श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रधानगुणवैषम्यात्सर्गकालः प्रवर्तते।<br>ईश्वराधिष्ठितात्पूर्वं तस्मात्सदसदात्मकात्॥ ८४<br><br>संसिद्धः कार्यकारणे रुद्रश्चाग्रे ह्यवर्तत।<br>तेजसाप्रतिमो धीमानव्यक्तः सम्प्रकाशकः॥ ८५<br><br>स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते।<br>ब्रह्मा च भगवांस्तस्माच्चतुर्वक्त्रः प्रजापतिः॥ ८६<br><br>संसिद्धः कार्यकारणे तथा वै समवर्तत।<br>एक एव महादेवस्त्रिधैव स व्यवस्थितः॥ ८७<br><br>अप्रतीपेन ज्ञानेन ऐश्वर्येण समन्वितः।<br>धर्मेण चाप्रतीपेन वैराग्येण च तेऽन्विताः॥ ८८ | सबसे पहले ईश्वरसे अधिष्ठित तथा सत्-असत्स्वरूप उस प्राकृत गुणवैषम्यके कारण सृष्टिका काल प्रवर्तित होता है। अपने तेजसे अनुपम, बुद्धिमान्, अव्यक्त तथा सम्यक् प्रकाश करनेवाले रुद्र सबसे पहले कार्य करनेमें तत्पर हुए। वे ही प्रथम शरीरधारी हैं और वे ही पुरुष कहे जाते हैं। चार मुखवाले तथा प्रजाओंके स्वामी भगवान् ब्रह्मा उन्हींसे उत्पन्न हुए और सृष्टिकार्य करनेमें समर्थ हुए। इस प्रकार वे एक ही महादेव तीन रूपोंमें व्यवस्थित हैं। वे [महादेव] अनुकूल ज्ञान तथा ऐश्वर्यसे युक्त हैं और वे तीनों देवता भी अनुकूल धर्म तथा वैराग्यसे युक्त हैं॥ ८४-८८॥ |
| अव्यक्ताज्जायते तेषां मनसा यद्यदीहितम्।<br>वशीकृतत्वात्त्रैगुण्यं सापेक्षत्वात्स्वभावतः॥ ८९ | वशीभूत होने तथा सापेक्ष होनेके कारण उन देवताओंके मनमें जो-जो त्रिगुणात्मक सृष्टिविषयकी अभिलाषा थी, वह स्वभावसे ही अव्यक्तसे उत्पन्न हुई॥ ८९॥ |
| चतुर्मुखस्तु ब्रह्मत्वे कालत्वे चान्तकः स्मृतः।<br>सहस्रमूर्धा पुरुषस्तिस्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः॥ ९०<br><br>ब्रह्मत्वे सृजते लोकान् कालत्वे सङ्क्षिपत्यपि।<br>पुरुषत्वे ह्युदासीनस्तिस्रोऽवस्थाः प्रजापतेः॥ ९१<br><br>ब्रह्मा कमलगर्भाभो रुद्रः कालाग्निसन्निभः।<br>पुरुषः पुण्डरीकाक्षो रूपं तत्परमात्मनः॥ ९२ | वे परमेश्वर ही ब्रह्माके रूपमें चार मुखवाले तथा कालके रूपमें संहार करनेवाले कहे गये हैं। वे ही हजार सिरोंवाले पुरुष विष्णु भी हैं। इस प्रकार स्वयम्भू [परमेश्वर]-की तीन अवस्थाएँ हैं। ब्रह्माके रूपमें वे लोकोंका सृजन करते हैं, कालके रूपमें उनका संहार भी करते हैं और पुरुषके रूपमें उदासीन रहते हैं; उन प्रजापतिकी तीन अवस्थाएँ हैं। ब्रह्मा कमलगर्भकी आभावाले हैं, रुद्र कालाग्निके समान हैं तथा पुरुष [विष्णु] कमलके समान नेत्रवाले हैं—यह उन परमात्माका रूप है॥ ९०-९२॥ |
| एकधा स द्विधा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः।<br>महेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च॥ ९३<br><br>नानाकृतिक्रियारूपनामवन्ति स्वलीलया।<br>महेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च॥ ९४ | वे महेश्वर एक, दो, तीन तथा अनेक प्रकारके शरीर धारण करते हैं और उन्हें नष्ट भी कर देते हैं। वे महेश्वर अपनी लीलासे अनेक आकृति, क्रिया, रूप तथा नामवाले शरीरोंको धारण करते हैं और उन्हें नष्ट भी कर देते हैं॥ ९३-९४॥ |
| त्रिधा यद्वर्तते लोके तस्मात्त्रिगुण उच्यते।<br>चतुर्धा प्रविभक्तत्वाच्चतुर्व्यूहः प्रकीर्तितः॥ ९५ | वे [परमेश्वर] लोकमें तीन रूपोंमें विद्यमान हैं, इसलिये वे तीन गुणोंवाले कहे जाते हैं और चार भागोंमें विभक्त होनेके कारण 'चतुर्व्यूह' कहे गये हैं॥ ९५॥ |
| यदाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानयम्।<br>यच्चास्य सततं भावस्तस्मादात्मा निरुच्यते॥ ९६ | ये विषयोंको प्राप्त करते हैं, ग्रहण करते हैं और उनका भक्षण कर जाते हैं; ऐसा इनका शाश्वत भाव |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... ...सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| है, इसलिये ये 'आत्मा' कहे जाते हैं ॥ ९६ ॥ | |
| ऋषिः सर्वगतत्वाच्च शरीरी सोऽस्य यत्प्रभुः ।<br>स्वामित्वमस्य यत्सर्वं विष्णुः सर्वप्रवेशनात् ॥ ९७ | सर्वत्र गमन करनेके कारण ये ऋषि हैं; वे परमेश्वर इस शरीरके प्रभु हैं तथा इसपर उनका पूर्ण स्वामित्व है; अतः वे शरीरी हैं और सर्वत्र प्रवेश करनेके कारण वे विष्णु हैं ॥ ९७ ॥ |
| भगवान् भगवद्भावान्निर्मलत्वाच्छिवः स्मृतः ।<br>परमः सम्प्रकृष्टत्वादवनादोमिति स्मृतः ॥ ९८<br><br>सर्वज्ञः सर्वविज्ञानात्सर्वः सर्वमयो यतः ।<br>त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैलोक्यं सम्प्रवर्तते ॥ ९९<br><br>सृजते ग्रसते चैव रक्षते च त्रिभिः स्वयम् ।<br>आदित्वादादिदेवोऽसावजातत्वादजः स्मृतः ॥ १००<br><br>पाति यस्मात्प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः ।<br>देवेषु च महान् देवो महादेवस्ततः स्मृतः ॥ १०१<br><br>सर्वगत्वाच्च देवानामवश्यत्वाच्च ईश्वरः ।<br>बृहत्त्वाच्च स्मृतो ब्रह्मा भूतत्वाद्भूत उच्यते ॥ १०२<br><br>क्षेत्रज्ञः क्षेत्रविज्ञानादेकत्वात्केवलः स्मृतः ।<br>यस्मात्पुर्यां स शेते च तस्मात्पूरुष उच्यते ॥ १०३<br><br>अनादित्वाच्च पूर्वत्वात्स्वयम्भूरिति संस्मृतः ।<br>याज्यत्वादुच्यते यज्ञः कविर्विक्रान्तदर्शनात् ॥ १०४ | वे ऐश्वर्यमय भावसे युक्त होनेके कारण 'भगवान्' तथा निर्मल होनेके कारण 'शिव' कहे गये हैं। वे विशिष्ट होनेके कारण 'परम' तथा रक्षा करनेके कारण 'ओम्' कहे गये हैं। वे सब कुछ सम्यक् जाननेके कारण 'सर्वज्ञ' हैं तथा सर्वमय होनेके कारण 'सर्व' हैं; वे अपनेको तीन रूपोंमें विभक्त करके तीनों लोकोंका संचालन करते हैं; वे तीन रूपोंसे स्वयं [जगतका] सृजन करते हैं, पालन करते हैं तथा संहार करते हैं ॥ ९८-९९ १/२ ॥<br><br>वे आदि (प्रारम्भ)-में प्रकट होनेके कारण 'आदिदेव' तथा अजन्मा होनेके कारण 'अज' कहे गये हैं। वे समस्त प्रजाओंकी रक्षा करते हैं, इसलिये 'प्रजापति' कहे गये हैं। वे देवताओंमें [सबसे] महान् देवता हैं, इसलिये 'महादेव' कहे गये हैं। वे सर्वव्यापी होने तथा किसीके वशमें न होनेके कारण देवताओंके भी 'ईश्वर', बृहत् होनेके कारण 'ब्रह्मा' तथा अपने भूतत्व (अस्तित्व)-के कारण 'भूत' कहे जाते हैं। वे क्षेत्रोंका ज्ञान रखनेके कारण 'क्षेत्रज्ञ' तथा एकमात्र होनेके कारण 'केवल' कहे गये हैं। चूँकि वे पुरी (शरीर)-में शयन करते हैं, इसलिये 'पुरुष' कहे जाते हैं। वे अनादि होने तथा [सबसे] पहले होनेके कारण 'स्वयम्भू' कहे गये हैं। वे यजनके योग्य होनेके कारण 'यज्ञ' तथा इन्द्रियोंसे न दिखायी देनेवाली वस्तुओंको भी देखनेके कारण 'कवि' कहे जाते हैं ॥ १००-१०४ ॥ |
| क्रमणः क्रमणीयत्वात्पालकश्चापि पालनात् ।<br>आदित्यसंज्ञः कपिलो ह्यग्रजोऽग्निरिति स्मृतः ॥ १०५ | वे क्रमणीय (पहुँचनेके योग्य) होनेके कारण 'क्रमण', [सबका] पालन करनेके कारण 'पालक', कपिलवर्ण होनेके कारण 'आदित्य' और सबसे पहले उत्पन्न होनेके कारण 'अग्नि' कहे गये हैं ॥ १०५ ॥ |
| हिरण्यमस्य गर्भोऽभूद्धिरण्मयस्यापि गर्भजः ।<br>तस्माद्धिरण्मयगर्भत्वं पुराणेऽस्मिन्निरुच्यते ॥ १०६ | हिरण्यमय अण्ड इनसे उत्पन्न हुआ और ये भी हिरण्यमय अण्डसे उत्पन्न हुए, अतः इस पुराणमें उन्हें |
| ३१४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| मूल संस्कृत (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
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| 'हिरण्यगर्भ' कहा जाता है॥१०६॥ | |
| स्वयम्भुवोऽपि वृत्तस्य कालो विश्वात्मनस्तु यः।<br>न शक्यः परिसंख्यातुमपि वर्षशतैरपि ॥ १०७<br>कालसंख्याविवृत्तस्य परार्धो ब्रह्मणः स्मृतः।<br>तावच्छेषोऽस्य कालोऽन्यस्तस्यान्ते प्रतिसृज्यते ॥ १०८ | अतीत विश्वात्मा स्वयम्भूका जो काल है, उसकी गणना सौ वर्षोंमें भी नहीं की जा सकती है। वर्तमान ब्रह्माकी कालसंख्याको परार्ध कहा गया है। उतने ही परिमाणवाला इनका काल [द्वितीय परार्ध] शेष रहता है; उसके अन्तमें जगत्का संहार हो जाता है। कल्पोंके हजारों करोड़ जो दिन व्यतीत हो गये हैं, उतने ही दूसरे अभी शेष हैं॥१०७-१०८ १/२॥ |
| कोटिकोटिसहस्राणि अहर्भूतानि यानि वै।<br>समतीतानि कल्पानां तावच्छेषाः परे तु ये।<br>यस्त्वयं वर्तते कल्पो वाराहस्तं निबोधत ॥ १०९<br>प्रथमः साम्प्रतस्तेषां कल्पोऽयं वर्तते द्विजाः।<br>यस्मिन् स्वायम्भुवाद्यास्तु मनवस्ते चतुर्दश ॥ ११०<br>अतीता वर्तमानाश्च भविष्या ये च वै पुनः।<br>तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता ॥ १११<br>पूर्णं युगसहस्त्रं वै परिपाल्या महेश्वरैः।<br>प्रजाभिस्तपसा चैव तेषां शृणुत विस्तरम् ॥ ११२ | जो यह वाराहकल्प चल रहा है, उसके विषयमें सुनिये। हे द्विजो! यह वर्तमान कल्प उनमें प्रथम [कल्प] है, जिसमें स्वायम्भुव आदि चौदह मनु व्यवस्थित हैं। बीत चुके, वर्तमान तथा अभी होनेवाले जो मनु हैं, उन महेश्वर मनुओंद्वारा अपनी तपस्यासे प्रजाओंके साथ सातों द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीका पालन पूरे हजार वर्षोंतक किया जाता है; अब उनका विस्तृत वर्णन सुनिये॥१०९-११२॥ |
| मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि च।<br>कथितानि भविष्यन्ति कल्पः कल्पेन चैव हि ॥ ११३<br>अतीतानि च कल्पानि सोदर्काणि सहानुवैः।<br>अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता ॥ ११४ | [हे ऋषियो!] एक मन्वन्तरके वर्णनसे सभी मन्वन्तरोंका तथा एक कल्पके वर्णनसे दूसरे कल्पका भी वर्णन हो जायगा। अपने वंशके राजाओंके साथ बीते हुए कल्प जिस रूपमें होते हैं, विद्वान्को वैसा ही तर्क (अनुमान) अनागत (भविष्य) कल्पोंके विषयमें भी कर लेना चाहिये॥११३-११४॥ |
