श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३१८ | श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निवृत्तं वर्तमानं च तेषां जानन्ति वै पुनः ।<br>भूतादिकानां भूतानां सप्तमः सर्ग एव च ॥ १६०<br><br>तेऽपरिग्राहिणः सर्वे संविभागरताः पुनः ।<br>स्वादनाश्र्चाप्यशीलाश्च ज्ञेया भूतादिकाश्च ते ॥ १६१<br><br>विपर्ययेण भूतादिरशक्त्या च व्यवस्थितः ।<br>प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणः स्मृतः ॥ १६२ | मनु आदिका सर्ग भूतोंका छठा सर्ग कहा जाता है। उन उत्पद्यमान भूतोंके प्राक्कर्म, वर्तमान तथा भविष्यको वे भूतादिक निश्चित रूपसे जानते हैं। भूतादिक भूतों (मनुष्यों)-का सातवाँ सर्ग है। [पूर्वोक्त] उन सभी भूतादिकोंको निःस्पृह, दानशील, कर्मफलका आस्वादन करनेवाला तथा अशील जानना चाहिये। भूतादि (अहंकार) अज्ञानसे तथा विष्णुमायासे व्यवस्थित होता है॥ १५९-१६१ १/२ ॥ |
| तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गः स उच्यते ।<br>वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः ॥ १६३<br><br>इत्येष प्राकृतः सर्गः सम्भूतो बुद्धिपूर्वकः ।<br>मुख्यसर्गश्चतुर्थश्च मुख्या वै स्थावराः स्मृताः ॥ १६४<br><br>ततोऽर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः ।<br>अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्त्विकस्तामसश्च सः ॥ १६५<br><br>पञ्चैते वैकृताः सर्गाः प्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः ।<br>प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः ॥ १६६<br><br>अबुद्धिपूर्वकाः सर्गाः प्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः ।<br>बुद्धिपूर्वं प्रवर्तन्ते षट् पुनर्ब्रह्मणस्तु ते ॥ १६७ | महत्से होनेवाले सर्गको ब्रह्माका प्रथम सर्ग कहा गया है। तन्मात्राओंका जो दूसरा सर्ग है, वह भूतसर्ग कहा जाता है। वैकारिक तीसरा सर्ग ऐन्द्रियसर्ग कहा गया है। यह सब प्राकृत सर्ग है, जो बुद्धिपूर्वक हुआ है। चौथा मुख्य सर्ग है; सभी स्थावर मुख्य कहे गये हैं। इसके बाद [तिर्यक्स्रोत, ऊर्ध्वस्रोत तथा अर्वाक्स्रोतके क्रमसे] अर्वाक्-स्रोतोंका सर्ग है; उनमें सातवाँ जो अर्वाक्स्रोतोंका सर्ग है, वह मानुषसर्ग है। आठवाँ अनुग्रहसर्ग है; वह सात्त्विक, तामस तथा राजस भेदोंवाला होता है [सात्त्विकको देवताओंमें, तामसको पशुओंमें तथा राजसको मनुष्योंमें जानना चाहिये]। इस प्रकार ये पाँच वैकृत सर्ग तथा तीन प्राकृत सर्ग कहे गये हैं। [सनक आदिका] जो नौवाँ सर्ग है, वह प्राकृत तथा वैकृत [दोनों रूपोंवाला] कहा गया है। ब्रह्माके जो तीन प्राकृतसर्ग कहे गये हैं, वे अबुद्धिपूर्वक प्रवर्तित हुए हैं और जो [शेष] छः सर्ग हैं, वे बुद्धिपूर्वक प्रवर्तित हुए हैं॥ १६२-१६७॥ |
| विस्तारनुग्रहः सर्गः कीर्त्यमानो निबोधत ।<br>चतुर्धावस्थितः सोऽथ सर्वभूतेषु कृत्स्नशः ॥ १६८<br><br>इत्येते प्राकृताश्चैव वैकृताश्च नव स्मृताः ।<br>परस्परानुरक्ताश्च कारणैश्च बुधैः स्मृताः ॥ १६९ | [हे ऋषियो!] अब मैं विस्तृत अनुग्रहसर्गका वर्णन कर रहा हूँ; आपलोग उसे जान लें। वह सभी भूतोंमें पूर्णरूपसे चार प्रकारसे अवस्थित है। ये जो प्राकृत तथा वैकृत [कुल] नौ सर्ग कहे गये हैं, उन्हें विद्वानोंने कारणोंके द्वारा एक-दूसरेसे अनुरक्त (सम्बद्ध) बताया है॥ १६८-१६९॥ |
| अग्रे ससर्ज वै ब्रह्मा मानसानात्मनः समान् ।<br>ऋभुः सनत्कुमारश्च द्वावेतावूर्ध्वरेतसौ ॥ १७०<br><br>पूर्वोत्पन्नौ पुरा तेभ्यः सर्वेषामपि पूर्वजौ ।<br>व्यतीते त्वष्टमे कल्पे पुराणौ लोकसाक्षिणौ ॥ १७१ | आरम्भमें ब्रह्माजीने अपने ही सदृश मानस पुत्रोंका सृजन किया। उनमेंसे सबसे पहले उत्पन्न तथा सभीके पूर्वज ऋभु तथा सनत्कुमार—ये दोनों ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी) थे। आठवाँ कल्प व्यतीत होनेपर प्राचीन एवं लोकसाक्षी |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप...सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१९
| तौ वाराहे तु भूर्लोके तेजः सङ्क्षिप्य धिष्ठितौ।<br>तावुभौ मोक्षकर्मणावारोग्यात्मानमात्मनि॥ १७२<br><br>प्रजां धर्मं च कामं च त्यक्त्वा वैराग्यमास्थितौ।<br>यथोत्पन्नस्तथैवेह कुमारः स इहोच्यते॥ १७३<br><br>तस्मात्सनत्कुमारोति नामास्येह प्रकीर्तितम्।<br>सनन्दं सनकं चैव विद्वांसं च सनातनम्॥ १७४<br><br>विज्ञानेन निवृत्तास्ते व्यवर्तन्त महौजसः।<br>सम्बुद्धाश्चैव नानात्वे अप्रवृत्ताश्च योगिनः॥ १७५<br><br>असृष्ट्वैव प्रजासर्गं प्रतिसर्गं गताः पुनः।<br>ततस्तेषु व्यतीतेषु ततोऽन्यान् साधकान् सुतान्॥ १७६ | वे दोनों वाराहकल्पमें [अपने] तेजको संक्षिप्त करके पृथ्वीलोकमें अधिष्ठित हुए। मोक्षके लिये कर्मपरायण वे दोनों [मानसपुत्र] आत्माको अपनेमें स्थिर करके प्रजा, धर्म तथा कामका त्याग करके वैराग्यमें स्थित हो गये। सनत्कुमार जिस रूपमें उत्पन्न हुए थे, वैसे ही कुमार-रूपमें विद्यमान कहे जाते हैं, इसलिये इनका नाम 'सनत्कुमार' प्रसिद्ध हुआ। इसी प्रकार ब्रह्माने [जिन] सनन्द, सनक तथा विद्वान् सनातनको उत्पन्न किया था, वे विशेष ज्ञानके द्वारा सांसारिकतासे निवृत्त रहे। महान् ओजवाले वे सब अविद्यापरिकल्पित भेदके प्रति सम्बुद्ध होकर अर्थात् उसे मिथ्या समझकर प्रवृत्तिसे रहित योगी हुए। प्रजाओंकी सृष्टि किये बिना ही वे मोक्षको प्राप्त हुए॥ १७०-१७५ १/२॥ | | मानसानसृजद् ब्रह्मा पुनः स्थानाभिमानिनः।<br>आभूतसम्प्लवावस्था यैरियं विधृता मही॥ १७७<br><br>आपोऽग्निं पृथिवीं वायुमन्तरिक्षं दिवं तथा।<br>समुद्रांश्च नदीश्चैव तथा शैलवनस्पतीन्॥ १७८<br><br>ओषधीनां तथात्मानो वल्लीनां वृक्षवीरुधाम्।<br>लताः काष्ठाः कलाश्चैव मुहूर्ताः सन्धिररात्र्यहान्॥ १७९<br><br>अर्धमासांश्च मासांश्च अयनाब्दयुगानि च।<br>स्थानाभिमानिनः सर्वे स्थानाख्याश्चैव ते स्मृताः॥ १८० | उन सबके मोक्षको प्राप्त हो जानेपर ब्रह्माने अपने स्थानके अभिमानी तथा कार्यक्षम अन्य मानस पुत्रोंका सृजन किया, जिन्होंने प्रलयपर्यन्त इस पृथ्वीको धारण किया। इसके बाद ब्रह्माने जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, समुद्रों, नदियों, पर्वतों, वनस्पतियों, औषधियों, वल्लियों, वृक्षों, झाड़ियों, लताओं, काष्ठाओं, कलाओं, मुहूर्तों, सन्धियों, रात्रि, दिन, पक्षों, मासों, अयनों, वर्षों तथा युगोंका सृजन किया। अपने स्थानोंके अभिमानी वे सब अपने स्थानोंके नामवाले कहे गये हैं॥ १७६-१८०॥ | | देवानृषींश्च महतो गदतस्तान्निबोधत।<br>मरीचिभृग्वङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्॥ १८१<br><br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजन्मानसान्नव।<br>नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥ १८२<br><br>तेषां ब्रह्मात्मकानां वै सर्वेषां ब्रह्मवादिनाम्।<br>स्थानानि कल्पयामास पूर्ववत्पद्मसम्भवः॥ १८३<br><br>ततोऽसृजच्च सङ्कल्पं धर्मञ्चैव सुखावहम्।<br>सोऽसृजद्व्यवसायात्तु धर्मं देवो महेश्वरः॥ १८४<br><br>सङ्कल्पञ्चैव सङ्कल्पात्सर्वलोकपितामहः।<br>मानसश्च रुचिर्नाम विजज्ञे ब्रह्मणः प्रभोः॥ १८५ | अब मैं महान् देवताओं तथा ऋषियोंके विषयमें बता रहा हूँ; आपलोग उन्हें जान लें। उन [ब्रह्मा]-ने मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ—इन नौ मानस पुत्रोंका भी सृजन किया। ये लोग पुराणमें नौ ब्रह्माके रूपमें निर्धारित किये गये हैं। ब्रह्माने पूर्वकी भाँति ब्रह्माके स्वरूपवाले तथा ब्रह्मवादी उन सभीके लिये स्थानोंको कल्पित किया। इसके बाद उन्होंने सुख देनेवाले धर्म एवं संकल्पका भी सृजन किया। सभी लोकोंके पितामह देव महेश्वरने व्यवसायसे धर्मका तथा संकल्पके द्वारा संकल्पका सृजन किया। प्रभु ब्रह्माके मनसे [प्रजापति] रुचि नामक मानसपुत्र भी उत्पन्न हुआ॥ १८१-१८५॥ |
| ३२० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्राणाद् ब्रह्मासृजद्दक्षं चक्षुर्भ्यां च मरीचिनम्।<br>भृगुस्तु हृदयाज्जज्ञे ऋषिः सलिलजन्मनः॥ १८६<br><br>शिरसोऽङ्गिरसश्चैव श्रोत्रादत्रिं तथासृजत्।<br>पुलस्त्यं च तथोदानाद्व्यानाच्च पुलहं पुनः॥ १८७<br><br>समानजो वसिष्ठश्च अपानान्निर्ममे क्रतुम्।<br>इत्येते ब्रह्मणः पुत्रा दिव्या एकादश स्मृताः॥ १८८ | ब्रह्माजीने [अपने] प्राणसे दक्षका तथा दोनों नेत्रोंसे मरीचिका सृजन किया। ऋषि भृगु जलमें जन्म लेनेवाले ब्रह्माके हृदयसे उत्पन्न हुए। उन्होंने सिरसे अंगिराको, कानसे अत्रिको, उदानवायुसे पुलस्त्यको तथा व्यानवायुसे पुलहको उत्पन्न किया। वसिष्ठ उनके समानवायुसे उत्पन्न हुए। उन्होंने अपानवायुसे क्रतुका सृजन किया। ये [संकल्प, धर्म, मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठ] ब्रह्माके ग्यारह दिव्य पुत्र कहे गये हैं॥ १८६-१८८॥ |
| धर्मादयः प्रथमजाः सर्वे ते ब्रह्मणः सुताः।<br>भृग्वादयस्तु ते सृष्टा नवैते ब्रह्मवादिनः॥ १८९<br><br>गृहमेधिनः पुराणास्ते धर्मस्तैः सम्प्रवर्तितः।<br>तेषां द्वादश ते वंशा दिव्या देवगुणान्विताः॥ १९० | प्रथम उत्पन्न धर्म आदि ब्रह्माजीके पुत्र हैं, जो भृगु आदि नौ [मानस पुत्र] सृजित किये गये, वे ब्रह्मवादी हुए। वे प्राचीन गृहस्थ थे और उन्हींके द्वारा धर्म प्रवर्तित हुआ। उनके दिव्य, देवगुणसम्पन्न, क्रियावान्, सन्तानवाले तथा महर्षियोंसे अलंकृत बारह वंश हुए॥ १८९-१९० १/२॥ |
