कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
४१९ कथासरित्सागर
४१९ कथासरित्सागर तीर्थयात्रा सवष्टावा सञ्छस्ता तस्य सा बुधैः। सम्पत्तिविधिभङ्गः स्याद्वैदिके यस्य कर्मणि॥२२४॥ अन्यथा देवपित्रग्निप्रियाव्रतजपादिभिः। गृहे या पुण्यनिष्पत्तिः साध्वनि भ्रमतः कुतः॥२२५॥ भुजोपधाना भूशायी भिक्षाशी केवलोऽशनः। मुनेः समत्वं प्राप्यापि न क्लेशैर्मुच्यतेऽध्वगः॥२२६॥ देहत्यागात्सुखं यद्वा वाञ्छस्येष तव भ्रमः। इतः कष्टतरं दुःखममुत्र ह्यात्मघातिनाम्॥२२७॥ तदेषोऽनुचितो मोहो यूनश्च विदुषश्च ते। स्वयं विचारयावश्यं कर्तव्यं मद्वचस्तव॥२२८॥ कारयामीह गुप्तं ते भूगृहं पृथु सुन्दरम्। विवाह्य सुन्दरीं तत्र तिष्ठाज्ञातो यथेच्छसि॥२२९॥ इति तेनाग्निवत्तेन बोधितः स प्रयत्नतः। गुणशर्मा सभ्येत्येतत्प्रतिपद्य जगाद तम्॥२३०॥ कृतं मया ते वचनं को भार्या सुन्दरीं त्यजेत्। किं त्वेतामकृती नाहं परिणेष्यामि ते सुताम्॥२३१॥ आराधयाम्यहं तावद्देवं कञ्चित्सुसंयतः। येन तस्य कृतघ्नस्य राज्ञः कुर्यां प्रतिक्रियाम्॥२३२॥ इति तद्वचनं हृष्टः सोऽग्निवत्तोऽन्वमन्यत। सोऽपि तां गुणशर्माणि विशश्राम सुखं निशाम्॥२३३॥ अन्येद्युश्चाग्निवत्तोऽस्य सौख्यार्थं तत्र गुप्तिमत्। पातालवसतिप्रख्यं कारयामास भूगृहम्॥२३४॥ तत्रस्थश्चाग्निवत्तं स गुणशर्माब्रवीद्ग्रहः। इहान्तर्ब्रूहि कं देवं केन मन्त्रेण भक्तितः॥२३५॥ आराधयाम्यहं तावद्वरदं व्रतचर्यया। इत्युक्तवन्तं तं धीरमग्निवत्तोऽभ्यभाषत॥२३६॥ अस्ति स्वामिकुमारस्य मन्त्रो मे गुरुचोदितः। तेनाराधय तं देवं सेनान्यं तारकान्तकम्॥२३७॥ यस्य जन्माग्निभिर्देवैः प्रथितं शत्रुपीड़ितैः। दग्धोऽपि कामः सङ्कल्पजन्मा स्वर्गेण निर्मितः॥२३८॥
षष्ठम लम्बक ४१७
षष्ठम लम्बक ४१७ तीर्थ-यात्रा तुम्हें अभीष्ट है, किन्तु विद्वानों के कथनानुसार तीर्थ-यात्रा उसके लिए उचित है, जिसके पास वैदिक कर्म करने के लिए प्रचुर सम्पत्ति नहीं है ॥२२४॥ अन्यथा देवता, पितर, अग्नि की सेवा, व्रत एवं जप आदि से घर बैठे जो पुण्य की प्राप्ति हो सकती है, वह मार्ग में भटकनेवाले तीर्थयात्रियों को नहीं ॥२२५॥ भुजाओं की तकिया लगाये भूमि पर सोनेवाला, भिक्षाओं से भोजन प्राप्त करनेवाला, अकेला और दीन यात्री मुनियों की समता पाकर भी कष्टों से छुटकारा नहीं पाता ॥२२६॥ देह-त्याग से तुम जो सुख चाहते हो, वह तुम्हारी भूल है। आत्मघाती को परलोक में भी अत्यधिक कष्ट उठाने पड़ते हैं ॥२२७॥ अतः युवा और विद्वान् तुम्हारा यह निरा मोह है। स्वयं सोचो और मेरी बात मानो ॥२२८॥ मैं तुम्हारे लिए विशाल विस्तृत भू-गृह बनवा देता हूँ। तुम सुन्दरी से विवाह करके वहाँ अज्ञात रूप से रहो, जैसा तुम चाहते हो ॥२२९॥ अग्निदत्त द्वारा इस प्रकार समझाये गये गुणशर्मा ने उसकी बात मान ली और उससे कहा कि मैंने तुम्हारी बात मान ली। सुन्दरी जैसी पत्नी को कौन छोड़ सकता है। किन्तु असफल अवस्था में मैं तुम्हारी कन्या से विवाह न करूँगा। तबतक संयत स्थिति में रहकर किसी देवता की आराधना करता हूँ। जिससे उस कृतघ्न राजा से बदला ले सकूँ ॥२३०-२३२॥ प्रसन्न चित्त अग्निदत्त ने उसकी बात मान ली और गुणशर्मा ने भी उसके घर में रात्रि को सुखपूर्वक विश्राम किया ॥२३३॥ दूसरे ही दिन अग्निदत्त ने गुणशर्मा की सुविधा के लिए रक्षायुक्त और आवश्यकताओं से परिपूर्ण 'पाताल-वसति' नामक भू-गृह बनवाया ॥२३४॥ उस गृह में रहते हुए एक बार गुणशर्मा ने अग्निदत्त से एकान्त में कहा- यह बताइए कि मैं यहाँ रहकर किस देवता की भक्ति और व्रत विधानानुसार आराधना करूँ? ऐसा कहते हुए धैर्यशाली गुणशर्मा से अग्निदत्त ने कहा-'मैं गुरु द्वारा दीक्षा में प्राप्त स्वामी कार्तिक का मन्त्र जानता हूँ। उस मन्त्र से तुम तारक (तारकासुर)-निहन्ता देवसेनापति (कार्तिकेय) की आराधना करो ॥२३५-२३७॥ जिन कार्तिकेय के जन्म को चाहनेवाले असुरों से पीड़ित देवताओं द्वारा भेजे गये कामदेव को शिव ने दग्ध करके भी सफलप्रयत्न बना दिया ॥२३८॥ ५३
१८ कथासरित्सागरं
