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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ गये हैं, जो न तो प्रधान (जड प्रकृति)-के लिये उपयुक्त हो सकते हैं और न अल्पज्ञ जीवात्माके लिये ही। इसके सिवा, उन दोनोंको ब्रह्मसे भिन्न कहा गया है। मुण्डकोपनिषद् (३।१।७)-में उल्लेख है कि—'पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥' अर्थात् 'वह देखनेवालोंके शरीरके भीतर यहीं हृदय- गुफामें छिपा हुआ है।' इसके अनुसार जीवात्मासे परमात्माकी भिन्नता स्वतः स्पष्ट हो जाती है। इसके सिवा, मुण्डक० (३।१।२)-में भी कहा है कि— 'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ 'शरीररूप वृक्षपर रहनेवाला यह जीवात्मा शरीरमें आसक्त होकर डूब रहा है। अपनेको असमर्थ समझकर मोहित हो शोक करता रहता है। परंतु वह जब वहीं स्थित तथा भक्तजनोंद्वारा सेवित अपनेसे भिन्न परमेश्वरको देख लेता है और उसकी महिमाको समझ लेता है, तब सर्वथा शोकरहित हो जाता है।' इस प्रकार इस मन्त्रमें स्पष्ट शब्दोंद्वारा परमेश्वरको जीवात्मासे तथा शरीररूपी वृक्षसे भी भिन्न बताया गया है। अतः यहाँ जीव और प्रकृति दोनोंमेंसे कोई भी अदृश्यता आदि गुणोंसे युक्त जगत्-कारण नहीं हो सकता। सम्बन्ध—इस प्रकरणमें जिसे समस्त भूतोंका कारण बताया गया है, वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, इसकी पुष्टिके लिये दूसरा प्रमाण उपस्थित करते हैं— रूपोपन्यासाच्च ॥ १ । २ । २३ ॥ रूपोपन्यासात् = श्रुतिमें उसीके निखिल लोकमय विराट्स्वरूपका वर्णन किया गया है, इससे; च = भी (वह परमेश्वर ही समस्त भूतोंका कारण सिद्ध होता है)। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् (२।१।४)-में परब्रह्म परमेश्वरके सर्वलोकमय विराट्स्वरूपका वर्णन इस प्रकार किया गया है— 'अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥'

सूत्र २४ ] अध्याय १ ६७

सूत्र २४ ] अध्याय १ ६७ 'अग्नि इस परमेश्वरका मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं, सब दिशाएँ दोनों कान हैं और प्रकट हुए वेद उसकी वाणी हैं। वायु इसका प्राण और सम्पूर्ण विश्व हृदय है। इसके पैरोंसे पृथिवी उत्पन्न हुई है। यह समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा है।' इस प्रकार परमात्माके विराट्स्वरूपका उल्लेख करके उसे सबका अन्तरात्मा बताया गया है; इसलिये उक्त प्रकरणमें 'भूतयोनि' के नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, यह निश्चय होता है। सम्बन्ध - यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद् (५ । १८ । २)- में 'वैश्वानर' के स्वरूपका वर्णन करते हुए 'द्युलोक' को उसका मस्तक बताया है। 'वैश्वानर' शब्द जठराग्निका वाचक है। अतः यह वर्णन जठरानलके विषयमें है या अन्य किसीके ? इस शंकाका निवारण करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है- वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॥ १।२।२४ ॥ वैश्वानरः = (वहाँ) 'वैश्वानर' नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है; साधारणशब्दविशेषात् = क्योंकि उस वर्णनमें 'वैश्वानर' और 'आत्मा' इन साधारण शब्दोंकी अपेक्षा (परब्रह्मके बोधक) विशेष शब्दोंका प्रयोग हुआ है। व्याख्या - छान्दोग्योपनिषद्में पाँचवें अध्यायके ग्यारहवें खण्डसे जो प्रसंग आरम्भ हुआ है, वह इस प्रकार है- 'प्राचीनशाल, सत्ययज्ञ, इन्द्रद्युम्न, जन तथा बुडिल - ये पाँचों ऋषि श्रेष्ठ गृहस्थ और महान् वेदवेत्ता थे। इन्होंने एकत्र होकर परस्पर विचार किया कि 'हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्मका क्या स्वरूप है?' जब वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सके तो यह निश्चय किया कि 'इस समय महर्षि उद्दालक वैश्वानर आत्माके ज्ञाता हैं, हमलोग उन्हींके पास चलें।' इस निश्चयके अनुसार वे पाँचों ऋषि उद्दालक मुनिके यहाँ गये। उन्हें देखते ही मुनिने अनुमान कर लिया कि 'ये लोग मुझसे कुछ पूछेंगे, किंतु मैं इन्हें पूर्णतया उत्तर नहीं दे सकूँगा। अतः अच्छा हो कि मैं इन्हें पहलेसे ही दूसरा उपदेष्टा बतला दूँ।' यह सोचकर उद्दालकने उनसे कहा- 'आदरणीय

