श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ३०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| [अव्यक्त]-के स्वरूपसे यह सम्पूर्ण [उत्पद्यमान] जगत् व्याप्त था॥ २-७॥ | |
| सर्गकाले प्रधानस्य क्षेत्रज्ञाधिष्ठितस्य वै।<br>गुणभावाद् व्यज्यमानो महान् प्रादुर्बभूव ह॥ ८<br><br>सूक्ष्मेण महता चाथ अव्यक्तेन समावृतम्।<br>सत्त्वोद्रिक्तो महानग्रे सत्तामात्रप्रकाशकः॥ ९<br><br>मनो महांस्तु विज्ञेयमेकं तत्कारणं स्मृतम्।<br>समुत्पन्नं लिङ्गमात्रं क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं हि तत्॥ १० | सृष्टिकालमें क्षेत्रज्ञ (पुरुष)-के द्वारा अधिष्ठित प्रधानके गुणभावसे प्रेरित होता हुआ महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ। पहले यह जगत् सूक्ष्म तथा महान् अव्यक्तसे आच्छादित था। इसके बाद सत्तामात्रका प्रकाशक सत्त्वगुण-प्रधान महत्तत्त्व प्रकट हुआ। महत्तत्त्वको मनके रूपमें जानना चाहिये; यह सृष्टिका कारण कहा गया है। लिङ्ग-मात्र यह [महत्तत्त्व] जीवोंसे अधिष्ठित होकर उत्पन्न हुआ॥ ८-१०॥ |
| धर्मादीनि च रूपाणि लोकतत्त्वार्थहेतवः।<br>महान् सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानः सिसृक्षया॥ ११ | यह महान् (महत्तत्त्व) सृष्टिकी इच्छासे ईश्वरके द्वारा प्रेरित होकर सृष्टिको तथा सृष्ट जीवोंके परमार्थ कारणभूत वेदों, धर्म आदि रूपोंको विस्तारित करता है॥ ११॥ |
| मनो महान् मतिर्ब्रह्म पूर्बुद्धिः ख्यातिरीश्वरः।<br>प्रज्ञा चितिः स्मृतिः संविद्विश्वेशश्चेति स स्मृतः॥ १२ | वे महेश्वर ही मन, महान्, मति, ब्रह्म, पूः, बुद्धि, ख्याति, ईश्वर, प्रज्ञा, चिति, स्मृति, संविद् तथा विश्वेश कहे गये हैं॥ १२॥ |
| मनुते सर्वभूतानां यस्माच्चेष्टा फलं ततः।<br>सौक्ष्म्यात्तेन विभक्तं तु येन तन्मन उच्यते॥ १३ | वे समस्त जीवोंका कर्मफल जानते हैं और इस मनके द्वारा सूक्ष्मताके कारण उस कर्मफलसे जगत् विभक्त है, इसलिये इन्हें ‘मन’ कहा जाता है॥ १३॥ |
| तत्त्वानांमग्रजो यस्मान्महांश्च परिमाणतः।<br>विशेषेभ्यो गुणेभ्योऽपि महानिति ततः स्मृतः॥ १४ | ये सभी तत्त्वोंसे पहले उत्पन्न हुए हैं और परिमाणमें सत्त्व आदि गुणोंसे भी अधिक महान् हैं, इसलिये वे ‘महान्’ कहे गये हैं॥ १४॥ |
| बिभर्ति मानं मनुते विभागं मन्यतेऽपि च।<br>पुरुषो भोगसम्बन्धात्तेन चासौ मतिः स्मृतः॥ १५ | वे पुरुष [ईश्वर] भोगसम्बन्धके कारण सबका पोषण करते हैं, सम्पूर्ण प्रमाणको जानते हैं तथा समस्त भेद मानते हैं, इसलिये वे ‘मति’ कहे गये हैं॥ १५॥ |
| बृहत्त्वाद्बृंहणत्वाच्च भावानां सकलाश्रयात्।<br>यस्माद्धारयते भावान् ब्रह्म तेन निरुच्यते॥ १६ | वे [महेश्वर] बृहत् होने, सबके पोषक होने तथा भावोंका सम्पूर्ण आश्रय होनेके कारण [समस्त] भावोंको धारण करते हैं, इसलिये उन्हें ‘ब्रह्म’ कहा जाता है॥ १६॥ |
| यः पूरयति यस्माच्च कृत्स्नान् देवाननुग्रहैः।<br>नयते तत्त्वभावं च तेन पूरिति चोच्यते॥ १७ | वे [महेश्वर] सभी देवताओंको [अपने] अनुग्रहोंसे परिपूर्ण करते हैं तथा उन्हें तत्त्वभाव प्राप्त कराते हैं, इसलिये वे ‘पूः’ कहे जाते हैं॥ १७॥ |
| बुध्यते पुरुषश्चात्र सर्वान् भावान् हितं तथा।<br>यस्माद् बोधयते चैव बुद्धिस्तेन निरुच्यते॥ १८ | वे ईश्वर इस ब्रह्माण्डमें समस्त भावों तथा हित (धर्म)-को [स्वयं] जानते हैं एवं [जीवोंको] बोध |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... 'सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३०७
| कराते हैं, इसलिये उन्हें 'बुद्धि' कहा जाता है॥ १८॥ | |
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| ख्यातिः प्रत्युपभोगश्च यस्मात्संवर्तते ततः।<br>भोगस्य ज्ञाननिष्ठत्वात्तेन ख्यातिरिति स्मृतः॥ १९<br><br>ख्यायते तद्गुणैर्वापि ज्ञानादिभिरनेकंशः।<br>तस्माच्च महतः संज्ञा ख्यातिरितृत्यभिधीयते॥ २० | ज्ञाननिष्ठाके कारण [विषय-सम्बन्धी] सुखकी ख्याति (प्रशंसा) तथा भोगकी प्राप्ति उन्हीं ईश्वरसे प्रवर्तित होती है, इसलिये वे 'ख्याति' कहे गये हैं। [आकाश आदिके शब्द आदि] गुणोंके द्वारा तथा ज्ञान आदिके द्वारा सत्पुरुष उनकी प्रशंसा करते हैं, इसलिये भी उन महान् (पूज्य) ईश्वरका नाम 'ख्याति' कहा जाता है॥ १९-२०॥ |
| साक्षात्सर्वं विजानाति महात्मा तेन चेश्वरः।<br>यस्माज्ज्ञानानुगश्चैव प्रज्ञा तेन स उच्यते॥ २१ | वे महात्मा शिव सम्पूर्ण जगत्को प्रत्यक्ष रूपसे जानते हैं, इसलिये 'ईश्वर' कहे जाते हैं और [स्वयं] ज्ञानरूप हैं, इसलिये 'प्रज्ञा' कहे जाते हैं॥ २१॥ |
| ज्ञानादीनि च रूपाणि बहुकर्मफलानि च।<br>चिनोति यस्माद्भोगार्थं तेनासौ चितिरुच्यते॥ २२ | वे [जीवोंको] भोगोंकी प्राप्तिके लिये ज्ञान आदि रूपों तथा अनेकविध कर्मफलोंका विस्तार करते हैं, इसलिये वे 'चिति' कहे जाते हैं॥ २२॥ |
| वर्तमानव्यतीतानि तथैवानागतान्यपि।<br>स्मरते सर्वकार्याणि तेनासौ स्मृतिरुच्यते॥ २३ | वे [महेश्वर] वर्तमान, भूत तथा भविष्यके भी समस्त कार्योंका स्मरण करते हैं अर्थात् उनका ज्ञान रखते हैं, इसलिये वे 'स्मृति' कहे जाते हैं॥ २३॥ |
| कृत्स्नं च विन्दते ज्ञानं यस्मान्माहात्म्यमुत्तमम्।<br>तस्माद्विन्देर्विदेश्चैव संविदित्युभिधीयते॥ २४<br><br>विद्यतेऽपि च सर्वत्र तस्मिन् सर्वं च विन्दति।<br>तस्मात्संविदिति प्रोक्तो महद्भिर्मु निसत्तमाः॥ २५ | वे सम्पूर्ण ज्ञान तथा उत्तम माहात्म्यको जानते हैं, इसलिये वे 'विन्द्' तथा 'विद्' धातुसे व्युत्पन्न 'संविद्' रूप भी कहे जाते हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो! वे सर्वत्र विद्यमान हैं और भक्त उन [शिव]-में ही सब कुछ प्राप्त करता है, इसलिये वे महात्माओंद्वारा 'संविद्' कहे गये हैं॥ २४-२५॥ |
| जानातेर्ज्ञानमित्याहुर्भगवान् ज्ञानसन्निधिः।<br>बन्धनादिपरीभावादीश्वरः प्रोच्यते बुधैः॥ २६ | 'ज्ञा' धातुसे 'ज्ञान' शब्द कहा गया है। ज्ञानसमुद्र भगवान् शिव बन्धन आदिका तिरस्कार करनेके कारण विद्वानोंद्वारा 'ईश्वर' कहे गये हैं॥ २६॥ |
| पर्यायवाचकैः शब्दैस्तत्त्वमाद्यमनुत्तमम्।<br>व्याख्यातं तत्त्वभावज्ञैर्देवस्सद्भावचिन्तकैः॥ २७ | इस प्रकार महेश्वरके उत्तम भावोंका चिन्तन करनेवाले तत्त्ववेत्ताओंने अनेक अर्थोंका प्रतिपादन करनेवाले शब्दोंके द्वारा आदि (सबसे पहले उत्पन्न) सर्वोत्तम 'शिव' नामक तत्त्वका वर्णन किया है॥ २७॥ |
| महान् सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानः सिसृक्षया।<br>सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च तस्य वृत्तिद्वयं स्मृतम्॥ २८ | सृष्टि करनेकी इच्छासे प्रेरित होकर 'महत्' सृष्टिकार्यको विस्तारित करता है। संकल्प तथा अध्यवसाय—ये उसकी दो वृत्तियाँ कही गयी हैं॥ २८॥ |
| त्रिगुणाद्रजसोद्रिक्तादहङ्कारस्ततोऽभवत् ।<br>महता च वृतः सर्गो भूतादिर्बाह्यतस्तु सः॥ २९ | रजोगुणप्रधान त्रिगुणके कारण वह [उत्पद्यमान] सर्ग, भूत आदि तथा अहंकार महत्के द्वारा बाहरसे ढके |
| ३०८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तस्मादेव तमोद्रिक्तादहङ्कारादजायत।<br>भूततन्मात्रसर्गस्तु भूतादिस्तामसस्तु सः॥ ३०<br><br>भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दमात्रं ससर्ज ह।<br>आकाशं सुशिरं तस्मादुत्पन्नं शब्दलक्षणम्॥ ३१<br><br>आकाशं शब्दमात्रं तु स्पर्शमात्रं समावृणोत्।<br>वायुश्चापि विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह॥ ३२<br><br>ज्योतिरुपद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते।<br>स्पर्शमात्रस्तु वै वायू रूपमात्रं समावृणोत्॥ ३३<br><br>ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह।<br>सम्भवन्ति ततो ह्यापस्ता वै सर्वरसात्मिकाः॥ ३४<br><br>रसमात्रास्तु ता ह्यापो रूपमात्रोऽग्निरावृणोत्।<br>आपश्चापि विकुर्वत्यो गन्धमात्रं ससर्जिरे॥ ३५<br><br>सङ्घातो जायते तस्मात्तस्य गन्धो गुणो मतः।<br>तस्मिंस्तस्मिंश्च तन्मात्रं तेन तन्मात्रता स्मृता॥ ३६ | हुए थे। उसी तमोगुणप्रधान अहंकारसे शब्द-स्पर्श आदि तन्मात्राओंका आकाश आदि तामस सर्ग हुआ। सृष्टिका विस्तार करते हुए भूतादिने शब्दमात्र आकाशका सृजन किया; उससे शब्दलक्षणवाला सुषिर (पुष्कर नामक) आकाश उत्पन्न हुआ। शब्दतन्मात्रावाले आकाशने स्पर्शतन्मात्रावाले वायुको आच्छादित किया। सृष्टिको आगे बढ़ाते हुए वायुने रूपतन्मात्रावाले अग्निको उत्पन्न किया। वायुसे जो ज्योति [अग्नि] उत्पन्न होती है, वह वायुके ही रूप तथा गुणवाली कही जाती है। इस प्रकार स्पर्शतन्मात्रावाले वायुने रूपतन्मात्रावाली अग्निको आच्छादित किया। सृष्टिको विस्तारित करती हुई ज्योति [अग्नि]ने रसतन्मात्राको उत्पन्न किया; उससे सर्वरसमय जल उत्पन्न हुआ। रूपतन्मात्रावाली अग्निने उस रसतन्मात्रात्मक जलको आच्छादित किया। पुनः सृष्टिको आगे बढ़ाते हुए जलने गन्धतन्मात्राका सृजन किया, उससे पृथिवी उत्पन्न हुई; उसका गुण गन्ध माना गया है। वे शब्द आदि गुण अपने-अपने धर्मियोंमात्रमें ही स्थित रहते हैं। अतः उनमें तन्मात्रता कही गयी है॥ २९-३६॥ |
| अविशेषवाचकत्वादविशेषास्ततस्तु ते।<br>प्रशान्तघोरमूढत्वादविशेषास्ततः पुनः॥ ३७<br><br>भूततन्मात्रसर्गोऽयं विज्ञेयस्तु परस्परम्।<br>वैकारिकादहङ्कारात्सत्त्वोद्रिक्तात्तु सात्त्विकात्॥ ३८ | वे [शब्द आदि] अविशेषके वाचक होनेके कारण तन्मात्र शब्दका प्रतिपादक होनेके कारण तथा प्रशान्त (सात्त्विक), घोर (राजस) और मूढ़ (तामस) होनेके कारण अविशेष कहे गये हैं। इसे परस्पर (पंच) भूतोंकी तन्मात्राओंका सर्ग (सृष्टि) जानना चाहिये। वैकारिक [राजस] अहंकारसे और सत्त्वप्रधान सात्त्विक अहंकारसे वह वैकारिक सर्ग एक साथ प्रवर्तित होता है॥ ३७-३८ १/२॥ |