१८ कथासरित्सागरं महेश्वरादग्निकुण्डाद्वने शरवणादपि। कृत्तिकाभ्यश्च शंसन्ति विचित्रं यस्य सम्भवम्॥२३९॥ जातेनैव जगत्कृत्स्नं क्षुब्धधैर्येण तेजसा। आनम्य येन निहतो दुर्जयस्तारकासुरः॥२४०॥ तन्मन्त्रमिममावृत्स्व मत्त इत्यभिधाय सः। अग्निवस्तो ददौ तस्मै मन्त्रं तं गुणशर्मणे॥२४१॥ सेनाराधितवांस्कन्दं गुणशर्मा स भूगृहे। तयोपचर्यमाणः सन्सुन्दर्या नियतव्रतः॥२४२॥ ततः प्रत्यक्षतामेत्य साक्षादेव स षण्मुखः। तुष्टोऽस्मि ते वरं पुत्र वृणीष्वेति तमादिशत्॥२४३॥ २४४॥ अक्षीणकोशो भूत्वा च महासेनं विजित्य च। गत्वाप्रतिहतः पुत्र पृथ्वीराज्यं करिष्यसि॥२४५॥ इति दत्त्वाधिकं तस्मै वरं स्कन्दस्तिरोदधे। सम्प्राप्ताक्षयकोषश्च गुणशर्मापि सोऽभवत्॥२४६॥ पृष्ट्वा सद्यः स्वमहिमोचितयाग्निवत्त— विप्रात्मजामनुविनाधिकबद्धभावाम् ॥ मान्मथसिद्धिमिव रूपवतीमुपेतां। तां सुन्दरीं स सुकृती विधिनोपयेमे॥२४७॥ अक्षीणकोशनिचयप्रभवप्रभावात् । सम्भूतभूरिगजबजिपदातिसैन्यः । दानप्रसादमिलिताखिलपार्थिवानां । रुन्धन्बलेरवनिमुज्जयिनीं जगाम॥२४८॥ प्रख्याप्य तस्यां तदशोकवत्याः प्रजास्वशीलं समरे च भूपम्। जित्वा महासेनमपास्य राज्यात्पृथ्वीपतित्वं स समाससाद॥२४९॥ अन्याश्च कन्याः परिणीय राज्ञामन्यैस्तटेष्वप्याप्तगजाश्वमुख्यैः। इष्टान्स भोगान्गुणशर्मसम्राट् चिराय मुद्वस्त स्म ससुन्दरीकः॥२५०॥
अष्टम लम्बक ४१९
अष्टम लम्बक ४१९ महेश्वर से अग्निकुंड से अग्नि से शर के वन से और कृत्तिकाओं से जिस स्वामी कार्तिकेय का विचित्र जन्म हुआ है, जिसने उत्पन्न होते ही अपने प्रचंड तेज से समस्त संसार को आनन्दित करके दुर्जय तारकासुर को मारा उस कार्तिकेय का मन्त्र मुझसे लो। इस प्रकार कहकर अग्निदत्त ने पुण्यशर्मा को मन्त्र-दीक्षा दी ॥२३९–२४१॥ उस पुण्यशर्मा ने सुन्दरी से सेवित होकर नियमित रूप से उस भू-गृह में उस मन्त्र द्वारा स्वामी कार्तिकेय की आराधना की ॥२४२॥ कुछ दिनों के उपरान्त भगवान् षडानन ने प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष होते हुए आज्ञा दी—'बेटा तुम पर मैं प्रसन्न हूँ वर माँगो' ॥२४३॥ २४४वां श्लोक त्रुटित है। पुण्यशर्मा द्वारा अभीष्ट वर माँगने पर षडानन ने कहा—'पुत्र ! तू अनन्त धन का स्वामी होकर और महासेन को जीतकर निष्कंटक पृथ्वी का राज्य करेगा' ॥२४५॥ इस प्रकार, माँग से भी अधिक वर प्रदान कर स्वामी कार्तिकेय अन्तर्हित हो गये और तदनन्तर पुण्यशर्मा को भी अक्षय धन की प्राप्ति हुई ॥२४६। अनुष्ठान की सिद्धि होने पर पुण्यशर्मा ने अपने महत्त्व और प्रभाव के अनुकूल समझकर चिरकालीन सेवा-सहवास से आसक्त अग्निदत्त की रूपवती कन्या सुन्दरी का मानो साक्षात् भावी कार्यसिद्धि के समान विधिपूर्वक पाणिग्रहण कर लिया ॥२४७॥ अक्षय धन-कोष की प्राप्ति के प्रभाव से प्रचुर हाथी घोड़े और पदातियों की सेना से युक्त पुण्यशर्मा ने शस्त्र के प्रभाव से मिलाए हुए दूसरे राजाओं की सेनाओं से भी उज्जयिनी नगरी को घेरते हुए उस पर आक्रमण कर दिया ॥२४८॥ उसने उज्जयिनी में जाकर रानी अशोकवती के दुराचार की घोषणा करके और युद्ध में राजा महासेन को जीतकर राज्य का अधिकार प्राप्त किया ॥२४९॥ राज्य प्राप्त कर और अन्य राजाओं की कन्याओं से विवाह करके समुद्र के तट तक राज्य का विस्तार करके सम्राट् पुण्यशर्मा उस सुन्दरी के साथ चिरकाल तक सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने लगा ॥२५ ॥
४२० कथासरित्सागर
४२० कथासरित्सागर इति पुष्यनिधोपाख्यानतो मूढबुद्धिः। सपदि विपदमाप प्राङ्महासेनभूपः। इति च स गुणशर्मा धैर्यमेकं सहायं। कृतमतिरवगम्य प्राप्तवानृद्धिमग्र्याम् ॥२५१॥ एव कथां स्वसचिवस्य मुखादुदारां। सूर्यप्रभो निशि निशम्य स वीतभीतेः। वीरो महासमरसागरमुत्तितीर्षु- रुत्साहमभ्यधिकमाप शनैश्च निद्रये ॥२५२॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके षष्ठस्तरङ्गः।
सप्तमस्तरङ्गः सूर्यप्रभचरितम्: अन्तिमं युद्धम् ततः सूर्यप्रभः प्रातरुत्थाय सचिवैः सह। दानवादिवलैः सर्वैर्युतो युद्धभुवं ययौ ॥१॥ आययो श्रुतशर्मा च विद्याधरबलैर्वृतः। आजग्मुश्च पुनर्द्रष्टुं सर्वे देवासुरादयः ॥२॥ सैन्ये द्वे अपि ते व्यूहावर्धचन्द्रौ च चक्रतुः। प्रावर्त्तत ततो युद्धं बलयोरुभयोस्तयोः ॥३॥ ससाध्वसमभिधावन्तो निकृन्तन्तः परस्परम्। पत्रास्ता प्रजविनो युध्यन्ते स्म शरा अपि ॥४॥ कोशानानप्रनिर्यताः सुदीर्घाः पीतशोणिताः। लोलाः खड्गलसा रेजुः कृतान्तरसना इव ॥५॥ शूरोत्कृष्टक्रमाम्भोजसम्पतच्चञ्चत्खड्गहतिः । राजहंसक्षयायासीत्तदाहवमहासुरः ॥६॥ उत्प्लद्भिः पतद्भिश्च निर्लूनैः शूरमूर्धभिः। कृतान्तकन्दुकक्रीडासभिमा समिवाबभौ ॥७॥ क्षतजासेकनिर्धूतधूलिध्मान्ते रणाजिरे। महारथानामभवद्वन्द्वायुद्धान्यमर्षिणाम् ॥८॥
अष्टम लम्बक ४२१