६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ महर्षियो! इस समय केवल राजा अश्वपति ही वैश्वानर आत्माके ज्ञाता हैं। आइये, हम सब लोग उनके पास चलें।' यों कहकर उन सबके साथ उद्दालक मुनि वहाँ गये। राजाने उन सबका यथोचित सत्कार किया और दूसरे दिन उनसे यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये प्रार्थना करते हुए उन्हें पर्याप्त धन देनेकी बात कही। इसपर उन महर्षियोंने कहा- 'हमें धन नहीं चाहिये, हम जिस प्रयोजनसे आपके पास आये हैं, वही दीजिये। हमें पता लगा है, आप वैश्वानर आत्माको जानते हैं, उसीका हमारे लिये उपदेश करें।' राजाने दूसरे दिन उन्हें अपने पास बुलाया और एक-एकसे क्रमशः पूछा- 'इस विषयमें आपलोग क्या जानते हैं?' उनमेंसे उपमन्युपुत्र प्राचीनशालने उत्तर दिया- 'मैं द्युलोकको आत्मा समझकर उसकी उपासना करता हूँ।' फिर सत्ययज्ञ बोले- 'मैं सूर्यकी उपासना करता हूँ।' इन्द्रद्युम्नने कहा- 'मैं वायुकी उपासना करता हूँ।' जनने अपनेको आकाशका और बुडिलने जलका उपासक बताया। इन सबकी बात सुनकर राजाने कहा- 'आपलोग उस विश्वके आत्मा वैश्वानरकी उपासना तो करते हैं, परंतु उसके एक-एक अंगकी ही उपासना आपके द्वारा होती है, अतः यह सर्वांगपूर्ण नहीं है; क्योंकि- 'तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वस्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥' अर्थात् 'उस इस विश्वके आत्मा वैश्वानरका द्युलोक मस्तक है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, आकाश शरीरका मध्यभाग है, जल बस्ति-स्थान है, पृथिवी दोनों चरण है, वेदी वक्षःस्थल है, दर्भ लोम है, गार्हपत्य अग्नि हृदय है, अन्वाहार्यपचन अग्नि मन है और आहवनीय अग्नि मुख है।' इस वर्णनसे मालूम होता है कि यहाँ विश्वके आत्मारूप विराट् पुरुषको ही वैश्वानर कहा गया है; क्योंकि इस प्रकरणमें जठराग्नि आदिके वाचक साधारण शब्दोंकी अपेक्षा, परब्रह्मके वाचक विशेष शब्दोंका जगह-जगह प्रयोग हुआ है-

सूत्र २५ ] अध्याय १ ६१

सूत्र २५ ] अध्याय १ ६१ सम्बन्ध—इसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण प्रस्तुत करते हैं— स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ॥ १ । २ । २५ ॥ स्मर्यमाणम्=स्मृतिमें जो विराट्स्वरूपका वर्णन है, वह; अनुमानम्= मूलभूत श्रुतिके वचनका अनुमान कराता हुआ वैश्वानरके 'परमेश्वर' होनेका निश्चय करानेवाला है; इति स्यात्=इसलिये इस प्रकरणमें वैश्वानर परमात्मा ही है। व्याख्या—महाभारत, शान्तिपर्व (४७।६९)-में कहा है— ‘यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः । सूर्यश्चक्षुर्दिशः श्रोत्रे तस्मै लोकात्मने नमः ॥’ ‘अग्नि जिसका मुख, द्युलोक मस्तक, आकाश नाभि, पृथिवी दोनों चरण, सूर्य नेत्र तथा दिशाएँ कान हैं, उस सर्वलोकस्वरूप परमात्माको नमस्कार है।' इस प्रकार इस स्मृतिमें परमेश्वरका अखिल विश्वके रूपमें वर्णन आया है। स्मृतिके वचनसे उसकी मूलभूत किसी श्रुतिका होना सिद्ध होता है। उपर्युक्त छान्दोग्य-श्रुतिमें जो वैश्वानरके स्वरूपका वर्णन है, वही पूर्वोक्त स्मृतिवचनका मूल आधार है। अतः यहाँ उस परब्रह्मके विराट्‌रूपको ही वैश्वानर कहा गया है यह बात स्मृतिसे भी सिद्ध होती है। अतएव जहाँ-जहाँ आत्मा या परमात्माके वर्णनमें 'वैश्वानर' शब्दका प्रयोग आवे, वहाँ उसे परब्रह्मके विराट्स्वरूपका ही वाचक मानना चाहिये, जठरानल या जीवात्माका नहीं। माण्डूक्योपनिषद्में ब्रह्मके चार पादोंका वर्णन करते समय ब्रह्मका पहला पाद वैश्वानरको बताया है। वहाँ भी वह परमेश्वरके विराट्स्वरूपका ही वाचक है; जठराग्नि या जीवात्माका नहीं। सम्बन्ध—उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शंका उपस्थित करके उसका समाधान करते हैं—

७० वेदान्त-दर्शन [ पाद २

७० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्ठानाच्च नेति चेन्न तथा दृष्ट्युपदेशा- दसम्भवात्पुरुषमपि चैनमधीयते ॥ १ । २ । २६ ॥ चेत् = यदि कहो; शब्दादिभ्यः = शब्दादि हेतुओंसे अर्थात् अन्य श्रुतिमें वैश्वानर शब्द अग्निके अर्थमें विशेषरूपमें प्रयुक्त हुआ है और इस मन्त्रमें गार्हपत्य आदि अग्नियोंको वैश्वानरका अंग बताया गया है, इसलिये; च = तथा; अन्तःप्रतिष्ठानात् = श्रुतिमें वैश्वानरको शरीरके भीतर प्रतिष्ठित कहा गया है, इसलिये भी; न = (यहाँ वैश्वानर शब्द परब्रह्म परमात्माका वाचक) नहीं है; इति न = तो यह कहना ठीक नहीं है; तथा दृष्ट्युपदेशात् = क्योंकि वहाँ वैश्वानरमें ब्रह्मदृष्टि करनेका उपदेश है; असम्भवात् = (इसके सिवा) केवल जठरानलका विराट्रूपमें वर्णन होना सम्भव नहीं है, इसलिये; च = तथा; एनम् = इस वैश्वानरको; पुरुषम् = 'पुरुष' नाम देकर; अपि = भी; अधीयते = पढ़ते हैं (इसलिये उक्त प्रकरणमें वैश्वानर शब्द परब्रह्मका ही वाचक है)। व्याख्या—यदि कहो कि अन्य श्रुतिमें 'स यो हैतमेवमग्निं वैश्वानरं पुरुषविधं पुरुषेऽन्तःप्रतिष्ठितं वेद।' (शतपथब्रा० १० । ६ । १ । ११) अर्थात् 'जो इस वैश्वानर अग्निको पुरुषके आकारका तथा पुरुषके भीतर प्रतिष्ठित जानता है।' इस प्रकार वैश्वानर शब्द अग्निके विशेषणरूपसे प्रयुक्त हुआ है, तथा जिस श्रुतिपर विचार चल रहा है, इसमें भी गार्हपत्य आदि तीनों अग्नियोंको वैश्वानरका अंग बताया गया है। इसी प्रकार भगवद्गीतामें भी कहा है कि 'मैं ही वैश्वानररूपसे प्राणियोंके शरीरमें स्थित हो चार प्रकारके अन्नका पाचन करता हूँ' (१५।१४)। इन सब कारणोंसे यहाँ वैश्वानरके नामसे जठराग्निका ही वर्णन है, परमात्माका नहीं, तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि शतपथब्राह्मणकी श्रुतिमें जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्मदृष्टि करानेके उद्देश्यसे ही है। यदि ऐसा न होता तो उसको पुरुष नहीं कहा जाता। तथा श्रीमद्भगवद्गीतामें भी जो वैश्वानर अग्निको सब प्राणियोंके शरीरमें स्थित बताया है, वहाँ भी उसमें परमात्मबुद्धि करानेके लिये भगवान्ने अपनी विभूतिके