| क्रियावन्तः प्रजावन्तो महर्षिभिरलङ्कृताः।<br>ऋभुः सनत्कुमारश्च द्वावेतावूर्ध्वरेतसौ॥ १९१<br><br>पूर्वोत्पन्नौ परं तेभ्यः सर्वेषामपि पूर्वजौ।<br>व्यतीते त्वष्टमे कल्पे पुराणौ लोकसाक्षिणौ॥ १९२<br><br>विराजेतामुभौ लोके तेजः सङ्क्षिप्य धिष्ठितौ।<br>तावुभौ योगकर्माणौवारोप्यात्मानमात्मनि॥ १९३<br><br>प्रजां धर्मं च कामञ्च त्यक्त्वा वैराग्यमास्थितौ।<br>यथोत्पन्नः स एवेह कुमारः स इहोच्यते॥ १९४ | ऋभु तथा सनत्कुमार—ये दोनों ब्रह्मचारी थे; ये उनसे पहले उत्पन्न हुए थे और सभीके पूर्वज थे। आठवें कल्पके व्यतीत होनेपर प्राचीन तथा लोकोंके साक्षी वे दोनों [अपने] तेजको संक्षिप्त करके लोकमें प्रतिष्ठित होकर विराजमान हुए। योगकर्मपरायण वे दोनों आत्माको अपनेमें आरोपित करके प्रजा, धर्म तथा कामका त्याग करके वैराग्यमें स्थित हो गये। वे सन्त् जिस रूपमें उत्पन्न हुए थे, वैसे ही सदा रहनेके कारण इस लोकमें 'कुमार' कहे जाते हैं और इसीलिये उनका 'सनत्कुमार'—यह नाम प्रसिद्ध हो गया॥ १९१-१९४ १/२॥ |
| तस्मात्सनत्कुमारेति नामास्येह प्रतिष्ठितम्।<br>ततोऽभिध्याय तस्तस्य जज्ञिरे मानसाः प्रजाः॥ १९५<br><br>तच्छरीरसमुत्पन्नैः कार्यैस्तैः कारणैः सह।<br>क्षेत्रज्ञाः समवर्तन्त गात्रेभ्यस्तस्य धीमतः॥ १९६<br><br>ततो देवासुरपितॄन् मानुषांश्च चतुष्टयम्।<br>सिसृक्षुरम्भांस्येतानि स्वमात्मानमयूयुजत्॥ १९७<br><br>ततस्तु युञ्जतस्तस्य तमोमात्रसमुद्भवम्।<br>समभिध्यायतः सर्गं प्रयत्नेन प्रजापतेः॥ १९८<br><br>ततोऽस्य जघनात्पूर्वमसुरा जज्ञिरे सुताः।<br>असुः प्राणः स्मृतो विप्रास्तज्जन्मानस्ततोऽसुराः॥ १९९ | इसके बाद ध्यान करते हुए उन ब्रह्माकी मानस प्रजाएँ (सन्तानें) उत्पन्न हुईं। पुनः उनके शरीरसे उत्पन्न उन कार्यों तथा कारणोंके साथ बुद्धिमान् ब्रह्माके अंगोंसे क्षेत्रज्ञ उत्पन्न हुए। इसके बाद देवता, असुर, पितर, मनुष्य—इन चार अम्भोंकी सृष्टि करनेकी इच्छावाले ब्रह्माने अपने मनको विचारयुक्त किया। तदनन्तर मनको विचारयुक्त करते हुए तथा प्रयत्नपूर्वक तमोमात्रसे उत्पन्न होनेवाले सर्गका चिन्तन करते हुए उन प्रजापतिकी जंघासे सर्वप्रथम असुरपुत्र उत्पन्न हुए। |
अध्याय ७० ] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... 'सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव <span style="float: right;">३२१</span>
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| यया सृष्टासुराः सर्वे तां तनुं स व्यपोहत।<br>सापविद्धा तनुस्तेन सद्यो रात्रिरजायत॥ २००<br><br>सा तमोबहुला यस्मात्ततो रात्रिर्नियामिका।<br>आवृतास्तमसा रात्रौ प्रजास्तस्मात्स्वपन्त्युत॥ २०१ | हे विप्रो! 'असुः' को प्राण कहा गया है; इसलिये उससे जन्म लेनेके कारण वे असुर हुए। जिस शरीरसे उन्होंने सभी असुरोंको उत्पन्न किया था, उस शरीरको छोड़ दिया। तब उनके द्वारा त्यक्त वह शरीर तत्काल रात्रि हो गयी। वह रात्रि अन्धकारकी अधिकतासे युक्त होती है, अतः वह नियामिका (सबको शयन करानेवाली) है। प्रजाएँ रातमें अन्धकारसे आवृत हो जाती हैं, इसलिये वे सोती हैं॥ १९५-२०१॥ |
| सृष्ट्वासुरांस्ततः सो वै तनुमन्यामगृह्णत।<br>अव्यक्तां सत्त्वबहुलां ततस्तां सोऽभ्यपूजयत्॥ २०२<br><br>ततस्तां युञ्जतस्तस्य प्रियमासीत्प्रजापतेः।<br>ततो मुखात्समुत्पन्ना दीव्यतस्तस्य देवताः॥ २०३<br><br>यतोऽस्य दीव्यतो जातास्तेन देवाः प्रकीर्तिताः।<br>धातुर्दिविति यः प्रोक्तः क्रीडायां स विभाव्यते॥ २०४ | तत्पश्चात् असुरोंका सृजन करके उन्होंने अन्य अव्यक्त तथा सत्त्वबहुल शरीर धारण किया; इसलिये उन्होंने उसकी पूजा की। तब उस शरीरको धारण करनेवाले उन ब्रह्माको प्रसन्नता हुई। इसके बाद क्रीड़ा करते हुए ब्रह्माके मुखसे देवता उत्पन्न हुए। चूँकि क्रीड़ा करते हुए इन ब्रह्मासे वे उत्पन्न हुए, इसलिये वे देवता कहे गये हैं। जो 'दिव्' धातु कही गयी है, वह क्रीड़ाके अर्थमें जानी जाती है। उन ब्रह्मासे वे क्रीड़ा करते हुए उत्पन्न हुए, इसलिये देवता कहे जाते हैं॥ २०२-२०४ १/२॥ |
| यस्मात्तस्य तु दीव्यन्तो जज्ञिरे तेन देवताः।<br>देवान् सृष्ट्वाथ देवेशस्तनुमन्यामपद्यत॥ २०५<br><br>उत्सृष्टा सा तनुस्तेन सद्योऽहः समजायत।<br>तस्मादहो धर्मयुक्तं देवताः समुपासते॥ २०६<br><br>सत्त्वमात्रात्मिकामेव ततोऽन्यां सोऽभ्यमन्यत।<br>पितृत्वन्मन्यमानस्य पुत्रांस्तान् ध्यायतः प्रभोः॥ २०७<br><br>पितरो ह्युपपक्षाभ्यां रात्र्यहोरन्तरेऽभवन्।<br>तस्मात्ते पितरो देवाः पितृत्वं तेन तेषु तत्॥ २०८ | देवताओंका सृजन करके देवेशने अन्य शरीर धारण किया और उनके द्वारा छोड़ा गया वह [पहलेवाला] शरीर शीघ्र ही दिन बन गया। इसलिये देवतालोग धर्मयुक्त दिनकी उपासना करते हैं। उन्होंने सत्त्वगुणमय उस अन्य शरीरकी भी पूजा की। पिताके समान मानते हुए तथा उन [उत्पद्यमान] पुत्रोंका ध्यान करते हुए प्रभु (ब्रह्मा)-के [दाहिने-बाएँ] दोनों पार्श्वभागसे दिन तथा रातके बीच पितर उत्पन्न हुए, इसलिये वे पितर देवता हैं और उनमें पितृत्व है॥ २०५-२०८॥ |
| यया सृष्टास्तु पितरस्तनुं तां स व्यपोहत।<br>सापविद्धा तनुस्तेन सद्यः सन्ध्या व्यजायत॥ २०९<br><br>यस्मादहर्देवतानां रात्रिर्या सासुरी स्मृता।<br>तयोर्मध्ये तु पैत्री या तनुः सा तु गरीयसी॥ २१०<br><br>तस्माद्देवासुराः सर्वे ऋषयो मानवास्तथा।<br>उपासन्ते मुदायुक्ता रात्र्यहोर्मध्यमां तनुम्॥ २११ | उन्होंने जिस कायासे पितरोंका सृजन किया था, उस कायाको त्याग दिया। उनके द्वारा त्यक्त वह काया शीघ्र ही सन्ध्या हो गयी। चूँकि दिन देवताओंका होता है और जो रात है, वह आसुरी कही गयी है; अतः उन दोनोंके मध्य जो पैत्री (पितरोंकी) काया है, वह सबसे श्रेष्ठ है। इसी कारणसे सभी देवता, असुर, ऋषि तथा मनुष्य प्रसन्नतासे युक्त होकर रात्रि तथा दिनके मध्यकी काया (सन्ध्या)-की उपासना करते हैं॥ २०९-२११॥ |
| ३२२ | श्रीलिङ्गपुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| ततो ह्यन्यां पुनर्ब्रह्मा तनुं वै समगृह्णत।<br>रजोमात्रात्मिकायां तु मनसा सोऽसृजत्प्रभुः॥ २१२<br><br>रजःप्रियांस्ततः सोऽथ मानसानसृजत्सुतान्।<br>मनस्विनस्ततस्तस्य मानवा जज्ञिरे सुताः॥ २१३<br><br>सृष्ट्वा पुनः प्रजाश्चापि स्वां तनुं तामपोहत्।<br>सापविद्धा तनुस्तेन ज्योत्स्ना सद्यस्त्वजायत॥ २१४<br><br>यस्माद्भवन्ति संहृष्टा ज्योत्स्नाया उद्भवे प्रजाः। | इसके बाद ब्रह्माने अन्य शरीर धारण किया। उन प्रभुने उस राजस तनुसे मानसिक सृजन करना आरम्भ किया। उन्होंने रजोगुणप्रिय मानस पुत्रोंका सृजन किया। तब उनके मनस्वी मानवपुत्र उत्पन्न हुए। उन सन्तानोंकी सृष्टि करके उन्होंने पुनः उस कायाका त्याग कर दिया। तब उनके द्वारा त्यक्त वह काया तुरंत ज्योत्स्ना हो गयी; इसीलिये ज्योत्स्नाका उद्भव होनेपर प्रजाएँ प्रसन्न हो जाती हैं॥ २१२–२१४१/२॥ | | इत्येतास्तनवस्तेन ह्यपविद्धा महात्मना॥ २१५<br><br>सद्यो रात्र्यहनी चैव सन्ध्या ज्योत्स्ना च जज्ञिरे।<br>ज्योत्स्ना सन्ध्या अहश्चैव सत्त्वमात्रात्मकं त्रयम्॥ २१६<br><br>तमोमात्रात्मिका रात्रिः सा वै तस्मान्निशात्मिका।<br>तस्माद्देवा दिवात्नवा तुष्ट्या सृष्टा मुखात्तु वै॥ २१७<br><br>यस्मात्तेषां दिवा जन्म बलिनस्तेन वै दिवा।<br>तन्वा ययासुरान् रात्रौ जघनादसृजत्प्रभुः॥ २१८<br><br>प्राणेभ्यो निशिजन्मानो बलिनो निशि तेन ते।<br>एतान्येव भविष्याणां देवानामसुरैः सह॥ २१९<br><br>पितॄणां मानवानां च अतीतानागतेषु वै।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु निमित्तानि भवन्ति हि॥ २२० | इस प्रकार उन महात्मा [ब्रह्मा]-ने जब इन शरीरोंका त्याग किया, तब तुरंत रात, दिन, सन्ध्या तथा ज्योत्स्ना उत्पन्न हो गये। ज्योत्स्ना, सन्ध्या तथा दिन—ये तीनों सत्त्वमात्रात्मक हैं। रात्रि तमोमात्रात्मिका है, इसलिये वह निशास्वरूपिणी है। अतः देवतालोग दिनके तनुसे सुखपूर्वक ब्रह्माके मुखसे सृजित हुए। चूँकि उनका जन्म दिनमें हुआ, इसलिये वे दिनमें बलशाली होते हैं। प्रभुने अपने शरीरके द्वारा जघनसे असुरोंको रातमें उत्पन्न किया था, अतः प्राणोंसे रातमें जन्म लेनेवाले वे [असुर] रातमें बलवान् होते हैं। ये ही समय बीते हुए तथा आगे आनेवाले समस्त मन्वन्तरोंमें होनेवाले देवताओं, असुरों, पितरों एवं मानवोंके निमित्त (कारणभूत) होते हैं॥ २१५–२२०॥ | | ज्योत्स्ना रात्र्यहनी सन्ध्या चत्वार्यम्भांसि तानि वै।<br>भान्ति यस्मात्ततोऽम्भांसि शब्दोऽयं सुमनीषिभिः॥ २२१<br><br>भातिर्दीप्तौ निगदितः पुनश्चाथ प्रजापतिः। | ज्योत्स्ना, रात्रि, दिन, सन्ध्या—ये चारों अम्भस्वरूप हैं; वे भासित होते हैं, इसलिये अम्भ हैं। विद्वानोंने 'भा' धातुको दीप्ति (प्रकाश) अर्थमें कहा है, उसीसे यह 'अम्भ' शब्द व्युत्पन्न है। उन ब्रह्माने इन | | सोऽम्भांस्येतानि सृष्ट्वा तु देवमानुषदानवान्॥ २२२<br><br>पितॄंश्चैवासृजत्तन्वा आत्मना विविधान् पुनः।<br>तामुत्सृज्य तनुं ज्योत्स्नां ततोऽन्यां प्राप्य स प्रभुः॥ २२३<br><br>मूर्तिं तमोरजःप्रायां पुनरेवाभ्यपूजयत्।<br>अन्धकारे क्षुधाविष्टांस्ततोऽन्यान् सोऽसृजत्प्रभुः॥ २२४<br><br>तेन सृष्टाः क्षुधात्मानो अम्भांस्यादातुमुद्यताः।<br>अम्भांस्येतानि रक्षाम उक्तवन्तस्तु तेषु ये॥ २२५ | अम्भोंका सृजन करके पुनः अपने शरीरसे विविध देवताओं, मनुष्यों, दानवों तथा पितरोंका सृजन किया था॥ २२१-२२२१/२॥<br><br>इसके बाद प्रभु [ब्रह्मा]-ने उस ज्योत्स्नामय शरीरका त्याग करके अन्य तमोमय तथा रजोमय शरीर धारण करके पुनः इसका पूजन किया। उन प्रभुने अन्धकारमें क्षुधापीड़ित अन्य लोगोंका सृजन किया। उनके द्वारा सृजित ये क्षुधायुक्त लोग [उन] अम्भोंको ग्रहण करनेके लिये उद्यत हुए। उनमें जिन्होंने कहा—'हम इन अम्भोंकी रक्षा करते हैं' वे राक्षस नामवाले हुए; |
