कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड
आचार्य-४ धर्मशास्त्र-५ पढ़ाने तथा सिखानेवाले साधु । इन्हींको जैन ईश्वर करके पूजते हैं, दूसरा कोई परमेश्वर नहीं, इन्हींको परमेश्वर कहो अथवा कुछ कहो । सो ये इनमें भी समस्त मनुष्योंके समान लोग विवश हुए हैं । इन पाँचोंमें प्रथम श्रेणी अरहंत अर्थात् तीर्थङ्करकी है, इनकी मूर्ति बनाकर जैनी लोग मन्दिरमें रखते हैं । इस मूर्तिके आगे गाते नाचते औ ढोल बजाते हैं । समस्त तीर्थङ्कर केवल ज्ञानी कहलाते हैं । उनका नाममात्रके लिये कैवल्य ज्ञान है । उसमें अंधेरा है, अंधेरा न होता तो वे सब कुछ जान सकते । कारण यह कि, ये लोग ज्ञान उत्पत्तिके उपरान्त अपनी अज्ञानताके कारण अठारह दोषोंमें फँसते हैं । अपने पापोंका प्रायश्चित्त करते हैं । यदि उनमें कैवल्य ज्ञान होता तो न उनको पापोंमें पड़ता पड़ता एवं न उनको प्रायश्चित्त करना पड़ता । कारण यह कि, कैवल्य ज्ञान वही है, जो कि, समस्त दोष गुण बुराइयोंसे विज कर दे । इस प्रकार समस्त मनुष्य खराबियोंमें लगे हैं उनमें तनिक भी सोच विचार नहीं है ।
परमेश्वरकी प्रशंसा तो सब कर रहे हैं । गुणभी सभी गाते हैं, पर उन लोगोंके मनमें तनिक भी सोच समझ नहीं कि, वे विचार करें कि हम किसकी प्रशंसा करते हैं तथा किसको पूजते हैं ? जिनका पूजन वे करते हैं उनमें ये गुण हैं या नहीं, वे अनभिज्ञ अनभिज्ञोंके साथ लड़ते झगड़ते हैं । समस्त पृथ्वीके मनुष्योंकी यही दशा है । तीन वेद तथा तीन अक्षरोंसे यह समस्त संसार दिखाई देता है । सो तीन वेद किस स्थान तक पहुँचा सकते हैं । चौथा स्थान किसी ज्ञानीके निमित्त नियक्त है । उस श्रेणीका ज्ञान जिसे हो वह वहाँ पहुँचे वेद-पाठियोंमें से थोड़े लोग इस पुरुषका समाचार देते हैं । इस कारण ब्रह्माण्डके चित्रमें इस पुरुषका चित्र नहीं बनाया । उस सर्वश्रेष्ठ स्थानके केवल मन्दिरका चित्र बना दिया । इस सर्वोच्च स्थानमें अक्षर पुरुष रहता है इस अक्षर पुरुषको महायश कहते हैं । महा ब्रह्माभी कहते हैं । यह अक्षर पुरुष इस स्थान पर विराजमान है, उसकी अधोद्भिनी योगमाया उसके साथ है । यहाँ बड़े चमक दमकके साथ वह रहता है । उसकी मूर्ति श्वेत और बड़ीही सुन्दर है उसका चित्र प्रारंभके चित्रोंमें है ।
यही योगमाया अक्षर माया कहलाती है इससे आगे वेद तथा पुस्तकोंको तनिक भी सुध नहीं, क्षर तथा अक्षरतक वेद और पुस्तकें कह सकती हैं । निरक्षरका समाचार कोई नहीं जानता इस निरअक्षर पुरुषको जो जाने सो मुक्ति मार्ग पावे । क्षर तथा अक्षर में सब भूल रहे हैं । यह चित्र ब्रह्माण्डके ऊपरकी
है जहाँ पहले चित्र नहीं बनाया गया यहाँही पर्य्यंत वेद और पुस्तकोंकी पहुँच है, आगेकी सुध किसीको नहीं है। वेद तथा पुस्तकोंके श्रेष्ठ विद्वान्गण इस स्थानतक पहुँचते हैं। जो कोई इस स्थानपर्य्यन्त पहुँचे वो सबका राजा है, यह श्रेणी उर्फान द्वारा प्राप्त होती है। जिसके पहुँचसे यह श्रेणी प्राप्त होती है वह विद्या किसी किसी योगीमें होती है। वेद और पुस्तकोंकी तो यहाँतक सीमा है। आगेका समाचार सूक्ष्म वेद देता है, स्थानोंका विवरण विस्तारपूर्वक लिखता है। सबका ठीक ठीक विवरण करता है।
जब कालपुरुषने चार खान चौरासी लाख योनि बनाई। तब इसी चार वेद छः शास्त्र छः दर्शन और छानवें पाखण्ड समस्त धर्म इत्यादि स्थिर किए, इसीसे नरक बैकुण्ठ तथा उसके आस पासका स्थान सब कुछ नियत हुवा। जिस योनिमें जिस स्थानपर और जिस अवस्था, स्वरूप, गुण तथा धर्ममें उसके कार्य्य उसको दृढ़ करते हैं वही उसको अच्छा लगता है। अपनी करनीका खिंचा हुआ जीव जिस अवस्थामें पैठ जाता है उसीसे उसको प्रेम हो जाता है, उसीसे प्रसन्न तथा दूसरोंसे दुःखी होता है। जिस धर्म रीति और व्यवहारको स्वयम् स्वीकार करता है। वही दूसरोंको सिखलाता भी है। उसको भले बुरेकी तनिक भी सुध नहीं। वह अपने जातिका अगुवा बनकर अन्यान्य लोगोंको भी वही सिखाता, दूसरे सब उसका पीछा करते हैं। जैसे एक काग बोलता है कान, तब समस्त काग कान कान करने लगते हैं। सब गीदड़ोंका अगुवा पहले बोलता है कि, मैं राजा हूँ तब समस्त गीदड़ बोलते हैं, तू हो, तू हो, तू हो, ऐसेही समस्त कीड़ोंका अगुवा आगे निकलकर चलता है। उसके पीछे समस्त कीड़े मकोड़े चलते हैं। सारे मकोड़ोंकी फौज उस अगुवाका चूतड़ देखते और सुंघते चली जाती है। समस्त दुर्बुद्धि अपने पथदर्शकके पीछे होते हैं। इसी प्रकार सारे भेड़ोंके पीछे भेड़े चलती हैं। यही हाल सारे आदमियोंका है। इस कारण वह सब मनुष्यतासे न्यारे हैं। उनमें कोई मनुष्य नहीं सब पशु हैं। कारण यह कि, इन सबमें पाशविक बुद्धि है। जो कोई मनुष्य होगा सो कदापि ऐसी आदत अपनी न बनावेगा मिथ्यासे सर्वतोभावसे पृथक् होकर सत्यको ग्रहण करेगा परमेश्वरको सत्य भला जान पड़ता है मिथ्या नहीं।
कबीर साहबकी आज्ञा है कि, मनुष्यको उचित है कि, परमेश्वरके स्थानमें अपने गुरुका भी पूजन किया करे। जो ध्यान ज्ञान गुरु बतावे उसीके अनुसार चला करे। कारण यह है कि, परमेश्वरको कोई देख नहीं सकता, गुरुके दिखानेसे देखने तथा जाननेका बल प्राप्त करता है। इस कारण गुरुकी श्रेष्ठता गोविंदसे
नानकशाह और जन्दाका संवाद