अष्टम लम्बक ४२१ इस प्रकार पुण्डरीकाक्ष के अज्ञान से मूर्खबुद्धि महासेन ने विरक्ति प्राप्त की और गुणशर्मा ने धैर्य धारण कर पूर्ण शक्रता और सर्वोत्कृष्ट राज्यलक्ष्मी प्राप्त की ॥२५१॥ अपने मन्त्री शास्त्रान्वित इस प्रकार की उदार कथा को सुनकर समर-रूपी महासागर को पार करने की इच्छा से सूर्यप्रभ ने अधिक उत्साह प्राप्त किया और धीरे धीरे सो गया ॥२५२॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का षष्ठ तरङ्ग समाप्त सप्तम तरङ्ग सूर्यप्रभ का वृतान्त अन्तिम युद्ध रात बीतने पर प्रातःकाल मदिरा के साथ शय्या से उठकर सूर्यप्रभ अपनी दानव और मानव-सेना को लेकर रणभूमि में गया ॥१॥ उधर विद्याधरों की सेनासहित श्रुतशर्मा भी युद्ध के मैदान में आकर डट गया और देवता असुर आदि भी प्रतिज्ञा के समान आकाश में युद्ध का दृश्य देखने के लिए आ गये ॥२॥ उस दिन दोनों ओर की सेनाओं में अर्धचन्द्र व्यूह बनाये गये और उसके पश्चात् दोनों सेनाओं में सङ्ग्राम आरम्भ हुआ ॥३॥ अस्त्रशस्त्रों के साथ दोनों ओर से दौड़ते हुए वीर आपस में एक दूसरे को काटते हुए और रक्ताक्त हुए हाथी भी दोनों आपस में टकरा-टकराकर युद्ध करने लगे ॥४॥ बाणों की धूलि में छिपी लक्ष्मी और खून की प्याली भरकर चलती हुई तलवारें मानो यम की प्रीक्षा के समान रणभूमि में लहलहा रही थीं ॥५॥ शस्त्रसञ्चालन से गिरे हुए हाथ-कङ्कालों पर गिरते हुए यक्ष-राक्षसों ... के सिरों को काट रहे थे ॥६॥ युद्ध के अन्ध और विकराल वातावरण के समय वीरों के पैर कटकर गिरते ... ... रही थी ॥७॥ उस समय दोनों ओर के ... ... ॥८-९-१०-११-१२-१३...॥ १. एक प्रकार का सैन्यव्यूह। २. युद्ध का फैसला।
आसीत्सूर्यप्रभस्यात्र संग्रामः श्रुतशर्मणा। दामोदरेण च समं प्रभासस्याहवोऽभवत् ॥१९॥ महोत्पातेन सार्कं च सिद्धार्थो युयुधे सदा। प्रहस्तो ब्रह्मगुप्तेन सङ्क्रमेन च बीतभीः ॥२०॥ प्रज्ञाढ्यश्चन्द्रगुप्तेनाप्यक्रमेण प्रियङ्करः। युयुधे सर्वदमनः सहैवातिबलेन च ॥२१॥ धुरन्धरेण युयुधे स कुञ्जरकुमारकः। अन्ये महारथाश्चान्यैरयुध्यन्त पृथक्पृथक् ॥२२॥ तत्र पूर्वं महोत्पातः प्रतिहत्य शरैः शरान्। सिद्धार्थस्य धनुश्छित्त्वा जघानाश्वांससारथीन् ॥२३॥ विरथः सोऽपि सिद्धार्थो धावित्वा तस्य तं रुषा। अयोदण्डेन महता साश्वं रथमचूर्णयत् ॥२४॥ ततस्तं पादचारी स सिद्धार्थं पादचारिणम्। बाहुयुद्धेन धरण्यां महोत्पातम्पातयत् ॥२५॥ यावच्चेच्छति निष्पेष्टुं स तं तावत्स खेचरः। भगेन रक्षितः पित्रा प्रोत्थाय प्रययौ रणात् ॥२६॥ प्रहस्तब्रह्मगुप्तौ चाप्यन्योन्यं विरथीकृतौ। करणैः खड्गयुद्धेन युध्यते स्म पृथग्विधैः ॥२७॥ प्रहस्तश्छासिनिर्मूनचर्माणं करणक्रमात्। युक्त्या तं पातयामास ब्रह्मगुप्तं भुवस्तले ॥२८॥ पतितस्य शिरस्तस्य स यावच्छेत्तुमिच्छति। तावन्निवारितो दूरात्पित्रास्य ब्रह्मणा स्वयम् ॥२९॥ सुता रक्षितुमायाता यूयं न प्रेक्षितुं रणम्। इत्युक्त्वा दानवाः सर्वे देवान्निजघ्नुस्तदा ॥३०॥ तावद्वीतभयश्छिन्नधन्वानं हतसारथिम्। जघान हृदये विद्ध्वा प्रद्युम्नास्त्रेण संङ्क्रमम् ॥३१॥ प्रज्ञाढ्यश्चन्द्रगुप्तं च पदातिं रथवांस्तयात्। पदातिं खड्गयुद्धेन न्यवधीत्कृतमस्तकम् ॥३२॥ ततः पुष्णवशत्रुश्च स्वममात्यं धनञ्जयम्। प्रज्ञाढ्ये योजयामास युद्धं चासीत्तयो क्षमम् ॥३३॥
अष्टम लम्बक ४२३
अष्टम लम्बक ४२३ सूर्यप्रभ का श्रुतधर्मा के साथ और प्रभास का दामोदर के साथ द्वन्द्व-युद्ध प्रारम्भ हुआ। इसी प्रकार, महोत्पात के साथ सिद्धार्थ का, ब्रह्मगुप्त के साथ प्रहस्त का और संगम के साथ वीतमति का, चन्द्रगुप्त के साथ प्रहास्य का, अक्रम के साथ प्रियंकर का और अतिबल के साथ सर्वदमन का द्वन्द्व-युद्ध होने लगा ॥९-११॥ इसी प्रकार, सुरेश्वर के साथ कुंजरकुमार भिड़ गया और अन्यान्य महारथियों के साथ अन्यान्य महारथी भिड़ गये ॥१२॥ उनमें पहले महोत्पात ने बाणों से सिद्धार्थ के बाणों को और धनुष को काटकर उसके सारथी और घोड़ों को भी मार डाला ॥१३॥ रथहीन और क्रुद्ध सिद्धार्थ ने भी रथ से कूदकर और दौड़कर लोहे के डंडे से महोत्पात के रथ को भी चूर चूर कर डाला ॥१४॥ तब सिद्धार्थ ने महोत्पात के साथ बाहुयुद्ध करके उसे पटक दिया और जब पटककर उसे मार डालना चाहा तब उसके पिता यम देवता ने उसकी रक्षा की और वह रणभूमि से उठकर भाग गया ॥१५-१६॥ प्रहस्त और ब्रह्मगुप्त परस्पर रथहीन होकर पृथक् पृथक् पैंतरेबाजी के साथ तलवारों से लड़ रहे थे। प्रहस्त ने तलवार से उसकी ढाल को काटकर पैंतरेबाजी के क्रम से ब्रह्मगुप्त को पृथ्वी पर गिरा दिया ॥१७-१८॥ जब प्रहस्त गिरे हुए ब्रह्मगुप्त का सिर तलवार से काटने लगा तब उसके पिता ब्रह्मा ने दूर से ही उसे स्वयं रोक दिया ॥१९॥ 'तुम सब लोग अपने पुत्रों की रक्षा करने आये हो, युद्ध देखने नहीं' इस प्रकार कहते हुए सभी दानव देवताओं की हँसी उड़ाने लगे ॥२०॥ इतने में ही वीतमय (वीतमिति) ने धनुष काटकर और सारथी को मारकर, हृदय पर बाणों की वर्षा करके संक्रम को प्रद्युम्नास्त्र से मार डाला ॥२१॥ रथ के दूर चले जाने से पैदल लड़ते हुए प्रहास्य ने रथहीन और पैदल युद्ध करते हुए चन्द्रगुप्त का मस्तक खड्ग-युद्ध में काट डाला ॥२२॥ तब पुत्र के वध से क्रुद्ध चन्द्रमा स्वयं युद्ध-भूमि में उतरकर प्रहास्य से लड़ने लगा। फलतः उन दोनों का युद्ध बराबर का हुआ ॥२३॥