1985 Lingamahapuran_Section_12_1_Back
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राक्षसा नाम ते यस्मात् क्षुधाविष्टा निशाचराः ।<br>येऽब्रुवन् यक्षमोऽम्भांसि तेषां हृष्टाः परस्परम् ॥ २२६<br><br>तेन ते कर्मणा यक्षा गुह्यका गूढकर्मणा ।<br>रक्षेति पालने चापि धातुरेष विभाव्यते ॥ २२७<br><br>एवं च यक्षतिर्धातुर्भक्षणे स निरुच्यते । | क्योंकि वे क्षुधापीड़ित तथा रात्रिमें विचरण करनेवाले थे। उनमेंसे प्रसन्न होकर जिन्होंने परस्पर यह कहा—'हम इन अम्भोका भक्षण करते हैं' वे अपने उस कर्मके कारण यक्ष तथा गूढ़ कर्मके कारण गुह्यक हुए। 'रक्ष' यह धातु पालन अर्थमें जानी जाती है और इसी प्रकार 'यक्षति' धातु भक्षण अर्थमें कही जाती है॥ २२३—२२७¹/₂ ॥ |
| तं दृष्ट्वा ह्यप्रियेणास्य केशाः शीर्णास्तु धीमतः ॥ २२८<br><br>ते शीर्णाश्चोत्थिता ह्यूर्ध्वं ते चैवारुरुधुः प्रभुम् ।<br>हीनास्तच्छिरसो बाला यस्माच्चैवावसर्पिणः ॥ २२९<br><br>व्यालात्मानः स्मृता बाला हीनत्वादहयः स्मृताः ।<br>पतत्वात्पन्नगाश्चैव सर्पाश्चैवावसर्पणात् ॥ २३०<br><br>तस्य क्रोधोद्भवो योऽसौ अग्निगर्भः सुदारुणः ।<br>स तु सर्पान् सहोत्पन्नानाविवेश विषात्मकः ॥ २३१ | उस सृष्टिको देखकर अप्रसन्नतासे युक्त उन बुद्धिमान् ब्रह्माके बाल शीर्ण हो गये। वे शीर्ण बाल [पुनः] ऊपर उठ गये और उन्होंने प्रभुको अवरुद्ध कर दिया। वे बाल सिरसे हीन हो गये थे, इसलिये [नीचेकी ओर] अपसर्पण करनेवाले हो गये; वे बाल व्यालस्वरूप कहे गये। वे हीन होनेके कारण 'अहि', गिरनेके कारण 'पन्नग' और अपसर्पण करनेके कारण 'सर्प' कहे गये हैं। उनके क्रोधसे उत्पन्न जो महाभयंकर विषमग्र अग्निगर्भ था, वह साथमें उत्पन्न हुए सर्पोंमें प्रविष्ट हो गया॥ २२८—२३१॥ |
| सर्पान् सृष्ट्वा ततः क्रुद्धः क्रोधात्मानो विनिर्ममे ।<br>वर्णेन कपिशेनोग्रास्ते भूताः पिशिताशनाः ॥ २३२<br><br>भूतत्वात्ते स्मृता भूताः पिशाचाः पिशिताशनात् ।<br>प्रसन्नं गायतस्तस्य गन्धर्वा जज्ञिरे यदा ॥ २३३<br><br>धयतीत्येष वै धातुः गानत्वे परिपठ्यते ।<br>धयन्तो जज्ञिरे वाचं गन्धर्वास्तेन ते स्मृताः ॥ २३४ | तब सर्पोंको देखकर ब्रह्माजी क्रुद्ध हुए और उन्होंने क्रोधमय स्वरूपवालोंको उत्पन्न किया। वे कपिश वर्ण, अत्यन्त उग्र तथा मांसका भक्षण करनेवाले भूत थे। वे भूतत्वके कारण 'भूत' तथा मांसभक्षण करनेके कारण 'पिशाच' कहे गये हैं। प्रसन्नतापूर्वक गान करते हुए उन ब्रह्मासे गन्धर्व उत्पन्न हुए थे। 'धयति'—यह धातु गान अर्थमें पढ़ी जाती है; वे वाणीका गान करते हुए उत्पन्न हुए, इसलिये 'गन्धर्व' कहे गये हैं॥ २३२—२३४॥ |
| अष्टस्वेतासु सृष्टासु देवयोनिषु स प्रभुः ।<br>ततः स्वच्छन्दतोऽन्यानि वयांसि वयसासृजत् ॥ २३५<br><br>स्वच्छन्दतः स्वच्छन्दांसि वयसा च वयांसि च ।<br>पशून् सृष्ट्वा स देवेशोऽसृजत्पक्षिगणानपि ॥ २३६ | इन आठ देवयोनियोंको सृजित करनेके अनन्तर उन प्रभुने स्वच्छन्दतापूर्वक अपनी आयुसे अन्य पक्षियोंका सृजन किया। पुनः उन्होंने स्वच्छन्दतापूर्वक स्वेच्छासे विचरण करनेवाले पक्षियोंका सृजन किया। इस प्रकार उन देवेशने पशुओंकी सृष्टि करके पक्षिसमुदायका भी सृजन किया था॥ २३५-२३६॥ |
| मुखतोऽजाः ससर्जाथ वक्षसश्चावयोसृजत् ।<br>गाश्चैवाथोदरद् ब्रह्मा पार्श्वाभ्यां च विनिर्ममे ॥ २३७<br><br>पद्भ्यां चाश्वान् समातङ्गान् रासभानावयान् मृगान् ।<br>उष्ट्रानश्वतरांश्चैव तथान्याश्चैव जातयः ॥ २३८ | ब्रह्माने [अपने] मुखसे बकरियोंका तथा वक्ष (छाती) से भेड़ोंका सृजन किया। उन्होंने उदरसे तथा पार्श्वभागोंसे गायोंकी रचना की। उन्होंने [अपने] पैरोंसे घोड़ों, हाथियों, गधों, आवयों, मृगों, ऊँटों और खच्चरोंका |
| ३२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ओषध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>एवं पशवोषधीः सृष्ट्वायुयुजत्सोऽध्वरे प्रभुः॥ २३९ | सृजन किया; इसी प्रकार अन्य जातियाँ भी उत्पन्न हुईं। उनके रोमोंसे फल तथा मूलवाली औषधियाँ उत्पन्न हुईं। इस प्रकार पशुओं तथा औषधियोंका सृजन करके वे प्रभु यज्ञमें लग गये॥ २३७-२३९॥ |
| गौरजः पुरुषो मेषो ह्यश्वोऽश्वतरगर्दभौ।<br>एतान् ग्राम्यान् पशूनाहुरारण्यान्वैनिबोधत॥ २४०<br><br>श्वापदो द्विखुरो हस्ती वानराः पक्षिपञ्चमाः।<br>आदकाः पशवः षष्ठाः सप्तमास्तु सरीसृपाः॥ २४१<br><br>महिषा गवयाक्षाश्च प्लवङ्गाः शरभा वृकाः।<br>सिंहस्तु सप्तमस्तेषामारण्याः पशवः स्मृताः॥ २४२ | गाय, अज, पुरुष (मनुष्य), मेष, अश्व, खच्चर तथा गधे—इन्हें ग्राम्य पशु कहा गया है। [नरमेधमें पशुत्वकी कल्पनाके कारण मनुष्यको पशुकोटिमें माना गया है] अब जंगली पशुओंको जान लीजिये। श्वापद (व्याघ्र आदि), द्विखुर (गवय आदि), हाथी, वानर, पाँचवाँ पक्षी, छठाँ आदक पशु तथा सातवाँ सरीसृप—ये जंगली पशु हैं। इनके अतिरिक्त महिष, गवय, हिरण, प्लवंग, शरभ, वृक तथा सातवाँ सिंह—ये जंगली पशु कहे गये हैं॥ २४०-२४२॥ |
| गायत्रं च ऋचं चैव त्रिवृत्साम रथन्तरम्।<br>अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात्॥ २४३<br><br>यजूंषि त्रैष्टुभं छन्दस्तोमं पञ्चदशं तथा।<br>बृहत्साम तथोक्थ्यं च दक्षिणादसृजन्मुखात्॥ २४४<br><br>सामानि जगतीच्छन्दस्तोमं सप्तदशं तथा।<br>वैरूपमतिरात्रं च पश्चिमादसृजन्मुखात्॥ २४५<br><br>एकविंशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च।<br>अनुष्टुभं सवैराजमुत्तरादसृजन्मुखात्॥ २४६<br><br>विद्युतो शनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च।<br>तेजांसि च ससर्जादौ कल्पस्य भगवान् प्रभुः॥ २४७<br><br>उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>ब्रह्मणस्तु प्रजासर्गं सृजतो हि प्रजापतेः॥ २४८ | ब्रह्माने [अपने] प्रथम (पूर्व) मुखसे गायत्री छन्द, ऋग्वेद, [गीयमान] त्रिवृत् साम, रथन्तर साम तथा यज्ञोंमें मुख्य अग्निष्टोमकी रचना की। उन्होंने दक्षिण मुखसे यजुर्वेद, त्रिष्टुप् छन्द, पंचदशावृत्त साम, बृहत्साम तथा उक्थ्यकी रचना की। उन्होंने पश्चिम मुखसे साम, जगतीछन्द, सप्तदशावृत्त स्तोम, वैरूपसाम तथा अतिरात्रयज्ञकी रचना की। उन्होंने उत्तर मुखसे इक्कीस अथर्व प्रार्थना-मन्त्रों, आप्तोर्यामाण, अनुष्टुप् छन्द तथा वैराज छन्दकी रचना की। भगवान् ब्रह्माने कल्पके प्रारम्भमें विद्युत्, वज्र, मेघों, रोहित वर्णवाले इन्द्रधनुषों तथा तेजोंकी रचना की। प्रजाओंकी सृष्टि करते हुए उन प्रजापति ब्रह्माके अंगोंसे उच्च तथा निम्न भूत (प्राणी) उत्पन्न हुए॥ २४३-२४८॥ |
| सृष्ट्वा चतुष्टयं पूर्वं देवासुरनरान् पितॄन्।<br>ततोऽसृजत भूतानि स्थावराणि चराणि च॥ २४९<br><br>यक्षान् पिशाचान् गन्धर्वांस्त्वथैवाप्सरसां गणान्।<br>नरकिन्नररक्षांसि वयःपशुमृगोरगान्॥ २५०<br><br>अव्ययं च व्ययं चापि यदिदं स्थाणुजङ्गमम्।<br>तेषां वै यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे॥ २५१<br><br>तान्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः।<br>हिंस्त्राहिंस्त्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मे नृतानृते॥ २५२ | पहले देवता, असुर, मनुष्य तथा पितर—इन चारोंकी सृष्टि करके उन्होंने स्थावर तथा जंगम भूतोंका सृजन किया; उन्होंने यक्षों, पिशाचों, गन्धर्वों, अप्सरागणों, मनुष्यों, किन्नरों, राक्षसों, पक्षियों, पशुओं, मृगों और सर्पों तथा अव्यय एवं व्यय; जो भी स्थावर-जंगम हैं—उन सबका सृजन किया। पूर्व सृष्टिमें उनके जो कर्म थे, बार-बार सृजित किये जाते हुए वे प्राणी उन्हीं कर्मोंको प्राप्त करते हैं। वे अपने लिये अनुकूल हिंसा-अहिंसा, मृदुता-क्रूरता, धर्म-अधर्म तथा मिथ्या-सत्यमें |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३२५
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते।<br>महाभूतेषु सृष्टेषु इन्द्रियार्थेषु मूर्तिषु॥ २५३<br><br>विनियोगं च भूतानां धातैव व्यदधात्स्वयम्। | प्रवृत्त होते हैं; इसीलिये वे उनमें आनन्दका अनुभव करते हैं। महाभूतों, इन्द्रिय-विषयों तथा उनके स्वरूपोंकी सृष्टि हो जानेपर स्रष्टाने स्वयं उन भूतोंका विनियोग किया॥ २४९—२५३ १/२॥ |