बढ़कर है । जो कोई गुरुकी सेवा तथा कृतज्ञताका कर्तव्य पूर्णतया प्रतिपालन करेगा वह निश्चय परमेश्वरसे संयुक्त हो जावेगा । गुरुको गोविंदकी मूर्ति जान, उसमें संदेह न करेगा तो उसका कार्य पूरा होगा । कञ्जूस तथा दुर्बुद्धि मनुष्यसे गुरुसेवा कदापि नहीं हो सकती, वे इससे दूर भागते हैं । इस कारण उनको सीधी राह नहीं मिलती ।
जितने ऋषि मुनि और पीर पैगम्बर इत्यादि हुए हैं, सबमें किसी सीमा तक प्रकाश हुआ है । उसके द्वारा उन लोगोंने अपने धर्म प्रचलित किए । आकाशवाणी, इलहाम, बही शब्द इत्यादि सब भायाके आयोजन हैं । वहाँ एकाई नहीं यह सब बातें विशेषतामें होती हैं, जो एक तथा बेजोड़ कहलाता है, वहाँ कोई कुछ नहीं कह सकता । इस कारण जो बहुत ज्यादा है सो मिथ्या है । चारों स्थानसे इस संसारका समस्त काम धाम धर्म सांसारिक प्रगट हो रहा है । जिवरूतसे तो समस्त कृत्योंकी आज्ञा है लाहूत अर्थात् अक्षर पुरुषकी उत्तेजना भी संयुक्त है । जैसे कि, मैं पहले लिख आया हूँ कि, मुहम्मद साहबने कहा कि, मुझको लाहूत स्थानसे आज्ञा मिली । इस शरीरके भीतर और भी कितनी मूर्तियाँ हैं जिसके गुरुने जिस स्थान तथा जिस मूर्तितक पहुँचनेका आदेश किया वह वहीं पहुँचा, उसीको वह अपना परमेश्वर तथा उपजानेवाला समझने लगा । जो कुछ पिण्ड तथा ब्रह्माण्डके भीतर दिखाई देता है, जो कहा सुना जाता है वो सब मिथ्या है । कहने सुननेसे पृथक् है । वह बिना सत्यगुरुके जाना नहीं जाता । वेद तथा पुस्तकोंकी पहुँच वहाँतक नहीं ।
यह समस्त संसार अंधा है । वेदको छोड़ सब पुस्तकें अंधेकी लकड़ियाँ हैं । समस्त विद्वान् लकड़ियोंके पकड़ानेवाले हैं । पढ़े लिखे तथा बिना पढ़े दोनों गर्भहीसे अंधे हैं । किसीको कुछ भी नहीं सूझता । दोनों सांसारिक वासनाओंमें फँसे हुए हैं । वासना तथा काम क्रोधदिने सारे संसारको अंधा बना दिया है । इस कारण, वासनासे कोई रहित नहीं हो सकता । जब उसको उचित पथकी शिक्षा दी जाती है तो यह पसंद नहीं करता है, उससे भागता है । साधु सदैवसे पुकारतें आते हैं । कोई नहीं मानता, जैसे जन्मान्धको दर्पण दिखानेसे कोई लाभ नहीं इस कारण जो लोग काम क्रोध लोभ मोहादिकके प्रपञ्चोंमें फँसकर अंधे हो रहे हैं, उनको कुछ नहीं सूझता और सत्य शिक्षा किसीके चित्तपर प्रभाव नहीं डालती जितने धर्म इस पृथिवीपर हैं जितने धर्मके अगुवा हुए हैं तथा अब हैं, सबकी यही शिक्षा है कि, जो कोई सत्यपथ चाहै तो मृतजीवित हो । पर इस बातपर कोई विचार नहीं करता कि, जीवन तथा मृत्यु किसे कहते हैं ?
समर्थन
सब धर्ममें तो उसीका तेज फैल रहा है। पर मुक्ति तो कहीं नहीं केवल कबीर पन्थमें है। इसी कारण इस धर्ममें थोड़े लोग हैं। और अन्य समस्त धर्मोंमें विष तथा अमृत दोनों मिलाये गये हैं। पर स्वच्छ अमृत तो केवल एकही धर्ममें है, मेलसे कुल संसार बना है, मुबितसे नाश है। जब उसकी वासना पृथक् होगई तो जगत् कहीं? जिसने स्वच्छ अमृत पी लिया उसके निमित्त यह जगत् तुच्छ है। सनत्कुमारको पार्वतीजीने दो बार शाप दिया, एक बेर आशीर्वाद दिया। आप शापसे अप्रसन्न तथा आशीर्वादसे प्रसन्न भी न हुए क्योंकि, उनका मन सांसारिक कामनाओंसे पृथक् था, उनका कोई भिन्न वैरी न था, दोनों अवस्था दुःख सुख राज्य तथा फकीरी नरक और त्रिविष्टय तथा उसके निकटवर्ती स्थान सब एकसे हैं कहीं किसीको चैन तथा सुख नहीं है।
अध्याय १३।
ज्ञानीजी महाराज।
जब तीन लोककी रचना हो चुकी तब कालपुरुषने असंख्य युगपर्यंत तीन लोकपर वेखटके, राज्य किया, समस्त मनुष्योंको लवेद तथा पुस्तकोंके बंधनमें फँसाया सत्यपुरुषका नाम छिपाकर अपनेको उत्पन्न कर्ता तथा समस्त संसारका मालिक ठहराया, अवर्णनीय तथा अनिर्वचनीय सत्यपुरुषने इस विषयकी ओर तनिक ध्यान भी न दिया। परमात्माका ध्यान पृथ्वीकी ओर मुड़ा देखा कि, कोई जीव सत्यलोकको नहीं आया, किसी मनुष्यने मुक्तिमार्ग नहीं पाया, समस्त जीवोंको कालपुरुष फँसाकर खा रहा है। तब ज्ञानीजीको बुलाकर कहा कि, ए ज्ञानीजी! आप अब पृथ्वीपर जाओ, कालपुरुषके फन्देसे मनुष्योंको छुड़ाकर मेरे लोक पहुँचा दो। तब ज्ञानीजी पृथ्वीपर आए, भिन्न भिन्न नामोंसे प्रख्यात हुए। पर आपके चार नाम चारों जगमें खूब प्रख्यात हुए। यद्यपि आपके अनगिनती नाम हैं, पर पूर्वलिखित चारों नाम अधिक प्रसिद्ध हैं।
सत्य पुरुषके जितने जीव हैं, सबमें ज्ञानीजी महाराज श्रेष्ठ हैं, सूक्ष्म वेदका कथन है कि, ज्ञानीजी आपही सत्यपुरुष हैं। सत्यपुरुष तथा ज्ञानीजीमें तनिक भी विभिन्नता नहीं है। सत्य सुकृतजी, मुनीन्द्रजी, करुणामय स्वामी, कबीर ज्ञानीजी, इन चारों नामोंसे चारों युगोंमें प्रसिद्ध होते हैं, अनगिनती मनुष्योंको पथ दरशाकर परम धामको पहुँचाते हैं। कबीर साहब स्वयम् सत्यपुरुष हैं, आपकी दया दृष्टि समस्तजीवोंपर एकसी हैं, आपके गुण कहने सुननेके बाहर हैं। जो गुण सत्यपुरुषमें हैं वे ही गुण कबीर साहबमें हैं, केवल
प्रलयकी समानता