४२४ कथासरित्सागर
४२४ कथासरित्सागर प्रियङ्करश्च विरथां विरथं रथनाशतः। एकखड्गप्रहारेण करोति स्माश्रर्मं द्विधा ॥२४॥ छिन्ने धनुषि निक्षिप्तनकुशेन हृदि क्षतम्। हतवान्सर्वदमनो हेलयातिबलं रणे ॥२५॥ ततो धुरन्धरं तं च स कुञ्जरकुमारकः। अस्त्रप्रत्यस्त्रयुद्धेन चकार विरथं मुहुः ॥२६॥ मुहुर्विक्रमशक्तिश्च तस्मै रथमडौकयत्। ररक्ष सङ्कटे च षाप्यस्त्रैरस्त्राणि वारयन् ॥२७॥ स कुञ्जरकुमारोऽथ धावित्वा महतीं शिलाम्। क्रुद्धो विक्रमशक्तेर्दाक् चिक्षेप स्यन्दनोपरि ॥२८॥ गते विक्रमशक्तौ च चूर्णितस्यन्दनं ततः। तयैव शिलया तं स धुरन्धरमचूर्णयत् ॥२९॥ सूर्यप्रभ प्रयुक्तोऽपि सहात्र श्रुतशर्मणा। विरोचनवचक्रोग्राञ्जघानैकैकुषा दसम् ॥३०॥ तत्क्रोधावश्विनौ देवौ युद्धायापतितौ शरैः। सुनीथः प्रतिजग्राह तेषां युद्धमभून्महत् ॥३१॥ स्थिरबुद्धिश्च संग्रामे शक्त्या हत्वा पराक्रमम्। वसुभिस्तद्वधक्रुद्धैः सहाष्टाभिरयुध्यत ॥३२॥ विरथीकृतमात्रं च प्रभासो वीक्ष्य मर्दनम्। वामोदररणासक्तोऽप्येकनेत्रेणवधीत् ॥३३॥ प्रकम्पनोऽस्त्रयुद्धेन हत्वा तेजःप्रभं युधि। युयुधे तद्वधक्रुद्धेनाग्निना सह साप्रतम् ॥३४॥ धूमकेतोश्च समरे यमदंष्ट्रं निजघ्नुषः। कुपितेन यमेनामूत्सह् युद्धं सुदारुणम् ॥३५॥ चूर्णयित्वा स शिलया सिंहदंष्ट्रः सुरोपमम्। समं निर्ऋतिना युद्धे तद्बषामर्षशालिना ॥३६॥ कालचक्रोऽपि चक्रेण चक्रे वायुबलं द्विधा। अयुध्यत च तत्कोपाञ्ज्वलन्ता वायुना सह ॥३७॥ स्पैर्नागाद्विवृक्षाणां महामायो विमोहदम्। कुबेरदत्तं हतवांस्तार्क्ष्यबन्ध्यामिरुद्ययत् ॥३८॥
षष्ठम लम्बक ४२५
षष्ठम लम्बक ४२५ रथहीन प्रियंकर ने तलवार के एक ही प्रहार से रथहीन अक्रम के दो टुकड़े कर डाले ॥२४॥ फेंके हुए अंकुश से धनुष के कटने पर धर्मदमन ने अतिबल को सहज में ही मार डाला॥२५॥ तब कुंजरकुमार ने अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों के युद्ध में रथहीन बुरबर को बार-बार मारा ॥२६॥ विक्रमशक्ति बुरबर के लिए बार-बार रथ उपस्थित करता था और अस्त्रों से अस्त्रों को दूर कर अपनी रक्षा कर रहा था। तब कुंजरकुमार ने क्रुद्ध होकर दौड़ते हुए, भारी पत्थर उठाकर विक्रमशक्ति के रथ पर फेंका ॥२७-२८॥ रथ के चूर-चूर हो जाने और विक्रमशक्ति के भाग जाने पर कुंजरकुमार ने उसी पत्थर की मार से बुरबर को चूर्ण-विचूर्ण कर डाला ॥२९॥ सूर्यप्रभ ने श्रुतशर्मा से युद्ध करते हुए भी विरोचन को मार देने के क्रोध से एक ही बाण से दम को मार डाला ॥३०॥ पुत्र-वध के क्रोध से अश्विनीकुमार देवता युद्ध के लिए उतर आये। सुनीथ ने उनको रोका तो उन दोनों में घमासान युद्ध मच गया ॥३१॥ स्थिरबुद्धि शक्ति (अस्त्र) से पराक्रम को मारकर उसके वध से क्रुद्ध आठ वसुओं के साथ लड़ने लगा ॥३२॥ दामोदर से युद्धरत प्रभास ने घास को रथहीन करनेवाले मथन को एक बाण से मार डाला ॥३३॥ प्रकम्पन नामक दानव अस्त्रयुद्ध में तेजप्रभ को मारकर उसके वध से क्रुद्ध अग्निदेव से युद्ध करने लगा ॥३४॥ यमपुत्र यमदंष्ट्र को मारनेवाले धूमकेतु दानव का उसके पिता यमराज के साथ युद्ध हुआ ॥३५॥ सिंहदंष्ट्र पत्थर के प्रहार से सुरोपण को मारकर उसके वध से क्रुद्ध निर्ऋति देवता से युद्ध करने लगा ॥३६॥ कालचक्र दानव ने चक्र से वायुबल (विद्याधर) के दो टुकड़े कर दिये। इस कारण क्रुद्ध उसके पिता वायु के साथ उसका युद्ध होने लगा ॥३७॥ महामाय दानव ने सर्प पहाड़ वृक्ष आदि नाना प्रकार के रूप धारण करनेवाले कुबेरदत्त नामक विद्याधर को गरुड़ वज्र और अग्नि का रूप धारण करके मार डाला ॥३८॥ ५४
४२१ कथासरित्सागरः