| केचित्पुरुषकारं तु प्राहुः कर्म सुमानवाः॥ २५४<br><br>दैवमित्यपरे विप्राः स्वभावं भूतचिन्तकाः।<br>पौरुषं कर्म दैवं च फलवृत्तिस्वभावतः॥ २५५<br><br>न चैकं न पृथग्भावमधिकं न ततो विदुः।<br>एतदेवं च नैकं च नामभेदेन नाप्युभे॥ २५६<br><br>कर्मस्था विषमं ब्रूयुः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः। | कुछ लोग होनेवाली घटनाओंका कारण पुरुषार्थको बताते हैं तथा कुछ श्रेष्ठ मनुष्य कर्मको उसका कारण बताते हैं। हे विप्रो! अन्य लोग दैव (भाग्य)-को और कुछ तत्त्वचिन्तक स्वभावको उसका कारण बताते हैं। इस प्रकार पुरुषार्थ, कर्म, दैव तथा स्वभावको कारण माना गया है। कर्ममार्गका अनुसरण करनेवाले जीव जगत्की विषमताके प्रति पूर्वोक्त चार कारणोंमेंसे किसी एकको कारण न मानकर उनके समुच्चयको कारण मानते हैं; क्योंकि वे इन चारोंसे भी परे सकलनियन्ता महेश्वरको नहीं जानते हैं। सत्त्वगुणमें स्थित समदर्शी लोग जगत्के मायामय होनेके कारण पूर्वोक्त कारणचतुष्टयोंमेंसे नामभेदके रूपमें न तो किसी एकको और न किन्हीं दोको कारण मानते हैं॥ २५४—२५६ १/२॥ |
| नाम रूपं च भूतानां कृतानां च प्रपञ्चनम्॥ २५७<br><br>वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः।<br>ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु वृत्तयः॥ २५८<br><br>शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः।<br>एवंविधाः सृष्टयस्तु ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ २५९<br><br>शर्वर्यन्ते प्रदृश्यन्ते सिद्धिमाश्रित्य मानसीम्।<br>एवंभूतानि सृष्टानि स्थावराणि चराणि च॥ २६० | उन [ब्रह्मरूपी] महेश्वरने पूर्वकल्पके भूतोंके नाम, रूप तथा प्रपंचको सर्गके आदिमें वेदके शब्दोंसे ही निर्मित किया। ब्रह्माजी रात्रिके अन्तमें (प्रलय समाप्त होनेपर) उत्पन्न ऋषियोंके नाम एवं उनकी जो वृत्तियाँ वेदोंमें हैं, उन सबको उन्हें प्रदान करते हैं। अव्यक्तसे जन्म लेनेवाले ब्रह्माकी इस प्रकारकी सृष्टियाँ होती हैं। [ब्रह्माकी] रात्रिके अन्तमें मानसी सिद्धिका आश्रय लेकर सृजित किये गये इस प्रकारके स्थावर-जंगम प्राणी दिखायी देते हैं॥ २५७—२६०॥ |
| यदास्य ताः प्रजाः सृष्टा न व्यवर्धन्त सत्तमाः।<br>तमोमात्रावृतो ब्रह्मा तदा शोकेन दुःखितः॥ २६१<br><br>ततः स विदधे बुद्धिमर्थनिश्चयगामिनीम्।<br>अथात्मनि समद्राक्षीत्तमोमात्रां नियामिकाम्॥ २६२<br><br>रजः सत्त्वं परित्यज्य वर्तमानां स्वधर्मतः।<br>ततः स तेन दुःखेन दुःखं चक्रे जगत्पतिः॥ २६३ | हे सत्तमो! जब उनकी वे सृजित प्रजाएँ वृद्धिको प्राप्त नहीं हुईं; तब तमोमात्रासे आवृत ब्रह्मा शोकसे दुःखित हो उठे। इसके बाद उन्होंने अर्थका निश्चय करनेवाली बुद्धिको धारण किया और सत्त्व तथा रजोगुणोंका परित्याग करके अपने धर्मसे वर्तमान नियामिका तमोमात्राको अपने अन्दर देखा। तब वे जगत्पति उस दुःखसे बहुत दुःखित हुए॥ २६१—२६३॥ |
| तमश्च व्यनुदत्पश्चाद्रजः सत्त्वं तमावृणोत्।<br>तत्तमः प्रतिनुन्नं वै मिथुनं समजायत॥ २६४ | तदनन्तर उन्होंने तमोगुणको प्रेरित किया; उस तमने रज तथा सत्त्वको आवृत्त किया। इस प्रकार प्रेरित |
| ३२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| अधर्मस्तमसो जज्ञे हिंसाशोकादजायत।<br>ततस्तस्मिन् समुद्भूते मिथुने दारुणात्मिके ॥ २६५<br>गतासुर्भगवानासीत्प्रीतिश्चैनमशिश्रियत् ।<br>स्वां तनुं स ततो ब्रह्मा तामपोहत भास्वराम् ॥ २६६<br>द्विधा कृत्वा स्वकं देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् ।<br>अर्धेन नारी सा तस्य शतरूपा व्यजायत ॥ २६७<br>प्रकृतिं भूतधात्रीं तां कामाद्वै सृष्टवान् प्रभुः।<br>सा दिवं पृथिवीं चैव महिम्ना व्याप्यधिष्ठिता ॥ २६८<br>ब्रह्मणः सा तनुः पूर्वा दिवमावृत्य तिष्ठति।<br>या त्वर्धात्सृजतो नारी शतरूपा व्यजायत ॥ २६९<br><br>सा देवी नियुतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम्।<br>भर्तारं दीप्तयशसं पुरुषं प्रत्यपद्यत ॥ २७० | हुआ वह तम ही दो रूपोंमें उत्पन्न हुआ ॥ २६४॥<br>तमसे अधर्म उत्पन्न हुआ और शोकसे हिंसा उत्पन्न हुई। तब भयानक रूपवाले उस मिथुन (अधर्म और हिंसा)-के प्रादुर्भूत होनेपर भगवान् [ब्रह्मा] प्राणहीन हो गये और प्रीतिने इनकी सेवा की। इसके बाद ब्रह्माने अपने उस दीप्त शरीरको अपोहित कर लिया। अपने देहको दो भागोंमें करके वे आधे शरीरसे पुरुष हो गये और उनके आधे शरीरसे नारी शतरूपा उत्पन्न हुई। ब्रह्माने प्राणियोंकी धात्री उस प्रकृतिको कामनापूर्वक उत्पन्न किया था; वे अपनी महिमासे स्वर्ग तथा पृथिवीको व्याप्त करके अधिष्ठित हैं। ब्रह्माका वह पूर्व शरीर स्वर्गको आवृत करके स्थित है। सृजन करनेवाले ब्रह्माके आधे शरीरसे जो नारी शतरूपा उत्पन्न हुई थीं, उन्होंने नियुत (दस लाख) वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप करके दीप्त यशवाले पुरुषको पतिरूपमें प्राप्त किया ॥ २६५-२७० ॥ | | स वै स्वायम्भुवः पूर्वं पुरुषो मनुरुच्यते।<br>तस्यैकसप्ततियुगं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ २७१<br>लेभे स पुरुषः पत्नीं शतरूपामयौनिजाम्।<br>तया सार्धं स रमते तस्मात्सा रतिरुच्यते ॥ २७२<br>प्रथमः सम्प्रयोगोऽत्मा कल्पादौ समपद्यत ।<br>विराजमसृजद् ब्रह्मा सोऽभवत्पुरुषो विराट् ॥ २७३<br>सम्राट् च शतरूपा वै वैराजः स मनुः स्मृतः।<br>स वैराजः प्रजासर्गं ससर्ज पुरुषो मनुः ॥ २७४<br>वैराजात्पुरुषाद्वीराच्छतरूपा व्यजायत।<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ पुत्रौ द्वौ लोकसम्मतौ ॥ २७५<br>कन्ये द्वे च महाभागे याभ्यां जाता इमाः प्रजाः।<br>देवी नाम तथाकूतिः प्रसूतिश्चैव ते उभे ॥ २७६ | वे पूर्वपुरुष ही स्वायम्भुव मनु कहे जाते हैं। उनका इकहत्तर चतुर्युगी मन्वन्तर कहा जाता है। उस पुरुषने अयोन निजा शतरूपाको पत्नीरूपमें प्राप्त किया। वे उनके साथ रमण करते हैं, अतः वे 'रति' कही जाती हैं। कल्पके आदिमें [यह] पहला परस्पर संयोग हुआ। ब्रह्माने विराट्को उत्पन्न किया था; वे पुरुष ही विराट् थे। शतरूपा और वे वैराज (विराट्पुत्र) मनुको सम्राट् कहा गया है। उन वैराज पुरुष मनुने प्रजासर्गका सृजन किया। शतरूपाने वीर वैराज पुरुषसे प्रियव्रत तथा उत्तानपाद [नामक] दो लोकमान्य पुत्रोंको उत्पन्न किया। उन्होंने दो महाभाग्यशालिनी कन्याओंको भी उत्पन्न किया, जिनसे ये प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं। वे दोनों देवी आकूति तथा प्रसूति नामवाली थीं ॥ २७१-२७६ ॥ | | स्वायम्भुवः प्रसूतिं तु दक्षाय प्रददौ प्रभुः।<br>प्राणो दक्ष इति ज्ञेयः सङ्कल्पो मनुरुच्यते ॥ २७७<br>रुचेः प्रजापतेः सोऽथ आकूतिं प्रत्यपादयत्।<br>आकृत्यां मिथुनं जज्ञे मानसस्य रुचेः शुभम् ॥ २७८ | प्रभु स्वायम्भुव मनुने प्रसूतिको दक्षको अर्पित कर दिया। दक्षको प्राण जानना चाहिये और मनुको संकल्प कहा जाता है। उन्होंने आकूतिको रुचिप्रजापतिको दिया। ब्रह्माके मानसपुत्र रुचिकी मिथुन (जुड़वाँ) सन्तानें |
| अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव | ३२७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यज्ञश्च दक्षिणा चैव यमलौ सम्बभूवतुः।<br>यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे॥ २७९<br>यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>एतस्य पुत्रा यज्ञस्य तस्माद्यामाश्च ते स्मृताः॥ २८०<br>अजितश्चैव शुक्रश्च गणौ द्वौ ब्रह्मणा कृतौ।<br>यामाः पूर्वं प्रजाता ये तेऽभवंस्तु दिवौकसः॥ २८१ | आकूतिसे उत्पन्न हुईं। यज्ञ तथा दक्षिणा—ये जुड़वाँ सन्तानें हुईं। दक्षिणासे यज्ञके बारह पुत्रोंने जन्म लिया। वे देवगण, स्वायम्भुव मन्वन्तरमें ‘याम’—इस नामसे प्रसिद्ध हुए; वे इस यज्ञके पुत्र थे, इसलिये वे ‘याम’ कहे गये हैं। ब्रह्माने अजित तथा शुक्र—इन दो गणोंको उत्पन्न किया था। पूर्वमें जो ‘याम’ उत्पन्न हुए थे, वे देवता हुए॥ २७७–२८१॥ |
| स्वायम्भुवसुतायां तु प्रसूत्यां लोकमातरः।<br>तस्यां कन्याश्चतुर्विंशद्दक्षस्त्वजनयत्प्रभुः॥ २८२<br>सर्वास्ताश्च महाभागाः सर्वाः कमललोचनाः।<br>भोगवत्यश्च ताः सर्वाः सर्वास्ता योगमातरः॥ २८३<br>सर्वाश्च ब्रह्मवादिन्यः सर्वा विश्वस्य मातरः।<br>श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा क्रिया तथा॥ २८४<br>बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदश।<br>पत्न्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायणीः प्रभुः॥ २८५<br>दाराण्येतानि वै तस्य विहितानि स्वयम्भुवा।<br>ताभ्यः शिष्टा यवीयस्य एकादश सुलोचनाः॥ २८६<br>सती ख्यात्यथ सम्भूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा।<br>सन्नतिश्चानसूया च ऊर्जा स्वाहा स्वधा तथा॥ २८७<br>तास्तथा प्रत्यपद्यन्त पुनरन्ये महर्षयः।<br>रुद्रो भृगुर्मरीचिश्च अङ्गिराः पुलहः क्रतुः॥ २८८<br>पुलस्त्योऽत्रिवसिष्ठश्च पितरोऽग्निस्तथैव च। | प्रभु दक्षने स्वायम्भुव [मनु]-की पुत्री उस प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं; वे लोकमाताएँ हुईं। वे सभी महाभाग्यशालिनी, कमलके समान नेत्रवाली, भोगवती, योगमाताएँ, ब्रह्मवादिनी तथा विश्वकी माताएँ थीं। उनमें जो श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि एवं कीर्ति—तेरह [पुत्रियाँ] थीं, उन दक्षकन्याओंको प्रभु धर्मने पत्नीके रूपमें ग्रहण कर लिया। स्वायम्भुवने इन सबको उन धर्मकी पत्नी बनाया। उन सभीसे कनिष्ठ जो शिष्ट तथा सुन्दर नेत्रोंवाली ग्यारह [कन्याएँ] थीं, वे सती, ख्याति, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा एवं स्वधा [नामवाली] थीं। उन्हें अन्य महर्षियोंने प्राप्त किया; वे रुद्र, भृगु, मरीचि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य, अत्रि, वसिष्ठ, पितर तथा अग्नि थे॥ २८२–२८८ १/२॥ |