देखनेको शरीर है, वास्तविक नहीं, आप तो विदेह हैं। मनुष्योंके उपदेशार्थ आपकी देह मनुष्योंकी होती है। क्योंकि, मनुष्यको केवल मनुष्यही शिक्षा दे सकता है, अन्य कोई नहीं। कालपुरुष बड़ा बलिष्ठ है। बिना सत्य पुरुषके दूसरे किसीसे दमन नहीं हो सकता। इस कारण स्वयम् पुरुष कबीरसाहबकी देहमें प्रगट हुआ वही यहाँ है, वही वहाँ है काल पुरुषके विषको नस नसमेंसे वही दूर करता है। वह अपने निजके सेवकोंको दर्शन देता है। वह सत्यके स्थानपर वर्तमान हो देखता रहता है, वह सदैव छिपा हुआ है; अपने गुलामोंसे बातें करता रहता है। जब नितान्तही दया होती है तब प्रगट हो जाता है। परदाको पृथक् कर देता है। वह अपने सेवकोंसे विशेष प्यार करता है प्रत्येक स्थान तथा प्रत्येक समय उनकी रक्षा करता है। कबीरका नाम सुनतेही काल यम भाग जाते हैं, जो कोई सत्यगुरुके नामका चिह्न पाता है वह परमरूपसे मिल जाता है कि, जहाँसे फिर कभी नहीं गिरता।
एक उदाहरण—उसके नाम की श्रेष्ठतामें बड़े इस प्रकार कहते हैं कबीर-साहेबके पास जाकर एक साधुने इस प्रकार प्रश्न किया कि, महाराज ! मुझे, अर्थ, धर्म काम और मोक्षकी युक्ति बताओ मुक्ति किस प्रकार प्राप्त हो ? कबीर साहबने उस साधुसे कहा कि, अमुक स्थानपर उजाड़में एक कुतियाने चार बच्चे दिये हैं। उन चारोंमें एक बच्चा अबलक रङ्गका है उसके पास चले जाओ, मेरा नाम लेकर यही प्रश्न करो। तब वह साधु उस उजाड़में गया। उस कुतियाको उसके बच्चों सहित वहाँ पाया। अबलक रङ्गके बच्चेके सामने जाकर यही प्रश्न किया। जब उस बच्चेके कानमें कबीर साहबके नामका शब्द पड़ा तो वह उसे सुनतेही मर गया। फिर वह साधु कबीर साहबके पास पलट आया प्रगट किया कि, आपका नाम सुनतेही वह अबलक बच्चा मर गया है तब कबीर साहबने कहा कि, कुछ दिवसोंपर्यन्त संतोष करो। कुछ दिवसोंके उपरान्त कबीर साहबने कहा कि अब तुम अमुक भङ्गीके घर जाओ उसके एक बालक उत्पन्न हुआ है उससे इस प्रश्नका उत्तर माँगो। तब साधु उस भङ्गीके घर गया। वह प्रश्न उस बालकसे किया। कबीर साहबका नाम सुनतेही भङ्गीका लड़का मर गया। तब वह भङ्गी रोने तथा चिल्लाने लगा कि, इस साधुने कुछ कर दिया जिससे मेरा बालक मर गया। वह साधु भागकर कबीर साहबके पास आया समस्त वृत्तान्त कह सुनाया। कबीर साहबने उस साधुसे कहा कि, कुछ दिन और ठहरो। फिर कुछ दिवसोंके उपरान्त आपने उस साधुसे कहा कि, अमुक राजाके घर जाना मेरा नाम लेना। उस राजाके घर पुत्र उत्पन्न हुआ
पाप पुण्यका हिसाब ब्रह्माण्ड पागल खाना
है वह बच्चा तुमको तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर देगा। तब वह साधु भयभीत होकर कहने लगा कि, महाराज ! यह कार्य मैं कदापि नहीं करूँगा क्योंकि, दो स्थानों-पर आपका नाम लेकर मैं कौतुक देख चुका हूँ। कुतिया और भङ्गीका बच्चा मर गया। अब फिर मैं राजाके बालकके सामने जाकर आपका नाम लूँ वह भी मर जावे तो वो मेरी बुरी गति बनावेगा। तब कबीर साहबने कहा कि, वह राजकुमार कदापि नहीं मरेगा। तुम निडर होकर जाके उससे पूछो। तब वह साधु उस राजकुमारके समीप गया। कबीर साहबका नाम लेकर अपना प्रश्न किया, उस समय वो राजाका पुत्र बोला कि, ए साधु ! तू कान लगाकर सुन मैं उस कुतियाका अबलक बच्चा हूँ जिसको पहले तूने कबीर नाम सुनाया था। उस नामके सुनतेही मेरी कुत्तेकी देह छूट गयी मैंने भङ्गीके घर जन्म पाया। पशुसे मनुष्य हुवा फिर तूने जाकर जब मुझे कबीर नाम सुनाया तब मेरी भङ्गीकी देह भी छूट गयी उसी नामके प्रभावसे अब मैं बादशाहका पुत्र हो गया अब मैं इस देहद्वारा परम धामको सिधार्हूँगा फिर कदापि आवागमन न होगा। अतः जिस जीवपर इस सत्यपुरुषकी दया हुई वह पशुभी इस सीमापर्यन्त पहुँच गया, मनुष्यकी तो गणनाही क्या है। यह बात सुनकर नामकी श्रेष्ठता स्वच्छसुसे देखकर वह साधु आकर कबीर साहबके चरणोंपर गिरा। इस सत्यपुरुषकी कृपाकटाक्षही मनुष्यके लिये यथेष्ट है दूसरी बात कुछ भी नहीं है। वही सत्य-गुरु सबका कर्ता धनी है। चाहे तो एक पलमें समस्त संसारको मुक्ति प्रदान कर दे। दूसरे किसीमें यह सामर्थ्य तथा वश नहीं जो कि सब कालपुरुषके जालमें फँसे हैं।
ज्ञानीजीके नाम।
सत्य सुकृतजी, मुनीन्द्रजी, करुणामय स्वामी, कबीर साहब ये चारों नाम तो चारो युगमें अधिक प्रसिद्ध होते हैं। पर समस्त नामोंसे आपकी प्रशंसा वेद, पुराण, ऋषि, मुनि पीर, पैगम्बर इत्यादि करते हैं। अनगिनतीनामोंमें से कुछ नाम ये हैं :—
ज्ञानी, अमर, अमर, अचिन्त्य, अक्षय, अविनाशी, आदिब्रह्म, अम्मर-पुरवासी, अदली, अमी, अनेह, अजावन आदि, सत्यमत, परमानंद, अखिल-सनेही, सत्य नाम, सत्यपुरुष, विदेही, निष्कामी निहंकर, अविगत, अगम, अपार, अनन्त, अभेद, अचल, अक्षय, अगोचर, अलेख, अभय, अवगाह, पुरुष-पुराण, हंसपति, हरम्बरमण, भवसागरतारन, अरूप, अथाह, अनाजदराता, सच्चिदानन्द, योगसंतायन, सुखसागर, सुरतनाम, अंकुर, शुभदानी, प्रथम-
पुरुष, अम्बूद्वीप, पुरुषोत्तम, सर्वमयी, साधुमति, भक्तराज, सत्यसन्तोष, स्नेही शब्दरूप, अविचलदेही, प्राणनाथ, अमृतवाणी, सत्यलोकपति, सत्यगुरु, जन्मनिवारन, वन्दीछोड़, बंदमुगतावन, शीलरूप, धर्मरायशिरमर्दनहार, मुक्तिदाता, राज्यनायक, शीतलउजियारा, परायण, अस्थिरनाम, अभयपददाता, सत्यसाहब, अक्षयवृक्ष, पुष्पद्वीपमण्डन, गुरुसाचा, हंससोहृद्भम्, सोहृद्भशब्द, कण्डहार, शठहार, इच्छारूप, ज्ञानबीज, अमोल, अबोल, अशोच, धीर, अन्तर्यामी, परिचय, विदेह सहीछाप, गुप्त, पोहृद्भ, विहृद्भ, निःशब्द, विषहर, शब्द सत्यशब्द, अजावन, निःसत्त्व, विहृद्भम्, अग्र, उम, अजीत, अर्ध अजीत, अर्ध स्थिति, संजीवन, निर्गुण, आदिऋषि, सत्यसमर्थ, गङ्गपुरुष, योगजीत, सधिक नौतम, मुक्तामणि, चूडामणि, सुकृत, धर्मऋषि, जन्दा इत्यादि अनगिनती नाम हैं। इतने नाम तो मने, कबीर एकोत्रीसे नकल किये हैं। अरब और फारसके लोग आपको सैयद अहमद कबीर और शेख कबीर कहते हैं। आप अविनाशी इत्यादि नामोंसे ग्रंथोंमें प्रसिद्ध हैं।
