया, जो फिस्टस बैलिमेन्स, एनकेरेनेटे मुंगिया या कोरल

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समय नानक साहब यमन आबाद नामक बस्ती जो इस समय गुजराँ बालाके निकट है, वहाँ पर आपका मलिक भागू नाम करोरी खत्री मिला । उसने नानकजीसे कहा कि, आज मेरे पिताके श्राद्धका दिन है, आप मेरे घर भोजन कीजिये नानक साहबने कहा कि, यह भोजन तुम्हारे पिताको पहुँच गया, उस खत्रीने उत्तर दिया कि, महाराज ! ब्राह्मण वचनानुसार तो अवश्य पहुँच गया नानक साहबने कहा कि, असज्जनोंको कदापि नहीं पहुँचता तेरा पिता भेड़ियाकी योनिमें गया है, यहाँसे पांचकोसपर अमुक स्थानमें तीन दिनका भूखा प्यासा झाड़ीमें बैठ आ हुआ है । खत्रीने कहा कि मैं इस बातका कैसे विश्वास करूँ ? नानक साहबने कहा कि, तू भोजन लेकर उसके पास जा, वह भोजन करेगा तेरे साथ मानुषिक भाषामें बातचीत करेगा । नानक साहबकी आज्ञानुसार खत्री भोजन लेकर वहाँ पहुँचा वहाँ भेड़िया मिला उसने खूब पेटभर भोजन किया । पेट भर खाने पर भेड़ियेने खत्रीके पूछनेसे कहा कि, मैं अमुक खत्री हूँ । एक वैष्णवके उपदेश मैंने मांस खाना त्याग दिया था । एक समय बीमार पड़ा उस समय मेरा पड़ोसी मांस पकाता था, मेरे नाकमें उसके मसालेकी गन्ध पहुँची, मेरा मन मांस पर चल गया, इतनेही मैं मेरे प्राण निकल गये । मांस खानेके सकलपसे मैं भेड़िया हो गया । फिर वही खत्री नानकसाहबका उपदेश लेकर भक्त हो गया ।

कबसे—जम्बूद्वीपके भरतखण्डको भारतवर्ष भी कहते हैं । यह देश पृथिवीके सभी प्रदेशोंसे उत्तम है । भारत वर्षके चारों ओर मुसलमान म्लेच्छोंकी बस्ती है, किसीकी भी ऐसी श्रेष्ठता नहीं है । भारतमें दयाका पूर्ण प्रचार होनेके कारण, यह सर्वोत्कृष्ट एवं सर्व गुण सम्पन्न हुआ है । शोककी बात है कि, मुसलमानोंके राज्य कालसे भारतमें भी मांस भक्षणका प्रचार और बढ़ गया जो दिन २ बढ़ता ही जाता है ।

हानिके कारण—दया कम हो गयी, लोगोंके अन्तःकर अशुद्ध हो गये । भक्ति लुप्त हो गई । साधु सेवा और सच्ची गुरु भक्तीका चिह्न भी नहीं मिलता, ऊपरसे गुरु भक्ति सेवाकी दिखावट और दम्भसे धर्मकी पुकार थोड़ी बहुत रह गई है । देखें आगे क्या होता है, शोक ! ज्ञान, भक्ति और मुक्ति आदि सत्य पदार्थकी खोजको भूलकर भारतवासियोंने मांस और शराब तथा नाना प्रकारके निषिद्ध मादक पदार्थोंको ग्रहण कर लिया है

उपदेश—परमात्माके सब गुणोंमें श्रेष्ठ गुण दयालुता और कृपालुता है सब मनुष्य तथा अन्य जीवधारी उसी दया और कृपाका आसरा रखते हैं । यदि वह कृपा न करे तो ऋषि, मुनि, पीर, पैगम्बर, साधु, महात्मा कोई भी न छूटें

स्पर्ज, लाजवन्ती, सूर्यमुखी वृक्षसे बतख कोहड़ा, पहाड़ोंकी लड़ाई

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वरन् सब उसके कोपमें पड़ें, यही एक इसका दयालू होनेका प्रमाण है कि, पापियों पर भी उसकी दया होती है। मनुष्य होकर जो इस सर्वोत्कृष्ट गुणको न धारण करे, वह मनुष्य मण्डलसे बाहर है। जो उस दयालूका दर्शन करना चाहता है एवं उसकी कृपा प्राप्त करके जन्म सुधारना चाहता है, तो अवश्य दया धारण करे, निर्दयी उसकी कृपाके पात्र कदापि न होंगे उसके कोपमें पड़के नर्कमें सड़ेंगे। मांस खानेवालोंके हृदयमें दयाका संचार भी नहीं होता, अपने स्वादके लिये हत्या करते हैं। शाक, जानवरोंका गला मूलीके समान काटते हैं। शहरोंमें कसाई एक अधेलाही देता है मुल्ता लोग प्रत्येक गलेपर एक अधेला लेकर सहस्रों बकरी और भेड़ोंको जबह करा देते हैं। शायद यह मुल्ले और मुसलमान लोग भी, बिहिश्त मिलनेकी आशा रखते होंगे? धिक्कार! धिक्कार! इसी विषय पर कबीर साहिबने भी अपने सच्चे उपदेश दिये हैं कि, मनुष्य सच्ची बातको समझ कर अपना कल्याण कर सके।