| सतीं भवाय प्रायच्छत् ख्यातिं च भृगवे ततः॥ २८९<br>मरीचये च सम्भूतिं स्मृतिमङ्गिरसे ददौ।<br>प्रीतिं चैव पुलस्त्याय क्षमां वै पुलहाय च॥ २९०<br>क्रतवे सन्नतिं नाम अनसूयां तथात्रये।<br>ऊर्जां ददौ वसिष्ठाय स्वाहामप्यग्नये ददौ॥ २९१<br>स्वधां चैव पितृभ्यस्तु तास्वपत्यानि बोधत।<br>एताः सर्वा महाभागाः प्रजास्वनुसृताः स्थिताः॥ २९२<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु यावदाभूतसम्प्लवम्। | उन्होंने सतीको भव (रुद्र)-को तथा ख्यातिको भृगुको दे दिया। इसके बाद उन्होंने सम्भूतिको मरीचिको और स्मृतिको अंगिराको प्रदान कर दिया। उन्होंने प्रीतिको पुलस्त्यको, क्षमाको पुलहको, सन्नतिको क्रतुको, अनसूयाको अत्रिको तथा ऊर्जाको वसिष्ठको अर्पित कर दिया और स्वाहाको अग्निको तथा स्वधाको पितरोंको सौंप दिया। अब उनसे उत्पन्न सन्तानोंको जान लीजिये॥ २८९–२९१ १/२॥ |
| श्रद्धा कामं विजज्ञे वै दर्पो लक्ष्मीसुतः स्मृतः॥ २९३<br>धृत्यास्तु नियमः पुत्रस्तुष्ट्याः सन्तोष एव च।<br>पुष्ट्या लोभः सुतश्चापि मेधापुत्रः श्रुतस्तथा॥ २९४<br>क्रियायामभवत्पुत्रो दण्डः समय एव च।<br>बुद्ध्यां बोधः सुतस्तद्वत्प्रमादोऽप्युपजायत॥ २९५ | ये समस्त महाभाग्यवती कन्याएँ सभी मन्वन्तरोंमें प्रलयपर्यन्त प्रजाओंके सृजनमें लगी रहती थीं। श्रद्धाने कामको उत्पन्न किया। दर्प लक्ष्मीका पुत्र कहा गया है। धृतिका पुत्र नियम, तुष्टिका पुत्र सन्तोष, पुष्टिका पुत्र लोभ तथा मेधाका पुत्र श्रुत है। क्रियासे दण्ड तथा समय |
| ३२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| लज्जायां विनयः पुत्रो व्यवसायो वसोः सुतः।<br>क्षेमः शान्तिसुतश्चापि सुखं सिद्धेर्व्यजायत॥ २९६<br><br>यशः कीर्तिसुतश्चापि इत्येते धर्मसूनवः।<br>कामस्य हर्षः पुत्रो वै देव्यां प्रीत्यां व्यजायत॥ २९७ | [नामक] पुत्र उत्पन्न हुए। बुद्धिसे बोध तथा प्रमाद [नामक] पुत्र उत्पन्न हुए। लज्जासे विनय नामक पुत्र हुआ। वसुका पुत्र व्यवसाय तथा शान्तिका पुत्र क्षेम है। सिद्धिसे सुख [नामक पुत्र] उत्पन्न हुआ। कीर्तिका पुत्र यश है। ये सब धर्मके पुत्र हैं। कामका पुत्र हर्ष देवी प्रीतिसे उत्पन्न हुआ। धर्मका यह सुतोदर्क सर्ग बता दिया गया॥ २९२—२९७१/२॥ |
| इत्येष वै सुतोदर्कः सर्गो धर्मस्य कीर्तितः।<br>जज्ञे हिंसा त्वधर्माद्वै निकृतिं चानृतं सुतम्॥ २९८<br><br>निकृत्यां तु द्वयं जज्ञे भयं नरक एव च।<br>माया च वेदना चापि मिथुनद्वयमेतयोः॥ २९९<br><br>भूयो जज्ञेऽथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम्।<br>वेदनायाः सुतश्चापि दुःखं जज्ञे च रौरवः॥ ३००<br><br>मृत्योर्व्याधिजराशोकक्रोधासूयाश्च जज्ञिरे।<br>दुःखोत्तराः सुता ह्येते सर्वे चाधर्मलक्षणाः॥ ३०१<br><br>नैषां भार्यास्तु पुत्राश्च सर्वे ह्येते परिग्रहाः।<br>इत्येष तामसः सर्गो जज्ञे धर्मनियामकः॥ ३०२ | हिंसाने अधर्मसे निकृति [नामकी कन्या] तथा अनृत पुत्रको उत्पन्न किया। निकृतिसे भय तथा नरक [दो पुत्र] उत्पन्न हुए और इनकी [पत्नियां] माया तथा वेदना जुड़वाँ कन्याएँ हुईं। इसके बाद मायाने प्राणियोंका हरण करनेवाले मृत्युको जन्म दिया और वेदनासे रौरवके द्वारा पुत्ररूपमें 'दुःख' उत्पन्न हुआ। मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, क्रोध तथा असूया उत्पन्न हुए। उत्तरोत्तर दुःख देनेवाले ये सभी पुत्र अधर्मके लक्षणोंसे युक्त थे। इन सबको भार्याएँ तथा पुत्र नहीं थे; ये सभी परिग्रह स्वभाववाले थे। इस प्रकार यह धर्मनियामक तामस सर्ग उत्पन्न हुआ॥ २९८—३०२॥ |
| प्रजाः सृजेति व्यादिष्टो ब्रह्मणा नीललोहितः।<br>सोऽभिध्याय सतीं भार्यां निर्ममे ह्यात्मसम्भवान्॥ ३०३ | ब्रह्माने नीललोहित शिवसे कहा था—‘प्रजाओंका सृजन कीजिये।' तब उन्होंने [अपनी] भार्या सतीका ध्यान करके पुत्रोंका सृजन किया। उन्होंने न अधिक, न कम, अपने ही समान तथा व्याघ्रचर्म धारण किये हुए |
| नाधिकान च हीनांस्तान् मानसानात्मनः समान्।<br>सहस्रं हि सहस्राणां सोऽसृजत्कृत्तिवाससः॥ ३०४ | हजारों-हजार मानसपुत्रों [रुद्रगणों]-को उत्पन्न किया। |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३२९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तुल्यानेवात्मनः सर्वान् रूपतेजोबलश्रुतैः।<br>पिङ्गलान् सनिषङ्गांश्च सकपर्दान् सलोहितान्॥ ३०५<br>विशिष्टान् हरिकेशांश्च दृष्टिघ्नांश्च कपालिनः।<br>महारूपान् विरूपांश्च विश्वरूपान् स्वरूपिणः॥ ३०६<br>रथिनश्चर्मिणश्चैव वर्मिणश्च वरूथिनः।<br>सहस्रशतबाहूंश्च दिव्यान् भौमान्तरिक्षगान्॥ ३०७<br>स्थूलशीर्षानष्टदंष्ट्रान्द्विजिव्हांस्तांस्त्रिलोचनान्।<br>अन्नादान् पिशिताशांश्च आज्यपान् सोमपानपि॥ ३०८<br>मीढुषोऽतिकपालांश्च शितिकण्ठोध्वंरेतसः।<br>हव्यादाञ्छ्रुतधर्मांश्च धर्मिणो ह्यथ बर्हिणः॥ ३०९<br>आसीनान् धावतश्चैव पञ्चभूतान् सहस्रशः।<br>अध्यापिनोऽध्यायिनश्च जपतो युञ्जतस्तथा॥ ३१०<br>धूमवन्तो ज्वलन्तश्च नदीमन्तोऽतिदीप्तिनः।<br>वृद्धान् बुद्धिमन्तश्चैव ब्रह्मिष्ठाञ्शुभदर्शनान्॥ ३११<br>नीलग्रीवान्सहस्राक्षान्सर्वांश्चाथ क्षमाकरान्।<br>अदृश्यान् सर्वभूतानां महायोगान् महौजसः॥ ३१२<br>भ्रमन्तोऽभिद्रवन्तश्च प्लवन्तश्च सहस्रशः।<br>अयातयामानसृजद्रुद्रानेतान् सुरोत्तमान्॥ ३१३ | उन्होंने रूप-तेज-बल-ज्ञानमें अपने ही सदृश, पिंगलवर्णवाले, निषंगयुक्त, जटाजूटधारी, लोहितवर्णवाले, विशिष्ट, हरित केशवाले, देखनेमात्रसे नाश करनेवाले, कपालधारी, विशाल रूपवाले, विकृत रूपवाले, विश्वरूप, स्वरूपवान्, रथारूढ़, ढाल-कवच-वरूथ धारण किये हुए, लाखों भुजाओंवाले, स्वर्ग-पृथ्वी-अन्तरिक्षमें गमन करनेवाले, स्थूल सिरवाले, आठ दाढ़ोंवाले, दो जीभोंवाले, तीन नेत्रोंवाले, अन्न खानेवाले, मांस भक्षण करनेवाले, घृत पीनेवाले, सोमपान करनेवाले, सुन्दर, बड़े-बड़े कपालवाले, नीले कण्ठवाले, ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी), हव्य खानेवाले, वेदपरायण, धार्मिक, मोरपंखसे सुशोभित, कुछ बैठे हुए, कुछ दौड़ते हुए, पाँच भूतोंवाले, कुछ अध्यापन करनेवाले, कुछ अध्ययन करनेवाले, कुछ जप करते हुए, कुछ योगाभ्यास करते हुए, कुछ धूमयुक्त, कुछ दीप्तिमान्, गंगाको धारण किये हुए, अत्यन्त कान्तिमान्, वृद्ध, बुद्धिसम्पन्न, ब्रह्मिष्ठ, शुभ दर्शनवाले, नीलग्रीवा (कण्ठ)-वाले, हजार नेत्रोंवाले, क्षमाकी निधि, सभी प्राणियोंसे अदृश्य, महान् योगवाले, महातेजस्वी, भ्रमण करते हुए, इधर-उधर भागते हुए, कूदते हुए तथा अयातयाम—इन हजारों-हजार उत्तम रुद्रदेवताओंको उत्पन्न किया॥ ३०३-३१३॥ |
| ब्रह्मा दृष्ट्वाऽब्रवीदेनं मास्त्राक्षीरीदृशीः प्रजाः।<br>स्रष्टव्या नात्मनस्तुल्याः प्रजा देव नमोऽस्तु ते॥ ३१४<br>अन्याः सृज त्वं भद्रं ते प्रजा वै मृत्युसंयुताः।<br>नारप्स्यन्ते हि कर्माणि प्रजा विगतमृत्युवः॥ ३१५ | इन्हें देखकर ब्रह्माजीने इन [नीललोहित]-से कहा—‘ऐसी प्रजाओंका सृजन मत कीजिये; अपने सदृश प्रजाओंकी सृष्टि आपको नहीं करनी चाहिये। हे देव! आपको नमस्कार है। आपका कल्याण हो। आप मृत्युयुक्त अन्य प्रजाओंका सृजन कीजिये; क्योंकि मृत्युरहित प्रजाएँ कार्योंका आरम्भ नहीं करेंगी’॥ ३१४-३१५॥ |
| एवमुक्तोऽब्रवीदेनं नाहं मृत्युजरान्विताः।<br>प्रजाः स्रक्ष्यामि भद्रं ते स्थितोऽहं त्वं सृज प्रजाः॥ ३१६<br>एते ये वै मया सृष्टा विरूपा नीललोहिताः।<br>सहस्त्राणां सहस्रं तु आत्मनो निःसृताः प्रजाः॥ ३१७<br>एते देवा भविष्यन्ति रुद्रा नाम महाबलाः।<br>पृथिव्यामन्तरिक्षे च दिक्षु चैव परिश्रिताः॥ ३१८<br>शतरुद्राः समात्मानो भविष्यन्तीति याज्ञिकाः।<br>यज्ञभाजो भविष्यन्ति सर्वदेवगणैः सह॥ ३१९ | ब्रह्माके द्वारा ऐसा कहे गये रुद्रने उनसे कहा—मैं मृत्यु तथा जरासे युक्त प्रजाओंका सृजन नहीं करूँगा। आपका कल्याण हो। अब मैं [शान्त होकर] बैठता हूँ और आप ही सृजन कीजिये। जिन हजारों-हजार विरूप नीललोहित रुद्रोंको मैंने सृजित किया है, वे मेरी आत्मासे निकली हुई प्रजाएँ हैं। ये रुद्र नामवाले महाबली देवता होंगे। ये पृथ्वी, आकाश तथा सभी दिशाओंमें व्याप्त रहेंगे। इनमें समान आत्मावाले सौ रुद्र याज्ञिक होंगे; वे सभी देवताओंके साथ |
३३० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मन्वन्तरेषु ये देवा भविष्यन्तीह भेदतः।<br>सार्धं तैरिज्यमानास्ते स्थास्यन्तीहायुगक्षयात्॥ ३२० | यज्ञभाग ग्रहण करनेवाले होंगे। सभी मन्वन्तरोंमें जो देवता भेदपूर्वक यहाँपर होंगे, उनके साथ पूजित होते हुए वे सभी रुद्र युगक्षयपर्यन्त यहाँ स्थित रहेंगे॥ ३१६—३२०॥ |
| एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा महादेवेन धीमता।<br>प्रत्युवाच नमस्कृत्य हृष्यमाणः प्रजापतिः॥ ३२१<br><br>एवं भवतु भद्रं ते यथा ते व्याहृतं विभो।<br>ब्रह्मणा समनुज्ञाते तथा सर्वमभूत्किल॥ ३२२ | बुद्धिमान् महादेवजीके द्वारा इस प्रकार कहे गये प्रजापति ब्रह्माजी प्रसन्न होकर प्रणाम करके उनसे बोले—'हे विभो! आपने जैसा कहा है, वैसा ही हो; आपका कल्याण हो।' ब्रह्माके ऐसा कहनेके बाद सब कुछ उसी प्रकारसे हुआ॥ ३२१-३२२॥ |