| वैकारिकः स सर्गस्तु युगपत्सम्प्रवर्तते।<br>बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्चकर्मेन्द्रियाणि च॥ ३९<br><br>साधकानीन्द्रियाणि स्युर्देवा वैकारिका दश।<br>एकादशं मनस्तत्र स्वगुणेनोभयात्मकम्॥ ४०<br><br>श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी।<br>शब्दादीनामवाप्त्यर्थं बुद्धियुक्तानि तानि वै॥ ४१<br><br>पादौ पायुरुपस्थश्च हस्तौ वाग्दशमी भवेत्।<br>गतिर्विसर्गो ह्यानन्दः शिल्पं वाक्यं च कर्म तत्॥ ४२ | पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ—ये इन्द्रियाँ साधनस्वरूप हैं और उनके दस राजस अधिष्ठाता देवता हैं। जो ग्यारहवाँ मन है, वह अपने गुणसे उभयात्मक (ज्ञान-कर्मेन्द्रियात्मक) है। कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा तथा पाँचवीं नासिका—ये इन्द्रियाँ शब्द आदिकी प्राप्तिके लिये ज्ञानयुक्त होती हैं। दोनों पैर, गुदा, जननेन्द्रिय, दोनों हाथ तथा दसवीं वाणी है; क्रमशः गति, विसर्ग (मलत्याग), आनन्द, शिल्प तथा बोलना उनका कार्य है॥ ३९-४२॥ |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३०९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| आकाशं शब्दमात्रं च स्पर्शमात्रं समाविशत्।<br>द्विगुणस्तु ततो वायुः शब्दस्पर्शात्मकोऽभवत्॥ ४३<br>रूपं तथैव विशतः शब्दस्पर्शगुणावुभौ।<br>त्रिगुणस्तु ततस्त्वग्निः सशब्दस्पर्शरूपवान्॥ ४४<br>सशब्दस्पर्शरूपं च रसमात्रं समाविशत्।<br>तस्माच्चतुर्गुणा आपो विज्ञेयास्तु रसात्मिकाः॥ ४५<br>शब्दस्पर्शं च रूपं च रसो वै गन्धमाविशत्।<br>सङ्गता गन्धमात्रेण आविशन्तो महीमिमाम्॥ ४६<br>तस्मात्पञ्चगुणा भूमिः स्थूला भूतेषु शस्यते।<br>शान्ता घोराश्च मूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः॥ ४७<br>परस्परानुपवेशाद्धारयन्ति परस्परम्।<br>भूमेरन्तस्त्विदं सर्वं लोकालोकाचलावृतम्॥ ४८ | शब्दतन्मात्रावाला आकाश स्पर्शतन्मात्रामें प्रविष्ट हुआ, अतः वायु शब्द तथा स्पर्शरूप दो गुणवाला हुआ। शब्द एवं स्पर्श—ये दोनों ही गुण रूपतन्मात्रामें प्रविष्ट हुए, अतः शब्द-स्पर्श-रूपयुक्त वह अग्नि तीन गुणोंवाला हुआ। शब्द-स्पर्श-रूपसहित अग्नि रसतन्मात्रामें प्रविष्ट हुआ, इसलिये रसमय जलको चार गुणोंवाला जानना चाहिये। शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस—ये गन्धतन्मात्रामें प्रविष्ट हुए। अतः गन्धतन्मात्राके साथ इस पृथ्वीमें इनके प्रवेश करनेपर पृथ्वी पाँच गुणोंवाली हुई, इसलिये यह स्थूलरूपा भूमि [पाँचों] भूतोंमें श्रेष्ठ कही जाती है। अतः [अधिक गुणके कारण] वे शब्द आदि गुण शान्त, घोर तथा मूढ़ तीन गुणवाले हैं; इसी कारणसे वे विशेष कहे गये हैं। परस्पर प्रवेश करनेके कारण वे एक-दूसरेको धारण करते हैं। भूमिके भीतर यह सब लोकालोकपर्वतसे आवृत है॥ ४३-४८॥ |
| विशेषाश्चेन्द्रियग्राह्या नियतत्वाच्च ते स्मृताः।<br>गुणं पूर्वस्य सर्गस्य प्राप्नुवन्त्युत्तरोत्तराः॥ ४९<br>तेषां यावच्च तद्यच्च यच्च तावद् गुणं स्मृतम्।<br>उपलभ्याप्सु वै गन्धं केचिद् ब्रूयुरपां गुणम्॥ ५०<br>पृथिव्यामेव तं विद्यादपां वायोश्च संश्रयात्।<br>एते सप्त महात्मानो ह्यन्योन्यस्य समाश्रयात्॥ ५१<br>पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च अव्यक्तानुग्रहेण च।<br>महादयो विशेषान्ता ह्याण्डमुत्पादयन्ति ते॥ ५२ | वे विशेष (शब्द आदि) नियतत्वके कारण इन्द्रिय-ग्राह्य कहे गये हैं। पूर्व सर्ग (आकाश आदि)-के गुणको उत्तरोत्तर वायु आदि प्राप्त करते हैं। उन शब्द आदिमें जितनी मात्रामें जो गुण होता है, उतनी ही मात्रामें उसे कहा गया है। जलमें गन्धका अनुभव होनेपर कुछ लोग कहते हैं कि यह जलका गुण है। पृथ्वीमें उस गन्धको जल तथा वायुके संयोगसे जानना चाहिये। महान् आत्मावाले ये सातों [महत्तत्त्व, अहंकार, शब्द आदि पाँच गुण] एक-दूसरेके आश्रयसे रहते हैं। महत्तत्त्वसे लेकर [शब्द आदि] विशेषतक पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण तथा अव्यक्त [परमेश्वर]-के अनुग्रहसे ब्रह्माण्डको उत्पन्न करते हैं॥ ४९-५२॥ |
| एककालसमुत्पन्नं जलबुद्बुदवच्च तत्।<br>विशेषेभ्योऽण्डमभवन्महत्तदुदकेशयम् ॥५३<br>अद्भिर्दशगुणाभिस्तु बाह्यतोऽण्डं समावृतम्।<br>आपो दशगुणेनैतास्तेजसा बाह्यतो वृताः॥ ५४<br>तेजो दशगुणेनैव वायुना बाह्यतो वृतम्।<br>वायुर्दशगुणेनैव बाह्यतो नभसा वृतः॥ ५५<br>आकाशेनावृतो वायुः खं तु भूतादिनावृतम्।<br>भूतादिर्महता चापि अव्यक्तेनावृतो महान्॥ ५६ | जलमें बुलबुलेकी भाँति एक विशाल अण्ड उन विशेषों (शब्द आदि)-से एक ही बारमें उत्पन्न हुआ; वह जलमें स्थित था। वह अण्ड [अपनेसे] दस गुना विस्तारवाले जलसे बाहरसे घिरा था; यह जल दस गुना विस्तारवाले तेज (अग्नि)-से बाहरसे घिरा था, तेज दस गुना विस्तारवाले वायुसे बाहरसे घिरा था और वायु भी दस गुना विस्तारवाले आकाशसे बाहरसे घिरा था, जिस आकाशसे वायु आवृत था, वह आकाश |
| ३१० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक | अर्थ |
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| भूत आदिसे घिरा था। भूत आदि महत्तत्त्वसे घिरे थे और महत्तत्त्व [उस] अव्यक्तसे घिरा था॥ ५३-५६॥ | |
| शर्वश्चाण्डकपालस्थो भवश्चाम्भसि सुव्रताः ।<br>रुद्रोऽग्निमध्ये भगवानुग्रो वायौ पुनः स्मृतः ॥ ५७<br><br>भीमश्चावनिमध्यस्थो ह्यहङ्कारे महेश्वरः ।<br>बुद्धौ च भगवानीशः सर्वतः परमेश्वरः ॥ ५८ | हे सुव्रतो! शर्व [उस] अण्डके कपालपर स्थित हैं और भव जलमें स्थित हैं; रुद्र अग्निमें तथा भगवान् उग्र वायुमें [स्थित] कहे गये हैं; भीम पृथ्वीके मध्यमें स्थित हैं, महेश्वर अहंकारमें स्थित हैं, भगवान् ईश बुद्धिमें स्थित हैं और परमेश्वर सर्वत्र स्थित हैं॥ ५७-५८॥ |
| एतैरावरणैरण्डं सप्तभिः प्राकृतैर्वृतम् ।<br>एता आवृत्य चान्योन्यमष्टौ प्रकृतयः स्थिताः ॥ ५९<br><br>प्रसर्गकाले स्थित्वा तु ग्रसन्त्येताः परस्परम् ।<br>एवं परस्परोत्पन्ना धारयन्ति परस्परम् ॥ ६०<br><br>आधाराधेयभावेन विकारास्ते विकारिषु ।<br>महेश्वरः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम् ॥ ६१<br><br>अण्डाज्जज्ञे स एवेशः पुरुषोऽर्कसमप्रभः ।<br>तस्मिन् कार्यस्य करणं संसिद्धं स्वेच्छयैव तु ॥ ६२<br><br>स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते ।<br>तस्य वामाङ्गजो विष्णुः सर्वदेवनमस्कृतः ॥ ६३<br><br>लक्ष्म्या देव्या ह्याभूद्देव इच्छया परमेष्ठिनः ।<br>दक्षिणाङ्गोद्भवो ब्रह्मा सरस्वत्या जगद्गुरुः ॥ ६४ | अण्ड इन सात प्राकृत आवरणोंसे आवृत है और एक-दूसरेको आवृत करके ये आठ प्रकृतियाँ (मूर्तियाँ) स्थित हैं। इस प्रकार स्थित होकर ये प्रसर्गकालमें एक-दूसरेको ग्रसती हैं और सृष्टिकालमें साथ-साथ उत्पन्न होकर एक-दूसरेको धारण करती हैं। वे विकार आधार-आधेयभावसे विकारियोंमें रहते हैं। महेश्वर अव्यक्तसे परे हैं। अण्ड अव्यक्तसे उत्पन्न हुआ है। सूर्यके समान प्रभाववाले वे पुरुष परमेश्वर ही अण्डसे उत्पन्न हुए; उन पुरुषमें [उत्पद्यमान] सृष्टिका उत्पादन अपनी इच्छासे हुआ। वे ही प्रथम शरीरधारी और वे ही पुरुष कहे जाते हैं। सभी देवताओंसे नमस्कृत [भगवान्] विष्णु देवी लक्ष्मीके साथ शिवकी इच्छासे उनके बायें अंगसे उत्पन्न हुए और जगद्गुरु ब्रह्मा सरस्वतीके साथ [उनके] दाहिने अंगसे उत्पन्न हुए॥ ५९-६४॥ |
| तस्मिन्नण्डे इमे लोका अन्तर्विश्वमिदं जगत् ।<br>चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ सग्रहौ सह वायुना ॥ ६५<br><br>लोकालोकद्वयं किञ्चिदण्डे ह्यस्मिन् समर्पितम् ।<br>यत्तु सृष्टौ प्रसंख्यातं मया कालान्तरं द्विजाः ॥ ६६<br><br>एतत्कालान्तरं ज्ञेयमहर्वै पारमेश्वरम् ।<br>रात्रिश्चैतावती ज्ञेया परमेशस्य कृत्स्नशः ॥ ६७<br><br>अहस्तस्य तु या सृष्टिः रात्रिश्च प्रलयः स्मृतः ।<br>नाहस्तु विद्यते तस्य न रात्रिरीति धारयेत् ॥ ६८<br><br>उपचारस्तु क्रियते लोकानां हितकाम्यया । | उस अण्डमें ये लोक और यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है। नक्षत्रों, ग्रहों तथा वायुसहित सूर्य-चन्द्रमा भी इसीमें हैं। दोनों लोकालोक [पर्वत] तथा सब कुछ इस अण्डमें स्थित है। हे द्विजो! अब मैं सृष्टिमें कहे गये कालान्तरको बताता हूँ। इस कालान्तरको परमेश्वरका दिन जानना चाहिये और [उन] परमेश्वरकी पूर्णरूपसे उतने ही कालकी रात जाननी चाहिये। जो सृष्टि है, वही उनका दिन है और प्रलयकालको उनकी रात कहा गया है। ऐसा मानना चाहिये कि न तो उनका दिन है और न उनकी रात; [केवल] लोकोंके हितकी कामनासे [उनके द्वारा] रात-दिनका ऐसा उपचार किया जाता है॥ ६५-६८ १/२॥ |
| इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च महाभूतानि पञ्च च ॥ ६९ | इन्द्रियाँ, इन्द्रियोंके विषय, पाँच महाभूत, सभी |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप...सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३११