झूलना—सन्तकी चाल संसारसे भिन्न है, सकल संसारमें चेहर बाजी।

हिंदू मुसल्मान दोउ दीन सरहद बने. वेद कितेब परपञ्च साजी ॥

हिंदूके नेम आचार पूजा घना, वरत रहत एकादशी राजी।

बकरा मार मुख मांस भक्षण करें, भक्ति ना होय यह दगाबाजी ॥

सर्व ऊपर श्रीकृष्ण गीता कथी, कृष्णकी बातको मान पाजी।

क्या भई वेद गीता पढ़े दृष्टि उघरे नहीं, भैंसकी सींग क्या बेनू बाजी ॥

मुसल्मान कलमा पढ़े तीस रोजा रहे, वंग निमाज ध्वनि करत गाढ़ी।

बकरीको कूटी काटि जीव जबह कर, गाय पच्छाड़के कुही काढ़ी ॥

इस जोर जुल्मसे बिहिस्त त मिलेगी, खून अपराध शिर व्याध बाढ़ी।

माँगेगा हिसाब तब जवाब क्या देवेंगे, चलेंगे फिरिश्ते जब पकड़ दाढ़ी ॥

मोमदिल मेहरवान दिल उस दिलको, बिहिश्त रोजी बिहिश्त ठाढ़ी।

कहैं कबीर वन्दे साहबी सो करे, सत्य जो चीन्हके झूठ छाढ़ी ॥

तम प्रिय होनेका कारण—प्रायः हिंसक जीवधारी प्रकाशको सहन नहीं कर सकते जैसे उल्लू, चमगीदड़ आदि बहुतसे मांस अहारी जीवधारी प्रकाशसे ऐसी घृणा रखते हैं कि सूर्यके निकलतेही बिलोंमें जा छिपते हैं शामको पूरी अँधेरी तक मुँह भी नहीं दिखाते। जब अँधेरी रात होती है तो आनन्द पूर्वक इधर उधर फिरते हैं, ऐसे करनेका कारण केवल मांस अहार है, जिससे उनका अन्तःकरण अन्धकारमय हो गया है इसी कारण, वे अन्धकारकोही स्वीकार करते हैं।

सुमेह और विन्ध्याचलकी लड़ाई

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अभक्ष्यके कारण अपूर्णता—जिस मकानमें गन्दगी, कूड़ा, कर्कट, भरा हुआ हो, लीपा झारा न जाता हो, ऐसे मकानमें दीपका प्रकाश करने पर भी ज्योति बहुत नहीं फैलता पर जो मकान खूब साफ स्वच्छ हो दीवारोंमें उत्तम उत्तम कांच लगे हुये हों ऐसे मकानमें एक छोटीसी बत्ती भी जला दी जाय, तो भी सैकड़ों दीपकोंके समान प्रकाश हो जाता है समस्त मकान ज्योति से भर जाता है । इसी प्रकार मनुष्यका अन्तःकरण है, यही आत्माका मकान है, यदि पापोंसे अन्तःकरण अशुद्ध हो, मांस शराब आदि अभक्ष्य घृणित पदार्थोंसे स्वच्छ हो, भय और शुद्धताके साथ भजनरूपी दीपक प्रकाश किया जावे, तो शीघ्र ही पूर्ण प्रकाशमय हो जावे । यही कारण है कि, पश्चिम देशके महात्मा पीर पैगम्बर, औलिया, नबी आदिकोंने अभक्ष्यका त्याग किये बिनाही बड़ी बड़ी तपस्यायें कीं तिसपर भी भारतवर्षके मामूली ऋषियों महात्माओंके संह्वांश प्रकाशको भी प्राप्त न कर सकें क्योंकि, भारतीय महात्मागण इन्द्रिय स्वादकी वासनाओंको त्यागकर भजन करते थे ।