| ततः प्रभृति देवेशो न चासूत वै प्रजाः।<br>ऊर्ध्वरेताः स्थितः स्थाणुर्यावदाभूतसम्प्लवम्॥ ३२३<br><br>यस्मादुक्तः स्थितोऽस्मीति तस्मात्स्थाणुरिति स्मृतः।<br>एष देवो महादेवः पुरुषोऽर्कसमद्युतिः॥ ३२४<br><br>अर्धनारीनरवपुस्तेजसा ज्वलनोपमः।<br>स्वेच्छ्यासौ द्विधाभूतः पृथक् स्त्री पुरुषः पृथक्॥ ३२५<br><br>स एवैकादशार्धेन स्थितोऽसौ परमेश्वरः।<br>तत्र या सा महाभागा शङ्करस्यार्धकायिनी॥ ३२६<br><br>प्रागुक्ता तु महादेवी स्त्री सैवेह सती ह्यभूत्।<br>हिताय जगतां देवी दक्षेणाराधिता पुरा॥ ३२७<br><br>कार्यार्थं दक्षिणं तस्याः शुक्लं वामं तथासितम्।<br>आत्मानं विभजस्वेति प्रोक्ता देवेन शम्भुना॥ ३२८<br><br>सा तथोक्ता द्विधाभूता शुक्ला कृष्णा च वै द्विजाः।<br>तस्या नामानि वक्ष्यामि शृण्वन्तु च समाहिताः॥ ३२९ | उसी समयसे देवताओंके स्वामी शिवने प्रजाओंका सृजन नहीं किया और वे प्रलयपर्यन्त स्थाणुवत् स्थित रहे तथा ब्रह्मचारी बने रहे। चूँकि उन्होंने कहा था कि 'मैं स्थित हूँ'—इसलिये वे 'स्थाणु' कहे गये। ये भगवान् महादेव पुरुषस्वरूप, सूर्यके समान तेजवाले, अपने तेजसे अग्निके समान प्रतीत होनेवाले तथा आधा भाग नर और आधा भाग नारीके शरीरवाले हैं। वे अपनी इच्छासे दो भागोंमें अलग-अलग स्त्री तथा पुरुषरूपमें विभक्त हुए। वे परमेश्वर आधे भागसे ग्यारह रूपोंमें स्थित हैं। उसमें जो शंकरकी अर्धांगिनी महाभागा महादेवी कही गयी हैं; वे ही भगवती पूर्वकालमें दक्षके द्वारा आराधित होकर जगत्के हितके लिये सतीके रूपमें आविर्भूत हुई थीं। सृष्टिकार्यके लिये उनका दाहिना भाग श्वेत तथा बायाँ भाग कृष्ण था। जब भगवान् शम्भुने उनसे कहा कि अपनेको विभक्त करो, तब हे द्विजो! उनके ऐसा कहनेपर वे शुक्ल तथा कृष्ण दो रूपोंमें विभक्त हो गयीं। अब मैं उनके नाम बताऊँगा; आपलोग एकाग्रचित्त होकर सुनिये॥ ३२३—३२९॥ |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप··· सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्वाहा स्वधा महाविद्या मेधा लक्ष्मीः सरस्वती।<br>सती दाक्षायणी विद्या इच्छा शक्तिः क्रियात्मिका॥ ३३०<br>अपर्णा चैकपर्णा च तथा चैवैकपाटला।<br>उमा हैमवती चैव कल्याणी चैकमातृका॥ ३३१<br>ख्यातिः प्रज्ञा महाभागा लोके गौरिति विश्रुता।<br>गणाम्बिका महादेवी नन्दिनी जातवेदसी॥ ३३२<br>एकरूपमथैतस्याः पृथग्देहविभावनात्।<br>सावित्री वरदा पुण्या पावनी लोकविश्रुता॥ ३३३<br>आज्ञा आवेशनी कृष्णा तामसी सात्त्विकी शिवा।<br>प्रकृतिर्विकृता रौद्री दुर्गा भद्रा प्रमाथिनी॥ ३३४<br>कालरात्रिर्महामाया रेवती भूतनायिका।<br>द्वापरान्तविभागे च नामानीमानि सुव्रताः॥ ३३५<br>गौतमी कौशिकी चार्या चण्डी कात्यायनी सती।<br>कुमारी यादवी देवी वरदा कृष्णपिङ्गला॥ ३३६<br>बर्हिध्वजा शूलधरा परमा ब्रह्मचारिणी।<br>महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी दृषद्वत्येकशूलधृक्॥ ३३७<br>अपराजिता बहुभुजा प्रगल्भा सिंहवाहिनी।<br>शुम्भादिदैत्यहन्त्री च महामहिषमर्दिनी॥ ३३८<br>अमोघा विन्ध्यनिलया विक्रान्ता गणनायिका।<br>देव्या नामविकाराणि इत्येतानि यथाक्रमम्॥ ३३९<br>भद्रकाल्या मयोक्तानि सम्यक्फलप्रदानि च।<br>ये पठन्ति नरास्तेषां विद्यते न च पातकम्॥ ३४०<br>अरण्ये पर्वते वापि पुरे वाप्यथवा गृहे।<br>रक्षामेतां प्रयुञ्जीत जले वाथ स्थलेऽपि वा॥ ३४१<br>व्याघ्रकुम्भीनचोरेभ्यो भयस्थाने विशेषतः।<br>आपत्स्वपि च सर्वासु देव्या नामानि कीर्तयेत्॥ ३४२<br>आर्यकग्रहभूतैश्च पूतनामातृभिस्तथा।<br>अभ्यर्दितानां बालानां रक्षामेतां प्रयोजयेत्॥ ३४३ | स्वाहा, स्वधा, महाविद्या, मेधा, लक्ष्मी, सरस्वती, सती, दाक्षायणी, विद्या, इच्छा, शक्ति, क्रियात्मिका, अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला, उमा, हैमवती, कल्याणी, एकमात्रुका, ख्याति, प्रज्ञा, महाभागा, लोकप्रसिद्ध गौरी, गणाम्बिका, महादेवी, नन्दिनी तथा जातवेदसी—ये नाम हैं। पृथक् देह धारण करनेसे पहले इनका एक ही रूप था। सावित्री, वरदा, पुण्या, पावनी, लोकविश्रुता, आज्ञा, आवेशनी, कृष्णा, तामसी, सात्त्विकी, शिवा, प्रकृति, विकृता, रौद्री, दुर्गा, भद्रा, प्रमाथिनी, कालरात्रि, महामाया, रेवती, भूतनायिका—हे सुव्रतो! द्वापरयुगके अन्तमें ये उनके नाम हुए। इसी प्रकार गौतमी, कौशिकी, आर्या, चण्डी, कात्यायनी, सती, कुमारी, यादवी, देवी, वरदा, कृष्णपिंगला, बर्हिध्वजा, शूलधरा, परमा, ब्रह्मचारिणी, महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी, दृषद्वती, एकशूलधृक्, अपराजिता, बहुभुजा, प्रगल्भा, सिंहवाहिनी, शुम्भादिदैत्यहन्त्री, महामहिषमर्दिनी, अमोघा, विन्ध्यनिलया, विक्रान्ता, गणनायिका—मैंने देवी भद्रकालीके इन नामविकारोंको यथाक्रम बता दिया, जो सम्यक् फल प्रदान करनेवाले हैं। जो लोग इनका पाठ करते हैं, उनका पाप शेष नहीं रह जाता है। जंगलमें, पर्वतपर, नगरमें, घरमें, जल अथवा स्थल कहीं भी रक्षाके लिये इनका प्रयोग करना चाहिये। विशेष रूपसे बाघ, हाथी तथा चोरोंसे भयके स्थानमें और सभी प्रकारकी विपत्तियोंमें देवीके नामोंको पढ़ना चाहिये। बुरे ग्रहों, भूतों, पूतना तथा मातृगणोंसे पीड़ित शिशुओंकी रक्षाके लिये इन नामोंका प्रयोग करना चाहिये॥ ३३०—३४३॥ |
| महादेवी कले द्वे तु प्रज्ञा श्रीश्च प्रकीर्तिते।<br>आभ्यां देवीसहस्त्राणि यैर्व्याप्तमखिलं जगत्॥ ३४४<br>अनया देवदेवोऽसौ सत्या रुद्रो महेश्वरः।<br>आतिष्ठत्सर्वलोकानां हिताय परमेश्वरः॥ ३४५<br>रुद्रः पशुपतिश्चासीत्पुरा दग्धं पुरत्रयम्।<br>देवाश्च पशवः सर्वे बभूवुस्तस्य तेजसा॥ ३४६<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि आदिसर्गक्रमं शुभम्।<br>स याति ब्रह्मणो लोकं श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्॥ ३४७ | 'प्रज्ञा' तथा 'श्री'—ये महादेवीकी दो कलाएँ कही गयी हैं। इन दोनोंसे हजारों देवियाँ उत्पन्न हुई हैं, जिनके द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। देवदेव महेश्वर परमेश्वर रुद्र सभी लोकोंके हितके लिये इन सतीके साथ [सर्वदा] विद्यमान रहते हैं। रुद्र पशुपति हैं। इन्होंने ही पूर्वकालमें त्रिपुरको दग्ध किया था। उन्हींके तेजसे सभी देवता पशु [जीव] हुए। जो [व्यक्ति] आदिसृष्टिके शुभ क्रमको पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा उत्तम द्विजोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोकको जाता है॥ ३४४—३४७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सृष्टिबिस्तारो नाम सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सृष्टिविस्तार' नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७०॥
७१- तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त एवं तपस्याद्वारा इन्हें कामचारी तीन पुरोंकी प्राप्ति, त्रिपुरासुरके विनाशके लिये देवताओंका उद्योग तथा भगवान् शंकरका उनपर अनुग्रह
| ३३२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
इकहत्तरवाँ अध्याय
तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त एवं तपस्याद्वारा इन्हें कामचारी तीन पुरोंकी प्राप्ति, त्रिपुरासुरके विनाशके लिये देवताओंका उद्योग तथा भगवान् शंकरका उनपर अनुग्रह
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] आपने संक्षेपमें |
|---|---|
| समासाद्विस्तराच्चैव सर्गः प्रोक्तस्त्वया शुभः।<br>कथं पशुपतिश्चासीत्पुरं दग्धुं महेश्वरः॥ १ | तथा विस्तारसे शुभ सर्गका निरूपण कर दिया। पशुपति महेश्वरने पुरको कैसे दग्ध किया और ब्रह्मासहित सभी |
| कथं च पशवश्चासन् देवाः सब्रह्मकाः प्रभोः।<br>मयस्य तपसा पूर्वं सुदुर्गं निर्मितं पुरम्॥ २ | देवता प्रभुके पशु कैसे हो गये? मयकी तपस्याके द्वारा पूर्वकालमें उत्तम दुर्गमय पुर निर्मित किया गया था। |
| हैमं च रजतं दिव्यमयस्मयमनुत्तमम्।<br>सुदुर्गं देवदेवेन दग्धमित्येव नः श्रुतम्॥ ३ | हमने सुना है कि देवदेव [शिव]-ने सोने, चाँदी तथा लोहेसे निर्मित दिव्य, उत्तम तथा सुन्दर दुर्गको जला |
| कथं ददाह भगवान् भगनेत्रनिपातनः।<br>एकेनेषुनिपातेन दिव्येनापि तदा कथम्॥ ४ | दिया था। भगके नेत्रका नाश करनेवाले भगवान् शिवने केवल एक बाणके प्रक्षेपसे उसे कैसे जला दिया और |
| विष्णुनोत्पादितैर्भूतैर्न दग्धं तत्पुरत्रयम्।<br>पुरस्य सम्भवः सर्वो वरलाभः पुरा श्रुतः॥ ५ | विष्णुके द्वारा उत्पन्न किये गये भूतगण उन तीनों पुरोंको क्यों नहीं जला सके? हमलोगोंने [उस] पुरकी उत्पत्ति |
| इदानीं दहनं सर्वं वक्तुमर्हसि सुव्रत।<br>तेषां तद्वचनं श्रुत्वा सूतः पौराणिकोत्तमः॥ ६ | तथा सम्पूर्ण वरप्राप्तिके विषयमें पहले ही सुन लिया है; अब हे सुव्रत! [पुरके] दहनके विषयमें पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा कीजिये॥ १—५ १/२॥ |
| यथा श्रुतं तथा प्राह व्यासाद्विश्वार्थसूचकात्। | तब उनका वचन सुनकर पौराणिकोंमें उत्तम सूतजीने समस्त अर्थोंके सूचक व्यासजीसे [इस विषयमें] जैसा सुना था, उसे बताया॥ ६ १/२॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] इस त्रिलोकीके |
| त्रैलोक्यस्यास्य शापाद्वि मनोवाक्कायसम्भवात्॥ ७ | मन-वाणी-शरीरजन्य शापके कारण स्कन्द (कार्तिकेय)- |
| निहते तारके दैत्ये तारपुत्रे सबान्धवे।<br>स्कन्देन वा प्रयत्नेन तस्य पुत्रा महाबलाः॥ ८ | के द्वारा प्रयत्नपूर्वक बान्धवोंसहित तारपुत्र दैत्य तारकके मार दिये जानेपर उसके महाबली पुत्रों विद्युन्माली, |
