श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप [ ४३
| तस्याः स्वास्थ्येन ध्यानं च समाधिश्च विचारतः।<br>तत्रैकचित्तता ध्यानं प्रत्ययान्तरवर्जितम्॥ ४३ | स्वस्थचित्ततासे उसी धारणाकी स्थिरता ही ध्यान है, जो विचारणापूर्वक समाधिमें परिणत हो जाता है। ध्येय विषयमें चित्तकी एकाग्रता ही ध्यान है और इस स्थितिमें चित्त अन्य वृत्तियोंसे रहित हो जाता है॥ ४३॥ |
| चिद्भासमर्थमात्रस्य देहशून्यमिव स्थितम्।<br>समाधिः सर्वहेतुश्च प्राणायाम इति स्मृतः॥ ४४ | चैतन्यस्वरूप ध्येयमात्रसे भासित होनेवाला और इस प्रकार देहशून्यताकी स्थितिको प्राप्त वह ध्यान ही समाधि है और प्राणायामको इन समस्त ध्यान-समाधि आदिका हेतु कहा गया है॥ ४४॥ |
| प्राणः स्वदेहजो वायुर्यमस्तस्य निरोधनम्।<br>त्रिधा द्विजैर्यमः प्रोक्तो मन्दो मध्योत्तमस्तथा॥ ४५ | अपने शरीरसे जायमान वायु ही प्राण है और उसे रोकनेको यम कहते हैं। द्विजोंने मन्द, मध्य तथा उत्तम—ये तीन प्रकारके यम बतलाये हैं॥ ४५॥ |
| प्राणापाननिरोधस्तु प्राणायामः प्रकीर्तितः।<br>प्राणायामस्य मानं तु मात्राद्वादशकं स्मृतम्॥ ४६<br><br>नीचो द्वादशमात्रस्तु उद्घातो द्वादशः स्मृतः।<br>मध्यमस्तु द्विरुद्घातश्चतुर्विंशतिमात्रकः॥ ४७<br><br>मुख्यस्तु यस्त्रिरुद्घातः षट्त्रिंशन्मात्र उच्यते।<br>प्रस्वेदकम्पनोत्थानजनकश्च यथाक्रमम्॥ ४८ | प्राण और अपान वायुका निरोध ही प्राणायाम कहलाता है। मन्द प्राणायामका मान बारह मात्राओंका कहा गया है। बारह लघु अक्षरोंके उच्चारणकालतक प्राणवायुको रोकना मन्द प्राणायाम या द्वादशमात्रात्मक प्राणायाम बताया गया है। उसके दुगुने उच्चारणकाल अर्थात् चौबीस मात्राओंके समयतक प्राणवायुके निरोधनको मध्यम प्राणायाम कहते हैं। इसी प्रकार तीन गुने उच्चारणकाल अर्थात् छत्तीस मात्राओंके उच्चारणकालतक प्राणवायुको रोकनेको उत्तम प्राणायाम कहा जाता है। मन्द, मध्य तथा उत्तम प्राणायाम शरीरमें क्रमशः प्रस्वेद (पसीना), कम्पन तथा उत्थान (ऊपर उठनेकी क्रिया) उत्पन्न करनेवाले हैं॥ ४६-४८॥ |
| आनन्दोद्भवयोगार्थं निद्राघूर्णिस्तथैव च।<br>रोमाञ्चध्वनिसंविद्धस्वाङ्गमोटनकम्पनम् ॥ ४९ | आनन्दकी उत्पत्ति करनेवाले योगकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले प्राणायामसे निद्रा, घूर्णन, रोमांच तथा ध्वनिसे व्याप्त कम्पन शरीरके अंगोंमें उत्पन्न हो जाता है॥ ४९॥ |
| भ्रमणं स्वेदजन्या सा संविन्मूर्च्छा भवेद्यदा।<br>तदोत्तमोत्तमः प्रोक्तः प्राणायामः सुशोभनः॥ ५० | जब निरन्तर प्राणायामके अभ्याससे [उत्पन्न उष्णतावश] स्वेदबिन्दु [पसीना] झलकने लगे, संविन्मूर्च्छा—ज्ञानमयी उन्मनी अवस्था आने लगे, सहसा शरीर हलका होकर प्लवन [जलमें तैरने-जैसी स्थिति]-जैसी अवस्थाका अनुभव करे, तब इस सुशोभन अवस्थाको उत्तमोत्तम प्राणायाम कहा गया है॥ ५०॥ |
| सगर्भोऽगर्भ इत्युक्तः सजपो विजपः क्रमात्।<br>इभो वा शरभो वापि दुराधर्षोऽथ केसरी॥ ५१ | सगर्भ तथा अगर्भ—यह दो प्रकारका होता है। जपसहित प्राणायाम सगर्भ तथा जपरहित प्राणायाम अगर्भ कहा जाता है। हाथी, शरभ* तथा सिंह अत्यन्त |
* आठ पैरवाला जीव, जो सिंहसे भी बलवान् होता है—‘अष्टपादः शरभः सिंहघाती।'
| ४४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गृहीतो दम्यमानस्तु यथास्वस्थस्तु जायते।<br>तथा समीरणोऽस्वस्थो दुराधर्षश्च योगिनाम् ॥ ५२ | दुराधर्ष होते हैं। जैसे उन्हें पकड़कर उनका दमन किये जानेपर वे अस्वस्थ हो जाते हैं, उसी प्रकार यह दुराधर्ष प्राणवायु भी योगियोंके द्वारा वशमें किये जानेपर अस्वस्थ हो उठता है अर्थात् अव्यवस्थित हो जाता है॥ ५१-५२॥ |
| न्यायतः सेव्यमानस्तु स एवं स्वस्थतां व्रजेत् ।<br>यथैव मृगराड् नागः शरभो वापि दुर्मदः ॥ ५३ | नियमपूर्वक अभ्यास किये जानेपर वह वायु उसी प्रकार स्वस्थताको प्राप्त हो जाता है, जैसे मतवाले सिंह, हाथी तथा शरभ अभ्यासपूर्वक युक्तिसे दमित किये जानेपर अपने अधीन हो जाते हैं॥ ५३॥ |
| कालान्तरवशाद्योगाद्गम्यते परमादरात् ।<br>तथा परिचयात्स्वास्थ्यं समत्वं चाधिगच्छति ॥ ५४ | जैसे नियमतः नियन्त्रण करनेपर शनैः-शनैः अपनी उग्रताको त्यागकर ये सिंहादि आदरपूर्वक वशमें हो जाते हैं, वैसे ही यह प्राणवायु भी शनैः-शनैः अभ्याससे अपनी अस्वस्थताको छोड़कर समत्वभावको प्राप्त हो जाता है॥ ५४॥ |
| योगादभ्यस्यते यस्तु व्यसनं नैव जायते ।<br>एवमभ्यस्यमानस्तु मुनेः प्राणो विनिर्दहेत् ॥ ५५<br><br>(चित्र)<br><br>मनोवाक्कायजान् दोषान् कर्तुर्देहं च रक्षति।<br>संयुक्तस्य तथा सम्यक्प्राणायामेन धीमतः ॥ ५६ | जो पुरुष योगपूर्वक अभ्यास करता है, उसके चित्तमें व्यसन उत्पन्न नहीं होता है। इस प्रकार सततं अभ्यास करनेपर प्राणायामसे उस योगीके मन-वचन तथा कर्मसे जायमान सभी दोष नष्ट हो जाते हैं और इस प्राणायामसे इसे करनेवाले उस बुद्धिमान् योगीके देहकी भलीभाँति रक्षा भी होती है॥ ५५-५६॥ |
| दोषात्तस्माच्च नश्यन्ति निःश्वासस्तेन जीर्यते।<br>प्राणायामेन सिध्यन्ति दिव्याः शान्त्यादयः क्रमात् ॥ ५७ | उस प्राणायामके सतत अभ्याससे सभी दोष नष्ट हो जाते हैं। साथ ही श्वास (प्रश्वास)-की गति भी न्यून होती जाती है। इस प्रकार प्राणोंके [श्वासोंके] नियन्त्रणसे क्रमशः दिव्य शान्ति आदि सिद्धियाँ प्राप्त होने लगती हैं॥ ५७॥ |
| शान्तिः प्रशान्तिर्दीप्तिश्च प्रसादश्च तथा क्रमात् ।<br>आदौ चतुष्टयस्येह प्रोक्ता शान्तिरिह द्विजाः ॥ ५८<br>सहजागन्तुकानां च पापानां शान्तिरुच्यते ।<br>प्रशान्तिः संयमः सम्यग्वचसामिति संस्मृता ॥ ५९ | हे द्विजो! अब मैं क्रमसे शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति तथा प्रसादका वर्णन करूँगा। आरम्भमें इन चारोंमेंसे यहाँ पहले शान्तिके विषयमें कहता हूँ। सहज तथा आगन्तुक पापोंका नाश शान्ति कहा जाता है तथा वाणीपर भली-भाँति संयम प्रशान्ति कहा गया है॥ ५८-५९॥ |
| प्रकाशो दीप्तिरित्युक्तः सर्वतः सर्वदा द्विजाः ।<br>सर्वेन्द्रियप्रसादस्तु बुद्धेर्वै मरुतामपि ॥ ६०<br>प्रसाद इति सम्प्रोक्तः स्वान्ते त्विह चतुष्टये ।<br>प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ॥ ६१ | हे द्विजो! सभी तरहसे सर्वदा प्रकाशकी स्थितिको दीप्ति कहा गया है। सभी इन्द्रियों, बुद्धि तथा प्राणवायु आदिकी प्रसन्नताको इस चतुष्टयमें 'प्रसाद' कहा गया है। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, |
अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप ४५
| नागः कूर्मस्तु कृकलो देवदत्तो धनञ्जयः।<br>एतेषां यः प्रसादस्तु मरुतामिति संस्मृतः॥ ६२ | देवदत्त तथा धनंजय—इनकी जो प्रसन्नता है, उसे मरुतोंका प्रसाद कहा गया है॥ ६०—६२॥ |
| प्रयाणं कुरुते तस्माद्वायुः प्राण इति स्मृतः।<br>अपानयत्यपानस्तु आहारादीन् क्रमेण च॥ ६३<br><br>व्यानो व्यानामयत्यङ्गं व्याध्यादीनां प्रकोपकः।<br>उद्वेजयति मर्माणि उदानोऽयं प्रकीर्तितः॥ ६४<br><br>समं नयति गात्राणि समानः पञ्च वायवः।<br>उद्गारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने तु सः॥ ६५<br><br>कृकलः क्षुत्कायैव देवदत्तो विजृम्भणे।<br>धनञ्जयो महाघोषः सर्वगः स मृतेऽपि हि॥ ६६ | जो वायु प्रयाण करता है, इसी कारण उस वायुको प्राणवायु कहा गया है। जो वायु आहार आदिको नीचेकी ओर क्रमसे ले जाता है, उसे अपान, सभी अंगोंमें जो वायु व्याप्त रहता है उसे व्यान तथा व्याधि आदिका प्रकोप जो वायु मर्मोंमें उद्वेजन पैदा करता है उसे उदान एवं जो वायु गात्रोंमें समता करता है, उसे समान वायु कहा गया है। इस प्रकार ये पाँच वायु हुए। इसी तरह उद्गार (डकार आदि)-के समय क्रियाशील वायुको नाग, उन्मीलन-अवस्थामें क्रियाशील वायुको कूर्म, छींक आदिमें आनेवाली वायुको कृकल, जम्हाईमें क्रियाशील वायु देवदत्त तथा महाघोष करनेवाले वायुका नाम धनंजय है, वह मरनेपर भी सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त रहता है॥ ६३—६६॥ |
| इति यो दशवायूनां प्राणायामेन सिध्यति।<br>प्रसादोऽस्य तुरीया तु संज्ञा विप्राश्चतुष्टये॥ ६७ | हे विप्रो! जो इन दस वायुओंको प्राणायामसे सिद्ध कर लेता है, वह शान्ति आदि चतुष्टयके प्रसादकी प्राप्ति कर लेता है। इन वायुओंका प्रसाद ही (शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति तथा प्रसाद नामक सिद्धियोंमें चतुर्थ प्रसाद नामक सिद्धिको) 'तुरीया' सिद्धि कहा जाता है॥ ६७॥ |