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मात्सर्वाणि भूतानि बुद्धिश्च सह दैवतैः।<br>अहस्तिष्ठन्ति सर्वाणि परमेशस्य धीमतः॥ ७०<br><br>अहरन्ते प्रलीयन्ते रात्र्यन्ते विश्वसम्भवः।<br>स्वात्मन्यवस्थिते व्यक्ते विकारे प्रतिसंहृते॥ ७१<br><br>साधर्म्येणावतिष्ठेते प्रधानपुरुषावुभौ।<br>तमःसत्त्वरजोपेतौ समत्वेन व्यवस्थितौ॥ ७२<br><br>अनुपृक्तावभूतान्तावोतप्रोतौ परस्परम्।<br>गुणसाम्ये लयो ज्ञेयो वैषम्ये सृष्टिरुच्यते॥ ७३<br><br>तिले यथा भवेत्तैलं घृतं पयसि वा स्थितम्।<br>तथा तमसि सत्त्वे च रजस्यनुसृतं जगत्॥ ७४ | प्राणी तथा बुद्धि—ये सब देवताओंके साथ बुद्धिमान् परमेश्वरके दिनके समय विद्यमान रहते हैं और दिनके अन्तमें विलीन हो जाते हैं। रात्रिका अन्त होनेपर पुनः विश्वकी उत्पत्ति होती है। उस समय व्यक्तके अपनी आत्मामें स्थित होनेपर तथा विकारके विलीन हो जानेपर प्रधान एवं पुरुष अपने लक्षणोंके साथ स्थित होते हैं। तम, सत्त्व तथा रजसे युक्त वे दोनों समत्वसे व्यवस्थित होकर एक-दूसरेमें मिलकर ओत-प्रोत हो जाते हैं। गुणोंकी साम्यास्थितिमें लयको जानना चाहिये और वैषम्यकी स्थितिमें सृष्टि कही जाती है। जैसे तिलमें तेल तथा दूधमें घी स्थित होता है, उसी प्रकार तम-सत्त्व-रजमें जगत् स्थित रहता है॥ ६९—७४॥ |
| उपास्य रजनीं कृत्स्नां परां माहेश्वरीं तथा।<br>अहर्मुखे प्रवृत्तश्च परः प्रकृतिसम्भवः॥ ७५<br><br>क्षोभयामास योगेन परेण परमेश्वरः।<br>प्रधानं पुरुषञ्चैव प्रविश्य स महेश्वरः॥ ७६<br><br>महेश्वरात् त्रयो देवा जज्ञिरे जगदीशवरात्।<br>शाश्वताः परमा गुह्याः सर्वात्मानः शरीरिणः॥ ७७ | पूरी रात परात्पर माहेश्वरीकी उपासना करके दिनका आरम्भ होनेपर प्रकृतिसे उत्पन्न परमेश्वर सृष्टिके लिये प्रवृत्त होते हैं। वे परमेश्वर महेश्वर (शिव) प्रधान तथा पुरुषमें प्रवेश करके श्रेष्ठ योगके द्वारा क्षोभ उत्पन्न करते हैं। तब शाश्वत, परम गुह्य, सर्वात्मा तथा शरीर-धारी तीन देवता [उन] जगदीश महेश्वरसे उत्पन्न होते हैं॥ ७५—७७॥ |
| एत एव त्रयो देवा एत एव त्रयो गुणाः।<br>एत एव त्रयो लोका एत एव त्रयोऽग्नयः॥ ७८<br><br>परस्पराश्रिता ह्येते परस्परमनुव्रताः।<br>परस्परेण वर्तन्ते धारयन्ति परस्परम्॥ ७९<br><br>अन्योन्यमिथुना ह्येते अन्योन्यमुपजीविनः।<br>क्षणं वियोगो न ह्येषां न त्यजन्ति परस्परम्॥ ८० | ये ही तीनों [ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर] देवता, ये ही तीनों गुण, ये ही तीनों लोक तथा ये ही तीनों अग्नयाँ हैं। ये देवता एक-दूसरेका आश्रय लेकर एक-दूसरेका अनुसरण करते हुए एक-दूसरेसे व्यवहार करते हैं और एक-दूसरेको धारण करते हैं। ये परस्पर संयोग करते हैं तथा एक-दूसरेके उपजीवी हैं; क्षणभरके लिये इनका वियोग नहीं होता है, ये एक-दूसरेका त्याग [कभी] नहीं करते हैं॥ ७८—८०॥ |
| ईश्वरस्तु परो देवो विष्णुश्च महतः परः।<br>ब्रह्मा च रजसा युक्तः सर्गादौ हि प्रवर्तते॥ ८१<br><br>परः स पुरुषो ज्ञेयः प्रकृतिः सा परा स्मृता॥ ८२ | महेश्वर सर्वश्रेष्ठ देवता हैं, विष्णु महत्से परे हैं और ब्रह्मा रजोगुणसे युक्त होकर सृष्टिकार्यमें प्रवृत्त होते हैं। उस पुरुषको 'पर' जानना चाहिये और वह प्रकृति 'परा' कही गयी है॥ ८१-८२॥ |
| अधिष्ठिता सा हि महेश्वरेण<br>प्रवर्तते चोद्यमाने समन्तात्।<br>अनुप्रवृत्तस्तु महांस्तदेनां<br>चिरस्थिरत्वाद्विषयं श्रियः स्वयम्॥ ८३ | महेश्वरके द्वारा अधिष्ठित वह प्रकृति सभी ओरसे सृष्टिकार्यमें प्रवृत्त होती है और उस समय चिरस्थायी होनेके कारण महत्तत्त्व ऐश्वर्यके विषयको स्वयं धारणकर इस प्रकृतिका अनुगमन करता है॥ ८३॥ |
३१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रधानगुणवैषम्यात्सर्गकालः प्रवर्तते।<br>ईश्वराधिष्ठितात्पूर्वं तस्मात्सदसदात्मकात्॥ ८४<br><br>संसिद्धः कार्यकारणे रुद्रश्चाग्रे ह्यवर्तत।<br>तेजसाप्रतिमो धीमानव्यक्तः सम्प्रकाशकः॥ ८५<br><br>स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते।<br>ब्रह्मा च भगवांस्तस्माच्चतुर्वक्त्रः प्रजापतिः॥ ८६<br><br>संसिद्धः कार्यकारणे तथा वै समवर्तत।<br>एक एव महादेवस्त्रिधैव स व्यवस्थितः॥ ८७<br><br>अप्रतीपेन ज्ञानेन ऐश्वर्येण समन्वितः।<br>धर्मेण चाप्रतीपेन वैराग्येण च तेऽन्विताः॥ ८८ | सबसे पहले ईश्वरसे अधिष्ठित तथा सत्-असत्स्वरूप उस प्राकृत गुणवैषम्यके कारण सृष्टिका काल प्रवर्तित होता है। अपने तेजसे अनुपम, बुद्धिमान्, अव्यक्त तथा सम्यक् प्रकाश करनेवाले रुद्र सबसे पहले कार्य करनेमें तत्पर हुए। वे ही प्रथम शरीरधारी हैं और वे ही पुरुष कहे जाते हैं। चार मुखवाले तथा प्रजाओंके स्वामी भगवान् ब्रह्मा उन्हींसे उत्पन्न हुए और सृष्टिकार्य करनेमें समर्थ हुए। इस प्रकार वे एक ही महादेव तीन रूपोंमें व्यवस्थित हैं। वे [महादेव] अनुकूल ज्ञान तथा ऐश्वर्यसे युक्त हैं और वे तीनों देवता भी अनुकूल धर्म तथा वैराग्यसे युक्त हैं॥ ८४-८८॥ |
| अव्यक्ताज्जायते तेषां मनसा यद्यदीहितम्।<br>वशीकृतत्वात्त्रैगुण्यं सापेक्षत्वात्स्वभावतः॥ ८९ | वशीभूत होने तथा सापेक्ष होनेके कारण उन देवताओंके मनमें जो-जो त्रिगुणात्मक सृष्टिविषयकी अभिलाषा थी, वह स्वभावसे ही अव्यक्तसे उत्पन्न हुई॥ ८९॥ |
| चतुर्मुखस्तु ब्रह्मत्वे कालत्वे चान्तकः स्मृतः।<br>सहस्रमूर्धा पुरुषस्तिस्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः॥ ९०<br><br>ब्रह्मत्वे सृजते लोकान् कालत्वे सङ्क्षिपत्यपि।<br>पुरुषत्वे ह्युदासीनस्तिस्रोऽवस्थाः प्रजापतेः॥ ९१<br><br>ब्रह्मा कमलगर्भाभो रुद्रः कालाग्निसन्निभः।<br>पुरुषः पुण्डरीकाक्षो रूपं तत्परमात्मनः॥ ९२ | वे परमेश्वर ही ब्रह्माके रूपमें चार मुखवाले तथा कालके रूपमें संहार करनेवाले कहे गये हैं। वे ही हजार सिरोंवाले पुरुष विष्णु भी हैं। इस प्रकार स्वयम्भू [परमेश्वर]-की तीन अवस्थाएँ हैं। ब्रह्माके रूपमें वे लोकोंका सृजन करते हैं, कालके रूपमें उनका संहार भी करते हैं और पुरुषके रूपमें उदासीन रहते हैं; उन प्रजापतिकी तीन अवस्थाएँ हैं। ब्रह्मा कमलगर्भकी आभावाले हैं, रुद्र कालाग्निके समान हैं तथा पुरुष [विष्णु] कमलके समान नेत्रवाले हैं—यह उन परमात्माका रूप है॥ ९०-९२॥ |
| एकधा स द्विधा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः।<br>महेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च॥ ९३<br><br>नानाकृतिक्रियारूपनामवन्ति स्वलीलया।<br>महेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च॥ ९४ | वे महेश्वर एक, दो, तीन तथा अनेक प्रकारके शरीर धारण करते हैं और उन्हें नष्ट भी कर देते हैं। वे महेश्वर अपनी लीलासे अनेक आकृति, क्रिया, रूप तथा नामवाले शरीरोंको धारण करते हैं और उन्हें नष्ट भी कर देते हैं॥ ९३-९४॥ |
| त्रिधा यद्वर्तते लोके तस्मात्त्रिगुण उच्यते।<br>चतुर्धा प्रविभक्तत्वाच्चतुर्व्यूहः प्रकीर्तितः॥ ९५ | वे [परमेश्वर] लोकमें तीन रूपोंमें विद्यमान हैं, इसलिये वे तीन गुणोंवाले कहे जाते हैं और चार भागोंमें विभक्त होनेके कारण 'चतुर्व्यूह' कहे गये हैं॥ ९५॥ |
| यदाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानयम्।<br>यच्चास्य सततं भावस्तस्मादात्मा निरुच्यते॥ ९६ | ये विषयोंको प्राप्त करते हैं, ग्रहण करते हैं और उनका भक्षण कर जाते हैं; ऐसा इनका शाश्वत भाव |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... ...सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| है, इसलिये ये 'आत्मा' कहे जाते हैं ॥ ९६ ॥ | |
| ऋषिः सर्वगतत्वाच्च शरीरी सोऽस्य यत्प्रभुः ।<br>स्वामित्वमस्य यत्सर्वं विष्णुः सर्वप्रवेशनात् ॥ ९७ | सर्वत्र गमन करनेके कारण ये ऋषि हैं; वे परमेश्वर इस शरीरके प्रभु हैं तथा इसपर उनका पूर्ण स्वामित्व है; अतः वे शरीरी हैं और सर्वत्र प्रवेश करनेके कारण वे विष्णु हैं ॥ ९७ ॥ |
| भगवान् भगवद्भावान्निर्मलत्वाच्छिवः स्मृतः ।<br>परमः सम्प्रकृष्टत्वादवनादोमिति स्मृतः ॥ ९८<br><br>सर्वज्ञः सर्वविज्ञानात्सर्वः सर्वमयो यतः ।<br>त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैलोक्यं सम्प्रवर्तते ॥ ९९<br><br>सृजते ग्रसते चैव रक्षते च त्रिभिः स्वयम् ।<br>आदित्वादादिदेवोऽसावजातत्वादजः स्मृतः ॥ १००<br><br>पाति यस्मात्प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः ।<br>देवेषु च महान् देवो महादेवस्ततः स्मृतः ॥ १०१<br><br>सर्वगत्वाच्च देवानामवश्यत्वाच्च ईश्वरः ।<br>बृहत्त्वाच्च स्मृतो ब्रह्मा भूतत्वाद्भूत उच्यते ॥ १०२<br><br>क्षेत्रज्ञः क्षेत्रविज्ञानादेकत्वात्केवलः स्मृतः ।<br>यस्मात्पुर्यां स शेते च तस्मात्पूरुष उच्यते ॥ १०३<br><br>अनादित्वाच्च पूर्वत्वात्स्वयम्भूरिति संस्मृतः ।<br>याज्यत्वादुच्यते यज्ञः कविर्विक्रान्तदर्शनात् ॥ १०४ | वे ऐश्वर्यमय भावसे युक्त होनेके कारण 'भगवान्' तथा निर्मल होनेके कारण 'शिव' कहे गये हैं। वे विशिष्ट होनेके कारण 'परम' तथा रक्षा करनेके कारण 'ओम्' कहे गये हैं। वे सब कुछ सम्यक् जाननेके कारण 'सर्वज्ञ' हैं तथा सर्वमय होनेके कारण 'सर्व' हैं; वे अपनेको तीन रूपोंमें विभक्त करके तीनों लोकोंका संचालन करते हैं; वे तीन रूपोंसे स्वयं [जगतका] सृजन करते हैं, पालन करते हैं तथा संहार करते हैं ॥ ९८-९९ १/२ ॥<br><br>वे आदि (प्रारम्भ)-में प्रकट होनेके कारण 'आदिदेव' तथा अजन्मा होनेके कारण 'अज' कहे गये हैं। वे समस्त प्रजाओंकी रक्षा करते हैं, इसलिये 'प्रजापति' कहे गये हैं। वे देवताओंमें [सबसे] महान् देवता हैं, इसलिये 'महादेव' कहे गये हैं। वे सर्वव्यापी होने तथा किसीके वशमें न होनेके कारण देवताओंके भी 'ईश्वर', बृहत् होनेके कारण 'ब्रह्मा' तथा अपने भूतत्व (अस्तित्व)-के कारण 'भूत' कहे जाते हैं। वे क्षेत्रोंका ज्ञान रखनेके कारण 'क्षेत्रज्ञ' तथा एकमात्र होनेके कारण 'केवल' कहे गये हैं। चूँकि वे पुरी (शरीर)-में शयन करते हैं, इसलिये 'पुरुष' कहे जाते हैं। वे अनादि होने तथा [सबसे] पहले होनेके कारण 'स्वयम्भू' कहे गये हैं। वे यजनके योग्य होनेके कारण 'यज्ञ' तथा इन्द्रियोंसे न दिखायी देनेवाली वस्तुओंको भी देखनेके कारण 'कवि' कहे जाते हैं ॥ १००-१०४ ॥ |