सूत्र २७ ] अध्याय १ ७१

सूत्र २७ ] अध्याय १ ७१ रूपमें ही कहा है। इसके सिवा, जिसपर विचार चल रहा है, उस श्रुतिमें समस्त ब्रह्माण्डको 'वैश्वानर' का शरीर बताया है, सिरसे लेकर पैरोंतक उसके अंगोंमें समस्त लोकोंकी कल्पना की गयी है। यह जठराग्निके लिये असम्भव भी है। एवं शतपथब्राह्मणमें तथा यहाँ भी इस वैश्वानरको पुरुषके आकारवाला और पुरुष कहा गया है; जो कि जठराग्निके उपयुक्त नहीं है। इन सब कारणोंसे इस प्रकरणमें कहा हुआ वैश्वानर परब्रह्म परमेश्वर ही है। जठराग्नि या अन्य कोई नहीं। सम्बन्ध - इस प्रसंगमें पृथक्-पृथक् उपास्यरूपसे आये हुए 'दिव्', 'आदित्य', 'वायु', 'आकाश', 'जल' तथा 'पृथिवी' भी वैश्वानर नहीं हैं; यह सिद्ध करनेके लिये कहते हैं— अत एव न देवता भूतं च ॥ १।२।२७॥ अतः = उपयुक्त कारणोंसे; एव = ही (यह भी सिद्ध होता है कि); देवता = द्यौ, सूर्य आदि लोकोंके अधिष्ठाता देवगण; च = और; भूतम् = आकाश आदि भूतसमुदाय (भी); न = वैश्वानर नहीं हैं। व्याख्या - उक्त प्रकरणमें 'द्यौ', 'सूर्य' आदि लोकोंकी तथा आकाश, वायु आदि भूतसमुदायकी अपने आत्माके रूपमें उपासना करनेका प्रसंग आया है। इसलिये सूत्रकार स्पष्ट कर देते हैं कि पूर्वसूत्रमें बताये हुए कारणोंसे यह भी समझ लेना चाहिये कि उन-उन लोकोंके अभिमानी देवताओं तथा आकाश आदि भूतोंका भी 'वैश्वानर' शब्दसे ग्रहण नहीं है; क्योंकि समस्त ब्रह्माण्डको वैश्वानरका शरीर बताया गया है। यह कथन न तो देवताओंके लिये सम्भव हो सकता है और न भूतोंके लिये ही। इसलिये यही मानना चाहिये कि 'जो विश्वरूप भी है और नर (पुरुष) भी, वह वैश्वानर है।' इस व्युत्पत्तिके अनुसार परब्रह्म परमेश्वरको ही वैश्वानर कहा गया है। सम्बन्ध - पहले २६वें सूत्रमें यह बात बतायी गयी है कि शतपथब्राह्मणके मन्त्रमें जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्मदृष्टि करानेके उद्देश्यसे है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शालग्राम-

इसपर सूत्रकार आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं—

७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ शिलामें विष्णुकी उपासनाके सदृश यहाँ 'वैश्वानर' नामक जठराग्निमें परमेश्वरकी प्रतीकोपासना बतलानेके लिये 'वैश्वानर' नामसे उस ब्रह्मका वर्णन है, अतः इसपर सूत्रकार आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं— साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥ १ । २ । २८ ॥ साक्षात् = 'वैश्वानर' शब्दको साक्षात् परब्रह्मका वाचक माननेमें; अपि = भी; अविरोधम् = कोई विरोध नहीं है, ऐसा; जैमिनिः (आह) = आचार्य जैमिनि कहते हैं। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कथन है कि वैश्वानर शब्दको साक्षात् विश्वरूप परमात्माका वाचक माननेमें कोई विरोध नहीं है। अतः यहाँ जठराग्निको प्रतीक मानकर उसके रूपमें परमात्माकी उपासना माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त सूत्रोंद्वारा यह बात सिद्ध हो गयी कि 'वैश्वानर' नामसे इस प्रकरणमें परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन किया गया है, परंतु निर्विकार निराकार अव्यक्त परब्रह्म परमात्माको इस प्रकार साकार विराट्रूपमें देश-विशेषसे सम्बद्ध बतलाना किस अभिप्रायसे है? निर्गुण-निराकारको सगुण-साकार बताना विरुद्ध-सा प्रतीत होता है। इसपर २९ वें सूत्रसे ३१ वें तक विभिन्न आचार्योंका मत बताते हुए अन्तमें ३२ वें सूत्रमें अपना सिद्धान्त कहकर सूत्रकार इस दूसरे पादको समाप्त करते हैं— अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः ॥ १ । २ । २९ ॥ अभिव्यक्तेः = (भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये) देश-विशेषमें ब्रह्मका प्राकट्य होता है, इसलिये; (अविरोधः =) कोई विरोध नहीं है; इति = ऐसा; आश्मरथ्यः = आश्मरथ्य आचार्य मानते हैं। व्याख्या—आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि भक्तजनोंपर अनुग्रह करके उन्हें दर्शन देनेके लिये भगवान् समय-समयपर उनकी श्रद्धाके अनुसार नाना रूपोंमें प्रकट होते हैं; तथा अपने भक्तोंको दर्शन, स्पर्श और प्रेमालाप आदिके द्वारा सुख पहुँचाने, उनका उद्धार करने और जगत्में अपनी कीर्ति