| आपो ह्यग्रे समभवन्नष्टे च पृथिवीतले।<br>शान्ततारैकनीरेऽस्मिन् प्राजायत किञ्चन ॥ ११५<br>एकार्णवे तदा तस्मिन्नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>तदा भवति वै ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ ११६<br>सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णस्त्वतीन्द्रियः।<br>ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु सुषुवाप सलिले तदा ॥ ११७<br>सत्त्वोद्रेकात्प्रबुद्धस्तु शून्यं लोकमुदैक्षत।<br>इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति ॥ ११८<br>आपो नाराश्च सूनव इत्यपां नाम शुश्रुमः।<br>आपूर्य ताभिरयनं कृतवानात्मनो यतः ॥ ११९<br>अप्सु शेते यतस्तस्मात्ततो नारायणः स्मृतः।<br>चतुर्युगसहस्रस्य नैशं कालमुपास्यतः ॥ १२० | पृथ्वीतलके नष्ट हो जानेपर सबसे पहले जल प्रादुर्भूत हुआ; विनष्ट नक्षत्रोंसे युक्त तथा उस विस्तृत जलमय ब्रह्माण्डमें कुछ भी नहीं मालूम पड़ता था। उस एकार्णव (प्रलयसागर)-में [समस्त] स्थावर-जंगमके विनष्ट हो जानेपर हजार नेत्रोंवाले, हजार पैरवाले, हजार सिरवाले तथा स्वर्णिम रंगवाले अतीन्द्रिय ब्रह्मा पुरुषरूपमें प्रकट हुए। उस समय नारायणसंज्ञक वे ब्रह्मा जलमें सोये हुए थे। पुनः सत्त्वगुणके उद्रेकके कारण जगे हुए उन ब्रह्माने लोकको शून्य देखा। लोग उन नारायणके प्रति इस श्लोकको उदाहृत करते हैं-जलका अर्थ है 'नार' तथा 'सूनु'-हमलोग जलके ये दो नाम सुनते हैं। उस जलसे पूरित करके उन्होंने अपना 'अयन' (निवासस्थान) बनाया और वे जलमें सोते हैं, इसलिये |
| अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप… सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव | ३१५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| 'नारायण' कहे गये हैं॥ ११५-११९ १/२॥ | |
| शार्वर्यन्ते प्रकुरुते ब्रह्मत्वं सर्गकारणात्।<br>ब्रह्मा तु सलिले तस्मिन् वायुर्भूत्वा समाचरत्॥ १२१<br><br>निशायामिव खद्योतः प्रावृट्काले ततस्तु सः।<br>ततस्तु सलिले तस्मिन् विज्ञायान्तर्गतां महीम्॥ १२२<br><br>अनुमानादसम्मूढो भूमेरुद्धरणं पुनः।<br>अकरोत्स तनूमन्यां कल्पादिषु यथा पुरा॥ १२३<br><br>ततो महात्मा भगवान् दिव्यरूपमचिन्तयत्।<br>सलिलेनाप्लुतां भूमिं दृष्ट्वा स तु समन्ततः॥ १२४ | हजार चतुर्युगीतक जलमें निवास करनेके पश्चात् रात्रिके अन्तमें उन्होंने सृष्टि करनेके उद्देश्यसे ब्रह्माका रूप धारण किया। ब्रह्माजी वायु होकर उस जलमें विचरण करने लगे, जैसे कि वर्षाऋतुमें रात्रिमें खद्योत विचरण करता है। तदनन्तर ज्ञानसम्पन्न उन ब्रह्माने अनुमानपूर्वक पृथ्वीको जलके भीतर गयी हुई जानकर पहलेके कल्पोंमें जैसा रूप धारण किया था, उस अन्य रूपको धारणकर पृथ्वीका उद्धार करनेका निश्चय किया। तत्पश्चात् महात्मा भगवान् [ब्रह्मा] उस दिव्य रूपका चिन्तन करने लगे। सभी ओरसे जलसे व्याप्त पृथ्वीको देखकर उन्होंने सोचा कि मैं कौन-सा रूप धारण करके इस पृथ्वीका उद्धार करूँ॥ १२०-१२४ १/२॥ |
| किन्नु रूपमहं कृत्वा उद्धरेयं महीमिमाम्।<br>जलक्रीडानुसदृशं वाराहं रूपमाविशत्॥ १२५<br><br>अधृष्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्मसंज्ञितम्।<br>पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविवेश रसातलम्॥ १२६<br><br>अद्भिः सञ्छादितां भूमिं स तामाशु प्रजापतिः।<br>उपगम्योज्जहारैनामापश्चापि समाविशत्॥ १२७<br><br>सामुद्रा वै समुद्रेषु नादेयाश्च नदीषु च।<br>रसातलतले मग्नां रसातलपुटे गताम्॥ १२८<br><br>प्रभुर्लोकहितार्थाय दंष्ट्रयाभ्युज्जहार गाम्।<br>ततः स्वस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीधरः॥ १२९<br><br>मुमोच पूर्ववदसौ धारयित्वा धराधरः।<br>तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता॥ १३० | उन्होंने जलक्रीड़ाके अनुरूप, सभी प्राणियोंसे अजेय, वेदमय तथा ब्रह्मसंज्ञक वाराहरूप धारण किया और पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश किया। उन [वाराहरूपधारी] प्रजापतिने जलसे घिरी हुई पृथ्वीके पास पहुँचकर उसे उठा लिया और समुद्रके जलको समुद्रोंमें तथा नदियोंके जलको नदियोंमें समाविष्ट कर दिया। इस प्रकार उन प्रभुने लोक-कल्याणके लिये रसातलमें गयी हुई तथा समुद्रतलमें डूबी हुई पृथ्वीको अपने दंष्ट्रापर उठा लिया। इसके बाद उन धरणीधरने पृथ्वीको उसके [मूल] स्थानमें लाकरके पूर्वकी भाँति रखकर छोड़ दिया। वह पृथ्वी उस जलराशिके ऊपर विशाल नौकाकी भाँति स्थित हो गयी और उसीके समान विशाल देह होनेके कारण पृथ्वी [पुनः] डूब न सकी॥ १२५-१३० १/२॥ |
| तत्समा ह्युरुदेहत्वान्न मही याति सम्प्लवम्।<br>तत उत्क्षिप्य तां देवो जगतः स्थापनेच्छया॥ १३१<br><br>पृथिव्याः प्रविभागाय मनश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः।<br>पृथिवीं च समां कृत्वा पृथिव्यां सोऽचिनोद् गिरीन्॥ १३२<br><br>प्राक्सर्गे दह्यमाने तु तदा संवर्तकाग्निना।<br>तेनाग्निना विशीर्णास्ते पर्वता भूरि विस्तराः॥ १३३<br><br>शैत्यादेकार्णवे तस्मिन् वायुना तेन संहताः।<br>निक्षिप्ता यत्र यत्रासंस्तत्र तत्राचलाभवन्॥ १३४ | तत्पश्चात् कमलके समान नेत्रवाले भगवान्ने उसे उठा करके जगत्की स्थापनाकी इच्छासे पृथ्वीका विभाग करनेके लिये मनमें निश्चय किया। उन्होंने पृथ्वीको समतल करके पृथ्वीपर पर्वतोंको संग्रहीत किया। संवर्तक अग्निद्वारा पूर्व सृष्टिके दग्ध कर दिये जानेपर उस समय बहुत विस्तारवाले वे पर्वत उस अग्निसे विशीर्ण हो गये थे। उस एकार्णवमें वायुप्रवाहके द्वारा एकत्रित होकर शीतके कारण वे जहाँ-जहाँ जम |
| ३१६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| तदाचलत्वादचलाः पर्वभिः पर्वताः स्मृताः ।<br>गिरयो हि निगीर्णत्वाच्छयानत्वाच्छिलोच्चयाः ॥ १३५<br><br>ततस्तेषु विकीर्णेषु कोटिशो हि गिरिश्वथ ।<br>विश्वकर्मा विभजते कल्पादिषु पुनः पुनः ॥ १३६ | गये, वहाँ-वहाँ पर्वत बन गये। वे चलायमान न होनेके कारण 'अचल', पर्वोंसे युक्त होनेके कारण 'पर्वत', निगीर्ण होनेके कारण 'गिरि' तथा [भूमिपर] शयन करनेके कारण 'शिलोच्चय' कहे गये हैं। इस प्रकार [भगवान्] विश्वकर्मा प्रत्येक कल्पमें उन करोड़ों पर्वतोंके [इधर-उधर] बिखर जानेपर बार-बार उनका विभाग करते हैं॥ १३१—१३६॥ | | ससमुद्रामिमां पृथ्वीं सप्तद्वीपां सपर्वताम् ।<br>भूराद्यांश्चतुरो लोकान् पुनः सोऽथ व्यकल्पयत् ॥ १३७<br><br>लोकान् प्रकल्पयित्वाथ प्रजासर्गं ससर्ज ह ।<br>ब्रह्मा स्वयम्भूभगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ॥ १३८<br><br>ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां कल्पादिषु यथा पुरा ।<br>तस्याभिध्यायतः सर्गं तदा वै बुद्धिपूर्वकम् ॥ १३९<br><br>बुद्ध्याश्च समकाले वै प्रादुर्भूतस्तमोमयः ।<br>तमो मोहो महामोहस्तामिस्रश्चान्धसंज्ञितः ॥ १४०<br><br>अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः ।<br>पञ्चधावस्थितः सर्गो ध्यायतः सोऽभिमानिनः ॥ १४१<br><br>संवृतस्तमसा चैव बीजाङ्कुरवदावृतः ।<br>बहिरन्तश्चाप्रकाशास्तब्धो निःसंज्ञ एव च ॥ १४२ | तदनन्तर उन्होंने समुद्रों, सातों द्वीपों तथा पर्वतोंसहित पृथ्वीको, भूः आदि चारों लोकोंको बनाया। इसके बाद लोकोंकी रचना करके उन्होंने प्रजासर्गकी रचना की, विविध प्रजाओंकी सृष्टि करनेकी इच्छावाले स्वयम्भू भगवान् [ब्रह्मा]-ने उसी प्रकारकी सृष्टिकी रचना की, जैसा उन्होंने पहलेके कल्पोंमें किया था। सृष्टिके समय बुद्धिपूर्वक सर्गका चिन्तन करते हुए उन ब्रह्माकी बुद्धिसे तमोमय [अविद्यात्मक] सर्ग उत्पन्न हुआ; वह तम, मोह, महामोह, तामिस्र तथा अन्ध—इन नामोंवाला है। इस प्रकार पाँच पर्वोंवाली यह अविद्या उन महात्मासे उत्पन्न हुई। ध्यान करते हुए अभिमानी ब्रह्माका वह सर्ग पाँच प्रकारसे अवस्थित हुआ। वह तमसे आवृत, बीजांकुरकी भाँति ढका हुआ, बाहर तथा भीतरसे प्रकाशरहित, स्तब्ध तथा निःसंज्ञ (चेतनाशून्य) था॥ १३७—१४२॥ | | यस्मात्तेषां वृता बुद्धिर्दुःखानि करणानि च ।<br>तस्मात्ते संवृतात्मानो नगा मुख्याः प्रकीर्तिताः ॥ १४३ | उन [पर्वतों]-की बुद्धि ढँकी हुई थी और उनके दुःख तथा क्रिया-कलाप भी ढँके हुए थे, अतः संवृतात्मा (आवृत आत्मावाले) वे नग (पर्वत) प्रथम उत्पन्न (मुख्य) कहे गये हैं॥ १४३॥ | | मुख्यसर्गं तथाभूतं दृष्ट्वा ब्रह्मा ह्यसाधकम् ।<br>अप्रसन्नमनाः सोऽथ ततोऽन्यं सो ह्यमन्यत ॥ १४४<br><br>तस्याभिध्यायताश्चैव तिर्यक्स्रोता ह्यवर्तत ।<br>यस्मात्तिर्यक्प्रवृत्तः स तिर्यक्स्रोतास्ततः स्मृतः ॥ १४५<br><br>पश्वादयस्ते विख्याता उत्पथग्राहिणो द्विजाः ।<br>तस्याभिध्यायतोऽन्यं वै सात्त्विकः समवर्तत ॥ १४६<br><br>ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयस्तु स वै चोर्ध्वं व्यवस्थितः ।<br>यस्मात्प्रवर्तते चोर्ध्वमूर्ध्वस्रोतास्ततः स्मृतः ॥ १४७ | उस प्रकारके प्रथम सर्गको कार्यहेतु व्यर्थ समझकर वे ब्रह्मा अप्रसन्नचित्त हो गये। तब वे अन्य सर्गका विचार करने लगे। ऐसा चिन्तन करते हुए उन ब्रह्मासे तिर्यक्स्रोत (बहिर्मुख इन्द्रियप्रवाहवाला)-सर्ग उत्पन्न हुआ। वह [सर्ग] तिर्यक् प्रवृत्तिवाला था, इसलिये उसे तिर्यक्स्रोत कहा गया है। हे द्विजो! वे उत्पथग्राही पशु-पक्षी आदिके रूपमें प्रसिद्ध हुए। इसके बाद अन्य सर्गका ध्यान करते हुए उन ब्रह्मासे ऊर्ध्वस्रोत (ऊर्ध्व इन्द्रियप्रवाहवाला) तीसरा सात्त्विक सर्ग उत्पन्न हुआ; |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१७