| क्रमणः क्रमणीयत्वात्पालकश्चापि पालनात् ।<br>आदित्यसंज्ञः कपिलो ह्यग्रजोऽग्निरिति स्मृतः ॥ १०५ | वे क्रमणीय (पहुँचनेके योग्य) होनेके कारण 'क्रमण', [सबका] पालन करनेके कारण 'पालक', कपिलवर्ण होनेके कारण 'आदित्य' और सबसे पहले उत्पन्न होनेके कारण 'अग्नि' कहे गये हैं ॥ १०५ ॥ |
| हिरण्यमस्य गर्भोऽभूद्धिरण्मयस्यापि गर्भजः ।<br>तस्माद्धिरण्मयगर्भत्वं पुराणेऽस्मिन्निरुच्यते ॥ १०६ | हिरण्यमय अण्ड इनसे उत्पन्न हुआ और ये भी हिरण्यमय अण्डसे उत्पन्न हुए, अतः इस पुराणमें उन्हें |
| ३१४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| मूल संस्कृत (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| 'हिरण्यगर्भ' कहा जाता है॥१०६॥ | |
| स्वयम्भुवोऽपि वृत्तस्य कालो विश्वात्मनस्तु यः।<br>न शक्यः परिसंख्यातुमपि वर्षशतैरपि ॥ १०७<br>कालसंख्याविवृत्तस्य परार्धो ब्रह्मणः स्मृतः।<br>तावच्छेषोऽस्य कालोऽन्यस्तस्यान्ते प्रतिसृज्यते ॥ १०८ | अतीत विश्वात्मा स्वयम्भूका जो काल है, उसकी गणना सौ वर्षोंमें भी नहीं की जा सकती है। वर्तमान ब्रह्माकी कालसंख्याको परार्ध कहा गया है। उतने ही परिमाणवाला इनका काल [द्वितीय परार्ध] शेष रहता है; उसके अन्तमें जगत्का संहार हो जाता है। कल्पोंके हजारों करोड़ जो दिन व्यतीत हो गये हैं, उतने ही दूसरे अभी शेष हैं॥१०७-१०८ १/२॥ |
| कोटिकोटिसहस्राणि अहर्भूतानि यानि वै।<br>समतीतानि कल्पानां तावच्छेषाः परे तु ये।<br>यस्त्वयं वर्तते कल्पो वाराहस्तं निबोधत ॥ १०९<br>प्रथमः साम्प्रतस्तेषां कल्पोऽयं वर्तते द्विजाः।<br>यस्मिन् स्वायम्भुवाद्यास्तु मनवस्ते चतुर्दश ॥ ११०<br>अतीता वर्तमानाश्च भविष्या ये च वै पुनः।<br>तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता ॥ १११<br>पूर्णं युगसहस्त्रं वै परिपाल्या महेश्वरैः।<br>प्रजाभिस्तपसा चैव तेषां शृणुत विस्तरम् ॥ ११२ | जो यह वाराहकल्प चल रहा है, उसके विषयमें सुनिये। हे द्विजो! यह वर्तमान कल्प उनमें प्रथम [कल्प] है, जिसमें स्वायम्भुव आदि चौदह मनु व्यवस्थित हैं। बीत चुके, वर्तमान तथा अभी होनेवाले जो मनु हैं, उन महेश्वर मनुओंद्वारा अपनी तपस्यासे प्रजाओंके साथ सातों द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीका पालन पूरे हजार वर्षोंतक किया जाता है; अब उनका विस्तृत वर्णन सुनिये॥१०९-११२॥ |
| मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि च।<br>कथितानि भविष्यन्ति कल्पः कल्पेन चैव हि ॥ ११३<br>अतीतानि च कल्पानि सोदर्काणि सहानुवैः।<br>अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता ॥ ११४ | [हे ऋषियो!] एक मन्वन्तरके वर्णनसे सभी मन्वन्तरोंका तथा एक कल्पके वर्णनसे दूसरे कल्पका भी वर्णन हो जायगा। अपने वंशके राजाओंके साथ बीते हुए कल्प जिस रूपमें होते हैं, विद्वान्को वैसा ही तर्क (अनुमान) अनागत (भविष्य) कल्पोंके विषयमें भी कर लेना चाहिये॥११३-११४॥ |
| आपो ह्यग्रे समभवन्नष्टे च पृथिवीतले।<br>शान्ततारैकनीरेऽस्मिन् प्राजायत किञ्चन ॥ ११५<br>एकार्णवे तदा तस्मिन्नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>तदा भवति वै ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ ११६<br>सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णस्त्वतीन्द्रियः।<br>ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु सुषुवाप सलिले तदा ॥ ११७<br>सत्त्वोद्रेकात्प्रबुद्धस्तु शून्यं लोकमुदैक्षत।<br>इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति ॥ ११८<br>आपो नाराश्च सूनव इत्यपां नाम शुश्रुमः।<br>आपूर्य ताभिरयनं कृतवानात्मनो यतः ॥ ११९<br>अप्सु शेते यतस्तस्मात्ततो नारायणः स्मृतः।<br>चतुर्युगसहस्रस्य नैशं कालमुपास्यतः ॥ १२० | पृथ्वीतलके नष्ट हो जानेपर सबसे पहले जल प्रादुर्भूत हुआ; विनष्ट नक्षत्रोंसे युक्त तथा उस विस्तृत जलमय ब्रह्माण्डमें कुछ भी नहीं मालूम पड़ता था। उस एकार्णव (प्रलयसागर)-में [समस्त] स्थावर-जंगमके विनष्ट हो जानेपर हजार नेत्रोंवाले, हजार पैरवाले, हजार सिरवाले तथा स्वर्णिम रंगवाले अतीन्द्रिय ब्रह्मा पुरुषरूपमें प्रकट हुए। उस समय नारायणसंज्ञक वे ब्रह्मा जलमें सोये हुए थे। पुनः सत्त्वगुणके उद्रेकके कारण जगे हुए उन ब्रह्माने लोकको शून्य देखा। लोग उन नारायणके प्रति इस श्लोकको उदाहृत करते हैं-जलका अर्थ है 'नार' तथा 'सूनु'-हमलोग जलके ये दो नाम सुनते हैं। उस जलसे पूरित करके उन्होंने अपना 'अयन' (निवासस्थान) बनाया और वे जलमें सोते हैं, इसलिये |
| अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप… सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव | ३१५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| 'नारायण' कहे गये हैं॥ ११५-११९ १/२॥ | |
| शार्वर्यन्ते प्रकुरुते ब्रह्मत्वं सर्गकारणात्।<br>ब्रह्मा तु सलिले तस्मिन् वायुर्भूत्वा समाचरत्॥ १२१<br><br>निशायामिव खद्योतः प्रावृट्काले ततस्तु सः।<br>ततस्तु सलिले तस्मिन् विज्ञायान्तर्गतां महीम्॥ १२२<br><br>अनुमानादसम्मूढो भूमेरुद्धरणं पुनः।<br>अकरोत्स तनूमन्यां कल्पादिषु यथा पुरा॥ १२३<br><br>ततो महात्मा भगवान् दिव्यरूपमचिन्तयत्।<br>सलिलेनाप्लुतां भूमिं दृष्ट्वा स तु समन्ततः॥ १२४ | हजार चतुर्युगीतक जलमें निवास करनेके पश्चात् रात्रिके अन्तमें उन्होंने सृष्टि करनेके उद्देश्यसे ब्रह्माका रूप धारण किया। ब्रह्माजी वायु होकर उस जलमें विचरण करने लगे, जैसे कि वर्षाऋतुमें रात्रिमें खद्योत विचरण करता है। तदनन्तर ज्ञानसम्पन्न उन ब्रह्माने अनुमानपूर्वक पृथ्वीको जलके भीतर गयी हुई जानकर पहलेके कल्पोंमें जैसा रूप धारण किया था, उस अन्य रूपको धारणकर पृथ्वीका उद्धार करनेका निश्चय किया। तत्पश्चात् महात्मा भगवान् [ब्रह्मा] उस दिव्य रूपका चिन्तन करने लगे। सभी ओरसे जलसे व्याप्त पृथ्वीको देखकर उन्होंने सोचा कि मैं कौन-सा रूप धारण करके इस पृथ्वीका उद्धार करूँ॥ १२०-१२४ १/२॥ |
| किन्नु रूपमहं कृत्वा उद्धरेयं महीमिमाम्।<br>जलक्रीडानुसदृशं वाराहं रूपमाविशत्॥ १२५<br><br>अधृष्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्मसंज्ञितम्।<br>पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविवेश रसातलम्॥ १२६<br><br>अद्भिः सञ्छादितां भूमिं स तामाशु प्रजापतिः।<br>उपगम्योज्जहारैनामापश्चापि समाविशत्॥ १२७<br><br>सामुद्रा वै समुद्रेषु नादेयाश्च नदीषु च।<br>रसातलतले मग्नां रसातलपुटे गताम्॥ १२८<br><br>प्रभुर्लोकहितार्थाय दंष्ट्रयाभ्युज्जहार गाम्।<br>ततः स्वस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीधरः॥ १२९<br><br>मुमोच पूर्ववदसौ धारयित्वा धराधरः।<br>तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता॥ १३० | उन्होंने जलक्रीड़ाके अनुरूप, सभी प्राणियोंसे अजेय, वेदमय तथा ब्रह्मसंज्ञक वाराहरूप धारण किया और पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश किया। उन [वाराहरूपधारी] प्रजापतिने जलसे घिरी हुई पृथ्वीके पास पहुँचकर उसे उठा लिया और समुद्रके जलको समुद्रोंमें तथा नदियोंके जलको नदियोंमें समाविष्ट कर दिया। इस प्रकार उन प्रभुने लोक-कल्याणके लिये रसातलमें गयी हुई तथा समुद्रतलमें डूबी हुई पृथ्वीको अपने दंष्ट्रापर उठा लिया। इसके बाद उन धरणीधरने पृथ्वीको उसके [मूल] स्थानमें लाकरके पूर्वकी भाँति रखकर छोड़ दिया। वह पृथ्वी उस जलराशिके ऊपर विशाल नौकाकी भाँति स्थित हो गयी और उसीके समान विशाल देह होनेके कारण पृथ्वी [पुनः] डूब न सकी॥ १२५-१३० १/२॥ |
| तत्समा ह्युरुदेहत्वान्न मही याति सम्प्लवम्।<br>तत उत्क्षिप्य तां देवो जगतः स्थापनेच्छया॥ १३१<br><br>पृथिव्याः प्रविभागाय मनश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः।<br>पृथिवीं च समां कृत्वा पृथिव्यां सोऽचिनोद् गिरीन्॥ १३२<br><br>प्राक्सर्गे दह्यमाने तु तदा संवर्तकाग्निना।<br>तेनाग्निना विशीर्णास्ते पर्वता भूरि विस्तराः॥ १३३<br><br>शैत्यादेकार्णवे तस्मिन् वायुना तेन संहताः।<br>निक्षिप्ता यत्र यत्रासंस्तत्र तत्राचलाभवन्॥ १३४ | तत्पश्चात् कमलके समान नेत्रवाले भगवान्ने उसे उठा करके जगत्की स्थापनाकी इच्छासे पृथ्वीका विभाग करनेके लिये मनमें निश्चय किया। उन्होंने पृथ्वीको समतल करके पृथ्वीपर पर्वतोंको संग्रहीत किया। संवर्तक अग्निद्वारा पूर्व सृष्टिके दग्ध कर दिये जानेपर उस समय बहुत विस्तारवाले वे पर्वत उस अग्निसे विशीर्ण हो गये थे। उस एकार्णवमें वायुप्रवाहके द्वारा एकत्रित होकर शीतके कारण वे जहाँ-जहाँ जम |