सूत्र ३० ] अध्याय १ ७३

सूत्र ३० ] अध्याय १ ७३ फैलाकर उसके कथन-मननद्वारा साधकोंको परम लाभ पहुँचानेके लिये भगवान् मनुष्य आदिके रूपमें भी समय-समयपर प्रकट होते हैं। यह बात उपनिषद् (केन० ३।२), गीता (४।६-९) और अन्यान्य सद्ग्रन्थोंसे भी प्रमाणित है। इस कारण विराट्‌रूपमें उस परब्रह्म परमात्माको सगुण-साकार तथा देश-विशेषसे सम्बन्धित माननेमें कोई विरोध नहीं है; क्योंकि वह सर्वसमर्थ भगवान् देश-कालातीत और देश-कालसे सम्बन्ध रखनेवाला भी है। वह जिस प्रकार निर्गुण-निराकार है, उसी प्रकार सगुण-साकार भी है। यह बात माण्डूक्योपनिषद्‌में परब्रह्म परमात्माके चार पादोंका वर्णन करके भलीभाँति समझायी गयी है। सम्बन्ध — अब इस विषयमें बादरि आचार्यका मत उपस्थित करते हैं— अनुस्मृतेर्बादरिः ॥ १।२।३०॥ अनुस्मृतेः = विराट्‌रूपमें परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करनेके लिये, उसको देश-विशेषसे सम्बद्ध बतानेमें; (अविरोधः = ) कोई विरोध नहीं है; (इति = ) ऐसा; बादरिः = बादरि नामक आचार्य मानते हैं। व्याख्या — परब्रह्म परमेश्वर यद्यपि देशकालातीत हैं तो भी उनका निरन्तर भजन, ध्यान और स्मरण करनेके लिये उन्हें देश-विशेषमें स्थित विराट्स्वरूप मानने, कहने और समझनेमें कोई विरोध नहीं है, क्योंकि भगवान् सर्वसमर्थ हैं। उनके भक्त उनका जिस-जिस रूपमें चिन्तन करते हैं, उनपर कृपा करनेके लिये वे उसी-उसी रूपमें उनको मिलते हैं। *

  • श्रीमद्भागवतमें भी ऐसा ही कहा गया है— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ (३।९।११) 'महान् यशस्वी परमेश्वर ! आपके भक्तजन अपने हृदयमें आपको जिस-जिस रूपमें चिन्तन करते हैं, आप उन संत-महानुभावोंपर अनुग्रह करनेके लिये वही- वही शरीर धारण कर लेते हैं।'

७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध—इसी विषयमें आचार्य जैमिनिका मत बताते हैं— सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥ १।२।३१॥ सम्पत्तेः = परब्रह्म परमेश्वर अनन्त ऐश्वर्यसे सम्पन्न है, इसलिये (उसे देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमें कोई विरोध नहीं है); इति = ऐसा; जैमिनिः = जैमिनि आचार्य मानते हैं; हि = क्योंकि; तथा = ऐसा ही भाव; दर्शयति = दूसरी श्रुति भी प्रकट करती है। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका यह कथन है कि परब्रह्म परमेश्वर अनन्त ऐश्वर्यसे सम्पन्न है; अतः उस निर्विकार, निराकार, देशकालातीत परमात्माको सगुण साकार और किसी देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमें कोई विरोध नहीं है; क्योंकि दूसरी श्रुति भी ऐसा ही भाव प्रकट करती है। (मु० उ० २।१।४)१ सम्बन्ध—अब सूत्रकार अपने मतका वर्णन करते हुए इस पादका उपसंहार करते हैं— आमनन्ति चैनमस्मिन् ॥ १।२।३२॥ अस्मिन् = इस वैदिक सिद्धान्तमें; एनम् = इस परमेश्वरको; (एवम्)= ऐसा; च = ही; आमनन्ति = प्रतिपादन करते हैं। व्याख्या—इस वैदिक सिद्धान्तमें सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सबके निवासस्थान, सर्वसमर्थ परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञानीजन ऐसा ही प्रतिपादन करते हैं२ इस विषयमें शास्त्र ही प्रमाण है। युक्ति-प्रमाण यहाँ नहीं चल १-यह मन्त्र पृष्ठ ६६ के अन्तर्गत २३ वें सूत्रकी व्याख्यामें अर्थसहित आ गया है। २-अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ (श्वेता० ५। १३) 'दुर्गम संसारके भीतर व्याप्त, आदि-अन्तसे रहित, समस्त जगत्की रचना करनेवाले,