शेर—नहीं नाम जिसके पायान है। सिफ़तस सब उसीकी हिंशायान है ॥
जो बेचूँ चुरा नामनामी हुवा। वह सब अञ्जियामें गिरामी हुवा ॥
लताफ़तकी छोड़ा कसाफ़त लिया। जहाँ की बला और आफ़त लिया ॥
नहीं नाम जिसका न कोई मुकाम। बहर जाय मौजूद हर शैनदाम ॥
जो है लाबयों उसका दारुलकरार। मुजस्मिम हुवा नाम है बेशुमार ॥
मुकद्दस कुतुब वेदबानी बयान। जो देखे पढ़े उसको हो सब यान ॥
जहाँ में जो मशहूर युग चार हैं। जुदा नाम उसके बहरबार हैं ॥
अब औव्वल यही मानना चाहिये। कबीर गुरु किसे मानना चाहिये ॥
हुए और हैं कते कबीर। वही सबका हादी है पीरान पीर ॥
जो औव्वलमें पैदायश इबतदा। परम आत्मासे हुई यह नदा ॥
पुरुषने इसे पहले ज्ञानी कहा। व मुखलूकपर हुकमरानी कहा ॥
पुरुष और ज्ञानी हो सूरत हुए। लताफ़त कसाफ़तकी मूरत हुए ॥
वह खुद आपको पुरुषज्ञानी किया। जगत जीवकी मेज़बानी किया ॥
वह अव्वलमें ज्ञानी व आखिर कबीर। मुबर्दा हुवा हिंस रोशन जमीर ॥
जमीमें फुँगा और नालः हुवा। यह दिल देव दुःखका कबला हुवा ॥
किते नामोंसे खुदको मशहूर कर। वह जाहिर हुवा जगतमें रूपधर ॥
वही खलकका आफ़री निन्दः है। वही बन्दः आसीका बर्खाशन्दा हैं ॥
पागलोंके काम
मुखम्मस तरजीअबन्द ।
नहीं कोई शुक्र हकका हक अदाकी । न जाने भेद इस साहब सदाकी ॥
जो हाशै खबर देरहे वकाकी । दिखावै राह उस गयाव खुदाकी ॥
सिफत क्योकर करूँ इनसों हूँ खाकी ।
तु है सत-पुरुष और ज्ञानी गुरु है । हम मौजूद सबके रुवरू है ॥
कि गुल ओ खारमें सब तेरी बू है । जहाँ देखो वहाँही तूही तू है ॥ सि० ॥
जितने सिद्ध साधु पैगम्बर जहाँके । करें सब वस्फ उस क्षाहैं शहाँके ॥
न जाने भेद इसरारे निहाँके । कहाँ घर और चले रहले कहाँकी ॥ सि० ॥
फिरिस्तः आदमी और आविदाँ सब । न जाने कोइ तुझ हम दोसना ढव ॥
हैं कहते सारेत खालिक मेरा रवाकरे । क्योकर करम किसतौर और कब ॥ सि० ॥
तु है खालिक व मालिक आलमोंका । तुही रहबर है मुनासिफ़ जालिमोंका ॥
करे तू काम पूरा आशकोंका । अँधेरा घर बनाया फासिकांका ॥ सि० ॥
थके गुण गावते शेष और शङ्कर । विसराह नारदो उलसाय बरतर ॥
खड़े सब दस्त वस्तः तेरे दरपर । तु है मल्लाह और अल्लाह अकबर ॥ सि० ॥
भटकता फिरता था ए खिज्ज मेरे । रहीमा रहम आइ दिलमें तेरे ॥
पडा खाना था गीत जमके घेरे । इस आजिज को चढ़ाया आने बेड़े ॥ सि० ॥
मुसद्दस ।
अहदो पैमान आदिमें लाया । देह नर धरके आ किया दावा ॥
कालने जगत जीव धर खाया । मुक्तिकी युक्ति सबको बतलाया ॥
नाम तेरो तुफ़्फ़्ज़ ज़मदर है । अकबर अकबर कबीर अकबर है ॥
लोक तीनोंमें काल घेर किया । रहम करते न आप देर किया ॥
मार दुश्मनको उसने ज़ेर किया । दोस्त अमृत पिलाके सेर किया ॥
शब्द शमशीर ढाले बकतर है । अकबर अकबर कबीर अकबर है ॥
धोखेके धूलको उडा डाला । कुफ़ औ शिर्कको मिटा डाला ॥
सारे जाहँर पर दया पाला । देश देशोंमें की नयी चाला ॥
चीन तुकोँ फिरङ्ग बर बर है । अकबर अकबर कबीर अकबर है ॥
कालके जालको वही तांडे । नाम नरमान हब्बसो जोडे ॥
कर्म औ भर्म भाँडेको फोडे । तीरतकदीरको वही मोडे ॥
सत्यनाम पयाम घर घर है । अकबर अकबर कबीर अकबर है ॥
जो हुवा खाककबर करके दूर । हिलमुनोवर हुआ है उसके नूर ॥
मत चलो चढ़ ऊपर गिरने मगरूर । बंदा आजिज हुवा कदमकी धूर ॥
खुद खुदाबंद खास वर तर है । अकबर अकबर कबीर अकबर है ॥
ग़ज़ल—वेदा हुआ यारको कहूर कहाँ मैं देखा ।
हर रङ्ग व ढङ्ग बाहर शानमें देख ॥
जो गुल नहीं देखा था कभी बूलबूल वीमार ।
सो दीदए वरदीद गुलस्तानमें देखा ॥
जब खोल दिया चश्म हा आलम नज़र आया ।
छिपकेही फ़ना हो मज़ः पैकानमें देखा ॥
वही अकबर अल्लाह वहीँ कित्रिया कबीर ।
वही बांग़ज़नी गबरो मुसलमानमें देखा ॥
खुद आपही आया बहरे अदल व इनसाफ़ ।
जब जुल्मो ज़रर मुल्क सुलेमानमें देखा ॥
तुझ बाँधी सिर मूय हो जिसनूरसे मामूर ।
सो नूर नहीं हूर न गिलमानमें देखा ॥
आजिजका लिया हाथ पकड़ डूबते फ़िलफ़ौर
अज़ मेन्ह पिदर सील व तूफ़ानमें देखा ॥
ग़ज़ल—और शान कहाँ कोई तेरी शानके आगे ।
और खाना कहाँ खानए नरवानके आगे ॥
सब सगुण और निर्गुण तुझहीसे है व्यापार ।
दूकान कहाँ निर्गुण दूकानके आगे ॥
सब खिलक़तका खेल जो ख़रदिलमें दिखाया ।
और इल्म कहाँ कोई तेरे उरफ़ानके आगे ॥
जीते हैं सलातीन ज़मीन और फलकके ।
सब खाक कदम साहब सुलतानके आगे ॥
आजिजका लिया हाथ पकड़ डूबते दरबह ।
न मुहसन गुरु पीर मेहरवानके आगे ॥
शेर—वही जगतका आत्माराम है । करीमो रहीम उसका ही नाम है ॥
वही वार है और वही पार है । वही वेदवानी वही सार है ॥
वही दैरमें है हरममें वही । वही सख्तमें है नरममें वही ॥
वह खुद खुदका अदही^१^ व पैगम्बर । वह बाहर क्यासो गुमाने वशर ॥
जहाँ मैं निहँ^२^ उसका इसरार^३^ है । कहीं गुल खिला है कहीं खार है ॥
गुनह वखशे^४^ एक आनकी आनमें । सनाखों हैं सब उसकी ही शानमें ।
जो पहचान कोई करीमुन नफस । न हो कैंद सो अनसरीके कफम ॥