| विस्वरस्तु महान् प्रज्ञा मनो ब्रह्मा चितिः स्मृतिः।<br>ख्यातिः संवित्ततः पश्चादीश्वरो मतिरेव च॥ ६८<br><br>बुद्धेरेताः द्विजाः संज्ञा महतः परिकीर्तिताः।<br>अस्या बुद्धेः प्रसादस्तु प्राणायामेन सिद्ध्यति॥ ६९ | विस्वर, महान्, प्रज्ञा, मन, ब्रह्मा, चिति, स्मृति, ख्याति, संवित्, ईश्वर तथा मति—ये सब महत्तत्त्वस्वरूप बुद्धिके नाम हैं। हे विप्रो! इस बुद्धिका प्रसाद प्राणायामसे ही सिद्ध होता है॥ ६८-६९॥ |
| विस्वरो विस्वरीभावो द्वन्द्वानां मुनिसत्तमाः।<br>अग्रजः सर्वतत्त्वानां महान् यः परिमाणतः॥ ७०<br><br>यत्प्रमाणगुहा प्रज्ञा मनस्तु मनुते यतः।<br>बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च ब्रह्मा ब्रह्मविदां वराः॥ ७१ | हे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनियो! यह बुद्धि शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंका उपतापन न होनेसे विस्वर, सभी तत्त्वोंके पहले उत्पन्न होनेसे महान्, प्रमाणोंका आश्रय होनेसे प्रज्ञा, मनन करनेसे मन तथा बृहत् होने एवं वृद्धि करनेसे ब्रह्मा—ऐसी कही गयी है॥ ७०-७१॥ |
| सर्वकर्माणि भोगार्थं यच्चिनोति चितिः स्मृता।<br>स्मरते यत्स्मृतिः सर्वं संविद्वै विन्दते यतः॥ ७२ | जो भोगोंके लिये समस्त कर्मोंका चयन करती है, उसे चिति कहा गया है। जो स्मरण करती है, उसे स्मृति तथा जो जानती है, उसे संवित् कहा गया है॥ ७२॥ |
| ख्यायते यत्त्विति ख्यातिर्ज्ञानादिभिरनेकशः।<br>सर्वतत्त्वाधिपः सर्वं विजानाति यदीश्वरः॥ ७३ | ज्ञान आदि अनेक उपायोंसे प्रतिष्ठित करनेसे ख्यातिसंज्ञक तथा सभी तत्त्वोंका स्वामी एवं सब कुछ |
| ४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मनुते मन्यते यस्मान्मतिर्मतिमतां वराः।<br>अर्थं बोधयते यच्च बुद्ध्यते बुद्धिरुच्यते॥ ७४ | जाननेके कारण ईश्वर संज्ञावाली बुद्धि कही गयी है। हे मतिमानोंमें श्रेष्ठ मुनियो ! माननेके कारण मति कही गयी है एवं अर्थको जानने तथा बोध करानेसे बुद्धि कही गयी है॥ ७३-७४॥ |
| अस्या बुद्धेः प्रसादस्तु प्राणायामेन सिद्ध्यति।<br>दोषान् विनिर्दहेत्सर्वान् प्राणायामादसौ यमी॥ ७५ | इस बुद्धिका भी प्रसाद प्राणायामसे सिद्ध होता है। योगीको प्राणायामके द्वारा सभी दोषोंको दग्ध कर डालना चाहिये॥ ७५॥ |
| पातकं धारणाभिस्तु प्रत्याहारेण निर्दहेत्।<br>विषयान् विषवद् ध्यात्वा ध्यानेनानीश्वरान् गुणान्॥ ७६<br><br>समाधिना यतिश्रेष्ठाः प्रज्ञावृद्धिं विवर्धयेत्।<br>स्थानं लब्ध्वैव कुर्वीत योगाष्टाङ्गानि वै क्रमात्॥ ७७<br><br>लब्ध्वासनानि विविधद्योगसिद्ध्यर्थमात्मवित्।<br>अदेशकाले योगस्य दर्शनं हि न विद्यते॥ ७८ | हे यतिश्रेष्ठ विप्रो! योगीको चाहिये कि वह धारणासे पापोंको तथा प्रत्याहारसे विषयोंको विष समझकर दग्ध कर डाले। ध्यानके द्वारा [काम-क्रोधादि] अनीश्वर गुणोंको जला डाले तथा समाधिसे बुद्धिकी वृद्धि करे। उत्तम स्थान प्राप्त करके तथा उचित आसनोंमें होकर आत्मवित् योगीको विधिपूर्वक योगके आठों अंगोंका क्रमसे अभ्यास करना चाहिये। समुचित स्थान तथा समयके बिना योगसिद्धि नहीं होती है॥ ७६-७८॥ |
| अग्न्यभ्यासे जले वापि शुष्कपर्णचये तथा।<br>जन्तुव्याप्ते श्मशाने च जीर्णगोष्ठे चतुष्पथे॥ ७९<br><br>सशब्दे सभये वापि चैत्यवल्मीकसञ्चये।<br>अशुभे दुर्जनाक्रान्ते मशकादिसमन्विते॥ ८०<br><br>नाचरेद्देहबाधायां दौर्मनस्यादिसम्भवे।<br>सुगुप्ते तु शुभे रम्ये गुहायां पर्वतस्य तु॥ ८१<br><br>भवक्षेत्रे सुगुप्ते वा भवारामे वनेऽपि वा।<br>गृहे तु सुशुभे देशे विजने जन्तुवर्जिते॥ ८२<br><br>अत्यन्तनिर्मले सम्यक् सुप्रलिप्ते विचित्रिते।<br>दर्पणोदरसङ्काशे कृष्णागुरुसुधूपिते॥ ८३ | अग्निके समीप, जलमें, सूखे पत्तोंके ढेरवाले स्थानोंमें, जन्तुओंसे व्याप्त जगहपर, श्मशानपर, जीर्ण गोशालामें, चौराहेपर, शोरगुलवाले स्थानमें, डरावने स्थानमें, पत्थरों तथा वल्मीक मिट्टीके ढेरपर, अपवित्र स्थानपर, दुष्टोंके आतंकवाले स्थानपर, मच्छर आदिसे युक्त स्थानपर तथा देहबाधा और दौर्मनस्य (मानसिक कष्ट) उत्पन्न करनेवाले स्थानपर योगका अभ्यास नहीं करना चाहिये। अपितु अत्यन्त गुप्त (एकान्त), पवित्र तथा रमणीक स्थानपर, पर्वतकी गुफामें, शिवक्षेत्रमें, एकान्तमें, शिव-उद्यानमें, वनमें, पवित्र घरमें, जन्तुओंसे रहित तथा निर्जन स्थानमें योग-साधन करना चाहिये॥ ७९-८२॥ |
| नानापुष्पसमाकीर्णे वितानोपरि शोभिते।<br>फलपल्लवमूलाढ्ये कुशपुष्पसमन्विते॥ ८४<br><br>समासनस्थो योगाङ्गान्यभ्यसेद्धृषितः स्वयम्।<br>प्रणिपत्य गुरुं पश्चाद्भवं देवीं विनायकम्॥ ८५<br><br>योगीश्वरान् सशिष्यांश्च योगं युञ्जीत योगवित्।<br>आसनं स्वस्तिकं बद्ध्वा पद्ममर्धासनं तु वा॥ ८६ | अत्यन्त स्वच्छ, भलीभाँति लिपे हुए, विशेष रूपसे चित्रित, दर्पणके समान स्वच्छ, कृष्ण अगरुके धूपसे सुगन्धित, अनेक प्रकारके पुष्पोंसे मण्डित, ऊपरसे चँदोवा आदिसे अलंकृत, फल-पल्लवोंसे सुशोभित तथा कुश और फूलसे युक्त दिव्य स्थानमें ठीक आसनसे बैठकर प्रसन्नतापूर्वक योगके अंगोंका अभ्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् गुरु, शिव, पार्वती, गणेश तथा शिष्योंसहित योगीश्वरोंको प्रणाम करके स्वस्तिक अथवा |
अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप ४७
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| समजानुस्तथा धीमानेकजानुरथापि वा।<br>समं दृढासनो भूत्वा संहृत्य चरणावुभौ ॥ ८७ | अर्ध पद्मासन (सिद्धासन) बाँधकर योगीको योग-साधनमें प्रवृत्त हो जाना चाहिये ॥ ८३–८६ ॥ |
| संवृतास्योपबद्धाक्ष उरो विष्टभ्य चाग्रतः।<br>पार्ष्णिभ्यां वृषणौ रक्षंस्तथा प्रजननं पुनः ॥ ८८<br><br>किञ्चिदुन्नामितशिरा दन्तैर्दन्तान संस्पृशेत्।<br>सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ ८९<br><br>तमः प्रच्छाद्य रजसा रजः सत्त्वेन छादयेत्।<br>ततः सत्त्वस्थितो भूत्वा शिवध्यानं समभ्यसेत् ॥ ९० | बुद्धिमान् योगीको इस प्रकार दोनों जानु बराबर करके अथवा एक जानुमें स्थित होकर वृषण तथा लिङ्गको दोनों पार्ष्णि (एड़ियों)-के बीच करके दृढ़ आसन लगाकर तथा मुखको बन्द करके सिरको कुछ ऊँचा उठाकर दाँतोंका परस्पर स्पर्श बचाते हुए, सभी ओरसे दृष्टिको रोककर, उन्मीलित नेत्रोंसे अपने नासिकाग्रपर दृष्टि केन्द्रित करके तथा वक्षःस्थलको आगेकी ओर उन्नतकर तमोगुणको रजोगुणसे तथा रजोगुणको सत्त्वगुणसे आच्छादित करना चाहिये। इस प्रकार केवल सत्त्वगुणमें स्थित होकर शिवध्यानका अभ्यास करना चाहिये ॥ ८७–९० ॥ |
| ॐकारवाच्यं परमं शुद्धं दीपशिखाकृतिम्।<br>ध्यायेद्धृदि पुण्डरीकस्य कर्णिकायां समाहितः ॥ ९१<br><br>नाभेरधस्ताद्वा विद्वान् ध्यात्वा कमलमुत्तमम्।<br>त्र्यङ्गुले चाष्टकोणं वा पञ्चकोणमथापि वा ॥ ९२<br><br>त्रिकोणं च तथाग्नेयं सौम्यं सौरं स्वशक्तिभिः।<br>सौरं सौम्यं तथाग्नेयमथवानुक्रमेण तु ॥ ९३<br><br>आग्नेयं च ततः सौरं सौम्यमेवं विधानतः।<br>अग्नेरधः प्रकल्प्यैवं धर्मादीनां चतुष्टयम् ॥ ९४<br><br>गुणत्रयं क्रमेणैव मण्डलोपरि भावयेत्।<br>सत्त्वस्थं चिन्तयेद्रुद्रं स्वशक्त्या परिमण्डितम् ॥ ९५ | समाहितचित्त होकर साधकको परम शुद्ध दीपशिखाकी आकृतिवाले तथा ओंकार नामसे अभिहित उस परमात्माका अपने हृदयकमलकी कर्णिकामें ध्यान करना चाहिये अथवा विद्वान् साधकको नाभिसे तीन अंगुल नीचे अष्टकोणात्मक, पंचकोणात्मक अथवा त्रिकोणात्मक उत्तम कमलका ध्यान करके उसमें क्रमानुसार अपनी शक्तियोंसहित अग्निमण्डल, चन्द्रमण्डल, सूर्यमण्डल अथवा सूर्य-चन्द्र-अग्निमण्डल अथवा अग्नि, सूर्य, चन्द्रमण्डलका विधिवत् ध्यान करते हुए अग्निके नीचे धर्म आदि चतुष्टय (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य)-की कल्पना करके मण्डलोंके ऊपर सत्त्व, रज तथा तमकी भावना करते हुए पार्वतीसे सुशोभित सत्त्वस्थित रुद्रका चिन्तन करना चाहिये ॥ ९१–९५ ॥ |
| नाभौ वाथ गले वापि भ्रूमध्ये वा यथाविधि।<br>ललाटफलिकायां वा मूर्ध्नि ध्यानं समाचरेत् ॥ ९६ | इसी प्रकार नाभि, कण्ठ, भ्रूमध्य, ललाटपट्ट अथवा मस्तकमें विधिके अनुसार शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ ९६ ॥ |
| द्विदले षोडशारे वा द्वादशारे क्रमेण तु।<br>दशारे वा षडस्रे वा चतुरस्रे स्मरेच्छिवम् ॥ ९७ | क्रमानुसार द्विदल, षोडशदल, द्वादशदल, दशदल, षड्दल अथवा चतुर्दल कमलमें शंकरजीका ध्यान करना चाहिये ॥ ९७ ॥ |
| कनकाभे तथाङ्गारसन्निभे सुसितेऽपि वा।<br>द्वादशादित्यसङ्काशे चन्द्रबिम्बसमेऽपि वा ॥ ९८<br><br>विद्युत्कोटिनिभे स्थाने चिन्तयेत्परमेश्वरम्।<br>अग्निवर्णेऽथ वा विद्युद्वलयाभे समाहितः ॥ ९९ | स्वर्णकी आभावाले तथा अंगारके सदृश, महाश्वेत, द्वादश सूर्यके समान दीप्त, चन्द्रबिम्बके सदृश, करोड़ों विद्युत्के समान प्रभाववाले, अग्निवर्णके सदृश, विद्युत्-वलयके |