| विद्युन्माली तारकाक्षः कमलाक्षश्च वीर्यवान्।<br>तपस्तेपुर्महात्मानो महाबलपराक्रमाः॥ ९ | तारकाक्ष तथा पराक्रमी कमलाक्षने तप किया। महान् बल तथा पराक्रमवाले वे महात्मा कठोर तपमें लीन |
| तप उग्रं समास्थाय नियमे परमे स्थिताः।<br>तपसा कर्शयामासुर्देहान् स्वान् दानवोत्त्माः॥ १० | होकर परम नियममें स्थित थे। उन श्रेष्ठ दानवोंने तपस्याके द्वारा अपने शरीरोंको दुर्बल बना दिया। तब |
| तेषां पितामहः प्रीतो वरदः प्रददौ वरम्। | उनपर प्रसन्न होकर वरदाता ब्रह्माजीने उन्हें वर प्रदान किया॥ ७—१० १/२॥ |
| दैत्या ऊचुः | दैत्य बोले— 'सभी प्राणियोंसे सर्वदा हम सभीका |
| अवध्यत्वं च सर्वेषां सर्वभूतेषु सर्वदा॥ ११ | अवध्यत्व हो'—उन सभीने एक साथ सभी लोकोंके |
| सहिता वरयामासुः सर्वलोकपितामहम्।<br>तानब्रवीत्तदा देवो लोकानां प्रभुरव्ययः॥ १२ | पितामहसे यह वर माँगा। तब लोकोंके स्वामी अव्यय |
| अध्याय ७१ ] | तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त | ३३३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नास्ति सर्वामरत्वं वै निवर्तध्वमतोऽसुराः।<br>अन्यं वरं वृणीध्वं वै यादृशं सम्प्ररोचते॥ १३ | देव ब्रह्माने उनसे कहा—'हे असुरो! सभीको अमरत्व नहीं हुआ करता, अतः इसे छोड़ो और दूसरा वर माँगो, जो तुमलोगोंको अच्छा लगता हो'॥ ११—१३॥ |
| ततस्ते सहिता दैत्याः सम्प्रधार्य परस्परम्।<br>ब्रह्माणमब्रुवन् दैत्याः प्रणिपत्य जगद्गुरुम्॥ १४<br><br>वयं पुराणि त्रीण्येव समास्थाय महीमिमाम्।<br>विचरिष्याम लोकेश त्वत्प्रसादाज्जगद्गुरो॥ १५<br><br>तथा वर्षसहस्रेषु समेष्यामः परस्परम्।<br>एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येतानि चानघ॥ १६<br><br>समागतानि चैतानि यो हन्याद्भगवंस्तदा।<br>एकेनैवेषुणा देवः स नो मृत्युर्भविष्यति॥ १७ | तदनन्तर उन दैत्योंने मिलकर आपसमें विचार करके जगद्गुरु ब्रह्माको प्रणाम करके कहा—हे लोकेश! हे जगद्गुरो! तीन पुर स्थापित करके हमलोग आपकी कृपासे इस पृथ्वीपर विचरण करें। हमलोग एक हजार वर्षमें आपसमें मिलें और हे अनघ! ये तीनों पुर एकीभावको प्राप्त हों। हे भगवन्! जो इन इकट्ठे हुए पुरोंको एक ही बाणसे नष्ट कर दे, वह देव हमलोगोंका मृत्युस्वरूप हो॥ १४—१७॥ |
| एवमस्त्विति तान् देवः प्रत्युक्त्वा प्राविशद्दिवम्।<br>ततो मयः स्वतपसा चक्रे वीरः पुराण्यथ॥ १८<br><br>काञ्चनं दिवि तत्रासीदन्तरिक्षे च राजतम्।<br>आयसं चाभवद्भूमौ पुरं तेषां महात्मनाम्॥ १९<br><br>एकैकं योजनशतं विस्तारायामतः समम्।<br>काञ्चनं तारकाक्षस्य कमलाक्षस्य राजतम्॥ २०<br><br>विद्युन्मालेश्चायसं वै त्रिविधं दुर्गमुत्तमम्।<br>मयश्च बलवांस्तत्र दैत्यदानवपूजितः॥ २१<br><br>हैरण्ये राजते चैव कृष्णायासमये तथा।<br>आलयं चात्मनः कृत्वा तत्रास्ते बलवांस्तदा॥ २२ | 'ऐसा ही हो'—उनसे यह कहकर ब्रह्मदेव स्वर्गलोक चले गये। इसके बाद वीर [दानव] मयने अपनी तपस्याके द्वारा तीन पुरोंका निर्माण किया। उन महात्माओंका सुवर्णमय पुर स्वर्गमें, रजत (चाँदी)-मय पुर अन्तरिक्षमें तथा लौहमय पुर पृथ्वीपर था। उनमेंसे प्रत्येक पुर लम्बाई तथा चौड़ाईमें एक सौ योजनवाला और एक समान था। सोनेका पुर तारकाक्षका, चाँदीका पुर कमलाक्षका और लोहेका पुर विद्युन्मालीका था; तीनों प्रकारके दुर्ग उत्तम थे। बलशाली मय दैत्यों तथा दानवोंसे पूजित था; वह बलवान् मय वहाँ स्वर्णमय, रजतमय एवं काले लौहमय पुरमें अपना भवन बनाकर |
| ३३४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| श्लोक (संस्कृत) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| रहा करता था॥ १८–२२॥ | |
| एवं बभूवुर्दैत्यानामतिदुर्गाणि सुव्रताः।<br>पुराणि त्रीणि विप्रेन्द्रास्त्रैलोक्यमिव चापरम्॥ २३<br>पुरत्रये तदा जाते सर्वे दैत्या जगत्त्रये।<br>पुरत्रयं प्रविश्यैव बभूवुस्ते बलाधिकाः॥ २४ | हे सुव्रतो! हे विप्रेन्द्रो! इस प्रकार दैत्योंके सुदृढ़ किलोंसे युक्त वे तीनों पुर दूसरे त्रिलोकीके समान थे। तब तीनों पुरोंके [निर्मित] हो जानेपर वे सभी दैत्य उन तीनों पुरोंमें प्रवेश करके तीनों लोकोंमें अत्यधिक बलशाली हो गये॥ २३-२४॥ |
| कल्पद्रुमसमाकीर्णं गजवाजिसमाकुलम्।<br>नानाप्रासादसङ्कीर्णं मणिजालैः समावृतम्॥ २५<br>सूर्यमण्डलसङ्काशैर्विमानैर्विश्वतोमुखैः।<br>पद्मरागमयैः शुभ्रैः शोभितं चन्द्रसन्निभैः॥ २६<br>प्रासादैर्गोपुरैर्दिव्यैः कैलासशिखरोपमैः।<br>शोभितं त्रिपुरं तेषां पृथक्पृथगनुत्तमैः॥ २७<br>दिव्यस्त्रीभिः सुसम्पूर्णं गन्धर्वैः सिद्धचारणैः।<br>रुद्रालयैः प्रतिगृहं साग्निहोत्रैर्द्विजोत्तमाः॥ २८ | उनके तीनों पुर कल्पवृक्षोंसे भरे हुए, हाथी-घोड़ोंसे परिपूर्ण, अनेक भवनोंसे सुशोभित, मणियोंके जालोंसे घिरे हुए, सभी ओर द्वारोंवाले, सूर्यमण्डलसदृश विमानोंसे युक्त, पद्मरागमय चन्द्रसदृश उज्ज्वल महलोंसे सुशोभित और कैलासशिखरके समान दिव्य तथा अत्युत्तम फाटकोंसे पृथक्-पृथक् मण्डित थे। हे श्रेष्ठ द्विजो! वे पुर दिव्य स्त्रियों, गन्धर्वों, सिद्धों एवं चारणोंसे भरे हुए थे। प्रत्येक घरमें रुद्रालय थे और अग्निहोत्र होता था। |
| वापीकूपतडागैश्च दीर्घिकाभिस्तु सर्वतः।<br>मत्तमातङ्गयूथैश्च तुरङ्गैश्च सुशोभनैः॥ २९<br>रथैश्च विविधाकारैर्विचित्रैर्विश्वतोमुखैः।<br>सभाप्रपादिभिश्चैव क्रीडास्थानैः पृथक् पृथक्॥ ३०<br>वेदाध्ययनशालाभिर्विविधाभिः समन्ततः।<br>अधृष्यं मनसाप्यन्यैर्मयस्यैव च मायया॥ ३१ | वे पुर सभी ओर बावलियों, कुओं, तालाबों और बड़ी-बड़ी झीलोंसे युक्त थे; मत्त हाथियोंके झुण्डों, अति सुन्दर घोड़ों, चारों ओर मुखवाले अनेक प्रकारके अद्भुत रथों, सभाभवनों, पानीय (जल)-की शालाओं तथा क्रीड़ास्थलोंसे पृथक्-पृथक् समन्वित थे। वे पुर चारों ओर अनेकविध वेदाध्ययनशालाओंसे युक्त थे और मय [दानव]-की मायासे अन्य लोगोंद्वारा मनसे भी अलंघ्य थे। |
| पतिव्रताभिः सर्वत्र सेवितं मुनिपुङ्गवाः।<br>कृत्वापि सुमहत्पापमपापैः शङ्करार्चनात्॥ ३२<br>दैत्येश्वरैर्महाभागैः सदारैः ससुतैर्द्विजाः।<br>श्रौतस्मार्तार्थधर्मज्ञैस्तद्धर्मनिरतैः सदा॥ ३३<br>महादेवेतरं त्यक्त्वा देवं तस्यार्चनं स्थितैः।<br>व्यूढोरस्कैर्वृषस्कन्धैः सर्वायुधधरैः सदा॥ ३४<br>सर्वदा क्षुधितैश्चैव दावाग्निसदृशेक्षणैः।<br>प्रशान्तैः कुपितैश्चैव कुब्जैर्वामनकैस्तथा॥ ३५<br>नीलोत्पलदलप्रख्यैर्नीलकुञ्चितमूर्धजैः।<br>नीलाद्रिमेरुसङ्काशैर्नीरदोपमनिःस्वनैः।<br>मयेन रक्षितैः सर्वैः शिक्षितैर्युद्धलालसैः॥ ३६ | हे मुनिश्रेष्ठो! वे पुर सर्वत्र पतिव्रता स्त्रियोंके द्वारा सेवित थे। हे द्विजो! वे पुर बड़े-बड़े पाप करके भी शंकरजीकी पूजाके कारण पापरहित, श्रौत-स्मार्त धर्मोंके ज्ञाता तथा अपने धर्मके प्रति परायण भार्यासहित महाभाग्यशाली दैत्योंसे सदा समन्वित थे; महादेवके अतिरिक्त अन्य देवताको छोड़कर उन [शिव]-के अर्चनमें स्थित, चौड़ी छातीवाले, बैलके समान कंधेवाले, सर्वदा समस्त आयुध धारण करनेवाले, सदा उपवास करनेवाले, दावानलके समान नेत्रोंवाले, उनमें कुछ शान्त तथा कुछ कुपित, कुबड़े, बौने, नील कमलदलकी आभाके सदृश, काले एवं घुँघराले बालोंवाले, नीलपर्वत तथा मेरुके समान प्रतीत होनेवाले, मेघके समान गर्जन करनेवाले, मयके द्वारा रक्षित तथा शिक्षित और युद्धकी तीव्र इच्छावाले दैत्योंसे परिपूर्ण थे। इस प्रकार वे पुर |
| अथ समररतैः सदासमन्ता-<br>च्छिवपदपूजनया सुलब्धवीर्यैः। |
अध्याय ७१ ] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त ३३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रविमरुदमरेन्द्रसन्निकाशैः<br>सुरमथनैः सुदृढैः सुसेवितं तत् ॥ ३७ | सदा युद्धपरायण, भलीभाँति शिवके चरणोंकी पूजाके द्वारा प्राप्त पराक्रमवाले, सूर्य-वायु-इन्द्रसदृश, देवताओंका दमन करनेवाले तथा अत्यन्त दृढ़ दैत्योंसे सेवित थे॥ २५-३७॥ |
| सेन्द्रा देवा द्विजश्रेष्ठा द्रुमा दावाग्निना यथा।<br>पुरत्रयाग्निना दग्धा ह्यभवन् दैत्यवैभवात् ॥ ३८ | हे द्विजश्रेष्ठो! दैत्योंके वैभवके कारण तीनों पुरोंकी अग्निसे इन्द्रसहित देवतागण उसी प्रकार दग्ध हो गये, जैसे दावाग्निसे वृक्ष दग्ध हो जाते हैं॥ ३८॥ |
| अथैवं ते तदा दग्धा देवा देवेश्वरं हरिम्।<br>अभिवन्द्य तदा प्राहुस्तमप्रतिमवर्चसम् ॥ ३९ | इस प्रकार उन दग्ध देवताओंने अतुलनीय तेजवाले देवेश्वर विष्णुको प्रणाम करके उनको [यह सब] बताया॥ ३९॥ |
| सोऽपि नारायणः श्रीमान् चिन्तयामास चेतसा।<br>किं कार्यं देवकार्येषु भगवानिति स प्रभुः ॥ ४०<br><br>तदा सस्मार वै यज्ञं यज्ञमूर्तिर्जनार्दनः।<br>यज्वा यज्ञभुगीशानो यज्वनां फलदः प्रभुः ॥ ४१ | तब उन श्रीमान् प्रभु भगवान् नारायणने मनमें सोचा कि देवताओंके कार्यके विषयमें क्या किया जाना चाहिये। इसके बाद यज्ञभोक्ता, यज्ञकर्ता, यज्ञकर्ताओंको फल प्रदान करनेवाले तथा यज्ञमूर्ति प्रभु जनार्दनने यज्ञदेवका स्मरण किया॥ ४०-४१॥ |