| श्लोक | अर्थ |
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| ते सुखप्रीतिबहुला बहिरन्तश्च संवृताः।<br>प्रकाशा बहिरन्तश्च ऊर्ध्वस्रोतोभवाः स्मृताः ॥ १४८<br><br>ते सत्त्वस्य च योगेन सृष्टाः सत्त्वोद्भवाः स्मृताः।<br>ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयो वै देवसर्गस्तु स स्मृतः ॥ १४९<br><br>प्रकाशाद्बहिरन्तश्च ऊर्ध्वस्रोतोद्भवाः स्मृताः।<br>ते ऊर्ध्वस्रोतसो ज्ञेयास्तुष्टात्मानो बुधैः स्मृताः ॥ १५० | वह ऊर्ध्वरूपसे व्यवस्थित था। चूँकि यह ऊर्ध्वभावसे कार्य करता था, अतः यह [सर्ग] ऊर्ध्वस्रोत कहा गया है। वे सुख-प्रीतिकी अधिक प्रवृत्तिवाले, बाहर तथा भीतरसे संवृत और बाहर तथा भीतरसे प्रकाशमय थे, इसलिये वे ऊर्ध्वस्रोतसे उत्पन्न कहे गये हैं। वे सत्त्वगुणके योगसे सृजित किये गये, इसलिये वे सत्त्वोद्भव कहे गये हैं। ऊर्ध्वस्रोत नामक वह तीसरा सर्ग देवसर्ग कहा गया है। बाहर तथा भीतर प्रकाशसे युक्त रहनेके कारण वे ऊर्ध्वस्रोतसे उत्पन्न कहे गये हैं। ऊर्ध्वस्रोतके रूपमें ज्ञेय वे लोग विद्वानोंके द्वारा सन्तुष्ट आत्मावाले कहे गये हैं॥ १४८-१५०॥ |
| ऊर्ध्वस्रोतस्सु सृष्टेषु देवेषु वरदः प्रभुः।<br>प्रीतिमानभवद् ब्रह्मा ततोऽन्यं सोऽभ्यमन्यत ॥ १५१<br><br>ससर्ज सर्गमन्यं हि साधकं प्रभुरीश्वरः।<br>ततोऽभिध्याय तस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्तदा ॥ १५२<br><br>प्रादुरासीत्तदा व्यक्तादर्वाक्स्रोतास्तु साधकः।<br>यस्मादर्वाक् न्यवर्तन्त ततोऽर्वाक्स्रोतसस्तु ते ॥ १५३<br><br>ते च प्रकाशबहुलास्तमःपृक्ता रजोऽधिकाः।<br>तस्मात्ते दुःखबहुला भूयोभूयश्च कारिणः ॥ १५४<br><br>संवृता बहिरन्तश्च मनुष्याः साधकाश्च ते।<br>लक्षणैस्तारकाद्यैस्ते ह्यष्टधा तु व्यवस्थिताः ॥ १५५<br><br>सिद्धात्मानो मनुष्यास्ते गन्धर्वसहधर्मिणः।<br>इत्येष तैजसः सर्गो ह्यर्वाक्स्रोतः प्रकीर्तितः ॥ १५६ | ऊर्ध्वस्रोतवाले देवताओंके सृष्ट हो जानेपर वर प्रदान करनेवाले प्रभु भगवान् ब्रह्मा प्रसन्न हो गये और उसके बाद वे दूसरी सृष्टिका विचार करने लगे। तब प्रभु ब्रह्माने अन्य साधक सर्गका सृजन किया। उस समय ध्यान करते हुए उन सत्यके अभिध्यायी व्यक्त ब्रह्मासे अर्वाक्स्रोत (बाहर तथा भीतरसे इन्द्रियप्रवाहवाला) साधक सर्ग उत्पन्न हुआ। इस सृष्टिके लोग अर्वाक्रूपसे कार्यमें प्रवृत्त हुए, इसलिये वे अर्वाक्स्रोता कहे गये हैं। वे प्रकाशबाहुल्यवाले, तमोगुणसे युक्त तथा रजोगुणकी अधिकतावाले थे, इसलिये वे बहुत दुःखसे युक्त थे तथा बार-बार कर्म करनेवाले थे। बाहर तथा भीतरसे संवृत वे लोग साधक (कार्यसाधनमें तत्पर) मनुष्य थे; वे तारक आदि लक्षणोंके द्वारा आठ प्रकारसे व्यवस्थित हुए। सिद्ध आत्मावाले वे मनुष्य गन्धर्वोंके समान गुणधर्मवाले थे। इस अर्वाक्स्रोत सृष्टिको ‘तैजस' सर्ग कहा गया है॥ १५१-१५६॥ |
| पञ्चमोऽनुग्रहः सर्गश्चतुर्धा तु व्यवस्थितः।<br>विपर्ययेण शक्त्या च सिद्ध्या तुष्ट्या तथैव च ॥ १५७<br><br>स्थावरेषु विपर्यासस्तिर्यग्योनिषु शक्तिः।<br>सिद्धात्मानो मनुष्यास्तु ऋषिदेवेषु कृत्स्नशः ॥ १५८<br><br>इत्येष प्राकृतः सर्गो वैकृतोऽनवमः स्मृतः।<br>भूतादिकानां भूतानां षष्ठः सर्गः स उच्यते ॥ १५९ | पाँचवाँ सर्ग ‘अनुग्रह' है; यह विपर्यय, शक्ति, सिद्धि तथा तुष्टिके द्वारा चार प्रकारसे व्यवस्थित है। स्थावरों (वृक्ष आदि)-में विस्तारके कारण भेद होता है, पशु आदिमें सामर्थ्यसे होता है, मनुष्य प्रारब्धजन्य सिद्धिसे युक्त होते हैं और ऋषियों तथा देवताओंमें सम्पूर्ण तुष्टिके द्वारा चतुर्थ भेद होता है। चार प्रकारवाला यह प्राकृत (प्रकृतिनिरूपण विषयवाला) तथा विकारको प्राप्त अनुग्रह [नामक] सर्ग श्रेष्ठ कहा गया है॥ १५७-१५८ १/२॥ |
३१८ | श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निवृत्तं वर्तमानं च तेषां जानन्ति वै पुनः ।<br>भूतादिकानां भूतानां सप्तमः सर्ग एव च ॥ १६०<br><br>तेऽपरिग्राहिणः सर्वे संविभागरताः पुनः ।<br>स्वादनाश्र्चाप्यशीलाश्च ज्ञेया भूतादिकाश्च ते ॥ १६१<br><br>विपर्ययेण भूतादिरशक्त्या च व्यवस्थितः ।<br>प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणः स्मृतः ॥ १६२ | मनु आदिका सर्ग भूतोंका छठा सर्ग कहा जाता है। उन उत्पद्यमान भूतोंके प्राक्कर्म, वर्तमान तथा भविष्यको वे भूतादिक निश्चित रूपसे जानते हैं। भूतादिक भूतों (मनुष्यों)-का सातवाँ सर्ग है। [पूर्वोक्त] उन सभी भूतादिकोंको निःस्पृह, दानशील, कर्मफलका आस्वादन करनेवाला तथा अशील जानना चाहिये। भूतादि (अहंकार) अज्ञानसे तथा विष्णुमायासे व्यवस्थित होता है॥ १५९-१६१ १/२ ॥ |
| तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गः स उच्यते ।<br>वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः ॥ १६३<br><br>इत्येष प्राकृतः सर्गः सम्भूतो बुद्धिपूर्वकः ।<br>मुख्यसर्गश्चतुर्थश्च मुख्या वै स्थावराः स्मृताः ॥ १६४<br><br>ततोऽर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः ।<br>अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्त्विकस्तामसश्च सः ॥ १६५<br><br>पञ्चैते वैकृताः सर्गाः प्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः ।<br>प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः ॥ १६६<br><br>अबुद्धिपूर्वकाः सर्गाः प्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः ।<br>बुद्धिपूर्वं प्रवर्तन्ते षट् पुनर्ब्रह्मणस्तु ते ॥ १६७ | महत्से होनेवाले सर्गको ब्रह्माका प्रथम सर्ग कहा गया है। तन्मात्राओंका जो दूसरा सर्ग है, वह भूतसर्ग कहा जाता है। वैकारिक तीसरा सर्ग ऐन्द्रियसर्ग कहा गया है। यह सब प्राकृत सर्ग है, जो बुद्धिपूर्वक हुआ है। चौथा मुख्य सर्ग है; सभी स्थावर मुख्य कहे गये हैं। इसके बाद [तिर्यक्स्रोत, ऊर्ध्वस्रोत तथा अर्वाक्स्रोतके क्रमसे] अर्वाक्-स्रोतोंका सर्ग है; उनमें सातवाँ जो अर्वाक्स्रोतोंका सर्ग है, वह मानुषसर्ग है। आठवाँ अनुग्रहसर्ग है; वह सात्त्विक, तामस तथा राजस भेदोंवाला होता है [सात्त्विकको देवताओंमें, तामसको पशुओंमें तथा राजसको मनुष्योंमें जानना चाहिये]। इस प्रकार ये पाँच वैकृत सर्ग तथा तीन प्राकृत सर्ग कहे गये हैं। [सनक आदिका] जो नौवाँ सर्ग है, वह प्राकृत तथा वैकृत [दोनों रूपोंवाला] कहा गया है। ब्रह्माके जो तीन प्राकृतसर्ग कहे गये हैं, वे अबुद्धिपूर्वक प्रवर्तित हुए हैं और जो [शेष] छः सर्ग हैं, वे बुद्धिपूर्वक प्रवर्तित हुए हैं॥ १६२-१६७॥ |
| विस्तारनुग्रहः सर्गः कीर्त्यमानो निबोधत ।<br>चतुर्धावस्थितः सोऽथ सर्वभूतेषु कृत्स्नशः ॥ १६८<br><br>इत्येते प्राकृताश्चैव वैकृताश्च नव स्मृताः ।<br>परस्परानुरक्ताश्च कारणैश्च बुधैः स्मृताः ॥ १६९ | [हे ऋषियो!] अब मैं विस्तृत अनुग्रहसर्गका वर्णन कर रहा हूँ; आपलोग उसे जान लें। वह सभी भूतोंमें पूर्णरूपसे चार प्रकारसे अवस्थित है। ये जो प्राकृत तथा वैकृत [कुल] नौ सर्ग कहे गये हैं, उन्हें विद्वानोंने कारणोंके द्वारा एक-दूसरेसे अनुरक्त (सम्बद्ध) बताया है॥ १६८-१६९॥ |
| अग्रे ससर्ज वै ब्रह्मा मानसानात्मनः समान् ।<br>ऋभुः सनत्कुमारश्च द्वावेतावूर्ध्वरेतसौ ॥ १७०<br><br>पूर्वोत्पन्नौ पुरा तेभ्यः सर्वेषामपि पूर्वजौ ।<br>व्यतीते त्वष्टमे कल्पे पुराणौ लोकसाक्षिणौ ॥ १७१ | आरम्भमें ब्रह्माजीने अपने ही सदृश मानस पुत्रोंका सृजन किया। उनमेंसे सबसे पहले उत्पन्न तथा सभीके पूर्वज ऋभु तथा सनत्कुमार—ये दोनों ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी) थे। आठवाँ कल्प व्यतीत होनेपर प्राचीन एवं लोकसाक्षी |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप...सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१९
| तौ वाराहे तु भूर्लोके तेजः सङ्क्षिप्य धिष्ठितौ।<br>तावुभौ मोक्षकर्मणावारोग्यात्मानमात्मनि॥ १७२<br><br>प्रजां धर्मं च कामं च त्यक्त्वा वैराग्यमास्थितौ।<br>यथोत्पन्नस्तथैवेह कुमारः स इहोच्यते॥ १७३<br><br>तस्मात्सनत्कुमारोति नामास्येह प्रकीर्तितम्।<br>सनन्दं सनकं चैव विद्वांसं च सनातनम्॥ १७४<br><br>विज्ञानेन निवृत्तास्ते व्यवर्तन्त महौजसः।<br>सम्बुद्धाश्चैव नानात्वे अप्रवृत्ताश्च योगिनः॥ १७५<br><br>असृष्ट्वैव प्रजासर्गं प्रतिसर्गं गताः पुनः।<br>ततस्तेषु व्यतीतेषु ततोऽन्यान् साधकान् सुतान्॥ १७६ | वे दोनों वाराहकल्पमें [अपने] तेजको संक्षिप्त करके पृथ्वीलोकमें अधिष्ठित हुए। मोक्षके लिये कर्मपरायण वे दोनों [मानसपुत्र] आत्माको अपनेमें स्थिर करके प्रजा, धर्म तथा कामका त्याग करके वैराग्यमें स्थित हो गये। सनत्कुमार जिस रूपमें उत्पन्न हुए थे, वैसे ही कुमार-रूपमें विद्यमान कहे जाते हैं, इसलिये इनका नाम 'सनत्कुमार' प्रसिद्ध हुआ। इसी प्रकार ब्रह्माने [जिन] सनन्द, सनक तथा विद्वान् सनातनको उत्पन्न किया था, वे विशेष ज्ञानके द्वारा सांसारिकतासे निवृत्त रहे। महान् ओजवाले वे सब अविद्यापरिकल्पित भेदके प्रति सम्बुद्ध होकर अर्थात् उसे मिथ्या समझकर प्रवृत्तिसे रहित योगी हुए। प्रजाओंकी सृष्टि किये बिना ही वे मोक्षको प्राप्त हुए॥ १७०-१७५ १/२॥ | | मानसानसृजद् ब्रह्मा पुनः स्थानाभिमानिनः।<br>आभूतसम्प्लवावस्था यैरियं विधृता मही॥ १७७<br><br>आपोऽग्निं पृथिवीं वायुमन्तरिक्षं दिवं तथा।