| ४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| | तुल्य आभावाले उन-उन स्थानोंमें साधकको समाहितचित्त होकर परमेश्वरका चिन्तन करना चाहिये ॥ ९८-९९ ॥ | | वज्रकोटिप्रभे स्थाने पद्मरागनभेऽपि वा।<br>नीललोहितबिम्बे वा योगी ध्यानं समभ्यसेत्॥ १०० | करोड़ों वज्रकी प्रभाववाले अथवा पद्मरागके सादृश्यवाले अथवा नीललोहित बिम्ब (सूर्यबिम्ब)-तुल्य स्थानमें योगीको शिवध्यान करना चाहिये ॥ १०० ॥ | | महेश्वरं हृदि ध्यायेन्नाभिपद्मे सदाशिवम्।<br>चन्द्रचूडं ललाटे तु भ्रूमध्ये शङ्करं स्वयम्॥ १०१<br>दिव्ये च शाश्वतस्थाने शिवध्यानं समभ्यसेत्। | हृदयप्रदेशमें महेश्वरका, नाभिकमलमें सदाशिवका, ललाटमें चन्द्रचूडका, भ्रूमध्यमें साक्षात् शंकरका तथा दिव्य शाश्वत स्थान मूर्धमें शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ १०१ १/२ ॥ | | निर्मलं निष्कलं ब्रह्म सुशान्तं ज्ञानरूपिणम्॥ १०२<br>अलक्षणमनिर्देश्यमणोरल्पतरं शुभम्।<br>निरालम्बमतर्क्यं च विनाशोत्पत्तिवर्जितम्॥ १०३<br>कैवल्यं चैव निर्वाणं निःश्रेयसमनुपमम्।<br>अमृतं चाक्षरं ब्रह्म ह्यपुनर्भवमद्भुतम्॥ १०४<br>महानन्दं परानन्दं योगानन्दमनामयम्।<br>हेयोपादेयरहितं सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं शिवम्॥ १०५<br>स्वयं वेद्यमवेद्यं तच्छिवं ज्ञानमयं परम्।<br>अतीन्द्रियमनाभासं परं तत्त्वं परात्परम्॥ १०६<br>सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं ध्यानगम्यं विचारतः।<br>अद्वयं तमसश्चैव परस्तात्संस्थितं परम्॥ १०७<br>मनस्येवं महादेवं हृत्पद्मे वापि चिन्तयेत्।<br>नाभौ सदाशिवं चापि सर्वदेवात्मकं विभुम्॥ १०८ | वे शिव निर्मल हैं, कला अथवा अवयवसे रहित हैं, ब्रह्मरूप हैं, शान्त हैं, ज्ञानस्वरूप हैं, लक्षणोंसे रहित हैं, अनिर्देश्य हैं, अणुसे भी सूक्ष्म हैं, कल्याणकारी हैं, आश्रयरहित हैं, तर्कोंसे परे हैं, उत्पत्ति तथा विनाशसे रहित हैं, मोक्षरूप हैं, परम गति हैं, कल्याणरूप हैं, उपमारहित हैं, अमृतस्वरूप हैं, अविनाशी हैं, पुनर्भावरहित ब्रह्मस्वरूप हैं, अद्भुत हैं, महानन्द हैं, परानन्द हैं, योगानन्द हैं, व्याधिरहित हैं, त्याग तथा ग्रहणसे रहित हैं, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर हैं, कल्याणमय हैं, स्वयंवेद्य हैं, अवेद्य हैं, परम ज्ञानयुक्त हैं, इन्द्रियोंकी पहुँचसे परे हैं, आभाससे परे हैं, परम तत्त्व हैं, परात्पर हैं, सभी उपाधियोंसे मुक्त हैं, विचारणापूर्वक ध्यान करनेसे प्राप्त होनेवाले हैं, एकरूप हैं तथा तमसे भी बढ़कर परम रूपमें स्थित हैं। ऐसे महादेवका हृदयकमलमें ध्यान करना चाहिये तथा नाभिमें सर्वदेवात्मक प्रभु सदाशिवका ध्यान करना चाहिये ॥ १०२-१०८ ॥ | | देहमध्ये शिवं देवं शुद्धज्ञानमयं विभुम्।<br>कन्यसेनेव मार्गेण चोद्घातेनापि शङ्करम्॥ १०९<br>क्रमशः कन्यसेनैव मध्यमेनापि सुव्रतः।<br>उत्तमेनापि वै विद्वान् कुम्भकेन समभ्यसेत्॥ ११० | विद्वान् तथा सुव्रत साधकको चाहिये कि वह शरीरके भीतर सुषुम्णा मार्गसे क्रमशः बारह मात्रात्मक मन्द कुम्भक, चौबीस मात्रात्मक मध्यम कुम्भक तथा छत्तीस मात्रात्मक उत्तम कुम्भकके द्वारा कल्याणप्रद, शुद्ध, देवस्वरूप तथा ज्ञानसम्पन्न प्रभु शंकरका ध्यान करे ॥ १०९-११० ॥ | | द्वात्रिंशद्रेचयेद्धीमान् हृदि नाभौ समाहितः।<br>रेचकं पूरकं त्यक्त्वा कुम्भकं च द्विजोत्तमाः॥ १११<br>साक्षात्समरसेनैव देहमध्ये स्मरेच्छिवम्।<br>एकीभावं समेत्यैवं तत्र यद्रससम्भवम्॥ ११२ | हृदयकमल तथा नाभिकमलमें ध्यान केन्द्रित करके बुद्धिमान् साधकको बत्तीस मात्रात्मक रेचक करना चाहिये। अथवा हे उत्तम द्विजो! रेचक तथा पूरक छोड़कर केवल कुम्भकमें ही स्थिर रहकर समरसतापूर्वक अपने हृदयमें साक्षात् शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ १११ १/२ ॥ |
९- योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न), योगसे प्राप्त होनेवाली विघ्नरूप विभिन्न सिद्धियाँ तथा ऐश्वर्य, गुणवैतृष्ण्य तथा वैराग्यसे पाशुपतयोगकी प्राप्ति
अध्याय ९ ] योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न)...'पाशुपतयोगकी प्राप्ति ४९
| आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् साक्षात्समरसे स्थितः ।<br>धारणा द्वादशायामा ध्यानं द्वादश धारणम् ॥ ११३<br><br>ध्यानं द्वादशकं यावत्समाधिरभिधीयते ।<br>अथवा ज्ञानिनां विप्राः सम्पर्कादेव जायते ॥ ११४<br><br>प्रयत्नाद्वा तयोस्तुल्यं चिराद्वा ह्याचिराद् द्विजाः ।<br>योगान्तरायास्तस्याथ जायन्ते युञ्जतः पुनः ॥ ११५<br><br>नश्यन्त्यभ्यासत्तस्तेऽपि प्रणिधानेन वै गुरोः ॥ ११६ | इस प्रकार समरसमें स्थित विद्वान् साधक ईश्वर तथा जीवके ऐक्यको प्राप्त होकर उस रसजनित ब्रह्मानन्दकी प्राप्ति कर लेता है॥ ११२ १/२ ॥<br>बारह प्राणायामोंकी एक धारणा होती है, बारह धारणाओंका एक ध्यान होता है तथा बारह ध्यानोंकी एक समाधि कही जाती है॥ ११३ १/२ ॥<br>हे विप्रो! यह योगसिद्धि ज्ञानियोंके समागमसे अथवा प्रयत्न करनेसे प्राप्त होती है। वे दोनों साधन समान ही हैं। यह सिद्धि पूर्वजन्मके योगाभ्यासी साधकको शीघ्र तथा नवीनाभ्यासी साधकको विलम्बसे प्राप्त होती है। हे द्विजो! योगसाधनकी अवधिमें बार-बार विघ्न भी उत्पन्न होते हैं, किंतु वे विघ्न निरन्तर अभ्यास करनेसे तथा गुरुके सान्निध्यसे नष्ट भी हो जाते हैं॥ ११४-११६ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽष्टाङ्गयोगनिरूपणं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अष्टांगयोगनिरूपण' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥
नौवाँ अध्याय
योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न), योगसे प्राप्त होनेवाली विघ्नरूप विभिन्न सिद्धियाँ तथा ऐश्वर्य, गुणवैतृष्ण्य तथा वैराग्यसे पाशुपतयोगकी प्राप्ति
| सूत उवाच<br>आलस्यं प्रथमं पश्चाद् व्याधिपीडा प्रजायते ।<br>प्रमादः संशयस्थाने चित्तस्येहानवस्थितिः ॥ १<br><br>अश्रद्धादर्शनं भ्रान्तिर्दुःखं च त्रिविधं ततः ।<br>दौर्मनस्यमयोग्येषु विषयेषु च योगता ॥ २<br><br>दशधाभिप्रजायन्ते मुनेर्योगान्तरायकाः ।<br>आलस्यं चाप्रवृत्तिश्च गुरुत्वात्कायचित्तयोः ॥ ३<br><br>व्याधयो धातुवैषम्यात् कर्मजा दोषजास्तथा ।<br>प्रमादस्तु समाधेस्तु साधनानामभावनम् ॥ ४ | सूतजी बोले—[हे मुनीश्वरो!] योगसाधनके कालमें पहले आलस्य तथा बादमें व्याधिपीड़ा उत्पन्न होती है, इसी प्रकार प्रमाद, संशय, चित्तकी अनवस्थिति, अश्रद्धादर्शन, भ्रान्ति, त्रिविध दुःख, दौर्मनस्य (मनमें असत्संकल्प-विकल्पका होना), निषिद्ध विषयोंमें मनका लगना—ये कुल दस प्रकारके विघ्न* साधकके योगाभ्यासमें उत्पन्न होते हैं॥ १-२ १/२ ॥<br>शरीर तथा चित्तके भारीपनके कारण योगमें प्रवृत्त न होना ही आलस्य है। धातुवैषम्य (न्यूनाधिक्य)-के कारण क्रियासे होनेवाले तथा वात-पित्त आदि दोषोंसे होनेवाले विकार ही व्याधियाँ हैं। समाधिके साधनोंका अनुष्ठान न करना प्रमाद है॥ ३-४॥ |
* पातंजलयोगसूत्रमें योगके अन्तराय इस प्रकार बताये गये हैं—व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः। (पातंजलयोगप्रदीप समाधिपाद ३०) अर्थात् व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, अनवस्थितत्व—ये चित्तके नौ विक्षेप [योगके विघ्न] हैं।
| ५० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इदं वेत्युभयस्पृक्तं विज्ञानं स्थानसंशयः।<br>अनवस्थितचित्तत्वमप्रतिष्ठा हि योगिनः॥ ५ | यह करूँ अथवा वह करूँ—इन दोनों स्थितियोंसे मिश्रित अनिश्चिततापूर्ण विज्ञानको स्थानसंशय कहा गया है। समाधि-अवस्थाको पाकर भी भवबन्धनके कारण योगीके चित्तका (लक्ष्यमें) न ठहर पाना अनवस्थित-चित्तत्व है॥ ५१/२ ॥ |
| लब्धायामपि भूमौ च चित्तस्य भवबन्धनात्।<br>अश्रद्धाभावरहिता वृत्तिर्वै साधनेषु च॥ ६ | योगके साधन, साध्य, गुरु, ज्ञान, आचार तथा भगवान् शिव आदिमें चित्तकी सद्भावरहित वृत्तिका नाम अश्रद्धा है॥ ६१/२॥ |
| साध्ये चित्तस्य हि गुरौ ज्ञानाचारशिवादिषु।<br>विपर्ययज्ञानमिति भ्रान्तिदर्शनमुच्यते॥ ७ | समाधिके समीप पहुँचकर अज्ञानताके कारण अनात्मपदार्थोंमें आत्मज्ञानरूप विपरीत ज्ञान रखना भ्रान्तिदर्शन कहा जाता है॥ ७१/२॥ |