जिसका जैसा कर्म होता है उसकी वैसेही बुद्धि होती है बुद्धिके अनुसारही विद्याका प्रकाश होता है इसीके अनुसार ज्ञान प्राप्त होता है । ज्ञान हुआ व्यक्ति आत्मज्ञानको प्राप्त करता है इसके किये बिना ईश्वरका ज्ञान कठिन ही नहीं बरन असम्भव है । जिसको आत्माका ज्ञान नहीं उसको सत्य ज्ञान नहीं जिसको आत्मा न होता है वह सब जीवोंको अपनी आत्मा समझता है । अखिल जीव धारियोंकी देहको अपना देह समझता है । जो सर्वत्र अपनीही आत्मा समझता है वह किसी जीवधारीको दुःख नहीं दे सकता वह न किसीको दुःख देना ही चाहता है, वो मांस खाना स्वीकार नहीं कर सकता जो कि जीव हिंसाके बिना प्राप्त नहीं हो सकता ।

न्यायकी बात—है कि जितने जीवधारी हैं वे सब अपना बदला लेनेको तैयार होते हैं स्थावर बदला नहीं लेते, जीवधारी पशु और मनुष्य सब एक समान ही हैं आपसमें भाई हैं, जो भाईका रक्तपात करेगा वह अवश्य बदला देगा गला काटनेके बदले गया कटावेगा इसमें कुछ भी अंदेश नहीं है ।

मछली खानेके दोष — जो कोई मांस खाता है वह सब जीवधारियोंका ही तो मांस खाता है उसके लिये शुद्ध अशुद्ध सब एक समान है, पशु और मनुष्यका-मांस एकही सरीखा है । जो मांस आहारी मछली अवश्य खाते हैं वो सब कुछ खाते हैं क्योंकि, मछली सब जीवधारियोंके मांसको खाती हैं विष्ठा आदिकका भी भक्षण करलेती हैं । प्रायः देखा गया है कि बड़ी बड़ी मछलियोंका पेट चौरने पर

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उनके पेटसे मनुष्यके हाथ पग अथवा कभी कभी पूरा आदमी अथवा छोटा लड़का निकल पड़ा है इसी प्रकार छोटे बड़े पशु भी बहुत निकले हैं। इससे सिद्ध होता है कि, मछली सब कुछ खाती है। अब विचार करने योग्य है कि जिसने मछली खाई उसने हलाल खाया कि, हराम।

कुत्ता खाया — प्रायः ऐसा भी दखा गया है कि, शहरके कसाई लोग अशुद्ध पशुओंके मांस और कभी कभी मनुष्यके मांसको भी बकरेके मांसके साथ मिलाकर बेच देते हैं लोग उनको मोल ले लेकर खा जाते हैं अस्तु, आठ बरसके लगभग हुए मैंने सुना था कि, लखनऊमें एक सर्कारी मुलाजिम चपरासी अथवा खलासी आदिमें से किसीने कसाईकी दूकानसे मांस ला पकाकर खालिया वह बहुत बीमार हो गया। डाक्टरके पास दवाई कराने गया, डाक्टरके पूछने पर उसने बतलाया कि, अमुक कसाईकी दूकानसे मैंने मांस लेकर खाया था। डाक्टर साहबने अपनी बुद्धिसे विचार किया कि, बकरेके गोश्त में तो यह बात नहीं होती जान पड़ता है कसाईने किसी दूसरे प्रकारका मांस दिया है। कसाईके घर जाकर तलाशी ली तो ठाँव २ पर कुत्तेको खाल पाई, दरियाप्त करनेसे मालूम हुआ कि, यह कुत्तों को ही मार २ कर चुपचाप बेचा करता है।

परमात्माने सब जीवधारियोंके ऊपर मनुष्यको राजा बनाया है न्यायी राजाके लिये स्वर्ग, अन्यायियोंके लिये घोर नरक होता है।

गलत यह भी — मुसलमान कहते हैं कि, यदि कलमा पढ़कर जबह करें तो हलाल होता है जीवधारी खुदाको पहुँचता है, अगर कलमा पढ़कर बिन व्याही स्त्रीके साथ व्यभिचार करे तो गुनाह नहीं है। मैं इस बातका कभी विश्वास नहीं कर सकता। अगर इस कलमेमें यह शक्ति होती तो कलमा पढ़कर चोरी करने वालेको पुलिस गिरफ्तार न करती। कलमा पढ़कर खून करनेवालेकी फाँसी न मिलती, कलमा पढ़कर डाँका मारता, कोई न पकड़ता इस कारण ये सब बातें बिलकुल झूठ हैं, मूर्खोंमें ठगी पसारनेकी बातें हैं। इसमें कोई प्रमाण नहीं कि, कलमा पढ़कर बध करनेसे जीव स्वर्गको चला जाता है, कलमा पढ़कर व्यभिचार करनेसे निष्पाप रहता है। यदि कलमेमें यह सामर्थ्य है तो चोरी क्या और डाँका आदि पुलिससे अधिक बलवान हैं? कलमामें यह सामर्थ्य बतलाना राक्षस, भूत यक्षोंके समान धोखा देना है। हां इतना है कि, मुहम्मद साहबके समयमें इस कलमामें बड़ी ताकत थी। क्योंकि, रक्तपात करने, निष्पाप जीवोंकी हत्या करने, चोरी और डाँका मारनेसे भी उनके समयमें अरबके लोग पकड़े नहीं जाते थे मुहम्मद साहबने रक्तपातकी आज्ञाही दी थी।