<br>समुद्रांश्च नदीश्चैव तथा शैलवनस्पतीन्॥ १७८<br><br>ओषधीनां तथात्मानो वल्लीनां वृक्षवीरुधाम्।<br>लताः काष्ठाः कलाश्चैव मुहूर्ताः सन्धिररात्र्यहान्॥ १७९<br><br>अर्धमासांश्च मासांश्च अयनाब्दयुगानि च।<br>स्थानाभिमानिनः सर्वे स्थानाख्याश्चैव ते स्मृताः॥ १८० | उन सबके मोक्षको प्राप्त हो जानेपर ब्रह्माने अपने स्थानके अभिमानी तथा कार्यक्षम अन्य मानस पुत्रोंका सृजन किया, जिन्होंने प्रलयपर्यन्त इस पृथ्वीको धारण किया। इसके बाद ब्रह्माने जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, समुद्रों, नदियों, पर्वतों, वनस्पतियों, औषधियों, वल्लियों, वृक्षों, झाड़ियों, लताओं, काष्ठाओं, कलाओं, मुहूर्तों, सन्धियों, रात्रि, दिन, पक्षों, मासों, अयनों, वर्षों तथा युगोंका सृजन किया। अपने स्थानोंके अभिमानी वे सब अपने स्थानोंके नामवाले कहे गये हैं॥ १७६-१८०॥ | | देवानृषींश्च महतो गदतस्तान्निबोधत।<br>मरीचिभृग्वङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्॥ १८१<br><br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजन्मानसान्नव।<br>नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥ १८२<br><br>तेषां ब्रह्मात्मकानां वै सर्वेषां ब्रह्मवादिनाम्।<br>स्थानानि कल्पयामास पूर्ववत्पद्मसम्भवः॥ १८३<br><br>ततोऽसृजच्च सङ्कल्पं धर्मञ्चैव सुखावहम्।<br>सोऽसृजद्व्यवसायात्तु धर्मं देवो महेश्वरः॥ १८४<br><br>सङ्कल्पञ्चैव सङ्कल्पात्सर्वलोकपितामहः।<br>मानसश्च रुचिर्नाम विजज्ञे ब्रह्मणः प्रभोः॥ १८५ | अब मैं महान् देवताओं तथा ऋषियोंके विषयमें बता रहा हूँ; आपलोग उन्हें जान लें। उन [ब्रह्मा]-ने मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ—इन नौ मानस पुत्रोंका भी सृजन किया। ये लोग पुराणमें नौ ब्रह्माके रूपमें निर्धारित किये गये हैं। ब्रह्माने पूर्वकी भाँति ब्रह्माके स्वरूपवाले तथा ब्रह्मवादी उन सभीके लिये स्थानोंको कल्पित किया। इसके बाद उन्होंने सुख देनेवाले धर्म एवं संकल्पका भी सृजन किया। सभी लोकोंके पितामह देव महेश्वरने व्यवसायसे धर्मका तथा संकल्पके द्वारा संकल्पका सृजन किया। प्रभु ब्रह्माके मनसे [प्रजापति] रुचि नामक मानसपुत्र भी उत्पन्न हुआ॥ १८१-१८५॥ |
| ३२० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्राणाद् ब्रह्मासृजद्दक्षं चक्षुर्भ्यां च मरीचिनम्।<br>भृगुस्तु हृदयाज्जज्ञे ऋषिः सलिलजन्मनः॥ १८६<br><br>शिरसोऽङ्गिरसश्चैव श्रोत्रादत्रिं तथासृजत्।<br>पुलस्त्यं च तथोदानाद्व्यानाच्च पुलहं पुनः॥ १८७<br><br>समानजो वसिष्ठश्च अपानान्निर्ममे क्रतुम्।<br>इत्येते ब्रह्मणः पुत्रा दिव्या एकादश स्मृताः॥ १८८ | ब्रह्माजीने [अपने] प्राणसे दक्षका तथा दोनों नेत्रोंसे मरीचिका सृजन किया। ऋषि भृगु जलमें जन्म लेनेवाले ब्रह्माके हृदयसे उत्पन्न हुए। उन्होंने सिरसे अंगिराको, कानसे अत्रिको, उदानवायुसे पुलस्त्यको तथा व्यानवायुसे पुलहको उत्पन्न किया। वसिष्ठ उनके समानवायुसे उत्पन्न हुए। उन्होंने अपानवायुसे क्रतुका सृजन किया। ये [संकल्प, धर्म, मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठ] ब्रह्माके ग्यारह दिव्य पुत्र कहे गये हैं॥ १८६-१८८॥ |
| धर्मादयः प्रथमजाः सर्वे ते ब्रह्मणः सुताः।<br>भृग्वादयस्तु ते सृष्टा नवैते ब्रह्मवादिनः॥ १८९<br><br>गृहमेधिनः पुराणास्ते धर्मस्तैः सम्प्रवर्तितः।<br>तेषां द्वादश ते वंशा दिव्या देवगुणान्विताः॥ १९० | प्रथम उत्पन्न धर्म आदि ब्रह्माजीके पुत्र हैं, जो भृगु आदि नौ [मानस पुत्र] सृजित किये गये, वे ब्रह्मवादी हुए। वे प्राचीन गृहस्थ थे और उन्हींके द्वारा धर्म प्रवर्तित हुआ। उनके दिव्य, देवगुणसम्पन्न, क्रियावान्, सन्तानवाले तथा महर्षियोंसे अलंकृत बारह वंश हुए॥ १८९-१९० १/२॥ |
| क्रियावन्तः प्रजावन्तो महर्षिभिरलङ्कृताः।<br>ऋभुः सनत्कुमारश्च द्वावेतावूर्ध्वरेतसौ॥ १९१<br><br>पूर्वोत्पन्नौ परं तेभ्यः सर्वेषामपि पूर्वजौ।<br>व्यतीते त्वष्टमे कल्पे पुराणौ लोकसाक्षिणौ॥ १९२<br><br>विराजेतामुभौ लोके तेजः सङ्क्षिप्य धिष्ठितौ।<br>तावुभौ योगकर्माणौवारोप्यात्मानमात्मनि॥ १९३<br><br>प्रजां धर्मं च कामञ्च त्यक्त्वा वैराग्यमास्थितौ।<br>यथोत्पन्नः स एवेह कुमारः स इहोच्यते॥ १९४ | ऋभु तथा सनत्कुमार—ये दोनों ब्रह्मचारी थे; ये उनसे पहले उत्पन्न हुए थे और सभीके पूर्वज थे। आठवें कल्पके व्यतीत होनेपर प्राचीन तथा लोकोंके साक्षी वे दोनों [अपने] तेजको संक्षिप्त करके लोकमें प्रतिष्ठित होकर विराजमान हुए। योगकर्मपरायण वे दोनों आत्माको अपनेमें आरोपित करके प्रजा, धर्म तथा कामका त्याग करके वैराग्यमें स्थित हो गये। वे सन्त् जिस रूपमें उत्पन्न हुए थे, वैसे ही सदा रहनेके कारण इस लोकमें 'कुमार' कहे जाते हैं और इसीलिये उनका 'सनत्कुमार'—यह नाम प्रसिद्ध हो गया॥ १९१-१९४ १/२॥ |
| तस्मात्सनत्कुमारेति नामास्येह प्रतिष्ठितम्।<br>ततोऽभिध्याय तस्तस्य जज्ञिरे मानसाः प्रजाः॥ १९५<br><br>तच्छरीरसमुत्पन्नैः कार्यैस्तैः कारणैः सह।<br>क्षेत्रज्ञाः समवर्तन्त गात्रेभ्यस्तस्य धीमतः॥ १९६<br><br>ततो देवासुरपितॄन् मानुषांश्च चतुष्टयम्।<br>सिसृक्षुरम्भांस्येतानि स्वमात्मानमयूयुजत्॥ १९७<br><br>ततस्तु युञ्जतस्तस्य तमोमात्रसमुद्भवम्।<br>समभिध्यायतः सर्गं प्रयत्नेन प्रजापतेः॥ १९८<br><br>ततोऽस्य जघनात्पूर्वमसुरा जज्ञिरे सुताः।<br>असुः प्राणः स्मृतो विप्रास्तज्जन्मानस्ततोऽसुराः॥ १९९ | इसके बाद ध्यान करते हुए उन ब्रह्माकी मानस प्रजाएँ (सन्तानें) उत्पन्न हुईं। पुनः उनके शरीरसे उत्पन्न उन कार्यों तथा कारणोंके साथ बुद्धिमान् ब्रह्माके अंगोंसे क्षेत्रज्ञ उत्पन्न हुए। इसके बाद देवता, असुर, पितर, मनुष्य—इन चार अम्भोंकी सृष्टि करनेकी इच्छावाले ब्रह्माने अपने मनको विचारयुक्त किया। तदनन्तर मनको विचारयुक्त करते हुए तथा प्रयत्नपूर्वक तमोमात्रसे उत्पन्न होनेवाले सर्गका चिन्तन करते हुए उन प्रजापतिकी जंघासे सर्वप्रथम असुरपुत्र उत्पन्न हुए। |
अध्याय ७० ] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... 'सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव <span style="float: right;">३२१</span>
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| यया सृष्टासुराः सर्वे तां तनुं स व्यपोहत।<br>सापविद्धा तनुस्तेन सद्यो रात्रिरजायत॥ २००<br><br>सा तमोबहुला यस्मात्ततो रात्रिर्नियामिका।<br>आवृतास्तमसा रात्रौ प्रजास्तस्मात्स्वपन्त्युत॥ २०१ | हे विप्रो! 'असुः' को प्राण कहा गया है; इसलिये उससे जन्म लेनेके कारण वे असुर हुए। जिस शरीरसे उन्होंने सभी असुरोंको उत्पन्न किया था, उस शरीरको छोड़ दिया। तब उनके द्वारा त्यक्त वह शरीर तत्काल रात्रि हो गयी। वह रात्रि अन्धकारकी अधिकतासे युक्त होती है, अतः वह नियामिका (सबको शयन करानेवाली) है। प्रजाएँ रातमें अन्धकारसे आवृत हो जाती हैं, इसलिये वे सोती हैं॥ १९५-२०१॥ |
| सृष्ट्वासुरांस्ततः सो वै तनुमन्यामगृह्णत।<br>अव्यक्तां सत्त्वबहुलां ततस्तां सोऽभ्यपूजयत्॥ २०२<br><br>ततस्तां युञ्जतस्तस्य प्रियमासीत्प्रजापतेः।<br>ततो मुखात्समुत्पन्ना दीव्यतस्तस्य देवताः॥ २०३<br><br>यतोऽस्य दीव्यतो जातास्तेन देवाः प्रकीर्तिताः।<br>धातुर्दिविति यः प्रोक्तः क्रीडायां स विभाव्यते॥ २०४ | तत्पश्चात् असुरोंका सृजन करके उन्होंने अन्य अव्यक्त तथा सत्त्वबहुल शरीर धारण किया; इसलिये उन्होंने उसकी पूजा की। तब उस शरीरको धारण करनेवाले उन ब्रह्माको प्रसन्नता हुई। इसके बाद क्रीड़ा करते हुए ब्रह्माके मुखसे देवता उत्पन्न हुए। चूँकि क्रीड़ा करते हुए इन ब्रह्मासे वे उत्पन्न हुए, इसलिये वे देवता कहे गये हैं। जो 'दिव्' धातु कही गयी है, वह क्रीड़ाके अर्थमें जानी जाती है। उन ब्रह्मासे वे क्रीड़ा करते हुए उत्पन्न हुए, इसलिये देवता कहे जाते हैं॥ २०२-२०४ १/२॥ |
| यस्मात्तस्य तु दीव्यन्तो जज्ञिरे तेन देवताः।<br>देवान् सृष्ट्वाथ देवेशस्तनुमन्यामपद्यत॥ २०५<br><br>उत्सृष्टा सा तनुस्तेन सद्योऽहः समजायत।<br>तस्मादहो धर्मयुक्तं देवताः समुपासते॥ २०६<br><br>सत्त्वमात्रात्मिकामेव ततोऽन्यां सोऽभ्यमन्यत।<br>पितृत्वन्मन्यमानस्य पुत्रांस्तान् ध्यायतः प्रभोः॥ २०७<br><br>पितरो ह्युपपक्षाभ्यां रात्र्यहोरन्तरेऽभवन्।<br>तस्मात्ते पितरो देवाः पितृत्वं तेन तेषु तत्॥ २०८ | देवताओंका सृजन करके देवेशने अन्य शरीर धारण किया और उनके द्वारा छोड़ा गया वह [पहलेवाला] शरीर शीघ्र ही दिन बन गया। इसलिये देवतालोग धर्मयुक्त दिनकी उपासना करते हैं। उन्होंने सत्त्वगुणमय उस अन्य शरीरकी भी पूजा की। पिताके समान मानते हुए तथा उन [उत्पद्यमान] पुत्रोंका ध्यान करते हुए प्रभु (ब्रह्मा)-के [दाहिने-बाएँ] दोनों पार्श्वभागसे दिन तथा रातके बीच पितर उत्पन्न हुए, इसलिये वे पितर देवता हैं और उनमें पितृत्व है॥ २०५-२०८॥ |
| यया सृष्टास्तु पितरस्तनुं तां स व्यपोहत।<br>सापविद्धा तनुस्तेन सद्यः सन्ध्या व्यजायत॥ २०९<br><br>यस्मादहर्देवतानां रात्रिर्या सासुरी स्मृता।<br>तयोर्मध्ये तु पैत्री या तनुः सा तु गरीयसी॥ २१०<br><br>तस्माद्देवासुराः सर्वे ऋषयो मानवास्तथा।<br>उपासन्ते मुदायुक्ता रात्र्यहोर्मध्यमां तनुम्॥ २११ | उन्होंने जिस कायासे पितरोंका सृजन किया था, उस कायाको त्याग दिया। उनके द्वारा त्यक्त वह काया शीघ्र ही सन्ध्या हो गयी। चूँकि दिन देवताओंका होता है और जो रात है, वह आसुरी कही गयी है; अतः उन दोनोंके मध्य जो पैत्री (पितरोंकी) काया है, वह सबसे श्रेष्ठ है। इसी कारणसे सभी देवता, असुर, ऋषि तथा मनुष्य प्रसन्नतासे युक्त होकर रात्रि तथा दिनके मध्यकी काया (सन्ध्या)-की उपासना करते हैं॥ २०९-२११॥ |