| अनात्मन्यात्मविज्ञानमज्ञानात्तस्य सन्निधौ।<br>दुःखमाध्यात्मिकं प्रोक्तं तथा चैवाधिभौतिकम्॥ ८<br><br>आधिदैविकमित्युक्तं त्रिविधं सहजं पुनः।<br>इच्छाविघातात्सङ्क्षोभश्चेतसस्तदुदाहृतम् ॥ ९ | आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक—ये तीन प्रकारके सहज दुःख बताये गये हैं। इच्छा-विघातके कारण चित्तमें उत्पन्न विक्षोभ ही दुःख कहा गया है॥ ८-९॥ |
| दौर्मनस्यं निरोद्धव्यं वैराग्येण परेण तु।<br>तमसा रजसा चैव संस्पृष्टं दुर्मनः स्मृतम्॥ १० | परम वैराग्यके द्वारा दौर्मनस्यको नियन्त्रित करना चाहिये। तमोगुण तथा रजोगुणसे मिला हुआ यह मन दुर्मन कहा गया है। इसलिये ऐसे मनमें उत्पन्न होनेवाला दूषित भाव दौर्मनस्य कहा गया है॥ १०१/२॥ |
| तदा मनसि सञ्जातं दौर्मनस्यमिति स्मृतम्।<br>हठात्स्वीकरणं कृत्वा योग्यायोग्यविवेकतः॥ ११<br><br>विषयेषु विचित्रेषु जन्तोर्विषयलोलता।<br>अन्तराया इति ख्याता योगस्यैते हि योगिनाम्॥ १२ | योग्य तथा अयोग्य जानते हुए भी अयोग्य विषयोंके प्रति हठपूर्वक आसक्ति रखना ही विषय-लोलता है। योगियोंके योगसाधनमें इन्हें विघ्नरूप कहा गया है। अत्यन्त उत्साहसे युक्त होकर अभ्यास करनेवाले साधककी ये बाधाएँ दूर हो जाती हैं, इसमें संशय नहीं है॥ ११-१२१/२॥ |
| अत्यन्तोत्साहयुक्तस्य नश्यन्ति न च संशयः।<br>प्रनष्टेष्वन्तरायेषु द्विजाः पश्चाद्धि योगिनः॥ १३ | हे द्विजो! इन विघ्नोंके समाप्त हो जानेके उपरान्त योगीके योगसाधनमें नानाविध उपसर्ग (उपद्रव) उत्पन्न होते हैं। वे सभी उपसर्ग भी असिद्धिसूचक हैं॥ १३१/२॥ |
| उपसर्गाः प्रवर्तन्ते सर्वे तेऽसिद्धिसूचकाः।<br>प्रतिभा प्रथमा सिद्धिर्द्वितीया श्रवणा स्मृता॥ १४<br><br>वार्ता तृतीया विप्रेन्द्रास्तुरीया चेह दर्शना।<br>आस्वादा पञ्चमी प्रोक्ता वेदना षष्ठिका स्मृता॥ १५ | हे विप्रेन्द्रो! प्रतिभा पहली सिद्धि, श्रवणा दूसरी सिद्धि, वार्ता तीसरी सिद्धि, दर्शना चौथी सिद्धि, आस्वादा पाँचवीं सिद्धि तथा वेदना छठी सिद्धि कही गयी है॥ १४-१५॥ |
| स्वल्पषट्सिद्धिसन्त्यागात्सिद्धिदाः सिद्धयो मुने।<br>प्रतिभा प्रतिभावृत्तिः प्रतिभाव इति स्थितिः॥ १६ | इन प्रतिभा आदि स्वल्प षट् सिद्धियोंके आकर्षणसे मुक्त मुनिको अणिमादि सिद्धियाँ अभिलषित सिद्धि प्रदान करती हैं, प्रत्येक पदार्थविषयक अवबोधात्मक |
अध्याय ९ ] योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न) ... पाशुपतयोगकी प्राप्ति ५१
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| बुद्धिर्विवेचना वेद्यं बुद्ध्यते बुद्धिरुच्यते।<br>सूक्ष्मे व्यवहितेऽतीते विप्रकृष्टे त्वनागते॥ १७<br><br>सर्वत्र सर्वदा ज्ञानं प्रतिभाऽनुक्रमेण तु।<br>श्रवणात्सर्वशब्दानाम्प्रयत्नेन योगिनः॥ १८ | वृत्तिको प्रतिभा कहते हैं, विवेचनापूर्वक वेद्य वस्तुको जिससे जाना जाय, वह बुद्धि कही गयी है। अतीत (भूत), अनागत (भविष्य), सूक्ष्म, अदृष्ट, दूरस्थ, अत्यन्त समीप (वर्तमान) पदार्थोंका सर्वदा एवं सर्वत्र ज्ञान प्रदान करनेवाली प्रतिभासिका वृत्ति ही प्रतिभा है॥ १६-१७१/२॥ |
| ह्रस्वदीर्घप्लुतादीनां गुह्यानां श्रवणादपि।<br>स्पर्शस्याधिगमो यस्तु वेदना तूपपादिता॥ १९ | सभी शब्दों, ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत आदि स्वरों तथा गुह्य ध्वनियोंका बिना किसी प्रयासके श्रवण होकर उनका यथार्थ ज्ञान हो जाना श्रवणसिद्धि है और स्पर्शकी जो अनुभूति है, वह वेदनासिद्धि कही गयी है॥ १८-१९॥ |
| दर्शनाद्दिव्यरूपाणां दर्शनं चाप्रयत्नतः।<br>संविद्दिव्यरसे तस्मिन्नास्वादो ह्यप्रयत्नतः॥ २० | बिना किसी प्रयत्नके दिव्य रूपोंका भी नेत्रेन्द्रियसे दिखायी पड़ना दर्शनासिद्धि है और दिव्य रसोंका सहज रूपमें बिना किसी प्रयत्नके ठीक-ठीक ज्ञान होना आस्वादसिद्धि है। |
| वार्ता च दिव्यगन्धानां तन्मात्रा बुद्धिसंविदा।<br>विन्दन्ते योगिनस्तस्मादाब्रह्मभवनं द्विजाः॥ २१ | इसी तरह बुद्धिके द्वारा दिव्य गन्धोंका भी ठीक-ठीक गन्धतन्मात्रके रूपमें अनुभव कर लेना वार्तासिद्धि है॥ २०१/२॥<br>हे द्विजो! इस योगजनित धर्मरूप संसर्गसे योगीलोग इस जगत्में ब्रह्मलोकपर्यन्त जो सब कुछ है, उसे अपने देहमें स्थित देखते हैं। |
| जगत्यस्मिन् हि देहस्थं चतुःषष्टिगुणं समम्।<br>औपसर्गिकमेतेषु गुणेषु गुणितं द्विजाः॥ २२ | हे द्विजो! आगे बताये जानेवाले आठ गुण वृद्धिक्रमसे गुणित होकर संख्यामें चौंसठ गुणोंके बराबर हो जाते हैं॥ २१-२२॥ |
| सन्त्याज्यं सर्वथा सर्वमौपसर्गिकमात्मनः।<br>पैशाचे पार्थिवं चाप्यं राक्षसानां पुरे द्विजाः॥ २३ | हे द्विजो! साधकको अपने इन औपसर्गिक अर्थात् विघ्नकारी गुणोंका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये। पिशाचलोकमें पार्थिव गुण, राक्षसलोकमें जल- |
| याक्षे तु तैजसं प्रोक्तं गान्धर्वे श्वसनात्मकम्।<br>ऐन्द्रे व्योमात्मकं सर्वं सौम्ये चैव तु मानसम्॥ २४ | सम्बन्धी गुण, यक्षलोकमें तेजसम्बन्धी गुण, गन्धर्वलोकमें वायुसम्बन्धी गुण, इन्द्रलोकमें व्योमात्मक अर्थात् आकाशसम्बन्धी गुण, सोमलोकमें मनसम्बन्धी गुण, |
| प्राजापत्ये त्वहङ्कारं ब्राह्मे बोधमनुत्तमम्।<br>आद्ये चाष्टौ द्वितीये च तथा षोडशरूपकम्॥ २५ | प्रजापतिलोकमें अहंकारसम्बन्धी गुण तथा ब्रह्मलोकमें सर्वोत्तम बोधगुण कहे गये हैं॥ २३-२४१/२॥ |
| चतुर्विंशत्तृतीये तु द्वात्रिंशच्च चतुर्थके।<br>चत्वारिंशत् पञ्चमे तु भूतमात्रात्मकं स्मृतम्॥ २६ | पहले पार्थिवमें आठ गुण, दूसरे जलमें सोलह गुण, तीसरे तेजमें चौबीस गुण, चौथे वायुमें बत्तीस गुण तथा पाँचवें आकाशमें चालीस गुणवाले ऐश्वर्य विद्यमान हैं। |
| गन्धो रसस्तथा रूपं शब्दः स्पर्शस्तथैव च।<br>प्रत्येकमष्टधा सिद्धं पञ्चमे तच्छतक्रतोः॥ २७ | गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द पूर्वोक्त पंचमहाभूतोंकी तन्मात्राएँ कही गयी हैं। इन्द्रसम्बन्धी व्योमात्मक गुणपर्यन्त |
| ५२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| तथाष्टचत्वारिंशच्च षट्पञ्चाशत्तथैव च।<br>चतुःषष्टिगुणं ब्राह्मं लभते द्विजसत्तमाः॥ २८॥ | इन पाँचोंमें प्रत्येक आठ-आठके वृद्धिक्रमसे बताये जा चुके हैं॥ २५-२७॥<br>हे उत्तम द्विजो! इसी प्रकार मनसम्बन्धी अड़तालीस गुण तथा अहंकारसम्बन्धी छप्पन गुण और अन्तमें चौंसठ गुणात्मक ब्राह्म अर्थात् बुद्धिसम्बन्धी ब्रह्मके ऐश्वर्यको साधक प्राप्त कर लेता है॥ २८॥ |
| औपसर्गिकमाब्रह्मभुवनेषु परित्यजेत्।<br>लोकेष्वालोक्य योगेन योगवित्परमं सुखम्॥ २९॥ | जो योगी ब्रह्मलोकपर्यन्त सभी लोकोंमें औपसर्गिक अर्थात् योगविघ्नोंको विचारपूर्वक उनका परित्याग कर देता है, वह परम सुखी हो जाता है॥ २९॥ |
| स्थूलता ह्रस्वता बाल्यं वार्धक्यं यौवनं तथा।<br>नानाजातिस्वरूपं च चतुर्भिर्देहधारणम्॥ ३०॥<br>पार्थिवांशं विना नित्यं सुरभिर्गन्धसंयुतः।<br>एतदष्टगुणं प्रोक्तमैश्वर्यं पार्थिवं महत्॥ ३१॥ | शरीरकी स्थूलता, ह्रस्वता, बालकपन, वृद्धता, यौवन, अनेकविध रूप धारण करना, बिना पार्थिव अंशके शेष चार तत्त्वोंसे देह धारण करना तथा नित्य सुगन्धिसे युक्त रहना—ये आठ प्रकारके महान् पार्थिव गुण कहे गये हैं॥ ३०-३१॥ |
| जले निवसनं यद्वद्भूम्यामिव विनिर्गमः।<br>इच्छेच्छक्तः स्वयं पातुं समुद्रमपि नातुरः॥ ३२॥<br>यत्रेच्छति जगत्यस्मिंस्तत्रास्य जलदर्शनम्।<br>यद्यद्वस्तु समादाय भोक्तुमिच्छति कामतः॥ ३३॥<br>तत्तद्रसान्वितं तस्य त्रयाणां देहधारणम्।<br>भाण्डं विनाथ हस्तेन जलपिण्डस्य धारणम्॥ ३४॥<br>अव्रणत्वं शरीरस्य पार्थिवेन समन्वितम्।<br>एतत् षोडशकं प्रोक्तमाप्यमैश्वर्यमुत्तमम्॥ ३५॥ | पृथ्वीपर रहनेकी भाँति जलमें निवास करना, उससे बाहर आनेकी सामर्थ्य रखना, इच्छा होनेपर स्वयं सम्पूर्ण समुद्रका पान करनेमें समर्थ होना तथा उससे किसी प्रकारका प्रतिकूल प्रभाव न पड़ना, इस जगत्में जहाँ भी इच्छा करे, वहाँ जलका दर्शन कर लेना, जिस-जिस वस्तुका भक्षण किया जाय, उसे अपनी इच्छाके अनुसार रसयुक्त बना देना, तेज, वायु, आकाश—इन तीनोंसे देह धारण करना, बिना पात्रके हाथसे जलपिण्डका धारण करना तथा शरीरमें व्रण आदिका न होना—इन आठ तथा पूर्वोक्त पार्थिव गुणोंको मिलाकर—ये सोलह गुणात्मक आप्य (जलसम्बन्धी) उत्तम ऐश्वर्य कहे गये हैं॥ ३२-३५॥ |