नहीं दूसरा उसका सानी हुवा । हमलमें जो आवे सो फानी हुवा ॥
वह ही पखरो दादगर जुलजलाल । मुजस्सिम हुवा देख दिलपर मलाल ॥
बिन्न आदमथे जब सब गामोरञ्जमें । गिरफ्तार जव्वारके पंजः में ॥
छोड़ा आन अज पंजए जालिमी । किया बेखतर खौफसो आलिमी ॥
जहाँ जाजमें नूर पैदा हुवा । जबोंमें अमौ वह हवीदा हुवा ॥
गजल—तुझ सही तो है और न कोई नजर^५^ आया ।
तुझे रूप निगह हरदोज^६^ हौसे हजर आया ॥
खुरशीद^७^ खिजल होके छिपा अन्नके^८^ अन्दर ।
जब रश्ककम^९^ आप जमीं पर उतर आया ॥
वह जाय मुबारक हुए जहाँ रौनक अफरोज ।
धरतेही कदम^१०^ शोर जमींसे शजर आया ॥
था बाग पड़ा खुशक^११^ नहीं फूल न फल था ॥
सरसब्ज^१२^ हुआ फजले सनमसे शमर आया ॥
न फसानी हुवा रामही आरामसे मखलूक ।
यह देखिए इस 'सारशबदका असर आया ॥
रो रोके 'शबेहिज्र कटी दर्दमें आजिज ।
तुझ चेहरए ताबोंसे शिताबों सदर आया ॥
यथा—जब दावर दादार फनादारमें आया ।
अंकार व अँकार निरङ्कारमें आया ॥
ब्रह्मा वही विष्णू वही शिव शक्ति निरंजन ।
पोशीदः जो था आपही इजहारमें आया ॥
बुलबुल वही सम्बुल है गुल नरगसे हैरान ।
अपनेही तमाशेको वह गुलजारमें आया ॥
वही मस्जिद गिर जामे वही ठाकुर द्वारा ।
वही बैत हरम खलिए खुम्भारमें आया ॥
१ एक २ छिपा, ३ तेज, ४ सभा, ५ दृष्टि, ६ दोनों लोकोंमें, ७ सूर्य, ८ बहल ९ परम तेजस्वी, १० चरण, ११ सूखा, १२ हराभरा, १३ कृपा, १४ शब्द, १५ वियोगकी रात ।
हंसकबीरकी स्थिति
वही बीज वही शाख गुलो बर्ग शुमर है ।
खिलबतसे निकल जलकते दरबारमें आया ॥
वही मेन्ह वही माह वही खोशए परवीं ।
वही कोकब सैयार दुमदारमें आया ॥
हरमानी मतनमें न बदर नकशो निगार ।
तस्बीर वही शंगरफो जङ्गारमें आया ॥
बेचन चरा बन्देके खूनपैकर रहम ।
आजिजके बचानेको सो बाजारमें आया ॥
यथा— सतपुर्ष^१^ आप कबीर हैं । नर मन न सुर गुरुपीर है ।
सब सन्त मिलकर यों कहो । वह पुरुष माया पार है ॥
सो गुल खिला बुस^२^तानमें । बू फैल हिन्दुस्तानमें ॥
सब बुलबुलें गाती हैं यो । वह आप शब्दसार है ॥
डाले गले सब तौक^३^में । सब कुमारियाँ इस शौकमें ॥
करती हैं सब गुप्तगू^४^ । ठाकुर तुही करतार है ॥
दया किया नर शोकसे । सद्गुरु चले सतलोकसे ॥
सब हंस मिलकर यों कहो । तुही पार है तुही वार है ॥
हंसोकी जो सब टोलियां । पहचान सागुर बोलियां ॥
लपटे क्रदम अल^५^फौर यों चुम्बक जो लोहा प्यार है ॥
पीर औलियां पैगम्बरान । सिद्ध साधु यों खोले जबों ॥
(बोले अलख अल्ला तु है । पिन्हों^६^ तेरा इसरार है ॥
सब तूतिया शा^७^री नवा । जाती हैं बाना जो अदा ॥
अल्लाह अकबर कित्रिया । सुन शब्द धुन झनकार है ॥
हर हजारो बुलबुलें । जिस हिजमें "नालै^८^ करें ।
वह बू बहरजा दूबदू । हर गुलमें और हर "खार है ॥
हम्दे सरायां सर्व मन । गरकाब जिसके ध्यानो धन ॥
जाहिर न बाहर देखले । हरकूच^९^ दूर बाजारमें ॥
"इनसान अंधा खोटमें । शहना छिपा खूस ओटमें ॥
जब "दस्तगीरी खुदकरे । सत्यपुरुषका दीदार^१०^" है ॥
बन्दः नेवाजाः बन्द पर । कर फ़जल "गुंनह आनन्द पर॥
१ सत्य पुरुष, २ बनारस, ३ गलेकी हथकडी, ४ बातें, ५ सत्यलोकके वासन्दे जीव
६ उसी वृक्ष, ७ छिपा हुआ, ८ मीठी । ९ परमात्मा, १० सामने, ११ काँटा, १२ मनुष्य,
१३ हाथों हाथ, १४ दर्शन, १५ दया,
सदहा^१^ करें तब वदंगी । वह बन्दः सब सरदार है ॥
गिरजाओ वृत्तखानः हरम^२^ सबज वजा तेरा धरम ॥
कालो दयाल वह आप है । गफ्फार और जब्बार है ॥
साहब कबीर वह एक है । सतनाम जिसकी टेक है ॥
हैवाहिद^३^ औरयूकता वही । गुन ज्ञानकी टकसार है ॥
गुजरी जो शव^४^ अब भोर है । इनसानो हैवान^५^ शोर है ॥
पहचानले रहमानको । जो कुलमकां मुखतार है ॥
चिड़ियोंकी सुनकर चेहचहे । आजिज^६^ तु क्यों कर चुप रहे ॥
लाजिम^७^ है तुमको यों कहे । कब्बीर कुल आधार है ॥
एक तुच्छ दरिद्री इस विद्याकी तथा उस महाशयकी प्रशंसा क्या कर सकता है जब कि, कोई देवता अथवा मनुष्य उसकी प्रशंसा नहीं कर सकता-सब विवश हैं । सब तूही तू करके विस्तब्ध रहजाता हैं, चारों युग तथा तीनों कालके ऋषि मुनि बराबर पुकारते चले आ रहे हैं कि, सत्य पुरुष तू है । सत्य कबीर तू है, स्वयम् सत्यपुरुष तू है । तेराही नाम बन्दीछोर है, तेरे अतिरिक्त दूसरा कोई भी मनुष्योंको छुटकारा देनेवाला नहीं है । तेरी प्रशंसा दोनों सूक्ष्म वेद तथा पुरस्म वेद करते रहते हैं, तूही परमात्मा है ।
छन्द सर्वैया ।
वेद थके^८^ गुण गावत जासु^९^ न भेद लखे^१०^ सतलोकपतीको^११^ ।
गारजकारन^१२^ धार भेख^१३^ लखे कहु कौन अलेखै^१४^ गतीको ॥
सृष्टिको साज^१५^ चल महाराजदले^१६^ दुख आज सो मुक्त मतीको ।
नाद^१७^ व विन्दके^१८^ बीचबसे^१९^ मनरोन^२०^ सो भौन^२१^ हैजन्म^२२^ जतीको ॥
रमैनी -करता^२३^ होय हम जग सिरजाया^२४^ । गुरुस्वरूप^२५^ मुक्तावन^२६^ आया ॥
तन मन भज रहु मोरे भक्ता । सत्य कबीर सत्य है वक्ता ॥ ९ ॥
आपै^२७^ देव आपही पाती^२८^ । आपै धर्म आप कुल जाती ॥ १० ॥
सर्व भूत संसार निवासी । आपै खसम^२९^ आप सुखवासी ॥ ११ ॥
चौथी २० -जो चीन्हें ताको निर्मल अङ्गा । अनचीन्हें^३०^ नर भए पतङ्गा^३१^ ॥ ५ ॥
बावन बीर कबीर कहावन । कलियुगकरे जीवमुक्तावन ॥