| ३२२ | श्रीलिङ्गपुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| ततो ह्यन्यां पुनर्ब्रह्मा तनुं वै समगृह्णत।<br>रजोमात्रात्मिकायां तु मनसा सोऽसृजत्प्रभुः॥ २१२<br><br>रजःप्रियांस्ततः सोऽथ मानसानसृजत्सुतान्।<br>मनस्विनस्ततस्तस्य मानवा जज्ञिरे सुताः॥ २१३<br><br>सृष्ट्वा पुनः प्रजाश्चापि स्वां तनुं तामपोहत्।<br>सापविद्धा तनुस्तेन ज्योत्स्ना सद्यस्त्वजायत॥ २१४<br><br>यस्माद्भवन्ति संहृष्टा ज्योत्स्नाया उद्भवे प्रजाः। | इसके बाद ब्रह्माने अन्य शरीर धारण किया। उन प्रभुने उस राजस तनुसे मानसिक सृजन करना आरम्भ किया। उन्होंने रजोगुणप्रिय मानस पुत्रोंका सृजन किया। तब उनके मनस्वी मानवपुत्र उत्पन्न हुए। उन सन्तानोंकी सृष्टि करके उन्होंने पुनः उस कायाका त्याग कर दिया। तब उनके द्वारा त्यक्त वह काया तुरंत ज्योत्स्ना हो गयी; इसीलिये ज्योत्स्नाका उद्भव होनेपर प्रजाएँ प्रसन्न हो जाती हैं॥ २१२–२१४१/२॥ | | इत्येतास्तनवस्तेन ह्यपविद्धा महात्मना॥ २१५<br><br>सद्यो रात्र्यहनी चैव सन्ध्या ज्योत्स्ना च जज्ञिरे।<br>ज्योत्स्ना सन्ध्या अहश्चैव सत्त्वमात्रात्मकं त्रयम्॥ २१६<br><br>तमोमात्रात्मिका रात्रिः सा वै तस्मान्निशात्मिका।<br>तस्माद्देवा दिवात्नवा तुष्ट्या सृष्टा मुखात्तु वै॥ २१७<br><br>यस्मात्तेषां दिवा जन्म बलिनस्तेन वै दिवा।<br>तन्वा ययासुरान् रात्रौ जघनादसृजत्प्रभुः॥ २१८<br><br>प्राणेभ्यो निशिजन्मानो बलिनो निशि तेन ते।<br>एतान्येव भविष्याणां देवानामसुरैः सह॥ २१९<br><br>पितॄणां मानवानां च अतीतानागतेषु वै।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु निमित्तानि भवन्ति हि॥ २२० | इस प्रकार उन महात्मा [ब्रह्मा]-ने जब इन शरीरोंका त्याग किया, तब तुरंत रात, दिन, सन्ध्या तथा ज्योत्स्ना उत्पन्न हो गये। ज्योत्स्ना, सन्ध्या तथा दिन—ये तीनों सत्त्वमात्रात्मक हैं। रात्रि तमोमात्रात्मिका है, इसलिये वह निशास्वरूपिणी है। अतः देवतालोग दिनके तनुसे सुखपूर्वक ब्रह्माके मुखसे सृजित हुए। चूँकि उनका जन्म दिनमें हुआ, इसलिये वे दिनमें बलशाली होते हैं। प्रभुने अपने शरीरके द्वारा जघनसे असुरोंको रातमें उत्पन्न किया था, अतः प्राणोंसे रातमें जन्म लेनेवाले वे [असुर] रातमें बलवान् होते हैं। ये ही समय बीते हुए तथा आगे आनेवाले समस्त मन्वन्तरोंमें होनेवाले देवताओं, असुरों, पितरों एवं मानवोंके निमित्त (कारणभूत) होते हैं॥ २१५–२२०॥ | | ज्योत्स्ना रात्र्यहनी सन्ध्या चत्वार्यम्भांसि तानि वै।<br>भान्ति यस्मात्ततोऽम्भांसि शब्दोऽयं सुमनीषिभिः॥ २२१<br><br>भातिर्दीप्तौ निगदितः पुनश्चाथ प्रजापतिः। | ज्योत्स्ना, रात्रि, दिन, सन्ध्या—ये चारों अम्भस्वरूप हैं; वे भासित होते हैं, इसलिये अम्भ हैं। विद्वानोंने 'भा' धातुको दीप्ति (प्रकाश) अर्थमें कहा है, उसीसे यह 'अम्भ' शब्द व्युत्पन्न है। उन ब्रह्माने इन | | सोऽम्भांस्येतानि सृष्ट्वा तु देवमानुषदानवान्॥ २२२<br><br>पितॄंश्चैवासृजत्तन्वा आत्मना विविधान् पुनः।<br>तामुत्सृज्य तनुं ज्योत्स्नां ततोऽन्यां प्राप्य स प्रभुः॥ २२३<br><br>मूर्तिं तमोरजःप्रायां पुनरेवाभ्यपूजयत्।<br>अन्धकारे क्षुधाविष्टांस्ततोऽन्यान् सोऽसृजत्प्रभुः॥ २२४<br><br>तेन सृष्टाः क्षुधात्मानो अम्भांस्यादातुमुद्यताः।<br>अम्भांस्येतानि रक्षाम उक्तवन्तस्तु तेषु ये॥ २२५ | अम्भोंका सृजन करके पुनः अपने शरीरसे विविध देवताओं, मनुष्यों, दानवों तथा पितरोंका सृजन किया था॥ २२१-२२२१/२॥<br><br>इसके बाद प्रभु [ब्रह्मा]-ने उस ज्योत्स्नामय शरीरका त्याग करके अन्य तमोमय तथा रजोमय शरीर धारण करके पुनः इसका पूजन किया। उन प्रभुने अन्धकारमें क्षुधापीड़ित अन्य लोगोंका सृजन किया। उनके द्वारा सृजित ये क्षुधायुक्त लोग [उन] अम्भोंको ग्रहण करनेके लिये उद्यत हुए। उनमें जिन्होंने कहा—'हम इन अम्भोंकी रक्षा करते हैं' वे राक्षस नामवाले हुए; |
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अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राक्षसा नाम ते यस्मात् क्षुधाविष्टा निशाचराः ।<br>येऽब्रुवन् यक्षमोऽम्भांसि तेषां हृष्टाः परस्परम् ॥ २२६<br><br>तेन ते कर्मणा यक्षा गुह्यका गूढकर्मणा ।<br>रक्षेति पालने चापि धातुरेष विभाव्यते ॥ २२७<br><br>एवं च यक्षतिर्धातुर्भक्षणे स निरुच्यते । | क्योंकि वे क्षुधापीड़ित तथा रात्रिमें विचरण करनेवाले थे। उनमेंसे प्रसन्न होकर जिन्होंने परस्पर यह कहा—'हम इन अम्भोका भक्षण करते हैं' वे अपने उस कर्मके कारण यक्ष तथा गूढ़ कर्मके कारण गुह्यक हुए। 'रक्ष' यह धातु पालन अर्थमें जानी जाती है और इसी प्रकार 'यक्षति' धातु भक्षण अर्थमें कही जाती है॥ २२३—२२७¹/₂ ॥ |
| तं दृष्ट्वा ह्यप्रियेणास्य केशाः शीर्णास्तु धीमतः ॥ २२८<br><br>ते शीर्णाश्चोत्थिता ह्यूर्ध्वं ते चैवारुरुधुः प्रभुम् ।<br>हीनास्तच्छिरसो बाला यस्माच्चैवावसर्पिणः ॥ २२९<br><br>व्यालात्मानः स्मृता बाला हीनत्वादहयः स्मृताः ।<br>पतत्वात्पन्नगाश्चैव सर्पाश्चैवावसर्पणात् ॥ २३०<br><br>तस्य क्रोधोद्भवो योऽसौ अग्निगर्भः सुदारुणः ।<br>स तु सर्पान् सहोत्पन्नानाविवेश विषात्मकः ॥ २३१ | उस सृष्टिको देखकर अप्रसन्नतासे युक्त उन बुद्धिमान् ब्रह्माके बाल शीर्ण हो गये। वे शीर्ण बाल [पुनः] ऊपर उठ गये और उन्होंने प्रभुको अवरुद्ध कर दिया। वे बाल सिरसे हीन हो गये थे, इसलिये [नीचेकी ओर] अपसर्पण करनेवाले हो गये; वे बाल व्यालस्वरूप कहे गये। वे हीन होनेके कारण 'अहि', गिरनेके कारण 'पन्नग' और अपसर्पण करनेके कारण 'सर्प' कहे गये हैं। उनके क्रोधसे उत्पन्न जो महाभयंकर विषमग्र अग्निगर्भ था, वह साथमें उत्पन्न हुए सर्पोंमें प्रविष्ट हो गया॥ २२८—२३१॥ |
| सर्पान् सृष्ट्वा ततः क्रुद्धः क्रोधात्मानो विनिर्ममे ।<br>वर्णेन कपिशेनोग्रास्ते भूताः पिशिताशनाः ॥ २३२<br><br>भूतत्वात्ते स्मृता भूताः पिशाचाः पिशिताशनात् ।<br>प्रसन्नं गायतस्तस्य गन्धर्वा जज्ञिरे यदा ॥ २३३<br><br>धयतीत्येष वै धातुः गानत्वे परिपठ्यते ।<br>धयन्तो जज्ञिरे वाचं गन्धर्वास्तेन ते स्मृताः ॥ २३४ | तब सर्पोंको देखकर ब्रह्माजी क्रुद्ध हुए और उन्होंने क्रोधमय स्वरूपवालोंको उत्पन्न किया। वे कपिश वर्ण, अत्यन्त उग्र तथा मांसका भक्षण करनेवाले भूत थे। वे भूतत्वके कारण 'भूत' तथा मांसभक्षण करनेके कारण 'पिशाच' कहे गये हैं। प्रसन्नतापूर्वक गान करते हुए उन ब्रह्मासे गन्धर्व उत्पन्न हुए थे। 'धयति'—यह धातु गान अर्थमें पढ़ी जाती है; वे वाणीका गान करते हुए उत्पन्न हुए, इसलिये 'गन्धर्व' कहे गये हैं॥ २३२—२३४॥ |
| अष्टस्वेतासु सृष्टासु देवयोनिषु स प्रभुः ।<br>ततः स्वच्छन्दतोऽन्यानि वयांसि वयसासृजत् ॥ २३५<br><br>स्वच्छन्दतः स्वच्छन्दांसि वयसा च वयांसि च ।<br>पशून् सृष्ट्वा स देवेशोऽसृजत्पक्षिगणानपि ॥ २३६ | इन आठ देवयोनियोंको सृजित करनेके अनन्तर उन प्रभुने स्वच्छन्दतापूर्वक अपनी आयुसे अन्य पक्षियोंका सृजन किया। पुनः उन्होंने स्वच्छन्दतापूर्वक स्वेच्छासे विचरण करनेवाले पक्षियोंका सृजन किया। इस प्रकार उन देवेशने पशुओंकी सृष्टि करके पक्षिसमुदायका भी सृजन किया था॥ २३५-२३६॥ |
| मुखतोऽजाः ससर्जाथ वक्षसश्चावयोसृजत् ।<br>गाश्चैवाथोदरद् ब्रह्मा पार्श्वाभ्यां च विनिर्ममे ॥ २३७<br><br>पद्भ्यां चाश्वान् समातङ्गान् रासभानावयान् मृगान् ।<br>उष्ट्रानश्वतरांश्चैव तथान्याश्चैव जातयः ॥ २३८ | ब्रह्माने [अपने] मुखसे बकरियोंका तथा वक्ष (छाती) से भेड़ोंका सृजन किया। उन्होंने उदरसे तथा पार्श्वभागोंसे गायोंकी रचना की। उन्होंने [अपने] पैरोंसे घोड़ों, हाथियों, गधों, आवयों, मृगों, ऊँटों और खच्चरोंका |
| ३२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ओषध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>एवं पशवोषधीः सृष्ट्वायुयुजत्सोऽध्वरे प्रभुः॥ २३९ | सृजन किया; इसी प्रकार अन्य जातियाँ भी उत्पन्न हुईं। उनके रोमोंसे फल तथा मूलवाली औषधियाँ उत्पन्न हुईं। इस प्रकार पशुओं तथा औषधियोंका सृजन करके वे प्रभु यज्ञमें लग गये॥ २३७-२३९॥ |
| गौरजः पुरुषो मेषो ह्यश्वोऽश्वतरगर्दभौ।<br>एतान् ग्राम्यान् पशूनाहुरारण्यान्वैनिबोधत॥ २४०<br><br>श्वापदो द्विखुरो हस्ती वानराः पक्षिपञ्चमाः।<br>आदकाः पशवः षष्ठाः सप्तमास्तु सरीसृपाः॥ २४१<br><br>महिषा गवयाक्षाश्च प्लवङ्गाः शरभा वृकाः।<br>सिंहस्तु सप्तमस्तेषामारण्याः पशवः स्मृताः॥ २४२ | गाय, अज, पुरुष (मनुष्य), मेष, अश्व, खच्चर तथा गधे—इन्हें ग्राम्य पशु कहा गया है। [नरमेधमें पशुत्वकी कल्पनाके कारण मनुष्यको पशुकोटिमें माना गया है] अब जंगली पशुओंको जान लीजिये। श्वापद (व्याघ्र आदि), द्विखुर (गवय आदि), हाथी, वानर, पाँचवाँ पक्षी, छठाँ आदक पशु तथा सातवाँ सरीसृप—ये जंगली पशु हैं। इनके अतिरिक्त महिष, गवय, हिरण, प्लवंग, शरभ, वृक तथा सातवाँ सिंह—ये जंगली पशु कहे गये हैं॥ २४०-२४२॥ |