| देहादग्निविनिर्माणं तत्तापभयवर्जितम्।<br>लोकं दग्धमपीहान्यददग्धं स्वविधानतः॥ ३६॥<br>जलमध्ये हुतवहं चाधाय परिरक्षणम्।<br>अग्निन्निग्रहणं हस्ते स्मृतिमात्रेण चागमः॥ ३७॥<br>भस्मीभूतविनिर्माणं यथापूर्वं सकामतः।<br>द्वाभ्यां रूपविनिष्पत्तिर्विना तैस्त्रिभिरात्मनः॥ ३८॥<br>चतुर्विंशात्मकं ह्येतत्तैजसं मुनिपुङ्गवाः।<br>मनोगतित्वं भूतानामन्तर्निवासनं तथा॥ ३९॥ | हे श्रेष्ठ मुनियो! देहसे अग्निका निर्माण, अग्निके तापका भय न होना, दग्धलोकको भी अपने योगविधानसे अदग्धतुल्य अर्थात् पूर्ववत् कर देना, जलके भीतर अग्नि स्थापित करके उसे वैसे ही बनाये रखना, हाथसे आग पकड़ लेना, स्मरणमात्रसे अग्नि प्रकट कर देना, भस्म हुए पदार्थको इच्छापूर्वक पहलेकी भाँति कर देना तथा उन तीनों (पृथ्वी, जल, तेज)-के बिना दो तत्त्वों अर्थात् वायु और आकाशसे अपनी देह धारण करना—ये चौबीस गुणवाले तैजस ऐश्वर्य हैं॥ ३६-३८१/२॥ |
| अध्याय ९ ] | योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न) ... पाशुपतयोगकी प्राप्ति | ५३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पर्वतादिमहाभारस्कन्धेनोद्वहनं पुनः।<br>लघुत्वं च गुरुत्वं च पाणिभ्यां वायुधारणम्॥ ४०<br><br>अङ्गुल्यग्रनिघातेन भूमेः सर्वत्र कम्पनम्।<br>एकेन देहनिष्पत्तिर्वातैश्वर्यं स्मृतं बुधैः॥ ४१ | मनकी गति प्राप्त कर लेना अर्थात् जहाँ मनकी इच्छा हो वहाँ चले जाना, अन्य प्राणियोंके अन्तर्मनमें निवास करना, पर्वत आदि महाभार कंधेपर धारण करके चलना, हलका तथा भारी होनेकी सामर्थ्य रखना, हाथोंसे वायु पकड़ लेना, अंगुलिके अग्रभागसे आघात करके पृथ्वीमें सर्वत्र कम्पन उत्पन्न कर देना, केवल आकाश तत्त्वसे देह धारण करना—ये वातसम्बन्धी ऐश्वर्य विद्वानोंके द्वारा कहे गये हैं॥ ३९—४१॥ |
| छायाविहीननिष्पत्तिरिन्द्रियाणां च दर्शनम्।<br>आकाशगमनं नित्यमिन्द्रियार्थैः समन्वितम्॥ ४२<br><br>दूरे च शब्दग्रहणं सर्वशब्दावगाहनम्।<br>तन्मात्रलिङ्गग्रहणं सर्वप्राणिनिदर्शनम्॥ ४३ | शरीरकी छाया न होना, इन्द्रियोंका प्रत्यक्ष दर्शन होना, आकाशमें गमन करना, इन्द्रियोंके अर्थका ज्ञान, दूरसे ही शब्दोंको सुननेकी क्षमता रखना, सभी शब्दोंके ज्ञानमें पारंगत होना, तन्मात्राओंके स्वरूपका ज्ञान तथा सभी प्राणियोंको साक्षात् देखनेमें समर्थ होना—ये ऐन्द्र ऐश्वर्य अर्थात् आकाशसम्बन्धी ऐश्वर्य हैं। इन समस्त पाँच प्रकारके ऐश्वर्योंसे युक्त साधक कायव्यूहसामर्थ्यवान् कहा जाता है॥ ४२-४३ १/२॥ |
| ऐन्द्रमैश्वर्यमित्युक्तमेतैरुक्तः पुरातनः।<br>यथाकामोपलब्धिश्च यथाकामविनिर्गमः॥ ४४<br><br>सर्वत्राभिभवश्चैव सर्वगुह्यनिदर्शनम्।<br>कामानुरूपनिर्माणं वशित्वं प्रियदर्शनम्॥ ४५ | किसी भी अभिलषित वस्तुकी प्राप्ति, जहाँ भी जानेकी इच्छा हो, वहाँ पहुँच जाना, सभी जगह अपना शक्तिप्राबल्य प्रदर्शित करना अर्थात् अपने प्रभावसे सभीको पराभूत कर देना, सभी गुप्त पदार्थोंको देख लेना, अपनी इच्छाके अनुसार रूप धारण करना, सभीको अपने वशमें कर लेना, सभीको प्रिय लगना, सम्पूर्ण जगत्को देखनेकी सामर्थ्य रखना—ये सब मानस गुणोंके लक्षण हैं॥ ४४-४५ १/२॥ |
| संसारदर्शनं चैव मानसं गुणलक्षणम्।<br>छेदनं ताडनं बन्धं संसारपरिवर्तनम्॥ ४६<br><br>सर्वभूतप्रसादश्च मृत्युकालजयस्तथा।<br>प्राजापत्यमिदं प्रोक्तमाहङ्कारिकमुत्तमम्॥ ४७ | छेदन, ताड़न, बन्ध, संसारपरिवर्तन, सर्वभूतप्रसाद, मृत्यु तथा कालका जय—ये प्रजापतिसम्बन्धी श्रेष्ठ आहंकारिक ऐश्वर्य कहे गये हैं॥ ४६-४७॥ |
| अकारणजगत्सृष्टिस्थानुग्रह एव च।<br>प्रलयश्चाधिकारश्च लोकवृत्तप्रवर्तनम्॥ ४८<br><br>असादृश्यमिदं व्यक्तं निर्माणं च पृथक् पृथक्।<br>संसारस्य च कर्तृत्वं ब्राह्ममेतदनुत्तमम्॥ ४९ | बिना कारण जगत्की सृष्टि, अनुग्रह, प्रलय, अधिकार, लोकवृत्तका प्रवर्तन, असादृश्य, पृथक्-पृथक् व्यक्त निर्माण तथा संसारका कर्तृत्व—यह उत्तम ब्राह्म ऐश्वर्य है॥ ४८-४९॥ |
| एतावत्तत्त्वमित्युक्तं प्राधान्यं वैष्णवं पदम्।<br>ब्रह्मणा तद्गुणं शक्यं वेत्तुमन्यैर्न शक्यते॥ ५० | ये ब्राह्म ऐश्वर्यके तत्त्व कहे गये हैं और ये ही प्रधानसम्बन्धी वैष्णव पद हैं। ब्रह्माके बिना उस गुणको अन्य कोई नहीं जान सकता है॥ ५०॥ |
| विद्यते तत्परं शैवं विष्णुना नावगम्यते।<br>असंख्येयगुणं शुद्धं को जानीयाच्छिवात्मकम्॥ ५१ | उस वैष्णवपदसे भी परे शैवपद है, जिसे विष्णु |
| ५४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| भी नहीं जानते हैं। असंख्य गुणोंवाले शुद्ध शिवात्मक तत्त्वको कौन जान सकता है अर्थात् कोई नहीं जान सकता॥ ५१॥ | |
| व्युत्थाने सिद्धयश्चैता ह्युपसर्गाश्च कीर्तिताः।<br>निरोद्धव्याः प्रयत्नेन वैराग्येण परेण तु॥ ५२। | चौंसठ गुणात्मक ये ऐश्वर्य व्यवहारकालमें सिद्धि कहे जाते हैं, किंतु समाधिकालमें ये ही उपसर्ग अर्थात् विघ्न कहे गये हैं। इन्हें प्रयत्नपूर्वक परम वैराग्यसे रोकना चाहिये॥ ५२॥ |
| नाशातिशयतां ज्ञात्वा विषयेषु भयेषु च।<br>अश्रद्धया त्यजेत्सर्वं विरक्त इति कीर्तितः॥ ५३ | भय उत्पन्न करनेवाले विषय-भोगोंकी अवश्यम्भावी नश्वरता जानकर सबका अश्रद्धासे त्याग कर देना चाहिये। ऐसा करनेवाला विरक्त कहा जाता है॥ ५३॥ |
| वैतृष्ण्यं पुरुषे ख्यातं गुणवैतृष्ण्यमुच्यते।<br>वैराग्येणैव सन्त्याज्याः सिद्धयश्चौपसर्गिकाः॥ ५४ | पुरुषमें वितृष्णा नामसे प्रसिद्ध भावको ही गुणवैतृष्ण्य कहा जाता है। औपसर्गिक अर्थात् विघ्नरूप सिद्धियोंका वैराग्यके द्वारा परित्याग कर देना चाहिये॥ ५४॥ |
| औपसर्गिकमाब्रह्मभुवनेषु परित्यजेत्।<br>निरुद्धयैव त्यजेत्सर्वं प्रसीदति महेश्वरः॥ ५५<br><br>प्रसन्ने विमला मुक्तिर्वैराग्येण परेण वै।<br>अथवानुग्रहार्थं च लीलार्थं वा तदा मुनिः॥ ५६ | चित्तको विषयभोगोंसे हटाकर भुवनोंमें समस्त विघ्नरूप ब्राह्म ऐश्वर्योंका परित्याग करनेसे महेश्वर प्रसन्न होते हैं और इस प्रकार साधकके परम वैराग्यसे शिवके प्रसन्न होनेपर उसे विमल मुक्ति प्राप्त होती है अथवा जो योगी सांसारिक प्राणियोंके कल्याणार्थ या लीलाके निमित्त इन सिद्धियोंका त्याग नहीं करता, वह भी सुखी ही रहता है॥ ५५-५६ १/२॥ |
| अनिरुद्धय विचेष्टेतः सोऽप्येवं हि सुखी भवेत्।<br>क्वचिद्भूमिं परित्यज्य ह्याकाशे क्रीडते श्रिया॥ ५७ | कभी भूमि छोड़कर अपनी प्रबल शक्तिसे आकाशमें क्रीडा करता है और कभी सूक्ष्म अर्थात् सामान्य लोगोंके लिये अबोधगम्य वेदार्थोंको संक्षेपमें उच्चारित करता है॥ ५७ १/२॥ |
| उद्गिरेच्च क्वचिद्वेदान् सूक्ष्मानर्थान् समासतः।<br>क्वचिच्छ्रुते तदर्थेन श्लोकबन्धं करोति सः॥ ५८ | वह कभी कोई प्रसंग सुनकर उसके अर्थसे श्लोक-रचना कर डालता है। कभी दण्डक छन्दमें और इसी प्रकार हजारों प्रकारके छन्दोंमें काव्यरचना करता है॥ ५८ १/२॥ |
| क्वचिद्दण्डकबन्धं तु कुर्याद् बन्धं सहस्त्रशः।<br>मृगपक्षिसमूहस्य रुतज्ञानं च विन्दति॥ ५९ | उसे मृग तथा पक्षिवर्गकी ध्वनियोंका ज्ञान हो जाता है। यहाँतक कि ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समग्र संसार उस योगीके लिये हस्तामलकतुल्य हो जाता है॥ ५९ १/२॥ |
| ब्रह्माद्यं स्थावरान्तं च हस्तामलकवद्भवेत्।<br>बहुनात्र किमुक्तेन विज्ञानानि सहस्रशः॥ ६०<br><br>उत्पद्यन्ते मुनिश्रेष्ठा मुनेस्तस्य महात्मनः।<br>अभ्यासेनैव विज्ञानं विशुद्धं च स्थिरं भवेत्॥ ६१ | हे श्रेष्ठ मुनियो! अधिक क्या कहा जाय; उस महात्मा योगीमें हजारों प्रकारके विज्ञान उत्पन्न हो जाते |
१०- योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण, साधुधर्मका स्वरूप, भगवान् शिवके साक्षात्कारके उपायोंका वर्णन तथा भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता
अध्याय १०] योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण... भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता ५५
| हैं। सतत अभ्यासके द्वारा ही यह विशुद्ध विज्ञान सदा स्थिर रहता है॥ ६०-६१॥ | |
|---|---|
| तेजोरूपाणि सर्वाणि सर्वं पश्यति योगवित्।<br>देवबिम्बान्यनेकानि विमानानि सहस्रशः॥ ६२ | योगी सभी तेजसम्पन्न देवताओंके बिम्ब तथा हजारों प्रकारके विमानोंको देखनेकी सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है॥ ६२॥ |
| पश्यति ब्रह्मविष्ण्वीन्द्रयमाग्निवरुणादिकान्।<br>ग्रहनक्षत्रताराश्च भुवनानि सहस्रशः॥ ६३ | वह ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, यम, अग्नि, वरुण आदि देवताओं, ग्रहों, नक्षत्रों, तारों तथा हजारों भुवनोंको देख लेता है॥ ६३॥ |
| पातालतलसंस्थांश्च समाधिस्थः स पश्यति।<br>आत्मविद्याप्रदीपेन स्वस्थेनाचलनेन तु॥ ६४ | वह पातालके तलमें स्थित पदार्थोंको भी आत्मविद्यारूप स्वस्थ तथा अचल दीपकसे समाधिस्थ होकर देखता है॥ ६४॥ |
| प्रसादामृतपूर्णेन सत्त्वपात्रस्थितेन तु।<br>तमो निहत्य पुरुषः पश्यति ह्यात्मनीश्वरम्॥ ६५ | वह साधक प्रसादरूप अमृतसे पूर्ण सत्त्वपात्रमें स्थित उस आत्मविद्यारूप प्रदीपसे अज्ञानान्धकारको नष्ट करके अपने भीतर साक्षात् ईश्वरका दर्शन करता है॥ ६५॥ |