सूत्र ३२ ] अध्याय १ ७५

सूत्र ३२ ] अध्याय १ ७५ सकता; क्योंकि परमात्मा तर्कका विषय नहीं है। वह सगुण-निर्गुण, साकार- निराकार, सविशेष-निर्विशेष आदि सब कुछ है। यह विश्वास करके साधकको उसके स्मरण और चिन्तनमें लग जाना चाहिये। वह व्यापक भगवान् सभी देशोंमें सर्वदा विद्यमान है। अतः उसको किसी भी देश-विशेषसे संयुक्त मानना विरुद्ध नहीं है तथा वह सब देशोंसे सदा ही निर्लिप्त है। इस कारण उसको देशकालातीत मानना भी उचित ही है। अतः सभी आचार्योंकी मान्यता ठीक है। दूसरा पाद सम्पूर्ण अनेक रूपधारी, समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेरे हुए एक अद्वितीय परमेश्वरको जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है।'

तीसरा पाद

तीसरा पाद सम्बन्ध—पहले दो पादोंमें सर्वान्तर्यामी परब्रह्म परमात्माके व्यापक रूपका भलीभाँति प्रतिपादन किया गया। अब उसी परमेश्वरको सबका आधार बतलाते हुए तीसरा पाद आरम्भ करते हैं— द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॥ १ । ३ । १ ॥ द्युभ्वाद्यायतनम् = (उपनिषदोंमें) जिसको स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार बताया गया है (वह परब्रह्म परमात्मा ही है); स्वशब्दात् = क्योंकि वहाँ उस परमात्माके बोधक 'आत्मा' शब्दका प्रयोग है। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् (२।२।५)-में कहा गया है कि— 'यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥' अर्थात् 'जिसमें स्वर्ग, पृथिवी और उसके बीचका आकाश तथा समस्त प्राणोंके सहित मन गुँथा हुआ है, उसी एक सबके आत्मरूप परमेश्वरको जानो, दूसरी सब बातोंको सर्वथा छोड़ दो। यही अमृतका सेतु है।' इस मन्त्रमें जिस एक आत्माको उपर्युक्त ऊँचे-से-ऊँचे स्वर्ग और नीचे पृथिवी आदि सभी जगत्का आधार बताया है; वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, जीवात्मा या प्रकृति नहीं; क्योंकि इसमें परब्रह्मबोधक 'आत्मा' शब्दका प्रयोग है। सम्बन्ध—उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये दूसरा हेतु देते हैं— मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । २ ॥ मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् = (उस सर्वाधार परमात्माको) मुक्त पुरुषोंके लिये प्राप्तव्य बतलाया गया है, इसलिये (वह जीवात्मा नहीं हो सकता)। व्याख्या—उक्त उपनिषद्में ही आगे चलकर कहा गया है कि—

सूत्र २ ] अध्याय १ ७७

सूत्र २ ] अध्याय १ ७७ 'यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥' (मु० उ० ३।२।८) 'जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महात्मा नाम-रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परमपुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है।' इस प्रकार श्रुतिने परमपुरुष परमात्माको मुक्त (ज्ञानी) पुरुषोंके लिये प्राप्तव्य बताया है; इसलिये (मु० उ० २।२।५ में) द्युलोक और पृथिवी आदिके आधाररूपसे जिस 'आत्मा' का वर्णन आया है, वह 'जीवात्मा' नहीं, साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही है। इसके पूर्ववर्ती चौथे मन्त्रमें भी परमात्माको जीवात्माका प्राप्य बताया गया है। वह मन्त्र इस प्रकार है— 'प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥' 'प्रणव तो धनुष है और जीवात्मा बाणके सदृश है। ब्रह्मको उसका लक्ष्य कहते हैं। प्रमादरहित (सतत सावधान) मनुष्यके द्वारा वह लक्ष्य बींधा जानेयोग्य है; इसलिये साधकको उचित है कि उस लक्ष्यको वेधकर बाणकी ही भाँति उसमें तन्मय हो जाय—सब बन्धनोंसे मुक्त हो सदा परमेश्वरके चिन्तनमें ही तत्पर रहकर तन्मय हो जाय।' इस प्रकार इस प्रसंगमें जगह-जगह परमात्माको जीवका प्राप्य बताये जानेके कारण पूर्वोक्त श्रुतिमें वर्णित द्युलोक आदिका आधारभूत आत्मा परब्रह्म ही हो सकता है; दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध—अब यहाँ यह शंका होती है कि पृथिवी आदि सम्पूर्ण भूत- प्रपंच जड प्रकृतिका कार्य है; कार्यका आधार कारण ही होता है; अतः प्रधान (जड प्रकृति-) - को ही सबका आधार माना जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं—

७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ नानुमानमतच्छब्दात् ॥ १ । ३ । ३ ॥ अनुमानम् = अनुमान-कल्पित प्रधान; न = द्युलोक और पृथिवी आदिका आधार नहीं हो सकता; अतच्छब्दात् = क्योंकि उसका प्रतिपादक कोई शब्द (इस प्रकरणमें) नहीं है। व्याख्या—इस प्रकरणमें ऐसा कोई शब्द नहीं प्रयुक्त हुआ है, जो जड प्रकृतिको स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार बताता हो। अतः उसे इनका आधार नहीं माना जा सकता। वह जगत्का कारण नहीं है, यह बात तो पहले ही सिद्ध की जा चुकी है। अतः उसे कारण बताकर इनका आधार माननेकी तो कोई सम्भावना ही नहीं है। सम्बन्ध—प्रकृतिका वाचक शब्द उस प्रकरणमें नहीं है यह तो ठीक है। परंतु जीवात्माका वाचक 'आत्मा' शब्द तो वहाँ है ही, अतः उसीको द्युलोक आदिका आधार माना जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— प्राणभृच्च ॥ १ । ३ । ४ ॥ प्राणभृत् = प्राणधारी जीवात्मा; च = भी; ( न= ) द्युलोक आदिका आधार नहीं हो सकता (क्योंकि उसका वाचक शब्द भी इस प्रकरणमें नहीं है)। व्याख्या—जैसे प्रकृतिका वाचक शब्द इस प्रकरणमें नहीं है, वैसे ही जीवात्माका बोधक शब्द भी नहीं प्रयुक्त हुआ है। 'आत्मा' शब्द अन्यत्र जीवात्माके अर्थमें प्रयुक्त होनेपर भी इस प्रकरणमें वह जीवात्माका वाचक नहीं है; क्योंकि (मु० उ० २।२।७ में) इसके लिये 'आनन्दरूप' और 'अमृत' विशेषण दिये गये हैं; जो कि परब्रह्म परमात्माके ही अनुरूप हैं। इसलिये प्राणधारी जीवात्मा भी द्युलोक आदिका आधार नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—उपर्युक्त अभिप्रायकी सिद्धिके लिये दूसरा कारण देते हैं— भेदव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । ५ ॥ भेदव्यपदेशात् = यहाँ कहे हुए आत्माको जीवात्मासे भिन्न बताये जानेके कारण; ( प्राणभृत् न= ) प्राणधारी जीवात्मा सबका आधार नहीं है।