| गायत्रं च ऋचं चैव त्रिवृत्साम रथन्तरम्।<br>अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात्॥ २४३<br><br>यजूंषि त्रैष्टुभं छन्दस्तोमं पञ्चदशं तथा।<br>बृहत्साम तथोक्थ्यं च दक्षिणादसृजन्मुखात्॥ २४४<br><br>सामानि जगतीच्छन्दस्तोमं सप्तदशं तथा।<br>वैरूपमतिरात्रं च पश्चिमादसृजन्मुखात्॥ २४५<br><br>एकविंशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च।<br>अनुष्टुभं सवैराजमुत्तरादसृजन्मुखात्॥ २४६<br><br>विद्युतो शनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च।<br>तेजांसि च ससर्जादौ कल्पस्य भगवान् प्रभुः॥ २४७<br><br>उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>ब्रह्मणस्तु प्रजासर्गं सृजतो हि प्रजापतेः॥ २४८ | ब्रह्माने [अपने] प्रथम (पूर्व) मुखसे गायत्री छन्द, ऋग्वेद, [गीयमान] त्रिवृत् साम, रथन्तर साम तथा यज्ञोंमें मुख्य अग्निष्टोमकी रचना की। उन्होंने दक्षिण मुखसे यजुर्वेद, त्रिष्टुप् छन्द, पंचदशावृत्त साम, बृहत्साम तथा उक्थ्यकी रचना की। उन्होंने पश्चिम मुखसे साम, जगतीछन्द, सप्तदशावृत्त स्तोम, वैरूपसाम तथा अतिरात्रयज्ञकी रचना की। उन्होंने उत्तर मुखसे इक्कीस अथर्व प्रार्थना-मन्त्रों, आप्तोर्यामाण, अनुष्टुप् छन्द तथा वैराज छन्दकी रचना की। भगवान् ब्रह्माने कल्पके प्रारम्भमें विद्युत्, वज्र, मेघों, रोहित वर्णवाले इन्द्रधनुषों तथा तेजोंकी रचना की। प्रजाओंकी सृष्टि करते हुए उन प्रजापति ब्रह्माके अंगोंसे उच्च तथा निम्न भूत (प्राणी) उत्पन्न हुए॥ २४३-२४८॥ |
| सृष्ट्वा चतुष्टयं पूर्वं देवासुरनरान् पितॄन्।<br>ततोऽसृजत भूतानि स्थावराणि चराणि च॥ २४९<br><br>यक्षान् पिशाचान् गन्धर्वांस्त्वथैवाप्सरसां गणान्।<br>नरकिन्नररक्षांसि वयःपशुमृगोरगान्॥ २५०<br><br>अव्ययं च व्ययं चापि यदिदं स्थाणुजङ्गमम्।<br>तेषां वै यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे॥ २५१<br><br>तान्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः।<br>हिंस्त्राहिंस्त्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मे नृतानृते॥ २५२ | पहले देवता, असुर, मनुष्य तथा पितर—इन चारोंकी सृष्टि करके उन्होंने स्थावर तथा जंगम भूतोंका सृजन किया; उन्होंने यक्षों, पिशाचों, गन्धर्वों, अप्सरागणों, मनुष्यों, किन्नरों, राक्षसों, पक्षियों, पशुओं, मृगों और सर्पों तथा अव्यय एवं व्यय; जो भी स्थावर-जंगम हैं—उन सबका सृजन किया। पूर्व सृष्टिमें उनके जो कर्म थे, बार-बार सृजित किये जाते हुए वे प्राणी उन्हीं कर्मोंको प्राप्त करते हैं। वे अपने लिये अनुकूल हिंसा-अहिंसा, मृदुता-क्रूरता, धर्म-अधर्म तथा मिथ्या-सत्यमें |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३२५
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते।<br>महाभूतेषु सृष्टेषु इन्द्रियार्थेषु मूर्तिषु॥ २५३<br><br>विनियोगं च भूतानां धातैव व्यदधात्स्वयम्। | प्रवृत्त होते हैं; इसीलिये वे उनमें आनन्दका अनुभव करते हैं। महाभूतों, इन्द्रिय-विषयों तथा उनके स्वरूपोंकी सृष्टि हो जानेपर स्रष्टाने स्वयं उन भूतोंका विनियोग किया॥ २४९—२५३ १/२॥ |
| केचित्पुरुषकारं तु प्राहुः कर्म सुमानवाः॥ २५४<br><br>दैवमित्यपरे विप्राः स्वभावं भूतचिन्तकाः।<br>पौरुषं कर्म दैवं च फलवृत्तिस्वभावतः॥ २५५<br><br>न चैकं न पृथग्भावमधिकं न ततो विदुः।<br>एतदेवं च नैकं च नामभेदेन नाप्युभे॥ २५६<br><br>कर्मस्था विषमं ब्रूयुः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः। | कुछ लोग होनेवाली घटनाओंका कारण पुरुषार्थको बताते हैं तथा कुछ श्रेष्ठ मनुष्य कर्मको उसका कारण बताते हैं। हे विप्रो! अन्य लोग दैव (भाग्य)-को और कुछ तत्त्वचिन्तक स्वभावको उसका कारण बताते हैं। इस प्रकार पुरुषार्थ, कर्म, दैव तथा स्वभावको कारण माना गया है। कर्ममार्गका अनुसरण करनेवाले जीव जगत्की विषमताके प्रति पूर्वोक्त चार कारणोंमेंसे किसी एकको कारण न मानकर उनके समुच्चयको कारण मानते हैं; क्योंकि वे इन चारोंसे भी परे सकलनियन्ता महेश्वरको नहीं जानते हैं। सत्त्वगुणमें स्थित समदर्शी लोग जगत्के मायामय होनेके कारण पूर्वोक्त कारणचतुष्टयोंमेंसे नामभेदके रूपमें न तो किसी एकको और न किन्हीं दोको कारण मानते हैं॥ २५४—२५६ १/२॥ |
| नाम रूपं च भूतानां कृतानां च प्रपञ्चनम्॥ २५७<br><br>वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः।<br>ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु वृत्तयः॥ २५८<br><br>शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः।<br>एवंविधाः सृष्टयस्तु ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ २५९<br><br>शर्वर्यन्ते प्रदृश्यन्ते सिद्धिमाश्रित्य मानसीम्।<br>एवंभूतानि सृष्टानि स्थावराणि चराणि च॥ २६० | उन [ब्रह्मरूपी] महेश्वरने पूर्वकल्पके भूतोंके नाम, रूप तथा प्रपंचको सर्गके आदिमें वेदके शब्दोंसे ही निर्मित किया। ब्रह्माजी रात्रिके अन्तमें (प्रलय समाप्त होनेपर) उत्पन्न ऋषियोंके नाम एवं उनकी जो वृत्तियाँ वेदोंमें हैं, उन सबको उन्हें प्रदान करते हैं। अव्यक्तसे जन्म लेनेवाले ब्रह्माकी इस प्रकारकी सृष्टियाँ होती हैं। [ब्रह्माकी] रात्रिके अन्तमें मानसी सिद्धिका आश्रय लेकर सृजित किये गये इस प्रकारके स्थावर-जंगम प्राणी दिखायी देते हैं॥ २५७—२६०॥ |
| यदास्य ताः प्रजाः सृष्टा न व्यवर्धन्त सत्तमाः।<br>तमोमात्रावृतो ब्रह्मा तदा शोकेन दुःखितः॥ २६१<br><br>ततः स विदधे बुद्धिमर्थनिश्चयगामिनीम्।<br>अथात्मनि समद्राक्षीत्तमोमात्रां नियामिकाम्॥ २६२<br><br>रजः सत्त्वं परित्यज्य वर्तमानां स्वधर्मतः।<br>ततः स तेन दुःखेन दुःखं चक्रे जगत्पतिः॥ २६३ | हे सत्तमो! जब उनकी वे सृजित प्रजाएँ वृद्धिको प्राप्त नहीं हुईं; तब तमोमात्रासे आवृत ब्रह्मा शोकसे दुःखित हो उठे। इसके बाद उन्होंने अर्थका निश्चय करनेवाली बुद्धिको धारण किया और सत्त्व तथा रजोगुणोंका परित्याग करके अपने धर्मसे वर्तमान नियामिका तमोमात्राको अपने अन्दर देखा। तब वे जगत्पति उस दुःखसे बहुत दुःखित हुए॥ २६१—२६३॥ |
| तमश्च व्यनुदत्पश्चाद्रजः सत्त्वं तमावृणोत्।<br>तत्तमः प्रतिनुन्नं वै मिथुनं समजायत॥ २६४ | तदनन्तर उन्होंने तमोगुणको प्रेरित किया; उस तमने रज तथा सत्त्वको आवृत्त किया। इस प्रकार प्रेरित |
| ३२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| अधर्मस्तमसो जज्ञे हिंसाशोकादजायत।<br>ततस्तस्मिन् समुद्भूते मिथुने दारुणात्मिके ॥ २६५<br>गतासुर्भगवानासीत्प्रीतिश्चैनमशिश्रियत् ।<br>स्वां तनुं स ततो ब्रह्मा तामपोहत भास्वराम् ॥ २६६<br>द्विधा कृत्वा स्वकं देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् ।<br>अर्धेन नारी सा तस्य शतरूपा व्यजायत ॥ २६७<br>प्रकृतिं भूतधात्रीं तां कामाद्वै सृष्टवान् प्रभुः।<br>सा दिवं पृथिवीं चैव महिम्ना व्याप्यधिष्ठिता ॥ २६८<br>ब्रह्मणः सा तनुः पूर्वा दिवमावृत्य तिष्ठति।<br>या त्वर्धात्सृजतो नारी शतरूपा व्यजायत ॥ २६९<br><br>सा देवी नियुतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम्।<br>भर्तारं दीप्तयशसं पुरुषं प्रत्यपद्यत ॥ २७० | हुआ वह तम ही दो रूपोंमें उत्पन्न हुआ ॥ २६४॥<br>तमसे अधर्म उत्पन्न हुआ और शोकसे हिंसा उत्पन्न हुई। तब भयानक रूपवाले उस मिथुन (अधर्म और हिंसा)-के प्रादुर्भूत होनेपर भगवान् [ब्रह्मा] प्राणहीन हो गये और प्रीतिने इनकी सेवा की। इसके बाद ब्रह्माने अपने उस दीप्त शरीरको अपोहित कर लिया। अपने देहको दो भागोंमें करके वे आधे शरीरसे पुरुष हो गये और उनके आधे शरीरसे नारी शतरूपा उत्पन्न हुई। ब्रह्माने प्राणियोंकी धात्री उस प्रकृतिको कामनापूर्वक उत्पन्न किया था; वे अपनी महिमासे स्वर्ग तथा पृथिवीको व्याप्त करके अधिष्ठित हैं। ब्रह्माका वह पूर्व शरीर स्वर्गको आवृत करके स्थित है। सृजन करनेवाले ब्रह्माके आधे शरीरसे जो नारी शतरूपा उत्पन्न हुई थीं, उन्होंने नियुत (दस लाख) वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप करके दीप्त यशवाले पुरुषको पतिरूपमें प्राप्त किया ॥ २६५-२७० ॥ | | स वै स्वायम्भुवः पूर्वं पुरुषो मनुरुच्यते।<br>तस्यैकसप्ततियुगं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ २७१<br>लेभे स पुरुषः पत्नीं शतरूपामयौनिजाम्।<br>तया सार्धं स रमते तस्मात्सा रतिरुच्यते ॥ २७२<br>प्रथमः सम्प्रयोगोऽत्मा कल्पादौ समपद्यत ।<br>विराजमसृजद् ब्रह्मा सोऽभवत्पुरुषो विराट् ॥ २७३<br>सम्राट् च शतरूपा वै वैराजः स मनुः स्मृतः।<br>स वैराजः प्रजासर्गं ससर्ज पुरुषो मनुः ॥ २७४<br>वैराजात्पुरुषाद्वीराच्छतरूपा व्यजायत।<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ पुत्रौ द्वौ लोकसम्मतौ ॥ २७५<br>कन्ये द्वे च महाभागे याभ्यां जाता इमाः प्रजाः।<br>देवी नाम तथाकूतिः प्रसूतिश्चैव ते उभे ॥ २७६ | वे पूर्वपुरुष ही स्वायम्भुव मनु कहे जाते हैं। उनका इकहत्तर चतुर्युगी मन्वन्तर कहा जाता है। उस पुरुषने अयोन निजा शतरूपाको पत्नीरूपमें प्राप्त किया। वे उनके साथ रमण करते हैं, अतः वे 'रति' कही जाती हैं। कल्पके आदिमें [यह] पहला परस्पर संयोग हुआ। ब्रह्माने विराट्को उत्पन्न किया था; वे पुरुष ही विराट् थे। शतरूपा और वे वैराज (विराट्पुत्र) मनुको सम्राट् कहा गया है। उन वैराज पुरुष मनुने प्रजासर्गका सृजन किया। शतरूपाने वीर वैराज पुरुषसे प्रियव्रत तथा उत्तानपाद [नामक] दो लोकमान्य पुत्रोंको उत्पन्न किया। उन्होंने दो महाभाग्यशालिनी कन्याओंको भी उत्पन्न किया, जिनसे ये प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं। वे दोनों देवी आकूति तथा प्रसूति नामवाली थीं ॥ २७१-२७६ ॥ | | स्वायम्भुवः प्रसूतिं तु दक्षाय प्रददौ प्रभुः।<br>प्राणो दक्ष इति ज्ञेयः सङ्कल्पो मनुरुच्यते ॥ २७७<br>रुचेः प्रजापतेः सोऽथ आकूतिं प्रत्यपादयत्।<br>आकृत्यां मिथुनं जज्ञे मानसस्य रुचेः शुभम् ॥ २७८ | प्रभु स्वायम्भुव मनुने प्रसूतिको दक्षको अर्पित कर दिया। दक्षको प्राण जानना चाहिये और मनुको संकल्प कहा जाता है। उन्होंने आकूतिको रुचिप्रजापतिको दिया। ब्रह्माके मानसपुत्र रुचिकी मिथुन (जुड़वाँ) सन्तानें |
| अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव | ३२७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यज्ञश्च दक्षिणा चैव यमलौ सम्बभूवतुः।<br>यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे॥ २७९<br>यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>एतस्य पुत्रा यज्ञस्य तस्माद्यामाश्च ते स्मृताः॥ २८०<br>अजितश्चैव शुक्रश्च गणौ द्वौ ब्रह्मणा कृतौ।<br>यामाः पूर्वं प्रजाता ये तेऽभवंस्तु दिवौकसः॥ २८१ | आकूतिसे उत्पन्न हुईं। यज्ञ तथा दक्षिणा—ये जुड़वाँ सन्तानें हुईं। दक्षिणासे यज्ञके बारह पुत्रोंने जन्म लिया। वे देवगण, स्वायम्भुव मन्वन्तरमें ‘याम’—इस नामसे प्रसिद्ध हुए; वे इस यज्ञके पुत्र थे, इसलिये वे ‘याम’ कहे गये हैं। ब्रह्माने अजित तथा शुक्र—इन दो गणोंको उत्पन्न किया था। पूर्वमें जो ‘याम’ उत्पन्न हुए थे, वे देवता हुए॥ २७७–२८१॥ |
| स्वायम्भुवसुतायां तु प्रसूत्यां लोकमातरः।<br>तस्यां कन्याश्चतुर्विंशद्दक्षस्त्वजनयत्प्रभुः॥ २८२<br>सर्वास्ताश्च महाभागाः सर्वाः कमललोचनाः।<br>भोगवत्यश्च ताः सर्वाः सर्वास्ता योगमातरः॥ २८३<br>सर्वाश्च ब्रह्मवादिन्यः सर्वा विश्वस्य मातरः।<br>श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा क्रिया तथा॥ २८४<br>बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदश।<br>पत्न्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायणीः प्रभुः॥ २८५<br>दाराण्येतानि वै तस्य विहितानि स्वयम्भुवा।<br>ताभ्यः शिष्टा यवीयस्य एकादश सुलोचनाः॥ २८६<br>सती ख्यात्यथ सम्भूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा।<br>सन्नतिश्चानसूया च ऊर्जा स्वाहा स्वधा तथा॥ २८७<br>तास्तथा प्रत्यपद्यन्त पुनरन्ये महर्षयः।<br>रुद्रो भृगुर्मरीचिश्च अङ्गिराः पुलहः क्रतुः॥ २८८<br>पुलस्त्योऽत्रिवसिष्ठश्च पितरोऽग्निस्तथैव च। | प्रभु दक्षने स्वायम्भुव [मनु]-की पुत्री उस प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं; वे लोकमाताएँ हुईं। वे सभी महाभाग्यशालिनी, कमलके समान नेत्रवाली, भोगवती, योगमाताएँ, ब्रह्मवादिनी तथा विश्वकी माताएँ थीं। उनमें जो श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि एवं कीर्ति—तेरह [पुत्रियाँ] थीं, उन दक्षकन्याओंको प्रभु धर्मने पत्नीके रूपमें ग्रहण कर लिया। स्वायम्भुवने इन सबको उन धर्मकी पत्नी बनाया। उन सभीसे कनिष्ठ जो शिष्ट तथा सुन्दर नेत्रोंवाली ग्यारह [कन्याएँ] थीं, वे सती, ख्याति, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा एवं स्वधा [नामवाली] थीं। उन्हें अन्य महर्षियोंने प्राप्त किया; वे रुद्र, भृगु, मरीचि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य, अत्रि, वसिष्ठ, पितर तथा अग्नि थे॥ २८२–२८८ १/२॥ |
| सतीं भवाय प्रायच्छत् ख्यातिं च भृगवे ततः॥ २८९<br>मरीचये च सम्भूतिं स्मृतिमङ्गिरसे ददौ।<br>प्रीतिं चैव पुलस्त्याय क्षमां वै पुलहाय च॥ २९०<br>क्रतवे सन्नतिं नाम अनसूयां तथात्रये।<br>ऊर्जां ददौ वसिष्ठाय स्वाहामप्यग्नये ददौ॥ २९१<br>स्वधां चैव पितृभ्यस्तु तास्वपत्यानि बोधत।<br>एताः सर्वा महाभागाः प्रजास्वनुसृताः स्थिताः॥ २९२<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु यावदाभूतसम्प्लवम्। | उन्होंने सतीको भव (रुद्र)-को तथा ख्यातिको भृगुको दे दिया। इसके बाद उन्होंने सम्भूतिको मरीचिको और स्मृतिको अंगिराको प्रदान कर दिया। उन्होंने प्रीतिको पुलस्त्यको, क्षमाको पुलहको, सन्नतिको क्रतुको, अनसूयाको अत्रिको तथा ऊर्जाको वसिष्ठको अर्पित कर दिया और स्वाहाको अग्निको तथा स्वधाको पितरोंको सौंप दिया। अब उनसे उत्पन्न सन्तानोंको जान लीजिये॥ २८९–२९१ १/२॥ |
| श्रद्धा कामं विजज्ञे वै दर्पो लक्ष्मीसुतः स्मृतः॥ २९३<br>धृत्यास्तु नियमः पुत्रस्तुष्ट्याः सन्तोष एव च।<br>पुष्ट्या लोभः सुतश्चापि मेधापुत्रः श्रुतस्तथा॥ २९४<br>क्रियायामभवत्पुत्रो दण्डः समय एव च।<br>बुद्ध्यां बोधः सुतस्तद्वत्प्रमादोऽप्युपजायत॥ २९५ | ये समस्त महाभाग्यवती कन्याएँ सभी मन्वन्तरोंमें प्रलयपर्यन्त प्रजाओंके सृजनमें लगी रहती थीं। श्रद्धाने कामको उत्पन्न किया। दर्प लक्ष्मीका पुत्र कहा गया है। धृतिका पुत्र नियम, तुष्टिका पुत्र सन्तोष, पुष्टिका पुत्र लोभ तथा मेधाका पुत्र श्रुत है। क्रियासे दण्ड तथा समय |
| ३२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| लज्जायां विनयः पुत्रो व्यवसायो वसोः सुतः।<br>क्षेमः शान्तिसुतश्चापि सुखं सिद्धेर्व्यजायत॥ २९६<br><br>यशः कीर्तिसुतश्चापि इत्येते धर्मसूनवः।<br>कामस्य हर्षः पुत्रो वै देव्यां प्रीत्यां व्यजायत॥ २९७ | [नामक] पुत्र उत्पन्न हुए। बुद्धिसे बोध तथा प्रमाद [नामक] पुत्र उत्पन्न हुए। लज्जासे विनय नामक पुत्र हुआ। वसुका पुत्र व्यवसाय तथा शान्तिका पुत्र क्षेम है। सिद्धिसे सुख [नामक पुत्र] उत्पन्न हुआ। कीर्तिका पुत्र यश है। ये सब धर्मके पुत्र हैं। कामका पुत्र हर्ष देवी प्रीतिसे उत्पन्न हुआ। धर्मका यह सुतोदर्क सर्ग बता दिया गया॥ २९२—२९७१/२॥ |
| इत्येष वै सुतोदर्कः सर्गो धर्मस्य कीर्तितः।<br>जज्ञे हिंसा त्वधर्माद्वै निकृतिं चानृतं सुतम्॥ २९८<br><br>निकृत्यां तु द्वयं जज्ञे भयं नरक एव च।<br>माया च वेदना चापि मिथुनद्वयमेतयोः॥ २९९<br><br>भूयो जज्ञेऽथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम्।<br>वेदनायाः सुतश्चापि दुःखं जज्ञे च रौरवः॥ ३००<br><br>मृत्योर्व्याधिजराशोकक्रोधासूयाश्च जज्ञिरे।<br>दुःखोत्तराः सुता ह्येते सर्वे चाधर्मलक्षणाः॥ ३०१<br><br>नैषां भार्यास्तु पुत्राश्च सर्वे ह्येते परिग्रहाः।<br>इत्येष तामसः सर्गो जज्ञे धर्मनियामकः॥ ३०२ | हिंसाने अधर्मसे निकृति [नामकी कन्या] तथा अनृत पुत्रको उत्पन्न किया। निकृतिसे भय तथा नरक [दो पुत्र] उत्पन्न हुए और इनकी [पत्नियां] माया तथा वेदना जुड़वाँ कन्याएँ हुईं। इसके बाद मायाने प्राणियोंका हरण करनेवाले मृत्युको जन्म दिया और वेदनासे रौरवके द्वारा पुत्ररूपमें 'दुःख' उत्पन्न हुआ। मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, क्रोध तथा असूया उत्पन्न हुए। उत्तरोत्तर दुःख देनेवाले ये सभी पुत्र अधर्मके लक्षणोंसे युक्त थे। इन सबको भार्याएँ तथा पुत्र नहीं थे; ये सभी परिग्रह स्वभाववाले थे। इस प्रकार यह धर्मनियामक तामस सर्ग उत्पन्न हुआ॥ २९८—३०२॥ |
| प्रजाः सृजेति व्यादिष्टो ब्रह्मणा नीललोहितः।<br>सोऽभिध्याय सतीं भार्यां निर्ममे ह्यात्मसम्भवान्॥ ३०३ | ब्रह्माने नीललोहित शिवसे कहा था—‘प्रजाओंका सृजन कीजिये।' तब उन्होंने [अपनी] भार्या सतीका ध्यान करके पुत्रोंका सृजन किया। उन्होंने न अधिक, न कम, अपने ही समान तथा व्याघ्रचर्म धारण किये हुए |
| नाधिकान च हीनांस्तान् मानसानात्मनः समान्।<br>सहस्रं हि सहस्राणां सोऽसृजत्कृत्तिवाससः॥ ३०४ | हजारों-हजार मानसपुत्रों [रुद्रगणों]-को उत्पन्न किया। |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३२९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तुल्यानेवात्मनः सर्वान् रूपतेजोबलश्रुतैः।<br>पिङ्गलान् सनिषङ्गांश्च सकपर्दान् सलोहितान्॥ ३०५<br>विशिष्टान् हरिकेशांश्च दृष्टिघ्नांश्च कपालिनः।<br>महारूपान् विरूपांश्च विश्वरूपान् स्वरूपिणः॥ ३०६<br>रथिनश्चर्मिणश्चैव वर्मिणश्च वरूथिनः।<br>सहस्रशतबाहूंश्च दिव्यान् भौमान्तरिक्षगान्॥ ३०७<br>स्थूलशीर्षानष्टदंष्ट्रान्द्विजिव्हांस्तांस्त्रिलोचनान्।<br>अन्नादान् पिशिताशांश्च आज्यपान् सोमपानपि॥ ३०८<br>मीढुषोऽतिकपालांश्च शितिकण्ठोध्वंरेतसः।<br>हव्यादाञ्छ्रुतधर्मांश्च धर्मिणो ह्यथ बर्हिणः॥ ३०९<br>आसीनान् धावतश्चैव पञ्चभूतान् सहस्रशः।<br>अध्यापिनोऽध्यायिनश्च जपतो युञ्जतस्तथा॥ ३१०<br>धूमवन्तो ज्वलन्तश्च नदीमन्तोऽतिदीप्तिनः।<br>वृद्धान् बुद्धिमन्तश्चैव ब्रह्मिष्ठाञ्शुभदर्शनान्॥ ३११<br>नीलग्रीवान्सहस्राक्षान्सर्वांश्चाथ क्षमाकरान्।<br>अदृश्यान् सर्वभूतानां महायोगान् महौजसः॥ ३१२<br>भ्रमन्तोऽभिद्रवन्तश्च प्लवन्तश्च सहस्रशः।<br>अयातयामानसृजद्रुद्रानेतान् सुरोत्तमान्॥ ३१३ | उन्होंने रूप-तेज-बल-ज्ञानमें अपने ही सदृश, पिंगलवर्णवाले, निषंगयुक्त, जटाजूटधारी, लोहितवर्णवाले, विशिष्ट, हरित केशवाले, देखनेमात्रसे नाश करनेवाले, कपालधारी, विशाल रूपवाले, विकृत रूपवाले, विश्वरूप, स्वरूपवान्, रथारूढ़, ढाल-कवच-वरूथ धारण किये हुए, लाखों भुजाओंवाले, स्वर्ग-पृथ्वी-अन्तरिक्षमें गमन करनेवाले, स्थूल सिरवाले, आठ दाढ़ोंवाले, दो जीभोंवाले, तीन नेत्रोंवाले, अन्न खानेवाले, मांस भक्षण करनेवाले, घृत पीनेवाले, सोमपान करनेवाले, सुन्दर, बड़े-बड़े कपालवाले, नीले कण्ठवाले, ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी), हव्य खानेवाले, वेदपरायण, धार्मिक, मोरपंखसे सुशोभित, कुछ बैठे हुए, कुछ दौड़ते हुए, पाँच भूतोंवाले, कुछ अध्यापन करनेवाले, कुछ अध्ययन करनेवाले, कुछ जप करते हुए, कुछ योगाभ्यास करते हुए, कुछ धूमयुक्त, कुछ दीप्तिमान्, गंगाको धारण किये हुए, अत्यन्त कान्तिमान्, वृद्ध, बुद्धिसम्पन्न, ब्रह्मिष्ठ, शुभ दर्शनवाले, नीलग्रीवा (कण्ठ)-वाले, हजार नेत्रोंवाले, क्षमाकी निधि, सभी प्राणियोंसे अदृश्य, महान् योगवाले, महातेजस्वी, भ्रमण करते हुए, इधर-उधर भागते हुए, कूदते हुए तथा अयातयाम—इन हजारों-हजार उत्तम रुद्रदेवताओंको उत्पन्न किया॥ ३०३-३१३॥ |