४२१ कथासरित्सागरः तत श्च कुबेरोऽत्र तेन साकमयुध्यत। एवमन्येऽप्ययुध्यन्त सुरा स्वांशावधृक्तया ॥३९॥ निजघ्निरञ्जसाऽन्येऽपि ये ते विद्याधराधिपाः। उत्पतद्भिः प्रतिपदं सशैलैर्मनुजदानवैः ॥४०॥ तावच्चात्र प्रभासस्य सह दामोदरेण यत्। परम्परास्त्रप्रत्यस्त्रभीमं युद्धमवर्त्तत ॥४१॥ अथ दामोदरश्छिन्नधन्वा निहतसारथिः। आसाद्य चापं शङ्खाद्यं स्वयं रथमिनोऽयुध्यत ॥४२॥ ताञ्चापि दृष्ट्वा साश्चर्यं पप्रच्छेन्द्रोऽम्बुजासनम्। हीयमाने प्रति कथं तुष्टोऽसि भगवन्निति ॥४३॥ ततो ब्रह्मा जगादेनं कथं न तस्य तुष्यत। इयच्चिरं प्रभासेन सह योऽनेन युध्यते ॥४४॥ दामोदरं हरञ्च विना मुञ्चन्ति हि कः। एतस्य हि प्रभासस्य सर्वैष्यत्या सुरा रणः ॥४५॥ मधुनिर्नाम यो ह्यासीदसुरः सुरमर्द्दनः। प्रद्युम्नवधतप्तोऽज्ञः शबरत्वमवाप सः ॥४६॥ सच प्रभासो जातोऽद्य पुत्रो भागस्य दुज्जयः। भागार्द्धः पूरुमभवद्वरन्निर्मलारुण्डः ॥४७॥ भूत्वा हिरण्यकशिपुस्ततो भूत्वा बलिस्ततः। मुकुन्दसख्ये सुरेषु योऽभून्गोत्रं मुदप्रमोदः सः ॥४८॥ हिरण्याक्षस्य याभूतत्राणं गुर्वीचायुरावयम्। प्रह्लादाख्यः स एवात्र यद्गर्भं दानवेश्वरः ॥४९॥ स दुष्प्राभिविषाणोऽसौ पुनर्ज्ञातो हलोत्सुकः। सान्तान्यः स्वामी पद्मरागाद्यधिपाः ॥५०॥ तानेतानपि ... विष्णुरप्यन्वभासत। विद्याधराणां चक्रं बलिनान्निहतारयः ॥५१॥ न ... तान्ज्ञात्वा ... ॥ ... ॥५२॥ ... ॥ ... ॥५३॥
अष्टम लम्बक ४२७
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इस कारण क्रुद्ध कुबेर महामाय से युद्ध करने लगा। इसी प्रकार अनेक देवता अपने अपने आंशिक पुत्र विद्याधरों के मारे जाने के कारण क्रुद्ध होकर दानवों और मानवों से युद्ध करने लगे ॥३९॥ पल-पल में उछलते हुए मानवों और दानवों ने अनेक प्रसिद्ध विद्याधर राजाओं और उनके सरदारों को मार डाला ॥४०॥ इधर प्रभास के साथ दामोदर का अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों के द्वारा घमासान युद्ध चल रहा था। कुछ समय कटे हुए धनुष और मरे हुए सारथीवाले दामोदर ने, दूसरा धनुष संभाल और स्वयं घोड़े की लगाम पकड़कर युद्ध किया ॥४१-४२॥ दामोदर को साधुवाद देते हुए ब्रह्मा से इन्द्र ने पूछा—'प्रभो हारते हुए दामोदर को आप साधुवाद क्यों दे रहे हैं? ॥४३॥ तब ब्रह्मा ने कहा—'क्यों न साधुवाद दूँ। यह दामोदर इस प्रभास के साथ इतनी देर तक जमकर युद्ध कर रहा है यह साधारण बात नहीं है ॥४४॥ भगवान् विष्णु के अंश-स्वरूप दामोदर के अतिरिक्त कौन इस प्रभास से युद्ध कर सकता है। क्योंकि अकेले प्रभास के लिए युद्ध में सभी देवता एक साथ मिलकर भी कम हैं ॥४५॥ पूर्वकाल में युद्ध में सुरों का मर्दन करनेवाला नमुचि नाम का जो असुर था वह दूसरे जन्म में सर्वस्तनमय प्रबल नाम से उत्पन्न हुआ। वही अब यह भास का पुत्र प्रभास हुआ है। भास भी पहले कालनेमि नाम का महान् असुर था। दूसरे जन्म में वह हिरण्यकशिपु नाम का दैत्य हुआ। तदनन्तर कपिंजल के नाम से अवतीर्ण हुआ। शुमुंडीक नाम का जो असुर था वह आज सूर्यप्रभ हुआ है। पहले जन्म में हिरण्याक्ष नाम का जो दैत्य था वह अब सुनीथ के रूप में है। प्रहस्त आदि ये सभी पूर्वजन्म के दैत्य और दानव हैं ॥४६-४९॥ तुम लोगों ने पहले जिन असुरों को मारा था वे ही इस समय मानव और दानव के रूप में अवतीर्ण हुए हैं। इसीलिए, मय आदि सभी उनके पक्ष में हैं ॥५०॥ सूर्यप्रभ आदि द्वारा किये गये यज्ञ के स्विष्टकृत् हवन के प्रभाव से बन्धन-मुक्त होकर बलि भी आज युद्ध देखने आया है ॥५१॥ यह (बलि) अपने सत्य-वचन की रक्षा के लिए पाताल-लोक में ही रहता है। तुम्हारा राज्य-काल समाप्त होने पर वही इन्द्र बनेगा ॥५२॥ इस समय ये दानव और मानव शिवजी की कृपा के पात्र हैं। अब यह तुम्हारे विजय का समय नहीं है। इसलिए सन्धि कर लो। आग्रह (हठ) करने से क्या लाभ है? ॥५३॥
४२८ कथासरित्सागर
४२८ कथासरित्सागर
इति यावत्सुरपति ब्रवीति कमलासनः। तावत्प्रभासः प्रामुञ्चदस्त्रं पाशुपतं महत् ॥५४॥ तद्दृष्ट्वा सर्वसंहारि रौद्रमस्त्रं विजृम्भितम्। प्रमुक्तं हरिणा चक्रं सुतस्नेहात्सुदर्शनम् ॥५५॥ ततः सम्पूयोराशीभूय दिव्यास्त्रयोस्तयोः। अकाण्डविश्वसंहारसंभ्रान्तमुभयत्रयम् ॥५६॥ अस्त्रं स्वं संहरैतत्वं यावत्स्वं संहराम्यहम्। इत्युक्तो हरिणा सोऽथ प्रभासः प्रत्युवाच तम् ॥५७॥ मुक्तमस्त्रं वृथा न स्यात्तन्नयातु पराङ्मुखः। दामोदरो रणं हित्वा ततोऽस्त्रं संहराम्यहम् ॥५८॥ इत्युक्ते तेन भगवानवादीत्तर्हि मानय। चक्रं त्वमपि मे मा भूद्वैफल्यमुभयोरपि ॥५९॥ एतच्छौरेर्वचः श्रुत्वा प्रभासः प्राह कालवित्। एवमस्तु रथं हन्तु मम चक्रमिदं तव ॥६०॥ तथेति हरिणा दामोदरे व्याव्र्त्तिते रणात्। प्रभासः संजहारास्त्रं चक्रं चास्यापतद्रथे ॥६१॥ आदह्यान्त्यं रथं सोऽथ ययौ सूर्यप्रभान्तिकम्। दामोदरोऽपि स प्रायाच्छतपर्वाक्तिकं ततः ॥६२॥ तावच्च वासवाघासदृप्तस्य श्रुतशर्मणः। सूर्यप्रभस्य च द्वन्द्वयुद्धं शुक्लं परामगात् ॥६३॥ श्रुतशर्मा प्रयुक्त स्म यद्यन्त्स्त्रं प्रयत्नतः। प्रत्यस्त्रैः प्रतिहन्ति स्म तत्तत्सूर्यप्रभः क्षणात् ॥६४॥ माया या या च तनात्र प्रयुक्ता श्रुतशर्मणा। सूर्यप्रभण ता मास्य निहताः प्रतिमायया ॥६५॥ ततो ब्रम्हास्त्रममर्षच्छ्रुताशर्माशिरोगतम्। सूर्यप्रमोऽपि प्रामुञ्चदस्त्रं पाशुपतं कृती ॥६६॥ तेन रौद्रमहास्त्रेण ब्रह्मास्त्रं प्रतिहत्य तत्। यावत्स दुद्रुवेण श्रुतशर्माभिभूयत ॥६७॥ नागेन्द्रमृगिभिश्चैषाञ्चे गमनाः। यथाशनि प्रयुक्तानि परमारत्राण्यमर्षिभिः ॥६८॥