गंगाजीकी कथा

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वाममागियोंसे तुलना — हिन्दुओंमें वाममागों लोग मदिरा, मांस, व्यभिचार सब कुछ कर लेते हैं। सुमिरण पढ़नेसे पाक होजाते हैं, उन नीचोंसे उनको सुमिरणका हाल पूछा जाय उसका अर्थ विचारा जाय, तो मालूम होगा कि, उस सुमिरण बनानेवाले महान् अत्याचारी, व्यभिचारी, जगत्की मर्यादा भ्रष्ट करनेवाले, महान् विषयी, मांसाहारी और मद्यप वाममागोंही निकलेंगे ।

समभाव — आदमीकी चार लाख योनि है । अस्सीलाख दूसरे योनिके जीवधारी हैं, सबमें एकही आत्मा है । सबको एक समानही दुःख सुख हैं, जिन जीवधारियोंमें रक्त और श्वासका सम्बन्ध है वे सब एक समानही दुःख दर्दके लिये चिल्लाते हुए दुःखी होते हैं । सब जीवधारियोंकी बहुतसी बातों में समानता के कारण भाई २ के समान सम्बन्ध है । जो भाईपर दया न करेगा वह कदापि मनुष्य नहीं कहला सकता ।

ऊँचनीच — जड़म स्थावर जीवोंसे संसारको लाभ पहुँचता है, वे सब शुद्ध पुण्यआत्मा हैं, जिनसे संसारको हानि पहुँचती है वे पापी हैं और अशुद्ध हैं । साधु विद्वान्, राजा, बादशाह, शूर, बीर, दानी, उदार आदि मनुष्य श्रेष्ठ गिने जाते हैं । पशुओंमें गाय, भैंस, घोड़ा, बकरी आदि—श्रेष्ठ हैं, रेशम तसरके कीड़े शहतकी मखली आदि कीड़ोंमें श्रेष्ठ हैं । स्थावरोंमें फलवान् वृक्ष और जड़ी, बूटी आदि सब शुद्ध और पुण्यात्मा समझे जाते हैं । अत्याचार करनेवाले, व्यर्थही रक्तपात करनेवाले, निरपराधोंको दुःख देनेवाले सब पापी अशुद्ध और नारकी हैं ।

झूठा दावा — कितने मांसअहारी दावा करते हैं कि, हम विद्या और बुद्धिमें मांस त्यागियोंसे कम नहीं हैं, पर यह उनकी निरा मूर्खता है। इतनी बात अवश्य है कि, ऐसे लोग सांसारिक विद्याके किसी किसी अंशमें चतुर होते हैं, सो भी सब अंशोंमें नहीं, पारलौकिक विद्यामें तो उनको सुधही क्या होनी थी ।

शुद्धोंके लिये नहीं — जिन जो लोग मांस खाते हैं, उन्हीं लोगोंके लिये मांस खाने तथा रक्तपात करनेकी आज्ञा उत्तरी और उत्तरा करती है । मांस त्यागी शुद्ध पुरुषोंके पास ईश्वर खुदा अथवा किसी देवताकी मांस खानेकी आज्ञा कभी नहीं उत्तरी, न उत्तरती है और न उत्तरनेकी आशा ही है । प्रत्येक मनुष्य दूसरोंको अपने रङ्ग ढङ्गका बनाना चाहता है ।

हिन्दू शब्दका अर्थ — महाभारत, योगवासिष्ठ और भारतीय प्राचीन इतिहास देखने और पुराणोंके पढ़नेसे मालूम होता है कि, हिन्दू एक प्रबल प्रभावशाली और विजयी जाति थी । इसका कारण भी यही प्रतीत होता है कि, प्राचीन-