१ सदा, २ मंदिर, ३ एक, ४ रात, ५ पशु, ६ दुबी, ७ उचित । ८ हारगयें, ९ जिसका, १० देखें, ११ सत्यपुरुष, १२ जरूरत, १३ वाना, १४ अकथ, १५ सजाकर, १६ नष्ट करे, १७ नाद वंश १८ विन्दवंश, १९ रहे, २० राजी, २१ खुशी, २२ जिन्दा २३ कर्ता, २४ रखा, २५ गुरुवन २६ मुक्त कराने, २७ आप ही, २८ बलि, २९ मालिक, ३० बिना जाने, ३१ पतिंग ।
१२ अध्याय : विश्वास
देखो ज्ञानगुदरीके अन्तमें ।
श्रद्धा चँवर^१^ प्रेमके धूपा । नौतम^२^ सूरत साहबका रूपा ॥
गुदरी पैर आप अलेखा । जिन यह प्रगट चलाई भेखा^३^ ॥
साहब कबीर बक्स^४^ जब दीन्हा^५^ । सुरनर मुनि सब गुदरी^६^ लीना ॥
देखो ग्रंथ भवतारण धर्मदास वचन ।
संशय^७^ किए एकही ओरा^८^ । तुमही थे कि, है कोई औरा^९^ ॥
सत्य सत्य सा मोसे कहिए । संशय रहत^१०^ सोई पद^११^ गहिए^१२^ ॥
सत्य कबीर वचन ।
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । सकल भेद^१३^ मैं कीन्ह प्रकासा^१४^ ॥
जौन^१५^ परतीत होय जिव^१६^ तोरा । भवको मेट संग रहो मोरा ॥
धरमदास तुम छोड़ो माया । अस्थिर^१७^ अमर अखण्डित काया^१८^ ॥
भक्ति मुक्ति उपजी^१९^ है जासों । प्रेमको लगन^२०^ लगाओ तासों ॥
साखी—अब तो वह ठौर^२१^ बतावहुँ^२२^, निर्मल ठौर निनार^२३^ ।
सबसे पर^२४^ सबसे ऊपर^२५^, जहाँ एक ओंकार ॥
चौपाई—पुरुष कहो तो पुरुषौ^२६^ नहीं । पुरुष भया^२७^ मायाके माहीं ॥
शब्द कहो तो शब्दौ^२८^ नहीं । शब्द भया मायाके माहीं ॥
द्वै विन होय न ओम् आवाजा^२९^ । कहिए कहासु^३०^ काज अकाजा ॥
नाम कहो तो नाम न ताका^३१^ । नाम राय काल है जाका ॥
है अनाम^३२^ अक्षरके माँही । निह अक्षर कोई जानत नहीं ॥
धर्मदास तहाँ बास हमारा । काल अकाल न पावे पारा^३३^ ॥
ताकी भक्ति करै जो कोई । भवते^३४^ छूटे जन्म न होई ॥
साखी—भवतारन^३५^ भरमै^३६^ नहीं, यही परताप^३७^ हमार ।
निश्चय करिके मानि^३८^ है, तो उतरे भवनिधि पार^३९^ ॥
धर्मदास वचन ।
हे स्वामी यह अकथ^४०^ कहानी । आगे सुनी न काहू^४१^ जानी ॥
जहाँ वहाँ तुम समरथदाता^४२^ । मोको जान^४३^ परी^४४^ यह बाता ॥
१ चमर, बीजना, २ नूतन, ३ भेष, पन्थ, ४ दान, ५ दिया, ६ ज्ञान गुदरी, ७ सन्देश, ८ तरफ, ९ दूसरा, १० हीन, ११ स्थान, १२ स्वीकार करिये, १३ हाल, १४ जाहिर, १५ जो, १६ दिल । १७ स्थिर, १८ शरीर, १९ पैदा हुई, २० लौ, २१ जगह, २२ बताओ हूँ, २३ निराला, २४ परे, २५ शिरमोर, २६ पुरुष भी, २७ हुआ, २८ शब्द भी, २९ शब्द, क्या, ३० जिसका, ३१ नाम बिना, ३२ बिना, ३३ थाह, ३४ संसारसे, ३५ संसारके पार करनेमें, ३६ भूले, ३७ प्रताप, ३८ मानेगा, ३९ किनारे पर, ४० नहीं कहीं जानेवाली, ४१ किसीने भी, ४२ सामर्थ्यवान् ४३ मालूम, ४४ हुई, ।
नाम कबीर धरयो सो काहे^१^ । कारण कौन देह धरि आए ॥
देहधरे^२^ सबही दुख पाया । तुमका काहेन व्यापी माया ॥
सत्य कबीर वचन ।
हो धर्मदास कहो तुम साचा । मिथ्या^३^ नहीं तुम्हारे बाचा^४^ ॥
तुमहो अंसवंस पति राजा । तुम्हारे मोह करनेके काजा ॥
आदि अनादि समीपै^५^ मोरा । अब मैं कारज करिहौँ^६^ तोरा^७^ ॥
वहोंसे तुमको दीन्ह^८^ पठाई । यहाँ आनके लागी काई^९^ ॥
कालपुरुष राख्यो^१०^ विलम्हाई^११^ । जो सब सृष्टि बनाए खाई ॥
जग जीवनसे तुम हो न्यारा । तुम्हारे काज^१२^ लीन्ह^१३^ औतारा ॥
और कारज मोरे कछु नाहीं । रहूं निरन्तर^१४^ जगके माँही ॥
मोहि न व्यापी^१५^ जगकी माया । कहन सुननको है यह काया^१६^ ॥
देह नहीं और दरसे^१७^ देही । रहूं सदा जहाँ पुरुष विदेही^१८^ ॥
यह गतिको नहि जानै कोई । धरमदास तुम राखौ गोई^१९^ ॥
आदि पुरुष निह अच्छर जानो । देही धरि मैं प्रगट बखानो^२०^ ॥
गुप्त^२१^ रहूं नाहीं लिखपाया^२२^ । सो मैं जगमें आन चिताया ॥
जुगन जुगन आयो संसारा । रहूं निरन्तर प्रगट पसारा ॥
सत्ययुग सत्य सुकृत वही खेरा । त्रेतानाम मुनिन्दर^२३^ मेरा ॥
द्रापर करुणामय^२४^ नामधराया । कलियुगनाम कबीर कहाया ॥
चारों युगमें चारों नावन^२५^ । माया रहित रहूं सब ठावन^२६^ ॥
सो जग पहचाने नहि भाई । सुर नर मुनि रहे मुखगाई^२७^ ॥
बीजक शब्द ।
नरको नहि परतीत^२८^ हमारी ॥
झूठे बनज^२९^ कियो झूठे सँग, पूंजी सबन मिल हारी ॥
षट्दर्शन^३०^ मिल पंथ चलायो, तिरदेवा^३१^ अधिकारी ॥
राजा देश बड़ो परपञ्ची^३२^, रैयत^३३^ रहत उजारी^३४^ ॥
१ क्या, २ शरीर धारण किये पीछे, ३ हे झूठ, ४ वचन, ५ समीपी, ६ करुणा, ७ तेंरा, ८ दिया, ९ माया । १० रखा, ११ विरमा, १२ लिये, १३ लिया, १४ हमेशा, १५ लगी, १६ शरीर, १७ प्दीबे, १८ सत्यपुरुष, १९ छिपा, २० कहो, २१ छिपा, २२ देख, २३ मुनीन्द्र, २४ करुणाके खजाने, २५ नामोसे, २६ जगह, २७ कह रहे हैं, २८ विश्वास, २९ व्यापार, ३० जोगी, जंग, सवेग, सन्यासी, दरवेश और ब्राह्मण, ३१ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, ३२ बखेडी, ३३ प्रजा, ३४ ऊजड, ।
उतते' इत इतते' उत राखन, यमकी साट सँवारी ॥
जीवनकपि' डोर बाँधे बाजीगर, अपनी खुशी परारी' ।
यही टेटरुं उतपत' परलयको', विषया' सभैं बिकारा' ॥
जैसे श्वान अपावन' राजी, तेवन' लागी संसारी ।
अजहूँ'' लेऊँ छोड़ाय कालसे, जो करसुरत'' सम्हारी'' ॥
प्रतिज्ञा अङ्गकी साखी ।
कबीर- शब्द'' हमारा आदिका'', इनसे बली न कोय ।
आगा पीछा सो करे, जो बलहीन'' होय ॥
कबीर- घर घर हम सबसे कहा, शब्द न सुने हमार ।
ते भवसागर बुडहीं'', लख चौरासी धार ॥
कबीर- हङ्ग त्वङ्गके बीचमें, मेरा नाम कबीर ।
जीव मुक्तावन'' कारण'', अविगत'' दासकबीर ॥