सूत्र ६-७ ] अध्याय १ ७९

सूत्र ६-७ ] अध्याय १ ७९ व्याख्या—इसी मन्त्र (मु० उ० २।२।५)-में यह बात कही गयी है कि ‘उस आत्माको जानो।’ अतः ज्ञातव्य आत्मासे उसको जाननेवाला भिन्न होगा ही। इसी प्रकार आगेवाले मन्त्र (मु० उ० ३।१।७)-में उक्त आत्माको द्रष्टा जीवात्माओंकी हृदय-गुफामें छिपा हुआ बताया गया है।* इससे भी ज्ञातव्य आत्माकी भिन्नता सिद्ध होती है; इसलिये इस प्रकरणमें बतलाया हुआ द्युलोक आदिका आधार परब्रह्म परमेश्वर ही है, जीवात्मा नहीं। सम्बन्ध— यहाँ जीवात्मा और जड प्रकृति दोनों ही द्युलोक आदिके आधार नहीं हैं, इसमें दूसरा कारण बताते हैं— प्रकरणात् ॥ १ । ३ । ६ ॥ प्रकरणात् = यहाँ परब्रह्म परमात्माका प्रकरण है, इसलिये; ( भी यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा और जड प्रकृति द्युलोक आदिके आधार नहीं हैं)। व्याख्या—इस प्रकरणमें आगे-पीछेके सभी मन्त्रोंमें उस परमात्माको सर्वाधार, सबका कारण, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् बताकर उसीको जीवात्माके लिये प्राप्तव्य ब्रह्म कहा है; इसलिये यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा और परमात्मा एक-दूसरेसे भिन्न हैं तथा यहाँ बतलाया हुआ स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार वह परब्रह्म ही है; जीव या जड प्रकृति नहीं। सम्बन्ध— इसके सिवा— स्थित्यदनाभ्यां च॥ १ । ३ । ७॥ स्थित्यदनाभ्याम् = एककी शरीरमें साक्षीरूपसे स्थिति और दूसरेके द्वारा सुख-दुःखप्रद विषयका उपभोग बताया गया है, इसलिये; च = भी (जीवात्मा और परमात्माका भेद सिद्ध होता है)।

  • दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम्॥ (मु० ३।१।७)

८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् (३।१।१)-में तथा श्वेताश्वतरोपनिषद् (४।६)-में कहा है— 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥' 'एक साथ रहते हुए परस्पर सख्यभाव रखनेवाले दो पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) एक ही शरीररूप वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं। उन दोनोंमेंसे एक (जीवात्मा) तो उस वृक्षके कर्मफलस्वरूप सुख-दुःखोंका स्वाद ले- लेकर (आसक्तिपूर्वक) उपभोग करता है, किंतु दूसरा (परमात्मा) न खाता हुआ केवल देखता रहता है।' इस वर्णनमें जीवात्माको कर्मफलका भोक्ता तथा परमात्माको केवल साक्षीरूपसे स्थित रहनेवाला बताया गया है। इससे दोनोंका भेद स्पष्ट है। अतः इस प्रकरणमें द्युलोक, पृथिवी आदि समस्त जड- चेतनात्मक जगत्का आधार परब्रह्म परमेश्वर ही सिद्ध होता है, जीवात्मा नहीं। सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें यह बात कही गयी कि जिसे द्युलोक और पृथिवी आदिका आधार बताया गया है, उसीको 'आत्मा' कहा गया है; अतः वह परब्रह्म परमात्मा ही है; जीवात्मा नहीं। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के सातवें अध्यायमें नारदजीके द्वारा आत्माका स्वरूप पूछे जानेपर सनत्कुमारजीने क्रमशः नाम, वाणी, मन, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न, जल, तेज, आकाश, स्मरण और आशाको उत्तरोत्तर बड़ा बताया है, फिर अन्तमें प्राणको इन सबकी अपेक्षा बड़ा बताकर उसीकी उपासना करनेके लिये कहा है। उसे सुनकर नारदजीने फिर कोई प्रश्न नहीं किया है। इस वर्णनके अनुसार यदि इस प्रकरणमें सबसे बड़ा प्राण है और उसीको 'भूमा' एवं 'आत्मा' भी कहते हैं, तब तो पूर्व प्रकरणमें भी सबका आधार प्राणशब्दवाच्य जीवात्माको ही मानना चाहिये; इसका समाधान करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है— भूमा सम्प्रसादादध्युपदेशात् ॥ १।३।८॥ भूमा = (उक्त प्रकरणमें कहा हुआ) 'भूमा' (सबसे बड़ा) ब्रह्म ही है;