तात्पर्य

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कालमें हिन्दू पूरे अहिंसक थे। हिन्दुओंको युद्ध विद्यामें ऐसी कुशलता थी कि, इनकी संमता कोई जाति नहीं कर सकती थी, धनुर्विद्याकी योग्यता तो ऐसी थी कि, एक बाणमें सहस्रों बाण छोड़ते थे, विशेष क्या कहें ? इनके समक्ष देव, दानव, राक्षस, यक्ष आदि कोई भी नहीं ठहर सकते थे, महान् प्रभावशाली देवताओंकी भी इनसे सहायता लेनेकी आवश्यकता होती थी। हाय ! शोक ! जबसे भारतवासियोंने मांस खाना और मदिरा आदि मादक पदार्थोंका सेवन करना तथा सज्जनोंके नियमोंको उलंघन करना आरम्भ कर दिया, तभीसे सारी शक्तियाँ ऐसी भाग गईं कि, अब उनका पता भी नहीं सुना जाता। प्राचीन मन्त्रोंमें भी असर न रहा। क्योंकि, अब हिन्दू-हिन्दू नहीं रहे, म्लेच्छोंके कर्म करके म्लेच्छोंके समान बन गये। हिन्दू उसे कहते हैं जो हिंसासे दूर रहे। हिन्दू शब्द दो शब्दोंके संयोगसे बना है-हिन् और -दू। ये दो शब्द हैं-हिन्-का अर्थ है। हिंसा, दू-का अर्थ है-अलग रहना, हिंसासे -सा को अलग किया, उसके साथ-दू-को मिला देने से - हिन्दू शब्द होता है। जो हिंसासे बिलकुल अलग रहे उसे हिन्दू कहते हैं। आर्यशब्दके भी ऐसेही श्रेष्ठ और उत्तम अर्थ हैं। मांस खानेसे हृदय और मस्तिष्क निर्बल और अशुद्ध हो जाते हैं येही विवेक और विचारके स्थान हैं। गोल्डस्मिथ साहबकी नेचरल् हिण्ट्री देखो वह भी मांसाहारियोंके विषयमें ऐसेही समर्थन करते हैं।

ब्राह्मणोंका निर्बल्य तथा परशुराम - ब्राह्मण हिंसाहीके कारण ऐसे निर्बल और कि, उनमें शूरताका नाम भी नहीं रहा। उनके अतिपराभवको देखकर भगवान्ने परशुरामजीको भेजा, इन्होंने शूरवीरता और तप दोनोंका उदाहरण एकत्र उपस्थित कर दिया तथा लोगोंको त्यागको माहात्म्य भी दिखा दिया। ये बड़े प्रभावशाली और शूरबीर हुये, उनने बड़ी तपस्याकी जिसके बलसे बड़े ऐश्वर्यको प्राप्त हुये। ब्राह्मणोंने ऐसा प्रभावशाली देखकर धर्मावतार परशुरामसे कहा उनकी बड़ी स्तुति की, उनके सम्मुख रोये, गिड़गिड़ाये अपना दुःख प्रगट किया। महाबली परशुरामने क्षत्रियोंको मारकर राज्य छीन लिया ब्राह्मणोंको राजा बनाकर कहा कि, तुम सुखपूर्वक राज्य करो। स्वयं तपस्या करनेको चले गये। उनके चले जानेके बाद क्षत्रियोंने फिर मार कूटके राज्य छीन लिया। ब्राह्मणोंने फिर पशुरामकी शरण ली, परशुरामजीने क्षत्रियोंको मारकर ब्राह्मणों को राज्य दे दिया। इसी प्रकार क्षत्रियों और परशुराममें अनेक बार लड़ाई हुई, अन्तमें ब्राह्मणोंको राज्य स्थापितकर परशुरामजी तपस्या करने चलने लगे, ब्राह्मणोंने कहा कि, महाराज ! हम अनेक बार दुःख उठा चुके हैं आप हमें छोड़े

इसलामी पुस्तकें और हदीसें जमीनोंकी आपसकी बातें प्यालेका आशीर्वाद इन्द्रियोंकी गवाइयाँ सजीव मूर्तियाँ जमीनकी जिवराईलसे बातें