| तस्य प्रसादाद्धर्मश्च ऐश्वर्यं ज्ञानमेव च।<br>वैराग्यमपवर्गश्च नात्र कार्या विचारणा॥ ६६ | उसी परमेश्वरकी कृपासे धर्म, ऐश्वर्य, ज्ञान, वैराग्य तथा मोक्ष सुलभ हो जाते हैं; इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं करना चाहिये॥ ६६॥ |
| न शक्यो विस्तरो वक्तुं वर्षाणामयुतैरपि।<br>योगे पाशुपते निष्ठा स्थातव्यं च मुनीश्वराः॥ ६७ | हे मुनीश्वरो! शिवकी महिमाका विस्तृत वर्णन हजारों वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता है। अतएव पाशुपतयोगमें निष्ठापूर्वक रहना चाहिये तथा उसीमें सदा मनको स्थिर रखना चाहिये॥ ६७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे योगान्तरायकथनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'योगान्तरायकथन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९॥
दसवाँ अध्याय
योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण, साधुधर्मका स्वरूप, भगवान् शिवके साक्षात्कारके उपायोंका वर्णन तथा भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता
| सूत उवाच | सूतजी बोले—हे उत्तम ब्राह्मणो! संत, जितेन्द्रिय, साक्षात् द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य), धर्मज्ञ, साधु, आचार्य, शिवात्मा, दयावान्, तपस्वी, संन्यासी, वैराग्य-परायण, ज्ञानी, मनपर नियन्त्रण रखनेवाले, दानी, उदार, मनसा-वाचा-कर्मणा सत्यवादी, अलुब्ध, |
|---|---|
| सतां जितात्मनां साक्षाद् द्विजातीनां द्विजोत्तमाः।<br>धर्मज्ञानां च साधूनामाचार्याणां शिवात्मनाम्॥ १ | |
| दयावतां द्विजश्रेष्ठास्तथा चैव तपस्विनाम्।<br>संन्यासिनां विरक्तानां ज्ञानिनां वशगात्मनाम्॥ २ |
| ५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दानिनां चैव दान्तानां त्रयाणां सत्यवादिनाम्।<br>अलुब्धानां सयोगानां श्रुतिस्मृतिविदां द्विजाः॥ ३<br>श्रौतस्मार्ताविरुद्धानां प्रसीदति महेश्वरः। | योगपरायण, श्रुतियों तथा स्मृतियोंके वेत्ता, श्रुतियों तथा स्मृतियोंका अनुकरण करनेवालोंका विरोध न करनेवाले लोगोंपर महेश्वर प्रसन्न रहते हैं॥ १-३ १/२ ॥ |
| सदिति ब्रह्मणः शब्दस्तदन्ते ये लभन्त्युत॥ ४<br>सायुज्यं ब्रह्मणो यान्ति तेन सन्तः प्रचक्षते। | सत् शब्दका अर्थ ब्रह्म होता है। जो अन्तमें उस ब्रह्मको पा लेते हैं, वे ब्रह्मसायुज्यको प्राप्त होते हैं, इसीलिये ऐसे महात्मा संत कहे जाते हैं॥ ४ १/२ ॥ |
| दशात्मके ये विषये साधने चाष्टलक्षणे॥ ५<br>न क्रुध्यन्ति न हृष्यन्ति जितात्मानस्तु ते स्मृताः। | दस इन्द्रियोंके विषयभोगोंमें तथा पूर्ववर्णित आठ प्रकारके ऐश्वर्यरूप साधनोंकी अप्राप्तिसे जो न तो क्रोध करते हैं और न उनकी प्राप्तिसे हर्षका अनुभव करते हैं, वे जितात्मा कहे गये हैं॥ ५ १/२ ॥ |
| सामान्येषु च द्रव्येषु तथा वैशेषिकेषु च॥ ६<br>ब्रह्मक्षत्रविशो यस्माद्युक्तास्तस्माद् द्विजातयः। | सामान्य तथा विशेष पदार्थोंके साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका सम्बन्धविशेष होनेसे ही ये द्विजाति कहे गये हैं॥ ६ १/२ ॥ |
| वर्णाश्रमेषु युक्तस्य स्वर्गादिसुखकारिणः॥ ७<br>श्रौतस्मार्तस्य धर्मस्य ज्ञानाद्धर्मज्ञ उच्यते। | स्वर्ग आदिका सुख प्रदान करनेवाले श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित वर्णाश्रम-धर्मका ज्ञान रखनेसे व्यक्ति धर्मज्ञ कहा जाता है॥ ७ १/२ ॥ |
| विद्यायाः साधनातसाधुर्ब्रह्मचारी गुरोर्हितः॥ ८<br>क्रियाणां साधनाच्चैव गृहस्थः साधुरुच्यते।<br>साधनात्तपसोऽरण्ये साधुर्वैखानसः स्मृतः॥ ९<br>यतमानो यतिः साधुः स्मृतो योगस्य साधनात्।<br>एवमाश्रमधर्माणां साधनात्साधवः स्मृताः॥ १०<br>गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थो यतिस्तथा। | विद्याकी साधना करनेके कारण गुरुका हित करनेवाला ब्रह्मचारी साधु तथा विहित कर्मोंकी साधना करनेवाला गृहस्थ साधु कहा जाता है। वनमें तपस्याकी साधना करनेसे वैखानस साधु एवं योगकी साधना करने तथा यतिधर्ममें परायण होनेसे व्यक्ति यति साधु कहा जाता है। इस प्रकार अपने-अपने आश्रमोंके धर्मोंका साधन करनेसे गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा यति—ये सभी साधु कहे गये हैं॥ ८-१० १/२ ॥ |
| धर्मधर्माविह प्रोक्तौ शब्दावेत्तौ क्रियात्मकौ॥ ११<br>कुशलाकुशलं कर्म धर्माधर्माविति स्मृतौ। | धर्म तथा अधर्म—ये दोनों शब्द क्रियाके वाचक कहे गये हैं। कुशल कर्मको धर्म तथा अकुशल कर्मको अधर्म कहा गया है॥ ११ १/२ ॥ |
| धारणार्थे महान् ह्येष धर्मशब्दः प्रकीर्तितः॥ १२<br>अधारणे महत्त्वे च अधर्म इति चोच्यते। | महत्तायुक्त यह धर्म शब्द धारणके अर्थमें कहा गया है तथा अधारण (धारण न करने)—को उद्देश्य करके कृत कर्म अधर्म कहा जाता है॥ १२ १/२ ॥ |
| अत्रेष्टप्रापको धर्म आचार्यैरुपदिश्यते॥ १३<br>अधर्मश्चानिष्टफलो ह्याचार्यैरुपदिश्यते। | जिससे अभीष्टकी प्राप्ति हो, उसे आचार्यलोग धर्म कहते हैं तथा जिससे अनिष्ट फलकी प्राप्ति हो, उसे आचार्यलोग अधर्म कहते हैं॥ १३ १/२ ॥ |
| वृद्धाश्चालोलुपाश्चैव आत्मवन्तो ह्यदाम्भिकाः॥ १४<br>सम्यग्विनीता ऋजवस्तानाचार्यान् प्रचक्षते। | वृद्ध, निर्लोभी, जितेन्द्रिय, दम्भ न करनेवाले, पूर्ण विनम्र, सरल स्वभाववाले लोगोंको आचार्य कहा जाता है॥ १४ १/२ ॥ |
| स्वयमाचरते यस्मादाचारे स्थापयत्यपि॥ १५ | जो स्वयं आचरण करता है तथा सभीको आचारमें |
अध्याय १०] योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण····भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता ५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आचिनोति च शास्त्रार्थनाचार्यस्तेन चोच्यते।<br>विज्ञेयं श्रवणाच्छ्रौतं स्मरणात्स्मार्तमुच्यते॥ १६ | नियोजित करता है एवं शास्त्रोंके अर्थोंका परिशीलन करता है; वह आचार्य कहा जाता है॥ १५ १/२॥<br>वेदोंका श्रवण करनेसे श्रौत तथा शास्त्रोंके अर्थोंका स्मरण करनेसे स्मार्त कहा जाता है। वेदविहित यज्ञ आदि करनेवाला श्रौत तथा वर्णाश्रमसम्बन्धी नियमोंका पालन करनेवाला स्मार्त कहा जाता है॥ १६ १/२॥ |
| इज्या वेदात्मकं श्रौतं स्मार्तं वर्णाश्रमात्मकम्।<br>दृष्ट्वानुरूपमर्थं यः पृष्टो नैवापि गूहति॥ १७ | किसीके द्वारा पूछनेपर देखे गये अनुरूप (कथनयोग्य) तथा अननुरूप (कथनके अयोग्य) विषयको बिना छिपाये अभिव्यक्त करनेको लिङ्गपुराणके अनुसार सत्य कहा गया है॥ १७ १/२॥ |
| यथादृष्टप्रवादस्तु सत्यं लैङ्गेऽत्र पठ्यते।<br>ब्रह्मचर्यं तथा मौनं निराहारत्वमेव च॥ १८ | ब्रह्मचर्य, मौन, निराहार, अहिंसा तथा सर्वविध शान्तिको तप कहा गया है॥ १८ १/२॥ |
| अहिंसा सर्वतः शान्तिस्तप इत्यभिधीयते।<br>आत्मवत्सर्वभूतेषु यो हितायाहिताय च॥ १९ | जो पुरुष सदा अपने ही हित तथा अहितकी भाँति सभी प्राणियोंके हिताहितका ध्यान रखता है; उसकी यह निरन्तर बनी रहनेवाली वृत्ति पूर्णतः दया कही गयी है॥ १९ १/२॥ |
| वर्तते त्वसकृद्वृत्तिः कृत्स्ना ह्येषा दया स्मृता।<br>यद्यदिष्टतमं द्रव्यं न्यायेनैवागतं क्रमात्॥ २०<br><br>तत्तद्गुणवते देयं दातुस्तद्दानलक्षणम्।<br>दानं त्रिविधमित्येतत्कनिष्ठज्येष्ठमध्यमम्॥ २१<br><br>कारुण्यात्सर्वभूतेभ्यः संविभागस्तु मध्यमः। | क्रमसे न्यायपूर्वक अर्जित अभीष्टतम द्रव्य गुणीको ही दिया जाना चाहिये। दाताके द्वारा प्रदत्त दानका यही लक्षण है। वह दान भी कनिष्ठ, मध्यम तथा श्रेष्ठ—तीन प्रकारका होता है। करुणापूर्वक सभी प्राणियोंके निमित्त धनका विभाग करना मध्यम दान है॥ २०-२१ १/२॥ |
| श्रुतिस्मृतिभ्यां विहितो धर्मो वर्णाश्रमात्मकः॥ २२ | श्रुतियों तथा स्मृतियोंसे विहित वर्णाश्रमसम्बन्धी तथा शिष्टाचारके अनुकूल जो धर्म है, वह साधुधर्म कहा जाता है॥ २२ १/२॥ |
| शिष्टाचाराविरुद्धश्च स धर्मः साधुरुच्यते।<br>मायाकर्मफलत्यागी शिवात्मा परिकीर्तितः॥ २३ | मायायुक्त कर्मफलका त्याग करनेवाला शिवात्मा कहा जाता है तथा सभी आसक्तियोंसे निवृत्त प्राणी युक्त-योगी कहा जाता है॥ २३ १/२॥ |
| निवृत्तः सर्वसङ्गेभ्यो युक्तो योगी प्रकीर्तितः।<br>असक्तो भयतो यस्तु विषयेषु विचार्य च॥ २४ | अनासक्त तथा पुनः-पुनः जन्म-मृत्युके भयसे भीत होकर विषयभोगोंकी नश्वरतापर विचार करके सभी ओरसे प्रलोभन दिये जानेपर भी जो अलुब्ध बना रहता है, वह संयमी कहा जाता है॥ २४ १/२॥ |