अष्टम लम्बक ४२१
अष्टम लम्बक ४२१ ब्रह्मा जबतक इस प्रकार कह रहे थे तभी प्रभास ने महान् पाशुपतास्त्र चलाया ॥५४॥ सर्वसंहारक उस अस्त्र से भीषण संहार होते देखकर अपने अंश दामोदर के पुत्र स्नेह से विष्णु ने सुदर्शन-चक्र चला दिया ॥५५॥ तब समान बलशाली उन दोनों दिव्यास्त्रों का सहसा विश्व के संहार का कारण तीनों लोकों को व्याकुल करनेवाला युद्ध होने लगा ॥५६॥ 'तुम अपने पाशुपत अस्त्र को हटा लो तो मैं भी अपने सुदर्शन चक्र को हटा लूँगा' विष्णु के इस प्रकार कहने पर प्रभास उनसे बोला- ॥५७॥ मेरा चलाया हुआ अस्त्र व्यर्थ नहीं जायगा। दामोदर युद्ध-भूमि छोड़कर हट जाय तो मैं अस्त्र-संहार कर सकता हूँ ॥५८॥ प्रभास के ऐसा कहने पर विष्णु ने कहा- तो तुम भी मेरे चक्र की मान-रक्षा करो। जिससे दोनों विरक्त न हों' ॥५९॥ विष्णु का वचन सुनकर अवसर जाननेवाले प्रभास ने कहा- 'ठीक है आपका यह चक्र मेरे रथ को तोड़ दे' ॥६०॥ विष्णु भगवान् के स्वीकार करने पर दामोदर युद्ध भूमि से लौट गया। फलतः प्रभास ने पाशुपतास्त्र को लौटा लिया और उसके रथ पर सुदर्शन-चक्र गिरा ॥६१॥ तब प्रभास दूसरे रथ पर बैठकर सूर्यप्रभ के पास चला गया और उधर दामोदर भी सुशर्मा के पास गया ॥६२॥ इसी बीच दुष्ट का अन्त होने के कारण पवित्र सुशर्मा का और सूर्यप्रभ का द्वन्द्व-युद्ध अत्यन्त भीषण अवस्था में पहुँच गया ॥६३॥ सुशर्मा बड़े ही प्रयत्न से जिस अस्त्र का प्रयोग करता था सूर्यप्रभ उसी क्षण प्रति अस्त्र से उसका प्रतिकार कर देता था ॥६४॥ इसके अतिरिक्त सुशर्मा ने जो जो इन्द्रजाल की माया फैलाई सूर्यप्रभ ने उन उन का विरोधी माया से दूर कर दिया ॥६५॥ जब सुशर्मा ने अन्त काल में सूर्यप्रभ पर वज्रास्त्र का प्रयोग किया तब सूर्यप्रभ ने भी पावक अस्त्र का प्रयोग कर दिया ॥६६॥ पावकास्त्र से उस वज्रास्त्र को दूर कर देनेपर पर सुशर्मा पर प्रहार हुआ तब क्रुद्ध होकर [L29: महारथ से वह इधर उधर बाणों और से रथ चढ़ि अस्त्रों का सूर्यप्रभ पर प्रहार किया ॥६७-६८॥
४२८ कथासरित्सागर
४२८ कथासरित्सागर इति यावत्सुरपतिं ब्रवीति कमलासनः। तावत्प्रभासः प्रामुञ्चदस्त्रं पाशुपतं महत् ॥५४॥ तद्दृष्ट्वा सर्वसंहारि रौद्रमस्त्रं विजृम्भितम्। प्रमुक्तं हरिणा चक्रं सुतस्नेहात्सुदर्शनम् ॥५५॥ ततः सरूपयोरासीद्दिव्यास्त्रयोस्तयोः। अकाण्डविषमसंहारसंभ्रान्तभुवनत्रयम् ॥५६॥ अस्त्रं स्वं संहरैतस्त्वं यावत्स्वं संहराम्यहम्। इत्युक्तो हरिणा सोऽथ प्रभासः प्रत्युवाच तम् ॥५७॥ मुक्तमस्त्रं वृथा न स्यात्तत्प्रयातु पराङ्मुखः। दामोदरो रणं हित्वा ततोऽस्त्रं संहराम्यहम् ॥५८॥ इत्युक्ते तेन भगवानवादीत्तर्हि मानय। चक्रं त्वमपि मे मा भूद्वैफल्यमुभयोरपि ॥५९॥ एतच्छौरेर्वचः श्रुत्वा प्रभासः प्राह कालवित्। एवमस्तु रथं हन्तु मम चक्रमिदं तव ॥६०॥ तथेति हरिणा दामोदरे व्याव्रतिते रणात्। प्रभासः संजहारास्त्रं चक्रं चास्यापतद्रथे ॥६१॥ आरुह्यान्यं रथं सोऽथ ययौ सूर्यप्रभान्तिकम्। दामोदरोऽपि स प्रायाच्छ्रुतशर्म्मान्तिकं ततः ॥६२॥ तावच्च वासवांशात्वदृप्तस्य श्रुतशर्मणः। सूर्यप्रभस्य च द्वन्द्वयुद्धं काष्ठां परामगात् ॥६३॥ श्रुतशर्मा प्रयुङ्क्ते स्म यद्यदस्त्रं प्रयत्नतः। प्रत्यस्त्रं प्रतिहन्ति स्म तत्तत्सूर्यप्रभः क्षणात् ॥६४॥ माया या या च तेनात्र प्रयुक्ता श्रुतशर्मणा। सूर्यप्रभेण सा मास्य निहता प्रतिमायया ॥६५॥ ततो ब्रह्मास्त्रममुञ्चच्छ्रुतशर्मातिरोषतः। सूर्यप्रभाऽपि प्रामुञ्चदस्त्रं पाशुपतं हृदी ॥६६॥ तेन रौद्रमहास्त्रेण ब्रह्मास्त्रं प्रतिहत्य तत्। यापरन् दुष्प्रभावेण श्रुतशर्माभिभूयत ॥६७॥ तावदिन्द्रप्रभृतिभिर्देवासुर... गमनुतः। वज्रादीनि प्रयुक्तानि परमास्त्राण्यमर्षिभिः ॥६८॥
अष्टम लम्बक ४२९