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जाते हो, आपके परोक्षमें क्षत्री लोग हमको आकर मारें तो क्या किया जावेगा ? परशुरामजीने एक घण्टा बाँध दिया कि, जब क्षत्री चढ़ाई करें उस समय इस घण्टाको बजा देना, मैं शीघ्रही आ जाऊँगा, यह कहकर तपस्या करने चले गये । कुछ कालके पीछे ब्राह्मणोंने अपने मनमें विचार किया कि, क्षत्री लोग हमारे ऊपर चढ़ आवें, घण्टा बजानेसे परशुरामजी न आवें तो हम लोगोंकी बड़ी दुर्गति होगी, यह शोच परीक्षाके हेतु घण्टा बजाया, शब्द होतेही परशुरामजी आ उपस्थित हुये । पूछा कि, तुमने घण्टाको क्यों बजाया ? किस शत्रुने तुम्हारे ऊपर चढ़ाई की ? ब्राह्मणोंने कहा कि, हम लोगोंने क्षत्रियोंसे भयभीत होकर परीक्षाके लिये घण्टा बजाया है । इस बात पर परशुरामजीने क्रुद्ध होकर कहा कि, ओ डरपोको ! तुम लोगोंसे राज्य न होगा, तुम लोग राज्य करनेके योग्य नहीं हो, क्षत्री लोगही राज्य करेंगे तुम लोग उनके पुरोहित बनकर अपने दिन बिताओगे । सत्य संकल्प परशुरामका संकल्प कौन टार सकता था, क्षत्रियोंने आकर फिर राज्य ले लिया, ब्राह्मण लोग यजमानी वृत्तीसे अपना कालक्षेप करने लगे । शनैः शनैः लोभ और तृष्णा वश हो निषिद्ध दान लेनेसे दरिद्रताको प्राप्त हो गये । ब्राह्मणोंको ऐसी हीनावस्थामें प्राप्त होनेका कारण केवल हिंसाही है । हिंसाके कारण इनके भाग्यमें भीख माँगना आना ही था । परशुरामजीके बल करनेसे क्या हो सकता था ? क्षत्रियोंका भाग्य चमका हुआ था, जिसका कारण केवल एक अहिंसा ही था ।

अधिकता—जीवधारियोंके पूर्वके कर्मानुसार शक्ति और बल प्राप्त होते हैं । हाथी व्याघ्रसे भागता है, वह शेरके बलसे भयभीत होकर नहीं भागता वरन् प्रकृतिने स्वभावसेही व्याघ्रको ऐसे हथियार दिये हैं कि, जिसके भयसे हाथी जैसा बलावान् भी उसके सम्मुख हार मानता है । व्याघ्र, बाज, शाहीन आदि हिंसक पशुओंमें जो शूरता देखी जाती है उसका कारण यही प्राकृतिक नियम है । जीवधारियोंको उसके कर्मानुसार शारीरिक बल तारतम्यतासे प्राप्त है । हिंसक मांस आहारी पशुओंकी अपेक्षा शाक, पात, नाज, फल खानेवालोंमें अधिक शूरता है । देखो बटेर और बुलबुल, मुर्गा मेंढा, शूकर और भैंसा आदिककी लड़ाई कौसी भयानक होती है । बनका शूकर व्याघ्रसे भी अधिक बलवान् होता है । मांस खाने से शारीरिक बल और काममें विशेषता नहीं होती, व्याघ्र और बिल्ली आदि मांस आहारी पशु विशेष कामानुर नहीं होते, वरन् मुर्गी और कबूतर आदिकोंमें विशेष काम होता है ।

अहिंसक सुखी हैं—मुसलमानोंकी अपेक्षा हिन्दू बहुत सुखी हैं यदि एकही

बड़ी मूर्तिकी बातें बूझोंकी, सलाम, पशुबल गदहाको फिरस्ते, पत्थर और दाऊद कूआका रोना, रागसे कार्य विशेष सबकी बातें, विच्छूके बदले चांदी

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व्यवहारमें, हिन्दू और मुसलमान, दोनों एकही देशमें, एकही समयमें, एकही स्थानपर एकही उद्यममें लगे हों तो हिन्दू विशेष लाभको प्राप्तकर बहुत सुखी होगा, मुसलमान निर्दयताके कारण दरिद्रता और दुःखमें ही फँसे रहेंगे. क्योंकि जीवधारियोंका रक्तपात करना महापाप है।

हेयताका कारण — जितने मांसाहारी हैं सबका स्वरूप भयानक है. क्योंकि उसकी बनावटमें तमोगुण (अग्नि) का भाग विशेष मिला हुआ होता है, जितने नाज, फल, घास आदिकके खानेवाले हैं उनका दिखाव महान् शान्तिभय एवं धैर्य संयुक्त होता है, क्योंकि, उनकी बनावटमें जलका विशेष अंश होता है। अग्नि — (तमोगुण) शिवका स्वरूप है जो संसारको नष्ट करनेवाली है। जल-विष्णुका स्वरूप है जो संसारका पालन करनेवाला है। सतोगुणको धारण करनेसे मुक्ति है, तमोगुणसे अधमता प्राप्त होती है। इसी कारण तमोगुण हेय समझा जाता है।