| अलुब्धः संयमी प्रोक्तः प्रार्थितोऽपि समन्ततः।<br>आत्मार्थं वा परार्थं वा इन्द्रियाणीह यस्य वै॥ २५ | अपने लिये अथवा दूसरेके लिये जिस व्यक्तिकी इन्द्रियाँ मिथ्या प्रवृत्त नहीं होतीं, वह शमके लक्षणोंवाला कहा जाता है॥ २५ १/२॥ |
| न मिथ्या सम्प्रवर्तन्ते शमस्यैव तु लक्षणम्।<br>अनुद्विग्नो ह्यनिष्टेषु तथेष्टान्नाभिनन्दति॥ २६ | जो अनिष्ट अर्थात् प्रतिकूल विषयोंपर उद्विग्न |
| ५८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| प्रीतितापविषादेभ्यो विनिवृत्तिर्विरक्तता।<br>संन्यासः कर्मणां न्यासः कृतानामकृतैः सह॥ २७ | नहीं होता तथा अनुकूल विषयोंकी प्राप्तिपर हर्षित नहीं होता; वह प्रीति, संताप तथा विषादसे रहित हो जाता है। उसकी यह विनिवृत्ति ही विरक्तता (विराग) कही जाती है॥ २६१/२॥ |
| कुशलाकुशलानां तु प्रहाणं न्यास उच्यते।<br>अव्यक्ताद्यविशेषान्ते विकारेऽस्मिन्नचेतने॥ २८ | निषिद्ध कर्मोंसहित विहित कर्मोंमें दोष-गुण बुद्धिका न्यास (त्याग) ही संन्यास है और इष्ट और अनिष्ट कर्मोंका भलीभाँति छोड़ना ही न्यास है॥ २७१/२॥ |
| चेतनाचेतनान्यत्वविज्ञानं ज्ञानमुच्यते।<br>एवं तु ज्ञानयुक्तस्य श्रद्धायुक्तस्य शङ्करः॥ २९ | अव्यक्त अर्थात् प्रकृतिसे लेकर परमाणुपर्यन्त इस जड जगत्के सभी पदार्थोंसे ईश्वरको पृथक् जानना ही वास्तविक ज्ञान है॥ २८१/२॥ |
| प्रसीदति न सन्देहो धर्मश्चायं द्विजोत्तमाः।<br>किं तु गुह्यतमं वक्ष्ये सर्वत्र परमेश्वरे॥ ३० | हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकारके ज्ञान तथा भक्ति (श्रद्धा)-से सम्पन्न पुरुषके ऊपर भगवान् शंकर अवश्य प्रसन्न होते हैं; इसमें कोई संशय नहीं है और वास्तवमें यही धर्म है॥ २९१/२॥ |
| भवे भक्तिर्न सन्देहस्तया युक्तो विमुच्यते।<br>अयोग्यस्यापि भगवान् भक्तस्य परमेश्वरः॥ ३१ | 'परम गुह्य रहस्य क्या है' अब मैं आप लोगोंको वह बताता हूँ। सर्वव्यापी परमेश्वर शिवमें भक्ति रखनी चाहिये। उस भक्तिसे युक्त प्राणी निःसंदेह मुक्ति प्राप्त कर लेता है॥ ३०१/२॥ |
| प्रसीदति न सन्देहो निगृह्य विविधं तमः।<br>ज्ञानमध्यापनं होमो ध्यानं यज्ञस्तपः श्रुतम्॥ ३२ | पात्रता न होनेपर भी उनकी परम भक्तिसे युक्त प्राणीके विविध अज्ञानरूप अन्धकारोंको दूर करके महेश्वर शिव उसपर प्रसन्न हो जाते हैं; इसमें संदेह नहीं है॥ ३११/२॥ |
| दानमध्ययनं सर्वं भवभक्त्यै न संशयः।<br>चान्द्रायणसहस्रैश्च प्राजापत्यशतैस्तथा॥ ३३ | ज्ञान, अध्यापन, होम, ध्यान, यज्ञ, तप, वेद, दान, अध्ययन—ये सभी शिवकी भक्ति प्राप्त करनेके साधन हैं; इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है॥ ३२१/२॥ |
| मासोपवासैश्चान्यैर्वा भक्तिर्मुनिवरोत्तमाः।<br>अभक्ता भगवत्यस्मिँल्लोके गिरिगुहाशये॥ ३४ | हे मुनीश्वरो! हजारों चान्द्रायण तथा सैकड़ों प्राजापत्यव्रतों, मासपर्यन्त किये गये उपवासों तथा अन्य अनुष्ठान आदिकी अपेक्षा शिवभक्ति ही श्रेष्ठ है॥ ३३१/२॥ |
| पतन्ति चात्मभोगार्थं भक्तो भावेन मुच्यते।<br>भक्तानां दर्शनादेव नृणां स्वर्गादयो द्विजाः॥ ३५ | भगवान् शिवकी भक्तिसे हीन प्राणी स्वर्गादिकी प्राप्तिके लिये अनेकविध कर्मजालमें फँसकर गहन गिरि-गुहारूपी इस मृत्युलोकमें बार-बार गिरते रहते हैं, किंतु भक्तिभावसे युक्त प्राणी मुक्त हो जाता है॥ ३४१/२॥<br>हे द्विजो! भगवान् शिवके भक्तोंके दर्शनमात्रसे |
अध्याय १०] योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण····भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता ५९
| श्लोक | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| न दुर्लभा न सन्देहो भक्तानां किं पुनस्तथा।<br>ब्रह्मविष्णुसुरेन्द्राणां तथान्येषामपि स्थितिः॥ ३६ | प्राणियोंको स्वर्ग आदि लोक सहज ही सुलभ हो जाते हैं तो फिर साक्षात् शिवभक्तोंके विषयमें क्या कहना! इस वास्तविकतामें कोई संदेह नहीं है॥ ३५¹/२॥ |
| भक्त्या एव मुनीनां च बलसौभाग्यमेव च।<br>भवेन च तथा प्रोक्तं सम्प्रेक्ष्योमां पिनाकिना॥ ३७ | ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र तथा अन्य देवता शिवभक्तिके द्वारा ही उत्तम पदको प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार मुनियोंका भी बल तथा सौभाग्य शिवभक्तिके ही कारण है॥ ३६¹/२॥ |
| देव्यै देवेन मधुरं वाराणस्यां पुरा द्विजाः।<br>अविमुक्ते समासीना रुद्रेण परमात्मना॥ ३८ | हे ऋषियो! प्राचीन कालमें देवाधिदेव पिनाकी शंकरने उमाको लक्ष्य करके वाराणसीमें उनसे जिस मधुर प्रसंगका वर्णन किया था, वही मैं भी आप लोगोंसे कह रहा हूँ॥ ३७¹/२॥ |
| रुद्राणी रुद्रमाहेदं लब्ध्वा वाराणसीं पुरीम्। | अविमुक्त क्षेत्र वाराणसीपुरीमें आकर भगवान् शिवके साथ विराजमान भगवती रुद्राणीने उन भगवान् रुद्रसे यह पूछा॥ ३८¹/२॥ |
| श्रीदेव्युवाच<br>केन वश्यो महादेव पूज्यो दृश्यस्त्वमीश्वरः॥ ३९<br><br>तपसा विद्यया वापि योगेनेह वद प्रभो। | देवी श्रीपार्वतीने कहा— हे महादेव! तप, विद्या, योग आदि किस साधनसे आप वशमें होते हैं, पूजित होते हैं तथा दर्शन देते हैं? हे प्रभो! मुझे बताइये॥ ३९¹/२॥ |
| सूत उवाच<br>निशम्य वचनं तस्यास्तथा ह्यालोक्य पार्वतीम्॥ ४० | सूतजी बोले— उन पार्वतीका वचन सुनकर बालचन्द्रमाको तिलकरूपमें धारण करनेवाले शिवने पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान मुखवाली पार्वतीकी ओर देखकर हँसते हुए उनसे कहा—॥ ४०¹/२॥ |
| आह बालेन्दुतिलकः पूर्णेन्दुवदनां हसन्।<br>स्मृत्वाथ मेनया पत्या गिरेर्गां कथितां पुरा॥ ४१<br><br>चिरकालस्थितिं प्रेक्ष्य गिरौ देव्या महात्मनः।<br>देवि लब्धा पुरी रम्या त्वया यत्प्रष्टुमर्हसि॥ ४२ | पूर्वमें चिरकालतक कैलासपर पार्वतीसहित मुझे रहते हुए देखकर हिमालयकी पत्नी मेनाद्वारा [अपना स्थान होना चाहिये—इस प्रकार] कही गयी वाणीको स्मरणकर सदाशिव बोले—हे देवि! हे विलासिनि! क्या तुम स्थानहेतु अपनी माताके द्वारा कहे गये वचनोंको भूल गयी हो? अब तुमने परम रम्य काशीपुरीको पा लिया है, अतः निश्चिन्त होकर अब तुम प्रश्न करनेयोग्य हो॥ ४१-४२¹/२॥ |
| स्थानार्थं कथितं मात्रा विस्मृतेह विलासिनि।<br>पुरा पितामहेनापि पृष्टः प्रश्नवतां वरे॥ ४३ | प्रश्न करनेवालोंमें श्रेष्ठ हे पार्वति! जिस प्रकार ब्रह्मात्मक तत्त्व जाननेके लिये इस समय तुमने मुझसे प्रश्न किया है, उसी प्रकार प्राचीन कालमें पितामह ब्रह्माने भी मुझसे पूछा था॥ ४३¹/२॥ |
| यथा त्वयाद्य वै पृष्टो द्रष्टुं ब्रह्मात्मकं त्वहम्।<br>श्वेते श्वेतेन वर्णेन दृष्ट्वा कल्पे तु मां शुभे॥ ४४ | हे कल्याणि! श्वेतकल्पमें श्वेतवर्ण सद्योजात |
| ६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| सद्योजातं तथा रक्ते रक्तं वामं पितामहः।<br>पीते तत्पुरुषं पीतमघोरे कृष्णमीश्वरम्॥ ४५<br><br>ईशानं विश्वरूपाख्ये विश्वरूपं तदाह माम्। | नामवाले, रक्तकल्पमें रक्तवर्ण वामदेव नामवाले, पीत-कल्पमें पीतवर्ण तत्पुरुष नामवाले, कृष्णकल्पमें कृष्ण-वर्ण अघोर नामवाले तथा विश्वरूपकल्पमें विश्वरूप ईशान नामवाले मुझ ईश्वरको देखकर ब्रह्माजीने मुझसे कहा॥ ४४-४५ १/२॥ | | पितामह उवाच<br>वाम तत्पुरुषाघोर सद्योजात महेश्वर॥ ४६ | ब्रह्माजी बोले— हे वामदेव! हे तत्पुरुष! हे अघोर! हे सद्योजात! हे महेश्वर! हे देवदेव! महादेव! मैंने गायत्री-उपासनासे आपका दर्शन किया है॥ ४६ १/२॥ | | दृष्टो मया त्वं गायत्र्या देवदेव महेश्वर।<br>केन वश्यो महादेव ध्येयः कुत्र घृणानिधे॥ ४७<br><br>दृश्यः पूज्यस्तथा देव्या वक्तुमर्हसि शङ्कर। | हे महादेव! आप किस प्रकार वशमें होते हैं? हे दयानिधे! आपका ध्यान कहाँ करना चाहिये? आप देवी पार्वतीके द्वारा दृश्य तथा पूज्य हैं। हे शंकर! कृपा करके मुझे बताइये॥ ४७ १/२॥ | | श्रीभगवानुवाच<br>अवोचं श्रद्धयैवेति वश्यो वारिजसम्भव॥ ४८ | भगवान् श्रीशंकर [ पार्वतीसे ] बोले— तब मैंने ब्रह्माजीसे कहा कि हे कमलोद्भव पितामह! मैं केवल श्रद्धासे वशमें किया जा सकता हूँ और आपने तथा विष्णुने समुद्रमें जिस लिङ्गका दर्शन किया था, उसीमें सबको मेरा ध्यान करना चाहिये॥ ४८ १/२॥ | | ध्येयो लिङ्गे त्वया दृष्टे विष्णुना पयसां निधौ।<br>पूज्यः पञ्चास्यरूपेण पवित्रैः पञ्चभिर्द्विजैः॥ ४९ | द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य)-को पवित्र सद्योजात आदि पाँच मन्त्रोंसे मेरे पंचमुखरूपकी पूजा करनी चाहिये। हे अण्डज! हे जगद्गुरो! आज आपने उसी भक्तिसे ही मेरा दर्शन प्राप्त किया है॥ ४९ १/२॥ | | भवभक्त्याद्य दृष्टोऽहं त्वयाण्डज जगद्गुरो।<br>सोऽपि मामाह भावार्थं दत्तं तस्मै मया पुरा॥ ५०<br><br>भावं भावेन देवेशि दृष्टवान् मां हृदीश्वरम्।<br>तस्मात्तु श्रद्धया वश्यो दृश्यः श्रेष्ठगिरेः सुते॥ ५१ | हे देवेशि! उन पितामहने भावपूर्वक मुझ ईश्वरको अपने हृदयमें देखा और जब उन्होंने मुझसे यह कहा कि आपमें मेरी अचल भक्ति हो, तब मैंने पूर्व-कालमें उन्हें वह भक्तिभाव प्रदान कर दिया। अतः हे श्रेष्ठ पर्वतकी पुत्री पार्वती! मात्र श्रद्धासे ही भक्त मुझे वशमें कर सकता है तथा मेरा दर्शन कर सकता है॥ ५०-५१॥ | | पूज्यो लिङ्गे न सन्देहः सर्वदा श्रद्धया द्विजैः।<br>श्रद्धा धर्मः परः सूक्ष्मः श्रद्धा ज्ञानं हुतं तपः॥ ५२<br><br>श्रद्धा स्वर्गश्च मोक्षश्च दृश्योऽहं श्रद्धया सदा॥ ५३ | द्विजोंको लिङ्गमें ही श्रद्धापूर्वक सदा मेरी पूजा करनी चाहिये और इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं होना चाहिये। श्रद्धा ही परम सूक्ष्म धर्म है। श्रद्धा ही ज्ञान, हवन, तप, स्वर्ग तथा मोक्ष आदिका फल प्रदान करती है और इसी श्रद्धासे भक्त सदा मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त कर सकते हैं॥ ५२-५३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भक्तिभावकथनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भक्तिभावकथन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०॥
११- श्वेतलोहितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् सद्योजातका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा
अध्याय ११] श्वेतलोहितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् सद्योजातका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा ६१
ग्यारहवाँ अध्याय
श्वेतलोहितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् सद्योजातका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| कथं वै दृष्टवान् ब्रह्मा सद्योजातं महेश्वरम्।<br>वामदेवं महात्मानं पुराणपुरुषोत्तमम्॥ १<br>अघोरं च तथेशानं यथावद्वक्तुमर्हसि। | [हे सूतजी!] ब्रह्माजीने सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर तथा ईशानसंज्ञक सनातन पुरुषोत्तम महेश्वर शिवको किस प्रकार देखा? आप हमें यथावत् रूपसे यह बतानेकी कृपा कीजिये॥ १ १/२॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| एकोनत्रिंशकः कल्पो विज्ञेयः श्वेतलोहितः॥ २<br>तस्मिंस्तत्परमं ध्यानं ध्यायतो ब्रह्मणस्तदा।<br>उत्पन्नस्तु शिखायुक्तः कुमारः श्वेतलोहितः॥ ३ | उनतीसवाँ कल्प श्वेतलोहित नामसे जाना जाता है। उस कल्पमें जब ब्रह्माजी समाधिस्थ होकर परमेश्वरका ध्यान कर रहे थे, उसी समय शिखाधारी श्वेतलोहित वर्णवाला एक कुमार प्रकट हुआ॥ २-३॥ |
| तं दृष्ट्वा पुरुषं श्रीमान् ब्रह्मा वै विश्वतोमुखः।<br>हृदि कृत्वा महात्मानं ब्रह्मरूपिणमीश्वरम्॥ ४<br>सद्योजातं ततो ब्रह्मा ध्यानयोगपरोऽभवत्।<br>ध्यानयोगात्परं ज्ञात्वा ववन्दे देवमीश्वरम्॥ ५ | उन सद्योजात कुमारको देखकर सर्वतोमुख श्रीमान् ब्रह्माजी उन्हीं ब्रह्मरूपी महात्मा परमेश्वरको हृदयमें धारण करके ध्यानयोगमें तत्पर हो गये। पुनः ध्यान-योगसे उन्हें साक्षात् परमेश्वर जानकर प्रणाम किया। ब्रह्माजीने उन सद्योजात कुमारको परात्पर ब्रह्म कल्पित कर लिया॥ ४-५ १/२॥ |
| सद्योजातं ततो ब्रह्मा ब्रह्म वै समचिन्तयत्।<br>ततोऽस्य पार्श्वतः श्वेताः प्रादुर्भूता महायशाः॥ ६<br>सुनन्दो नन्दनश्चैव विश्वनन्दोपनन्दनौ।<br>शिष्यास्ते वै महात्मानो यैस्तद् ब्रह्म सदावृतम्॥ ७ | तत्पश्चात् उन सद्योजात ब्रह्मके समीप ही सुनन्द, नन्दन, विश्वनन्द तथा उपनन्दन नामक श्वेतवर्णवाले चार महायशस्वी शिष्य प्रकट हुए। वे महात्मा शिष्य उन सद्योजात ब्रह्मकी सेवामें सर्वदा तत्पर रहते थे॥ ६-७॥ |
| तस्याग्रे श्वेतवर्णाभः श्वेतो नाम महामुनिः।<br>विजज्ञेऽथ महातेजास्तस्माजज्ञे हरस्त्वसौ॥ ८ | उनके आगे श्वेत वर्णकी आभावाले श्वेत नामक एक महातेजस्वी मुनि उत्पन्न हुए। उन सद्योजातसे उत्पन्न होनेके कारण उस मुनिका नाम हर भी है॥ ८॥ |
| तत्र ते मुनयः सर्वे सद्योजातं महेश्वरम्।<br>प्रपन्नाः परया भक्त्या गृणन्तो ब्रह्म शाश्वतम्॥ ९ | वहाँपर वे सभी मुनि परम भक्तिसे शाश्वत ब्रह्मरूप उन सद्योजात महेश्वरकी स्तुति करते हुए उनके शरणागत हुए॥ ९॥ |
| तस्माद्विश्वेश्वरं देवं ये प्रपद्यन्ति वै द्विजाः।<br>प्राणायामपरा भूत्वा ब्रह्मतत्परमानसाः॥ १०<br>ते सर्वे पापनिर्मुक्ता विमला ब्रह्मवर्चसः।<br>विष्णुलोकमतिक्रम्य रुद्रलोकं व्रजन्ति ते॥ ११ | अतएव हे द्विजो! जो प्राणी प्राणायामपरायण होकर ब्रह्मतत्परचित्तसे उन विश्वेश्वरदेवके शरणागत होते हैं; वे सभी पापोंसे मुक्त, विमल आत्मावाले तथा ब्रह्मज्ञानी हो जाते हैं और अन्तमें विष्णुलोकको भी पार करके रुद्रलोकको जाते हैं॥ १०-११॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सद्योजातमाहात्म्यं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सद्योजातमाहात्म्य' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥
१२- रक्तकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् वामदेवका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा
श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग ६२
बारहवाँ अध्याय
रक्तकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् वामदेवका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा
| सूत उवाच | |
|---|---|
| ततस्त्रिंशत्तमः कल्पो रक्तो नाम प्रकीर्तितः ।<br>ब्रह्मा यत्र महातेजा रक्तवर्णमधारयत् ॥ १ | **सूतजी बोले—**तीसवाँ कल्प रक्तकल्पके नामसे प्रसिद्ध है। महान् तेजस्वी ब्रह्माने उस कल्पमें रक्तवर्ण धारण किया था॥ १ ॥ |
| ध्यायतः पुत्रकामस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।<br>प्रादुर्भूतो महातेजाः कुमारो रक्तभूषणः ॥ २ | पुत्रकी कामनासे ध्यानरत परमेष्ठी ब्रह्माजीके समक्ष एक महातेजस्वी तथा प्रतापी कुमार प्रकट हुआ। वह रक्तवर्णके भूषण, रक्तवर्णकी माला तथा रक्तवर्णके वस्त्र धारण किये हुए था तथा उसके नेत्र भी रक्तवर्णके थे ॥ २\frac{१}{२} ॥ |
| रक्तमाल्याम्बरधरो रक्तनेत्रः प्रतापवान् ।<br>स तं दृष्ट्वा महात्मानं कुमारं रक्तवाससम् ॥ ३ | |
| परं ध्यानं समाश्रित्य बुबुधे देवमीश्वरम् ।<br>स तं प्रणम्य भगवान् ब्रह्मा परमयन्त्रितः ॥ ४ | लाल वस्त्र धारण किये उस महात्मा कुमारको देखकर ब्रह्माजीने परम ध्यानयोगसे यह जान लिया कि यह कुमार तो साक्षात् देवेश्वर है॥ ३\frac{१}{२} ॥ |
| वामदेवं ततो ब्रह्मा ब्रह्म वै समचिन्तयत् ।<br>तथा स्तुतो महादेवो ब्रह्मणा परमेश्वरः ॥ ५ | उन्हें प्रणाम करके आत्मजित् भगवान् ब्रह्माने वामदेवसंज्ञक उन परमेश्वरको साक्षात् ब्रह्मस्वरूप कल्पित किया॥ ४\frac{१}{२} ॥ |
| प्रतीतहृदयः सर्व इदमाह पितामहम् ।<br>ध्यायता पुत्रकामेन यस्मात्तेऽहं पितामह ॥ ६ | तत्पश्चात् ब्रह्माजीके द्वारा अनेकविध स्तुति किये जानेपर प्रसन्नहृदय परमेश्वर महादेवने उन पितामहसे यह कहा॥ ५\frac{१}{२} ॥ |
| दृष्टः परमया भक्त्या स्तुतश्च ब्रह्मपूर्वकम् ।<br>तस्माद् ध्यानबलं प्राप्य कल्पे कल्पे प्रयत्नतः ॥ ७ | हे पितामह! पुत्रकी कामनासे ध्यानपरायण आपने मेरा दर्शन प्राप्त किया और परम भक्तिसे ब्रह्म अर्थात् 'वामदेवाय' मन्त्र पूर्वमें लगाकर अनेक स्तुतियोंसे मेरा स्तवन किया। अतएव आप प्रयत्नपूर्वक ध्यानबलका आश्रय लेकर कल्प-कल्पमें मुझ सर्वश्रेष्ठ तथा लोकके आधारस्वरूप परमेश्वरको भलीभाँति जानेंगे॥ ६-७\frac{१}{२} ॥ |
| वेत्स्यसे मां प्रसंख्यातं लोकधातारमीश्वरम् ।<br>ततस्तस्य महात्मानश्चत्वारस्ते कुमारकाः ॥ ८ | |
| सम्बभूवुर्महात्मानो विशुद्धा ब्रह्मवर्चसः ।<br>विरजाश्च विबाहुश्च विशोको विश्वभावनः ॥ ९ | इसके अनन्तर ब्रह्माजीके विरजा, विबाहु, विशोक तथा विश्वभावन नामवाले चार और कुमार उत्पन्न हुए। वे सभी कुमार महान्, विशुद्ध आत्मावाले तथा ब्रह्मतेजसे सम्पन्न थे॥ ८-९॥ |
| ब्रह्मण्या ब्रह्मणस्तुल्या वीरा अध्यवसायिनः ।<br>रक्ताम्बरधराः सर्वे रक्तमाल्यानुलेपनाः ॥ १० | वे सभी कुमार ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मतुल्य, वीर तथा अध्यवसायी थे। वे रक्तवर्णके वस्त्र तथा रक्तवर्णकी मालासे विभूषित थे। उनके शरीरमें लाल कुमकुम तथा लाल भस्म लगा हुआ था॥ १०\frac{१}{२} ॥ |
| रक्तकुङ्कुमिलप्ताङ्गा रक्तभस्मानुलेपनाः ।<br>ततो वर्षसहस्रान्ते ब्रह्मत्वेऽध्यवसायिनः ॥ ११ | तत्पश्चात् एक हजार वर्षके अनन्तर ब्रह्मभावमें |