कबीर- झहां करतमन'' था, धरती'' हती न नीर ।
उतपत परलय नाहती, तबके कथी'' कबीर ॥
हम कर्ता सब सृष्टिके, हम पर दूसरा नाहिं ।
कहैं कबीर हमें चीन्हे'', नहिंपरे चौरासी माहिं'' (बीजक६२९)
कबीर- लोहा चुम्बक प्रीति, जस'' लोहा लेत उठाय ।
ऐसा शब्द कबीरका, कालसे लेत छुड़ाय ॥
कबीर- यह संसारको, समझायो सौबार, ।
पूँछ जो पकड़ी भेड़की, उतरा चाहे पार ।
कबीर- मैं कलिका कोतवाल'' हूँ, लेहहो शब्द हमार ।
जो या शब्दको मानि है उतरै भवजल पार ॥
कबीर- शब्द उपदेश जो मैं कहूँ, जो गोई माने सन्त ।
कहैं कबीर बचावके, ताही'' मिलावन'' कन्त'' ॥
कबीर- हिन्दू तुर्कके बीचमें, मेरा नाम कबीर ।
जीव मुक्तावन कारणे, अविगत धरा शरीर ॥
१ इससे उस जोनमें, २ उससे इस योनमें, ३ बन्दर, ४ पड़ा हुआ, ५ उत्पत्ति, ६ प्रलय,
७ विषय रूप रस आदि, ८ परिवर्तनशील, ९ अपवित्र हाड़ आदि, १० तँसेही, ११ अवभी,
१२ याद, १३ सावधान । १४ रामनाम, १५ अनादि, १६ कमजोर, १७ डूवेंगे, १८ मुक्तकराने
१९ लिये, २० विचारनेमें न आये, २१ कृत्य, २२ पृथ्वी, २३ कहीं, २४ जाने, २५ भीतर,
२६ जँसी, २७ रखवाला, २८ उसीको २९ मिलाने, ३० मालिक,
कबीर- जाय मिल्यो परिवारमें, सुखसागरके तीर ।
वरण पलट हंसा किया, सद्गुरु शब्द कबीर ॥
प्रेम पि^१^ छौरी तानके, सुख मन्दिरमें सोय ।
घर कबीरको पायके, कहा मुक्तिको रोय ॥
कबीर- बहुत गुरु भए, जगतमें, कोई न लागे तीर ।
वै गुरु वह^२^ जायगे, जाग्रत^३^ गुरु कबीर ॥
कबीर- पीर पैगम्बर औलिया, धर धर मरे शरीर ।
अजर अम्बर^४^ पलटे नहीं, ताका नाम कबीर ॥
मैं कबीर । बिचलों^५^ नहीं, शब्द मोर^६^ समरर्थ^७^ ।
ताको लोक पठाइहों, जो चढ़े शब्दके रथ^८^ ॥
कबीर- ओंकार निश्चय किया, यह कर्ता मत^९^ चान ।
साँचा शब्द कबीरका, परदेमें^१०^ पहचान ।
अनन्त कोटि ब्रह्मण्डका, एक रती नहि भार ।
साहब पुरुष कबीर है, कुलका सर्जनहार^११^ ॥ [क. वी. ६३८]
इसी प्रकार समस्त सूक्ष्म वेदमें कबीर साहबकी प्रशंसा भरी हुई है, भली भाँति खोल खोल पुकार पुकार बारम्बार कबीर साहबने कहा है कि, मैं स्वयम् सत्यपुरुष हूँ, स्वयम् मैं ही सृष्टिका रचयिता तथा समस्त जगत्का स्वामी हूँ, मेरे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है । जो कोई मुझको पहचानेगा वो भव-सागरके पार हो जावेगा ।
वेदमें कबीर ।
आशुः शिशानो वृषभो न भीभो, घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्, संकन्दनो निमिष ए कबीरः शतं सेना अजयत् साकमिन्द्रः ॥ य० अ० १७-३६ ॥
हे कबीर ! आप चारों ओरसे अविगत शब्द रूप हो । देहसे रहित रूप विदेह हो, विना शरीरके हो, समस्त पवित्रावतार आपके हैं, सैकड़ों बार प्रकट होते हो सबके ज्ञान रूप और परम विजयी हो यही मन्त्र सामवेदमें भी आया है, यहाँ इसका जो अर्थ है वही वहाँ भी अर्थ है ।
सुकृत नाम ।
अधज्मोऽधवादिवो बृहतो राचनादधि अया वर्धस्व,
तन्वा गिरा ममाजाता सुकृतो पृण ॥ सा. १. ८. ॥ प्र. १ ॥
१ चादर, २ पानीसे खिंचे, ३ जगता हुआ, ४ अमर, ५ चलायमान, ६ मेरा, ७ भक्तिवाला,
८ रथ, ९ न, १० दिलके भीतर, ११ रचनेवाला ।
विश्वासकी झलक जीवकी हालत
अग्रनाम ।
सोमः पुनान ऊर्मिणा व्योवारं विधावति, अग्रेवाचः पवमानः कनिन्द्रत् ॥
अग्रे सिन्धूनां पवमानोऽतिपतिर्दिवः शतधारो विचक्षणः । हरिर्मित्रस्य सदनं
षु सीदति मर्मजानो विभि- सिन्धुभिर्वृषा ॥
उग्रनाम ।
उच्चातेजातमंधसोदिर्विसधभूम्या ददे उग्र शर्म महि खवः ॥ सामवेद
उत्तर अ० ॥ प्र० ५ ॥ मन्त्र १ ॥
युध्वाहिवृत्रहंतमंहीरिद्रंदपरावताः । अर्वाचीनोमघनसोमपीतय उग्रक्रुध्यै-
हिराग साम १ ॥ प्र० ४ ॥ मन्त्र ९ ॥
आवृंदंवृत्राहाददे जातः पृच्छातद्विमातरंक उग्रके शृणीरे ॥
सामवेद अ १० ॥ प्र० ३ ॥ मन्त्र ३ ॥
इस तरह वेदोंमें भी कबीर, अग्र, उग्र, और मुनीन्द्र शब्द आजाते हैं ऐसी
रीतिसे वेद भी बाकी नहीं रह जाते ।
कबीर शब्दके अर्थ ।
‘कबीरैकोत्तरशतक’ इस नामके ग्रन्थमें कबीर शब्दके अर्थकी निरुक्ति
१०३ श्लोकोंमें की है इसकी और वरामजीने बड़ी सुन्दर भाषा की है उसके
कुछ एक श्लोक यहाँ भी उद्धृत करते हैं ।
श्रीपार्वत्युवाच- अक्षर त्रितय स्वामिन् कबीर इति को भवेत् ॥
किं देव उपदेवो वा तन्मे ब्रूहि जगत्पते ॥
पार्वतीजीका प्रश्न-ऐ स्वामीजी ! जो तीन अक्षर कबीर हैं वो कबीर
कौन हैं तथा किन देवताओंमेंसे हैं ।
श्रीमहादेव उवाच-कोब्रह्मा प्रोच्यते बीचं विद्यमानो विशिष्यते ॥
रमन्ते सर्व भूतानि यत्कवीरस्य चोच्यते ॥
महादेवजीका उत्तर (क) ब्रह्म (ब) प्रगट, (र) समस्त जीवोंमें समान-
रूपसे रम रहा है ऐसेको कबीर कहते हैं ।
कश्चैवकेवलं ब्रह्म विशेषं बीजमव्ययम् ॥
अंतर्वहिरमन्ते च यत्कवीरस्स चोच्यते ॥
(क) ब्रह्मरूप है, । (ब) अमर बीजरूप है । (र) भीतर बाहर
सब स्थानोंमें समभाव है, उसको कबीर कहते हैं ।
क सुखसागरो दाता बीजं ज्ञान तथैव च ॥
रहित आदिनान्तेन यत्कवीरस्स चोच्यते ॥
(क) का अर्थ—सुख रूप समुद्रका देनेवाला है। (ब) ज्ञानका देनेवाला है। (र) उसका आरम्भ अन्त कुछ नहीं, ऐसेको कबीर कहते हैं।
कस्तुकायापतिश्चैववीशेषः समतिजयः ॥
रकारो रतिसर्वस्य यत्कवीरस्स चोच्यते ॥
(क) समस्त शरीरोंका स्वामी है, प्रत्येक स्थानमें वर्तमान है। (बी) सबका विजयकर्ता है। (र) सबका प्यारा है उसको कबीर कहते हैं।