भ्रष्ट करनेवाला — तमोगुण शिव स्वरूप है। शिव कङ्काल और भिखारी है तमोगुण रूपी शिवकी स्त्री दरिद्रता है शिव यानी तमोगुणके अनुयायी दरिद्री और भिखारी हैं। विष्णु सतो गुणरूप है—धनी है, लक्ष्मीका पति है, सुख सम्पत्ति सब उसके साथ हैं, इसी लिये सतोगुणी धर्म, लोक परलोकके कल्याणका कारण है, तमोगुण दोनों लोकसे भ्रष्ट करनेवाला है।

रक्तपातका काल — भारत वर्षमें मुसलमानोंके राज्यके पहले धन सम्पत्तिकी कुछ कमी न थी, सब प्रजा सुखसे रहती थी। जबसे मुसलमानी राज्य आया भारत भूमिपर जीर्वाहंसा और रक्तपात होने लगा, तबीसे सब पदार्थोंमें घाटा आने लगा; पापसे पीड़ित पृथ्वी होकर फल फूल और नाज इत्यादि देनेसे रुक गई। जहाँ पहले पचास मन अनाज होता था वहाँ अब बड़ी कठिनतासे दशमनसे भी कम होने लगा, फल आदिककी भी यही दशा है कि, पर्याप्त नहीं होते।

हत्याका प्रायश्चित्त — हिन्दू जातिको धन्य है जो कि, यदि भूलसे संयोगन कोई पशु बंधा हुआ मर जावे अथवा ऐसी चोट लग जावे जिससे कि उसके कारण उसका प्राण निकाल जे वे, तो जिस मनुष्यसे ऐसा काम हुआ हो, उसको घरसे बाहर निकाल देते हैं, उसका छूना भी पाप समझते हैं। वह निकाला हुआ मनुष्य हाथमें एक लकड़ी लेकर भीख मांगता फिरता ये शब्द पुकार पुकारके कहता है “धौरीकी बछिया दिया बनवास” अर्थात् गायकी बछियाने मुझको घरसे निकाल दिया उसको लोग हत्यारा कहते उसको न कोई छूता है न घरके अन्दर घुसने ही देता है। उसको भीख मांगकर खाना वृक्षोंके नीचे सोना तीर्थों तीर्थोंमें स्नान

जगदीशका सम्भाव बालककी रक्षा

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करते फिरना पड़ता है । शास्त्रानुसार नियमित तीर्थोंमें फ़िरनेके पीछे, ब्रह्म भोज, भण्डारा और जाति भोजके अतिरिक्त बहुत कुछ दान पुण्य करने पर उसको जातिमें मिलाते हैं । उसको ऐसा कठिन दण्ड होता है कि, बहुत दुःखी होता है । यह रीति न्यूनाधिक्य करके समस्त भारतवर्षमें है, इस बातका पूरबमें अधिक प्रचार है ।

हिंसकोंके मारनेका कारण — मनुष्य सृष्टिमें सबसे श्रेष्ठ है मनुष्यसे श्रेष्ठ परमात्मा है जो कोई अपने शासककी आज्ञा न माने उसके कार्य्यको पूरा न करे तो अवश्य दण्डका भागी होगा, जितने हिंसक पशु हैं वे मनुष्यके कोई काम नहीं आते, वरन् अवसर मिलनेपर घात करते हैं, इस कारण मनुष्य उनको मारते हैं । जिस प्रकार मनुष्यके हिंसक पशु शत्रु हैं, उसी प्रकार मांस आहारी और नशेबाज मनुष्य ईश्वरके शत्रु हैं । ईश्वर उनको अवश्य नरकमें डालेगा ।

सबसे हिंसक और अहिंसक — जितने हिंसक पशु हैं सबको प्रकृतिनेही उनके योग्य नख, दांत दिये हैं, पर मनुष्यकी उत्पत्ति हिंसक नहीं है । इसी कारण प्रकृतिने उनको हिंसाकी सामग्रीसे वञ्चित रक्खा है, पर प्राकृतिक नियमको तोड़कर ये हथियारोंसे जीर्वाहिंसाका काम करते हैं । इसी कारण ऐसी हिंसा और मांस अहार प्राकृतिक नियमके विरुद्ध है इसके करनेसे अवश्य दण्ड पावेंगे ।

पापी और कृतकृत्य — शरीरके पोषण और जिह्वाके स्वादके लिये लोग मांस खाते हैं । यह शरीर जिसको वे सत्य जानकर पालते हैं पाप करके महान अधर्मके कर्ता बनते हैं, सो एकदम असत्य है । जो लोग असत्यसे प्रीति करेंगे वे कभी सत्यको प्राप्त न कर सकेंगे । जो लोग तन, मन, धन, ईश्वरार्पण करते हैं वेही कृतकृत्य होते हैं ।