| ३१६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| तदाचलत्वादचलाः पर्वभिः पर्वताः स्मृताः ।<br>गिरयो हि निगीर्णत्वाच्छयानत्वाच्छिलोच्चयाः ॥ १३५<br><br>ततस्तेषु विकीर्णेषु कोटिशो हि गिरिश्वथ ।<br>विश्वकर्मा विभजते कल्पादिषु पुनः पुनः ॥ १३६ | गये, वहाँ-वहाँ पर्वत बन गये। वे चलायमान न होनेके कारण 'अचल', पर्वोंसे युक्त होनेके कारण 'पर्वत', निगीर्ण होनेके कारण 'गिरि' तथा [भूमिपर] शयन करनेके कारण 'शिलोच्चय' कहे गये हैं। इस प्रकार [भगवान्] विश्वकर्मा प्रत्येक कल्पमें उन करोड़ों पर्वतोंके [इधर-उधर] बिखर जानेपर बार-बार उनका विभाग करते हैं॥ १३१—१३६॥ | | ससमुद्रामिमां पृथ्वीं सप्तद्वीपां सपर्वताम् ।<br>भूराद्यांश्चतुरो लोकान् पुनः सोऽथ व्यकल्पयत् ॥ १३७<br><br>लोकान् प्रकल्पयित्वाथ प्रजासर्गं ससर्ज ह ।<br>ब्रह्मा स्वयम्भूभगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ॥ १३८<br><br>ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां कल्पादिषु यथा पुरा ।<br>तस्याभिध्यायतः सर्गं तदा वै बुद्धिपूर्वकम् ॥ १३९<br><br>बुद्ध्याश्च समकाले वै प्रादुर्भूतस्तमोमयः ।<br>तमो मोहो महामोहस्तामिस्रश्चान्धसंज्ञितः ॥ १४०<br><br>अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः ।<br>पञ्चधावस्थितः सर्गो ध्यायतः सोऽभिमानिनः ॥ १४१<br><br>संवृतस्तमसा चैव बीजाङ्कुरवदावृतः ।<br>बहिरन्तश्चाप्रकाशास्तब्धो निःसंज्ञ एव च ॥ १४२ | तदनन्तर उन्होंने समुद्रों, सातों द्वीपों तथा पर्वतोंसहित पृथ्वीको, भूः आदि चारों लोकोंको बनाया। इसके बाद लोकोंकी रचना करके उन्होंने प्रजासर्गकी रचना की, विविध प्रजाओंकी सृष्टि करनेकी इच्छावाले स्वयम्भू भगवान् [ब्रह्मा]-ने उसी प्रकारकी सृष्टिकी रचना की, जैसा उन्होंने पहलेके कल्पोंमें किया था। सृष्टिके समय बुद्धिपूर्वक सर्गका चिन्तन करते हुए उन ब्रह्माकी बुद्धिसे तमोमय [अविद्यात्मक] सर्ग उत्पन्न हुआ; वह तम, मोह, महामोह, तामिस्र तथा अन्ध—इन नामोंवाला है। इस प्रकार पाँच पर्वोंवाली यह अविद्या उन महात्मासे उत्पन्न हुई। ध्यान करते हुए अभिमानी ब्रह्माका वह सर्ग पाँच प्रकारसे अवस्थित हुआ। वह तमसे आवृत, बीजांकुरकी भाँति ढका हुआ, बाहर तथा भीतरसे प्रकाशरहित, स्तब्ध तथा निःसंज्ञ (चेतनाशून्य) था॥ १३७—१४२॥ | | यस्मात्तेषां वृता बुद्धिर्दुःखानि करणानि च ।<br>तस्मात्ते संवृतात्मानो नगा मुख्याः प्रकीर्तिताः ॥ १४३ | उन [पर्वतों]-की बुद्धि ढँकी हुई थी और उनके दुःख तथा क्रिया-कलाप भी ढँके हुए थे, अतः संवृतात्मा (आवृत आत्मावाले) वे नग (पर्वत) प्रथम उत्पन्न (मुख्य) कहे गये हैं॥ १४३॥ | | मुख्यसर्गं तथाभूतं दृष्ट्वा ब्रह्मा ह्यसाधकम् ।<br>अप्रसन्नमनाः सोऽथ ततोऽन्यं सो ह्यमन्यत ॥ १४४<br><br>तस्याभिध्यायताश्चैव तिर्यक्स्रोता ह्यवर्तत ।<br>यस्मात्तिर्यक्प्रवृत्तः स तिर्यक्स्रोतास्ततः स्मृतः ॥ १४५<br><br>पश्वादयस्ते विख्याता उत्पथग्राहिणो द्विजाः ।<br>तस्याभिध्यायतोऽन्यं वै सात्त्विकः समवर्तत ॥ १४६<br><br>ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयस्तु स वै चोर्ध्वं व्यवस्थितः ।<br>यस्मात्प्रवर्तते चोर्ध्वमूर्ध्वस्रोतास्ततः स्मृतः ॥ १४७ | उस प्रकारके प्रथम सर्गको कार्यहेतु व्यर्थ समझकर वे ब्रह्मा अप्रसन्नचित्त हो गये। तब वे अन्य सर्गका विचार करने लगे। ऐसा चिन्तन करते हुए उन ब्रह्मासे तिर्यक्स्रोत (बहिर्मुख इन्द्रियप्रवाहवाला)-सर्ग उत्पन्न हुआ। वह [सर्ग] तिर्यक् प्रवृत्तिवाला था, इसलिये उसे तिर्यक्स्रोत कहा गया है। हे द्विजो! वे उत्पथग्राही पशु-पक्षी आदिके रूपमें प्रसिद्ध हुए। इसके बाद अन्य सर्गका ध्यान करते हुए उन ब्रह्मासे ऊर्ध्वस्रोत (ऊर्ध्व इन्द्रियप्रवाहवाला) तीसरा सात्त्विक सर्ग उत्पन्न हुआ; |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१७
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| ते सुखप्रीतिबहुला बहिरन्तश्च संवृताः।<br>प्रकाशा बहिरन्तश्च ऊर्ध्वस्रोतोभवाः स्मृताः ॥ १४८<br><br>ते सत्त्वस्य च योगेन सृष्टाः सत्त्वोद्भवाः स्मृताः।<br>ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयो वै देवसर्गस्तु स स्मृतः ॥ १४९<br><br>प्रकाशाद्बहिरन्तश्च ऊर्ध्वस्रोतोद्भवाः स्मृताः।<br>ते ऊर्ध्वस्रोतसो ज्ञेयास्तुष्टात्मानो बुधैः स्मृताः ॥ १५० | वह ऊर्ध्वरूपसे व्यवस्थित था। चूँकि यह ऊर्ध्वभावसे कार्य करता था, अतः यह [सर्ग] ऊर्ध्वस्रोत कहा गया है। वे सुख-प्रीतिकी अधिक प्रवृत्तिवाले, बाहर तथा भीतरसे संवृत और बाहर तथा भीतरसे प्रकाशमय थे, इसलिये वे ऊर्ध्वस्रोतसे उत्पन्न कहे गये हैं। वे सत्त्वगुणके योगसे सृजित किये गये, इसलिये वे सत्त्वोद्भव कहे गये हैं। ऊर्ध्वस्रोत नामक वह तीसरा सर्ग देवसर्ग कहा गया है। बाहर तथा भीतर प्रकाशसे युक्त रहनेके कारण वे ऊर्ध्वस्रोतसे उत्पन्न कहे गये हैं। ऊर्ध्वस्रोतके रूपमें ज्ञेय वे लोग विद्वानोंके द्वारा सन्तुष्ट आत्मावाले कहे गये हैं॥ १४८-१५०॥ |
| ऊर्ध्वस्रोतस्सु सृष्टेषु देवेषु वरदः प्रभुः।<br>प्रीतिमानभवद् ब्रह्मा ततोऽन्यं सोऽभ्यमन्यत ॥ १५१<br><br>ससर्ज सर्गमन्यं हि साधकं प्रभुरीश्वरः।<br>ततोऽभिध्याय तस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्तदा ॥ १५२<br><br>प्रादुरासीत्तदा व्यक्तादर्वाक्स्रोतास्तु साधकः।<br>यस्मादर्वाक् न्यवर्तन्त ततोऽर्वाक्स्रोतसस्तु ते ॥ १५३<br><br>ते च प्रकाशबहुलास्तमःपृक्ता रजोऽधिकाः।<br>तस्मात्ते दुःखबहुला भूयोभूयश्च कारिणः ॥ १५४<br><br>संवृता बहिरन्तश्च मनुष्याः साधकाश्च ते।<br>लक्षणैस्तारकाद्यैस्ते ह्यष्टधा तु व्यवस्थिताः ॥ १५५<br><br>सिद्धात्मानो मनुष्यास्ते गन्धर्वसहधर्मिणः।<br>इत्येष तैजसः सर्गो ह्यर्वाक्स्रोतः प्रकीर्तितः ॥ १५६ | ऊर्ध्वस्रोतवाले देवताओंके सृष्ट हो जानेपर वर प्रदान करनेवाले प्रभु भगवान् ब्रह्मा प्रसन्न हो गये और उसके बाद वे दूसरी सृष्टिका विचार करने लगे। तब प्रभु ब्रह्माने अन्य साधक सर्गका सृजन किया। उस समय ध्यान करते हुए उन सत्यके अभिध्यायी व्यक्त ब्रह्मासे अर्वाक्स्रोत (बाहर तथा भीतरसे इन्द्रियप्रवाहवाला) साधक सर्ग उत्पन्न हुआ। इस सृष्टिके लोग अर्वाक्रूपसे कार्यमें प्रवृत्त हुए, इसलिये वे अर्वाक्स्रोता कहे गये हैं। वे प्रकाशबाहुल्यवाले, तमोगुणसे युक्त तथा रजोगुणकी अधिकतावाले थे, इसलिये वे बहुत दुःखसे युक्त थे तथा बार-बार कर्म करनेवाले थे। बाहर तथा भीतरसे संवृत वे लोग साधक (कार्यसाधनमें तत्पर) मनुष्य थे; वे तारक आदि लक्षणोंके द्वारा आठ प्रकारसे व्यवस्थित हुए। सिद्ध आत्मावाले वे मनुष्य गन्धर्वोंके समान गुणधर्मवाले थे। इस अर्वाक्स्रोत सृष्टिको ‘तैजस' सर्ग कहा गया है॥ १५१-१५६॥ |
| पञ्चमोऽनुग्रहः सर्गश्चतुर्धा तु व्यवस्थितः।<br>विपर्ययेण शक्त्या च सिद्ध्या तुष्ट्या तथैव च ॥ १५७<br><br>स्थावरेषु विपर्यासस्तिर्यग्योनिषु शक्तिः।<br>सिद्धात्मानो मनुष्यास्तु ऋषिदेवेषु कृत्स्नशः ॥ १५८<br><br>इत्येष प्राकृतः सर्गो वैकृतोऽनवमः स्मृतः।<br>भूतादिकानां भूतानां षष्ठः सर्गः स उच्यते ॥ १५९ | पाँचवाँ सर्ग ‘अनुग्रह' है; यह विपर्यय, शक्ति, सिद्धि तथा तुष्टिके द्वारा चार प्रकारसे व्यवस्थित है। स्थावरों (वृक्ष आदि)-में विस्तारके कारण भेद होता है, पशु आदिमें सामर्थ्यसे होता है, मनुष्य प्रारब्धजन्य सिद्धिसे युक्त होते हैं और ऋषियों तथा देवताओंमें सम्पूर्ण तुष्टिके द्वारा चतुर्थ भेद होता है। चार प्रकारवाला यह प्राकृत (प्रकृतिनिरूपण विषयवाला) तथा विकारको प्राप्त अनुग्रह [नामक] सर्ग श्रेष्ठ कहा गया है॥ १५७-१५८ १/२॥ |
३१८ | श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निवृत्तं वर्तमानं च तेषां जानन्ति वै पुनः ।<br>भूतादिकानां भूतानां सप्तमः सर्ग एव च ॥ १६०<br><br>तेऽपरिग्राहिणः सर्वे संविभागरताः पुनः ।<br>स्वादनाश्र्चाप्यशीलाश्च ज्ञेया भूतादिकाश्च ते ॥ १६१<br><br>विपर्ययेण भूतादिरशक्त्या च व्यवस्थितः ।<br>प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणः स्मृतः ॥ १६२ | मनु आदिका सर्ग भूतोंका छठा सर्ग कहा जाता है। उन उत्पद्यमान भूतोंके प्राक्कर्म, वर्तमान तथा भविष्यको वे भूतादिक निश्चित रूपसे जानते हैं। भूतादिक भूतों (मनुष्यों)-का सातवाँ सर्ग है। [पूर्वोक्त] उन सभी भूतादिकोंको निःस्पृह, दानशील, कर्मफलका आस्वादन करनेवाला तथा अशील जानना चाहिये। भूतादि (अहंकार) अज्ञानसे तथा विष्णुमायासे व्यवस्थित होता है॥ १५९-१६१ १/२ ॥ |
| तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गः स उच्यते ।<br>वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः ॥ १६३<br><br>इत्येष प्राकृतः सर्गः सम्भूतो बुद्धिपूर्वकः ।<br>मुख्यसर्गश्चतुर्थश्च मुख्या वै स्थावराः स्मृताः ॥ १६४<br><br>ततोऽर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः ।<br>अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्त्विकस्तामसश्च सः ॥ १६५<br><br>पञ्चैते वैकृताः सर्गाः प्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः ।<br>प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः ॥ १६६<br><br>अबुद्धिपूर्वकाः सर्गाः प्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः ।<br>बुद्धिपूर्वं प्रवर्तन्ते षट् पुनर्ब्रह्मणस्तु ते ॥ १६७ | महत्से होनेवाले सर्गको ब्रह्माका प्रथम सर्ग कहा गया है। तन्मात्राओंका जो दूसरा सर्ग है, वह भूतसर्ग कहा जाता है। वैकारिक तीसरा सर्ग ऐन्द्रियसर्ग कहा गया है। यह सब प्राकृत सर्ग है, जो बुद्धिपूर्वक हुआ है। चौथा मुख्य सर्ग है; सभी स्थावर मुख्य कहे गये हैं। इसके बाद [तिर्यक्स्रोत, ऊर्ध्वस्रोत तथा अर्वाक्स्रोतके क्रमसे] अर्वाक्-स्रोतोंका सर्ग है; उनमें सातवाँ जो अर्वाक्स्रोतोंका सर्ग है, वह मानुषसर्ग है। आठवाँ अनुग्रहसर्ग है; वह सात्त्विक, तामस तथा राजस भेदोंवाला होता है [सात्त्विकको देवताओंमें, तामसको पशुओंमें तथा राजसको मनुष्योंमें जानना चाहिये]। इस प्रकार ये पाँच वैकृत सर्ग तथा तीन प्राकृत सर्ग कहे गये हैं। [सनक आदिका] जो नौवाँ सर्ग है, वह प्राकृत तथा वैकृत [दोनों रूपोंवाला] कहा गया है। ब्रह्माके जो तीन प्राकृतसर्ग कहे गये हैं, वे अबुद्धिपूर्वक प्रवर्तित हुए हैं और जो [शेष] छः सर्ग हैं, वे बुद्धिपूर्वक प्रवर्तित हुए हैं॥ १६२-१६७॥ |