सूत्र ८ ] अध्याय १ ८१ सम्प्रसादात्=क्योंकि उसे प्राणशब्दवाच्य जीवात्मासे भी; अधि=ऊपर (बड़ा); उपदेशात्=बताया गया है। व्याख्या—उक्त प्रकरणमें नाम आदिके क्रमसे एककी अपेक्षा दूसरेको बड़ा बताते हुए पंद्रहवें खण्डमें प्राणको सबसे बड़ा बताकर कहा है—'यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्वँ समर्पितम्। प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति। प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥' (छा० उ० ७।१५।१) अर्थात् 'जैसे अरे रथचक्रकी नाभिके आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार समस्त जगत् प्राणके आश्रित है, प्राण ही प्राणके द्वारा गमन करता है, प्राण ही प्राण देता है, प्राणके लिये देता है, प्राण पिता है, प्राण माता है, प्राण भ्राता है, प्राण बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है।' इससे यह मालूम होता है कि यहाँ प्राणके नामसे जीवात्माका वर्णन है; क्योंकि सूत्रकारने यहाँ उस प्राणका ही दूसरा नाम 'सम्प्रसाद' रखा है और सम्प्रसाद नाम जीवात्माका है, यह बात इसी उपनिषद् (छा० उ० ८।३।४)-में स्पष्ट कही गयी है। इस प्राणशब्दवाच्य जीवात्माके विषयमें आगे चलकर यह भी कहा है कि 'यह सब कुछ प्राण ही है; इस प्रकार जो चिन्तन करनेवाला, देखनेवाला और जाननेवाला है, वह अतिवादी होता है।' इसलिये यहाँ यह धारणा होनी स्वाभाविक है कि इस प्रकरणमें प्राणशब्दवाच्य जीवात्माको ही सबसे बड़ा बताया गया है; क्योंकि इस उपदेशको सुनकर नारदजीने पुनः अपनी ओरसे कोई प्रश्न नहीं उठाया। मानो उन्हें अपने प्रश्नका पूरा उत्तर मिल गया हो। परंतु भगवान् सनत्कुमार तो जानते थे कि इससे आगेकी बात समझाये बिना इसका ज्ञान अधूरा ही रह जायगा, अतः उन्होंने नारदजीके बिना पूछे ही सत्य शब्दसे ब्रह्मका प्रकरण उठाया अर्थात् 'तू' शब्दका प्रयोग करके यह स्पष्ट कर दिया कि 'वास्तविक अतिवादी तो वह है, जो सत्यको जानकर उसके बलपर प्रतिवाद करता है।' इस कथनसे नारदके मनमें सत्यतत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके उसे जाननेके साधनरूप विज्ञान, मनन, श्रद्धा, निष्ठा और क्रियाको

८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ बताया। फिर सुखरूपसे भूमाको अर्थात् सबसे महान् परब्रह्म परमात्माको बतलाकर प्रकरणका उपसंहार किया। इस प्रकार प्राणशब्दवाच्य जीवात्मासे अधिक (बड़ा) भूमाको बताये जानेके कारण इस प्रकरणमें 'भूमा' शब्द सत्य ज्ञानानन्दस्वरूप सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है। प्राण, जीवात्मा अथवा प्रकृतिका वाचक नहीं। सम्बन्ध—इतना ही नहीं, अपितु— धर्मोपपत्तेश्च ॥ १। ३ । ९ ॥ धर्मोपपत्तेः = (उक्त प्रकरणमें) जो भूमाके धर्म बतलाये गये हैं, वे भी ब्रह्ममें ही सुसंगत हो सकते हैं, इसलिये; च = भी; (यहाँ 'भूमा' ब्रह्म ही है।) व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमें उस भूमाके धर्मोंका इस प्रकार वर्णन किया गया है—'यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत् पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद् विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्। स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि।' (छा० उ० ७।२४।१) अर्थात् 'जहाँ पहुँचकर न अन्य किसीको देखता है, न अन्यको सुनता है, न अन्यको जानता है, वह भूमा है। जहाँ अन्यको देखता, सुनता और जानता है, वह अल्प है। जो भूमा है, वही अमृत है और जो अल्प है, वह नाशवान् है।' इसपर नारदने पूछा—'भगवन् ! वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है?' उत्तरमें सनत्कुमारने कहा—'अपनी महिमामें।' आगे चलकर फिर कहा है कि 'धन, सम्पत्ति, मकान आदि जो महिमाके नामसे प्रसिद्ध हैं, ऐसी महिमामें वह भूमा प्रतिष्ठित नहीं है, किंतु वह नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दायें और बायें है तथा वही यह सब कुछ है।' इसके बाद उस भूमाको ही आत्माके नामसे कहा है और यह भी बताया है कि 'आत्मा ही नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दायें और बायें है तथा वही सब कुछ है। जो इस प्रकार देखने, मानने तथा विशेषरूपसे जाननेवाला है, वह आत्मामें ही क्रीडा करनेवाला, आत्मामें ही रतिवाला, आत्मामें ही जुड़ा हुआ तथा आत्मामें ही आनन्दवाला है।' इत्यादि।