इखलाकी असूल — भी मनुष्यको मांस आहारी होना नहीं चाहता. क्योंकि, जावनरोंके मारनेके समय उनकी जो दशा होती है, उनके हाथ पांवका फड़-फड़ाना, दुःखके साथ बलबलाना, हृदय वेधक शब्दके साथ चिल्लाना, प्राण निकलनेके समय महान् कष्टका होना, कठिनसे कठिन हृदय को भी द्रवीभूत कर देता है इससे प्रतीत होता है कि, मनुष्य मांसाहारके लिये नहीं बनाया गया ।

मुक्तिके अधिकारी — मुक्तिके दो किनारे हैं, दोनोंही उसके आधार हैं, पहला कर्म, उपासना, ज्ञान और विज्ञान, सच्चे साधु गुरुकी सेवा दूसरा सच्चे परमात्माका भजन है इन दोनोंमें ये चार २ डण्डे हैं, दोनों आधारोंसे ये चारों येस्थित रहते हैं । आधार न हो तो डण्डे किस तरह स्थिर रह सकते हैं । जो साधु और गुरुकी सेवा हिन्दू जातिमें है वह किसी जातिमें नहीं है ।

बनी इसराईलकी रक्षा

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मांस आहारी मद्यप और नशेबाजोंसे न कभी साधु गुरुकी सेवा हुई न, भजनही बना वरन् वह साधुओंसे बाद विवाद किया करता है, उनकी मसखरी उड़ाता है, उनमें दोष निकालता है। जो सच्चे साधुओंमें स्नेह रखनेवाल होगा, वही ईश्वरका प्यारा होगा। जो सच्चे साधुओंमें प्रेम नहीं रखता वह ईश्वरका शत्रु है। सच्चे सन्तकी शरण गहे बिना कदापि परमात्मा न मिलेगा। मांस आहारियोंमें दोनोंही अवगुण होते हैं, इस कारण उनका अन्तःकरण अन्धकारमय हो जाता है, वे प्रकाशका मार्ग नहीं पाते उनसे दीनता दूर हो जाती है तथा मान बड़ाई अहंकारमें फँस जाते हैं।

यूरोपके विद्वानोंकी सम्मतियाँ

योरप देशके तत्त्ववेत्ताओं (PHILOSOPHERS) का विचार है कि, मनुष्य मांस खानेके लिये नहीं बनाया गया, इसका यथार्थ मांस भोजन नहीं है। मनुष्यको किसी प्रकारसे भी मांस न खाना चाहिये। मनुष्यके शरीरकी भीतरी और बाहरी बनावट बताती है कि, मांसाहारी जीवधारियोंमें नहीं है, वरन् अनाज साग, पात, फल आदिक खाकर अपना जीवन व्यतीत करनेके लिये बनाये गये हैं। बड़े २ नेचरलिष्ट विद्वान् और प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता लोगोंकी ऐसीही संमतियाँ हैं लीलीस्टन्, गिनी, सर एवर्ड होम्, वरन् कोबेरी, प्रोफेसर लारेनेस, लार्ड मेनबोडो मिस्टर टाम्स वेल जैसे बड़े २ समीक्षकोंने पूरी जाँच करके प्रगट किया है कि, मनुष्यके दांत पेट और अंतडियों तथा उसके शरीरकी बाहर भीतरी बनावटें प्रगट करती हैं कि, वह मांस आहारी उत्पन्न नहीं किया गया, प्रकृतिने इसके स्वभाव और बनावटसे इसे मांस त्यागी बनाया है।

मिस्टर लार्ड बक और मिस्टर गोसिङ्गल्ट — आदि रसायन विद्याके, प्रसिद्ध विद्वानोंमें थे, उनके वचनोंसे इस बातको प्रमाणित करता हूँ वे लिखते हैं कि, जो मनुष्य पशुओंका मांस खाता है, वही फिरसे घास पात बनता है, जो कि, रूप बदलकर मनुष्योंके खानेमें आता है जिसके द्वारा खानेवाले जीवधारीका पालन होता है। सब जीवोंमें जो एक किसमकी अण्डेके समान सफेदी होती है, वह जीवधारियोंकी समानही होती है इस सफेदीको अंग्रेजीमें एलू बियोमन कहते हैं। इसी प्रकारसे उनकी रगें और मनुष्योंकी रगें एकसी होती हैं, यहाँतक कि, उनके स्वरूपमें भी किसी प्रकारका भेद नहीं होता। कह बात लार्डबक् साहबकी फीमेली आर लेटर्ज आन कोमिस्ट्री किताबमें लिखी हुई है।

समीक्षा — विचार करना चाहिये कि, यह वचन मिस्टर लार्डबक् और बोसंगाल्ड आदिकोंका वचन भारतवर्षके ज्ञानी ऋषीश्वरोंके साथ मिलता है,