| विस्तारनुग्रहः सर्गः कीर्त्यमानो निबोधत ।<br>चतुर्धावस्थितः सोऽथ सर्वभूतेषु कृत्स्नशः ॥ १६८<br><br>इत्येते प्राकृताश्चैव वैकृताश्च नव स्मृताः ।<br>परस्परानुरक्ताश्च कारणैश्च बुधैः स्मृताः ॥ १६९ | [हे ऋषियो!] अब मैं विस्तृत अनुग्रहसर्गका वर्णन कर रहा हूँ; आपलोग उसे जान लें। वह सभी भूतोंमें पूर्णरूपसे चार प्रकारसे अवस्थित है। ये जो प्राकृत तथा वैकृत [कुल] नौ सर्ग कहे गये हैं, उन्हें विद्वानोंने कारणोंके द्वारा एक-दूसरेसे अनुरक्त (सम्बद्ध) बताया है॥ १६८-१६९॥ |
| अग्रे ससर्ज वै ब्रह्मा मानसानात्मनः समान् ।<br>ऋभुः सनत्कुमारश्च द्वावेतावूर्ध्वरेतसौ ॥ १७०<br><br>पूर्वोत्पन्नौ पुरा तेभ्यः सर्वेषामपि पूर्वजौ ।<br>व्यतीते त्वष्टमे कल्पे पुराणौ लोकसाक्षिणौ ॥ १७१ | आरम्भमें ब्रह्माजीने अपने ही सदृश मानस पुत्रोंका सृजन किया। उनमेंसे सबसे पहले उत्पन्न तथा सभीके पूर्वज ऋभु तथा सनत्कुमार—ये दोनों ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी) थे। आठवाँ कल्प व्यतीत होनेपर प्राचीन एवं लोकसाक्षी |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप...सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१९
| तौ वाराहे तु भूर्लोके तेजः सङ्क्षिप्य धिष्ठितौ।<br>तावुभौ मोक्षकर्मणावारोग्यात्मानमात्मनि॥ १७२<br><br>प्रजां धर्मं च कामं च त्यक्त्वा वैराग्यमास्थितौ।<br>यथोत्पन्नस्तथैवेह कुमारः स इहोच्यते॥ १७३<br><br>तस्मात्सनत्कुमारोति नामास्येह प्रकीर्तितम्।<br>सनन्दं सनकं चैव विद्वांसं च सनातनम्॥ १७४<br><br>विज्ञानेन निवृत्तास्ते व्यवर्तन्त महौजसः।<br>सम्बुद्धाश्चैव नानात्वे अप्रवृत्ताश्च योगिनः॥ १७५<br><br>असृष्ट्वैव प्रजासर्गं प्रतिसर्गं गताः पुनः।<br>ततस्तेषु व्यतीतेषु ततोऽन्यान् साधकान् सुतान्॥ १७६ | वे दोनों वाराहकल्पमें [अपने] तेजको संक्षिप्त करके पृथ्वीलोकमें अधिष्ठित हुए। मोक्षके लिये कर्मपरायण वे दोनों [मानसपुत्र] आत्माको अपनेमें स्थिर करके प्रजा, धर्म तथा कामका त्याग करके वैराग्यमें स्थित हो गये। सनत्कुमार जिस रूपमें उत्पन्न हुए थे, वैसे ही कुमार-रूपमें विद्यमान कहे जाते हैं, इसलिये इनका नाम 'सनत्कुमार' प्रसिद्ध हुआ। इसी प्रकार ब्रह्माने [जिन] सनन्द, सनक तथा विद्वान् सनातनको उत्पन्न किया था, वे विशेष ज्ञानके द्वारा सांसारिकतासे निवृत्त रहे। महान् ओजवाले वे सब अविद्यापरिकल्पित भेदके प्रति सम्बुद्ध होकर अर्थात् उसे मिथ्या समझकर प्रवृत्तिसे रहित योगी हुए। प्रजाओंकी सृष्टि किये बिना ही वे मोक्षको प्राप्त हुए॥ १७०-१७५ १/२॥ | | मानसानसृजद् ब्रह्मा पुनः स्थानाभिमानिनः।<br>आभूतसम्प्लवावस्था यैरियं विधृता मही॥ १७७<br><br>आपोऽग्निं पृथिवीं वायुमन्तरिक्षं दिवं तथा।<br>समुद्रांश्च नदीश्चैव तथा शैलवनस्पतीन्॥ १७८<br><br>ओषधीनां तथात्मानो वल्लीनां वृक्षवीरुधाम्।<br>लताः काष्ठाः कलाश्चैव मुहूर्ताः सन्धिररात्र्यहान्॥ १७९<br><br>अर्धमासांश्च मासांश्च अयनाब्दयुगानि च।<br>स्थानाभिमानिनः सर्वे स्थानाख्याश्चैव ते स्मृताः॥ १८० | उन सबके मोक्षको प्राप्त हो जानेपर ब्रह्माने अपने स्थानके अभिमानी तथा कार्यक्षम अन्य मानस पुत्रोंका सृजन किया, जिन्होंने प्रलयपर्यन्त इस पृथ्वीको धारण किया। इसके बाद ब्रह्माने जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, समुद्रों, नदियों, पर्वतों, वनस्पतियों, औषधियों, वल्लियों, वृक्षों, झाड़ियों, लताओं, काष्ठाओं, कलाओं, मुहूर्तों, सन्धियों, रात्रि, दिन, पक्षों, मासों, अयनों, वर्षों तथा युगोंका सृजन किया। अपने स्थानोंके अभिमानी वे सब अपने स्थानोंके नामवाले कहे गये हैं॥ १७६-१८०॥ | | देवानृषींश्च महतो गदतस्तान्निबोधत।<br>मरीचिभृग्वङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्॥ १८१<br><br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजन्मानसान्नव।<br>नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥ १८२<br><br>तेषां ब्रह्मात्मकानां वै सर्वेषां ब्रह्मवादिनाम्।<br>स्थानानि कल्पयामास पूर्ववत्पद्मसम्भवः॥ १८३<br><br>ततोऽसृजच्च सङ्कल्पं धर्मञ्चैव सुखावहम्।<br>सोऽसृजद्व्यवसायात्तु धर्मं देवो महेश्वरः॥ १८४<br><br>सङ्कल्पञ्चैव सङ्कल्पात्सर्वलोकपितामहः।<br>मानसश्च रुचिर्नाम विजज्ञे ब्रह्मणः प्रभोः॥ १८५ | अब मैं महान् देवताओं तथा ऋषियोंके विषयमें बता रहा हूँ; आपलोग उन्हें जान लें। उन [ब्रह्मा]-ने मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ—इन नौ मानस पुत्रोंका भी सृजन किया। ये लोग पुराणमें नौ ब्रह्माके रूपमें निर्धारित किये गये हैं। ब्रह्माने पूर्वकी भाँति ब्रह्माके स्वरूपवाले तथा ब्रह्मवादी उन सभीके लिये स्थानोंको कल्पित किया। इसके बाद उन्होंने सुख देनेवाले धर्म एवं संकल्पका भी सृजन किया। सभी लोकोंके पितामह देव महेश्वरने व्यवसायसे धर्मका तथा संकल्पके द्वारा संकल्पका सृजन किया। प्रभु ब्रह्माके मनसे [प्रजापति] रुचि नामक मानसपुत्र भी उत्पन्न हुआ॥ १८१-१८५॥ |
| ३२० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्राणाद् ब्रह्मासृजद्दक्षं चक्षुर्भ्यां च मरीचिनम्।<br>भृगुस्तु हृदयाज्जज्ञे ऋषिः सलिलजन्मनः॥ १८६<br><br>शिरसोऽङ्गिरसश्चैव श्रोत्रादत्रिं तथासृजत्।<br>पुलस्त्यं च तथोदानाद्व्यानाच्च पुलहं पुनः॥ १८७<br><br>समानजो वसिष्ठश्च अपानान्निर्ममे क्रतुम्।<br>इत्येते ब्रह्मणः पुत्रा दिव्या एकादश स्मृताः॥ १८८ | ब्रह्माजीने [अपने] प्राणसे दक्षका तथा दोनों नेत्रोंसे मरीचिका सृजन किया। ऋषि भृगु जलमें जन्म लेनेवाले ब्रह्माके हृदयसे उत्पन्न हुए। उन्होंने सिरसे अंगिराको, कानसे अत्रिको, उदानवायुसे पुलस्त्यको तथा व्यानवायुसे पुलहको उत्पन्न किया। वसिष्ठ उनके समानवायुसे उत्पन्न हुए। उन्होंने अपानवायुसे क्रतुका सृजन किया। ये [संकल्प, धर्म, मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठ] ब्रह्माके ग्यारह दिव्य पुत्र कहे गये हैं॥ १८६-१८८॥ |
| धर्मादयः प्रथमजाः सर्वे ते ब्रह्मणः सुताः।<br>भृग्वादयस्तु ते सृष्टा नवैते ब्रह्मवादिनः॥ १८९<br><br>गृहमेधिनः पुराणास्ते धर्मस्तैः सम्प्रवर्तितः।<br>तेषां द्वादश ते वंशा दिव्या देवगुणान्विताः॥ १९० | प्रथम उत्पन्न धर्म आदि ब्रह्माजीके पुत्र हैं, जो भृगु आदि नौ [मानस पुत्र] सृजित किये गये, वे ब्रह्मवादी हुए। वे प्राचीन गृहस्थ थे और उन्हींके द्वारा धर्म प्रवर्तित हुआ। उनके दिव्य, देवगुणसम्पन्न, क्रियावान्, सन्तानवाले तथा महर्षियोंसे अलंकृत बारह वंश हुए॥ १८९-१९० १/२॥ |
| क्रियावन्तः प्रजावन्तो महर्षिभिरलङ्कृताः।<br>ऋभुः सनत्कुमारश्च द्वावेतावूर्ध्वरेतसौ॥ १९१<br><br>पूर्वोत्पन्नौ परं तेभ्यः सर्वेषामपि पूर्वजौ।<br>व्यतीते त्वष्टमे कल्पे पुराणौ लोकसाक्षिणौ॥ १९२<br><br>विराजेतामुभौ लोके तेजः सङ्क्षिप्य धिष्ठितौ।<br>तावुभौ योगकर्माणौवारोप्यात्मानमात्मनि॥ १९३<br><br>प्रजां धर्मं च कामञ्च त्यक्त्वा वैराग्यमास्थितौ।<br>यथोत्पन्नः स एवेह कुमारः स इहोच्यते॥ १९४ | ऋभु तथा सनत्कुमार—ये दोनों ब्रह्मचारी थे; ये उनसे पहले उत्पन्न हुए थे और सभीके पूर्वज थे। आठवें कल्पके व्यतीत होनेपर प्राचीन तथा लोकोंके साक्षी वे दोनों [अपने] तेजको संक्षिप्त करके लोकमें प्रतिष्ठित होकर विराजमान हुए। योगकर्मपरायण वे दोनों आत्माको अपनेमें आरोपित करके प्रजा, धर्म तथा कामका त्याग करके वैराग्यमें स्थित हो गये। वे सन्त् जिस रूपमें उत्पन्न हुए थे, वैसे ही सदा रहनेके कारण इस लोकमें 'कुमार' कहे जाते हैं और इसीलिये उनका 'सनत्कुमार'—यह नाम प्रसिद्ध हो गया॥ १९१-१९४ १/२॥ |
| तस्मात्सनत्कुमारेति नामास्येह प्रतिष्ठितम्।<br>ततोऽभिध्याय तस्तस्य जज्ञिरे मानसाः प्रजाः॥ १९५<br><br>तच्छरीरसमुत्पन्नैः कार्यैस्तैः कारणैः सह।<br>क्षेत्रज्ञाः समवर्तन्त गात्रेभ्यस्तस्य धीमतः॥ १९६<br><br>ततो देवासुरपितॄन् मानुषांश्च चतुष्टयम्।<br>सिसृक्षुरम्भांस्येतानि स्वमात्मानमयूयुजत्॥ १९७<br><br>ततस्तु युञ्जतस्तस्य तमोमात्रसमुद्भवम्।<br>समभिध्यायतः सर्गं प्रयत्नेन प्रजापतेः॥ १९८<br><br>ततोऽस्य जघनात्पूर्वमसुरा जज्ञिरे सुताः।<br>असुः प्राणः स्मृतो विप्रास्तज्जन्मानस्ततोऽसुराः॥ १९९ | इसके बाद ध्यान करते हुए उन ब्रह्माकी मानस प्रजाएँ (सन्तानें) उत्पन्न हुईं। पुनः उनके शरीरसे उत्पन्न उन कार्यों तथा कारणोंके साथ बुद्धिमान् ब्रह्माके अंगोंसे क्षेत्रज्ञ उत्पन्न हुए। इसके बाद देवता, असुर, पितर, मनुष्य—इन चार अम्भोंकी सृष्टि करनेकी इच्छावाले ब्रह्माने अपने मनको विचारयुक्त किया। तदनन्तर मनको विचारयुक्त करते हुए तथा प्रयत्नपूर्वक तमोमात्रसे उत्पन्न होनेवाले सर्गका चिन्तन करते हुए उन प्रजापतिकी जंघासे सर्वप्रथम असुरपुत्र उत्पन्न हुए। |