| ब्रह्मा दृष्ट्वाऽब्रवीदेनं मास्त्राक्षीरीदृशीः प्रजाः।<br>स्रष्टव्या नात्मनस्तुल्याः प्रजा देव नमोऽस्तु ते॥ ३१४<br>अन्याः सृज त्वं भद्रं ते प्रजा वै मृत्युसंयुताः।<br>नारप्स्यन्ते हि कर्माणि प्रजा विगतमृत्युवः॥ ३१५ | इन्हें देखकर ब्रह्माजीने इन [नीललोहित]-से कहा—‘ऐसी प्रजाओंका सृजन मत कीजिये; अपने सदृश प्रजाओंकी सृष्टि आपको नहीं करनी चाहिये। हे देव! आपको नमस्कार है। आपका कल्याण हो। आप मृत्युयुक्त अन्य प्रजाओंका सृजन कीजिये; क्योंकि मृत्युरहित प्रजाएँ कार्योंका आरम्भ नहीं करेंगी’॥ ३१४-३१५॥ |
| एवमुक्तोऽब्रवीदेनं नाहं मृत्युजरान्विताः।<br>प्रजाः स्रक्ष्यामि भद्रं ते स्थितोऽहं त्वं सृज प्रजाः॥ ३१६<br>एते ये वै मया सृष्टा विरूपा नीललोहिताः।<br>सहस्त्राणां सहस्रं तु आत्मनो निःसृताः प्रजाः॥ ३१७<br>एते देवा भविष्यन्ति रुद्रा नाम महाबलाः।<br>पृथिव्यामन्तरिक्षे च दिक्षु चैव परिश्रिताः॥ ३१८<br>शतरुद्राः समात्मानो भविष्यन्तीति याज्ञिकाः।<br>यज्ञभाजो भविष्यन्ति सर्वदेवगणैः सह॥ ३१९ | ब्रह्माके द्वारा ऐसा कहे गये रुद्रने उनसे कहा—मैं मृत्यु तथा जरासे युक्त प्रजाओंका सृजन नहीं करूँगा। आपका कल्याण हो। अब मैं [शान्त होकर] बैठता हूँ और आप ही सृजन कीजिये। जिन हजारों-हजार विरूप नीललोहित रुद्रोंको मैंने सृजित किया है, वे मेरी आत्मासे निकली हुई प्रजाएँ हैं। ये रुद्र नामवाले महाबली देवता होंगे। ये पृथ्वी, आकाश तथा सभी दिशाओंमें व्याप्त रहेंगे। इनमें समान आत्मावाले सौ रुद्र याज्ञिक होंगे; वे सभी देवताओंके साथ |
३३० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मन्वन्तरेषु ये देवा भविष्यन्तीह भेदतः।<br>सार्धं तैरिज्यमानास्ते स्थास्यन्तीहायुगक्षयात्॥ ३२० | यज्ञभाग ग्रहण करनेवाले होंगे। सभी मन्वन्तरोंमें जो देवता भेदपूर्वक यहाँपर होंगे, उनके साथ पूजित होते हुए वे सभी रुद्र युगक्षयपर्यन्त यहाँ स्थित रहेंगे॥ ३१६—३२०॥ |
| एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा महादेवेन धीमता।<br>प्रत्युवाच नमस्कृत्य हृष्यमाणः प्रजापतिः॥ ३२१<br><br>एवं भवतु भद्रं ते यथा ते व्याहृतं विभो।<br>ब्रह्मणा समनुज्ञाते तथा सर्वमभूत्किल॥ ३२२ | बुद्धिमान् महादेवजीके द्वारा इस प्रकार कहे गये प्रजापति ब्रह्माजी प्रसन्न होकर प्रणाम करके उनसे बोले—'हे विभो! आपने जैसा कहा है, वैसा ही हो; आपका कल्याण हो।' ब्रह्माके ऐसा कहनेके बाद सब कुछ उसी प्रकारसे हुआ॥ ३२१-३२२॥ |
| ततः प्रभृति देवेशो न चासूत वै प्रजाः।<br>ऊर्ध्वरेताः स्थितः स्थाणुर्यावदाभूतसम्प्लवम्॥ ३२३<br><br>यस्मादुक्तः स्थितोऽस्मीति तस्मात्स्थाणुरिति स्मृतः।<br>एष देवो महादेवः पुरुषोऽर्कसमद्युतिः॥ ३२४<br><br>अर्धनारीनरवपुस्तेजसा ज्वलनोपमः।<br>स्वेच्छ्यासौ द्विधाभूतः पृथक् स्त्री पुरुषः पृथक्॥ ३२५<br><br>स एवैकादशार्धेन स्थितोऽसौ परमेश्वरः।<br>तत्र या सा महाभागा शङ्करस्यार्धकायिनी॥ ३२६<br><br>प्रागुक्ता तु महादेवी स्त्री सैवेह सती ह्यभूत्।<br>हिताय जगतां देवी दक्षेणाराधिता पुरा॥ ३२७<br><br>कार्यार्थं दक्षिणं तस्याः शुक्लं वामं तथासितम्।<br>आत्मानं विभजस्वेति प्रोक्ता देवेन शम्भुना॥ ३२८<br><br>सा तथोक्ता द्विधाभूता शुक्ला कृष्णा च वै द्विजाः।<br>तस्या नामानि वक्ष्यामि शृण्वन्तु च समाहिताः॥ ३२९ | उसी समयसे देवताओंके स्वामी शिवने प्रजाओंका सृजन नहीं किया और वे प्रलयपर्यन्त स्थाणुवत् स्थित रहे तथा ब्रह्मचारी बने रहे। चूँकि उन्होंने कहा था कि 'मैं स्थित हूँ'—इसलिये वे 'स्थाणु' कहे गये। ये भगवान् महादेव पुरुषस्वरूप, सूर्यके समान तेजवाले, अपने तेजसे अग्निके समान प्रतीत होनेवाले तथा आधा भाग नर और आधा भाग नारीके शरीरवाले हैं। वे अपनी इच्छासे दो भागोंमें अलग-अलग स्त्री तथा पुरुषरूपमें विभक्त हुए। वे परमेश्वर आधे भागसे ग्यारह रूपोंमें स्थित हैं। उसमें जो शंकरकी अर्धांगिनी महाभागा महादेवी कही गयी हैं; वे ही भगवती पूर्वकालमें दक्षके द्वारा आराधित होकर जगत्के हितके लिये सतीके रूपमें आविर्भूत हुई थीं। सृष्टिकार्यके लिये उनका दाहिना भाग श्वेत तथा बायाँ भाग कृष्ण था। जब भगवान् शम्भुने उनसे कहा कि अपनेको विभक्त करो, तब हे द्विजो! उनके ऐसा कहनेपर वे शुक्ल तथा कृष्ण दो रूपोंमें विभक्त हो गयीं। अब मैं उनके नाम बताऊँगा; आपलोग एकाग्रचित्त होकर सुनिये॥ ३२३—३२९॥ |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप··· सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्वाहा स्वधा महाविद्या मेधा लक्ष्मीः सरस्वती।<br>सती दाक्षायणी विद्या इच्छा शक्तिः क्रियात्मिका॥ ३३०<br>अपर्णा चैकपर्णा च तथा चैवैकपाटला।<br>उमा हैमवती चैव कल्याणी चैकमातृका॥ ३३१<br>ख्यातिः प्रज्ञा महाभागा लोके गौरिति विश्रुता।<br>गणाम्बिका महादेवी नन्दिनी जातवेदसी॥ ३३२<br>एकरूपमथैतस्याः पृथग्देहविभावनात्।<br>सावित्री वरदा पुण्या पावनी लोकविश्रुता॥ ३३३<br>आज्ञा आवेशनी कृष्णा तामसी सात्त्विकी शिवा।<br>प्रकृतिर्विकृता रौद्री दुर्गा भद्रा प्रमाथिनी॥ ३३४<br>कालरात्रिर्महामाया रेवती भूतनायिका।<br>द्वापरान्तविभागे च नामानीमानि सुव्रताः॥ ३३५<br>गौतमी कौशिकी चार्या चण्डी कात्यायनी सती।<br>कुमारी यादवी देवी वरदा कृष्णपिङ्गला॥ ३३६<br>बर्हिध्वजा शूलधरा परमा ब्रह्मचारिणी।<br>महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी दृषद्वत्येकशूलधृक्॥ ३३७<br>अपराजिता बहुभुजा प्रगल्भा सिंहवाहिनी।<br>शुम्भादिदैत्यहन्त्री च महामहिषमर्दिनी॥ ३३८<br>अमोघा विन्ध्यनिलया विक्रान्ता गणनायिका।<br>देव्या नामविकाराणि इत्येतानि यथाक्रमम्॥ ३३९<br>भद्रकाल्या मयोक्तानि सम्यक्फलप्रदानि च।<br>ये पठन्ति नरास्तेषां विद्यते न च पातकम्॥ ३४०<br>अरण्ये पर्वते वापि पुरे वाप्यथवा गृहे।<br>रक्षामेतां प्रयुञ्जीत जले वाथ स्थलेऽपि वा॥ ३४१<br>व्याघ्रकुम्भीनचोरेभ्यो भयस्थाने विशेषतः।<br>आपत्स्वपि च सर्वासु देव्या नामानि कीर्तयेत्॥ ३४२<br>आर्यकग्रहभूतैश्च पूतनामातृभिस्तथा।<br>अभ्यर्दितानां बालानां रक्षामेतां प्रयोजयेत्॥ ३४३ | स्वाहा, स्वधा, महाविद्या, मेधा, लक्ष्मी, सरस्वती, सती, दाक्षायणी, विद्या, इच्छा, शक्ति, क्रियात्मिका, अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला, उमा, हैमवती, कल्याणी, एकमात्रुका, ख्याति, प्रज्ञा, महाभागा, लोकप्रसिद्ध गौरी, गणाम्बिका, महादेवी, नन्दिनी तथा जातवेदसी—ये नाम हैं। पृथक् देह धारण करनेसे पहले इनका एक ही रूप था। सावित्री, वरदा, पुण्या, पावनी, लोकविश्रुता, आज्ञा, आवेशनी, कृष्णा, तामसी, सात्त्विकी, शिवा, प्रकृति, विकृता, रौद्री, दुर्गा, भद्रा, प्रमाथिनी, कालरात्रि, महामाया, रेवती, भूतनायिका—हे सुव्रतो! द्वापरयुगके अन्तमें ये उनके नाम हुए। इसी प्रकार गौतमी, कौशिकी, आर्या, चण्डी, कात्यायनी, सती, कुमारी, यादवी, देवी, वरदा, कृष्णपिंगला, बर्हिध्वजा, शूलधरा, परमा, ब्रह्मचारिणी, महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी, दृषद्वती, एकशूलधृक्, अपराजिता, बहुभुजा, प्रगल्भा, सिंहवाहिनी, शुम्भादिदैत्यहन्त्री, महामहिषमर्दिनी, अमोघा, विन्ध्यनिलया, विक्रान्ता, गणनायिका—मैंने देवी भद्रकालीके इन नामविकारोंको यथाक्रम बता दिया, जो सम्यक् फल प्रदान करनेवाले हैं। जो लोग इनका पाठ करते हैं, उनका पाप शेष नहीं रह जाता है। जंगलमें, पर्वतपर, नगरमें, घरमें, जल अथवा स्थल कहीं भी रक्षाके लिये इनका प्रयोग करना चाहिये। विशेष रूपसे बाघ, हाथी तथा चोरोंसे भयके स्थानमें और सभी प्रकारकी विपत्तियोंमें देवीके नामोंको पढ़ना चाहिये। बुरे ग्रहों, भूतों, पूतना तथा मातृगणोंसे पीड़ित शिशुओंकी रक्षाके लिये इन नामोंका प्रयोग करना चाहिये॥ ३३०—३४३॥ |
| महादेवी कले द्वे तु प्रज्ञा श्रीश्च प्रकीर्तिते।<br>आभ्यां देवीसहस्त्राणि यैर्व्याप्तमखिलं जगत्॥ ३४४<br>अनया देवदेवोऽसौ सत्या रुद्रो महेश्वरः।<br>आतिष्ठत्सर्वलोकानां हिताय परमेश्वरः॥ ३४५<br>रुद्रः पशुपतिश्चासीत्पुरा दग्धं पुरत्रयम्।<br>देवाश्च पशवः सर्वे बभूवुस्तस्य तेजसा॥ ३४६<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि आदिसर्गक्रमं शुभम्।<br>स याति ब्रह्मणो लोकं श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्॥ ३४७ | 'प्रज्ञा' तथा 'श्री'—ये महादेवीकी दो कलाएँ कही गयी हैं। इन दोनोंसे हजारों देवियाँ उत्पन्न हुई हैं, जिनके द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। देवदेव महेश्वर परमेश्वर रुद्र सभी लोकोंके हितके लिये इन सतीके साथ [सर्वदा] विद्यमान रहते हैं। रुद्र पशुपति हैं। इन्होंने ही पूर्वकालमें त्रिपुरको दग्ध किया था। उन्हींके तेजसे सभी देवता पशु [जीव] हुए। जो [व्यक्ति] आदिसृष्टिके शुभ क्रमको पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा उत्तम द्विजोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोकको जाता है॥ ३४४—३४७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सृष्टिबिस्तारो नाम सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सृष्टिविस्तार' नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७०॥