| ततो यज्ञः स्मृतस्तेन देवकार्यार्थसिद्धये।<br>देवं ते पुरुषं चैव प्रणेमुस्तुष्टुवुस्तदा ॥ ४२<br><br>भगवानपि तं दृष्ट्वा यज्ञं प्राह सनातनम्।<br>सनातनस्तदा सेन्द्रान् देवानालोक्य चाच्युतः ॥ ४३ | तदनन्तर देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये उनके द्वारा स्मरण किये गये यज्ञदेव उपस्थित हुए। तब उन देवताओंने यज्ञदेवको प्रणाम किया और उनकी स्तुति की। इसके बाद सनातन यज्ञको देखकर पुनः इन्द्रसहित देवताओंकी ओर देखकर सनातन भगवान् अच्युत (विष्णु) उनसे कहने लगे॥ ४२-४३॥ |
| श्रीविष्णुरुवाच<br>अनेनोपसदा देवा यजध्वं परमेश्वरम्।<br>पुरत्रयविनाशाय जगत्त्रयविभूतये ॥ ४४ | श्रीविष्णु बोले—हे देवताओ! तीनों पुरोंके विनाशके लिये तथा तीनों लोकोंकी समृद्धिके लिये इन [उपस्थित] उपसद नामक यज्ञके द्वारा परमेश्वरका यजन कीजिये॥ ४४॥ |
| सूत उवाच<br>अथ तस्य वचः श्रुत्वा देवदेवस्य धीमतः।<br>सिंहनादं महत्कृत्वा यज्ञेशं तुष्टुवुः सुराः ॥ ४५ | सूतजी बोले—उन बुद्धिमान् देवदेवका वचन सुनकर महान् सिंहनाद करके देवतागण [उन] यज्ञेशकी स्तुति करने लगे॥ ४५॥ |
| ततः सञ्चिन्त्य भगवान् स्वयमेव जनार्दनः।<br>पुनः प्राह स सर्वांस्तांस्त्रिदशांस्त्रिदशेश्वरः ॥ ४६<br><br>हत्वा दग्ध्वा च भूतानि भुक्त्वा चान्यायतोऽपि वा।<br>यजेद्यदि महादेवमपापो नात्र संशयः ॥ ४७ | इसके बाद स्वयं विचार करके देवताओंके स्वामी वे भगवान् जनार्दन पुनः सभी देवताओंसे बोले—प्राणियोंको मारकर तथा जलाकर और अन्यायपूर्वक भोग-विलास करके भी यदि कोई महादेवकी पूजा करे, तो वह पापरहित हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ४६-४७॥ |
| अपापा नैव हन्तव्याः पापा एव न संशयः।<br>हन्तव्याः सर्वयत्नेन कथं वध्याः सुरोत्तमाः ॥ ४८ | 'निष्पाप लोगोंकी हत्या नहीं की जानी चाहिये; केवल पापियोंकी ही हत्या पूर्णप्रयत्नसे की जानी |
| ३३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| असुरा दुर्मदाः पापा अपि देवैर्महाबलैः।<br>तस्मान्न वध्या रुद्रस्य प्रभावात्परमेष्ठिनः॥ ४९<br><br>कोऽहं ब्रह्माथवा देवा दैत्या देवारिसूंदनाः।<br>मुनयश्च महात्मानः प्रसादेन विना प्रभोः॥ ५० | चाहिये; इसमें सन्देह नहीं है। हे श्रेष्ठ देवताओ! पापी होते हुए भी दुर्मद असुर महाबली देवताओंके द्वारा वध्य कैसे हो सकते हैं? क्योंकि परमेष्ठी रुद्रके प्रभावके कारण वे वध्य नहीं हैं। हे देवताओ! प्रभु [शिव]-की कृपाके बिना मैं कौन हूँ, ब्रह्मा कौन हैं, दैत्य कौन हैं, देवशत्रुओंके विनाशक कौन हैं और महात्मा मुनिगण कौन हैं?॥ ४८-५०॥ | | यः सप्तविंशको नित्यः परात्परतरः प्रभुः।<br>विश्वामरेश्वरो वन्द्यो विश्वाधारो महेश्वरः॥ ५१<br><br>स एव सर्वदेवेशः सर्वेषामपि शङ्करः।<br>लीलया देवदैत्येन्द्रविभागमकरोद्धरः॥ ५२ | जो सत्ताईस तत्त्वोंसे युक्त, शाश्वत, महान्से भी महत्तर, प्रभुतासम्पन्न, सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी, वन्दनीय, विश्वके आधार, महेश्वर, सर्वदेवेश तथा सबके स्वामी हैं; उन हर शंकरने ही [अपनी] लीलासे देवताओं एवं दैत्योंका विभाजन किया है॥ ५१-५२॥ | | तस्यांशमेकं सम्पूज्य देवा देवत्वमागताः।<br>ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापन्नो ह्यहं विष्णुत्वमेव च॥ ५३<br><br>तमपूज्य जगत्यस्मिन् कः पुमान् सिद्धिमिच्छति।<br>तस्मात्तेनैव हन्तव्या लिङ्गार्चनविधेर्बलात्॥ ५४<br><br>धर्मनिष्ठाश्च ते सर्वे श्रौतस्मार्तविधौ स्थिताः।<br>तथापि यजमानेन रौद्रेणोपसदा प्रभुम्।<br>रुद्रमिष्ट्वा यथान्यायं जेष्यामो दैत्यसत्तमान्॥ ५५<br><br>सतारकाक्षेण मयेन गुप्तं<br>स्वस्थं च गुप्तं स्फटिकाभमेकम्।<br>को नाम हन्तुं त्रिपुरं समर्थो<br>मुक्त्वा त्रिनेत्रं भगवन्तमेकम्॥ ५६ | उनके एक अंश (लिङ्गरूप)-की पूजा करके देवताओंने देवत्व प्राप्त किया है, ब्रह्माने ब्रह्मत्व प्राप्त किया है और मुझ विष्णुने विष्णुत्व प्राप्त किया है। उनकी पूजा किये बिना इस जगत्में कौन व्यक्ति सिद्धि प्राप्त कर सकता है? अतः लिङ्गार्चनविधिके प्रभावसे उन्हींके द्वारा वे दैत्य हन्तव्य हैं। यद्यपि वे सभी [दैत्य] धर्मनिष्ठ हैं तथा श्रौत-स्मार्तविधानमें स्थित हैं, फिर भी उपसद नामक रुद्रयज्ञसे यजमानके द्वारा विधिपूर्वक प्रभु रुद्रका यजन करके हमलोग महादैत्योंको जीत सकेंगे। एकमात्र त्रिनेत्र भगवान् [शिव]-को छोड़कर तारकाक्षसहित [दानव] मयके द्वारा सुरक्षित, स्वस्थ, गुप्त तथा स्फटिकके समान आभावाले तीनों पुरोंको नष्ट करनेमें भला कौन समर्थ है?॥ ५३-५६॥ | | सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा हरिश्चेष्ट्वा यज्ञेनोपसदा प्रभुम्।<br>उपविष्टो ददर्शाथ भूतसङ्घान् सहस्रशः॥ ५७<br><br>शूलशक्तिगदाहस्तान् टङ्कोपलशिलायुधान्।<br>नानाप्रहरणोपेतान्नानावेषधरांस्तदा ॥ ५८<br><br>कालाग्निरुद्रसङ्काशान् कालरुद्रोपमांस्तदा।<br>प्राह देवो हरिः साक्षात्प्रणिपत्य स्थितान् प्रभुः॥ ५९ | सूतजी बोले— इस प्रकार उपसद [नामक] यज्ञके द्वारा प्रभु [शिव]-का यजन करके बैठे हुए विष्णुने हजारों भूतसमुदायोंको देखा। तब शूल-शक्ति-गदासे युक्त हाथोंवाले, टंक-उपल-शिलाको आयुधके रूपमें धारण किये हुए, अनेक प्रकारके प्रहारयोग्य अस्त्रोंसे समन्वित, अनेक वेषोंको धारण किये हुए, कालाग्नि रुद्रके समान प्रतीत होनेवाले तथा कालरुद्रके सदृश उन उपस्थित भूतोंको प्रणाम करके साक्षात् प्रभु विष्णुदेव कहने लगे॥ ५७-५९॥ |
अध्याय ७१] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त ३३७
| विष्णुरुवाच | विष्णु बोले— |
|---|---|
| दग्ध्वा भित्त्वा च भुक्त्वा च गत्वा दैत्यपुरत्रयम्।<br>पुनर्यथागतं वीरा गन्तुमर्हथ भूतले॥ ६० | हे वीरो! उस [त्रिपुर] दैत्यके तीनों पुरोंमें जाकर सभीको जलाकर, छिन्न-भिन्न करके और उनका भक्षण करके पुनः आपलोग जैसे आये हैं, वैसे ही भूतलपर चले जायँ॥ ६०॥ |
| ततः प्रणम्य देवेशं भूतसङ्घाः पुरत्रयम्।<br>प्रविश्य नष्टास्ते सर्वे शलभा इव पावकम्॥ ६१ | तत्पश्चात् देवेशको प्रणाम करके तीनों पुरोंमें प्रवेश करके वे भूतगण उसी तरह नष्ट हो गये, जैसे अग्निमें प्रवेश करके शलभ (पतिंगे) नष्ट हो जाते हैं॥ ६१॥ |
| ततस्तु नष्टास्ते सर्वे भूता देवेशवराज्ञया।<br>ननृतुर्मुदुशुश्चैव जगुर्दैत्याः सहस्त्रशः॥ ६२<br>तुष्टुवुर्देवदेवेशं परमात्मानमीश्वरम्।<br>ततः पराजिता देवा ध्वस्तवीर्याः क्षणेन तु॥ ६३<br>सेन्द्राः सङ्गम्य देवेशमुपेन्द्रं धिष्ठिता भयात्।<br>तान् दृष्ट्वा चिन्तयामास भगवान् पुरुषोत्तमः॥ ६४<br>किं कृत्यमिति सन्तप्तः सन्तप्तान् सेन्द्रकान् क्षणम्।<br>कथं तु तेषां दैत्यानां बलं हत्वा प्रयत्नतः॥ ६५<br>देवकार्यं करिष्यामि प्रसादात्परमेष्ठिनः।<br>पापं विचारतो नास्ति धर्मिष्ठानां न संशयः॥ ६६<br>तस्माद्दैत्या न वध्यास्ते भूतैश्चोपसदोद्भवैः।<br>पापं नुदति धर्मेण धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ ६७<br>धर्मादैश्वर्यमित्येषा श्रुतिरेषा सनातनी।<br>दैत्याश्चैते हि धर्मिष्ठाः सर्वे त्रिपुरवासिनः॥ ६८<br>तस्मादवध्यतां प्राप्ता नान्यथा द्विजपुङ्गवाः।<br>कृत्वापि सुमहत्पापं रुद्रमभ्यर्चयन्ति ये॥ ६९<br>मुच्यन्ते पातकैः सर्वैः पद्मपत्रमिवाम्भसा।<br>पूजया भोगसम्पत्तिरवश्यं जायते द्विजाः॥ ७०<br>तस्मात्ते भोगिनो दैत्या लिङ्गार्चनपरायणाः।<br>तस्मात्कृत्वा धर्मविघ्नमहं देवाः स्वमायया॥ ७१<br>दैत्यानां देवकार्यार्थं जेष्येऽहं त्रिपुरं क्षणात्। | तब देवेश्वरकी आज्ञासे उन सभी भूतोंके नष्ट हो जानेपर हजारों दैत्य आनन्द मनाने लगे, नाचने-गाने लगे और देवेश परमात्मा ईश्वरकी स्तुति करने लगे॥ ६२ १/२॥<br><br>तदनन्तर क्षणभरमें पराजित तथा नष्ट पराक्रमवाले इन्द्रसहित देवतागण देवेश विष्णुके पास पहुँचकर भयपूर्वक खड़े हो गये। तब इन्द्रसहित उन सन्तप्त देवताओंको देखकर भगवान् पुरुषोत्तम उस समय दुःखी होकर सोचने लगे—क्या किया जाना चाहिये? प्रयत्नपूर्वक उन दैत्योंका बल नष्ट करके मैं कैसे देवताओंका कार्य करूँगा? विचारपूर्वक देखा जाय, तो शिवकी कृपासे उन धर्मनिष्ठ दैत्योंमें पाप नहीं है, अतः वे दैत्य उपसद [नामक] यज्ञसे उत्पन्न भूतोंके द्वारा वध्य नहीं हैं। धर्मसे ही पाप नष्ट होता है; सब कुछ धर्ममें ही प्रतिष्ठित है। धर्मसे ऐश्वर्य प्राप्त होता है—यह सनातनी श्रुति है। [सूतजीने कहा—] हे द्विजश्रेष्ठो! तीनों पुरोंमें निवास करनेवाले वे सभी दैत्य धर्मनिष्ठ थे, अर्थात् अनुष्ठानमें तत्पर थे। अतः वे अवध्यताको प्राप्त हो गये थे; इसमें सन्देह नहीं है। बहुत बड़ा पाप करके भी जो लोग रुद्रका अर्चन करते हैं, वे सभी पापोंसे मुक्त हो जाते हैं; जैसे जलसे कमल मुक्त रहता है। हे द्विजो! शिवकी पूजासे भोगसम्पदा अवश्य प्राप्त होती है; वे दैत्य लिङ्ग-पूजामें परायण हैं, अतः वे भोगोंसे युक्त हैं। [विष्णुने कहा—] हे देवताओ! इसलिये मैं देवताओंके कार्यके लिये अपनी मायासे दैत्योंके धर्म (अनुष्ठान)-में विघ्न डालकर क्षणभरमें तीनों पुरोंको जीत लूँगा॥ ६३—७१ १/२॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| विचार्यैवं ततस्तेषां भगवान् पुरुषोत्तमः।<br>कर्तुं व्यवसितश्चाभूद्धर्मविघ्नं सुरारिणाम्॥ ७२<br>असृजच्च महातेजाः पुरुषं चात्मसम्भवम्।<br>मायी मायामयं तेषां धर्मविघ्नार्थमच्युतः॥ ७३ | ऐसा विचार करके भगवान् पुरुषोत्तम उन देवशत्रुओं (दैत्यों)-के धर्ममें विघ्न उत्पन्न करनेके लिये प्रवृत्त हुए। महातेजस्वी मायावी अच्युतने उनके धर्मविघ्नके |