अध्याय ७० ] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... 'सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव <span style="float: right;">३२१</span>
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| यया सृष्टासुराः सर्वे तां तनुं स व्यपोहत।<br>सापविद्धा तनुस्तेन सद्यो रात्रिरजायत॥ २००<br><br>सा तमोबहुला यस्मात्ततो रात्रिर्नियामिका।<br>आवृतास्तमसा रात्रौ प्रजास्तस्मात्स्वपन्त्युत॥ २०१ | हे विप्रो! 'असुः' को प्राण कहा गया है; इसलिये उससे जन्म लेनेके कारण वे असुर हुए। जिस शरीरसे उन्होंने सभी असुरोंको उत्पन्न किया था, उस शरीरको छोड़ दिया। तब उनके द्वारा त्यक्त वह शरीर तत्काल रात्रि हो गयी। वह रात्रि अन्धकारकी अधिकतासे युक्त होती है, अतः वह नियामिका (सबको शयन करानेवाली) है। प्रजाएँ रातमें अन्धकारसे आवृत हो जाती हैं, इसलिये वे सोती हैं॥ १९५-२०१॥ |
| सृष्ट्वासुरांस्ततः सो वै तनुमन्यामगृह्णत।<br>अव्यक्तां सत्त्वबहुलां ततस्तां सोऽभ्यपूजयत्॥ २०२<br><br>ततस्तां युञ्जतस्तस्य प्रियमासीत्प्रजापतेः।<br>ततो मुखात्समुत्पन्ना दीव्यतस्तस्य देवताः॥ २०३<br><br>यतोऽस्य दीव्यतो जातास्तेन देवाः प्रकीर्तिताः।<br>धातुर्दिविति यः प्रोक्तः क्रीडायां स विभाव्यते॥ २०४ | तत्पश्चात् असुरोंका सृजन करके उन्होंने अन्य अव्यक्त तथा सत्त्वबहुल शरीर धारण किया; इसलिये उन्होंने उसकी पूजा की। तब उस शरीरको धारण करनेवाले उन ब्रह्माको प्रसन्नता हुई। इसके बाद क्रीड़ा करते हुए ब्रह्माके मुखसे देवता उत्पन्न हुए। चूँकि क्रीड़ा करते हुए इन ब्रह्मासे वे उत्पन्न हुए, इसलिये वे देवता कहे गये हैं। जो 'दिव्' धातु कही गयी है, वह क्रीड़ाके अर्थमें जानी जाती है। उन ब्रह्मासे वे क्रीड़ा करते हुए उत्पन्न हुए, इसलिये देवता कहे जाते हैं॥ २०२-२०४ १/२॥ |
| यस्मात्तस्य तु दीव्यन्तो जज्ञिरे तेन देवताः।<br>देवान् सृष्ट्वाथ देवेशस्तनुमन्यामपद्यत॥ २०५<br><br>उत्सृष्टा सा तनुस्तेन सद्योऽहः समजायत।<br>तस्मादहो धर्मयुक्तं देवताः समुपासते॥ २०६<br><br>सत्त्वमात्रात्मिकामेव ततोऽन्यां सोऽभ्यमन्यत।<br>पितृत्वन्मन्यमानस्य पुत्रांस्तान् ध्यायतः प्रभोः॥ २०७<br><br>पितरो ह्युपपक्षाभ्यां रात्र्यहोरन्तरेऽभवन्।<br>तस्मात्ते पितरो देवाः पितृत्वं तेन तेषु तत्॥ २०८ | देवताओंका सृजन करके देवेशने अन्य शरीर धारण किया और उनके द्वारा छोड़ा गया वह [पहलेवाला] शरीर शीघ्र ही दिन बन गया। इसलिये देवतालोग धर्मयुक्त दिनकी उपासना करते हैं। उन्होंने सत्त्वगुणमय उस अन्य शरीरकी भी पूजा की। पिताके समान मानते हुए तथा उन [उत्पद्यमान] पुत्रोंका ध्यान करते हुए प्रभु (ब्रह्मा)-के [दाहिने-बाएँ] दोनों पार्श्वभागसे दिन तथा रातके बीच पितर उत्पन्न हुए, इसलिये वे पितर देवता हैं और उनमें पितृत्व है॥ २०५-२०८॥ |
| यया सृष्टास्तु पितरस्तनुं तां स व्यपोहत।<br>सापविद्धा तनुस्तेन सद्यः सन्ध्या व्यजायत॥ २०९<br><br>यस्मादहर्देवतानां रात्रिर्या सासुरी स्मृता।<br>तयोर्मध्ये तु पैत्री या तनुः सा तु गरीयसी॥ २१०<br><br>तस्माद्देवासुराः सर्वे ऋषयो मानवास्तथा।<br>उपासन्ते मुदायुक्ता रात्र्यहोर्मध्यमां तनुम्॥ २११ | उन्होंने जिस कायासे पितरोंका सृजन किया था, उस कायाको त्याग दिया। उनके द्वारा त्यक्त वह काया शीघ्र ही सन्ध्या हो गयी। चूँकि दिन देवताओंका होता है और जो रात है, वह आसुरी कही गयी है; अतः उन दोनोंके मध्य जो पैत्री (पितरोंकी) काया है, वह सबसे श्रेष्ठ है। इसी कारणसे सभी देवता, असुर, ऋषि तथा मनुष्य प्रसन्नतासे युक्त होकर रात्रि तथा दिनके मध्यकी काया (सन्ध्या)-की उपासना करते हैं॥ २०९-२११॥ |
| ३२२ | श्रीलिङ्गपुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| ततो ह्यन्यां पुनर्ब्रह्मा तनुं वै समगृह्णत।<br>रजोमात्रात्मिकायां तु मनसा सोऽसृजत्प्रभुः॥ २१२<br><br>रजःप्रियांस्ततः सोऽथ मानसानसृजत्सुतान्।<br>मनस्विनस्ततस्तस्य मानवा जज्ञिरे सुताः॥ २१३<br><br>सृष्ट्वा पुनः प्रजाश्चापि स्वां तनुं तामपोहत्।<br>सापविद्धा तनुस्तेन ज्योत्स्ना सद्यस्त्वजायत॥ २१४<br><br>यस्माद्भवन्ति संहृष्टा ज्योत्स्नाया उद्भवे प्रजाः। | इसके बाद ब्रह्माने अन्य शरीर धारण किया। उन प्रभुने उस राजस तनुसे मानसिक सृजन करना आरम्भ किया। उन्होंने रजोगुणप्रिय मानस पुत्रोंका सृजन किया। तब उनके मनस्वी मानवपुत्र उत्पन्न हुए। उन सन्तानोंकी सृष्टि करके उन्होंने पुनः उस कायाका त्याग कर दिया। तब उनके द्वारा त्यक्त वह काया तुरंत ज्योत्स्ना हो गयी; इसीलिये ज्योत्स्नाका उद्भव होनेपर प्रजाएँ प्रसन्न हो जाती हैं॥ २१२–२१४१/२॥ | | इत्येतास्तनवस्तेन ह्यपविद्धा महात्मना॥ २१५<br><br>सद्यो रात्र्यहनी चैव सन्ध्या ज्योत्स्ना च जज्ञिरे।<br>ज्योत्स्ना सन्ध्या अहश्चैव सत्त्वमात्रात्मकं त्रयम्॥ २१६<br><br>तमोमात्रात्मिका रात्रिः सा वै तस्मान्निशात्मिका।<br>तस्माद्देवा दिवात्नवा तुष्ट्या सृष्टा मुखात्तु वै॥ २१७<br><br>यस्मात्तेषां दिवा जन्म बलिनस्तेन वै दिवा।<br>तन्वा ययासुरान् रात्रौ जघनादसृजत्प्रभुः॥ २१८<br><br>प्राणेभ्यो निशिजन्मानो बलिनो निशि तेन ते।<br>एतान्येव भविष्याणां देवानामसुरैः सह॥ २१९<br><br>पितॄणां मानवानां च अतीतानागतेषु वै।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु निमित्तानि भवन्ति हि॥ २२० | इस प्रकार उन महात्मा [ब्रह्मा]-ने जब इन शरीरोंका त्याग किया, तब तुरंत रात, दिन, सन्ध्या तथा ज्योत्स्ना उत्पन्न हो गये। ज्योत्स्ना, सन्ध्या तथा दिन—ये तीनों सत्त्वमात्रात्मक हैं। रात्रि तमोमात्रात्मिका है, इसलिये वह निशास्वरूपिणी है। अतः देवतालोग दिनके तनुसे सुखपूर्वक ब्रह्माके मुखसे सृजित हुए। चूँकि उनका जन्म दिनमें हुआ, इसलिये वे दिनमें बलशाली होते हैं। प्रभुने अपने शरीरके द्वारा जघनसे असुरोंको रातमें उत्पन्न किया था, अतः प्राणोंसे रातमें जन्म लेनेवाले वे [असुर] रातमें बलवान् होते हैं। ये ही समय बीते हुए तथा आगे आनेवाले समस्त मन्वन्तरोंमें होनेवाले देवताओं, असुरों, पितरों एवं मानवोंके निमित्त (कारणभूत) होते हैं॥ २१५–२२०॥ | | ज्योत्स्ना रात्र्यहनी सन्ध्या चत्वार्यम्भांसि तानि वै।<br>भान्ति यस्मात्ततोऽम्भांसि शब्दोऽयं सुमनीषिभिः॥ २२१<br><br>भातिर्दीप्तौ निगदितः पुनश्चाथ प्रजापतिः। | ज्योत्स्ना, रात्रि, दिन, सन्ध्या—ये चारों अम्भस्वरूप हैं; वे भासित होते हैं, इसलिये अम्भ हैं। विद्वानोंने 'भा' धातुको दीप्ति (प्रकाश) अर्थमें कहा है, उसीसे यह 'अम्भ' शब्द व्युत्पन्न है। उन ब्रह्माने इन | | सोऽम्भांस्येतानि सृष्ट्वा तु देवमानुषदानवान्॥ २२२<br><br>पितॄंश्चैवासृजत्तन्वा आत्मना विविधान् पुनः।<br>तामुत्सृज्य तनुं ज्योत्स्नां ततोऽन्यां प्राप्य स प्रभुः॥ २२३<br><br>मूर्तिं तमोरजःप्रायां पुनरेवाभ्यपूजयत्।<br>अन्धकारे क्षुधाविष्टांस्ततोऽन्यान् सोऽसृजत्प्रभुः॥ २२४<br><br>तेन सृष्टाः क्षुधात्मानो अम्भांस्यादातुमुद्यताः।<br>अम्भांस्येतानि रक्षाम उक्तवन्तस्तु तेषु ये॥ २२५ | अम्भोंका सृजन करके पुनः अपने शरीरसे विविध देवताओं, मनुष्यों, दानवों तथा पितरोंका सृजन किया था॥ २२१-२२२१/२॥<br><br>इसके बाद प्रभु [ब्रह्मा]-ने उस ज्योत्स्नामय शरीरका त्याग करके अन्य तमोमय तथा रजोमय शरीर धारण करके पुनः इसका पूजन किया। उन प्रभुने अन्धकारमें क्षुधापीड़ित अन्य लोगोंका सृजन किया। उनके द्वारा सृजित ये क्षुधायुक्त लोग [उन] अम्भोंको ग्रहण करनेके लिये उद्यत हुए। उनमें जिन्होंने कहा—'हम इन अम्भोंकी रक्षा करते हैं' वे राक्षस नामवाले हुए; |
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अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राक्षसा नाम ते यस्मात् क्षुधाविष्टा निशाचराः ।<br>येऽब्रुवन् यक्षमोऽम्भांसि तेषां हृष्टाः परस्परम् ॥ २२६<br><br>तेन ते कर्मणा यक्षा गुह्यका गूढकर्मणा ।<br>रक्षेति पालने चापि धातुरेष विभाव्यते ॥ २२७<br><br>एवं च यक्षतिर्धातुर्भक्षणे स निरुच्यते । | क्योंकि वे क्षुधापीड़ित तथा रात्रिमें विचरण करनेवाले थे। उनमेंसे प्रसन्न होकर जिन्होंने परस्पर यह कहा—'हम इन अम्भोका भक्षण करते हैं' वे अपने उस कर्मके कारण यक्ष तथा गूढ़ कर्मके कारण गुह्यक हुए। 'रक्ष' यह धातु पालन अर्थमें जानी जाती है और इसी प्रकार 'यक्षति' धातु भक्षण अर्थमें कही जाती है॥ २२३—२२७¹/₂ ॥ |
| तं दृष्ट्वा ह्यप्रियेणास्य केशाः शीर्णास्तु धीमतः ॥ २२८<br><br>ते शीर्णाश्चोत्थिता ह्यूर्ध्वं ते चैवारुरुधुः प्रभुम् ।<br>हीनास्तच्छिरसो बाला यस्माच्चैवावसर्पिणः ॥ २२९<br><br>व्यालात्मानः स्मृता बाला हीनत्वादहयः स्मृताः ।<br>पतत्वात्पन्नगाश्चैव सर्पाश्चैवावसर्पणात् ॥ २३०<br><br>तस्य क्रोधोद्भवो योऽसौ अग्निगर्भः सुदारुणः ।<br>स तु सर्पान् सहोत्पन्नानाविवेश विषात्मकः ॥ २३१ | उस सृष्टिको देखकर अप्रसन्नतासे युक्त उन बुद्धिमान् ब्रह्माके बाल शीर्ण हो गये। वे शीर्ण बाल [पुनः] ऊपर उठ गये और उन्होंने प्रभुको अवरुद्ध कर दिया। वे बाल सिरसे हीन हो गये थे, इसलिये [नीचेकी ओर] अपसर्पण करनेवाले हो गये; वे बाल व्यालस्वरूप कहे गये। वे हीन होनेके कारण 'अहि', गिरनेके कारण 'पन्नग' और अपसर्पण करनेके कारण 'सर्प' कहे गये हैं। उनके क्रोधसे उत्पन्न जो महाभयंकर विषमग्र अग्निगर्भ था, वह साथमें उत्पन्न हुए सर्पोंमें प्रविष्ट हो गया॥ २२८—२३१॥ |