अष्टम लम्बक ४२९ ब्रह्मा जबतक इन्द्र से इस प्रकार कह रहे थे तभी प्रभास ने महान् पाशुपतास्त्र चलाया ॥५४॥ सर्वसंहारकारी उस अस्त्र से भीषण संहार होते देखकर अपने अंश दामोदर के पुत्र स्नेह से विष्णु ने सुदर्शन चक्र चला दिया ॥५५॥ तब समान बलशाली उन दोनों दिव्यास्त्रों का सहसा विश्व के संहार का कारण तीनों लोकों को व्याकुल करनेवाला युद्ध होने लगा ॥५६॥ 'तुम अपने पाशुपत अस्त्र को हटा लो तो मैं भी अपने सुदर्शन चक्र को हटा लूँगा' विष्णु के इस प्रकार कहने पर प्रभास उनसे बोला—॥५७॥ मेरा चलाया हुआ अस्त्र व्यर्थ नहीं जायगा। दामोदर, युद्ध-भूमि छोड़कर हट जाय तो मैं अस्त्र-संहार कर सकता हूँ ॥५८॥ प्रभास के ऐसा कहने पर विष्णु ने कहा—'तो तुम भी मेरे चक्र की मान-रक्षा करो। जिससे दोनों निष्फल न हों' ॥५९॥ विष्णु का वचन सुनकर अवसर जाननेवाले प्रभास ने कहा—'ठीक है, आपका यह चक्र मेरे रथ को तोड़ दे' ॥६०॥ विष्णु भगवान् के स्वीकार करने पर दामोदर युद्ध-भूमि से लौट गया। फलतः प्रभास ने पाशुपतास्त्र को लौटा लिया और उसके रथ पर सुदर्शन चक्र गिरा ॥६१॥ तब प्रभास दूसरे रथ पर बैठकर सूर्यप्रभ के पास चला गया और उधर दामोदर भी श्रुतशर्मा के पास गया ॥६२॥ इसी बीच इन्द्र का अंश होने के कारण गर्वित श्रुतशर्मा का और सूर्यप्रभ का द्वन्द्व-युद्ध अत्यन्त भीषण अवस्था में पहुँच गया ॥६३॥ श्रुतशर्मा बड़े ही प्रयत्न से जिस अस्त्र का प्रयोग करता था सूर्यप्रभ उसी क्षण प्रति अस्त्र से उसका प्रतिकार कर देता था ॥६४॥ इसके अतिरिक्त श्रुतशर्मा ने जो-जो इन्द्रजाल की माया फैलाई, सूर्यप्रभ ने उस-उस को विरोधी माया से दूर कर दिया ॥६५॥ जब श्रुतशर्मा ने अत्यन्त क्रोध से सूर्यप्रभ पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया तब सूर्यप्रभ ने भी पाशुपत अस्त्र का प्रयोग कर दिया ॥६६॥ पाशुपतास्त्र ने जब ब्रह्मास्त्र को दूर कर श्रुतशर्मा पर प्रभाव डाला तब इन्द्र आदि लोकपालों ने क्रोध करके चारों ओर से वज्र आदि अस्त्रों का सूर्यप्रभ पर प्रहार किया ॥६७-६८॥
सतु पाशुपतं तानि जित्वा सर्वायुधान्यपि। प्रज्वलन् सुतरामस्त्रं श्रुतशर्मजिघांसया ॥६९॥ ततः सूर्यप्रभं स्तुत्वा महास्त्रं तद्व्यविक्षिपत्। मा वधीः श्रुतशर्माणं बध्द्वा त्वं तं समर्पय ॥७०॥ ततः प्रसह्य निश्चेष्टः ससम्भ्रममवत्सुरैः। तज्जिगीषावधाच्चान्ये प्रेक्षकैरसुरैरपि ॥७१॥ तत्राथ वीरभद्राख्यः शम्भुना प्रेरितो गणः। आगत्यैव तदावेशमिन्द्रादिभ्योऽब्रवीदिदम् ॥७२॥ यूयं प्रेक्षितुमायातास्तद्रोधुं वः क्रमोऽत्र कः। मर्यादाभङ्गुतानाञ्चान्यदपि स्यादसञ्जसम् ॥७३॥ एतच्छ्रुत्वाब्रुवन्देवा हन्यन्ते न हताश्च नः। सर्वेषामत्र तनयास्तन्न युध्यामहे कथम् ॥७४॥ दुस्त्यजो हि सुतस्नेहस्तद्वशस्य प्रतिक्रिया। तन्निहन्तृषु कर्तव्या यथाशक्त्यत्र कोऽक्रमः ॥७५॥ इत्युक्तवत्सु देवेषु वीरभद्रे ततो गते। सुराणामसुराणां च प्रावर्त्तत महारथः ॥७६॥ सुनीथः सममश्विभ्यां प्रज्ञाचक्षुश्च सहेतुना। स्थिरबुद्धिश्च वसुभिः कालभद्रश्च वायुना ॥७७॥ प्रकम्प्योऽग्निना सिंहदंष्ट्रो निर्ऋतिना तथा। वरुणेन प्रधमनो धूमकेतुर्यमेन च ॥७८॥ महामायः स च तथा धनाधिपतिना सह। अयुध्यतास्त्रप्रत्यस्त्रैरन्योन्यैश्च समं सुरैः ॥७९॥ पर्यन्ते परमास्त्रं च यो यो यद्यत्सुरोऽक्षिपत्। तस्य तन्म हरस्तत्तदुङ्कारेण व्यनाशयत् ॥८०॥ धनदस्तूद्यतगदः साम्ना शर्वेण वारितः। भग्नास्त्राश्च सुरास्ते ते परित्यज्याहवं ययुः ॥८१॥ ततः सूर्यप्रभं शक्रः स्वयं क्रोधादयोधयत्। सरोषममुचत्तस्मिंस्तानि तान्यायुधानि च ॥८२॥ सूर्यप्रभश्च निर्धूय तदस्त्राण्यवहेलया। मार्जारिष्टनाराचैस्तेनेन्द्रमभ्यताडयत् ॥८३॥
अष्टम लम्बक ४३१
अष्टम लम्बक ४३१ किन्तु, जब पाशुपतास्त्र उन सब अस्त्रों को हटाकर धृतधर्मा को मारने के लिए प्रवृत्त हुआ तब सूर्यप्रभ ने उस अस्त्र की स्तुति करके उससे प्रार्थना की कि वह धृतधर्मा का वमन करे। उसे बाँधकर वह मुझे सौंप दे ॥६९-७०॥ यह देखकर सभी देवता क्रोध से युद्ध करने के लिए उद्यत हो गये और इधर उन्हें जीतने के लिए असुर भी तैयार हो गये ॥७१॥ उसी समय शंकर द्वारा प्रेरित वीरभद्र नामक गण उत्पन्न हुआ और उसने इन्द्र आदि देवताओं को शंकर की आज्ञा सुनाई—॥७२॥ 'तुमलोग युद्ध देखने के लिए आये हो तो युद्ध करने का यह कौन-सा तुक है। इस प्रकार, मर्यादा का भंग करने से और भी बुराई उत्पन्न होगी' ॥७३॥ यह सुनकर देवता कहने लगे कि 'इस युद्ध में हम सभी के पुत्र मारे गये और मारे जा रहे हैं। इसलिए, हमलोग क्यों न लड़ें ? ॥७४॥ पुत्र का स्नेह छोड़ा नहीं जा सकता। अतः मारनेवालों पर प्रतिक्रिया अवश्य ही करनी होगी। इसमें क्या बेतुकापन है ॥७५॥ देवताओं के इस प्रकार कहने पर और वीरभद्र के अन्तर्धान होने पर देवासुरों का भी भीषण युद्ध प्रारम्भ हुआ ॥७६॥ सुनीथ अश्विनीकुमारों के साथ प्रज्ञाढ्य चन्द्रमा के साथ स्थिरबुद्धि अष्ट वसुओं के साथ कालचक्र वायु के साथ प्रकम्पन अग्नि के साथ सिंहदंष्ट्र निर्ऋति के साथ प्रमथन वरुण के साथ धूमकेतु यम के साथ और महामाय धनाधिप कुबेर के साथ द्वन्द्व-युद्ध करने लगे। इसी प्रकार, अन्य असुर भी शस्त्रास्त्रों द्वारा देवताओं से युद्ध करने लगे ॥७७-७९॥ अन्त में देवता अपने जो-जो परम अस्त्र का प्रयोग करते थे शिवजी उस-उस अस्त्र को हुङ्कार मात्र से व्यर्थ कर देते थे ॥८०॥ गदा उठाये हुए अपने मित्र को शिव ने शान्तिपूर्वक मना किया। अस्त्रों के विफल हो जाने के कारण विवश देवता युद्ध से विरत हो गये ॥८१॥ तब इन्द्र क्रोध से भरकर स्वयं सूर्यप्रभ से युद्ध करने लगा और उस पर बाणों तथा अन्यान्य शस्त्रास्त्रों की वर्षा करने लगा ॥८२॥ सूर्यप्रभ ने उसकी शस्त्र-वर्षा को साधारण समझा और स्वयं शान्त रह खींचे हुए धनुष से इन्द्र को एक सौ बाणों से मारा ॥८३॥
ततः क्रुद्धः स कुलिशं जग्राह च सुराधिपः। हुङ्कारं चाकरोद्बुद्धः कुलिशं च ननाश तत् ॥८४॥ ततः पराङ्मुखे याते शक्रे नारायणः स्वयं । प्रभासं योधयामास क्रोधात्कोटीमुखैः शरैः ॥८५॥ अस्त्राण्यन्यानि चाप्यस्त्रैर्निष्कम्यो युयुधे समम्। हताश्वो विरथीभूतोऽप्यारुह्याग्यं रथं च सः ॥८६॥ तेन दैत्यारिणा सार्धं निर्विशेषमयुध्यत। ततः प्रकुपितो देवो ज्वलच्चक्रं मुमोच सः ॥८७॥ प्रभासोऽप्यभिमन्त्र्यैव दिव्यं खड्गं प्रमुक्तवान्। तयोरायुधयोर्युध्यमानयोर्वीक्ष्य धन्वराट् ॥८८॥ हीयमानं रणे खड्गं हुङ्कारं कृतवान्हरः। तेन ते खड्गचक्रे द्वे अन्तर्धानमुपेयतुः ॥८९॥ ततो ननन्दुरसुरा विषीदन्ति स्म चामराः। सूर्यप्रभे लब्धजये बद्धे च श्रुतशर्मणि ॥९०॥ संस्तुत्याराभयामासुरथ देवा वृषध्वजम्। ततस्तुष्टः सुरानिदमादिवेशाम्बिकापतिः ॥९१॥ सूर्यप्रभप्रतिज्ञातं वर्जयित्वार्थ्यतां वरः। दैव यत्ते प्रतिज्ञातं कः शक्तः कर्तुमन्यथा ॥९२॥ किं त्वस्माभिः प्रतिज्ञातं यदस्य श्रुतशर्मणः। सत्यं तदप्यस्तु विभो मा भूद्वक्षक्षयश्च नः ॥९३॥ इत्युक्त्वा विरतान्देवा भगवानसमादिशत्। संधौ कृते मवस्येतत्सन्धिधैवमिहास्तु वः ॥९४॥ सूर्यप्रभं प्रणमतु श्रुतशर्मा सहानुगः। ततस्तथा विधास्यामो यथोभयहितं भवेत् ॥९५॥ इतीदवरवचो देवाः प्रतिपद्य समेति च। सूर्यप्रभस्य विदधुः श्रुतशर्माणमानतम् ॥९६॥ ततस्तयोमिथस्त्यक्तवैरयोः कृष्ठमन्वयोः। सन्धिं देवासुराश्चक्रुः शान्तवैराः परस्परम् ॥९७॥ अथ शृण्वत्सु निर्जितेष्वसुरेषु सुरेषु च। उवाच भगवाञ्छम्भुः सूर्यप्रभमिदं वचः ॥९८॥
अष्टम लम्बक ४३१
अष्टम लम्बक ४३१ तब देवराज इन्द्र ने क्रोध से भरकर वज्र उठाकर सूर्यप्रभ पर प्रहार किया तो शिवजी ने हुंकार कर दिया। फलतः वज्र नष्ट होगया ॥८४॥ तब इन्द्र के युद्धभूमि से चले जाने पर स्वयं नारायण क्रोध से भरकर तीक्ष्ण मुखवाले बाणों से प्रभास को कढ़ाने लगे ॥८५॥ नारायण के अस्त्रों का उत्तर विरोधी अस्त्रों से देता हुआ प्रभास अविचल भाव से छायारथ व्यक्ति के समान युद्ध करने लगा। घोड़ों के मर जाने और रथ के टूट जाने पर भी वह दूसरे रथ पर चढ़कर लड़ रहा था। तब विष्णु भगवान् ने क्रुद्ध होकर प्रभास पर जलते हुए चक्र का प्रहार किया तो तुरन्त प्रभास ने भी अभिमन्त्रित खड्ग का प्रयोग कर दिया। उन दोनों अस्त्रों (चक्र और खड्ग) को परस्पर युद्ध करते हुए और चक्र से खड्ग को धीरे-धीरे निर्बल होते हुए देख कर शंकर भगवान् ने हुंकार किया। उससे वे दोनों खड्ग और चक्र अन्तर्हित हो गये ॥८६—८९॥ तब सूर्यप्रभ के विजयी होने और श्रुतशर्मा के पकड़कर बांध लिये जाने पर असुर आनन्दित और देवता खिन्न हो गये ॥९०॥ तदनन्तर देवताओं ने स्तुति करके शंकर की आराधना की। फलतः प्रसन्न होकर गिरिजापति शंकर भगवान् ने देवताओं से यह कहा—'मैंने सूर्यप्रभ से जो प्रतिज्ञा की है उसे छोड़कर और कोई भी वर मांगो। देवताओं ने कहा—'भगवन्, आप जो प्रतिज्ञा कर चुके उसे उलटने में कौन समर्थ हो सकता है, किन्तु हम लोगों ने भी श्रुतशर्मा को जो वचन दिया है वह भी सत्य होना चाहिए। हमारे वंश का नाश नहीं होना चाहिए' ॥९१—९३॥ ऐसा कहकर चुप हुए देवताओं से भगवान् महादेव ने कहा—'परस्पर सन्धि कर लेने पर ही यह सम्भव है। पहले श्रुतशर्मा अपने अनुचरों के साथ सूर्यप्रभ को प्रणाम करे, तब मैं उस पक्ष के हित की बात कहूँगा' ॥९४—९५॥ शिवजी के ऐसा कहने पर 'ऐसा ही होगा' देवताओं ने कहा और श्रुतशर्मा को सूर्यप्रभ के आगे विनम्र कर दिया ॥९६॥ तब उन लोगों के गले मिलने पर और आपसी शत्रुता छोड़ देने पर देवताओं और असुरों ने बैर शान्त करके परस्पर मित्रता कर ली ॥९७॥ तदनन्तर, सभी सुरों और असुरों के नमते रहने पर, भगवान् शंभू ने सूर्यप्रभ से कहा—॥९८॥ ५५