सूत्र १०] अध्याय १ ८३

सूत्र १०] अध्याय १ ८३ इन सब धर्मोंकी संगति परब्रह्म परमात्मामें ही लग सकती है; अतः वही इस प्रकरणमें 'भूमा' के नामसे कहा गया है। सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें भूमाके जो धर्म बताये गये हैं, वे ही बृहदारण्यकोपनिषद् (३।८।७)-में 'अक्षर' के भी धर्म कहे गये हैं। अक्षर शब्द प्रणवरूप वर्णका भी वाचक है; अतः यहाँ 'अक्षर' शब्द किसका वाचक है? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अक्षरमम्बरान्तधृतेः ॥ १। ३। १०॥ अक्षरम् = (उक्त प्रकरणमें) अक्षर शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है; अम्बरान्तधृतेः = क्योंकि उसको आकाशपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाला बताया गया है। व्याख्या—यह प्रकरण इस प्रकार है—'सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिन् तदोतं च प्रोतं चेति॥' (३।८।६) गार्गीने याज्ञवल्क्यसे पूछा—'याज्ञवल्क्य! जो द्युलोकसे भी ऊपर, पृथिवीसे भी नीचे और इन दोनोंके बीचमें भी हैं तथा जो यह पृथिवी और द्युलोक हैं, ये सब-के-सब एवं जिसको भूत, भविष्यत् और वर्तमान कहते हैं, वह काल किसमें ओत-प्रोत है?' इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा— 'गार्गि ! यह सब आकाशमें ओत-प्रोत है।' इसपर गार्गीने पूछा—'वह आकाश किसमें ओत-प्रोत है?' (३।८।७) तब याज्ञवल्क्यने कहा— 'एतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहित- मस्नेहम्······ इत्यादि।' 'हे गार्गि ! उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्तालोग 'अक्षर' कहते हैं। जो कि न स्थूल है, न सूक्ष्म है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल है, न पीला है, इत्यादि।' (३।८।८) इस प्रकार वह अक्षर आकाशपर्यन्त सबको धारण करनेवाला बताया गया है, इसलिये यहाँ 'अक्षर' नामसे उस परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं।

८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध - कारण अपने कार्यको धारण करता है, यह सभी मानते हैं। जिनके मतमें प्रकृति ही जगत्का कारण है, वे उसे ही आकाशपर्यन्त सभी भूतोंको धारण करनेवाली मान सकते हैं। अतः उनके मतानुसार यहाँ 'अक्षर' शब्द प्रकृतिका ही वाचक हो सकता है। इस शंकाका निवारण करनेके लिये कहते हैं- सा च प्रशासनात् ॥ १ । ३ । ११ ॥ च=और; सा=वह आकाशपर्यन्त सब भूतोंको धारण करनारूप क्रिया (परमेश्वरकी ही है); प्रशासनात् =क्योंकि उस अक्षरको सबपर भलीभाँति शासन करनेवाला कहा है। व्याख्या- इस प्रकरणमें आगे चलकर कहा है कि 'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठत - इत्यादि' अर्थात् 'इसी अक्षरके प्रशासनमें सूर्य और चन्द्रमा धारण किये हुए स्थित हैं, एवं द्युलोक, पृथिवी, निमेष, मुहूर्त, दिन-रात आदि नामोंसे कहा जानेवाला काल - ये सब विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित हैं। इसीके प्रशासनमें पूर्व और पश्चिमकी ओर बहनेवाली सब नदियाँ अपने-अपने निर्गम-स्थान पर्वतोंसे निकलकर बहती हैं।' इत्यादि। (बृह० उ० ३।८।९) इस प्रकार उस अक्षरको सबपर भलीभाँति शासन करते हुए आकाशपर्यन्त सबको धारण करनेवाला बताया गया है। यह कार्य जडप्रकृतिका नहीं हो सकता। अतः वह सबको धारण करनेवाला अक्षरतत्त्व ब्रह्म ही है, अन्य कोई नहीं। सम्बन्ध - इसके सिवा- अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॥ १ । ३ । १२ ॥ अन्यभावव्यावृत्तेः = यहाँ अक्षरमें अन्य (प्रधान आदि)-के लक्षणोंका निराकरण किया गया है इसलिये; च = भी ('अक्षर' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है)।

सूत्र १३ ] अध्याय १ ८५

सूत्र १३ ] अध्याय १ ८५ व्याख्या - उक्त प्रसंगमें आगे चलकर कहा गया है— 'वह अक्षर देखनेमें न आनेवाला किंतु स्वयं सबको देखनेवाला है; सुननेमें न आनेवाला, किंतु स्वयं सुननेवाला है; मनन करनेमें न आनेवाला किंतु स्वयं मनन करनेवाला है; जाननेमें न आनेवाला, किंतु स्वयं सबको भलीभाँति जाननेवाला है' इत्यादि। (बृह० उ० ३।८।११) इस प्रकार यहाँ उस अक्षरमें देखने, सुनने और जाननेमें आनेवाले प्रधान आदिके धर्मोंका निराकरण किया गया है,* इसलिये भी 'अक्षर' शब्द विनाशशील जड प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता। अतः यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'अक्षर' नामसे परब्रह्मका ही प्रतिपादन किया गया है। सम्बन्ध - उपर्युक्त प्रकरणमें 'अक्षर' शब्दको परब्रह्मका वाचक सिद्ध किया गया; किंतु प्रश्नोपनिषद् (५। २-७)-में ॐकार अक्षरको परब्रह्म और अपरब्रह्म दोनोंका प्रतीक बताया गया है अतः वहाँ अक्षरको अपरब्रह्म भी माना जा सकता है, इस शंकाकी निवृत्तिके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ॥ १ । ३ । १३ ॥ ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् = यहाँ परमपुरुषको 'ईक्षते' क्रियाका कर्म बताये जानेके कारण; सः = वह परब्रह्म परमेश्वर ही (त्रिमात्रासम्पन्न 'ओम्' इस अक्षरके द्वारा चिन्तन करनेयोग्य बताया गया है)। व्याख्या - इस सूत्रमें जिस मन्त्रपर विचार चल रहा है, वह इस प्रकार है— 'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः। यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते।' (प्र० उ० ५। ५) अर्थात् 'जो तीन मात्राओंवाले 'ओम्' रूप इस अक्षरके द्वारा ही इस परम पुरुषका निरन्तर

  • उपर्युक्त श्रुतिमें अक्षरको सर्वद्रष्टा बताकर उसमें प्रकृतिके जडत्व और जीवात्माके अल्पज्ञत्व आदि धर्मोंका भी निराकरण किया गया है।