| सर्पान् सृष्ट्वा ततः क्रुद्धः क्रोधात्मानो विनिर्ममे ।<br>वर्णेन कपिशेनोग्रास्ते भूताः पिशिताशनाः ॥ २३२<br><br>भूतत्वात्ते स्मृता भूताः पिशाचाः पिशिताशनात् ।<br>प्रसन्नं गायतस्तस्य गन्धर्वा जज्ञिरे यदा ॥ २३३<br><br>धयतीत्येष वै धातुः गानत्वे परिपठ्यते ।<br>धयन्तो जज्ञिरे वाचं गन्धर्वास्तेन ते स्मृताः ॥ २३४ | तब सर्पोंको देखकर ब्रह्माजी क्रुद्ध हुए और उन्होंने क्रोधमय स्वरूपवालोंको उत्पन्न किया। वे कपिश वर्ण, अत्यन्त उग्र तथा मांसका भक्षण करनेवाले भूत थे। वे भूतत्वके कारण 'भूत' तथा मांसभक्षण करनेके कारण 'पिशाच' कहे गये हैं। प्रसन्नतापूर्वक गान करते हुए उन ब्रह्मासे गन्धर्व उत्पन्न हुए थे। 'धयति'—यह धातु गान अर्थमें पढ़ी जाती है; वे वाणीका गान करते हुए उत्पन्न हुए, इसलिये 'गन्धर्व' कहे गये हैं॥ २३२—२३४॥ |
| अष्टस्वेतासु सृष्टासु देवयोनिषु स प्रभुः ।<br>ततः स्वच्छन्दतोऽन्यानि वयांसि वयसासृजत् ॥ २३५<br><br>स्वच्छन्दतः स्वच्छन्दांसि वयसा च वयांसि च ।<br>पशून् सृष्ट्वा स देवेशोऽसृजत्पक्षिगणानपि ॥ २३६ | इन आठ देवयोनियोंको सृजित करनेके अनन्तर उन प्रभुने स्वच्छन्दतापूर्वक अपनी आयुसे अन्य पक्षियोंका सृजन किया। पुनः उन्होंने स्वच्छन्दतापूर्वक स्वेच्छासे विचरण करनेवाले पक्षियोंका सृजन किया। इस प्रकार उन देवेशने पशुओंकी सृष्टि करके पक्षिसमुदायका भी सृजन किया था॥ २३५-२३६॥ |
| मुखतोऽजाः ससर्जाथ वक्षसश्चावयोसृजत् ।<br>गाश्चैवाथोदरद् ब्रह्मा पार्श्वाभ्यां च विनिर्ममे ॥ २३७<br><br>पद्भ्यां चाश्वान् समातङ्गान् रासभानावयान् मृगान् ।<br>उष्ट्रानश्वतरांश्चैव तथान्याश्चैव जातयः ॥ २३८ | ब्रह्माने [अपने] मुखसे बकरियोंका तथा वक्ष (छाती) से भेड़ोंका सृजन किया। उन्होंने उदरसे तथा पार्श्वभागोंसे गायोंकी रचना की। उन्होंने [अपने] पैरोंसे घोड़ों, हाथियों, गधों, आवयों, मृगों, ऊँटों और खच्चरोंका |
| ३२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ओषध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>एवं पशवोषधीः सृष्ट्वायुयुजत्सोऽध्वरे प्रभुः॥ २३९ | सृजन किया; इसी प्रकार अन्य जातियाँ भी उत्पन्न हुईं। उनके रोमोंसे फल तथा मूलवाली औषधियाँ उत्पन्न हुईं। इस प्रकार पशुओं तथा औषधियोंका सृजन करके वे प्रभु यज्ञमें लग गये॥ २३७-२३९॥ |
| गौरजः पुरुषो मेषो ह्यश्वोऽश्वतरगर्दभौ।<br>एतान् ग्राम्यान् पशूनाहुरारण्यान्वैनिबोधत॥ २४०<br><br>श्वापदो द्विखुरो हस्ती वानराः पक्षिपञ्चमाः।<br>आदकाः पशवः षष्ठाः सप्तमास्तु सरीसृपाः॥ २४१<br><br>महिषा गवयाक्षाश्च प्लवङ्गाः शरभा वृकाः।<br>सिंहस्तु सप्तमस्तेषामारण्याः पशवः स्मृताः॥ २४२ | गाय, अज, पुरुष (मनुष्य), मेष, अश्व, खच्चर तथा गधे—इन्हें ग्राम्य पशु कहा गया है। [नरमेधमें पशुत्वकी कल्पनाके कारण मनुष्यको पशुकोटिमें माना गया है] अब जंगली पशुओंको जान लीजिये। श्वापद (व्याघ्र आदि), द्विखुर (गवय आदि), हाथी, वानर, पाँचवाँ पक्षी, छठाँ आदक पशु तथा सातवाँ सरीसृप—ये जंगली पशु हैं। इनके अतिरिक्त महिष, गवय, हिरण, प्लवंग, शरभ, वृक तथा सातवाँ सिंह—ये जंगली पशु कहे गये हैं॥ २४०-२४२॥ |
| गायत्रं च ऋचं चैव त्रिवृत्साम रथन्तरम्।<br>अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात्॥ २४३<br><br>यजूंषि त्रैष्टुभं छन्दस्तोमं पञ्चदशं तथा।<br>बृहत्साम तथोक्थ्यं च दक्षिणादसृजन्मुखात्॥ २४४<br><br>सामानि जगतीच्छन्दस्तोमं सप्तदशं तथा।<br>वैरूपमतिरात्रं च पश्चिमादसृजन्मुखात्॥ २४५<br><br>एकविंशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च।<br>अनुष्टुभं सवैराजमुत्तरादसृजन्मुखात्॥ २४६<br><br>विद्युतो शनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च।<br>तेजांसि च ससर्जादौ कल्पस्य भगवान् प्रभुः॥ २४७<br><br>उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>ब्रह्मणस्तु प्रजासर्गं सृजतो हि प्रजापतेः॥ २४८ | ब्रह्माने [अपने] प्रथम (पूर्व) मुखसे गायत्री छन्द, ऋग्वेद, [गीयमान] त्रिवृत् साम, रथन्तर साम तथा यज्ञोंमें मुख्य अग्निष्टोमकी रचना की। उन्होंने दक्षिण मुखसे यजुर्वेद, त्रिष्टुप् छन्द, पंचदशावृत्त साम, बृहत्साम तथा उक्थ्यकी रचना की। उन्होंने पश्चिम मुखसे साम, जगतीछन्द, सप्तदशावृत्त स्तोम, वैरूपसाम तथा अतिरात्रयज्ञकी रचना की। उन्होंने उत्तर मुखसे इक्कीस अथर्व प्रार्थना-मन्त्रों, आप्तोर्यामाण, अनुष्टुप् छन्द तथा वैराज छन्दकी रचना की। भगवान् ब्रह्माने कल्पके प्रारम्भमें विद्युत्, वज्र, मेघों, रोहित वर्णवाले इन्द्रधनुषों तथा तेजोंकी रचना की। प्रजाओंकी सृष्टि करते हुए उन प्रजापति ब्रह्माके अंगोंसे उच्च तथा निम्न भूत (प्राणी) उत्पन्न हुए॥ २४३-२४८॥ |
| सृष्ट्वा चतुष्टयं पूर्वं देवासुरनरान् पितॄन्।<br>ततोऽसृजत भूतानि स्थावराणि चराणि च॥ २४९<br><br>यक्षान् पिशाचान् गन्धर्वांस्त्वथैवाप्सरसां गणान्।<br>नरकिन्नररक्षांसि वयःपशुमृगोरगान्॥ २५०<br><br>अव्ययं च व्ययं चापि यदिदं स्थाणुजङ्गमम्।<br>तेषां वै यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे॥ २५१<br><br>तान्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः।<br>हिंस्त्राहिंस्त्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मे नृतानृते॥ २५२ | पहले देवता, असुर, मनुष्य तथा पितर—इन चारोंकी सृष्टि करके उन्होंने स्थावर तथा जंगम भूतोंका सृजन किया; उन्होंने यक्षों, पिशाचों, गन्धर्वों, अप्सरागणों, मनुष्यों, किन्नरों, राक्षसों, पक्षियों, पशुओं, मृगों और सर्पों तथा अव्यय एवं व्यय; जो भी स्थावर-जंगम हैं—उन सबका सृजन किया। पूर्व सृष्टिमें उनके जो कर्म थे, बार-बार सृजित किये जाते हुए वे प्राणी उन्हीं कर्मोंको प्राप्त करते हैं। वे अपने लिये अनुकूल हिंसा-अहिंसा, मृदुता-क्रूरता, धर्म-अधर्म तथा मिथ्या-सत्यमें |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३२५
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते।<br>महाभूतेषु सृष्टेषु इन्द्रियार्थेषु मूर्तिषु॥ २५३<br><br>विनियोगं च भूतानां धातैव व्यदधात्स्वयम्। | प्रवृत्त होते हैं; इसीलिये वे उनमें आनन्दका अनुभव करते हैं। महाभूतों, इन्द्रिय-विषयों तथा उनके स्वरूपोंकी सृष्टि हो जानेपर स्रष्टाने स्वयं उन भूतोंका विनियोग किया॥ २४९—२५३ १/२॥ |
| केचित्पुरुषकारं तु प्राहुः कर्म सुमानवाः॥ २५४<br><br>दैवमित्यपरे विप्राः स्वभावं भूतचिन्तकाः।<br>पौरुषं कर्म दैवं च फलवृत्तिस्वभावतः॥ २५५<br><br>न चैकं न पृथग्भावमधिकं न ततो विदुः।<br>एतदेवं च नैकं च नामभेदेन नाप्युभे॥ २५६<br><br>कर्मस्था विषमं ब्रूयुः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः। | कुछ लोग होनेवाली घटनाओंका कारण पुरुषार्थको बताते हैं तथा कुछ श्रेष्ठ मनुष्य कर्मको उसका कारण बताते हैं। हे विप्रो! अन्य लोग दैव (भाग्य)-को और कुछ तत्त्वचिन्तक स्वभावको उसका कारण बताते हैं। इस प्रकार पुरुषार्थ, कर्म, दैव तथा स्वभावको कारण माना गया है। कर्ममार्गका अनुसरण करनेवाले जीव जगत्की विषमताके प्रति पूर्वोक्त चार कारणोंमेंसे किसी एकको कारण न मानकर उनके समुच्चयको कारण मानते हैं; क्योंकि वे इन चारोंसे भी परे सकलनियन्ता महेश्वरको नहीं जानते हैं। सत्त्वगुणमें स्थित समदर्शी लोग जगत्के मायामय होनेके कारण पूर्वोक्त कारणचतुष्टयोंमेंसे नामभेदके रूपमें न तो किसी एकको और न किन्हीं दोको कारण मानते हैं॥ २५४—२५६ १/२॥ |
| नाम रूपं च भूतानां कृतानां च प्रपञ्चनम्॥ २५७<br><br>वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः।<br>ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु वृत्तयः॥ २५८<br><br>शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः।<br>एवंविधाः सृष्टयस्तु ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ २५९<br><br>शर्वर्यन्ते प्रदृश्यन्ते सिद्धिमाश्रित्य मानसीम्।<br>एवंभूतानि सृष्टानि स्थावराणि चराणि च॥ २६० | उन [ब्रह्मरूपी] महेश्वरने पूर्वकल्पके भूतोंके नाम, रूप तथा प्रपंचको सर्गके आदिमें वेदके शब्दोंसे ही निर्मित किया। ब्रह्माजी रात्रिके अन्तमें (प्रलय समाप्त होनेपर) उत्पन्न ऋषियोंके नाम एवं उनकी जो वृत्तियाँ वेदोंमें हैं, उन सबको उन्हें प्रदान करते हैं। अव्यक्तसे जन्म लेनेवाले ब्रह्माकी इस प्रकारकी सृष्टियाँ होती हैं। [ब्रह्माकी] रात्रिके अन्तमें मानसी सिद्धिका आश्रय लेकर सृजित किये गये इस प्रकारके स्थावर-जंगम प्राणी दिखायी देते हैं॥ २५७—२६०॥ |
| यदास्य ताः प्रजाः सृष्टा न व्यवर्धन्त सत्तमाः।<br>तमोमात्रावृतो ब्रह्मा तदा शोकेन दुःखितः॥ २६१<br><br>ततः स विदधे बुद्धिमर्थनिश्चयगामिनीम्।<br>अथात्मनि समद्राक्षीत्तमोमात्रां नियामिकाम्॥ २६२<br><br>रजः सत्त्वं परित्यज्य वर्तमानां स्वधर्मतः।<br>ततः स तेन दुःखेन दुःखं चक्रे जगत्पतिः॥ २६३ | हे सत्तमो! जब उनकी वे सृजित प्रजाएँ वृद्धिको प्राप्त नहीं हुईं; तब तमोमात्रासे आवृत ब्रह्मा शोकसे दुःखित हो उठे। इसके बाद उन्होंने अर्थका निश्चय करनेवाली बुद्धिको धारण किया और सत्त्व तथा रजोगुणोंका परित्याग करके अपने धर्मसे वर्तमान नियामिका तमोमात्राको अपने अन्दर देखा। तब वे जगत्पति उस दुःखसे बहुत दुःखित हुए॥ २६१—२६३॥ |
| तमश्च व्यनुदत्पश्चाद्रजः सत्त्वं तमावृणोत्।<br>तत्तमः प्रतिनुन्नं वै मिथुनं समजायत॥ २६४ | तदनन्तर उन्होंने तमोगुणको प्रेरित किया; उस तमने रज तथा सत्त्वको आवृत्त किया। इस प्रकार प्रेरित |