कस्तु वायुरजश्चैव विज्ञानं ज्ञानमीर्यते ॥
रसना ध्यायते नाम्ना यत्कवीरः स चोच्यते ।
(क) वायु और जलके साथ मिलकर एक रूप हो रहा है। (ब) ज्ञानरूप हो रहा है अर्थात् लद्दुनी विद्यासे पूर्ण है। (र) जिह्वा द्वारा रटा जाता है। जिसमें एकता है, जल, वायु, ज्ञान और ध्यान उसकी प्रशंसा करते हैं परन्तु वह उन सबसे जुदा है उसको कबीर कहते हैं।
कः पियूषरसाधीशो वीतृष्णामोहनाशकृत् ॥
रक्षिताऽखिललोकानां यत्कवीरः स चोच्यत ॥
जो (क) स्वच्छ अमृत स्वरूप है। (बी) कांक्षा स्वाद और बुरे ध्यानोंको दूर करनेवाला है। (र) सबकी रक्षा और सतर्कता करनेवाला है, उसको कबीर कहते हैं।
कः करुणामयः सिन्धू, विर्मुक्तो मनसी स्थितः ।
रसास्मरचयोगेषु यत्कवीरस्स चोच्यते ॥
जो (क) केवल एक दयाका समुद्र है। (बी) मुक्तिको देनेवाला है। (र) समाधि करानेवाला है, उसको कबीर कहते हैं।
कः कामाद्यखिलादीनां वीबिहंगो जितेंद्रियः ।
रमाय निगमाश्चैव यत्कवीरस्स चोच्यते ॥
(क) जो अच्छी कामनाको पूर्ण करने वाला है। (ब) बिहङ्ग एक पक्षीका नाम है। वह चित्त, मन और इन्द्रीके बन्द करनेके निमित्त होता है और समस्त मनुष्योंको मुक्ति प्रदान करने वाला है। समस्त संसारमें एक प्रकारका है। उसे कबीर कहते हैं।
कः कन्दर्पो वीर्ययुक्तो दयामुक्तोह्यनामयः ॥
सत्यरत्नसमायुक्तो यत्कवीरस्स चोच्यते ॥
जो (क) कामरूप कामनासे पृथक्, दयाकरके समझ, नाम और रूपसे रहित, सत्यरूपी रत्नसे मिला हुआ है उसे कबीर कहते हैं।
चार पशु
कः कल्पद्रुमसत्त्वेषु विशदं भावसाक्षिणम् ।
रजति ह्यक्षरश्चैव यत्कबीरस्स चोच्यते ॥
जो (क) कल्पवृक्ष है, समस्त पदार्थोंका देनेवाला है (बी) उत्कृष्ट भावका जाननेवाला है (र) समस्त दुःख चिन्ताका दूर करनेवाला है, उसको कबीर कहते हैं ।
कश्च कलाकरोत्येवं विवकाललनामयम् ।
रसभारा भूता येन यत्कबीरस्स चोच्यते ॥
जो (क) समस्त शब्द हो रहे हैं । समस्त स्थानोंमें पूर्ण है । (बी) मिलाव, शब्दसे रहित चैतन्य रूप है (र) समस्त रसोंको धार रहा है, उसको कबीर कहते हैं ।
कः कर्मोद्धारमेतेषु विरंच्यो मुक्तिमार्गणम् ।
रसनासिंधुनामेषु यत्कबीरः स चोच्यते ॥
जो (क) केवल मुक्तिदाता है आनन्दका आनन्द देनेवाला है (बी) मुक्तस्वरूप है । (र) जिह्वा प्रशंसामें आप परमेश्वरके सद्गुण हैं, समुद्रके समान जैसे, अनन्त नाम परमेश्वरके हैं उसको कबीर कहते हैं ।
कः कर्णामयः कायो विविधभावविशारदः ।
रमन्ते यत्समास्तेषां यत्कबीरः स चोच्यते ॥
जो (क) समस्त शरीरोंमें है (बी) बहुत स्वच्छ तथा अच्छा है । (र) अनेक होकर रम रहा है, उसको कबीर कहते हैं ।
कोभवसिन्धुकेर्बर्तो विविधो ह्यघदाहकः ।
रकारो केशवो नाम यत्कबीरः स चोच्यते ॥
जो (क) इस उत्पत्ति सागरका मल्लाह है । (बी) समस्त पापोंका पृथक् करनेवाला है । (र) अद्वितीय है उसीका नाम कबीर है ।
कः कुन्दः स्मरते तेषां विहर्तुं सुखसागरात् ।
रहस्योमरलोकेषु यत्कबीरः स चोच्यते ॥
जो (क) समस्त शास्त्रोंमें प्रकाशमान है । (बी) सुखरूप समुद्रमें रम रहा है । (र) अमरलोकमें आनन्द और सुखरूप समुद्र है, उसको कबीर कहते हैं ।
कलिकर्मविनाशी च विमलश्चित्तनिर्मलः ।
रागद्वेषविनिर्मुक्तो यः कबीरः स चोच्यते ॥
जो (क) कलियुगमें समस्त पापोंका नाश करनेवाला है । (बी) समस्त पापोंसे पृथक् है । (र) समस्त भेदी तथा बँरसे पृथक् है, उसको कबीर कहते हैं ।
नरपशु, दुष्टांत
कः कमनीयो भावेषु विसर्गः सर्वभावनः ।
रः सशान्तः समाधानो यः कबीरः स चोच्यते ॥
(क) अक्षरसे यह तात्पर्य है कि, जो समस्त गुणोंसे पूर्ण है । (बी) समस्त संसारका रचयिता तथा स्वामी है । (र) आनन्द स्वरूप है, उसको कबीर कहते हैं ।
कलौनाम प्रिये प्रोक्तं विवर्णं यागधारणम् ।
रागद्वेषपरित्यागी यः कबीरः स चोच्यते ॥
(क) प्रेम और प्रेमसे उत्पत्ति करनेवाला तथा (बी) सब ओर देख रहा है । (र) मैत्री तथा विरोधसे पार है उसको कबीर कहते हैं ।
कमलोद्भवसंभूतौ वीक्षते मृदुमंजुलः ॥
समर्थः सर्वलोकानां यः कबीरः स चोच्यते ॥
(क) कमलसे उत्पन्न हुआ, कमलोंके दलोंसे प्रगट हुआ । (बी) देख रहा है, समसृष्टि है, (र) सर्वलोकमें समर्थ है, उसको कबीर कहते हैं ।
मुक्तिमार्गविनोदश्च भक्तिमार्गललामयः ।
रसनामृतमूलेषु यः कबीरः स चोच्यते ॥
मुक्ति तथा सत्यका दिखानेवाला है । भक्ति पक्षका उजियारा करनेवाला है । जो अमृतका निचोड़ है, उसको कबीर कहते हैं ।
कंटकैभ्यो विनिर्मुक्तो विश्वासोच्छ्वास एव च ।
रमन्ते सर्वभूतानि यः कबीरः स चोच्यते ॥
(क) दुःख तथा कष्टसे अलग (बी) श्वासमें होकर जगत्में जगत् रूप हो रहा है । (र) समस्त जीवोंको आनन्द देनेवाला है, उसको कबीर कहते हैं ।
कैवर्तः सर्वलोकानां विदेहस्य प्रकाशकः ।
रजनी भव उत्साहो यः कबीरः स चोच्यते ॥
(क) समस्त संसारका मल्लाह है । (बी) देहका प्रकाश करनेवाला है । (र) ज्ञानरूप है । यानी संसार सागरसे पार उतारनेको जो खेवट है उसीको कबीर कहते हैं ।
कपाटस्यपटच्छेता विचारः परमार्थकः ।
रागद्वेषविनाशश्च यः कबीरः स चोच्यते ॥
जो (क) अज्ञानके द्वारोंका तखता तोड़नेवाला है (बी) परमार्थरूप है, परमार्थके निमित्त है । (र) मैत्री तथा विरोधको पृथक् करनेवाला है, उसे कबीर कहते हैं ।